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सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

9अक्टूबर को चे का स्मृति दिवस- महान क्रांतिकारी चेग्वारा की विरासत -3- फिदेल कास्त्रो

      मैंने पहले कहा कि विचार हथियारों से ज्यादा शक्तिशाली हैं। इसी के साथ मैं यह कहता हूं कि शिक्षा ही वह उपकरण है जिसके जरिए मानव कहे जाने वाले इन जीवों का विकास हुआ है, जो सहज बुध्दि या प्राकृतिक नियमों से नियंत्रित होते हैं। डार्विन ने यही दिखाया है और आज इससे कोई इनकार नहीं करता...मैं विकास के सिद्धांत की बात कर रहा हूं। मुझे वह क्षण याद है जब पोप जॉन पॉल द्वितीय ने कहा था कि विकास का सिद्धांत सृजन के सिद्धांत का विरोधी नहीं है। मैं इस तरह के कथनों की बहुत प्रशंसा करता हूं क्योंकि ये वैज्ञानिक सिद्धांत और धार्मिक विश्वास में परस्पर विरोध पर विराम लगाते हैं। इन मानवों को यदि जंगल में छोड़ दिया जाए तो वे जानवरों की तरह ही रहेंगे। वे बुद्धि संपन्न जीव हैं और हम जानते हैं कि मानव खोपड़ी में क्या है। हम यह भी जानते हैं कि केवल मानव ही ऐसे जीव हैं जिनका मस्तिष्क जन्म के ढाई वर्ष बाद तक विकसित होता रहता है। आप विश्वविद्यालय के छात्र हैं और आपने इस बारे में कहीं पढ़ा होगा। प्रतिभा के विकास में इसका बहुत प्रभाव पड़ता है।
     यदि बच्चों को ढाई साल की उम्र तक सभी पोषक तत्व नहीं दिए गए तो वे जब छह वर्ष की आयु में स्कूल जाएंगे तो वे पर्याप्त पोषक तत्व पाने वाले बच्चों की तुलना में कम बुद्धि के साथ स्कूल जाएंगे । मैं यह कहना चाहता हूं कि यदि हम बराबरी के अधिकार की पैरवी करना चाहते हैं तो हम छह वर्ष की आयु में बच्चे को जन्मजात मानसिक क्षमता के साथ स्कूल भेजने के अधिकार की बात करें। हम जानते हैं कि जिन बच्चों को इस प्रारंभिक उम्र में पोषक तत्व नहीं मिलते और दुनिया में इस तरह के करोड़ों बच्चे हैं जब वे स्कूल जाते हैं, बशर्ते कि स्कूल हों और उन्हें पढ़ाने के लिए सक्षम अध्यापक हों, तो उनके पढ़ने की बहुत कम संभावनाएं होती हैं। हालांकि ऐसे भी मामले हैं जहां इस अवस्था में पर्याप्त पोषक तत्व तो मिलते हैं लेकिन बाद में उनके लिए कोई स्कूल या अध्यापक नहीं होते ।
     लेकिन मूल रूप से तीसरी दुनिया के देशों में बसे दुनिया के अस्सी प्रतिशत मानवों का क्या हश्र होता है। इन्हीं क्षेत्रों में गरीब लोग बसे हैं जो विकसित क्षमता तो दूर जन्मजात क्षमता को भी बचा कर नहीं रख सकते। यहां पर स्कूल भी नहीं है।
     दुनिया में 86 करोड़ बालिग निरक्षर हैं। बालिगों की बात करने के साथ-साथ वे यह भी बताते हैं कि इन 86 करोड़ निरक्षर बालिगों में से 90 प्रतिशत तीसरी दुनिया में रहते हैं। लेकिन अत्यधिक विकसित देशों में भी निरक्षरता है। उत्तर में हमारे महान पड़ोसी देश में लाखों निरक्षर हैं (सीटियां और कोलाहल), पूरी तरह से निरक्षर। साथ ही लाखों व्यावहारिक निरक्षर भी हैं और इसे कोई... (डॉक्टर डॉक्टर की आवाजें) वह क्या है, डॉक्टर, डॉक्टर के बारे में क्या बात है? (उन्हें कुछ बताया जाता है)।
मैंने लाखों की बात की, लेकिन वास्तव में इनकी संख्या करोड़ों में है, विकसित देशों में नहीं, तीसरी दुनिया के देशों में। उन्हें बताया जाता है कि वे श्रोताओं में से किसी के लिए डॉक्टर लाने के वास्ते कह रहे हैं।) यहां डॉक्टर है। किसको चाहिए? उसे जल्दी से बाहर ले जाओ। डॉक्टर उसे अभी देख लेगा। मेरी बात आशा से लंबी हो रही है। तो मैं आपसे आपस में जुड़े दो महत्वपूर्ण मुद्दों की बात कर रहा था। ये हैं शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा। हम एक अर्जेंटीनियाई डॉक्टर के विषय में बात कर रहे हैं जो डॉक्टर बने रहने के साथ-साथ एक सिपाही भी बन गया। उन्हीं से प्रेरित होकर हमने इस ओर ध्यान देना शुरू किया। मैं कह रहा था कि शिक्षा ही छोटे से पशु को मानव बनाती है। यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए। शिक्षा से ही नैसर्गिक वृत्तियों पर काबू पाया जाता है।
       इसके अलावा शिक्षा के द्वारा ही जेलों को खाली किया जा सकता है। इनमें ऐसे ही लोग हैं जिन्हें शिक्षा नहीं मिली और जिनका ठीक से पोषण नहीं हुआ। हमारे अपने देश में हमें काफी समय बाद यह बात समझ में आई कि चाहे कितने भी कानून बना दिए जाएं, कितने ही स्कूल खोल दिए जाएं, कितने ही अध्यापक प्रशिक्षित कर दिए जाएं, मानवों की शिक्षा के मामले में फिर भी बहुत कुछ करना शेष रह जाएगा। हमारे समाज में लाखों विश्वविद्यालय प्रशिक्षित पेशेवर और बुद्धिजीवी हैं।
     परिवार नामक इकाई का प्रभाव निर्णायक होता है।यदि आप जेलों में जाएं और बंदी बनाए गए 20 से 30 वर्ष की आयु के युवाओं से बात करें तो आपको पता चलेगा कि वे आबादी के बहुत गरीब तबके से हैं । वे उन तबकों से होते हैं जिन्हें हम सीमांत तबके कहते हैं। इसके विपरीत यदि आप अत्यधिक प्रतिस्पर्धी स्कूलों, जिनमें कार्य-निष्पादन और ग्रेडों के आधार पर दाखिले होते हैं, के सामाजिक ताने-बाने को देखें तो आपको पता चलेगा कि वहां अधिकांश बच्चे बुद्धिजीवियों या कलाकर्मियों के हैं।
     इस बात पर ध्यान दिया जाए कि मैं आर्थिक दृष्टि से वर्ग विभेद की बात नहीं कर रहा हूं। नए समाज का निर्माण जितना हम सोचते हैं उससे कहीं अधिक मुश्किल होता है क्योंकि इस दिशा में काम करते हुए आपको बहुत सी नई बातें मालूम होती है। यदि आप 30 प्रतिशत निरक्षरता या पूर्ण तथा व्यावहारिक निरक्षरता दोनों को मिलाकर 90 प्रतिशत निरक्षरता दर के खिलाफ संघर्ष शुरू करें तो आपका ध्यान इसी पर रहता है। इसके बाद कुछ वर्ष बीत जाने के बाद जब आप समाज का गहराई से अध्ययन शुरू करते हैं तब आपको शिक्षा के प्रभाव का पता चलता है।
      मैं आपको बताना चाहता हूं कि निर्धन और सीमांत तबकों में परिवार की इकाई जल्दी टूटती है। इसका शिक्षा पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आप देख सकते हैं कि इनमें से 70 प्रतिशत टूटे हुए परिवारों से हैं और 19 प्रतिशत न तो मां और न पिता, बल्कि उन्हें पालने के लिए जिम्मेदार किसी रिश्तेदार के पास रहते हैं। लेकिन जब बुद्धिजीवियों के परिवार में ऐसा होता है तो परिवार के टूटने का बच्चों पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता है। सामान्यत: वे पिता या मां के पास रहते हैं। परंपरा से वे मां के साथ रहते हैं और क्यूबा के कुल प्रशिक्षित कार्मिक बल में 65 प्रतिशत स्त्रियां हैं। वे 65 प्रतिशत से कुछ ज्यादा ही हैं। यह सब शिक्षा का असर नहीं तो और क्या है? दूसरे शब्दों में क्रांति के बाद भी मां और पिता का शैक्षिक स्तर बच्चों के भविष्य को बहुत प्रभावित करता है।
     कुछ परिस्थितियों, जिनमें साधारण तबकों के बच्चे न्यूनतम ज्ञान के साथ रहते हैं, मैं यहां घर की आर्थिक स्थिति की नहीं बल्कि शैक्षिक स्थिति की बात कर रहा हूं जो पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसी ही बनी रहती है, ऐसी परिस्थितियों में वही कहा जा सकता है जो कि हम कभी-कभी कहते हैं : 'अमुक काम करने वाले या अमुक सेवाएं देने वालों के बच्चे किसी कंपनी के प्रेसीडेंट, या प्रबंधक नहीं बनेंगे या वरिष्ठ स्थानों पर नहीं जाएंगे, वे ज्यादातर कैदखानों में ही जाएंगे।'
     हमने इसका तथा कुछ अन्य बातों का अध्ययन किया है लेकिन उस सब में जाने का यह समय नहीं है। मैं यह सब बताने के लिए कह रहा हूं कि शैक्षिक क्रांति, वास्तव में ही गंभीर शैक्षिक क्रांति के बगैर अन्याय और असमानता बनी रहेगी भले ही देश के सभी नागरिकों की भौतिक जरूरतें पूरी हो जाएं ।

हमने अपने देश में सात साल की उम्र तक प्रत्येक बच्चे के लिए प्रतिदिन एक लीटर दूध की गारंटी दी हुई है। इससे बड़े बच्चों को, सीमित संसाधनों के कारण, हम अन्य डेयरी उत्पादों की सप्लाई की गारंटी देते हैं। सौभाग्य से हम ऐसा कर पाते हैं।
     प्रत्येक बच्चे को इतना दूध अमरीकी डॉलर के एक सेंट की कीमत पर दिया जाता है । उत्तर में बैठा कोई व्यक्ति क्यूबा में अपने किसी मित्र को एक डालर भेजकर 104 दिन के लिए दूध मंगा सकता है ।
     हमारे देश की नाकाबंदी ने हमें राशन प्रणाली अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है। इस नाकाबंदी को चलते हुए 44 साल हो गए हैं । लेकिन हमारे देश में एक भी बच्चा बगैर स्कूल के नहीं मिलेगा, एक भी बच्चा ।
     हमारे देश में किसी प्रकार की मानसिक अपंगता के साथ जो बच्चे पैदा होते हैं उनके बारे में हम गहराई से अध्ययन कर रहे हैं। मामूली, कम, ज्यादा या गंभीर रूप से मंदबुद्धि होने, जिनकी अपनी-अपनी विशेषताएं हैं, के कारणों का हम पता लगा रहे हैं। सौभाग्य से मामूली या कम मंदबुद्धि होने के मामले ही अधिक हैं। हर मामले को दर्ज किया जाता है। केवल बच्चे ही नहीं बल्कि 140,000 से थोड़े अधिक मंद बुद्धि लोग हैं। ऐसे सभी बच्चों का पंजीकरण किया जाता है जो किसी भी रूप में भौतिक या मानसिक रूप से अपंग हैं या नेत्रहीन या गूंगे और बहरे हैं या एक साथ नेत्रहीन, गूंगे और बहरे हैं। और भी कई तरह की मानव त्रासदियां हैं जिनका अध्ययन और जिन पर अनुसंधान किया जाना चाहिए। शुरू में हमें इनके बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं था। वर्षों तक शिक्षा के लिए संघर्ष और व्यवहार के बाद हमें धीरे-धीरे उनके बारे में पता चला। इनके लिए विशेष स्कूल हैं। इन विशेष शिक्षा स्कूलों में 55000 बच्चे दाखिल हैं। हमने बता दिया है कि इन विशेष स्कूलों में बच्चे का छठी से नौवीं कक्षा तक दाखिला रहना ही काफी नहीं है। जो बच्चे सीनियर हाई स्कूल में 12 कक्षा तक या व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए तकनीकी स्कूलों में नहीं जा सकते उन्हें नौवीं कक्षा पूरी कराई जानी चाहिए भले ही उनको एक या दो साल अधिक लग जाएं। वे जो काम कर सकते हैं उसके लिए उन्हें तैयार किया जाना चाहिए तथा उन्हें कोई काम दिया जाना चाहिए । हमें इस तरह की समस्याओं से ग्रस्त बच्चों को कम करके नहीं आंकना चाहिए। उनमें बहुत से काम करने की योग्यता होती है। हम हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकते। इस तरह की अपंगता वाले बच्चों को जो पढ़ाया जाना चाहिए। लेकिन केवल पढ़ाकर हम अपना काम खत्म नहीं समझ सकते। चाहे जैसी अपंगता हो, उनका ध्यान रखा जाता है। हमें इस बात पर संतोष है कि 44 सालों की नाकाबंदी के बावजूद क्यूबा में एक भी बच्चा ऐसा नहीं है जिसे विशेष स्कूल की जरूरत हो और जिसे इस तरह का स्कूल उपलब्ध नहीं हो ।
     मैं एक बात कहना चाहता हूं कि इसे हमारा घमंड नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि जब भी मैं शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा की बात करता हूं तो मुझे नई संभावनाओं के विषय में जानकर शर्म आती है कि हमें इनके बारे में पहले पता क्यों नहीं चला। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि क्यूबा अपनी सफलताओं की डींग मारता है। कुछ ऐसी बातें हैं जिनकी हमें भी जानकारी नहीं थी।

9अक्टूबर को चे का स्मृति दिवस- महान क्रांतिकारी चेग्वारा की विरासत -2- फिदेल कास्त्रो

यहां भी बहुत कम प्रकाश है। यहां प्रकाश करना होगा। ऐसा न हो कि इसे अंधेरा कोना मान कर इस पर पूर्व हमला हो जाए । लेकिन यह स्क्वायर, ये सीढ़ियां अंधा कोना नहीं हैं, यह पूरी तरह से प्रकाशित कोना है, लाखों प्रकाशपुंजों से आलोकित कोना। यह स्क्वायर, ये सीढ़ियां सूर्य जैसी हैं, ऐसा सूर्य जिसे हमने यहां आते ही देखा, जिसे हमने जोसे मार्ती की मूर्ति पर पुष्प चढ़ाते समय देखा (दर्शकों में से किसी ने उनसे कुछ कहा)। हां ,लेकिन सेन मार्टिन की मूर्ति पर हम थोड़ा पहले पहुंचे, हालांकि सूर्य निकल चुका था। मैंने सोचा, यह लो! हमारा सूर्य शक्तिशाली और गर्म है। फिर मुझे लगा शायद यह उतना गर्म नहीं है। कहने का मतलब है कि मौसम ठंडा है लेकिन सूर्य दहक रहा है। 
सूर्य बहुत शक्तिशाली लगता था। लेकिन इस क्षण दो सूर्य हैं। एक वह सूर्य जो हमने आज सुबह यहां पहुंचने पर देखा तथा दूसरा हम यहां इस स्क्वायर, इन सीढ़ियों पर देख रहे हैं। यह सूर्य विचारों का सूर्य है। विचार की दुनिया को प्रकाशित करते हैं । मेरा तात्पर्य ऐसे विचारों से है जो न्यायपूर्ण हैं, जो दुनिया में शांति ला सकते हैं, जो युद्ध के गंभीर खतरे को खत्म कर सकते हैं, हिंसा का अंत कर सकते हैं। इसीलिए मैं विचारों की लड़ाई की बात करता हूं।
मैं आशावादी हूं और मुझे विश्वास है कि पहले की गई गलतियों, जबर्दस्त एकतरफा शक्तियों के पैदा हो जाने के बावजूद दुनिया को बचाया जा सकता है क्योंकि मैं यह मानता हूं कि विचार ताकत पर विजय पा सकते हैं । यहां हम यही देख रहे हैं।
मैं कोई लंबा-चौड़ा उग्र भाषण देने के लिए यहां नहीं आया हूं। बल्कि प्रत्येक शब्द बोलते समय सावधानी रखना मैं अपना कर्तव्य समझता हूं। मैंने अपने देश और दुनिया के बारे में बोलने की योजना बनाई थी और मैं वही कर रहा हूं। लेकिन आपको यहां देखे बगैर, यहां महसूस किए बगैर ऐसा नहीं कर सकता हूं।
पहले मैं यह कल्पना कर रहा था कि बैठक एक शांत कमरे में होगी जिसमें प्रत्येक व्यक्ति ठीक से बैठा होगा। फिर मैंने सोचा कि मैं अर्जेंटीनियाइयों से क्या बात करूंगा? कहीं पर भी भाषण देना बहुत जटिल काम होता है। यह आसान काम नहीं है। ऐसी बातों से बचना होता है जो किसी की भावना को आहत करें या जो किसी तरह की दखलंदाजी लगे और मुझे विश्वास है कि मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा है जो इस मेहमानवाज देश के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी लगे। लेकिन मैंने सोचा कि मैं किसके बारे में बात करूं? मेरे दिमाग में विचार आया कि अधिकांश वक्ता अपना विषय श्रोताओं पर लाद देते हैं। वे इस या उस विषय पर बोलने के लिए पहले ही योजना बना लेते हैं। तभी मैंने विचार बनाया कि मैं पहले से कोई विषय तय न करूं और अपने सामने बैठे छात्रों से ही पूछूं कि वे किन विषयों पर मुझे सुनना चाहते हैं। अपनी मर्जी से जो चाहे बोलने के बजाए मैं चाहता था कि आप अपना विषय मुझे दें। मैंने सोचा कि यही अधिक लोकतांत्रिक तथा उचित होगा।
यह सब शाम के बाद इस विश्वविद्यालय में आए भूचाल, तूफानी लहर तथा इस झंझावात के आने से पहले की बात थी। मैंने चारों तरफ देखकर विचार किया कि क्या पहले सोची गई रणनीति काम कर सकती है। मैंने महसूस किया कि यह संभव नहीं है। लेकिन वहां किसी ने मुझसे...किसी विषय पर (उनसे चे के बारे में बोलने के लिए कहा गया) चे के बारे में बोलने के लिए कहा ।
मैं यहां विस्तार से बात कर सकता हूं लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इसका कोई मतलब नहीं होगा। मैं कुछ बातें कर सकता हूं। मुझे चे के बारे में बोलने के लिए कहा गया है । मैं आज सुबह सेन मार्टिन की मूर्ति के सामने ही उनके बारे में बोला था क्योंकि मेरे विचार से वह असाधारण शख्सियत थे।
चे सैनिक के रूप में हमारी सेना में भर्ती नहीं हुए थे। वह डॉक्टर थे। वह संयोग से मैक्सिको गए। वह गुआटेमाला तथा लैटिन अमरीका में कई स्थानों पर गए। वह खदान क्षेत्र में थे जहां काम करना बहुत मुश्किल है। उन्होंने अमेजन में कुष्ठरोगियों के अस्पताल में काम किया।
लेकिने मैं चे की केवल एक विशेषता के बारे में बात करूंगा जिसका मैं बहुत कायल हूं। हर सप्ताहांत चे मैक्सिको शहर के बाहर एक ज्वालामुखी पोपोकेटेपेटी के शिखर पर चढ़ने की कोशिश करते थे। यह बहुत ऊंचा पर्वत शिखर है जो पूरे वर्ष बर्फ से ढका रहता है। वह अपनी पूरी ताकत लगाकर चढ़ना शुरू करते, जबर्दस्त कोशिश करते लेकिन चोटी पर कभी नहीं पहुंच पाते। उनकी दमे की बीमारी हर बार उनके आड़े आ जाती थी। अगले सप्ताह, वह बकौल उनके, इस 'पोपो' शिखर पर चढ़ने की फिर नाकाम कोशिश करते। वह बार-बार कोशिश करते। हालांकि वह चोटी पर नहीं पहुंच पाए लेकिन जीवन भर इस पोपोकेटेपेटी शिखर पर चढ़ने की कोशिश करते रहे । इससे उनके दृढ़ निश्चय, उनके आत्मिक बल, उनके अध्यवसाय का पता चलता है जिसकी मैं बहुत प्रशंसा करता हूं।
उनकी दूसरी विशेषता यह थी कि जब किसी काम के लिए हमारे छोटे से समूह को किसी वालंटियर की जरूरत होती थी तो वह ही सबसे पहले खुद को पेश करते थे।
डॉक्टर के रूप में रोगियों तथा घायलों को देखने के लिए वह हमेशा ही पीछे रुक जाते थे। कुछ खास परिस्थितियों में जब हम वनों से घिरे पहाड़ी इलाकों में होते थे तथा चारों ओर से हमारा पीछा हो रहा था तो मुख्य दल को चलते रहना होता था। कुछ हल्के निशान छोड़ दिए जाते थे जिससे कि डॉक्टर आसपास कुछ दूर मरीजों और बीमारों की देखभाल कर सके। यह सब तब तक चलता रहा जब तक वह समूह में एकमात्र डॉक्टर थे। बाद में और डॉक्टर आ गए।
आपने कुछ घटनाओं का जिक्र करने के लिए कहा है। मैं एक बहुत मुश्किल कार्रवाई के विषय में बताऊंगा। जब हम प्रांत के उत्तरी तट पर उतराई के एक पहाड़ पर थे तो पता चला कि कुछ और लोग उतर कर वहां आ रहे हैं। इस उतराई पर पहुंचने के बाद पहले कुछ दिन हमें बहुत मुसीबतें झेलनी पड़ी थीं। जो लोग अब उतरे थे उनका साथ देने के लिए हमने बहुत साहसिकता का काम किया। तट पर अच्छी तरह से जमकर बैठी यूनिट पर हमला करना सैनिक दृष्टि से बुद्धिमत्ता का काम नहीं था।
मैं इसका पूरा विवरण नहीं दूंगा। तीन घंटे तक चली इस लड़ाई के बाद हमने सौभाग्य से सभी तरह का संचार काट दिया। इस लड़ाई में भी उन्होंने मिसाल योग्य काम किया। इस लड़ाई में शामिल एक तिहाई लोग या तो मर गए या घायल हो गए। एक डॉक्टर के रूप में उन्होंने घायल शत्रुओं की भी देखभाल की। यह बड़ी असामान्य सी बात थी। शत्रु पक्ष के कुछ सैनिक घायल नहीं हुए थे लेकिन उन्होंने अपने कामरेडों के साथ-साथ भारी संख्या में घायल शत्रु सैनिकों की भी देखभाल की ।
आप इस व्यक्ति की संवेदनशीलता के बारे में कल्पना नहीं कर सकते । मुझे एक वाकया याद है। हमारा एक घायल कामरेड बचने की हालत में नहीं था। हमें उस इलाके से फौरन बाहर निकलना था क्योंकि पता नहीं कब विमान आ जाए। लेकिन सौभागय से लड़ाई के दौरान एक भी जहाज नहीं आया। सामान्यत: इस तरह की लड़ाई के दौरान बीस मिनट के भीतर पहले विमान आ जाते हैं। लेकिन इस बार हमने अचूक गोलियों से उनकी संचार व्यवस्था ठप्प कर दी थी। हमें कुछ अतिरिक्त समय मिल गया था लेकिन हमें घायलों को देखना था और वहां से तुरंत निकल जाना था। उन्होंने निश्चित मौत से जूझ रहे हमारे एक कामरेड के बारे में बताया उसे मैं कभी नहीं भूल सकता। कामरेड को वहां से हिलाया नहीं जा सकता था। कभी-कभी गंभीर रूप से घायल लोगों को उठाना मुश्किल हो जाता है। चूंकि आपने शत्रु के जख्मों का इलाज किया है तथा कइयों को बंदी बना कर उनके साथ सम्मान का सलूक किया है इसलिए आपको विश्वास का सहारा लेना पड़ता है। हमने कभी भी युद्धबंदी के साथ बुरा व्यवहार नहीं किया है और न ही कभी उन्हें मारा है । कभी-कभी हम दुर्लभ मात्रा में उपलब्ध अपनी दवाईयां भी उन्हें दे देते थे।
इस नीति के कारण हमें युद्ध में बहुत कामयाबी मिलती थी । किसी संघर्ष में सही ध्येय के लिए लड़ रहे लोगों को ऐसा आचरण करना चाहिए जिससे शत्रु भी उसका सम्मान करे।
उस घटना में हमें अपने बहुत से घायल कामरेडों को पीछे छोड़ना पड़ा। कुछ तो बहुत गंभीर रूप से घायल थे। बाद में उन्होंने बहुत तकलीफ के साथ जो बताया वह मेरे दिल को छू गया। हमारे एक कामरेड के बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। उन्होंने चलने से पहले इस मरणासन्न कामरेड पर झुककर उसका माथा चूमा ।
चे एक असाधारण मनुष्य थे।वह असाधारण रूप से सुसंस्कृत और प्रतिभासंपन्न व्यक्ति थे। उनके अध्यवसाय और उनकी दृढ़ता के विषय में मैं आपको पहले ही बता चुका हूं। क्रांति की सफलता के बाद उन्हें जो भी कार्य दिया गया उन्होंने उसे तुरंत स्वीकार किया। वह नेशनल बैंक ऑफ क्यूबा के डायरेक्टर थे। उस समय वहां पर एक क्रांतिकारी की बहुत जरूरत थी। क्रांति की हाल ही में विजय हुई थी। देश की आरक्षित निधियों को चुरा लिया गया था। इसलिए संसाधन बहुत कम थे।
हमारे शत्रुओं ने इसका मजाक उड़ाया। वे हमेशा मजाक उड़ाते हैं, हम भी उड़ाते हैं। लेकिन इस मजाक का राजनीतिक मंतव्य था। इसके अनुसार मैंने एक दिन घोषणा की कि 'हमें एक इकोनामिस्ट चाहिए।' चे ने तुरंत हाथ खड़ा कर दिया। उन्हें गलती लगी थी। उन्होंने सोचा कि मैंने कहा था कि हमें एक कम्युनिस्ट चाहिए और इस तरह से उन्हें चुना गया । खैर चे क्रांतिकारी थे, कम्युनिस्ट थे और उत्कृष्ट अर्थशास्त्री थे क्योंकि उत्कृष्ट अर्थशास्त्री होना इस बात पर निर्भर करता है कि आपने देश की अर्थव्यवस्था के इस अंग अर्थात नेशनल बैंक ऑफ क्यूबा के प्रभारी के रूप में क्या कार्य करने का विचार बनाया है। उन्होंने एक कम्युनिस्ट और एक अर्थशास्त्री के रूप में यह दायित्व बखूबी संभाला। उनके पास कोई डिगरी नहीं थी लेकिन उन्होंने बहुत कुछ देखा और पढ़ा था।
चे ने ही हमारे देश में स्वैच्छिक कार्य के विचार को आगे बढ़ाया क्योंकि वह खुद हर रविवार को स्वैच्छिक कार्य करने के लिए जाते थे। किसी दिन वह खेती का कार्य करते तो किसी दिन नई मशीनरी की जांच करते तो किसी दिन निर्माण कार्य करते। उन्होंने इस प्रथा की विरासत हमारे लिए छोड़ी है। उनके पदचिह्नों पर चलते हुए आज लाखों क्यूबाइयों ने यह प्रथा अपनाई है।
वह हमारे लिए बहुत सारी यादें छोड़ गए हैं। इसलिए मैं कहता हूं कि वह मेरी जिंदगी में आए सबसे महान और असाधारण व्यक्ति हैं। मेरा विश्वास है कि अवाम में इस तरह के करोड़ों-करोड़ व्यक्ति मौजूद हैं।
कोई भी उत्कृष्ट व्यक्ति तब तक कुछ नहीं कर पाएगा जब तक कि उसके जैसी विशेषताएं विकसित करने में सक्षम लाखों लोग न हों। यही कारण है कि हमारी क्रांति ने निरक्षरता को दूर करने तथा शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए हैं ।
(फिदेल कास्त्रो- नव उदारवाद का फासीवादी चेहरा ,अनुवाद-रामकिशन गुप्ता ,ग्रंथ शिल्पी, भी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मीनगर,दिल्ली-110092 ,मूल्य-325, से साभार)

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

चेग्वेरा क्यों नहीं बने नामवर सिंह

               (बाएं क्रांतिकारी चेग्वेरा) 
          सवाल टेढ़ा है लेकिन जरूरी है कि चेग्वेरा क्यों नहीं बन पाए नामवर सिंह। उन्होंने क्रांतिकारी की बजाय बुर्जुआमार्ग क्यों अपनाया ? क्रांति का मार्ग दूसरी परंपरा का मार्ग है। जीवन की प्रथम परंपरा है बुर्जुआजी की है। नामवरजी को पहली परंपरा की बजाय दूसरी परंपरा पसंद है। सवाल यह है कि दूसरी परंपरा क्या है ?  दूसरी परंपरा है क्रांति की और क्रांतिकारी विचारों के निर्माण की। दूसरी परंपरा वह नहीं है जो हजारीप्रसाद द्विवेदी ने खोजी है। वह तो साहित्य की बुर्जुआ परंपरा है। यह परंपरा तो उसी बुर्जुआ साहित्य परंपरा का एक रूप है जिसे रामचन्द्र शुक्ल ने खोजा था। रामविलास शर्मा शुक्लजी की परंपरा में अटककर रह गए और बाद में और भी पीछे चल गए। नामवर सिंह ने दूसरी परंपरा की खोज की और जो बातें कहीं उनमें वे बुनियादी तौर पर बुर्जुआ चिंतन के ढ़ांचे का अतिक्रमण नहीं कर पाते।
     चे की पुण्यतिथि के मौके पर नामवर सिंह से हम यह सवाल करना चाहते हैं कि उन्होंने चे की परंपरा में जाने की बजाय बुर्जुआ परंपरा में रहना क्यों पसंद किया ? हम जानते हैं कि नामवरजी और उनके भक्तों के पास इस सवाल का जबाव नहीं है। लेकिन चे और नामवरजी में एक समानता है,चे जिस तरह सारी दुनिया में क्रांतिकारियों के प्यारे थे और हैं, नामवरजी भी प्रगतिशील , क्रांतिकारी लेखकों, युवाओं में आइकॉन की तरह हैं। हिन्दी के छात्रों में आज भी आइकॉन हैं। प्यारे हैं।
     सवाल उठता है उनके व्यक्तित्व में ऐसा कौन सा जादू है जो लोगों पर असर डालता है और उन्हें महान बनाता है ? उनसे मिलकर यही लगेगा कि किसी महान व्यक्ति से मिले। बुर्जुआ महानायकों जैसी उदारता उनके व्यक्तित्व में रच बस गयी है।
    मैं नहीं जानता कि उनके अंदर क्रांतिकारी विचारों का कौन सा महान पाठ छिपा है लेकिन एक बात उनकी चे से जरूर मिलती है वे चे की तरह असहमत होना जानते हैं और अपनी असहमति को वे बताना,समझाना और व्यवहार में उतारना भी जानते हैं। नामवरजी का यह असहमति वाला गुण क्रांतिकारी विरासत से मिलता-जुलता है। चे से उनके व्यक्तित्व की एक और बात मिलती है कि वे प्रेम के पुजारी हैं। चे की तरह उन्होंने भी प्रेम को अपने संस्कार का हिस्सा बनाया है। इसके बावजूद वे चे क्यों बन पाए यही मेरी मूल चिन्ता है।   
     चे की जिंदगी और विचारो ने करोड़ों युवाओं को सारी दुनिया में क्रांति के लिए जान निछाबर करने की प्रेरणा दी। क्रांतिकारी विचारों और क्रांति से प्यार करना सिखाया। भारत के युवाओं पर भी चे का गहरा असर रहा है। किसी भी क्रांतिकारी की जिंदगी उसके जनता के प्रति समर्पण,कुर्बानी और विचारधारात्मक स्पष्टता के पैमाने पर देखी जानी चाहिए। चे के विचारों और कर्म में गहरी एकता थी। उनमें अन्य के प्रति,उसकी मुक्ति के प्रति गहरी निष्ठा थी। चे यह नहीं मानते थे कि वे जनता के मुक्तिदाता हैं बल्कि उनका मानना था "मैं मुक्तिदाता नहीं हूँ। मुक्तिदाता का अस्तित्व नहीं होता। जनता स्वयं को मुक्त करती है।"
    हमें देखना चाहिए कि जिस समाज में बुनियादी परिवर्तन चाहते हैं वहां क्रांतिकारी ताकतें,क्रांति के लिए प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी आखिर क्या कर रहे हैं ?क्या वे बुर्जुआ वर्ग के एजेण्डे पर काम कर रहे हैं या फिर क्रांतिकारियों के एजेण्डे पर काम कर रहे हैं ? भारत की आयरनी यह है कि यहां के क्रातिकारी बुद्धिजीवी बुर्जुआ एजेण्डे पर फुलटाइम काम करते हैं ,क्रांतिकारी एजेण्डे पर पार्टटाइम काम करते हैं। जाहिर है समग्रता में उनके कार्यों से क्रांति का कम बुर्जुआजी का ज्यादा भला होता है।
     क्रांतिकारी कार्यकलाप का प्रेम की धारणा के साथ गहरा संबंध है जो प्रेम नहीं कर सकता वह क्रांति भी नहीं कर सकता। जो प्रेम नहीं कर सकता वह भक्ति भी नहीं कर सकता। ईश्वर उपासना भी नहीं कर सकता। प्रेम हमारे समस्त जीवन की धुरी है। उसका क्रांति के साथ भी अभिन्न संबंध है। क्रांतिकारी भावों-विचारों के प्रति निष्ठा बनाने में प्रेम के प्रति कर्म और व्यवहार में वचनवद्धता जरूरी है।
    चे का मानना था"यह हास्यास्पद लग सकता है लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि सच्चा क्रांतिकारी प्रेम से निर्देशित होता है। "
   हम मध्यवर्ग के लोगों की बुनियादी समस्या यह है कि हम जीवन में सब कुछ पाना चाहते हैं। सुखी जीवन चाहते हैं। सारी सुविधाएं चाहते हैं। किसी भी किस्म के सामाजिक परिवर्तन के लिए विचार से लेकर व्यवहार तक हमारे  पास समय नहीं है। हम सारी जिंदगी जुगाड़ में लगा देते हैं। जोड़-तोड़,कुर्सी,पद,सम्मान,पैसा,शोहरत आदि हासिल करने में सारी ऊर्जा खर्च कर देते हैं और इस चक्कर में ब्लडप्रेशर से लेकर डायविटीज तक अनगिनत बीमारियों के शिकार हो जाते हैं,खाली समय में अवसाद में भोगते हैं,इससे कुछ बचता है तो निंदा में खर्च करते हैं,इससे समय बचता है तो फिर सो जाते हैं।
     हमारे पूरे जीवन के टाइमटेबिल में क्रांति और सामाजिक परिवर्तन के कामों के लिए कोई जगह नहीं होती। यदि हम महान प्रगतिशील आलोचक हुए तो सारी उम्र सेमीनार, चयन समिति,पुरस्कार समिति,अध्यक्षता आदि में आदरणीय नामवर सिंह की तरह खर्च कर देते हैं।
    आप कल्पना कीजिए नामवरसिंह जैसे महान पंडित ने क्रांति के बारे में अपने जीवन का आधा समय भी खर्च किया होता तो भारत और हिन्दीभाषी समाज का कितना उपकार हुआ होता। अंत में चे के शब्दों में " आप सब कुछ खोकर ,कुछ पाते हैं।’’ उसके बाद ही क्रांति कर पाते हैं। नामवर सिंह ने अपने जीवन में सब कुछ पाया। लेकिन बिना जोखिम उठाए। उनके जीवन की चे के मुताबिक सबसे बड़ी असफलता यही है कि उन्होंने कोई जोखिम नहीं उठाया। चे के अनुसार जोखिम उठाए बिना सब कुछ पाना जीवन की सबसे बड़ी विपत्ति है, और नामवरजी इसके आदर्श पुरूष हैं। नामवरसिंह ने सब कुछ पाया लेकिन कोई जोखिम नहीं उठाया। व्यक्तिगत जीवन से लेकर सामाजिक-राजनीतिक जीवन तक यदि वे जोखिम उठाते तो वे चे बन सकते थे।

9अक्टूबर को चे का स्मृति दिवस- महान क्रांतिकारी चेग्वारा की विरासत -1- फिदेल कास्त्रो

           (महान क्रांतिकारी चेग्वारा 14जून 1928-9 अक्टूबर 1967)   
प्रिय भाइयो और बहनो, छात्रो, मजदूरो बल्कि मैं तो कहूंगा कि साथी अर्जेण्टीनियाइयो : मेरी बहुत उम्र हो चुकी है। लेकिन मैंने इस तरह के जोखिम भरे भावुक आयोजन की भी कल्पना नहीं की थी ।
मैं आपको बताना चाहता हूं कि इस समय दसियों ला क्यूबावासी इस आयोजन को दे रहे हैं । अपने अवाम की ओर से मैं बहुत शुक्रगुजार हूं। विचारों, सचाई और न्यायोचित ध्येय से आई ताकत जनता को अजेय बना देती है।
छात्रों तथा विश्वविद्यालय प्राधिकारियों ने मुझे बताया था कि वे इस लॉ स्कूल में एक छोटी सी बैठक आयोजित कर रहे हैं। यह बैठक सायं 7 बजे शुरू होगी तथा एक थियेटर में बैठे छात्र इसमें हिस्सा लेंगे। यदि अधिक लोग आ गए तो वे बाहर एक स्क्रीन लगा देंगे ताकि बाहर बैठे लोग भी इसे दे सकें।
मैं अपने कामरेडों को प्यार से झिड़कना चाहता था। मैं उनसे कहना चाहता था कि 'आपने अर्जेंटिनियाई लोगों के बारे में सही अनुमान नहीं लगाया है।'  हमें बर मिल रही थी कि थियेटर भर गया है, वहां क्षमता से दुगुने लोग आ गए हैं, गलियारे में जगह नहीं है, प्रवेश कक्ष भर चुका है और अब सीढ़ियां भर रही हैं। उन्होंने कहा कि 1000, 2000, 3000 लोग हैं। फिर टेलीविजन यहां के दृश्य दिखाने लगा। हम भी लोगों की संख्या का अनुमान लगा सकते हैं। कुछ दृश्यों को दे¹कर मुझे ऐसा लगा कि जैसे यह क्यूबा का रेवोल्यूशन स्क्वायर हो । सब संचार माध्यम तथा मार्ग अवरुध्द हो गए थे। लेकिन सौभाग्य से ये छोटे से उपकरण जो इतना शोर करते हैं और परेशानी बन जाते हैं, मेरा मतलब ये सेल फोन, ऐसे मौकों पर अच्छा काम देते हैं। इनसे स्थिति का पता चलता रहता है।
हमारा राजदूत, जो खुद भी कम अनुमान लगाने का दोषी है ,मैं जानता हूं कि आप उनकी पैरवी करेंगे क्योंकि वह अर्जेंर्टीनियाई लोगों से बहुत प्यार करता है । बैठक हाल में ही बैठे अपने परिवार के साथ सेल फोन पर बात कर रहा था। वहां कुछ बच्चे भी थे, क्योंकि उन्हें यकीन था कि यह बहुत शांतिपूर्ण आयोजन होगा। और यह ऐसा ही आयोजन है, है कि नहीं? किसी ने कल्पना भी नहीं की थी इतना अच्छा बंदोबस्त किया जाएगा। कोई हिल भी नहीं सकता था, जो जहां था वहीं फंस गया। केवल सेल फोन से बात हो रही थी। उन्होंने बताया कि भीतर घुसना असंभव है। लेकिन मैं अपने वायदे से पीछे नहीं हट सकता था। किसी भी स्थान पर हालात जैसे भी हों और भारी भीड़ के कारण चाहे जितनी बाधा हो, मैं आपसे मिलने के सम्मान और गौरव को नहीं छोड़ सकता।
मुझे बताया गया कि यह असंभव है, लेकिन मैं यह कहता रहा कि कुछ भी असंभव नहीं है। यह केवल एक दिक्कत थी जिसे दूर किया जाना था। मैं वहां बैठकर समाचारों का इंतजार नहीं कर सकता था। मैं जीवन भर दिक्कतों के बीच घूमता रहा हूं और मैं इस विश्वविद्यालय में आए बगैर जहाज नहीं पकड़ सकता था।
मैं यहां एक आगंतुक हूं और मुझे कानून तथा व्यवस्था का सम्मान जरूर करना चाहिए। मुझे ऐसा कुछ भी करने का अधिकार नहीं है जिससे इस देश के नियमों का तनिक भी उल्लंघन होता हो।
मैं यह मानता हूं कि समाधान खोजने में प्राधिकारियों ने पूरा सहयोग दिया है।
मुझे लॉ स्कूल से रिपोर्ट मिलती रही और वे हमें बताते रहे कि 'कोई भी हॉल से बाहर नहीं जा रहा।' वे सब और धीरे-धीरे आगे सरक रहे हैं। बीच-बीच में कहीं पर कुछ टूट जाता था। एक बात माननी पड़ेगी कि अर्जेंटीनियाइयों की इस देशभक्त और क्रांतिकारी सेना द्वारा खिड़कियों को पहुंचाए गए नुकसान में हमें अपना हिस्सा देना होगा या हमें अकेले उसकी भरपाई करनी होगी ।
हमने अपने शिष्टमंडल के युवा सदस्य, अपने विदेश मंत्री से बात की। आपने अभी उन्हें देखा और उनकी बात सुनी। मैंने उनसे कहा, 'आप वहां जाओ, कैसे भी अंदर प्रवेश करो तथा थियेटर में लोगों से बात करो। आप उन्हें स्थिति के बारे में समझाओ और बताओ कि हम वहां बैठक नहीं कर सकते।' क्योंकि यह डर ठीक ही था कि यदि वहां आयोजन हुआ और बाहर स्क्रीन रही तो अपनी मर्जी से बाहर निकले लोग वापस कमरे में जाने की कोशिश कर सकते हैं। इसलिए उन्हें बाहर सीढ़ियों पर जाने और वहां आयोजन के लिए राजी करना जरूरी था।
हम बड़ी बेचैनी से इंतजार कर रहे थे। अपने दूत की बात सुनने के हमारे पास दो ही साधन थे : टेलीजिवन क्योंकि कुछ नेटवर्क उसके शब्दों का प्रसारण कर रहे थे तथा सेल फोन। हम उन्हें लोगों को बाहर जाने के लिए प्रेरित करते हुए देरहे थे।
शीघ्र ही हमें लोगों की समझने, सहयोग करने की क्षमता का पता चला क्योंकि कुछ ही मिनट बाद उसने मुझे बताया कि 'वे बाहर सीढ़ियों की ओर जा रहे हैं।'
लेकिन एक और समस्या रह गई थी और वह थी टेलीविजन कैमरों और माइक्रोफोनों की। (कोलाहल) सुनिए अब कैमरों से न झगड़ें। (उनसे किसी ने कुछ कहा।) हां मैं जानता हूं, जानता हूं। मैं सब सुन रहा था। लेकिन वे यहां की घटनाओं के विषय में रिपोर्ट करना चाहते थे। इसलिए मुझे कोई शिकायत नहीं है। उन्हें यहां रना होगा अन्यथा यहां जो कुछ हो रहा है, उसके बारे में केवल आप ही जान पाएंगे।
उदाहरण के लिए इन कैमरों और इन उपकरणों के बगैर हमारे लोग इस आयोजन को नहीं दे पाएंगे। इस वजह से देर हुई। क्या आप जानते हैं कि अधीरता की स्थिति में एक घंटा कितना लंबा लगने लगता है? आप सबने, हमने अधीरता के इस लंबे, अंतहीन घंटे को बर्दाश्त किया है क्योंकि प्रेस द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले इन माइक्रोफोनों, लाउडस्पीकरों तथा उपकरणों को फिर से लगाया जाना था। इस आयोजन के लिए पहले ये भीतर लगाए गए थे। उन्होंने रिकार्ड समय में यह कार्य पूरा कर लिया।
हमने उनसे पूछा कि क्या हो रहा है। उस समय रात्रि के 8:40 बजे थे। उन्होंने हमें बताया कि 'सब कुछ तैयार है और हम शीघ्र यहां आ जाएं।' सर्दी भी है। लेकिन आप लोगों की गर्मजोशी को देते हुए यह सर्दी कुछ भी नहीं है ।
उन्होंने मुझे यह पहना दिया है, मुझे इसकी जरूरत नहीं है। मैं इसे उतार रहा हूं, इसे यहां पहनने के लिए मैं शर्मिंदा हूं (उन्होंने अपना कोट उतारा)।
यहां समय पर पहुंचने के लिए हम तुरंत चल पड़े। लोगों ने जो बंदोबस्त किया है, वह वास्तव में ही चमत्कार है। आपने आज रात यहां जो किया है उसे हम कभी नहीं भुला पाएंगे। हम यहां से बहुत खुश और हमेशा के लिए कृतज्ञ होकर जाएंगे।
आपने हमें जो सम्मान दिया है उसे देते हुए कृतज्ञता की बात कुछ लोगों को ढकोसला लग सकती है। ऐसी बात नहीं है। मैं हमेशा के लिए कृतज्ञता की बात इसलिए कर रहा हूं कि जो लोग हमारे देश पर, हमारे शहरों पर हमले का सपना दे रहे हैं उन्हें ब्यूनोस आयरस के लोगों ने एक संदेश भेज दिया है। (करतल ध्वनि तथा 'क्यूबा, क्यूबा, क्यूबा, लोगों का सलाम' और 'बुश, तुम फासीवादी, तुम आतंकवादी हो' के नारे और कोलाहल।) आप उन लोगों को संदेश भेज रहे हैं जो न केवल क्रांति बल्कि क्रांति लाने वाले लोगों को नष्ट करने का सपना देरहे हैं। एक संदेश उनके लिए भी है जिन्होंने चालीस साल से भी अधिक समय से हमारे देश के खिलाफ चल रही नाकाबंदी, हमलों और धमकियों का मुकाबला किया है।
ऐसे हालात में आप मरने वाले बच्चों या मरने वाली मांओं या मरने वाले वृद्धों या मरने वाले युवाओं और मरने वाले बालिगों की ही गणना नहीं करेंगे। कई बार जीवित बच्चे, लोग इतने क्षत-विक्षत होते हैं कि हमारे विचार से उनका मर जाना 100 गुना अच्छा होता। इस तरह की तबाही मचाने का कोई वास्तविक कारण, अधिकार या कोई औचित्य नहीं होता। यह अंतर्राष्ट्रीय मानकों और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का स्पष्ट उल्लंघन होता है जिनका हमारे हिसाब से दुनिया पर शासन होना चाहिए। लेकिन हम यह पहले ही समझ चुके हैं कि इस दुनिया में कानून का सम्मान नहीं होता। अब ताकत ही कानून है। इसी के जोर पर हमारे लोगों को अधीन बनाया जाता है, हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा किया जाता है और पूरी दुनिया पर नाजीवादी-फासीवादी तानाशाही लादी जाती है। यह कोई अतिशयोक्ति या बढ़-चढ़ कर की गई बात नहीं है। हम पहले ही सुन चुके हैं कि 60 या उससे अधिक देशों पर पूर्व हमला हो सकता है। इतिहास में पहले किसी व्यक्ति, किसी साम्राज्य ने ऐसी धमकी नहीं दी थी ।
दुनिया के किसी भी अंधेरे कोने पर हमले की तैयारी की बात हुई। मैंने पहले कभी ऐसी बात नहीं सुनी। युद्ध के हर हथियार, चाहे वह जैव हथियार हो, रासायनिक हथियार हो या परमाणु हथियार, के प्रयोग की बात हुई। ऐसे अत्यंत परिष्कृत हथियारों के प्रयोग की बात भी हुई जो किसी मानक से अब परंपरागत हथियार नहीं रह गए हैं क्योंकि वे हर तरह से तबाही मचाते हैं। हमने सोचा कि दुनिया के देशों को धमकी देने का किसी को क्या अधिकार है?(क्रमशः)


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