छात्र राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
छात्र राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 23 अप्रैल 2017

नव्य उदार आर्थिकयुगीन युवा की सच्चाईयां-


भूमंडलीकरण की केन्द्रीय विशेषता है आत्ममुग्धता ,आत्महनन और आत्म-व्यस्तता । सन् 1990-91 के बाद से युवाओं में यह प्रवृत्ति तेजी से पैदा हुई है। इसने उसे सामाजिक सरोकारों से काटा है। पहले यह प्रवृति उच्चवर्ग में थी लेकिन भूमंडलीकरण के बाद से इस प्रवृत्ति ने निचले वर्गों में पैर पसारने आरंभ कर दिए।
आत्ममुग्ध भाव की विशेषता है आप स्वयं को जानने की कोशिश नहीं करते। वे तमाम क्षमताएं त्याग देते हैं जिसके जरिए आत्म को जानने में मदद मिले। आत्म या खुद को न जानने के कारण व्यक्ति के अंदर अन्य को जानने की इच्छा भी खत्म हो जाती है।फलतः ये युवा अन्य की मदद नहीं कर पाते। वे निजी जीवन में व्यस्त रहते हैं। निज से परे कोई संसार है जिसे जानना चाहिए उसको ये युवा सम्बोधित ही नहीं करते। यह ऐसा युवा है जो अपने अलावा किसी में दिलचस्पी नहीं ले जाता। ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं यह सुनना बंद कर देता है, रुचि लेना बंद कर देता है।
नए युवा देखने में आकर्षक,नए भाव-भंगिमा वाले हैं वे देखने में सुंदर लगते हैं। आरंभ में ये अन्य को जल्दी प्रभावित भी कर लेते हैं लेकिन ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं ये अपने को समेटना आरंभ कर देते हैं। इन युवाओं में एक बड़ा अंश है जो अपने चारों ओर की दुनिया से एकदम बेखबर है।
अमेरिका में इस तरह के युवा की एक नागरिकता परीक्षा ली गयी। अमेरिका में अक्टूबर 2009 से अगस्त 2013 के दौरान ली गयी नागरिकता परीक्षा में 30लाख से ज्यादा आप्रवासी युवाओं ने हिस्सा लिया। इस परीक्षा को 92प्रतिशत युवाओं ने पास किया। इन उत्तीर्ण युवाओं में 29फीसदी को अमेरिका के उपराष्ट्रपति का नाम तक नहीं मालूम था। 43फीसदी नागरिक अधिकारों को परिभाषित करने में असमर्थ रहे,40 फीसदी नहीं जानते थे कि अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान और जर्मनी से युद्ध किया था। 73 फीसदी नहीं जानते थे कि शीतयुद्ध के दौरान साम्यवाद ही मुख्य समस्या थी। 67 प्रतिशत नहीं जानते थे कि वे जिस आर्थिक व्यवस्था में रहते हैं उसे पूंजीवाद कहते हैं।
एक अन्य सर्वे में पता चला कि चार में से एक अमेरिकन को संविधान प्रदत्त पांच स्वाधीनताओं का ज्ञान नहीं था। वे एक से अधिक स्वाधीनता का नाम नहीं जानते थे। जिन लोगों में सर्वे किया गया उनमें से आधे से अधिक लोग “सिम्पसन कार्टून फैमिली ” के दो चरित्रों के नाम तक नहीं जानते थे। इन सर्वेक्षणों पर विशेषज्ञों ने कहा कि बच्चों की इस दशा के लिए पब्लिक स्कूल सिस्टम जिम्मेदार है। क्योंकि वे ठीक से बच्चों को इतिहास,भूगोल और नागरिकशास्त्र नहीं पढ़ाते। इन लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि इंटरनेट ने ऐसी पीढ़ी पैदा की है जो आत्मलीन,एडिक्ट,चंचलमन और अचेत है। यह भी देखा गया अनेक लोग अमेरिका में निजी स्वार्थ को देखकर वोट देते हैं न कि देश के स्वार्थ को देखते हैं। अमेरिका के पतन का बड़ा कारण है कि अनेक अमेरिकन देश के बारे में नहीं सोचते ,सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं। एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा कि जब युवा हमारे संविधान को ही नहीं जानते तो उसकी रक्षा में या संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए वे खड़े कैसे होंगे ?

कश्मीर से आई आवाज छात्र एकता जिंदाबाद

इस साल का नारा होगा-गर्व से कहो हम छात्र हैं ।छात्रों के हकों पर जिस तरह हमले बढ़ रहे हैं,छात्र राजनीति के ऊपर अंकुश लगाने की साजिशें चल रही हैं उनसे छात्र अपने को अपमानित महसूस कर रहे हैं।यूजीसी से लेकर केन्द्र का मानव संसाधन मंत्रालय,राज्य सरकारों से लेकर शिक्षा माफिया तक सब ओर से छात्रों के हकों पर हमले हो रहे हैं।छात्रों के अपने हक हैं जिनकी लंबे समय से अनदेखी होती रही है।कश्मीर में आतंकी समस्या को हल करने में केन्द्र सरकार नाकाम रही है और उसके प्रतिवाद में विगत पांच दिनों से कश्मीर के छात्र हड़ताल पर हैं।कश्मीर में छात्रों का समूचा कैरियर और शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से ठप्प पड़ी है।दुख की बात यह है कश्मीरी छात्रों का भविष्य किसी को नजर नहीं आ रहा,उनकी समस्याएं किसी को दिखाई नहीं दे रहीं।
यही स्थिति जेएनयू की है ,जिन छात्रों ने जेएनयू से एमए किया और आगे एमफिल-पीएचडी करना चाहते थे, उनके भविष्य को रोकने के लिए जेएनयू वीसी ने वहां की तयशुदा दाखिला नीति को यूजीसी सर्कुलर की आड़ में खत्म कर दिया और एमफिल्-पीएचडी के दाखिले के लिए तय सीटों में इस तरह कटौती की कि एमफिल्-पीएचडी में तकरीबन सभी सीटें बलिदान हो गयीं।वहीं दूसरी ओर पंजाब वि वि ने ट्यूशन फीस में बेशुमार बढोतरी करके पढ़ना ही मुश्किल कर दिया है।वहां ट्यूशन फीस दस गुना बढा दी गयी है। यूपी में वि वि और कॉलेजों में छह महिनों के लिए पाबंदी लगा दी गयी है।मोदी सरकार आने के बाद यूजीसी के बजट में कटौती की गयी है, केन्द्रीय वि वि से कहा गया है 30 फीसदी संसाधन वे स्वयं जुगाड़ करें।केन्द्र सरकार की नौकरियों की भर्ती मोदी सरकार आने के साथ ही बंद कर दी गयी है।ये सारे हालात बता रहे हैं कि विश्वविद्यालय और कॉलेज परिसर लगातार खराब होते जा रहे हैं।कश्मीर के छात्रों का विगत पांच दिनों से जिस तरह का आक्रोश सामने आया है वह कश्मीर के छात्र आंदोलन में हाल के वर्षों में नहीं देखा गया।

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

आज कवि केदारनाथ सिंह का जन्मदिन है- जनप्रिय केदारनाथ सिंह

         केदारनाथ सिंह पर लिखना बहुत मुश्किल काम है।नामवरजी पर जल्दी लिख सकते हैं,मैनेजर पांडेय पर उससे भी जल्दी लिख सकते हैं,लेकिन केदारजी पर लिखना आसान नहीं है,उन पर लिखना नामवरजीसे भी मुश्किल काम है। दो दिन पहले से मन में तय कर लिया था कि केदारजी के जन्मदिन पर फेसबुक पर जरूर लिखूँगा।नामवरजी पर इतना लिख चुका हूँ कि सभी मित्र चिढ़ने लगे हैं,कहते हैं नामवरग्रंथि के शिकार हो ! लेकिन मैंने विगत दो दिन में महसूस किया कि केदारजी पर लिखना सबसे मुश्किल है।उनकी कविता पर सोचता हूँ तो लगता है जन्मदिन पर काव्यमीमांसा गले नहीं उतरेगी,इन दिनों फेसबुक मित्रों का आस्वाद बदल गया है,वे हल्का लिक्विड चाहते हैं जिसके जरिए केदारजी सीधे गले में उतर जाएं।

दिक्कत यह है कि केदारजी इतने सरल,सहज हैं कि वे पहले से ही तरल पदार्थ की तरह युवाओं से लेकर रचनाकारों के गले में उतरे हुए हैं,फेसबुक पर अनेक फोटोग्राफ नजर आए जिनमें वे युवाओं के बीच में हैं।समस्या यह है लेखक के बारे में यदि उसके जन्मदिन को याद करें तो किस तरह याद करें।जन्मदिन मनाने का ´केक काटो खुशियां मनाओ´,आइसक्रीम लेखक के गालों पर मल दो,यह चलेगा नहीं।आखिर जन्मदिन पर कौनसी चीज है जिसे याद करें ॽ मुझे लगता है हर लेखक से पूछा जाना चाहिए कि वह आदमी कैसा है ॽ

केदारजी को मैं बहुत ज्यादा नहीं जानता।बहुत कम जानता हूँ।लेकिन जितना भी जानता हूँ वह उन पर लिखने के लिए पर्याप्त नहीं है।केदारजी से मुझे पढ़ने,उनके निर्देशन में एमफिल्,पीएचडी करने का सौभाग्य मिला,मैं उनको एक बेहतरीन शिक्षक के रूप में बहुत प्यार करता रहा हूँ।केदारजी ऐसा नहीं है कि मेरे प्रिय शिक्षक थे वे उन तमाम छात्रों के प्रिय शिक्षक थे जो जेएनयू पढ़ने आते थे।मैंने अपने जीवन में इस तरह का इंसान नहीं देखा जो पढ़ाते समय डूबकर पढाए,रिश्ते और संबंध निभाते समय मानवता और संवेदनशीलता की डोर से बंधा रहे,छात्रों को तिकड़म का पाठ न पढ़ाए।



केदारजी बेहद सरल हैं लेकिन राजनीति में बेहद कठोर,उनके अंदर लोकतांत्रिक भावों और हकों को लेकर गहरी निष्ठा और लगाव है जो हम सब छात्रों को जेएनयू में प्रेरित करता रहा है।मैं जेएनयू में छात्रों के बीच में सबसे सक्रिय छात्रों की टोली में था,बहुत कम समय मिलता था उनसे मिलने का,लेकिन पढ़ने का समय मिल जाता था।केदारजीकी सबसे बेहतरीन बात यह कि वे जब कहो मिलने को राजी हो जाते।मुझे एक बार का वाकया याद आ रहा है मैं1981-82 में एसएफआई की ओर से उपाध्यक्ष का उम्मीदवार था और पूर्वांचल होस्टल में चुनावी जनसभा थी रात को,मैं एमफिल में था।वे मेरे गाइड थे। मैं चुनाव प्रचार में बुरी तरह मशगूल था,लेकिन केदारजी से मिलना बेहद जरूरी था।वे उन दिनों पूर्वांचल में रहते थे। मैंने उनसे कहा आपसे मिलना है बोले जब मन हो आ जाओ,मैंने कहा मैं आज रात पूर्वांचल होस्टल चुनावसभा करने जाऊँगा,देर रात को साढ़े बारह के बाद सभा खत्म होगी, मैं उसके बाद आपसे मिलने आ जाऊँगा।बोले बेहिचक चले आओ। मैं तकरीबन एक बजे रात को उनके पास पहुँचा,एक घंटा जमकर बातें कीं और दो बजे करीब मैंने कहा चलता हूँ,इतनी देर गए कोई सवारी वहां से मिलने की संभावना नहीं थी,पैदल ही तकरीबन 6किलोमीटर आना था।केदारजी ने कहा आधी दूर तक मैं तुमको छोड आता हूँ,हम दोनों पैदल ही रात को चलते हुए आए,केदारजी आधी दूरी मुझे छोड़कर चले गए और बोले अब तुम आराम से चले जाओगे।मैंने उनको मना किया कि मैं अकेले चला जाऊँगा,बोले नहीं बहुत दूर है,रात गहरी है,ठंड है, तकलीफ होगी,मैं कुछ दूर साथ चलता हूँ,बोरियत कट जाएगी।मैं उनके व्यवहार और आत्मीयता से मस्तभाव में बीच रास्ते में उनको छोड़कर चला आया,दिलचस्प बात यह है आधी दूर वे पैदल चलकर अपने घर गए,मैंने जेएनयू में इस तरह का मिलनसार व्यक्तित्व नहीं देखा।

सोमवार, 9 मई 2016

जेएनयू के छात्र आंदोलन के समर्थन में राष्ट्रपति के नाम अपील

Text of the appeal authored by a former President of the JNUSU , Jagadishwar Chaturvedi , that was passed unopposed by the JNU oldies after more than 50-hours debate , discussions , deliberations , consent after dissent the world over in the larger interest of JNU and democracy in India . Dear Mr President Sir
We the Alumni of JNU, request you to kindly intervene in the ongoing student agitation on the campus and help restore normalcy.
The health of several office-bearers and other members of JNUSU, on an indefinite hunger strike under the banner of JNUSU over the last eight days, is causing serious concern.
The students have been demanding that the ‘disciplinary action’ suggested by the “High Level Enquiry Committee” set up by the University Administration be revoked forthwith.
At the very inception of the committee the students had raised several objections to the setting up of the committee and had said that it was totally unacceptable. It is worth noting that the JNUTA had also rejected the enquiry committee.
The administration rejected the objections and conducted a one sided probe. Police action was also been initiated against the students and the matter is sub-judice.
The action initiated against the students and office bearers of JNUSU is politically motivated. We therefore demand that the JNU administration immediately withdraw the proposed disciplinary action and restore normalcy on Campus
मान्यवर,
हम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र आपसे अनुरोध करते हैं कि विश्वविद्यालय प्रांगण में चल रहे छात्रों के आंदोलन में हस्तक्षेप करके कैंपस में शांति बहाल करने में मदद करें।उल्लेखनीय है कैंपस में छात्रसंघ के बैनरतले अनेक छात्र और छात्रसंघ पदाथिकारी विगत आठ दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं।इन सभी छात्रों की शारीरिक अवस्था चिंताजनक है।छात्रों की मांग है कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर की गयी अनुशासनात्मक कार्रवाई को तुरंत रद्द किया जाय।यह जांच कमेटी जब गठित की गयी थी तब ही छात्रों ने इसके निर्माण पर अनेक आपत्तियां प्रकट की थीं,इन आपत्तियों को प्रशासन ने एकसिरे से अस्वीकार किया और इकतरफा जांच कमेटी का गठन करके उस घटना की जांचकी।उल्लेखनीय है कि जेएनयू शिक्षक संघ ने भी जांच समिति को अस्वीकार किया था।वहीं दूसरी ओर छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई भी गयी।जिससे संबंधित मुकदमा अदालत में विचाराधीन है।हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि जिन छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गयी है वह राजनीति से प्रेरित है।अतःहम मांग करते हैं कि जेएनयू प्रशासन तुरंत छात्रों के खिलाफ की गयी अनुशासनात्मक कार्रवाई को वापस ले और कैंपस में शांति बहाल करे।( चन्द्रप्रकाश झा की वॉल से साभार

रविवार, 1 मई 2016

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू -2-

       जेएनयू की 'स्प्रि ‍ट' का स्रोत हैं छात्र। छात्रों की एकता,सहनशीलता,मि‍तव्ययता, अनौपचारि‍कता, बौद्धि‍कता आदि‍ के सामने सभी नतमस्तंक होते हैं। जेएनयू की पहचान जी.पार्थसारथी, नायडूम्मा, मुनीस रजा,जीएस भल्ला या नामवर सिंह से नहीं बनती। जेएनयू की पहचान की धुरी है ''छात्र स्प्रिट'। यह 'छात्र स्प्रिट' सारी दुनि‍या में कहीं पर भी देखने को नहीं मि‍लेगी। जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' का आधार न वाम वि‍चारधारा है न दक्षि‍णपंथी वि‍चारधारा है। बल्कि लोकतांत्रि‍क अकादमि‍क वातावरण,वि‍चारधारात्मक वैवि‍ध्य, और लोकतांत्रि‍क छात्र राजनीति‍ इसकी आत्मा है। जेएनयू के वातावरण और 'छात्र स्प्रि ‍ट' को नि‍र्मि‍त करने में अनेक वि‍चारधाराओं की सक्रि‍य भूमि‍का रही है। जेएनयू का अकादमि‍क वातावरण वि‍चारधाराओं के संगम से बना है। जेएनयू में आपको एक नहीं अनेक वि‍चारधाराओं के अध्ययन-अध्यापन और सार्वजनि‍क वि‍मर्श का अवसर मि‍लता है । इस अर्थ में जेएनयू वि‍चारधाराओं का वि‍श्ववि‍द्यालय है। सि‍र्फ वाम वि‍चारधारा का वि‍श्ववि‍द्यालय नहीं है।फर्क इतना है कि‍ अन्यत्र वि‍श्ववि‍द्यालयों में वि‍चारधाराओं के अध्ययन -अध्यापन को लेकर इस तरह का खुलापन,सहि‍ष्णु और लोकतांत्रि‍क भाव नहीं है जि‍स तरह का यहां पर है।
जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' के अनेक नजारे हमारी आंखों से गुजरे हैं। आज भी इस 'छात्र स्प्रिट' को आप व्यंजि‍त होते देख सकते हैं। मुझे मई 1983 का ऐति‍हासि‍क क्षण याद आ रहा है। यह क्षण कई अर्थों में छात्र राजनीति‍ के सभी पुराने मानक तोड़ता है और नए मानकों को जन्मं देता है। यह वह ऐति‍हासि‍क क्षण है जि‍समें जेएनयू अपना समस्त पुराना कलेवर त्यागकर नया कलेवर धारण करता है। छात्रों में अभूतपूर्व एकता,अभूतपूर्व भूल और अभूतपूर्व क्षति‍ के दर्शन एक ही साथ हुए हैं। जेएनयू की अभूतपूर्व क्षति‍ के लि‍ए सि‍र्फ उस समय के छात्रसंघ के नेतृत्व को दोष देना सही नहीं होगा। मई 1983 की जेएनयू की तबाही के लि‍ए छात्र बहानाभर थे। असल खेल तो प्रशासकों ने खेला था। उस खेल में अधि‍कांश नामी गि‍रामी शि‍क्षकों ने प्रशासन का समर्थन कि‍या था। एकमात्र जीपी देशपाण्डे ,प्रभात पटनायक, सुदीप्ति‍‍ कवि‍राज, उत्सा पटनायक, पुष्पेंशपंत आदि ने खुलेआम छात्रों का पक्ष लि‍या था,प्रशासकों के खि‍लाफ आवाज उठायी थी। बाकी सब तो 'बदलो' ,' बदलो' कर रहे थे। मई 83 की घटना के साथ जेएनयू की समस्त पुरानी ऐति‍हासि‍क मान्याताएं, धारणाएं, वि‍श्वास, संस्कार,आदतें, राजनीति‍क मान्यताएं, प्रशासनि‍क नजरि‍या,प्रशासकीय नीति‍यां सब कुछ धराशायी हो गए । मई 83 की घटना को बहाना बनाकर जेएनयू को सुनि‍योजि‍त ढ़ंग से प्रशासकों ने तोड़ा। इस कार्य में लोकल प्रशासकों से लेकर केन्द्रीय शि‍क्षा मंत्रालय तक सभी का हाथ था। छात्र आंदोलन को तो महज बहाने के रूप में इस्तेमाल कि‍या गया था। मई छात्र आंदोलन नहीं होता तब भी जेएनयू में बुनि‍यादी परि‍वर्तन आते। मई 83 के भयानक दमन के बाद भी 'छात्र स्प्रि ट' खत्म नहीं हुई । सारे प्रशासकीय और नीति‍गत परि‍वर्तनों को लाने का बुनि‍यादी लक्ष्य था 'छात्र स्प्रिट' को नष्ट करना। छात्रों ने कभी भी यह लक्ष्य हासि‍ल करने दि‍या।उल्लेखनीय है मई आंदोलन के कारण 170 से अधिक छात्र निष्कासित हुए,एक साल दाखिले नहीं हुए,370से अधिक छात्रों पर 20 से अधिक केस दो साल तक चलते रहे। मई 83 के भयानक उत्पीडन और दमन के बावजूद छात्रों की एकता,भाईचारा, राजनीति‍क सहि‍ष्णुता और बंधुत्व बना रहा। उल्लेखनीय है मई 83 में मैं वहां की राजनीति‍ का अनि‍वार्य हि‍स्सा‍ था। जेएनयू की स्टूडेण्ट फेडरेशन ऑफ इण्डिया की जेएनयू यूनि‍ट का अध्यक्ष और दि‍ल्ली राज्य का उपाध्यक्ष था। बाद में सन् 1984 -85 के छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष बनने वाला जेएनयू का एकमात्र हि‍न्दीभाषी छात्र था। जेएनयू कि‍सी व्यक्ति का बनाया नहीं है, कुछ व्यंक्तियों का भी बनाया नहीं है। वह प्रोफेसरों का भी बनाया नहीं है। जेएनयू को बनाया है छात्र स्प्रिट ने। कि‍सी महापंडि‍त ने जेएनयू नहीं बनाया। जेएनयू में व्यक्ति नहीं 'स्प्रिट' महत्वपूर्ण है। कर्मण्यता और छात्रसेवा महत्वपूर्ण है। जेएनयू 'छात्र स्प्रिट' की धुरी है कर्मण्यता। जो छात्रों के लि‍ए काम करेगा उसे वे प्यार करते हैं। वे राजनीति‍ पर ध्यान पीछे देते हैं कर्मण्यता पर ध्यान पहले देते हैं। अकर्मण्यक होने पर वे कि‍सी भी धाकड़ नेता को घूल चटा सकते हैं। छात्रों के बीच कौन कि‍तना समय देता है, उनकी तकलीफों में कौन कि‍तना ध्यान देता है,कि‍तना समय उनकी सुख दुखभरी जिंदगी में शेयर करता है। इन चीजों को जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' पहचानती है। कोई बढ़ि‍या नेता हो लेकि‍न छात्रों के बीच में नहीं छात्रसंघ के दफतर में क्लर्क की तरह बैठा रहे। छात्रसंघ की कार्रवाईयों को ही महत्व दे। सार्वजनि‍क तौर पर कम मि‍ले या लोगों में कम घुले मि‍ले तो ऐसे नेता को जेएनयू के छात्र पसंद नहीं करते।

शनिवार, 29 जनवरी 2011

जेएनयू छात्र प्रतिवाद का स्वर्णिम पन्नाः इंदिरा गांधी वापस जाओ


( जेएनयू कुलपति के ऑफिस के सामने प्रतिवाद करते हुए छात्र)
     जेएनयू में रहते हुए अनेक सुनहरे पलों को जीने का मौका मिला था। जेएनयू के पुराने दोस्तों ने काफी समय से एक फोटो फेसबुक पर लगाया हुआ है। यह फोटो और इसके साथ जुड़ा प्रतिवाद कई मायनों में महत्वपूर्ण है। छात्र राजनीति में इस प्रतिवाद की सही मीमांसा होनी चाहिए। उन छात्रों को रेखांकित किया जाना चाहिए जो पुलिस लाठाचार्ज में घायल हुए। उन छात्रनेताओं की पहचान की जानी चाहिए जो नेतृत्व कर रहे थे। उन परिस्थितियों का मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए जिसमें यह प्रतिवाद हुआ था।
संभवतः 30 अक्टूबर 1981 का दिन था वह। इस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.श्रीमती इंदिरागांधी जेएनयू में आयी थीं। याद करें वह जमाना जब श्रीमती गांधी 1977 की पराजय के बाद दोबारा सत्ता में 1980 में वापस आयीं। जेएनयू के छात्रों के प्रतिवाद का प्रधान कारण था कि आपातकाल में लोकतंत्र की हत्या में वे अग्रणी थीं,जेएनयू के छात्रों के दमन में भी वे अग्रणी थीं। स्कूल आफ इंटरनेशनल स्टैडीज के तत्कालीन डीन के.पी मिश्रा ने उन्होंने स्कूल के 25 साल होने पर बुलाया था,छात्रों ने आमसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास करके उनके आने का विरोध किया था। मैं उस समय कौंसलर था।
      छात्रसंघ का एक प्रतिनिधिमंडल वी.भास्कर ,अध्यक्ष छात्रसंघ के नेतृत्व में तत्कालीन कुलपति नायडुम्मा को छात्रों के विरोध और प्रतिवाद से अवगत करा चुका था। इसी बीच में छात्रसंघ के चुनाव आ गए और 22 अक्टूबर1981 को नयी लीडरशिप आ गयी जिसमें सारा नेतृत्व एसएफआई और एआईएसएफ के हाथ में अमरजीत सिंह सिरोही अध्यक्ष ,अजय पटनायक,महामंत्री,आर.वेणु उपाध्यक्ष,सोनिया गुप्ता सहसचिव थीं। रोचक बात यह थी कि मैं उपाध्यक्ष का चुनाव 18 वोट से हार गया था। दो-तिहाई बहुमत से एसएफआई-एआईएसएफ मोर्चा जीता था।
     चुनाव में श्रीमती गांधी के प्रतिवाद का सवाल प्रमुख सवाल था और नये नेतृत्व पर इसकी जिम्मेदारी थी। मैं उस समय एसएफआई का यूनिट अध्यक्ष और राज्य का उपाध्यक्ष था। कैंपस में श्रीमती गांधी के आगमन के खिलाफ जितना गहरा आक्रोश मैंने उस समय देखा था वह आज भी जेएनयू छात्रों की प्रतिवादी लोकतांत्रिक भावनाओं की यादों को ताजा कर रहा है। सारा कैंपस श्रीमती गांधी के खिलाफ प्रतिवाद पर एकमत था। मुझे याद है कर्मचारियों का जिस तरह का समर्थन हमें मिला था वह बहुत महत्वपूर्ण था। के.पी.मिश्रा-नायडुम्मा की लॉबी को कैंपस में अलग-थलग करने में हमें जितना व्यापक समर्थन मिला था उसने छात्रों के हौसले बुलंद कर दिए थे।

(श्रीमती इंदिरा गांधी के आगमन का विरोध करते हुए जेएनयू छात्र)    
याद पड़ रहा है कि श्रीमती गांधी के भाषण को दिल्ली के किसी आखबार ने हैडलाइन नहीं बनाया था सभी अखबारों में एक ही बड़ी खबर थी जेएनयू के छात्रों का प्रतिवाद और मुखपृष्ठ पर लाठीचार्ज की खबरें,लाठीचार्ज के बाद छात्रनेताओं की गिरफ्तारी और कैंपस में जो फूलों के गमले टूटे थे उसकी खबरें।
    दूरदर्शन पर श्रीमती गांधी के भाषण के अंश भी दिखाए गए थे जिसमें वे भाषण दे रही थीं और पृष्ठभूमि में हजारों छात्रों-कर्मचारियों के कंठों से निकला एक ही नारा गूंज रहा था ' इंदिरा गांधी वापस जाओ।' कुल मिलाकर 15 मिनट उन्होंने भाषण दिया और भाषण के दौरान सभास्थल पर अंदर प्रत्येक 30 सैकिण्ड में एक छात्र उठ रहा था और नारा लगा रहा था 'इंदिरा मुर्दाबाद','इंदिरा गांधी वापस जाओ।'
     छात्रसंघ का फैसला था कि इस समारोह का बहिष्कार करेंगे। साथ ही सभा के पण्डाल में जाकर प्रत्येक 5 सीट के बाद हमारा एक छात्र रहेगा जो उनके भाषण के दौरान उठकर प्रतिवाद  करेगा। तकरीबन 30 छात्रों की उस दौरान गिरफ्तारी हुई थी। समूचे पण्डाल में पुलिस ही पुलिस थी कुछ शिक्षक और अधिकारी भी थे। पुलिस की सारी चौकसी भेदकर छात्रों ने पण्डाल में प्रवेश किया था,सभी परेशान थे कि आखिरकार भीतर कैसे जाएंगे। लेकिन हम लोगों ने किसी तरह सेंधमारी करके छात्रों को अंदर घुसेड़ने में सफलता हासिल कर ली थी। जब श्रीमती गांधी अंदर भाषण दे रही थीं बाहर कई हजार छात्र-कर्मचारी एकस्वर से नारे लगा रहे थे। नारों का इतना जबर्दस्त असर और छात्रों-कर्मचारियों और प्रतिवादी शिक्षकों की ऐसी एकता जेएनयू के इतिहास में विरल थी।
     श्रीमती गांधी के कैंपस में आने के पहले से ही नारों से आकाश गूंज रहा था और जब वो आई तो पहलीबार इंटरनेशनल स्टैडीज के सामने और जेएनयू वीसी के ऑफिस के सामने से पुलिस की घेराबंदी को तोड़ने की एकजुट कोशिश आरंभ हुई और पुलिस का बर्बर लाठीचार्ज शुरू हुआ। मुझे याद है उस समय हिंसा छात्रों ने आरंभ नहीं की थी। जेएनयू के दोनों गेट पर छात्र और कर्मचारी प्रतिवाद कर रहे थे।हरबंस मुखिया आदि कुछ शिक्षक भी उसमें शामिल थे। नारेबाजी चल रही थी स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टैडीज के सामने और वीसी ऑफिस के सामने। अचानक पुलिस ने नारे लगाते छात्रों को जबर्दस्ती ठेलने की कोशिश की थी इंटरनेशनल स्टैडीज के सामने और फिर लाठीचार्ज किया जिसमें मुझे पीटते हुए पुलिस ने सबसे पहले गडढे में गिरा दिया उसके बाद छात्रों ने जमकर प्रतिवाद किया।
   वीसी ऑफिस के सामने वहां सिरोही छात्रसंघ के अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व कर रहे थे उन्होंने श्रीमती गांधी की कार पर लंबी छलांग लगाई और वे किसी तरह 6-7 मीटर लंबी जंप के बाद श्रीमती गांधी की गाड़ी के सामने सारी सुरक्षा व्यवस्था को तोड़कर जाकर गिरे ,उन्हें पुलिस ने पकड़ा।दोनों ओर तेज लाठीचार्ज हुआ था,200 से ज्यादा छात्रों को चोटें आईं। अनेक को गिरफ्तार करके पुलिस ले गई।
जेएनयू में प्रतिवाद का यह शानदार दिन था।मुझे याद है इंटरनेशनल स्टैडीज के सामने हम सैंकड़ो छात्रों के साथ प्रतिवाद कर रहे थे,मेरे साथ सुहेल हाशमी भी थे, मैं पुलिस की लाठी खाने से डर रहा था,उन्होने मुझे ठेलकर आगे किया और कहा डरो मत,मैंने उस दिन के लिए नई ब्लैक शर्ट बनवायी थी,छात्र ब्लैक बिल्ले लगाए हुए थे। पुलिस की पिटाई से मेरी शर्ट फट गयी, जिस समय पहली लाठी मेरे ऊपर पड़ी थी छात्रों में तो जबर्दस्त आक्रोश की लहर दिखी ही थी साथ ही सबसे आगे आकर हरबंस मुखिया साहब ने चीत्कार करते हुए प्रतिवाद किया था। मजेदार बात यह थी कि मैं उपाध्यक्ष का चुनाव हारा था। वेणु जीता था। वह कहीं नहीं दिख रहा था। प्रतिवाद के बाद नेताओं और छात्रों को पुलिस जब पकड़कर ले जा रही थी तो संभवतः वह पीछे से किसी तरह जाकर गिरफ्तार छात्रों में शामिल हो गया, उस समय उसके फ्री थिंकर्स दोस्तों ने भेजा कि जाओ वरना नाक कट जाएगी। हमारे संगठन का निर्णय था कि मैं गिरफ्तारी नहीं दूँगा बाहर रहूँगा लेकिन पुलिस वाले सबसे पहले लाठीचार्ज करते हुए मुझे ही पकड़कर ले गए।याद पड़ रहा है जिस समय वे पीट रहे थे उस समय एक थानेदार ने मुझे पिटने से बचाया,वह थानेदार जानता था मुझे । क्योंकि उसका एक भाई हरियाणा में एसएफआई करता था।वरना उसदिन मैं बहुत पिटता। लेकिन मुझे पुलिस लाठी खाने के लिए आगे ठेलने के लिए मैं आजतक सुहेल को याद करता हूँ।
इस प्रतिवाद का शानदार पक्ष था कुलपति का लाठीचार्ज के लिए लिखित माफी मांगना और श्रीमती गांधी को बुलाने के फैसले पर खेद व्यक्त करना। जेएनयू में इसके पहले किसी कुलपति ने अपने फैसले पर इस तरह दुख व्यक्त नहीं किया था। यह हमारे लोकतांत्रिक आंदोलन की सफलता थी कि विश्वविद्यालय को अपने फैसले पर अफसोस जाहिर करना पड़ा। सारे छात्रनेताओं को तत्काल रिहा किया गया और सारे मामले वापस लिए गए। यह सब कुछ हुआ अहिंसक ढ़ंग से।

गुरुवार, 13 मई 2010

जेएनयू में जातिवाद की धुरी हैं अभिजन संरचनाएं

(जेएनयू की जातिवादी संरचनाओं के विरोधी छात्र नेता बाएं से देवीप्रसाद त्रिपाठी,चन्द्रशेखर टिवरीवाल,रमेश दीक्षित) 
        हम लोग जब पढ़ते थे तब भी जेएनयू में जातिवाद था लेकिन सुसंस्कृतभाव से जातिवादी ऑपरेशन चलता था,छात्रों में जातिवाद नहीं था। प्रशासन में जातिवाद था। प्रशासन में जो लोग बैठे थे उनकी दिलचस्पी अभिजन समुदाय को तैयार करने में थी। जेएनयू में 1979-1986 के बीच पढ़ने का मौका मिला । इस दौर में जमकर छात्र राजनीति भी की।
      इस दौर में सामान्य से तथ्य से प्रशासन में व्याप्त जातिवादी मनोदशा को सहज ही समझा जा सकता है कि उस समय सारे जेएनयू में 3-4 एससीएसटी शिक्षक थे। जबकि एससीएसटी के लिए आरक्षित पद थे 27 प्रतिशत। संवैधानिक तौर पर ये पद निर्धारित तक नहीं किए गए थे।
     उदाहरण के लिए हिंदी-उर्दू विभाग को ही लें वहां एक भी रिजर्व केटेगरी के तहत शिक्षक नहीं था। समूचे लैंग्वेज स्कूल में किसी भी विभाग में एक भी शिक्षक रिजर्व केटेगरी से नहीं था। बाकी स्कूलों की भी यही दशा थी। मुश्किल से 3-7 प्रतिशत रिजर्व सीटें छात्रों की भर पाती थीं। बड़ी ही चालाकी से हमारे ‘प्रगतिशील’ प्रशासकों ने जेएनयू में जातिवाद के खेल को चलाया हुआ था। उस समय छात्रसंघ की प्रमुख मांग थी शिक्षकों और छात्रों में एससीएसटी कोटे की सीटें हर हालत में भरी जाएं।
   विचारणीय समस्या यह है कि प्रशासनिक संरचनाएं अभिजनमुखी होंगी तो क्या जातिवादी मनोदशा के पनपने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं ? कृपया बताएं अभिजनोन्मुख संरचनाओं से मुक्ति का रास्ता या विकल्प क्या ?  


हमारी पहली टिप्पणी पर फेसबुक पर कुछ पुराने जेएनयू के दोस्तों ने लिखा है। कुछ टिप्पणियां और आयी हैं ,देखें-  

      चन्द्रप्रकाश झा-  aapke sawalon ke jawab dene ke main kabil nahin - lekin yeh bahas honi hi chahiye ki hum madhyayugin yug mein kyon laut rahe hain - Rajendra Sharma ( LokLahar ) ke putra Kabir ( Mattu ) ki ek baat mujhe yaad aati hai - jab KABIR jati mein yakin nahin karte the toh mere naam ke saath SHARMA surname jod kar KABIR ka naam kyon bigad diya gaya


जगदीश्वर-  सवाल नाम का नहीं रवैय्ये का है। आप अपनी तरफ से संक्षेप में ही सही कह गए।

चन्द्रप्रकाश झा-   aapko sahi laga - dhanyawad , ek baat aur SAMPRADAYIKTA se ladna jaatiwad se ladne ke mukable shayad jyada aasan hai - shahar mein curfew ke lekhak - Vibhuti Narain Rai ko dekh lijiye Vardha mein Namwar Singh ki sangat mein

 Kandarpa Das :

"As far I understand, it is an iminent effect of the post Mandal era. The whole north India have been effected during the last two decades and JNU is cannot be an isolation. Politics of North Indian always effected JNU. Remember, during the anti Mandal movement in Delhi, JNU was also effected (during Amit Sengupta's Presidency). The left forces were sidelined. I remember the evening when Atul Aneja and othes were attacked at Purvanchal. 
There has been a polarisation in JNU on caste line since than. Winning elections by SFI-AISF in between does not mean anything different. Another important factor, according to me is the caste politics played by our so called Ultra left. "

Kandarpa Das :

"I think it is the effect of the post Mandal North-Indian politics. Though JNU is supposed to be an all India University, North Indian politics always effected JNU student politics.(SYS during 1970s, NSUI during 1980s, ABVP during 1990s and AISA now)  Remember the days of Anti Mandal movements in Delhi. JNU was also effected . When Amit Sengupta was theJNUSU president, a whole gang of anti-Mandal castiest created big problem in JNU campus. I still remember the evening in 1990, when Atul Aneja and others were attacked by these forces in Purvanchal.  
During the last two decades castiest forces did consolidate their position. Many students Union elections were also fought in these lines. SFI-AISF alliance winning elections doesnot say anything. Moreover, many of our friends in the ultra left in JNU also play lower caste politics. All these have contributed to this. According to me only khate-pite parivar ke bande hi jati me ulazhte hei. ...........One thing I must add, since there is no castiesm in North-east like the north India,NE students in JNU are free from this.  "

बुधवार, 12 मई 2010

जेएनयू में जातिवादी चेतना का जहर

      सुनने में अटपटा लगता है लेकिन वास्तविकता है कि जेएनयू के सांस्कृतिक वातावरण में जातिवाद का विष आ गया है। जेएनयू लंबे समय तक जातिवाद के जहर से मुक्त था। लेकिन आज ऐसा नहीं है। मैं लंबे समय वहां पढ़ा हूँ और एक भावनात्मक लगाव भी महसूस करता हूँ,जेएनयू के बारे में पुराने और नए दोस्तों से पूछता रहता हूँ। इस क्रम में मेरे कानों में एक छात्र की यह पीड़ा भी आई है कि जेएनयू में जातिवाद घुस आया है। विद्यार्थियों में एक अच्छा-खासा तबका तैयार हो गया है तो जातिवादी मनोदशा में जी रहा है।
      जेएनयू के शानदार सांस्कृतिक वातावरण में पैदा हुए जातिवाद के खिलाफ व्यापक सार्वजनिक बहस चलाई जानी चाहिए। जेएनयू के छात्र सक्षम हैं और देश-विदेश की समस्याओं पर चर्चाएं करते रहते हैं। उन्हें इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए कि भारत का सबसे शानदार विश्वविद्यालय अचानक जातिवाद की चपेट में कैसे आ गया है ?
     क्या जेएनयू में पैदा हो रही जातिवादी चेतना का वहां के पाठ्यक्रमों में आए बदलाव से कोई संबंध है ? क्या  
     जेएनयू में पैदा हो रही जातिचेतना का कैरियरपंथी रुझान से संबंध है ?
    क्या जेएनयू में दाखिला नीति के बदल जाने के साथ इसका संबंध है ?
    क्या जेएनयू में पठन-पाठन के गिरते स्तर के साथ इसका संबंध है ?
क्या जेएनयू का विचारधारात्मक रक्षाकवच कमजोर हो गया है ? यही विचारधारात्मक रक्षा कवच था जिससे टकराकर देश में व्याप्त जातिवाद टूट जाता था ।
     जेएनयू में बढ़ रही जातिवादी चेतना के पीछे क्या कैंपस में बढ़ रही अराजनीति की राजनीति का हाथ है ? क्या अतिवामपंथी राजनीति की आड़ में जातिवादी गोलबंदी तो नहीं चल रही ?
      संभवतः आम लोगों को यह बात सीधे समझ में न आए लेकिन यह एक वास्तविकता है परंपरागत वाम राजनीति को कैंपस में अपदस्थ करने के नाम पर गैर परंपरागत तथाकथित वाम राजनीति का जब से कैंपस में पदार्पण हुआ है। जातिवादी चेतना में इजाफा हुआ है।
     गैर परंपरागत वाम का बिहार से लेकर आंध्र तक जितना जुझारू तेवर है, क्रांतिकारीभाव है उसकी ओट में माओवाद प्रभावित इलाकों में जातिवादी वैमनस्य और घृणा व्यापक रुप में फैली हुई है।
      माओवादी संगठनों से लेकर आइसा जैसे संगठनों की विचारधारात्मक परिणतियों के बारे में खासकर जातिवादी फिनोमिना के साथ उसकी अन्तर्क्रियाओं के बारे में गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। आप भी बताएं क्या सोचते हैं ?

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

जेएनयू के महाख्यान की स्मृतियां

- जेएनयू के महाख्यान की स्मृतियां -
- 1-
छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू। छात्र अस्मिता की राजनीति का आरंभ सन् 65-66 में बीएचयू में समाजवादियों ने किया और जेएनयू ने उसे सन् 1972-73के बाद से नई बुलंदियों तक पहुँचाया। देश में छात्र अस्मिता और छात्र राजनीति को लोकतांत्रिक बोध देने में एसएफआई की बड़ी भूमिका रही है, खासकर जेएनयू में। जेएनयू लोकतांत्रिक छात्र राजनीति की प्रयोगशाला है। इस प्रयोगशाला के निर्माण में माक्र्सवादियों, समाजवादियों और फ्री थिंकरों की केन्द्रीय भूमिका रही है।
आमतौर पर शिक्षा का देश में जो वातावरण है वह छात्रों को सामाजिक जड़ताओं और रूढियों से मुक्त नहीं करता। इसके विपरीत जेएनयू के संस्थापकों का सपना था शिक्षा को रूढियों और सभी किस्म की वर्जनाओं से मुक्ति का अस्त्र बनाया जाए। शिक्षा केन्द्र वर्जनाओं से मुक्ति के तीर्थ बनें। जेएनयू के वातावरण में सभी किस्म की वर्जनाओं से मुक्ति का संदेश छिपा है। जेएनयू में पढ़ने वाला छात्र सामान्य प्रयत्न से सामाजिक रूढियों और वर्जनाओं से मुक्त होता है । जेएनयू की संरचना में वर्जना और अछूतभाव के लिए जगह नहीं है।
भारतीय समाज की सबसे बड़ी बाधा है वर्जनाएं ,अछूतभाव और भेदभाव की सभ्यता। जेएनयू का इसी सभ्यता के साथ विचारधारात्मक संघर्ष है। जेएनयू का वातावरण निषेधों और वर्जनाओं के वातावरण का विकल्प देता और इस विकल्प को तैयार करने में जेएनयू के छात्रों और छात्र राजनीति की केन्द्रीय भूमिका रही है। यह वातावरण किसी एक नेता, प्रशासक, संगठन आदि की देन नहीं है बल्कि सामुदायिक प्रयासों की देन है। सामुदायिक प्रयासों ने जाने-अनजाने जेएनयू की धुरी बायनरी अपोजीशन को बना दिया। यहां पर छोटा बड़ा और बड़ा छोटा बन जाता है। भेदों की अनुभूति गायब है।
भारतीय समाज में तरह-तरह के भेद हैं किंतु जेएनयू में अभेद का वैभव है। जेएनयू भेदों को समझता है किंतु मानता नहीं है। बाकी विश्वविद्यालय भेदों को समझने के साथ भेदों में जीते हैं। शिक्षा के लिए भेद और वर्जनाएं सबसे बुरी चीजें हैं। इन्हीं दोनों चीजों को जेएनयू ने निशाना बनाया है। जेएनयू वास्तव अर्थों में संस्थान है यहां प्रत्येक स्तर पर सभी वर्ग शिरकत करते हैं। खासकर छात्रों की शिरकत अभूतपूर्व है। देश के किसी भी विश्वविद्यालय में प्रत्येक स्तर पर छात्रों की शिरकत, सम्मान और साख वैसी नहीं है जैसी जेएनयू में है। फैसलेकुन कमेटियों में सभी स्तरों पर छात्रों की शिरकत और छात्रों की राय का सम्मान जेएनयू की सबसे बड़ी पूंजी है।
जेएनयू का कोई भी आख्यान छात्रों के बिना नहीं बनता। जेएनयू छात्रों की पहचान ज्ञान ,राजनीति और लोकतांत्रिक नजरिए से बनी है। लोकतंत्र की महानता का जैसा आख्यान जेएनयू ने तैयार किया है वैसा दुनिया के किसी भी देश में देखने को नहीं मिलता। जेएनयू के छात्रों के पास दुनिया को देखने का एक विशिष्ट नजरिया है,जीवनशैली और स्वायत्ताता बोध है। यही वजह है जेएनयू का छात्र भिन्न नजर आता है।
जेएनयू के वातावरण में व्यक्तित्व रूपान्तरण की अद्भुत शक्ति है। आप किसी भी पृष्ठभूमि के हों जेएनयू में दाखिला लेने के बाद बदले बिना नहीं रह सकते। व्यक्तित्व रूपान्तरण की इतनी जबर्दस्त स्वाभाविक शक्ति अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलती। आखिरकार परिवर्तन की यह शक्ति आती कहां से है ?
मैं अपने छोटे से तजुर्बे के आधार पर कह सकता हूँ कि जेएनयू की स्वाभाविक धारा में शामिल होने के बाद कोई भी छात्र और अध्यापक अपने को बदले बिना नहीं रह सकता। जो बदल नहीं पाते थे वे संग्रहालय की धरोहर नजर आते थे। बदलो या धरोहर बनो। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से जेएनयू का वातावरण किसी भी छात्र की जीवनशैली और नजरिए को प्रभावित करता है।
जेएनयू में सन् 1979 में जब प्रवेश परीक्षा देने आया तो सबसे पहले गंगा ढाबे पर अनिल चौधरी से परिचय हुआ। वह उस समय एसएफआई के और छात्र संघ के महासचिव थे। उनसे मिलने का प्रधान कारण था वह मथुरा के थे। मैं भी मथुरा का था। उन्होंने बड़े ही आत्मीयभाव से स्वागत किया और अनौपचारिक ढ़ंग से व्यवहार किया। अनिल के अंदाज में खासकिस्म का गर्वीला ठेठ देसी भाव था जो अपनी चाल-ढाल और बातचीत की भाषा में अभिजात्य भावबोध को चुनौती देता था। वह तीक्ष्णबुध्दि और तेजतर्रार छात्रनेता था। अनेक विलायत पलट नेता उसके नजरिए के सामने बौने नजर आते थे। समस्याओं को सुलझाने की उसकी अपनी देशी शैली थी और भाषण का स्थानीय मथुरिया अंदाज था।
मथुरिया अंदाज की विशेषता है बेबाकी मुखरता। अंग्रेजी भाषी अभिजात्य पृष्ठभूमि के लोग उसकी पारदर्शी बुध्दि की दाद देते थे। अनेक बार छात्र आन्दोलन के संकट के क्षणों में अनिल की मेधा बिजली की चमक की तरह दिखती थी, अनिल की हमदर्दी और संवेदनशीलता के सारे कॉमरेड कायल थे और अपने सुख-दुख का उसे साथी मानते थे।
-2-

जेएनयू के दाखिले की प्रक्रिया बड़ी ही दिलचस्प हुआ करती थी, पहले टेस्ट और बाद में इंटरव्यू ,इन दोनों के आधार पर ही दाखिला होता था। मैंने जब फार्मभरा तो अनेक मिथ, भय, दुविधा और विभ्रम थे। पहला मिथ था जिसके ज्यादा अच्छे नम्बर होते हैं उसका ही दाखिला होता है। खैर मेरा दाखिला होते ही यह भ्रम टूट गया क्योंकि शास्त्री में मेरे मात्र पचास फीसद नम्बर थे। दूसरा मिथ था जेएनयू मेधावियों का केन्द्र है ,दाखिले के बाद बड़ी मात्रा में औसत दर्जे के छात्रों को देखकर यह मिथ भी खत्म हो गया। यह मिथ भी टूटा कि जेएनयू में सभी शिक्षक बड़े ज्ञानी होते हैं। हिंदी में कई औसत शिक्षक भी थे और जीनियस शिक्षकों में नामवरसिंह, मैनेजर पाण्डेय और केदारनाथसिंह प्रमुख थे। जेएनयू के बारे में एक अन्य मिथ था नामवरसिंह ऐसे किसी भी छात्र को हिन्दी में दाखिला नहीं देते जहां के किसी छात्र का एसएफआई या सीपीएम से संबंध हो। मेरे मामा कविवर मनमोहन और अनिल चौधरी दोनों का एसएफआई और मथुरा से संबंध था अत: यह भय था कि मथुरा का पता दोगे तो दाखिला नहीं होगा। काफी बुध्दि खर्च करने के बाद अपने ज्योतिष गुरू संकटाप्रसाद उपाध्याय के बनारस के घर का पता दिया। चूंकि मैं अंग्रेजी नहीं जानता था अत: फार्म भरने का काम मनमोहन और हरिवंश ने मिलकर किया। जेएनयू का प्रवेश फार्म भी मजेदार था उसमें अनेक रोचक कॉलम थे ,उनमें एक कॉलम था कि आप किस शहर के वाशिंदा हैं और उसमें कितनी तहसील हैं। तकलीफ तब हुई जब बनारस में कितनी तहसील हैं इस कॉलम को मुश्किल से इधर-उधर से पूछकर भरा गया। मैं साक्षात्कार के समय डरा हुआ था कहीं नामवरजी बनारस के बारे कुछ पूछ न लें। खैर उन्होंने परेशान नहीं किया उलटे वे खुश थे कि कोई सिध्दान्त ज्योतिष से प्रथमश्रेणी में आचार्य करके हिंदी पढ़ने आया है।
मेरे पिता जेएनयू में दाखिले के सख्त खिलाफ थे क्योंकि मेरे मामा मनमोहन ने अंतर्जाजीय विवाह जेएनयू की एक छात्रा शुभा शर्मा से किया था। चौबों के लिए यह विवाह सामाजिक धक्के की तरह था। टेस्ट के बाद जब इंटरव्यू हुआ तो मुझे पहलीबार नामवरसिंह, केदारनाथ सिंह, मैनेजर पाण्डेय, सावित्री चन्द्र शोभा, चिन्तामणि, डा.सुधेशजी आदि के दर्शन का मौका मिला। 50 मिनट के करीब सवाल जबाव हुए और ज्योंही मैं इण्टरव्यू खत्म करके कमरे से निकल रहा था कि अचानक मेरे प्रवेश फार्म में आंखे गड़ाए बैठे डा. चिन्तामणिजी ने मजेदार कमजोरी खोज निकाली , तुरंत लौटने को कहा और सवाल किया कि आपकी शिक्षा मथुरा की है ,घर भी मथुरा में है, किंतु संपर्क का पता बनारस का क्यों है ? मेरे पास इसका कोई सटीक जबाव नहीं था अचानक मैंने कहानी बनायी कि मेरे पिता ने दूसरी शादी कर ली और विमाता के कारण मुझे अपने ज्योतिष गुरू के घर बनारस रहना पड़ रहा है। यह उल्लेखनीय है कि मैं कभी बनारस में नहीं रहा और मेरे पिता ने दूसरी शादी नहीं की। उसी समय नामवरजी ने मार्के का दूसरा सवाल किया आपने सिध्दान्त ज्योतिष से आचार्य किया है आप पीएचडी में दाखिल ले सकते हैं। मैंने तुरंत कहा मुझे एमए में दाखिला चाहिए, नामवरजी का सवाल था क्यों ? मैंने कहा कि मैं हजारीप्रसाद द्विवेदीजी की तरह हिंदी पढ़ाना चाहता हूँ। संभवत: मेरा यह उत्तर डूबे को तिनके के सहारे की तरह मददगार साबित हुआ और मैं जेएनयू पहुँच गया।
हिन्दी विभाग के दो छात्रों का व्यक्तित्व मुझे बड़ा ही दिलचस्प लगता था इनमें एक थे घनश्याम मिश्र और दूसरे थे चौधरी रामबीर सिंह। इन दोनों के व्यक्तित्व के साथ जेएनयू के हिंदी विभाग की पहचान भी जुड़ी थी। ये दोनों ही मस्त पहलवान किस्म के छात्र थे। जेएनयू के इकहरे बदन के छात्रों में इन्हें विलक्षण माना जाता था। एक बार मजेदार वाकया भी हुआ जब काशी वि.वि. में अन्तर्विश्वविद्यालय कुश्ती प्रतियोगिता के लिए चौधरी रामबीर सिंह को भेज दिया गया, जेएनयू के इतिहास में यह अद्भुत क्षण था क्योंकि जेएनयू के छात्रों में खेलों के प्रति कभी गहरी दिलचस्पी नहीं थी। खेल को वे बेकार मानते थे, ऊर्जा का अपव्यय मानते थे। चौधरी रामबीर सिंह का कुश्ती प्रतियोगिता में काशी जाना और वहां से हार के आना भी एक खबर बन गया। हिंदी विभाग जिस केन्द्र के तहत था उसे भारतीय भाषा केन्द्र कहते थे, यह भाषा संस्थान का हिस्सा था। उन दिनों विभाग में सबसे दिलचस्प और धाकड़ छात्र था कुलदीपकुमार वह घोषित तौर पर कम से कम कक्षाएं करता था और कभी समय पर अपने टर्मपेपर ,टयूटोरियल वगैरह जमा नहीं करता था। हर बार उसका एक ग्रेड नामवरजी काटते थे। नामवरजी का नियम था जो छात्र देर से टर्मपेपर वगैरह देगा उसका एक ग्रेड काट लिया जाएगा। कुलदीप ग्रेड कटवाता था और उसके बावजूद 'ए माइनस ' ग्रेड पाता था। मैंने ग्रेड कटवाने वाला छात्र अपने जीवन में नहीं देखा। भारतीय भाषा केन्द्र में दूसरे दो बड़े ही अच्छे दोस्त थे राजेन्द्र शर्मा और असद जैदी। राजेन्द्र हिंदी में था,असद उर्दू में था। दोनों के गुण अलग थे। राजेन्द्र की खूबी थी जिसे एसएफआई की राय से सहमत करने के लिए जाता था उसे विपक्ष में करके आता था। असद के पोस्टर स्वयं में उसकी कला के प्रदर्शन का केन्द्र थे।
मनमोहन के बारे में चर्चा किए बिना भारतीय भाषा केन्द्र की चर्चा खत्म नहीं हो सकती। मनमोहन अपनी मेधा, सरलता, सहजता और बेबाकी के कारण भारतीय भाषा केन्द्र के विद्याार्थियों में प्रसिध्द था। उसे बचपन से ही कविताएं लिखने का शौक था। विचारों की दुनिया में रमण करने में उसे मजा आता था। माक्र्सवाद की बारीकियों, साहित्य की कल्पनाशीलता को वह आज भी साक्षात अपने जीवन में जीता है। कवि और साहित्यकार होने के बावजूद उसकी समूची व्यवहारिक जिंदगी कवि के तामझाम के बाहर है। कविरूप में जेएनयू के अंदर ही नहीं समूचे देश में उसने प्रसिध्दि अर्जित की। खासकर आपात्काल के दौरान मनमोहन की लिखी कविताएं बेहद लोकप्रिय हुईं। इनमें जिस कविता ने सभी को आकर्षित किया वह थी 'आ राजा का बाजा बजा।'
जेएनयू में पढ़ते हुए छात्रों में मनमोहन की जनप्रियता उस समय देखने लायक थी जब एसएफआई का पैनल एसएफसी चुनावों में भारतीय भाषा केन्द्र में पांचों सीटों पर सन् 1979 में एसएफआई विरोधी हवा होने के बावजूद जीत गया। मैंने दाखिला लिया ही था और समूचे कैम्पस में खासकर भारतीय भाषा केन्द्र में एसएफआई के खिलाफ नामवरजी से दर्ुव्यवहार करने के कारण तनावपूर्ण वातावरण था उसमें एआईएसएफ के समूचे पैनल का हारना अपने आप में बहुत बड़ी बात थी। उस साल (1979) छात्रसंघ चुनाव में डी.रघुनंदन ने अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की थी और दिग्विजय सिंह ने महासचिव पद पर जीत दर्ज की थी। दिग्विजय सिंह को सभी छात्र दादा कहकर पुकारते थे, दादा का व्यवहार भी सचमुच दादा जैसा था, वे सभी छात्रों से बेहद स्नेह करते थे, बिहार से आने वाले छात्रों को तुलनात्मक तौर पर ज्यादा प्यार करते थे। दिग्विजय सिंह ने समाजवादी युवजनसभा की ओर से चुनाव जीता था और उनकी लोकतांत्रिक मूल्यों और लोहिया के विचारों के प्रति गहरी निष्ठा सभी को प्रभावित करती थी। भाषा संस्थान से छात्रसंघ की राजनीति में मुख्यपद पर जीतने वाले दादा पहले नेता थे। दादा के पहले छात्रसंघ में भाषा संस्थान का मुख्यपदों (अध्यक्ष और महासचिव पद) पर कभी भी कोई उम्मीदवार नहीं जीता था, बाद में सन् 1983 में रूसी भाषा केन्द्र की रश्मि दोराईस्वामी अध्यक्ष बनी और उसके बाद मैं अध्यक्ष पद पर सन् 1984 में चुना गया। इसके बाद तो भाषा संस्थान से अनेक नेता पैदा हुए जो छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए। छात्रसंघ के इतिहास में मैं पहला अध्यक्ष था जिसने अपनी पीएचडी समय पर जमा की, मैंने मात्र साढ़े छह साल में एम.ए,एम.फिल् और पीएचडी का कोर्स पूरा किया। जेएनयू की सारी डिग्रियों (एमए,एमफिल् और पीएचडी) की पढ़ाई निर्धारित समय में मुझसे पहले किसी भी छात्रसंघ अध्यक्ष ने पूरा नहीं किया।
भारतीय भाषा केन्द्र का कोई भी आख्यान नामवरसिंह के बिना संपन्न नहीं होता। नामवरजी की कक्षा करना निश्चित रूप से एक विशिष्ट अनुभव से गुजरना था। उनकी क्लास विचारोत्तोजक और प्रेरक हुआ करती थी। नामवरजी के व्यक्तित्व को लेकर अनेक किस्म का वादविवाद हो सकता है किंतु एक चीज निर्विवाद है उनकी भाषणकला, बेहतरीन शिक्षक की इमेज और छात्रों में आलोचनात्मक विवेक पैदा करने की क्षमता। आलोचनात्मक विवेक पैदा करने का काम सबसे कठिन काम था। आयरनी यह थी कि नामवरजी अपने प्रभाव से आलोचनात्मक विवेक पैदा करते थे किंतु अंदर से आलोचना नापसंद करते थे। स्वभाव से नामवरजी को आज्ञाकारी भाव ही पसंद था किंतु अपने भाषणों और कक्षा में वक्तृता के जरिए उन्होंने सैंकड़ों विवेकवान छात्र तैयार किए हैं। संभवत: हिंदी में किसी एक शिक्षक ने उच्चशिक्षा के स्तर पर इतना व्यापक योगदान अभी तक नहीं किया है। आप नामवरजी से नफरत करते हों किंतु उनका लोहा मानने को मजबूर होंगे। नामवरजी का यह लोहा मनवाने वाला हुनर उनकी आलोचनात्मक विवेक पैदा करने वाली कला के गर्भ से पैदा हुआ है। यह कला नामवरजी ने माक्र्सवादी परंपरा से सीखी। उसे आम जीवन की आलोचना में बदला है। नामवर सिंह पढ़ाते समय जिस चीज को सबसे ज्यादा पसंद करते थे और प्रशंसा भी करते थे वह था आलोचनात्मक विवेक। नामवरजी अगर किसी चीज पर फिदा थे तो छात्रों के आलोचनात्मक विवेक पर। वे बार-बार उन छात्रों की प्रशंसा करते थे जो आलोचनात्मक विवेक की कसौटी पर खरे उतरते थे। वे ऐसे भी छात्रों की प्रशंसा करते थे जिनके बारे में प्रसिध्द था कि वे नामवरजी के कटु आलोचक हैं। छात्रों के साथ समानता और सभ्यता के धरातल पर बात करने वाले वह विरल शिक्षक हैं।
-4-
जेएनयू की एक आयरनी है कि इसमें आइकॉन विरोधी भावबोध है। इसके बावजूद कुछ छात्रनेता ऐसे भी हुए जो अपने को जेएनयू के आइकॉन या प्रतीक पुरूष के रूप में प्रतिष्ठित करने में सफल रहे। इनमें जिसने सबसे ज्यादा शोहरत और साख हासिल की है वह देवी प्रसाद त्रिपाठी यानी डीपीटी। इन दिनों वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। देवी प्रसाद त्रिपाठी से मेरी पहली मुलाकात सन् 1979 के अक्टूबर महिने में छात्रसंघ के चुनाव के मौके पर हुई। त्रिपाठीजी के बारे में मैं लगातार अन्तर्विरोधी बातें सुनता रहता था। खासकर जेएनयू आने के बाद अनेक एसएफआई नेता थे जो नहीं चाहते थे कि त्रिपाठी जी को कभी भी एसएफआई और उससे जुड़े मंचों पर बुलाया जाए। मजेदार बात यह थी कि ये नेतागण उनके बारे में तरह-तरह की कानाफूसी भी किया करते थे। एक अवस्था तो यह भी आयी कि माकपा के दिल्ली राज्य नेतृत्व से यह तय करा लिया गया कि त्रिपाठी को कभी जेएनयू चुनाव में प्रचार के लिए नहीं बुलाया जाएगा। सन् 1979 में डी.रघुनंदन को एसएफआई ने अध्यक्ष पद पर लड़ाने का फैसला लिया। आखिरी समय में स्थितियां एसएफआई के अनुकूल नहीं थीं। उस साल एआईएसएफ के साथ चुनावी समझौता भी नहीं हो पाया था। अंत में झक मारकर जेएनयू पार्टी ब्रांच ने निर्णय लिया कि देवीप्रसाद त्रिपाठी को प्रचार के लिए इलाहाबाद से बुलाया जाए।
देवी प्रसाद त्रिपाठी उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग में अध्यापन कार्य कर रहे थे और माकपा के उ.प्र. राज्य कमेटी सदस्य थे। इलाहाबाद में पार्टी का काम मूलत: उन्हीं के जिम्मे था। उल्लेखनीय है उनके इलाहाबाद में पार्टी कार्य देखने के दौरान ही पहलीबार इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यक्ष पद पर एसएफआई ने चुनाव जीता था। त्रिपाठीजी की इन सारी स्थितियों के बावजूद जेएनयू के कुछ नेताओं का उनके प्रति गुटपरस्तभाव मुझे आज तक समझ में नहीं आया। मेरी समझ है जब एक व्यक्ति पार्टी का सदस्य है तो उसके प्रति पार्टी के अंदर भेदभाव नहीं होना चाहिए।
डीपीटी के संदर्भ में माकपा के अंदर भेदभाव और गुटपरस्ती को मैंने पहलीबार जब देखा तो माथा ठनका था। कई बार इस मसले को लेकर पार्टी में गर्मागर्म बहसें भी हुईं और उसका यह सुपरिणाम था कि मैं त्रिपाठीजी को देखना चाहता था, मैंने कुलदीपकुमार से अपनी इच्छा व्यक्त की मेरी डीपीटी से मुलाकात करा दो। कुलदीप ने कहा वे रघु के चुनाव प्रचार के लिए आ रहे हैं तुम मेरे साथ रहना मुलाकात हो जाएगी और त्रिपाठी आए तो सबसे पहले उन्हें खाना खिलाने के लिए हम दोनों डाउन कैम्पस में कटवारिया सराय में एक रेस्टोरैंट में ले गए हम तीनों ने जमकर खाना खाया और खूब बातें की। अंत में खाना खाकर तकरीबन ग्यारह बजे रात को हम ऊपर कैम्पस में आए और गोदावरी होस्टल (लड़कियों का) में चुनावसभा स्थल पर पहुँचे और तकरीबन एक बजे करीब डीपीटी ने अपना भाषण शुरू किया जो तकरीबन ढाई घंटे का था । इतना लंबा धारावाहिक, आकर्षक, विचारों से भरा भाषण्ा सुनकर सभी छात्र मुग्ध थे, मेरे लिए यह विलक्षण अनुभव था। मैंने अनेक नेताओं के भाषण सुने थे, सबसे लंबे भाषण के रूप में जयप्रकाशनारायण और चन्द्रशेखर का भाषण मैं मथुरा में सुन चुका था। किंतु डीपीटी के भाषण के बाद जो अनुभूति भाषणकला के प्रति पैदा हुई वह आनंददायी थी।
डीपीटी का भाषण आकर्षक,सरस, मानवीय और विचारधारात्मक था। यह भाषण द्विभाषी था। अधिकांश समय अंग्रेजी को मिला तकरीबन आधा घंटा हिन्दी में भी बोले। अनिलचौधरी और रमेश दधीचि के अलावा त्रिपाठीजी तीसरे छात्र नेता थे जो हिन्दी में भी थोड़ा समय बोलते थे। रघु के चुनाव की यह अंतिम सभा थी और इसमें प्रकाश कारात, सीताराम येचुरी ने भी भाषण दिया और जब त्रिपाठीजी बोल रहे थे वे दोनों मुग्धभाव से सुन रहे थे और बार-बार यह संकेत भी कर रहे थे कि त्रिपाठी को सुनना एक आनंद से कम नहीं है। मजेदार बात यह थी कि उन्हें इतना मजा आ रहा था कि प्रत्येक बीस मिनट के बाद एक स्लिप डीपीटी की ओर बढ़ा देते थे कि बीस मिनट और बोलो। किसी नेता के भाषण के प्रति किसी नेता का यह आग्रह निश्चित रूप से विरल चीज थी।
डीपीटी के भाषण शुरू होने के बाद कैम्पस में और कहीं पर किसी भी संगठन को अपनी चुनावी सभा जारी रखने में जबर्दस्त मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। विपक्ष के सभी नेता और कार्यकत्तर्ाा अपनी सभा खत्म करके उनका भाषण सुनने चले आते थे ,रघु की चुनाव सभा में कहने को मंच पर प्रकाश कारात और सीताराम येचुरी बैठे थे वे पहले ही भाषण दे चुके थे उनके भाषणों के दौरान वह हलचल और सुनने की बेचैनी नहीं देखी गयी जो त्रिपाठी के भाषण के समय देखी गयी। त्रिपाठी को लंबे समय तक विपक्ष की सभाभंग करने वाले वक्ता के रूप में भी जाना जाता था। त्रिपाठी के भाषण के प्रति आम छात्रों में एक तरह का पागलपन था। मैंने अनेक छात्रों से पूछा कि भाई ऐसा क्या है जो पागल की तरह सुनने आ गए, सभी एक ही बात कहते थे कि त्रिपाठी को सुनने में मजा आता है। त्रिपाठी के भाषण के बाद जाना कि भाषण को आनंद देने वाला होना चाहिए। अमूमन नेतागण भाषणों के जरिए बोर करते हैं।
त्रिपाठी के भाषणों में रस होता था। त्रिपाठी ने अपनी भाषणकला में राजनीतिक भाषण कला में समाजवादी, कम्युनिस्ट और पंडितों की कथाशैली का सम्मिश्रण करके एक ऐसा फॉरमेट तैयार किया था जिसमें समाजवादियों की तरह विचारधारात्मक विवाद थे, कथाओं की तरह आनंद और आख्यान था साथ ही कम्युनिस्टों की समाहार शैली भी थी। त्रिपाठी की कोशिश हुआ करती थी कि श्रोताओं को कुछ देर के लिए दैनन्दिन जंजाल के बाहर ज्ञान के जंजाल में आनंद लेने को तैयार किया जाए। फलत: भाषण में विवाद ,समाहार,और आनंद की त्रिवेणी का एक अच्छी विचारोत्तोजक सुबह में मिलन होता था। त्रिपाठी का भाषण आधी रात के बाद कभी शुरू होता था और सुबह सूर्योदय के पहले तक चलता था। रघु के चुनाव के समय जो जलवा था वही जलवा अगले साल वी. भास्कर के चुनाव के समय भी था और दोनों ही मौकों पर मैन ऑफ द मैच त्रिपाठी थे। त्रिपाठी का हिन्दी का देशी ठाठ हिन्दीभाषी प्रान्तों के छात्रों को बेहद अपील करता था। डीपीटी अकेले वक्ता थे जिनकी अभिजन और गैर अभिजनों में समान अपील और सम्मान था। रघु की चुनाव सभा खत्म करने के बाद डीपीटी और मै,ं कुलदीपकुमार के पेरियार होस्टल स्थित कमरे में चले आए तब त्रिपाठीजी ने अपने हंसी-मजाक वाले अंदाज में ही मुझसे अपनी ज्योतिष संबंधी जिज्ञासाएं रखीं और इस तरह मैंने पहलीबार किसी माक्र्सवादी को ज्योतिषी से प्रश्न करते पाया।
-5-
जेएनयू के प्रतीक पुरूषों में तीन कॉमरेडों का नाम आता है ये हैं देवीप्रसाद त्रिपाठी, प्रकाश कारात और सीताराम येचुरी। इनमें से एकमात्र देवी प्रसाद त्रिपाठी ने सबसे ज्यादा कुर्बानियां दीं। आपातकाल में 18 महीनों तक जेल में रहे। जबकि बाकी दोनों का किसी भी किस्म की कुर्बानी देने का रिकॉर्ड नहीं है। यह बात दीगर है कि प्रकाशकारात और सीताराम येचुरी को माकपा के शीर्ष नेतृत्व में जगह मिली। इन दोनों नेताओं के व्यक्तित्व की अपनी-अपनी निजी विशेषताएं हैं। किंतु कुछ साझा विशेषताएं भी हैं। दोनों माक्र्सवाद की किताबी भाषा से अच्छी तरह वाकिफ हैं। दोनों का माक्र्सवाद और हिंदुस्तान के प्रति दर्शकीय संबंध है। प्रकाश कारात ने जेएनयू में सन् 1980 में भास्कर वेंकटरमन के अध्यक्ष पद हेतु आखिरी चुनाव प्रचार सभा की। तब से प्रकाशकारात ने कभी छात्र चुनाव सभाओं में हिस्सा नहीं लिया।
प्रकाश कारात का भाषण पार्टी प्रेस विज्ञप्ति, पार्टी कक्षा और पार्टी के संपादकीय शैली का मिश्रित रूप था ,उसके भाषणों में जिंदगी की धड़कनों का अभाव खटकता था, चाहकर भी वह अंत तक इस कमजोरी से मुक्त हो पाया। प्रकाश के इस स्वभाव का जीवन और पार्टी के प्रति यांत्रिक और संवेदनाहीन समझ से गहरा संबंध है। कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर जो लोग स्टालिन टाइप व्यक्तित्व से प्रभावित हैं उन्हें प्रकाश अपील करता है। साधारण छात्रों में उसके भाषण्ाों की न्यूनतम अपील होती थी, सिर्फ एसएफआई के सदस्यों का एक हिस्सा ही उसे आदर्श वक्ता के रूप में पसंद करता था।
इसके विपरीत सीताराम येचुरी के भाषणों में पब्लिक स्कूल के डिबेटरों की शैली थी, यह शैली जेएनयू के पब्लिक स्कूल मार्का छात्रों को अपील करती थी, इसी शैली के कारण सीताराम को मीडिया में भी ज्यादा पसंद किया जाता है। पब्लिक स्कूल मार्का वक्तृता शैली मूलत: आभिजात्य पापुलिज्म को संबोधित करती है। आभिजात्य पृष्ठभूमि के छात्रों में सीताराम की जनप्रियता जबर्दस्त थी ।
उल्लेखनीय है आभिजात्य की जनप्रियता खोखली और अस्थायी होती है। यही वजह है सीता के भाषणों का क्षणिक प्रभाव होता था। वह जिस क्षण बोलता है तत्काल ही प्रभावहीन हो जाता है। आप जब तक भाषण सुनते हैं अच्छा लगता है, भाषण बंद और प्रभाव भी खत्म। इसके विपरीत डीपीटी के भाषणों में आख्यान और विचार की सम्मिश्रित पध्दति का प्रयोग था। डीपीटी का भाषण सुनते हुए छात्र आनंद लेते थे बाद में उसे स्मरण करके बहस करते थे। बहस अंतर्वस्तु और भाषणकला दोनों को लेकर होती थी।
जेएनयू की वामपंथी छात्र संस्कृति को बनाने में जिन छात्रों की भूमिका महत्वपूर्ण थी और जो आइकॉन नहीं थे किंतु अपने जमाने के जेएनयू के बेहतरीन छात्र होने के साथ बेहतरीन संगठनकत्तर्ाा थे इनमें सर्वप्रथम दो नाम आते हैं पहला रमेश दीक्षित का और दूसरा है सुनीत चोपड़ा का। इन दोनों ने अपने-अपने तरीके से जेएनयू के छात्र आंदोलन की बुनियाद का निर्माण किया। साथ ही देश में एसएफआई जैसे विशाल छात्र संगठन के संस्थापक सदस्यों में भी बने। सुनीत इन दिनों माकपा के केन्द्रीय कमेटी के सदस्य हैं जबकि रमेश दीक्षित राष्ट्रवादी कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व का अंग हैं। इन दोनों छात्रनेताओं ने लंबे समय तक जेएनयू के उदात्त मानवीय चरित्र को अपने दैनन्दिन व्यवहार और विचारधारात्मक कार्यों से प्रस्तुत किया। इनके अलावा उस जमाने में छात्र आंदोलन के अग्रणी नेताओं में दिनेश अवरोल, प्रबीर पुरकायस्थ, अशोक लता जैन, इंदु अग्निहोत्री,सुहेल हाशमी, दिलीप उपाध्याय ,सीताराम प्रसाद सिंह, कैशर शमीम, रमेश दधीचि आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।


( लेखक,, सन् 1984 में जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष )

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...