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मंगलवार, 30 अगस्त 2016

पूंजीवादी गुलामी है संतई

      संतों और धर्म की पूंजीपति को जरूरत क्यों पड़ती है ? इस सवाल का सही उत्तर समाजशास्त्री बेबर ने दिया है।उसने लिखा " पूंजीपति को ऊर्जा पैदा करने के लिए धर्म की जरूरत पड़ती है।"

पूंजीवादी विकास के लिए ऊर्जा का होना बेहद जरूरी है। यही वजह है हमारे देश में धर्म का उन्माद पैदा करने लिए पूंजीपति-व्यापारी बड़े पैमाने पर पैसा खर्च करते हैं।पूंजीपति और संतों का गठजोड़ परंपरावाद और पूंजीवादी उपभोग के वैचारिक -सामाजिक तानेबाने को बनाने में लगा रहता है।

जो उपभोगवादी है वह परंपरावादी भी है,यही वह बुनियादी प्रस्थान बिंदु है जहां से नया उपभोक्तावाद और उपभोक्ता बन रहा है।यह एक खुला सच है उपभोक्तावाद के विकास के साथ धर्म का भी तेजी से विकास हुआ है,वे एक-दूसरे के पूरक के तौर पर भूमिका अदा करते हैं।यह कैसे संभव है कि पूंजीवादी उपभोग तो सही है और धर्म गलत है।असल में धर्म और पूंजीवादी उपभोग एक पैकेज है। पुरानी आर्थिक परंपरा से मुक्ति का अर्थ, धर्म से मुक्ति नहीं है।बल्कि उलटा देखा गया है।पुराने आर्थिक संबंधों से मुक्त होते ही धर्म भी बड़े पैमाने पर फलने-फूलने लगता है।यही वजह है हमारे यहां पूंजीपति मात्र पूंजीपति नहीं होता बल्कि वह धर्मप्राण प्राणी भी होता है और वह समाज में प्रचार करता है कि मनुष्य धार्मिक -सामाजिक-प्राणी है।यह भी देखा गया है पूंजीवादी पेशेवर लोगों में धार्मिक भावबोध प्रबल होता है।खासकर हिन्दुओं में।

आधुनिकयुग के संत भगवान के नहीं पूंजीवाद के गुलाम हैं।वे पूंजीवादी बर्बरता ,शोषण और लूट के संरक्षक हैं।पूंजीवादी लूट को वैध बनाने ,स्वीकार्य योग्य बनाने में इन संतों की बड़ी भूमिका है।ये वस्तुतः टैक्सचोरों की बैंक हैं,स्वर्ग हैं।ये टैक्सचोरों के भारतीय स्विस बैंक हैं।

मेरी किसी संत से कोई दुश्मनी नहीं है और न मित्रता है।संतों का काम है संतई करना,लेकिन संत यदि गैर-धार्मिक विषयों पर उपदेश देते हैं तो मुझे शिकायत होती है।

धर्म और संत का गैर-धार्मिक क्षेत्र में प्रवेश वर्जित है।मुझे भगवान की उपासना करते संत पसंद हैं।भगवान के नाम पर,धर्म के दायरे में ईमानदारी -बेईमानी कुछ भी करें,हम हस्तक्षेप नहीं करते।धर्म उनका है वे धर्म के हैं,वे धर्म को बनाएं या बिगाड़ें हमें इससे क्या।

लेकिन धर्म के क्षेत्र से बाहर निकलकर यदि कोई संत अपने पोंगापंथी ज्ञान के आधार पर हस्तक्षेप करता है,सलाह देता है,हरकत करता नजर आता है तो मन में बेचैनी होती है और यही बात उठती है कि संत होकर धर्म के क्षेत्र का अतिक्रमण क्यों कर रहे हो,अतिक्रमण ही करना है तो संतई छोड़ दो,नागरिक बनो और सभी विषयों पर बोलो,उन विषयों का उपभोग करो।विधानसभा,लोकसभा,सांसद,विधायक,मंत्री आदि अच्छे लगते हैं तो संतई छोड़ो नागरिक बनो।संत बनकर नागरिकता का उपभोग नहीं कर सकते।यह संतई का दुरूपयोग है।मैं यदि शिक्षक बनना चाहता हूँ तो पहले मुझे कहीं नौकरी हासिल करके पढाने का अवसर हासिल करना होगा,बिना यह किए मैं शिक्षक नहीं बन सकता।उसी तरह संतई छोड़कर नागरिक बने बिना संत को सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक विषयों पर बोलने का कोई हक नहीं है।संत के रूप में यदि कोई बात कहोगे तो वह स्वीकार्य नहीं है,क्योंकि इन क्षेत्रों के लिए संत अवैध प्राणी है।

आरएसएस के बगलगीर होकर जो धर्म और धार्मिक नेता इन दिनों सुर्खियां बटोर रहे हैं,उनके साथ किस तरह के व्यापारिक समूह सक्रिय हैं उनकी अनैतिकता,मूल्यहीनता और संवेदनहीनता को देखना हो तो सीधे बाजार जाओ और देखो कि जिस व्यापारी से सामान खरीद रहे हो उसकी नैतिकता,ईमानदारी किस तरह की है ?

मैंने आज तक आरएसएस करने वाले किसी भी व्यापारी को ईमानदारी से व्यापार करते नहीं देखा।हमारे यहाँ व्यापारियों की वैचारिक शरणस्थली धर्म है।वे अपना सारा वैचारिक और सामाजिक कारोबार धर्म की आड़ में करते हैं।यही वजह है हमारे मंत्री,मुख्यमंत्री,प्रधानमंत्री आदि आए दिन इन संतों की चरण-रज लेते दिख जाएंगे,दैनंदिन राजनीतिक समस्याओं से लेकर गंभीर नीतिगत समस्याओं पर इन संतों से सलाह लेते दिख जाएंगे।

हरियाणा विधानसभा में एक जैन संत ने जो कुछ कहा उसमें नया कुछ नहीं है,इस तरह की बातें हमारे संतजन आए दिन बोलते रहते हैं।

परंपराओं को बचाने के नाम पर वे पूरा जोर लगाए हुए हैं,परंपरागत जीवन शैली,परंपरागत परिवार,परंपरागत स्त्री-पुरूष संबंध,परंपरागत शासक,परंपरागत शासन व्यवस्था आदि के प्रति इन संतों में जबर्दस्त आकर्षण है। वे परंपराओं को बचाने के नाम पर संविधान से लेकर आधुनिक न्यायपालिका तक सबकी उपेक्षा करते हैं,कभी कभी उनके खिलाफ जहर भी उगलते हैं।उनके मन में परंपरा का आग्रह इस कदर भरा हुआ है उसने समूचे समाज को परंपरा की बेड़ियों में कसकर बांधा हुआ है।

वे परम्परा बचाकर ऊर्जस्वित होते हैं,उनको आनंद मिलता है,लेकिन परंपराएं तो समाज को,युवाओं को,स्त्रियों और पुरूषों को आए दिन बर्बर ढ़ंग से उत्पीड़ित करती हैं,अपमानित करती हैं,इस समूची प्रक्रिया में नागरिक अधिकारों का आए दिन हनन होता है,संविधान प्रदत्त हकों और संवैधानिक माहौल की क्षति होती है। संत संतई करें हमें परेशानी नहीं होगी,लेकिन वे परंपरा बचाने के नाम पर आतंक पैदा करें,जीवनशैली,खान-पान,पहनावे,रीति-रिवाज आदि में हस्तक्षेप करें,हमें स्वीकार्य नहीं है।

संत वह है जो समाज से परे है।लेकिन इन दिनों संत वे हैं जो समाज के वैचारिक नियंता बने हुए हैं।संतों का वैचारिक नियंता बनना असल में फंडामेंटलिज्म है और यह तालिबान का भारतीय संस्करण है।



हिन्दुस्तान के व्यापारियों की वैचारिक और धार्मिक मनोदशा के बीच में वैचारिक साम्य है।उनके व्यापारिक विवेक को धार्मिक विवेक ही निर्धारित करता रहा है।इस नजरिए से व्यापारियों को देखेंगे तो धर्म की तमाम किस्म की सड़ांध आपको व्यापार में भी साफ नजर आएगी।हमलोग धर्म की आलोचना करते हैं लेकिन धर्म और व्यापारियों के मानसिक सहस्संबंध की अनदेखी करते हैं।

किसी भी हमारे देश में पूंजीपतियों के मूल्यों को निर्मित करने में धर्म ही सबसे बड़ी भूमिका निभाता रहा है। पूंजीवाद में उतनी क्षमता नहीं है कि वह नए सकारात्मक मूल्यों को पैदा कर सके।फलतः पूंजीपति पुराने धार्मिक विचारों से बंधा रहता है।पुरानी धार्मिक विचारधाराओं को आधार बनाकर जीने वाले हिन्दुस्तानी व्यापारियों के यहां पूंजीवाद और धर्म की सड़ांध का व्यापक जमावड़ा सहज ही देख सकते हैं।यही वजह है धर्म की हिमायत में,धर्म की परवरिश पर,पुराने सड़े-गले मूल्यों को बचाने के लिए,पुराने बर्बर सामाजिक संबंधों की हिम्यत में भारत के व्यापारी नियमित पूंजी निवेश करते रहते हैं।

RSS की यह राजनीतिक सफलता है वह अपने हिन्दुत्ववादी एजेण्डे के साथ बौद्ध और जैनधर्म के बडे लोगों को जोड़ने में सफल हो गया है जबकि हिन्दुत्व की विचारधारा का इन दोनों धर्मों के साथ तीन-तेरह का संबंध है।

मांसाहार और मुस्लिम विरोध के आधार पर वह इन दोनों धर्मों को करीब लाने में सफल हो गया है और यह बेहद खतरनाक स्थिति है।

जैन व्यवसायीवर्ग के बहुसंख्यक हिस्से का आरएसएस की ओर आर्थिक मदद का हाथ बढ़ा हुआ है।वे भाजपा और संघ के संगठनों के लिए फंड देने वाले सबसे बड़े सहयोगी हैं।यह वह वर्ग है जो कांग्रेस को भी मदद देता रहा है।इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जैनधर्म के मुनियों को आरएसएस अपने राजनीतिक हितसाधन में इस्तेमाल करने में क्यों सफल रहा है।

अब मांसाहार के खिलाफ हिन्दुत्ववादी सड़कों पर हैं। हिंसा के मूड में हैं।मांसाहार के विरोधी संत, सम्प्रदाय और सामाजिक समूह हिंसकों की सामाजिक शक्ति बनकर सामने खड़े हैं और राजनीतिज्ञों को बंधक बनाने की कोशिश कर रहे हैं।जैन नया दबाव ग्रुप है। यह चिंता की बात है । सहिष्णुता के पक्षधर घटिया राजनीति में कूद पड़े हैं।

एक राजनेता मंदिर जा सकता है,किसी धर्मगुरू या बाबा से मिलने या आशीर्वाद लेने जा सकता है।उसके प्रवचन सुनने जा सकता है,यह सब कानूनन वैध है।लेकिन एक राजनेता किसी संत या बाबा को संसद या विधानसभा में प्रवचन के लिए नहीं बुला सकता,राजनीति के मंंच से धर्म के नाम

पर बाबा के नाम पर वोट नहीं मांग सकता,अपने भाषणों में धर्म और राजनीति में घालमेल नहीं कर सकता।सत्ता के साथ धर्म का घालमेल नहीं कर सकता है।यह कानूनन अवैध है।दिलचस्प बात यह है अधिकतर राजनीतिक दल इस अवैध काम को अवसरवाद के रूप में करते हैं,कई हैं जो आदतन करते हैं।मसलन् साम्प्रदायिक-आतंकी संगठन आदतन धर्म का इस्तेमाल करते हैं।इधर जैन मुनि का हरियाणा विधानसभा में प्रवचन संवैधानिक मान-मर्याओं और परंपराओं का सीधे उल्लंघन है।सवाल यह है धर्मनिरपेक्षता को क्या इस तरह के अवसरवादी दल और नेता बचा पाएंगे।धर्मनिरपेक्षता उन नेताओं के हाथों क्षतिग्रस्त हो रही है जो धर्म का राजनीति में अवैध इस्तेमाल कर रहे हैं।आम आदमी पार्टी ने जैनमुनि के हरियाणा विधानसभा में दिए गए प्रवचन के पक्ष में राय देकर सबसे घटिया क़िस्म की साम्प्रदायिकता का परिचय दिया है।

भाजपा संतों को राजनीति से जोडकर सभी राजनीतिक दलों की राजनीति को साम्प्रदायिकता के बैनर तले गोलबंद करने की मुहिम पर चल निकली है।

जैनमुनि ने क्या कहा वह तो महत्वपूर्ण है , साथ ही महत्वपूर्ण है राजनीति और धर्म के बीच स्थापित किया जा रहा सहसंबंध।

यह बुर्जुआ राजनीति और बुर्जुआ संतई का खुला गठजोड़ है इसका बुनियादी लक्ष्य है राजनीति का अपराधीकरण करना, राजनीति में साम्प्रदायिकता को वैधता प्रदान करना।

सवाल उठा है कि जैनधर्म के नाम पर क्या सब कुछ माफ है ॽ संविधान और नागरिक समाज को जैन धर्माघिकारियों से सीधे सवाल करना चाहिए और मांग करनी चाहिए कि जैनधर्म अपने को राजनीति से दूर रखें।





गुरुवार, 7 जुलाई 2016

धर्म एक आदत है



धर्म पहले जीवनशैली का अंग था लेकिन मनुष्य के विकास के क्रम में जीवनशैली बदली धर्म की भूमिका बदली,धर्म को जीवनशैली से अलग किया गया,वह विचार बना,दर्शन बना,विचारधारा बना,लेकिन जीवनशैली से धर्म का निकल जाना सबसे बड़ी मानवीय सफलता थी।आज भी धर्म हमारी जीवनशैली के अधिकांश से बाहर धकेला जा चुका है और यह काम मनुष्य ने स्वेच्छा से किया है,अनुभवों के आधार पर किया है।पूंजीवाद के आने के साथ धर्म की समस्त मान्यताओं,पवित्रताओं के रूपों को नष्ट कर दिया है,धर्म को धंधे और मुनाफे में बदल दिया है।अब धर्म तो है लेकिन उसमें पुराने धर्म जैसी कोई चीज नहीं बची है।अब धर्म भी उद्योग है।

मनुष्य का जीवन जितना अनुभव समृद्ध होता जाता है वह धर्म को त्यागता चला जाता है।धर्म इसी क्रम में ईश्वर बना,मूर्ति बना,अंधविश्वास बना,विचारधारा बना और अंत में डिजिटल बना।

डिजिटल युग में धर्म है लेकिन आभासी रूप में।मसलन्,मैं कहने को हिन्दू हूं लेकिन हिन्दुओं के किसी धार्मिक संस्कार का नियमतःपालन नहीं करता,मैं चोटी नहीं रखता,जनेऊ नहीं पहनता ,उसे उतार चुका हूँ,मंदिर में जाता हूँ मूर्तियों को प्रणाम करता हूं,भेंट भी चढ़ाता हूं ,लेकिन ईश्वर की सत्ता को नहीं मानता।मेरे अधिकांश मित्र हिन्दू हैं और भी वे भी यही करते हैं।लोग सवाल कर सकते हैं कि मैं भगवान को नहीं मानता तो मंदिरों में जाता क्यों हूँ,मैंं मंदिर में इसलिए जाता हूँ कि यह सब हमारी पुरानी सभ्यता के अवशेष हैं।धर्म पहले आदत था,आज भी जिनकी आदतें नहीं बदली हैं उनके जीवन में धर्म बचा है,जिनकी आदतें बदल गयी है,धर्म उनके जीवन से निकल गया है।

पर्यटन और धर्म में अंतर करो.गंगा में डुबकीपर्यटन है,मंदिर दर्शन घूमना है, धर्म नहीं है,इसी तरह कथा सुनना टाइम पास है,धर्म नहीं।भारत की अधिकांश मेहनतकश जनता ईश्वर और उसके तंत्र पर विश्वास नहीं करती, संस्कार नहीं मानती,ईश्वर उनके लिए मनोरंजन है।

कौन बच्चा है जिसने अनेक बार भगवान की मूर्ति न तोड़ी हो! बच्चों से बड़ा ईश्वरद्रोही कोई नहीं है,बच्चे तमाम पंडितों और उनके शास्त्र से ज्यादा ताकत रखते हैं। समाज में खेल संस्कृति जितनी मजबूत होगी,ईश्वर उतना ही कमजोर होगा। ईश्वर को हमने जिस क्षण मूर्ति बनाया उसी क्षण उसे खिलौना बना दिया। ईश्वर का खिलौना बनना उसके लोप का आरंभ है।यह काम किसी और ने नहीं बच्चों ने किया,बच्चों ने खेल ही खेल में ईश्वर की जीवन से विदाई की घोषणा कर दी,इस नजरिए से देखें तो बच्चों ने ईश्वर को समाज से सर्जनात्मकता के जरिए विदा किया।आप सर्जक बनते जाइए ईश्वर स्वतः ही चला गया है आपके अंदर से।




मंगलवार, 24 नवंबर 2015

जर्मनी से क्यों हो रही है आतंकीसेना में भरती


आज से एक साल पहले इराक में कुर्द इलाके में जब भाड़े के सैनिक-आतंकी के रुप में एक जर्मन की लाश मिली तो सारी दुनिया का ध्यान आतंकियों की भर्ती क्षमता की ओर गया। हमने कभी इस सवाल पर विचार नहीं किया कि जर्मन देश में मजबूत सरकार,मजबूत राष्ट्रवाद,उदार समाज और बेहतरीन शिक्षा के बावजूद वहां से आतंकी संगठनों के लिए भाड़े के सैनिक कैसे मिल रहे हैं ? सीरिया में आतंकियों के संगठनों में तकरीबन 600जर्मन-मुसलिम भाड़े के सैनिकों के होने का अनुमान जर्मन सरकार ने व्यक्त किया है।

उल्लेखनीय है भाड़े के सैनिकों की एक ऐसे देश से भर्ती हो रही है जिसकी प्रति व्यक्ति आय सारे यूरोप में सबसे ज्यादा है।जर्मन अधिकारियों के अनुसार सीरियाई आतंकियों के लिए काम करते हुए 60जर्मन भाड़े के सैनिक मारे जा चुके हैं और तकरीबन180वापस जर्मनी लौट चुके हैं। जर्मनों की आतंकी भाड़े के सैनिक के रुप में संघर्ष करने की लंबी परंपरा है, एक जमाने में अफगानिस्तान में भी भाड़े के जर्मन सैनिक लड़ने के लिए गए थे। भाड़े के जर्मन आतंकीसैनिकों को चेचेन्या और बोसनिया की भाड़े की सेनाओं में भी लड़ते हुए देखा गया। सवाल यह है अतिविकसित देश जर्मन अपने नागरिकों को आतंकियों-पृथकतावादियों को क्यों मुहैय्या करा रहा है ?जर्मनी में “मल्टी कल्चरल हाउस” नामक संस्था है जिसने चेचेन्या-बोसनिया आदि में भाड़े के सैनिकों की भर्ती करके आतंकियों को जर्मन-मुसलिम युवाओं की सेवाएं उपलब्ध करायीं। इसके अलावा हेमबर्ग की एक मसजिद के जरिए भी भाड़े के सैनिकों की भर्ती का काम होता रहा है। यही वह मसजिद है जिसके जरिए 9/11 के आतंकी हमले लिए भी आतंकी भर्ती किए गए थे।सन् 2009 और 2010 में अलकायदा के पाक ग्रुप के लिए भी यहाँ से भाड़े के सैनिक भर्ती किए गए। इसके अलावा यमन,सोमालिया, सीरिया और इराक में भी आतंकियों की भाड़े की सेना में जर्मनी से भर्ती युवा काम कर रहे हैं। सीरिया में काम करने वाले आतंकी संगठन “सलाफी जेहादी ऑर्गनाइजेशन मिलातु इब्राहीम” में जर्मनों की बड़ी संख्या है। इस संगठन का निर्माण अलकायदा के मीडिया फ्रंट “ग्लोबल इस्लामिक मीडिया फ्रंट” के महमूद और डेनिश कुस्पर्ट नामक एक आतंकी ने किया था। महमूद को 2007 में गिरफ्तार किया गया बाद में 2011 में उसे छोड़ दिया गया। डेनिश कुस्पर्ट इन दिनों सीरियाई आतंकियों का महत्वपूर्ण प्रचारक बना हुआ है। उनके नेटवर्क-वीडियो आदि के कामों को अंजाम दे रहा है। जर्मनों की आईएसआईएसएल में उपस्थिति कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं उन्होंने अपनी एक स्वतंत्र ब्रिगेड़ इस संगठन के अंदर बना ली है।

गुरुवार, 19 जून 2014

जनता के स्वाद का बादशाह हलवाई


       हलवाई के बिना बाजार और जीवन में मजा नहीं है। हलवाई हमारे बाजार की शोभा हुआ करते थे उनसे ही बाजार या इलाके पहचान थी। छोटे शहरों में हलवाई लोकल पहचान का संकेत था। हलवाई को मैं समानान्तर बाजार मानता हूँ। एक तरफ विभिन्न किस्म के दुकानदार और दूसरी ओर हलवाई की दुकान। हलवाई लंबे समय से बाजार के परंपरागत खाद्य उद्योग की धुरी रहा है। हलवाई कब दुकान पर आया ? कब घर तक चला आया और कब हलवाई का सामाजिक कायाकल्प हो गया हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया।

भारत में हलवाई परिवार की रसोई और मेहमाननबाजी का भागीदार होकर आया,जब भी पहला हलवाई आया होगा वह निश्चित तौर पर प्रगतिशील रहा होगा। घर के बाहर हलवाई की बनी चीजें खाना या उन चीजों को घर में लाकर खाने की परंपरा तब ही आई होगी जब हमारे समाज के कुछ अतिरिक्त धन बचता होगा। हलवाई की बनी चीजें पुराने वर्णसमाज के तंत्र,मूल्यबोध और तयशुदा आदतों को तोड़ने में मदद करती रही हैं।

हलवाई ने भोजन की निजता में एक नयी कोटि भोजन की सामाजिकता को शामिल किया। हमारे यहां भोजन निजी होता था और निजी व्यक्ति के विस्तारित संबंधों को ही हम दावतों में बुलाकर सामाजिकता निभाते थे। लेकिन हलवाई की बनी चीजों के आने के साथ सामाजिक जीवन और खासकर जीवनशैली में धीमी गति से परिवर्तनों की शुरुआत होती है।

हलवाई कहने को वैश्यजाति का अंग रहा है। लेकिन हलवाई का काम और तंत्र जिस तरह जीवनशैली ,खानपान और पापुलर कल्चर को प्रभावित करता रहा है उसकी कभी हमने विस्तार से मीमांसा ही नहीं की। हलवाई मतलब खाने की वस्तुओं का दुकानदार।

हलवाई का व्यापार सबसे पुख्ता व्यापार रहा है। यह विकेन्द्रित और छोटी पूंजी से आरंभ होने वाला कारोबार है। मसलन् कचौडी की दुकान खोलने के लिए बहुत बड़ी पूंजी की आज भी जरुरत नहीं पड़ती। विकेन्द्रीकृत ढ़ंग से इसने आम जनता के स्वाद को बदला और नवीकृत किया। हलवाई को जनता के स्वाद बादशाह कहना अतिशयोक्ति नहीं है।

एक हलवाई अपने माल के जरिए मुनाफा कमाने के साथ अभिरुचि और स्वाद का भी निर्माण करता है। सबसे अच्छा हलवाई वह माना जाता है जिसके माल के स्वाद को आप बार बार महसूस करें और लौटकर उसकी दुकान पर आएं। हलवाई की रिटर्न अपील बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। वह अपने अपभोक्ता को बाँधता है और उसकी रुचि को स्टीरियोटाइप होने से बचाता है।

हलवाई का काम पेसन का काम है। हलवाई के पकवान हमारी खाद्य अभिरुचि को सीधे प्रभावित करते हैं। हलवाई का सबसे बड़ा आनंद यह है कि यह अनौपचारिक खानपान को बढ़ावा देता है। खाने में हम जितना अनौपचारिक होंगे उतने ही बेहतर सामूहिक मनुष्य होगे। खानपान में हम जितने संगठित और औपचारिक रहेंगे उतने ही एकांतवासी होंगे।

हलवाई के खाने में बाजार की ध्वनियों और खुली हवा की गंध रहती है। वहां रेस्तराँ की तरह तयशुदा धुनें और गंध नहीं तैरती ।

हलवाई खुलेपन को लेकर आया। खानपान में खुलेपन को लेकर आया। रेस्तराँ ने खानपान को बंद रेस्तराँ का खाद्य बना दिया। हलवाई ने समाज में खुलेपन और लिबरल माहौल को पैदा किया।वह बाजार में जीवनशैली को प्रभावित करने वाले प्रमुख कर्ता के रुप में दाखिल हुआ।

हलवाई गतिशील है। वह जड़ नहीं है। गतिशील हलवाई हमेशा नए पर नजर रखता है। जड़ हलवाई यथास्थितिवादी होता है। वह दसियों साल एक जैसा सामान बेचता रहता है ।गतिशील हलवाई सामान की लिस्ट बढ़ाता जाता है,अपनी इमेज का नए युग के साथ रुपान्तरण करता जाता है। भारत के हलवाई आज से तीस साल पहले तक लोकल थे लेकिन विगत तीस सालों में इन्होंने अपने को बाजार निर्माण की नयी प्रक्रियाओं से जोड़ा है। अपने को लोकल से ऊपर उठाकर क्षेत्रीय-राष्ट्रीय और ग्लोबल बनाया है।

हलवाई कल तक लघु व्यापार था. लेकिन विगत चार दशकों में इसने उद्योग की शक्ल लेली है। एक-एक हलवाई के यहां सैंकड़ों –हजारों लोग काम कर रहे हैं। हल्दीराम से लेकर भीखाराम तक अनेक देशज हलवाई पूरे देश में मिल जाएंगे और इनकी ग्लोबल शाखाएं भी मिल जाएंगी। हलवाईयों का कारोबार खरबों रुपये का है। हलवाई उद्योग मूलतःराष्ट्रीय उद्योग है जिसका बहुराष्ट्रीय खाद्य कंपनियों से सीधा मुकाबला है।

रविवार, 23 सितंबर 2012

अस्मिता ,वर्चस्व और अमेरिकी जेल व्यवस्था

अमेरिका ने अपने देश में इस तरह की संस्कृति निर्मित की है जिसमें पुलिस और न्याय की हिंसा सामान्य और वैध लगती है। जिस तरह हमारे देश में आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज करना आमलोगों को वैध लगता है वैसे ही अमेरिकी समाज में भी पुलिस की हिंसा और आतंक को मीडिया प्रचार ने वैध बनाया है। सामान्य नागरिकों पर की गई पुलिस हिंसा को आजकल अमेरिका में लोग नॉर्मल एक्ट की तरह लेते हैं। एक जमाना था कि साधारण सी पुलिस कार्रवाई पर सारा देश हुंकार भर उठता था लेकिन लेकिन इन दिनों ऐसा कुछ भी नहीं होता।

आमलोगों में पुलिस के खिलाफ प्रतिवाद की भावना के लोप में मीडिया के रीगनयुगीन मॉडल की केन्द्रीय भूमिका है।यह प्रचार किया गया कि जो पुलिस के खिलाफ प्रचार या प्रतिवाद करते हैं वे क्रिमिनल हैं। यह भावना पैदा की गयी है कि पुलिस के खिलाफ वे ही लोग ज्यादा हल्ला मचाते हैं जो गलत धंधा करते हैं। ये ही लोग कानून तोड़ते हैं, नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं , गुण्डागर्दी करते हैं या हिंसा करते हैं ,आदि।

प्रसिद्ध मार्क्सवादी मीडिया सिद्धांतकार बौद्रिलार्द के अनुसार रीगनयुगीन अमेरिकी परिप्रेक्ष्य में सीनिरियो या परिदृश्य महत्वपूर्ण है। अब सब कुछ सीनिरियो के कमिटमेंट और प्रस्तुति पर निर्भर है। अपराध हुआ है फोटो दिखाओ,कैमरे में कैद करो,टीवी पर प्रसारित करो। किसी व्यक्ति का गिरफ्तार होना और फिर उसका टीवी फोटो या सीन में प्रसारण ही महत्वपूर्ण मान लिया गया है। सीनिरियो के लिए कमिटमेंट असल में रीगन युग में जन्म लेता है। रीगन स्वयं फिल्म अभिनेता थे और कैलीफोर्निया के थे। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद मीडिया में मूलगामी परिवर्तन यह आया कि सीनिरियो की प्रस्तुति महत्वपूर्ण मान ली गयी। खासकर विज्ञापन से लेकर टीवी तक सीनिरियो का महत्व बढ़ गया। विज्ञापन और टीवी दृश्यों के जरिए ही इमेजों के निर्माण,विध्वंस ,नियंत्रण और मेनीपुलेशन की पूरी दुनिया में बाढ़ आ गयी।

रीगन ने अपनी फिल्मी इमेज को अमेरिका की फिल्मी इमेज के निर्माण में सफलता के साथ इस्तेमाल किया। सामान्य जिंदगी जीने के लिए ब्लैकमेलिंग का मूलभूत गुण के रूप में इस्तेमाल किया। मीडिया प्रस्तुतियों में कहा गया सामान्य जिंदगी जीना चाहते हो तो ब्लैकमेलिंग करो। सहजजीना चाहते हो तो व्यक्तिगत हितों को तरजीह दो सामाजिक हितों की उपेक्षा करो।

अमेरिका आज जिस संकट में घिरा है उसका समाधान तब तक संभव नहीं लगता तब वह सामूहिक समाधान की धारणा को महत्ता नहीं देता। रीगनशासन ने इमेज को महान बनाया। कमाते हो तो अच्छे हो,इसमें यह महत्वहीन हो गया कि कैसे कमाते हो। अब प्रिफॉर्मेस पर जोर था। विज्ञापन ने लुक को महत्ता दी। इमेज प्रचारित रहे, चाहे जो करो। लुक के आधार निजी और सामाजिक बीमारियों को भी छिपा लिया गया। रीगन को कैंसर था लेकिन कैंसर जैसी बीमारी को भी लुक की ओट में छिपा लिया गया। यानी नई रणनीति में बीमारी भी लुक का हिस्सा बना दी गयी।

अब राजनीतिक खामियां या व्वस्था की खामियां या बेबकूफियां महत्वहीन हो गयीं, महत्वपूर्ण थी तो बस अमेरिका की इमेज। सुंदर,चमकीले,साफ-सुथरे,न्यायप्रिय,बहुलतावादी अमेरिका की इमेज की अहर्निश वर्षा ने अमेरिकी समाज के स्याह इलाकों को सामने आने ही नहीं दिया। इन स्याह इलाकों में से एक है अमेरिकी जेलप्रणाली।

अमेरिका की रीगनयुग से मीडिया में जिस तरह की इमेज वर्षा होती रही है उसके आधार पर अमेरिकी समाज और उसके तानेबाने को समझना मुश्किल है। मीडिया निर्मित इमेजों के आधार पर अमेरिका के राजनीतिक सत्य को नहीं जान सकते। यही हाल इन दिनों भारत का है। हमारी समस्त सरकारें खास किस्म के स्थायी शासन का भरोसा देती रही हैं। राजनीतिक स्थायित्व के ऊपर जोर देने के कारण भूलों, भ्रष्टाचार और असफलताओं को सरकार के लिए विध्वंसक नहीं माना जाता। अब भूलों और गलतनीतियों के कारण सरकारों का पतन नहीं होता। अब नेताओं पर जनता गर्व नहीं करती और नेता भी अपने फैसलों पर गर्व नहीं करते। यह वह परिदृश्य है जिसे रीगनयुग ने निर्मित किया और इस पैराडाइम में हम अभी भी जी रहे हैं।

अमेरिकी समाज में पुलिस और न्यायपालिका के खिलाफ नागरिकों के प्रतिवाद को मीडिया से एकदम धो-पोंछकर साफ कर दिया गया है। नई सूचना तकनीक के रूप में इंटरनेट और मोबाइल के आने के बाद से समूचे समाज की नजरदारी बढ़ा दी गयी है। अमेरिकी शासक जितना अपने देश के बाहर आतंकित और असुरक्षित हैं अपने देश में भी उतने ही आतंकित और असुरक्षित हैं। बाहर वे सीधे सेना,सूचना और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और बहुराष्ट्रीय निगमों के जरिए हमला करते हैं देश में पुलिस नजरदारी और गिरफ्तारी के जरिए नागरिक अधिकारों पर हमले करते हैं।

अमेरिकी समाज में कारपोरेट घरानों की लूट और मनमानी के खिलाफ प्रतिवाद संभव नहीं है साथ ही पुलिस हिंसाचार और अत्याचार के विरोध में भी प्रतिवाद करना संभव नहीं है।आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में जेलबंदियों में आधे के करीब लोग नशीले पदार्थो की तस्करी या अवैध सेवन संबंधी मामलों में गिरफ्तार किए गए हैं। " नेशनल ड्रग कंट्रोल पॉलिसी" संगठन के द्वारा जारी सन् 2009 की रिपोर्ट में अमेरिका के 10 महानगरों में किए गए एक सर्वे में कहा गया है कि इन शहरों में गिरफ्तार किए गए 87 फीसदी लोग अवैध नशीले पदार्थों के सेवन के शिकार पाए गए हैं। तरूणों में वैध नशीली दवाओं का प्रयोग अच्छी-खासी मात्रा में होता है।

सवाल यह उठता है कि अमेरिकी समाज में अवैध नशीले पदार्थों के सेवन का इतना व्यापक सामाजिक आधार क्यों और कैसे बना ? असल में ,शीतयुद्धीय राजनीति के तहत रीगन प्रशासन ने ड्रगवार के नाम से जो नीति अख्तियार की उसने अमेरिका के बाहर और अंदर आमलोगों को नशीले पदार्थों की लत का शिकार बनाया और यह काम बड़े सुनियोजित ढ़ंग से किया गया। ड्रगवार से लैटिन अमेरिका के साथ अमेरिका के अंदर का युवावर्ग भी बड़ी संख्या में प्रभावित हुआ।

ड्रगवार के कारण नशे की लत और अपराधकर्म में तेजी से इजाफा। विदेशों में ड्रगवार को माफिया गिरोहों, भाड़े के सैनिकों और अमेरिकी सैन्यहितों के विस्तार के साथ लागू किया गया और देश के अंदर युवाओं में नशे की लत,पॉपकल्चर,पॉप म्यूजिक और अपराधकर्म का त्रिकोणीय फार्मूला लागू किया गया इसके नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पुलिस प्रणाली और जेल व्यवस्था का विस्तार किया गया। जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को जेलों में बंद रखकर जहां एक ओर गुलामी को बढ़ावा दिया गया वहीं दूसरी ओर ड्रगवार के जरिए जन नियंत्रण के लक्ष्य को भी हासिल किया गया। नॉम चोम्स्की ने “डिटरिंग डेमोक्रेसी” नामक किताब में लिखा है कि नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों के कारण संगठित अपराधकर्म को बढ़ावा मिला। यह माना जाता है कि अमेरिका की करव्यवस्था में आधे से ज्यादा कर तो ड्र्ग ट्रेड से ही आता है। नशीले पदार्थ वैध बिकें या अवैध बिकें वे असल में नशीले पदार्थ ही हैं। उल्लेखनीय है अमेरिका में तम्बाकू वैध है , मरिजुआना वैध नहीं है।क्योंकि मरिजुआना को कहीं पर भी पैदा किया जा सकता है। मरिजुआना की बिक्री करना मुश्किल है। जबकि तम्बाकू के साथ ऐसा नहीं है। यही वजह है अमेरिका की 60 फीसदी से ज्यादा आबादी मरीजुआना पीती है.इधर के तीन दशकों में अमेरिकी युवाओं में मरिजुआना को छोड़कर अन्य ज्यादा नशीले पदार्थों के सेवन की ओर उन्मुख हुए हैं। इसके कारण समाज में अनेक किस्म की गंभीर बीमारियां भी फैली हैं। तम्बाकू और शराब के सेवन से मरने वाले युवाओं की संख्या का अनुपात जेलों में बंद कैदियों की संख्या से भी ज्यादा है। नशेड़ियों को सजा और जुर्माने के जरिए भी प्रशासन को बड़ी मात्रा में धन मिलता है।

चोम्स्की ने लिखा है कि सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिकी विश्व नीति में तीसरी दुनिया के देशों के खिलाफ हिंसाचार और जोर-जबर्दस्ती प्रभुत्व में लेने का मनोभाव व्यक्त हुआ है। घरेलू स्तर पर आम जनता को विभिन्न तरीकों से नियंत्रण में रखने और धमकाने के साथ तुरंत गिरफ्तार करके सजा दिलाने के मैथड का जमकर दुरूपयोग किया गया है।

बंदीजनों को अमेरिकी समाज में सामान्य नागरिक से भिन्न नजर से देखा जाता है। सामान्य नागरिक को अमेरिकी प्रशासन ने “हम” और बंदीजन को “तुम” की कोटि में रखकर विभाजित किया है। इसमें “हम” के पास नागरिक अधिकार हैं,”तुम” के पास नागरिक अधिकार नहीं हैं। “तुम” केटेगरी के लोगों को नियंत्रण में रखने लिए अमेरिका के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा कानून-व्यवस्था के ढाँचे पर खर्च होता है। यही स्थिति अमेरिका के बाहर है अमेरिका ने पाकिस्तान इराक,अफगानिस्तान, लीबिया आदि में विकास पर कम और सैन्य साजो -सामान खरीदने के लिए सहायता ज्यादा दी है।

अमेरिका ने ड्रगवार के बहाने देश के बाहर पराए मुल्कों यानी लैटिन अमेरिकी देशों की जनता की सेना से ठुकाई की, देश की जनता की पुलिस से ठुकाई करायी। देश के बाहर प्रतिक्रांतिकारी ताकतों को संगठित किया और देश में माफिया गिरोहों को संगठित किया।

कैदी नागरिक होता है। कैदी को अ-नागरिक मानकर किया गया बर्ताब सीधे मानवाधिकार का उल्लंघन है। अमेरिकी समाज में किसी भी अपराध में सजा पाए व्यक्ति को मतदान देने के नागरिक अधिकार से वंचित कर दिया जाता है और इस कारण लाखों अमेरिकी बाशिंदे नागरिक अधिकारों से वंचित हैं और दोयमदर्जे के नागरिक की हैसियत से जी रहे हैं। कोई व्यक्ति अपराध करने के कारण जब नागरिक अधिकार से वंचित किया जाता है तो यह उसके लिए दोहरी सजा है और यह सजा फांसी की सजा से भी बदतर है। नागरिक अधिकारों को किसी बहाने नहीं छीना जा सकता। इस समूचे पहलू को अस्मिता और मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में समझें तो बेहतर ढ़ंग से देख पाएंगे।

मैं क्या हूँ यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि मैं समाज में जिंदा हूँ और एक मनुष्य के रूप में जब मेरी उपस्थिति है तो यह मेरी मनुष्य के रूप में उपस्थिति है और मनुष्य के अलावा जितनी भी अस्मिताएं या पहचान के रूप है वे अप्रासंगिक हैं। व्यक्ति की पहचान को स्थान के आधार पर तय करना ठीक नहीं है। मैं घर पर रहूँ या जेल में। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।इससे मेरी पहचान तय नहीं हो सकती। ज्योंही आप किसी व्यक्ति की पहचान को उसके जेल में रहने के कारण निर्धारित करते हैं आप पाते हैं कि इस तरह संबंधित व्यक्ति की ही नहीं उसके परिवारीजनों,नाते-रिश्तेदारों और जाति या समुदाय या धार्मिक समूह की भीपहचान तय करने लगते हैं। अतः स्थान विशेष के आधार पर व्यक्ति और समुदाय की पहचान निर्धारित नहीं की जानी चाहिए। जेल के आधार पर जब किसी व्यक्ति की पहचान तय करते हैं तो उस व्यक्ति के अंदर स्थायी तौर पर अपराधबोध और कुंठा भर देते हैं। जेलबंदी का जिस पर लेबिल लगा होता है उसे हमेशा दागी अपराधी के रूप में देखा जाता है।

सवाल यह है कि अस्मिता के जब विभिन्न रूप बदलते हैं तो उनको अवस्था विशेष से जोड़कर देखा जाता है। मसलन् एक अविवाहित लड़की की अस्मिता विवाह करते ही बदलती है,वह विवाहिता कहलाने लगती है,माँ बनते ही वह माँ की अस्मिता हासिल कर लेती है। एक ही लड़की एक ही साथ लड़की,पत्नी,माँ आदि की अस्मिताओं से गुजरती है। यानी व्यक्ति की अस्मिता उसकी अवस्था के अनुसार बदलती रहती है,ऐसी अवस्था में एक जेलबंदी की अस्मिता को स्थायी तौर पर दागी अपराधी के रूप में देखना सही नहीं है। वह जब तक जेल में था वह अपराधी था। लेकिन जब वह सजा काट चुका वह अपराधी नहीं रहा।

अमेरिका में अपराधी व्यक्ति पर लगा दाग उसका,उसके परिवार का और उसके समुदाय का कभी पीछा नहीं छोड़ता और इस तरह व्यक्ति अहर्निश अपराधबोध से ग्रस्त कुंठा और हताशा में जीता है। यह अपराध और अपराधी के प्रति साम्राज्यवादी नजरिया है। जरूरत है इस नजरिए को बदलने की।

मैं अभी प्रोफेसर हूँ और नागरिक भी हूँ। बुनियादी पहचान मेरी नागरिक की है।नागरिक की पहचान के परिप्रेक्ष्य में ही मेरी पहचान के बाकी रूपों को परिभाषित किया जाना चाहिए। लेकिन 60 साल बाद नौकरी से अवकाश ग्रहण कर लूँगा तब में प्रोफेसर नहीं रहूँगा। मेरी प्रोफेसर की पहचान कक्षा में उपस्थिति के समय प्रमुख होगी और नागरिक की पहचान गौण होगी। लेकिन कक्षा के बाहर में नागरिक हूँ, पिता हूँ,चतुर्वेदी हूँ,पति हूँ आदि। इनमें से पहचान का प्रत्येक रूप किसी न किसी सामाजिक अवस्था से जुड़ा है।मैंने ज्योतिष से आचार्य भी किया है तो मैं जब किसी का फलादेश बता रहा होता हूं तो मेरी पहचान एक ज्योतिषी के रूप में होगी न कि एक प्रोफेसर के रूप में। इसी तरह एक कैदी जब तक जेल में है वह कैदी है साथ में नागरिक भी है।

आधुनिक युग में नागरिक अस्मिता के बिना अन्य किसी पहचान का कोई मूल्य नहीं है।आधुनिक समाज में नागरिक होना ही आधुनिक होना है। नागरिक के अधिकारों,मान्यताओं और मूल्यों की रोशनी में हमें पहचान के सभी रूपों को परिभाषित करना चाहिए। नागरिक की पहचान सभी किस्म की अस्मिता या पहचान का मूलाधार है। पहचान के जितने भी रूप हैं वे नागरिक की पहचान के साथ मिलकर ही अपनी स्थिति निर्धारित करते हैं। नागरिक नहीं तो आधुनिक नहीं।अमेरिकी न्याय की यह आयरनी है कि नागरिक को जब किसी अपराध में सजा मिलती है तो उसको मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है।

आमतौर पर संकीर्णतावादी और फंडामेंटलिस्ट विचारधारा के लोग यह मांग करते देखे जाते हैं कि अपराधियों को कठोर से कठोर सजा दी जाय। इन लोगों का मानना है कठोर सजा देने से अपराधी फिर से अपराध नहीं करता। लेकिन यह धारणा व्यवहार में सच साबित नहीं हुई है। अमेरिका में कठोर सजाएं सुनाए जाने के बाद भी अपराधों में गिरावट नहीं आई है।इस तरह के विचारक आमतौर पर अपराध को नैतिकता से जोड़कर देखते हैं और बढ़ते अपराधों को नैतिक ह्रास का लक्षण बताते हैं। सच यह नहीं है। बल्कि ऐसा करके वे नैतिकता के क्षय का भय पैदा करते हैं और कठोरतम दण्ड के प्रावधान की मांग करते हैं। अपराधी के लिए कठोर दंड़ और नैतिकता के क्षय का भय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ये दोनों कंजरवेटिव और फासिस्ट विचारधाराओं से जुड़ा नजरिया है।

कठोर दंड की मांग अंततःराजनीति में अधिनायकवाद को जन्म देती है।अमेरिकी सत्ता की मनमानी से आज सारी दुनिया परेशान है।वहां सत्ता पर कारपोरेट तानाशाही का कब्जा है। अपराध और कठोरदंड से भय के कारण लोकतंत्र बाधित हुआ है और सर्वसत्तावादी विचारधाराएं मजबूत हुई हैं। कारपोरेट अधिनायकवाद का मार्ग प्रशस्त हुआ है । ये लोग आए दिन न्याय के अधिनायकवादी समाधान सुझाते रहते हैं और इसके बहाने हाशिए के लोगों पर वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश करते हैं।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो अमेरिकी जेल प्रणाली 200साल पुरानी है। इसमें दो तरह के प्रयोग किए किए गए। पहला प्रयोग गरीबों को दंडित करने के लिहाज से कारागार बनाकर आरंभ किया गया। 18वीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में यह प्रणाली आरंभ की गयी।आरंभ में अस्थायी बंदीघर के रूप में जेल का इस्तेमाल किया जाता था।जब तक कोई बंदी मुकदमे से बरी नहीं हो जाता उसे बंदी कराए रखने के लिए जेलों का इस्तेमाल करते थे और उसे बंदी रखते थे।इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि अमीरलोग तो जुर्माना देकर छूट जाते थे लेकिन गरीबों को जुर्माना न भरने के कारण जेलों में बंद रखा जाता था।गरीबों को जेलों में तरह-तरह की यातनाएं दी जाती थीं और अनेक मामलों में सार्वजनिक तौर पर दंडित किया जाता था।यह पूरी प्रणाली अनेक उपनिवेशों में भी लागू की गयी।उनदिनों सार्वजनिक तौर पर दंडित करने का प्रावधान था।

पूंजीवाद के आगमन के समय बड़े पैमाने पर समूचे यूरोप में चोरियां हो रही थीं, छोटे छोटे चोरों को सुधारने के लिहाज से 1557 से बड़े पैमाने पर खाली घरों में सुधारघर बनाए गए और चोरों को इनमें बंदी बनाकर रखा जाता था। खासकर ब्रिटेन में इस तरह के सुधारघर थे।इनमें बंद लोगों से जबरिया श्रम कराया जाता था और यह प्रयोग काफी सफल रहा।कालांतर में इस तरह के संस्थान समूचे ब्रिटेन और यूरोप में फैल गए।लेकिन उस जमाने में सुधारघरों मे जो बंदी थे वे छोटे-मोटे अपराधों में बंदी हुआ करते थे और ये गरीब लोग थे।इन बंदियों को यातनाएं दी जाती थीं,दण्डित किया जाता था और अन्यत्र भी भेज दिया जाता था। इस तरह के बंदीघर या सुधारघर का विचार सबसे पहले इंग्लिश समाजसुधारक जॉन हार्वर्ड के दिमाग में आया और इस तरह के सुधारघर सबसे पहले ब्रिटिश उपनिवेश अमेरिका में बनाए गए।बाद में ब्रिटेन में बने।

उस जमाने में शारीरिक दंड़ और फांसी दोनों का ही विलियम पेन ने जमकर विरोध किया और कहा कि इन दोनों किस्म के दण्ड देने से बेहतर है लंबी सजाएं देना।अमेरिकी क्रांति के दौरान भी जेलों में शारीरिक यातनाएं देने का जमकर विरोध हुआ और ब्रिटिश औपनिवेशिक न्याय प्रणाली की जमकर आलोचना की गयी। इस तरह की आलोचना करने वालों में डा. बेंजामिन रश का नाम सबसे ऊपर आता है।रश साहब पेनसिलवेनिया में सर्जन थे और अमेरिकी स्वाधीन क्रांति के अमर जनगायक भी थे। उनके लिखे दो चर्चित पर्चे हैं। इन दोनों पर्चों ने अमेरिका में जेलसुधार की प्रक्रिया को जन्मदिया और विगत 200सालों में वह विभिन्न पड़ावों से गुजरती हुई मौजूदा प्रणाली तक पहुंची है।बाद में कैदी को जेल में पृथक कमरे में बंद रखने,एक निश्चित स्थान तक आने-जाने, उस पर नजर रखने के प्रावधान किए गए।

उस समय जेलप्रणाली का प्रधान लक्ष्य था कैदी के लिए एकांत, श्रम, और अहर्निश नजरदारी। ऐतिहासिक नजरिए से देखें तो अमेरिकी जेलप्रणाली ने आरंभ में जो मॉडल अपनाया उसका लक्ष्य था वर्गीय नियंत्रण और नस्लीय नियंत्रण। सन् 1814 के न्यूयार्क जेल के रिकॉर्ड बताते हैं कि जेल में बंद 29फीसदी लोग काले थे। सन् 1833 की रिपोर्ट बताती है कि जिन राज्यों में जनसंख्या में 1नीग्रो और 30गोरेलोग रहते थे,वहीं पर इन राज्यों की जेलों में 1काला और 4गौरवर्ण के कैदी बंद थे।दक्षिणी राज्यों में 19वीं सदी में जेलों में बंद कैदियों की संख्या 75प्रतिशत के करीब थी। इन राज्यों में आमतौर पर कैदियों को निजी लोगों को ठेके पर दे दिया जाता था।इसके कारण दक्षिणी राज्यों में खुलेआम गुलामप्रथा फलीफूली। इसे ठेकेदारी प्रथा भी कहते हैं।अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में काले लोगों के खिलाफ जिस नग्नतम रूप में अमानवीय व्यवहार किया जाता था वह उस दौर में एक मिसाल माना जाता है।मसलन् सामान्य से अपराध के मामले में उस जमाने में पुलिस वाला नीग्रो को पकड़कर ले जाता था और फिर उसे लंबी सजा देकर बंद कर दिया जाता था, इस तरह नीग्रो जाति पर बर्बर जुल्म ढाए गए उनको गुलामी के लिए मजबूर किया गया। यही वजह है अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में गुलामगिरी के खिलाफ सबसे तेज प्रतिक्रिया हुई। अमेरिकी जेलों में बंद कैदियों को सुनियोजित ढ़ंग से नशे की लत डाली जाती थी। उनको कोकीन,हेरोइन,अफीम आदि सप्लाई दी जाती थी। इस दुष्परिणाम यह होता था कि वे जब जेलों से बाहर निकलते थे तो नशे के आदी हो चुके होते थे और बाहर निकलकर फिर से अपराधकर्म में लिप्त हो जाते थे और फिर से लौटकर जेल में पहुँच जाते थे।

अमेरिकी जेलप्रणाली में दूसरा बड़ा प्रयोग 1929-30 की मंदी के समय किया गया। इस प्रयोग के दौरान यह पाया गया कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय जेलों में कैदी कम थे और उसके पहले और बाद में कैदियों की संख्या ज्यादा थी।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में अमेरिका में नशीले पदार्थों के सेवन और उससे जुड़े अपराधों की बाढ़ आती है। फलतः इसदौर की जेलप्रणाली में नशीले पदार्थों के सेवन को आधार बनाकर चिन्तन आरंभ हुआ। सन् 1929 के आसपास आई मंदी के दौर में देखा गया कि तेजी से बेकारी बढ़ी है और अपराध भी बढ़े हैं। अपराधों का सिलसिला बंद हुआ है द्वितीय विश्वयुद्ध आने के साथ।युद्ध के दौरान अपराध का आंकड़ा तेजी से कम हो जाता है। लेकिन ज्योंही युद्ध खत्म होता है अपराधियों और बेकारों की संख्या में तेजी से उछाल आता है।यही वह दौर है जब दंड की टिकाऊ प्रणाली की हिमायत की जाती है।बेकारीऔर मंदी के कारण अपराधियों की संख्या में आया उछाल आंकड़ों से भी पुष्ट होता है।

सन् 1999 में अमेरिकी जेलों में प्रति एक लाख लोगों में 476लोग बंदी थे।यह संख्या 1929 की मंदी में जेलों में बंद लोगों की संख्या से तीन गुना ज्यादा है।अमेरिकी फेडरल जेलों में बंद लोगों की संख्या 1999 से 2000 में 9फीसदी बढ़ी है ।यानी अमेरिका के समस्त राज्यों की जेलों में 1990 में प्रति एक लाख की आबादी में 458लोग जेल में बंद थे जो 2000 में बढ़कर 702 हो गए।

सन् 2000 में फेडरल जेलों में बीस लाख लोग जेलों में बंद थे।ताजा आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका के विभिन्न राज्यों में जेलों में कैदियों की संख्या बेशुमार है। इन जेलों में जेलों की क्षमता से 33 फीसदी ज्यादा कैदी बंद हैं। जून 2003 में न्याय सांख्यिकी विभाग के द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार विगत 4सालों ( 1999-2003)में जेलों में बंदियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।जेलों में बंद कैदियों में औरतों की भी बड़ी तादाद है। इन चार सालों में कुल जेलबंदियों में 5.0प्रतिशत औरतों की संख्या बढ़ी है। खासकर टैक्सास और कैलीफोर्निया में बंदियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।जबकि 9राज्यों में बंदियों की संख्या में गिरावट दर्ज की गयी है। अमेरिकी जेलों में बंदी लोगों का प्रोफाइल बताता हैकि कैदियों में 60फीसदी अल्पसंख्यक हैं।इनकी उम्र 20साल से नीचे है।अमेरिका की समग्र जेल बंदी संख्या सन् 2003 में 6.9 मिलियन यानी 70लाख दर्ज की गयी थी ।

नई अमेरिकी जेल प्रणाली और न्याय प्रणाली कठोर दण्ड देने की नीति पर आधारित है और इसके अनुकूल परिणाम नहीं निकले हैं। बंदियों पर किए गए अनुसंधान बताते हैं बंदियों को कड़े दण्ड देने की नीति के कारण अपराधों में कोई कमी नहीं आई है। इसके विपरीत कठोर दण्ड देने से हिंसक और आक्रामक व्यवहार में इजाफा हुआ है। अपराधियों को कठोर देने से उनमें आक्रामकता बढ़ी है और वे और भी हिंसक हो उठे हैं। जेलों में इन बंदियों के आक्रामक व्यवहार का अन्य कैदियों पर भी बुरा असर देखा गया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि अपराधी को दुरूस्त करने के लिए दण्ड देकर सुधारने की बजाय सामाजिक व्यवहार और सामाजिक शिक्षा से दुरूस्त करने पर जोर दिया जाना चाहिए। लेकिन अमेरिकी न्यायप्रणाली में इसके लिए कोई जगह ही नहीं है।

अमेरिका में बढ़े अपराध और जेलों में स्थान के अभाव के कारण अमेरिकी प्रशासन ने एक पद्धति इजाद की और उन अपराधों को रेखांकित किया है जिनमें कम से कम सजा दी जाए। कम सजा के प्रावधान का समाज पर क्या असर हुआ उसका मूल्यांकन करने के लिए एक कमीशन बनाया गया जिसने 20साल के अनुभवों को समेटते हुए अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में बताया गया कि कम अवधि की सजा पाने वाले कैदियों की संख्या में 155फीसदी इजाफा हुआ है। 52 फीसदी जजों ने माना कि न्यूनतम सजा देने के मामले में विषमता देखी गयी है। 62फीसदी जजों ने कहा कि सभी किस्म के मामलों में न्यूनतम सजा देने का औसत प्रतिशत बहुत ज्यादा रहा है। ये राय सन् 2010 की है।

अमेरिका में एक फिनोमिना यह भी देखने में आया है कि समुदाय विशेष के लोगों को चिह्नित करके अपराधी की केटेगरी में बदनाम कर दिया जाता है। जिस व्यक्ति को एकबार जेल हो जाती है उसके बाद उसका परिवार और सामाजिक समुदाय हमेशा अपराधी के नाम से जाना जाता है फलतःएक तरह की सामूहिक यंत्रणा से संबंधित नागरिक को गुजरना पड़ता है।

मसलन, न्यूयार्क को ही लें,पूर्वी न्यूयार्क के इलाके में रहने वाले लोगों में अपराध एक कॉमन फिनोमिना बना दिया गया है। इन बस्तियों में ऐसे परिवार ज्यादा रहते हैं जिनका कोई न कोई सदस्य किसी न किसी समय जेल में रहा है या जाने वाला है। यह फिनोमिना अकेले न्यूयार्क शहर में ही नहीं है अन्य अमेरिकी शहरों में भी इस फिनोमिना को देख सकते हैं।

अमेरिका की समस्त जेलों ( संघ और केन्द्र की ) में आधे से ज्यादा बंदी काले लोग हैं। गोरे बंदियों की तुलना में काले बंदियों की संख्या सात गुना ज्यादा है। सन् 1996 तक के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका की समग्र काली आबादी के 30फीसदी लड़के कभी न कभी जेल में बंद जरूर रहे हैं। गोरी औरतों से 421फीसदी ज्यादा काली औरतें नशीले पदार्थों के सेवन के चक्कर में जेलों में बंद रही हैं। बंद औरतों में तीन-चौथाई औरतों के बच्चे हैं। 15लाख से ज्यादा बंदी औरतों के छोटे-छोटे बच्चे हैं। जेलों में बंद आधी से ज्यादा काली औरतें अपने बच्चों को जेल में रहते हुए कभी नहीं देख पाएंगी।

अमेरिकी न्यायप्रणाली में अपराध के कारण अपराधी के साथ-साथ पूरा परिवार टूट जाता है। यही वजह है कि अमेरिका में पितारहित बच्चों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। अमेरिकी सिस्टम की दूसरी पीड़ादायक बात यह है कि जिन लोगों को एकबार जेल हो जाती है उनका मतदान का अधिकार खत्म हो जाता है। सरकारी घर पाने का अधिकार खत्म हो जाता है,बैंक से कर्ज नहीं मिलता,विकास योजनाओं के लाभों से इनको वंचित कर दिया जाता है। इन स्थितियों में जब कोई बंदी सजा काटकर सामाजिक जीवन में वापस लौटकर एक भले शहरी की जिंदगी गुजारना चाहे तो उसके लिए कोई संभावना ही नहीं बचती। बल्कि उसे पहले से भी कठिन सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह एक तरह से अमेरिकी प्रणाली में नस्लवादी शोषण और उत्पीड़न का अंतहीन चक्र है जिसमें काले लोगों को जीना पड़ता है। यह भी कह सकते हैं कि अमेरिकी समाज में जेल यात्रा कर आए व्यक्ति के लिए नए सिरे से भले आदमी की जिन्दगी जीने की अमेरिकी सत्ता कोई संभावनाएं ही नहीं छोड़ती।

अमेरिकी समाज में काले और हिस्पनिक समुदाय के अघिकांश लोग घेटो में रहते हैं। एकदम दमघोंटू अभावग्रस्त माहौल में रहते हैं। हर शहर में इनके लिए दमघोंटू घेटो बस्तियां बनी हैं जो शहर के भीतरी इलाकों में बसी हैं। इन घेटो बस्तियों में रहने वालों की जीवनशैली बेहद खराब है। उल्लेखनीय है अमेरिकी जेलों में बंद लोगों में आधी संख्या उनकी है जो नशीले पदार्थों के सेवन के जुर्म में पकड़े गए हैं। उल्लेखनीय है घेटो में रहने वालों की शिक्षा पर कम और जेलों के रखरखाब पर ज्यादा खर्चा किया जा रहा है। रेण्ड कारपोरेशन के द्वारा कराए एक सर्वे से पता चला है कि नशीले पदार्थों के सेवन के लिए दिए गए कठोर दंड की व्यवस्था ने समाज में असुविधाएं ज्यादा पैदा की हैं। कठोर दंड देने से लोग और ज्यादा बिगड़े हैं, पीड़ितों के परिवार में तबाही मची हुई है।

कायदे से देखें तो अमेरिका में जेल-औद्योगिक समूह का निर्माण हो चुका है। आमलोग खेतों-खलिहानों में काम करने की बजाय जेल की चौकीदारी ज्यादा पसंद करते हैं। अमेरिकी सामाजिक सेवाओं की तरह जेल व्यवस्था का भी निजीकरण कर दिया गया है। जेल बनाना और उनको चलाना बहुत बढ़िया मुनाफे का धंधा है। लगातार नए-नए जेलों का प्रत्येक शहर में निर्माण हो रहा हैऔर ये स्थानीय निजी जेल भी अमेरिकी जनगणना के रिकॉर्ड का हिस्सा है।

मसलन् विगत 30सालों में न्यूयार्क में घेटो वाले इलाकों में 30 नए बहुमंजिला जेल बनाए गए हैं। इन जेलों के रखरखाब पर आम करदाता जनता का पैसा खर्च होता है। मसलन् 1997 में प्रति कैदी 8डालर खर्चा आता था जो 1999 में बढ़कर 30 डॉलर हो गया। एक अनुमान के अनुसार जेल में बंदी व्यक्ति पर सालाना पन्द्रह फीसदी खर्चा बढ़ा है। चूंकि जेल और कैदी अब कारपोरेट मुनाफावृद्धि का हिस्सा हैं अतः अब गिरफ्तारियां और सजाएं भी खूब हो रही हैं। जितनी ज्यादा लोगों को गिरफ्तारी और सजा उतना ही ज्यादा मुनाफा। जेल-उद्योग में लगे कारपोरेट घरानों के दबाब के चलते ही अमेरिका की अधिकांश सरकारी जेलों को भी निजी हाथों में सौंप दिया गया है। सन् 1990 के बाद से अमेरिका के तकरीबन सभी राज्यों ने कानून बनाकर सरकारी जेलों को निजी हाथों में सौंप दिया है। विभिन्न जेलों के साथ विभिन्न वस्तुओं की उत्पादक बड़ी कंपनियों का समझौता है और बंदियों के बनाए सामान को ये कंपनियां खरीदकर बाजार में बेचती हैं। अथवा वे अपना माल कैदियों से बनवाते हैं।

सन् 1980 से सन् 2000 के बीच में जेलबंदियों ने तकरीबन 2विलियन डॉलर का सामान बनाया । मसलन् साबुन,कम्प्यूटर पुर्जे,ऑफिस फर्नीचर,गोल्फ वॉल,कपड़े,चटाई आदि बनानेवाले बंदी को 1.10 डॉलर प्रतिघंटे मजदूरी मिलती है। जबकि सामान्य नियम के तौर पर एक मजदूर को जेल के बाहर 10 डॉलर प्रतिघंटा देना होता है। अतः बाहर काम कराना महंगा पड़ता है ,यही वजह है कि कंपनियां बंदियों से सस्ती दर पर काम कराती हैं। यह एक तरह की गुलाम प्रथा है।

अमेरिकी जेलों में सस्ते श्रम को कारपोरेट घराने व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे और बंदियों से वस्तुतः गुलामों की तरह काम ले रहे हैं,साथ ही इनका सामाजिक जीवन भी दोयमदर्जे के नागरिक जैसा है। शोषण की स्थिति यह है कि एयरलाइंस कंपनियों से लेकर हीरो होण्डा कंपनी तक के कामों में ये बंदी जुटे रहते हैं। एक जमाने में ओहिओ राज्य में ट्रांसवर्ल्ड एयरलाइंस जेल में बंद कैदी को फोन से टिकट बुक करने का 5डॉलर प्रतिघंटा देती थी। इसी तरह हीरो होण्डा अपने एसेम्बली लाइन काम के लिए जेलकैदी को 2.05डॉलर प्रतिघंटा देती थी, इसके खिलाफ मजदूर यूनियनों ने जमकर प्रतिवाद किया था और उसके बाद यह योजना बंद कर दी गयी।

अमेरिकी न्यायप्रणाली की न्यायप्रियता की आमतौर पर मीडिया में बड़ी प्रशंसा की जाती है और उसके अन्यायपूर्ण पहलुओं की अनदेखी की जाती है। अमेरिकी न्यायप्रणाली में गोरी नस्ल का वर्चस्व है और गैर-गौरवर्ण के नागरिकों को आएदिन अन्याय झेलना पड़ता है। अमेरिकी न्याप्रणाली में नस्लभेदीय रूझानों की कभी मीडिया और सार्वजनिक जीवन में चर्चा नजर नहीं आती।अमेरिकी न्यायप्रणाली का लक्ष्य है अफ्रीकी –अमेरिकियों को नियंत्रण में रखना।

पूंजीवादी व्यवस्था की यह सामान्य विशेषता है कि वह जहां पर अपना पैर पसारती है वहीं पर सामाजिक मनुष्य की मौत हो जाती है। एकाकीपन, अलगाव,एकांत,अजनबियत आदि को इतनी जल्दी प्रसार मिलता है कि नागरिक समझ नहीं पाता कि आखिर यह सब कैसे हो रहा है। सामाजिक की मौत ही वह प्रस्थान बिन्दु है जहां से राज्य आसानी से नागरिक पर अपना अधिकार जमा लेता है और शासकवर्ग उसे अपनी विचारधारा के घेरे में ले लेता है। एक अध्ययन के अनुसार अमेरिकी जेलों में बंद अमेरिकी नागरिकों की संख्या विलक्षण रूप से बहुत ज्यादा है। अध्ययन बताता है कि विश्व की 5फीसदी आबादी अमेरिका में रहती है और उसके 25फीसदी लोग जेलों में बंद हैं। जेलबंदियों के मामले में भी अमेरिका का दुनिया में फीसदी और संख्या के लिहाज से सर्वोच्च स्थान है।

अमेरिकी जेलों में बंद लोगों का प्रोफाइल बताता है कि बंदी बनाने के मामले में भी अमेरिका में नस्लभेद है। मसलन् युवा अफ्रीकी-अमेरिकन कैदियों की संख्या गोरे कैदियों की संख्या से ज्यादा है। स्थिति यहां तक खराब है कि जेलखाने गुलामी के लिए पट्टे पर दिए जाते हैं। अमेरिका में यह मिथ प्रचारित है कि काले लोग बलात्कारी होते हैं और गोरी औरतें मानती हैं उनको गुलाम बनाए रखना ,मारदेना और काले लोगों पर सख्त निगरानी आदि जायज हैं।

अमेरिका के नागरिकों की पश्चिमी यूरोप के नागरिकों की तुलना में आय 5 से 8 गुना ज्यादा है। जबकि अहिंसक अपराधों के मामले में अमेरिका में जापान की तुलना में सत्रह गुना ज्यादा अपराध होते हैं। सन् 1970 की तुलना में अमेरिका के राज्यों में अपराधों में 500 गुना इजाफा हुआ है। अपराधों की हालत यह है अहिंसक अपराधों में लंबी सजाएं भोगने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है और जेलों में जगह नहीं है।

मिशेल फूको ने “डिसप्लिन एंड पनिश”( 1975) में विस्तार से यह बात रेखांकित की है कि जेल प्रणाली से अपराधों में कमी नहीं आई है बल्कि अपराधी ज्योंही जमानत पर छूटते थे वे पहला केस खत्म होने के पहले फिर जेल में आ जाते थे।जो लोग जेलों में बंदी हुआ करते थे उनसे काम कराया जाता था और उनको श्रम के गुण और ईमानदारी का पाठ भी पढ़ाया जाता था।

मिशेल फूको ने अपनी किताब में विस्तार के साथ फ्रांसीसी जेलों की दशा और सामाजिक स्थिति का सुंदर वर्णन किया है। जेलप्रणाली के सुधार के वर्षों में जेल में श्रम कराने और उस श्रम से बनी वस्तुओं को बाजार में बेचकर मुनाफा कमाने की परंपरा आरंभ हो गयी थी।अब जेल और फैक्ट्री एक हो गए थे। बेंथम ने विस्तार के साथ इस पहलू पर ध्यान खींचा है।जेरेमी बेंथम ने लिखा है कि जेल और फैक्ट्री दोनों को एकांत में संगठित किया जाता था और दोनों पर अहर्निश नजरदारी रखी जाती थी। इससे व्यक्ति को बांटने और श्रम कराने में मदद मिलती थी। उन दिनों जेलों में कैदियों के सुधार पर कम और उनसे मुनाफे के लिए श्रम ज्यादा कराया जाता था। फलतः इससे कैदी सुधरे कम लेकिन उन्होंने मुनाफा ज्यादा पैदा किया।

बेंथम ने उदार दण्ड प्रणाली का एक तरह से मॉडल पेश किया।जिसमें अपराधी को वैध एकाकी शोषण के लिए तैयार किया जाता था।इसके विपरीत कार्ल मार्क्स ने ’’पवित्र परिवार’’ नामक पुस्तक में लिखा अपराध के लिए एकाकी व्यक्ति को सजा नहीं दी जानी चाहिए बल्कि अपराध के अ-सामाजिक स्रोत को नष्ट किया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को मनुष्य की तरह विकास करने का अवसर दिया जाना चाहिए।यदि व्यक्ति को वातावरण बनाता है तो वातावरण को मानवीय होना चाहिए। यदि मनुष्य स्वभावतः सामाजिक है तो वह समाज की सही प्रकृति का विकास करेगा। उसकी शक्ति की प्रकृति को एकाकी व्यक्ति के आधार पर नहीं बल्कि समाज की शक्ति के आधार पर परखा जाना चाहिए।कालांतर में पूंजी(भाग-1) में मार्क्स ने लिखा कि अधिकांश अपराधी अति जनसंख्या वाले निचले तबकों से आते हैं और ये वे लोग हैं बेकार हैं।मार्क्स ने यह भी लिखा है कि बेकारों की संख्या जितनी घटती जाती है अपराधियों की समाज में संख्या उसी अनुपात में घटती जाती है। यानी बेकारी घटने का अर्थ है बेकारों की फौज और अपराधियों की संख्या मॆं गिरावट।

मार्क्स ने रेखांकित किया है कि अपराध को व्यक्तिगत की बजाय सामाजिक आधार पर देखा जाना चाहिए।यह एक तरह से वर्चस्वशाली ताकतों के सामाजिक वर्चस्व की अभिव्यक्ति भी है। अपराध को जन्म देने वाली परिस्थितियों को बनाए रखकर वर्चस्वशाली ताकतें अपने सामाजिक-आर्थिक वर्चस्व को बनाए रखती हैं।




रविवार, 26 जून 2011

'नए तुलसीदास' और साहित्य पतन


हिन्दी का नया ठाट नये जनसंपर्क अधिकारी या 'नए तुलसीदास' रच रहे हैं, इनके पास मीठी भाषा,मधुर सपने, पद, हैसियत,पैसा आदि सब है। इनके नेता से लेकर प्रोफेसरों तक संपर्क-संबंध हैं।इन्हें सत्तातंत्र की बारीक रीति-नीति का ज्ञान है। 'नए तुलसीदास' ने इस युग में 'पद' को महान बनाया है। जितनी बड़ी कुर्सी ,साहित्य और हिन्दी अकादमिक जगत में उतना ही बड़ा स्थान। इन दिनों लिखने-पढ़ने से साहित्य का ओहदा तय नहीं हो रहा । उल्लेखनीय है साहित्य में नया तत्व दाखिल हुआ है कनेक्टविटी का। साहित्य में कनेक्टविटी जितनी अच्छी उसका उतना ही नाम। यह सूचनायुग का सीधा असर है। हिन्दी का प्रत्येक ख्यातिलब्ध लेखक इस आधार पर खा -कमा रहा है। आज से कुछ साल पहले एक ख्यातिलब्ध लेखक को मात्र एक साल में 10 से ज्यादा पुरस्कार मिले। ज्ञानपीठ को छोड़कर ये जनाब सभी पुरस्कार पाने में सफल रहे, अब वे सिर्फ ज्ञानपीठ और नोबुल पुरस्कार का ही इंतजार कर रहे हैं। साहित्य में कृति,कृतिकार और पाठक के बीच में पाठ सेतु का काम करता था। लेकिन आज पाठ गौण है,लिखा हुआ गौण है। कनेक्टविटी बड़ी चीज है।
     कॉलेज-विश्वविद्यालयों में हिन्दी के ऐसे शिक्षकों की पीढ़ी पैदा हुई है जो जानते हैं देश में किस विश्वविद्यालय में क्या हो रहा है? कौन प्रोफेसर क्या कर रहा है ? किसके अंदर कितने लोग पीएचडी कर रहे हैं ? हिन्दी विभाग में कितने लोग हैं ? किसका किससे पंगा है ? किससे मधुर संबंध हैं ? नामवर सिंह के यहां कौन आता-जाता है ? अशोक बाजपेयी इस समय कहां पर हैं ? हिन्दी में कहां नियुक्तियां हो रही हैं और वहां किसकी संभावना है ? कौन एक्सपर्ट हैं ? किसके जरिए काम कराया जा सकता है? आदि । हिन्दी में कुछ भी लिखे-पढ़े बिना मात्र इनके साथ संपर्क के जरिए हिन्दी जगत की सारी जानकारी  प्राप्त कर सकते हैं। ये लोग असल में हिन्दी के नए पीआरओ यानी  'नए तुलसीदास' हैं। ये इस युग के प्रभावशाली प्रचारक हैं। ये जिसके पीछे लग जाएं उसका जीवन संवारने या तबाह करने की क्षमता रखते हैं। ये लोग आमतौर पर अफवाहों से काम चलाते हैं और कनेक्टविटी पर टिके हैं। ये लेखक के भ्रम में जीते हैं।
     आपको सारे देश में अपनी हवा बनानी है,शहर में हवा बनानी है ,इन  लेखकों से मिलें ,वे पलक झपकते ही महान बना देंगे। कोलकाता से लेकर दिल्ली तक,पटना से लेकर काशी तक इन लोगों की कई टीमें सक्रिय हैं। इनकी कनेक्टविटी में जो है वह अक्लमंद है,बुद्धिजीवी है,श्रेष्ठ शिक्षक है, इसके जो बाहर है वो कूड़ा है। कचरा है। घटिया है।
   'नए तुलसीदास' का मानना है साहित्य और शिक्षा में टिकना है तो साहित्य के पठन-पाठन से ज्यादा कनेक्टविटी पर ध्यान दो,कनेक्टविटी पर निवेश करो। कौन नौकरी दिला सकता है उसे पकड़ो,उससे येन-केन-प्रकारेण सामंजस्य बिठाओ। समाजशास्त्र की भाषा में इसे 'सामंजस्यपूर्ण व्यक्ति' कहते हैं। यह ऐसा व्यक्ति है जो अपने हितों के विस्तार के लिए तरह-तरह की सेवाएं हासिल करने या देने में विश्वास करता है। चंदे के कूपन देने से लेकर फर्श बिछाने, हॉल सजाने, गोष्ठियों में आने-जाने,इनके लिए चंदा देने, और गुलदस्ता देने आदि को ही ये 'साहित्य सृजन' कहते हैं। मूलतःयह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास हिन्दी की डिग्रियां तो हैं,पद भी है, लेकिन इसे शिक्षित आदमी नहीं कह सकते। यह न तो कुछ लिख रहा है, और नहीं  नया जानने समझने की कोशिश कर रहा है। इसके ज्ञान की सीमा है। यह पाठ्यक्रम  से ज्यादा नहीं जानता। उसे नए पुराने किसी भी किस्म के पाठ्यक्रम से इतर ज्ञान से कोई लेना -देना नहीं है। अधिक से अधिक वह उतना जान लेता है जिससे वह अपनी दैनंदिन अकादमिक जरूरतों की पूर्ति कर सके।
   'नए तुलसीदास' का हिन्दी के अकादमिक जगत में दबदबा है। ये लोग उन्नति के कलात्मक गुणों में माहिर हैं। ये लोग अच्छे नम्बर ,प्रथमश्रेणी ,नियुक्ति,पद-पुरस्कार-सम्मान दिलाने में माहिर हैं। इससे साहित्य समृद्ध नहीं होता। हिन्दी समृद्ध नहीं होती ,बल्कि पीआरओ संस्कृति समृद्ध होती है। कायदे से किसी भी विवेकवान मनुष्य को इनसे घृणा होगी,लेकिन हिन्दी में इस संस्कृति के पुजारियों को श्रद्धा-सम्मान से देखा जाता है। 
    'नए तुलसीदास' की संस्कृति अनपढ़ की संस्कृति है, वे कक्षा में जो पढ़ाते हैं अथवा पाठ्यक्रम में जो है,अथवा हिन्दी में जो थोड़ा-बहुत समाचारपत्रों में लिखा जा रहा है उसके अलावा कुछ नहीं जानते। सवाल उठता है हिन्दी के कॉलेज-विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों को मोटी पगार मिलती है। वे इस पगार के बदले समाज को क्या दे रहे हैं ? क्या लिख-पढ़ रहे हैं ? हिन्दी में यह पतन क्यों हुआ ? वे न्यूनतम ज्ञान को महाज्ञान क्यों समझ रहे हैं ? 
     मसलन् 'नए तुलसीदास' को यह तो मालूम है रामचन्द्र शुक्ल ने क्या लिखा है। लेकिन वो देरिदा-फ्रेडरिक जेम्सन के बारे में कुछ भी नहीं जानता, वह यह तो जानता है प्रेमचंद ने गोदान लिखा था लेकिन अन्य भाषा के साहित्य और कला रूपों से एकदम अनभिज्ञ है। कोलकाता में अधिकांश हिन्दी शिक्षकों-विद्यार्थियों ने कोलकाता के हिन्दी-बांग्ला रंगमंच के नाटक नहीं देखे। ये लोग कभी बांग्ला का सिनेमा नहीं देखते। ज्यादातर को बांग्ला साहित्य कला-संस्कृति में चल रही चर्चाओं का कोई ज्ञान नहीं है।विदेशी भाषा के साहित्य और उसके विवादों से तो इनका दूर दूर तक कोई संबंध नहीं है। यही दशा दिल्ली -काशी-इलाहाबाद और लखनऊ की है। कहने का अर्थ यह है हिन्दीवाला बंद गली के आखिरी मकान में रहता है। इसमें किसी भी किस्म की बाहरी हवा,विचार,साहित्य,स्वस्थ मूल्य आदि नहीं आ रहे। कोई ऐसा उपाय किया जाए जिससे यह बंद मकान खुल जाए ।
       'नए तुलसीदास' ने किताबों की महत्ता खत्म कर दी है। ये खुद किताब नहीं खरीदते और खरीदने कि लिए प्रेरित भी नहीं करते। आप किसी भी शहर में जाइए और किताबवाले से पूछिए कॉलेज-विश्वविद्यालय के कितने प्रोफेसर हैं जो आपके यहां किताब खरीदने आते हैं तो एक ही जबाब मिलेगा ,गिनती के दो-चार। जबकि बंगाली समाज में ऐसा नहीं है। हिन्दी के 'नए तुलसीदास' अपनी अकादमिक गुणवत्ता पर भी ध्यान नहीं देते। एकबार जब कोई शिक्षक बन जाता है तो वह कैसा पढ़ा रहा है ? उसके पढ़ाने की क्वालिटी क्या है ? गुणवत्तापूर्ण पढ़ाता है या नहीं ? इन सब पर ध्यान नहीं दिया जाता। आज तक किसी शिक्षक को खराब पढ़ाने के कारण नौकरी से नहीं निकाला गया। बल्कि देखने में यह आया है कि जो जितना ज्यादा खराब पढ़ाता है उसकी कनेक्टिविटी उतनी ही ठीक  है।
     हिन्दी के 'नए तुलसीदास' न तो किताब खरीदते हैं और नहीं पत्रिकाएं खरीदते हैं। ये लोग साल में लाखों रूपया पगार पाते हैं और साल में एक भी किताब नहीं खरीदते। जो थोड़ी-बहुत किताबें इनके घरों में मिलेंगी वे किसी न किसी जुगाड़ की देन है। हमें गंभीरता से सोचना चाहिए जो कक्षा में क्वालिटी बनाए रखने में असमर्थ हैं ,साहित्य में क्वालिटी बनाए रखने में असफल हैं, उन्हें क्या नौकरी का हक है ? साहित्यकार कहलाने का हक है ? मसलन् कोई मजदूर यदि घटिया क्वालिटी का सामान बनाता है तो उसे मालिक काम से निकाल देता है,बाजार में घटिया क्वालिटी का माल हम नहीं खरीदते। लेकिन हिन्दी शिक्षण और साहित्य सृजन में ऐसा नहीं हो रहा,हम घटिया क्वालिटी के शिक्षक - साहित्यकार-लेखक के दीवाने हैं। हमने आज तक सेमीनारों में घटिया भाषण देने वाले की मीडिया या सेमीनार में आलोचना नहीं देखी। हमें देखना चाहिए क्या एक प्रोफेसर-लेखक अपने काम को ईमानदारी  से करता है? आखिर इस समस्या का समाधान क्या है ? प्रोफेसर और लेखक में अपने पेशे के प्रति कुर्बानी,मेहनत , नए विचारों और व्यापक सामाजिक यथार्थ को जानने की जितनी ज्यादा भूख होगी,वह उतना ही सुंदर लिख पाएगा।पढ़ा पाएगा।
    लेकिन 'नए तुलसीदास' ने ज्ञान के प्रति आकर्षण पैदा करने की बजाय धनलोलुपता बढ़ायी है। वे अपने काम के प्रति बेवफा हैं। वे पदोन्नति,सरकारी पद, सलेक्शन कमेटी आदि के चक्करों में सारी जिंदगी खत्म कर देते हैं। वे जिस समय रिटायर होते हैं उनके पास एक सुंदर घर,मोटा सा बैंक बैलेंस, कुछ भक्त और खोखली प्रसिद्धि के अलावा कुछ नहीं होता। यह नोटिस करने लायक बात है कि एक प्रोफेसर 20-30साल काम करने के बाद समाज को एक अच्छी किताब तक लिखकर नहीं दे जाता। अधिकांश शिक्षक बिना लिखे ही रिटायर कर जाते हैं। स्मरण के लायक कोई किताब तक समाज को नहीं देकर जाते । लेकिन उनका नाम बड़ा होता है,चर्चे बड़े होते हैं,भक्त बहुत होते हैं।
       गंभीर साहित्य और गंभीर शिक्षण सामाजिक न्यूजरील की तरह नहीं है। गंभीर शिक्षण और साहित्य के सृजन में कठोर परिश्रम और काफी समय लगता है। एक प्रोफेसर या साहित्यकार रातों-रात किसी चुगद किस्म के प्रशंसक आलोचक या उपकुलपति की प्रशंसा से तैयार  नहीं होता। उसे तैयार होने में दसियों वर्ष लगते हैं,बेशुमार मेहनत के बाद वह तैयार होता है। साहित्यकार या एक अच्छा शिक्षक बनने का कोई शार्टकट रास्ता नहीं है। शार्टकट रास्ता बुद्धिहीन तलाश करते हैं।बुद्धिमान बनने के लिए लंबी कठिन साधना की जरूरत होती है।
    'नए  तुलसीदास ' साहित्यिक प्रेरणाओं से कोसों दूर हैं। उनके ऊपर लोगों की निर्मम आलोचना का कोई असर नहीं होता। उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। वे अपने को हिन्दी का योद्धा समझते हैं और समाज में हिन्दी योद्धा की तरह विचरण करते हैं। ये लोग जब किसी कार्यक्रम में जाते हैं या उसका आयोजन करते हैं,सिर्फ उसी समय इनकी सर्जना के दर्शन होते हैं,बाकी समय ये सर्जनात्मक अवकाश पर रहते हैं। मसलन वे जब किसी गोष्ठी या समारोह या मेले का आयोजन करते हैं तो उस समारोह के  अलावा कभी सर्जनात्मक भाव में नजर नहीं आते,इन समारोहों में भी उनके सर्जनात्मकभाव की इमेज कम और साहित्य प्रबंधकर्ता की इमेज ज्यादा उभरती है। इन कार्यक्रमों से साहित्य के नायकों का मान-सम्मान नहीं बढ़ता बल्कि प्रबंधकों का मान बढ़ता है। इस तरह के आयोजनों के जरिए साहित्य का कम्युनिकेशन नहीं होता बल्कि साहित्य संप्रेषण बाधित होता है। वे साहित्य,साहित्यकार और संस्कृति को चीजों में बदल देते हैं। प्रमोशन की वस्तु बना देते हैं। संप्रेषण को वस्तुओं में बदलना बेहद खतरनाक काम है। साहित्य के आयोजन जब शोहरत पाने,पदोन्नति पाने,नौकरी पाने,अंक बढ़ाने, प्रथमश्रेणी दिलाने आदि में जब बदल जाते हैं तो साहित्य वस्तु में बदल जाता है और ऐसी अवस्था में साहित्य, सामाजिक परिवर्तन की बजाय सामाजिक उत्पीड़न का काम करने लगता है। वे आयोजनों में साहसपूर्ण संवाद नहीं करते,नए विचारों का जोखिम नहीं उठाते,साहित्य में सहभागिता पैदा नहीं करते। बल्कि वे साहित्य आयोजन कुछ पाने के लिए करते हैं। देने के लिए नहीं करते। साहित्य कभी आयोजनों से प्रसार नहीं पाता। साहित्य का विकास होता है लेखकीय आचरण पर सख्ती से अमल करने से। साहित्य को अभिजनों और सत्ता के खिलाफ प्रतिवादी बनाने से।साहित्य का झूठी प्रशंसा से विकास नहीं होता। साहित्य में खोखले शब्द थोपे जाने से भी साहित्य की उन्नति नहीं होती।





शनिवार, 25 जून 2011

बिदेसिया यानी सामूहिक त्रासदी की कलात्मक अभिव्यक्ति-कुमार नरेन्द्र सिंह


भोजपुरी साहित्य के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर का बिदेसिया नाटक, सच कहें तो भोजपुरी लोक जीवन का जीवंत दस्तावेज है, भोजपुरियों के दिल की धड़कन है। बिदेसिया महज नाटक की एक किताब भर नहीं है बल्कि भोजपुरिया अस्मिता की पहचान है, सृजनशीलता की प्रतीक है। शहरीकरण और औद्योगीकरण की आंधी में उजड़ते भोजपुरिया परिवार और कोलकाता, असम के चटकलों काम की तलाश में पहुंचे भोजपुरिया मजदूरों की जिंदगी की दारुण दास्तान है बिदेसिया।

नृत्य-नाट्य की बिदेसिया शैली भोजपुरी लोक-संस्कृति की अनोखी उपलब्धि तो है ही, लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के कवित्तमय और कलात्मक सौंदर्य-बोध की विशिष्ट पहचान भी है। वास्तव में बिदेसिया नाटक वैयक्तिक प्रतिभा और संस्कृति के अंतर्मेल की उपज है। यही कारण है कि शायद ही कोई ऐसा खांटी भोजपुरिया मिले जो बिदेसिया के अभाव में भोजपुरी संस्कृति की कल्पना भी कर सके। बिदेसिया शैली की अपार लोकप्रियता का सबसे महत्वपूर्ण कारण इसका परंपरा-स्युत होना ही है। भोजपुरी साहित्य और संस्कृति मूल रूप से मौखिक परंपरा पर आधारित रही है और गेयता इसका स्वभाव रहा है। भोजपुरी के प्रसार में उसकी गेयता, गीतों की बड़ी प्रधानता रही है। आज मॉरीशस, सूरीनाम, ट्रिनिडाड, फिजी, हॉलैंड, साउथ अफ्रीका आदि देशों में अगर भोजपुरी जिंदा है तो बहुत हद तक उसकी गेयता ही है। अमिताभ घोष ने अपनी पुस्तक सी ऑफ दी पॉपीज में इस तथ्य का उल्लेख विस्तार से किया है। वह कहते हैं कि गिरमिटिया मजदूरों में अन्य भाषा भाषियों की भी अच्छी संख्या थी लेकिन जब उनके जहाज उन देशों के समुद्र तटों पर उतरे तो सबकी भाषा भोजपुरी हो चुकी थी। इसका कारण यह है कि भोजपुरी संस्कृति में सामूहिक गान की जबर्दस्त परंपरा रही है। दुनिया के सबसे बड़े कोरस यानी सामूहिक गान की शैली को भोजपुरियों ने ही संजो रखा है - होली और चैता के रूप में। अपने गीतों की बदौलत भोजपुरी अन्य भाषाओं की रानी बन बैठी। ऐसे में यह अन्यथा नहीं कि ठाकुर जी के नाटकों मे परंपरा और गेयता का साहचर्य देखने को मिलता है। यही कारण है कि भिखारी ठाकुर के नाटकों के पात्र बहुधा गीतों के माध्यम से ही अपने मनोभावों का इजहार करते हैं।

भोजपुरी अगर लोक परंपरा से विमुख नहीं हुई तो इसका कारण ऐतिहासिक है। अपनी तमाम लोकप्रियता और भाषा के रूप में अपनी उपादेयता साबित कर चुकने के बावजूद अवधि, ब्रज और मैथिली की तरह भोजपुरी को हिंदी क्षेत्र की सांस्कृतिक को वहन कर सकने वाली भाषा के रूप में प्रतिष्ठा नहीं मिल सकी। इसका एक कारण तो यह है कि इतिहास के किसी दौर में उसे राजाश्रय प्राप्त नहीं हो सका और दूसरा कि भोजपुरी जनता की सांस्कृतिक चेतना भी कई ऐतिहासिक और अनैतिहासिक कारणों से विकसित नहीं हुई। राष्ट्र की मुख्य धारा में भरपूर सहयोग करते रहने के बावजूद भोजपुरी के विकास के प्रति सरकारी रवैया नकारात्मक ही रहा।

इस सम्यक उपेक्षा का एक संतोषजनक परिणाम भी निकला और वह यह कि भोजपुरी भाषा और संस्कृति लोकधारा की सहजता से विमुख नहीं हो पाई। भावपथ की यह सरसता ही शैली के स्तर पर गेयता को जन्म देती है। लोक चेतना के प्रतिनिधि कलाकार भिखारी ठाकुर को यह समझने में कोई भूल नहीं हुई कि सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा और उसका विकास चिर- परिचित परंपरा के स्वीकार में ही निहित है। परंपरा से भिखारी ठाकुर का आत्यंतिक जुड़ाव ही उन्हें विविध शैलियों के प्रयोग के लिए उकसाता रहा। यह आकस्मिक नहीं था उनकी रचनाओं में सोरठी, कजरी, झूमर, पूर्वी तथा आल्हा छंद का अनुकरण मिलता है, नाटक के गीतों में वे पारंपरिक तर्जों को ही तरजीह देते हैं। परंतु अनुकरण तो अनुकरण ही है। कलाकार के जीवन में यही वह बिंदु है जहां उसकी समस्त आंतरिक संभावनाएं किसी अज्ञात बल से एकजुट होकर सर्वथा नवीन का निर्माण करती है। कहना न होगा कि बिदेसिया इसी सर्वथा नवीन की शोध-प्रक्रिया की अन्यतम उपलब्धि है। अन्यथा न होगा, अगर कहें कि बिदेसिया भिखारी ठाकुर के समग्र नाट्य-चिंतन की परमाभिव्यक्ति है।

भिखारी ठाकुर ने बिदेसिया शैली का प्रयोग सामूहिक त्रासदी की कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए किया था। यह सामूहिक त्रासदी औद्योगीकरण के कोख से पैदा हुई थी जिससने पुरुबियों का सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर के रख दिया। इतिहास गवाह है कि भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की स्थापना के साथ ही भोजपुरी क्षेत्रों के मजदूरों का पलायन कोलकाता, असम ही नहीं वरन फिजी, मॉरीशस, ट्रिनिडॉड, सुरीनाम आदि अन्य उपनिवेशों में हुआ। अंग्रेजी शासन की सबसे गहरी मार भोजपुरियों को ही सहनी पड़ी थी। 1857 की क्रांति में भोजपुरियों ने जगदीशपर के जमींदार बाबू कुंअर सिंह की अगुआई में अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे। देश के अंदर भोजपुरियों ने कोलकाता को ही अपना आशियाना बनाया। सबसे ज्यादा भोजपुरिया वहीं पहुंचे।

भोजपुरी प्रदेशों के लिए कोलकाता महज एक शहर का नाम नहीं है बल्कि बिरह का एक ऐसा सैलाब है जिसमें हजारों-हजार आंखों का काजल बह चुका है। इन प्रदेशों के नौजवान रोजगार और खुशी की तलाश में कोलकाता और असम के चटकलों में शरण पाते थे। बहुधा वे लौटकर नहीं आते थे क्योंकि लौटने लायक उनकी स्थिति ही नहीं बन पाती थी और अगर लौटते भी थे तो खुशहाली के बदले तंगहाली लेकर। अकारण नहीं कि भोजपुरी प्रदेशों की औरतों के लिए कोलकाता किसी सौत से कम नहीं था। उत्तर प्रदेश औऱ बिहार के गांवों की औरतों में आज भी यह अंधविश्वास व्याप्त है कि बंगाल औऱ असम की औरतें उनके मर्दों को जादू से तोता और भेड़ा बनाकर रख लेती हैं। भिखारी ठाकुर की निम्नलिखित पंक्तियों में इस विश्वास की ललिताभिव्यक्ति देखते ही बनती है--------------

मोर पिया मत जा हो पुरुबवा

पुरुब देश में टोना बेस बा, पानी बड़ा कमजोर

मोर मत जा हो पुरुबवा।

इसी तरह एक और गीत में एक नारी अपने पति को पुरुब में नौकरी करने जाने नहीं देना चाहती। जब पति कहता है कि वह पुरुब में नौकरी करने जाएगा औऱ वहां से वह उसके लिए साड़ी और सिकड़ी (गले का चेन)ले आएगा तो सुनिए कि उसकी पत्नी क्या कहती है –

अगिया लागहू पिया तोहरी नोकरिया, बजर पड़हूं

पिया साड़ी ओ सिकड़िया, बजर पड़हूं। (आपकी नौकरी में आग लगे और साड़ी तथा सिकड़ी को वजर पड़े।)

औद्योगीकरण की आंधी में उड़कर पुरुष के प्रदेश जाने पर नारियों को ही ज्यादा पीड़ा होती थी। अकारण नहीं कि भोजपुरी गीतों में औद्योगीकरण के खिलाफ भी आक्रोश दिखाई देता है। दिलचस्प है कि नारियों ने ही औद्योगीकरण की मुखालफत सबसे ज्यादा की है। देखिए एक बानगी –

कलवा के पानी पी के भइलन पियवा करिया

कल में डाढ़ा लागो ना.....अर्थात नलके का पानी पीकर मेरे पिया काले हो गए हैं इसलिए यह कल (पुरब के लोग नलके के पानी को कल का पानी ही कहते हैं।) ही नष्ट हो जाए। अगर कहा जाए कि औद्योगीकरण के खिलाफ पहला स्वर नारियों का ही उभरा तो कोई गलत नहीं होगा।

भिखारी ठाकुर ने इन हालात को अपनी लेखनी से स्वर दिया और इसका दस्तावेज बना बिदेसिया। भिखारी ठाकुर ने अपने प्रातिनिधिक नाटक बिदेसिया में नाटक की नायिका प्यारी सुंदरी के माध्यम से उन तमाम विरहिणी नारियों की मनोदशा का वर्णन किया है जिनके कंत रोजी-रोटी की तलाश में पुरुब में कमाने गए हैं। इसके साथ ही ठाकुर जी ने अन्य पात्रों के संवाद के माध्यम से उन नारियों के और परिवेश के प्रति समाज के नजरिए को भी उकेरा है।

प्यारी सुंदरी का पति गवना करा के उसे अपने घर ले आता है और स्वयं एक दिन चुपके से नौकरी की तलाश में कलकत्ता (अब कोलकाता) चला जाता है। वहां के चटकल में उसे नौकरी मिल जाती है। कोलकाता में रहते हुए उसकी मुलाकात एक औरत से होती है। धीरे-धीरे यह मुलाकात मोहब्बत में बदल जाती है और दोनों पति-पत्नी बनकर रहने लगते हैं। प्यारी का पति प्यारी को एकदम भुल जाता है। अब यही औरत उसकी जिंदगी है। प्यारी का पति तो उसे भूल जाता है लेकिन प्यारी अपने पति को कैसे भूल जाए। उसका तो सबकुछ उसका पति ही है। अनेक प्रलोभनों को ठुकरा कर वह अपने पति 12 बरसों तक इंतजार करती है लेकिन उसका पित नहीं लौटता है। प्यारी की स्थिति है कि क्या करें, कहां जाए। वह परेशान है कि अपने मन की व्यथा अपने पति तक वह पहुंचाए कैसे। अपने पति का पता-ठिकाना भी तो नहीं जानती वह। तिल-तिल जलना ही उसकी नियती बन गई है। विरहिणी नारी प्यारी की मनोव्यथा का क्या ही मार्मिक चित्रण भिखारी ठाकुर ने किया है-----

अमवा मोजरी गइले, लगले टिकोरवा

दिन पर दिन पियरात रे बिदेसिया।

एक दिन बही जइहें जुलुमा बेयरिया

डार-पात जइहें भहराई रे बिदेसिया।

(आम में मंजर लग चुके हैं और अब तो टिकोले भी लग चुके हैं। डर है कि एक दिन जुल्मी बयार बह जाएगी और डार-पात सहित पेड़ गिर जाएगा।)

एक बिरहिणी नारी की मनोदशा का इतना शुक्ष्म चित्रांकन बिरले कवियों, लेखकों ने किया है। पति-पत्नी के संबंधों में फिसलन की आशंका का इतना लालित्यपूर्ण बयान अन्यत्र कम ही देखने को मिलता है। बहरहाल, प्यारी सुंदरी के इस मनोभाव का एहसास उसके पित बिदेसिया को हो तब न। छह महीने के लिए ही तो कहकर गया था बिदेसिया परंतु 12 वर्ष बाद भी नहीं लौटा। इसी मनदशा में प्यारी की मुलाकात बटोही से होती है। मालूम हो कि बटोही की भूमिका भिखारी ठाकुर स्वयं करते थे। जब प्यारी को जानकारी होती है कि बटोही कोलकाता जो रहा है तो वह उससे मुलाकात करती है और अर्ज करती है कि वह उसका संदेशा उसके पति बिदेसिया तक पहुंचा दे। बटोही प्यारी से उसके पति का नाम -पता पूछता है परंतु प्यारी अपने पति का नाम बताने के बदले उसकी पहचान बताती है और पता तो वह जानती ही नहीं। वह बटोही से कहती है -----

हमरो बलमू जी के बड़े-बड़े अंखिया

चोखे-चोखे हउवे नैनाकोर रे बटोहिया।

ओठवा त हवे जइसे कतरल पनवां

नकवा सुगनवा के ठोर रे बिदेसिया।

बटोही कोलकाता पहुंचता है और प्यारी के बताए पहचान का आदमी ढूंढ़ने में जुट जाता है। अंत में वह बिदेसिया को ढूढ़ने में सफल हो जाता है। जब बटोही देखता है कि बिदेसिया किसी और औरत के साथ रह रहा है तो वह उसे काफी फटकार लगाता है और समझा-बुझाकर तथा प्यारी की व्यथा कथा बयान कर उसकी गलती का एहसास कराता है। अंत में बिदेसिया बटोही की बात मानकर अपने गांव वापस लौटने की तैयार करने लगता है, जो उसकी दूसरी पत्नी को नागवार गुजरता है और वह बिदेसिया पर दबाव डालती है कि वह उसे छोड़कर न जाए लेकिन बिदेसिया नहीं मानता है और अपने घर अपनी पत्नी प्यारी सुंदरी के पास वापस लौट आता है। कथा यहीं समाप्त नहीं होती, वह आगे बढ़ती है। होता यह है कि कोलकाता वाली बिदेसिया की उप पत्नी बिदेसिया को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते उसके गांव पहुंच जाती है। कहानी कई नाटकीय परिस्थितियों से गुजरता है और हुए दोनों पत्नियों द्वारा बिदेसिया को स्वीकार कर लिए जाने के साथ खत्म हो जाता है। सभी खुशीपूर्वक एक साथ रहने लगते हैं।

बिदेसिया नाटक की कथा-वस्तु देखकर तुरंत ही यह स्पष्ट हो जाता है कि भिखारी ठाकुर भोजपुरिया क्षेत्रीय परंपरा से गहरे स्तर पर जुड़े हैं। नाटक के एक दृष्य में जब बटोही प्यारी सुंदरी से उसके पति का नाम पूछता है तो प्यारी अपने पति का नाम नहीं बताकर उसकी पहचान बताती है। ऐसा नहीं है कि प्यारी अपने पति का नाम नहीं जानती परंतु यदि ठाकुर जी प्यारी के मुंह से उसके पति का नाम कहवाते तो यह क्षेत्रीय परंपरा से अलग होता। कहने की आवश्यकता नहीं कि उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में आज भी महिलाएं अपने पति नाम लेने शर्माती हैं। जाहिर है कि ऐसे में नाटक का दृष्य लोगों की आंखों में खटकता और तब संभव है कि इसका असर नाटक की लोकप्रियता पर भी होता।

सही मायने में बिदेसिया लोक-नाट्य परंपरा का वायवीय विकास है। नौटंकी की तरह बिदेसिया में भी पात्रों का कथन-उपकथन मूल रूप से काव्य रूप में ही बयान होता है। दरअसल. संपूर्ण भोजपुरी साहित्य ही काव्य में है। भिखारी ठाकुर इसी परंपरा को और समृद्ध कर आगे बढ़ाने का काम करते हैं। संस्कृत नाट्य परंपरा की तर्ज पर बिदेसिया में मंगलाचरण का प्रावधान है, वैसे ठाकुर जी के सभी नाटकों में मंगलाचरण का प्रयोग है। सूत्रधार की आवश्यक उपस्थिति भी संस्कृत की रंगमंच परंपरा का ही विस्तार है। बिदेसिया नाटक में सूत्रधार की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि नाटक के कथा-प्रवाह में वह उत्प्रेरक का काम करता है।

बिदेसिया नाटक में पात्रों के विशिष्टीकरण का अभाव होता है। क्षण भर पहले बिदेसिया, बटोहिया की भूमिका निभाने वाला दूसरे ही क्षण मंत पर ढोलक या खंजड़ी बजाते नजर आता है। इसी तरह चरित्र के अनुरूप पात्रों का नामकरण बिदेसिया नाटक की अपनी मौलिक विशेषता है। भिखारी ठाकुर के अन्य नाटकों में भी ऐसा ही देखने को मिलता है। उदाहरण के लिए पात्रों बिदेसिया, बटोहिया आदि नाम उनके गुण-कर्म के अनुसार ही दिए गए हैं। वैसे उनके नाटकों में पात्रों का नामकरण वर्गीय स्थिति के अनुसार भी किए गए हैं।

बिदेसिया नाटक को बहुधा हम सांसारिक लीला के रूप में देखते हैं, देखते हैं कि इस नाटक में तत्कालीन भोजपुरिया समाज का उत्स उभरता है। लेकिन सामाजिक पक्ष के अलावा बिदेसिया का आध्यात्मिक पक्ष भी है। जीव और माया के बीच स्थित आध्यात्मिक संबंधों को दर्शाने का प्रयास भी बिदेसिया में दिखाई देता है। भिखारी ठाकुर ने स्वयं इसके आध्यात्मिक पक्ष का स्पष्ट उल्लेख किया है। भिखारी ठाकुर कहते हैं – बिदेसिया जीव का प्रतीक है जो दुनिया में उद्देश्य हासिल करने के लिए भटक रहा है और यह उद्देश्य है ईश्वर से एकाकार हो जाना। बिदेसिया की दूसरी पत्नी जिसे भिखारी ठाकुर ने पतुरिया कहा है, माया की प्रतीक है। जीव यानी बिदेसिया उसमें उलझकर अपना उद्देश्य भूल जाता है। बटोरी धर्म या संत का प्रतीक है जो बिदेसिया को उसका उद्देश्य बताकर सीधी राह पर लाता है। और प्यारी....प्यारी सुंदरी तो स्वयं ईश्वर की प्रतीक है।

भिखारी ठाकुर ने अपने बिदेसिया नाटक में जीव, ईश्वर और माया का एक अनोखा रुपक तैयार किया है। भारतीय वांग्मय में यूं तो ईश्वर की कल्पना अर्द्धनारीश्वर के रूप में जरूर की गई है लेकिन जीव और माया के संबंध में किसी भी संत, कवि ने ईश्वर की कल्पना नारी रूप में नहीं की है। वैसे भी बिदेसिया नाटक का मूल स्वर त्रासदी और करुणा है औऱ कहने की आवश्यकता नहीं कि इनकी प्रतिमूर्ति नारी ही हो सकती है। नाटक के जरिये ठाकुर जी ने परदेश में रहने वालों को घर लौटने की सलाह भी दी है।

इतनी समृद्ध और रचनात्मक शैली के बावजूद अब बिदेसिया नाटक अपना वजूद खोता जा रहा है। आनन-फानन में 15-20 हजार लोगों की भीड़ जुटा लेना जिस नाटक का अनिवार्य गुण रहा हो, जो नाटक दर्शकों को घंटों बैठकर देखने को मजबूर करने की हैसियत रखता हो, वह आज लोगों से दूर होता जा रहा है। कहने का अर्थ कि बिदेसिया नाटक की लोकप्रियता कम होती जा रही है। इसकी लोकप्रियता में कमी आने का सबसे बड़ा कारण यह रहा कि भिखारी ठाकुर की मृत्यु के बाद उनकी मंडली के अन्य सदस्यों में न तो उतनी प्रतिभा थी और न उत्साह वे नाटक को समीचीन बनाए रखते। समय के साथ बिदेसिया में आवश्यक परिवर्तन नहीं किया जा सका। जब तक भिखारी ठाकुर जिंदा थे, अफने नाटकों में आवश्यक परिवर्तन कर उसे प्रासंगिक बनाए ऱखते थे, अपने नाटकों को सुधारने, संवारने का काम करते रहे थे। उनके नहीं रहने के बाद सार्थक परिवर्तन की यह प्रक्रिया बंद हो गई, लिहाजा दूसरे जगहों की बात कौन करे, स्वयं भोजपुरी प्रदेशों में भी बिदेसिया की न तो पहले वाली ठाठ बची और न मांग। ले-देकर शादी-व्याह के अवसरों पर नाच तक सिमट कर रह गया है बिदेसिया।

बहरहाल, पिछले कतिपय वर्षों में रंगकर्मियों का ध्यान बिदेसिया शैली की तरफ गया आकृष्ट हुआ है। सतीश आनंद और संजय उपाध्याय जैसे रंगकर्मी बहु उत्साह से इस शैली के विकास और प्रचार के लिए काम कर रहे हैं। सतीश आनंद ने बिदेसिया शैली पर आधारित अमली नाटक का मंचन न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी किया और हर जगह वाहवाही लूटी। संजय उपाध्याय तो मूल बिदेसिया का ही मंचन करते हैं। यह अलग बात है कि प्रयोग के नाम पर वह कई बार बिदेसिया की भोंडी प्रस्तुती करते हैं लेकिन इसे बाजारवाद के दबाव के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। सच तो यह है कि हाल के वर्षों में बिहार की लगभग सभी नाटक-मंडलियों ने बिदेसिया या उसकी शैली पर आधारित नाटक का मंचन किया है।

हिंदुस्तान के सारे रंगकर्मी मुक्त कंठ से बिदेसिया की प्रशंसा कर चुके हैं। महापंडित राहुल सांकृत्यायन बिदेसिया नाटक एक बड़े प्रशंसको में थे। बिदेसिया नाटक को देखकर ही उन्होंने भिखारी ठाकुर को एक अनगढ़ हीरा कहा था। वह मानते थे कि भिखारी ठाकुर की कृतियों का अगर सही आकलन नहीं हो सका तो इसके लिए पढ़ुआ (पढ़े-लिखे) लोग ही जिम्मेदार हैं। यदि भिखारी ठाकुर को पढ़े-लिखों का सहयोग मिला होता तो उनकी प्रतिभा में और भी निखार आता। भोजपुरी भाषा में बिदेसिया नाम की एक फिल्म भी बन चुकी है। यह अलग बात है कि फिल्म का कथानक नाटक से बिलकुल अलग है। यदि फिल्म में भिखारी ठाकुर की उपस्थिति औऱ उनके द्वारा गाए गए एक गीत को छोड़ दिया जाए तो फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जिसे बिदेसिया नाटक से जोड़कर देखा जाए। इसके बावजूद इतना तो मानना ही पड़ेगा कि फिल्म का निर्माण नाटक की लोकप्रियता से ही उत्प्रेरित था औऱ उसी लोकप्रियता को भुनाने का प्रयास भी था।

संक्षेप में कहें तो बिदेसिया शब्द नहीं, यथार्थ है, एक ऐसा यथार्थ जिसमें माटी की गंध है, फूलों की महक है और जीवन की आलोचना है। श्रृंगार औऱ वियोग की चादर पर करुणा का रंग बिखेरने तथा सामूहिक त्रासदी की कलात्मक अभिव्यक्ति का नाम है बिदेसिया।

सोमवार, 7 मार्च 2011

फेसबुक पर सर्वहारा कवि शील की कविता और सभ्यता


           शील जी हिन्दी की प्रगतिशील काव्यधारा के अग्रणी कतार के लेखक हैं। उनके कर्म,विचार,सृजन और आंदोलन में फांक नहीं है। ऐसा एकीकृत समग्र व्यक्तित्व हिन्दी में विरल घटना है। हिन्दी के अनेक प्रगतिशील लेखकों जैसे नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल,शमशेर ,त्रिलोचन आदि में आजादी के बाद के दौर में अनेक किस्म के विचलन देखे गए। कर्म,विचार और सृजन में फांक भी देखी गयी,लेकिन शील जी इस व्याधि से मुक्त अविचलभाव से मार्क्सवाद,कम्युनिस्ट आंदोलन,प्रगतिशील-जनवादी साहित्य की एकनिष्ठ भाव से सेवा करते रहते रहे।
    शील जी का व्यक्तित्व सामाजिक आग्रहों और गरीबों की मुक्ति के संकल्पों से बना था। उनके व्यक्तित्व की अनेक खूबियों को मुझे करीब से देखने का भी सौभाग्य मिला था। शील जी ने मजदूरों-किसानों और प्रतिशील साहित्य के प्रति कमिटमेंट को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने संकलन ' लावा और फूल' (1967) के समर्पण में लिखा है, "देश की  उन असंख्य बलिदानी माताओं की तरह,माँ तूने भी अपने लाल को देश की स्वतंत्रता के लिए न्यौछाबर कर दिया था। 1930 में में गान्धी बाबा की पुकार पर में जेल गया ।यह अंग्रेज परस्त जमींदार को अच्छा न लगा। लेकिन मां ! तुझे पुत्र विछोह की असीम पीड़ा के साथ गर्व भी था कि तेरा लाल देश की स्वतंत्रता के लिए जेल गया है। यह बात भी,अंगरेज परस्त जमींदार को अच्छी न लगी। मेरे छूटने के चौबीस घंटे पूर्व उसने यह अफ़वाह फैलाकर ( कि तेरा लाल,मन्नू जेल के दंगे में गोली से मार दिया गया) तेरे प्राण ले लिए। मां,तेरी पीड़ा,जमींदार का जुल्म,और मेरी ममता-सब कुछ मेरे देखते-देखते उनकी आँखों से वह निकली। और वे भी तेरी ही तरह सदा के लिए मुझसे दूर हो गए।माँ बता कि तेरे और पिता जी के सिवा अपना यह कृतित्व,किसे समर्पित करूं,यह तो तुम दोनों की आहुति का ही परिणाम है। और तुम्हें ही समर्पित है।"
    शीलजी का अपनी माँ की कुर्बानियों और पीड़ाओं को काव्य संकलन के समर्पण वक्तव्य में इस तरह याद करना अपने आपमें विरल बात है। हिन्दी के लेखकों को माँ की पीड़ा और कुर्बानियों का ध्यान कम आता है,सार्वजनिक तौर पर उसका उल्लेख वे कभी नहीं करते। इस नजरिए से देखें तो 1967 में यह बात जो शीलजी ने लिखी,नयी बात थी और इससे कविमन की पीड़ा,मानवीयता,रिश्तों के प्रति कृतज्ञता,वफादारी आदि का बोध भी व्यक्त होता है।
    हिन्दी की अकादमिक समीक्षा की आयरनी है कि वह जीवन के ज्वलंत सवालों से कन्नी काटती रही है। यह बात शीलजी की उपेक्षा के संदर्भ में भी कही जा सकती है। लेखक के लिए किस तरह की पीड़ा रही है,इसका अंदाजा आज के मीडिया युग में लगाना संभव नहीं है।  अपने काव्य संकलन ' लावा और फूल' के प्रकाशन के लिए लेखक को मुहिम चलानी पड़ा,कोई छापने के लिए तैयार नहीं था।
     उल्लेखनीय है शील जी के प्रथम काव्यसंकलन 'अंगडाई' (1944)के साथ एक प्रकाशक ने बड़ी बुरी की, उसने उस संकलन के कवर पर एक नंगी औरत का फोटो छाप दिया था। इससे भी बुरी बात यह हुई कि इस संकलन को किसी भी प्रगतिशील समीक्षक ने नोटिस ही नहीं लिया। वे उन दिनों पंत की ग्राम्या और अंचल की लाल चूनर को लेकर व्यस्त थे।
   'लावा और फूल'  की भूमिका में शील जी ने एक बड़ी महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान खींचा है। लिखा है, " अखबारों का प्रभाव एक अध्ययनशील विद्यार्थी को प्रभावित कर सकता है,उकसा सकता है किन्तु उसमें कर्म का उपक्रम पैदा नहीं कर सकता। उसकी सबसे बड़ी योग्यता ,उसकी अनुभूति की अपरोक्षता और तीव्रता में होती है।जो केवल पुस्तकीज्ञान से नहीं पैदा हो सकती। रोटी और प्रेम के राग बिना साक्षात के नहीं गाए जाते। जिन्होंने जीविकोपार्जन की मुसीबतों,अपमानों का अनुभव नहीं किया,भोक्तावर्ग में बने रहकर दूर-दूर से अवलोकन मात्र किया है। वे शोषितमात्र पर दया ही कर सकते हैं:-उसकी आवाज में बोल नहीं सकते।"
    शील जी ने सवाल किया है कि "नयी कविता में नए यथार्थ की स्वीकृति है,पर यह नया यथार्थ किस सभ्यता का यथार्थ है ? नयी कविता का कवि किस सभ्यता की सेवा कर रहा है ? नए कवि की नई कविता में किस सभ्यता के चरण पड़ रहे हैं ? क्योंकि सभ्यता,मनुष्य के समाज के सदस्य होने के ज्ञान को कर्म में परणित करती है। सभ्यता परिष्कृत सामाजिक चेतना के लिए उन्मेषपूर्ण अवस्थाएं जन्मती है। वह सभ्यता अधिक समय तक नहीं बदलती जो बदली हुई दुनिया के लिए कोई नयी वस्तु देने में असमर्थ होती है।''
         शील जी ने यह भी लिखा '' पूँजीवादी सभ्यता की प्रजननशक्ति समाप्त हो चुकी है। पूँजीवादी सभ्यता पितृसत्तात्मक सभ्यता है। पूँजीवादी सभ्यता में श्रम और नारी ,दोनों ही अनुपस्थित होकर ईश्वर के अधीन रखे जाते हैं। हमारे देश में तो पितृसत्ता के अभिशापस्वरूप ,कन्या-दान कर दी जाती है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण की सभ्यता, श्रम और नारी के मुक्ति की सभ्यता -समाजवादी सभ्यता है,यह न मातृ सत्तात्मक है,पितृसत्तात्मक।"
यहां शील जी की वे काव्यपंक्तियां प्रस्तुत हैं जो मैंने अपने फेसबुक वॉल पर दी हैं। इन काव्यअंशों में जीवन के यथार्थ को कवि ने समाजवादी नजरिए से रूपायित किया है।   
 शील जी ने 1964 में लिखा था- "समाजवाद की घोषणा और मेरा गाँव ! मुझे हंसी आती है/मैं अनुभव करता हूँ/मेरे देश का कांग्रेसी लोकतंत्र /मेरे गांव की तरह अनाथ है/"

शील की एक कविता है 'तुम्हारा न्याय' उसका अंश देखें- "तुम्हारा न्याय/बेलगाम तंग कसे घोड़े की तरह/ दुलत्ती झा़ड़ रहा है/तुम्हारे सभासदःअपराधों की अपच से मोटे हो गए हैं/ भेडिए बतखों के साथ बलात्कार करते हैं /सामाजिक प्रश्नों के हल तुम्हें विघटन में दिखाई देते हैं/ गॉव केचुए काटते रहे/गलियाँ प्रस्तावों की सुगंध लेती रहें/भूमि प्रबन्धक समिति अंगूठों की स्याही देखते रहे/और उत्पीड़न की देह-तुम्हें फूल फल देती रहे।"

भ्रष्टाचार के खिलाफ 30अगस्त 1965 को शील जी ने एक कविता लिखी थी जो आज भी प्रासंगिक है,लिखा- "मर्ज़ लाइलाज है/दाँत न दिखाओ/सोख्ते की मलाई खाओ ! सन्तति निग्रह रस की मालिश करो !बहादुर बनो !कोई क्या कर सकता है !भ्रष्टाचार जिंदाबाद !सोख्ते की सरकार जिंदाबाद।"

शील की कविता एकजमाने में इप्टा की शान थी और उनकी लिखी रचनाएं मुम्बई के पृथ्वी थियेटर में गूंजती थीं। लिखा- "आंधियां उठ रहीं भूख की आग की/फिर क़हर के फरिश्तों में है गूफ्तगू/ काम देगी न फसलों की जल्वागिरी/हम ख़यालो मनोरथ के हांक दो ! बदचलन मुंसिफ़ों के उठादो चलन !हाँकदो- हाँकदो चौमुखी हाँक दो !"

शील जी ने लिखा- "हमें मिटाने की हलचल है/मन्दिर-मसजिद के भीतर/नागपाश लेकर बैठे हैं/युग के जड़ शोषक ईश्वर/"

शील जी नागार्जुन-केदारनाथ अग्रवाल-त्रिलोचन के समकालीन थे,लिखा- "ये शब्दों के बीज/तुम्हारी गर्भवती आस्था की तह में/फूट पड़ेंगे/अंकुर देंगे/आलोडित होने दो अपने मन की पीड़ा/और सपचने दो जठरानल/संयम के संराधक तुम ! /शिव की साध पचाकर देखो ! / ये शब्दों के बीज तुम्हारे पुत्र बनेंगे/"


शील जी ने लिखा- साथियो ! "अंधराष्ट्रवाद /पूंजीपतियों का रिसाला है/ जो खोखली राष्ट्रीयताओं के लिए/कुर्बानियों की चादर ओढ़े/पिला रहा है तुम्हें अफ़यून के घूंट/"

प्रगतिशील कवि शील ने लिखा- "साथियो ईश्वर और नफ़रत,इन्हीं पूजीपतियों की विरासत है,साथियो पूंजीपतियों का उसूल,घृणा का गुब्बारा है,जो मशीन पै ढलता है।"
प्रगतिशील कवि शील ने लिखा- "साथियो होश में हो ! वक्त आराम का नहीं,कलम की नोंक से अवाम के फफोलों को कुरेदो ?लहू गर्म करो ?दिलों के दर्द में सियासत की हरारत भर दो ?अदब को सरमाया की गर्दिश से निकालो? "

एक कविता अंश देखें - "कागज के पुल से-फार्मूला लादे/योजनाओं के गधे जा रहे हैं/ आप मुस्करा रहे हैं/जैसे आप,नसबंदी से बच जाएंगे/और आपकी पत्नी लूप लगाने से/"

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

पूंजीवाद का उद्भव - इलेन मिक्सिन्स वुड

प्रस्तावना
बीसवीं सदी के आठवें दशक के अंतिम वर्षों में और नौवें दशक के दौरान कम्युनिज्म ढेर हो गया। इससे ऐसा लगा कि लंबे समय से चलते आए उन अनेक लोगों के विश्वासों की पुष्टि हो गई कि मानवता की स्वाभाविक स्थिति पूंजीवाद है और प्रकृति के नियमों तथा मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों के अनुरूप भी यही है। साथ-साथ उनका यह भी मानना था कि इन प्राकृतिक नियमों तथा प्रवृत्तियों से किसी भी प्रकार के विचलन से दुखदाई परिणाम ही निकलेंगे। 
लेकिन आज साम्यवाद के ढह जाने के बाद सामने आए पूंजीवादी विजयवाद पर प्रश्नचिह्न लगाने के अनेक कारण हैं। जिस समय मैं यह प्रस्तावना लिख रही हूं मेरा सुबह का अखबार 'आधुनिक पूंजीवादी युग का कदाचित सबसे गंभीर ठहराव' के बारे में सूचना और चेतावनी देता है कि दुनिया में उसी स्तर की या विस्तार में उससे भी बड़ी मंदी आ सकती है जितनी कि पिछली सदी के तीसरे दशक में आई थी। दुनिया अब भी एशियाई संकट की लपेट में है और इसमें कोई संदेह नहीं कि इसके अंत से हम अब भी बहूत दूर हैं और विश्व अर्थव्यवस्था पर इसका पूरा-पूरा प्रभाव तो आने वाले समय में ही दिखाई पड़ेगा। सोवियत संघ का अंत पूंजीवादी विजय की सबसे अहंकारी उपलब्धि रही है। इससे रूसी अर्थव्यवस्था तो लगभग पूरी तरह चौपट हो ही चुकी है पर इसके तरह-तरह के प्रभाव विकसित पूंजीवाद के संपूर्ण जगत पर भी पड़े हैं। पश्चिमी देशों के समाचार जगत के कुछ संपादकीयों का मत है कि इनमें से कुछ प्रभाव इतने नुकसानदेह हैं जितने पूंजीवाद पर सोवियत संघ ने कभी नहीं डाले थे। 
अतीत में पूंजीवाद बार-बार आने वाले संकटों से सदा उबरता रहा है लेकिन यह कभी भी नए और अधिक बुरे संकट की आधारशिला स्थापित हुए बगैर नहीं हुआ। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह व्यवस्था भग्नावशेषों से फिर उभर आएगी। लेकिन नुकसान को सीमित करने या उसकी भरपाई करने के लिए चाहे जो उपाय किए जाएं यह निश्चित है कि इसके इलाज से भी करोड़ों लोगों को मुसीबतें उठानी पडेंग़ी जितने लोगों को बीमारियों से उठानी पड़ी हैं। 
पूंजीवादी व्यवस्था का उत्तरोत्तर स्पष्ट होती जा रही कमजोरियां और इसके अंतर्विरोध अंतत: इसके कुछ अधिक अंध समर्थकों तक को यह विश्वास दिला देंगे कि इसके विकल्प की तलाश करना आवश्यक है। लेकिन यह विश्वास खास तौर पर पश्चिमी संस्कृति में बहुत गहराई से पैठा है कि इसका न कोई विकल्प है और न ही हो सकता है। इस विश्वास का समर्थन न केवल पूंजीवादी विचारधारा की अधिक नंगी अभिव्यक्तियों द्वारा बल्कि हमारे इतिहास की कुछ सर्वाधिक संजोई और निर्विवाद मान्यताओं द्वारा भी किया जाता है। मानो कि पूंजीवाद ही इतिहास के हर आंदोलन की नियति रहा है और, इससे भी अधिक प्रारंभ से ही इतिहास का संचालन पूंजीवादी 'गति के नियमों' से होता रहा है। 

प्रश्न की शुरुआत 
पूंजीवाद वह व्यवस्था है जिसमें जीवन की सबसे मूल आवश्यकताओं तक हर चीज और सेवा का उत्पादन लाभदायी विनिमय के लिए किया जाता है और जिसमें मानव श्रम शक्ति तक बाजार में बेचने का एक माल होती है, और जहां चूंकि आर्थिक गतिविधियों में संलग्न तमाम अभिनेता बाजार पर निर्भर होते हैं अत: प्रतिस्पर्धा और अधिकतम मुनाफा कमाने की आवश्यकताएं जीवन के आधारभूत नियम बन जाती हैं। इन नियमों के कारण यह वह व्यवस्था है जिसका संचालन उत्पादन की शक्तियों का अपूर्व विकास करने तथा तकनीकी उपायों से श्रम की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए किया जाता है। सर्वोपरि तो यह वह व्यवस्था है जिसमें समाज का ज्यादातर काम संपत्तिहीन श्रमिकों द्वारा किया जाता है। ये श्रमिक जीवन के साधन प्राप्त करने के लिए अपनी श्रम शक्ति को वेतन के बदले बेचने को विवश होते हैं। समाज की आवश्यकताओं और इच्छाओं की पूर्ति करने की प्रक्रिया में श्रमिक उनके लिए मुनाफे भी पैदा करते हैं जो उनकी श्रम शक्ति को खरीदते हैं। वास्तविकता यह है कि चीजों और सेवाओं का उत्पादन पूंजी और पूंजीवादी मुनाफे के अधीन है। या यों कहें कि पूंजीवादी व्यवस्था का मूल लक्ष्य पूंजी का उत्पादन और उसका स्वयं विस्तार है। 
मानव मात्र की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने की यह विशिष्ट पध्दति भौतिक जीवन और सामाजिक पुनरुत्पादन को संगठित करने की तमाम पूर्ववर्ती पध्दतियों से बहुत भिन्न है और यह धरती पर मानव जीवन के संपूर्ण अस्तित्व के एक बहुत छोटे से हिस्से ही अस्तित्व में है। जो लोग बलपूर्वक यह कहते हैं कि इस व्यवस्था की जड़ें मानव प्रकृति में स्थित हैं वे भी यह दावा नहीं करते कि इसका अस्तित्व प्रारंभिक आधुनिक काल से पहले (और वह भी केवल पश्चिमी यूरोप में) भी था। वे इसके संकेत पहले के कालों में देख सकते हैं या इसकी शुरुआतों को मध्य कालों में पतनशील सामंतवाद पर मंडराते खतरे में तलाश कर सकते हैं हालांकि उस समय तक यह सामंती प्रतिबंधों से नियंत्रित था, अथवा यह कह सकते हैं कि इसका प्रारंभ व्यापार के विस्तार या खोजी समुद्र यात्राओं, खास तौर पर पंद्रहवीं सदी के अंत में कोलंबस के समुद्री अभियान के साथ हुआ। लेकिन ईमानदारी के साथ यह बात कुछ ही लोग कहेंगे कि इसका अस्तित्व सोलहवीं या सत्रहवीं सदी से पहले भी था, और कुछ तो कहेंगे कि यह अठारहवीं सदी में या यहां तक कि अपने औद्योगिक रूप में परिपक्व होने के बाद उन्नीसवीं सदी में तब अस्तित्व में आया था। फिर भी यह व्यवस्था अस्तित्व में कैसे आई इसके ऐतिहासिक कारणों को विशिष्ट प्रकार से सदा उपस्थिति प्रवृत्तियों की स्वाभाविक परिणति के रूप में प्रस्तुत किया गया। चूंकि इतिहासकारों ने प्रारंभ पूंजीवाद के उदय की व्याख्या करने के साथ किया अत: ऐसी कोई व्याख्या शायद ही मिल पाए जिसने शुरुआत ही उस चीज से न की हो जिसकी व्याख्या की जानी थी। लगभग बिना किसी अपवाद के पूंजीवाद की उत्पत्ति के वृत्तांत मूलतया एक ही धुरी पर घूमते रहे हैं। इसके पैदा होने की व्याख्या करने के लिए वे इसके अस्तित्व को पहले से मानते रहे हैं। अधिकतम मुनाफे की ओर पूंजीवाद के विशिष्ट अभियान की व्याख्या करने के लिए उन्होंने यह कल्पना कर ली थी कि अधिकतम मुनाफे कमाने की चेतना पहले से ही उपस्थित थी। और तकनीकी उपायों से श्रम उत्पादकता को बढ़ाने के पूंजीवादी रुझान की व्याख्या करने के लिए उन्होंने पहले से मान लिया था कि श्रम की उत्पादकता में प्रौद्योगिकी सुधार की दिशा में प्रगति लगातार होती रही है जो लगभग प्राकृतिक है। चीजों को पहले से मान कर चलने वाली इन व्याख्याओं का जन्म क्लासिकीय राजनीतिक अर्थशास्त्र और प्रगति की प्रबोधक अवधारणाओं से हुआ। इन दोनों ने मिलकर ऐतिहासिक विकास का जो वर्णन किया उसमें पूंजीवाद की उत्पत्ति और उसके विकास से उसकी परिपक्वता तक के बीज मानवीय चेतना की सबसे प्राचीन अभिव्यक्ति के तौर पर पहले से मौजूद थे। वे उन प्रौद्योगिक विकास में भी थे जिसका प्रारंभ आदिमानव द्वारा एक उपकरण गढ़ने के साथ हुआ था और वे आदान-प्रदान की उन गतिविधियों में भी मौजूद थे जिनको मानव मात्र अनादि काल से करता रहा है। वे स्वीकार करते हैं कि 'वाणिज्यिक समाज' या पूंजीवाद की दिशा में इतिहास की यह यात्रा लंबी और कठिन थी और इसके रास्ते में अनेक अवरोध थे। फिर भी इसकी प्रगति स्वाभाविक और अपरिहार्य थी। 'पूंजीवाद के उदय' को बताने के लिए यह कहना ही काफी है कि इसके आगे बढ़ने के दौरान कितने अवरोधों को कैसे हटाया गया है, जो कभी-कभी क्रमश: हुआ है और कभी-कभी क्रांतिकारी हिंसा के साथ अचानक। 
पूंजीवाद और इसकी उत्पत्ति के जो वर्णन किए गए हैं उनमें से अधिकांश में तो वास्तव में इसकी उत्पत्ति की चर्चा ही नहीं है। पूंजीवाद कहीं न कहीं हमेशा विद्यमान रहा प्रतीत होता है और जरूरत केवल इसे इसकी बेड़ियों से मुक्त करने की रही है जैसे कि सामंतवाद से, ताकि यह बढ़ सके और परिपक्व हो सके। ये बेड़ियां विशेष तौर पर राजनीतिक रही हैं अर्थात स्वामियों की परजीवी शक्तियां या निरकुंशतावादी राज्य के प्रतिबंध। कभी-कभी वे सांस्कृतिक और वैचारिक थीं शायद दोषपूर्ण धर्म के कारण। इन बंधनों ने आर्थिक अभिनेताओं की स्वतंत्र गतिविधियों को सीमित और आर्थिक तर्कणा की मुक्त अभिव्यक्ति को अवरुध्द कर दिया था। इन प्रतिपादनों में 'आर्थिक' का अर्थ बाजारों में आदान-प्रदान है, और यहां हम इस पूर्वानुमान को पकड़ सकते हैं कि पूंजीवाद के बीज विनिमय के सबसे सरल कार्यों में, व्यापार या बाजार की गतिविधियों में मौजूद हैं। यह पूर्वानुमान विशिष्ट तौर पर उन दूसरे पूर्व मान्यताओं से जुड़ा है कि इतिहास प्रौद्योगिक विकास की लगभग प्राकृतिक प्रक्रिया रही है। अत: जब और जहां फैलते हुए बाजार और प्रौद्योगिक विकास एक उचित स्तर तक पहुंच जाते हैं तो किसी न किसी प्रकार से पूंजीवाद कमोबेश स्वाभाविक रूप से प्रकट हो जाता है। अनेक मार्क्सवादी व्याख्याएं मूलतया एक सी हैं जिनके साथ बेड़ियों को तोड़ने में मदद करने को बुर्जुआ क्रांतियां जुड़ जाती हैं। 
इन व्याख्याओं का उद्देश्य गैर-पूंजीवादी और पूंजीवादी समाजों के बीच निरंतरता पर जोर देना और पूंजीवाद की विशिष्टता से इनकार करना अथवा उसे छिपाना है। विनिमय या लेन-देन कमोबेश सदा से होता रहा है और ऐसा लगता है कि पूंजीवादी बाजार बस उसी का बढ़ा हुआ रूप है। इस प्रकार के तर्क के अनुसार उद्योगीकरण मानव जाति के सबसे मूल रुझानों का अनिवार्य परिणाम है। कारण यह है कि उत्पादन की शक्तियों में लगातार आमूल परिवर्तन करना पूंजीवाद की विशिष्टता और अपूर्व आवश्यकता है और ये सर्वजनीन इतिहास पार की एक विस्तार और त्वरण मात्र हैं। और इसलिए पूंजीवाद की वंश परंपरा स्वाभाविक तौर पर बेबीलोन या रोम के व्यवसायी से शुरू होकर मध्यकालीन नगरवासी से गुजरती हुई प्रारंभिक आधुनिक बुर्जुआ और अंतत: औद्योगिक पूंजीपति तक पहुंचती है। 
इस वृत्तांत के कुछ मार्क्सवादी रूपांतरों में यही तर्क है हालांकि, अधिक हाल के रूपांतरों में वर्णन अधिकतर शहरों से गांवों की ओर मुड़ जाता है और व्यापारियों का स्थान गांवों के माल उत्पादक, छोटे या 'मंझोले' किसान ले लेते हैं जो साफ तौर पर पूर्ण रूप से विकसित पूंजीपतियों के रूप में फूलने फलने की राह देख रहे होते हैं। इस प्रकार के वृत्तांत में सामंतवाद के बंधनों से मुक्त हुआ छोटा माल उत्पादन कमोबेश स्वाभाविक तौर पर पूंजीवाद में विकास कर जाता है, और मौका मिलते ही छोटा माल उत्पादन पूंजीवादी राजमार्ग पर निकल पड़ता है। 
इतिहास के इन परंपरागत वृत्तांतों में मानव प्रकृति के बारे में और यदि अवसर मिलता है तो मनुष्यों का व्यवहार क्या होगा के संबंध में कुछ स्पष्ट अथवा अस्पष्ट कल्पनाएं हैं। कहानी यह है कि लेन-देन की गतिविधियों के द्वारा वे हमेशा अधिकतम मुनाफे कमाने के अवसर का लाभ उठाएंगे, और अपने प्राकृतिक रुझान को साकार करने के लिए वे श्रम की उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से हमेशा श्रम के संगठन तथा उपकरणों को सुधारने के मार्ग ढूढ़ लेंगे। 
अवसर या अनिवार्यता?
इस प्रकार क्लासिकीय माडल के अनुसार जहां कहीं, जब कभी संभव हो अवसर का लाभ उठाना चाहिए। पूंजीवादी व्यवस्था की परंपरागत समझ के लिए अवसर की यह अवधारणा हमारी आज की रोजमर्रा की भाषा में भी, निर्णायक महत्व रखती है। जरा विचार करिए कि पूंजीवाद के हृदय बाजार में बसे इस शब्द को सामान्य तौर पर कैसे इस्तेमाल किया जाता है। शब्दकोश में 'बाजार' की लगभग प्रत्येक परिभाषा किसी अवसर का अर्थ रखती है। अर्थात एक ठोस स्थल या अवसर के रूप में बाजार वह स्थान है जहां बेचने और खरीदने के मौके मौजूद होते हैं। सारांश यह है कि बाजार विक्रय की संभावना है। चीजों को 'बाजार मिलता है' और हम कहते हैं कि किसी सेवा या माल के लिए बाजार तब है जब इसके लिए मांग है जिसका अर्थ है कि इसे बेचा जा सकता है और बेचा जाएगा। जो बेचना चाहते हैं उनके लिए बाजार 'खुले' हैं। बाजार 'खरीदने और बेचने से जुड़ी परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करता है (दि कानसाइज आक्सफोर्ड डिक्शनरी)। बाजार का आशय प्रस्तुत करना और चुनाव करना है। तब फिर बाजार की ताकतें क्या हैं? क्या शक्ति का अर्थ दबाव नहीं? पूंजीवादी विचारधारा में बाजार का आशय बाध्यता से नहीं स्वतंत्रता से है। साथ ही इस स्वतंत्रता को कुछ कार्यप्रणालियों द्वारा सुनिश्चित किया जाता है। और यह एक ऐसी तर्कसंगत अर्थव्यवस्था को सुनिश्चित करती है जिसमें जिन सेवाओं और मालों को लोग स्वतंत्र रूप से चुनेंगे, उनको प्रस्तुत करती हुई आपूर्ति मांग से मेल खाती है। ये कार्यप्रणालियां बाजार की अवैयक्तिक शक्तियां हैं और अगर वे किसी तरह से बाध्य करने वाली हैं तो केवल इन अर्थों में कि वे आर्थिक अभिनेताओं को 'तर्कसंगत ढंग से' व्यवहार करने को विवश करती हैं ताकि चुनाव और अवसर का अधिकतम उपयोग हो सके। इसका अर्थ है कि पूंजीवाद 'बाजारी समाज का' चरम अवसर और चुनाव की सर्वश्रेष्ठ परिस्थिति है। ज्यादा वस्तुएं और सेवाएं प्रस्तुत हैं, ज्यादा लोग इनको बेचने और मुनाफा कमाने के लिए स्वतंत्र हैं और ज्यादा लोग स्वतंत्र हैं उनके बीच से चुनने तथा उनको खरीदने के लिए। तब फिर इस विचार में दोष क्या है? समाजवादी संभवतया यह कहेगा कि प्रमुख तत्व जो इसमें नहीं हैं वे हैं श्रम शक्ति का माल बनना और वर्ग शोषण। चलिए मान लेते हैं। लेकिन बाजार की समाजवादी व्याख्या में भी हमेशा यह स्पष्ट नहीं होता कि पूंजीवादी बाजार की सबसे अलग और प्रधान विशिष्टता अवसर या चुनाव नहीं बल्कि उनके विपरीत बाध्यता है। यह दो अर्थों में है। एक कि पूंजीवाद में भौतिक जीवन और सामाजिक पुनरुत्पादन सार्वदेशिक तौर पर बाजार की मध्यस्थता होती है। इसके कारण जीवन के साधनों को प्राप्त करने के लिए तमाम लोग किसी न किसी रूप में बाजारी संबंध बनाते हैं, और दूसरे पूंजीवादी बाजार के आदेश और प्रतिस्पर्धा, संचयन, अधिकतम मुनाफे और श्रम उत्पादकता में वृध्दि की इसकी अनिवार्यताएं सारे आर्थिक लेन देन को ही नहीं बल्कि आम तौर पर सारे सामाजिक संबंधों को भी नियंत्रित करती हैं। चूंकि मनुष्यों के बीच के संबंधों में माल विनिमय की प्रक्रिया मध्यस्थ का काम करती है अत: लोगों के बीच के सामाजिक संबंध या वस्तुओं के बीच के संबंध प्रतीत होते हैं जिसे मार्क्स ने अपनी प्रसिध्द सूक्ति में 'माल का जादू' कहा था। 
यहां कुछ पाठक आपत्ति कर सकते हैं कि यह बात तो हर समाजवादी या कम से कम कम्युनिस्ट तो जानता ही है। लेकिन पूंजीवाद के मार्क्सवादी इतिहासों तक में पूंजीवाद की विशिष्टताएं वैसे ही खो जाती हैं जैसे कि पूंजीवादी बाजार के क्रियाकलाप जो अवसर के बजाए अनिवार्यता के रूप में होते हैं। एक विशिष्ट सामाजिक ढांचे के तौर पर पूंजीवाद बाजार तब खो जाता है जब पूर्व पूंजीवादी समाजों से पूंजीवादी समाजों में संक्रमण को न्यूनाधिक स्वाभाविक अवसर पहले से मौजूद सामाजिक ढांचों के आड़े-तिरछे, विस्तारित अथवा परिपक्व, संघटना के रूप में, गुणात्मक के स्थान पर परिमाणात्मक रूपांतरण के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है।
यह छोटी सी पुस्तक पूंजीवाद के उदय और उन ऐतिहासिक तथा सैध्दांतिक विवादों के बारे में है जिसको इसने पैदा किया है। पहले भाग में सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक वृत्तांतों और उनके चारों ओर की बहसों पर नजर डाली गई है। इसमें हम विशेष तौर पर इसके अनेक विभेदों के साथ पूंजीवादी विकास के सबसे आम, तथाकथित वाणिज्यीकरण माडल पर, और इसको मिलने वाली कुछ मुख्य चुनौतियों पर विचार करेंगे। भाग दो एक वैकल्पिक इतिहास की रूपरेखा बनाता है जिसमें मुझे आशा है कि आम सवाल पैदा करने वाली व्याख्याओं के कुछ सबसे आम फंदे नहीं होंगे। यह रूपरेखा भाग एक में चर्चित पूंजीवाद के उन इतिहासों की हृदय से ऋणी है जिन्होंने इतिहास की कुछ प्रचलित रूढ़ियों पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। सर्वोपरि तो मेरा इरादा पूंजीवाद के प्राकृतीकरण को चुनौती देना और उन विशेष उपायों को रेखांकित करना है जिनमें यह एक ऐतिहासिक रूप से विशिष्ट सामाजिक ढांचे का और पूर्ववर्ती सामाजिक ढांचों से अलगाव का प्रतिनिधित्व करता है। इस कसरत के उद्देश्य बौध्दिक और राजनीतिक दोनों हैं। पूंजीवाद का प्राकृतीकरण अतीत के बारे में हमारी समझ को सीमित करता है क्योंकि यह पूंजीवाद की विशिष्टता को तथा इसको जन्म देने वाली लंबी और दु:खदायी प्रक्रियाओं को अस्वीकार करता है। साथ ही यह भविष्य के प्रति हमारी आशाओं और आकांक्षाओं को भी सीमित करता है क्योंकि यदि पूंजीवाद इतिहास की प्राकृतिक पराकाष्ठा है तो इसको पार करने की कल्पना तक नहीं की जा सकती। पूंजीवाद के उदय का प्रश्न रहस्यपूर्ण लग सकता है पर यह हमारी संस्कृति में गहरी जड़ें जमाए धारणाओं के, तथाकथित मुक्त बाजार और मानवता को इसके लाभों से संबंधित व्यापक और खतरनाक भ्रमों के मूल में जाता है। पूंजीवाद के भावी विकल्पों के बारे में विचार करते समय हमसे इसके अतीत के विकल्पों को खोजने की अपेक्षा की जाती है। 
( साभार,    पूंजीवाद का उद्भव ,इलेन मिक्सिन्स वुड ,अनुवादक नरेंद्रकुमार तोमर,ग्रंथ शिल्पी (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड, बी-7, सरस्वती कामप्लेक्स, सुभाष चौक, लक्ष्मी नगर, दिल्ली 110 092 )













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