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सोमवार, 15 सितंबर 2014

बर्बरता के प्रतिवाद में


भारत में सभ्यता विमर्श है लेकिन हमने कभी यह ठहरकर नहीं सोचा कि सभ्यता के पर्दे के पीछे बर्बरता के किस तरह के रुप समाज में विकसित हो रहे हैं । हम सभ्यता और धर्म की ऊँची मीनारों पर सवार हैं लेकिन  बर्बरता की भी ऊँची मीनारों का निर्माण किया है । हमने बर्बरता के लक्षणों की तफ़सील के साथ जाँच- पड़ताल नहीं की । 
     आज़ाद भारत की नींव भारत -विभाजन और तेलंगाना विद्रोह के दमन से पैदा हुई बर्बरता पर रखी गयी है । यह संयोग है कि भारत विभाजनजनित बर्बरता की तो कभी -कभार चर्चा सुनने को मिल जाती है लेकिन तेलंगाना के किसान आंदोलन के दमन और बर्बरता के रुपों की कभी चर्चा ही नहीं होती, यहाँ तक कि कम्युनिस्ट थिंकरों के यहाँ भी उसका ज़िक्र नहीं मिलता ।
    भारत में लोकतंत्र का कम और बर्बरता का ज़्यादा विकास हुआ है । बर्बरता की जब भी बातें होती हैं तो हम वफ़ादारी के आधार पर पक्ष- विपक्ष तय करने लगते हैं या फिर राजनीतिक - सामाजिक पूर्वाग्रहों के आधार पर ।
   भारत में दो तरह की बर्बरता है , पहली बर्बरता घर के अंदर है ,दूसरी बर्बरता घर के बाहर समाज के विभिन्न स्तरों पर घट रही है। संक्षेप में , बर्बरता के दो बड़े एजेंट हैं परिवार और पुलिस ।
  बर्बरता के पारिवारिक तत्वों को हमने सामाजिक तौर पर चुनौती नहीं दी । लंबे समय तक पारिवारिक बर्बरता को हम छिपाते रहे। सन् 1970-71 के बाद से पारिवारिक बर्बरता के रुपों को धीरे धीरे हमने सार्वजनिक करना आरंभ किया लेकिन इसके बारे में कोई समग्र समझ नहीं बनायी ।
    पारिवारिक बर्बरता का प्रधान कारण है पारिवारिक सदस्यों में समानता , सद्भाव और एक- दूसरे के प्रति लगाव का अभाव । जीवनशैली के विभिन्न पारिवारिक रुपों में वर्चस्व की मौजूदगी । साथ ही परिवार को नए लोकतांत्रिक ढाँचे के अनुरूप परिवर्तित न कर पाना ।  

  लोकतंत्र में कोई भी चीज, वस्तु, विचार या जीवन मूल्य जब जन्म लेता है तो वह प्रसारित होता है । लोकतंत्र में प्रसार की क्षमता के कारण ही बुरी चीज़ें, बुरी आदतें और बुरे मूल्य तेज़ी से प्रसारित हुए ।बर्बरता का प्रसार उनमें से एक है । 
     त्रासदी की हमारे समाज में आँधी चल रही है।   इसमें पारिवारिक बर्बरता, जातिवादी, साम्प्रदायिक, पृथकतावादी ( उत्तर पूर्वी राज्यों , पंजाब और कश्मीर ), माओवादी -नक्सलवादी बर्बरता,आपातकालीन आतंकी बर्बरता के साथ पुलिसबलों की दैनंदिन बर्बरता शामिल है ।  हिंसा और बर्बरता के इन सभी क्षेत्रों के आँकड़े चौंकाने वाले हैं । 
        परिवार में दहेज- हत्या, स्त्री- उत्पीड़न , बच्चों और बूढ़ों का उत्पीड़न या उनके प्रति बर्बर व्यवहार हमें त्रासद नहीं लगता बल्कि इसे हम 'बुरा' कहकर हल्का बनाने की कोशिश करते हैं । इसी तरह की कोई घटना घटित होती है तो हमें बुरा लगता है । हम यही कहते हैं 'बुरा' हुआ। जबकि यह त्रासद है , दुखद है , लेकिन हम 'बुरा 'कहकर अपने भावों को व्यक्त करते हैं। 
    दैनन्दिन पारिवारिक जीवन की त्रासदियों में भय , शाॅक , चौंकाने वाला और उत्पीड़न सबसे बड़े तत्व हैं। आधुनिक त्रासदी को इन तत्वों के बिना परिभाषित ही नहीं कर सकते । त्रासदी को महज़ बुरे के रुप न देखा जाय।
    मार्क्सवादी आलोचक  टेरी इगिलटन के अनुसार त्रासदी को जब हम 'बुरा' या ' बहुत बुरा हुआ' कहते हैं तो इसमें निहित दर्द को महसूस नहीं करते । 
     टेरी इगिलटन के अनुसार शिक्षित और अशिक्षित संस्थानों के बीच में त्रासदी के अर्थ को लेकर बहुत बड़ा भेद है। इस प्रसंग में शिक्षितों के संस्थान तुलनात्मक तौर पर ज़्यादा विश्वसनीय हैं। वे यह महसूस करते हैं कि त्रासदी का अर्थ ' बुरा' से बढ़कर होता है । वे दुख में निहित मूल्य की खोज करते हैं और उसे रेखांकित करते हैं । 
     त्रासदी को हमें दुख या बुरे के रुप से ज़्यादा व्यापक अर्थ में देखना चाहिए । त्रासदी का मतलब दुख मात्र नहीं है । 
     हमारे समाज में जो अनुदारवादी हैं वे त्रासदी को 'दुख'या 'बुरे ' के रुप में ही देखते हैं। वे इसमें निहित दर्द, पीड़ा, उत्पीड़न और भय की उपेक्षा करते हैं।
    मसलन् ,गुजरात के दंगों को मोदीपंथी दुखद या बुरा मानते हैं , त्रासद नहीं मानते हैं , त्रासदी और बर्बरता नहीं मानते । इसी तरह दहेज- हत्या को हम बुरा कहते हैं बर्बरता या त्रासदी नहीं कहते । इस तरह हमलोग जाने -अनजाने बर्बरता के साथ सहनीय संबंध बना लेते हैं। 
     पारिवारिक बर्बरता को कम करके आँकने और देखने का सबसे जनप्रिय मुहावरा है ,'चार बर्तन होंगे तो खनकेंगे।' पति-पत्नी  के बीच की बर्बरता को हम उपेक्षणीय मानते हैं । कहते हैं 'जहाँ प्यार होता है वहाँ झगड़ा भी होता है ।' 'पारिवारिक झगडा' कहकर बर्बरता को कम करके पेश किया जाता है और इस प्रक्रिया में घटित त्रासदी की अनदेखी की जाती है । यह त्रासदी लिंगमुक्त है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ महिलाओं के साथ त्रासद घटनाएँ घटित होती हैं , यह भी देखा गया है कि पुरुषों , बच्चों और बूढ़ों के साथ त्रासद घटनाएँ बढ़ी हैं ।
   त्रासदी में अपूरणीय मानवीय क्षति होती है । इसके दो छोर हैं , पहला , निजी, शारीरिक और मानसिक है तो दूसरा , सार्वजनिक, राजनीतिक और अन्य के प्रति जबावदेही  है । 
      सवाल यह है कि लोकतंत्र के विकास के साथ- साथ समाज में सभ्यता का विकास कम और बर्बरता का विकास ज़्यादा क्यों हुआ ? बर्बरता के साथ सामंजस्य बिठाने की मानसिकता का विकास क्यों हुआ ? बर्बरता का कैनवास दिनोंदिन क्यों बढा ? 
मेरे लेखे ,बर्बरता के विकास का प्रधान कारण है समाज में नई जीवन प्रणाली , सामाजिक संरचनाओं और नियमों के विकास की प्रक्रिया का अभाव। पुरानी प्रणाली का पूरी तरह बिखर जाना या ध्वस्त हो जाना और नियमन की नई प्रणाली का निर्मित न हो पाना । 
   एरिक हाॅब्सबाम के अनुसार ' नियमों और नैतिक आचरण ' की परंपरागत और सार्वभौम प्रणाली जब ध्वस्त हो जाती है तो बर्बरता पैदा होती है ।
    सामाजिक- राजनीतिक नियमन की  राजकीय प्रणाली को जब हम आधार बनाकर समाज को संचालित करने लगते हैं तब भी बर्बरता में इज़ाफ़ा होता है । 
    राजकीय नियमन बर्बरता के प्रति सहिष्णु बनाता है, राजकीय बर्बरता को वैध और स्वीकार्य बनाता है फलत: राजकीय बर्बरता की हम अनदेखी करते हैं ,पुलिस और सैन्यबलों की बर्बरता को वैध मानने लगते हैं। 
      काम संतुष्टि के अभाव और  बंदूक़ की सभ्यता के विकास ने बर्बरता के क्षेत्र में लंबी छलाँग लगायी है। असहाय और मातहत लोगों के प्रति बर्बरता के ये दो बडे अस्त्र हैं। 
    हम बर्बरता की ओर जितना तेज़ी से बढ़े हैं उतनी ही तेज़ी से दक्षिणपंथी राजनीति का ग्राफ़ बढ़ा है ।  उदार राजनीति का ह्रास हुआ है । 
      भारतीय  समाज में एक तरफ़ निरंतर पुलिस बर्बरता है तो दूसरी ओर साम्प्रदायिक दंगों , पृथकतावादी -आतंकी आंदोलनों का हिंसाचार है। इसके अलावा राजनीतिक हत्याओं का ग्राफ़ तेज़ी से बढ़ा है।   
    स्वाधीनता संग्राम और मध्यकाल की तुलना में स्वाधीन भारत में राजनीतिक हत्याएँ कई गुना ज़्यादा हुईं ।  जितने लोग युद्ध( 1962,1965,1971 ) में मारे गए उससे कई गुना ज़्यादा लोग पुलिस के हाथों थानों में मारे गए या पुलिसबलों से मुठभेड़ में मारे गए । 
     गाँवों में जातिगत बर्बरता को हमने सामान्य रुटिन मानकर आँखें बंद कर लीं। जातिगत बर्बरता के हमने सुंदर वैध तर्कों का परंपरागत कम्युनिकेशन के ज़रिए प्रचार किया और परंपरागत ग़ुलामी को वैध बनाने की कोशिश की । असल में यह वर्गयुद्ध है जो अपने ही देश के नागरिकों के ख़िलाफ़ जारी है । 
    जातिगत श्रेष्ठता को आधार बनाकर किए गए बर्बर हमलों ने भारत के सुंदर भविष्य की सभी संभावनाओं को दफ़न कर दिया । शैतान को हमने भगवान बना लिया और हर घर में जातिरुपी शैतान की पूजा-अर्चना, मान- मर्यादा बढ़ा दी ।
      इसी दौर में तमाम प्रगतिशीलों को पुरानी और नई जाति व्यवस्था में भेद करके पुरानी को बेहतर कहते सुना गया । पुरानी जाति व्यवस्था के 'अच्छे' गुणों की खोज खोजकर चर्चा की गयी और यह काम नामवर सिंह जैसे प्रगतिशील आलोचक ने ख़ूब किया । 
     जाति व्यवस्था पुरानी हो या नई वह हमेशा से बर्बर रही है और उसका मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य के साथ सीधे अंतर्विरोध है उसकी किसी भी क़िस्म की हिमायत बर्बरता को वैधता प्रदान करती है । 
     यही हाल साम्प्रदायिक बर्बरता का है जिसके कारण हज़ारों दंगे हुए ,उनमें हज़ारों लोग बर्बरता की बलि चढ़ गए । भारत विभाजन से लेकर आज तक हुए दंगों के ग्राफ़ को देखें तो पाएँगे कि हमारे ज़ेहन में साम्प्रदायिक हिंसा और बर्बरता के प्रति घृणा घटी है । तरह - तरह के घटिया तर्कों के ज़रिए हमने साम्प्रदायिक हिंसा को वैधता प्रदान की है । सतह पर साम्प्रदायिक हिंसा और बर्बरता टुकड़ों में होती रही है लेकिन उसके बीच में एक बारीक कड़ी है जो सभी क़िस्म के बिखरे टुकड़ों को जोड़ती है ।
     साम्प्रदायिक बर्बरता का सबसे बड़ा योगदान है कि हमारे समाज में पहचान के आधुनिक वर्गीय और पेशेवर रुपों की बजाय धार्मिक रुपों की ओर रुझान बढा है । 
  साम्प्रदायिक बर्बरता ने देश की ' ब्रेनवाशिंग' की है । भारतीय मन को साम्प्रदायिक मन में रुपान्तरित किया है ।  बहिष्कार करने और साम्प्रदायिक समूह में रहने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है ।महानगरों या शहरों में मिश्रित बस्तियाँ या बसावट ग़ायब हो गयी है। 
    अल्पसंख्यकों और ख़ासकर मुसलमानों को समाज में वैध तरीक़ों के ज़रिए ठेलकर समूहबंद 'घेटो ' में बंद कर दिया है या फिर उनकी बस्तियाँ अलग बसा दी गयी हैं। इसने समाज में ' हम' और ' तुम' के आधार पर विभाजन को वैध बनाया है और यह बर्बरता का वह साइड इफ़ेक्ट है जो हिंसाचार के बाद भी जारी है । 
        बर्बरता के दो तरह के प्रभाव होते हैं ,पहला पतात्कालिक होता है और दूसरा प्रभाव दीर्घकालिक होता है । तात्कालिक प्रभाव पर हमारी तत्काल प्रतिक्रिया सुनने में आती है लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव के बारे में हमारी कोई प्रतिक्रिया नज़र नहीं आती ।
   बर्बरता का दीर्घकालिक प्रभाव बेहद ख़तरनाक होता है और मौन उत्पीडक का काम करता है । इसमें व्यक्ति हर स्तर पर बिखर जाता है, नष्ट हो जाता है । इससे समाज में बर्बरता को चुप सहने और देखने की बीमारी का जन्म होता है और हम फिर बर्बरता को देखते हैं और चुप रहने लगते हैं । अब बर्बरता हमारे ज़ेहन में रुटिन बनकर छा जाती है । वह रोज़मर्रा की चीज़ हो जाती है और हम उसे 'बुरा'भर कहकर मन के भावों को व्यक्त करने लगते हैं ।
     यही हाल पुलिस बर्बरता का है ,हम कभी नहीं सोचते कि पुलिस जब किसी अपराधी के प्रति असभ्य तरीक़ों का इस्तेमाल करती है या 'थर्ड डिग्री'उत्पीडन के तरीक़े अपनाती है तो वह राजकीय संस्थाओं को बर्बर बनाती है । राजकीय संस्थाएँ जब बर्बर हो जाती हैं तो समाज में सभ्यता को बचाना बहुत ही मुश्किल काम हो जाता है । इससे समाज की नैतिक प्रगति बाधित होती है । 
     अपराधियों से सूचनाएँ हासिल करने के लिए पुलिस के बलप्रयोग ने जबरिया सूचना हासिल करने और जबरिया मुखबिर की तरह काम करने की पद्धति का विकास किया , इस पद्धति का कालांतर में साम्प्रदायिक -पृथकतावादी -माओवादी और आतंकी संगठनों ने भी इस्तेमाल किया । इन संगठनों से प्रभावित इलाक़ों में आतंक और प्रति आतंक    को बढ़ावा मिला जिसने राजकीय बर्बरता में इज़ाफ़ा किया ।मसलन पुलिस के बर्बर दमन से आतंकी संगठन ख़त्म हो जाते हैं , जैसा पंजाब में हुआ , तो लोग राजकीय बर्बरता को वैध मानने लगते हैं। इसके चलते आमलोगों में यह धारणा भी बनी कि सभ्यता के मुक़ाबले बर्बरता ज़्यादा कारगर हथियार है । इसने हमेशा के लिए सभ्यता की सीमाओं को कमज़ोर कर दिया । 
      सभ्य तरीक़ों की बजाय हम जब बर्बर तरीक़ों को वैध मानने लगते हैं तो स्वयं को अमानवीय बना रहे होते हैं। अमानवीयता में मज़े लेना आरंभ कर देते हैं । फलत: हम अमानवीयता के आदी हो दाते हैं । इस समूची प्रक्रिया के वाहक युवा बनते हैं । वे असहनीय चीज़ों को, अमानवीय चीज़ों को सहन करने लगते हैं , उनमें मज़ा लेने लगते हैं। 
     आज बर्बरता के निशाने पर युवा हैं। बर्बरता युवाओं को विभिन्न रुपों में अपनी ओर आकर्षित कर रही है । साम्प्रदायिक-पृथकतावादी -माओवादी-आतंकी हिंसा के वाहक युवा हैं, वे अपने बर्बर हिंसा से रोमैंटिक संबंध बना रहे हैं । 
     परिवार से लेकर समाज तक बर्बरता के विभिन्न रुपों में युवाओं की बड़े पैमाने पर शिरकत चिन्ता की बात है । 
    युवाओं में बर्बरता के प्रति बढ़ते आकर्षण और बेगानेपन को हमें  जुड़वाँ पहलू की तरह देखना चाहिए । यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । मसलन युवाओं में दहेज के प्रति कोई घृणा नहीं है उलटे वे दहेज माँगने लगे हैं । 
    यही हाल साम्प्रदायिक -आतंकी-पृथकतावादी -माओवादी- नक्सल राजनीति का है ,उसकी धुरी भी युवा हैं। एक तरफ़ युवाओं का यह रुप और दूसरी ओर उनका 'अ- राजनीतिक 'रुप असल में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और ये दोनों मिलकर बर्बरता को महत्वहीन बनाते हैं। सच यह है बर्बरता महत्वहीन नहीं है वह एक सच्चाई है और इसने जीवनशैली से लेकर राजनीति तक, आदतों से लेकर आचार- व्यवहार और नैतिकता के विभिन्न स्तरों तक अपने पैर पसार लिए हैं ।
    अब बर्बरता एक नई ऊँचाई की ओर जा रही है और अब इसने युवाओं में येन-केन-प्रकारेण पैसा कमाने की अंधी होड़ पैदा कर दी है। अब बर्बरता महत्वहीन हो गयी है और पैसा कमाना महत्वपूर्ण हो गया है और यह बर्बरता का वह छोर है जहाँ पहुँचकर सभ्यता और मानवीय मूल्यों की खोज का काम और भी दूभर हो गया है । 
     
      
      
     


मंगलवार, 3 जून 2014

बलात्कार के प्रतिवाद और नागरिक औरत की तलाश में

    
 
  मीडिया में बलात्कार की ख़बरों का सुर्खियों में आना और नेताओं का बलात्कार को लेकर हाय हाय करना रोज़मर्रा का नाटक है। 
   बलात्कार कोई मीडिया इवेंट नहीं है। बलात्कार के यथार्थ चित्र मीडिया के क़िस्सों और बाइट्स से भी ज़्यादा भयानक हैं। बलात्कार हमारे समाज और लोकतंत्र की प्रकृति को समझने का प्रस्थान बिंदु है। यह हमारे लोकतंत्र के समस्त दावों को खोखला साबित करता है ।
    लेनिन कहा करते थे यदि किसी समाज की हक़ीक़त जानना है तो पता करो औरत की दशा क्या है ? हमलोग जब भी लोकतंत्र की बातें करते हैं तो सतही मसलों को केन्द्र में रखकर बातें करते हैं। औरत को केन्द्र में रखकर बातें नहीं करते। औरत हमारी सृष्टि की धुरी है।
   अभी लोकसभा चुनावों के परिणामों की स्याही सूखी नहीं है । हम अपने अंदर झाँकने के लिए तैयार नहीं हैं। लोकसभा चुनाव में हमने औरतों के सवालों पर बातें तक नहीं कीं।
    मोदी से लेकर शोहदों तक सभी ने जितने भाषण दिए उनमें  औरत का मसला ठीक से उठाया ही नहीं गया। जब भी औरत का मसला उठा तो अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को हेयऔर निकम्मा सिद्ध करने के लिहाज़ से उठाया गया। औरत को भी क़ानून -व्यवस्था का मसला बना दिया गया। सरकार को  निकम्मा घोषित करने का औज़ार बना दिया गया और वोट जुगाड़ करने की मशीन में तब्दील कर दिया गया। कभी किसी भी दल ने औरतों के सवालों पर बुनियादी ढंग से बातें नहीं कीं।
   स्थिति इतनी बदतर है कि आज भी हम बदायूँ की घटना को यूपी सरकार को गिराने या बदनाम करने के लक्ष्य से आगे देखने को तैयार नहीं हैं। हम यह जानने और समझने को तैयार नहीं हैं कि हमारा देश 'बलात्कारियों का देश 'कैसे हो गया? क्यों हमारे देश में औरत को ही पग-पग पर लांछन, उत्पीड़न और बलात्कार का सामना करना पड़ता है? वे कौन सी ताक़तें और जीवन मूल्य हैं जो औरत पर हो रहे अत्याचारों की तह तक हमें जाने नहीं देते ? 
          बलात्कार की जड़ें हमारे समाज में हैं। समाज की मूल्य संरचना में हैं। औरत को मातहत मानने या दोयमदर्जे का नागरिक मानने की मानसिकता में हैं। वास्तविकता यह है कि हमने अपने देश में लोकतंत्र का कम और वोटतंत्र का ज़्यादा विकास किया है। हमने नागरिकचेतना और आधुनिकभावबोध पैदा करने की बजाय उपभोक्ताबोध पैदा करने पर ज़ोर दिया है। औरत को समाज में नागरिक नहीं माना यहाँ तक कि पुरुष को भी नागरिक नहीं माना। हमारा समाज अभी तक नागरिक समाज बना ही नहीं है। 

    हम लिंग समाज में जी रहे हैं। ' ये औरत है वो मर्द है' की मानसिकता में जी रहे हैं। औरत-मर्द के संबंधों के आधार पर ही एक- दूसरे के बारे में सोचते हैं।हमने अपने संबंधों को नागरिक संबंधों में रुपान्तरित नहीं किया है। आज भी औरतें सबसे ज़्यादा शारीरिक हिंसा की शिकार क्यों हैं? क्योंकि औरत को शरीर या योनि से ज़्यादा हमारा समाज सोचने को तैयार नहीं है। 
    औरत  या योनि देह नहीं नागरिक है। जीवंत मनुष्य है। औरत का समूचा विमर्श अभी भी माँ , बेटी, बहन के सम्बोधनों से बन रहा है। हम औरत को इन सम्बोधनों और इनसे जुड़े सामाजिक संबंधों से परे जाकर देखने को तैयार नहीं हैं। औरत को जब तक हम इन संबंधों में देखेंगे तब तक औरत पर हमले जारी रहेंगे। औरत की अवस्था और भी बदतर होगी। 
     भारत में नया भारत तब बनेगा जब हम नागरिक के रुप में औरत- मर्द को देखेंगे । लिंगाधारित असमान संबंधों को हमने कभी बुनियादी तौर पर बदलने की मुहिम नहीं चलायी। औरत को लिंगाधारित संबंधों के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने से औरत की मातहत की सामाजिक दशा में बदलाव नहीं आएगा। औरत इस परिप्रेक्ष्य में हमेशा पुरुष संदर्भ से ही परिभाषित होती रही है। 
    औरत को माँ,बहन, बेटी के रुप में देखने का अर्थ है उसे पुरुष संदर्भ में देखना। नागरिक के रुप में औरत को देखा जाय इसकी पहली सीढ़ी है कि हम औरत को 'व्यक्ति' के रुप में देना आरंभ करें और क्रमश : 'व्यक्ति'रुप में उसकी सत्ता,महत्ता और अधिकारों को परिभाषित करें। 
        औरत को व्यक्ति के रुप में न देख पाने के कारण ही हम उसे मनुष्य के रुप में भी नहीं देख पाते। वह हमारी चेतना में लिंग होती है या माँ -बहन-बेटी होती है ,इसके अलावा उसकी कोई अवस्था नहीं होती।
      औरतों पर बढ़ रहे शारीरिक हमलों और बलात्कार की घटनाओं का एक अन्य कारण है मर्दानगी का नग्न प्रदर्शन और उसके श्रेष्ठत्व पर ज़ोर। मर्दानगी को हमारे मीडिया से लेकर राजनीति, संस्कृति से लेकर शिक्षा तक, धर्म से लेकर न्याय तक सबने महिमामंडित किया है।मर्दानगी को अपरिहार्य मान लिया गया है। मर्दानगी का हमारे यहाँ जो विकल्प औरतों की महिमा के नाम पर सुझाया जाता है वह भी मर्दानगी के ही लक्षणों को पुष्ट करता है। मर्दानगी का अहर्निश प्रचार- प्रसार हमारे मनोजगत को संचालित करता रहता है। यह हमें स्वाभाविक लगने लगा है।
    सामाजिक विकास के लिए मर्दानगी का महिमामंडन या फिर परंपरागत भावबोध का महिमामंडन इस तरह किया जाता है कि हम स्वतंत्र रुप में औरत की व्यक्ति और नागरिक के रुप में स्थिति को परिभाषित ही नहीं कर पाते। औरत को नागरिक के रुप में हम अभी तक अपने मन में बिठा नहीं पाए हैं। यह हमारे लोकतंत्र की अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी है।
     हमने लोकतंत्र में नागरिक की पहचान को अर्जित नहीं किया और न उसके लिए कोई आंतरिक और सामाजिक संघर्ष ही चलाया। हमने मान लिया कि हम नागरिक हैं और हमारा समाज लोकतांत्रिक है। 
     लोकतंत्र या नागरिकबोध प्रदत्त नहीं होता, वह संवैधानिक घोषणाओं के साथ ही हमें नहीं मिल जाता बल्कि उसके लिए सचेत रुप में सामाजिकस्तर पर संघर्ष चलाने की ज़रुरत है। इस काम को हमारे यहाँ अभी तक किसी ने नहीं किया। 
      हमने औरत को शिक्षित बनाया, नया उत्पादक बनाया लेकिन औरत और समाज में नागरिकबोध पैदा नहीं किया। औरत के ऊपरी उपकरण बदले लेकिन उसकी आंतरिक संरचनाएँ पुरानी बनी रहीं। हमें कमाऊ औरत चाहिए लेकिन नए मूल्यबोधवाली नागरिकबोध से युक्त औरत नहीं चाहिए । यही वह बिंदु है जहाँ से औरत के हकों और उसके शरीर पर बराबर हमले हो रहे हैं। 
       औरत को हम क़ानून -व्यवस्था का मसला न मानें। औरतें क़ानून भंजक नहीं हैं।लेकिन औरतें हमारे क़ानूनी मशीनरी की शिकार जरुर हैं। हमारी सारी क़ानूनी मशीनरी और समाज पूरी तरह से औरत को शक की नज़र से देखता है।
    औरतें सुरक्षित रहें इसके लिए ज़रुरी है कि हम उन पर विश्वास करना सीखें । औरत पर शक करना उसका अपमान है। औरत पर शक के कारण ही यह मानसिकता बनी है कि औरत तो पापिन होती है। नागिन होती है। औरत को हमने न तो समाज में सम्मान से देखा और नहीं घर में सम्मान और विश्वास की नज़र से देखा। इसके अलावा औरत के अंदर पुंसवादी मूल्यों और विश्वासों को भी बिठाया गया है। आज वास्तविकता यह है कि औरत का साथ देने को औरत ही तैयार नहीं होती। 
     औरत आज जितनी अकेली और असहाय है उतनी असहाय और कमज़ोर वह पहले कभी नहीं थी। हम औरत को पूँजीवादी उत्पादन संबंधों के परिप्रेक्ष्य में नए सिरे से परिभाषित करें तो चीज़ें ज़्यादा साफ़ नज़र आएँगी। 
    औरत के दो शत्रु हैं । पहला शत्रु है पूँजीवाद और दूसरा शत्रु हैं पितृसत्ता। औरत को मुक्ति हासिल करने के लिए पुंसवाद के ख़िलाफ़ समझौताहीन संघर्ष चलाना होगा। औरत इस संघर्ष में सफलता हासिल करें इसके लिए ज़रुरी है पुरुष भी उसका साथ दें। 
   औरत को संरक्षण के लिए क़ानून चाहिए लेकिन पुंसवादी नज़रिए से रहित। भाई ,पिता,बेटा चाहिए लेकिन पुंसवाद के बिना। औरत को हम औरत रहने दें उसे पुंसवादी साँचे में न ढालें। औरत को पुंसवादी साँचे में ढालने और पुंसवादी नज़रिए से देखने के कारण ही औरत आज सबसे ज़्यादा असहाय और हिंसा की शिकार है।
    हम सब एकजुट होकर पुंसवादी विचारधारा और पुंसवादी मूल्यों का हर स्तर पर विरोध करें। पुंसवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष घर के अंदर और हमारे दिलोदिमाग़ के अंदर चलाने की ज़रुरत है। 
      

रविवार, 11 मई 2014

मोदी की हिमायती औरतें


नरेन्द्र मोदी पर हमारी आलोचनाएं राजनीतिक हैं। उन सभी आलोचनाओं का एक आयाम राजनीतिक है तो दूसरा आयाम सांस्कृतिक और पितृसत्तात्मक है। असल में मोदी की आड़ में हम सबके मन में पितृसत्ता विचारधारा फल फूल रही है । यह सबसे घृणित विचारधारा है। यह उस समय और भी खतरनाक होती है जब कोई स्त्री जाने-अनजाने पितृसत्ता की हिमायत करे। मोदी की हिमायत अंततः पितृसत्ता की हिमायत है। 

मोदी पितृसत्ता के अनुदार रुपों का साक्षात प्रतिनिधि रुप है। पितृसत्ता के लिबरल रुपों और अनुदार रुपों में इस चुनाव में सीधी टकराहट है। राहुल गांधी-सोनिया गांधी पितृसत्ता के लिबरल रुपों के प्रतिनिधि हैं। इसके विपरीत मोदी पितृसत्ता के अनुदार रुपों के नुमाइंदे हैं। इन दोनों में यह वैचारिक अंतर हमें लिबरल को चुनने की ओर ठेल रहा है। पितृसत्तात्मक लिबरल विचारधारा अंततः संकट की घड़ी में स्त्री विरोधी या स्त्री समर्थक हो सकती है। समस्या यह है कि किस तरह का सामाजिक दबाव पैदा करते हैं। शाहबानो केस के समय कट्टरपंथी मुसलमानों का दबाव था और लिबरल पितृसत्ता को हमने स्त्री विरोधी भूमिका अदा करते देखा। राजीव गांधी ने शाहबानो और मुसलिम औरतों के हकों के खिलाफ कदम उठाए। लेकिन निर्भयाकांड के समय सोनिया गांधी ने स्त्रीहित में कदम उठाए,कड़े कानून बनाने में सक्रिय भूमिका निभायी,क्योंकि जन दबाव था।

इसके विपरीत मोदी का अनुदार पितृसत्तात्मक रुप है और आचरण है जिसको संघ की विचारधारा और उसके सहयोगी संगठनों के जरिए पूरे देश में लागू किया जा रहा है। कांग्रेस और कांग्रेसियों ने कभी अन्तर्जातीय विवाह का विरोध नहीं किया बल्कि उसे बढ़ावा दिया। इसके विपरीत संघ और उसके सहयोगी संगठनों ने अंतर्जातीय विवाह करने वालों पर खुलेआम हमले किए।लोगों को अंतर्जातीय विवाह करने से रोका । इसके सैंकड़ों उदाहरण हैं।

गुजरात में 2002 के दंगों में सैंकड़ों औरतों के साथ जो हुआ वह भूलने वाली चीज नहीं है। उसी तरह राजीव गांधी के एक वाक्य के कारण सिख औरतों के जो जघन्य हिंसाचार हुआ वह भी भूलने वाली चीज नहीं है, फिर भी एक बड़ा अंतर है जो सोनिया गांधी को राजीव गांधी से अलग करता है। सोनिया गांधी ने कम से कम खुलेआम,उनके पीएम ने संसद में 1984 के जघन्य कांड के लिए संसद और देश से माफी मांगी है। फिर भी 1984 के अपराध भूलना संभव नहीं है।

कांग्रेस के अंदर एक तबका है जिसका अनुदारवादी नजरिया है और यह तबका बीच बीच में चमक मारता है। लेकिन मोदी के साथ तो सरेआम स्त्री हकों पर हमले करने वाले लोग सक्रिय हैं। वे निर्लज्जता के स्त्री विरोधी फैसलों की हिमायत करते हैं।

मैं एक बात अभी तक नहीं समझ पाया कि मोदी यदि मातृभक्त हैं तो अपनी माँ को अपने पास क्यों नहीं रखते ? यह कैसा प्रेम है जिसमें एकल मोदी के पास माँ रहना नहीं चाहती, माँ मोदी से दूर रहना चाहती है। मोदी बार बार माँ की खबर लेने जरुर जाते हैं। माँ अपनी राजी खुशी की खबर भी देती है,माँ उनको आशीर्वाद भी देती है, क्योंकि वह माँ है और स्त्री है। लेकिन मोदी की माँ उनके साथ नहीं रहती। उसका साथ न रहना मोदी के किसी आचार-व्यवहार का प्रतिवाद है। औरतें प्रतिवाद भिन्न तरीके से करती हैं वे मर्दों की तरह प्रतिवाद नहीं करतीं। मोदी की माँ का मोदी से अलग रहना , मोदी का अकारण अपनी पत्नी को छोड़कर रहना,ये दो घटनाएं निजी होते हुए भी सार्वजनिक हैं और आमलोगों का ध्यान खींचती हैं। ये वे घटनाएं हैं जो मोदी के अंदर छिपे अनुदार पितृसत्तात्मक नजरिए की अभिव्यक्ति भी हैं।

हमारे समाज में एक बड़ा तबका है जो अनुदार पितृसत्ता का भक्त है और कठमुल्लों की तरह जीता है। इसमें वे लोग ज्यादा हैं जो पढ़े लिखे हैं, विदेशों में रहते हैं , मध्यवर्ग से आते हैं।

गरीबों में अनुदार पितृसत्ता का आधार बहुत कमजोर है। गरीब औरतें पितृसत्ता से आए दिन मुठभेड़ करती रहती हैं और अपने लिए मार्ग तलाशती रहती हैं। लेकिन अधिकांश शिक्षित औरतों और मर्दों में अनुदार पितृसत्ता हमेशा माँ की आड़ में औरत का शिकार करती है। माँ की आड़ में औरतों के हकों पर हमले करती है।

ये लोग माँ-बेटे के संबंधों को पितृसत्तात्मक संदर्भ के बिना देखना ही नहीं चाहते। माँ को पितृसत्ता के संदर्भ में देखने का अर्थ है औरत को पुरुष के मातहत के रुप में देखना। माँ के शोषण के रुप देखें तो इनलोगों से नफरत होने लगेगी। ये वे लोग हैं जो माँ को स्वायत्त औरत के रुप में नहीं देखते।

माँ एक स्वायत्त सामाजिक स्त्री इकाई है और उसको माँ की बजाय स्त्री के रुप में देखना चाहिए। माँ के पदबंध का प्रयोग करके माँ को तो ये लोग मातहत बनाते ही हैं साथ ही स्त्री को मातहत रखते हैं।

हीगेल ने कहा था 'सन्तान का जन्म माता-पिता की मृत्यु भी है।' इसी तरह माँ के प्रति जिस व्यक्ति में सम्मानभाव है उसके अंदर क्या अपनी पत्नी या स्त्री मात्र के प्रति सम्मानभाव है ? मोदी इस मामले एकसिरे से नकारात्मक स्थान पर खड़े हैं। उनके अंदर माँ के प्रति जो सम्मान भाव है वह सम्मानभाव अपनी पत्नी के प्रति नहीं है। यह खुला सच है।

जो लोग स्त्री में माँ ही माँ देखते हैं वे जान लें कि औरत में यदि माँ ही माँ देखेंगे तो स्त्री कभी स्वायत्त पहचान अर्जित नहीं कर सकती।इसमें मातृत्व पर जोर है इससे स्त्री की स्थिति में बदलाव नहीं आएगा। स्त्री बदले इसके लिए जरुरी है उसे मातृत्व के दायरे के बाहर निकालें।

स्त्री का निरासक्त माँ बने रहना स्त्री को पिछडा बनाए रखता है और उसे आधुनिक आत्मनिर्भर स्त्री के रुप में विकसित नहीं होने देता।

माँ तो औरत के व्यक्तित्व का एक अंश है ,समग्र नहीं है। हमें स्त्री को उन कार्यों के बाहर निकालने के बारे में सोचना चाहिए जिनको वह सदियों से करती आ रही है। मसलन् माँ का बच्चे पालना, केयर करना,आशीर्वाद देना, प्यार करना,घर की देखभाल करना। माँ ये सारे काम हजारों सालों से करती रही है और ये काम उसकी गुलामी की अवस्था के प्रतीक हैं। औरत को इन कामों के दायरे बाहर निकलना होगा। मोदी की मुश्किलें यहीं पर हैं।

जो मोदी और उनकी मां के बीच के संबंध को लेकर भावविह्वल हैं वे भी अंततः अपनी भावविह्वलता में औरत को गुलाम बनाए रखने का शास्त्र रच रहे हैं। माँ को हमने पालन-पोषण करने वाली मशीन बनाया है उसे साक्षात जीवन का आनंद लेने वाली स्वायत्त औरत नहीं बनाया है। हम माँ-बेटे के प्यार के महिमामंडन में जाने-अनजाने पुराने अनुदार माँ-बेटे के संबंध की हिमायत कर रहे हैं। यह हिमायत मूलतः हिटलर के विचारों की हिमायत है।

हिटलर मानता था स्त्री का काम है बच्चे पैदा करना और परिवारीजनों की घर के अंदर रहकर सेवा करना। अनुदार पितृसत्ता के संघी हिमायतियों और उनके फेसबुक अनुयायियों को माँ-बेटे का वह रुप पसंद है जो मोदी और उनकी माँ के बीच में है।यह रुप वैचारिक तौर पर हिटलर के द्वारा तय की गयी लक्ष्मण-रेखा के बाहर नहीं जाने देता।

मेरे लिए चिन्ता तब और होती है जब कोई आधुनिक पढ़ी-लिखी औरत अपने भावों-विचारों में मोदीभक्त हो और उसके अनुदार पितृसत्तात्मक विचारों की भी भक्त हो।यह कम्प्लीट पुंसवादी गुलामी है।

स्त्री के अंदर अनुदार पितृसत्तात्मक विचारधारा बेहद खतरनाक होती है यह विचारधारा स्त्री के आधुनिकीकरण की विरोधी है। यह औरत की स्वायत्तत और लोकतांत्रिक पहचान का निषेध करती है।

संघ ने दुर्गावाहिनी और इस तरह के संगठनों के जरिए औरतों में अनुदार पितृसत्ता का जमकर प्रचार किया है। ये वे औरतें हैं जो अनुदार पितृसत्ता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाकर स्त्री अधिकारों का हनन कर सकती हैं।ये ही औरतें वैचारिक तौर पर मोदी भक्ति में फेसबुक से लेकर राजनीति तक सक्रिय हैं।











रविवार, 5 दिसंबर 2010

मित्रता का स्त्रीवादी मर्म - विजया सिंह


समस्त मानवीय संबंधों में मित्रता सबसे महत् संबंध है। यह साथ, साहचर्य, सहयोग, पारस्परिकता एवं स्वतंत्रता पर आधारित विशुध्द रूप से सकारात्मक संबंध है। जीवन की अनेकानेक पूर्णताओं के बावजूद मित्रहीन जीवन स्वीकार्य नहीं होता। स्वतंत्रता का विवेक, निजी व अन्य की अस्मिता का सहज, स्वाभाविक स्वीकार मित्रता के स्वरूप को प्रगाढ़ बनाते हैं। इसमें प्रेम के एकाकीपन, परनिर्भर संकीर्णता, ईर्ष्या से विलग व्यापकता का बोध अधिक है। अरस्तू ने 'निमोकियन एथिक्स' की आठवीं और नौवीं पुस्तकों में 'मित्रता' को नैतिक गुण माना है, जो एक जैसे उत्तम गुणधर्म वाले व्यक्तियों में होती है। आठवीं पुस्तक के तृतीय और चतुर्थ अध्यायों में मित्रता को परिभाषित करते हुए अरस्तू कहते है यह विस्तृत रूप में ऐसी अवस्था या स्थिति है जहाँ दो व्यक्ति एक दूसरे की भलाई की कामना करते हैं। वे मित्रता के तीन विभेद भी स्वीकार करते है जहाँ स्नेह का आधार भिन्न होता है। पहली प्रकार की मित्रता उपयोगिता पर आधारित है तथा दूसरे प्रकार की आनंद पर। उपयोगिता के आधार पर की गई मित्रता में हम उस व्यक्ति के मित्र होंगे तो हमारे लिए उपयोगी होगा। यहाँ स्नेह का आधार मित्र नहीं बल्कि उसकी उपयोगिता है। दूसरी प्रकार की मित्रता भी मित्रों से नहीं वरन् उनसे मिलनेवाले आनंद को आधार बनाकर विकसित होती है। यहाँ आनंद प्रधान है मित्रता नहीं। तीसरी और वास्तविक मित्रता, अरस्तू के अनुसार, नेकी या भलाई पर आधारित होती है। इसमें मित्र प्रमुख होते हैं। गुणी मित्रों की हित कामना करना ही सच्ची मित्रता है। यह हित कामना भी मित्र के स्वभाव और वास्तविक स्थिति अर्थात् वह क्या है, कैसा है, पर आधारित होनी चाहिए। यह आकस्मिक समझदारी और विचार पर आधारित नही होनी चाहिए। अत: मित्रता का वही रूप आदर्श होता है जब हम मित्र के प्रति स्नेह उसकी अच्छाई के कारण महसूस करते हैं। उनके उपयोग या आनंद के कारण नहीं। 

अरस्तू आदर्श मित्रता के लिए अच्छाई के साथ समानता को भी आवश्यक मानते है। यह मान्यता बहुप्रचलित सिनेमाई मुहावरे 'विपरीतों का आकर्षण'(अपोजिट्स अटरैक्ट) से बिल्कुल उलट है। पारस्परिकता के लिए समान होना आवश्यक है। यह समानता 'नेकी'/'अच्छाई' की होनी चाहिए। जब मित्र एक-दूसरे को, उनकी अच्छाई को महत्व देते है तभी दोस्ती चिरायु होती है। इसके साथ ही वे यह रेखांकित करना नहीं भूलते कि सच्ची दोस्ती दुर्लभ है क्योंकि भले और गुणी इंसान भी विरल हैं। मित्रों को एक-दूसरे को जानने, समझने एवं चरित्र की पहचान करने में काफी समय लगता है। ताकि वे एक-दूसरे पर विश्वास कर सकें। अत: आदर्श मित्रता के लिए अच्छा दिखने से ज्यादा अच्छा होना अधिक महत्वपूर्ण है। अरस्तू ज़ोर देकर कहते है कि बुरे और दुर्गुणी लोगों के बीच सच्ची मित्रता नही हो सकती है कारण कि वे हमेशा उपयोग व आनंद के इच्छुक होते हैं।

अच्छे मित्र साथ में समय गुजारना पसंद करते हैं। एक दूसरे के साथ का आनंद लेते हैं। गौरतलब है कि मित्र के साथ मूल्यवान समय की साझेदारी ही मित्रता को प्रगाढ़ बनाती है। यदि किसी की भलाई की कामना करते हुए भी हम उसे पसंद नहीं करते या उसके साथ समय व्यतीत नही करते तो यह मित्रता नही है क्योंकि यहाँ मित्रों के बीच मूल्यवान समय की साझेदारी गायब है। वास्तविकता यही है कि हम अपने मूल्यवान समय को स्वयं के लिए चुराकर रखते है तथा बाकि बचे हुए, थके हुए मूल्यहीन समय की साझेदारी करते हैं। संबंधों के खोखले होने का रोना भी रोते हैं। मित्रता ही नही किसी भी संबंध में मूल्यवान समय की साझेदारी की ज़रूरत सबसे ज्यादा है, उसकी जगह धन, संपदा और मौखिक प्यार कभी नहीं ले सकता। आदर्श मैत्री मित्रों की निजी इयत्ता को नष्ट नही करती। मित्र निजी अस्मिता को जीते हुए उससे भी परे की अच्छाई 'गुड' की ओर उन्मुख होते हैं।

समानता को अत्यधिक महत्व देने के कारण अरस्तू धनवान-दरिद्र, राजा-रंक, बुद्धिमान-मूर्ख व्यक्तियों में आदर्श मैत्री को असम्भव मानते हैं। उनका मानना है दो व्यक्तियों में गुण, धन, स्वभाव, विवेक या किसी अन्य व्यवहार की अत्यधिक भिन्नता उन्हें मित्र नहीं रहने देती। एन वार्ड का मानना है अरस्तू के इस आदर्श मित्रता की धारणा समस्याप्रद है। ऐसा लगता है मानो यह केवल पुरूषों के लिए उपयुक्त है। कारण कि परिवार में पति-पत्नी के बीच अपूर्ण मैत्री संबंध होते हैं। इसके अलावा अच्छे पुरुष का प्रेम दूसरों की बनिस्बत स्वयं से अधिक होता है।

अरस्तू 'निमोकियन एथिक्स' की आठवीं पुस्तक के सप्तम अध्याय में शारीरिक, मानसिक धरातल पर भिन्न स्त्री व पुरुष के बीच दोषपूर्ण मैत्री को रेखांकित करते हैं। दो असमान इयत्ता वाले संबंध में वरिष्ठ संगी कनिष्ठ का ज्यादा स्नेह पाएगा जबकि कनिष्ठ को वरिष्ठ से कम प्यार मिलेगा। यह अपूर्ण मैत्री पिता-पुत्र, आयु में बड़े-छोटे, शासक-शासित और पति-पत्नी के बीच होती है। पति-पत्नी के बीच की मित्रता का सच्चा या दोशपूर्ण रूप प्रथमत: परिवार के बीच में ही उभरता है। उनका मंतव्य है कि पति-पत्नी के बीच का संबंध 'अभिजात्य' होता है। असमान संबंधों पर आधारित होता है। इस अभिजात्य संबंध में स्त्री अल्पतंत्र में होती है एवं पुरुष गुणवान, कुलीन, श्रेष्ठ शासक होता है। परिवार में औरत का कोई निर्णय अन्तिम और महत्वपूर्ण नहीं होता। अत: इस अर्थ में पति-पत्नी आदर्श मित्रता के मानकों तक नही पहुँचते।

यहाँ यह समझना जरूरी है कि अरस्तू परिवार की इकाई को राजनीतिक संबंधों से भिन्न और इतर मानते है और यह कि किसी भी राजनीतिक समुदाय से अलग परिवार के सदस्यों के बीच मित्रता अधिक स्वाभाविक व सहज होती है। उसमें किसी प्रचलित रीति या शासन पध्दति की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि वे पति-पत्नी में गुणात्मक अंतर मानते हुए भी उनकी सहजवृत्ति तथा जैविक ज़रूरतों को चिह्नित करते हैं जिसे प्रकारान्तर से मित्रता का आधार भी माना जा सकता है। उनका कहना है कि पति-पत्नी में मित्रता स्वाभाविक रूप में होती है। पुरुष सामान्यतया जोड़े में रहना अधिक पसंद करते हैं बजाए सामाजिक या राजनीतिक इकाई के रूप में रहने के। क्योंकि घरेलू जीवन प्रारम्भिक व अपरिहार्य रूप में उनसे जुड़ा होता है और प्रजनन एक ऐसा बंधन है जो सभी जीवितों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
यह कामुक,प्रजनन संबंध स्त्री-पुरुष की मित्रता के प्राकृतिक आधार हैं। बच्चों की उपस्थिति से यह संबंध प्रगाढ़ व सुदृढ़ बनता है। बच्चे के अभाव में विवाह बंधन शीघ्र टूट जाते हैं। स्त्री-पुरुष समस्त जैविक भिन्नताओं के बावजूद पुनरुत्पादन करते हैं जो उनकी साझा उत्पत्ति है। वे साथ रहकर पुनर्रुत्पादन ही नहीं करते वरन् जीवन की आवश्यकताओं को सुरक्षित भी करते हैं। एकदूसरे को संतुष्टि और आनंद देते हुए वे नवीन निर्माण करते हैं। यह मैत्री उपयोगी तथा आनंददायक तो है ही साथ ही स्त्री-पुरुष के सद्गुणी होने पर यह उत्कृष्ट भी है।

एन वार्ड अरस्तू के आदर्श मैत्री संबंध को स्त्री-पुरुष के मध्य न देखकर माँ और बच्चे के बीच देखती हैं। अत: उनका नजरिया अन्य विचारकों जैसे ली बैरडषॉ, नैंसी तुआन, बारबरा टोवे और जार्ज टोवे, अरलेन सैक्सोन्हाउस से भिन्न है। ये सभी विचारक अरस्तू की मित्रता की अवधारणा को औरत-मर्द के संदर्भ में देखते हुए नैतिक, राजनीतिक और दार्शनिक क्रियाकलापों के परिप्रेक्ष्य में स्त्री के स्वभाव और संभावनाओं को देखते हैं। वे स्त्री को प्राकृतिक रूप में बुद्धिहीन, सांस्कृतिक तौर पर अनुकूलित, अबाधित भावनाओं एवं नैतिक दौर्बल्य से ग्रसित मानते हैं। जबकि एन वार्ड का नजरिया मैरी पी. निकोल्स, हैराल्ड एल लेवी से साम्य रखता है। जो मानते है कि अरस्तू घर-परिवार में पुरुष के समान स्त्री की समान हिस्सेदारी की माँग करते हैं। निकोल्स के अनुसार, अरस्तू दोनों लिंगों के बीच की समानता को स्वीकार करते हैं और राजनीतिक समानता व न्यायपरकता की बात करते हैं। दोनों लिंगों की भिन्नता में भी साझे नियमों के गठन की बात करते हैं। लेवी के अनुसार, अरस्तू महिलाओं के द्वारा राजनीतिक नियम का क्रियान्वयन परिवार में ही नहीं नगर में भी चाहते हैं। ताकि औरतें राजनीतिक शक्ति हासिल कर सकें।
मातृत्व के संदर्भ में सैक्सोन्हाउस और डैरेल डाब्स का मंतव्य है कि मातृत्व ही वह कारक है जिसके कारण अरस्तू स्त्री को पुंस सार्वजनिक क्षेत्रों से दूर रखना चाहते हैं। बच्चों का पालन-पोषण, घरेलू कार्य स्त्री को इतना अवकाश नहीं देते कि वह राजनीतिक विमर्श तथा नागरिक हिस्सेदारी को निभा सकें। इसके विरोध में एन वार्ड का कहना है 'अरस्तू प्रत्यक्षत: स्त्री को आदर्श मैत्री के उपयुक्त नहीं मानते किंतु मातृत्व पर दिए गए उनके वक्तव्य में मातृभाव मित्रता के एक रूप में सामने आता है। जो स्त्री को खोलता है, उसे मुक्त करता है साथ ही उसे राजनीतिक, नैतिक एवं दार्शनिक जीवन के लिए विशेष तौर पर तैयार करता है। यह औरत के स्व का सर्वोत्कृष्ट रूप है जिसके मूल में नि:स्वार्थ भलाई की कामना सन्निहित है। अत: मेरे इस विश्लेषण में आंशिक रूप में ही सही अरस्तू से इस प्रश्न का जबाव, कि महिलाएँ 'आदर्स मित्र' हो सकती हैं, मिलता है। स्त्री की मित्रता-क्षमता के प्रश्न पर पूर्ण उत्तर भले न मिला हो परन्तु मातृत्व की ज्ञानवर्ध्दक समझ जरूर मिलती है। मातृत्व औरत और मर्द को या 'स्त्री भाव' और 'पुंस तर्क' को अलगाता नहीं है बल्कि उन्हें अधिक पास खींच लाता है।'
       कुछ नारीवादी दार्शनिकों ने 'जिम्मेदारी या देखरेख के ’आचारशास्त्र' 'एथिक्स ऑफ केयर' के निर्माण की बात कही जिसके मूल दृष्टांत के रूप में मातृत्व को प्रतिपादित किया। यह स्त्रीवादियों के बीच विवादित विषय है। कुछ का मत है कि यह धारणा सारतत्ववाद से प्रभावित है जिसमें पहले से ही स्त्री को पुरूषों की अपेक्षा अल्प तार्किक और अधिक भावपूर्ण, आत्मत्यागी माना जाता है। इससे यह बात भी पुष्ट होती है कि महिलाएँ नैतिक और राजनैतिक चुनाव करने में अक्षम होती हैं। अत: औरतों को घर, परिवार, बच्चे व पुरूषों के साथ असमान संबंधों में ही जीना चाहिए। सैंड्रा ली बार्टकी ने 'फेमिनिटी एंड डोमिनेशन' में माना कि 'नि:स्वार्थ देखभाल' ने स्त्री को पुरुष की तुलना में लिंगीय रूप में असमानुपातिक स्थिति में खड़ा कर दिया है। इससे वह अत्यधिक शोषित व शक्तिहीन हुई है। मर्दों का अधिनायकत्व बना रह सका है। उसकी निजी अस्मिता और यथार्थ की चेतना को हानि पहुँची है। वे पुरूषों के नैतिक मूल्यों को ग्रहण कर रहीं हैं जो बहुत खतरनाक है। सुसन मोलर ओकिन भी मातृत्व को ही स्त्री के पुंस प्रभुत्ववाले क्षेत्रों से बहिष्कार का बड़ा कारण मानती हैं। जबकि अरस्तू मातृत्व को स्त्री की सक्रियता एवं तत्वज्ञान का आधार मानते हैं जिसके कारण वह सभी क्षेत्रों का अभिन्न हिस्सा होती है।

प्लेटो ने महिलाओं को बौध्दिक तथा आध्यात्मिक स्तर पर पुरूषों से हीन माना। स्त्री-पुरुष के संबंध को वे केवल विवाह एवं प्रजनन के लिए उपयुक्त मानते हैं। जबकि मित्रता दो पुरूषों के या पुरुष और भगवान के बीच ही हो सकती है। उन्होंने मैत्री के लिए न्याय व समानता के महत्व को स्वीकार करते हुए भी अपवादों से इंकार नहीं किया हैं ''जब दो व्यक्ति गुणी एवं समान हों, उनमें बराबरी हो, तो हम कह सकते हैं कि वे एक दूसरे के मित्र हैं। लेकिन दरिद्र व्यक्ति की धनवान व्यक्ति से भी मित्रता हो सकती है, चाहे वे बिल्कुल विपरीत हों। इन दोनों ही संदर्भों में यदि मित्रता उत्कट हो तो उसे प्रेम कहते है।'' (प्लेटो, लॉज़ 873 अ)
    प्रसिध्द नारीवादी लूस इरीगरी स्त्री की माँ के रूप में अतिरिक्त क्षमता को स्वीकार करती हैं। इस तरह देखा जाए तो माँ के तौर पर औरत न केवल आदर्श मित्र होती है वरन् उसका दायरा भी व्यापक होता है। बकौल लूस इरीगरी, हम जब औरतें होती हैं तो हमेशा माँ होती हैं। एक स्त्री की दिक्कत यह नही है कि वह औरत है एवं माँ हैं बल्कि उसकी परेशानी यह है कि उसे बच्चे, महिला तथा पुरुष सभी को देखना पड़ता है।
      स्त्री व स्त्री की मित्रता वस्तुत: सहभाव पर आधारित होती है। देखा भी गया है कि स्त्री और पुरूष के बीच की असमानता, मर्द की तुलना में उसकी गौण स्थिति उसके उदार रूप-संरचना, स्वभाव, व्यवहार को विकृत कर देती है। वह सभी भूमिकाओं को निभाते हुए अपने प्रति सबसे ज्यादा गैरजिम्मेदार होती है। अनेक प्रकार की भिन्नताओं तथा बहुलताओं के बावजूद वे पितृसत्ताक समाज में पीड़ित, शोषित की एकजुट सहभावना से जुड़ी होती हैं। परम्परागत महिला पुरुष के सामने न केवल अभिनय करने बल्कि झूठ बोलने, आडंबर करने के लिए बाध्य होती है। यही कारण है कि वह अपने ही समान अन्य औरतों से सहभाव महसूस करती है। सीमोन द बोउवार इसे 'कुछ अंशों में समलिंगी कामुकता' मानती हैं। यहाँ स्त्री अपने संसार की छोटी-छोटी बातों, क्रियाकलापों, चंचलवृत्तियों, इच्छाओं, कई बार दमित कामुक भावों का उन्मुक्त भाव से साझा करती है। यहाँ यह भी रेखांकित करना ज़रूरी है कि भावों और वृत्तियों का यह स्वाभाविक प्रवाह पुरूषों के द्वारा स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। किंतु इस सहभाव की भी अपनी दिक्कत है जो आदर्श मित्रता के लिए बाधक है। पहली यह कि स्त्री का व्यक्तित्वहीन होना। व्यक्तित्व के अभाव में वे स्वयं को परे रखकर अपने संबंधों का चुनाव और निर्माण करती हैं। व्यक्तित्व एवं वैयक्तिकता का नकार उनमें आपसी समानता तथा सहभाव के बावजूद षत्रुता का सृजन करता है। जैसा कि सीमोन द बोउवार कहती हैं 'स्त्रियों में मुश्किल से सह-भाव सच्ची मित्रता में बदलता है। वे पुरूषों से अधिक संलग्नता अनुभव करती हैं। वे सामूहिक रूप से पुरूष-जगत का सामना करती हैं। प्रत्येक स्त्री उस विश्व की कीमत अपनी निजी मान्यता के आधार पर ऑंकना चाहती है। स्त्रियों के संबंध उनके व्यक्तित्व पर आधारित नहीं होते। वे साधारणत: एक-सा ही अनुभव करतीं हैं और इसी कारण शत्रुता के भाव का जन्म होता है। स्त्रियाँ एक-दूसरे को सहजता से समझ लेती हैं इसलिए वे आपस में समानता का अनुभव तो करती हैं, पर इसी कारण वे एक-दूसरे के विरुध्द भी हो जाती हैं।'

भारतवर्ष के संदर्भ में देखें तो पाएँगे कि विगत सैकड़ों वर्षों में मित्रता की परिभाषा बदलती रही है एवं स्त्री ने माँ, पत्नी, सहचरी, मित्र, प्रेमिका, बहन, बेटी बनकर उसे निभाया भी है। हमारे यहाँ मित्रता पारस्परिकता एवं पारदर्शी अभिव्यक्ति का माध्यम रही है। ऐसी मैत्री व्यक्तित्व के सर्जनात्मक विकास में सहायक होती है। कालिदास की पत्नी उनकी सच्ची मित्र ही नहीं बल्कि शिक्षिका भी रही। तुलसीदास की पत्नी उनसे कहीं अधिक शिक्षित तो थीं ही, वे वास्तव अर्थों में उनकी सहचरी भी थीं। शायद यही कारण रहा कि कालिदास ने अपनी कृति में दुष्यंत व शकुंतला को पति-पत्नी बनाने से पहले मित्र के रूप में चित्रित किया। पत्नी तो वह बाद में बनी। उसकी मित्रता दुरावरहित पारदर्शी मित्रता है। इसलिए दुष्यंत से बिछुड़ने के बाद वह अपनी शारीरिक पीड़ा नही छुपाती। अपने आग्रह को व्यक्त करती है।

भक्तिकाल में गोपियों में कृष्ण के साथ इसी मैत्री भाव की प्रधानता है। वे सारे बंधनों, वर्जनाओं को तोड़कर कृष्ण से मिलने जाती हैं। उनका निष्छल प्रेम संसार तथा निर्गुणी ईश्वर को नहीं मानता, वो तो कृष्ण में रमता है। भक्ति-आंदोलन की कवयित्रियों में भी गुरू के साथ यह मित्रता-बोध परिलक्षित होता है। गुरू उनका इनसाइडर है। वे जो किसी से नहीं कहती, गुरू से कहती हैं। सारे आडंबर व मिथ्याचार के विरुद्ध पारस्परिकता का बोध विकसित होता है। यह उसी प्रकार की मैत्री है जो पिता-पुत्र में, जब एक ही नाप के जूते होने लगे तो, होती है या तब जब पहली बार मासिक धर्म होने के बाद पुत्री और माँ के बीच होती है।

मित्रता अनमोल है। अत: आवश्यक है कि स्त्री स्त्रीत्व की मान्य पराधीनता से मुक्त हो। उसकी शिक्षा-दीक्षा उसे आत्मनिर्भर, व्यक्तित्व सम्पन्न बनाए ताकि वह निजी अस्मिता एवं स्वतंत्रता के महत्व को समझ सके। परनिर्भर व्यक्तित्वहीन स्त्री एकाकी, ईर्ष्यालु, संकीर्ण और मिथ्याचारी होती है। यही कारण है कि वह सालों साथ रहकर भी परिवार और सदस्यों से मित्रवत नहीं हो पाती। विवाह के पश्चात की स्थितियाँ कहीं ज्यादा भयानक और निर्मम हो जातीं हैं। अपनी माँ, बहनों के बाद पति की माँ, बहन, भाभी का लगातार साथ व साहचर्य भी उसे घनिष्ठ मित्रताबोध से वंचित रखता है। अर्थात् निज की अवहेलना पर बनाए संबंधों का खामियाजा वह उम्र भर भुगतती है। उसे स्वयं से प्यार करना सीखना होगा। खुद से द्वेषरत स्त्री किसी से प्रेम नहीं कर पाती। मित्रता नहीं कर पाती। उदासी, खिन्नता से घिरी वह निरन्तर असुरक्षित महसूस करती है। इसलिए उसे खुद की इयत्ता-चेतना से संपन्न होना होगा ताकि वह अपनी शक्ति, नि:स्वार्थ प्रेम की क्षमता को पहचान सके।

( विजया सिंह,रिसर्च स्कॉलर,कलकत्ता विश्वविद्यालय,कोलकाता)

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

आलोचना का पराभव और नामवर सिंह -4- समापन किश्त

    व्यक्ति-कृति केन्द्रित लेखन अंततःअधिनायकवादी राजनीति की ओर ले जाता है। स्त्री के प्रति पितृसत्तात्मक रवैय्या इसकी स्वाभाविक परिणति है। नामवर सिंह की व्याख्यान कला के सभी कायल हैं। लेकिन उनके लेखन में निहित अधिनायकवादी रणनीतियों की ओर कभी ध्यान नहीं दिया गया। अधिनायकवादी रणनीति में संदर्भ ,तथ्य और सत्य को सबसे पहले विकृत किया जाता है। उदाहरण के लिए यहां सिर्फ उनके लेख ‘साम्प्रदायिकता,राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता’ लेख को ही लें। यह समूचा लेख ऐतिहासिक भूलों ,सरलीकरण और अनैतिहासिकता से भरा हुआ है।
    नामवर सिंह ने लिखा है ‘‘ सन् 1975 में जब आपात्काल की घोषणा हुई थी ,तब 44वें संशोधन के द्वारा हमारे संविधान में ‘स्टेट’ को एक ‘सेकुलर स्टेट’ घोषित किया गया।’’ यह बात बुनियादी दौर पर गलत है। भारत के संविधान के निर्माण की सारी बहसों में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा केन्द्र में थी,संविधान का अन्तर्ग्रथित हिस्सा है धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा। ‘सेकुलर‘ पदबंध को आपात्काल में ‘प्रियंबल’ में जरूर शामिल किया गया था ,यह कांग्रेस पार्टीं के तानाशाही राजनीतिक चरित्र से ध्यान हटाने की बृहद योजना का हिस्सा था।
       यहां पर आपात्काल को अधिनायकवादी राजनीति की अभिव्यक्ति देखने की बजाय नामवर सिंह को सत्ता का साम्प्रदायिक चेहरा नजर आया।  वे आपात्काल को अधिनायकवादी राजनीति के रूप में देखते ही नहीं हैं। वे आपात्काल में तुर्कमानगेट के सफाई अभियान को सत्ता के साम्प्रदायिक अभियान के रूप में देखते हैं। जबकि यह अभियान संजय गांधी के पांच सूत्री कार्यक्रम के सौंदर्यीकरण अभियान का हिस्सा था। आपात्काल मूलतः लोकतंत्र पर हमला था,यह साम्प्रदायिक कार्रवाई नहीं है फासीवाद है। आपात्काल का राष्ट्रवाद से कोई लेना देना नहीं है।
    आपात्काल में सभी किस्म के लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिए गए थे। आपात्काल में नामवर सिंह चुप क्यों थे और आपातकाल का उन्होंने समर्थन क्यों किया इसका जबाब उन्हें कम से कम जरूर देना चाहिए। इस दौर के प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन और जेएनयू की कारगुजारियां अभी भी पुराने छात्र भूले नहीं हैं। नामवर सिंह के अजनतांत्रिक भाव को इन संग्रहों से समझने में असुविधा होगी। नामवर सिंह के बयानों की सबसे कमजोर कड़ी है उनकी राजनीतिक धारणाएं।      
     इसके अलावा नामवर सिंह के इन वाचिक निबंधों में पितृसत्तात्मक रूझानों को भी आसानी से देखा जा सकता है। यह वाचन की मार्क्सवादी पद्धति नहीं है बल्कि अधिनायकवादी पद्धति है। यह सेंसरशिप की पद्धति है।
      साहित्य में सेंसरशिप और आत्म सेंसरशिप के आदर्श हैं नामवर सिंह। वे साहित्य में सेंसरशिप अथवा दिमाग की खिड़कियों को एक ही दिशा में खोलने का काम करते रहे हैं। यह फासिस्ट प्रवृत्ति है। वे साहित्य, कृतियों और कृतिकारों के बारे में तय करके ,अघोषित प्रतिबंध लगाकर बातें करते रहे हैं, वे यह भी तय करते रहे हैं कि किस पर अब हिन्दी जगत बोले और क्या बोले । यह साहित्य में अधिनायकवाद है,प्रगतिवाद नहीं है।
     साहित्य में अधिनायकवादी नजरिया जीवन में कमजोर लोगों को निकट रखने,चाटुकारों को रखने की मनोदशा बनाता है। साथ ही साहित्य और शिक्षा संस्थानों के प्रति अजनतांत्रिक नजरिया पैदा करता है। अजनतांत्रिक नजरिया वस्तुतः दीमक की मनोदशा है। जिस तरह दीमक जहां रहती है उसे ही खाती है वैसे ही नामवर सिंह का अधिनायकवादी नजरिया साहित्य और शिक्षा संस्थानों से लेकर आलोचना तक को दीमक की तरह खाता रहा है। कभी-कभार घुड़ाक्षरन् न्याय के तहत कुछ अच्छा भी हुआ है। वैसे ही जैसे दीमक काठ खाते-खाते कभी अक्षर भी लिख देती है।        
        आपात्काल में नामवर सिंह की भूमिका में परिवर्तन आया। वे अधिनायकवादी राजनीति के साथ जा मिले और उन्होंने आपात्काल का समर्थन किया। अपने इस रूख की उन्होंने कभी आत्मालोचना नहीं की, आपात्काल की कोई भी आलोचना नहीं लिखी।
      हमें यह भी देखना चाहिए कि अन्य आलोचक जैसे रामविलास शर्मा,हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि आपातकाल में क्या कर रहे थे  ?  क्या आपात्काल ने हिन्दी आलोचना और रचना को बदला है ? यह बदलाव किस रूप में आया है ?
    आपात्काल सामान्य राजनीतिक फिनोमिना नहीं है। बल्कि असामान्य फासिस्ट फिनोमिना है। इस पर नामवर सिंह का लेखन और व्यवहार चिंता पैदा करता है।  यह पहलू उनके लेखन से गायब क्यों है ? उन्होंने कभी आपात्काल में उसके खिलाफ और बाद में विस्तार के साथ क्यों नहीं लिखा ? उन्होंने आपात्काल का समर्थन किया था जबकि अज्ञेय ने आपात्काल का विरोध किया था।
      जिस तरह भारतेन्दु युग महत्वपूर्ण परिवर्तन का प्रस्थान बिंदु है वैसे ही स्वातंत्र्योत्तर भारत में किसी भी लेखक के नजरिए को परखने के चार प्रस्थान बिंदु हैं पहला है भारत विभाजन,दूसरा ,आपातकाल , तीसरा है स्त्री, और चौथा है किसान। दुर्भाग्य से नामवर सिंह का आपात्काल और स्त्री के प्रति अलोकतांत्रिक और अवैज्ञानिक नजरिया है। जबकि किसान पर उन्होंने प्रेमचंद के बहाने व्यापक रूप में विचार किया है। इसमें उन्होंने किसान जीवन के जिस सत्य को सामने रखा है जिस सत्य के छिपाया है उस पर भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है।भारत विभाजन पर कभी विचार ही नहीं किया.         
 
       आपात्काल के पहले के साहित्यिक सवाल और आपात्काल के बाद के साहित्यिक सवालों पर नामवरसिंह का रूख एक ही परिप्रेक्ष्य को सामने नहीं लाता। आपात्काल के बाद नामवरसिंह में अतीत में जाने ,मृत मुद्दों में रमण करने और एकायामी ढ़ंग से पापुलिज्म के दबाब में ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक विषयों पर लिखने और बोलने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
    दुनिया में सभी मार्क्सवादी समीक्षकों ने अपने देश के पूजीवाद के चरित्र,स्वभाव और सांस्कृतिक-साहित्यिक प्रभावों के बारे में लिखा है,लेकिन नामवर सिंह संभवतः अकेले मार्क्सवादी हैं जो भारत के पूंजीवाद पर अपना कहीं पर भी समग्र मूल्यांकन व्यक्त नहीं करते वे सिर्फ प्रकारान्तर या किसी लेखक के बहाने से पूंजीवाद पर छोटी चलताऊ टिप्पणियां करके अपने वास्तविक सोच को छिपाए रखते हैं। उनका पूंजीवाद ,कल्याणकारी राज्य और परवर्ती पूंजीवाद के प्रति अनालोचनात्मक नजरिया गंभीर चिंता की चीज है,इसने एक खास किस्म की पूंजीवाद निरपेक्ष प्रगतिशील आलोचना को विकसित किया है जो इन दिनों खूब फलफूल रही है।
      नामवर सिंह के लेखन और व्याख्यानों में स्त्री तकरीबन गायब है (छायावाद को छोड़कर) और जो व्यक्त हुई है वह नकारात्मक और अवैज्ञानिक है। उनके इसी रूप को सामने लाने वाली एक टिप्पणी है ‘ मुक्त स्त्री की छद्म छबि’। यह टिप्पणी ‘जमाने से दो दो हाथ’ नामक संकलन में शामिल है। इस टिप्पणी का पहला वाक्य ही नामवर सिंह जैसे महापंडित के लिए अनुपयुक्त है। वैसे पूरी टिप्पणी उनके स्त्री संबंधी अवैज्ञानिक और पुंसवादी सोच का आदर्श नमूना है।
     नामवर सिंह ने लिखा है, ‘ स्त्री-पुरूष संबंधों पर हम तीन दायरों में विचार कर सकते हैं। कानून ,समाज और परिवार।’ वे भूल ही गए स्त्री-पुरूष संबंधों पर इन तीन के आधार पर नहीं ‘लिंग’ के आधार पर विचार विमर्श हुआ है। स्त्री-पुरूष का मूल्यांकन गैर-लिंगीय आधार पर करने से गलत निष्कर्ष निकलेंगे और गलत समझ बनेगी।
    कानून में स्त्री-पुरूष संबंधों को लेकर क्या लिखा है यह नामवर सिंह नहीं जानते अथवा जानबूझकर गलतबयानी कर रहे हैं,कानून में विवाह संबंधी प्रावधान हैं,लेकिन विवाह को कानून ने स्त्री-पुरूष संबंधों का मूलाधार नहीं बनाया है। भारतीय कानून लिंगीय समानता के आधार पर स्त्री-पुरूष संबंधों पर विचार करता है। न कि विवाह के आधार पर।
    भारतीय कानून लंबे समय तक स्त्री विरोधी प्रावधानों से भरा था लेकिन विगत 60 सालों में औरतों के संघर्ष ने उसमें स्त्री अधिकारों के प्रति जो असंतुलन था उसे कम किया है। उसके पुंसवादी रूझान को तोड़ा है।
      स्त्री-पुरूष संबंध का मतलब शादी का संबंध नहीं है। स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में नामवर सिंह की समझ बेहद सीमित है। वे इस टिप्पणी में स्त्री-पुरूष संबंधों को शादी के संबंध में रिड्यूज करके देखते हैं। शादी में भी बहुविवाह या अवैध विवाह में रिड्यूज करके स्त्री-पुरूष संबंध को कानूनी नजरिए से देखते हैं, वे बात शुरू करते हैं स्त्री-पुरूष संबंधों की और अचानक शिफ्ट कर जाते हैं विवाह,बहुविवाह,अवैध संबधों पर और उसमें भी निम्न-मध्यवर्गीय पुंसवादी नैतिकता के नजरिए को व्यक्त करते हैं ,विवाह के साथ ही औरतों के बारे में नामवर सिंह की टिप्पणियां पुंसवाद को अभिव्यक्त करती हैं।
    नामवर सिंह ने लिखा है ,‘यह तो मानना ही होगा कि समलैंगिकता एक अपवाद है, कोई प्रचलन नहीं। वह चाहे पुरूष पुरूष या स्त्री स्त्री के बीच हो,पर वह अप्राकृतिक है। साहित्य में इसे इसी रूप में आना चाहिए। कुछ अंग्रेजी लेखक पश्चिम के प्रभाव में इस अपवाद को ग्लोरिफाई करके सस्ती लोकप्रियता बटोरने की कोशिश कर रहे हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो मुझे स्त्रियों के अधिकारों को लेकर चल रहे आन्दोलनों का उद्देश्य समझ में नहीं आता। कहा जा रहा है कि स्त्रियाँ चूँकि अब कामकाजी हो गई हैं इसलिए वे उग्रता से अपने अधिकारों की मांग कर रही हैं। पर मुझे कोई यह तो बताए कि स्त्रियाँ कब कामकाजी नहीं थीं। यह अलग बात है कि पहले वे घरों में काम करती थीं ,अब दफ्तरों में करने लगी हैं। पर घरों का काम क्या दफ्तरों के काम से कम था। इससे भी बड़ी बात यह कि क्या घरों में काम करते हुए उनके अधिकार कम थे।’( जमाने से दो दो हाथ,पृ.123)
    नामवरसिंह जैसे प्रगतिशील विद्वान की उपरोक्त टिप्पणी स्वयं में इस बात का प्रमाण है कि उन्हें सेक्स ,परिवार और स्त्री के बारे में कितना कम और कितना गलत पता है। वरना कोई व्यक्ति इस तरह की टिप्पणी कैसे कर सकता है ‘क्या घरों में काम करते हुए उनके अधिकार क्या कम थे।’
    सच यह है कि आज भी घरों में औरतों के साथ दोयम दर्जे से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। हमारे घरों में औरतें आज भी अधिकारहीन हैं। इस बात को नामवर सिंह जानते हैं। औरतों के पास आज की तुलना में पहले भी घरों में अधिकार शून्य के बराबर थे, यदि ऐसा न होता तो औरतों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष ही नहीं करना पड़ता। घर वस्तुतःऔरत का कैदखाना है।
    यदि नामवरसिंह के अनुसार औरतों के पास पहले अधिकार थे तो बताएं वह कौन सा जमाना था जब अधिकार थे ? औरत अधिकारहीन थी,असमानता की शिकार थी, और आज भी है। यही वजह है कि आधुनिककाल में औरत के अधिकारों ,महिला संगठनों और संघर्षों का जन्म हुआ।
   इसी तरह समलैंगिकता पर भी नामवर सिंह अवैज्ञानिक बातें कह रहे हैं। समलैंगिकता स्वाभाविक आनंद है,मित्रता है। यह वैज्ञानिक सच है कि समलैंगिकता अस्वाभाविक नहीं है। वरना इस्मत चुगताई ‘लिहाफ’ जैसी महान समलैंगिक कहानी न लिखतीं। हिन्दी में आशा सहाय ‘एकाकिनी’ जैसा महान समलैंगिक उपन्यास नहीं लिख पातीं।
      नामवर सिंह की महिला आंदोलन के बारे में भ्रांत धारणा है। उनका मानना है कि महिला आंदोलन का सामाजिक परिणाम है पति-पत्नी में तलाक। महिला आंदोलन पर चलताऊ ढ़ंग से नामवर सिंह ने लिखा है ‘ इन आंदोलनों की खास बात यह थी कि पुरूषों ने स्त्रियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। बाद में गांधी के असहयोग आन्दोलन और मार्क्सवाद से प्रेरित समाजवादी आन्दोलनों में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यहाँ एक बात और कहना चाहूँगा कि पश्चिमी समाज में ऐसे आंदोलनों के अन्ततः क्या परिणाम निकले ? वहाँ हमारे समाज से अधिक तलाक होते हैं। और खासकर  सम्बंधों के मामले में वहाँ स्त्रियों का हमारे समाज से कहीं अधिक शोषण होता है। साहित्य में ये सब बातें प्रतिबिम्बित होती रही हैं। भारतीय साहित्य में स्त्री को हमेशा ही एक सम्मानित दर्जा दिया गया है। पति-पत्नी की मर्यादा का सभी लेखक निर्वाह करते आए हैं। निजी जीवन में कैसी भी स्थिति हो परन्तु साहित्य में उन्होंने पत्नी की गरिमा का ध्यान रखा है।’ (उपरोक्त,पृ.123-124)
    नामवर सिंह के अनुसार महिला आंदोलन की परिणति क्या है ? तलाक। साथ ही वे महिला आंदोलन की स्वतंत्र भूमिका और विकास को नहीं देखते बल्कि मर्दों के संघर्ष का हिस्सा मानते हैं। सच यह है कि महिला आंदोलन का परिप्रेक्ष्य  और मर्दों के द्वारा संचालित नवजागरण और समाजवादी आंदोलन के परिप्रेक्ष्य और सवालों में बुनियादी फर्क है।
     दूसरी महत्वपूर्ण भूल यह है कि स्त्री का भारतीय परिवार में पश्चिम की तुलना में कम शोषण होता है। यह बात तथ्य और सत्य दोनों ही दृष्टियों से गलत है। इस बयान में भारतीय साहित्य में स्त्री के प्रति  जिस रवैय्ये की बात कही गयी है वह गलत है। भारतीय साहित्य की मूलधारा पुंसवादी है,वहां स्त्री का पुंसवादी परिप्रेक्ष्य में व्यापक चित्रण हुआ है। साहित्य में स्त्री साहित्य की भयानक उपेक्षा हुई है। स्त्री के पुंसवादी चित्रण जैसे पति-पत्नी की मर्यादा के पुंसवादी चित्रण को नामवरसिंह आदर्श चित्रण मानते हैं।  स्त्री के प्रति पुंसवादी नजरिए और स्त्री नजरिए में वे अंतर नहीं करते।
       फिल्मों से लेकर साहित्य तक स्त्री का जो चित्रण है उसे नामवर सिंह मनमाने ढ़ंग से पेश करते हैं ,गलत तर्क देते हैं और गलत निष्कर्ष निकालते हैं। वे औरत के सामयिक तेवर से परेशान हैं और उसे संयमित होने का उपदेश देते हैं। सवाल यह है कि क्या नामवर सिंह नहींजानते कि औरतें सैंकडों सालों से पुरूषों के आक्रामक तेवर की शिकार रही हैं।
    स्वयं नामवर सिंह की इतनी घृणित और आक्रामक स्त्री विरोधी टिप्पणी की हिन्दी जगत में कायदे से भर्त्सना होनी चाहिए थी लेकिन हुआ उलटा उसे  चार-पांच प्रकाशित प्रगतिशील संकलनों में शामिल किया गया । इससे हिन्दी में प्रचलित प्रगतिशील साहित्यकारों के प्रकाशनों में छायी पितृसत्तात्मक विचारधारा की मजबूत पकड़ को देखा जा सकता है।
     प्रगतिशील लेखक संघ की पत्रिका ‘वसुधा’ ने भी इस टिप्पणी को छापा था, इससे यह भी पता चलता है कि मार्क्सवाद के नाम पर भारत में पितृसत्ता को बनाए रखने का वैचारिक और सांगठनिक तामझाम नग्नतम रूप में काम कर रहा है। यह टिप्पणी नामवर सिंह के पितृसत्तात्मक नजरिए का आदर्श उदाहरण है यह प्रगतिशील आलोचना के क्षय की भी सूचना है।
      अंत में, नामवर सिंह की आलोचना पद्धति पर उनके ही हवाले से कहना चाहता हूँ  कि नामवर सिंह ने आलोचना टुकड़ों में लिखी है। उन्होंने ‘छायावाद’ को छोड़कर किसी भी लेखक या आंदोलन पर समग्रता में नहीं लिखा है।
     उनका एक चर्चित व्याख्यान है ‘ ‘गोदान’ को फिर से पढ़ते हुए’ यह सन् 2009 में प्रकाशित हुआ है,यह उनके नजरिए का ताजा पैमाना है। इसमें नामवर सिंह ने प्रेमचंद के स्त्री और दलित समीक्षकों पर जो कहा है, वह उन पर भी लागू होता है,नामवर सिंह ने कहा है ‘‘ मैं पहली बात उनसे कहना चाहता हूँ कि जो लोग ‘गोदान’ में दलित विमर्श देखना चाहते हैं, और जो स्त्री विमर्श देखना चाहते हैं,ये देखना, ‘गोदान’ को टुकडे़ में देखना है और सम्पूर्ण की उपेक्षा करना है। ये मिथ्या चेतना और एक अर्थ में ऑडियोलॉजिकल दृष्टि है। प्रेमचंद में केवल दलित विमर्श ढूँढना और उसे गलत ठहराना या केवल स्त्री विमर्श ढूँढना ऐसा है जैसे अंधों का हाथी देखना। हाथी की पूँछ हाथ लगी तो कहा हाथी ऐसा ही होता है, यह ऑडियोलॉजिकल दृष्टि है। अर्द्धसत्य झूठ से भी ज्यादा खतरनाक होता है। उसी तरह उतना ही खतरनाक होगा-प्रेमचंद को किसी एक दृष्टि से देखना।’’ ( प्रेमचंद और भारतीय समाज,पृ.174)
    आश्चर्य की बात यह है नामवर सिंह को प्रेमचंद को समग्रता में देखने का ज्ञान 2009 में हुआ। क्या नामवर सिंह जबाब देंगे कि उन्होंने प्रेमचंद पर टुकड़ों में विचार करते हुए अपने विचारों को 24 निबंधों में अलग-अलग क्यों व्यक्त किया ? उन्होंने प्रेमचंद पर समग्रता में विचार करते हुए एक किताब क्यों नहीं लिखी ? समग्रता में विचार करते हुए कोई निबंध क्यों नहीं लिखा ?
    यदि किसी एक दृष्टि का सहारा लेकर लिखना विचारधारात्मक दृष्टि है तो उनकी इन चार किताबों में शामिल निबंधों में विभिन्न विषयों पर लिखे और बोले जिस अर्द्धसत्य को स्वयं नामवर सिंह ने व्यक्त किया है क्या उसे भी खतरनाक मानें ?
     वे जबाब दें कि उनके स्त्री के बारे में व्यक्त विचार झूठ से भी ज्यादा खतरनाक हैं या नहीं ? हम चाहेंगे नामवर सिंह स्त्री पर लिखे अपने सबसे घृणिततम लेख में व्यक्त विचारों को सार्वजनिक तौर पर अस्वीकार करें   ।
        नामवर सिंह टुकडों में बोल-लिखकर समग्रता में मलाई खाते रहे हैं। क्या उनके प्रेमचंद पर व्यक्त विचारों को समग्रता में व्यक्त विचार मान लें ? क्या वे कह सकते हैं कि उन्होंने जो लिख दिया वह सम्पूर्ण है,अब भविष्य में प्रेमचंद पर नया सोचा ही नहीं जा सकता  ? यदि ऐसा होगा तो हम आलोचना से लौटकर काव्यशास्त्र की दुनिया में पहुँच जाएंगे। फिर व्याख्या और पुनर्व्याख्या का क्या होगा ?
     क्या मार्क्स ने समग्रता में पूंजी को देख लिया था ? क्या संचार क्रांति युग के परवर्ती पूंजीवाद का रूप उनके यहां है ? क्या मार्क्स के विचारों के आगे जाकर पूंजी की भूमिका को देखने की जरूरत है या नहीं ?
    नामवर सिंह ,रामविलास शर्मा, विजयदेवनारायण साही आदि के नजरिए से भिन्न नजरिए से किसी एक दृष्टि से प्रेमचंद को देखना यदि विचारधारा है तो फिर इन आलोचकों में से किसने समग्रता में प्रेंमचंद पर विचार किया है ? यदि समग्रता में विचार हो ही गया है तो फिर नामवर सिंह के व्याख्यान की क्या प्रासंगिकता है ? एक सवाल यह भी उठता है नामवर सिंह को अपना सारा लिखा और बोला प्रासंगिक क्यों लगता है ? क्या वे कार्ल मार्क्स ,जार्ज लूकाच आदि की अपने लिखे को अस्वीकार करने की परंपरा से कुछ सीख ले सकते हैं ? एक अच्छे मार्क्सवादी में अपने गलत विचारों के अस्वीकार का साहस होना चाहिए। नामवर सिंह अपने गलत विचारों से अपने को अलग क्यों नहीं करते ? वे संस्कृत के काव्यशास्त्रियों की तरह अपने लिखे को परम सुंदर और सही क्यों मानते हैं ? उनकी इन किताबों में बहुत सारा हिस्सा ऐसा है जो अधूरा और विभ्रमों से भरा है,अवधारणात्मक तौर पर गलत समझ से भरा है।    
     असल में नामवर सिंह स्त्री विमर्श और दलित विमर्श को अप्रासंगिक मानते हैं। नामवर सिंह बताएं कि औरतें और दलित क्या करें ? क्या वे अपने नजरिए का निर्माण न करें ? क्या स्त्री और दलित के नजरिए से समाज,साहित्य ,संस्कृति,राजनीति,अर्थनीति को न देखा जाए ? यदि नामवर सिंह का आशय यह है कि स्त्री और दलित नजरिए से चीजों को न देखा जाए तो यह तो वर्णाश्रम व्यवस्थापंथी दृष्टिकोण की शरण में वापसी होगी । यह साहित्य की शव साधना है। प्रेमचंद पर नामवरसिंह का 2009 का व्याख्यान प्रेमचंद को सिर के बल खड़ा करने की बुद्धि का आदर्श प्रमाण है।              


































रविवार, 18 अप्रैल 2010

पितृसत्ता से भागते हिन्दी आलोचक



                                      
          हिन्दी की अधिकांश आलोचना मर्दवादी है।इसमें पितृसत्ता के प्रति आलोचनात्मक विवेक का अभाव है।आधुनिक आलोचना में धर्मनिरपेक्ष आलोचना का परिप्रेक्ष्य पितृसत्ता से टकराए,उसकी मीमांसा किए बगैर संभव नहीं है।मसलन् ,अभी तक तुलसी पर समीक्षा ने लोकवादी जनप्रिय नजरिए से विचार किया है और पितृसत्ता को स्पर्श तक नहीं किया है।
   आधुनिक काल या पहले के किसी भी काल की आलोचना,संस्कृति,इतिहास आदि का कोई भी विमर्श पितृसत्ता की उपेक्षा करके विकसित नहीं हुआ है। पितृसत्ता सभी विचारधाराओं की धुरी है। समाज में किस विचारधारा का वर्चस्व होगा यह इस बात से तय होता रहा है कि आखिरकार पितृसत्ता के साथ किस तरह का संबंध है।
     प्राचीनकाल से लेकर आधुनिककाल तक का समूचा विमर्श पितृसत्ता के साथ अपना रवैयया तय करके ही विकास कर पाया है।मजेदार बात यह है कि हिन्दी में पितृसत्ता वर्चस्व बनाए हुए है,हमने कभी इसके बारे में बहस तक नहीं की,आलोचना नहीं लिखी,गोया ! हमारे समाज में पितृसत्ताा का अस्तित्व ही न हो ! सवाल किया जाना चाहिए क्या पितृसत्ता को चुनौती दिए बिना धर्मनिरपेक्ष समाज और आलोचना का विकास संभव है , क्या पितृसत्ता की आलोचना से रहित आलोचना को धर्मनिरपेक्ष आलोचना कहा जा सकता है ?जी नहीं,धर्मनिरपेक्ष आलोचना का पितृसत्तात्मक विचारधारा की आलोचना के बिना विकास ही संभव नहीं है।    
    धर्मनिरपेक्ष आलोचना के विकास के लिए पितृसत्तात्मक विचारधारा के परिप्रेक्ष्य में ''रामचरित मानस ''पर विचार किया जाना चाहिए। तुलसीदास की इस ऐतिहासिक लोक रचना में पितृसत्ता के अन्तर्विरोधों का बारीकी से मूल्यांकन किया गया है। वे सामंती पितृसत्ता की बजाय व्यापारिक पूंजीवाद युगीन पितृसत्ता की परिकल्पना पेश करते हैं। यह सच है कि तुलसीदास पितृसत्ता से अपने को मुक्त नहीं कर पाते,किंतु पितृसत्ता के जिस रूप को वे अपने पात्रों के इर्द-गिर्द निर्मित करते हैं ,वह व्यापारिक पूंजीवादी पितृसत्ता है, यही आधुनिक पितृसत्ता का आधार है,यही वजह है कि आधुनिक पितृसत्ता के अनेक लक्षणों से इसका सहज साम्य नजर आता है।
    मसलन् विवाह संस्था के प्रति व्यक्त नजरिए को गौर से देखें तो पाएंगे कि तुलसीदास ने विवाह संस्था में बहु-पत्नीप्रथा और एक-पत्नीप्रथा के बीच के अंतर्विरोधों को केन्द्र में रखा है, बहुपत्नी प्रथा के प्रतीक हैं राजा दशरथ और एक पत्नी प्रथा के प्रतीक हैं राजा राम और उनके भाई, रावण एवं उसके परिवार है।तुलसी ने बार-बार इस अन्तर्विरोध की परतें खोलते हुए एक पत्नी प्रथा को तुलनात्मक रूप में ज्यादा बेहतर माना है,सामंती समाज व्यवस्था में एक पत्नी प्रथा का एजेण्डा पहलीबार केन्द्र में लाने का श्रेय तुलसी को है जिसे कालांतर में रैनेसां में प्रमुख सामाजिक सुधार का एजेण्डा बनाया गया।
     भक्ति-आंदोलन में रामभक्ति और कृष्णभक्ति की दो धाराओं में विचारधारात्मक भिन्नाता का सबसे प्रमुख आधार यदि पितृसत्ता को बनाया जाए तो ज्यादा सटीक विमर्श तैयार किया जा सकता है। कृष्णकाव्य धारा वस्तुत: पुराने किस्म के पितृसत्ताबोध को व्यक्त करती है जिसमें कृष्ण की एकाधिक रानियां हैं,तकरीबन वैसे ही जैसे दशरथ की हैं।
    इसी तरह सामंती समाज में शादी पहले होती थी और प्रेम बाद में।किंतु तुलसीदास ने राम और सीता में प्रेम पहले कराया और शादी बाद में। उन दोनों का विवाह प्रेम की परिणति है।तुलसीदास न्याय-अन्याय के सवाल पर तटस्थ रूख नहीं अपनाते,राजा-प्रजा के बीच के संघर्ष में प्रजा के साथ हैं। न्याय के साथ हैं।तुलसी को सामंती व्यवस्था ने अपार कष्ट दिए थे यही वजह है कि उनकी रचनाओं में रह-रहकर सामंती व्यवस्था के प्रति घृणा व्यक्त हुई है।सामंती समाज की सबसे बड़ी कमजोरी है निष्क्रियता।तुलसी का साहित्य निष्क्रियता का साहित्य नहीं है।
पितृसत्ता के नजरिए से देखें तो तुलसी पुराने किस्म की पितृसत्ता की बजाय नए किस्म की  पितृसत्ता का एजेण्डा बनाते हैं,इसमें एक पत्नी प्रथा पर जोर है।स्त्रियों की अभिव्यक्ति पर जोर है, उल्लेखनीय है कि स्वयं तुलसीदास की पत्नी भी बड़ी लेखिका थी, कवियित्री थी।
    जबकि निर्गुणपंथी कबीर का नजरिया पुराने किस्म की पितृसत्तात्मकता को व्यक्त करता है,इसमें स्त्रियों के प्रति किसी भी किस्म के दायित्वबोध का चित्रण नहीं मिलता।सृजन के क्षेत्र में पितृसत्ताा के पुराने रुपों को चुनौती स्त्रियों के कार्य-व्यापार और अभिव्यक्ति के रूपों के चित्रण से मिलती है।
     रामचरित मानस में स्त्री-पात्र जितना अपने को व्यक्त करते हैं,अपने अधिकार, आत्म-सम्मान और भावनाओं को लेकर जितना सजग हैं,उतना अन्यत्र नहीं दिखते।यह अचानक नहीं है कि रामभक्ति और रामकथा आज भी औरतों को अपील करती है। दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि तुलसीदास ने स्त्री को सामाजिक निर्मिति के रुप में चित्रित किया है,वे स्त्री को बायोलॉजिकल रूप में पेश नहीं करते।स्त्री की लिंगीय अस्मिता की बजाय सामाजिक अस्मिता को महत्वपूर्ण मानते हैं।
      पुराने किस्म का पितृसत्तात्मक नजरिया स्त्री के कामुकभाव पर मुग्ध था,संस्कृत -साहित्य की परंपरा में श्रृंगार-रस का वर्चस्व था,यहां तक कि श्रृंगार-रस के गहरे प्रभाव में भक्ति आंदोलन के कवि भी थे। स्त्री के श्रृंगार-रस में चित्रित रूप से भिन्न स्त्री का रूपायन तुलसी के मानस की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
     तुलसी के यहां स्त्री सामाजिक पहचान के साथ दाखिल होती है ,न कि श्रृंगारी पहचान के साथ।पितृसत्ता की विचारधारा वैराग्य और वासना इन दो के ऊपर ज्यादा जोर देती है,भक्ति के निर्गुण संतों में वैराग्य भाव कूट-कूटकर भरा पड़ा है,इसका प्रच्छन्न और प्रत्यक्ष रूप में हिन्दी की आलोचना में खूब महिमामंडन हुआ है।
     पितृसत्ता के नए पैराडाइम में तुलसीदास ''रामचरित मानस'' के जरिए वैराग्य और वासना इन दो तत्वों को किसी भी रूप में महिमामंडित नहीं करते। पहलीबार वे दशरथ से राम का विछोह कराकर एकल परिवार और उसकी चुनौतियों को चित्रित करते हैं। पुराने किस्म की पितृसत्ता में स्त्री के प्रति न्याय और समानता का दृष्टिकोण नहीं है। व्यापारिक पूंजीवाद के दौर में यह दृष्टिकोण अपनी अंतिम सांसें ले रहा था।
   तुलसीदास न्याय की नजर में समानता के पक्षधर और विरोधियों का चित्रण करते समय हाशिए अथवा अधिकारहीनों के हित में न्यायभावना का चित्रण करते हुए जिस तरह धोबी की गुहार पर सीता के बारे में राम से न्याय कराते हैं ,उसे प्रतीकात्मक रूप में विखंडित करके पढ़ा जाना चाहिए।
    इसी तरह रावण चाहता तो सीता के साथ जबर्दस्ती कर सकता था,शादी भी कर सकता था, किंतु राम से लेकर रावण तक सबका स्त्रियों के प्रति एक ही भाव है कि अंतत: स्त्री की इच्छा का सम्मान करो।
      स्त्री की इच्छा को प्रमुख एजेण्डा तुलसीदास ने बनाया,जबकि निर्गुणपंथियों के यहां स्त्री की इच्छा का कोई मूल्य ही नहीं है। इसी तरह राजा दशरथ का कैकेयी की इच्छा का सम्मान करना और उसे वर प्रदान करना वस्तुत: स्त्री इच्छा को तरजीह देने की कोशिश है।
     पुराने किस्म की पितृसत्ता को तब ज्यादा वैचारिक परेशानी होती है जब स्त्री की इच्छा व्यक्त होने लगे। स्त्री को भोग की वस्तु,अधिकारहीन अवस्था से मुक्ति दिलाने का यह मौन क्रांतिकारी प्रयास है। स्त्री की इच्छाओं को केन्द्र में लाकर,स्त्री की पीड़ा को केन्द्र में लाकर बड़ा कार्य किया है। कमजोरी यह है कि युद्ध में मच रही तबाही और उसके कारण स्त्री जाति को किस तरह की मानसिक,सामाजिक यातनाओं से गुजरना पड़ता है,स्त्रियां युध्द से किस तरह पीड़ित हैं और युध्दोत्तर दौर में उनकी क्या अवस्था होती है, इसके व्यापक ब्यौरे और विवरण तुलसीदास के रामचरित मानस में एकसिरे से गायब हैं, इन पर लेखक चुप है, वह चुप क्यों है ? यह पहलू एकदम नए किस्म के विमर्श को जन्म दे सकता है, स्त्रियां युद्ध में किस पीड़ा से गुजरती हैं,हमारे लेखक और आलोचना की उस पर नजर ही नहीं पड़ी।



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