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शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

मोदी सरकार की असंवैधानिक और विध्वंसक नोट नीति-

            पीएम नरेन्द्र मोदी डर के मारे संसद में नहीं बोल रहे,डर के मारे बैंक पीड़ितों से नहीं मिल रहे, आत्महत्या कर रहे किसानों से नहीं मिल रहे,उनके अंदर का डर इस कदर हावी है कि रिजर्व बैंक को स्वायत्त ढ़ंग से काम नहीं करने दे रहे।इसके विपरीत राहुल गांधी एकदम निडर और निस्संकोच आम जनता में जाकर मिल रहे हैं,बैंक और एटीएम की लाइन में लगे लोगों से मिल रहे हैं,कर्ज से पीड़ित किसानों से मिल रहे हैं ।आंदोलनकारी पूर्व सैनिकों से मिल रहे हैं।लोकतंत्र में तानाशाह और लोकतांत्रिक नेता का अंतर देखना हो तो डर के पैमाने से देखो,डरा नेता जनता से दूर रहता है, हिटलर की तरह हमेशा सभा मंच पर नजर आता है जनता से दूर रहता है,जबकि लोकतांत्रिक नेता हमेशा जनता में नजर आता है।

जिस तरह आपातकाल ने उत्तरभारत में कांग्रेस की कमर तोड़ी थी वैसे ही नोटबंदी ने भाजपा की पूरे देश में रीढ़ तोड़ दी है। आपातकाल के लाभ विपक्ष ने उठाए उसी तरह नोटबंदी से पैदा हुई तबाही का लाभ विपक्ष को मिलना तय है। नोटबंदी के मायने हैं " नो अपील नो वकील और नो दलील" । यही आपातकाल का मोटो था।जिसे सुप्रीम कोर्ट में उस जमाने के महान्यायवादी ने व्यक्त किया था।

पी एम नरेन्द्र मोदी लगातार झूठ बोल रहे हैं,वे कह रहे हैं नोट बंदी का कुछ दिन तक ही बुरा असर रहेगा,सच यह है इसका बहुत ज्यादा दिनों, कई महिने और कई साल तक बुरा असर रहेगा।भारत की सारी दुनिया में इससे मट्टी पलीत हुई है।अब विदेशी पूंजी निवेश कम से कम भारत में निकट भविष्य में नहीं आएगा।सारी दुनिया जान गयी है भारत में इस समय ऐसा पीएम है जिसके पास स्नातक स्तर के ज्ञानधारी देशभक्त और नौकरशाह हैं।

सारी दुनिया में जितने पीएम हैं वे बेहतरीन शिक्षितों से विभिन्न पहलुओं पर सलाह करके नीति बनाते हैं लेकिन मोदीजी ज्ञानी और विद्वानों से कोसों दूर रहते हैं ,उनके पास नौकरशाह सलाहकार हैं,ये नौकरशाह सलाहकार अधिक से अधिक स्नातक हैं और इनकी कोई विशेष योग्यता नहीं है।इसके अलावा यह भी पता चला है कि नोट नीति बनाते समय कुछ ही लोगों से सलाह करके फैसला लिया गया,ये कुछ लोग कौन हैं यह भी सामने आना बाकी है,उनके काम करने की पद्धति वही है जो आपातकाल में श्रीमती गांधी की थी,वे चंडाल चौकड़ी से घिरी हुई थीं,सारे फैसले चंडाल चौकड़ी लेती थी, मंत्रीमंडल कागजी था,संविधान फालतू था।मोदीजी भी चंडाल चौकड़ी से घिरे हैं और वही देश को संचालित कर रही है।नोट बंदी का फैसला इसी चंडाल चौकड़ी ने लिया है।अखबारों में अभी जो नाम आ रहे हैं वे सब गलत हैं।असली नाम कुछ और हैं।नोट बंदी का फैसला न तो रिजर्व बैंक ने लिया है और न मंत्रीमंडल ने विस्तार से बहस करके लिया है,यह फैसला मूलतःपीएम का है और उसे सारे देश पर थोप दिया गया है। नियमानुसार यह फैसला संसद और रिजर्व बैंक को लेना था,लेकिन संसद को ठेंगे पर रखा गया है,रिजर्व बैंक को रबड़ स्टैम्प की तरह इस्तेमाल किया गया है।इस सबको नाम दिया गया सीक्रेसी का।

जो नीति सारे देश पर लागू होनी है उस पर सीक्रेसी की क्या जरूरत यह बात हमारी समझ में नहीं आती।यह कैसी नीति है जिस पर रिजर्व बैंक बहस न करे,संसद बहस न करे,मंत्रीमंडल में बहस न हो,देश में बहस न हो और देश से कह दिया जाए कि तुम नीति का पालन करो।यही तो अधिनायकवाद है।



नोट नीति के जरिए पीएम मोदी की जनता में पहलीबार प्रशासनिक दक्षता परीक्षा हुई और वे इसमें बुरी तरह फेल हुए हैं।जबकि वे प्रशासनिक दक्षता और ईमानदारी के दावे पर वे लोकसभा का चुनाव जीतकर आए थे। इस नीति के पहले उनकी नीतिगत तौर पर जनता में कोई परीक्षा नहीं हुई थी,यहां तक कि जिन जनधन खाता धारकों के करोड़ों खाते खुलवाने का वे दावा करते हैं उसमें बैंक कर्मचारियों की बड़ी भूमिका थी,इसमें मोदीजी की प्रशासनिक क्षमता नजर नहीं आती,जिस तरह वे खाते खुले हैं,सारा देश जानता है, उनकी अक्षमता,मूर्खता और जनविरोधी भावनाओं को आम जनता में नंगा करके रख दिया है।कल राज्यसभा में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विमुद्रीकरण की नीति को सटीक आलोचना करते हुए तबाही के जिस मंजर का खाका पेश किया है वह हम सबके लिए चिन्ता की बात है।इसके विपरीत कल वित्तमंत्री अरूण जेटली की पूर्व पीएम मनमोहन सिंह पर हमला करने वाली प्रेस कॉंफ़्रेंस देखकर यह विश्वास हो गया है कि मोदी सरकार सभ्यता और लोकतंत्र की सभी सीमाएँ लांघ चुकी है और असहिष्णुता के शिखर पर बैठी है। जेटली के बयान का मर्म यह था कि मनमोहन सिंह को बोलने का कोई हक नहीं है।क्योंकि उनके शासन में कालाधन आया , सबसे ज्यादा घोटाले हुए , वे महान पापी हैं! जो महान पापी हैं उनको मोदीजी जैसे चरित्रवान,ईमानदार, बेदाग़ नए कपड़े पहने वाले नेता की नीति की आलोचना करने का कोई हक नहीं है।मोदी जी इतने महान हैं कि विगत सत्तर साल में इस तरह का चरित्रवान और पुण्यात्मा कोई पीएम नहीं बना है! सच तो यह है उनसे बेहतर कोई पीएम न तो सोच सकता है और न बोल ही सकता है!!
मोदीजी महान हैं! क्योंकि वे संविधान के बंधनों से मुक्त हैं! हमेशा १२५ करोड लोगों के बंधन में बँधे रहते हैं। १२५ करोड लोगों की तरह ही सोचते हैं, हँसते हैं, गाते हैं ,खाते हैं, रोते हैं!!उनके मन और तन में १२५ करोड़ मनुष्य वास करते हैं!करोड़ों जीव-जन्तु-पशु-पक्षी उनके हृदय में निवास करते हैं !
उनका मन मंदिर है और हृदय जंगल है।वे इस जंगल के बेताज बादशाह हैं। वे वैसे ही अक्लमंद हैं जैसे जंगल में पशु -पक्षी अक्लमंद होते हैं।जिस तरह १२५ करोड जनता कभी किसी अर्थशास्त्री से राय नहीं लेती जो मन में आए काम करती है मोदीजी भी ठीक वैसे ही काम करते हैं।यही वजह है मोदीजी महान हैं! मोदीजी की आलोचना वही कर सकता है जो उनके जैसा महान हो ! मनमोहन चूँकि मोदीजैसे महान नहीं हैं इसलिए उनकी बातों को गंभीरता से दरकिनार करने की जरूरत है।रही बात संसद की तो संसद नक्षत्रों से भरी है उसमें मोदी जैसा सूर्य मिसफ़िट है। यही वजह मोदी जैसा सूर्य हमेशा संसद के बाहर ही चमकता है , कल पंजाब में दिखाई देंगे ।

शनिवार, 17 मई 2014

कांग्रेस की पराजय के प्रमुख कारण

इस बार के लोकसभा चुनाव में विकास के मुद्दे ने सभी मुद्दे अपहृत कर लिए इन अपहृत मुद्दों में बड़ा मुद्दा स्त्री के अधिकारों और सुरक्षा संबंधी मसलों से जुड़ा था। यह दुर्भाग्यजनक है कि स्त्री के सवाल जो विगत दो साल से मीडिया में सबसे ज्यादा स्थान घेरे रहे वे सवाल मीडिया में से ठेलकर बाहर कर दिए गए। यह प्रक्रिया क्यों और कैसे संपन्न हुई यह विचारणीय समस्या है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों के जनविरोधी पहलू की तो चर्चा हुई लेकिन विकल्प की नीतियों पर कोई बात नहीं हुई।

कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व ने इसबार के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी चूक यह की कि उसने मनमोहन सिंह को सामने रखकर चुनाव नहीं लड़ा। भारतीय समाज में बूढ़ा नेता साखदार होता है। मनमोहन सिंह को सामने रखकर चुनाव लड़ा जाता तो परिणाम भिन्न होते और राजनीतिक जबावदेही के नाते उन्हें जनता में भेजना चाहिए था लेकिन अफसोस यह कि जनता में मनमोहन कम से कम गए। मनमोहन सिंह देश की नीतियों के प्रतीक हैं वे चुनाव के समय चुप रहेंगे तो यह बात देश की जनता हजम नहीं कर सकती।

कांग्रेस के दोनों नेताओं सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने  कांग्रेस की पराजय तो मानी  लेकिन इस पराजय में कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों और कांग्रेसी नेता और जनता के बीच में पैदा हुए अलगाव को नहीं देखा।
   कांग्रेस को रेखांकित करना चाहिए कि वे कौन सी नीतियां है जिनके कारण जनता से कांग्रेस का अलगाव बढ़ा। कांग्रेस यदि अपनी नीतियों के जनविरोधी चरित्र को नहीं देखेगी तो वह पराजय के सही कारणों को नहीं खोज पाएगी। वह यह भी नहीं देख पाएगी कि कांग्रेस का क्षय क्यों हो रहा है।
कांग्रेस को बताना होगा कि उसकी नीतियों के गर्भ से भाजपा जैसा अनुदार दल शक्तिशाली कैसे बना। भाजपा की शक्ति में इजाफा मनमोहन युग में हुआ है। कांग्रेस ने जिस ग़रीब विरोधी एजेण्डे को राजनीतिक बुलंदियाँ पर पहुँचाया है उसे चुनौती देना फ़िलहाल किसी भी दल का लक्ष्य नहीं है फलत:विकल्पहीनता पैदा हुई है और इस विकल्पहीनता को मोदी ने आक्रामक नव्य उदार एजेण्डे से भरा है और इस काम में जनता ने मोदी के हाथों सत्ता सौंपकर अपने लोकतांत्रिक दायित्व का पालन किया है।
अब देखना है कि मोदी अपने कार्यकाल में कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों को ख़त्म करते हैं या उन पर ही चलते हैं ? यहाँ नेता बदला है, दल बदला है। नव्य उदार आर्थिक नीतियाँ नहीं बदली हैं। देखना होगा मोदी नव्य उदार नीतियों के प्रति संघ के स्वदेशी एजेण्डे के साथ आते हैं या मनमोहन नीतियों को जारी रखते हैं।






शनिवार, 20 जुलाई 2013

नरेन्द्र मोदी के चुनावी विभ्रम


भाजपा और नरेन्द्र मोदी का आनेवाले चुनाव में संभावित वैचारिक नारा "ताकतवर-भारत" का होगा। मोदी के प्रचार अभियान के प्रधान मुद्दे होंगे पड़ोसियों से दबकर मत रहो ।उनसे अकड़ से पेश आओ। अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यकों का समानता के नाम पर दबाब बनाए रखो। उन्हें मैनस्ट्रीम से बाहर रखो।
मोदी और भाजपानेताओं के भाषणों का मूल मुद्दा मनमोहन सरकार की करप्टशासन प्रणाली और अनेकों घोटाला गाथाएं रहेंगी।
मोदी के प्रचार का लक्ष्य है धर्मनिरपेक्ष सामाजिक बहुलतावाद को "भारत पहले "पदबंध के जरिए बहस से गायब करो। युवाओं की बात करने के बहाने,मध्यवर्गीय युवाओं को अपील करो। खेतीहरयुवाओं-अल्पसंख्यकयुवाओं पर ध्यान न दो। मजदूरों-किसानों के मूल सवालों से आम चुनाव में जनता का ध्यान हटाओ। नव्य-उदार नीतियों के जनविरोधी चरित्र पर से ध्यान हटाने के लिए "आदर्श गुजरात विकास " पर जोर दो। गुजरात विकास के कारपोरेट चरित्र का महिमामंडन करो और देश को उसका अनुगमन करने का संदेश दो।
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नरेन्द्र मोदी जिस संघ परिवार से आते हैं उसकी खूबी है कि गुरू गोलवल्कर जो लिख गए हैं उन विचारों में अब तक कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। मोदी गुरूजी के कथनों से ही प्रेरित होकर अपना रेहटोरिक सुनाते रहते हैं ।
मोदी से सवाल किया जाना चाहिए कि क्या वे संघ की विचारधारा या गोलवल्कर के विचारों को भाजपा के राजनीतिक घोषणापत्र का हिस्सा बनाकर गुजरात सरकार या भावी केन्द्र सरकार में लागू कर सकते हैं ?
मोदी या संघीनेताओं के चरित्र का यह दुरंगापन है कि वे भाषण देते हैं संघ के विचारों के अनुकूल ,और सरकार में आचरण करते हैं एकदम भिन्न।

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नरेन्द्र मोदी जबाब दें- 1-

नरेन्द्र मोदी और उनकी मीडियाटीम से सवाल किया जाना चाहिए कि मोदी का गुरू गोलवल्कर के मुसलमान और ईसाइयों से संबंधित विचारों से सहमति है क्या ? नीचे गोलवल्कर का उद्धरण दे रहे हैं ,नरेन्द्र मोदी क्या इससे सहमत हैं ?

"The non-Hindu people of Hindustan must either adopt Hindu culture and languages, must learn and respect and hold in reverence the Hindu religion, must entertain no idea but of those of glorification of the Hindu race and culture... in a word they must cease to be foreigners; Or may stay in the country, wholly subordinated to the Hindu nation, claiming nothing, deserving no privileges, far less any preferential treatment— not even citizens' rights"

— M. S. Golwalkar

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नरेन्द्र मोदी जबाव दें- 2-

मोदी का बड़ा जोर है कि इनको एसआईटी ने निर्दोष माना है,जबकि किसी अदालत ने उनको निर्दोष नहीं माना है। सवाल यह है कि जमशेदपुर दंगों में संघ की भूमिका के लिए मोदी क्या संघ की निंदा करेंगे ?

"After giving careful and serious consideration to all the materials that are on record,the Commission is of the view that the RSS with its extensive organisation in jamshedpur and which had close links with the Bharatiya Janata Party and the Bharatiya Mazdoor Sangh had a positive hand in creating a climate which was most propitious for the outbreak of communal disturbances. In the first instance, the speech of Shri Deoras (delivered just five days before the Ram Navami festival) tended to encourage the Hindu extremists to be unyielding in their demands regarding Road No. 14. Secondly, his speech amounted to communal propaganda. Thirdly, the shakhas and the camps that were held during the divisional conference presented a militant atmosphere to the Hindu public. In the circumstances, the commission cannot but hold the RSS responsible for creating a climate for the disturbances that took place on the 11th of April, 1979"

— Jitendra Narayan in a report on Jamshedpur riots of 1979
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मोदी से सवाल है कि वे हिटलर के बारे में क्या सोचते हैं , वे क्या गुरू गोलवल्कर के विचारों से सहमत हैं। मोदी जानते हैं कि भारत में हिटलर को घृणा की नजर से देखा जाता है। भारत हिन्दूराष्ट्र नहीं है। दूसरी बात यह कि नस्लवादी मानसिकता पर गर्व नहीं किया जा सकता।नस्लवाद आधुनिकयुग का धीमाजहर है,वैसे ही हिन्दुत्व भी धीमाजहर है। गुरू गोलवल्कर का मानना था-
"To keep up the purity of the Race and its culture, Germany shocked the world by her purging the country of the semitic Races — the Jews. Race pride at its highest has been manifested here. Germany has also shown how well nigh impossible it is for Races and cultures, having differences going to the root, to be assimilated into one united whole, a good lesson for us in Hindusthan to learn and profit by.
Ever since that evil day, when Moslems first landed in Hindustan, right up to the present moment, the Hindu Nation has been gallantly fighting on to take on these despoilers. The Race Spirit has been awakening."
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कल (18जुलाई 2013)अन्ना हजारे का बयान कुछ था लेकिन आज दूसरा बयान आया है। अन्ना ने कहा है मोदी धर्मनिरपेक्ष नहीं है। पढ़ें- NEW DELHI: Calling BJP communal, activist Anna Hazare on Friday said he never described Narendra Modi as secular.

"He (Modi) belongs to a party that sympathizes with only one community, and is against other communities. It is also known that it is totally against one particular community," Hazare told reporters.

"Modi represents what BJP stands for. From their statements, it appears to be communal. I don't want to talk about an individual person, because it is a matter of his political party. BJP has nominated Narendra Modi as chairman of its campaign committee," he said.

Hazare said a non-communal person, who can provide better governance, should come to power after the elections.

He said that he was misquoted by a section of media which said he viewed Modi as not being communal.

"This is wrong. Journalists asked me whether I consider Narendra Modi communal or not. I immediately said I don't have any proof against him, so I can't say anything on it. But some newspaper wrote that Anna Hazare said Modi is not communal ... This does not mean that he is secular or non-secular."
(टाइम्स ऑफ इण्डिया से साभार)
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नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक पैंतरेबाजी में शालीन राजनीतिक एजेण्डा कभी नहीं रहा। इसबार राष्ट्रीय क्षितिज पर आकर उन्होंने बेबकूफी-विमर्श का जो दायरा बनाया है उसकी कायदे से कांग्रेस और अन्यदलों को उपेक्षा करनी चाहिए। मोदी बोलें तो उनको बोलने दें । मोदी असल में पब्लिक रिलेशन के एजेण्डा सेटिंग पैटर्न पर चल रहे हैं।इस चक्र में फंसने के बाद न तो खबरें रहेंगी।और न राजनीतिक कार्यक्रम पर ही बातें होंगी। मोदी के जनसंपर्कचक्र का अर्थ है सिर्फ प्रौपेगैण्डा और सिर्फ प्रौपेगैण्डा। मोदी न तो खबर है और न इवेंट है,वह तो प्रौपेगैंडा है और प्रौपेगैण्डा खबर नहीं होती है।
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नेताओं में बेबकूफी दूसरा शो विपक्ष की ओर से चल रहा है,मुलायम को अफसोस है ,कल हो सकता है राजनाथ सिंह भी गुजरात पर अफसोस जाहिर कर बैठें।मोदी तो तय है गुजरात दंगों के लिए माफी मांगेंगे। समस्या यह है कि किस समय मांगें ? इसबार का चुनाव नेताओं से सबकुछ कराएगा। अफसोस-दुख-निंदा करने वाले नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि अरे भाई आपने जब घटना घटी थी तब अफसोस -दुख जाहिर क्यों नहीं किया ?
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भारत में मूर्खता का अंधड़ चल रहा है। सबसे बड़ा हिन्दू कौन ? इवेंट प्रतियोगिता का नियोजित शो चल रहा है। छोटे बच्चों की तरह नेतागण तुतला -तुतलाकर कह रहे हैं मैं बड़ा हिन्दू -मैं बड़ा हिन्दू। कोई चोटी दिखा रहा है ,कोई जनेऊ,कोई शंकराचार्य,कोई राम को तो कोई किसी और को। 21वीं सदी की यह सबसे बड़ी बेबकूफी है।
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भाजपा ने उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा के लिए मदद के सवाल को आगामी लोकसभा चुनाव के साथ जोड़ दिया है। सस्ती राजनीति का संसार में यह दुर्लभ उदाहरण है।
भाजपा-कांग्रेस आदि दल अपनी रैलियों में पैसे खर्च करके लोग लाते हैं।फोकट में इन दलों की रैली में कोई नहीं आता। भाजपा जैसी समर्थ पार्टी के लिए पांच लाख का चंदा जुटाना आसान बात है,मौटे तौर पर इससे कई गुना ज्यादा पैसा तो हैदराबादरैली में आने वाले लोगों की परिवहन व्यवस्था और खाने-पीने पर खर्च हो जाएगा।
भाजपा का कहना है हैदराबाद में मोदी की मीटिंग में शामिल हो और पांच रूपया दो । यह पैसा उत्तराखंड के प्राकृतिक आपदा पीड़ितों को दिया जाएगा।
नरेन्द्र मोदी और भाजपा को यदि उत्तराखंड आपदा पीड़ितों की इतनी ही चिन्ता है तो वे इस तरह का सस्ता हथकंडा अपनाकर मदद क्यों कर रहे हैं ? यह अपमान है आपदा पीड़ितों का।
जो मदद करते हैं वे ढोल नहीं बजाते। पीड़ा में मदद की ढोल,मीटिंग के नाम पर जलसा करना ,आपदा में मारे गए लोगों के प्रति संवेदनहीनता है। मदद के नाम पर लोग जुटाना और उनसे वोट की अपील करना,घटिया राजनीति है।
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हमारा प्रस्ताव है देश में चारों ओर जिस राज्य के मजदूर ज्यादा काम करते हों ,उस राज्य के पैदाइशी नागरिक को प्रधानमंत्री पद सौंपना चाहिए। क्योंकि असली समाज संचालक वे ही हैं।
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कांग्रेस - भाजपा के नेताओं से मीडिया और जनता यह सवाल बार-बार पूछे कि धर्मनिरपेक्ष प्रशासनिकतंत्र के निर्माण के लिए इन दोनों दलों क्या किया ? यदि इन दोनों दलों ने कुछ किया होता तो बाबरी मस्जिद का विध्वंस न होता। भारत की धर्मनिरपेक्ष राजनीति की दावेदार इनदोनों पार्टियों के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर बाबरी मस्जिद विध्वंस बदनुमा दाग है।
मंदिर तोड़ना, गुरूद्वारे जलाना,मस्जिद गिराना धर्मनिरपेक्ष राजनीति का काम नहीं है। लेकिन अफसोस यह है कि भारत में यह सब होता रहा है। किसने मस्जिद गिरायी, किसने गुरूद्वारे लाए और किसने मंदिरों पर हमले किए इसके बारे में देश के तमाम जागरूक लोग जानते हैं.हम यहां नाम नहीं लेना चाहते।
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आज टीवी चैनलों पर खूब आनंद आया । कांग्रेस और भाजपा के प्रवक्ता मुर्गे की तरह लड़ रहे हैं। इन दोनों ही पुण्यात्मा दलों में होड़ मची है भारतीय राजनीति के सबसे बड़े पुण्यात्मा होने की। इस होड़ में इन दलों के नेताओं ने झूठ और बेशर्मी की सभी हदें तोड़ दी हैं। अरे भाईयो गुजरात हमारा है वह भाजपा-कांग्रेस का नहीं है। गुजरात यदि शिक्षा में पीछे रह गया तो यह भी भारत की कमी है ।इसे सिर्फ मोदी के खाते नहीं डाल सकते।
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चुनाव आएं और मुसलमान याद न आएं हो नहीं सकता। मोदी भी याद कर रहे हैं और मोदी विरोधी भी मुसलमानों को याद कर रहे हैं। यानी मुसलमानों के बिना ये दल जी नहीं सकते। मुसलमानों का मैनस्ट्रीम से अलगाव खत्म करने का सही तरीका उनको याद करना मात्र नहीं है। मुसलमान अपने हैं तो इनदलों को मुसलमानों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक रिश्ते बनाने पर जोर देना चाहिए। दंगे से ज्यादा जरूरी है मुसलमानों के साथ खान-पान , वोट पाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है शादी-ब्याह के संबंध बनाना। उर्दू को पढ़ना -पढ़ाना,उसे मात्र मुसलमानों की भाषा न रहने देना। बाकी वैषम्य अपने आप समझने में सहायता मिलने लगेगी।
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नरेन्द्र मोदी को संघ परिवार ने मैदान में उतारकर सारे देश में मनमोहन सरकार की जनविरोधी नीतियों पर से बहस को खिसकाकर मोदी के व्यक्तित्व विवेचन और क्षमता के प्रचार में लगा दिया है।
देश मनमोहन सिंह की नीतियों से तबाह है ,मोदी पर संघ परिवार बहस चलाकर बहुराष्ट्रीय निगमों और कारपोरेट घरानों की लूटलीला पर परदा डालने का काम कर रहा है।
आज मोदी का राष्ट्रवाद समस्या नहीं है,समस्या यह है कि भाजपा के पास मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों का कोई विकल्प है तो अब तक मोदी ने उन नीतियों को पेश क्यों नहीं किया ?

नरेन्द्र मोदी मजमेवाजों की तरह चुनाव को नाटक बनाने में लगे हैं। वे नीतियों पर नहीं बोल रहे,थोथे बयान दे रहे हैं। थोथे बयान अंततः बहुराष्ट्रीयनिगमों को मदद करते हैं।
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नरेन्द्र मोदी के नए वैचारिक खेल-3-

मोदी ने कहा है "मैं हिंदू राष्ट्रवादी हूं। "
सवाल यह है कि वे नागरिक की अस्मिता को मानते हैं या नहीं,वे अपने को भारत का नागरिक कहना पसंद क्यों नहीं करते, असल में नागरिक की पहचान में समानता,बंधुत्व और लोकतंत्र का भाव अभिव्यंजित होता है। लेकिन हिन्दू राष्ट्रवादी की संघी अवधारणा मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति घृणा से भरी है।
एक हिन्दूराष्ट्रवादी कभी नागरिक भावबोध से लैस नहीं हो सकता। मोदी को भारत का नेता बनना है तो हिन्दू राष्ट्रवाद को छोड़ना होगा और भारत के नागरिकबोध को मानना होगा।
हिन्दू राष्ट्रवाद या मुस्लिम राष्ट्रवाद या राष्ट्रवाद का नागरिकभावबोध और नागरिक हकों से तीखा अन्तर्विरोध है। मोदी आने वाले चुनाव में हिन्दू राष्ट्रवादी के नाते नागरिकहकों पर हमलावर हो सकते हैं ?
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नरेन्द्र मोदी के नए वैचारिक खेल-2-

गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने एक झूठा बयान दिया है कि गुजरात दंगों के प्रसंग में वे निर्दोष हैं। सच है कि सुप्रीमकोर्ट ने उनको अभी क्लीन चिट नहीं दी है। यदि वे अपने को निर्दोष मानते हैं तो उनको यह बात अपने नेताओं को पहले समझानी थी कि उन्होंने 2002 से लेकर 2013 तक उनको भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया ? सन् 2014 में ही वे उम्मीदवार क्यों बनाए गए हैं ?
असल में उनको और संघ-परिवार को भय है कि कहीं मोदी को सुप्रीमकोर्ट दोषी करार न दे दे। यदि ऐसा होता है तो न्यायालय पर भी हमले करने में आसानी होगी।

मोदी से सवाल पूछा गया 2002 में आपने जो कुछ किया वह बिल्कुल ठीक था, तो उन्होंने कहा 'बिल्कुल। जितनी अक्ल मुझे ऊपर वाले ने दी है, जितनी अनुभव मैंने हासिल किया और उन हालात में जितनी ताकत मुझे हासिल थी, उसे देखते हुए जो कुछ मैंने किया वह बिल्कुल सही था और इसी बात की जांच एसआईटी ने की थी।'
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नरेन्द्र मोदी के नए वैचारिक खेल-1-

भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी हिन्दुत्व के मौलिक चिंतक हैं। आज उनका एक नया रूप सामने आया है, वे गुजरात के दंगों में मारे गए लोगों को न तो मुसलमान मानते हैं और इंसान मानते हैं,वे उनको पिल्ला यानी कुत्ता मानते हैं। मारे गए लोगों की कुत्ते से तुलना करना निश्चिततौर पर संघ की विचारधारा का एकदम नया रूप है।
नवभारत टाइम्स के अनुसार "गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू में गुजरात के दंगों पर विवादास्पद बयान दिया है।जब उनसे पूछा गया कि क्या जो कुछ हुआ उसका उन्हें दुख है, तो उन्होंने कहा, 'दुख तो होता ही है। अगर कुत्ते का बच्चा भी कार के नीचे आ जाए तो भी दुख होता है।' "


दंगों में मारे गए लोगों को इंसान न मानना और उनकी पिल्ले यानी कुत्ते के बच्चे से तुलना करना स्वयं में इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में मोदी आक्रामक हिन्दुत्व का कार्ड खेलने जा रहे हैं। यह सच है कि वे जो बोल रहे हैं,होशोहवास में बोल रहे हैं, सोचिए मोदी की कार ड्राइविंग का क्या हश्र होता यदि उनकी कार किसी ट्रेन या ट्रक की चपेट में आ जाती ? मोदी के मन में गुजरात दंगों में माए गए मुसलमानों के प्रति कोई दुख नहीं है। हम चाहते हैं मोद कार चलाएं और उसी तरह कार दौडाएं जैसे वे गुजरात में दौडा रहे हैं। ईश्वर उन्हें अगले चुनाव में वोटों की चपेट में वैसे ही ले जैसे कोई कार किसी ट्रेन की चपेट में आती है। उस दुर्घटना में मोदी बचें और भाजपारूपी कार ध्वस्त हो।

सोमवार, 21 जनवरी 2013

मीडिया उन्माद ,कांग्रेस और फेसबुक


-1- 

राजनीति में भावुकता कैंची है,वह इधर -उधर दोनों ओर काटती है। यह लाभ कम नुकसान ज्यादा करती है। भावुकता के आधार पर जुटाया समर्थन किस तरह रसातल में ले जा सकता है। इसे राजीवगांधी की इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुई जीत के बाद कांग्रेस के पराभव के साथ देख सकते हैं। यही हाल बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ भाजपा के ह्रास के रूप में भी देख सकते हैं।

भाजपा और कांग्रेस दोनों भावुकता का दुरूपयोग करती रही हैं और इसबार राहुल गांधी ने भावुक भाषण देकर कांग्रेस में प्राणसंचार करने की असफल कोशिश की है।

भावुक भाषण कभी संगठन में प्राण नहीं फूंकते, उनसे टीवी में जान आती है।

-2-

राहुल गांधी ने अपने भाषण में 'उम्मीद' पर जोर दिया 'पावर' यानी सत्ता को निशाना बनाया। उनके भाषण का यह फॉरमेट ओबामा के राष्ट्रपति चुनाव की पहली पारी में दिए गए भाषण की बुनियादी समझ से परिचालित है।

-3-

राहुल गांधी को नेताओं की तलाश है,राजकुमार भूल गए कि यह दौर नेता के अंत का दौर है। परवर्ती पूंजीवाद में नेता नहीं बचता,दलाल रह जाते हैं या औसतदर्जे के नेता रह जाते हैं। आज नेताओं का अभाव सभी दलों में है। राहुल ने कहा-

'' हमें ऐसे चालीस-पचास नेता तैयार करने हैं, जो देश और प्रदेश को चला सकें। हर प्रदेश में 5 से 10 ऐसे नेता हों जो सीएम बन सकें। हर जिले में यह बात हो। जब भी कोई पूछे कि कांग्रेस क्या करती है तो जवाब मिलना चाहिए कि भविष्य के लिए सेकुलर नेता तैयार करती है। जमीन से जुड़े नेता तैयार करती है। ऐसे नेता तैयार करती है, जिन्हें देखकर हिंदुस्तान के लोग उनके पीछे खड़े होने के लिए तैयार हो जाएं। इसके लिए संगठन की जरूरत हैं। ऐसा सिस्टम बन सकता है, जिसे आप बनाएंगे और चलाएंगे।''

-4-

राहुल गांधी के भाषण में आए सरलीकरण-

"मैं सबकुछ नहीं जानता। दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो सबकुछ जानता हो। "

''हमें इस पावर का इस्तेमाल लोगों के सशक्तिकरण के लिए करना चाहिए।''

"अगर आप पावरफुल होते हैं, तो आपको बहुत संभलकर रहने की जरूरत है। "

-5-

राहुल गांधी किस तरह की भूमिका में ले जाना चाहते हैं और किस तरह की तुलनाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं,इससे उनकी और कांग्रेस पार्टी की भूमिका का भावी कार्यक्रम समझ में आ जाएगा। वे जज बनना चाहते हैं। वे जनता नहीं बनना चाहते,जनसेवक नहीं बनना चाहते।



"कचहरी में दो लोग होते हैं जज और वकील। मैं जज का काम करूंगा। वकील का काम नहीं करूंगा।"

न्यायप्रियता और जज में अंतर होता है। यह सत्ता का अहंकार है।

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सत्ता हर कोई हासिल करना चाहता है, वह 'जहर' की तरह है।(राहुल गांधी) के इस बयान के बाद टीवी पर भारी प्रौपेगैण्डा चल रहा है। यह मीडिया केन्द्रित नकली या प्रायोजित प्रशंसा है। प्रायोजित प्रशंसा लोकतंत्र में मीडिया जहर है।

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कांग्रेस चिन्तन शिविर में राजनीतिक-सांगठनिक कमजोरी को "स्ट्रक्चरल वीकनेस "कहा गया। यह भाषा का बदला हुआ रूप है जिसके जरिए कांग्रेस राजनीतिक दुर्बलता को कम करके पेश कर रही है। जिन इलाकों में कांग्रेस कमजोर है उसको सांगठनिक तौर पर कैसे दूर करेगी,इसके बारे में कोई दिशा निर्देश सामने नहीं आए हैं।

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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आज जयपुर के चिन्तन शिविर में भावुक और अन्तर्विरोधपूर्ण भाषण दिया। पहला अंतर्विरोध-

"मैं जब बच्चा था तो मुझे बैडमिंटन बहुत पसंद था। यह खेल इस जटिल दुनिया में मुझे बैलेंस देता था। मैं अपनी दादी के घर में दो पुलिस वालों के साथ बैडमिंटन खेलता था। वे मेरी दादी की सुरक्षा का जिम्मा संभालते थे। वे मेरे दोस्त हो गए थे। एक दिन उन्होंने मेरी दादी को मार दिया और मेरे जीवन का बैलेंस छीन लिया।"

यह पैराग्राफ क्या संदेश देता है ? दोस्त कभी भी दुश्मन हो सकता है ।

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मीडियावाले कह रहे हैं कि राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने 2014 के अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का संकेत दे दिया है। उल्लेखनीय है कि मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने थे तब सोनिया अध्यक्ष थीं लेकिन प्रधानमंत्री नहीं बन पायीं,राहुल को यदि अध्यक्ष भी बना दिए जाए तो भी प्रधानमंत्री के पद पर कांग्रेसी उनको ही बिठाएंगे यह कहना मुश्किल है।

कांग्रेस अंततः संघ परिवार और अमेरिका के फैसले को मानता है,सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री न बन पाने और मनमोहन के बन जाने में इन दोनों की बड़ी भूमिका थी।

प्रधानमंत्री का पद उसको ही मिलेगा जिस पर अमेरिकी मोहर लगी होगी .।

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कांग्रेस नेताओं की सोशलमीडिया पर सोनिया गांधी के भाषण पर आई प्रतिक्रियाएं देखकर भावी रणनीति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है ।आनेवाले समय में कांग्रेस सोशलमीडिया के नियमंन की दिशा में जा सकती है ?--11-

टीवी चैनलों की आरामतलबी का आलम यह है कि कांग्रेस के चिन्तनशिविर से कोई खबर लीक नहीं हो रही है। कांग्रेस को अपने चिन्तनशिविर को पारदर्शी बनाना चाहिए और उसकी लाइव प्रसारण व्यवस्था करनी चाहिए जिससे पता चले कि कांग्रेस के अंदर क्या चिन्तन हो रहा।

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राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया।वे संगठन में दूसरे नम्बर पर आ गए हैं।

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मीडिया चैनल और कांग्रेसी नेताओं की बेबकूफीभरी युगलबंदी देखें- दोनों कह रहे हैं कि राहुल को बड़ी भूमिका दी जाय,यह खबर विगत दो साल से समय समय पर टीवी में चलायी जा रही है। मीडिया राहुल के बारे में इस तरह की गप्प को बार बार क्यों उछालता है ?

राहुल बड़ी भूमिका में आएं तब ही खबर दें। अघटित घटना की खबर को खबर नहीं कहते।

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कांग्रेसी नीतियों की असफलता का ताजा प्रमाण देखें- आधारभूत ढांचा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी जीएमआर और जीवीके पूंजी जुटाने की असमर्थता की वजह से बड़ी सड़क परियोजनाओं से बाहर निकल रही हैं। यह बात यह बात भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने आज कही।

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कांग्रेस आनेवाले चुनाव में खाद्य विधेयक को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक अस्त्र बनाने जा रही है। लेकिन इस अस्त्र से कांग्रेस को कोई खास लाभ नहीं होगा। इस विधेयक को लाने के पीछे प्रधान कारण सब्सीडी को घटाना, लेकिन यह काम नहीं हो पाएगा। उलटे सबसे पहले खाद्य सब्सिडी का खर्च बढ़ेगा और मौजूदा सरकारी आकलन के मुताबिक पहले साल में यह 1.2 लाख करोड़ रुपये होगा, जो तीसरे साल 1.5 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच सकता है अगर एमएसपी में बढ़ोतरी होती रहे और इसे जारी करने की कीमत स्थिर रहे। अगर हम इस विधेयक में कुपोषण समाप्त करने, भंडारण व अनाज की ढुलाई के लिए बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च को जोड़ें तो यह आसानी से सालाना 2 लाख करोड़ रुपये को पार कर जाएगा।

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सरकार ने खाद्य तेलों के आयात पर शुल्क गणना के लिए निर्धारित शुल्क मूल्य व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। अब खाद्य तेलों के आयात पर उनके शुल्क मूल्य की गणना अंतरराष्ट्रीय कीमत के आधार पर होगी। इससे खाने के तेलों के दामों में उछाल आएगा। यानी सूखी रोटी खाओ कांग्रेस के गुन गाओ।

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कांग्रेस गरीबी का समारोह कैसे करती है इसे देखें-कांग्रेस के 'चिंतन शिविर' से एक दिन पहले संसदीय स्थायी समिति ने आज खाद्य सुरक्षा विधेयक पर बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट पेश की। इस विधेयक में देश की 75 फीसदी ग्रामीण और 50 फीसदी शहरी आबादी को बिना किसी विभेद के एकसमान 5 किलोग्राम अनाज मुहैया कराने का कानूनी अधिकार देने का प्राïवधान किया गया है। यह अनाज फ्लैट रेट (अपरिवर्तित दर) पर वितरित किया जाएगा। इसमें चावल की दर 3 रुपये, गेहूं की 2 रुपये और मोटे अनाजों की 1 रुपये प्रति किलोग्राम होगी।

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कांग्रेस का तीन दिनों तक चलने वाला चिंतन शिविर आज यानी शुक्रवार से जयपुर में शुरू हो रहा है। यह चिंतन शिविर ऐसे समय हो रहा है जब कांग्रेस की नीतियों का खोखलापन तेजी से सामने आ रहा है। हर मोर्चे पर सरकार और उसकी नीतियां विफल रही हैं। नव्य आर्थिक उदारीकरण का पूरा प्रपंच चरमराने लगा है। क्या आत्मसमीक्षा भी होगी इस शिविर में ?

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टीवी चैनलों ने सरकारी भांड़ का दायित्व अपने ऊपर ले लिया है वे पेट्रोल आदि के दामों में बढोत्तरी के संबंध में पहले से ही खबर लगाते हैं और लगातार इस तरह के लोगों के विचार पेश करते रहते हैं जो किसी न किसी रूप में दाम बढ़ाए जाने को वैधता प्रदान करते हैं। भांडों का काम है सरकार के भोंपू की तरह काम करना। इस तरह की टीवी पत्रकारिता वस्तुगत होने का दावा नहीं कर सकती।

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एनडीटीवी इंटिया पर आज रवीशकुमार के टॉकशो पर सभी वक्ता कह रहे हैं कि 2014 में लोकसभा चुनाव के समय 20 करोड़ लोग वोटर इंटरनेट से जुड़े होंगे। ये 20करोड़ जागरूक वोटर होंगे।

हमारी राय में सोशलमीडिया की राजनीतिक भूमिका को यह अतिरंजित रूप में देखना होगा। वोटर अपनी राय जमीनी हकीकत और अपने पुराने विश्वासों के आधार पर बनाता और व्यक्त करता है।

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रवीशकुमार कह रहे हैं कि सोशलमीडिया की भाषा भिड़ने की भाषा है। रवीशकुमार को यह बात समझनी होगी कि सोशलमीडिया की भाषा पर्सुशसन की भाषा है।

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एनडीटीवीइंडिया में अभी एक टॉकशो चल रहा है सोशलमीडिया की भूमिका पर। भाजपा के अरविंद गुप्ता ने कहा है कि सोसलमीडिया पर राइटविंग के मंच के रूप में उनके मीडियम को जाना जाता है।

असल में सोशलमीडिया पर मात्र कम्युनिकेशन होता है वहां कोई विचारधारात्मक कम्युनिकेशन नहीं होता।

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टीवी चैनलों में पाकविरोधी उन्माद इनदिनों चरमोत्कर्ष पर है । भाजपा और उसके सहजिया सम्प्रदाय के नेता और संगठन भारत के दो सैनिकों की पाक द्वारा हत्या किए जाने के बाद से आर-पार की जंग जारी रखो,पाक से कडाई से पेश आओ,का नारा लगाकर मीडिया में उन्मादी प्रचार कर रहे हैं।

इन उन्मादी नेताओं और मीडिया के दबाव में मनमोहन सरकार भी आ गयी है।

सवाल यह है कि यूरोप से हमने दोस्ती करना क्यों नहीं सीखा, जिनदेशों ने सारी दुनिया पर 2-2 विश्वयुद्ध थोपे,करोड़ों लोगों की हत्या की उन देशों के साथ सभी देशों के मित्रतापूर्ण संबंध हैं।

करोडों लोगों की हत्या करने वाले हिटलर के देश के साथ कभी किसी ने यह नहीं कहा कि हम जर्मनी की टीम के साथ नहीं खेलेंगे।जर्मनी के गायकों को नहीं सुनेंगे।

भारत में हाल की घटनाओं पर जिस तरह की घटिया उन्मादी प्रतिक्रिया टीवी चैनलों ने दी है वह निंदनीय है और मानवाधिकार के विश्व परिप्रेक्ष्य के खिलाफ है।

हमें सोवियत संघ से सीखना चाहिए जिसके द्वितीय विश्वयुद्ध में करोडों लोग मारे गए लेकिन कभी किसी नेता ने यह मांग नहीं की सोवियत संघ का जर्मनों के साथ मित्रतापूर्ण संबंध नहीं होगा।

हमें वियतनाम से सीखना चाहिए जिसको अमेरिका ने पूरी तरह कई दशक तक बमों से रौंदा लेकिन वियतनाम जब अमेरिकी प्रभुत्व से मुक्त हो गया तो अमेरिका के साथ गहरी मित्रता करके उसने नई मिसाल कायम की है और वियतनाम में आज सबसे ज्यादा अमेरिकी कंपनियां काम कर रही हैं। हमें पड़ोसी देशों के प्रति उन्माद पैदा करने की राजनीति को बंद करना चाहिए।

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भारतीय चैनलों के द्वारा पाक-भारत संबंधों को बिगाड़ने के लिए सचेत कोशिशें हो रही हैं।

इस तरह के टॉकशो आयोजित किए जा रहे हैं जिनसे पाक के प्रति घृणा पैदा की जा सके। भारतीय सीमा पर पाक का बार बार उल्लंघन और हमारे दो सैनिकों का पाकसैनिकों द्वारा कत्ल निंदनीय कृत्य है। इसकी निंदा की जानी चाहिए। लेकिन इस घटना की आड़ में भारत-पाक संबंधों को बिगाडकर हमारे चैनल जनविरोधी हरकत कर रहे हैं। खासकर पाकविरोधी भावनाओं को व्यापक कवरेज दे रहे हैं। पाकविरोधी उन्मादी प्रचार टीवी चैनलों की मासकल्चर संस्कृति का वैचारिक खाद्य है। इससे सावधान रहने की जरूरत है।

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विपक्ष की नेत्री सुषमा स्वराज से पाक के साथ बढे हुए तनाव पर अभी बातें की हैं। लेकिन इससे क्या भाजपा के पाकविरोधी घृणा अभियान को वे शांत कर पाएंगे ?

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हाल ही में कलकत्ता में विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब बोल रहे थे तो वे वैज्ञानिकों को सम्बोधित कम और कांग्रेसियों को सम्बोधित करते ज्यादा दिख रहे थे। वे कांग्रेस के प्रचारक के रूप में बोल रहे थे। प्रधानमंत्री का विज्ञान कांग्रेस में दिया गया भाषण राजनीतिक प्रचार से ज्यादा महत्व नहीं रखता। वे जो कहते हैं वह कपूर की तरह कुछ क्षण दिखता है फिर गायब हो जाता है। संभवतः वे अकेले प्रधानमंत्री हैं जिनके किसी भी भाषण की कोई भी बात आम आदमी से लेकर बुद्धिजीवियों तक किसी को भी याद नहीं है। प्रधानमंत्री का प्रचारक होना सामान्य बात है लेकिन मनमोहन सिंह इस मामले में विरल हैं क्योंकि वे नव्य उदारनीतियों के नीति निर्माता-प्रचारक के रूप में काम करते रहे हैं। वे मूलतः वर्चुअल हैं। आप उनको पकड सकते हैं लेकिन घेर नहीं सकते। गलती पकड सकते हैं लेकिन दोषी नहीं ठहरा सकते।



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विपक्ष जब भी घेरने की कोशिश करता है वे हाथ से निकल जाते हैं। हाल ही में दामिनी दिल्ली बलात्कार कांड के प्रसंग में मीडिया उन्माद के जरिए मनमोहन सरकार को घेरने की असफल कोशिश की गई लेकिन वे साफ बच निकले। सवाल यह है कि मनमोहन सरकार को घेरने में विपक्ष आज तक सफल क्यों नहीं हुआ ?



मनमोहन सरकार और कांग्रेस पार्टी ने एक नयी रणनीति बनाई है जिसके तहत वे पापुलिज्म और लोकप्रिय जनदबाब का प्रत्युत्तर प्रशासनिक एक्शन के जरिए दे रहे हैं। मसलन् जब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया तो उन्होंने सीधे एक्शन लिया। कॉमनवेल्थ कांड से लेकर दामिनी कांड तक जो भी समस्या आई उसके प्रशासनिक समाधान तलाशने की सक्रिय कोशिश की और इससे भी ज्यादा अपनी कोशिश का मीडिया में जमकर प्रचार किया।



मनमोहन सरकार का मानना है पापुलर को मानो,आलोचनात्मक राय दो । राजनीतिक दबाब को प्रशासनिक –न्यायिक समाधान दो। इस अर्थ में वे लगातार संरचनात्मक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। संरचनात्मक सुधार वस्तुतःनव्य आर्थिक उदारीकरण का हिस्सा हैं। नव्य उदारवादी दृष्टिकोण के अनुसार नयी समस्याएं पुराने कानूनी फ्रेमवर्क में हल नहीं हो सकतीं, मनमोहन सरकार ने इसे सभी मंत्रालयों की कार्यप्रणाली का अंग बना दिया है। इस पद्धति का अनुकरण करने के कारण उनकी जब आलोचना आरंभ होती है तब वे सामने होते हैं लेकिन प्रशानिक एक्शन जब आने लगते हैं तो मनमोहन सरकार के खिलाफ गुस्सा गायब हो जाता है और फिर आमलोगों से लेकर मीडिया तक समस्या और समाधान पर ही बहस आकर टिक जाती है। इसके कारण राजनीति में पैदा हुए उन्माद और भावुकता को हाशिए पर डालने में उनको सफलता मिली है।



मनमोहन सिंह जब से प्रधानमंत्री बने हैं। वे मीडिया और विशेषज्ञों की आलोचना के केन्द्र में नहीं आते। उन्हें प्रधानमंत्री बने 8 साल से ज्यादा समय हो गया है। मीडिया में ममता बनर्जी,शरद पवार ,प्रफुल्ल पटेल ,डी.राजा ,कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं ,कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों आदि की आलोचना दिखेगी लेकिन मनमोहन सिंह की आलोचना नहीं मिलेगी। आकाश छूती मंहगाई है लेकिन प्रधानमंत्री पर न तो मीडिया हमला कर रहा है और न विपक्ष। असल में मनमोहन सिंह डिजिटल हो गए हैं। उनका डिजिटल इमेज में रूपान्तरण कर दिया गया है। डिजिटल इमेज और राजनीतिक व्यक्तित्व की इमेज में यही अंतर होता है। राजनीतिक इमेज को पकड़ सकते हैं लेकिन डिजिटल इमेज को पकड़ नहीं सकते।



मनमोहन सिंह का व्यक्तित्व अनेक गुणों से परिपूर्ण है। वे बेहद विनम्र हैं, सुसंस्कृत है, शिक्षित हैं। नव्य -उदार नीतियों के विशेषज्ञ हैं। मीडिया में उनके बारे में न्यूनतम बातें छपती हैं। संभवतः मीडिया में उन्हें सबसे कम कवरेज वाले प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा।



नई डिजिटल इमेज एक ही साथ मिथकीय और ऐतिहासिक होती है। अतीतपंथी और भविष्योन्मुखी होती है। तकनीकीपरक और धार्मिक होती है। मनमोहन सिंह ने अपने प्रचार में बार-बार समृद्ध भारत और समर्थ भारत की बात करते हैं। बार-बार विकासदर को उछाला है। भारत को समृद्धि के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। खासकर पूंजीपति,ह्वाइट कॉलर और मध्यवर्ग के साथ जोड़ा है। इस क्रम में उन्होंने मजदूरों-किसानों की राजनीति को हाशिए पर ड़ालने में सफलता अर्जित की है।



मनमोहन कोड की विशेषता है कि उसने गरीबी के यथार्थ विमर्श को वायवीय बनाया है। गरीबी और अभाव को गैर-बुनियादी विमर्शों के जरिए अपदस्थ किया है। मनमोहन कोड ने गरीबी और अभाव को अप्रत्यक्ष दानव में रूपान्तरित किया है। जिसके बारे में आप सिर्फ कभी-कभार सुन सकते हैं। मनमोहनकोड के लिए गरीबी और अभाव कभी महान समस्या नहीं रहे। मनमोहन कोड ने देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे खतरनाक शत्रु के रूप में माओवाद को प्रतिष्ठित किया है। जबकि माओवाद भारत विभाजन या सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं है।



मनमोहन कोड की काल्पनिक सृष्टि है माओवाद और आतंकी हिन्दू। यह जादुई-मिथकीय शत्रु है। मनमोहन कोड के अनुयायी और प्रचारक माओवाद के बारे में तरह-तरह की दंतकथाएं, किंवदन्तियां आदि प्रचारित कर रहे हैं। मीडिया में माओवाद एक मिथकीय महामानव है। इसी तर्ज पर आरएसएस के नाम पर बहुत सारे आतंकी हिन्दू महामानव पैदा कर दिए गए हैं। ये सारे मनमोहन कोड से सृजित वर्चुअल सामाजिक शत्रु हैं। ये आधे मानव और आधे दानव हैं।



माओवाद और हिन्दू आतंकवाद की रोचक डिजिटल कहानियां आए दिन सम्प्रेषित की जा रही हैं। इन्हें सामाजिक विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। आप जरा गौर से माओवादी नेता किशनजी की कपड़ा मुँह पर ढ़ंके इमेज और हिन्दू आतंकी के रूप में पकड़े गए संतों को ध्यान से देखें तो इनमें आप आधे मनुष्य और आधे प्राचीन मनुष्य की इमेज के दर्शन पाएंगे।



कारपोरेट मीडिया माओवादी और हिन्दू आतंकी की ऐसी इमेज पेश कर रहा है गोया कोई फोरेंसिक रिपोर्ट पेश कर रहा हो। वे इनके शरीर की ऐसी इमेज पेश कर रहे हैं जिससे ये आधे मनुष्य और आधे शैतान लगें। इससे वे खतरे और भय का विचारधारात्मक प्रभाव पैदा कर रहे हैं।



मनमोहन सिंह मीडिया में उतने नजर नहीं आते जितना इन दिनों डिजिटल दानवों (माओवाद और हिन्दू आतंकी) को पेश किया जा रहा है। हमें इस कोड को खोलना चाहिए। यह तकरीबन वैसे ही है जैसे अमेरिका ने तालिबान और विन लादेन की इमेजों के प्रचार-प्रसार के जरिए सारी दुनिया को तथाकथित आतंकवाद विरोधी मुहिम में झोंक दिया और तबाही पैदा की । सामाजिक अस्थिरता पैदा की । घृणा का वातावरण पैदा किया । ठीक यही काम मनमोहन कोड अपने डिजिटल शत्रुओं के प्रचार-प्रसार के नाम पर कर रहा है। हमें जागरूक रहने की जरूरत है।


गुरुवार, 10 जनवरी 2013

प्रौपेगैण्डा के धनी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

     हाल ही में कलकत्ता में विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब बोल रहे थे तो वे वैज्ञानिकों को सम्बोधित कम और कांग्रेसियों को सम्बोधित करते ज्यादा दिख रहे थे। वे कांग्रेस के प्रचारक के रूप में बोल रहे थे। प्रधानमंत्री का विज्ञान कांग्रेस में दिया गया भाषण राजनीतिक प्रचार से ज्यादा महत्व नहीं रखता। वे जो कहते हैं वह कपूर की तरह कुछ क्षण दिखता है फिर गायब हो जाता है। संभवतः वे अकेले प्रधानमंत्री हैं जिनके किसी भी भाषण की कोई भी बात आम आदमी से लेकर बुद्धिजीवियों तक किसी को भी याद नहीं है। प्रधानमंत्री का प्रचारक होना सामान्य बात है लेकिन मनमोहन सिंह इस मामले में विरल हैं क्योंकि वे नव्य उदारनीतियों के नीति निर्माता-प्रचारक के रूप में काम करते रहे हैं। वे मूलतः वर्चुअल हैं। आप उनको पकड सकते हैं लेकिन घेर नहीं सकते। गलती पकड सकते हैं लेकिन दोषी नहीं ठहरा सकते। 

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विपक्ष जब भी घेरने की कोशिश करता है वे हाथ से निकल जाते हैं। हाल ही में दामिनी दिल्ली बलात्कार कांड के प्रसंग में मीडिया उन्माद के जरिए मनमोहन सरकार को घेरने की असफल कोशिश की गई लेकिन वे साफ बच निकले। सवाल यह है कि मनमोहन सरकार को घेरने में विपक्ष आज तक सफल क्यों नहीं हुआ ?

मनमोहन सरकार और कांग्रेस पार्टी ने एक नयी रणनीति बनाई है जिसके तहत वे पापुलिज्म और लोकप्रिय जनदबाब का प्रत्युत्तर प्रशासनिक एक्शन के जरिए दे रहे हैं। मसलन् जब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया तो उन्होंने सीधे एक्शन लिया। कॉमनवेल्थ कांड से लेकर दामिनी कांड तक जो भी समस्या आई उसके प्रशासनिक समाधान तलाशने की सक्रिय कोशिश की और इससे भी ज्यादा अपनी कोशिश का मीडिया में जमकर प्रचार किया।

मनमोहन सरकार का मानना है पापुलर को मानो,आलोचनात्मक राय दो । राजनीतिक दबाब को प्रशासनिक –न्यायिक समाधान दो। इस अर्थ में वे लगातार संरचनात्मक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। संरचनात्मक सुधार वस्तुतःनव्य आर्थिक उदारीकरण का हिस्सा हैं। नव्य उदारवादी दृष्टिकोण के अनुसार नयी समस्याएं पुराने कानूनी फ्रेमवर्क में हल नहीं हो सकतीं, मनमोहन सरकार ने इसे सभी मंत्रालयों की कार्यप्रणाली का अंग बना दिया है। इस पद्धति का अनुकरण करने के कारण उनकी जब आलोचना आरंभ होती है तब वे सामने होते हैं लेकिन प्रशानिक एक्शन जब आने लगते हैं तो मनमोहन सरकार के खिलाफ गुस्सा गायब हो जाता है और फिर आमलोगों से लेकर मीडिया तक समस्या और समाधान पर ही बहस आकर टिक जाती है। इसके कारण राजनीति में पैदा हुए उन्माद और भावुकता को हाशिए पर डालने में उनको सफलता मिली है।

मनमोहन सिंह जब से प्रधानमंत्री बने हैं। वे मीडिया और विशेषज्ञों की आलोचना के केन्द्र में नहीं आते। उन्हें प्रधानमंत्री बने 8 साल से ज्यादा समय हो गया है। मीडिया में ममता बनर्जी,शरद पवार ,प्रफुल्ल पटेल ,डी.राजा ,कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं ,कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों आदि की आलोचना दिखेगी लेकिन मनमोहन सिंह की आलोचना नहीं मिलेगी। आकाश छूती मंहगाई है लेकिन प्रधानमंत्री पर न तो मीडिया हमला कर रहा है और न विपक्ष। असल में मनमोहन सिंह डिजिटल हो गए हैं। उनका डिजिटल इमेज में रूपान्तरण कर दिया गया है। डिजिटल इमेज और राजनीतिक व्यक्तित्व की इमेज में यही अंतर होता है। राजनीतिक इमेज को पकड़ सकते हैं लेकिन डिजिटल इमेज को पकड़ नहीं सकते।

मनमोहन सिंह का व्यक्तित्व अनेक गुणों से परिपूर्ण है। वे बेहद विनम्र हैं, सुसंस्कृत है, शिक्षित हैं। नव्य -उदार नीतियों के विशेषज्ञ हैं। मीडिया में उनके बारे में न्यूनतम बातें छपती हैं। संभवतः मीडिया में उन्हें सबसे कम कवरेज वाले प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा।

नई डिजिटल इमेज एक ही साथ मिथकीय और ऐतिहासिक होती है। अतीतपंथी और भविष्योन्मुखी होती है। तकनीकीपरक और धार्मिक होती है। मनमोहन सिंह ने अपने प्रचार में बार-बार समृद्ध भारत और समर्थ भारत की बात करते हैं। बार-बार विकासदर को उछाला है। भारत को समृद्धि के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। खासकर पूंजीपति,ह्वाइट कॉलर और मध्यवर्ग के साथ जोड़ा है। इस क्रम में उन्होंने मजदूरों-किसानों की राजनीति को हाशिए पर ड़ालने में सफलता अर्जित की है।

मनमोहन कोड की विशेषता है कि उसने गरीबी के यथार्थ विमर्श को वायवीय बनाया है। गरीबी और अभाव को गैर-बुनियादी विमर्शों के जरिए अपदस्थ किया है। मनमोहन कोड ने गरीबी और अभाव को अप्रत्यक्ष दानव में रूपान्तरित किया है। जिसके बारे में आप सिर्फ कभी-कभार सुन सकते हैं। मनमोहनकोड के लिए गरीबी और अभाव कभी महान समस्या नहीं रहे। मनमोहन कोड ने देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे खतरनाक शत्रु के रूप में माओवाद को प्रतिष्ठित किया है। जबकि माओवाद भारत विभाजन या सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं है।

मनमोहन कोड की काल्पनिक सृष्टि है माओवाद और आतंकी हिन्दू। यह जादुई-मिथकीय शत्रु है। मनमोहन कोड के अनुयायी और प्रचारक माओवाद के बारे में तरह-तरह की दंतकथाएं, किंवदन्तियां आदि प्रचारित कर रहे हैं। मीडिया में माओवाद एक मिथकीय महामानव है। इसी तर्ज पर आरएसएस के नाम पर बहुत सारे आतंकी हिन्दू महामानव पैदा कर दिए गए हैं। ये सारे मनमोहन कोड से सृजित वर्चुअल सामाजिक शत्रु हैं। ये आधे मानव और आधे दानव हैं।

माओवाद और हिन्दू आतंकवाद की रोचक डिजिटल कहानियां आए दिन सम्प्रेषित की जा रही हैं। इन्हें सामाजिक विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। आप जरा गौर से माओवादी नेता किशनजी की कपड़ा मुँह पर ढ़ंके इमेज और हिन्दू आतंकी के रूप में पकड़े गए संतों को ध्यान से देखें तो इनमें आप आधे मनुष्य और आधे प्राचीन मनुष्य की इमेज के दर्शन पाएंगे।

कारपोरेट मीडिया माओवादी और हिन्दू आतंकी की ऐसी इमेज पेश कर रहा है गोया कोई फोरेंसिक रिपोर्ट पेश कर रहा हो। वे इनके शरीर की ऐसी इमेज पेश कर रहे हैं जिससे ये आधे मनुष्य और आधे शैतान लगें। इससे वे खतरे और भय का विचारधारात्मक प्रभाव पैदा कर रहे हैं।

मनमोहन सिंह मीडिया में उतने नजर नहीं आते जितना इन दिनों डिजिटल दानवों (माओवाद और हिन्दू आतंकी) को पेश किया जा रहा है। हमें इस कोड को खोलना चाहिए। यह तकरीबन वैसे ही है जैसे अमेरिका ने तालिबान और विन लादेन की इमेजों के प्रचार-प्रसार के जरिए सारी दुनिया को तथाकथित आतंकवाद विरोधी मुहिम में झोंक दिया और तबाही पैदा की । सामाजिक अस्थिरता पैदा की । घृणा का वातावरण पैदा किया । ठीक यही काम मनमोहन कोड अपने डिजिटल शत्रुओं के प्रचार-प्रसार के नाम पर कर रहा है। हमें जागरूक रहने की जरूरत है।


रविवार, 16 सितंबर 2012

मनमोहन के फैसले ने ममता की घबराहट बढ़ायी


                 
      पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केन्द्र सरकार को 72घंटे का अल्टीमेटम दिया है और कहा है डीजल के बढ़े दाम और खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी निवेश का फैसला वापस ले। लेकिन मनमोहन सिंह सरकार अपने ये दोनों फैसले वापस नहीं लेने जा रही है। सबकी आंखें ममता के अगले कदम पर टिकी हैं।
    ममता का तर्क है कि सरकार ने हमसे सलाह नहीं ली, हमारे मंत्री ने मीटिंग में हिस्सा नहीं लिया।अतःहम इस फैसले को नहीं मानते। केन्द्र सरकार के फैसले की घोषणा के तत्काल बाद तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेताओं की ममता के साथ अनौपचारिक बैठक हुई।इसमें पार्थ चटर्जी-सुब्रत मुखर्जी आदि ने ममता की राय से असहमति व्यक्ति की।
     तृणमूल सरकार में वरिष्ठमंत्री ने नाम न बताए जाने की शर्त पर कहा यह फैसला यूपीए-2 सरकार का सामूहिक फैसला है। इस फैसले से यूपीए-2के सभी दल बंधे हैं। मंत्रीमंडल किसी दल विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वह तो सारे देश का प्रतिनिधित्व करता है। सभी सत्तारूढ़ दल मंत्रीमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी से बंधे हैं। कोई मंत्री मंत्रीमंडल की बैठक में शामिल हो या न हो वह मंत्रीमंडल के सामूहिक फैसलों से बंधा है। शुक्रवार की रात को ही इस मंत्री ने ममता को उनके घर जाकर अपनी राय से अवगत करा दिया और कहा कि वे यूपीए छोड़ने का फैसला न लें।
     असल में  राजनीति में एक होता है सत्ताखेल और दूसरा होता है सत्तामोह। सत्ताखेल में वे नेता सफल होते हैं  जो दूरदृष्टि रखते हैं और दीर्घकालिक बृहत्तर जनहितों का ख्याल रखते हैं।पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सारे राजनीतिक दांवपेंच सत्तामोह की देन हैं।सत्तामोह विवेकहीन बनाता है।
    पापुलिज्म ,नकली प्रतिवाद और उत्सवधर्मिता में बांधे रखता है।सत्तामोह में बंधे लोग नकली प्रतिवाद के लिए सड़कों पर हंगामे करते हैं ,मीडिया में खूब हो-हल्ला करते हैं।वामदलों में भी यह बीमारी है। सत्तामोहित नेता गैर-जिम्मेदार होता है और सामाजिक जबाबदेही से भागता है। ।
इनदिनों जो  नकली प्रतिवाद ममता और उनका दल कर रहा है यह प्रतिवाद नहीं है यह प्रतिवाद का ऑब्शेसन है। प्रतिवाद का ऑब्शेसन वामदलों में भी है और ममता में भी है। प्रतिवाद का ऑब्शेसन अंततः अ-राजनीतिकरण करता है और नीतिविहीन बनाता है। प्रतिवाद का ऑब्शेसन लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था के विकास को अवरूद्ध करता है। आमलोगों में राजनीति और राजनेताओं के प्रति अनास्था पैदा करता है।
       ममता का 72 घंटे का अल्टीमेटम एब्सर्ड पापुलिज्म की देन है। यह सामूहिक जिम्मेदारी से पलायन है। सामूहिक जिम्मेदारी से पलायन के कारण ही ममता बनर्जी विगत दो महिनों से यूपीए-2 की सरकार में हाशिए पर आ गयी हैं। एक जमाना था उनसे प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी बात करते थे।लेकिन राष्ट्रपति चुनाव के बाद से ममता बनर्जी को उनकी राजनीतिक हैसियत का एहसास करा दिया गया है। विगत बृहस्पति और शुक्रवार को मंत्रीमंडलीय उपसमिति के बैठकों से तृणमूल कांग्रेस के मंत्री नदारत थे। ममता बनर्जी ने राजनीतिक जिम्मेदारी से भागने का एक सुगम रास्ता अख्तियार किया है कि केन्द्रीय मंत्रीमंडल के बैठकों में उनके दल के मंत्री हिस्सा ही नहीं लेते और इसके बाद ममता बनर्जी मीडिया में हल्ला करती हैं कि उनसे पूछा नहीं गया,उनकी राय नहीं ली गयी, उन्हें मंत्रीमंडल का फैसला सुनकर अचम्भा हुआ है,इसके बाद वे धमकियां देती हैं।यह नाटक विगत 3सालों से चल रहा है और मनमोहन सिंह इसे झेलते रहे हैं। इसे ममता ने अपनी राजनीतिक ताकत के रूप में प्रचारित किया है और मीडिया ने भी ममता को ताकतवर महिला के रूप में खूब उछाला है। लेकिन विगत बृहस्पतिवार और शुक्रवार के मंत्रीमंडलीय समिति के फैसलों ने ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत की सीमाओं को एकसिरे से उजागर कर दिया है। ममता की समझ है कि उनका दल यदि सरकार से समर्थन वापस ले लेता है तो सरकार गिर जायगी । लेकिन राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि ममता बनर्जी के समर्थन वापस लेने से सरकार नहीं गिरने वाली। तृणमूल कांग्रेस यदि समर्थन वापस लेता है तो वैसे स्थिति में मुलायम सिंह यादव और अन्यदलों का समर्थन मिलना पक्का है।इस संदर्भ में पहले से ही राजनीतिक तैयारियां कर ली गयी हैं और बदले में समर्थक दलों के नेताओं से भी विस्तार के साथ बातें हो गयी हैं।
    केन्द्र सरकार के बयान के अनुसार रिटेल में विदेशी पूंजी निवेश के सवाल पर विगत शुक्रवार को जो फैसला लिया गया वह विगत 24नवम्बर 2011 को ही मंत्रीमंडलीय समिति ने पास कर दिया था सिर्फ उसके कार्यान्वयन को स्थगित रखा गया था। कार्यान्वयन के संदर्भ में 7दिसम्बर 2011 को  विभिन्न राज्य सरकारों और मजदूर, किसान,दुकानदार,छोटे व्यापारी आदि के संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक हुई थी जिसमें दिल्ली,असम, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, आंध्र,राजस्थान,हरियाणा,मणिपुर, जम्मू-कश्मीर, केन्द्र शासित क्षेत्र दमन-दीउ,दादरा और नागर हवेली के प्रतिनिधियों ने रिटेल में विदेशी पूंजी निवेश का समर्थन किया था जबकि बिहार, कर्नाटक, उडीसा,केरल,मध्यप्रदेश,त्रिपुरा ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था। पश्चिम बंगाल सरकार ने अपना प्रतिनिधि इस बैठक में नहीं भेजा और नहीं बाद में इस पर अपनी कोई राय दी। इस बीच विभिन्न राज्यों के साथ सलाह-मशविरे के बाद यह तय पाया गया कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश को राज्य सरकारें लागू करें या न करें यह उनका फैसला होगा। यानी ममता बनर्जी के लिए रास्ता खुला रखा गया है कि वे अब यह तय करें कि इसके बावजूद वे मंत्रीमंडल में रहना चाहती हैं या नहीं। इस स्थिति में ममता बनर्जी के दल में आंतरिक अन्तर्विरोध तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस के केन्द्र में जो मंत्री हैं वे चाहते हैं कि उनका दल सरकार का समर्थन जारी रखे। जबकि ममता बनर्जी चाहती हैं कि मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया जाय और बाहर से सरकार का समर्थन किया जाय। पार्थ चटर्जी-सौगत राय-सुब्रत मुखर्जी आदि का मानना है कि मनमोहन सरकार से समर्थन वापस न लिया जाय और न ही सरकार के काम में अडंगे डाले जाएं इस सबसे तृणमूल कांग्रेस की अड़ंगेबाज पार्टी की इमेज बन रही है।
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गुरुवार, 24 मई 2012

मनमोहन प्रेम का अंत


मनमोहन सरकार का आम जनता के साथ अन्तर्विरोध प्रखर हो गया है। जिन लोगों ने यह सपना देखा था कि नव्य आर्थिक नीतियां मध्यवर्ग के लिए फायदेमंद हैं और यह वर्ग कम से कम चैन की बंशी बजाएगा।आज वे लोग निराश हैं। मनमोहन सरकार ने मध्यवर्ग के चैन को बेचैनी में बदल दिया है। मुश्किल यह है कि 1990-91 के बाद से मध्यवर्ग में आरामतलबी के संस्कार गहरे हुए हैं। जनांदोलनों से मध्यवर्ग की दूरी बढ़ी है। बल्कि यों कहें मध्यवर्ग का एक बड़ा अंश जनांदोलनों के प्रति संशय में ठेल दिया गया है। मीडिया और उपभोक्तावाद की आक्रामक रणनीतियों ने इस वर्ग को पराश्रित बना दिया है और गहरे अवसाद में डुबो दिया है। ऐसे में मध्यवर्ग में से प्रतिवाद की जगह सिर्फ मीडियापीड़ा के स्वर सुनाई दे रहे हैं।मध्यवर्ग की मीडियापीड़ा को आम जनता के संघर्ष में रूपान्तरित करने की जरूरत है।

मध्यवर्ग के नपुंसक बनाए जाने की स्थिति का मजदूर संगठनों और कम्युनिस्ट पार्टियों पर भी असर हुआ है वे भी ठलुआदल बनकर रह गए हैं। यही वह नपुंसक परिवेश है जिसको चुनौती देने की जरूरत है। नपुंसक परिवेश नव्य आर्थिक उदारनीतियों की देन है और महंगाई का उससे गहरा संबंध है।जब तक विपक्ष इन नीतियों के खिलाफ एकजुट नहीं होता भविष्य में भी महंगाई के झटके लगते रहेंगे।

मनमोहन सिह सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय प्रतिवाद का अभाव इस बात का संकेत है कि मध्यवर्ग परजीवी है और माहौल नपुंसक है। ऐसे में प्रतिवाद दिवा-स्वप्न ही प्रतीत हो रहा है । मनमोहन सरकार ने अपनी जनविरोधी इमेज में चार चाँद लगाते हुए जिस तरह पेट्रोल के दामों में साढ़े सात रूपये का इजाफा किया है। उससे एक बात साफ हो गयी है कि यह सरकार आम जनता के हितों के बारे में कागजीतौर पर वचनवद्ध है। आम आदमी और खासकर मध्यवर्ग इसके निशाने पर है। क्या इतने बड़ी मूल्यवृद्धि के बाद भी मनमोहन सरकार को उसके सहयोगी दल समर्थन देते रहेंगे ? कायदे से ममता-मुलायम -मायावती -करूणानिधि और लालू यादव को यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेना चाहिए।

केंद्र सरकार ने पेट्रोल बम फोड़कर आम आदमी की जेब को लहुलूहान करने की पूरी तैयारी कर ली है। एक न्यूज एजेंसी के हवाले से आई खबर के मुताबिक, पेट्रोल के दाम में प्रति लीटर 7.50 पैसे का इजाफा किया गया है। ऐसे में इस इजाफे को जोड़ते हुए पिछले 3 सालों में पेट्रोल की कीमतों में करीब 23 रुपये का इजाफा किया जा चुका है। वहीं डीजल को लेकर ये आंकड़ा 8 रुपये प्रति लीटर है। महंगाई से त्रस्त भारतीय जनता के लिए ये इजाफा कमर तोड़ने वाला है।आने वाले समय में गैस के प्रति सिलेण्डर और डीजल के दामों में भी इजाफा होने के चांस हैं।यह नव्य आर्थिक उदारीकरण का क्लाइमेक्स है ।मनमोहन सरकार ने मंदी के समय में जनता के ऊपर यह भारी बोझ डालकर अपनी हृदयहीनता का परिचय दिया है।

असल में, मीडिया -मनोरंजन और उपभोक्तावाद की अशांत भूख ने मध्यवर्ग और आम आदमी को इस कदर घेरा है कि उसके पास प्रतिवाद के लिए समय ही नहीं बचा है।हम लोग प्रतिवाद के नाम पर जैसे-तैसे वोट डाल आते हैं और फिर पांच साल तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। इससे लोकतंत्र बेजान हो गया है। वोट डालना लोकतंत्र के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी की इतिश्री नहीं है।बल्कि वह तो शुरूआत है।

कांग्रेस की ठग नीतियों से बचने का एकमात्र रास्ता है लोकतांत्रिक हकों के लिए नियमित संघर्ष और सरकार पर आंदोलन के जरिए दबाब। आम लोगों को लोकतंत्र बचाने के लिए अपनी आरामगाह से बाहर निकलना होगा। मीडिया की नकली बहसों से आगे जाकर सड़कों-गलियों -मुहल्लों में महंगाई और अन्य सवालों पर बहसों को नियोजित करना करना होगा।संगठनवद्ध करना होगा। और स्थानीय स्तर पर दीर्घकालिक संघर्ष की तैयारी करनी होगी।

आज स्थिति यह है मनमोहन सरकार के हाथों समूची अर्थव्यवस्था कुप्रबंधन का शिकार होकर रह गयी है। डॉलर के मुकाबले रूपये की स्थिति बदतर है,निजीक्षेत्र को बेशुमार आर्थिक रियायतों के बाबजूद कोई औद्योगिक रैनेसां नहीं हुआ है। निजी क्षेत्र में मजदूरों की पगार में कोई इजाफा नहीं हुआ है। सरकारी कर्मचारियों के बढ़ाए नए वेतनमान अब सुचारू जीवन संचालन के लिए अपर्याप्त साबित हो रहे हैं।यानी आम लोगों के सामने पामाली में जीने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। ऐसे में मध्यवर्ग की चुप्पी चिंता की बात है। मध्यवर्ग को अपने हितों के बारे में सोचने के साथ आम जनता यानी मजदूरों-किसानों के बारे में भी सोचना होगा।

हमें यह भी ध्यान रखना होगा लोकतंत्र का अर्थ निरंकुश लोकतांत्रिक शासन और गूंगी- बहरी जनता नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ,आम जनता के साथ निरंकुश शासक की तरह व्यवहार कर रहे हैं और बाकी दलों के नेता अनुनय-विनय-अपील के भाव से पेश आ रहे हैं। लोकतंत्र में हमें मनमोहन सिंह जैसे निरंकुश शासक नहीं चाहिए। कायदे से विपक्षीदल मनमोहन सरकार के खिलाफ तदर्थ प्रतिवाद का रवैय्या त्यागें और ईमानदारी से दीर्घकालिक संघर्ष की घोषणा करें और सड़कों पर आएं।

महंगाई के सवाल पर वामपंथीदलों और गैर-वामपंथी विपक्षी दलों को सड़कों पर संयुक्त कार्रवाई करनी चाहिए। अन्नाहजारे - बाबा रामदेव को महंगाई के खिलाफ आवाज उठाने से किसने रोका हुआ है। अन्ना से करूणानिधि तक सबको सड़कों पर आना चाहिए। हर आदमी को विरोध करना चाहिए और पीएम को प्रतिवाद करते हुए ईमेल करना चाहिए।


शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

कारपोरेट मीडिया का अन्ना ऑब्शेसन


 अन्ना हजारे ने अपने अनशन की घोषणा कर दी है। वे 16 अगस्त से अनशन पर बैठेंगे। असल में इस अनशन का कोई अर्थ नहीं है। अन्ना हजारे की राजनीति का आधार है 'मैं सही और सब गलत' । लोकतंत्र में ' मैं' के लिए जितनी जगह है उससे ज्यादा 'अन्य' के लिए जगह रखनी होती है। अन्ना के राजनीतिक एजेण्डे में 'अन्य ' के लिए कोई जगह नहीं है। अन्ना की राजनीति में 'जिद' का बड़ा महत्व है,यह ऐसे व्यक्ति की जिद है जिसकी कोई सामाजिक जबावदेही नहीं है। अन्ना और उनकी टीम की लोकतंत्र के मौजूदा ढ़ांचे में कोई जबाबदेही नहीं है। वे सर्वतंत्र-स्वतंत्र हैं।

     अन्ना की पूरी समझ इस धारणा पर टिकी है कि 'सरकारी लोकपाल' भरोसेमंद नहीं है। वे 'सरकार' के प्रति संदेह की नजर रखते हैं। सरकार के प्रति अविश्वास के आधार पर राजनीति नहीं चलती। सरकार के प्रति आलोचनात्मक हो सकते हैं लेकिन सरकार के पक्ष को पूरी तरह दरकिनार नहीं कर सकते। आखिरकार सरकार भी तो देश की बृहत्तर जनता का प्रतिनिधित्व कर रही है। जबकि अन्ना तो अपने गुटों और सहयोगी संगठनों का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
      अन्ना की एक अन्य दिक्कत है कि वे हथेली पर सरसों जमाना चाहते हैं। लोकतंत्र में यह संभव नहीं है। तानाशाही में यह संभव है कि किसी एक ने कहा और उसे सारे देश पर थोप दिया गया। अन्ना की जिद है जो कहा है उसे मानो।जैसा कह रहे हैं वैसा करो। जिस दिन करने को कह रहे हैं उसदिन करो। अन्ना का स्वभाव लोकतंत्र की प्रक्रियाओं के बाहर रमण करता है। वे चाहते हैं भ्रष्टाचार पर लगाम लगे,भ्रष्ट लोगों को दण्ड मिले लेकिन मुश्किल यह है कि वे इसे अपनी गति और मति के आधार पर करना चाहते हैं।
      अन्ना की गति और मति का लोकतंत्र की गति और मति से दूर-दूर तक तार नहीं जुड़ता। अन्ना लोकतंत्र के डिक्टेटरर हैं। लोकतंत्र में डिक्टेटरशिप नहीं चलती चाहे जितनी भी अच्छी बातें करे डिक्टेटरर। अन्ना की पहले अनशन के समय मांग थी कि सारे देश में  मजबूत लोकपाल की स्थापना हो और उसके लिए तुरंत लोकपाल बिल लाया जाए। केन्द्र सरकार ने उनकी यह मांग बुनियादी तौर पर मान ली है और संसद के अगस्त से आरंभ हो रहे सत्र में लोकपाल बिल पेश होने जा रहा है। अनशन आरंभ होने के बाद अन्ना ने स्टैंड बदला और कहा कि लोकपाल के लिए संयुक्त समिति बने जिसमें सरकार और 'अन्ना ब्रॉण्ड सिविल सोसायटी' के लोग हों। सरकार ने यह भी मान लिया। संयुक्त मसौदा समिति बना दी गयी। बाद में अन्ना स्वयं ही समिति में चले आए जबकि आरंभ में वे किसी समिति में रहना नहीं चाहते थे। मजेदार बात यह है कि अन्ना क्या चाहते हैं और उनकी मांगे क्या हैं उनके विवरण और ब्यौरे बादमें आम जनता में आए। आरंभ में मांग थी लोकपाल बिल लाओ।
अन्ना अब कह रहे हैं केन्द्र सरकार ने लोकपाल बिल का जो मसौदा तैयार किया है वह देश की जनता के साथ छल है। अन्ना जानते हैं  छल तब होता है जब कोई बात छिपायी जाए। धोखा तब होता है जब ठगा जाए। केन्द्र सरकार ने अपने नजरिए से न तो ठगा है और न किसी को धोखा दिया है। केन्द्र सरकार ने कभी नहीं कहा कि वह अन्ना की सारी बातें मानते हैं।
      केन्द्र सरकार ने अपने नजरिए से एक लोकपाल बिल तैयार किया है और उसे वह संसद में पेश करने जा रही है। सांसदों के ऊपर है कि वे उसे किस रूप में पास करें। केन्द्र सरकार ने लोकपाल बिल का वायदा किया था और वे जिस नजरिए से देख रहे हैं उसके आधार पर एक मसौदा संसद में पेश करने जा रहे हैं। सारी चीजें पारदर्शी हैं। अन्ना के लोग खुलेआम जितना बोल रहे हैं और अपनी असहमतियों का इजहार कर रहे हैं वैसा अन्य दल नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि मीडिया ने सारे मसले को अन्ना बनाम सरकार का मसला बना दिया है।
    अन्ना और सरकार के अलावा अनेक राजनीतिक दल हैं और विभिन्न किस्म के सैंकड़ों संगठन हैं जिनकी लाखों-करोड़ों की मेम्बरशिप है। मीडिया की बहस में ये संगठन एकसिरे से गायब हैं। इससे एक बात का पता चलता है कि अन्ना को लेकर मीडिया ऑब्शेसन का शिकार है। मसलन् विभिन्न विचारधारा के महिला,किसान ,मजदूर,युवा और छात्र संगठन हैं,इसके अलावा ऐसे भी स्वयंसेवी संगठन हैं जिनकी सैंकड़ों यूनिटें हैं। इनकी राय एकसिरे से गायब है।
     कारपोरेट मीडिया का अन्ना के प्रति ऑब्शेसन इस बात का सबूत है कि वह भारत की बृहत्तर ओपिनियन की उपेक्षा कर रहा है। विगत दिनों टीवी स्टूडियो में डिशकशन के नाम पर जो भीड़ अन्नाभक्तों की जुटायी गयी थी वह भी कारपोरेट मीडिया के अन्ना ऑब्शेसन को ही सामने लाती है। अन्न्भक्त स्टूडियो में अन्नाटीम से भिन्न राय व्यक्त करने वालों को हूट कर रहे थे।
     अन्नाभक्तों की बॉडी लैंग्वेज में लोकतांत्रिक विनम्रता नहीं है। वे आक्रामक और उद्धत हैं। जबरिया मनवाने में विश्वास करते हैं और मीडियासेवी लोग हैं। इन्हें लोकतंत्र के अधीर नागरिक कहना समीचीन होगा। लोकतंत्र अधीरों से नहीं धीरवान समाज से चलता है। लोकतंत्र में जिद्दीभाव की नहीं लोकतांत्रिक भाव की जरूरत है। लोकतंत्र 'मैं 'का नहीं 'हम' का खेल है।
     लोकतंत्र में व्यक्ति नहीं संस्थान महत्वपूर्ण हैं। अन्ना -मनमोहन,सिविल सोसायटी-कांग्रेस-भाजपा-माकपा आदि से बहुत बड़ा दायरा है लोकतंत्र का। लोकतंत्र का आधार हैं संस्थान। संस्थानों की अपनी काम करने की गति है। उस गति की उपेक्षा करने से लोकतंत्र के नष्ट हो जाने का खतरा है। अन्ना की मुश्किल यह है कि वे लोकतंत्र के साथ संस्थान की गति के बाहर रहकर संबंध बनाना चाहते हैं।
     अन्ना का 16 अगस्त को अनशन पर बैठना एकसिरे से गलत है। उन्हें लोकपाल बिल के अंतिम शक्ल लेने तक का  इंतजार करना चाहिए। अभी पहला चरण है जिसमें मसौदा तैयार हुआ है और वह संसद में जाएगा तो उसको अन्य प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। इसमें जो भी समय लगे वह देना होगा ,लेकिन अन्ना के पास धैर्य नहीं है। अधीरता से अन्ना की छोटी टीम तो चल सकती है लोकतंत्र नहीं चल सकता। लोकतंत्र में प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं और उसके विभिन्न चरणों में गति बनाए रखने के लिए अपार धैर्य की जरूरत है।
     अन्ना की एक और मुश्किल है कि वे लोकतंत्र के काल्पनिक संसार में रहते हैं। लोकतंत्र को कल्पना में पाना और संस्थान की प्रक्रियाओं में ठोस रूप में देखने में जमीन- आसमान का अंतर है। लोकतांत्रिक संस्थाएं भेड़-बकरी नहीं हैं जिन्हें कोई चरवाहा हांककर ले जाए।
    लोकपाल बिल आरंभ है यह अंतिम पड़ाव नहीं है लोकपाल का। अन्ना की मुश्किल है कि वे लोकपाल और भ्रष्टाचार के भविष्य की सारी समस्याएं एक ही साथ पूरे परफेक्शन के साथ सिलटा देना चाहते हैं। लोकतंत्र में परफेक्शन, अनुभव से आता है।ख्यालों से परफेक्ट बिल या कानून हमेशा डिक्टेटर बनाते हैं। इस अर्थ में अन्ना लोकतंत्र के डिक्टेटर हैं। हमें लोकतांत्रिकअन्ना कहीं पर भी नजर नहीं आ रहा जिसमें धैर्य हो, अन्य के लिए जगह हो,संसद की प्रक्रियाओं के प्रति नमनीय भाव हो।
     अन्ना टीम का सारा प्रचार अभियान मीडिया ऑबशेसन पर टिका है। सभी बहसों में अन्नाटीम को सैलीब्रिटी के रूप में रखा जाता है। सामान्यतौर पर स्टूडियो में ऐसे लोग बुलाए जाते हैं जो अन्ना के फेन हैं या अनुयायी हैं। अन्नाटीम को मीडिया ने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं बल्कि सैलीब्रिटी के रूप में कल्टीवेट किया है।
     अन्ना के इस समय जितने अनुयायी नेट पर हैं उतने जमीन पर नहीं है। जमीन पर वेही हैं जो नेट पर हैं। इनमें अधिकांश वे लोग हैं जो सोशल नेटवर्क से जुड़े हैं और सोशल नेटवर्किंग और मीडिया के ऑब्शेसन के शिकार हैं।
     इनमें एक वर्ग उन लोगों काभी है जो भीडतंत्र का हिस्सा हैं। भीडतंत्र और लोकतंत्र में कारपोरेट मीडिया भेद करना नहीं जानता। भीडतंत्र की भाषा में ही बौखलाकर अन्नाटीम ने लोकपाल बिल  को जोकपाल बिल कहा है। भीड़तंत्र के तर्कशास्त्र में सरकार या अधिकारी की बात न मानने का भाव होता है। वे सरकार की जमकर खिल्ली उड़ाते हैं। अन्नाटीम के लोग लोकतंत्र की खिल्ली उड़ा रहे हैं, मतदाता की खिल्ली उड़ा रहे हैं, वे वोटर की अज्ञानता,उपेक्षा,संवादहीनता,शिरकत के अभाव की खिल्ली उड़ा रहे हैं। स्वयं अन्ना हजारे यही हथकंडा अपना चुके हैं। स्वयं अन्ना ने आम नागरिकों की खिल्ली उड़ायी है। अन्नाटीम अपने को ज्ञानी और आम आदमी को मूर्ख मानकर तर्क दे रही है। संस्थान के नियम,कानून का शासन,कानून की गति,सरकार की मजबूरियां और जिम्मेदारियों आदि के प्रति अन्नाटीम का अनैतिहासिक नजरिया है। वे न तो संरचनाओं को ऐतिहासिक नजरिए से देख रहे हैं और न संसद और संविधान को ही।







बुधवार, 8 जून 2011

बाबा रामदेव, कांग्रेस और मीडिया

बाबा रामदेव के अनशन पर 4 जून की रात को अचानक 12.30 बजे पुलिस के हजारों सिपाहियों ने घेरा डाल दिया। सोते हुए नागरिकों पर लाठीचार्ज,जबर्दस्ती खदेड़ने ,मारने,आंसू गैस के गोले छोड़ने आदि के कारण अनेक लोग घायल हुए हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मानना है  उनकी सरकार के पास इससे बेहतर कोई विकल्प नहीं था । असल में कांग्रेस को बाबा पर अपनी रणनीति तय करने में वक्त लगा और जब बाबा से मुठभेड़ का फैसला किया तब तक 1 लाख लोग अनशन स्थल के आसपास पहुँच गए थे। इससे यही पता चलता है कि कांग्रेस पार्टी को राजनीतिक तौर पर फैसले लेने में किस कठिनाई से गुजरना पड़ा होगा। पहले कांग्रेस ने तदर्थभाव से बाबा के अनशन को लिया और टुकड़ो में उसे सिलटाने की सोची थी ,लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां तदर्थ में सोचने की कांग्रेस की आदत के अनुकूल नहीं थीं ,अतः कांग्रेस ने बाबा का राजनीतिक मुकाबला करने का फैसला किया और उसी फैसले के तहत अनशन स्थल पर पुलिस एक्शन हुआ। आज 8 जून 2011को अन्ना हजारे इसके प्रतिवाद में अनशन कर रहे हैं, अपनी तदर्थ राजनीतिक समझ के कारण अन्ना हजारे के पहले वाले अनशन को कांग्रेस ठीक से देख ही नहीं पायी लेकिन अब इन दोनों से ही उसने टकराव का रास्ता अपना लिया है।
    बाबा के अनशन का अहर्निश लाइव कवरेज करने वाले चैनलों की पुलिस एक्शन के समय की छवियों के प्रसारण को लेकर जो भूमिका रही है वह चिंता की बात है और उसने कई नए सवालों को जन्म दिया है।
मसलन्, कारपोरेट मीडिया पर मनमोहन सरकार की अघोषित सेंसरशिप है या सेल्फ सेंसरशिप है ?बाबा रामदेव के अनशन स्थल पर टीवी चैनलों ने ढाई घंटे की पुलिस कार्रवाई के बर्बर दृश्यों को सेंसर कर दिया है। कारपोरेट मीडिया की इस तरह सत्य को छिपाने की कोशिश की तीखी आलोचना की जानी चाहिए।इससे कारपोरेट मीडिया की पोल खुलती है ।कि वो किससे के साथ है ? आजतक ने किस दबाब में पुलिस बर्बरता को छिपाया है ? अपने वेब पेज पर पीटीआई की मासूम तस्वीरें दी हैं इनको देखकर नहीं लगता कि बाबा के अनशन स्थल पर कोई पुलिस वाला मार रहा था ? टीवी चैनलों का पूरी नंगई के साथ अनशन पर पुलिस की बर्बरता को छिपाना अभिव्यक्ति की आजादी की हत्या है ?जिस समय बाबा रामदेव के अनशन स्थल पर पुलिस ने घेरा डाला,लाठीचार्ज किया उस समय एकमात्र स्टार न्यूज के संवाददाता दीपक चौरसिया कमेन्ट्री कर रहे थे। बाकी चैनल वाले सोए हुए थे।वे सब बाद में धीरे धीरे पहुँचे।पीटीआई संवाद एजेंसी किस तरह सरकारी एजेंसी की तरह काम करती है और सेंसरशिप का प्रयोग करते हैं,आजतक चैनल की वेबसाइट पर दी तस्वीरें इसका आदर्श प्रमाण हैं। ऐसी अवस्था में लोग किस पर विश्वास करें ? स्टार न्यूज पर दीपक चौरसिया बता रहे थे कि कैसे पुलिस लाठियां बरसा रही है,औरतों को पीट रही है,नृशंसतापूर्ण व्यवहार कर रही है लेकिन तस्वीरों में यह सब गायब था। स्टूडियो में फोटो सेंसर करके सीधे कमेंट्री सुनाई जा रही थी।
एनडीटीवी पर विष्णुसोम आते हैं और वे उन्हीं तस्वीरों को दिखाते हैं जो स्टार न्यूज की थीं लेकिन कमेंट्री अपनी बनाते हैं। बाद में उनकी संवाददाता पहुँचती है लेकिव तस्वीरें नहीं आतीं। आखिर बर्बर लाठीचार्ज की तस्वीरें किसके कहने से सेंसर की गईं ?
टाइम्स नाउ के अर्णव गोस्वामी हरकत में आते हैं। संवाददाताओं को भेजते - खोजते हैं। स्टार न्यूज की इमेजों का प्रक्षेपण जारी रखते हैं। उनके 2 संवाददाता पहलीबार यह बताते हैं कि पुलिस ने दोपहर ही बाबा को नोटिस दिया था कि आपको दी गई परमीशन क्यों न कैंसिल कर दी जाए।बाबा जबाब नहीं देते। मीडिया ने उस समय यह खबर क्यों नहीं दी ?टाइम्सनाउ ने भी नहीं दी।क्यों ?
टीवी चैनलों ने बाबा रामदेव के अनशन पर बर्बर लाठीचार्ज की जो तस्वीरें दी हैं उनमें यह सामान्य पुलिस कार्रवाई लगती है। जबकि उनके बयानों में यह असामान्य कार्रवाई थी। क्या यह रूटिन पुलिस एक्शन था ?बाबा रामदेव से लेकर भारतीय जनता पार्टी के आडवाणी जी तक कह रहे हैं यह जलियांवालाबाग जैसी घटना है। यह तुलना सरासर गलत है।जलियाँबाग की नृशंस घटना के बाद सारे देश में आक्रोश की लहर दौड़ गयी थी। बाबा रामदेव के अनशन पर लाठीजार्ज को जनता ने सामान्य भाव से लिया है। भाजपाके बड़े नेता अपने धरने पर 5हजार की भीड़ भी नहीं जुटा पाए।

बाबा रामदेव ने उस समय दिल्ली की जनता का आह्वान किया था कि वो घरों से आकर प्रतिवाद करें।संभवतः ज्यादातर लोगों ने उसे देखा ही नहीं था। बाबा रामदेव बताएंगे कि कितने लोग घायल हुए ?टीवी चैनल वाले अभी तक संख्या क्यों बता रहे ? उस रात विभिन्न अस्पतालों में कितने अनशनकारी लोगों का इलाज हुआ।किस तरह की चोटें आईं उन्हें ?बाबा रामदेव के कहा है कि उनके पास सभी अनशनकारियों के मोबाइल नम्बर हैं। फिर उन्होंने अभी तक घायल अनशनकारियों के नाम-पते जारी क्यों नहीं किए ? फिर उन लोगों की मीडिया जांच करे ?आस्था चैनल बाबा रामदेव चलाते हैं और उस चैनल के लोग भी कैमरा लेकर 4जून को अनशन स्थल पर थे पुलिस एक्शन के समय के उनके कैमरे में बंद फुटेज आज तक क्यों नहीं दिखाए गए ? बाबा किसका इंतजार कर रहे हैं ? किस मंशा से नहीं दिखाए अभी तक फुटेज ?         
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मसले पर संज्ञान लिया है और संबंधित संस्थानों से जबाव मांगे हैं।मानवाधिकार आयोग ने भी नोटिस जारी किए हैं। कायदे से सुप्रीम कोर्ट को सभी प्रमुख चैनलों कवरेज से असंपादित फुटेज जमा करने के लिए कहना चाहिए ।अनशन स्थल पर सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे , अदालत को दिल्ली पुलिस को आदेश देना चाहिए कि वह सीसीटीवी कैमरों के जरिए लिए गए सभी चित्रों को अदालत में पेश करे ,इससे पुलिस बर्बरता को समझने में मदद मिलेगी।  




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