आईएसआईएस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आईएसआईएस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

आईएसआईएस और उसके सहयोगी राष्ट्र

सामान्य तौर पर मीडिया देखकर यही लगता है आईएस के आतंकियों का स्वायत्त नेटवर्क है और वे सच में पश्चिम के शत्रु हैं,लेकिन पिछले दिन रुस के राष्ट्रपति पुतिन ने आईएस के 40 मददगार देशों की सूची जारी करके साफ कर दिया कि आईएस के पीछे किन ताकतों का हाथ है। इराक में सद्दाम हुसैन के जुल्मों से इराकी जनता को निजात दिलाने और इराक जनसंहारक अस्त्रों के जखीरे को नष्ट करने के बहाने अमेरिका और नाटो संगठन ने इराक पर हमला किया उससे इराक में शांति तो नहीं लौटी,विनाशलीला और आईएस जैसे दानव का जन्म जरुर हुआ। आईएस को निर्मित करने में सऊदीअरब,अमेरिका,कतार,तुर्की,इस्रायल, ब्रिटेन और फ्रांस आदि देशों के नाम पुतिन ने अपनी सूची में प्रमाण सहित पेश किए हैं। आईएस के आतंकियों को तुर्की ,जोर्डन,कतार,इराक और सऊदी अरब से सीधे सैन्य मदद मिल रही है।हथियारों की अबाध सप्लाई का काम अमेरिकी प्रशासन कर रहा है। सीरिया युद्ध में जिस तरह आईएस उलझा हुआ है और नाटो सैन्य संगठन उनकी मदद कर रहा है उस समूची योजना को रुस के सैन्य अभियान ने पूरी तरह पंक्चर कर दिया है, आईएस के जरिए सीरिया के तेल कुओं पर नाटो देशों खासकर तुर्की ने कब्जा जमाया हुआ है,यही बुनियादी वजह है कि आईएस के साथ पश्चिमी देशों की अघोषित मित्रता है।

   रुस के सुखोई बमबर्षक विमान को तुर्की द्वारा अवैध रुप से गिराए जाने के साथ यह कयास लगाया जा रहा था कि रुस का आईएस के खिलाफ अभियान कमजोर हो जाएगा,लेकिन ऐसा नहीं हुआ,रुस ने उस घटना के बाद सीरिया के इलाके में आईएस के शिविरों और कब्जे वाले लाके में जमकर बमबारी की है। तुर्की किस तरह आईएस के आतंकियों से जुड़ा रहा है और उनके लिए हथियारों की सप्लाई कर रहा है उसके प्रमाण अखबारों एवं अन्य मीडिया में आने लगे हैं। तुर्की के प्रसिद्ध अखबार “Cumhuriyet’s” ने मई 2014 में लिखा कि तुर्की के सरकारी ट्रकों के जरिए आईएस के सीरियाई आतंकियों को सैन्य सामग्री की बहुत बड़ी खेप की सप्लाई भेजी गयी, इसमें 1,000 तोप के गोले,, 50,000 मशीनगन गोलियां,  30,000 भारी मशीनगन गोलियां, 1,000 मोर्टार तोप के गोले थे। कालांतर में इस अखबार के संपादक को तुर्की प्रशासन जेल में डाल दिया,लेकिन इस अखबार ने प्रमाणसहित यह खबर प्रकाशित करके तुर्की सरकार को बेनकाव कर दिया। इस समय सारी दुनिया के सामने रुसी बमवर्षक विमान को तुर्की द्वारा मार गिराए जाने के सभी प्रमाण आ गए हैं जिनसे यह साबित होता है कि रुसी विमान तुर्की की नहीं सीरिया की सीमा में था और तुर्की ने कोई चेतावनी नहीं दी थी। 

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

जर्मनी से क्यों हो रही है आतंकीसेना में भरती


आज से एक साल पहले इराक में कुर्द इलाके में जब भाड़े के सैनिक-आतंकी के रुप में एक जर्मन की लाश मिली तो सारी दुनिया का ध्यान आतंकियों की भर्ती क्षमता की ओर गया। हमने कभी इस सवाल पर विचार नहीं किया कि जर्मन देश में मजबूत सरकार,मजबूत राष्ट्रवाद,उदार समाज और बेहतरीन शिक्षा के बावजूद वहां से आतंकी संगठनों के लिए भाड़े के सैनिक कैसे मिल रहे हैं ? सीरिया में आतंकियों के संगठनों में तकरीबन 600जर्मन-मुसलिम भाड़े के सैनिकों के होने का अनुमान जर्मन सरकार ने व्यक्त किया है।

उल्लेखनीय है भाड़े के सैनिकों की एक ऐसे देश से भर्ती हो रही है जिसकी प्रति व्यक्ति आय सारे यूरोप में सबसे ज्यादा है।जर्मन अधिकारियों के अनुसार सीरियाई आतंकियों के लिए काम करते हुए 60जर्मन भाड़े के सैनिक मारे जा चुके हैं और तकरीबन180वापस जर्मनी लौट चुके हैं। जर्मनों की आतंकी भाड़े के सैनिक के रुप में संघर्ष करने की लंबी परंपरा है, एक जमाने में अफगानिस्तान में भी भाड़े के जर्मन सैनिक लड़ने के लिए गए थे। भाड़े के जर्मन आतंकीसैनिकों को चेचेन्या और बोसनिया की भाड़े की सेनाओं में भी लड़ते हुए देखा गया। सवाल यह है अतिविकसित देश जर्मन अपने नागरिकों को आतंकियों-पृथकतावादियों को क्यों मुहैय्या करा रहा है ?जर्मनी में “मल्टी कल्चरल हाउस” नामक संस्था है जिसने चेचेन्या-बोसनिया आदि में भाड़े के सैनिकों की भर्ती करके आतंकियों को जर्मन-मुसलिम युवाओं की सेवाएं उपलब्ध करायीं। इसके अलावा हेमबर्ग की एक मसजिद के जरिए भी भाड़े के सैनिकों की भर्ती का काम होता रहा है। यही वह मसजिद है जिसके जरिए 9/11 के आतंकी हमले लिए भी आतंकी भर्ती किए गए थे।सन् 2009 और 2010 में अलकायदा के पाक ग्रुप के लिए भी यहाँ से भाड़े के सैनिक भर्ती किए गए। इसके अलावा यमन,सोमालिया, सीरिया और इराक में भी आतंकियों की भाड़े की सेना में जर्मनी से भर्ती युवा काम कर रहे हैं। सीरिया में काम करने वाले आतंकी संगठन “सलाफी जेहादी ऑर्गनाइजेशन मिलातु इब्राहीम” में जर्मनों की बड़ी संख्या है। इस संगठन का निर्माण अलकायदा के मीडिया फ्रंट “ग्लोबल इस्लामिक मीडिया फ्रंट” के महमूद और डेनिश कुस्पर्ट नामक एक आतंकी ने किया था। महमूद को 2007 में गिरफ्तार किया गया बाद में 2011 में उसे छोड़ दिया गया। डेनिश कुस्पर्ट इन दिनों सीरियाई आतंकियों का महत्वपूर्ण प्रचारक बना हुआ है। उनके नेटवर्क-वीडियो आदि के कामों को अंजाम दे रहा है। जर्मनों की आईएसआईएसएल में उपस्थिति कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं उन्होंने अपनी एक स्वतंत्र ब्रिगेड़ इस संगठन के अंदर बना ली है।

बाली में आतंकी हमला और भाड़े के सैनिकों की परंपरा


    आईएस की भाड़े की फौज को देखकर ऐसा लग रहा है कि यह नया फिनोमिना है। लेकिन सच यह है कि भाड़े की फौज खड़ी करना,आतंकी हमले करना,स्थिर सरकारों को गिराना और उनके स्थान पर कठपुतली सरकारों को बिठाने का धंधा बहुत पहले से सीआईए करता रहा है। मध्यपूर्व में दाखिल होने के पहले अनेक देशों में भाड़े के सैनिकों की भर्ती करके हमला करने,हमला गुटों को हथियार देने,पैसा देने,प्रशिक्षण देने आदि के काम भी सीआईए करता रहा है। मीडिया में आईएस और उसकी भाड़े की सेना का कवरेज कुछ इस तरह आ रहा है कि यह कोई नई बात हो। शीतयुद्ध के दौरान सीआईए ने भाड़े की सेना खड़ी करने के मामले में विशेषज्ञता हासिल कर ली थी और अनेक देशों में जनता के द्वारा चुनी गयी सरकारों को गिराया,उनके खिलाफ भाड़े के सैनिकों के जरिए युद्ध चलाए, उन देशों में अस्थिरता पैदा की ।

शीतयुद्ध की तथाकथित समाप्ति के बाद भाड़े के सैनिकों के जरिए उत्पात मचाने का सिलसिला अफगानिस्तान से सन् 1979 में आरंभ हुआ,उस समय यही कहा गया कि सोवियत सेनाओं की अफगानिस्तान में मौजूदगी का विरोध करने के लिए भाड़े की सेना बनायी जा रही है और उस सेना को खड़ा करने का ठेका फंड़ामेंटलिस्टों को बिन लादेन के नेतृत्व में आधिकारिक तौर पर सीआईए ने सौंपा,अमेरिकी राजकोष से इसके लिए धन मुहैय्या कराया गया। सीआईए के इतिहास का यह सबसे बड़ा प्रच्छन्न ऑपरेशन था, वहां से जो सिलसिला आरंभ हुआ है आज वह अब समूचे मध्यपूर्व में फैल गया है। भाड़े के सैनिकों को आतंकवाद और फंडामेंटलिज्म के विचारधारात्मक आवरण में पेश किया जा रहा है।भाड़े के सैनिकों का मुख्य काम है समूचे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करना। भाड़े के सैनिक जहां पर भी बर्ती किए गए हैं उन्होंने हमेशा संबंधित इलाके में अस्थिरता पैदा करने का काम किया है। इससे अमेरिकी प्रभुत्व,बहुराष्ट्रीय हथियार कंपनियों के कारोबार के प्रसार और भय के विस्तार में मदद मिलती है। इस तरह की गतिविधि का आतंकवाद तो एक ऊपरी आवरण है मूल लक्ष्य है भय और सामाजिक असुरक्षा पैदा करना,राजसत्ता को कमजोर करना।

मसलन्, हाल के माली में हुए आतंकी हमले को ही लें। इस हमले का मीडिया में कवरेज आया,लगातार रिपोर्टिंग आई,लेकिन मीडिया वालों ने यह नहीं बताया कि आखिरकार कौन संगठन है जिसने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। उसकी विचारधारा क्या है ,उसकी फंडिंग कहां से होती है,उसे किसने स्थापित किया,क्यों स्थापित किया आदि ।

माली के “बामको रेडीशन होटल ब्लू” पर हुए आतंकी हमले में 21लोग मारे गए, इस हमले में “इस्लामिस्ट अल-मुल्थामीन ब्रिगेड” और “अलकायदा इन दि इस्लामिक मगरिब” का हाथ था। इस संगठन को मोटे तौर पर “मुख्तार बेलमोख्तार” के नाम से जाना जाता है। “अलकायदा इन दि इस्लामिक मगरिब” संगठन का सीआईए की मदद से 2012 में लीबिया को मुक्त कराने के लिए गठन किया गया, यह संगठन आरंभ में नशीले पदार्थों की तस्करी,हथियारों की तस्करी,आतंकी हमलों ,अपहरण आदि में शामिल हुआ करता था।

न्यूयार्क टाइम्स ने 20नवम्बर2015 को माली के हमले पर लिखा-“ A member of Al Qaeda in Africa confirmed Saturday that the attack Friday on a hotel in Bamako, Mali, had been carried out by a jihadist group loyal to Mokhtar Belmokhtar, an Algerian operative for Al Qaeda. The Qaeda member, who spoke via an online chat, said that an audio message and a similar written statement in which the group claimed responsibility for the attack were authentic. The SITE Intelligence Group, which monitors jihadist groups, also confirmed the authenticity of the statement.

The Qaeda member, who refused to be named for his protection, said that Mr. Belmokhtar’s men had collaborated with the Saharan Emirate of Al Qaeda in the Islamic Maghreb, … In the audio recording, the group, known as Al Mourabitoun, says it carried out the operation in conjunction with Al Qaeda’s branch in the Islamic Maghreb.

The recording was released to the Al Jazeera network and simultaneously to Al Akhbar, … The recording states: “We, in the group of the Mourabitoun [Arabic Rebel Group], in cooperation with our brothers in Al Qaeda in Islamic Maghreb, the great desert area, claim responsibility for the hostage-taking operation in the Radisson hotel in Bamako.”

जिस समय बिन लादेन के नेतृत्व में मुजाहिदीनों की भर्ती हो रही थी और समूची दुनिया में सोवियत विरोधी उन्माद चरम पर था तो तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने मुजाहीदीनों को आतंकी कहने की बजाय “स्वाधीनता सेनानी” कहा था। “अलकायदा” का अरबी में अर्थ है “आधार” ,इस संगठन की समूची व्यूह रचना का गोमुख है सीआईए। माली की घटना में “बेलमोख्तार” संगठन का हाथ बताया जा रहा है और इस संगठन के इतिहास के बारे में प्रसिद्ध आतंकवाद विशेषज्ञ मिशेल चोदुसोवस्की ने लिखा है माली हमले में शामिल दोनों संगठनों “इस्लामिस्ट अल-मुल्थामीन ब्रिगेड” और “अलकायदा इन दि इस्लामिक मगरिब” का गहरा संबंध है। “इस्लामिस्ट अल-मुल्थामीन ब्रिगेड” नामक संगठन “अलकायदा इन दि इस्लामिक मगरिब” के सहयोगी संगठन के रुप में जाना जाता है। “अलकायदा इन इस्लामिक मगरिब” को प्रशिक्षित करने का काम 1979-89 के बीच में अफगानिस्तान में ही हुआ था। वाशिंगटन स्थित “कौसिल ऑन फॉरेन रिलेशन” ने इनके आंतरिक संबंधों को माना है। उसने लिखा है- “Most of AQIM’s major leaders are believed to have trained in Afghanistan during the 1979-1989 war against the Soviets as part of a group of North African volunteers known as “Afghan Arabs” that returned to the region and radicalized Islamist movements in the years that followed. The group is divided into “katibas” or brigades, which are clustered into different and often independent cells.The group’s top leader, or emir, since 2004 has been Abdelmalek Droukdel, also known as Abou Mossab Abdelwadoud, a trained engineer and explosives expert who has fought in Afghanistan and has roots with the GIA in Algeria.”



भाड़े के सैनिकों की भर्ती की परंपरा में इन दिनों भारत का नाम भी आ गया है तकरीबन 29भारतीय भी आईएस की भाड़े की फौज में शामिल हो चुके हैं, जिनमें से 6 मारे जा चुके हैं, कुछ भारत वापस आ गए हैं, कुछ अभी वहीं पर लड़ रहे हैं। सीरिया-इराक के प्रसंग में भाड़े के फौजियों की भर्ती के केन्द्र के रुप में कनाडा बहुत बड़े भर्ती केन्द्र के रुप में उभरकर सामने आया है। उल्लेखनीय है कनाडा से ही बड़ी मात्रा में एक जमाने में भाड़े के आतंकी पंजाब में आतंकवाद फैलाने आए थे,आज भी पंजाब में सक्रिय आतंकियों का बहुत बड़ा केन्द्र कनाडा से ही संचालित है। यही दशा सीरिया की भी है। सीरिया में राष्ट्रपति असद के खिलाफ जो संगठन सीआईए और नाटो ने खड़े किए उनके लिए भाड़े के सैनिकों की बहुत बड़ी खेप कनाडा से ही लायी गयी। आज इराक और सीरिया में कनाड़ा से भर्ती किए गए भाड़े के सैनिक सबसे ज्यादा लड़ रहे हैं। ये लोग विभिन्न गुटों की सेनाओं में भर्ती होकर काम कर रहे हैं। उल्लेखनीय है विभिन्न आतंकी संगठनों की अपनी निजी सेनाएं है,हत्यारे गिरोह हैं जो तयशुदा निशानों और लक्ष्यों पर आदेशानुसार हमले करते हैं। सतह पर देखेंगे तो कनाड़ा शांत देश है,बहुलतावादी देश है,सारी दुनिया उसके बहुलतावाद पर गर्व करती है लेकिन आतंकी संगठनों की निजी सेनाओं के लिए भाड़े के सैनिकों की भर्ती का यह बहुत बड़ा केन्द्र भी है ।सवाल यह है कि बहुलतावाद-उदारतावाद आदि के बावजूद कनाडा से युवालोग आतंकी सेना में भाड़े के सैनिक के रुप में भर्ती क्यों किए जा रहे हैं ? कनाडा का बहुलतावाद-उदारतावाद उनको रोक क्यों नहीं पा रहा ? अमेरिका-कनाडा की सरकारें बेहतर ढ़ंग से जानते हुए भी इन युवाओं को रोकती क्यों नहीं ?

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

विवेकवाद के हत्यारे

                                    
  पेरिस में व्यंग्य पत्रिका चार्ली हेब्दो "पर किया गया हमला निंदनीय है। इस हमले में १२लोग मारे गए हैं जिनमें 10 पत्रकार भी हैं। इस व्यंग्य पत्रिका ने आईएसआईएस के प्रधान पर व्यंग्य छापा था,जिसके प्रत्युत्तर में आतंकियों ने यह हमला किया , यह पत्रिका फ़्रांस में व्यंग्य के लिए प्रसिद्ध है और समय- समय पर विभिन्न धर्मों पर व्यंग्य छापती रही है। सारी दुनिया में आतंकी और साम्प्रदायिक संगठन जिस तरह धर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं उससे धर्म के प्रति सारी दुनिया में धारणा ही बदल गयी है। आतंकी और साम्प्रदायिक संगठनों के द्वारा धर्म का इस्तेमाल करने से धर्म का मूल चरित्र ही बदल गया है। धर्म का मूल चरित्र प्रेम और सहिष्णुता का था लेकिन नए रुपों में धर्म अब भय का प्रतीक बन गया है। 
    
          असल में  धर्म मध्यकालीन अविवेकवाद है। उससे निरंतर मुक्त होकर सोचने और आचरण करने की ज़रुरत है। दुर्भाग्य यह है कि आधुनिकयुग में धर्म की अंधी चली हुई है। चारों ओर संतों-महंतों-धार्मिक चैनलों की बाढ़ आ गयी है। धर्म के नाम पर राजनीति हो रही है , वोट माँगे जा रहे हैं,धार्मिक समूह में जीने और सहने की बातें कही जा रही हैं,उनके मानने पर ज़ोर दिया जा रहा है, धार्मिक पहचान में सोचने और जीने के नए -नए फ़ार्मूले जीवनशैली- स्वास्थ्य आदि के नाम पर  ज़ेहन में उतारे जा रहे हैं। सच यह है धर्म का जितना बर्बर इस्तेमाल आधुनिककाल में देख रहे हैं वैसा तो मध्यकाल में भी नहीं देखा गया। आधुनिककाल में धर्म को हम विभिन्न वैचारिक धार्मिक रंगतों में देख रहे हैं और इन सभी रंगतों का एक ही लक्ष्य है धर्म के सामाजिक और राजनीतिक वर्चस्व को स्थापित करना, हर हालत में धर्म के आधार पर सोचने ,मानने और आचरण करने के लिए विवश करना । इस नज़रिए का आतंकी और साम्प्रदायिक संगठन  खुलकर प्रयोग कर रहे हैं। धर्म की आलोचना करने वालों के खिलाफ हिंसाचार कर रहे हैं,निरीह  जनता पर हमले कर रहे हैं, धर्म के आलोचक बुद्धिजीवियों को निशाना बना रहे हैं ।
     इस समूची प्रक्रिया का एक आयाम  मध्यपूर्व के देशों में सक्रिय धार्मिक आतंकी संगठनों से जुडा है तो दूसरा तथाकथित उदार लोकतंत्र में सक्रिय साम्प्रदायिक -फ़ंडामेंटलिस्ट संगठनों से जुडता है। ईसाई,हिन्दू,बुद्ध ,इस्लाम आदि धार्मिक मताबलम्बियों में ये संगठन अमेरिका,ब्रिटेन,जापान, फ़्रांस,श्रीलंका, चीन, म्यांमार, भारत आदि में आक्रामक और हिंसक रुप में सक्रिय हैं।  ये संगठन खुलकर धर्म के साथ हिंसा का सहारा ले रहे हैं ,कहीं पर वे शारीरिक हमले कर रहे हैं तो कहीं पर वाचिक हमले कर रहे हैं। इन नए धर्मरक्षकों का लक्ष्य है सत्ता हासिल करना और सामाजिक वर्चस्व स्थापित करना।
     पेरिस की व्यंग्य पत्रिका "चार्ली हेब्दो "पर किया गया हमला सामयिक दौर का सबसे बर्बर हमला है। इसमें एक साथ 12 लोग मारे गए हैं। यह व्यंग्य विधा पर तो हमला है ही, साथ ही अभिव्यक्ति की आज़ादी पर भी हमला है। यह धार्मिक आतंकवाद है। धर्म के नाम किया गया हिंसाचार धार्मिक आतंकवाद की कोटि में आता है और यह सामाजिक कैंसर है । यह धर्म के प्रति सम्मान को नष्ट करने वाली प्रवृत्ति है। हम साफ़तौर पर कहना चाहते हैं  लोकतंत्र में व्यंग्य विधा की हर हालत में रक्षा करने की ज़रुरत है, साथ ही निर्भीक आलोचना का सम्मान करना और उसके साथ जीने के संस्कार और आदतें पैदा करें । हम  उनका भी सम्मान करना करना सीखें जो निर्भीक होकर असहमति व्यक्त करते हैं, असम्मान व्यक्त करते हैं। लोकतंत्र का अर्थ है ' स्व' एवं 'अन्य' के प्रति सम्मान और सहिष्णुता व्यक्त की जाय ।हर स्तर पर वाचिक और शारीरिक हिंसाचार  और असभ्य आचरण से बचा जाय ।हिंसा, असभ्यता और अविवेक ये तीन नरक द्वार हैं धार्मिक आतंकवाद के। 


शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

गुमशुदा 39 के कवरेज से उठे सवाल


        एबीपी न्यूज ने इराक में आईएसआई के द्वारा अपहृत किए गए 40भारतीय मजदूरों पर कल (28जून 2014) एक बेहतरीन तथ्यपरक कार्यक्रम पेश किया। साथ में अपने चैनल की राय भी दी कि कार्यक्रम में प्रस्तुत तथ्यों की खासकर 39मजदूरों की हत्या की वह पुष्टि नहीं कर सकता। इसके बावजूद हमें इस कार्यक्रम से उठे सवालों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह सच है कि आम आदमी पार्टी के सांसद ने लोकसभा के पिछले सत्र में यह मसला सबसे उठाया था, उस समय किसी ने इस मसले की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया,यहां तक कि विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने भी आश्वासन देकर सारे मसले को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया। लेकिन कल के टीवी कवरेज ने इस मसले को जिंदा कर दिया है। इस मसले पर विदेशमंत्रालय अभी तक बयान नहीं दे पाया है।
      स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इन मजदूरों के अपहरण के प्रसंग का सरकार और उसका तंत्र निगरानी  कर रहा था, आतंकियों के चंगुल से भागे एक मजदूर से भी इराक स्थित दूतावास ने संपर्क किया, लेकिन इस समय वह मजदूर कहां है,कोई नहीं जानता ,साथ ही 39मजदूर किस अवस्था में हैं कोई नहीं जानता।  सरकार ने अपने बयान में भी कहा था कि उसे मालूम है कि भारतीय मजदूरों को बंदी बनाकर कहां रखा गया है। इसके बाद क्या हुआ किसी को कुछ नहीं मालूम। कल हठात 2बंगलादेशी नागरिकों के बयान सुनाकर टीवी चैनल ने सारे देश का ध्यान इस समस्या की ओर खींचा है और पत्रकारिता के लिहाज से यह स्वस्थ बात है। सरकार का पूरा तंत्र जो अब तक सोया पड़ा था हठात हरकत में आ गया है और विदेशमंत्री कह रही हैं कि तथ्यों को जानकर ही वे बयान देंगी। सवाल यह है क्या इस घटना की दैनंदिन सूचनाएं-रिपोर्टिंग मंत्री महोदया को हमारा इराक दूतावास नहीं कर रहा था ? रीयलटाइम में ट्विट करने वाले पीएम और उनके मंत्री एक भी ट्विट क्यों नहीं कर पाए ? क्या मंत्रालय के पास इतनी भी जानकारी नहीं है कि तुरंत कुछ कहा जाय ? सूचनाएं बताती हैं कि 10जून2014 को इराक के मोसुल इलाके में 40 भारतीय मजदूरों का आतंकियों ने अपहरण किया था। इनमें से एक मजदूर किसी तरह भागने में सफल रहा। यह खबर सबसे पहले भारतीय मीडिया में आई। जबकि भारतीय मीडिया में बंगलादेश के मजदूरों के अपहरण की बात एकसिरे से गायब रही है ,लेकिन एबीपी न्यूज की रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है कि कुल91मजदूरों का आतंकियों ने अपहरण किया था जिनमें 51 बंगलादेशी मजदूरों को उन्होंने मुसलमान होने के कारण बाद में छोड़ दिया और 40 भारतीयों को उन्होंने झुंड से अलग करके गोलियों से भून दिया। 
     बंगलादेश के जिन दो चश्मदीद मजदूरों का टीवी कवरेज में चैनल ने इस्तेमाल किया है,उनके बयान के अलावा और किसी स्रोत से इस खबर की पुष्टि नहीं हुई है। उल्लेखनीय है कि आईएसआईएस का अब तक का रवैय्या रहा है कि वे जिनको गोलियों से भूनते हैं उनके बारे में खुद भी बयान जारी करते हैं, वीडियो जारी करते हैं,लेकिन अपहृत मजदूरों के बारे में उन्होंने कोई बयान जारी ही नहीं किया,न तो अपहरण का बयान जारी किया और न हत्या करनेवाली घटना पर बयान जारी किया। दूसरी समस्या यह है कि भारत सरकार यह कहती रही है कि वे जानते हैं इन मजदूरों को बंदी बनाकर रखा हुआ है और वे प्रयास कर रहे हैं रिहाई के। सवाल यह है कि उन प्रयासों में कोई प्रगति हुई या नहीं ? विदेशमंत्री ने विभिन्न स्तरों पर मजदूरों की रिहाई के लिए बातें की हैं लेकिन कोई परिणाम सामने नहीं आया। इसी प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कई हजार भारतीयों और अपहृत नर्सों को छुड़ाने में सरकार को सफलता मिली है। लेकिन इस चक्कर में 39मजदूरों की रिहाई का मामला अभी तक अटका पड़ा है। कई स्रोतों से यह भी खबर आई थी कि आतंकियों ने 39मजदूरों की रिहाई के बदले मोटी रकम फिरौती के रुप में मांगी थी, जिसे भारत सरकार ने देने से मना कर दिया था। तीसरी मुश्किल यह है कि इराक के जिस इलाके में घटना हुई और जहां पर ले जाकर 39 मजदूरों का 'कत्ल' हुआ है,उसके बारे में इराक स्थित राजदूत या विदेश मंत्रालय या अन्य एजेन्सियों का कोई बयान अभी तक क्यों नहीं आया ? एबीपी न्यूज की खबर जब तक पुष्ट नहीं होती तब तक वह महज़ 'अघटित घटना' की खबर ही कही जाएगी। बेहतर यही होगा कि विदेश मंत्रालय विस्तार के साथ सभी तथ्यों का खुलासा करते हुए श्वेतपत्र के रुप में विस्तृत बयान जारी करे।  

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...