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शनिवार, 7 मई 2016

डिग्री का मायाजाल और हनुमानभाव


     जब हमने कह दिया तुम भगवान हो तो भगवान हो ! जब हमने कह दिया तुमसे ज्यादा कोई बलिष्ठ नहीं है,तो कोई नहीं है ! हमारे यानी भक्त के कहने का मूल्य है ! तुम तो जानते ही हो भगवान को भगवान खुद भगवान ने नहीं बनाया बल्कि भक्तों ने भगवान को भगवान बनाया है!तुम जान लो श्रीराम –श्रीराम न होते यदि भक्त हनुमान न होते ! हमने देखा है भगवान के पेशाब से चिराग जलता है,हमने महसूस किया भगवान के इशारे पर सारे मीडिया की आवाज बंद हो जाती है ! सारा मीडिया भगवान –भगवान करने लगता है ! यह भगवान का ही खेल है कि आरएसएस जैसा संगठन भेड़ बन गया है! भगवान के जब इतने खेल चल रहे हों तो ऐसी अवस्था में ये क्या डिग्री दिखाओ –डिग्री दिखाओ लगा रखा है !

डिग्री की जरूरत मूर्खों की पड़ती है !देवता और अक्लमंद डिग्री से नहीं पहचाने जाते ! तुम कम अक्ल हो, इसीलिए डिग्री-डिग्री चिल्ला रहे हो!भगवान तो भगवान हैं ,वे महाअक्ल हैं!वे कृपानिधान हैं! सर्वगुण सम्पन्न हैं! उनकी इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता! वैंकेय्या नायडूजी आप उनसे भी महान् हैं! हमारे यहां हिन्दी साहित्य में कहावत है भक्त भगवान से बड़ा होता है ! भगवान और भक्त में भक्त ताकतवर होता है! नायडूजी आपकी भक्ति देखकर मेरा मन भक्त-भक्त हो गया है ! आपसे अंदर से ईर्ष्या भी हो रही है कि मैं आप जैसा भक्त क्यों नहीं बन पाया !

नायडूजी आपने सही कहा पीएम नरेन्द्र मोदी भगवान की देन हैं,स्वयं भगवान हैं!कमाल की खोज की है आपने ! सही कहा है किसी ने ,जो चीज भक्त को नजर आती है वह चीज भगवान में गैर-भक्तों को नजर नहीं आती ! नायडूजी आपकी जय हो!आपने हम सबकी आँखें खोल दीं! आप कितने महान् हैं कि आपने मोदी भगवान् की खोज कर ली !आप इसलिए भी महान् हैं क्योंकि आपने भगवान् को भगवान् बना दिया!

पत्थर की मूर्ति में भगवान् की जो प्राणप्रतिष्ठा करता है उसका लोग परम भक्त के रूप में प्रतिदिन स्मरण करते हैं! नायडूजी आपकी भक्ति देखकर इस समय ईश्वर के रीयल भक्त भी थर-थर काँपने लगे हैं,पश्चाताप की आग में जल रहे हैं कि अरे सामने भगवान खड़े थे,घर –घर में टीवी स्क्रीन में भगवान गीता पढ़ रहे थे,लेकिन हम अभागे उनको देख ही न पाए!नायडूजी रीयल भक्त दुखी हैं और पीड़ित भी हैं कि हमारे जैसे धर्मप्राण भारत में साक्षात भगवान पधारे और वे उनको पहचान नहीं पाए! नायडूजी आपने भारत की भक्तप्राण जनता की आँखें खोल दीं,आप धन्य हैं और हमें धिक्कार है !

नायडूजी आपकी भक्ति और दिव्यदृष्टि देखकर अरविन्द केजरीवाल पर गुस्सा आ रहा है,लगता है यह आदमी ठीक नहीं है,भक्त को नहीं पहचानता ! भगवान को नहीं पहचानता ! पता नहीं यह मोदी भगवान को छोड़कर काहे को रोज जय हनुमान –हनुमान करता रहता है !

जिस तरह हर गली में हनुमान घूमते रहते हैं वैसे ही यह भी घूमता रहता है,जिस तरह गली के छोरे किसी के पीछे पड़ जाते हैं तो झल्लाकर रख देते हैं,इसने भी गली के छोकरों की तरह मूर्खतापूर्ण सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं,कह रहा भगवान की डिग्री फेक है! पागल हो गए हो केजरीवाल ! लेकिन नहीं हमें उसकी बात पर गौर करना चाहिए।असल में केजरीवाल तो हनुमान भाव में रहता है! हनुमान भाव बेहद खतरनाक है यह रावण को मौत के मुँह तक पहुँचा चुका है,वह बहुत सारी डिग्रियों से युक्त पंडित था,लेकिन हनुमान भाव ने रावण की ,सत्ता,डिग्रियों और विद्वता को एक ही झटके में राख करके रख दिया था,सोने की लंका में आग लगा दी ।हनुमान भाव में निडरता और पूंछ बहुत महत्वपूर्ण है,लंका में आग लगाने के लिए हनुमान की निडरता और पूंछ ही महान् हैं!

हनुमान भाव के सामने महाबली ,महापंडित रावण का सारा कौशल बेकार गया! हनुमान भाव से राम भी प्रभावित थे।हनुमान भाव यानी आग लगाने वाला भाव,लंका जलाने वाला भाव!इस भाव के सामने सब कुछ नश्वर है,भगवान भी नश्वर है,विद्वान भी नश्वर है,राम की विजय में हनुमान भाव की कभी किसी ने उस तरह चर्चा नहीं की है,लेकिन आप तो जानते ही हैं हनुमान भाव महान है। हनुमान भाव का लक्ष्य है रावण का वध ! हनुमान भाव के लिए सत्य,तथ्य, तर्क-वितर्क महत्वपूर्ण नहीं है।हमने बार-बार देखा है भक्तभाव के जितने रूप हैं उनमें हनुमान भाव सबसे ताकतवर है।भगवान राम के भक्त काम नहीं आए,हनुमान भाव काम आया! तुम यादकरो हनुमान के पास क्या था ॽ सिर्फ हनुमान भाव था!हनुमान भाव यानी निडरता! केजरीवाल इसलिए सुंदर लगता है क्योंकि वह निडर है!भक्त कमजोर होता है क्योंकि वह निडर नहीं होता!तुम तो जानते हो लोकतंत्र की कुंजी उनके हाथ में है जो निडर हैं ! अब सोचो तुमको भक्त बनना है या निडर बनना है।निडर बनना है तो हनुमान भाव में जाओ,लंका में आग लगाओ !



शुक्रवार, 6 मई 2016

मोदी-ईरानी निराश न हों! डिग्रियां ही डिग्रियां!


         जब देश में प्रधानमंत्री और मानव संसाधन मंत्री की डिग्रियां फेक हों तो सोचो इनके निशाने पर सबसे पहले कौन होगा ॽ जाहिरा तौर पर शिक्षा क्षेत्र होगा।विश्वविद्यालय होंगे,दिल्ली विश्वविद्यालय होगा।हमारे सीपीआईएम के शिक्षकनेता खासतौर पर सुन लें कि उनकी यह पहली जिम्मेदारी बनती थी कि वे नरेन्द्र मोदी और स्मृति ईरानी की फेक डिग्री के मामले को उठाते और इन दोनों नेताओं को बेनकाब करते।लेकिन उन्होंने यह काम नहीं किया।जबकि शिक्षक संघ में उनका नेतृत्व है। हम नहीं मानते कि इस मामले में माकपा के नेताओं ने अनजाने चूक की है,बल्कि यह माकपा के शिक्षक नेताओं में बढ़ रही अ-राजनीतिक मनोदशा का परिणाम है।सोचने वाली बात यह भी है कांग्रेस का दमदार नेतृत्व है डीयू में लेकिन उसने भी यह काम नहीं किया,क्योंकि उनको भी मोदीजी से लेन-देन की राजनीति करनी है।

आम आदमी पार्टी को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने पीएम नरेन्द्र मोदी और मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की फेक डिग्रियों के मसले को राष्ट्रीय प्रश्न बना दिया।ताज्जुब की बात यह है कांग्रेस और माकपा दोनों ने संसद में इन दोनों नेताओं की फेक डिग्री के मसले को आजतक पुरजोर ढ़ंग से नहीं उठाया,एक भी दिन संसद ठप्प नहीं की। इस मसले की इन दोनों दलों द्वारा उपेक्षा अनजाने में नहीं हुई है।बल्कि सुनियोजित समझ का परिणाम है।

संसद में इन दोनों नेताओं पर दबाव डाला जाए कि ये दोनों नेता अपनी वैध डिग्रियां संसद के पटल पर पेश करें,जिससे उनकी वैधता की जांच करायी जा सके।लेकिन सत्ता और विपक्ष में इस मामले में नूरा कुश्ती चल रही है।पूरा विपक्ष मोदीजी और ईरानीजी को घेर सकता था लेकिन घेर नहीं रहा।क्यों नहीं घेर रहा ॽ क्यों अकेले आम आदमी पार्टी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने यह फ्रंट संभाला हुआ है ॽ क्या विपक्ष की इस मामले में कोई जिम्मेदारी है या नहीं ॽ

ईरानीजी और मोदीजी की फेक डिग्रियों के प्रसंग में मुझे 1970 के दशक की दिल्ली की दीवारें याद आ रही हैं,उस समय इन दीवारों पर पोस्टर लगे रहते थे-हाईस्कूल फेल निराश न हों,सीधे बी.ए. करें।इसी तरह-बी.ए.फेल निराश न हों सीधे एम.ए. करें।सचदेवा इंस्टीट्यूट के इस तरह पोस्टरों से दिल्ली भरी रहती थी। इन पोस्टरों का मुख्य शीर्षक हुआ करता था,´निराश न हों´,हमें लगता यही है इन दोनों नेताओं ने इस तरह के पोस्टरों से प्रभावित होकर अपनी डिग्री की अभिलाषा को पूरा किया होगा !!

इस तरह के इंस्टीट्यूट उस जमाने में हजारों निराश युवक-युवतियों के लिए आशा की किरण बनकर सामने आए थे।लाखों निराश युवाओं के इनके जरिए घर बसे,डिग्री पाने की अभिलाषा पूरी हुई। वरना यह कैसे संभव है कि आम आदमी पार्टी चीख-चीखकर कह रही है पीएम की डिग्रियां फेक हैं लेकिन पीएम जबाव नहीं दे रहे,ईरानी जबाव नहीं दे रहीं।

आम आदमी पार्टी ने इन दोनों नेताओं की डिग्रियों के बारे में सही ढ़ंग से खोज की है और सारे तथ्य जुटाए हैं और राजनीतिक पहल करके हमला बोला है।इस समय आम आदमी पार्टी के हाथ में इन दोनों नेताओं की गर्दन है।हम भी देखें सच्चाई कब तक सामने आती है। पीएम मोदी और ईरानीजी ने लगातार विभिन्न स्तरों पर अपनी डिग्रियों को लेकर सफेद झूठ बोला है।यदि उनके दावे में जान होती तो ये दोनों नेता अपनी डिग्री को संसद के पटल पर रख देते और सारी बहस खत्म हो जाती।लेकिन पीएम की एमए डिग्री के बारे में गुजरात वि.वि. के उपकुलपति बोले जो कि स्वयं में समस्या खड़ी करके चले गए,उनके बयान में साफ था कि पीएम मोदी की एम.ए.डिग्री ऊपर के दवाब में आनन-फानन में तैयार की गयी है।वरना सभी सूचनाएं एक साथ सामने रखी जानी चाहिए।



हम मांग करते हैं पीएम मोदी और मानव संसाधन मंत्री ईरानीजी अपनी सारी डिग्रियां संसद के पटल पर रखें जिससे सच्चाई सामने आ सके।यदि इन्होंने झूठ बोला है तो इनको पद छोड़ना चाहिए।मोदी सरकार को इस्तीफा देना चाहिए।मुखिया के नाते राजनीतिक तौरपर वे जिम्मेदार हैं और झूठ बोलने के लिए उन्हें दण्डस्वरूप सरकार से इस्तीफा देना चाहिए।

मंगलवार, 3 मई 2016

अनपढ़ ईरानी की शैतानियों के प्रतिवाद में


             मोदी सरकार में मंत्री स्मृति ईरानी ने भगतसिंह आदि क्रांतिकारियों को ´आतंकवादी´कहने के लिए विपन चन्द्रा आदि की किताब पर पाबंदी लगा दी,कमाल है,ईरानीजी आप शिक्षामंत्री हैं लेकिन आपको नहीं मालूम कि चन्द्रशेखर आजाद अपने को क्या कहते थे! पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जब पहलीबार चन्द्रशेखर आजाद से मुलाकात की थी तो उसका वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया है,कम से कम उसी को आपने पढ़ लिया होता तो भगतसिंह संबंधी आतंकवादी-क्रांतिकारी ´गुत्थी सुलझ गयी होती,लेकिन अब तो ईरानीजी ने भगतसिंह को आतंकवादी लिखने के कारण विपन चन्द्रा आदि इतिहासकारों की किताब पर ही पाबंदी लगा दी है,तो अगला कदम उन किताबों की ओर बढ़ना चाहिए,जिनमें इन क्रांतिकारियों को आतंकवादी लिखा गया है ! ताकत है तो उन सभी किताबों पर पाबंदी जारी करके दिखाओ जिनमें आतंकवादी के रूप में क्रांतिकारियों का जिक्र है !

पंडित जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा ´मेरी कहानी´ को ही लेते हैं। याद कीजिए जब लाला लाजपतराय पर अंग्रेजों की लाठियां पड़ी थीं और उसके कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गयी ।ईरानीजी जानती हैं किसी हिन्दुत्ववादी का इस घटना पर खून नहीं खोला,दिलचस्प बात यह है कि लालाजी पर पड़ी लाठियों से भगतसिंह आदि क्रांतिकारियों का खून खोला ।जबकि उनके लालाजी से विचार नहीं मिलते थे।ईरानीजी आप कल्पना कीजिए कि किसी हिन्दुत्ववादी का उस समय खून क्यों नहीं खौला ॽभगतसिंह औप उनके साथियो ने लालाजी पर हमला करने वाले अंग्रेज शासन से बदला लेने का फैसला किया और उसके कारण भगतसिंह और उनके साथियों को सारे देश में बड़ी प्रसिद्धि मिली।इस वाकया का पंडित नेहरू ने बहुत सुंदर ढ़ंग से वर्णन किया है।

नेहरू ने लिखा है ´साइमन-कमीशन हिन्दुस्तान में दौरा कर रहा था और काले झंडे लिए ´गो बैक´के नारे लगानेवाली विरोधी भीड़ हर जगह उसका स्वागत कर रही थी।कभी-कभी भीड़ और पुलिस में मामूली झगड़ा भी हो जाता था।लाहौर में बात बहुत बढ़ गई और यकायक देश-भर में गुस्से की लहर दौड़ गई। लाहौर में जो साइमन-विरोधी प्रदर्शन हुआ वह लालालाजपत राय के नेतृत्व में हुआ।जब वह सड़क के किनारे हजारों प्रदर्शनकारियों के आगे खड़े हुए थे तब एक नौजवान अंग्रेज पुलिस अफसर ने उनपर हमला किया और उनकी छाती पर डंडे बरसाए.लालाजी का तो कहना ही क्या ,भीड़ की तरफ से किसी किस्म का झगड़ा खड़ा करने की कोई कोशिश नहीं हुई थी।.....लेकिन फिरभी जिस ढ़ंग से उन पर हमला किया गया,उससे और उस हमले के बहशियाने ढ़ंग से हिन्दुस्तान के करोड़ों लोगों को धक्का लगा।उन दिनों हम पुलिस द्वारा लाठियों के मार खाने के आदी न थे।´ लालाजी की कुछ दिन बाद इस लाठीचार्ज से लगी चोटों के कारण मौत हो गई और सारे देश में गुस्से की लहर दौड़ गई।

पंडित नेहरू ने भगतसिंह आदि द्वारा इस घटना के प्रतिवाद में की गई कार्रवाई की प्रशंसा की और जो लिखा उसका तो महत्व है ही,साथ ही उनको ´आतंकवादी´कहकर सम्बोधित किया है। ईरानीजी हिम्मत है तो नेहरू की आत्मकथा पर पाबंदी लगाकर दिखाओ,हम भी देखते हैं संसद कितने दिन चलती है और आप कितने दिन ऑफिस जाती हैं !

नेहरू ने जो लिखा उसे ईरानीजी आप पढ़ें,संदर्भ है लालाजी पर पड़ी लाठियां और उसका भगतसिंह आदि के द्वारा किया गया प्रतिवाद,इस प्रतिवाद ने भगतसिंह को जनप्रिय बनाया, नेहरू ने लिखा ´इससे पहले भगतसिंह को जो लोकप्रियता मिली वह कोई हिंसात्मक या आतंकवाद का काम करने की वजह से नहीं मिली , आतंकवादी तो हिन्दुस्तान में करीब- करीब तीस बरस से रह-रहकर अपना काम कर रहे हैं, और बंगाल में आतंकवाद के शुरू के दिनों को छोड़कर और कभी किसी भी आतंकवादी को,भगतसिंह को जो लोकप्रियता हासिल हुई,उसका सौवां हिस्सा भी नहीं मिली।यह एक ऐसी जाहिर बात है,जिससे इन्कार नहीं कर सकता।इसे तो मानना पड़ेगा।´

ईरानीजी इसी क्रम में पंडित नेहरू ने बड़े मार्के की बात कही है जो आपको समझनी चाहिए। लिखा है ´मामूली तौर पर आतंकवाद से किसी देश में होने वाली क्रान्तिकारी प्रेरणा का बचपन जाहिर होता है।वह अवस्था गुजर जाती है और उसके साथ-साथ महत्वपूर्ण घटना के रूप में आतंकवाद भी गुजर जाता है; स्थानिक कारणों या व्यक्तिगत दमन के कारण कभी-कभी कुछ आतंकवादी कार्य भले ही होते रहें। बिलाशक हिन्दुस्तान की क्रान्ति का बचपन बीत चुका और इसमें कुछ शक नहीं कि उसके फलस्वरूप यहां कभी-कभी हो जानेवाली आतंकवादी घटनाएं भी धीरे-धीरे बन्द हो जाएंगी। ´

नेहरू ने साफ लिखा आतंकवाद आज तो ´महज एक तात्विक विवाद का सवाल है।´ ईरानीजी आप यह भी जान लें ,नेहरू ने लिखा है ´भगतसिंह ने अपने हिंसात्मक कार्य से लोकप्रियता प्राप्त नहीं की, बल्कि इससे प्राप्त की कि कम-से-कम उस समय लोगों को ऐसा मालूम हुआ कि उसने लालाजी की और लालाजी के रूप में राष्ट्र की इज्जत रखी है।भगतसिंह एक प्रतीक बन गया।उसके काम को लोग भूल गए,केवल प्रतीक उनके मन में रह गया।´

ईरानीजी आप बहुत ही ड्रामेबाज मंत्री हैं।आपने अपने जीवन में कभी कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं किया,कभी गंभीर किताबें नहीं पढ़ी,इसलिए किताब और जनसंघर्ष का मतलब आपको नहीं आता। क्रांतिकारियों में ये दोनों गुण होते हैं ,वे पढ़ते भी हैं और जनता के हितों के लिए लड़ते भी हैं।आपने कभी गौर किया कि भारत में कभी किसी शिक्षा मंत्री ने क्रांतिकारियों को सम्बोधित किसी भी किताब पर कभी कोई पाबंदी नहीं लगायी ,ऐसा क्यों हुआ ॽक्या आप सबसे बड़ी अक्लमंद हैं ॽया फिर आपके आरएसएस के सलाहकार सबसे बड़े अक्लमंद हैं ॽ कभी गंभीरता से सोचना आपसे पहले कभी किसी आरएसएस-जनसंघ के नेता ने क्रांतिकारियों को ´आतंकवादी क्रांतिकारी´ लिखने पर पाबंदी लगाने की न तो मांग की और न मंत्री होते हुए इस तरह की किताबों पर पाबंदी लगायी।सोचकर देखें ईरानीजी आप क्या श्यामाप्रसाद मुखर्जी,दीनदयाल उपाध्याय,अटलबिहारी बाजपेयी,मुरली मनोहर जोशी आदि से ज्यादा अक्लमंद हैं ॽ सवाल यह है इन नेताओं को, क्रांतिकारियों को ´आतंकवादी क्रांतिकारी´कहने वाली किताबों से कभी कोई परेशानी नहीं हुई,लेकिन आपको परेशानी हुई और आपने ताबड़तोड़ ढ़ंगसे तुरंत पाबंदी का आदेश जारी कर दिया।

ईरानी जी आप नहीं जानतीं कि आपने अपने जीवन का सबसे घटिया काम किया है। एक सही किताब पर पाबंदी लगाना सबसे घटिया काम है,मैं इसे देशद्रोह से भी खराब हरकत मानता हूँ। दुख इस बात का है आपने भारत के सभी कानूनों को ताक पर रखकर यह काम किया है।किसी भी किताब पर पाबंदी लगाने से पहले उसके लेखक-प्रकाशक से नोटिस देकर पूछा जाता है कि आपने ऐसा क्यों लिखा ॽयदि आप उनके उत्तर से संतुष्ट नहीं होतीं तो फिर देखतीं कि जो वैध किताब है,उस पर पाबंदी लगाने का आपको हक है या नहीं।विपन चन्द्रा की किताब वैध किताब है।आप उस पर दिल्ली विश्वविद्यालय में पाबंदी नहीं लगा सकतीं।यदि वह किताब अवैध है तो सारे देश में पाबंदी लगाकर दिखाएं और फिर देखें कि आपको कानून का कितना करारा तमाचा खाना पडेगा।आपने कानून के तमाचे से बचने के लिए मंत्री पद का दुरूपयोग किया है और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को एक बेहतरीन किताब को वैध रूप में पढ़ने से वंचित किया है।

ईरानीजी आप पढ़ती नहीं हैं और आपके अनुयायी आरएसएस के लोग भी नहीं पढ़ते, आपका प्रचार करने वाले टीवी चैनलवाले भी पढ़ते नहीं हैं।इतने अनपढ़ यदि एक साथ मिल जाएं तो हमारे जैसे लोगों के लिए मुसीबतें तो आएंगी।लेकिन बुद्धिजीवी का काम तो यही है कि वह अनपढों के द्वारा पैदा की गयी मुसीबतों से देश को छुटकारा दिलाए,देश को पढ़ाए,सत्य,तथ्य और ज्ञान का अनुभव कराए।



सोमवार, 2 मई 2016

भगतसिंह को आतंकवादी-क्रांतिकारी किसने कहा ॽ

         जिस देश में मूर्ख मंत्री हो उस देश की भगवान भी रक्षा नहीं कर सकते ! मूर्ख मंत्री अपने को ज्ञानी की तरह पेश कर रहे हैं,ज्ञानियों को वे अज्ञानी करार दे रहे हैं।इसे कहते हैं बुद्धिजीवी विरोधी माहौल।हाल में भगतसिंह के मामले में जिस तरह का आचरण केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने किया है उसकी मिसाल भारत में मिलनी मुश्किल है।ईरानी के भक्त कमाल के ´अक्लमंद´ हैं जो बिना पढ़े ही हल्ला करने लगते हैं ! कहने को ये सब टैक्नोसेवी हैं लेकिन अक्ल से एकदम पैदल ! बेबकूफी और संचार क्रांति का विरल सह-संबंध इन दिनों हम भारत में देख रहे हैं ! वे हल्ला कर रहे हैं इतिहासकार विपन चन्द्रा ने भगतसिंह को ´आतंकवादी क्रांतिकारी´क्यों लिखाॽ कभी ठीक से इतिहास पढ लिया होता तो इस सवाल का उत्तर भी मिल जाता !

भारत में क्रांतिकारी आंदोलन के प्रवर्तकों में से एक थे डा.भूपेन्द्रनाथ दत्त ,उनकी एक किताब है ´अप्रकशित राजनीतिक इतिहास,(नवभारत पब्लिशर्स,कलकत्ता 1953) ।यह पूरी किताब क्रांतिकारियों के कारनामों से भरी है।इस किताब की भूमिका में उन्होंने लिखा है ´ क्रांतिकारियों का वास्तविक कार्य,जिसे ´आतंकवाद´कहा जाता है,आंदोलन का बाह्य प्रकाश मात्र था।पराधीनता की ग्लानि जब जब असह्य हो उठी,तब तब सभी देशों में देशप्रेम का प्रकाश आतंकवाद के रूप में दीख पड़ा।आतंकवाद जन-आंदोलन नहीं, बल्कि निष्फल प्राणों का कूड़ा-करकट जलाकर देशप्रेम की आग प्रज्वलित करने का प्रतीक है।´

स्वाधीनता संग्राम के दौरान आतंकवाद के बारे में डा.भूपेन्द्रनाथ दत्त के उपरोक्त कथन के जरिए उसके चरित्र,प्रकृति और उत्पत्ति के बारे में सरल ढ़ंग से समझ सकते हैं। अब हमसे यह न पूछो कि भूपेन्द्र दत्त कौन हैं ॽ इंटरनेट पर जाओ पता चल जाएगा ! स्वामी विवेकानंद के पास जाओ पता चल जाएगा ! उस जमाने में रूसी आतंकवाद से भारत के क्रांतिकारी किस तरह प्रभावित थे,इस पर उस दौर में ´मॉडर्न रिव्यू´ने लिखा ´हमारे सबसे बड़े रेडीकल राज्य सचिव को अवश्य ही बम फेंकनेवाला पैदा करने के अद्वितीय कृतित्व का श्रेय मिलना चाहिए।बंगाल में आतंकवाद के अंतिम कारण को सरकार की सोलहों आने स्वार्थी,स्वेच्छाचारी और अत्याचारी नीतियों में खोजना होगा। उसे खोजना होगा उस घृणापूर्ण और अपमानजनक तरीके में जिसे अधिकांश सरकारी और गैरसरकारी एंग्लो-इंडियनों ने बंगालियों के प्रति मंतव्य प्रकट करने और उनसे व्यवहार करने में अपनाया है।उन्होंने बंगालियों की भावनाओं को बूटों तले रौंदा है और उनके तथ्यों तथा आंकड़ों द्वारा समर्थित सबसे बड़े और सबसे तर्कसंगत आवेदनों पर जरा भी कान नहीं दिया। भावना और तरीकों में प्रशासन के रूसीकरण ने जनता के एक छोटे से हिस्से को रूसी आतंकवाद के तरीकों को अपनाने को बाध्य कर दिया है।´



भारत में आतंकवादी क्रांतिकारी´ आंदोलन की परंपरा बहुत पुरानी है।इसे आजकल के आतंकियों के साथ एकमेक नहीं करना चाहिए।

अक्ल का अजीर्ण है स्मृति ईरानी को

      मोदी सरकार में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के यहां अक्ल का अजीर्ण हो गया है।इसके कारण वे आए दिन अनाप-शनाप बोलती और एक्शन लेती रहती हैं।उनके अक्ल के अजीर्ण का ताजा नमूना है विपन चन्द्रा की किताब ´India’s Struggle for Independence´(1988) प्रतिबंध लगाने का सुझाव देना और दिल्ली वि.वि.के द्वारा उनके आदेश का तुरंत पालन करते हुए इस किताब की बिक्री पर रोक लगाना,पाठ्यक्रम में पाबंदी लगाना।

इस पुस्तक में विपनचन्द्रा के अलावा मृदुला मुखर्जी,आदित्य मुखर्जी ,सुचेता महाजन और के.एन पन्निकर के लिखे अध्याय भी हैं।विपन चन्द्रा ने भूमिका के अलावा इस किताब के कुल39 अध्यायों में से 22अध्याय स्वयं लिखे हैं।बाकी अन्य के लिखे हैं।मूल समस्या है भगतसिंह को ´क्रांतिकारी आतंकवादी´के रूप में सम्बोधित करने को लेकर ।यह किताब1988 में आई।तब से लेकर आज तक सारे देश में यह किताब बेहद जनप्रिय है।लाखों छात्रों ने इसका लाभ उठाया है।इसके पहले इस पदबंध को लेकर कभी किसी ने कोई आपत्ति प्रकट नहीं की।हाल ही में अचानक एक टीवी कार्यक्रम में इस पदबंध का जिक्र आया और मंत्री महोदया ने राजाज्ञा जारी करके किताब को पढ़ाए जाने पर पाबंदी लगादी।इससे एक बात तो साफ है कि मोदी सरकार और आरएसएस उन तमाम धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों को सहन करने की स्थिति में नहीं हैं जो साम्प्रदायिक नजरिए का विरोध करते हैं।स्मृति ईरानी का विपनचन्द्रा आदि की किताब पर जो रूख सामने आया है वह इस बात का भी प्रमाण है कि सत्ता के अंदर किस तरह असहिष्णुता भरी पड़ी है।इससे यह भी पता चलता है कि मोदी सरकार किसी भी तरह के वैज्ञानिक अनुसंधान को पसंद नहीं करती और ज्योंही कहीं पर कोई मौका मिलता है तुरंत हमलावर कार्रवाई करने पर उतारू हो जाती है।मंत्री महोदया के आदेस पर दिल्ली वि.वि. प्रशासन ने विभागीय स्वायत्तता का उल्लंघन किया है, बिना इतिहास विभाग से पूछे सीधे कार्रवाई करके नई घटिया मिसाल कायम की है। सामान्यतौर पर विभाग को अकादमिक मामलों में फैसले लेने का हक है,मंत्री या वीसी को भी यह हक नहीं है। खासतौर पर जिस तरह से इस किताब पर पाबंदी लगायी गयी है वह निंदनीय है और सरकार की फासिस्ट मनोदशा की अभिव्यंजना है।

सवाल यह है भगतसिंह आदि को ´क्रांतिकारी आतंकवादी´कहने का सिलसिला कहां से शुरू हुआ ॽ क्या क्रांतिकारियों को विपनचन्द्रा ने सम्बोधित करके इस पदबंध की शुरूआत की या फिर पहले से इसका कहीं आरंभ होता है।इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आतंकवादी किसे कहें ॽआतंकवादी की परिभाषा क्या है ॽस्वयं पीएम नरेन्द्र मोदी विश्व के नेताओं और संयुक्त राष्ट्र संघ का भी आतंकवाद की परिभाषा बनाने के लिए आह्वान कर चुके हैं। सवाल यह है आरएसएस की नजर में आतंकवाद की परिभाषा क्या है ॽभारत सरकार की नजर में आतंकवाद की परिभाषा क्या है ॽ क्रांतिकारी और क्रांति की परिभाषा क्या है ॽ इससे भी बड़ा सवाल यह है क्या किसी राजनीतिक संगठन या आरएसएस जैसे संगठन के नजरिए से भारत का इतिहास लिखा जा सकता है ॽ



इतिहास लेखन एक स्वतंत्र अनुशासन है,उसके नियम,परंपराएं और दृष्टियां हैं।सामग्री संकलन की शोध पद्धतियां हैं।इनको लंबे अकादमिक विचार-विमर्श के आधार पर निर्मित किया गया है,इनके बारे में किसी नेता के मूड़ और विचारों के आधार पर फैसला नहीं हो सकता।इतिहास का क्षेत्र इतिहासकारों का है ,वह राजनेताओं के जंग की जगह नहीं है।आरएसएस इतिहासलेखन को इतिहासकारों के दायरे से बाहर लाकर राजनेताओ की,संघ के काल्पनिक इतिहासकारों की कर्मशाला बनाना चाहता है।काल्पनिक इतिहास की अशिक्षित समाज में उपजाऊ जमीन होती है,वे किंवदन्तियों और पुराकथाओं को ही इतिहास के रूप में पेश करते हैं।वे इतिहासलेखन के किसी भी वैज्ञानिक पद्धतिशास्त्र को नहीं मानते।लेकिन अकादमिक जगत कल्पनाशास्त्र और किंवदन्तियों से नहीं चलता उसके लिए अकादमिक अनुशासन में प्रवेश करने, बुद्धि,विवेक और अकादमिकश्रम की जरूरत पड़ती है,जाहिरातौर पर आरएसएस के लोग इन सब पर विश्वास नहीं करते,वे अकादमिक अनुशासन को संघ के अनुशासन के जरिए अपदस्थ करने पर उतारू हैं,इससे भी शर्मनाक बात है कि दिल्ली वि. वि. के उपकुलपति महोदय संघ के अनुशासन को मानकर एक्शन ले रहे हैं।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

विज्ञान ,संस्कृत और संघ

        आरएसएस का विज्ञान और संस्कृत से तीन-तेरह का संबंध है।इस संगठन की न तो विज्ञान में रूचि है और न संस्कृतभाषा और साहित्य के पठन-पाठन में दिलचस्पी है।इसके विपरीत इस संगठन का समूचा आचरण विज्ञान और संस्कृत विरोधी है।

आरएसएस के लिए विज्ञान और संस्कृत अन्य पर,विरोधियों पर और ज्ञान संपदा पर हमला करने का बहाना है।वे ज्ञान को अर्जित करने के लिए विज्ञान और संस्कृत के पास नहीं जाते बल्कि ज्ञानसंपदा को नष्ट करने के लिए संस्कृत का बहाने के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं।

भारत की पुरानी परंपरा में संस्कृत साहित्य और संस्कृत भाषा आनंद सृजन और आनंद प्राप्ति का स्रोत थी और आज भी है,लेकिन संघ ने संस्कृत भाषा को आनंद की बजाय टकराव और वर्चस्व की भाषा बना दिया है। बृहदारण्यक उपनिषद में वेदान्त के बारह महावाक्यों में एक ´विज्ञानमानन्दं ब्रह्म´भी है।इसमें विज्ञान को आनंद के समान माना है।यह विज्ञान और कुछ नहीं भाषा ही है।संस्कृत में इसी के आधार पर भाषा को विज्ञान मानने की परंपरा चली आ रही है।अन्यत्र तैतिरीय उपनिषद में ´विज्ञानं देवाःसर्वे ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते´ कहा गया है यानि विज्ञान को ही ज्येष्ठ ब्रह्म माना गया है। कहने का आशय यह है कि प्राचीन परंपरा में ज्ञान का अर्थ था स्थूल वस्तुओं का ज्ञान, जिसे अविद्या या अपरा विद्या कहा गया।जबकि विज्ञान का अर्थ है वस्तुओं का सूक्ष्मज्ञान।इसे विद्या और परा विद्या कहा गया। लेकिन बाल गंगाधर तिलक ने इस परंपरा से विपरीत धारणा प्रतिपादित की, उन्होंने कहा ज्ञान का अर्थ है आध्यात्मिक ज्ञान और विज्ञान का अर्थ है इम्पीरिकल नॉलेज यानि भौतिक ज्ञान।सारी समस्याओं का गोमुख यहीं से आरंभ होता है।

जब हम भाषा के साथ विज्ञान को जोड़ते हैं तो इसका अर्थ यह है कि भाषा का विशेष ज्ञान। इसके अलावा एक और पदबन्ध है ´व्याकरण´ ,इसे लेकर भी गड़बड़झाला है। ´व्याकरण ´यानी विश्लेषण। सवाल यह है विश्लेषण से ये आरएसएस भागते क्यों हैं ॽ हर भाषा और ज्ञान की शाखा का अपना व्याकरण है।विश्लेषण पद्धति है।उसकी स्वायत्त संरचनाएं हैं उनमें गड्डमड्ड करने से बचना चाहिए। आईआईटी में पढाए जाने वाले विषयों की भाषा और व्याकरण वही नहीं है जो संस्कृत साहित्य के काव्यग्रंथों का है।इसी तरह वेद की भाषा और व्याकरण वही नहीं है जो इंजीनियरिंग की है।

भारत में संस्कृत के वैय्याकरणशास्त्रियों की सुदीर्घ परंपरा रही है।यह सच है पाणिनी इनमें सुसंगत हैं। लेकिन पाणिनी भाषा संबंधी सभी समस्याओं का समाधान नहीं करते।आरएसएस के लोग चूंकि ´भारतप्रेमी ´होने का दावा करते हैं और हिन्दूज्ञान में ही विश्वास करते हैं,अतःहम यहाँ भर्तृहरि को उद्धृत करना चाहेंगे।वाचिकरोग या भाषा के अपशब्दों के प्रयोग से बचने के लिए भाषाशास्त्र पढ़ने के लिए कहते हैं।यानि भाषा का ज्ञान आरंभिक कक्षाओं में कराया जाए।आईआईटी के छात्र आरंभिक कक्षा के छात्र नहीं हैं।वे यदि अंग्रेजी भाषा का शुद्ध प्रयोग करना नहीं जानते तो परीक्षा में पास नहीं हो सकते।

पुराने जमाने में वेदाध्ययन आरंभ करने के पहले संस्कृत व्याकरण पढ़ाने पर जोर दिया गया।इसी प्रसंग में कहना चाहते हैं कि भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली में अन्य विषयों के साथ संस्कृत भाषा और उसका व्याकरण पढ़ाया जाता है।संस्कृत पाठशालाओं में कक्षा 6 यानी प्रवेशिका से उत्तरमध्यमा यानि 12वीं तक व्याकरण पढ़ाया जाता है।इसके आगे व्याकरण यदि कोई पढ़ना चाहे तो वह व्याकरण विषय लेकर शास्त्री(बीए) और आचार्य(एमए) में पढ़ सकता है।अन्य विषयों के संस्कृत के छात्रों के लिए 12वीं के बाद व्याकरण नहीं पढ़ाया जाता,मैं स्वयं इसी परंपरा से पढ़ा हूँ।यानी संस्कृत में यदि कोई स्नातक स्तर पर न्याय,वेद,धर्मशास्त्र,साहित्य आदि विषय लेता है तो उसे संस्कृत व्याकरण नहीं पढाया जाता। संस्कृत में जब स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में संस्कृत व्याकरण नहीं पढाया जाता तो फिर आईआईटी में ही इसे जबर्दस्ती क्यों पढाने पर जोर दिया जा रहा है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि संस्कृत की परंपरा 12वीं तक संस्कृत भाषा और व्याकरण पढाने पर जोर देती है,उसी पैटर्न पर सारे देश में आधुनिक शिक्षा में संस्कृत को 12वीं तक सामान्य विषय के रूप में रखा गया है।इस फैसले को लागू करने के लिए सारे देश में गंभीर मंथन हो चुका है,मुश्किल यह है कि आरएसएस और उनकी मंत्री स्मृति ईरानी बिना कुछ जाने-समझे संस्कृत को आईआईटी के छात्रों पर थोप देना चाहती हैं।यह भारतीय परंपरा में संस्कृत के पठन-पाठन के रिवाज के एकदम खिलाफ है ,यह भाषा पढ़ाने की विश्वपरंपरा के भी खिलाफ है,अतः इसका मुखर विरोध किया जाना चाहिए।










आईआईटी , संस्कृत और संघ का खेल

               मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी का मानना है कि आईआईटी के छात्रों को संस्कृतभाषा की शिक्षा दी जानी चाहिए।सुनने में यह सुझाव बड़ा अच्छा लगता है लेकिन सवाल यह है संस्कृत पढ़कर आईआईटी का छात्र क्या करेगा ॽ क्या संस्कृतभाषा उसके ज्ञान-विज्ञान में कोई इजाफा करेगी ॽइससे भी बड़ी बात यह कि संस्कृत पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को आईआईटी में क्या दाखिला मिलता है ॽये कुछ सवाल हैं जिनके बारे में ईरानी और उनकी संस्कृतमंडली को जबाव देने चाहिए।

आईआईटी के पाठ्यक्रम का ढ़ांचा कुछ इस तरह का है कि उसमें संस्कृत से कोई मदद नहीं मिलेगी।मसलन्,आईआईटी के पाठ्यक्रम से संबंधित कोई भी सामग्री संस्कृत में नहीं है।दूसरी बात यह कि आईआईटी में भाषा की पढ़ाई नहीं होती बल्कि प्रौद्योगिक,इंजीनियरिंग आदि की पढ़ाई होती।स्मृति ईरानी को यदि संस्कृत के उत्थान की इतनी ही चिन्ता है तो उनको संस्कृत भाषा और साहित्य के पठन-पाठन पर उन विश्वविद्यालयों में जोर देना चाहिए जहां संस्कृत पढायी जाती है।अधिक से अधिक संस्कृत के शिक्षकों की नियुक्तियां कराएं,संस्कृत के विद्यार्थियों को विशेष वजीफे दें,शोध के लिए बड़े-बड़े प्रोजेक्ट दें।संस्कृत के विद्वानों को नए-नए विषयों में अनुसंधान के लिए प्रेरित करें।यह सब करने की बजाय स्मृति ईरानी आईआईटी के छात्रों को संस्कृत पढ़ाकर न तो संस्कृत का भला करेंगी और न छात्रों का ही भला करेंगी।इस प्रसंग में चीन के अनुभव से हम सीख सकते हैं,चीन में सब कुछ चीनी भाषा में पढ़ाया जाता है लेकिन उच्च शिक्षा,प्रौद्योगिकी,इंजीनियरिंग,विज्ञान आदि की शिक्षा में वहां पर भी अंग्रेजी भाषा में पठन-पाठन पर जोर दिया गया है, इसके कारण विज्ञान से लेकर समाजविज्ञान तक हर क्षेत्र में चीनी मेधा का विश्वस्तरीय मानकों के आधार पर विकास करने में मदद मिली है।विश्व के नामी विश्वविद्यालयों में चीन के कई विश्वविद्यलयों के नाम आते हैं,यहां तक कि भारत के हजारों छात्र वहां पढ़ने जाते हैं।वहां माध्यम के रूप में चीनी भी है लेकिन अंग्रेजी भी है।



संस्कृत सुंदर और समृद्ध भाषा है ,लेकिन संस्कृत का व्याकरण तो संस्कृतसाहित्य में मदद करेगा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी,समाजविज्ञान,देशज भाषायी साहित्य में मदद नहीं करेगा।आरएसएस के लोगों की मुश्किल यह है कि संस्कृत से तथाकथित प्रेम करना जानते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि संस्कृत प्रेम को हासिल कैसे करें।संस्कृत के विद्वानों ने डंडे और सत्ता के जोर से संस्कृतभाषा और उसके साहित्य का निर्माण नहीं किया ।कोई भी भाषा पर्सुएसन के जरिए ही विकास करती है।संस्कृत भाषा के बारे में यह मिथ है कि वह सबसे वैज्ञानिक भाषा है ,लोग यह भी कह रहे हैं कि कम्प्यूटर की भाषा बनाने में उससे मदद मिल सकती है,हम यही कहेंगे कि भारत सरकार वैज्ञानिकों और भाषावैज्ञानिकों से कहे कि वे संस्कृत में काम करें और सिद्ध करें कि संस्कृत सच में विज्ञान की भाषा बन सकती है और उससे हमें काम करने में मदद मिल सकती है,फिलहाल तो अवस्था यह है कि हिन्दीसहित दस देशी भाषाओं के यूनीकोड फॉण्ट को ही हम इंटरनेट पर जनप्रिय नहीं बना पाए हैं,हिन्दी सबसे पिछड़ी अवस्था में है,ऐसे में संस्कृत को क्षितिज पर लाना तो दिवा-स्वप्न ही कहेंगे।

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

रोहित की आत्महत्या से उठे सवाल

         हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित की आत्महत्या असामान्य – बर्बर घटना है।विश्वविद्यालय प्रशासन ने सामान्य स्थानीय छात्र विवाद को असामान्य बनाकर बुद्धिहीनता और छात्रविरोधी नजरिए का परिचय दिया है। कल जिस तरह केन्द्रीय मानव संसाधनमंत्री ने इस घटना पर विस्तार से प्रेस कॉफ्रेंस की,उससे साफ जाहिर है कि इस घटना में आरएसएस नीचे से ऊपर तक शामिल है।मेरी जानकारी में किसी विश्वविद्यालय की घटना पर कभी किसी केन्द्रीयमंत्री ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में इस तरह कभी कोई प्रेस कॉफ्रेंस नहीं की।ईरानी का सबसे घटिया रूप इस कॉफ्रेस में सामने आया।वह निर्लज्जता से विश्वविद्यालय प्रशासन के बर्बर आचरण की हिमायत कर रही थीं।

केन्द्रीय मंत्री का काम हिमायत करना नहीं है। वह पक्षधर नहीं हो सकता,वह सबका होता है,उसका काम है समाधान खोजना ,सबकी मदद करना,न कि पक्षविशेष की हिमायत करना। लेकिन मोदी सरकार जब से आई है उसके मंत्री खुलेआम निचले स्तर पर संघियों की हरकतों की अंधी हिमायत करके मंत्री के तटस्थ आचरण के नियम का उल्लंघन कर रहे हैं। बेहतर तो यही होता कि स्मृति ईरानी की यह प्रेस कॉफ्रेस आज न होकर उसी दिन होती जिस दिन यह घटना हुई थी और वे संबंधित पक्षों को बुलाकर समझा-बुझाकर मामले का हल तलाश करतीं,केन्द्रीय मंत्री को बोलने में इतना लंबा समय क्यों लगा ?

केन्द्रीय मंत्री का काम निचले स्तर पर प्रशासन की खामियों पर पर्दा डालना या उसकी हिमायत करना नहीं है।मंत्री यदि पक्षधर होकर काम करेगा तब आम जनता न्याय मांगने कहां जाएगी ? ईरानी की प्रेस कॉफ्रेस से यह भी संदेश गया है कि संघ अब विश्वविद्यालय कैम्पसों में खुलेआम अलोकतांत्रिक और शिक्षाविरोधी और अ-सामाजिक कार्यकलापों को संरक्षण देगा,संघ का खुला संदेश है उसके सदस्यगण जो मन में आए करें ,उनको किसी भी किस्म के सभ्य आचरण की जरूरत नहीं है।लगता है मंत्रियों को संघ का आदेश है कि हर हालत में निचले स्तर पर काम कर रहे संघियों के पक्ष में खड़े रहो। इस तरह की संघी प्रशासनिक पक्षधरता शिक्षा संस्थानों को अपराध संस्थान बनाकर छोड़ेगी।उल्लेखनीय है पहले से ही हमारे शिक्षा संस्थानों में अनेक समस्याएं हैं ,ऐसे में संघी पक्षधरता के आधार पर प्रशासन का काम करने का तरीका अपने आपमें मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

रोहित को आत्महत्या न करनी पड़ती यदि संघियों ने हठधर्मिता से काम न लिया होता। इस समूचे प्रसंग में संघी हठधर्मिता के अलावा जो अन्य संदेश निकल रहा है वह यह कि छात्रों में बीच-बचाव करके मित्रतापूर्ण समाधान निकालने में स्थानीय स्तर पर छात्र-शिक्षक-कर्मचारी संगठन भी असफल रहे हैं। छात्रों के बीच में सामान्य मारपीट की घटना इस कदर विकराल रूप कैसे ले सकती है और उसमें आरएसएस के बड़े दिग्गज नेता इस कदर शामिल कैसे हो सकते हैं ?

सवाल यह है क्या छात्रों के निजी झगड़े या राजनीतिक विवाद इसी तरह हल किए जाएंगे या उनके समाधान के सभ्य तरीकों का हम पालन करना सीखेंगे?छात्र राजनीति में वैचारिक मतभेद होंगे,वैचारिक गरमी भी होगी,लेकिन बलप्रयोग,सत्ता का दुरूपयोग आदि की उसमें कोई जगह नहीं है। हम नहीं जानते कि रोहित प्रसंग में किसने किसको मारा-पीटा,अब वह मार-पीट उतनी प्रासंगिक भी नहीं रह गयी है ,रोहित की आत्महत्या के बाद समूचा प्रसंग और उसका संदर्भ एकदम बदल गया है। रोहित और पांच लड़कों के खिलाफ कायदे से विश्वविद्यालय प्रशासन को पक्षधर होकर बीच में पड़ने की जरूरत नहीं थी। विश्वविद्यालय प्रशासन पक्षधरता के आधार चलेगा तो कैम्पस में समस्याओं का अम्बार लग जाएगा। इससे विश्वविद्यालयों का समूचा वातावरण और अकादमिक सभ्यता का समूचा ढ़ांचा टूटेगा।

हैदराबाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने सामान्य मारपीट की घटना पर जिस तरह का एक्शन लिया,जांच बिठायी और जिस तरह संघी राजनेता उसमें कूद गए उससे साफ है कि संघ के लोगों ने अपने विरोधियों को सबक सिखाने के लिए सामान्य मारपीट की घटना का बहाने के रूप में इस्तेमाल किया है।इस चक्कर में जहां उन्होंने स्थानीय प्रशासन का दुरूपयोग किया वहीं दूसरी ओर शिक्षा प्रबंधन के सभ्य आचरण का उल्लंघन किया ।

उल्लेखनीय है जिन विश्वविद्यालयों में वाम राजनीति या वैकल्पिक राजनीति करने वाले छात्र संगठन सक्रिय हैं वहीं पर संघी छात्र संगठन सुनियोजित ढ़ंग से निजी पंगे ले रहे हैं और उनका राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।इसके बहाने वे कैम्पस से लोकतांत्रिक राजनीति को बाहर खदेड़ना चाहते हैं। वाम-लोकतांत्रिक राजनीति करने वालों को संघ के मंत्री से लेकर अदना से मीडियागुलाम तक राष्ट्रद्रोही की पदवी देकर अपमानित कर रहे हैं। जेएनयू से लेकर हैदराबाद विश्वविद्यालय तक एक ही आख्यान चल रहा है कि विश्वविद्यालयों से वाम-लोकतांत्रिक राजनीति को बाहर करो,इसके लिए अपराधियों से लेकर वि.वि. प्रशासन तक,मोदी सरकार के मंत्रियों से लेकर राज्यपाल तक सभी का दुरूपयोग खुला दुरूपयोग किया जा रहा है। संघ की इस तरह की आक्रामकता पहले कभी देखी नहीं गयी।



संघ की विश्वविद्यालय कैम्पसों में बढ़ रही आक्रामकता का लक्ष्य है छात्र राजनीति का अपराधीकरण करना। उच्चशिक्षा के संस्थानों खासकर केन्द्र सरकार के अधीन चल रहे शिक्षा संस्थानों के समूचे तंत्र को तोड़ना। यह काम वे दो तरीके से कर रहे हैं।पहला,वे उन तमाम लोगों को विश्वविद्यालय के जिम्मेदार पदों पर बिठा रहे हैं जो लोग उन पदों के लायक नहीं हैं,जिनकी कोई अकादमिक साख नहीं है।वे विश्वविद्यालय की फैसलेकुन कमेटियों में उन लोगों को जिम्मेदारी दे रहे हैं जो अव्वलदर्जे के डफर हैं।धूर्त हैं।इससे प्रशासन को पूरी तरह प्रदूषित करने,वि.वि. की नीतियों को मनमाफिक ढ़ंग से तोड़ने-मरोड़ने का संघ को मौका मिल रहा है।दूसरी ओर संघ समर्थित छात्र-शिक्षक-कर्मचारी संगठनों के भ्रष्ट राजनीतिक कर्मकांड जगह-जगह विश्वविद्यालय की गरिमा को नष्ट कर रहे हैं, लोकतांत्रिक छात्र संगठनों और उनके साथ जुड़े छात्रों पर घटिया किस्म के राजनीतिक हमले हो रहे हैं और शारीरिक हमले भी हो रहे हैं।इस काम में मीडिया का संघ को खुला समर्थन मिल रहा है।

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