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सोमवार, 25 जनवरी 2016

सुभाषचन्द्र बोस के नाम पर संघीखेल


हाल ही में सुभाषचन्द्र बोस की 100 गोपनीय फाइल मोदी सरकार ने सार्वजनिक की हैं, इसके पहले कुछ फाइल ममता सरकार ने सार्वजनिक की थीं, मोदी सरकार भी कुछ फाइल पहले सार्वजनिक कर चुकी है।लेकिन इन फाइलों से नया कोई तथ्य सामने नहीं आया, सवाल यह है जब नया कुछ नहीं है तो क्या तालियां सुनने –बजाने के लिए रद्दी गोपनीय फाइल सार्वजनिक की गयी हैं? सुभाषचन्द्र बोस और अन्य क्रांतिकारियों के गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक करने से पहले यदि इन क्रांतिकारियों की समस्त रचनाएं हिन्दी और अंग्रेजी में इंटरनेट पर मुफ्त में केन्द्र सरकार मुहैय्या करा देती तो बड़ा उपकार होता।

पीएम नरेन्द्र मोदी ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के सपने के साथ कैसे खिलवाड़ किया है,यह समझने के लिए सिर्फ एक ही उदाहरण काफी है। पीएम मोदी ने सरकार बनाते ही योजना आयोग को खत्म कर दिया। यह एक्शन सीधे सुभाषचन्द्र बोस के सपने की हत्या है। उल्लेखनीय है सुभाषचन्द्र बोस ने अगस्त1942 में एक लेख ‘फ्री इण्डिया एण्ड हर प्रॉब्लम्स’ शीर्षक से लिखा जो उनकी रचनावली में संकलित है।इस लेख में उन्होंने विस्तार के साथ आजाद भारत में आने वाली समस्याओं पर प्रकाश डाला है।इस लेख में एक जगह उन्होंने योजना समिति की महत्ता पर रोशनी डालते हुए कहा है कि भारत के निर्माण के लिए यह जरूरी कदम है। उन्होंने लिखा है कि मैं जब कांग्रेस का अध्यक्ष था तब मैंने राष्ट्रीय योजना समिति की बैठक का उद्घाटन किया था।यह भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कमेटी है।

उल्लेखनीय है बाद में इसी कमेटी के आधार पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने योजना आयोग का गठन किया और पंचवर्षीय योजना का शुभारंभ किया। लेकिन पीएम मोदी ने आते ही सबसे पहले योजना आयोग को ही खत्म कर दिया।यह प्रकारान्तर से सुभाषचन्द्र बोस के सपने की हत्या है।

इस प्रसंग में दूसरी बात यह कि सुभाषचन्द्र बोस और हेडगेवार - गोलवलकर-मोहन भागवत के भारत में जमीन-आसमान का अंतर है।संघ के नेतागण भारत को हिन्दुत्व के नजरिए से और धर्म को आधार बनाकर संगठित करना चाहते हैं,उनके नायक पीएम के मन की बात भी यही है।लेकिन सुभाष चन्द्र बोस का मकसद इससे भिन्न था,वे न्याय,समानता और बंधुत्व के आधार पर स्वतंत्र भारत का निर्माण करना चाहते थे।उनकी इस भावना को संविधान निर्माताओं ने संविधान निर्माण का आधार बनाया।इसलिए सुभाष का वैचारिक अपहरण असंभव है।

असल में संघ एक घटिया हरकत कर रहा है ,वह सुभाष के गोपनीय दस्तावेजों के उद्घाटन के बहाने नेहरूविरोधी मुहिम चला रहा है, नेहरूविरोधी मुहिम के जरिए संघ एक तरफ कांग्रेस को नीचा दिखाना चाहता है ,दूसरी ओर धर्मनिरपेक्षता विरोधी मुहिम की वैचारिक मदद करना चाहता है,अफसोस की बात है कि संघ के ये दोनों मकसद सफल नहीं हो सकते। क्योंकि यह भारत है,संघियों का धार्मिकदेश नहीं है।

आरएसएस का मानना है स्वाधीनता संग्राम में मुसलमानों की देशद्रोही की भूमिका रही है,वे आजादी के पक्ष में नहीं थे।यही ब्रिटिश शासकों की भी समझ थी।सुभाष चन्द्र बोस ने इस नजरिए का खंडन करते हुए " फ्री इंडिया एंड हर प्राब्लम्स" लेख में लिखा है " मुसलमान भारत की आजादी के खिलाफ थे,यह प्रचार एकदम गलत है,बल्कि सच यह है कि वे राष्ट्रवादी आंदोलन के साथ थे।आजकल तो एक मुसलमान कांग्रेस का सदर है।मुसलमानों का व्यापकतम तबका ब्रिटिश गुलामी से भारत को मुक्त कराने के पक्ष में था,वे ब्रिटिशविरोधी थे,सुभाष ने लिखा १८५७ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से हिन्दू और मुसलमान एक साथ ब्रिटिश शासकों के खिलाफ लड़े हैं।मिलकर भारत की स्वाधीनता के लिए काम किया है।मुस्लिम समस्या कृत्रिम गढी गयी है।

इसी तरह स्वतंत्र भारत को लेकर आरएसएस और सुभाषचन्द्र बोस का नजरिया एकदम भिन्न है। सुभाषचन्द्र बोस का मानना था कि स्वतंत्र भारत में राजसत्त्ता की यह जिम्मेदारी है कि सभी नागरिकों को पूर्णत: धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता दी जाय,जबकि संघ इसके एकदम खिलाफ है।सुभाष यह भी मानते थे कि राज्य को पूरी तरह धर्ममुक्त होना चाहिए,संघ यह भी नहीं मानता।सुभाष का यह भी मानना था कि धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों में नागरिकों को पूर्ण स्वतंत्रता दी जाय।संघ यह भी नहीं मानता,उसके नेताओं का मानना है कि मुसलमानों को दोयमदर्जे का नागरिक बनाकर रखा जाए।

सुभाषचन्द्र बोस के बहाने संघ परिवार कुप्रचार तो कर सकता है, मीडियासंघी और फेसबुकसंघी कुतर्कों का जाल भी बुन सकते हैं,लेकिन सुभाष का सच नहीं बदल सकते।सुभाषचन्द्र बोस का सच यह है कि वह हिन्दुत्ववादी नहीं है,वह प्रतिक्रियावादी नहीं है,वह तो क्रांतिकारी है।वह कॉमरेड है और इसी सम्बोधन से अपने साथियों- सैनिकों को सम्बोधित करता है।संघ से लेकर पीएम मोदी तक किसी की जुबान में कॉमरेड पदबंध बोलने की शक्ति और विवेक नहीं है।संघी ध्यान रखें क्रांतिकारी हमेशा क्रांतिकारी रहता है।क्रांतिकारी पर अन्य कोई रंग नहीं चढ़ता।

आरएसएस मूलत: कारपोरेट घरानों द्वारा वित्तपोषित राजनीतिक संगठन है,इसके लिए राष्ट्रीय नायक (पटेल-सुभाष -आम्बेडकर-मालवीय आदि )पोस्टरबॉय से ज्यादा महत्व नहीं रखते,उसके लिए इनका मात्र विज्ञापन मूल्य है। इस संगठन का मूल मकसद है स्वाधीनता का अवमूल्यन करना,हिन्दुत्व के आधार पर समाज को संगठित करना,सामाजिक विभेद पैदा करना। आरएसएस का गुण है ये लोग पहले मीडिया के जरिए झूठ गढ़ते हैं,फिर कहते हैं यह सच्ची खबर है।फिर उसे सबको मानने के लिए मजबूर करते हैं।

संघ का नया नारा है (शायर इकबाल से क्षमा-याचना के साथ) ‘हो जाएं ख़ून लाखों लेकिन लहू न निकले।’

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

क्रांतिकारी मंगल पांडे के शहीद दिवस पर विशेष- 1857 के विद्रोह का परिप्रेक्ष्य - इरफान हबीब


सबसे पहली बात तो यह है कि मैं 1857 के विद्रोह को औपनिवेशिक शासन के बृहत्तर संदर्भ में रखना चाहूंगा। बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिनमें अनेक इतिहासकार भी शामिल हैं, जो अब यह मानने लगे हैं कि हमारी पाठयपुस्तकों में और इतिहास में औपनिवेशिक शासन की जो आलोचनाएं हैं, उनमें कुछ ज्यादती हुई है। अब से दो-तीन साल पहले, एन.सी.ई.आर.टी. की पाठयपुस्तकों में अनेक इतिहासकारों ने यह बात चलाई भी थी। लेकिन, मुझे लगता है कि हम 1857 के विद्रोह को और उसके चरित्र को तब तक नहीं समझ सकते हैं, जब तक हम यह नहीं समझते कि भारत के लिए और वास्तव में किसी हद तक पूरी दुनिया के लिए ही उपनिवेशवाद का क्या अर्थ रहा था और इस औपनिवेशिक शासन के साथ भारत किस तरह जुड़ा हुआ था और खास तौर पर भारतीय सेना के सिपाही उसके साथ किस तरह जुड़े हुए थे।
अव्वल तो उपनिवेशवाद का अर्थ था लगातार भारत के संसाधनों का दोहन कर बाहर ले जाया जाना। प्रसंगत: कह दूं कि एन.सी.ई.आर.टी. ने हाई स्कूल के बच्चों के लिए अब जो पाठयपुस्तकें लगाई हैं, उनमें से व्यावहारिक मायने में यह पहलू गायब ही है। बहरहाल, यह उस समय जीवन का एक तथ्य था। इस तरह निचोड़ा जाने वाला राष्ट्रीय आय का
3-4 फीसद हिस्सा, बेशक छोटा सा लग सकता है। लेकिन, याद रहे कि औद्योगिक क्रांति के दौरान ब्रिटेन में बचतों का स्तर वास्तव में 6 फीसद से ज्यादा नहीं था। इससे कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है कि साल दर साल, कैसी तबाह करने वाली लूट हो रही थी। 1854 से 1855 तक यानी विद्रोह से पहले के दो वर्षों में ही, भारतीय तटकर संबंधी रिकार्डों के अनुसार, भारत के लिए आयातों के मुकाबले निर्यातों की अधिकता यानी यह लूट 5.8 करोड़ रु. की आंकी गई है। उस जमाने की कीमतों के हिसाब से यह बहुत बड़ी रकम थी। इस लूट का मतलब यह है कि हिंदुस्तानी जनता को बढ़ते हुए फालतू कराधान का शिकार बनाया जा रहा था। और कराधान में यह बढ़ोतरी, जो ब्रिटिश शासन के कर बंदोबस्तों के रूप में सामने आई थी, सबसे ज्यादा बोझ उन इलाकों पर डाल रही थी जिन्हें महालवाड़ी इलाकों के नाम से जाना जाता था। करों का यह अतिरिक्त बोझ उतना ज्यादा स्थायी बंदोबस्ती के इलाकों पर और मद्रास प्रेसिडेंसी में रैयतवारी इलाकों पर नहीं पड़ रहा था, क्योंकि यहां पर करों का हिस्सा अपेक्षाकृत ज्यादा अवधि के लिए तय होता था। इसके विपरीत महालवाड़ी इलाकों में अपरिहार्य रूप से करों का यह बोझ ज्यादा था। वास्तविक मूल्य का हिसाब लगाएं तो 1819 से 1856 के बीच महालवाड़ी इलाके में, जिसमें उत्तर प्रदेश, मध्य भारत के हिस्से, हरियाणा आदि आते थे, कर के बोझ में पूरे 70 फीसद की बढ़ोतरी हुई थी। इसलिए 1839 से 1859 के बीच, ज्यादातर जिलों में 50 फीसद तक मामलों में जमीनें इस हाथ से उस हाथ चली गई थीं। इसका अर्थ यह है कि किसानों के और जमींदारों के लिए, भूमि की समस्या और कराधान की समस्या बहुत ही नाजुक होती जा रही थी। याद रहे कि यही इलाका विद्रोह का हृदय साबित हुआ था। यही वह क्षेत्र था जहां से बंगाल आर्मी के सिपाही आए थे और उनके बारे में कहा जाता है कि वे बस वर्दी पहने हुए भारतीय किसान थे। ये किसान छोटी-छोटी जमीनों पर मालिकाना हक रखने वाले किसानों के परिवारों से थे, जिस पर मैं जरा आगे चलकर चर्चा करूंगा।
दूसरा घटनाविकास था, उस चीज का विकास जिसे मुक्त बाजार का साम्राज्यवाद कहते हैं। 1833 के चार्टर कानून के बाद तो अंगरेजी और औद्योगिक विनिर्माता, भारत में व्यावहारिक मायने में शुल्क माफी के साथ ही आ रहे थे। इसका अर्थ यह है कि बड़े पैमाने पर भारतीय सूत कातने वालों और बुनकरों का रोजगार छिन रहा था। कार्ल मार्क्स ने इसकी ओर ध्यान खींचा था और जहां तक भारतीय बुनकरों का सवाल है, उनके लिए तो इसे मार्क्स ने मानव जाति का सफाया ही करार दिया था। भारत के कपड़े के कुल उपभोग के चौथाई हिस्से से ज्यादा की पूर्ति अब ब्रिटेन से होने वाले आयातों से हो रही थी और यह आंकड़ा उस भारत के लिए है, जो कपास के उत्पादन में सिरमौर माना जाता था। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तानी शहरी आबादी और खास तौर पर कताई करने वालों और बुनकरों पर कितनी भारी मार पड़ रही होगी। इस मुकाम पर हमें यह याद रखना चाहिए और हम जरा आगे चलकर इसका जिक्र भी करेंगे कि किस तरह अंगरेज लेखकों ने बुनकरों को, 1857 के विद्रोह में शामिल हुए असैनिकों में से सबसे कट्टर विद्रोहियों के रूप में यूं ही पेश नहीं किया है।
तीसरे, मुक्त व्यापार के साम्राज्यवाद के साथ ही साथ, 1843 से 1856 के बीच नए-नए इलाकों के हड़पे जाने की नीति को भी लागू किया जा रहा था। इस नीति के तहत, हिंदुस्तान के अनेक हिस्सों को हड़प कर ब्रिटिश शासित क्षेत्र में मिला लिया गया था, ताकि मुक्त व्यापार की छतरी को और फैलाया जा सके। 1843 से 1856 के बीच ही पंजाब, अवध, सतारा, नागपुर और झांसी को हड़पा गया था। इन वर्षों के दौरान ही हिंदुस्तानी भू-भाग का करीब पांचवां हिस्सा, ब्रिटिश शासन के इलाके में जोड़ा गया था। इस तरह हड़पेजाने का हर एक कदम, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी भी पैदा करता था क्योंकि पुराने शासनों में काम कर रहे बहुत से लोगों को, नई व्यवस्था में अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ता था। इसी प्रकार, दस्तकारों को बड़ी संख्या में रोजगार से हाथ धोना पड़ रहा था। मिसाल के तौर पर 1856 में लखनऊ की आबादी 6 लाख पचास हजार से ऊपर आंकी गई थी। यह विद्रोह से सिर्फ साल भर पहले, 1856 में अवध को हड़पे जाने के बाद की बात है। वास्तव में एक अंगरेज ने, जो विद्रोह फूटने के समय लखनऊ में ही था, पहले ही यह भविष्यवाणी जैसी कर दी थी कि लखनऊ की जनता को अंगरेजों के खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए और ऐसा होने की संभावना है। उसने लिखा था कि 'हमने ऐसा शायद ही कुछ किया होगा, जिससे हमें उनका प्यार मिल सकता हो।' उसने इसका विवरण दिया है कि किस तरह लोगों को रोजगार से हाथ धोने पड़े थे और किस तरह ब्रिटिश सरकार साधारण जनता से बहुत ज्यादा कर निचोड़ रही थी। अवध आदि इलाकों के अंगरेजी राज द्वारा हड़पे जाने की नीति ने आम लोगों की तकलीफें और बढ़ा दी थीं।
आखिरी नुक्ता यह कि मुक्त व्यापार के साम्राज्यवाद की कीमत खून से चुकानी पड़ रही थी और यह ऐसा पहलू है जिसे अकसर अनदेखा ही कर दिया जाता है। बंगाल आर्मी, जिसमें 1 लाख 35 हजार हिंदुस्तानी सैनिक थे, युध्द की तमाम आधुनिक पध्दतियों में प्रशिक्षित सेना थी और यह एशिया की सबसे बड़ी आधुनिक सेना थी। यही उस समय ब्रिटिश साम्राज्यवाद की मुख्य सेना थी। 1839 से लगातार इसी सेना ने भारत में और दुनिया भर में, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हमलावर युध्दों की तलवार की तरह काम किया था।
ऐसा पहला युध्द जिसमें इस सेना के हजारों लोग मारे गए थे, अफगानिस्तान का युध्द था। इसी तरह, 1843 में ग्वालियर के खिलाफ लड़े गए युध्द को अब भुला ही दिया गया है। पंजाब के और बर्मा में, दो बहुत ही खून-खराबे भरी लड़ाइयां हुई थीं और बंगाल आर्मी के हिंदुस्तानी सिपाहियों को फ्रांस और इंगलैंड के लिए लड़ने के लिए, क्रमश: केन्या और रूस भेजा गया था। इसके बाद इसी सेना के सिपाहियों को इंगलैंड के लिए अफीम युध्द में लड़ने के लिए, 1840 से 1857 तक चीन में झोंका गया था, जहां विद्रोह फूटा था। बाद में 1856 में इसी सेना को लड़ने के लिए ईरान भेजा गया था।
इन लड़ाइयों का कोई अंत ही नजर नहीं आता था। लेकिन तभी बंगाल आर्मी ने ही विद्रोह का बिगुल बजा दिया। इस तरह एक मायने में साम्राज्यवाद या उपनिवेशवाद द्वारा पैदा किए जा रहे सारे के सारे तनाव, नाटकीय तरीके से उस औजार पर संकेद्रित हो गए, जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने खुद ही गढ़ा था। यह पक्का करने के खयाल से कि इस सेना में एक ही भाषा बोलने वाले सिपाही लेने चाहिए, बंगाल आर्मी के सिपाही हिंदुस्तानी भाषा बोलने वाले इलाके से ही भर्ती किए गए थे। इसे तिलंगी सेना या कुर्गी सेना भी कहा जाता था। इसे तिलंगी सेना इसलिए कहा जाता था कि इस सेना के शुरुआती सिपाही आंध्र प्रदेश से थे। इस सेना में वे चूंकि साक्षर लोगों को ही रखना चाहते थे, अत: उन्होंने भर्ती के लिएब्राह्मणों पर ही ध्यान केंद्रित किया था। यह हमें इसकी भी याद दिलाता है कि यह एक साक्षर सेना थी। इस सेना का नवाबों, शाहजादों, जमींदारों और तालुकेदारों की पुरानी दुनिया से कुछ भी लेना-देना नहीं था। यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है।
इसमें शक नहीं कि उन्होंने तात्कालिक रूप से तो चिकनाई वाले कारतूसों से भड़ककर ही विद्रोह किया था और इस तरह दीन या धर्म के मुद्दे पर विद्रोह किया था। लेकिन, यह कोई धार्मिक सेना नहीं थी। सिपाही बस उतने ही धार्मिक थे, जितने बाकी तमाम लोग। वे जाति के मामले में जरूर काफी सचेत थे। 1850 के बाद यह तय किया गया था कि चूंकि इस सेना में इतने सारे ब्राह्मण थे, निचली जाति के लोगों को इस सेना में भर्ती ही नहीं किया जाए। इस तरह, वे किसी हद तक जाति-सजग जरूर थे अन्यथा वे संगठन के और सैन्य नेतृत्व के आधुनिक तरीकों से अच्छी तरह से परिचित थे और उनका सामंती वर्ग के साथ कोई लेना-देना नहीं था।
बंगाल आर्मी के संबंध में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों को साथ-साथ रखा गया था। सैय्यद अहमद खान ने तो अपनी रचना, 'हिंदुस्तानी बंगावत के वजूहात' में अंगरेजों की इसके लिए आलोचना भी की थी कि उन्होंने इतनी नासमझी की थी कि हिंदुओं और मुसलमानों को बटालियानों और रेजीमेंटों के तहत साथ-साथ रखा था। वह लिखते हैं : 'जब वे लड़ने के लिए निकले, दोनों के खून आपस में मिल गए और हिंदू, मुसलमान की मदद के भरोसे था और मुसलमान, हिंदू की मदद के आसरे।' इस तरह वे भाई बन गए। उनकी भाईचारे की भावनाएं, सगे भाइयों से गहरी थीं। वह कहते हैं, 'यह गलत था।' अगर मुसलमान और हिंदू, अलग-अलग रेजीमेंटों में रहे होते, तो मुसलमानों के विद्रोह करने की स्थिति में अंगरेज, हिंदुओं के खिलाफ मुसलमानों का या मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं का उपयोग कर सकते थे।
लेकिन, यह सलाह तो विद्रोह हो जाने के बाद दी जा रही थी। सच तो यह है कि चूंकि एक का खून दूसरे के खून से मिल गया था, हिंदू और मुसलमान सिपाही यह भूल ही गए थे कि वे अलग-अलग धर्मों को मानने वाले हैं। जब चिकनाई वाले कारतूसों का मुद्दा आया या फिर दूसरे अनेक मौके आए थे जब मुसलमान सिपाहियों ने कहा था कि जब तक हमारे हिंदू भाई इन कारतूसों को स्वीकार नहीं करते, हम भी उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। आगे चलकर सिपाहियों ने अपने अफसरों का चुनाव करना शुरू कर दिया। यह हैरानी की बात है कि प्रचंड रूप से हिंदुओं की बहुलता वाले दस्तों ने मुसलमानों को अपना अफसर चुना था और प्रचंड रूप से मुसलिम बहुल दस्तों ने हिंदुओं को। यह कोई सचेत रूप से नहीं किया जा रहा था। यही बात इस सचाई को खास तौर पर शानदार बना देती है।
मैं सिपाहियों की भूमिका पर खास तौर पर जोर देना चाहता हूं क्योंकि कुछ बात है कि हमें 'बंगावत' शब्द पसंद नहीं है और इस नापसंदगी को फैलाकर बंगाल आर्मी के सिपाहियों तक पहुंचा दिया गया है। वे ही इस विद्रोह की रीढ़ थे। वे इस विद्रोह के सबसेपुख्ता घटक थे। वे ही इस विद्रोह के सबसे सशस्त्र तत्व थे। बेशक, विद्रोह में दूसरे भी शामिल थे। लेकिन विद्रोह में, सशस्त्र बलों की भूमिका ही सबसे पहले आती है। इसी ने 1857 के विद्रोह को दुनिया का सबसे बड़ा उपनिवेशविरोधी विद्रोह बनाया था। दूसरा कोई भी विद्रोह बंगाल आर्मी जैसे 1 लाख 20 हजार से ज्यादा पेशेवर सैनिकों को विद्रोह के मैदान में नहीं उतार पाया था। बंगाल आर्मी के कुल 1 लाख 35 हजार सिपाहियों में से सिर्फ 8 हजार ही थे जो अब भी ब्रिटिश सेना के वफादार बने हुए थे।
मेरे खयाल में हमारे देश के लोगों की बंगाल आर्मी के सिपाहियों की जनतांत्रिक भावनाओं या उनके जनतांत्रिक परिसर के बारे में जानने में खास तौर पर दिलचस्पी होगी। उन्होंने हर एक स्थान पर काउंसिलों का गठन किया था। सिपाहियों ने इन्हें काउंसिलों का ही नाम दिया था। उन्होंने इन्हें 'पंचायत' का नाम नहीं दिया था। दूसरों ने जरूर इन्हें पंचायत कहा था। लेकिन, सिपाही इन्हें काउंसिल ही कहते थे। उन्होंने प्रशासन के संचालन के लिए इन काउंसिलों में अपने साथियों को चुना था। दिल्ली में वास्तव में उन्होंने एक कोर्ट ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन का गठन किया था। इसमें विभिन्न दस्तों के उनके प्रतिनिधि शामिल थे, जिन्हें दिल्ली का शासन संभालना था और व्यवहार में, रस्मी सम्राट बहादुशाह जफर को परे खिसकाकर, सरकार के सारे के सारे फैसले लेने थे। अगर विद्रोह सफल हो गया होता तो भारत की शुरुआती संसद के रूप में हमारे सामने, सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेंबली की जगह पर, दिल्ली का कोर्ट ऑफ एडमिनिस्टे्रशन आया होता। इसलिए, यह बंगाल आर्मी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटक था। उनके बीच एक आधुनिक संगठन की अवधारणा तो थी ही, इसके अलावा उन्होंने चुनाव और चयन प्रणाली को इतना भारी महत्व भी दिया था। यह कहा जाता था कि यही उनकी मुसीबत भी बन गया क्योंकि कोई भी फैसला लिए जाने से पहले, अंतहीन बहसें हुआ करती थीं।
गौर करने वाली एक और बात यह है कि ब्रिटिश राज में सिपाहियों के आचरण की आलोचनाएं किए जाने के बावजूद, अगर हम वाकई मिसाल के तौर पर विद्रोहियों के नियंत्रण के चार महीनों के दौरान दिल्ली के हालात पर नजर डालते हैं, जिस दौर के संबंध में अखबार और दस्तावेज, राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद हैं, सिपाहियों के गलत आचरण के मामले बहुत सीमित नजर आते हैं और यह उल्लेखनीय बात है। उन्हें कोई तनख्वाह नहीं मिल रही थी, जिसके चलते शुरुआत में उन्हें असैनिक आबादी से कुछ पैसे की उगाही करनी पड़ी थी। लेकिन, जब उनकी तनख्वाह का इंतजाम हो गया, उसके बाद उन्होंने असैनिक आबादी को परेशान नहीं किया, यहां तक कि महाजनों को भी नहीं। इन परिस्थितियों को देखते हुए, विद्रोहियों के नियंत्रण के इन चार महीनों के दौरान दिल्ली में जिस तरह कानून व व्यवस्था को कायम रखा गया, वाकई उल्लेखनीय है। किसी की भी ओर से इसकी कोई शिकायत नहीं आई थी कि सिपाहियों ने उसके परिवार को लूटा हो या किसी को मार दिया हो।
जरा इसकी तुलना, ब्रिटिश कब्जे के दौरान उसी दिल्ली में जो कुछ हुआ था उससे करके देखें। एक सिरे से जनता का नरसंहार हुआ था और उसे लूटा गया था। साहूकारों और व्यापारियों का सब कुछ छिन गया। अंगरेजों के लाड़ले कहे जाने वाले अफसरों ने उनके घरों को खुदवा दिया था। इस तरह विद्रोह के पूरे दौर में बागी सिपाहियों का आचरण, उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए वास्तव में उदाहरणीय था।
जहां तक धर्म का सवाल है, मैं पहले ही कह चुका हूं कि बेशक, धर्म उनका एक नारा था। यह विचार विकसित किया गया था कि हिंदू और मुसलमान, दोनों एकेश्वरवादी हैं, जबकि ईसाई ही हैं जो त्रिमूर्ति में विश्वास करते हैं। मुसलमानों और हिंदुओं के धार्मिक मूल्य एक ही हैं। वे ईश्वर में विश्वास रखते हैं। हर जगह विद्रोहियों द्वारा दोनों समुदायों को एकजुट करने के लिए यह तर्क पेश किया जा रहा था। लेकिन, इससे आगे यह धारणा थी कि वे हिंदुस्तान के प्रति वफादार थे और अंगरेज एक भिन्न राष्ट्रीयता के लोग थे, जो हिंदुस्तानियों को बेइज्जत कर रहे थे।
मैं इस विद्रोह के एक और तत्व पर आना चाहूंगा, जिसे भुला ही दिया गया है। उस समय दिल्ली से तीन अखबार निकलते थे, दो उर्दू में और एक फारसी में। देहली का उर्दू अखबार एक बड़ा अखबार था। ये अखबार उस जमाने के शिक्षित वर्ग की भाषाओं में निकलते थे। देहली उर्दू अखबार की मुख्य लाइन इस प्रकार थी : 'अंगरेज विदेशी हैं। वे गोरे हैं और हम काले हैं। वे ईसाई हैं और वे त्रिमूर्ति में विश्वास करते हैं। हम मुसलमान और हिंदू हैं। मुसलमान, अल्लाह में विश्वास करते हैं और हिंदू, आदिपुरुष में।'
जहां तक दोनों समुदायों को एक दूसरे से जोड़ने का सवाल है, यह सब सही था। लेकिन, देश के नाम पर देशभक्तिपूर्ण पुकारें भी थीं। देहली उर्दू अखबार अपने पाठकों को हमेशा, 'प्यारे देशवासियो' कहकर संबोधित करता है। उसकी पूरी वफादारी हिंदुस्तान या भारत के लिए है। उसके लिए सिपाही बादशाही फौज या शाही फौज नहीं है। वे तो 'फौज-ए-हिंदुस्तान' हैं या 'हिदुस्तानी फौज'। वे मजहब से भले ही हिंदू हों या मुसलमान, यह अखबार अकसर उन्हें जेहादी या धर्मयोध्दा कहता है।
विद्रोहियों के जनतंत्रवादी कमांडर, बख्त खान इस अखबार की नजरों में उसके सबसे बड़े नायक हैं। मैं कहना चाहूंगा कि बख्त खान, धर्मशास्त्रविदों को काफी हिकारत की नजर से देखता था। मिसाल के तौर पर उसने यह आदेश जारी किया था कि अगर दिल्ली में कोई गोकुशी करता है तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाएगा। उसने इस आशय के आदेश जारी किए थे। पिछले ही दिनों गोकुशी के खिलाफ आई.सी.एच.आर. की प्रदर्शनी में इस आदेश को प्रदर्शित किया गया था। खुद को मुजाहिदीन कहने वाले जो लोग हिंदू-मुसलिम एकता में खलल डालना चाहते थे, उनके लिए उसने कह दिया था कि उन्हें जामा मसजिद से निकाल फेंका जाना चाहिए, क्योंकि वे अपनी गंदगी से मसजिद को नापाक कर रहे थे। वास्तव में इसी शख्श की देहली उर्दू अखबार प्रशंसा करता है। यह एक महान सैन्यकमांडर या सिपाही था, जो दिल्ली का कमांडर इन चीफ बनाया गया था। वह आखिर में लखनऊ चला गया और वहां लड़ाई के मैदान में 1859 में उसकी मौत हो गई। ऐसा शख्श देहली उर्दू अखबार का हीरो था।
सच यह है कि शिक्षित आबादी धर्मशास्त्रियों के अंगूठे के नीचे किसी भी तरह से नहीं थी और उसके बीच अनेक आधुनिक विचार मौजूद थे। उर्दू अखबार इसकी वकालत कर रहा था कि शिक्षित लोगाें को हथियार बनाने वाले कारीगर का काम संभाल लेना चाहिए; उन्हें राइफलें बनानी चाहिए। यहां शारीरिक श्रम के प्रति प्रशंसा का भाव सामने आता है और दूसरी ओर संचार के किसी भी आधुनिक साधन की किसी तरह की निंदा नहीं है। वास्तव में फिरोज शाह ने तो 1857 के अगस्त के अपने एलान में भाप से चलने वाले जहाजों का और रेलवे के विकास का वादा किया था। इन सिपाहियों और खास तौर पर शिक्षित लोगों ने विद्रोहों को दिशा देने का काम किया था और उसके लिए एक विचारधात्मक रूपरेखा मुहैया कराई। लेकिन, दूसरे तबकों की भी भूमिका महत्वपूर्ण थी। यह बात दस्तकारों के मामले में तो और भी सच है, जो हर जगह विद्रोहों में शामिल हुए थे। मुजाहिदीन के नाम से पहचाने जाने वाले असैनिक वालंटियरों में, जिन्होंने वास्तव में लड़ाकों के रूप में विद्रोह में हिस्सा लिया था, उनकी संख्या काफी अच्छी थी। मुजाहिदीन की संज्ञा का प्रयोग अकसर मुसलमानों के मामले में ही किया जाता था, हालांकि कई बार हिंदू असैनिक वालंटियरों के लिए भी इस संज्ञा का प्रयोग किया गया है।
जहां तक इस विद्रोह में किसानों के शामिल होने का सवाल है, इस सिलसिले में मुझे कुछ खास कहने की जरूरत नहीं है क्योंकि अब, खास तौर पर एरिक स्टोक्स की कृति के सामने आने के बाद से, इस भूमिका को पूरी तरह से पहचाना जा चुका है। उन्होंने जमींदारों को नेतृत्व में रखकर लड़ाई लड़ी थी और बहुत बार, किसान समुदाय ने स्वतंत्र रूप से कार्रवाइयां भी थीं, जिस सब पर एरिक स्टोक्स ने विस्तार से चर्चा की है।
 थार्न हिल ने, जो 1858 के आखिर में मथुरा के डिस्ट्रिक्ट मजिस्टे्रट थे, लिखा था कि ब्रिटिश शासन के बने रहने के सबसे ज्यादा खिलाफ तो किसान ही थे। उनका कहना था कि अंगरेजों का काम अब यह होगा कि जमींदारों की मदद करें और किसानों को दबाएं। इस विद्रोह में किसानों की हिस्सेदारी सबसे पहले तो कर वसूली और वास्तव में कमरतोड़ कर वसूली का नतीजा थी। दूसरे, विद्रोहों में उन देहाती इलाकों के किसानों की हिस्सेदारी खास तौर पर ज्यादा थी, जहां किसान और सिपाहियों के बीच सीधे रिश्ते थे। बेशक, बाद वाले कारक की भी भूमिका रही थी, फिर भी विद्रोह में किसानों की बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी की वजहें तो, महालवाड़ी इलाकों में कमरतोड़ कर वसूली और ऋणों के बोझ के चलते, उनके अपनी जमीनें खो बैठने या खोने के खतरे में आ जाने आदि से संबंधित थीं। इसी ने उन्हें विद्रोह की ओर धकेला था।
अब मैं पूरे सम्मान के साथ, अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया में पंडित नेहरू नेइस विद्रोह के संबंध में जो कुछ कहा था, उसकी चर्चा करना चाहता हूं। उन्होंन 1857 के विद्रोह को एक विशाल और जबरदस्त विद्रोह का नाम दिया था। वह अपनी इस बात को दोहराते भी हैं क्योंकि 1857 के उनके विवरण के आखिर में आया यह सूत्रीकरण बहुत ही भावपूर्ण है। सचाई यह है कि अंगरेजों ने भारत पर जो जुल्म ढाए थे, जिस तरह लोगों को फांसियां दी थीं और लूटा था, उसे लेकर वह काफी भावुक हो उठते हैं। वह विस्तार से इस सबका वर्णन करते हैं। फिर भी यह कहते हैं कि अंतिम विश्लेषण में यह विद्रोह था एक सामंती विद्रोह ही। बुनियादी तौर पर सामंती विद्रोह। इस विद्रोह के संबंध में उसके प्रमुख नेताओं ने जो विचार व्यक्त किए थे, उनके दिमाग में रहे होंगे।
इसमें तो कोई शक ही नहीं है कि इस विद्रोह के अनेक प्रमुख नेता या राजा-राजकुमार थे या जमींदार। मुझे उनके नाम गिनाने की जरूरत नहीं है। मिसाल के तौर पर जगदीशपुर के जमींदार, कुंवरसिंह या अमरसिंह का उदाहरण लिया जा सकता है, जिन्होंने अपनी विद्रोही सेना के साथ रीवां, कालपी, कानपुर, लखनऊ और आजमगढ़ तक मार्च किया था। कहा जाता है कि ब्रिटिश इतिवृत्तकारों के विद्रोह के वृत्तांतों में यह स्वीकार किया जाता था कि अगर विद्रोहियों के पास इनके जैसे दर्जन भर नेता भी होते, तो दोबारा ब्रिटिश राज कायम हो ही नहीं सकता था। खुद एंगेल्स ने 1857 में अमरसिंह की कार्यनीति की प्रशंसा की थी। वे बेशक जमींदार थे। इसी तरह रानी लक्ष्मीबाई, झांसी की रानी थीं। उधर हजरतमहल थीं, जिन्होंने इतनी मजबूती से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। बेशक, ये सभी 1857 के महान नायक थे।
ऐसे तालुकेदारों की संख्या काफी बड़ी है, जिन्होंने विद्रोह के लिए अपनी जानें कुर्बान की थीं और जिन्हें अपने देश के लिए लड़ने के लिए अंगरेजों ने फांसी पर चढ़ाया था। बरेली के खान बहादुर खान का जिक्र किया जा सकता है, जो एक जमींदार थे और आखिरकार उन्हें फांसी दी गई थी। अपनी बढ़ी उम्र के बावजूद, वह अंगरेजों के बहुत मुखर विरोधी थे। इसी तरह, इन विद्रोहों में मुगलों की बहुत ही शानदार भूमिका को लिया जा सकता है। और बहादुरशाह जफर, जिसने अपनी शुरुआती हिचकिचाहट की बाद में क्षतिपूर्ति कर दी थी और अंतत: अपनी शायरी को और खुद को समर्पित कर दिया था, जिसमें उसने इस विद्रोह के शहीदों को श्रध्दांजलि अर्पित की थी। विद्रोह के बारे में पंडितजी के चरित्रांकन को लेकर कोई विवाद नहीं है, यह कहना सही नहीं होगा। वास्तव में इस विद्रोह के चरित्रांकन पर भिन्न-भिन्न रायें रही हैं। मिसाल के तौर पर एक तर्क यह भी दिया जाता रहा है कि 1857 का विद्रोह, सारत: एक किसान विद्रोह था, जिसके निशाने पर जमींदार थे और विदेशी शासन। लेकिन, वास्तव में ऐसा कहना पूरी तरह से गलत होगा। पी.सी. जोशी ने पचास साल पहले इस गलती को रेखांकित किया था और मैं इस पर आगे बहस नहीं करना चाहूंगा।
असली नुक्ता यह है कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब तालुकेदार, जमींदारऔर राजा-रजवाड़े, सिपाहियों, किसानों और दस्तकारों के साथ होकर, उस समय की दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी सत्ता के खिलाफ उठ खड़े हुए, खुद उनकी अपनी धारणाएं भी बदल गईं। प्रतिरोधी संघर्ष ने उनके नजरिए को बदल कर रख दिया था।
इस सिलसिले में मैं अवध के विद्रोहियों के दो दस्तावेजों की ओर ध्यान खींचना चाहूंगा। इनमें से पहला दस्तावेज भाषा के पहलू से बहुत ही महत्वपूर्ण है। वास्तव में विद्रोहियों के सारे के सारे दस्तावेज, चाहे वे अखबार हों या फिर उनकी घोषणाएं हों, महत्वपूर्ण हैं। फिर भी यह एलान मेरा प्रिय दस्तावेज है, जो कि हमारे संविधान के उस प्रावधान को चुनौती देता है, जो यह कहता है कि हिंदी, संस्कृत की शब्दावली पर आधारित होनी चाहिए। ये एलान संस्कृत की शब्दावली में न होकर, पूरी तरह से बोलचाल की हिंदुस्तानी में हैं। उनमें उर्दू के शब्दों का तो बोलबाला है, लेकिन फारसी के शब्दों का नहीं। मिसाल के तौर पर मेरे पास एक घोषणा का द्विभाषिक पाठ है, जिसमें दाएं हाथ में उर्दू में घोषणा है और बाएं पर हिंदी में। दोनों पाठ पूरी तरह से एक जैसे नहीं हैं। उर्दू या हिंदुस्तानी के पाठ में उर्दू के शब्दों की बहुतायत है, न कि फारसी के शब्दों की। इसी तरह, हिंदी के पाठ में हिंदुस्तानी के शब्द प्रमुखता से हैं, कुछेक शब्द फारसी के भी मिल जाएंगे, लेकिन संस्कृत के शब्द व्यावहारिक मायने में गैर-हाजिर ही हैं। यही है जनता की भाषा। यह एलान छपे हुए रूप में है। इस तरह विद्रोह का एलान करने में विद्रोही, छपाई का सहारा ले रहे थे। यह पुराने सामंती रुख से काफी भिन्न मामला है। यह कोई हुक्मनामा नहीं है। यह कोई आज्ञाप्ति नहीं है।
इस सार्वजनिक अपील के लिए 'इश्तिहारनामा' शब्द का प्रयोग किया गया है। आखिर, यह अपील किसको संबोधित थी? यह अपील जमींदारों के लिए और आम बाशिंदों के लिए थी। इस पाठ में पुराने मूल्य भी नजर आते हैं। इसकी शिकायत की जा रही है कि जमींदारों की जमीनें अंगरेज छीन रहे हैं, जैसा इससे पहले के निजाम में नहीं होता था। ये जमींदार अपनी जमीनों की इज्जत करते थे। अंगरेज तो इन जमींदारों के साथ भी, मजूरों-हम्मालों जैसा बर्ताव कर रहे थे। अंगरेजों के लिए तो वे मोचियों की तरह हैं। इसलिए, भारतीय निजाम फिर से श्रेणी विभाजन को बहाल करेगा। लेकिन, जल्द ही विद्रोहियों की घोषणाओं से यह तत्व काफूर होना शुरू हो गया। अंत में उन्हीं विद्रोहियों ने, हजरत महल के उसी कोर्ट की तरफ से जब 1857 के अक्टूबर में मलका विक्टोरिया की घोषणा का जवाब दिया, तो ये सभी मामले भुलाए जा चुके थे। अब साधे-सीधे हिंदुस्तानियों से अपील की जा रही थी।
अगर मुझे ठीक-ठीक याद है तो अवध के विद्रोहियों की 1857 की जुलाई की घोषणा में हमें 'हिंदुस्तान' शब्द दिखाई नहीं देता है। लेकिन, मलका विक्टोरिया की घोषणा के जवाब में हमें 'हिंदुस्तान' शब्द मिल जाता है। ठीक-ठीक जिस जुमले का इस्तेमाल किया गया है वह है'हिंदुस्तानी फौज और अवाम'। उन्हें संबोधित कर कहा जा रहा है किमलका विक्टोरिया पर विश्वास न करें। मलका विक्टोरिया का एलान धोखे और फरेब से भरा हुआ है। अगर वे वाकई न्याय करना चाहती हैं तो मैसूर क्यों नहीं लौटा देतीं जो उन्होंने टीपू सुलतान से छीना था? वे पंजाब क्यों नहीं लौटा देतीं जो उन्होंने दिलीपसिंह से छीना था? और वे बंगाल क्यों नहीं लौटा देतीं जो उन्होंने धोखे से छीना था? और अवध भी क्यों नहीं लौटा देतीं अगर मलका विक्टोरिया की दिलचस्पी न्याय करने में है तो उन्होंने यहां भी जो संपदा हथियाई है, उसे लौटा क्यों नहीं देतीं?
इस जबाव में जो दूसरी दलील दी जा रही थी वह यही थी कि अंगरेज तुम्हें कभी माफ नहीं करेंगे। तुम्हें तब तक लड़ते रहना होगा, जब तक कि अंगरेजों को निकाल बाहर नहीं किया जाता है। लड़ाई से पीछे नहीं हटना चाहिए। यह कमाल की बात है कि उस समय जबकि विद्रोह का सब कुछ खतम हो चुका था, उन्होंने यह जवाब छपवाया था और उसमें पूरे भारत की तसवीर को सामने रखते हुए, यह सब कहा था। इस तरह हम, सामंती वर्ग के नजरिए में एक बदलाव आता देखते हैं।
यहां मैं जो नुक्ते लेना चाहूंगा, वे सब आपस में जुड़े हुए हैं। पहला है, झांसी की रानी के रुख में आया बदलाव। इससे हमें पता चलता है कि किस तरह पारिवारिक शिकायतें, आज की भाषा में कहें तो राष्ट्रीय लक्ष्यों में या बृहत्तर लक्ष्यों में बदल जाती हैं। अगर झांसी को ब्रिटिश राज में नहीं मिलाया गया होता और उनके दत्तक पुत्र के दावे को खारिज न कर दिया गया होता, तो झांसी की रानी का ब्रिटिश हुकूमत से कोई विरोध नहीं होता। इसीलिए वह विद्रोहियों के साथ आने में हिचकिचा रही थीं। लेकिन, एक बार जब वह विद्रोह के साथ जुड़ गईं, वह ऐसी गतिविधियों तक पहुंच गईं जिनकी पहले कभी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी, जैसे पठान रक्षक और मुसलिम तोपची रखना, सिपाहियों का नेतृत्व करना, बंदूक बनाने के लिए फाउंड्री स्थापित करना आदि। जब वह तूफानी लड़ाई के बाद झांसी से दूर निकल रही थीं, दकन के एक पंडित से उनकी भेंट हो गई।
उस ब्राह्मण विष्णु भट्ट ने यह दर्ज किया है कि वह पठानी पोशाक में थीं और पठान रक्षक ही उनके साथ थे। वह कुएं से पानी पीना चाहती थीं। जैसे ही रानी को उसके दकन का ब्राह्मण होने का पता चला, उन्होंने ब्राह्मण से बातचीत शुरू कर दी। विष्णु भट्ट जब विद्रोह के बीच फंसा, वह बनारस से आ रहा था। उसने जो लिखा है, एक तटस्थ प्रेक्षक का बयान है। झांसी की रानी ने उससे कहा था : 'मैं तो एक गरीब विधवा हूं। मुझे विधवा धर्म अपनाना चाहिए था, जैसा कि रिवाज है। लेकिन नियति को यही मंजूर था कि मैं आज हिंदू धर्म के सम्मान के लिए लड़ रही हूं।'
बेशक, वह जिस हिंदू धर्म के लिए लड़ने की बात कर रही थीं, उस परंपरा-निर्धारित धर्म के लिए लड़ना नहीं हो सकता है, जिसका तकाजा यही था कि वह बाकी हर चीज से कटी हुई एक विधवा का जीवन व्यतीत करतीं। वह तो उस हिंदू धर्म की बात कर रही थीं, जिसका यह निर्देश था कि विदेशियों के राज को उखाड़ फेंको। सिपाहियों की ही तरह, झांसी की रानी की भी धर्म ने निर्देश के मामले में यही धारणा थी। रजतकांत राय ने अपने 'अनुभूत' समुदाय के विश्लेषण में धर्म और देशभक्ति के इस खास अंतर्संबंध का बहुत सुंदर तरीके से विश्लेषण किया है और यह दिखाया है कि किस तरह यहां आकर धर्म की अवधारणा, किसी खास धर्म के प्रति वफादारी मात्र के विचार से आगे बढ़कर, खास तौर पर देशभक्तिपूर्ण, असांप्रदायिक रूप ले लेता है।
यही बात वहाबियों के संबंध में भी लागू होती है। मेरे मित्र इक्तिदार आलम खान ने वहाबियों के इस मामले पर गहराई से चर्चा की है और मैं इस संबंध में ज्यादा कुछ नहीं जोड़ पाऊंगा। फिर भी मैं यह जरूर कहूंगा कि आगे चलकर इस विद्रोह में वहाबियों की भूमिका के संबंध में जो भी दावे किए गए, बहुत ही अतिरंजित थे। वास्तव में उनकी भूमिका किसी भी तरह से उल्लेखनीय नहीं थी। इससे भिन्न, ऐसे मुसलिम वालंटियरों की भूमिका जरूर उल्लेखनीय थी, जो इस विद्रोह में शामिल हुए हिंदू असैनिकों की ही तरह यह मानते थे कि उनके धर्म का यही निर्देश है कि उन्हें विदेशियों के शासन के खिलाफ लड़ना चाहिए। लेकिन, ऐसे लोगों में ज्यादातर ने न तो अब्दुल बहाव का नाम सुना था और न सैयद अहमद बरेलवी का। दूसरी ओर उन्होंने बख्त खान का नाम जरूर सुना था और उन्हें देखा था। यह दूसरी बात है कि विलियम डेलरिंपल ने बड़ी आसानी से बख्त खान को वहाबियों के खाने में डाल दिया है, जबकि वास्तव में वह हर प्रकार के बहावी विचार के सख्त खिलाफ थे।
मैं अंत में यह कहना चाहूंगा कि पहले अकसर यह सुनने को मिलता था कि अंगरेजों ने जो कुछ किया था, उसकी पर्दापोशी नहीं की जानी चाहिए। हो सकता है कि कूटनीतिक पहलू से हम इस पहलू की चर्चा नहीं करना चाहें। लेकिन, विद्रोह फूटने के बाद जो कुछ हुआ था, उसे इतिहास के पन्नों से मिटाया तो नहीं जा सकता है। कानुपर के बीवीघर नरसंहार से काफी पहले ही, नील ने यह लिखा था कि, 'कहा जाता है कि एक अंगरेज का गला विक्षोभ से लगभग रुंध ही जाता है कि श्रीमती चैंबर या सुश्री जेनिंग्स की हत्या कर दी गई। लेकिन देसी इतिहासों में या देसी लोगों के इतिहास में ऐसी लोकख्यातियों और लोक-कथाओं की कमी नहीं है,जिनमें हमारे लोगों के खिलाफ यह दर्ज होगा कि अपेक्षाकृत कम परिचित नाम वाली माताओं, बीवियों और बच्चों को, ब्रिटिश प्रतिशोध की विभीषिका का दयनीय शिकार बनना पड़ा था और इन कथाओं का भी दूसरी सभी कथाओं की तरह ही गहरा भावनात्मक असर होगा।'
डेलरिंपल ने दिल्ली के नरसंहार का विशद वर्णन किया है। यह दूसरी बात है कि यह विवरण पहले से मौजूद संस्मरणों की विशाल संख्या और ब्रिटिश रिपोर्टों के माध्यम से, पहले से आम जानकारी में रहा है। पूरे के पूरे शहर को उजाड़ा गया और वहां नरहसंहार किया गया। हां, एक बात जरूर है कि आधिकारिक रूप से औरतों की हत्याएं नहीं की गई थीं। लेकिन, अगर सभी मर्दों को मार दिया जाए तो औरतें कहां से खाएंगी, कहां जाएंगी? सैयद अहमद खान ने जो उस समय एक ब्रिटिश एजेंट थे, बिना किसी सहानुभूति के जिस तरह से विवरण दिया था, वह इस प्रकार है :
'नगीना के शहरियों ने सोचा था कि लूट होगी और उनमें से कुछ ने अपने परिवारों को वहां से हटाया भी था, लेकिन उन सबको तो कत्ल ही कर दिया गया। यह कत्लेआम दिन भर चला। वहां सिर्फ एक शख्स को बख्श दिया गया था क्योंकि उसने अंगरेजों के खिलाफ फतवे पर दस्तखत करने से इनकार किया था। वर्ना सभी निर्दोष लोगों को कत्ल कर दिया गया।' सैयद अहमद ने यह वर्णन हमदर्दी का एक शब्द तक खर्च किए बिना किया है। जब उनका इस तरह का रुख था, तो अंगरेजों का रुख कैसा होगा इसका हम अंदाजा लगा सकते हैं।
विष्णु भट्ट ने कोष्टिपुर की लूट का वर्णन किया है। हम जानते हैं कि दिल्ली में सिर्फ मुसलमानों का कत्लेआम हुआ था। लेकिन, भट्ट के अनुसार कोष्टिपुर में और झांसी में, रानी के ब्राह्मण होने की वजह से, सभी ब्राह्मणों को कत्ल कर दिया गया। वह यह भी बताता है कि कोष्टिपुर में तो औरत, मर्द, बच्चे, सभी का नरसंहार किया गया था।
साफ है कि प्रतिशोध भी इतिहास का हिस्सा है। जिस तरह यह बदला लिया गया, वह भी इतिहास का हिस्सा है। इसे मिटाया नहीं जा सकता है। इसे मिटाया नहीं जाना चाहिए। अगर विद्रोहियों ने सैकड़ों में अंगरेजों की जानें ली थीं, तो अंगरेजों ने दसियों हजार में उनकी हत्याएं की थीं। एक-एक अंगरेज की हत्या की सजा, दोषियों और निर्दोषों को समान रूप से दी जाती थी। दूसरी ओर, किसी भी भारतीय की हत्या के लिए किसी यूरोपीय को कोई सजा नहीं दी गई। तब हम बदले की इन कार्रवाइयों को बराबर कैसे मान सकते हैं? इसलिए, जब हम भारत में ब्रिटिश शासन की अच्छाइयों की बात करते हैं, जैसे इंडियन सिविल सर्विस की स्थापना आदि, तो हमें इस विद्रोह में अपने प्राणों की आहुति देने वाले विद्रोहियों को तो याद करना ही चाहिए, उन साधारण नागरिकों को, आम औरतों, मर्दों और बच्चों को भी याद कर लेना चाहिए, जिन्हें 1857-58 के दौरान मौत के घाट उतारा गया था और यातनाएं देने के भांति-भांति के तरीके आजमाते हुए मौत के घाट उतारा गया था।
जहां तक अन्य विद्रोहों की और खासकर दक्षिण भारत की भूमिका का सवाल है, एक दिलचस्प प्रसंग का जिक्र करना चाहूंगा। अब से कुछ अर्सा पहले टेलीविजन पर हैदर अली और टीपू सुलतान पर एक कार्यक्रम सीरियल के रूप में दिखाया जा रहा था। लेकिन, अदालत का आदेश आ गया कि उसमें यह एलान जोड़ा जाना चाहिए कि यह इतिहास नहीं है बल्कि मिथक है या ऐसा ही कुछ और। मैंने भारतीय टेलीविजन पर किसी अन्य सीरियल में इस तरह की घोषणा जोड़े जाने का आग्रह नहीं देखा है। बहरहाल, अदालत ने यह सुनिश्चित कर दिया कि हैदरअली और टीपू सुलतान को मिथकीय चरित्रों की तरह ही लिया जाए। यह बात सही है कि बहुत बार इससे पहले के विद्रोह हमारे ध्यान से निकल जाते हैं और ऐसा लगने लगता है जैसे सब कुछ 1857 के विद्रोह से ही शुरू हुआ हो।बहरहाल, जहां तक इससे पहले के किसी तुलनीय विद्रोह का सवाल है, यह समझना जरूरी है कि देश के पूरी तरह से एकीकृत होने से पहले, अलग-अलग कड़ियों को आपस में जोड़ना मुश्किल होता होगा। विद्रोह करना वैसे भी एक नाटकीय निर्णय होता है और हम तो यही देखकर अजरज में पड़ जाते हैं कि 1857 में उत्तरी भारत में यह फैसला कैसे लिया गया होगा, जबकि लोग यह अच्छी तरह समझते थे कि यह जान की बाजी लगाने का मामला है।
फिर भी पंजाब के दो युध्दों से एक हद तक इसकी तुलना की जा सकती है। भारतीय प्रतिरोध के किसी भी इतिहास में पंजाब के दोनों युध्दों को हमेशा याद रखा जाना चाहिए। ब्रिटिश राज के विस्तार का, पंजाब के दो युध्दों जैसा जबरदस्त प्रतिरोध पहले नहीं हुआ था। अंगरेजों को इतनी कठिन लड़ाइयां पहले नहीं लड़नी पड़ी थीं। इन लड़ाइयों में बंगाल आर्मी के ही हजारों सिपाही मारे गए थे। बहरहाल, 1857 में पंजाब में हुए अधिकांश विद्रोह, वहां तैनात बंगाल आर्मी के सिपाहियों के ही विद्रोह थे। ऐतिहासिक घटनाओं में ऐसी भिन्नताओं का सामने आना स्वाभाविक है। एक मायने में हम यह कह सकते हैं कि 1857 के विद्रोह को और फैलने का मौका ही नहीं मिला था क्योंकि साल के भीतर-भीतर, वास्तव में तो छह महीने में ही, उसे कुचला जा चुका था। कौन जानता है कि अगर यह सफल हो जाता तो क्या होता!
(इरफान हबीब,प्रसिद्ध इतिहासकार हैं,यह लेख सांसदों के लिए भाषण माला के क्रम में 9 मई 2007 को आयोजित व्याख्यान पर आधारित है)
















सोमवार, 22 नवंबर 2010

भारतीय सेना में विद्रोह- कार्ल मार्क्स

फूट डालो और राज्य करो, रोम के इसी महान नियम के आधार पर ग्रेट ब्रिटेन लगभग डेढ़ सौ वर्ष तक अपने भारतीय साम्राज्य पर अपना शासन बनाए रखने में कामयाब हुआ था। जिन विभिन्न नस्लों, कबीलों, जातियों, धार्मिक संप्रदायों और स्वतंत्र राज्यों के योग से उस भौगोलिक एकता का निर्माण हुआ है जिसे भारत कहा जाता है, उनके बीच आपसी शत्रुता फैलाना ही ब्रिटिश आधिपत्य का बुनियादी उसूल रहा है। लेकिन, बाद के काल में, उस आधिपत्य की परिस्थितियों में एक परिवर्तन हुआ। सिंध और पंजाब की फतह के बाद, एंग्लो-इंडियन साम्राज्य न केवल अपनी स्वाभाविक सीमाओं तक फैल गया था, बल्कि स्वतंत्र भारतीय राज्यों के अंतिम चिह्नों को भी पैरों तले कुचल कर उसने नष्ट कर दिया था। तमाम लडाकू देशी जातियों को वश में कर लिया गया था, देश के अंदर के तमाम बड़े झगड़े खतम हो गए थे, और हाल में अवध के (अंगरेजी सलतनत मेंअनु.) मिला लिए जाने की घटना ने संतोषप्रद रूप से इस बात को सिध्द कर दिया था कि तथाकथित स्वतंत्र भारतीय राज्यों के अवशेष केवल अंगरेजों की दया पर ही जिंदा हैं। इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थिति में एक जबरदस्त परिवर्तन आ गया था। अब वह भारत के एक भाग की मदद से दूसरे भाग पर हमला नहीं करती थी; वह अब उसके शीर्ष स्थान पर आसीन हो गई थी और सारा भारत उसके चरणों में पड़ा था। अब वह फतह करने का काम नहीं कर रही थी, वह सर्वविजेता बन गई थी। उसकी मातहत सेनाओं को अब उसके साम्राज्य का विस्तार करने की नहीं, बल्कि उसे केवल बनाए रखने की जरूरत थी। सिपाहियों को बदल कर उन्हें पुलिस मैन बना दिया गया था; 20 करोड़ भारतवासियों को अंगरेज अफसरों की मातहती में 2 लाख सैनिकों की देशी फौज की मदद से दबा कर रखा जा रहा है, और इस देशी फौज को केवल 40 हजार अंगरेज सैनिकों की सहायता से काबू में रखा जा रहा है। प्रथम दृष्टि में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय जनता की फर्माबरदारी उस देशी फौज की नमकहलाली पर आधारित है जिसे संगठित करके ब्रिटिश शासन ने, साथ ही साथ, भारतीय जनता के प्रतिरोध के एक प्रथम आम केंद्र को भी संगठित कर दिया है। उस देशी फौज पर कितना भरोसा किया जा सकता है, यह हाल की उसकी उन बंगावतों से बिलकुल स्पष्ट है जो, फारस (ईरान) के साथ युध्द के कारण, बंगाल प्रेसिडेंसी (प्रांत) के यूरोपियन सैनिकों से खाली होते ही वहां पर आरंभ हो गई थीं। भारतीय सेना में इससे पहले भी बंगावतें हुई थीं, लेकिन वर्तमान विद्रोह उनसे भिन्न है, उसकी कुछ अपनी विशिष्ट और घातक विशेषताएं हैं। यह पहली बार है जबकि सिपाहियों की रेजीमेंटों ने अपने यूरोपीय अफसरों की हत्या कर दी है; जबकि अपने आपसी विद्वेषों को भूल कर, मुसलमान और हिंदू अपने सामान्य स्वामियों के खिलाफ एक हो गए हैं; जबकि 'हिंदुओं द्वारा आरंभ की गई उथल-पुथल ने दिल्ली के राज्य सिंहासन पर वास्तव में एक मुसलमान बादशाह को बैठा दिया है;जबकि बंगावत केवल कुछ थोड़े से स्थानों तक ही सीमित नहीं रही है; और, अंत में, जबकि एंग्लो इंडियन सेना का विद्रोह अंगरेजों के प्रभुत्व के विरुध्द महान एशियाई राष्ट्रों के असंतोष के आम प्रदर्शन के साथ मिलकर एक हो गया है। इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं कि बंगाल की सेना का विद्रोह फारस (ईरान) और चीन के युध्दों के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
बंगाल की सेना में चार महीने पहले जो असंतोष फैलने लगा था, उसका तथाकथित कारण यह बताया जाता है कि देशी फौजों को यह डर था कि सरकार उनके धर्मकर्म में हस्तक्षेप करेगी। कहा गया है कि सिपाहियों में जो कारतूस बांटे गए थे, उनके कागजों में गाय और सुअर की चर्बी लगी हुई थी, और इसलिए उनको दांत से काटने की आज्ञा को देशी फौजियों ने अपने धार्मिक रीतिरिवाजों में दखलंदाजी माना, और यही चीज स्थानीय फसादों के लिए एक सिगनल बन गई। 22 जनवरी को कलकत्ते से थोड़े ही फासले पर स्थिति छावनियों में भयानक आग लग गई। 25 फरवरी को बरहमपुर में 19वीं देशी रेजीमेंट ने बंगावत कर दी जिसके सैनिकों को उन कारतूसों के प्रति विरोध था। 31 मार्च को इस रेजीमेंट को भंग कर दिया गया। मार्च के अंत में, बैरकपुर में स्थित 34 वीं सिपाही रेजीमेंट ने परेड ग्राउंड पर अपने एक सैनिक को भरी हुई बंदूक लेकर एकदम अगली कतार तक आगे बढ़ जाने दिया; वहां से बंगावत के लिए अपने साथियों को आह्वान करने के बाद उसे अपने एडजुटेंट और सार्जेंट-मेजर पर हमला करने और उन्हें घायल करने दिया। इसके बाद जो जबरदस्त हाथापाई हुई, उसके दौरान सैकड़ों सिपाही चुपचाप खड़े तमाशा देखते रहे और कुछ दूसरों ने इस मारपीट में शामिल होकर अपनी बंदूकों के कुंदों से अफसरों की मरम्मत की। इसके बाद उस रेजीमेंट को भी भंग कर दिया गया। अप्रैल महीने का श्रीगणेश इलाहाबाद, आगरा, अंबाला आदि कई छावनियों में बंगाली सेना की आगजनी से, मेरठ में हल्के घुड़सवारों की तीसरी रेजीमेंट की बंगावत से, और मद्रास और बंबई की सेनाओं में इसी प्रकार की बागी प्रवृत्तियों के प्रदर्शन से हुआ। मई के आरंभ में अवध की राजधानी लखनऊ में भी एक विद्रोह की तैयारी हो रही थी, लेकिन सर एच. लारेंस की सतर्कता ने उसे रोक दिया था। 9 मई को मेरठ की तीसरी हल्की घुड़सवार सेना के बागियों को जेल ले जाया गया जिससे कि उन्हें जो भिन्न-भिन्न सजाएं दी गई थीं उन्हें वे काटें। अगले दिन की शाम को, 11वीं और 20वींदो देशी रेजीमेंटों के साथ तीसरी घुड़सवार सेना के सैनिक परेड मैदान में इकट्ठे हो गए। जो अफसर उन्हें शांत और अनुशासित करने की कोशिश कर रहे थे उनको उन्होंने मार डाला, छावनियों में आग लगा दी और जितने अंगरेजों को वे पा सके, उन सबको उन्होंने काट डाला। ब्रिगेड के अंगरेज सैनिकों के भाग ने यद्यपि पैदल सेना की एक रेजीमेंट, घुड़सवार सेना की एक रेजीमेंट, और पैदल घुड़सवार तोपखाने की एक भारी शक्ति जमा कर ली थी, लेकिन रात होने से पहले वे कोई कार्रवाई न कर सके। बागियों को वे कोई चोट न पहुंचा सके, और उन्होंने वहां से उन्हें खुले मैदान में, मेरठ से लगभग चालीस मील के फासले पर स्थित दिल्ली के ऊपर, धावा करने के लिए चला जाने दिया। वहां 38वीं, 54वीं और 74वीं पैदल सेना की रेजीमेंटों की देशी गैरीसन, और देशी तोपखाने की एक कंपनी भी उनके साथ शामिल हो गई। ब्रिटिश अफसरों पर हमला बोल दिया गया, जितने भी अंगरेजों को विद्रोही पकड़ सके उनकी हत्या कर दी गई, और दिल्ली के पिछले मुगल बादशाह के वारिस को भारत का बादशाह घोषित कर दिया गया। मेरठ की मदद के लिए, जहां पुन: व्यवस्था स्थापित कर ली गई थी, भेजी गई फौजों में से देशी घुड़सवार और पैदल सिपाहियों की छह कंपनियों ने, जो 15 मई को वहां पहुंची थीं, अपने कमांडिंग अफसर मेजर फ्रेजर को मार डाला और फौरन देहात की तरफ चल पड़ीं। उनके पीछे-पीछे घुड़सवार तोपखाने की फौजें और छठे ड्रैगन गाड्र्स की बहुत सी टुकड़ियां उन्हें पकड़ने के उद्देश्य से निकल पड़ीं। पचास या साठ बागियों को गोली मार दी गई, लेकिन बाकी भाग कर दिल्ली पहुंचने में सफल हो गए। पंजाब के फीरोजपुर में 57वीं और 45वीं देशी पैदल रेजीमेंटों ने बंगावत कर दी, लेकिन उन्हें बलपूर्वक कुचल दिया गया। लाहौर से आने वाले निजी पत्र बताते हैं कि तमाम देशी फौजें खुले तौर से बागी बन गई हैं। 19 मई को कलकत्ता में तैनात सिपाहियों ने सेंट विलियम के किले पर अधिकार करने की असफल कोशिश की थी। बुशायर से बंबई आई तीन रेजीमेंटों को तुरंत कलकत्ता रवाना कर दिया गया।
इन घटनाओं का सिंहावलोकन करते समय मेरठ के ब्रिटिश कमांडर के रवैए के संबंध में हर आदमी को हैरत होती है। लड़ाई के मैदान में उसका देर से आना और ढीले-ढाले ढंग से उसके द्वारा बागियों का पीछा किया जाना उससे भी कम समझ में आता है। दिल्ली जमुना के दाहिने तट पर और मेरठ उसके बाएं तट पर स्थित है। दोनों तटों के बीच दिल्ली में केवल एक पुल है। इसलिए भागते हुए सिपाहियों का रास्ता काट देने से अधिक आसान चीज दूसरी न होती!
इसी दरम्यान, तमाम अप्रभावित जिलों में मार्शल लॉ लगा दिया गया है। मुख्यतया भारतीय फौजी टुकड़ियां उत्तर पूर्व और दक्षिण से दिल्ली की तरफ बढ़ रही हैं। कहा जाता है कि पड़ोसी राजे-रजवाड़ों ने अंगरेजों के पक्ष में होने का एलान कर दिया है। लंका चिट्ठियां भेज दी गई हैं कि लार्ड एलगिन और जनरल एशबर्नहम की सेनाओं को चीन जाने से रोक दिया जाए और, अंत में, पखवाड़े भर के अंदर ही 14 हजार अंगरेज सैनिक इंगलैंड से भारत भेजे जा रहे हैं। भारत के वर्तमान मौसम के कारण और आवाजाही के साधनों की एकदम कमी की वजह से ब्रिटिश फौजों के आगे बढ़ने में चाहे जो रुकावटें सामने आएं, लेकिन बहुत संभव यही है कि दिल्ली के विद्रोही बिना किसी लंबे प्रतिरोध के ही हार जाएंगे। लेकिन, इसके बावजूद, यह उस भयानक दुखांत नाटक की मात्र भूमिका है जो वहां अभी खेला जाएगा।
 (15 जुलाई 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5056, में एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।)



सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

भारत में ब्रिटिश शासन के भावी परिणाम- कार्ल मार्क्स- 1-


   भारत के संबंध में अपनी टिप्पणियों को इस पत्र में मैं समाप्त कर देना चाहता हूं।
यह कैसा हुआ कि भारत के ऊपर अंगरेजों का आधिपत्य कायम हो गया? महान मुगल की सर्वोच्च सत्ता को मुगल सूबेदारों ने तोड़ दिया था। सूबेदारों की शक्ति को मराठों ने नष्ट कर दिया था। मराठों की ताकत को अफगानों ने खतम किया, और जब सब एक दूसरे से लड़ने में लगे थे, तब अंगरेज घुस आए और उन सबको कुचल कर खुद स्वामी बन बैठे। एक देश जो न सिर्फ मुसलमानों और हिंदुओं में, बल्कि, कबीले-कबीले और वर्ण-वर्ण में भी बंटा हुआ हो; एक समाज जिसका ढांचा उसके तमाम सदस्यों के पारस्परिक विरोधों और वैधानिक अलगावों के ऊपर आधारित होऐसा देश और ऐसा समाज क्या दूसरों द्वारा फतह किए जाने के लिए ही नहीं बनाया गया था? भारत के पिछले इतिहास के बारे में यदि हमें जरा भी जानकारी न हो, तब भी क्या इस जबरदस्त और निर्विवाद तथ्य से हम इनकार कर सकेंगे कि इस क्षण भी भारत को, भारत के ही खर्च पर पलने वाली एक भारतीय फौज अंगरेजों का गुलाम बनाए हुए है? अत:, भारत दूसरों द्वारा जीते जाने के दुर्भाग्य से बच नहीं सकता, और उसका संपूर्ण पिछला इतिहास अगर कुछ भी हो, तो वह उन लगातार जीतों का इतिहास है जिनका शिकार उसे बनना पड़ा है। भारतीय समाज का कोई इतिहास नहीं है, कम से कम ज्ञात इतिहास तो बिलकुल ही नहीं है। जिसे हम उसका इतिहास कहते हैं, वह वास्तव में उन आक्रमणकारियों का इतिहास है जिन्होंने आकर उसके उस समाज के निष्क्रिय आधार पर अपने साम्राज्य कायम किए थे, जो न विरोध करता था, न कभी बदलता था। इसलिए, प्रश्न यह नहीं है कि अंगरेजों को भारत जीतने का अधिकार था या नहीं, बल्कि प्रश्न यह है कि क्या अंगरेजों की जगह तुर्कों, ईरानियों, रूसियों द्वारा भारत का फतह किया जाना हमें ज्यादा पसंद होता।
भारत में इंगलैंड को दोहरा काम करना है : एक ध्वंसात्मक, दूसरा पुनर्रचनात्मक पुराने एशियाई समाज को नष्ट करने का काम और एशिया में पश्चिमी समाज के लिए भौतिक आधार तैयार करने का काम।
अरब, तुर्क, तातार, मुगल, जिन्होंने एक के बाद दूसरे भारत पर चढाई की थी, जल्दी ही खुद हिंदुस्तानी बन गए थे : इतिहास के एक शाश्वत नियम के अनुसार बर्बर विजेता अपनी प्रजा की श्रेष्ठतर सभ्यता द्वारा स्वयं जीत लिए गए थे। अंगरेज पहले विजेता थे जिनकी सभ्यता श्रेष्ठतर थी, और, इसलिए, हिंदुस्तानी सभ्यता उन्हें अपने अंदर न समेट सकी। देशी बस्तियों को उजाड़ कर, देशी उद्योग-धंधों को तबाह कर और देशी समाज के अंदर जो कुछ भी महान और उदात्त था उस सबको धूल-धूसरित करके उन्होंने भारतीय सभ्यता को नष्ट कर दिया। भारत में उनके शासन के इतिहास के पन्नों में इस विनाश की कहानी के अतिरिक्त और लगभग कुछ नहीं है। विध्वंस के खंडहरों में पुनर्रचना के कार्य का मुश्किल से ही कोई चिह्न दिखलाई देता है। फिर भी यह कार्य शुरू हो गया है।
पुनर्रचना की पहली शर्त यह थी कि भारत में राजनीतिक एकता स्थापित हो और वह महान मुगलों के शासन में स्थापित एकता से अधिक मजबूत और अधिक व्यापक हो। इस एकता को ब्रिटिश तलवार ने स्थापित कर दिया है और अब बिजली का तार उसे और मजबूत बनाएगा और स्थायित्व प्रदान करेगा। भारत अपनी मुक्ति प्राप्त कर सके और हर विदेशी आक्रमणकारी का शिकार होने से वह बच सके, इसके लिए आवश्यक था कि उसकी अपनी एक देशी सेना हो : अंगरेज ड्रिल-सार्जेंट ने ऐसी ही एक सेना संगठित और शिक्षित करके तैयार कर दी है। (एशियाई समाज में पहली बार स्वतंत्र अखबार कायम हो गए हैं।) इन्हें मुख्यतया भारतीयों और यूरोपियनों की मिली-जुली संतानें चलाती है और वे पुनर्निर्माण के एक नए और शाक्तिशाली साधन के रूप में काम कर रहे हैं। जमींदारी और रैयतवारी प्रथाओं के रूप मेंयद्यपि ये अत्यंत घृणित प्रथाएं हैंभूमि पर निजी स्वामित्व के दो अलग रूप कायम हो गए हैं; इससे एशियाई समाज में जिस चीज की (भूमि पर निजी स्वामित्व की प्रथा कीअनु.) अत्यधिक आवश्यकता थी, उसकी स्थापना हो गई है। भारतीयों के अंदर से, जिन्हें अंगरेजों की देख-देख में कलकत्ते में अनिच्छापूर्वक और कम से कम संख्या में शिक्षित किया जा रहा है, और नया वर्ग पैदा हो रहा है जिसे सरकार चलाने के लिए आवश्यक ज्ञान और यूरोपीय विज्ञान की जानकारी प्राप्त हो गई है। भाप ने यूरोप के साथ भारत का नियमित और तेज संबंध कायम कर दिया है, उसने उसके मुख्य बंदरगाहों को पूरे दक्षिण-पूर्वी महासागर के बंदरगाहों से जोड़ दिया है, और उसकी उस अलगाव की स्थिति को खतम कर दिया है जो उसकी प्रगति न करने का मुख्य कारण थी। वह दिन बहुत दूर नहीं है जब रेलगाड़ियों और भाप से चलने वाले समुद्री जहाज इंगलैंड और भारत के बीच के फासले को, समय के माप के अनुसार, केवल आठ दिन का कर देंगे और वह वैभवशाली देश पश्चिमी संसार का सचमुच एक हिस्सा बना जाएगा।
ग्रेट ब्रिटेन के शासक वर्गों की भारत की प्रगति में अभी तक केवल आकस्मिक, क्षणिक और अपवाद रूप में ही दिलचस्पी रही है। अभिजात वर्ग उसे फतह करना चाहता था, थैलीशाहों का वर्ग उसे लूटना चाहता था, और मिलशाहों का वर्ग सस्ते दामों पर अपना माल बेच कर उसे बर्बाद करना चाहता था। लेकिन अब स्थिति एकदम उलटी हो गई है। मिलशाहों के वर्ग को पता लग गया है कि भारत को एक उत्पादन करने वाले देश में बदलना उनके अपने हित के लिए अत्यंत आवश्यक हो गया है, और यह कि, इस काम के लिए, सबसे पहले इस बात की आवश्यकता है कि वहां पर सिंचाई के साधनों और आवाजाही के अंदरूनी साधनों की व्यवस्था की जाए। अब वे भारत में रेलों का जाल बिछा देना चाहते हैं। और वे बिछा देंगे। इसका परिणाम क्या होगा, इसका उन्हें कोई अनुमान नहीं है।
यह तो कुख्यात है कि विभिन्न प्रकार की उपजों को लाने-ले जाने और उसकी अदला-बदली करने के साधनों के नितांत अभाव ने भारत की उत्पादक शक्ति को पंगु बना रखा है। अदला-बदली के साधनों के अभाव के कारण, प्राकृतिक प्रचुरता के मध्य ऐसी सामाजिक दरिद्रता हमें भारत से अधिक कहीं और दिखलाई नहीं देती। ब्रिटिश कॉमन्स सभा की एक समिति के सामने, जो 1848 में नियुक्त की गई थी, यह साबित हो गया था कि :
खानदेश में जिस समय अनाज 6 शिलिंग से लेकर 8 शिलिंग फी क्वार्टर के भाव से बिक रहा था, उसी समय पूना में उसका भाव 64 शिलिंग से 70 शिलिंग तक का था, जहां पर अकाल के मारे लोग सड़कों पर दम तोड़ रहे थे, पर खानदेश से अनाज ले आना संभव नहीं था क्योंकि कच्ची सड़कें एकदम बेकार थीं।
रेलों के जारी होने से खेती के कामों में भी आसानी से मदद मिल सकेगी, क्योंकि जहां कहीं बांध बनाने के लिए मिट्टी की जरूरत होगी वहां तालाब बन सकेंगे, और पानी को रेलवे लाइन के सहारे विभिन्न दिशाओं में ले जाया जा सकेगा। इस प्रकार सिंचाई का, जो पूर्व में खेती की बुनियादी शर्त है, बहुत विस्तार होगा और पानी की कमी के कारण बार-बार पड़ने वाले स्थानीय अकालों से निजात मिल सकेगी। इस दृष्टि से देखने पर रेलों का आम महत्व उस समय और भी स्पष्ट हो जाएगा जब हम इस बात को याद करेंगे कि सिंचाई वाली जमीनें, घाट के नजदीक वाले जिलों में भी, बिना सिंचाई वाली जमीनों की तुलना में उतने ही रकबे के ऊपर तीन-गुना अधिक टैक्स देती हैं, दस या बारह गुना अधिक लोगों को काम देती हैं और उनसे बारह या पंद्रह गुना अधिक मुनाफा होता है।
रेलों के बनने से फौजी छावनियों की संख्या और उनके खर्चे में कमी करना भी संभव हो जाएगा। फोर्ट सेंट विलियम के टाउन मेजर, कर्नल वारेन ने कॉमन्स सभा की एक प्रवर समिति के सामने कहा था :
यह संभावना कि जितने दिनों में, यहां तक कि हफ्तों में, देश के दूर-दूर के भागों से आजकल जो सूचनाएं आ पाती हैं, वे आगे से उतने ही में वहां से प्राप्त हो जाया करेंगी और इतने ही संक्षिप्त समय में फौजों और सामान के साथ वहां हिदायतें भेजी जा सकेंगी, यह ऐसी संभावना है जिसका महत्व कभी भी बहुत बढ़ाकर नहीं आंका जा सकता। फौजों को तब और दूर-दूर की, और आज की अपेक्षा अधिक स्वास्थ्यप्रद, छावनियों में रखा जा सकेगा और बीमारी के कारण जो बहुत सी जानें जाती हैं, उन्हें इस तरह बचा लिया जा सकेगा। तब विभिन्न गोदामों में इतना अधिक सामान रखने की भी जरूरत नहीं होगी और सड़ने-गलने और जलवायु के कारण नष्ट हो जाने से होने वाले नुकसान से भी बचा जा सकेगा। फौजों की कार्य-क्षमता के प्रत्यक्ष अनुपात में उनकी संख्या में भी कमी की जा सकेगी। (क्रमशः)

शनिवार, 18 सितंबर 2010

ईस्ट इंडिया कंपनी, उसका इतिहास और परिणाम- कार्ल मार्क्स

     लॉर्ड स्टैनली के इस प्रस्ताव पर कि भारत के लिए कानून बनाने की बात को स्थगित कर दिया जाए, शाम तक के लिए बहस टाल दी गई है। 1783 के बाद से पहली बार भारतीय प्रश्न इंगलैंड में मंत्रिमंडल के जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है। ऐसा क्यों हुआ?
ईस्ट इंडिया कंपनी की वास्तविक शुरुआत को 1702 के उस वर्ष से पीछे के किसी और युग में नहीं माना जा सकता जिसमें पूर्वी भारत के व्यापार के इजारे का दावा करने वाले विभिन्न संघों ने मिलकर अपनी एक कंपनी बना ली थी। उस समय तक असली ईस्ट इंडिया कंपनी का अस्तित्व तक बार-बार संकट में पड़ जाता था। एक बार, क्रोमवेल के संरक्षण काल में, वर्षों के लिए उसे स्थगित कर दिया गया था; और, एक बार, विलियम तृतीय के शासनकाल में, पार्लियामेंट के हस्तक्षेप के द्वारा उसे बिलकुल ही खतम कर दिए जाने का खतरा पैदा हो गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी के अस्तित्व को पार्लियामेंट ने उस डच राजकुमार के उत्थान काल में तब स्वीकार किया था जब ह्विग लोग ब्रिटिश साम्राज्य की आमदनियों के अहलकार बन गए थे, बैंक ऑफ इंगलैंड का जन्म हो चुका था, इंगलैंड में संरक्षण की व्यवस्था दृढ़ता से स्थापित हो गई थी और यूरोप में शक्ति का संतुलन निश्चित रूप से निर्धारित हो गया था। ऊपर से दिखने वाली स्वतंत्रता का वह युग वास्तव में इजारेदारियों का युग था। एलिजाबेथ और चार्ल्स प्रथम के कालों की तरह, इन इजारेदारियों की सृष्टि शाही स्वीकृतियों के द्वारा नहीं हुई थी, बल्कि उन्हें पार्लियामेंट ने अधिकार प्रदान किया था और उनका राष्ट्रीकरण किया था। इंगलैंड के इतिहास का यह युग वास्तव में फ्रांस के लुई फिलिप के युग से अत्यधिक मिलता-जुलता हैभूस्वामियों का पुराना अभिजात वर्ग पराजित हो गया है और पूंजीपति वर्ग 'वित्तीय प्रभुत्ता' का झंडा उठाए बिना और किसी तरह से उसका स्थान लेने में असमर्थ है। ईस्ट इंडिया कंपनी आम लोगों को भारत के साथ व्यापार करने से वंचित रखती थी, उसी तरह जिस तरह कि कॉमन्स सभा पार्लियामेंट में प्रतिनिधित्व पाने से उन्हें वंचित रखती थी। इस और दूसरे उदाहरणों से हम देखते हैं कि सामंती अभिजात वर्ग के ऊपर पूंजीपति वर्ग की प्रथम निर्णायक विजय के साथ ही साथ जनता के विरुध्द जबरदस्त आक्रमण भी शुरू हो जाता है। इस चीज की वजह से कोबेट जैसे एक से अधिक जन-प्रेमी लेखक जनता की आजादी के लिए भविष्य की ओर देखने के बजाए वर्तमान की ओर देखने को बाध्य हो गए थे।
वैधानिक राजतंत्र और इजारेदार पैसे वाले वर्ग के बीच, ईस्ट इंडिया की कंपनी और  1688 की 'गौरवशाली' क्रांति के बीच एकता उसी शक्ति ने कायम की थी जिसके कारण तमाम कालों और तमाम देशों में उदारपंथी वर्ग और उदार राजवंश मिले और एकताबध्द हुए हैं। यह शक्ति भ्रष्टाचार की शक्ति है जो वैधानिक राजतंत्र को चलाने वाली प्रथम और
अंतिम शक्ति है। विलियम तृतीय की यही रक्षक देवता थी और यही लुई फिलिप का जानलेवा दैत्य था। पार्लियामेंटरी जांचों से यह बात 1693 में ही सामने आ गई थी कि सत्ताशाली व्यक्तियों को दी जाने वाली 'भेंटों' की मद में होने वाला ईस्ट इंडिया कंपनी का सालाना खर्च, जो क्रांति से पहले शायद ही कभी 1,200 पौंड से अधिक हुआ था, अब 90,000 पौंड प्रति वर्ष तक पहुंच गया था। लीड्स के डयूक पर इस बात के लिए मुकदमा चलाया गया था कि उसने 5,000 पौंड की रिश्वत ली थी, और स्वयं धर्मात्मास्वरूप राजा को 10,000 पौंड लेने का अपराधी घोषित किया गया था। इन सीधी रिश्वतों के अलावा, विरोधी कंपनियों को हराने के लिए सरकार को सूद की नीची से नीची दर पर विशाल रकमों के ऋण देने का लालच दिया जाता था और विरोधी डायरेक्टरों को खरीद लिया जाता था।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने सरकार को रिश्वत देकर सत्ता हासिल की थी। उसे कायम रखने के लिए वह फिर रिश्वत देने के लिए मजबूर थी। बैंक ऑफ इंगलैंड ने भी इसी प्रकार सत्ता प्राप्त की थी और अपने को बनाए रखने के लिए वह फिर रिश्वत देने के लिए बाध्य थी। हर बार जब कंपनी की इजारेदारी खतम होने लगती थी तब वह सरकार को नए कर्जे और नई भेंटें देकर ही अपनी सनद को फिर से बढ़वा पाती थी।
सात-वर्षीय युध्द ने ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यावसायिक शक्ति से बदल कर एक सैनिक और प्रदेशीय शक्ति बना दिया था। पूर्व में वर्तमान ब्रिटिश साम्राज्य की नींव उसी वक्त पड़ी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के शेयर की कीमत बढ़ कर तब 263 पौंड हो गई और डिवीडेंड (शेयर पर मुनाफे) 12.5 प्रतिशत की दर से दिए जाने लगे। लेकिन तभी कंपनी का एक नया दुश्मन पैदा हो गया। इस बार वह प्रतिद्वंद्वी संघों के रूप में नहीं, बल्कि प्रतिद्वंद्वी मंत्रियों और एक प्रतिद्वंद्वी प्रजा के रूप में पैदा हुआ था। कहा जाने लगा कि कंपनी के राज्य को ब्रिटिश जहाजी बेड़ों और ब्रिटिश फौजों की मदद से जीतकर कायम किया गया है और ब्रिटिश प्रजा के किन्हीं भी व्यक्तियों को इस बात का अधिकार नहीं है कि वे ताज (बादशाह) से अलग कोई स्वतंत्र राज्य रख सकें। पिछली जीतों के द्वारा जिन 'आश्चर्यजनक खजानों' को हासिल किया गया था उनमें उस समय के मंत्री और उस समय के लोग भी अपने हिस्से का दावा करने लगे। कंपनी अपने अस्तित्व को 1767 में यह समझौता करके ही बचा सकी कि राष्ट्रीय कोष को प्रति वर्ष वह 4,00,000 पौंड दिया करेगी।
लेकिन, इस समझौते को पूरा करने के बजाए ईस्ट इंडिया कंपनी स्वयं आर्थिक कठिनाइयों में फंस गई और अंगरेजी प्रजा को नजराना देने की जगह, आर्थिक सहायता के लिए पार्लियामेंट को उसने अर्जी दी। इस कदम का फल यह हुआ कि कंपनी की सनद में गंभीर परिवर्तन कर दिए गए। लेकिन नई शर्तों के बावजूद कंपनी के मामलों में सुधार न हुआ, और लगभग इसी समय, अंगरेजी राष्ट्र के उत्तरी अमरीका वाले उपनिवेशों के हाथ से निकल जाने के कारण, अन्य किसी स्थान पर किसी विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य को हासिल करने की आवश्यकता को सब लोगों द्वारा अधिकाधिक महसूस किया जाने लगा।
1783 में नामी मि. फॉक्स ने सोचा कि अपने प्रसिध्द भारतीय बिल को पार्लियामेंट में ले आने का अब उपयुक्त अवसर आ गया है। इस बिल में प्रस्ताव किया गया था कि डायरेक्टरों और मालिकों के कोर्टों (संचालक समितियों) को खतम कर दिया जाए और संपूर्ण भारतीय सरकार की जिम्मेदारी पार्लियामेंट द्वारा नियुक्त किए गए सात कमिश्नरों के हाथों में सौंप दी जाए। लाड्र्स सभा के ऊपर उस समय के दुर्बल राजा* के निजी प्रभाव के कारण मि. फॉक्स का बिल गिर गया; और उसी को आधार बनाकर फॉक्स और लार्ड नौर्थ की तत्कालीन मिली-जुली सरकार को भंग कर दिया गया और प्रसिध्द पिट को सरकार का मुखिया बना दिया गया। पिट ने 1784 में दोनों सदनों से एक बिल पास कराया जिसमें आदेश दिया गया था कि प्रिवी कौंसिल के 6 सदस्यों का एक नियंत्रण बोर्ड स्थापित किया जाए जिसका काम होगा :
ईस्ट इंडिया कंपनी की अमलदारियों और मिल्कियतों के नागरिक और फौजी शासन, अथवा आमदनियों से किसी भी प्रकार से संबंधित उसके तमाम कार्यों, कार्रवाइयों और मामलों पर नजर रखना, उनकी देखभाल करना और उन पर नियंत्रण रखना।
इस विषय में इतिहासकार मिल कहते हैं :
उक्त कानून को पास करते समय दो उद्देश्य सामने रखे गए थे। उस अभियोग से बचने के लिए जिसे मि. फॉक्स के बिल का घृणित लक्ष्य बताया गया था। आवश्यक था कि ऊपर से ऐसा लगे कि सत्ता का मुख्यांश डायरेक्टरों के ही हाथ में है। लेकिन, मंत्रियों के लाभ के लिए आवश्यक था कि वास्तव में सारी सत्ता डायरेक्टरों के हाथ से छीन ली जाए। अपने प्रतिद्वंद्वी के बिल से मिस्टर पिट का बिल अपने को मुख्यतया इसी बात में भिन्न बताता था कि जहां उसमें डायरेक्टरों की सत्ता को खतम कर दिया गया था, इसमें उसे लगभग पूरा का पूरा बनाए रखा गया था। मि. फॉक्स के कानून के अंतर्गत एलानिया तौर से मंत्रियों की सत्ता कायम हो जाती। मि. फिट के कानून के मातहत उसे छिपाकर और छल-कपट से हाथ में ले लिया गया था। फॉक्स का बिल कंपनी की सत्ता को पार्लियामेंट के द्वारा नियुक्त किए गए कमिश्नरों के हाथ में सौंप देता। मि. पिट के बिल ने उसे राजा द्वारा नियुक्त कमिश्नरों के हाथ में सौंप दिया।
इस प्रकार 1783-84 के वर्ष ही प्रथम, और अब तक, एकमात्र, ऐसे वर्ष रहे हैं जिनमें भारत का सवाल मंत्रिमंडल के स्वयं के अस्तित्व का सवाल बन गया है। मि. पिट के बिल के पास हो जाने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी की सनद को फिर जारी कर दिया गया और भारतीय सवाल को 20 साल तक के लिए खतम कर दिया गया। लेकिन, 1813 में शुरू हुए
जैकोबिन-विरोधी युध्द और 1833 में नए-नए पेश किए जाने वाले सुधार बिल ने अन्य तमाम राजनीतिक प्रश्नों को गौण बना दिया।
तब फिर, 1784 से पहले और उसके बाद से भारत का सवाल एक बड़ा राजनीतिक सवाल क्यों नहीं बन सका, इसका प्रथम कारण यही है कि उससे पहले आवश्यक था कि ईस्ट इंडिया कंपनी अपने अस्तित्व और महत्व को हासिल करे। इसके हो जाने के बाद कंपनी की उस तमाम सत्ता को, जिसे जिम्मेदारी अपने ऊपर लिए बिना वह अपने हाथों में ले सकता था, शासक गुट ने अपने पास समेट लिया था। और, इसके बाद, सनद के फिर जारी किए जाने के जब अवसर आए, 1813 और 1833 में, तब आम अंगरेज लोग सर्वाधिक हित के दूसरे सवालों में बुरी तरह उलझे हुए थे।
अब हम एक दूसरे पहलू से विचार करेंगे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने काम की शुरुआत केवल इस बात की कोशिश से की थी कि अपने एजेटों के लिए फैक्टरियां और अपने मालों को रखने के लिए जगहों की वह स्थापना करे। इनकी हिफाजत के लिए कंपनी वालों ने कई किले बना लिए। भारत में राज्य कायम करने और जमीन की मालगुजारी को अपनी आमदनी का एक जरिया बनाने की बात की कल्पना ईस्ट इंडिया कंपनी के लोगों ने यद्यपि बहुत पहले, 1689 में ही, की थी; लेकिन 1744 तक, बंबई, मद्रास और कलकत्ता के आसपास केवल कुछ महत्वहीन जिले ही वे हासिल कर पाए थे। इसके बाद कर्नाटक में जो युध्द छिड़ गया था, उसके परिणामस्वरूप, विभिन्न लड़ाइयों के बाद, भारत के उस भाग के भी वे लगभग एकछत्र स्वामी बन गए थे। बंगाल के युध्द और क्लाइव की जीतों से उन्हें और भी अधिक लाभ हुए। बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर उनका वास्तविक कब्जा हो गया। 18वीं शताब्दी के अंत में और वर्तमान शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में टीपू सुलतान के साथ होने वाले युध्द आए। इनके परिणामस्वरूप सत्ता और नायवी की व्यवस्था का बहुत व्यापक विस्तार हुआ। 19वीं शताब्दी के दूसरे दशक में सीमांत के प्रथम सुविधाजनक प्रदेश को, रेगिस्तान के अंदर भारत के सीमांत को आखिरकार जीत लिया गया। इससे पहले पूर्व में एशिया के उन भागों तक ब्रिटिश साम्राज्य नहीं पहुंचा था जो तमाम कालों में भारत की प्रत्येक महान केंद्रीय सत्ता की राजधानी रहे थे। लेकिन साम्राज्य के सबसे भेद्य स्थल के, उस स्थल के जहां से उसके ऊपर उतनी ही बार हमले हुए थे जितनी बार पुराने विजेताओं को नए विजेताओं ने निकाल बाहर किया था, यानी देश की पश्चिमी सरहद के नाके अंगरेजों के हाथों में नहीं थे। 1838 से 1849 के काल में, सिख और अफगान युध्दों के द्वारा, पंजाब और सिंध पर जबरदस्ती कब्जा करके, ब्रिटिश शासन ने पूर्वी भारत के महाद्वीप की जातीय, राजनीतिक, और सैनिक सरहदों को भी निश्चित रूप से अपने अधीन कर लिया। मध्य एशिया से आने वाली किसी भी ताकत को खदेड़ने के लिए और फारस (ईरान) की सरहदों की ओर बढ़ते हुए रूस को रोकने के लिए ये अधिकार नितांत आवश्यक थे। इस पिछले दशक के दौरान ब्रिटेन के भारतीय प्रदेश में 1, 67,000 वर्ग मील का रकबा, जिसमें
85,72,630 लोग रहते हैं, और जुड़ गया है। जहां तक देश के अंदर की बात है, तो तमाम देशी रियासतें अब ब्रिटिश अमलदारियों से घिर गई हैं; किसी न किसी रूप में वे ब्रिटेन की सत्ता के मातहत हो गई हैं; और, केवल गुजरात और सिंध को छोड़कर वे समुद्र तट से काट दी गई हैं। जहां तक बाहर का सवाल है, भारत अब खतम हो गया है। 1849 के बाद से केवल एक महान एंग्लो-इंडियन साम्राज्य का अस्तित्व ही वहां रह गया है।
इस भांति, कंपनी के नाम के नीचे ब्रिटिश सरकार दो शताब्दियों से तब तक लड़ती आई है जब तक कि आखिरकार भारत की प्राकृतिक सरहदें खतम नहीं हो गईं। अब हम समझ सकते हैं कि इस पूरे काल में इंगलैंड की तमाम पार्टियां खामोशी से नजर नीची किए क्यों बैठी हैंवे भी जिन्होंने संकल्प कर रखा था कि भारतीय साम्राज्य की स्थापना का कार्य पूरा हो जाने के बाद कपटी शांति की बनावटी बातें बनाकर वे खूब हल्ला मचाएंगी। अपनी उदार परोपकारिता दिखलाने के लिए आवश्यक था कि पहले वे उसे किसी तरह हथिया तो लें! इस नजरिए से देखने पर हम समझ सकते हैं कि इस वर्ष, 1853 में, सनद के दोबारा जारी किए जाने के पुराने जमानों की तुलना में, भारतीय सवाल की स्थिति क्यों बदल गई है।
फिर, हम एक और पहलू पर विचार करें। भारत के साथ ब्रिटेन के व्यापारिक संबंधों के विकास की विभिन्न मंजिलों के सिंहावलोकन से उससे संबंधित कानून के अनोखे संकट को हम और भी अच्छी तरह समझ सकेंगे।
एलिजाबेथ के शासनकाल में, ईस्ट इंडिया कंपनी की कार्रवाइयों के प्रारंभ में, भारत के साथ लाभदायक ढंग से व्यापार चलाने के लिए कंपनी को इस बात की इजाजत दे दी गई थी कि चांदी, सोने और विदेशी मुद्रा के रूप में 30,000 पौंड तक के मूल्य की वस्तुओं का वार्षिक निर्यात वह कर ले। यह चीज उस युग के तमाम पूर्वग्रहों के विरुध्द जाती थी और इसीलिए टॉमस मुन इस बात के लिए मजबूर हो गया था कि ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ इंगलैंड के व्यापार का एक विवेचन पेश कर वह 'व्यापारिक व्यवस्था' के आधारों को निर्धारित कर दे। इसमें उसने स्वीकार किया था कि बहुमूल्य धातुएं ही किसी देश की सच्ची संपदा होती हैं; लेकिन, इसके बावजूद, साथ ही साथ उसने कहा था कि बिना किसी नुकसान के उनका निर्यात होने दिया जा सकता है बशर्ते कि बाकी अदायगी निर्यात करने वाले राष्ट्र के अनुकूल हो। इस दृष्टि से, उसका कहना था कि ईस्ट इंडिया से जो माल आयात किए जाते थे, उन्हें मुख्यतया दूसरे देशों को फिर से निर्यात कर दिया जाता था जिससे भारत में उनका मूल्य चुकाने के लिए जितने सोने की जरूरत पड़ती थी उससे कहीं अधिक सोना प्राप्त हो जाता था। इसी भावना के अनुरूप सर जोशिया चाइल्ड ने भी एक पुस्तक लिखी जिसमें सिध्द किया गया है कि ईस्ट इंडिया के साथ किया जाने वाला व्यापार तमाम विदेशी व्यापारों में सबसे अधिक राष्ट्रीय है। धीरे-धीरे ईस्ट इंडिया कंपनी के समर्थक अधिक उध्दत होते गए और, भारत के इस विचित्र इतिहास के दौर में एक अचंभे
के रूप में देखा जा सकता है कि इंगलैंड में सबसे पहले मुक्त व्यापार के जो उपदेशक थे, वही अब भारतीय व्यापार के इजारेदार बन गए थे।
सत्रहवीं शताब्दी के अंतिम और अठारहवीं शताब्दी के अधिकांश भाग में, जिस समय यह कहा जा रहा है कि ईस्ट इंडिया से मंगाए जाने वाले सूती और सिल्क के सामानों के कारण ब्रिटेन के गरीब कारखानेदार तबाह हुए जा रहे हैं, उसी समय ईस्ट इंडिया कंपनी के संबंध में पार्लियामेंट से हस्तक्षेप करने की फिर मांग की जा रही थी। और यह मांग की जा रही थी व्यापारी वर्ग की ओर से नहीं, बल्कि स्वयं औद्योगिक वर्ग की ओर से। जॉन पोलैक्सफेन की रचना, इंगलैंड और ईस्ट इंडिया के असंगत विनिर्माण, लंदन, 1697, में यही राय दी गई थी। इस रचना का शीर्षक डेढ़ शताब्दी बाद विचित्र रूप से सही सिध्द हुआ थालेकिन एक बिलकुल ही दूसरे अर्थ में। इसके बाद पार्लियामेंट ने जरूर हस्तक्षेप किया। विलियम तृतीय के शासनकाल में 10वें अध्याय के ग्यारहवें और बारहवें कानूनों द्वारा यह तय कर दिया गया कि हिंदुस्तान, ईरान और चीन की कृत्रिम सिल्कों और छपी या रंगी छीटों के पहनने पर रोक लगा दी जाए और उन तमाम लोगों पर जो इन चीजों को रखते या बेचते हैं, 200 पौंड का जुर्माना किया जाए। बाद में इतने 'ज्ञानी' बनने वाले ब्रिटिश कारखानेदारों के बार-बार रोने-धोने के परिणामस्वरूप इसी तरह के कानून जॉर्ज प्रथम, द्वितीय और तृतीय के शासनकाल में भी बना दिए गए थे और, इस भांति, अठारहवीं शताब्दी के अधिकांश में, भारत का बना माल इंगलैंड में आम तौर से इसलिए मंगाया जाता था कि उसे यूरोप में बेचा जा सके। पर इंगलैंड के बाजार से उसे दूर ही रखा जाता था।
ईस्ट इंडिया कंपनी के मामलों में इस पार्लियामेंटरी दखलंदाजी के अलावाजो देश के लालची कारखानेदारों ने करवाईउसकी सनद के दोबारा जारी किए जाने के हर अवसर पर लंदन, लिवरपूल और ब्रिस्टल के व्यापारियों द्वारा यह कोशिश भी की जाती थी कि कंपनी की व्यापारिक इजारेदारी को खतम कर दिया जाए और उस व्यापार में, जिसमें सोना बरसता दिखाई देता था, हिस्सा बंटा लिया जाए। इन कोशिशों के फलस्वरूप, 1773 के उस कानून में, जिसके द्वारा कंपनी की सनद को 1 मार्च 1814 तक के लिए फिर बढ़ा दिया गया था, एक धारा ऐसी भी जोड़ दी गई थी जिसके अंतर्गत ब्रिटेन के गैर-सरकारी लोगों को इंगलैंड से लगभग सभी प्रकार के मालों का निर्यात करने और कंपनी के भारतीय नौकरों को इंगलैंड में उनका निर्यात करने की अनुमति मिल गई थी। लेकिन इस छूट को देने के साथ-साथ, निजी व्यापार करने वाले व्यापारियों द्वारा ब्रिटिश भारत में माल भेजे जाने के संबंध में ऐसी शतर्ें लगा दी गई थीं जिनसे कि इस छूट से होने वाले फायदे एकदम खतम हो जाते थे। 1813 में कंपनी आम व्यापारियों के दबाव का और अधिक सामना कर सकने में असमर्थ हो गई; और चीनी व्यापार की इजारेदारी तो बनी रही, लेकिन भारत के साथ व्यापार करने की छूट कुछ शर्तों के साथ निजी व्यापारियों को मिल गई। 1833 में जब फिर सनद जारी की जाने लगी तो ये अंतिम प्रतिबंध भी आखिरकार खतम कर दिए गए। कंपनी
को किसी भी तरह का व्यापार करने से रोक दिया गया। उसके व्यापारिक रूप का अंत कर दिया गया, और भारतीय प्रदेश से ब्रिटिश प्रजाजनों को दूर रखने के उसके विशेषाधिकार को उससे छीन लिया गया।
इसी बीच ईस्ट इंडिया के साथ होने वाले व्यापार में अत्यंत क्रांतिकारी परिवर्तन हो गए थे जिनसे कि इंगलैंड के विभिन्न वर्गों की स्थिति उसके संबंध में एकदम बदल गई थी। पूरी अठारहवीं शताब्दी के दौर में जो विशाल धनराशि भारत से इंगलैंड लाई गई थी, उसका बहुत ही थोड़ा भाग व्यापार के द्वारा प्राप्त हुआ था, क्योंकि तब व्यापार अपेक्षाकृत महत्वहीन था। उसका अधिकतर उस देश के प्रत्यक्ष शोषण के द्वारा और उन विशाल व्यक्तिगत संपत्तियों के रूप में हासिल हुआ था जिन्हें जोर जबरदस्ती से इकट्ठा करके इंगलैंड भेज दिया गया था। 1813 में व्यापार का मार्ग खुल जाने के बाद बहुत ही थोड़े समय के अंदर भारत के साथ होने वाला व्यवसाय तीन गुने से भी अधिक बढ़ गया। लेकिन बात इतनी ही नहीं थी। व्यापार का पूरा चरित्र ही बदल गया था। 1813 तक भारत मुख्यतया निर्यात करने वाला देश था, पर अब वह आयात करने वाला देश बन गया था। यह परिवर्तन इतनी तेजी से हुआ था कि 1823 में ही विनिमय की दर, जो आम तौर से 2 शिलिंग 6 पेंस फी रुपया थी, गिर कर 2 शिलिंग फी रुपया हो गई। भारत कोजो अनादि काल से सूती कपड़े के उत्पादन के संबंध में संसार की महान उद्योगशाला बना हुआ थाअब अंगरेजी सूत और सूती कपड़ों से पाट दिया गया। उसके अपने उत्पादन के इंगलैंड में प्रवेश पर रोक लगा दी गई या अगर उसे वहां आने भी दिया गया तो बहुत ही कठिन शर्तों पर। और इसके बाद, स्वयं उसे थोड़ी सी और नाममात्र की चुंगी लगाकर ब्रिटेन के बने माल से पाट दिया गया। इसके फलस्वरूप उस देश में उन सूती कपड़ों का बनना, जो कभी इतने प्रसिध्द थे, खतम हो गया। 1780 में ब्रिटेन के तमाम उत्पादन का मूल्य केवल 3,86,152 पौंड था; उसी साल जो सोना वहां से निर्यात किया गया था उसका मूल्य 15,041 पौंड था और 1780 में जो निर्यात हुआ था उसका कुल मूल्य 1,26,48,616 पौंड था। इस तरह भारत के साथ होने वाला व्यापार ब्रिटेन के कुल विदेशी व्यापार के केवल 132 के बराबर था। 1850 में ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड से भारत को निर्यात किए जाने वाले कुल माल की कीमत 80,24,000 पौंड हो गई थी। इसमें केवल सूती कपड़े की कीमत 52,20,000 पौंड थी। इस तरह भारत को भेजा जाने वाला माल उसके कुल निर्यात के 18 भाग से अधिक हो गया था और उसके सूती कपड़े के विदेशी व्यापार के 14 भाग से अधिक। लेकिन कपड़े का उद्योग अब ब्रिटेन की 18 आबादी को अपना रोजगार मुहैया कर रहा था और संपूर्ण राष्ट्रीय आय का 112 हिस्सा केवल उसी से प्राप्त होता था। प्रत्येक व्यापारिक संकट के बाद, भारत के साथ होने वाला व्यापार ब्रिटेन के सूती कपड़े के उद्योगपतियों के लिए अधिकाधिक महत्व की वस्तु बनता गया और पूरब का भारतीय महाद्वीप उनका सबसे अच्छा बाजार बन गया।
जिस रफ्तार से ग्रेट ब्रिटेन के संपूर्ण सामाजिक ढांचे के लिए सूती कपड़े का निर्माण बुनियादी महत्व की चीज बन गया था, उसी रफ्तार से ब्रिटेन के सूती कपड़े के उद्योग के लिए पूर्वी दुनिया में भारत भी बुनियादी महत्व का केंद्र बन गया।
उस समय तक उन थैलीशाहों के स्वार्थ, जिन्होंने भारत को उस शासक गुट की जागीर बना लिया था जिसने अपनी फौजों के द्वारा उसको फतह किया था, उन मिल-मालिकों के स्वार्थों के साथ-साथ चलते आए थे जिन्होंने उसे अपने कपड़ों से पाट दिया था। लेकिन औद्योगिक स्वार्थ भारत के बाजार के ऊपर जितने ही अधिक निर्भर होते गए, वे उतने ही अधिक इस बात की आवश्यकता अनुभव करते गए कि भारत के राष्ट्रीय उद्योग को तबाह कर चुकने के बाद अब उन्हें भारत में नई उत्पादक शक्तियों की सृष्टि करनी चाहिए। किसी देश को अपने माल से आप बराबर पाटते नहीं जा सकते जब तक कि उसे भी आप बदले में कोई उपज देने योग्य न बना दें। औद्योगिक मालिकों को लगा कि उनका व्यापार बढ़ने की जगह घट गया था। 1846 से पहले के चार वर्षों में ग्रेट ब्रिटेन से जो माल भारत भेजा गया था, उसका मूल्य 26 करोड़ 10 लाख रुपया था; 1850 से पहले के चार वर्षों में केवल 25 करोड़ 30 लाख रुपयों का माल वहां भेजा गया था; और भारत से ब्रिटेन में जो माल आया था उसका मूल्य पहले वाले काल में 27 करोड़ 40 लाख रुपए के बराबर और बाद के काल में 25 करोड़ 40 लाख रुपए के बराबर था। उन्होंने देखा कि भारत में उनके माल की खपत की ताकत निम्नतम स्तर पर पहुंच गई थी। ब्रिटिश वेस्ट इंडीज में उनके मालों की खपत का मूल्य जनसंख्या के प्रति व्यक्ति पर प्रति वर्ष लगभग 14 शिलिंग था। चिली में 9 शिलिंग 3 पेंस, ब्राजील में 6 शिलिंग 5 पेंस, क्यूबा में 6 शिलिंग 2 पेंस, पेरू में 5 शिलिंग 7 पेंस, मध्य अमरीका में 10 पेंस और भारत में उसका मूल्य मुश्किल से लगभग 9 पेंस था। उसके बाद अमरीका में कपास की फसल का अकाल आया जिससे 1850 में उन्हें 1 करोड़ 10 लाख पौंड का नुकसान हुआ। ईस्ट इंडीज से कच्ची कपास मंगाकर अपनी जरूरत को पूरा करने के बजाए अमरीका पर निर्भर रहने की अपनी नीति से वे ऊब उठे। इसके अलावा, उन्होंने यह भी देखा कि भारत में पूंजी लगाने की उनकी कोशिशों के मार्ग में भारतीय अधिकारी रुकावटें पैदा करते थे और छल-कपट से काम लेते थे। इस भांति, भारत एक रक्षण-क्षेत्र बन गया जिसमें एक तरफ औद्योगिक स्वार्थ थे और दूसरी तरफ थैलीशाह और शासक गुट के लोग। उद्योगपति, जिन्हें इंगलैंड में अपनी बढ़ती हुई शक्ति का पूरा एहसास है, अब मांग कर रहे हैं कि भारत की इन विरोधी ताकतों का एकदम खातमा कर दिया जाए, भारतीय सरकार प्राचीन अपने अधिकारी तंत्र के ताने-बाने को पूर्णतया नष्ट कर दे और ईस्ट इंडिया कंपनी की अंतिम क्रिया कर दी जाए।
और अब हम उस चौथे और अंतिम पहलू को लें जिससे भारतीय सवाल को देखा जाना चाहिए। 1784 से भारत की वित्तीय व्यवस्था कठिनाई के दलदल में अधिकाधिक गहरे फंसती गई है। अब वहां 5 करोड़ पौंड का राष्ट्रीय कर्जा हो गया है, आमदनी के साधन

लगातार घटते जा रहे हैं, और खर्चा उसी गति से बढ़ता जा रहा है। अफीम कर की अनिश्चित आय के द्वारा इस खर्च को संदिग्ध रूप से पूरा करने की कोशिश की जा रही है। पर अब यह अफीम कर की आमदनी भी खतरे में है, क्योंकि चीनियों ने स्वयं पोस्त (अफीम) की खेती शुरू कर दी है। दूसरी तरफ निरर्थक बर्मी युध्द में जो खर्च होगा, उससे यह संकट और भी गहरा हो जाएगा।
मि. डिकिंसन कहते हैं : परिस्थिति यह है कि जिस तरह भारत में अपने साम्राज्य को खो देने पर इंगलैंड तबाह हो जाएगा, उसी तरह उसे अपने कब्जे में बनाए रखने के लिए वह स्वयं हमारी वित्तीय व्यवस्था को तबाही की ओर लिए जा रहा है।
इस तरह मैंने दिखला दिया है कि 1783 के बाद पहली बार भारत का सवाल किस तरह इंगलैंड का और मंत्रिमंडल का सवाल बन गया है।
कार्ल मार्क्स द्वारा 24 जून 1853    
को लिखा गया।      
11 जुलाई 1853 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 3816, में प्रकाशित हुआ।



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