माफिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
माफिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 14 अप्रैल 2013

पश्चिम बंगाल के माफियातंत्र के सामने बौने लग रहे हैं भद्रलोकनेता

विगत शुक्रवार को प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में चांसलर और राज्य के राज्यपाल एम.के नारायणन ने छात्रों से कैम्पस में हुई तोड़फोड़ और हिंसा से छात्रों की रक्षा न कर पाने के लिए माफी मांगी। चांसलर का स्वर पीड़ा से भरा था लेकिन वे भरोसा पैदा नहीं कर पा रहे थे।कायदे से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को माफी मांगनी चाहिए लेकिन यह काम राज्यपाल से कराया गया।


प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में टीएमसी के कार्यकर्त्ताओं ने बुधवार को प्रतिवाद करते हुए हिंसा का ताण्डव किया ,कैम्पस में गेट का ताला तोड़कर प्रवेश किया,छात्र-छात्राओं पर हमले किए, ऐतिहासिक बेकर लैव में जाकर तोड़फोड़ की। उपकुलपति मालविका सरकार ने इस हिंसक ताण्डव को अपनी आंखों से देखा, रजिस्ट्रार ने पुलिस से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया लेकिन पुलिस मूकदर्शक बनी रही।


उल्लेखनीय है 9 अप्रैल को दिल्ली में योजना आयोग भवन के अहाते में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके साहयोगी मंत्रियों के खिलाफ एसएफआई ने प्रदर्शन किया था वे मांग कर रहे थे सुदीप्त गुप्ता की पुलिस कस्टैडी में हुई मौत की न्यायिक जांच करायी जाय, उस समय किन्हीं कारणों से एसएफआई कार्यकर्त्ता उत्तेजित हो गए और उन्होंने ममता बनर्जी और उनके सहयोगी मंत्रियों के साथ धींगामुश्ती की,हमला किया,जिसमें राज्य के वित्तमंत्री के कपड़े फट गए और उनको सिर में चोट भी आई। यह निंदनीय घटना थी और लोकतांत्रिक प्रतिवाद की सभी घोषित प्रतिज्ञाओं का खुला उल्लंघन भी। इस घटना के समय मौके पर आंदोलनकारियों में माकपा का दिल्ली नेतृत्व मौजूद था। स्वयं माकपा के राज्यसचिव और एसएफआई के महासचिव जुलूस में मौजूद थे,इसके बाबजूद इस तरह की अशोभनीय घटना घटी। इस घटना के तत्काल बाद समूचे पश्चिम बंगाल में टीएमसी के कार्यकर्त्ताओं ने माकपा के दफ्तरों पर हमले किए,तोड़फोड़ की,आग लगायी।


यहां पर यह उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल में 34 साल के वामशासन में कभी भी मुख्यमंत्री के ऊपर शारीरिक हमला नहीं किया गया,यहां तक कि दिल्ली में भी कभी ज्योति बसु या बुद्धदेव भट्टाचार्य के खिलाफ हिंसक प्रतिवाद उनके विरोधियों ने नहीं किया। जबकि वामशासन में विपक्ष के हजारों कार्यकर्ताओं की माकपा के लोगों के हाथों मौत हुई है। एसएफआई का दिल्ली में हिंसक प्रतिवाद निंदनीय है । इस प्रतिवाद से पता चलता है कि माकपा के अंदर असहिष्णुता और हिंसा की दीमक लग चुकी है। माकपा ने जल्द ही इसका समाधान नहीं खोजा तो जिस तरह हिन्दीभाषी राज्यों में माकपा अस्तित्वहीन हो गयी है कालान्तर में पश्चिम बंगाल में भी उसके अस्तित्वहीन हो जाने का खतरा है। आज स्थिति यह है कि ममता के कुशासन के बाबजूद माकपा पर जनता विश्वास नहीं करती।


9अप्रैल के दिल्लीकांड ने एक अन्य संदेश दिया है कि पश्चिम बंगाल इनदिनों अपने विलोम में जी रहा है। एक जमाना था जब बंगाली समाज शांतिप्रिय, विद्वत्तापसंद, राजनीतिक सचेतन और लोकतंत्र पसंद था। यही चेतना यहां के राजनेताओं में थी। लेकिन इनदिनों यह राज्य एकदम विलोम अवस्था में जी रहा है।


इनदिनों बंगाल का अर्थ है अशांत और असामान्य राज्य। यहां लंपट कल्चर ने सभ्य -लोकतांत्रिक संस्कृति को पदस्थ कर दिया है। नियमहीनता इस राज्य का प्रधान मूल्य है। राजनीति से लेकर प्रशासन के विभिन्न स्तरों और विभागों तक, शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य-उद्योग और जनसेवा के क्षेत्रों तक नियमहीनता और धन वसूली ने अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है।


वामशासन में पार्टी के आदेश पर काम होता था इनदिनों घूस के आदेश पर काम होता है। वामशासन में हिंसा थी इनदिनों अराजकता है। वामशासन में सत्ता पक्ष और विपक्ष में संवादहीनता और निजी हिंसा थी इनदिनों संवादहीनता और सामाजिक हिंसा है। पश्चिम बंगाल में जिस तरह के हालात बन गए हैं उसमें शांति या सामान्य स्थिति की निकट भविष्य में संभावनाएं नजर नहीं आतीं।


चौंतीस साल के वामशासन के अवसान के बाद यह माना जा रहा था कि राज्य में हिंसा ,बमबाजी, तोड़फोड़, धमकी देना,धन वसूलना आदि बंद होगा लेकिन अब यह सब स्वप्न लगता है। समूची राजनीति को उत्पाती मानसिकता ने घेर लिया है।


पश्चिम बंगाल का सामान्य फिनोमिना है उलटा चलो। उलटा चलो या उलटा करो की संस्कृति तब पैदा होती है जब कान बंद हो जाएं,आंखों से दिखाई न दे और बुद्धि का आंख-कान में संबंध खत्म हो जाय। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर विमान बसु तक सभी में उलटा चलो की संस्कृति को सहज ही देखा जा सकता है।


उल्लेखनीय है पश्चिम बंगाल में हिंसा की संस्कृति को कांग्रेस ने रोपा,नक्सलियों ने सींचा,माकपा ने हिंसा के खेतों की रखवाली की और इसकी कई फसलें उठायीं और इनदिनों ममता सरकार उसी हिंसा की फसल के आधार पर अपने राजनीतिक कद का विस्तार करना चाहती हैं।


हिंसा के आधार पर राजनीति कद का विस्तार करने की कला का बीजवपन कांग्रेस ने 1971-72 में किया था,कालान्तर में इस फसल से राजनीतिक लाभ लेने की सभीदलों ने कोशिश की। हिंसा के आधार पर राजनीतिक लाभ लेने के चक्कर में कांग्रेस का यहां अस्तित्व समाप्त हो गया और अब वामदलों का जनाधार तेजी से सिकुड़ रहा है,कालान्तर में ममता और उनके दल को भी अप्रासंगिक होना पड़ेगा। ऐसी अवस्था में राज्य में अपराधी गिरोहों की गुटबाजी में राज्य की राजनीति में फंसकर रह जाएगी।


राजनीतिक दलों के हिंसक होने का अर्थ है माफियातंत्र की प्रतिष्ठा। लोकतंत्र में हिंसा तात्कालिक बढ़त देती है लेकिन दीर्घकालिक तौर पर अप्रासंगिक बना देती है। दुर्भाग्य से पश्चिम बंगाल इन दिनों भद्रलोक से निकलकर माफियालोक की ओर जा रहा है। माफिया गिरोहों के सामने माकपा से लेकर टीएमसी तक सभी बौने नजर आ रहे हैं। माफिया गिरोह जिस तरफ इच्छा होती है उधर चीजों को मोड़ रहे हैं। माफिया मानसिकता ने विगत दो दशक पहले माकपा के पार्टीतंत्र में प्रवेश किया था और आज वह पूरे समाज में छायी हुई है।आज सभी दल इसके सामने नतमस्तक हैं।

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

पश्चिम बंगाल की शिक्षा में बाहुबलियों की जंग के निहितार्थ

पश्चिम बंगाल के शिक्षाजगत में वफादारों और बाहुबली गिरोहों में जंग छिड़ी हुई है। राज्य में छात्रसंघ चुनावों का सच है कि वाम छात्र संगठन अपने विरोधी को नामांकन जमा नहीं करने देते। फलतःहिंसा हो रही है। एक-दूसरे पर हिंसक हमले किए जा रहे हैं। मीडिया प्रबंधन ने हिंसा को अर्थहीन और रूटिन घटना में तब्दील कर दिया है। हिंसा करने वाले शर्मिंदा होने की बजाय गर्वित महसूस कर रहे हैं। बढ़-चढ़कर बयान दे रहे हैं। असल में शिक्षा में नंदीग्राम के प्रेत घुस आए हैं। इन प्रेतों के हमलों के कारण ही हावड़ा के अंदूल में एक छात्र की मौत हो गयी, एक छात्र को अपनी आंखों से हाथ धोना पड़ा। नंदीग्राम के प्रेत किसी एक दल में नहीं है बल्कि एकाधिक दलों में हैं। इनकी पद्धति है  शिक्षामंदिरों में नंदीग्राम की तर्ज पर नकली मसले उठाना और हिंसा करना। पश्चिम बंगाल के विभिन्न कॉलेज और विश्वविद्यालयों में नंदीग्राम के प्रेत जिस तरह हिंसाचार कर रहे हैं उसने उच्चशिक्षा से लेकर प्राथमिक शिक्षा तक सभी स्तरों पर अराजकता ,भय और असुरक्षा के वातावरण की सृष्टि की है। सारे राज्य में विवेकहीन बहादुरी के नारे के आधार पर हिंसा का तांडव चल रहा है। इसके कारण अपराधी गिरोहों की बल्ले-बल्ले हो गयी है। भय और असुरक्षा का वातावरण बना है।
    विवेकहीन बहादुरी की राजनीति पहले हाशिए पर थी आज केन्द्र में है। पश्चिम बंगाल में उच्चशिक्षा का स्तर देश के विभिन्न राज्यों से कईगुना बेहतर है। परीक्षाएं और कक्षाएं समय पर होती है। परीक्षाफल समय पर निकलते हैं। उच्चशिक्षा की कक्षाओं में पढ़ने वाले छात्र भरे रहते हैं। कम फीस ली जाती है। विभिन्न विषयों में सालाना भर्ती होने वाले छात्रों की संख्या बढ़ी है। चंद अपवादों को छोड़कर शिक्षा संबंधी सभी फैसले नियमों के आधार पर लिए जाते हैं। शिक्षा में शांति का वातावरण है। लेकिन कुछ सालों से शिक्षा विवेकहीन बहादुरों के निशाने पर है।
   विवेकहीन बहादुरों का मानना है शिक्षा में राजनीति नहीं चलेगी। यह नकारात्मक माफिया नारा है। इसके बहाने शिक्षा के लोकतांत्रिक ढ़ांचे पर भीतर और बाहर से हमले हो रहे हैं। वामदल अंदर से हमले कर रहे हैं तो गैर वामदल बाहर से हमले कर रहे हैं। दोनों उत्तेजक नारे और नकली मांगों के आधार पर सीधे एक्शन में हैं। यह सिलसिला विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में देखा जा सकता है।दोनों पक्ष सीधे एक्शन में हैं।  सीधे एक्शन का अर्थ है तोड़फोड़,मारपीट, धमकी, हिंसा, बमबाजी आदि। इसका मकसद है शिक्षादखल। शिक्षादखल माफिया फंडा है। इससे शिक्षा माफिया पैदा होगा। अनुयायी और माफिया दोनों की राजनीति का यही मूल साझा लक्ष्य है। दोनों एक-दूसरे को हिंसा के हथियार से मारना चाहते हैं। एकबार हिंसा या विवेकहीन बहादुरी का फिनोमिना युवाओं के दिमाग में घुस गया तो बाद में उससे समूची शिक्षा व्यवस्था को ही खतरा पैदा हो जाएगा। चाकू और बम की नोंक पर चुनाव जीतने वाले कितनी भी जेनुइन मांगें उठाएं अंततः सारे फैसले चाकू की नोंक पर ही होंगे। इन दिनों सुनियोजित ढ़ंग से कॉलेज और विश्वविद्यालयों के आसपास जितने भी विभिन्न दलों के पार्टी दफ्तर हैं उनमें काम करने वाले सक्रिय कार्यकर्ता ऐसे लोगों को रखा गया है जो बाहुबली हैं। जिनका अपराधी अतीत है। ये छात्रों-शिक्षकों और कर्मचारियों में भय और आतंक की सृष्टि कर रहे हैं।  
   राज्य की शहरी आम राजनीति का मूलाधार है छात्र राजनीति । पश्चिम बंगाल के अर्द्घ-फासी आतंक के हिंसक माहौल को नष्ट करके सामान्य शांति का वातावरण बनाने और राज्य में सुव्यवस्था स्थापित करने में छात्र राजनीति की केन्द्रीय भूमिका रही है। कम से कम 35 साल के शासन में पश्चिम बंगाल की छात्र राजनीति ने गुण्डे-अपराधी छात्रनेता पैदा नहीं किए । फलतः पश्चिम बंगाल में ईमानदार और सभ्य इमेज के वामनेताओं का आज भी राज्यस्तर पर दबदबा है, स्वयं मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य साफ-सभ्य और सुसंस्कृत छात्र राजनीति का आदर्श नमूना हैं। उनकी अनेक बातों पर आलोचना की जा सकती है लेकिन उनकी व्यक्तिगत इमेज एक ईमानदार, सुसंस्कृत आदमी की है।
    उच्चशिक्षा में इन दिनों जो हिंसा हो रही है उसके अनेक कारण हैं उसमें सबसे बड़ा कारण है छात्र राजनीति में अधूरा जनतंत्र। इसके लिए वामदल जिम्मेदार हैं। वामदलों ने शिक्षा के लोकतांत्रिकीकरण का जो मॉडल यहां लागू किया है उसने विपक्ष के सफाए का काम किया है,लोकतंत्र का अर्थ विपक्ष को हजम कर जाना नहीं है। शिक्षा में लोकतांत्रिकीकरण ने भिन्न मतों और दलों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी है। इसके कारण विभिन्न स्तरों पर छात्रों-शिक्षकों की फैसलेकुन कमेटियों में शिरकत घटी है। पक्षपात  और गैर पेशेवर लोगों का मनमानापन बढ़ा है। इसके कारण शिक्षा में व्यापक असंतोष पैदा हुआ है। इसका गैर वामदल फायदा उठा रहे हैं फलतःहिंसक टकराव हो रहे हैं।
    वामदलों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को इस कदर सजाया है कि उसमें अन्य के लिए कोई जगह नहीं है। ध्यान रहे अन्य के बिना लोकतंत्र निरर्थक है। यह स्थिति बदलनी चाहिए। गैर वाम विचारों के छात्रों-शिक्षकों और कर्मचारियों के प्रति दोस्ताना और समान नजरिया व्यवहार में विकसित किया जाना चाहिए। विभिन्न स्तरों पर अकादमिक पेशेवर कुशलता ,अनुभव और श्रेष्ठता को बढ़त मिलनी चाहिए। शिक्षा में लोकतंत्र के नाम पर अकादमिक वरिष्ठता के उल्लंघन से बचना चाहिए। शिक्षा में वफादार और माफिया दोनों से लड़कर ही लोकतंत्र स्थापित हो सकता है। शिक्षा में लोकतांत्रिकीकरण के नाम पर वाम ने वरिष्ठता और सामयिक अकादमिक जरूरतों की उपेक्षा की है। शिक्षा में लोकतंत्र को पार्टीतंत्र में रूपान्तरित किया है इसके कारण हिंसा पैदा हो रही है। उच्चशिक्षा में गैर पेशेवरों को महिमामंडित किया है ,पद दिए हैं,नौकरियां दी हैं ,इससे उच्चशिक्षा व्यवस्था गंभीर संकट में फंस गयी है। शिक्षा में अकादमिक श्रेष्ठता की बजाय पार्टी बफादारी पर बल दिया है। जिसके कारण उच्च शिक्षा में मंदमतियों की बाढ़ आ गयी है।वाम राजनीति को बचना है तो वफादारों के गिरोहों से बाहर आना होगा। ये बातें वाम सरकार के उच्चशिक्षा पर बने अशोक मित्र कमीशन की अप्रकाशित रिपोर्ट में रेखांकित की गयी हैं।   

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...