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शनिवार, 26 सितंबर 2015

बैंकिंग सेवा और भाषा समस्या

भारत में राष्ट्रीयकृत बैंक मूलत मासबैंकिंग का अंग हैं। यहाँ पर जनता के व्यापकतम समूहों की सक्रियता सहज ही देखी जा सकती है। सामान्यतौर पर बैंकिंग में अंग्रेज़ी मूल भाषा है। लेकिन जनता के लिए बंगला,हिन्दी आदि के उपयोग की व्यवस्था है। यह सच है कि हिन्दी और लोकल भाषा का प्रयोग बढ़ा है। लेकिन सच यह है बैंकिंग में लोकल भाषाओं का क्षय हुआ है। हिन्दी का प्रतीकात्मक उपयोग बढ़ा है।
समस्या यह है कि बैंकिंग सिस्टम में लोकल भाषाओं का ह्रास कैसे रोका जाय ? बैंकिंग भाषा समस्या को हमने मानकीकरण के ज़रिए हल करने की कोशिश की है। मानकीकरण से संचार तो होता है लेकिन जातीय और लोकल बोली और भाषा का विकास बाधित होता है। इस तरह मानकीकरण के कारण जो भाषायी अन्तर्विरोध पैदा होता है वह अंतत: मानक भाषा को बढ़त दिलाता है और स्थानीय भाषा और बोलियों को क्षतिग्रस्त करता है।
सिस्टम में मानक भाषा के विकास के साइड इफ़ेक्ट के बारे में हमने कभी खोज ख़बर नहीं ली। बैंकिंग सिस्टम ने कभी भाषायी समृद्धि के विकल्पों की खोज नहीं की। मसलन्, बैंकों ने भाषा और साहित्य के विकास की मूलभूत संरचनाओं के निर्माण की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। बैंकों ने सामाजिक विकास की अन्य परियोजनाओं में सक्रिय भूमिका अदा की है, अनेक विश्वविद्यालयों में प्रोफ़ेसर चेयर भी हैं। लेकिन भाषा और बोलियों के विकास और शोध के लिए बैंकों ने कभी कोई फ़ंड आवंटित नहीं किया। क़ायदे से विभिन्न प्रान्तों में बैंकों के ज़रिए भाषा - साहित्य के विभाग स्थापित किए जाएँ और वहाँ से ही इसकी पेशेवर शिक्षा के विकास के बारे में प्रयास किए जाएँ।
बैंकिंग भाषा की अनेक समस्याएँ हैं इनको हम उपहार, प्रमोशन आदि के ज़रिए नज़रअन्दाज़ करते रहे हैं। मसलन्, हमने बैंक की भाषा समस्या को कभी विश्लेषित ही नहीं किया, बैंक की भाषा समस्या हिन्दी अधिकारी की नियुक्ति की समस्या नहीं है। पहली समस्या यह है कि कम्प्यूटरीकरण के कारण उत्पन्न स्तरीकरण से कैसे निबटें। मसलन् , डिजिटलीकरण ने मानवीय सहयोग को पूरी तरह अपदस्थ कर दिया है। अब कम्प्यूटर जो कहता है वह सही है । मसलन् आपके हस्ताक्षर में यदि कोई त्रुटि है तो मशीन तुरंत भुगतान रोक देगी। चैक क्लीयर नहीं होगा। बैंकों के द्वारा संचालित लाइब्रेरी नेटवर्क का होना जरुरी है जिसमें तमाम क़िस्म की ज़रूरत की किताबें सहज रुप में उपलब्ध हों ।
बैंकिंग सिस्टम वस्तुत: गुलाब के फूल की तरह है। जिस तरह गुलाब जहाँ खिलता है वहाँ न तो फूल लगाने वाला नज़र आता है और न बाहर का ही कोई व्यक्ति नज़र आता है। सिर्फ़ बैंक रुपी गुलाब नज़र आता है। बैंक अपनी ख़ुशी का गान स्वयं गाती रहती हैं जैसे गुलाब गाता है। कोई इनके न तो दुख में शामिल होता है और नहीं सुख में शामिल होता है। बैंक हमारे सामाजिक सिस्टम के नियम क़ायदे के दायरे में नहीं आतीं, मसलन् बैंक मैनेजर छुट्टी लेकर सहज ही अवकाश पर नहीं जा सकता। नौकरी के समय और तनाव की जो अवस्था मैनेजर को झेलनी होती है यह चीज वह नौकरी मिलने के पहले नहीं जानता था। तनाव के जितने रुप बैंक मैनेजरों को झेलने पड़ते हैं वह अपने आपमें संकेत है कि बैंक का सामाजिक नियमों और परंपराओं के साथ किस तरह का अंतर्विरोध है। बैंक मैनेजरों के अनुभवों को देखें तो पता चलेगा कि सामाजिक अनुभव, परंपराएँ आदि के साथ बैंकिंग सिस्टम का किस तरह का अंतर्विरोध है।
बैंक कर्मचारी को मैंने कभी हँसते हुए नहीं देखा। ख़ासकर बैंक में काम करते समय अधिकांश बैंक कर्मचारी हँसते नज़र नहीं आते। बैंक कर्मचारी की हँसी कहाँ ग़ायब हो गयी ? क्यों ग़ायब हो गयी ?
बैंक की सबसे बड़ी समाज सेवा यह है कि उसने सामाजिक विकास में बहुत बड़ी भूमिका अदा की और उसकी सबसे खराब कुसेवा है क़र्ज़ में डूबा हुआ धन। इसने बड़े पैमाने पर भ्रष्ट लोगों की मदद की। नॉन प्रिफार्मिंग एसिट के रुप में जो धन डूबा पड़ा है वह बैंकिंग सिस्टम का नकारात्मक तत्व है।
बैंकों में देशज भाषाएँ व्यवहार में तब आएँगी जब बैंकिंग सिस्टम देशज भाषा में संचार पहल करे। मसलन् एसएमएस से लेकर समस्त कम्युनिकेशन देशज भाषा में हो, भाषा के संरक्षण के लिए विभिन्न विश्वविद्यालयों में भाषा विभाग बनाए जाएँ जो बैंकों के लिए कुशल लोग तैयार करें और भाषा की स्थानीय स्तर पर जानकारियाँ एकत्रित करें।

शुक्रवार, 20 जून 2014

हिन्दीभक्तों का भाषायी बेगानापन


         मोदी सरकार ने आते ही राजभाषा के तौर पर प्राथमिकता के साथ हिन्दी में काम करना आरंभ कर दिया है। इसके परिणामों के बारे में हम कुछ साल बाद चर्चा करेंगे। इस पर भी बाद में ही चर्चा करेंगे कि हिन्दी इस तरह मजबूत होती है या दुबली-पतली ही रहती है। इस समूचे प्रसंग में बुनियादी बात यह है कि कोई भी भाषा सरकारी मदद से ताकतवर नहीं बनती। यदि ऐसा ही था तो अंग्रेजी को तो घर घर की भाषा होना चाहिए था।

भाषा की जमीन शिक्षा और निजी दैनंदिन व्यवहार पर निर्भर करती है। हमसब हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय लोगों की मुश्किल यह है कि हमारा अपनी भाषा से खोखला लगाव है। यह स्थिति अन्य भारतीय भाषाओं की भी है। आजादी के बाद जो मध्यवर्ग पैदा हुआ है वह स्वभाव और विचार से अपनी भाषा से कोसों दूर है। हिन्दी भाषी में अपनी भाषा को लेकर जिस तरह का बेगानापन है वैसा ही बेगानापन मराठी-मलयाली या बंगाली में भी अपनी भाषा को लेकर मिलेगा।

विचारणीय सवाल यह है कि हमारे देश की जनता का शिक्षितवर्ग अपनी भाषाओं से दूर कैसे चला गया ? वे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से वह अपनी भाषा से प्यार तो करता है लेकिन लिखने-पढ़ने के लिए उसे गैर जरुरी मानता है ? यह महज राजभाषा की समस्या नहीं है। इस समस्या की जडें कहीं गहरे हमारी आर्थिक योजना और मनोदशा में हैं।

हमारी आर्थिक नीतियों का लक्ष्य कहने को आत्मनिर्भर रहा है लेकिन व्यवहार में हमने आत्मनिर्भर समाज बनाने लायक न तो कभी शिक्षा पर खर्च किया और नहीं भाषा के रखरखाव पर खर्च किया। शिक्षा और संस्कृति को हमने कभी प्रधान एजेण्डा नहीं बनाया। सीमित उत्पादन-सीमित विकास ही हमारी योजनाओं का लक्ष्य रहा है। हमारे देश में हिन्दीभाषा को लेकर जो लोग आए दिन हिन्दीप्रेम व्यक्त करते रहते हैं वे यह भूल जाते हैं कि सरकारी बैशाखी पर सवार होने के कारण हिन्दी और भी ज्यादा अपाहिज बनी है। सरकारी आफिसों में हिन्दी इनाम,प्रमोशन ,भाषायी राजनीति और टाइमपास की भाषा बनकर रह गयी है।

भाषा की मूल जगह शिक्षा संस्थान और बाजार हैं। सरकारी ऑफिस तो भाषा का कैदघर है। हमें यह पढ़कर दुख होता है कि जो लोग सरकारी ऑफिसों में कामकाज की हिन्दी बनाने पर खुश हैं वे कभी इस पहलू पर नहीं सोचते कि हिन्दी को शिक्षा में प्रसार कैसे दिया जाय ? भाषा को सीखने और व्यवहार में लागू करने का आग्रह हमारी चेतना में खत्म हो गया है। ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी को हमने बहुत गंभीरता के साथ सीख लिया है। हमारे मध्यवर्ग के लोगों में बुनियादी तौर पर भाषा का क्षय हुआ है। सभी भाषाएं क्षयग्रस्त हुई हैं।

अंग्रेजी दां लोगों में भाषा का भयानक क्षय हुआ है , वे ही बताते हैं लोगों को ठीक से अंग्रेजी लिखनी तक नहीं आती। एकबार हमारे एक दोस्त कुलदीप कुमार ने कहा कि ये उदयप्रकाश काहे को फेसबुक पर अंग्रेजी में लिखते हैं, अंग्रेजी गलत-सलत लिखते हैं। यही हाल और भी बहुत से फेसबुक लेखकों का है।

हमारे ढ़ेर सारे मित्र अंग्रेजी जानते हैं मैं तो कभी अंग्रेजी पढ़ा नहीं और मैंने कोई डिग्री नहीं ली। मैं संस्कृत माध्यम से पढ़ा बाद में जेएनयू जाकर हिन्दी में पढ़ा। वहां पर भी मैंने अंग्रेजी नहीं सीखी.यह मेरी कमजोरी रही है और जिद भी रही है कि मैं अंग्रेजी नहीं सीखूँगा लेकिन मैं अंग्रेजी का कभी विरोधी नहीं रहा। मैं आज भी अंग्रेजी नहीं जानता। मैं किसी तरह अंग्रेजी में लिखे को पढ़ लेता हूँ और अपना काम कर लेता हूँ आज भी कोई सामान्य पत्र अंग्रेजी में लिखाना होता है तो किसी न किसी की मदद लेकर लिखाता हूँ। मुझे कोई अफसोस नहीं है कि मैं अंग्रेजी नहीं जानता।

मैंने कभी अंग्रेजी न जानने के कारण न तो जेनयू में और न कभी कलकत्ता विश्वविद्यालय में परेशानी महसूस की। मैं बेहतरीन अंग्रेजी जानने और बोलने वालों के बीच में जेएनयू में मजे में धारावाहिक हिन्दी बोलता रहा और मित्रलोग मजे लेते रहे। भाषा को मैंने कभी प्रतिष्ठा,इज्जत,सामाजिक हैसियत की चीज नहीं माना, भाषा मेरे लिए कम्युनिकेशन का माध्यम थी और आज भी है।

मैंने कभी नहीं सोचा कि मैं कैसे जिऊँगा ?क्योंकि मैं अंग्रेजी नहीं जानता ! मैंने कभी अपना आवेदनपत्र अपने हाथ से नहीं भरा क्योंकि मैं अंग्रेजी लिखना नहीं जानता था। मैंने जेएनयू में दाखिले का फार्म भरा तो वो भी मेरे दो दोस्तों ने मिलकर भरा ,बाद में मेरे रजिस्ट्रेशन का छमाही फोलियो दोस्त ही भरते थे, वे ही स्कालरशिप का फार्म भरते थे। वहां पर अनेक पेपरों की सामग्री अंग्रेजी में थी उसे मैं कष्ट करके पढ़ता था और मित्रों की मदद लेता था। लेकिन अंग्रेजी नहीं जानता था इसकी मुझे कोई पीड़ा नहीं थी। मैं स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज में ही नहीं पूरे विश्वविद्यालय में पहला कौंसलर था जो अंग्रेजी एकदम नहीं जानता था और जेएनयू छात्रसंघ का चुनाव जीता। मैंने जब जेएनयू में छात्रसंघ के अध्यक्ष का चुनाव जीता तो मैं सभी स्कूलों में विजयी हुआ। उन स्कूलों में भी विजयी हुआ जिनमें एसएफआई नहीं थी। सारा कैंपस जानता था मैं अंग्रेजी एकदम नहीं जानता।इसके बावजूद सारा कैम्पस बेइंतिहा प्यार करता था।

कहने का आशय यह कि अंग्रेजी से ही कम्युनिकेशन होता है,सम्मान मिलता है,हैसियत बढ़ती है,यह धारणा बोगस है। भाषा हमारे कम्युनिकेशन की चीज है सामाजिक हैसियत या श्रेष्ठता प्रदर्शन की चीज नहीं है। मैंने कभी अंग्रेजी में भाषण नहीं दिया हां अंग्रेजी दां लोगोंके साथ एक ही मंच पर जमकर हिन्दी में भाषण दिया है। जेएनयू में प्रकाश कारात, देवीप्रसाद त्रिपाठी,सीताराम येचुरी,टी.के.अरुण आदि के साथ सैंकडों भाषण दिए हैं और हिन्दी को वही गरिमा मिली जो किसी अंग्रेजी में बोलने वाले को मिलती है। मुझे अंदर से सुख भी है कि मैं जेएनयू में हिन्दी को राजनीतिक कर्म की साझा भाषा बनाने, साझा कम्युनिकेशन की भाषा बनाने का माध्यम बना।

मैं सात साल जेएनयू में छात्र राजनीति में शीर्ष पर सक्रिय रहा लेकिन हिन्दी में बोलने के कारण मुझे कभी परेशानी नहीं नहीं हुई। मैं यह मानता हूँ भाषा हमारी जीवनानुभूति और संचार की भाषा होती है । हमें अपनी भाषा में बोलना,पढ़ना-लिखना अच्छी तरह से आना चाहिए। हम स्वयं अपनी भाषा का अपमान करते हैं और दोष सरकार पर डालते हैं। एक और अनुभव साझा करता हूँ।

मैंने 1989 में जब कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में प्रवक्ता पद पर कार्य आरंभ किया तो उस समय हमारे विभाग में अन्य शिक्षकों के अलावा प्रो.विष्णुकांत शास्त्री भी पढ़ाते थे ,वे भाजपा के बहुत बड़े नेता थे,बाद में सांसद बने, यूपी के राज्यपाल बने, सुसंस्कृत और मृदुभाषी व्यक्ति थे। हिन्दीभक्त थे। मेरी पहली तनखबाह आई तो मैं क्लर्क के पास अपना चैक लेने गया तो उस समय शास्त्री जी भी मेरे पास खड़े थे, मैंने अपना चैक लिया और पे फोलियो पर हिन्दी में दस्तखत किए। शास्त्रीजी मेरे दस्तखत हिन्दी में देखकर चौंक गए,बोले बेटा तुम हिन्दी में दस्तखत करते हो , मैंने कहा हाँ, बोले बहुत अच्छी बात है, मैं तो अंग्रेजी में करता रहा हूँ. मैंने कभी सोचा ही नहीं कि हिन्दी में भी दस्तखत करके काम चल सकता है. मैंने हँस कर कहा आज से ही आरंभ कर दीजिए,उसके बाद से शास्त्रीजी हिन्दी में दस्तखत करके चैक लेने लगे।

यह वाकया मैंने इसलिए लिखा है जिससे हिन्दीप्रेमी लोग समझें भाषा का विकास व्यवहार में लागू करने से होता है, भाषा बहस की चीज नहीं है, राजनीति की चीज नहीं है। भाषा हमारी प्राणवायु है। हमने ऐसा मध्यवर्ग तैयार किया है जो भाषा को ओढ़ता है, भाषा उसके स्वाभाविक कम्युनिकेशन के मिजाज का अंग नहीं बन पायी है। मोदी सरकार से उम्मीद रखने से पहले हमलोग अपने को दुरुस्त करें। अपने आसपास की गतिविधियों में हिन्दी का व्यवहार करें।

स्थिति इतनी भयावह है कि हमारे यहां कलकत्ता विश्वविद्यालय में ऐसे शिक्षक हैं जो सारे देश को हिन्दी का उपदेश देते हैं लेकिन हिन्दी विभाग के मीटिंग के मिनिटस अंग्रेजी में लिखते हैं। मेरी लाख आपत्तियों के बावजूद वे नहीं माने। मैंने अपने अध्यक्षकाल (चारबार अध्यक्ष रहा विभाग में)में हमेशा हिन्दी में मिनटस  लिखे।



कहने का आशय यह कि जो काम हम आसानी से अपनी भाषा में कर सकते हैं पहले वह काम तो अपनी भाषा में करें। मसलन हम अपने दस्तखत पहले हिन्दी में करें, अपने सामान्य कम्युनिकेशन को हिन्दी में करें। स्थिति बदतर है कि हम किसी न किसी बहाने से अपने समस्त कम्युनिकेशन की भाषा अंग्रेजी बनाए हुए हैं। इससे हिन्दी की क्षति हुई है।

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