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गुरुवार, 3 मई 2012

नामवर सिंह और प्रयोजनमूलक मार्क्सवाद की परंपरा



       नामवरसिंह पर लिखना बेहद असुविधाएं पैदा करता है। मन करता है उनकी खूब प्रशंसा करूँ , विवेक कहता है आलोचना करूँ। आलोचना को विवेक संचालित करता है। लेकिन नामवरसिंह के लेखन में विवेक के साथ भावुकता का भी विशेष योगदान रहा है। वे जब भी बोलते हैं ,मन से बोलते हैं।भावुक होकर बोलते हैं। कक्षा में पढ़ाते समय भी भावुकता और व्यक्तिगत भावबोध काम करता रहा है। वहां पर भी वे अपनी निजी इमोशनल प्राथमिकताओं के आधार पर आलोचक विशेष के बारे में पढ़ाते थे।भावुक लगाव के आधार पर ही छात्र के प्रति अपना रूख तय करते थे। वक्तृता और अध्यापन में शास्त्र के अलावा भावनाओं का भी योग होता है। यह चीज मैंने पहलीबार उनको देखकर महसूस की।
    मैं मथुरा से माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय में बेहतरीन विद्वानों से पढ़कर आया था।दर्शन मैंने आचार्य सवलकिशोर पाठक से पढ़ा,सिद्धांतज्योतिष संकटाप्रसाद उपाध्याय, वेद और धर्मशास्त्र लालनकृष्ण पंड्या,संस्कृत व्याकरण आचार्य बलदेव शास्त्री और संस्कृत साहित्य आचार्य वनमाली शास्त्री,केशवचन्द्र पांडेय,आचार्य कृष्णचन्द्र चतुर्वेदी ने पढ़ाया था। ये सभी अपने विषय के ज्ञाता विद्वान थे । इन सभी ने 13 साल की लंबी अवधि तक यानी प्रथमा से लेकर सिद्धांतज्यौतिषाचार्य पर्यन्त तक मुझे पढ़ाया था। इन विद्वानों से पढ़ते समय कभी महसूस नहीं हुआ कि शिक्षक के सहृदय मन का शिक्षण से कोई संबंध भी होता है। एकदम वस्तुगत शिक्षण की परंपरा से निकलकर जब मैं जेएनयू में दाखिला हुआ तो शास्त्र, माहौल, मित्र,मिजाज और शिक्षक सभी बदले हुए थे।मथुरा में मैं आपातकाल में ही एसएफआई से जुड़ गया था।जेएनयू आने के पहले माकपा का पार्टी मेम्बर था और एसएफआई का जिला सचिव भी था।   
     मेरे मन में कहीं न कहीं इस बात का असर था कि कक्षा में पढ़ाते समय शास्त्र ही प्रमुख है,शिक्षक की भावनाएं और प्राथमिकताएं प्रमुख नहीं हैं।लेकिन जेएनयू में 1979 में जब दाखिला लिया और पहलीबार क्लास करने गया तो नामवर सिंह की पढ़ाने की शैली देखकर बड़ा मजा आया। पहलीबार शिक्षक की संवेदनाओं और शास्त्र के बीच चल रही प्रक्रियाओं को देखा,सुना और महसूस किया।
     नामवर सिंह की पढ़ाने की शैली में हर दिन एक नयी तैयारी दिखती थी और उसका सामयिक चीजों और घटनाओं के साथ भी गहरा संबंध हुआ करता था। उनके पढ़ाने की शैली में युवामन के प्रति सम्मान का भाव होता था। युवामन को वे अपने प्रति भक्ति,राजनीतिक लगाव और प्रतिबद्धता के आधार पर परखते थे।उनके सबसे प्रिय छात्र वे ही होते थे जो उनके अनन्यभक्त थे। ये लोग साहित्य ज्यादा हांकते थे और राजनीति कम करते थे। वे उन छात्रों से कम प्रेम करते थे जो उनके भक्त नहीं थे,राजनीति और साहित्य ज्यादा करते थे। भारतीय भाषा केन्द्र में अधिसंख्य छात्र ऐसे थे जो नामवरसिंह के अनन्य भक्त नहीं थे। यह एक विलक्षण बात थी कि वे मार्क्सवाद का व्यवहार में इस्तेमाल करने वाले छात्रों को कम  पसंद करते थे। उन्हें वे छात्र ज्यादा अच्छे लगते थे, जिनका मार्क्सवाद से प्रयोजनमूलक संबंध होता था।
    मेरे लिए यह बात हमेशा रहस्य रही है कि नामवर सिंह जैसा मार्क्सवाद का बेहतरीन विद्वान व्यवहार में, खासकर छात्रों में, प्रयोजनमूलक मार्क्सवादियों को पसंद क्यों करता है ? प्रयोजनमूलक मार्क्सवादी वे थे जिनका मार्क्सवाद से सिर्फ पाठ्यक्रम तक संबंध था। पाठ्यक्रम में जो मार्क्सवाद था उसे  वे तोते की तरह पढ़ते थे ,कभी गुनने और उसे जीवन में लागू करके अपने को मार्क्सवादी के रूप में ढ़ालने का किसी ने प्रयास नहीं किया। यही वजह है कि नामवर सिंह का वरदहस्त उन पर होता था जो प्रयोजनमूलक मार्क्सवादी थे। इनमें से किसी ने भी  कालांतर में मार्क्सवाद पर कभी भी न तो कुछ लिखा और न मार्क्सवाद की अकादमिक परंपरा में उनकी गणना की जाती है। इन प्रयोजनमूलक मार्क्सवादियों की तुलना हिन्दी के प्रयोजनमूलक कार्य व्यापार से जुड़े मेधावियों से की जा सकती है। इन प्रयोजनमूलक मार्क्सवादियों को ही नामवरजी की सभी किस्म की मदद अनायास मिलती रही है। मार्क्सवादी छात्रों की मदद उन्होंने बहुत कम की है।
   सवाल उठता है नामवरसिंह के भक्त प्रतिभाशाली छात्रों में कोई भी मार्क्सवादी आलोचक पैदा क्यों नहीं हुआ ? नामवरजी ने सैंकड़ो नियुक्तियां की हैं।लेकिन देश में एक भी हिन्दी  विभाग ऐसा निर्मित नहीं कर पाए जो अकादमिक गुणवत्ता का मानक होता। यहां तक कि इनदिनों जेएनयू के हिन्दी विभाग की स्थिति सामान्य स्तर की रह गयी है। यह प्रयोजनमूलक मार्क्सवाद का क्लाइमैक्स है।यह भक्ति का दुष्परिणाम है।
      यह सच है कि नामवर सिंह बहुत बड़े विद्वान हैं। खूब पढ़ते हैं।खूब सुंदर पढ़ाते  हैं। लेकिन सुंदर मेधावी छात्र तैयार करने की कला एकदम नहीं जानते। विद्यार्थी को तरासना और शिक्षित-दीक्षित करना एकदम नहीं जानते।  जेएनयू में हर विभाग में ऐसे शिक्षक रहे हैं जिन्होंने  अपने शास्त्र के श्रेष्ठतम प्रयोगकर्ताओं को पैदा किया है। लेकिन नामवरसिंह की यह बड़ी  कमजोरी रही है कि वे अपने जैसा परिश्रमी एक भी छात्र तैयार नहीं कर पाए।
     एक अन्य चीज जो बार बार खटकती रही है कि वे सार्वजनिक तौर पर कुछ भी कहें लेकिन निजीतौर पर वे कभी जेएनयू कैंपस में हिन्दी में मार्क्सवादीचेतना और विचारधारा से लैस छात्र-छात्राओं को निर्मित नहीं कर पाए। एक मार्क्सवादी की सफलता तब मानी जाती है जब वह नई मार्क्सवादी पीढ़ी तैयार करे। नामवर सिंह का यह सबसे कमजोर पक्ष है।वे जाने जाते हैं मार्क्सवादी के रूप में लेकिन अध्यापन के दौरान वे एक भी अच्छा मार्क्सवादी तैयार नहीं कर पाए। नामवर सिंह के सबसे प्रिय और कृपापात्र वे छात्र रहे हैं ,और आज भी हैं,जो मार्क्सवादी नहीं हैं, या प्रयोजनमूलक मार्क्सवादी हैं।फलतः आज जेएनयू के हिन्दी विभाग की कोई विशिष्ट पहचान नहीं है।नामवर सिंह के रहते हुए एक भी बेहतरीन अनुसंधान कार्य विभाग की ओर से सामने नहीं आया। जबकि जेएनयू  के अनेक विभाग हैं जहां शिक्षक लगातार अनुसंधान करते रहते हैं और उनके नए  शोध कार्य प्रकाशित होते रहते हैं। इसके बावजूद नामवर सिंह सारे देश में मार्क्सवाद के प्रतीक पुरूष के रूप में जाने जाते हैं।
    एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उनके जेएनयू कार्यकाल के दौरान उनकी कोई आलोचना कृति सामने नहीं आई। सवाल यह है कि इतने बड़े ओहदे पर लंबे समय तक काम करने के बाद भी नामवरजी को मार्क्सवाद का कोई भी विषय लिखने के लायक महसूस क्यों नहीं हुआ ?जिस पर वे विस्तार से कभी लिखते।उन्होंने कभी किसी मार्क्सवादी परकिताब नहीं लिखी। किसी मार्क्सवादी सिद्धांतत पर किताब नहीं लिखी।जबकि सारी दुनिया में मार्क्सवादियों ने मार्क्सवादी और मार्क्सवादी सिद्धांत पर किताबें जरूर लिखी हैं।भारत में राहुल सांकृत्यायन,यशपाल,रामविलास शर्मा आदि उदाहरण हैं। नामवरसिंह मार्क्सवाद पर किताब  लिखने से क्यों भागते रहे हैं , इसका कोई संतोषजनक उत्तर आज तक नहीं मिला है। असल में वे मनसा-वाचा मार्क्सवादी हैं,कर्मणा नहीं।
     नामवर सिंह की चाह और सच्चाई में विशाल अंतराल है। वे जो चाहते थे वह उनको मिला है।  उन्हें नाम,यश,साख,विद्वत्ता,धन,पद आदि सब कुछ मिला है। उनका अकादमिक दर्जा हमेशा से बहुत ऊँचा रहा है। लेकिन उस दर्जे के अनुकूल उन्होंने कम लिखा है। एक अकादमीशियन सिर्फ कक्षा और वक्तृता से नहीं पहचाना जाता बल्कि लेखन और शोध से पहचाना जाता है। बिडम्वना है कि नामवर सिंह ने आलोचना के रूप में बहुत लिखा,आलोचक के रूप में हजारों भाषण दिए, लेकिन एक भी नयी आलोचना की अवधारणा का निर्माण नहीं किया। आलोचना के नए मानक भी निर्मित नहीं कर पाए।
     नामवर सिंह की हिन्दी आलोचना में महत्ता है। वे आज भी 86साल की उम्र में सबसे ज्यादा सक्रिय विद्वान हैं, देश में चारों ओर उनके दौरे अभी भी होते हैं। उनकी यही सक्रियता सभी को चकित और मुग्ध करती है। मुझे उनका बराबर आशीर्वाद रहा है और उसका मुझे सुफल भी मिला है। वे हमेशा मन से चाहते रहे हैं कि मेरी उन्नति हो।मैं जब भी मिला हूँ उन्होंने खुले मन से मेरे साथ सुंदर हृदयस्पर्शी व्यवहार किया है। यह बात दीगर है कि मैं उनके भक्तछात्रों की टोली में कभी नहीं रहा और न नामवरजी ने ही मुझे भक्तटोली में शामिल करने की कोशिश की। वे हमेशा कहते हैं कि आप शिष्य तो मेरे ही कहलाओगे और मैं हमेशा इसे स्वीकार भी करता रहा हूँ।
    निजी तौर पर नामवर सिंह जब भी बातें करते हैं तो उसमें एक खास का किस्म उदारभाव होता है जो उनकी सामान्य सी बातों के जरिए मन को स्पर्श करता है। मुझे जो चीज सबसे अच्छी लगती है वो है उनकी उदार भाषा। लिखने और बोलने में उनकी मर्मस्पर्शी उदार भाषा अभी भी मन को छूती है। ईर्ष्या भी होती है कि ऐसी मर्मस्पर्शी भाषा मेरे पास क्यों नहीं है। मेरे व्यक्तित्व और मानसिक गठन का पूरा काय़ाकल्प करने में उनकी बहुत बड़ी भूमिका रही है। उनकी कक्षाएं ,भाषण,बातचीत और किताबें प्रभावित करती रही हैं। आज भी संकट की अवस्था में उनका लिखा पढ़ता हूँ और आनंद लेता हूँ,मन ही मन आलोचना करता हूँ कि वे गहराई में जाकर और क्यों नहीं लिखते।
एक अन्य पहलू जो काफी विवादास्पद है। जिसकी ओर कभी लिखकर किसी ने ध्यान नहीं खींचा। नामवरसिंह जब भारतीय भाषा केन्द्र के अध्यक्ष थे या भाषा संस्थान के डीन बने या अकादमिक परिषद के सदस्य थे तो उस समय पद रहते हुए अमूमन वे छात्रों के खिलाफ और विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ हुआ करते थे। प्रशासन के खिलाफ उन्होंने कभी राय जाहिर नहीं की। इसके कारण एक अजीब स्थिति हमेशा रहती थी। हमलोग छात्र प्रतिनिधि के नाते जब भी किसी समस्या पर उनसे समर्थन के लिए अनुरोध करने घर जाते थे तो वे हमेशा सहयोग का आश्वासन देते थे,लेकिन अकादमिक परिषद या प्रशासन के सामने हमेशा छात्रों के खिलाफ राय देते थे। यानी निजी बातचीत में नामवर और प्रशासन में नामवर में अंतर करके देखा जाना चाहिए।  निजी बातचीत, सभा,गोष्ठी आदि में वे हमेशा छात्रों के पक्ष में होते थे लेकिन प्रशासनिक मीटिंगों में हमेशा प्रशासन के अ-लोकतांत्रिक फैसलों के हिस्सेदार रहे हैं। मैं 1980-81 में भाषा संस्थान में कौंसलर था। मैंने अनेक मर्तबा उनको अ-लोकतांत्रिक फैसले लेते देखा है और हमको मजबूर होकर उनके खिलाफ आंदोलन करना पड़ता था और बादमें आंदोलन के दबाव में उन्होंने अपने फैसले बदले भी हैं। इस समूची प्रक्रिया ने एक विलक्षण अनुभव दिया है। मौटे तौर पर जेएनयू में जो लोग सामान्य जीवन में प्रगतिशील हैं, वे जरूर नहीं है कि प्रशासन में भी प्रगतिशील हों। जीवन में प्रगतिशील और प्रशासनिकस्तर पर अलोकतांत्रिक का द्वैत जेएनयू के अधिकांश प्रगतिशील शिक्षकों की सामान्य प्रकृति रहा है। नामवरसिंह में भी यह फिनोमिना था।
     नामवरसिंह के मध्यवर्गीय व्यक्तित्व के अनेक रूप हैं। जिस तरह सामान्यतौर पर मध्यवर्ग के पास एकाधिक मुखौटे हैं ,वैसे ही नामवर सिंह के पास भी एकाधिक मुखौटे हैं। ये मुखौटे उनके आत्मकथा के अंशों में सहज रूप में व्यक्त हुए हैं। नामवर सिंह के व्यक्तित्व का एक पहलू है उनका सामान्य उदार व्यवहार, लेकिन एक अन्य पहलू  भी है जिसमें वे कभी कभी वैचारिक प्रतिबद्धता के प्रतीक के रूप में भी नजर आते हैं। परिवार नामक संस्था में उनकी अनुपस्थिति और अपने परिवार से लंबे समय तक दूरी के कारण उनके व्यक्तित्व में एक खास किस्म की जटिलता पैदा हुई है.इसने उनके समूचे नजरिए को प्रभावित किया है। परंपरागत नियमों को तोड़ने और साहित्यिक रूढ़ियों को तोड़ने में उनकी खास दिलचस्पी रही है। नियम तोड़ने में वक्तृत्व कला का उन्होंने जमकर इस्तेमाल किया है। जो चीजें वे सामान्य जीवन में अर्जित नहीं कर पाए उसे उन्होंने भाषणकला और लेखन में हासिल करने की कोशिश की है।इस प्रसंग में उनकी किताबों में उद्धरणों के चयन को देखें तो उनके नजरिए को साफतौर पर समझा जा सकता है। नामवरसिंह स्वयं उद्धरणों की एक किताब लिखना चाहते थे। हम सिर्फ यहां उनके यहां से कुछ सामयिक समस्याओं पर उनके नजरिए को व्यक्त करने वाले विचार दे रहे हैं। इससे समस्या के विभिन्न आयामों के साथ सही नजरिए को भी समझने में मदद मिलेगी।
आत्मकथा- नामवर सिंह ने अपने संबंध में लिखा है "मेरा कोई भी काम बिना बाधाओं के होता ही नहीं,कहने को तो मैं भी प्रेमचंद की तरह कह सकता हूँ कि मेरा जीवन सरल सपाट है। उसमें न ऊँचे पहाड़ हैं न घाटियाँ हैं। वह समतल मैदान है। लेकिन औरों की तरह मैं भी जानता हूँ कि प्रेमचंद का जीवन सरल सपाट नहीं था। अपने जीवन के बारे में भी मैं नहीं कह सकता कि यह सरल सपाट है। भले ही इसमें बड़े ऊँचे पहाड़ न हों, बड़ी गहरी घाटियाँ न हों। मैंने जिन्दगी में बहुत जोखिम न उठाये हों।ब्रेख्त के एक नाटक गैलीलियो का एक वाक्य अकसर याद आता रहा है कि बाधाओं को देखते हुए दो बिन्दुओं के बीच की सबसे छोटी रेखा टेढ़ी ही होगी। मेरे जीवन की रेखा भी कहीं-कहीं टेढ़ी हो गयी है। जहाँ टेढ़ी हुई है, उसका जिक्र करूँगा।"
" मैं यह कह रहा हूँ कि मेरी जिन्दगी भी एक हद तक ऊसर है और एक हद तक उसमें उगने वाली नागफनी है जिसमें काँटे होते हैं और सीधे तड़ंगे बाँस होते हैं। यदि प्रकृति कहीं न कहीं परिवेश को प्रभावित करती है तो शायद मेरे व्यक्तित्व को- मेरे जीवन को उसने प्रभावित किया हो।"
" मैं अभागा हूँ कि माँ की मृत्यु हुई तो जोधपुर में था। काशी ने तार भेजा तो तार दिल्ली होते हुए जोधपुर गया। पिता जी की मृत्यु हुई तो मैं दिल्ली में था। उनका मुँह भी नहीं देख सका। इस मामले में काशी भाग्यशाली है। अंतिम दिनों में माँ की सेवा की और पिता की भी सेवा की। मैंने तो कोई जिम्मेदारी निभायी नहीं उन दोनों के प्रति लेकिन उन्होंने अपने आशीष का हाथ बराबर मेरे सिर पर रखा। "
"अभी भी हमारा संयुक्त परिवार है। अपने को बहुत सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे अनमोल दो भाई मिले। गाँव में ही नहीं, आस-पास के पूरे क्षेत्र में मिसाल दी जाती है हमारी। मुझे खुशी है कि मेरे दोनों भाई आज भी मेरे साथ हैं। मैं कहना चाहता हूँ कि भाइयों का प्यार मैंने जाना। मेरे भाई अगर न होते, तो मेरे जैसा आदमी जो बनारस छोड़ कर जगह-जगह द्घूमता रहा, दिल्ली आया, जोधपुर गया, सागर गया, फिर दिल्ली आया, परिवार कभी साथ नहीं रहा, कैसे कुछ कर पाता। जब मैं बनारस में था तब भी मैंने नहीं जाना कि राशन की दुकान कौन सी है, सब्जी कहाँ मिलती है, कैसे घर का खर्च चलता है। सारा का सारा काम काशी करते थे जो हमारे साथ रहते थे। हाईस्कूल करके गाँव से आये थे काशी और सारी जिम्मेदारी ले ली थी। कभी-कभी मुझे बहुत अफसोस होता है कि यदि काशी पर वह बोझ न होता तो वह और जाने क्या बन गये होते। लेकिन मैं तो लाचार था। मैं निश्चिन्त हो गया था काशी पर सब कुछ छोड़कर के। माँ साथ रहती थी, मेरी पत्नी थी घर में। मेरा बेटा आ गया था, पिता जी भी आया करते थे गाँव से, मझले भाई भी आते थे। उनका भी परिवार था। इन तमाम चीजों को बरसों तक काशी ने संभाला। इसीलिए काशी के लिए एक स्नेह तो अनुभव करता हूँ लेकिन एक आँण भी है जो बराबर महसूस करता रहा हूँ। इसे कभी नहीं भूल सकता, हालांकि कभी कहा नहीं, कभी लिखा नहीं।"
"पिता जी ने मेरी इच्छा के विरुद्ध मेरा विवाह किया था, सही है लेकिन उसका दंड मेरी पत्नी भोगे यह उचित नहीं, यह मैं जानता था। और जानता हूँ लेकिन जाने क्यों मन में ऐसी गाँठ थी कि मैं पत्नी को पति का सुख नहीं दे सका।"
" मैंने कभी अपने गुरुदेव हजारी प्रसाद द्विवेदी से पूछा था, 'सबसे बड़ा दुख क्या है?' बोले, 'न समझा जाना।' और सबसे बड़ा सुख ? मैंने पूछा। फिर बोले, 'ठीक उलटा! समझा जाना।' अगर लगे कि दुनिया में सभी गलत समझ रहे हैं लेकिन एक भी आदमी ऐसा है जिसके बारे में तुम आश्वस्त हो कि वह तुझे समझता है तो फिर उसके बाद किसी और चीज की कमी नहीं रह जाती।"
" मैं जन्मकुंडली, हस्तरेखा, ज्योतिष किसी में विश्वास नहीं करता और न मृत्युबोध का विलास पालने की कामना है मेरी। दरअसल बीमारियाँ मेरे लिए इसलिए दुखद हैं कि वे पर निर्भर बनाती हैं।"
"एक चीज याद रखो, विरोध उसी का होता है जिसमें तेज होता है। विरोध से ही शक्ति नापी जाती है। जब छोटी सी चिन्गारी दिखाई पड़ती है तो लोग घी नहीं पानी डालते हैं।"
"दरअसल हम लेखक लोग मध्यवर्ग के हैं और मध्यवर्ग में जो कुछ ऊपर ठीक-ठाक जगह पर पहुँच जाता है तो लोग अचानक उसको सत्ता और प्रतिष्ठान के प्रतीक के रूप में देखने लगते हैं। वस्तुतः हम लोग विशाल तंत्र के पुर्जे हैं। कोई छोटा है तो कोई बड़ा है।"
"मैंने किसी के हाथ के नीचे तो अपना हाथ नहीं रखा। रखा है तो किसी के हाथ पर हाथ रखा है। और रखा है तो उसके बदले में कुछ लिया नहीं है।"
" मैं पुरस्कारों के मामले में प्रूपफरीडर हूँ जो भूल सुधार का काम करता है। जो लोकमत है, साधुमत है मैंने उसी के अनुसार काम करने की कोशिश की है। इसके बाद भी यदि मुझे अपयश मिलता है तो अपयश भी शिरोधार्य।
शमशेर जी से मैंने किसी का यह शेर सुना थाः
न हंसना ही सलीके का, न रोना ही सलीके का।
परेशानी में कोई काम जी से हो नहीं सकता
जो हो सकता है इससे वह किसी से हो नहीं सकता
मगर देखो तो फिर कुछ आदमी से हो नहीं सकता।
मैं इतना निराशावादी नहीं हूँ कि यह कहूँ कि कुछ आदमी से हो नहीं सकता। क्योंकि 'जो हो सकता है इससे, वह किसी से हो नहीं सकता।' रही बात सलीके की, तो मैंने जो बातें की हैं, चाहता था कि सलीके से कहूँ। क्योंकि एक साहित्यकार, कलाकार के हँसने में, रोने में एक सलीका तो होना ही चाहिए। पता नहीं मेरा यह काम सलीके से हो सका या नहीं! आश्वस्त नहीं हूँ।अंत में पीछे मुड़कर अपने पूरे जीवन का सिंहावलोकन करता हूँ तो अंदर-अंदर वहीं प्रश्न उठता है जिससे मुक्तिबोध बेचैन रहते थेः
अब तक क्या किया?
जीवन क्या जिया?"
प्रेम-  नामवरसिंह ने कभी प्यार नहीं किया ,लेकिन प्यार की हिमायत में खूब लिखा है,वे प्यार के सवालों पर खूब जमकर बोलते भी हैं ,लेकिन वे प्यार करने के मामले में जोखिम उठाने से कतराते रहे हैं या उनके अंदर एक कायर मन भी रहा है जो उनको प्यार नहीं करने देता। उनके प्रेम संबंधी नजरिए पर गालिब, एरिक फ्रॉम और हजारीप्रसाद द्विवेदी का गहरा प्रभाव है। हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास "अनामदास दास का पोथा" के बहाने लिखा है  ," प्रेम पाप नहीं है, बल्कि मनुष्य का 'स्वभाव' है और इस स्वभाव को स्वीकार करके ही चरम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।" प्रेम हो तो क्या होता है ? नया जन्म होता है। प्रेम को वह सबसे बड़ा पुरूषार्थ मानते हैं।
''मानव देह केवल दंड भोगने के लिए नहीं बनी है, आर्य! यह विधाता की सर्वोत्तम सृष्टि है। यह नारायण का पवित्र मन्दिर है। पहले इस बात को समझ गई होती, तो इतना परिताप नहीं भोगना पड़ता। गुरु ने मुझे अब यह रहस्य समझा दिया है। मैं जिसे अपने जीवन का सबसे बड़ा कलुष समझती थी, वही मेरा सबसे बड़ा सत्य है। क्यों नहीं मनुष्य अपने सत्य को देवता समझ लेता आर्य?'' प्रेम में बार बार बंदिशें परेशान करती हैं। सामाजिक विकास में बंदिशें वैसे भी बड़ी बाधा हैं।
     नामवरसिंह बंदिशों के विरोधी हैं। इस मामले में उनके विचार और कर्म में बहुत कम अंतर है। सामान्यतौर पर प्रेमविवाह करने वालों से वे बड़े खुश होते हैं और यदि उनके किसी शिष्य ने प्रेमविवाह किया है और दावत –आशीर्वाद पर बुलाया है तो वे जरूर जाते हैं। सामंती बंदिशों को तोड़ने में वे अपने शिष्यों की मदद भी करते रहे हैं। प्रेम को वे कमजोरी नहीं मानते। उनका मानना है " मानवीय प्रवृत्तियों का दमन सामन्ती दमन का ही एक अंग है। अमानवीकरण की यह प्रक्रिया शासक वर्गों के दमन का प्रमुख अस्त्र रही है। सामन्ती युग में इस दमन-कार्य के लिए शासक वर्ग धर्म का सहारा लेता था और आधुनिक पूंजीवादी युग में धर्म के अतिरिक्त वैज्ञानिक-तार्किक-व्यावहारिक नीतिशास्त्र का भी।" " कहने की आवश्यकता नहीं कि हिन्दी में सूरदास आदि का भक्तिकाव्य इस सामन्ती दमन के विरुद्ध मानवीय विद्रोह था।" "इस पाप-बोध जगाने वाले वर्ग से निपटने के लिए भक्तों के पास सबसे अमोद्घ अस्त्र था- प्रेम। आश्चर्य नहीं कि पुरोहिती हितों के पोषक पंडितों ने सबसे अधिक कोप इस 'प्रेम' पर ही प्रकट किया। कोप का एक रूप तो यह है कि इसे अभारतीय कहकर अग्राह्य बना दिया जाय।"
आचार्य पुरगोभिल ने कहा है,''अगर निरन्तर व्यवस्थाओं का संस्कार और परिमार्जन नहीं होता रहेगा, तो एक दिन व्यवस्थाएँ तो टूटेंगी ही, अपने साथ धर्म को भी तोड़ देंगी।''
     नामवरसिंह के अनुसार मध्यकालीन भक्ति आंदोलन में ,खासकर,सूरदास के यहां '' १. प्रेम ही परम पुरुषार्थ है २. भगवान के प्रति प्रेम कौलीन्य से बड़ी चीज है ३. भक्ति के बिना शास्त्र ज्ञान और पांडित्य व्यर्थ है और ४. भक्त भगवान से बड़ा है।'' ''इसका मतलब यह नहीं कि सूरदास स्मार्त पन्थ के विरोधी हैं। वे भक्ति को सर्वोपरि समझते हैं। अगर भक्ति है तो तीर्थ-व्रत की जरूरत नहीं, अगर भक्ति नहीं है तो तीर्थ-व्रत से कुछ बड़ी चीज की प्राप्ति नहीं होगी। भगवान की दृष्टि में जाति-पांति, कुल -शील आदि कोई चीज नहीं है। केवल प्रेम चाहिए, प्रेम से ही वे मिलते हैं।''
भारतीयता- नामवर सिंह के ही शब्दों में "सवाल यह है कि एक भारतीय लेखक के लिए भारतीयता आज समस्या क्यों है? कहीं यह हमारे मध्यवर्गीय अपराधबोध का प्रक्षेपण तो नहीं? भारतीयता की समस्या को लेकर सबसे ज्यादा परेशान वह लेखक दिखते हैं जो इस अपराधबोध से सबसे ज्यादा ग्रस्त हैं। शायद मूल पाप वह है जब भारत ने पहले पहल पश्चिम के ज्ञान का फल चखा। भारत को एकाएक यह एहसास हुआ कि वह पूर्व है पश्चिम से भिन्नऋ और एक भारतीय को पहली बार यह महसूस करना पड़ा कि वह वस्तुतः भारतीय होना है। भारतीयता अचानक एक समस्या हो गई। अब सहज रूप से भारतीय होना सम्भव न रहा। एक जमाना था जब हर कलाकार को सहज रूप से भारतीय होने की स्वतंत्राता थी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह कहा था तो वह अतीत की एक मधुर स्मृति होने के साथ ही वर्तमान की कटु अनुभूति भी थी।"
"इतिहास की यह भी एक विडंबना ही है कि जिस पश्चिम ने पुरातन भारत को मारकर उसे दपफन किया उसी ने बाद में अस्थि-पंजर की खुदाई करके इतिहास से परिचित कराने का दम भी भरा। समस्यामूलक भारतीयता, वस्तुतः इसी उपनिवेशवाद की सन्तान है और इसी कारण मूलतः उपनिवेशवादी विचारप्रणाली का एक अंग भी -एक ऐसी मिथ्या चेतना जिसकी अभिव्यक्ति बंकिमचन्द्र से अब तक अनेक रूपों में हुई है। पश्चिम के द्वारा भारत जैसे भारतीय होने के लिए अभिशप्त था। पश्चिम की चुनौती के सम्मुख भारतीय होने का हर संभव प्रयत्न एक प्रकार की मिथ्या चेतना बनता गया, क्योंकि भारतीय होने की हर अदा पश्चिम द्वारा निर्धारित थी। स्वर्णिम अतीत का गौरवबोध हो या फिर भविष्य में उस अतीत के प्रत्यावर्तन की आशा, पश्चिम के भौतिकवाद के विरुद्ध भारत के अध्यात्मवाद का औचित्य स्थापन हो या पाश्चात्य परिवर्तनशीलता के विपरीत अपनी स्थिरता का आत्मतोष- भारतीय मनीषा द्वारा निर्मित सारे सुरक्षा कवच, वस्तुनिष्ठ रूप से उपनिवेशवादी विचारप्रणाली के ही अस्त्रा साबित हुए। विडंबना यह है कि जातीय अस्मिता के ये सारे प्रयत्न आत्मोपार्जित प्रतीत होते थे जबकि सचमुच वे पश्चिम प्रदत्त थे। दृष्टि इस बात की ओर नहीं गई कि स्वयं पश्चिम और पूर्व की इस द्वैधता में ही मिथ्या चेतना अन्तर्निहित है।"



सोमवार, 23 अप्रैल 2012

विचारधारा का कम्युनिकेशन में अवमूल्यन है फेसबुक


                   
       फेसबुक के 85 करोड़ यूजर हैं और इसने पिछले साल 3.7 बिलियन डॉलर का मुनाफा कमाया है। कंपनी का मानना है कि वह आगामी दिनों में बाजार से 5बिलियन डॉलर शेयर बेचकर उठाएगी। इस कंपनी की हैसियत 100 बिलियन से ऊपर आंकी जा रही है।
फेसबुक महज एक कंपनी नहीं है वह नए युग की कम्युनिकेशन, सभ्यता-संस्कृति की रचयिता भी है। यह बेवदुनिया की पहली कंपनी है जिसके एक माह में 1 ट्रिलियन पन्ने पढ़े जाते हैं। प्रतिदिन फेसबुक पर 2.7बिलियन लाइक कमेंटस आते हैं। किसी भी कम्युनिकेशन कंपनी को इस तरह सफलता नहीं मिली ,यही वजह है कि फेसबुक परवर्ती पूंजीवाद की संस्कृति निर्माता है। वह महज कंपनी नहीं है।
गूगल के सह-संस्थापक सिर्गेयी ब्रीन ने इंटरनेट के भविष्य को लेकर गहरी चिन्ता व्यक्त की है। इंटरनेट की अभिव्यक्ति की आजादी को अमेरिका और दूसरे देशों में जिस तरह कानूनी बंदिशों में बांधा जा रहा है उससे मुक्त अभिव्यक्ति के इस माध्यम का मूल स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा।
फेसबुक पर यदि कोई यूजर कहीं से सामग्री ले रहा है और उसे पुनः प्रस्तुत करता है और अपने स्रोत को नहीं बताता तो इससे नाराज नहीं होना चाहिए। यूजर ने जो लिखा है वह उसके विचारधारात्मक नजरिए का भी प्रमाण हो जरूरी नहीं है।
फेसबुक तो नकल की सामग्री या अनौपचारिक अभिव्यक्ति का मीडियम है। यह अभिव्यक्ति की अभिव्यक्ति  या कम्युनिकेशन का कम्युनिकेशन है। यहां विचारधारा, व्यक्ति, उम्र,हैसियत,पद. जाति, वंश, धर्म आदि के आधार पर कम्युनिकेशन नहीं होता। फेसबुक में संदर्भ और नाम नहीं कम्युनिकेशन महत्वपूर्ण है। फेसबुक की वॉल पर लिखी इबारत महज लेखन है। इसकी कोई विचारधारा नहीं है। फेसबुक पर लोग विचारधारारहित होकर कम्युनिकेट करते हैं। विचारधारा के आधार पर कम्युनिकेट करने वालों का यह मीडियम " ई" यूजरों से अलगाव पैदा करता है।
फेसबुक विचारधारात्मक संघर्ष की जगह नहीं है। यह मात्र कम्युनिकेशन की जगह है। इस क्रम में मूड खराब करने या गुस्सा करने या सूची से निकालने की कोई जरूरत नहीं है। हम कम्युनिकेशन को कम्युनिकेशन रहने दें। कु-कम्युनिकेशन न बनाएं। फेसबुक कम्युनिकेशन क्षणिक कम्युनिकेशन है। अनेक बार फेसबुक में गलत को सही करने के लिए लिखें ,लेकिन इसमें व्यक्तिगत आत्मगत चीजों को न लाएं। दूसरी बात यह कि फेसबुक मित्र तो विचारधारा और पहचानरहित वायवीय मित्र हैं। आभासी मित्रों से आभासी बहस हो।यानी मजे मजे में कम्युनिकेट करें। असल में ,विचारधारा का कम्युनिकेशन में अवमूल्यन है फेसबुक।
        एक अन्य सवाल उठा है कि  क्या फेसबुक और ट्विटर ने अकेलेपन को कम किया है या अकेलेपन में इजाफा किया है ? यह अकेले व्यक्ति को और भी एकांत में धकेलता है। संपर्क तो रहता है ,लेकिन संबंधों का बंधन नहीं बंधने देता। दोस्त तो होते हैं लेकिन कभी मिलते नहीं हैं।
     फेसबुक ने मनुष्य की मूलभूत विशेषताओं को कम्युनिकेशन का आधार बनाकर समूची प्रोग्रामिंग की है। मनुष्य की मूलभूत विशेषता है शेयर करने की और लाइक करने की। इन दो सहजजात संवृत्तियों को फेसबुक ने कम्युनिकेशन का महामंत्र बना डाला। इसमें भी फोटो शेयरिंग एक बड़ी छलांग है। यूजर जितने फोटो शेयर करता है वह नेट पर उतना ही ज्यादा समय खर्च करता है। आप जितना समय खर्च करते हैं उतना ही खुश होते हैं और फेसबुक को उससे बेशुमार विज्ञापन मिलते हैं । विगत वर्ष फेसबुक को विज्ञापनों से 1 बिलियन डॉलर की कमाई हुई है। असल में फेसबुक सामुदायिक साझेदारी का माध्यम है।यदि कोई इसे घृणा का माध्यम बनाना चाहे तो उसे असफलता हाथ लगेगी। फेसबुक में धर्म,धार्मिक प्रचार, राजनीतिक प्रचार आदि सब सतह पर विचारधारात्मक लगते हैं लेकिन प्रचारित होते ही क्षणिक कम्युनिकेशन में रूपान्तरित हो जाते हैं। विचारधारा और विचार का महज कम्युनिकेशन में रूपान्तरण एक बड़ा फिनोमिना है। जिनकी तरीके से देखने की आदत है वे इस तथ्य को अभी भी पकड़ नहीं पा रहे हैं।
     इंटरनेट के समानान्तर सैटेलाइट टीवी और मोबाइल कम्युनिकेशन का भी तेजी से विस्तार हुआ है। नई पूंजीवादी संचार क्रांति समाज को स्मार्ट मोबाइल क्रांति की ओर धकेल रही है। स्मार्ट मोबाइल के उपभोग के मामले में चीन ने सारी दुनिया को पीछे छोड़ दिया है। भारत में बिजली की कमी के अभाव में रूकी संचार क्रांति निकट भविष्य में स्मार्ट मोबाइल फोन से गति पकड़ेगी ।  स्मार्ट फोन के जरिए हम पीसी-लैपटॉप को भी जल्द ही पीछे छोड़ जाएंगे ।  

रविवार, 22 मई 2011

पराजय से क्या सही सबक लेगी माकपा ?- कुलदीप कुमार

                                                         
                                                       वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप कुमार

पश्चिम बंगाल और केरल में वाम मोर्चे को मिली चुनावी हार के बाद लगभग वही माहौल है जैसा 1991 में सोवियत यूनियन के विघटन के बाद था. वाम-विरोधियों के उत्साह का ठिकाना नहीं है. उनकी राय में अब वामपंथी राजनीति को ऐसी पटखनी मिल गयी है कि उसका फिर से उठना मुश्किल है. उधर वामपंथी, विशेषकर मार्क्सवादी, यह दिखाने में लगे हैं मानों कुछ हुआ ही न हो. हम हार गए तो क्या, हमें 41 प्रतिशत वोट नहीं मिले क्या? क्या इससे पता नहीं चलता कि हमारा जनाधार बरकरार है? हमारी हार तो सबको दीख रही है, पर जनाधार नहीं दीख रहा. ठीक है, कुछ गलतियां हुई हैं, लेकिन हमारी पार्टी में इतनी शक्ति है, हमारे यहाँ इतना आतंरिक लोकतंत्र है कि हम इन्हें दूर कर लेंगे.

लेकिन क्या चुनाव परिणामों की समीक्षा करने भर से यह सब हो जाएगा? क्या कम्युनिस्ट पार्टियों को कुछ अधिक बुनियादी सवालों पर विचार करने की ज़रुरत नहीं है? क्या उन्हें इस सवाल पर नहीं सोचना चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर लेनिनवादी पार्टी संगठन की संगति बैठती है या नहीं? दूसरे, क्या वह अब उपयोगी भी रह गया है या नहीं? चुनाव परिणाम आने के दो दिन बाद ही एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलितब्यूरो की सदस्य बृंदा कारत ने माओ की उक्ति को याद करते हुए कहा कि पार्टी सदस्यों को जनता के बीच इस तरह रहना चाहिए जैसे नदी के जल में मछली रहती है. आशा है कि उनकी पार्टी केवल चुनाव परिणामों की ही नहीं, अपने पिछले तीन दशकों के कामकाज की भी समीक्षा करेगी और देखेगी कि उसके कार्यकर्ता जनता के बीच जल में मछली की तरह रह रहे थे या मगरमच्छ की तरह.
दरअसल कम्युनिस्ट विचारपद्धति की सबसे बड़ी खामी यह है कि कम्युनिस्टों को अभिव्यक्ति और राजनीतिक कर्म की स्वतंत्रता सिर्फ अपने लिए चाहिए. यानी जब वे सत्ता के विरोध में हों. लेकिन स्वयं सत्ता में आने के बाद वे ये स्वतंत्रताएं दूसरों को नहीं देना चाहते. जैसा कि लेनिन ने पार्टी संगठन के अपने सिद्धांतों में स्पष्ट कर दिया था, स्वतंत्रता भी पार्टी हित के अधीन है. चूंकि पार्टी हित और क्रान्ति के हित में कोई फर्क नहीं है, इसलिए क्रान्ति के हित को ध्यान में रखते हुए सभी प्रकार की स्वतंत्रताओं को पार्टी हित के दायरे में ही देखा जाना चाहिए. सीपीआई हो या सीपीएम, क्रांति के लिए काम करने का दावा किसी ने भी नहीं छोड़ा है. यह एक अजीब विसंगति है कि पिछले छह दशकों से संसदीय व्यवस्था के भीतर काम करने और संविधान के दायरे में राज्य सरकारें चलाने के बावजूद दोनों पार्टियों का दावा है कि वे भारत में क्रान्ति लाने के लिए संघर्षरत हैं.
हर चीज़ को पार्टी हित के अधीन करने की लेनिनवादी धारणा का ही नतीजा था कि चौंतीस वर्षों के वामपंथी शासन के दौरान पश्चिम बंगाल में नौकरशाही और सीपीएम के पार्टी संगठन के बीच का फर्क लगभग समाप्त हो गया. पार्टी की स्थानीय कमिटियाँ जीवन के हर क्षेत्र में हस्तक्षेप करने लगीं. हर स्तर पर छोटे-छोटे तानाशाह पनपने लगे. कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघों के चुनाव मज़ाक बन कर रह गए क्योंकि उनमें अक्सर पदाधिकारी और कार्यकारिणी के सदस्य निर्विरोध चुने जाने लगे. विरोध करने वालों को सबक सिखाया जाने लगा. अवसरवादिता, भ्रष्टाचार और आतंक के ज़रिये बात मनवाने की प्रवृत्ति जड़ पकड़ने लगी. जो लोग समझते हैं कि पश्चिम बंगाल में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था और यदि सिंगूर तथा नंदीग्राम की घटनाएं न हुई होतीं तो राज्य में सत्ता-परिवर्तन नहीं होता, वे खासी ग़लतफ़हमी में हैं. लोगों के भीतर आक्रोश की आग बहुत समय से धधक रही थी. सिंगूर और नंदीग्राम की घटनाओं से वह बाहर आ गयी.
वाम मोर्चे की सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि थी भूमि सुधार. लेकिन ये भूमि सुधार उसके कार्यकाल के प्रारम्भिक वर्षों में ही हो गए थे. इनके कारण जीवन में क्या परिवर्तन आया था, इसका अहसास पुरानी पीढ़ी के किसानों को तो था, लेकिन जो किसान आज तीस वर्ष का है उसे नहीं, क्योंकि उसने तो आँख खोलते ही दुनिया को वैसा ही पाया था जैसी वह आज है. इसलिए उसके मन में वाम मोर्चा सरकार के लिए किसी प्रकार की कृतज्ञता नहीं है. वह तो यह देख रहा है कि उसके जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा. टीवी और इंटरनेट के इस युग में केवल शहर में रहने वालों की ही आशाएं-आकांक्षाएं नहीं बढ़ी हैं, गाँव वालों के भी सपनों में भी बदलाव आया है. ऐसे में वे यथास्थिति से संतुष्ट रहने वाले नहीं.
वाम मोर्चा सरकार ने बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर भी ध्यान नहीं दिया जो अपने आप में विस्मयकारी बात है. पश्चिम बंगाल में उसकी एक अन्य बहुत बड़ी उपलब्धि यह भी रही कि राज्य को उसने साम्प्रदायिक हिंसा से मुक्त रखा. लेकिन इसके अतिरिक्त कुछ भी ऐसा नहीं हुआ जिसके लिए राज्य के मुसलमान अल्पसंख्यक उसका शुक्रिया अदा करें. तसलीमा नसरीन को राज्य से खदेड़ कर सरकार ने सोचा कि वह मुसलमानों को रिझा सकेगी, लेकिन इससे केवल उनके बीच पनपने वाले इसलामवादी तत्वों को ही बल मिला. उधर रिजवानुल हक वाले मामले में स्पष्ट हो गया कि राज्य सरकार और प्रशासन एक धनी हिन्दू का पक्ष ले रहे हैं. अल्पसंख्यक वोट इसके बाद भी वाम मोर्चे के पक्ष में कैसे पड़ता?
उधर केरल में सीपीएम के अनुशासन की धज्जियां उड़ गयीं. वहां की राज्य इकाई में वी एस अच्युतानंदन और पिनाराई विजयन के दो गुट हैं जो एक दूसरे को फूटी आँख नहीं देख सकते. केंद्रीय नेतृत्व ने विजयन गुट की तरफदारी करते हुए पांच साल से मुख्यमंत्री के रूप में काम कर रहे अच्युतानंदन के खिलाफ चुनाव से ऐन पहले अविश्वास व्यक्त कर दिया और उनका टिकट काट दिया. जब पार्टी में ज़बरदस्त विरोध हुआ तो ठेठ अवसरवादिता का परिचय देते हुए उन्हें टिकट दे दिया. वहां हालत यह है कि विजयन की छवि एक उदारवादी लेकिन भ्रष्ट नेता की है तो अच्युतानंदन की छवि स्तालिनवादी किन्तु ईमानदार नेता की।
चुनाव परिणामों के विश्लेषण से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा अपनी वर्तमान स्थिति का आकलन और विश्लेषण. सीपीएम ने 1978 में सल्किया प्लेनम आयोजित करके वहां हुए विचार-विमर्श के बाद तय किया था कि अब उसकी प्राथमिकता हिंदी प्रदेशों में पार्टी के विस्तार की होगी. यह प्लेनम पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु के नेतृत्व वाली सरकार के गठन के एक साल बाद हुआ था. इसके बाद ही पार्टी का मुख्यालय कोलकाता से दिल्ली लाया गया. शुरू के एक-दो साल ज्योति बसु ने भी दिल्ली और हिंदी राज्यों के कुछ शहरों में जाकर जनसभाएं संबोधित कीं लेकिन फिर उनका उत्साह ठंडा पड़ गया और वह अपने राज्य में ही उलझ कर रह गए. उस समय सीपीएम पंजाब में काफ़ी मजबूत थी. उत्तर प्रदेश के भी कुछ हिस्सों में उसका अच्छा-खासा असर था. अन्य हिंदी प्रदेशों में भी उसकी थोड़ी-बहुत उपस्थिति थी. लेकिन आज क्या स्थिति है? आज वह हिंदी प्रदेशों से लगभग गायब हो चली है. सीपीआई की हालत भी ऐसी ही है. इसके बावजूद वर्ष 2008 में, जब सीपीएम की अगुवाई में वाम दलों ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस लिया था, वाम दलों का राष्ट्रीय राजनीति में अच्छा-खासा प्रभाव था. इस स्थिति में लौटने में अब उन्हें बहुत समय लगेगा.
सीपीएम के केरल और पश्चिम बंगाल के नेता अपने राज्यों में ही सीमित रहे. केंद्रीय नेतृत्व उन्होंने उन लोगों को सौंप दिया जिनका ज़मीनी आधार नहीं है. व्यक्ति के रूप में ये नेता बहुत प्रतिभाशाली, कर्मठ और सक्षम हो सकते हैं, लेकिन जनता की नब्ज़ पर इनकी उंगली कभी नहीं रही. अब इन राज्यों के नेताओं के सामने दो विकल्प हैं. या तो वे अपने-आपको अपने राज्य में पार्टी को मजबूत बनाने के प्रयास में पूरी तरह से झोंक दें, या फिर केंद्रीय नेतृत्व की ओर भी ध्यान दें. सीपीएम महासचिव प्रकाश कारत ने पिछले दिनों एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में बहुत भोलेपन के साथ कहा है कि पार्टी महासचिव पोलितब्यूरो सदस्यों में से एक होता है और वह सिर्फ पार्टी का प्रवक्ता है. वरना उसमें और दूसरों में कोई फर्क नहीं. लेकिन कम्युनिष पार्टियों के कामकाज से परिचित लोग जानते हैं कि वास्तविकता इससे बिलकुल भिन्न है. पार्टी महासचिव के पद का इस्तेमाल करके ही स्टालिन ने सोवियत संघ में अपना वर्चस्व कायम किया था. महासचिव के हाथ में संगठन के सारे सूत्र होंते हैं. वह पार्टी का ही नहीं, उसके द्वारा लागू की जा रही राजनीतिक लाइन का भी प्रतिनिधित्व करता है. किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी में यह नहीं हुआ कि पार्टी की लाइन बदल जाए पर महासचिव वही रहे. सीपीएम के इतिहास में ही इसके उदाहरण मिल जायेंगे. क्या पी. सुन्दरैया को लोग भूल गए हैं?
एक बात वाम-विरोधियों को भी याद रखनी चाहिए. जब तक समाज में शोषण, भूख, गरीबी और बेरोज़गारी है, वाम राजनीति की प्रासंगिकता बनी रहेगी. उस वाम राजनीति की बागडोर सीपीआई या सीपीएम या माओवादियों के हाथ में ही हो, ऐसा भी ज़रूरी नहीं है. वक़्त की ज़रुरत के मुताबिक़ जनता अपने संघर्ष के हथियार तैयार कर लेती है. लेकिन शोषण और उत्पीडन के खिलाफ संघर्ष कभी भी बंद नहीं होता. उसकी धार कभी तेज़ और कभी कुंद अवश्य हो सकती है. इन दिनों मनमोहन सिंह की सरकार जिस तरह की नव-उदारवादी नीतियाँ अपना रही है, वे केवल अमीरों के प्रति उदार हैं. आम आदमी से उन्हें कोई सरोकार नहीं. ऐसे में वाम राजनीति के लिए स्वयं के पुनराविष्कार का सुनहरी मौक़ा है. देश में उसका प्रभाव तभी फ़ैल सकता है जब आम आदमी अपने जीवन में उसकी उपस्थिति की ज़रुरत महसूस करे और उसके माध्यम से अपने सपनों के साकार होने की संभावना देखे. वाम दल अपनी चुनावी पराजय से सबक सीख कर आगे बढ़ेंगे, तभी राष्ट्रीय राजनीति में सार्थक हस्तक्षेप कर सकेंगे.
( 22 मई के जनसत्ता में प्रकाशित ,जनसत्ता से साभार)

मंगलवार, 3 मई 2011

भ्रष्टाचार,क्रांति और साहित्य

राजनीति में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है लेकिन साहित्य में यह कभी मुद्दा ही नहीं रहा। यहां तक संपूर्ण क्रांति आंदोलन के समय नागार्जुन ने भ्रष्टाचार पर नहीं संपूर्ण क्रांति पर लिखा,इन्दिरा गांधी पर लिखा। जबकि यह आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था। क्या वजह है लेखकों को भ्रष्टाचार विषय नहीं लगता। जबकि हास्य-व्यंग्य के मंचीय कवियों ने भ्रष्टाचार पर जमकर लिखा है। साहित्य में भ्रष्टाचार की अनुपस्थिति इस बात का संकेत है कि लेखक इसे मसला नहीं मानते। दूसरा बड़ा कारण साहित्य का मासकल्चर के सामने आत्म समर्पण और उसके साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश करना है। साहित्य में मूल्य,नैतिकता,परिवार और राजनीतिक भ्रष्टाचार पर खूब लिखा गया है लेकिन आर्थिक भ्रष्टाचार पर नहीं लिखा गया है। आर्थिक भ्रष्टाचार सभी किस्म के भ्रष्टाचरण की धुरी है। यह प्रतिवाद को खत्म करता है। उत्तर आधुनिक अवस्था का यह प्रधान लक्षण है।    इसकी धुरी है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार। इसके साथ नेताओं में संपदा संचय की प्रवृत्ति बढ़ी है। अबाधित पूंजीवादी विकास हुआ है। उपभोक्तावाद की लंबी छलांग लगी है और संचार क्रांति हुई है। इन लक्षणों के कारण सोवियत अर्थव्यवस्था धराशायी हो गयी। सोवियत संघ और उसके अनुयायी समाजवादी गुट का पराभव हुआ। फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में यह आधुनिकीकरण की छलयोजनाहै। अस्सी के दशक से सारी दुनिया में सत्ताधारी वर्गों और उनसे जुड़े शासकों में पूंजी एकत्रित करने,येन-केन प्रकारेण दौलत जमा करने की लालसा देखी गयी। इसे सारी दुनिया में व्यवस्थागत भ्रष्टाचार कहा जाता है और देखते ही देखते सारी दुनिया उसकी चपेट में आ गयी। आज व्यवस्थागत भ्रष्टाचार सारी दुनिया में सबसे बड़ी समस्या है। पश्चिम वाले जिसे रीगनवाद,थैचरवाद आदि के नाम से सुशोभित करते हैं यह मूलतः 'आधुनिकीकरण की छलयोजना' है , इसकी धुरी है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार।रीगनवाद-थैचरवाद को हम नव्य आर्थिक उदारतावाद के नाम से जानते हैं । भारत में इसके जनक हैं नरसिंहाराव-मनमोहन । यह मनमोहन अर्थशास्त्र है। भ्रष्टाचार को राजनीतिक मसला बनाने से हमेशा फासीवादी ताकतों को लाभ मिला है। यही वजह है लेखकों ने आर्थिक भ्रष्टाचार को कभी साहित्य में नहीं उठाया। भ्रष्टाचार वस्तुतः नव्य उदार आर्थिक नीतियों से जुड़ा है। आप भ्रष्टाचार को परास्त तब तक नहीं कर सकते जबतक नव्य उदार नीतियों का कोई विकल्प सामने नहीं आता।
    भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन प्रतीकात्मक प्रतिवादी आंदोलन रहे हैं।  इन आंदोलनों को सैलीब्रिटी प्रतीक पुरूष चलाते रहे हैं। ये मूलतःमीडिया इवेंट हैं। ये जनांदोलन नहीं हैं। प्रतीक पुरूष इसमें प्रमुख होता है। जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से लेकर अन्ना हजारे के जन लोकपाल बिल आंदोलन तक इसे साफ तौर पर देख सकते हैं। मीडिया पुरूष हैं। इवेंट पुरूष हैं। इनकी अपनी वर्गीय सीमाएं हैं और वर्गीय भूमिकाएं हैं। प्रतीक पुरूषों के संघर्ष सत्ता सम्बोधित होते हैं जनता उनमें दर्शक होती है। टेलीविजन क्रांति के बाद पैदा हुई मीडिया आंदोलनकारियों की इस विशाल पीढ़ी का योगदान है कि इसने जन समस्याओं को मीडिया टॉक शो की समस्याएं बनाया है। अब जनता की समस्याएं जनता में कम टीवी टॉक शो में ज्यादा देखी -सुनी जाती हैं। इनमें जनता दर्शक होती है। इन प्रतीक पुरूषों के पीछे कारपोरेट मीडिया का पूरा नैतिक समर्थन है।  
     उल्लेखनीय है भारत को महमूद गजनवी ने जितना लूटा था उससे सैंकड़ों गुना ज्यादा की लूट नेताओं की मिलीभगत से हुई है। नव्य उदार नीतियों का इस लूट से गहरा संबंध है। चीन और रूस में इसका असर हुआ है चीन में अरबपतियों में ज्यादातर वे हैं जो पार्टी मेंम्बर हैं या हमदर्द हैं,इनके रिश्तेदारसत्ता में सर्वोच्च पदों पर बैठे हैं। यही हाल सोवियत संघ का हुआ। 
    भारत में नव्य उदारतावादी नीतियां लागू किए जाने के बाद नेताओं की सकल संपत्ति में तेजी से वृद्धि हुई है। सोवियत संघ में सीधे पार्टी नेताओं ने सरकारी संपत्ति की लूट की और रातों-रात अरबपति बन गए। सरकारी संसाधनों को अपने नाम करा लिया। यही फिनोमिना चीन में भी देखा गया। उत्तर आधुनिकतावाद पर जो फिदा हैं वे नहीं जानते कि वे व्यवस्थागत भ्रष्टाचार और नेताओं के द्वारा मचायी जा रही लूट में वे मददगार बन रहे हैं। मसलन गोर्बाचोव के नाम से जो संस्थान चलता है उसे अरबों-खरबों के फंड देकर गोर्बाचोव को रातों-रात अरबपति बना दिया गया। ये जनाव पैरेस्त्रोइका के कर्णधार थे। रीगन से लेकर क्लिंटन तक और गोर्बाचोब से लेकर चीनी राष्ट्रपति के दामाद तक पैदा हुई अरबपतियों की पीढ़ी की तुलना जरा हमारे देश के सांसदों-विधायकों की संपदा से करें। भारत में सांसदों-विधायकों के पास नव्य आर्थिक उदारतावाद के जमाने में जितनी तेजगति से व्यक्तिगत संपत्ति जमा हुई है वैसी पहले कभी जमा नहीं हुई थी। अरबपतियों-करोड़पतियों का बिहार की विधानसभा से लेकर लोकसभा तक जमघट लगा हुआ है। केन्द्रीयमंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक सबकी दौलत दिन -दूनी रात चौगुनी बढ़ी है। नेताओं के पास यह दौलत किसी कारोबार के जरिए कमाकर जमा नहीं हुई है बल्कि यह अनुत्पादक संपदा है जो विभिन्न किस्म के व्यवस्थागत भ्रष्टाचार के जरिए जमा हुई है। कॉमनवेल्थ भ्रष्टाचार, 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला आदि तो उसकी सिर्फ झांकियां हैं। अमेरिका मे भयानक आर्थिकमंदी के बाबजूद नेताओं की परिसंपत्तियों में कोई गिरावट नहीं आयी है। कारपोरेट मुनाफों में गिरावट नहीं आयी है। भारत में भी यही हाल है।
 इसी संदर्भ में फ्रेडरिक जेम्सन ने मौजूदा दौर में मार्क्सवाद की चौथी थीसिस में लिखा है इस संरचनात्मक भ्रष्टाचार का नैतिक मूल्यों के संदर्भ में कार्य-कारण संबंध के रूप में व्याख्या करना भ्रामक होगा क्योंकि यह समाज के शीर्ष वर्गों में अनुत्पादक ढंग से धन संग्रह की बिलकुल भौतिक सामाजिक प्रक्रिया में उत्पन्न होती है।    इस बात पर बल देना अनिवार्य है कि कार्य-कुशलता, उत्पादकता और वित्तीय संपन्नता जैसे संवर्ग तुलनात्मक हैं। अभिप्राय यह है कि उनके परिणामों की भूमिका उस क्षेत्र में आती है जिसमें अनेक असमान परिघटनाएं प्रतिस्पर्धा कर रही हों। अधिक कार्यकुशल और उत्पादक तकनीकी पुरानी मशीनरी और पुराने संयंत्र को तभी विस्थापित करती हैं, जब पुरानी मशीनरी और संयंत्र अधिक कार्यकुशल तथा आधुनिक तकनीकी के कार्यक्षेत्र में प्रवेश करते हैं और उनके साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं।
    इसी बात को सोवियत संघ के संदर्भ में आगे बढ़ाते हुए जेम्सन ने लिखा सोवियत संघ अकुशल हो गया और जब इसने अपने को 'विश्व-तंत्र' के साथ एकीकृत करने का प्रयास किया, तो यह विघटित हो गया क्योंकि विश्व-तंत्र आधुनिकता से उत्तरआधुनिकता की ओर अग्रसर था। यह एक ऐसा तंत्र था जो संचालन के नए नियमों के हिसाब से उत्पादकता की अतुलनीय द्रुत गति से दौड़ रहा था। वहीं सोवियत संघ में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसकी इससे तुलना की जा सके। सांस्कृतिक अभिप्रेरकों (उपभोक्तावाद, नई सूचना प्रौद्योगिकी आदि) द्वारा प्रेरित, सुविचारित सामरिक-तकनीकी प्रतिस्पर्धा में आकृष्ट होकर, ऋण तथा तीव्र होते वाणिज्यिक सह-अस्तित्व के रूपों के प्रलोभन में आकर रूस एक ऐसे तत्व में प्रवेश कर गया जहां इसका अस्तित्व समाप्त हो गया। यह दावा किया जा सकता है कि सोवियत संघ और इसके अनुषंगी देश, जो अब तक अपने ही विशिष्ट दबाव क्षेत्र में अलग-अलग थे मानो किसी विचारधारात्मक सामाजिक, आर्थिक, भूगणितीय उभार (गुंबज) के नीचे दबे हों,इसने अविवेकपूर्ण ढंग से बिना अंतरिक्ष-पोशाक तैयार किए ही वायुबंध खोलना आरंभ कर दिया और इस प्रकार स्वयं को और अपने संस्थानों को बाह्य विश्व के तीव्र और अपरिमेय दबाव के हवाले कर दिया। इसके परिणाम की तुलना हम प्रथम परमाणु बम के विस्फोट से हुई उन तुच्छ ढांचों की हालत से कर सकते हैं जो इस बम विस्फोट के स्थल के सबसे नजदीक थे, या फिर उन असुरक्षित जीवों की हालत से कर सकते हैं जो समुद्र तल पर उपस्थित थे जब जल में उत्पन्न विकृत दबाव का भार उन पर पड़ा होगा, खासकर जब यह दबाव से ऊपर की ओर उठ रहा होगा। यह परिणाम वॉलरस्टीन की दूरदर्शितापूर्ण चेतावनी की पुष्टि करता है। उन्होंने कहा था कि सोवियत ब्लॉक ने अपनी महत्ता के बावजूद पूंजीवादी तंत्र के विकल्प के रूप में किसी तंत्र का निर्माण नहीं किया। बल्कि इसके भीतर एक तंत्र-विरोधी क्षेत्र या स्थान बनाया, जो अब स्पष्टतया समाप्त हो गया है। यदि शेष कुछ बचे हैं तो वे कुछ पॉकेट्स हैं जिनमें आज भी विविध समाजवादी प्रयोग किए जा रहे हैं।
उत्तर आधुनिकतावाद के दौर में क्रांति पर सबसे तेज हमले हुए हैं। इन हमलों के आंतरिक और बाह्य दोनों ही किस्म के रूप हैं। क्योंकि उत्तर आधुनिकता के दौर पर क्रांति की अवधारणा के खिलाफ जितना लिखा गया है उतना अन्य किसी अवधारणा के बारे में नहीं लिखा गया है। क्रांति संबंधी बहस का बृहत्तर रूप में गहरा संबंध सिद्धांत और व्यवहार की एकता के साथ है। इस प्रसंग में पहली बात यह कि क्रांति का वास्तव अर्थ इन दिनों विकृत हुआ है। उसका अवमूल्यन हुआ है। क्रांति का अर्थ परिवर्तन मान लिया गया है और प्रत्येक परिवर्तन को क्रांति कहने का रिवाज चल निकला है। क्रांति के अर्थ का यह विकृतिकरण है। क्रांति का अर्थ है बुनियादी या आमूल-चूल परिवर्तन। क्रांति पर बहस करते हुए आमतौर पर कुछ इमेजों,कुछ आख्यानों, कुछ देशों ,कुछ खास क्षण विशेष आदि का जिक्र किया जाता है। क्रांति पर बात करने के लिए उसे साम्यवादी और साम्यवादविरोधी विचारकों और प्रचार सामग्री के द्वारा निर्मित इमेजों से बाहर आकर देखने की जरूरत है।
      क्रांति अनंत क्षण में नहीं बल्कि समकालिक क्षण में घटित होती है। इसमें प्रत्येक चीज एक-दूसरे जुड़ी होती है। क्रांति का मतलब राजतंत्र या समाजतंत्र का सुधार या अल्प सुधार नहीं है क्रांति का मतलब किसी काल्पनिक मानसिक जगत में परिवर्तन से नहीं है। बल्कि इसका संबंध आमूल-चूल परिवर्तन से है। ये परिवर्तन एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं। क्रांति कोई बनीबनायी परंपरा का निर्माण नहीं है। बल्कि मूलभूत परिवर्तनों का पुनरान्वेषण है। क्रांति कोई तयशुदा तर्कसंघर्ष नहीं है । इसी प्रसंग में प्रसिद्ध मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने तीसरी थीसिस में लिखा है ,सामाजिक क्रांति अनंत समय का एक क्षण मात्र नहीं है। प्रत्युत समकालिक तंत्र में परिवर्तन की आवश्यकता की पुष्टि है, जिसमें हर चीज एक साथ है और एक दूसरे से अंतर्संबधित है। इस प्रकार का तंत्र संपूर्ण तंत्रगत परिवर्तन की मांग करता है, न कि अल्प 'सुधार', जिसे निंदात्मक अर्थ में 'मनोराज्य विषयक' कहा जाता है, जो भ्रामक है, व्यवहार्य नहीं। अभिप्राय यह है कि यह तंत्र वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के स्थान पर एक रैडिकल सामाजिक विकल्प की विचारधारात्मक दृष्टि की मांग करता है, ऐसा कुछ जिसे वर्तमान तर्कमूलक संघर्ष के अंतर्गत दिया हुआ या विरासत में मिला नहीं माना जाए, बल्कि जो पुनरान्वेषण की मांग करे। धार्मिक रूढ़िवाद (चाहे वह इसलामी, ईसाई, या हिंदू रूढ़िवाद हो) जो उपभोक्तावाद या 'अमरीकी जीवन शैली' का रैडिकल विकल्प देने का दावा करता है, तभी महत्वपूर्ण अस्तित्व प्राप्त करता है जब पारंपरिक वाम विकल्प खासकर मार्क्सवाद और साम्यवाद की महान क्रांतिकारी परंपराएं अचानक अनुपलब्ध प्रतीत होने लगती हैं। क्रांति एक प्रक्रिया है और समकालिक परवर्ती पूंजीवादी तंत्र का अवसान भी है। लेकिन इसका प्रस्थान बिंदु राष्ट्रीय सप्रभुता की रक्षा के सवालों से आरंभ होता है। परवर्ती पूंजीवाद के जमाने में राष्ट्रीय संप्रभुता ही दांव पर लगी है। किसी भी देश को स्वतंत्र रूप से अपनी नीतियां बनाने और विकास करने का हक नहीं है। क्रांतिकारी ताकतों का यह विश्व एजेण्डा है।क्रांतिकारी ताकतों का आंतरिक एजेण्डा है हाशिए के लोगों को उनकी जनवादी मांगों के इर्दगिर्द एकजुट करना। समाज में प्रत्येक व्यक्ति को संघर्ष की अवस्था में इस या उसके साथ खड़े होने,प्रतिबद्ध होने के लिए तैयार करना। परवर्ती पूंजीवाद ने गैर प्रतिबद्धता की हवा चला दी है,इस हवा को जनवादी प्रतिबद्धता के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है। आम लोगों को जनवादी विचारों के प्रति प्रतिबद्ध बनाना,हाशिए के लोगों की जनवादी मांगों के आधार पर एकजुट करना, उनके संगठनों और संघर्षों को आयोजित करना वास्तव अर्थों में क्रांति के मार्ग पर ही चलना है।






रविवार, 24 अप्रैल 2011

नव्य उदार यथार्थ और मार्क्सवादी असफलताएं



      मार्क्सवादी आलोचक फ्रेडरिक जेम्सन ने मौजूदा दौर के संदर्भ में मार्क्सवाद की पांच थीसिस प्रतिपादित की हैं। इनमें दूसरी थीसिस में उन्होंने उन खतरों की ओर ध्यान खींचा है जो मार्क्सवाद के लिए आ सकते हैं या आए हैं और जिनसे मार्क्सवादी आंदोलन को धक्का लगा है। उत्तर आधुनिक परिस्थितियों के आने के साथ मार्क्सवादी चिंतन को नव्य उदार आर्थिक नीतियों और उसके गर्भ से पैदा हुए बाजार ने सबसे बड़ा खतरा पैदा किया है।नव्य उदारतावाद के खिलाफ विचारधारात्मक संघर्ष में मार्क्सवादी आम लोगों का दिल जीतने ,उन्हें इसके परिणामों के बारे में समझाने में असमर्थ रहे। इस समस्या के दो स्तर थे, पहला स्तर स्वयं मार्क्सवादियों के लिए था वे खुद समझ ही नहीं पाए कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों का क्या परिणाम निकलेगा। उनका इन नीतियों के प्रति तदर्थ रवैय्या था। जब वे स्वयं दुविधाग्रस्त थे तो वे अन्य को कैसे समझाते ? इससे संकट और भी गहरा हो गया।
   दूसरी समस्या यह आयी कि नव्य उदार परिवर्तनों के गर्भ से जो परिवर्तन पैदा हुए उनसे मार्क्सवादी लाभ नहीं उठा पाए। वे उस यथार्थ को पकड़ ही नहीं पाए जो नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से जन्मा है। उन्हें यह सामान्य सी बात समझ में नहीं आई कि कम्यूटर आज के मनुष्य की अपरिहार्य जरूरत है। भारत में लंबे समय तक अनेक मार्क्सवादी कम्प्यूटरीकरण के पक्ष में नहीं थे। लंबे अर्से के बाद उन्होंने हथियार डाले। इस चक्कर में मजदूरवर्ग को उन्होंने पिछड़ी कठमुल्ला चेतना के हवाले कर दिया। पश्चिम बंगाल और केरल कम्प्यूटर क्रांति में पिछड गए और बाकी देश आगे निकल गया। समूचा सोवियत संघ और पुराना समाजवादी देशों का समूह इस परिवर्तन को नहीं समझने के कारण तबाह हो गया। सोचिए 18 साल तक सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने पार्टी कॉमरेड वैज्ञानिकों को काफ्रेंस में कम्प्यूटर की उपयोगिता पर बहस करने की अनुमति नहीं दी।
   उत्तर आधुनिकतावाद के संदर्भ में मार्क्सवादियों की सफलताएं कम हैं असफलताएं ज्यादा हैं। सबसे बड़ी असफलता है नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से पैदा हुई असुरक्षा, अव्यवस्था,विस्थापन और भय को संगठनबद्ध न कर पाना। नव्य उदार दौर में मजदूरवर्ग के क्षय को वे रोक नहीं पाए और असंगठित मजदूरवर्ग की तबाही को अपने संगठनों के जरिए एकजुट नहीं कर पाए। आज महानगरों में लाखों असंगठित मजदूर हैं जो किसी भी वाम संगठन में संगठित नहीं हैं।
     मजदूरवर्ग के अंदर नव्य उदारतावाद ने जो भय पैदा किया उसे भी प्रभावशाली ढ़ंग से मार्क्सवादी लिपिबद्ध नहीं कर पाए। इसका व्यापक दुष्परिणाम निकला है,मजदूरों की आवाज सामान्य वातावरण से गायब हो गयी है। दूसरी ओर नव्य उदारपंथी एजेण्डा वाम संगठनों में आ घुसा है। वे इससे बचने की युक्ति वे नहीं जानते।
   इसी प्रसंग में फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा, तर्कमूलक संघर्ष (जैसा कि यह सीधी वैचारिक लड़ाई के विरुध्द है) अपने विकल्पों की साख समाप्त करके और थीमैटिक प्रसंगों की एक पूरी श्रृंखला को अनुल्लेखनीय घोषित करके सफलता हासिल करता है। यह राष्ट्रीकरण, विनियमन, घाटा व्यय, कीन्सवाद, नियोजन, राष्ट्रीय उद्योगों की सुरक्षा, सुरक्षा नेट, तथा अंतत: स्वयं कल्याणकारी राज्य जैसी पूर्ववर्ती गंभीर संभावनाओं को निर्णायक रूप में अवैध घोषित करने के लिए क्षुद्रीकरण, निष्कपटता, भौतिकस्वार्थ, 'अनुभव', राजनीतिक भय ऐतिहासिक सबक को 'आधार' मानने का आग्रह करता है। कल्याणकारी राज्य को समाजवाद बताना बाजारवाद का उदारवादियों (अमरीकी प्रयोग में जैसा कि 'न्यू डील लिबरल्स' में किया गया है) तथा वामपंथियों दोनों पर दोहरी जीत दिलाता है। इस प्रकार आज वामपंथ ऐसी स्थिति में आ गया है जब उसे बड़ी सरकारों या कल्याणकारी राज्यों का समर्थन करना पड़ रहा है। सामाजिक प्रजातंत्र की समीक्षा करने की जो वामपंथियों की विस्तृत और परिष्कृत परंपरा रही है, उसके लिए यह कार्य खासकर वामपंथियों को इतिहास की द्वंद्वात्मक समझ जितनी होनी चाहिए उतनी नहीं होने के कारण बेहद लज्जित करने वाला है।
 मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने आगे लिखा है इसी बीच मनोराज्य (यूटोपिया) से जुड़ी चिंताएं जो इस भय से उत्पन्न होती हैं कि हमारी वर्तमान पहचान, हमारी आदतें और आकांक्षा पूर्ति के तरीकों का निर्माण करने वाली चीज कतिपय नई सामाजिक व्यवस्था में समाप्त हो जाएगी तथा सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आज कुछ समय पहले की तुलना में अधिक संभव है। स्पष्टतया दुनिया के आधे से अधिक भाग में और न केवल प्रभावशाली वर्गों में आज निस्सहाय लोगों के जीवन में परिवर्तन की आशा का स्थान 'नष्ट हो जाने के भय' ने ले लिया है। इस प्रकार की मनोराज्य-विरोधी (एंटी-यूटोपियन) चिंताओं को दूर करना अनिवार्य है जो कि सांस्कृतिक निदान और उपचार के रूप में किया जाना चाहिए न कि बाजार के सामान्य बहस और अलंकार की इस या उस विशेषता से सहमति जताकर इससे बचना चाहिए।
मानव-स्वभाव मूल रूप से अच्छा और सहयोगी है या फिर बुरा और आक्रामक। यदि यह सर्वसत्तात्मक राज्य (लेवियाथन) को नहीं तो कम से कम बाजार को वश में रखने की अपेक्षा करता है, ये सारे तर्क वास्तव में मानवतावादी और विचारधारात्मक हैं (जैसा कि अल्थूसर ने कहा है) और इसके स्थान पर रैडिकल परिवर्तन और सामूहिक परियोजना का परिप्रेक्ष्य लाना चाहिए। साथ ही वामपंथियों को बड़ी सरकारों या फिर कल्याणकारी राज्यों का आक्रामक रूप से बचाव करना चाहिए तथा मुक्त बाजार के ऐतिहासिक ध्वंसात्मक रिकार्ड को देखते हुए बाजारवाद पर लगातार प्रहार करते रहना चाहिए ।
     मार्क्सवादी के लिए साम्यवाद या कम्युनिस्ट पार्टी पूजा की चीज नहीं है। मार्क्सवादी के लिए वैज्ञानिक ढ़ंग से इस समाज को समझना और उस परिवर्तन के तर्क को समझना जरूरी होता है जिसके कारण परिवर्तन घट रहे हैं। पुराने साम्राज्यवाद के दौर में पूंजीवाद का केन्द्र था इंग्लैण्ड,बाद में द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर में अमेरिका केन्द्र बना।नव्य उदारतावाद के आरंभ में अमेरिका ही पूंजीवाद का गोमुख था। लेकिन नव्य उदारतावाद के अगले चरण में यानी मौजूदा दौर में पूंजीवाद का केन्द्र चीन है,अमेरिका नहीं। कारपोरेट और लंपट पूंजीवाद की इसमें सभी खूबियां हैं। सब कुछ हजम कर जाने का इसमें भाव है। विश्व बाजार में छा जाने ,सब कुछ बनाने और सस्ता उपलब्ध कराने का नजरिया है। इस समाविष्टकारी भाव से सारी दुनिया में देशज उद्योगों के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया है।
    एक जमाना था चीन में कम से कम चीजें पैदा होती थीं। सारा देश पांच किस्म के कपड़े पहनता था। सारा देश साइकिल पर चलता था। लेकिन विगत 30 सालों में उसने सब कुछ बदल दिया है। उत्पादन और जिन्सों के उत्पादन में तो उसने क्रांति की है। किसी वस्तु को सस्ते में बनाना,बाजार में इफ़रात में उपलब्ध कराना और बाजार को घेरे रखना। बड़ी पूंजी को आकर्षित करना,श्रम और श्रमिक को सस्ते माल में लब्दील करना। मैन्यूफेक्चरिंग की ताकत को ऐसे समय में स्थापित करना जब सारी दुनिया मैन्यूफैक्चरिंग छोड़कर सेवाक्षेत्र की ओर आंखें बंद करके भाग रही थी।अपने आप में महान उपलब्धि है।
     उत्पादन और खूब उत्पादन का नारा लगाकर चीन ने उत्पादन और उत्पादकों की महत्ता स्थापित की है। तंत्रगत संकटों को उसने अभिनव परिवर्तनों और प्रौद्योगिक क्रांति के जरिए संभाला है। विकास की तेजगति को बरकरार रखा है। साथ ही उत्पादन की गति को बनाए रखकर कारपोरेट पूंजीवाद को नए सिरे से पुनर्गठित किया है। इन परिवर्तनों को उत्तर मार्क्सवाद के आधार पर ही परखा जा सकता है। चीन और अमेरिका के नव्य उदार आर्थिक परिवर्तन पुराने मार्क्सवाद से नहीं उत्तर मार्क्सवाद से ही समझ में आ सकते हैं।
  नव्य उदार परिवर्तनों का विश्व में सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है। लेकिन यहां पर हम वामपंथ पर जो प्रभाव पड़ा है उसकी समीक्षा तक ही फिलहाल सीमित रखेंगे। वामपंथ पर नव्य उदारतावाद के प्रभाव को हम इस रूप में देख तकते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां अब अपने बुनियादी मसलों पर विचारधारात्मक संघर्ष नहीं कर रही हैं बल्कि उन मसलों पर संघर्ष कर रही हैं जो पूंजीवादी मसले हैं। पूंजीवादी विचारधारा के द्वारा निर्मित मसले हैं।  
   इन दिनों कम्युनिस्टों का संघर्ष समाजवाद के लिए नहीं चल रहा बल्कि कल्याणकारी राज्य को बचाने के लिए चल रहा है। भारत से लेकर अमेरिका तक सभी जगह कम्युनिस्ट पार्टियां कल्याणकारी राज्य को बचाने के एजेण्डे में फंस गयी हैं।कल्याणकारी राज्य आंतरिक गुलामी का परिवेश तैयार करता है।
  नव्य उदारतावाद के आने के साथ ही अनेक समाजवादी देशों ने समाजवाद को त्यागकर कारपोरेट पूंजीवाद का मार्ग पकड़ लिया। यह काम अकारण सभी किस्म के मार्क्सवादी मूल्यों और मान्यताओं को त्यागकर किया गया। भारत में आज कम्युनिस्ट पार्टियां कल्याणकारी राज्य के एजेण्डे को लेकर ही हल्ला मचा रही हैं। जबकि पूंजीपतिवर्ग ने कल्याणकारी पूंजीवाद के मार्ग को तिलांजलि दे दी है और नव्य उदार आर्थिक कारपोरेट पूंजीवादी विकास का मार्ग ग्रहण कर लिया है। अनेक अवसरों पर कम्युनिस्टों में भी वे तमाम विकृतियां देखने को मिलती हैं जो कल तक पूंजीवादी दलों में हुआ करती थीं। वे पूंजीवादी विकृतियों को समझने और उनके खिलाफ अनवरत संघर्ष चलाने में असमर्थ रहे हैं।
   पहले लोग बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के सवालों को पसंद करते थे। उनके लिए कुर्बानी देने के लिए तैयार रहते थे। लेकिन नव्य उदार प्रचार अभियान के कारण आम आदमी बुनियादी सामाजिक परिवर्तनो से डरने लगा है। जोखिम उठाने से डरने लगा है। बहस करने से बचने लगा है। वह इस या उसकी हां में हां मिलाकर सामंजस्य बिठाकर यथास्थितिवाद के सामने समर्पण कर चुका है। अब हमारे बीच में बुनियादी मसलों पर बहसें कम हो रही हैं,कचरा विषयो पर बहसें ज्यादा हो रही हैं।
    मसलन हाल ही में उठे 2जी घोटाले को ही लें। मीडिया और संसद बहस कर रही है पूर्व संचारमंत्री ए.राजा ने 1 लाख 75 हजार करोड़ का देश को चूना लगा दिया। नियम तोड़े। घूस ली बगैरह-बगैरह। इस प्रसंग में आम लोग,मीडिया और सांसद यह बात नहीं कर रहे कि आखिरकार ये रेडियो तरंगें किसकी हैं  ? क्या इन्हें बेचा जा सकता था ? क्या रेडियो तरंगे कारपोरेट पूंजी की सेवा के लिए आवंटित की जाती हैं ? रेडियो तरंगे राष्ट्र की संपदा हैं और इन्हें हमारा देश अंतर्राष्ट्रीय संचार समझौते के तहत अंतर्राष्ट्रीय संस्था के जरिए आवंटन के माध्यम से प्राप्त करता है। इन्हें बेचा नहीं जा सकता। क्योंकि ये राष्ट्र की संपत्ति हैं। वैसे ही जैसे भारत के ऊपर का आकाश भारत का है उसे बेचा नहीं जा सकता। समुद्र को बेचा नहीं जा सकता। संसद भवन बेचा नहीं जा सकता।ताजमहल बेचा नहीं जा सकता। बजट घाटे को कम करने के नाम पर रेडियो तरंगों का कारपोरेट घरानों को आवंटन देशद्रोह है,देशभक्ति नहीं है। सवाल उठता है देशद्रोह बड़ा अपराध है या भ्रष्टाचार ?कायदे से रेडियो तरंगे बेची नहीं जानी चाहिए। लेकिन संसद में कभी भी किसी भी दल के सांसदों ने रेडियो तरंगों के निजी हाथों बेचे जाने का विरोध नहीं किया,आज भी वे विरोध नहीं कर रहे बल्कि यह कह रहे हैं कि नए सिरे से इनका आवंटन बाजार दर पर करवा दो और राष्ट्र को 1लाख 75 हजार करोड़ रूपये दिलवा दो। उनकी रूचि राष्ट्र को पैसा दिलवाने में हैं तरंगों को राष्ट्र के खाते में बचाने में नहीं है। यहीं पर उत्तर आधुनिक समाज की आयरनी छिपी है। हम जानते ही नही हैं कि राष्ट्र हित क्या हैं ? कारपोरेट हितों को राष्ट्रहित समझ रहे हैं और यही नव्य उदार प्रौपेगैण्डा की जीत है।बजट घाटे को कम करना देशसेवा है चाहे रेडियो तरंगें बेचनी पड़ें। धन्य हैं ये देशभक्त जो देश की संपदा (रेडियो तरंगें) बेचकर देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं।  यह नव्य उदार प्रौपेगैण्डा की जीत है । आज मीडिया में सारे राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी बहस के उन मसलों पर उलझे हैं जो बाजार के मसले हैं,सतही मसले हैं। बहस-मुबाहिसे में बाजार का लक्ष्य प्रधान हो गया है और बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के सवाल बहस से गायब हो गए हैं। उपभोग के सवालों पर बहस कर रहे हैं ,उत्पादन के सवालों पर नहीं। भ्रष्टाचार पर बहस कर रहे हैं भूख पर नहीं। नरेगा के कार्यान्वयन पर उलझे हैं गांव की गरीबी पर नहीं। यह विचारधारात्मक अवमूल्यन है।      


रविवार, 3 अप्रैल 2011

नामवर सिंह और ग्लोबल प्रेत


      हिन्दी में इन दिनों उत्तर आधुनिकतावाद और उत्तर औपनिवेशिकता पर खूब विमर्श हो रहे है। मजेदार बात यह है कि इस विमर्श में ज्ञानी-अज्ञानी दोनों ही भाग ले रहे हैं। वे लोग भी भाग ले रहे हैं जिनके लिए यह सिद्धान्त अमेरिकी षडयंत्र है। ऐसे ही विचारों के मानने वालों में हिन्दी की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'आलोचना' (जुलाई-सितम्बर,2002 ) ने एक अंक "उत्तर आधुनिक दौर में इतिहास" शीर्षक से विशेष सामग्री के साथ निकाला था। इस अंक का जिक्र अचानक करने की इच्छा इसलिए हुई कि इसमें जितने लेख हैं वे किसी न किसी रूप में घूम-फिरकर उत्तर आधुनिकता के सवालों पर रोशनी डालते हैं। इसी अंक में नामवर सिंह का महत्वपूर्ण लेख है 'इतिहास के प्रेत', यह लेख नामवर सिंह का व्यंग्यपूर्ण बहुत ही सुंदर लेख है। समस्या सिर्फ यह है कि नामवर सिंह ने जिस भाव से उत्तर आधुनिक विमर्श में भाग लिया है वह उत्तर आधुनिक भाव नहीं है। बल्कि यह उत्तर-मार्क्सवादी भाव है।  इस लेख में नामवर सिंह ने कई मजेदार बातें कही हैं जो आलोचना की कु-व्याख्या से जुड़ी हैं। इसमें नामवर सिंह ने फ्रांसीसी विचारक और दार्शनिक ज्याक देरिदा की किताब  स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्स के हवाले से प्रेत के रूपक पर रोशनी डाली है। इस रूपक पर नामवर सिंह को देरिदा भी प्रेत पीड़ित दिखाई पड़े। लिखा , "देरिदा ने ऐसा चमत्कारपूर्ण विखंडन किया कि मार्क्स का समस्त साहित्य यहाँ से वहाँ तक प्रेतों से ही प्रतिच्छायित प्रतीत होने लगा और देखते ही देखते देरिदा की विखंडन -विधि एक नई ' प्रेत विद्या' में बदल गई ! वैसे भी इतिहास के अंत के बाद तो इतिहास के प्रेत ही बचे रहते हैं। इसीलिए इस पुस्तक में देरिदा जोर देकर कहते हैं कि अब प्रेतों से बात करने,प्रेतों के बारे में बात करने,प्रेतों के साथ रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं। गरज कि उत्तर -आधुनिक दौर के इस अन्तिम चरण का मुख्यशास्त्र ' प्रेत विद्या' है- विखंडन विधि की फलश्रुति।"    
    असल में देरिदा ने अपनी किताब में 'पाठ पढ़ने की राजनीतिक' पद्धति अपनायी है। जिस बात से नामवर सिंह ने देरिदा पर व्यंग्य किया है वही देरीदियन पद्धति उन्होंने अपने लेख में अपनायी है। इस क्रम वे देरिदा की तरह ही किसी एक पर चीज केन्द्रित नहीं होते,वे गुजरात के दंगों से लेकर भूमंडलीकरण तक के व्यापक कैनवास में एक विषय से दूसरे विषय में उत्तर आधुनिक भाषिक खेल खेलते हैं। यह नामवर सिंह का उत्तर-मार्क्सवादी खेल है। इस लेख में नामवर सिंह का प्रत्येक निर्णय राजनीति पर आधारित है,राजनीति सही तो बाकी सब सही। लेकिन देरिदा के संदर्भ में उनके निष्कर्ष सही नहीं हैं।नामवर सिंह ने लिखा '' मार्क्स के प्रेत '(1993) पुस्तक से पता चलता है कि देरिदा को भी चारों ओर प्रेत ही प्रेत दिखाई देने लगे हैं।" 
असल में देरिदा ने इस किताब में पाठ समीक्षा की राजनीति की व्यापक चर्चा की है। देरिदा ने लिखा है इन दिनों वास्तव और अवास्तव ,व्यक्ति और अव्यक्ति,जीवन और मृत्यु, उपस्थित और अनुपस्थित आदि के बारे में सवाल नहीं किए जाते। जो कुछ भी कहा जाता है वह खास सीमा में रहकर ही कहा जाता है। इसी प्रसंग ने स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्समें बड़े मार्के की बात कही है।
     देरिदा ने लिखा है ऐसे विद्वान अब नहीं रहे जो वास्तव अर्थ में विद्वान हों और विद्वान की तरह ही भूत के बारे में बता सकें। परंपरागत विद्वान् भूत में विश्वास नहीं करते थे और नहीं इसे वर्चुअल स्पेस का नजारा ही कह सकते हैं। अब ऐसे विद्वान नहीं रहे जो बता सकें कि यथार्थ और अयथार्थ में अंतर क्या है,वास्तव और अवास्तव में अंतर क्या है। जीवित और मृत में अंतर क्या है। व्यक्ति और अव्यक्ति में अंतर क्या है। इसी तरह उपस्थित और अनुपस्थित में अन्तर्विरोध बताने वाले विद्वान नहीं रहे।
      देरिदा इस किताब में वास्तव और अवास्तव के अलावा कोई तीसरा आयाम भी हो सकता है इसकी खोज करते हैं। यह मूलतः हैऔर नहींके बीच में किसी तीसरे की खोज का काम है। यह औरहै। वे इसे भूत के रूपक के जरिए खोजने की कोशिश करते हैं।
   मसलन् अस्मिता की धारणा को ही लें। अस्मिता का आधार पिता है। फलां का पिता दलित था अतः बेटा भी दलित होगा। मजेदार बात यह है कि पिता मर गया है। मरे की पहचान को हम जिंदा की पहचान के रूप में देख रहे हैं। अतः जो अस्मिता जी रहे हैं वह जिंदा है लेकिन जो नाम अस्मिता को दिया गया है वह मृत है। यहां पर पिता का भूत पीछा कर रहा है। पिता रूपी भूत वास्तव बेटे से काल्पनिक दूरी बनाए रखता है।
    दिक्कत यह है कि अस्मिता भूत है और वर्तमान भी है। यह ऐसा शरीर है जो कभी था और आज भी है। यहां अन्य के संदर्भ से अस्मिता पहचान बनाती है और फिर अन्य में ही तब्दील हो जाती है। अन्य से अन्य का जन्म, अन्य के आधार पर स्व की पहचान, विषय और व्यक्ति  की पहचान, चेतना ,स्प्रिट आदि का निर्धारण करने लगते हैं। देरिदा के यहां पर जो भूतहै वह परंपरागत किस्म के सोच को चुनौती देता है। वह जीवित और मृत के बीच के विरोध में आश्वासन का काम करता है। वह स्व की पहचान, समय और स्थान की धारणा को भी चुनौती देता है।
     आमतौर पर हम यही कहते हैं कि हमने कल भूत देखा था। या उस घर में भूत है। देरिदा ने सवाल किया है भूत के साथ बीता कल कैसे जुड़ गया ? जबकि भूत तो वह है जो समय और स्थान के परे है। समय के तीन रूप है भूत,भविष्य और वर्तमान। भूत इनमें से किसी के दायरे में नहीं आता। जब हम कहते हैं कि मैंने उस घर में भूत देखा तो हम भूल ही जाते हैं कि भूत घर में नहीं रहता। ज्योंही हम भूत को खोजने जाएंगे वह नहीं मिलेगा। ज्योंही भूत को खोजेंगे कि वह कहां है और कब देखा था ,उसका वास्तव में पता नहीं चलेगा। यही वह भूत है जो हमें अन्य के विमर्श में मिलता है और अन्य का विमर्श अंततः शून्य के विमर्श में विलीन हो जाता है। भूत हमेशा कोई हैऔर कोई अन्य है।यहां इन दोनों में समानता है।
   हमारे बीच में उत्तर आधुनिकता ने  जितने भी विमर्श पेश किए हैं वे सब भूत विमर्श हैं, ऐसे विमर्श हैं जो जीवन में हैं भी और नहीं भी।  इनमें कौन सा विमर्श कब आरंभ हो जाए कहना मुश्किल है। विमर्श की अनिश्चितता ही है जो किसी भी चीज को उत्तर आधुनिक चंचल अवस्था में रखती है। उत्तर आधुनिक विमर्श कब आरंभ होता है और किस तरह आरंभ होता है, और किससे बंधा या जुड़ा हैं ?ये तीनों चीजें ध्यान देने योग्य हैं।
   उत्तर आधुनिकों ने वंचितों को केन्द्र में रखकर कोई गंभीर काम नहीं किया है। अथवा भूत ने कभी उत्पीडितों को सम्बोधित नहीं किया है। उत्तर आधुनिक सवालों पर हमेशा बहस बहुआयामी स्थितियों और अर्थों को जन्म देती है। प्रत्येक उत्तर आधुनिक साहित्य समस्या राजनीतिक अभिव्यक्ति से भरी होती है। चूंकि उत्तर आधुनिक का अर्थ अनिश्चित होता है अतः उसकी राजनीति भी अनिश्चित होती है। आलोचना जिस चीज को देखती है वह वास्तव और अवास्तव का अस्थिर रूप है। फलतः यथार्थ और अयथार्थ और जीवंत और मृत के बीच में अंतर करना मुश्किल हो जाता है। इसके कारण राजनीतिक और साहित्यिक फैसले लेना असंभव हो जाता है। यानी उत्तर आधुनिकता का स्थायी भाव है दुविधा।
   देरिदा ने स्पेक्टर्स ऑफ मार्क्समें इतिहास की भिन्न धारणा का इस्तेमाल किया है। वैसे गौर से देखें तो इतिहास की परंपरागत धारणा का इस्तेमाल करने के कारण फुकुयामा और ल्योतार इतिहास के अंतकी थ्योरी पर  एकमत हो जाते हैं। जबकि देरिदा भिन्न तरीके से देखते हैं। वैसे इन दोनों में कोई भी साझा तत्व नहीं है। ऐतिहासिक घटनाओं को देखने की परंपरागत धारणा के अनुसार इतिहास मृत है। प्रत्येक चीज एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी है। कोई भी धड़ा अपनी समझ के बारे में,उसके परिणाम के बारे में पुनर्विचार करने को तैयार नहीं है।
    उत्तरआधुनिकतावाद के संदर्भ में साहित्य में क्या घटा है इसके बारे में देरिदा ने बेहतर रोशनी डाली है। मार्क्स और हेमलेट का मूल्यांकन करते हुए लिखा है  इस युग में साहित्य के सवाल राजनीति के सवालों को खोल रहे हैं। यही स्थिति राजनीति की भी है आप राजनीति के सवाल उठाते हैं तो उससे साहित्य के सवाल खुलते है। यानी साहित्य और राजनीति में एक-दूसरे के बरक्श सवाल उठ रहे हैं। नामवर सिंह इस देरिदियन पद्धति का अपने लेख में कौशल के साथ इस्तेमाल करते हैं।
नामवर सिंह ने लिखा है '' देरिदा के मार्क्स के प्रेत को देखकर अब तो यह कहना ही पड़ेगा कि मार्क्सवाद और जो कुछ भी हो ' प्रेत विद्या' नहीं है।देरिदा 'किसी सड़े हुए राज्य' के राजकुमार हेमलेट हों तो हों,मार्क्स कोई हैमलेट नहीं थे,शेक्सपियर को दिल से चाहने के बावजूद। नामवर सिंह ने यह भी लिखा, " मार्क्स के प्रेत तो थे, लेकिन अपने प्रेत। प्रेत और प्रेतों की छाया का प्रयोग भी उन्होंने किया है-प्रायः अलंकार और रूपक की तरह,लेकिन उन रूपकों के अन्दर भौतिक वास्तविकता की ठोस अन्तर्वस्तु भी है और महत्वपूर्ण वह अन्तर्वस्तु ही है। प्रसंग -भेद से अन्तर्वस्तु भी भिन्न-भिन्न है।"
   प्रेत की खूबी है कि वह कभी सीधे नहीं आते ,प्रेत के आने के लिए'अन्य' का होना जरूरी है। प्रेत पहले 'अन्य' को रेखांकित करता है, उसके अंदर प्रवेश करता है जिसकी काया के अंदर प्रवेश करके प्रेत ताण्डव करते हैं उसे लोग विस्मित नजरों से देखते हैं।
इन दिनों जिस प्रेत का हमारे समाज पर सबसे ज्यादा प्रभाव है वह है भूमंडलीकरण का प्रेत। यह अकेला नहीं हैयह व्यक्ति नहीं है बल्कि फिनोमिना है, यह दल नहीं है यह तो सिर्फ प्रेत है। प्रेत के लोकल और ग्लोबल हित होते है। प्रेत कभी भी परमार्थी नहीं होता बल्कि सबसे बड़ा स्वार्थी होता है प्रेत हमेशा अदृश्य रहता है उसके सिर्फ एक्शन दिखाई देते हैं,परिणाम दिखाई देते हैं, प्रेत कभी दिखाई नहीं देता। हमारे देश में ग्लोबल प्रेत जो कर रहे हैं उनकी हमने पश्चिम बंगाल में नकल शुरू कर दी है, नकल हमेशा असल से भी सुंदर लगती है। बल्कि यह कहें कि असल फीकी और नकल चमकदार और आकर्षक लग रही है।प्रेत अदृश्य होता है उसे आप पकड़ नहीं सकते। महाशक्तिशाली होता है उसे पछाड़ नहीं सकते। प्रेत को आप पकड़ने की कोशिश करेंगे तो स्वयं क्षतिग्रस्त होंगे। प्रेत हमें अच्छे लगते हैं,हम प्रेतों से प्यार करने लगे हैं और स्वयं प्रेत बनते जा रहे हैं। यही प्रेतों की सबसे बड़ी सफलता है। प्रेत का हमारी काया में प्रवेश इच्छाओं के माध्यम से होता है और अंतत: हम प्रेत बनकर रह जाते हैं। हमारे पास इच्छाएं होती हैं,बर्बरता होती है और प्रेतभावना होती है।
21वीं सदी की सबसे बड़ी ताकत हैं ग्लोबल प्रेत । वे अदृश्य तरीकों से विभिन्न दलों में घुस आए हैं। इनमें वे दल भी हैं जो क्रांतिकारी हैं,सामाजिक परिवर्तन के लिए आए दिन जयघोष करते हैं। ऐसे दलों का ग्लोबल प्रेतों के स्वरों में बोलना मानवीय राजनीति की सबसे बड़ी पराजय है। जो आदमी एक बार मनुष्यता अर्जित कर लेता है वह पलटकर पीछे नहीं लौट सकता।क्योंकि मनुष्यता अर्जित करना बेहद मुश्किल काम है और मनुष्य बन जाने के बाद प्रेत बन जाना सबसे बड़ी दुर्घटना है। ऐतिहासिक दुर्घटना है। मिथकीय दुर्घटना है। अमानवीयता का चरम है।
हमारे बीच में ग्लोबल प्रेत शांति, मुक्ति,लोकतंत्र, संत्रास से मुक्ति,विकास, उपभोग, नव्य- उदारवाद ,नई-नई उपभोगवादी संस्कृति के विभिन्न रूपों के बहाने प्रवेश कर रहे हैं। ग्लोबल प्रेत इतने आकर्षक होते हैं कि सबको अपनी ओर खींचते हैं। सब उनसे प्यार करने लगे हैं। इस प्यार का आलम ही है कि हमारे यहां ग्लोबलपंथी राजनीति का वर्चस्व बढ़ा है। यही वजह है कि ग्लोबल प्रेत जिसके अंदर प्रवेश करते हैं उसे बेचैन करते हैं,तनाव में रखते हैं,बर्बर बनाते हैं।
      'हम' और 'तुम' का खेल ग्लोबल प्रेतों का खेल है,उनके प्रतिरूपों का ताण्डव है,यह हम सबके लिए खुशी का समय नहीं है बल्कि त्रासद समय है। प्रेतों का ताण्डव आनंद की नहीं त्रासदी की अनुभूति देता है। प्रेतों के कंधे पर सवार होकर आयी शांति अथवा इलाका दखल अंतत: नरक और बर्बरता के लोक में ले जा सकते हैं। प्रेतों का रास्ता लोकतंत्र की ओर कम से कम नहीं जाता। ग्लोबल प्रेतों और उनके अनुगामी लोकल प्रेतों ने जहां पर भी कदम रखा है वहां सिर्फ चीखें ही सुनाई दी हैं,चीखों को शांति की आवाज नहीं कहते! वेदमंत्र नहीं कहा जा सकता। मनुष्यों की चीखों से सिर्फ प्रेत खुश होते हैं। प्रेतात्माओं के जरिए अर्जित की गई शांति कभी टिकाऊ नहीं होती।









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