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बुधवार, 13 जुलाई 2016

मथुरा के दूधवालों की रौनक और ईमानदारी-

        मथुरा पर जब भी बात होती है आमतौर पर जीवनशैली में रचे-बसे पहलुओं पर बातें नहीं होतीं,मथुरा की जीवनशैली में दूध और दूधवाले गहरे तक रचे बसे थे।इधर 35साल में बहुत कुछ बदला, उसकी चर्चा मैं कभी फुर्सत से करूँगा।लेकिन मैं 1979 के पहले के समय को आज याद करता हूँ तो पाता हूँ शहर के विभिन्न गली-मुहल्लों के नुक्कड़ ,गली या मुख्य बाजार में कई दूधवालों की दुकानें थीं इनके ग्राहक बंधे हुए थे,इनमें हरेक के दूध का स्वाद भी अलग हुआ करता था।ऐसी भी दुकाने थीं जो मिलावटी दूध बेचती थीं ,इनकी गिनती कम थी।लेकिन असली दूध बेचने वालों की दुकानें बहुत ज्यादा हुआ करती थीं।

मथुरा के सांस्कृतिक और व्यापारिक विकास को समझने के लिए इन दूध वालों का कायदे से अध्ययन किया जाना चाहिए।यह देखें कि इनमें से कितने व्यापार में आगे गए और कितने पीछे खिसकते चले गए या शहर छोड़कर चले गए। इन दूधवाले दुकानदारों द्वारा सृजित व्यापारिक संस्कृति का अध्ययन जरूर किया जाना चाहिए।इन दूधवालों की शहर में व्यापारिक ईमानदारी और निष्ठा ने ईमानदार संस्कृति को बनाने में बहुत मदद की।ऐसा नहीं है कि ये दूधवाले व्यापार करके मुनाफा नहीं कमाते थे,मुनाफा कमाते थे,लेकिन ईमानदारी के साथ।दूध के व्यापार में मुनाफे और ईमानदारी में संतुलन की कला के दर्शन मैंने इन दूधवालों के यहां किए।

दिलचस्प बात है कि हमारे मंदिर (चर्चिका देवी) पर तकरीबन सभी दूधवाले दर्शन करने आते थे।इनमें से सभी लोग बेइंतहा शरीफ और मधुरभाषी थे।इस तरह के जनप्रिय दुकानदारों में चौक में भरतपुरिया,द्वराकाधीश की गली में गोपाल पारूआ.छत्ता बाजार में भानु पहलवान आदि कुछ नाम ही फिलहाल याद आ रहे हैं।इन दूध वालों के यहाँ दूध का मजा असल में रात को आता था।जब आप गरम-गरम दूध कुल्हड़ में ऊपर से मलाई डालकर बाजार में खड़े होकर पीते थे।यह मथुरा के लोगों की खानपान की रात्रि संस्कृति का एक जरूर हिस्सा था। इधर वर्षों से यह दृश्य में उपभोग करने से वंचित रहा हूँ।जितनीबार में चौक या द्वारकाधीश की गली या छत्ता बाजार से निकला हूँ,दूध की पुरानी बड़ी कडाही नजर नहीं आतीं,रात की वह रौनक नजर नहीं आती।

शनिवार, 28 जून 2014

भाषा की गुलेल

         बेहद संवेदनशील और गंभीर शहर है। इसमें महानगर ,गांव और छोटे शहर की मनोदशाएं एक ही साथ तैरती रहती हैं। इन तीनों मनोदशाओं को बाजार से लेकर ऑफिस तक,कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालय तक अंतर्क्रियाएं करते देख सकते हैं। यहां इन तीनों मनोदशाओं के साक्षात चित्र भी मिल जाएंगे। इच्छाओं का ऐसा संगम अन्यत्र कम ही देखने को मिलता है। यह तय करना मुश्किल है कि इस शहर का ड्राइवर कौन है ? महानगरीय भावबोध या ग्रामीण भावबोध ?

यह ऐसा शहर है जिसके सामान्य बहस मुबाहिसे में गरीब-मेहनतकश के स्वर-दुख,भाषा,भाषिक मुहावरे और जरुरतों को आप चलते फिरते सुन सकते हैं,महसूस कर सकते हैं। विभिन्न समस्याओं पर लोग बातें करते,भाषण देते मिल जाएंगे,और एक ही नारा सब जगह मिलेगा,'गरीब की कौरे वांचबे',या गरीब कैसे जिंदा रहेगा ?

महंगाई पर बात करो यही टेक सुनने को मिलेगी, वाम और दक्षिण राजनीति पर बात करो तो यह टेक सुनने को मिलेगी। मेहनतकशों और ग्रामीणों की भाषा और उससे जुड़े मुहावरे ,टेक और संस्कृति को आप यहांके बाजारों में तैरते हुए महसूस कर सकते हैं। जिंदादिली और व्यंग्य में वाद-विवाद का तो खैर कोलकाता में जो आनंद है वह शायद और कहीं पर देखने को न मिले।

एक वाकया देखा।एक दिन मिनीबस में दमदम पार्क से मेडीकल कॉलेज जा रहा था। मिनीबस में अच्छी खासी भीड़ थी, लोगों के हाथ और शरीर एक-दूसरे से टकरा रहे थे। अचानक देखा कि दो यात्री आपस में विवाद करने लगे। एक का दूसरे से शरीर रगड़ा खा रहा था,पहले ने दूसरे से कहा सीधे खड़े हो और अपने शरीर का वजन ठीक रखो। दूसरे व्यक्ति ने कहा मैं ठीक ही खड़ा हूँ,आप सही ढ़ंग से खड़े हों।इसी पर बातचीत थोड़ा तेजभाषा में शिफ्ट कर गयी।

कुछ देर बाद पहले व्यक्ति ने दूसरे से कहा 'बोकार मतो दांडिए आछो', पहले ने ध्यान नहीं दिया,बात फिर आगे बढ़ गयी ,पहले ने फिर कहा ' इडियटेर मतो दांडिए आछो', यह शब्द सुनते ही दूसरा व्यक्ति भड़क गया और बोला 'इडियट ' क्यों कहा ? यह मेरा अपमान है ? पहले ने कहा मैंने तो तुमको पहले 'बोका' कहा था तब तुमको गुस्सा क्यों नहीं आया ? अब इडियट कहने पर क्यों भड़क रहे हो,इस पर पहला बोला 'इडियट' मत बोलो,यह गाली है,दूसरे ने कहा 'बोका' भी तो कहा तब गुस्सा क्यों नहीं आया ? यह संवाद सुनकर सारी मिनीबस हँस रही थी और वे दोनों 'बोका' और 'इडियट' की बहस में उलझे हुए इन दोनों शब्दों की सांस्कृतिक मीमांसा करते हुए अपने गुस्से का इजहार कर रहे थे। भाषा में आनंद लेना,सहज ग्रामीण और शिक्षित भाषा में तकरार करना और भाषिक प्रयोगों पर गर्व करना कोलकाता की जान है। यह भाषिक रंग अन्यत्र कम ही देखने को मिलता है।













































शनिवार, 5 नवंबर 2011

ब्रज और चौबों का लोकोत्सव कंस मेला


                     (मथुरा में कंस मेले का दृश्य)          
आज कंस  का मेला है।  चौबों का परंपरागत परिवार और बगीची-अखाड़े इसके प्रमुख आयोजक हैं, इन्हें कंसटीले वाले कहते हैं। इसी नाम से मथुरा में कंस का अखाड़ा हुआ करता था। मैंने बचपन में वहां पर चौबों को खूब कसरत करते और कुश्तियों के मेले आयोजित करते देखा है।पहले चौबों को पहलवानी का खूब शौक होता था। मथुरा की वो शानदार लोक संस्कृति का हिस्सा रहा है। कंस के टीले पर एक जमाने में बड़ा ही शानदार अखाड़ा था ,और उस पर पखवाड़े में एकबार कुश्तियां होती थीं ,जिनमें जीतने वालों को शानदार इनाम भी मिलता था।इस अखाडे के एक तरफ अंतापाड़ा नाम का मोहल्ला है,दूसरी ओर जिला अस्पताल है। यह इलाका शहर के बाहर मुख्यबाजार में पड़ता है। अब मथुरा के चौबों में सालाना जलसे के रूप में कंस मेला ही बचा है।
      एक जमाना था जब कंस के मेले के लिए चौबों में सुंदर से सुंदर लाठी खरीदने और पुरानी लाठियों को तेल पिलाने और साफ करके रखने की परंपरा थी, खासकर कंस मेले के मौके पर सैंकड़ों सुंदर लाठियों का प्रदर्शन देखने लायक होता था।प्रत्येक चौबे के हाथ में लाठी इस दिन शुभ मानी जाती थी। और कंस मेले के दिन बड़े पैमाने पर चौबे लाठियां लेकर निकलते भी थे।कंस वध करके कंस के अखाड़े से लौटते हुए चतुर्वेदी युवाओं के अनेक टोल हुआ करते थे और कई अखाड़े भी रहते थे, जिनमें पटेबाजी करते युवाओं के दल सड़कों पर अपनी कला का प्रदर्शन करते दिखते थे,एक समूह ऐसा भी होता था जिसके हाथ में तकरीबन 20 मीटर से ज्यादा लंबी बल्ली पर कंस का शिर हुआ करता है ,कंस के अखाड़े में कंस के धड़ का वध होता है, शिर बच जाता है ,उसे जुलूस की शक्ल में नाचते-गाते मंडलियों में परिक्रमा करते हुए कंसखार बाजार में लाकर चौबों के द्वारा लाठियों से मारकर चूर चूर किया जाता है।
    यह मान्यता है कि कंस वध करने जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस के किले पर धावा बोला तो कंस भागकर कंस अखाडे में चला आया,वहां उसके पालतू 4 पहलवानों से भगवान और चौबों का युद्ध हुआ,ये पहलवान थे, सल,तोसल,चाणडूल,मांडूल इन पहलवानों को माकर जब भगवान ने कंस क खोज की तो पता चलाकि वो भागकर कंसखार इलाके में जाकर छिप गया है।यही वजह है कि कंस के शिर का वध लौटकर कंसखार में जाकर ही होता है और यह कार्य चौबों की मदद से होता है। आम धारणा है कि श्रीकृष्ण ने कंस को मारा था,लेकिन कंस वध में चौबों की महत्वपूर्ण भूमिका थी,इसकी ओर कभी लोगों का ध्यान नहीं जाता।
आज के दिन कंस का भगवान श्रीकृष्ण ने वध किया था। यह धारणा है कि स्थानीयतौर पर मथुरा के चौबों ने इस वध में भगवान की मदद की थी। यही वजह है कि कंस जैसे जल्लाद राजा के मेले और उसके वध के आयोजन की परंपरा सैंकड़ों सालों से मथुरा के चौबों में चली आ रही है।गोपालजी मंदिर के गुरूजी के जिम्मे श्रीकृष्ण-बलराम को सजाकर तैयार करने की जिम्मेदारी हुआ करती थी।बाकी आयोजन को कंस अखाड़े के चौबे मिलकर तैयार करते थे। चौबों में एक जमाने में इस मेले के लिए नए कपड़े आदि खरीदने और नए वस्त्र पहनने की परंपरा थी। कंस के अखाड़े पर प्रति पखवाडे कुश्तियों के दंगल हुआ करते थे। इनमें मथुरा के विभिन्न अखाड़ों के पहलवानों के अलावा आसपास के इलाकों के गांवों से भी पहलवान आकर नियमित भाग लिया करते थे।

आज के दिन कंस का मेला शाम 5 बजे के आसपास आरंभ होता है। कंस का विशाल पुतला लेकर चौबे निकलते हैं। यह चौबों का लोकोत्सव है। मजेदार बात यह है कि मथुरा के चौबे ही सारे देश में कंस मेला का आयोजन करते हैं और यह सिर्फ मथुरा में होता है।यह मान्यता है कि राजा कंस का भगवान श्रीकृष्ण ने चौबों की मदद से वध किया था। यही वजह है कि चौबे ही इस मेले का आयोजन करते हैं। चतुर्वेदी सज-धजकर और हाथों में सुंदर लाठियां लेकर इस मेले में टोल बनाकर निकलते हैं।विश्राम घाट से यह मेला एक जुलूस के रूप में आरंभ होता है जिसमें कंस का विशालकाय पुतला होता है और लट्ठ लेकर चतुर्वेदियों के टोल उसके चारों ओर नाचते-गाते चलते हैं ,अंत में कंस के टीले पर ले जाकर कंस का लाठियों से मार-मारकर चौबे वध करते हैं।बाद में नाचते-गाते लौटते हैं। साथ में हाथी पर श्रीकृष्ण-बल्देव भी सजे हुए विराजमान रहते हैं।अंत में यह जुलूस विश्रामघाट पर कंस के अस्थि विसर्जन और भगवान की आरती के साथ सम्पन्न होता है।

शनिवार, 11 जून 2011

धर्मनिरपेक्ष भारत का महान चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन

एमएफ हुसैन का इंतकाल कलाजगत की अपूरणीय क्षति है। 10जून 2011 को उन्हें दक्षिण लंदन के ब्रुकबुड कब्रिस्तान में दफना दिया गया। उनकी यह अंतिम इच्छा थी कि वे जहां मरें वहीं दफनाए जाएं। भारत सरकार ने उन्हें भारत लाकर दफनाने का अनुरोध किया था जिस पर उनके बेटा-बेटी विचार भी कर रहे थे ,लेकिन अंत में हुसैन की इच्छा के अनुरूप ही उनका अंतिम संस्कार लंदन में ही किया गया।
हुसैन जबतक जिंदा रहे कलाकारों और कलाभोक्ताओं को बार-बार नए सवालों की ओर आकर्षित करते रहे। वे हमेशा एक नए विषय को उठाते और उस पर कलाजगत से लेकर आम आदमी तक चर्चा होती। वे जहां जाते वहां आलोचनात्मक वातावरण की सृष्ठि करते। उनकी इसी सर्जक शक्ति ने उन्हें महान कलाकार बना दिया। वे पेंटर थे साथ ही बहुत बड़े विचारक भी थे। उन्हें बंदिशें और सीमाएं परेशान करती थीं। अपनी पेंटिंग के बहाने उन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक बंदिशों और संकीर्णताओं के खिलाफ राय बनायी। रंगों को उन्होंने तहजीब में तब्दील किया। कला के सामाजिक सरोकारों के दायरों में रद्दोबदल किया और कलाओं को सम-सामयिक आंदोलनों से जोड़ा।
एमएफ हुसैन की चंद पेंटिंग पर हिन्दू फंडामेंटलिस्टों की आपत्तियों के अलावा हुसैन की अधिकांश पेंटिंग ऐसी हैं जिनके बारे में फंडामेंटलिस्टों ने कभी जानने की कोशिश भी नहीं की। इससे एकबात पता चली कि फंडामेंटलिस्टों को सीमित कलाज्ञान है। वे कलाओं की नीति-उपदेशकों की तरह आलोचना करते हैं।कलाओं को नीति और उपदेशों से नहीं समझा जा सकता।कला जीवन की हूबहू छबि नहीं है।
एमएफ हुसैन ने अपनी कला से भारत की सोई हुई आत्मा को जगाया है। उनकी कला भारत को जानने,जुड़ने और उसके लिए कुछ करने का ज़ज्बा पैदा करती है। यही वजह है कि वे मरकर भी सबसे ज्यादा चर्चा के केन्द्र में हैं। हुसैन ने जीवन के अछूते और गुमनाम विषयों को अभिव्यक्ति देकर कला और जीवन के नए संबंधों को जन्म दिया है। उनकी कला में भारत बोलता है। एमएफ हुसैन की कलाकृतियों में उनके मन का हिन्दुस्तान बसता है। वे मर गए हैं लेकिन अपने सपनों का भारत धरोहर में दे गए हैं। मुझे बेलिस्की के शब्द याद आ रहे हैं। बेलिंस्की ने लिखा था-"हमारे युग की कला क्या है ? न्याय की घोषणा,समाज का विश्लेषण,परिणामतः आलोचना।विचारतत्व अब कलातत्व तक में समा गया है।" हुसैन की कला पर ये शब्द खरे उतरते हैं।

     एमएफ हुसैन का अंतिम संस्कार उनकी इच्छा के अनुरूप हुआ।यह उनके जीवन की आखिरी बड़ी उपलब्धि थी। इस पर किसी शायर का शेर है -"ख़बर उनको हुई होगी, अजब क्या वे चले आएँ।जनाजा ले चलो सूएमज़ार आहिस्ता-आहिस्ता।।"
एमएफ हुसैन की विदेश में मौत का एक ही सबक है कि जो संगठन या व्यक्ति कलाओं और कलाकारों के प्रति विद्वेष पैदा करें,हमले करें,आतंक पैदा करें,उन्हें आजीवन जेल में बंद किया जाना चाहिए। कलाओं और कलाकारों का समाज में सम्मान करने की जरूरत है। समाज उनके लिए है, कलाविरोधी गुण्डों के लिए नहीं। क्या सरकार इस दिशा में कानून बनाएगी ?
धर्मनिरपेक्ष कला और कलाकारों को हिन्दुत्ववादी संगठन समय -समय पर कलंकित करते रहे है।इससे सारी दुनिया में भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र की धज्जियां उड़ी हैं। एमएफ हुसैन का भागकर विदेश जाना और वहां शरण लेना धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की असमर्थता का संकेत है। सवाल यह है हिन्दुत्ववादी संगठन धर्मनिरपेक्ष कलाओं से घृणा क्यों करते हैं ? क्या यह देशभक्ति है ?
उनकी मौत पर फंडामेंटलिस्टों की भूमिका को लेकर सवाल खड़े करना गढ़े मुर्दे उखाड़ना नहीं है।समस्या इससे भी ज्यादा गहरी है और हुसैन का हमारे देश में वापस न लौटना ,शर्म की बात है, जो लोग काले धन को विदेश से वापस लाना चाहते हैं वे अपने सोने की खान जैसे कलाकार को वापस नहीं लाना चाहते थे। वे धन से प्यार करते हैं कलाओं-कलाकारों से नहीं। सवाल यह है कलामें नग्नता पर बात करो, किसी को मारोगे क्यों,अपमानित क्यों करोगे,पेंटिंग क्यों तोडोगे, सवाल उठता है क्या खजुराहो को तोड़ देंगे हम ? क्या लिंग और योनि पूजा पर पाबंदी लगा देंगे ? फंडामेंटलिस्ट जानते नहीं हैं कलाओं और भारतीय परंपरा को।
एमएफ हुसैन की विदेश में मृत्यु भारत की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रशक्ति की सबसे बड़ी असफलता है। विचारणीय सवाल है कि हुसैन को अपने देश वापस लाने में सरकार असमर्थ क्यों रही ? हुसैन के मन में सुरक्षा का भरोसा पैदा क्यों नहीं कर पाई ?
हुसैन की जिन विवादास्पद पेंटिंग पर हंगामा हुआ उस उन्होंने कहा था कि मेरा मकसद किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं था और किसी की भावनाएं आहत हुई हैं तो मैं माफी मांगता हूं। इसके बाबजूद हिन्दू फंडामेंटलिस्ट संगठनों ने अपनी फासिस्ट हरकतें बंद नहीं की,जगह-जगह उनकी पेंटिंगों पर हमले किए ,उन पर सैंकड़ों मुकदमे देश के विभिन्न शहरों में दायर कर दिए। उनकी जिंदगी को पूरी तरह असुरक्षित बना दिया और परिणामतः उन्हें देश छोड़कर जाना पड़ा। हुसैन चले गए लेकिन जिन कलाओं ने उन्हें महान बनाया,हमारे कलाजगत को महान बनाया ।ऐसी सैंकड़ों-हजारों कलाकृतियां धरोहर में दे गए हैं। ये कलाएं हुसेन को हमेशा लोगों के दिलो-दिमाग में उन्हें जिंदा रखेंगी । वे नहीं हैं, लेकिन हैं। वे अपनी कलाओं में भारत की सभ्यता और संस्कृति का एक नया नजरिया देकर गए हैं। नए धर्मनिरपेक्ष भारत का सपना सौंपकर गए हैं। 

रविवार, 20 मार्च 2011

होली पर मथुरा का अविस्मरणीय महामूर्ख सम्मेलन

      मथुरा की होली  सचमुच विलक्षण हुआ करती है। इधर कई सालों से देख नहीं पाया हूँ। लेकिन मानकर चल रहा हूँ कि होली की मस्त बयार मथुरा में आज भी बह रही होगी। होली का मजा वहां एक माह (पूरे फाल्गुन महीने) चलता था होली के बाद भी शहर में होली 8 दिनों तक चलती थी। अब इतना लंबा उल्लास मनाने की क्षमता नहीं रह गयी है लोगों में।
मथुरा की होली का सबसे अविस्मरणीय क्षण है गले मिलना। लोग होली पर पहल करके एक-दूसरे से गले मिलते हैं। घर जाकर गले मिलते हैं। जैसे आज धुलेंड़ी है तो सारे दिन रंग पड़ेगा,रंग में गले मिलेंगे। शाम को डेम्पियर पार्क में शहर के सभी लोग एकत्रित होते हैं और एक-दूसरे से गले मिलते हैं। यह काम बड़े शालीन भाव से होता है। दुश्मन के भी लोग गले मिलते हैं, जिनसे पुश्तैनी रंजिशें चल रही हैं ,वेभी एक-दूसरे से गले मिलते हैं। भांग और ठंडाई में शहर के अधिकांश मस्त मर्द डूबे रहते हैं। भांग पीना होली संस्कार है। कोई भी अकेले नहीं पीता,बुलाकर पीते हैं,पिलाकर पीते हैं।
     मथुरा की होली का दूसरा शानदार पहलू है महामूर्ख सम्मेलन। धुलेंड़ी के पहले वाली शाम को महामूर्ख सम्मेलन और महामूर्खों का विशाल प्रदर्शन निकलता था। इसमें शहर के सभी शानदार ,सभ्य, नामी, शिक्षित,प्रोफेशनलों को शिरकत के लिए बुलाया जाता था ।साथ ही महामूर्ख सम्मेलन के जुलूस का मुखिया हमेशा शहर के सबसे प्रतिष्ठित आदमी को बनाया जाता था। अनेकबार उसे गधे पर बिठाकर निकालते थे और सारा शहर उस जुलूस का आनंद लेता था। इस जुलूस के बारे में एक बड़ा पोस्टर छपवाकर सारे शहर में लगाया जाता था जिसमें लिखा रहता था कि इस साल का महामूर्ख कौन है ।
     इसके अलावा एक बड़ा पोस्टर और प्रकाशित किया जाता था जिसमें शहर के सभी नामी लोगों को गंदी और चुभती भाषा में उपाधियां और गुणों से विभूषित किया जाता था। इसके अलावा एक अश्लील पर्चा होता था जिसमें एक सुंदर अश्लील लंबी तुकबंदी वाली कविता होती थी और तकरीबन 10 हजार की संख्या में यह पर्चा छापकर बांटा जाता था। यह मथुरा का लोकल होली काव्य था। इसमें सामयिक मसले अश्लील भाषिक काव्य सौंदर्य के साथ उठाए जाते थे। सारा शहर उसे रस लेकर पढ़ता था। हमारे एक दोस्त और पड़ोसी थे मोहनलाल प्रेमी वे कविता में निपुण थे और वे यह होली काव्य बड़े ही लोकलुभावन भाव से लिखते थे। हम लोगों ने अपने तरीके से इस होली की विलक्षण परंपरा का निर्माण किया था। इस आयोजन के सारे फैसले सड़क किनारे खड़े होकर लिए जाते थे,कोई औपचारिक मीटिंग नहीं होती थी,किसी खाली बंद पड़ी दुकान के तख्ते पर बैठकर गप्पें करते हुए महामूर्ख सम्मेलन और पोस्टर-पर्चे आदि के बारे में फैसले लेते थे और पैसे की जरूरत नहीं पड़ती थी सारे काम मुफ्त में लोगों की मदद से होते थे। काश ‍यह परंपरा जिंदा रहती !      





केशर की कलि की पिचकारी-निराला


केशर की,कलि की पिचकारीः
पात-पात की गात सँवारी।

राग-पराग-कपोल किये हैं,
लाल-गुलाल अमोल लिये हैं
तरू-तरू के तन खोल दिये हैं,
आरती जोत-उदोत उतारी-
गन्ध-पवन की धूप धवारी।

गाये खग-कुल-कण्ठ गीत शत,
संग मृदंग तरंग-तीर -हत
भजन-मनोरंजन-रत अविरत,
राग-राग को फलित किया री-
विकल -अंग कल गगन विहारी।






ख़ून की होली जो खेली- निराला

युवकजनों की है जान ;
    खू़न की होली जो खेली।
पाया है लोगों में मान,
   ख़ून की होली जो खेली।
रँग गये जैसे पलाश;
   कुसुम किंशुक के,सुहाये,
कोकनद के पाये प्राण,
    ख़ून की होली जो खेली।
निकले क्या कोंपल लाल,
     फाग की आग लगी है,
फागुन की टेढ़ी तान,
     ख़ून की होली जो खेली।
खुल गयी गीतों की रात,
      किरन उतरी है प्रात की ;-
हाथ कुसुम-वरदान,
   ख़ून की होली जो खेली।
आयी सुवेश बहार,
   आम-लीची की मंजरी;
कटहल की अरघान,
    ख़ून की होली जो खेली।
विकच हुए कचनार,
    हार पड़े अमलतास के ;
पाटल-होठों मुसकान,
    ख़ून की होली जो खेली।
( यह कविता ने निराला ने 1946 के स्वाधीनता संग्राम में विद्यार्थियों के देशप्रेम पर लिखी थी और यह गया से प्रकाशित साप्ताहिक 'उषा ' के होलिकांक में मार्च 1946 में प्रकाशित हुई)





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