अज्ञेय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अज्ञेय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 13 मार्च 2011

अज्ञेय और समीक्षा का स्टीरियोटाइप


       कोलकाता में साहित्यकारों पर सुंदर आयोजन होते हैं। लेकिन मूल्यांकन केजुअल और स्टीरियोटाइप होता हैं। यहां लेखक का खूब स्वागत होता है,जलसे खूब होते हैं,लेकिन विचारों और मूल्यांकन के मामले में कभी कोई नयी बात नहीं उठती। बाहर से आने वाले विद्वान कोलकाता में केजुअल बोलते हैं,वैसे वे अब सब जगह केजुअल ही बोलते हैं। या किताबी बोलते हैं। यह फिनोमिना हाल में स.ही.वा.अज्ञेय के जन्मशती वर्ष पर आयोजित एक सुंदर कार्यक्रम में दिखाई दिया। किसी साहित्यकार पर किताबी और अप्रासंगिक बातें बोलने का अर्थ है हवा में बोलना। यह वैसे ही है जैसे अंधा कुत्ता हवा पर भूँकता है।
   हमारे समालोचक सिर्फ बोलने के लिए बोलते हैं ऐसी अवस्था में वे साहित्य की दुर्गति के साथ श्रोताओं की दुर्गति भी करते हैं। इन लोगों के कारण साहित्य शिक्षा की स्थिति तीन-तेरह की हो गयी है। अज्ञेय  और अन्य हिन्दी के लेखकों की शताब्दी पर बोलने वाले वक्तागण चिकने और गोलमटोल शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। इनके पास बताने के लिए कोई नया विचार नहीं होता,वे किसी नए रंग या पहलू का उदघाटन नहीं करते। इस तरह के समारोहों में भाग लेने वाले एक ही टोली के सदस्य हैं और यही टोली सभी साहित्यकारों से संबंधित आयोजनों पर मंचों की शोभा बढ़ा रही है। इस तरह के आयोजनों और बी.ए. -एम.ए. की कक्षा में अंतर नहीं है । लेखक के बारे में स्टीरियोटाइप बोलना,भावुक होकर बोलना,किताबी बोलना ये सब साहित्य ढ़ोंग है,पाखण्ड है । सेमीनार विचार-विमर्श का मंच हैं। साहित्य ढ़ोंग की जगह नहीं है। इस तरह के आयोजनों में उत्सवधर्मिता हावी है,विचार गायब हैं,नया मूल्यांकन गायब है। यह बाजार रीतिवाद है।
    अज्ञेय के बारे में दो बातें उल्लेखनीय हैं। ये दोनों बातें कविवर त्रिलोचन ने कही हैं। त्रिलोचन ने कहा है 'आधुनिक कविता का पहला संकलन है 'तारसप्तक' ।' यदि आधुनिक कविता का यह पहला संकलन है तो आधुनिक काव्य का नया अर्थ भी यहां पर होगा ? उल्लेखनीय है आरंभ में नामवर सिंह तारसप्तक को कचरा मानते थे। इस पर त्रिलोचन ने नामवर सिंह को सलाह दी थी कि तारसप्तक को ढ़ंग से पढ़ो। त्रिलोचन ने लिखा है ,"उन्होंने 'तारसप्तक' को बोधपूर्वक पढ़ा था। मेरे कहने पर जब उन्होंने भावपूर्वक पढ़ा तो बात खुलने लगी। अर्थात् यह संभव है कि मजाक बनाते बनाते कोई तदाकार हो सकता है। भृंगी कीट जिस कीड़े के चारों ओर चक्कर लगाता है,वह वैसा ही हो जाता है।" यह बात त्रिलोचन ने 28 मार्च 1968 में एक व्याख्यान कही थी। इन दिनों सेमीनारों में वक्तागण तदाकार होने की बात तो दूर रही संतुलन और बौद्धिक विवेक से भी काम नहीं ले रहे हैं।
       त्रिलोचन ने दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कही है कि आधुनिक कविता का पैमाना यह है कि वह छायावाद से अपने को कितना मुक्त करती है। 'तारसप्तक' में छायावाद का प्रभाव है लेकिन अज्ञेय ने सचेत रूप से अपने को छायावादी भावबोध से अलगाया है । त्रिलोचन का मानना है 'रूपाभ' से आधुनिकता शुरू होती है। आधुनिकता की गति अलग है वह किसी खास क्षण से शुरू नहीं होती। अज्ञेय पर आधुनिकतावादी होने का आरोप लगाया जाता है। यह बात आधुनिकता को सही परिप्रेक्ष्य में समझे बिना कही जा रही है। त्रिलोचन के शब्दों में 'आधुनिकता उस नए चरित्र को उभारती है जो समवर्ती जीवन में मिलता है।' अज्ञेय ने अपनी रचनाओं में आयातित आधुनिकता का चित्रण नहीं किया है। उनके यहां आधुनिकता की पहचान पूंजीवादी व्यवस्था के साथ जुड़ी हुई है। हिन्दी के अधिकांश समीक्षक आधुनिकता को पूंजीवाद के साथ जोड़कर नहीं देखते। उनके यहां पूंजीवाद का गंभीर विवेचन नहीं मिलता।
    अज्ञेय का सामाजिक सत्य के प्रति आग्रह था और अपनी रचनाओं के प्रति आत्मविश्वास था। वे अतीत के बोझ से एकदम मुक्त थे। यही चीज उन्हें कम्प्लीट आधुनिक लेखक बनाती है। यह चीज उनसे सीखनी चाहिए। अनेक आलोचक और शिक्षक अतीत की गठरी सिर पर रखकर कक्षाओं में जाते हैं और साहित्य के प्रति अरूचि पैदा करते हैं। साहित्य के पठन-पाठन का अर्थ अतीत का बोझ ढ़ोना नहीं है। अतीत के बोझ से साहित्य और व्यक्ति जितना मुक्त होगा उसके उतने ही आधुनिक होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।
        दूसरा सवाल है कवि -आलोचक-शिक्षक-साहित्यकार बंधनों से कितना मुक्त है ? हिन्दी में कवि-लेखक -आलोचक इतने बंधनों में बंधे हैं कि उनसे निर्बंध रचना और आलोचना की उम्मीद ही नहीं कर सकते। जिस तरह एक अच्छी रचना के लिए लेखक के अंदर असंतोष का होना जरूरी है वैसे ही एक सेमीनारिस्ट के अंदर असंतोष का होना जरूरी है। असंतोष के बिना आप अच्छा और नया बोल नहीं सकते। भावुक प्रस्तुतियां,प्रशंसात्मक प्रस्तुतियां,भांडशैली की वक्तृता अंततः साहित्य का वातावरण नष्ट करती है ।
    वक्ता और लेखक में असंतोष तब पैदा होता है जब उसे जीवन की विषमताएं परेशान करती हैं। यह परेशानी जितनी गहरी होगी उतना ही उदगारों में बेचैनी और नयापन आएगा। सेठाश्रयी और सरकारश्रयी समारोहों में लोग बेचैन होकर नहीं बोलते। उनमें सामाजिक उद्विग्नता नहीं होती फलतः नए विचारों की सृष्टि नहीं होती।      
    अज्ञेय को एक जमाने में क्षणवादी-आधुनिकतावादी-अस्तित्ववादी कहा गया और यह सब काम हुआ शीतयुद्ध की राजनीति के तहत। शीतयुद्ध के दौरान बहुत कुछ समीक्षा ने गलत-सलत सोचा था। उसमें हिन्दी समीक्षकों का अज्ञेय पर लिखा भी आता है आज उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है,वह आलोचना का कचरा है।
   अज्ञेय ने 'अलगाव' पर सबसे ज्यादा लिखा है। आलोचना की त्रासदी यह है कि उसने 'अलगाव' को कभी आधुनिक पूंजीवादी फिनोमिना के रूप में नहीं देखा। यह पूंजीवादी विकास प्रक्रिया का सकारात्मक और स्वाभाविक फिनोमिना है। इसका आधुनिक राष्ट्र के साथ गहरा संबंध है। आधुनिक राष्ट्र के उदय के साथ 'जीवन का निजीकरण' होता है। 'पृथक्कृत व्यक्तिनिष्ठता' पैदा होती है। ये सारी चीजें एक विशिष्ट ऐतिहासिक अवस्था की देन हैं। प्राचीनकाल में अलगाव का आदर्शकवि कालिदास है और अलगाव का आदर्श रस श्रृंगार रस का साहित्य है। प्राचीन साहित्य में अलगाव का जिस तरह का महिमामंडन कालिदास के यहां है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं है। कालिदास ने ऐसे नायक को पेश किया जो सर्वगुण सम्पन्न है। आनंद में मगन है। आनंद को व्यक्त करता है। कालिदास के पात्र जो कुछ करते हैं ,अपने लिए करते हैं। कालिदास के नायक प्रेम करते हैं अपने लिए ,युध्द करते हैं अपने लिए, अकेले ही सारी मुसीबतों का सामना करते हैं। एक तरह से समूची सृष्टि के साथ संघर्ष करते हैं।
प्राचीनकालीन समाज में रची गई रचनाओं को अलगाव के साथ सबसे पहले जोड़कर कार्ल मार्क्स ने देखा था। कार्ल मार्क्स ने अपनी डाक्टरेट थीसिस से विकास किया था। उसने एपीक्यूरियन कवियों को 'रोम के नायक कवि' की संज्ञा दी थी। यही स्थिति हमारे कालिदास की है। उन पर कभी अलगाव की अवधारणा की रोशनी में विचार नहीं किया गया। कालिदास ऐसा कवि है जिसका सभी चीजों से संघर्ष होता है और सभी चीजें नायक के साथ युध्द करती नजर आती हैं। कालिदास के पात्र आरंभ से ही अपने बारे में सोचते हैं, अपने लिए संघर्ष करते हैं और आनंद लेते हैं। अपने लिए संघर्ष करना और आनंद मनाना यही अलगाव की धुरी है। वह स्वयं के प्रति कठोर है, इनके सामने प्रकृति अपनी सारी अच्छाईयां खो देती है, अच्छाईयों के लिए शब्द अधूरे लगते हैं। अच्छाईयों के लिए शब्द नहीं मिलते।
      एपीक्यूरियन कवियों का नारा था ''वार ऑफ ऑल अगेंस्ट ऑल।'' यानी ''सबके खिलाफ और सबके लिए जंग।'' यही नारा भारत के प्राचीन कवियों का भी था। प्राचीन कवियों के यहां जीवन और आनंद के बीच अंतराल नहीं था। सारी चीजें शरीर में केन्द्रित थीं। शरीर प्रमुख विमर्श था। श्रृंगार का समूचा विमर्श शरीर और आनंद का विमर्श है। रस का सारा विमर्श शरीर को केन्द्र में रखता है। नख-शिख वर्णन में उसे सहज ही देखा जा सकता है। नायक का शरीर कैसा है, आंखें कैसी हैं, पीड़ा कैसी है, चिन्ताधारा कैसी है और नायक जब चिन्ता में घिरा होता है तो कैसे कृशकाय हो जाता है और जब नायक युध्दरत होता है तो उसकी भंगिमाएं,शारीरिक सौष्ठव किस तरह का होता है ? इसी तरह नायिका जब कृति में आती है तो सारी ऊर्जा उसके शरीर के सौंदर्य वर्णन पर ही खर्च की गई। कहने का तात्पर्य यह कि प्राचीन कवि 'स्व' से बेहद प्यार करता है। शरीर से बेहद प्यार करता है। प्राचीन महाकाव्यों में निज के बहाने ,शरीर और उसके आनंद की सृष्टि पर जोर है। शरीर का विमर्श अलगाव का विमर्श है। भगवान के बारे में भी जब कवि रूपायन करने बैठा तो शरीर ही प्रमुख विषयवस्तु था। शरीर,स्व,आनंद और निजता ये चार चीजें हैं जो अलगाव के कारण कृति के केन्द्र में आयीं। अन्तर्विरोधों के बिना इन चारों चीजों का विकास संभव नहीं है।ये चार चीजें अज्ञेय के लेखन में भी प्रमुख हैं।
    लेखक के अस्तित्व की परिस्थितियां उसका जीवन से अलगाव पैदा करती हैं। अलगाव के कारण लेखक बाहरी चीजों को आत्मसात करता है और अपने अलगाव को अभिव्यक्त करता है। इस क्रम में वह अपने अस्तित्व के रूपों से स्वायत्त नजर आता है। परम नजर आता है। मार्क्स के शब्दों में यह 'अमूर्त व्यक्तिनिष्ठता' है।
मार्क्स ने प्राचीन काल में अलगाव को उत्पत्तिपरक रूप में विश्लेषित करते हुए ' पृथक्कृत व्यक्तिनिष्ठता' और '' अमूर्त व्यक्तिनिष्ठता'' की चर्चा की है। मार्क्स के अनुसार आधुनिक राष्ट्र के उदय के साथ यह धारणा नकारात्मक नहीं रह जाती बल्कि सकारात्मक हो जाती है। सकारात्मक शक्ति बन जाती है। सकारात्मक का अर्थ है 'वास्तव' और 'अनिवार्य'। इसके लिए किसी नैतिक स्वीकृति की जरूरत नहीं है। इस ऐतिहासिक प्रवृत्ति का आधुनिक राष्ट्र में 'आत्मकेन्द्रित' रूप में विकास होता है। 'पृथक्कृत व्यक्तिनिष्ठता ' के लिए आधुनिक राष्ट्र स्वाभाविक परिस्थितियां पैदा करता है।
      अलगाव का आधार है 'आत्मकेन्द्रिकता' ,इसका '' सबके खिलाफ और सबके लिए जंग'' की धारणा से गहरा संबंध है। इस धारणा के आधार पर आंतरिक वैधता ,प्रकृति के सार्वभौम नियमों की वैधता और आंतरिक अनुभूति को महत्वपूर्ण माना गया। आधुनिक समाज व्यक्ति को अपने साथ एकीकृत नहीं करता, कुछ तो यह संयोग की बात है और कुछ व्यक्तिगत प्रयासों के ऊपर भी निर्भर करता है। मार्क्स ने लिखा है बुर्जुआ समाज में व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार सुख भोगता है। राजनीतिक अर्थ में बुर्जुआ समाज में व्यक्ति अपने को राष्ट्र से पृथक् कर लेता है। अपनी निजी अवस्थाओं को राष्ट्र से अलग कर लेता है। जहां उसकी मनुष्य,राष्ट्र,,समुदाय और मानवीय निर्धारणकर्त्ता के रूप में महत्ता उद्धाटित होती है। व्यक्ति के अन्य गुण सामने आते हैं और वे उसके अस्तित्व को निर्धारित करने में मदद करते हैं। मार्क्स के अनुसार मनुष्य का व्यक्ति के रूप में अस्तित्व बुनियादी तत्व है। बुर्जुआ समाज में व्यक्तिवाद और व्यक्तिगत अस्तित्व ही अंतिम सत्य है। बाकी सब चीजें जैसे श्रम,गतिविधियां बगैरह इसके साधन हैं। बुर्जुआ समाज में वास्तव आदमी निजी व्यक्ति (प्राइवेट इण्डिविजुअल) होता है। यह ऐसा व्यक्ति है जो मूलत: बाहरी और भौतिक है।
   अनेक समीक्षकों ने अज्ञेय की कृतियों में लेखक के निजी जीवन को खोज लिया है,दूसरी ओर पाठक उनकी रचनाओं में अपने जीवन के पहलुओं को खोज रहे हैं। साहित्य पढ़ने का यह तरीका गलत है।
सआदत हसन मंटो ने साहित्य के बारे में लिखा है अदब एक फ़र्द(आदमी) की अपनी जिंदगी की तस्वीर नहीं। जब कोई अदीब कलम उठाता है तो वह अपने घरेलू मामलात का रोजनामचा पेश नहीं करता। वह अपनी ज़ाती ख्बाहिशों,खुशियों,रंजिशों ,बीमारियों और तंदुरूस्तियों का जिक्र नहीं करता।उसकी कलमी तस्वीरों में,बहुत मुमकिन है,आँसू उसकी दुखी बहन के हों,मुसकराहटें आपकी हों और क़हक़हे एक खस्ताहाल मज़दूर के। इसलिए अपनी मुसकराहटों,अपने आँसुओं और अपने क़हक़हों की तराज़ू में उन तस्वीरों को तोलना बहुत बड़ी ग़लती है।









                   


रविवार, 26 दिसंबर 2010

जनवादी अज्ञेय की तलाश में

      इस साल स.ही.वा.अज्ञेय का जन्मशती वर्ष मनाया जा रहा है और उनके नाम पर बड़े-बड़े जलसे हो रहे हैं और इन जलसों में सबसे विलक्षण बात है प्रगतिशील आलोचकों और लेखकों की उपस्थिति। उल्लेखनीय है प्रगतिशील आलोचकों ने अज्ञेय का कभी संतुलन के साथ मूल्यांकन नहीं किया और वे उन्हें लगातार आधुनिकतावादी और अमेरिकापंथी कहकर खारिज करते रहे हैं। वे अज्ञेय को लोकतांत्रिक लेखक नहीं मानते। ऐसे  लेखकों-आलोचकों को जब अज्ञेय के जलसों में देखता हूँ तो आश्चर्य होता है। ये लोग साहित्य की रेबड़ियां खाने में हमेशा आगे रहते हैं। ये साहित्य के जन-संपर्क अधिकारी हैं। ये सबके हैं और सब इनके हैं। सेठ,सत्ता,सेठानी,विश्वविद्यालय ,टीवी आदि सभी मंचों पर इन्हें देख सकते हैं।  ये असल में साहित्य के प्रगतिशील लेखक-आलोचक नहीं जनसंपर्क अधिकारी हैं। उन्हें मंच से मतलब है और वे किसी भी लेखक के आयोजन में और किसी भी विषय पर सानंद पधारने को तैयार रहते हैं बस उन्हें सिर्फ पत्र-पुष्प और कुर्सी चाहिए। इससे हिन्दी का सिर नीचा हुआ है, आलोचना दरिद्र हुई है।
      अज्ञेय को कल तक लोकतंत्र का शत्रु बताने वाले,अमेरिका का एजेण्ट बताने वाले और आधुनिकतावादी बताने वाले स्वनामधन्य प्रगतिशील हिन्दी आलोचकों की वैचारिक दरिद्रता ही कही जाएगी कि वे खुलकर अपनी आत्मालोचना नहीं कर रहे हैं। वे अज्ञेय का पुनर्मूल्यांकन भी नहीं कर रहे हैं। वे यह भी नहीं बता रहे हैं कि साहित्य में पहली और दूसरी परंपरा बनाते समय उन्हें अज्ञेय का स्मरण क्यों नहीं आया ? वे नहीं बता रहे हैं कि धर्मनिरपेक्षता,लोकतंत्र और समानता के व्यापक संदर्भ में अज्ञेय क्यों प्रासंगिक हैं ?
     वे हमें अज्ञेय पर कुछ किस्से बता रहे हैं। संस्मरण बता रहे हैं। गूढ़ किस्म की अबूझ बातें बता रहे हैं जिन्हें मौजूदा दौर से जोड़कर देखने और समझने में असुविधा होती है। जो लोग साम्प्रदायिकता का विरोध करने वालों और अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करने वालों को अभी तक जनवादी और धर्मनिरपेक्ष मानते रहे हैं वे भी अज्ञेय को जनवादी और धर्मनिरपेक्ष लेखक मानने से किनाराकशी कर रहे हैं। हिन्दी साहित्य में जो लोग अज्ञेय की ‘कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ की गतिविधियों का विरोध करते रहे हैं और उसके आधार पर उन्हें सीआईए का एजेंट तक बताते रहे हैं उन्हें इस बात का जबाब देना चाहिए कि इन दिनों सीआईए और अमेरिकी विदेश नीति के झंड़े तले चलने वाले विश्वव्यापी लोकतंत्र बचाओ संगठन ‘ दि इनडोवमेंट फॉर डेमोक्रेसी ’ के साथ जुड़े हुए प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन उन्हें सीआईए एजेण्ट नजर क्यों नहीं आते ? समझ में नहीं आता कि अज्ञेय को ही शीतयुद्धीय तमंगे क्यों दिए गए ? जबकि अज्ञेय ने आपात्काल का विरोध किया था। साम्प्रदायिकता का विरोध किया था,धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में जमकर लिखा। अज्ञेय हिन्दी के प्रमुख जनवादी और धर्मनिरपेक्ष लेखक हैं उन्होंने अलगाव की धारणा का साहित्य में,खासकर कथा साहित्य में सर्जनात्मक सकारात्मक रूपायन किया है। अज्ञेय पर नयी समीक्षा का गहरा असर था। कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के साथ वे जुड़े हुए थे। उन्होंने 1980 में ‘जय जानकी यात्रा’ के नाम पर बहुत कुछ ऐसा किया जिसकी आलोचना भारत के संदर्भ में रखकर की जानी चाहिए। यह अध्यात्म और साहित्य की जुगलबंदी थी।
   ‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ नामक अमेरिकी संगठन के साथ बाबू जयप्रकाश नारायण आदि भारत के अनेक राजनेता-बुद्धिजीवी जुड़े हुए थे। लेकिन उन सबको भारत की राजनीति में लोकतांत्रिक माना गया । लेकिन अज्ञेय को नहीं।  भारत में भाजपा को लोग लोकतांत्रिक मानने को तैयार हैं लेकिन अज्ञेय को नहीं। सवाल उठता है क्या अज्ञेय लोकतांत्रिक हैं ? यदि हैं तो उनका एक लोकतांत्रिक लेखक के रूप में मूल्यांकन होना चाहिए। अज्ञेय को हिन्दी आलोचना के एक बड़े हिस्से ने शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क में रखकर पढ़ा और विश्लेषित किया है। कम से कम हमें अब अज्ञेय और हिन्दी साहित्य का शीतयुद्ध की वैचारिक बंद गली के बाहर लाकर मूल्यांकन करना चाहिए।
      अज्ञेय की कविता के बारे में बात करते समय हमें समग्रता और विविधता दोनों का ख्याल रखना होगा। ‘समग्रता और विविधता’ उनकी आधुनिकता की धुरी है। वे हठात आधुनिकतावाद के क्लासिकल लेखक कैसे बन गए ? कल तक जो लोग यह मान रहे थे कि अज्ञेय के आधुनिकतावाद का कोई महत्व नहीं है ,उन्हीं को अज्ञेय इतने प्रासंगिक क्यों लग रहे हैं ? जिन समस्याओं पर अज्ञेय ने प्रगतिवाद की आलोचना करते हुए सबसे पहले ध्यान खींचा था। समाजवाद की अनेक बड़ी कमजोरियों को अपनी रचना के माध्यम से उजागर किया था। उन पर पुनर्विचार की जरूरत है।
    समाजवाद, साम्प्रदायिकता,लोकतंत्र, आपात्काल,साहित्य और यथार्थ,साहित्य और क्रांति, साहित्य और अलगाव, साहित्य और दैनंदिन जीवन,साहित्य और आत्मकथा, साहित्य और नैतिकता, साहित्य और धर्म, कहानी और उपन्यास की संरचनाएं,कविता या साहित्य का लक्ष्य,लेखक की भूमिका,साहित्य की सामाजिक भूमिका,साहित्य की राजनीतिक भूमिका ,पत्रकारिता और राष्ट्रवाद,पत्रकारिता और लोकतंत्र आदि सवालों पर उन्होंने विस्तार के साथ विचार किया है। इन सभी सवालों पर विचार करते हुए अज्ञेय ने साहित्य और पत्रकारिता के सर्जनात्मक और सूचनात्मक रूप के साथ कोई समझौता नहीं किया। उनकी सर्जनात्मक प्रतिभा का लोहा उनके आलोचक भी मानते हैं। उनके लेखन में स्टीरियोटाईप रूपों का निषेध है।
     रोलां बार्थ के शब्दों में किसी भी साहित्य की महानता इस तथ्य से आंकी जानी चाहिए कि क्या उसमें जीवन की धड़कनें व्यंजित होती हैं ? क्या साहित्य से जीवन को प्राणवायु मिलती है ? क्या जीवन को साहित्य विकसित करता है या उसका विध्वंस करता है ? कम से कम अज्ञेय के साहित्य के संदर्भ में हम यह कह सकते हैं कि साहित्य में जीवन संचार के साथ-साथ जीवन में भी सर्जनात्मक प्राणवायु के संचार में उनके साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान है। खासकर उनके क्रांतिकारी जीवन की रचनाओं, भारत-विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखी रचनाओं,अलगावकेन्द्रित कथा साहित्य और आपातकाल के विरोध में लिखी रचनाओं ने हिन्दी साहित्य की जनवादी परंपरा को समृद्ध किया है।
    अज्ञेय और प्रगतिशील लेखकों में एक बड़ा अंतर है प्रगतिशील लेखकों ने सार्वभौम को प्रधानता दी, सामयिकता-स्थानीयता के रूपायन पर जोर दिया , तात्कालिक राजनीतिक जरूरतों की साहित्यपूर्ति पर जोर दिया। जबकि अज्ञेय ने सामयिक समस्याओं को सार्वभौम परिप्रेक्ष्य में पेश किया। रचना को तात्कालिक राजनीतिक  दबावों से मुक्त रखा । वे इस क्रम में विचारधारा का परित्याग नहीं करते। जिस तरह प्रगतिशील लेखकों को विचारधारा से लगाव है वैसे ही अज्ञेय को भी विचारधारा से लगाव है। वे अपनी विचारधारात्मक अभिव्यक्तियों में वैविध्यपूर्ण इमेजरी और प्रतीकों का जमकर इस्तेमाल करते हैं। बहुस्तरीय अर्थ संरचनाओं को अभिव्यक्ति देते हैं।  यहां उनकी उन कविताओं में से सिर्फ एक कविता की चर्चा करना चाहता हूँ जिस पर हिन्दी आलोचना में कभी चर्चा नहीं हुई । कविता का शीर्षक है  ‘घृणा का गान’ । यह कविता भारत के उस यथार्थ की ओर ध्यान खींचती है जिसे हम अछूत कहते हैं। लिखा है-‘‘सुनो,तुम्हें ललकार रहा हूँ,सुनो घृणा का गान! / तुम,जो भाई को अछूत कह वस्त्र बचाकर भागे/ तुम,जो बहिनों छोड़ बिलखती,बढ़े जारहे आगे! / उत्तर दो,मेरा है प्रतिहत आह्वान-/ सुनो ,तुम्हें ललकार रहा हूँ,सुनो घृणा का गान! /’’
    यह कविता हिन्दी की अछूत समस्या पर लिखी शानदार कविता है। इसमें लेखक का अछूत को भाई मानना बड़ा ही अर्थपूर्ण है और यह कविता अज्ञेय ने लाहौर में 30 जनवरी 1935 को लिखी थी। इस कविता के माध्यम से लेखक ने अमीरों,सवर्णों, लेखकों, सत्ताधारियों आदि के अछूतों के प्रति अमानवीय रवैय्ये का जितना सुंदर चित्रण किया है। वह उल्लेखनीय है। अछूतविरोधी भावनाओं को उन्होंने घृणा के गान की संज्ञा दी है। जो अछूतों से परहेज रखते थे उन्हें अज्ञेय ने ‘श्मशानों के देव’ कहा। अछूतों के प्रति अमानवीय रवैय्या उनका भी है जो प्राचीनतापंथी हैं। लिखा है ‘‘ तुम ,सत्ताधारी, मानवता के शव पर आसीन/ जीवन के चिर-रिपु,विकास के प्रतिद्वंद्वी प्राचीन/ तुम श्मशान के देव! सुनो यह रण-भेरी की तान-/ आज तुम्हें ललकार रहा हूँ,सुनो घृणा का गान।’’
     अज्ञेय के बारे में आम तौर पर जितनी चर्चाएं हुई हैं उनमें ज्यादातर उन्हीं रचनाओं का हवाला दिया जाता है और मूल्यांकन किया जाता है जो पाठ्यपुस्तकों में हैं अथवा जिन पर प्रगतिशील आलोचकों ने कहीं पर कुछ बोल या लिख दिया है। इसके कारण अज्ञेय के समग्र लेखन को लेकर हिन्दी में कभी चर्चा ही नहीं हुई है। यहां तक कि किसी बड़े प्रगतिशील आलोचक ने उनके ऊपर कोई आलोचना किताब भी नहीं लिखी है। इससे हिन्दी आलोचना के उपेक्षापूर्ण रूख को आसानी से समझा जा सकता है।
    अज्ञेय आधुनिकतावादी विजन में गहरी आस्था रखते हैं और उसके आधार पर आधुनिकतावादी सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति का समूचा तंत्र निर्मित करते हैं। इससे उनके लेखन में आकर्षण पैदा हुआ वहीं दूसरी ओर हिन्दी साहित्य में प्रगतिशील सौंदर्य मानकों के समानान्तर आधुनिकतावादी सौंदर्य के हिन्दी काव्य मानकों का जन्म हुआ।
    वे अपनी कविताओं में जिस विषय को उठाते हैं उसमें प्रतीक को अंतर्वस्तु के साथ जोड़ते हैं। आधुनिक समाज के उन रूपों और प्रक्रियाओं को सबसे पहले देखते हैं जिनके साथ आधुनिकतावादी मानकों का गहरा संबंध है। वे मध्यवर्ग को आधुनिकतावादी सौंदर्य मानकों के सर्जक के रूप में चिह्नित करते हैं।
    मध्यवर्ग इस समाज का सबसे महत्वपूर्ण सर्जक वर्ग है और भविष्य का नायक भी है यह बात अज्ञेय ने प्रतिष्ठित की है। अज्ञेय के सृजन की पीड़ा और लक्ष्य को व्यक्त करने वाली पंक्तियां देखें,लिखा है, ‘‘ प्रेम को प्राप्त करना,जीवन के मिष्टानों को चखना और जीवन के मीठे आसव में मत्त रहना मेरे लिए नहीं है।मेरा काम केवल इतना ही है कि जो प्रेम औरों ने प्राप्त किया है,जिस आसव ने दूसरों को उन्मत्त किया है ,उसकी पवित्र मिठास को अपनी वाणी द्वारा संसार-भर में फैला दूँ- और जो दुःख और क्लेश मैंने देखे हैं,उन्हें अपने पास संचित कर लूँ -उस से एक विराट् समाधि बना लूँ जिस में मृत्यु के बाद मेरा शरीर दब जाय।’’
     आधुनिकतावाद की एक खूबी है वहां छद्म और फेक भाषा का व्यापक प्रयोग मिलता है। क्या अज्ञेय ने अपने साहित्य में फेक भाषा का प्रयोग किया है ? क्या वे ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जो गलत समझी जाती हो,भ्रमित करती हो ?भ्रमित व्याख्या को जन्म देती हो ? आधुनिकतावादी नहीं जानते कि भाषा का साहस के साथ कैसे इस्तेमाल करें। लेकिन अज्ञेय के साथ यह संकट नहीं है। वे भाषा का साहसिक प्रयोग करते हैं साथ ही भाषा की काव्यात्मकता और संप्रेषणीयता के बीच संतुलन बनाए रखते हैं। वे हिन्दी में नए विषयों और पात्रों को लेकर आए। साहित्य को भारत विभाजन की अभिव्यक्ति का आधार बनाया,आपातकाल के प्रतिवाद का औजार बनाया और यह काम उन्हें आधुनिकतावादी से जनवादी बनाता है। 





रविवार, 21 नवंबर 2010

अज्ञेय जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष- बलाओं की मां है साम्प्रदायिकता

    स.ही.वा.अज्ञेय हिन्दी के बड़े साहित्यकार हैं। उनकी प्रतिष्ठा उनमें भी है जो उनके विचारों से सहमत नहीं हैं। अज्ञेय के बारे में प्रमुख समस्या है कि उन्हें किस रूप में याद करें ? क्या उन्हें धिक्कार और अस्वीकार के साथ देखें ? क्या वे सचमुच में ऐसा कुछ लिख गए हैं जिसके कारण उन्हें याद किया जाए ?
    मेरे मन में अज्ञेय को लेकर लंबे समय से कई सवाल उठते रहे हैं मसलन् क्या एक व्यक्ति मार्क्सवाद में दीक्षित होने के बाद उसके प्रभाव से मुक्त हो जाता है ? क्रांतिकारी अज्ञेय और आधुनिकतावादी अज्ञेय में ऐसे कौन से तत्व हैं जिनसे हम सीख सकते हैं ? हिन्दी के समीक्षकों ने अज्ञेय के साथ क्या न्याय किया है ? क्या क्रांतिकारी अज्ञेय का लेखन आज के दौर में हमारी कोई मदद कर सकता है ?
   मुझे अज्ञेय इसलिए पसंद हैं कि वे साहित्य को अभिव्यक्ति नहीं संप्रेषण मानते हैं। हिन्दी के अधिकांश आलोचकों ने साहित्य को अभिव्यक्ति माना है। अज्ञेय ने संप्रेषण माना है। अज्ञेय ने लिखा है-‘‘ मैंने हमेशा माना है कि रचना का पहला धर्म अभिव्यक्ति नहीं है,संप्रेषण है।’’ साहित्य को संप्रेषण मानने का अर्थ है उसे कम्युनिकेशन के रूप में देखना। यह साहित्य का विकसित नजरिया है।
    एक और महत्वपूर्ण बात है जो अपील करती है वह है लेखक के नाते उनका यह कहना कि कहानी लेखन मुझे इसलिए बंद करना पड़ा ,क्योंकि कहानी लिखने से अर्थवत्ता का एहसास नहीं हो रहा था।
    संप्रेषण के लिए उन्हें जब कहानी नाकाफी लगने लगी तो उन्होंने कहानी लिखना बंद कर दिया।  उन्हें जो नजरिया नाकाफी लगा उसे छोड़ दिया। वे आज के तमाम हिन्दी लेखकों की तरह नहीं हैं जो किसी नजरिए से इसलिए चिपके हैं क्योंकि उन्हें उससे प्यार है,पुराना संबंध है,विचारधारात्मक लगाव है,लेकिन व्यवहार में उसे नहीं लागू करते।
    ऐसे ढ़ेर सारे लेखक हैं जिनके नजरिए ,साहित्य और जीवन में महा-अंतराल है। अज्ञेय इस अर्थ में बड़े लेखक हैं कि वे जिस विचार को मानते थे उसे व्यवहार में, साहित्य में ,पत्रकारिता में उतारने की क्षमता भी रखते थे।
   अज्ञेय के नजरिए के दो छोर हैं ,पहला है अर्थवत्ता, और दूसरा है संप्रेषण। अर्थवत्ता की तलाश में उनको विचारधारात्मक रूपान्तरण करना पड़ा और संप्रेषण के लिए विधा रूपों में नए प्रयोगों की ओर जाना पड़ा।
    अज्ञेय लिखने के लिए लिखने में विश्वास नहीं करते थे। विचारधारात्मक आग्रहों के आधार पर नहीं लिखते थे बल्कि संप्रेषण के लिए लिखते थे। लेखन को संप्रेषण मानना बड़ी उपलब्धि है और यह हिन्दी की पहली और दूसरी परंपरा से भिन्न परंपरा है। संप्रेषण पर जोर देने का अर्थ है समाज और पाठक को केन्द्र में रखकर लिखना। उसे साथ लेकर चलना।
     अज्ञेय उन चंद लेखकों में हैं जो मौजूदा दौर की बेहतर समझ रखते थे। सामयिक यथार्थ को ज्यादा गहराई से पहचानते थे। उन्होंने लिखा है- ‘‘ जानकारी हासिल करने के (या जानकारी को विकृत करके जबरन वह विकृति स्वीकार कराने के ) साधन लगातार ऐसे लोगों के दृढ़तर नियंत्रण में चले जा रहे हैं जिन पर हमारा नियंत्रण लगातार कमजोरतर होता जा रहा है। यहां तक कि स्वयं हम कहां खड़े,और जिस युग अथवा काल-खंड में जी रहे हैं वह वास्तव में क्या है ,उससे हमारा रिश्ता क्या अथवा कैसा है ,यही पहचानना हमारे लिए दिन-प्रतिदिन कठिनतर होता जा रहा है। ’’
   अज्ञेय का मुझे अच्छा लगने का एक और कारण है उनका साम्प्रदायिकता और अधिनायकवाद विरोधी नजरिया। इस प्रसंग में मुझे उनकी एक कहानी ‘मुस्लिम-मुस्लिम भाई -भाई’ याद आ रही है। यह छोटी बड़ी शानदार कहानी है। इस कहानी में मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बेपर्दा किया गया है। पूरी कहानी का ढ़ांचा एकदम धर्मनिरपेक्ष है। इस कहानी के आरंभ में अज्ञेय ने साम्प्रदायिकता को ‘डर’ और 'छूत' की बीमारी कहा है। लिखा है डर ‘‘बला नहीं बलाओं की माँ है।’’ ..‘‘ जहां डर आता है,वहां तुरंत घृणा और द्वेष और कमीनापन आ घुसते हैं, और पीछे-पीछे न जाने मानवात्मा की कौन कौन-सी दबी हुई व्याधियां !’’
अज्ञेय ने जिस तरह मुस्लिम साम्प्रदायिकता को नंगा करते हुए ‘मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई’ कहानी लिखी थी। उसी तरह हिन्दू साम्प्रदायिकता को निशाना बनाते हुए ‘रमंते तत्र देवता’ कहानी लिखी थी। इन दोनों कहानियों में रेखांकित किया गया है कि किस तरह दोनों ही रंगत की साम्प्रदायिकता  ने औरतों को निशाना बनाया है। यह कहानी 1946 के कलकत्ता में हुए दंगों पर लिखी गयी है। उस समय कोलकाता कैसा था इस पर अज्ञेय ने लिखा ‘‘शहर बहुत से छोटे-छोटे हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में बंट गया था। जिनकी सीमाओं की रक्षा पहरेदार नहीं करते थे, लेकिन जो फिर भी परस्पर अनुल्लंघ्य हो गए थे। लोग इसी बंटी हुई जीवन-प्रणाली को लेकर भी अपने दिन काट रहे थे।’’
   इसी कहानी में एक अन्य जगह लिखा है ‘‘ नफ़रत के एक-एक बीज से हमेशा सौ-सौ जहरीले पौधे उगे हैं। नहीं तो यह जंगल यहां उगा कैसे ,जिसमें आज हम-आप खो गए हैं और क्या जानें निकलेंगे कि नहीं ? हम रोज़ दिन में नफ़रत का बीज बोते हैं और पौधा फलता है तो चीखते हैं कि धरती ने हमारे साथ धोखा किया !’’   
                 

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

कवि चतुष्टयी जन्मशती पर- विभूतिनारायण राय का साम्राज्यवादी आख्यान

                     (स्व.बाबा नागार्जुन)       

     बाबा नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल,अज्ञेय और शमशेर का यह जन्मशती वर्ष है। यह समारोह ऐसे समय में आरंभ हुआ है जब देश भयानक मंदी की मार और नव्य-उदार आर्थिक नीतियों की मार से गुजर रहा है। सवाल उठता है क्या इसे तिलांजलि देकर कवि चतुष्टयी की जन्मशती मनायी जा सकती है ? लेकिन हिन्दी के कई प्रतिष्ठित लेखकों -आलोचकों और संस्थानों ने साम्राज्यवाद और सत्ता के प्रति आलोचनात्मक रूख को तिलांजलि देकर इस आयोजन का आरंभ कर दिया है।  
   बाबा नागार्जुन को मंदी और नव्य-उदारीकरण के संदर्भ में पढ़ना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। मैंने करीब एक दशक से बाबा को  नहीं पढ़ा था,कभी पढ़ा भी तो चलताऊ ढ़ंग से पढ़ा और रख दिया,लेकिन इस बीच में उनकी जो भी किताबें बाजार में दिखीं खरीदता चला गया और इस सप्ताह उन्हें मन लगाकर पढ़ गया।
   बाबा नागार्जुन से मुझे कईबार व्यक्तिगत तौर पर जेएनयू में पढ़ते समय मिलने और बातें करने का मौका मिला था। उनसे मेरी पहली मुलाकात 1981 में हुई जब मैंने उनकी आपात्कालीन कविताओं पर एम.फिल् करने का फैसला किया था। केदारनाथ सिंह गाइड थे। उसके बाद तो कईबार मिला और उनके साथ लंबी बैठकें भी कीं।
      बाबा नागार्जुन सहज,सरल,पारदर्शी और धुनी व्यक्तित्व के धनी थे। प्रतिवादी लोकतंत्र उनके स्वभाव में रचा-बसा था। उनकी कविता लोकतंत्र की तरह पारदर्शी और आवरणहीन है। उन्हें प्रतिवादी लोकतंत्र का बिंदास लेखक भी कह सकते हैं। प्रतिवादी लोकतंत्र की प्राणवायु में जीने वाला ऐसा दूसरा लेखक हिन्दी में नहीं हुआ। नामवर सिंह को नागार्जुन का व्यंग्य खास लगता है मुझे उनका प्रतिवादी लोकतंत्र के प्रति लगाव खास लगता है।
     नागार्जुन के व्यक्तित्व और कविता की यह खूबी थी कि वे जैसा सोचते थे वैसा ही जीते भी थे। आज हिन्दी के अधिकांश लब्ध प्रतिष्ठित लेखक इससे एकदम उलट हैं। सोचते कुछ हैं जीते कुछ हैं। आज के हिन्दी लेखकों के कर्म और विचार में जो महा-अंतराल आया है वह हमारे लिए चिन्ता की बात है। कवि चतुष्टयी की जन्मशती पर कम से कम हिन्दी के स्वनामधन्य बड़े लेखक इस सवाल पर सोचें कि उनके कर्म और विचार में महा-अंतराल क्यों आया है ? उनके हाथ से सामयिक यथार्थ क्यों छूट गया है ?
     कवि चतुष्टयी जन्मशती पर बड़े-बड़े प्रतिष्ठानी जलसों की खबरें आ रही हैं । इन जलसों के बहाने सत्य को असत्य में तब्दील करने की कोशिशें आरंभ हो गयी हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि यह काम प्रगतिशील आंदोलन के पुरोधाओं की आंखों के समाने हो रहा है वे असत्य का जयगान सुन रहे हैं। यह हिन्दी के प्रतिवादी कवियों का अपमान है। मैं यहां सिर्फ एक झलकी दिखाना चाहता हूँ।
   हाल ही में वर्धा स्थित महात्मा गांधी विश्वविद्यालय ने एक बड़ा ही भव्य कार्यक्रम शमशेर, अज्ञेय, केदार और नागार्जुन के जन्मशती पर आयोजित किया था। इसमें जो विचार वक्ताओं ने रखे हैं ,उन पर विस्तार से चर्चा करने की जरूरत है। हमारे प्रगतिशील लेखक किस संसार की छवि बना रहे हैं और सत्ताभक्त साहित्य प्रशासक विभूतिभूषण राय किस नजरिए से संसार की छवि बना रहे हैं,इसे देखना बड़ा ही दिलचस्प होगा।
   मैंने कभी राय साहब को देखा नहीं है। मिलने का भी सौभाग्य नहीं मिला। लेकिन जो रिपोर्ट इस सेमीनार की सामने है उस पर कहे बिना नहीं रह सकता। एक वाक्य में कहूं तो विभूतिनारायण राय ने बाबा नागार्जुन और अन्य प्रतिवादी कवियों की आत्मा को अपने बयान से कष्ट पहुंचाया है। राय साहब ने कहा है -
"बीसवीं शताब्दी को यदि एक वाक्य में परिभाषित करना हो तो मैं उसे हाशिए की शताब्दी कहना चाहूंगा। इस सदी में उपनिवेशवाद का अंत हुआ, लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ स्थापित हुईं और सदियों से समाज के हाशिए पर रहने वाले लोग- जैसे दलित, आदिवासी और स्त्रियाँ- पहली बार मनुष्य का जीवन जीने का अवसर पा सके। इससे पहले हाशिए पर अटके लोगों के मानवाधिकार समाज के प्रभु वर्ग द्वारा अपहृत कर लिए गये थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना हुई और विश्व मानवाधिकारों के चार्टर की घोषणा हुई तो मानव सभ्यता को जो उपहार मिला वह किसी भी धार्मिक पुस्तक से नहीं मिल पाया था।"( http://hindustaniacademy.blogspot.com)
    इस साधुभाषा का हिन्दी के प्रतिवादी कवियों के सोच से क्या संबंध है ? राय साहब इतने भोले कैसे हैं कि उन्हें समाजवादी व्यवस्था का उदय और पराभव नजर नहीं आया, उन्हें दो-दो विश्वयुद्ध नजर नहीं आए और उन्हें अमेरिकी साम्राज्यवाद का आतंकी नव्य उदार चेहरा नजर नहीं आया, आखिरकार विभूति बाबू किसकी चारण वंदना कर रहे हैं ? उन्होंने जैसा भाषण दिया है वैसा भाषण अमेरिका के ह्वाइट हाउस के कर्मचारी रोज देते हैं। हिन्दी के प्रगतिशील लेखक यह कैसे भूल सकते हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवाद नाम का पूरा विचारधारात्मक तंत्र है जिसके जबड़े में हम सब फंसे हैं। राय साहब के साहबी बयान से तय हो चुका है कि अब ज्ञान-गंगा किधर बहेगी।
   हम सोचें कि क्या किसी लेखक को अमेरिकी साम्राज्यवाद के गुनाहों पर इस साधुभाषा के बहाने पर्दा डालने की अनुमति दी जा सकती है ? क्या नागार्जुन,केदार और शमशेर की साम्राज्यवाद विरोधी चेतना और अज्ञेय की अमेरिकी साम्राज्यपरस्त समझ में पटरी बिठायी जा सकती है ? जी हां ,यह काम इस साधुभाषा के बहाने किया जा रहा है।
     मजेदार बात यह है कि नागार्जुन,केदार और शमशेर और अज्ञेय को आप एक साथ कैसे रख सकते हैं ? कभी उनका नजरिया नहीं मिला तो अब उनकी एक साथ जन्मशती कैसे मना सकते हैं ? जब इस तरह का घल्लूघारा होगा तो समाजवाद और साम्राज्यवाद का क्या करोगे ? काग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के साथ अज्ञेय के रिश्ते का क्या करोगो ? जन्मशती के नाम पर इस तरह की विचारधाराहीनता सिर्फ अब हिन्दी के सत्ताभक्तों के यहां ही संभव है यही वजह है कि विभूति बाबू ह्वाइट हाउस के कर्मचारी की भाषा बोल रहे हैं।  
    दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हिन्दी के मंच,गोष्ठी या सेमीनार अमेरिकी साम्राज्यवाद की भाषा के मंच नहीं रहे हैं। विभूति बाबू ने इस बयान के साथ ही सत्ता के गलियारों में अपनी पकड़ और भी पुख्ता कर ली है। इस मौके पर मुझे नागार्जुन की एक कविता याद आ रही है,उसका शीर्षक है "इतना ही काफी है"। नागार्जुन ने लिखा है -
" बोल थे नेह -पगे बोल,
यह भी बहुत है! इतना ही काफी है!"

         





सोमवार, 15 मार्च 2010

अज्ञेय जन्मशती पर खास- अज्ञेय के अलगाव और मार्क्स को क्यों भूल गए नामवर सिंह




          (नामवर सिंह)
       (सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय')   
       अशोक वाजपेयी ने रविवार (14 मार्च 2010) के जनसत्ता में अपने कॉलम में नामवर सिंह के अज्ञेय के बारे में दिए गए भाषण के प्रमुख बिंदुओं को बताया है। वाजपेयी के अनुसार नामवरजी ने अज्ञेय की नाचकविता का पाठ किया और आलोचना को कई नसीहत दे ड़ालीं। पहली बात यह है कि नाचकविता आपात्काल के प्रतिवाद में लिखी भारतीय भाषाओ में लिखी श्रेष्ठतम कविता   है। अशोक वाजपेयी जानते हैं कि यह असाधारण परिस्थितियों में लिखी कविता है। पता नहीं नामवरजी ने आपात्काल का संदर्भ बताया था कि नहीं ,या फिर अशोक बाजपेयी लिखना भूल गए ?
    यह उल्लेखनीय है कि नामवरसिंह ने आपातकाल का समर्थन किया था और अज्ञेय ने विरोध किया था। यह कविता प्रत्येक जनतंत्र प्रेमी को पढ़नी चाहिए। नामवरसिंह-अशोक वाजपेयी दोनों ही आलोचना के नाम पर लंबे समय से जो कह रहे हैं वे बातें आज प्रासंगिक नहीं हैं। पता नहीं ये दोनों आलोचक अपनी ऊर्जा अप्रासंगिक बातें बताने में क्यों खर्च करते हैं।
    आज साहित्य की धारणा बदल गयी है। नामवर की आलोचना में इस बदले रुप की गूंज नहीं मिलती। अशोक वाजपेयी -नामवर सिंह जानते हैं कि यह कनवर्जन का युग है। इसमें साहित्य,विधाएं आदि का ‘ लेखन’ में कनवर्जन हो चुका है। अब सिर्फ ‘लेखन’ होता है। यह ज्याक देरिदा की राय है। इतिहास,आलोचना,कविता, कहानी, उपन्यास आदि विधाओं का अंत हो चुका है। गुरुदेव पढ़ाते रहे हैं कि गलत तर्क के आधार पर सही निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते। नामवरजी अभी भी विधाओं के वर्गीकरण में रखकर देखते हैं ऐसे सारी आलोचना और नेक सलाहों की कूढ़ेदान के अलावा और कहीं जगह नहीं है।
   नामवरजी के अज्ञेय बोध की सीमाएं हैं। नामवरजी ने कभी भी अज्ञेय को ‘अलगाव’ के साहित्य के संदर्भ में नहीं देखा है। नामवरजी को ही दोष क्यों दें हिन्दी के सभी नामी-गिरामी आलोचकों ने भी अज्ञेय को साहित्य और 'अलगाव' के अन्तस्संबंध के आधुनिक फिनोमिना के रूप में नहीं देखा। हिन्दी में दो ही लेखक हैं अज्ञेय और मुक्तिबोध इन दोनों ने 'अलगाव' को गहराई में जाकर चित्रित किया।
      दुर्भाग्य की बात यह है कि 'अलगाव' को देखने की बजाय नामवर सिंह ने मुक्तिबोध में अस्मिता की खोज की। 'अलगाव' की खोज करते तो ज्यादा व्यापक समस्याओं को उद्धाटित कर पाते। यही हाल अज्ञेय का किया है। नामवरसिंह ने अज्ञेय को आधुनिकतावादी बनाकर खारिज किया और 'अलगाव' को परायी प्रवृत्ति मानकर अस्वीकार किया। सच यह है कि 'अलगाव' पूंजीवादी विकास प्रक्रिया का सकारात्मक और स्वाभाविक फिनोमिना है।
     अज्ञेय और मुक्तिबोध के संदर्भ में 'अलगाव' की जब भी चर्चा उठी है उसमें अलगाव को आधुनिक राज्य से विच्छिन्न करके देखा गया। 'अलगाव' का आधुनिक राष्ट्र के साथ गहरा संबंध है। आधुनिक राष्ट्र के उदय के साथ 'जीवन का निजीकरण' होता है। 'पृथक्कृत व्यक्तिनिष्ठता' पैदा होती है। ये सारी चीजें एक विशिष्ट ऐतिहासिक अवस्था की देन हैं।
     प्राचीनकाल में अलगाव का आदर्शकवि कालिदास है और अलगाव का आदर्श रस श्रृंगार रस का साहित्य है। अलगाव का जिस तरह का महिमामंडन कालिदास के यहां है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं है। कालिदास ने ऐसे नायक को पेश किया जो सर्वगुण सम्पन्न है। आनंद में मगन है। आनंद को व्यक्त करता है। कालिदास के पात्र जो कुछ करते हैं अपने लिए करते हैं। कालिदास के नायक प्रेम करते हैं अपने लिए ,युद्ध करते हैं अपने लिए, अकेले ही सारी मुसीबतों का सामना करते हैं। एक तरह से समूची सृष्टि के साथ संघर्ष करते हैं।

     प्राचीनकालीन समाज में रची गई रचनाओं को अलगाव के साथ सबसे पहले जोड़कर कार्ल मार्क्स ने देखा था। इसका आरंभ कार्ल मार्क्स ने अपनी डाक्टरेट थीसिस से किया था और बाद में अन्य रचनाओं में इसका विकास किया। मार्क्स ने एपीक्यूरियन कवियों को 'रोम के नायक कवि' की संज्ञा दी थी। यही स्थिति हमारे कालिदास की है।
   मार्क्सवादी और गैर मार्क्सवादी आलोचकों ने कालिदास की रचनाओं में सामयिक संस्कृति और समाज की बहुत खोज की है किंतु कभी अलगाव की अवधारणा की रोशनी में रखकर विचार नहीं किया।
    कालिदास ऐसा कवि है जिसका सभी चीजों से संघर्ष होता है और सभी चीजें नायक के साथ युद्ध करती नजर आती हैं। कालिदास के पात्र आरंभ से ही अपने बारे में सोचते हैं, अपने लिए संघर्ष करते हैं और आनंद लेते हैं। अपने लिए संघर्ष करना और आनंद मनाना यही अलगाव की धुरी है। वे स्वयं के प्रति कठोर हैं, इनके सामने प्रकृति अपनी सारी अच्छाईयां खो देती है, अच्छाईयों के लिए शब्द अधूरे लगते हैं। अच्छाईयों के लिए शब्द नहीं मिलते।
      एपीक्यूरियन कवियों का नारा था ''वार ऑफ ऑल अगेंस्ट ऑल।'' यानी ''सबके खिलाफ और सबके लिए जंग।'' यही नारा भारत के प्राचीन कवियों का भी था। प्राचीन कवियों के यहां जीवन और आनंद के बीच अंतराल नहीं था।      सारी चीजें शरीर में केन्द्रित थीं। शरीर प्रमुख विमर्श था।
   श्रृंगार रस का समूचा विमर्श शरीर और आनंद का विमर्श है। रस का सारा विमर्श शरीर को केन्द्र में रखता है। नख-शिख वर्णन में उसे सहज ही देखा जा सकता है। नायक का शरीर कैसा है, आंखें कैसी हैं, पीड़ा कैसी है, चिन्ताधारा कैसी है और नायक जब चिन्ता में घिरा होता है तो कैसे कृशकाय हो जाता है और जब नायक युद्धरत होता है तो उसकी भंगिमाएं,शारीरिक सौष्ठव किस तरह का होता है ? इसी तरह नायिका जब कृति में आती है तो सारी ऊर्जा उसके शरीर के सौंदर्य वर्णन पर ही खर्च की गई। कहने का तात्पर्य यह कि प्राचीन कवि 'स्व' और शरीर से बेहद प्यार करता है।
     प्राचीन महाकाव्यों में निज के बहाने शरीर और उसके आनंद की सृष्टि पर जोर है। शरीर का विमर्श अलगाव का विमर्श है। भगवान के बारे में भी जब कवि रूपायन करने बैठा तो शरीर ही प्रमुख विषयवस्तु था। शरीर,स्व,आनंद और निजता ये चार चीजें हैं जो अलगाव के कारण कृति के केन्द्र में आयीं। अन्तर्विरोधों के बिना इन चारों चीजों का विकास संभव नहीं है। लेखक के अस्तित्व की परिस्थितियां उसका जीवन से अलगाव पैदा करती हैं। अलगाव के कारण लेखक बाहरी चीजों को आत्मसात करता है और अपने अलगाव को अभिव्यक्त करता है। इस क्रम में वह अपने अस्तित्व के रूपों से स्वायत्त नजर आता है। परम नजर आता है। मार्क्स के शब्दों में यह 'अमूर्त व्यक्तिनिष्ठता' है।
     मार्क्स ने प्राचीन काल में अलगाव का उत्पत्तिपरक रूप में विश्लेषण करते हुए ' पृथक्कृत व्यक्तिनिष्ठता' और '' अमूर्त व्यक्तिनिष्ठता'' की चर्चा की थी,यह चर्चा नकारात्मक रूप में की थी, मार्क्स के अनुसार आधुनिक राष्ट्र के उदय के साथ यह धारणा नकारात्मक नहीं रह जाती बल्कि सकारात्मक हो जाती है। सकारात्मक शक्ति बन जाती है। सकारात्मक का अर्थ है 'वास्तव' और 'अनिवार्य'। इसके लिए किसी नैतिक स्वीकृति की जरूरत नहीं है। इस ऐतिहासिक प्रवृत्ति का आधुनिक राष्ट्र में 'आत्मकेन्द्रित' रूप में विकास होता है। 'पृथक्कृत व्यक्तिनिष्ठता ' के लिए आधुनिक राष्ट्र स्वाभाविक परिस्थितियां पैदा करता है।
अलगाव की धुरी है 'आत्मकेन्द्रिकता' । इसका आधार है '' सबके खिलाफ और सबके लिए जंग'' की धारणा। इस धारणा के आधार पर आंतरिक वैधता ,प्रकृति के सार्वभौम नियमों की वैधता और आंतरिक अनुभूति को महत्वपूण माना गया। कार्ल मार्क्स ने '' क्रिटिक ऑफ दि हेगेलियन फिलोसफी ऑफ राइट'' (1843) में हेगेल के अलगाव संबंधी नजरिए की विस्तार के साथ समीक्षा करते हुए आधुनिक राष्ट्र का पुराने समाज की परिस्थितियों के साथ अंतर किया। आधुनिक समाज व्यक्ति को अपने साथ एकीकृत नहीं करता, कुछ तो यह संयोग की बात है और कुछ व्यक्तिगत प्रयासों के ऊपर भी निर्भर करता है।
   मार्क्स ने लिखा है बुर्जुआ समाज में व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार सुख भोगता है। राजनीतिक अर्थ में बुर्जुआ समाज में व्यक्ति अपने को राष्ट्र से पृथक् कर लेता है। अपनी निजी अवस्थाओं को राष्ट्र से अलग कर लेता है। यही वह बिंदु है जहां उसकी मनुष्य के रूप में महत्ता सामने आती है। यों भी कह सकते हैं कि राष्ट्र के सदस्य के रूप में महत्ता सामने आती है। समुदाय के सदस्य के रूप में और मानवीय निर्धारणकर्त्ता के रूप में महत्ता उद्धाटित होती है। इसी तरह व्यक्ति के अन्य गुण भी सामने आते हैं और वे उसके अस्तित्व को निर्धारित करने में मदद करते हैं।
   मार्क्स के अनुसार मनुष्य का व्यक्ति के रूप में अस्तित्व बुनियादी तत्व है। बुर्जुआ समाज में व्यक्तिवाद और व्यक्तिगत अस्तित्व ही अंतिम सत्य है। बाकी सब चीजें जैसे श्रम,गतिविधियां बगैरह इसके साधन हैं। मार्क्स ने लिखा है बुर्जुआ समाज में वास्तव आदमी निजी व्यक्ति (प्राइवेट इण्डिविजुअल) होता है। यह ऐसा व्यक्ति है जो मूलत: बाहरी और भौतिक है।
     कार्ल मार्क्स की अलगाव की धारणा का सुनियोजित विकास ''दि मेनुस्क्रिप्टस ऑफ 1844' में होता है। इस कृति में मार्क्स उन तमाम धारणाओं को विकसित करते हैं जो '' क्रिटिक ऑफ हेगेलियन फिलोसफी ऑफ राइट'' में पहले व्यक्त की गई थीं।
    अलगाव के बारे में कार्ल मार्क्स को विस्तार के साथ पेश करने का प्रधान मकसद इस तथ्य की ओर ध्यान खींचना है कि अज्ञेय ने जिस अलगाव और व्यक्तिनिष्ठता को अपने उपन्यासों में अभिव्यक्ति दी है वह आधुनिक बुर्जुआ समाज का सकारात्मक तत्व है ,दुर्भाग्य की बात यह है कि इसे नकारात्मक तत्व मानकर अज्ञेय के उपन्यासों की गलत व्याख्याएं की गई हैं। दूसरी बात यह कि अज्ञेय के यहां भारतीय लोकतंत्र सकारात्मक फिनोमिना है। हमें देखना चाहिए कि कितने प्रगतिशील आलोचक और लेखकों ने अज्ञेय के जमाने में लोकतंत्र को सकारात्मक फिनोमिना के रुप में चित्रित किया है ?  




                




विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...