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रविवार, 20 अगस्त 2017

मोदीमोह के छंद से गुज़रते हुए



     प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब भी बोलते हैं तो सवा सौ करोड़ भारतवासियों को सम्बोधित करके बोलते हैं।वे हर इलाके में प्रचलित समस्या को उठाते हैं और उसे स्थानीय भावनाओं से जोड़ते हैं।फलत:मंच पर वे राजनीतिक तौर पर सही नजर आते हैं, सुनने वाला यही कहता है  मोदीजी सही बोल रहे हैं।इस क्रम में जहाँ वे समस्या की ओर व्यापकतम जनता के तबक़ों का ध्यान खींचने में सफल हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर जनता को मंत्रमुग्ध कर लेते हैं।
      मोदी के प्रचार में मंत्रमुग्ध करना ही सबसे प्रमुख चीज है। स्थिति यह है सभी विपक्षी नेता तक उनकी भाषणकला का लोहा मानते हैं।मंत्रमुग्ध करने के बाद उनका असली खेल आरंभ होता है ।वह श्रोताओं को बहलाना-फुसलाना शुरू कर देते हैं।वे मंत्रमुग्ध भावबोध को वोट देने की मंशा से जोड़ देते हैं,भाजपा-आरएसएस के लक्ष्यों से जोड़ देते हैं।इस क्रम में जनता यह भूल जाती है कि भाजपा-आरएसएस ने वर्तमान या अतीत में क्या किया ।यही वजह है कि मोदी के राष्ट्रीय क्षितिज पर आने के बाद भाजपा-आरएसएस के वर्तमान और अतीत के कर्म-कुकर्मों पर बहस ही नहीं होती, उसके जनविरोधी -साम्प्रदायिक चरित्र पर बहस नहीं होती।
     मंत्रमुग्ध करके बहलाने-फुसलाने की कला के कारण हमेशा चीजें भविष्य की ओर ठेली जा रही हैं। मोदीजी जो कुछ करेंगे वह भविष्य में सामने आएगा, वर्तमान में उसे मत खोजो।राजनीतिक लक्ष्यों को अर्जित करने को वर्तमान की बजाय भविष्य में ठेलना अपने आपमें सबसे बडा अविवेकवाद है।लेकिन आम जनता को यह अविवेकवाद नजर ही नहीं आता।
   मोदी और आरएसएस का सारा जोर आक्रामक प्रचार अभियान पर है जिससे वे अपनी असफलताओं को आम जनता से छिपाने में सफल रहे हैं।मसलन जो उन्होंने चुनावी वायदे किए थे उनको वे आजतक पूरा नहीं कर पाए ,लेकिन जनता इस सब पर बहस ही नहीं कर रही, वह तो मोदीमोह में डूबी है और सुंदर भविष्य का इंतजार कर रही है, आम जीवन में सामाजिक-आर्थिक तौर पर जो गिरावट आई है उस पर समाज में कहीं पर बहस नहीं हो रही और सारी जनता भविष्य के हवाले कर दी गयी है, यह मोदी के प्रचार अभियान की सबसे बडी सफलता है।
        हम सब जानते हैं कि कांग्रेस और यूपीए की जनविरोधी नीतियों से जनता परेशान थी उसने मजबूरी में , विकल्प के अभाव में भाजपा-मोदी को वोट दिया था।मोदी आम जनता की रेशनल पसंद नहीं हैं बल्कि वे मजबूरी में , विकल्प के अभाव में सत्ता में आए हैं।वहीं दूसरी ओर मोदी के प्रचार अभियान ने विकल्प बनाने में मदद की।
        प्रचार अभियान के जरिए दो तरह के लोगों को ख़ासतौर पर निशाना बनाया गया।एक तरफ भाजपा-आरएसएस के समर्थकों को निशाना बनाया गया वहीं दूसरी ओर तटस्थ  मतदाताओं को निशाना बनाया।इसके लिए बृहत्तर जन आकांक्षाओं को प्रचार अभियान के केन्द्र में रखा गया।
        मोदी के प्रचार अभियान के प्रभाव को उनको मिले वोट की तराज़ू में नहीं तोलना चाहिए, कहने उनको मात्र ३१ प्रतिशत वोट मिले हैं, लेकिन उनके प्रचार के असर को देखना हो तो यहां से देखो कि उन्होंने भाजपा और आरएसएस के बारे में जनता का नजरिया ही बदल दिया।उन्होंने जितने भी राजनीतिक एक्शन किए उसकी संगति में प्रचार मशीन को सक्रिय रखा जिसका उनको लाभ मिला।मसलन् लवजेहाद,गऊ रक्षा, जेएनयू आदि के बारे में उनके राजनीतिक एक्शन को आम लोगों में व्यापक समर्थन मिला जबकि ये तीनों मसले एकसिरे से जनविरोधी और संविधान विरोधी फ्रेमवर्क में चलाए गए।आम लोगों में इन तीनों मसलों पर या तो संघ परिवार के साथ सहमति नजर आई या फिर लोगों ने प्रतिवाद को गंभीरता से नहीं लिया।

शुक्रवार, 30 जून 2017

गुलाम संविधान को नहीं मानते


                नए दौर का सबसे खतरनाक पहलू है कि गुलाम विचारधारा में यकीन रखने वाले हमारे देश के उदारतावादी संविधान को नहीं मानते।वे संविधान प्रदत्त नैतिकता को ठुकराते हैं।एक जमाना था ब्रिटिश गुलामी से मुक्त होने के लिए देश में स्वाधीनता की आकांक्षा थी, गुलामी से मुक्त होने के लिए स्वाधीनता ,स्वतंत्रता और उदारतावाद को हमने गले लगाया, उससे जुड़े मूल्यों और नैतिकता को अपना कंठहार बनाया।लेकिन आपातकाल के बाद पैदा हुए युवावर्ग में देश के लिबरल संविधान के प्रति, उससे जुड़ी नैतिकताओं के प्रति नफरत पैदा हुई ,इस नफरत की जड़ में है धर्म और जाति आधारित गुलाम विचारधाराएं।

आपातकाल के बाद पैदा हुए समाज में युवा का आतंक है, आक्रामकता है,राजनीति में जिसका चमकता हुआ चेहरा नजर आ रहा है,यह वह युवा है जिसके पास किसी भी किस्म के लोकतांत्रिक मूल्यों और हकों के लिए संघर्ष करने का कोई अनुभव नहीं है। इसे सारी लिबरल मान्यताएं बिना संघर्ष के मिली हैं।यह युवा अपने निहित स्वार्थों में इस कदर डूबा है कि उसे लोकतांत्रिक मनुष्य, लोकतांत्रिक समाज और लोकतंत्र के निर्धारक मूल्यों और नैतिकता से ऩफरत है।वह अपनी जाति और अपने धर्म की श्रेष्ठता और उनकी सर्वोपरि भूमिका के नशे में डूबा है।हर चीज को जाति और धर्म के पैमाने पर कसकर देख रहा है।यहां तक कि संविधान को भी जाति और धर्म के पैमाने पर परखकर देख रहा है।कायदे से जाति और धर्म की श्रेष्ठता पर उसे शर्म आनी चाहिए,लेकिन जाति और धार्मिक पहचान के रूप उसे इस कदर पसंद हैं कि उनके अलावा वह कोई चीज सुनने को तैयार नहीं है। यह वह युवा है जिसे बिना कोई संघर्ष किए सभी लोकतांत्रिक हक मिले हैं,लेकिन वह लोकतांत्रिक हकों, लिबरल संविधानजनित मूल्यों और नैतिकता को ठेंगे पर रखता है।हर चीज को जाति और धर्म की भीड़चेतना के आधार पर तय करना चाहता है।फलतः लोकतंत्र को इसने भीड़तंत्र में तब्दील कर दिया है।आप जरा टीवी इमेजों में जाति और धर्म के नाम पर उठे आंदोलनों को देखिए और उनमें शिरकत करने वालों की उम्र देखिए तो पाएंगे कि इनमें अधिकांश युवा हैं।

राममंदिर आंदोलन,असम आंदोलन,आरक्षण विरोधी आंदोलन आदि से यह युवा अपनी नई अ-लोकतांत्रिक पहचान के साथ समाज में दाखिल होता है। उल्लेखनीय है इन आंदोलनों में आरएसएस की केन्द्रीय भूमिका थी। समग्रता में इन सभी आंदोलनों के जरिए एक ही संदेश गया है ´हम संविधान को नहीं मानते´ ,´संविधान प्रदत्त मूल्यों और नैतिकता को नहीं मानते।´इन आंदोलनों में शामिल युवाओं को संविधानप्रदत्त हकों का लाभ मिला लेकिन इन लोगों ने संविधान प्रदत्त मूल्यों और नैतिकताओं को मानने से इंकार किया। वे अपने को विभिन्न नामों से संबोधित करने में रुचि रखते हैं लेकिन ´लोकतांत्रिक´ या ´नागरिक´ कहलाने में इनकी कोई रुचि नहीं है,मसलन्, वे कहते हैं ´हम भारतीय हैं´,´हम भारतीय मुसलमान हैं´,´हम हिंदू हैं´,´हम ईसाई हैं´,´हम दलित हैं´,आदि, लेकिन वे अपने को लोकतांत्रिक या नागरिक कहने से परहेज करते हैं।लोकतंत्र में रहना, लोकतांत्रिक उदार संविधान के हकों का उपभोग करना और लोकतांत्रिक पहचान के ´नागरिक´ रूप में अपने को न देखना,यह सबसे बड़ी कमी है।इस कमी को हमारा देश जिस दिन पूरा कर लेगा उस दिन वह संविधान का सम्मान करना सीख जाएगा।

नागरिक की पहचान हमें गुलाम पहचान के रूपों से मुक्त करती है, एक बड़ा परिवेश देती है,नए लोकतांत्रिक असंख्य विकल्पों को जन्म देती है। लोकतांत्रिक आत्म-सम्मान पैदा करती है। आयरनी यह है हम नागरिक के गौरव में जीने की बजाय जाति और धर्मगत पहचान के आत्म-सम्मान में जीना पसंद करते हैं।इससे समाज में लोकतंत्र कमजोर हुआ है और उससे फासिज्म को मदद मिली है।आज जो युवा मोदी-मोदी का नारा लगा रहा है,यह वही युवा है जिसके अंदर जाति और धर्म की गुलाम पहचान कूट-कूटकर भरी हुई है।वह गुलामी में मस्त है और निरंकुश की तरह व्यवहार कर रहा है।



हम कितने असहाय हैं !


          संकट गहरा है,यह कहना अब बेकार है,क्योंकि हम सब संकट में घिर चुके हैं।कातिल कितने ताकतवर हैं यह कहना अर्थहीन है क्योंकि हम सब असहाय साबित किए जा चुकेहैं। जब किसी निर्दोष व्यक्ति को भीड़ पीट रही हो और लोग तमाशा देख रहे हों तो समझो चीजें हम नहीं वे तय कर रहे हैं।ये ´वे´कौन हैं ॽ बताने की जरूरत नहीं,ये ´वे´तो ´हम ´में से ही हैं।´हम´को ´वे´में तब्दील करने की कला का नाम ही तो फासिज्म है। उसकी कारीगरी बेहद जटिल होती है।

फासिस्ट विचार एकदिन ,दो दिन ,एक साल या तीन साल में पैदा नहीं होता,बल्कि फासिस्ट विचार लंबा समय लेता है पूरी तरह पकने में।भारत में फासिस्ट विचारों की फसल एक ही दिन में पैदा नहीं हुई है, इस फसल को किसी एक संगठन या विचार विशेष ने तैयार नहीं किया है,बल्कि फासिस्ट विचार को अनेक विचारों,अनेक संगठनों और हजारों लोगों ने मिलकर रचा है। यह किसी एक के दिमाग की खुराफात नहीं है,यह खामखयाली भी नहीं है।

फासिस्ट विचारों का हमारे देश में पहले से भौतिक और वैचारिक आधार मौजूद है, नए फासिस्टों ने सिर्फ इतना किया है कि उस आधार को पाला-पोसा और बड़ा किया है।फासिज्म आज हर व्यक्ति के अंदर जगा दिया गया है। फासिज्म को उन पुरानी सड़ी-गली मान्यताओं और धारणाओं से मदद मिल रही है जिनके बारे में हम यह मानकर चल रहे थे कि वे मान्यताएं तो पुरानी हैं,मर चुकी हैं।लेकिन हकीकत में सड़ी गली मान्यताएं मरती नहीं हैं। भारत में तो एकदम नहीं मरतीं,पुरानी सड़ी गली मान्यताओं को बचाकर रखना,उनमें जीना और उनकी पूजा करना भारत की विशेषता है और यही वह जगह है जहां से फासिस्ट लोग अपने लिए ईंधन और समर्थन जुटाते हैं।

´गऊ हमारी माता है ´ उसी तरह का पुराना विचार है,जिसे हम मान चुके थे कि वह मर गया,लेकिन वह इतना ताकतवर होकर चला आएगा हमने कभी सोचा नहीं था। मन में विचार करें कि पुराने सड़े गले विचार के निशाने पर कौन लोग हैं,उसके नाम पर किस आय़ुवर्ग के लोग हत्याएं कर रहे हैं ॽ पुराने सड़े गले विचारों से चिपके हुए समाज में फासिज्म आसानी से पैदा होता है,तय मानो पीएम लाख चिल्लाएं, मेरे जैसे लोग लाखों-करोड़ों शब्द खर्च कर दें पुराने सड़े गले विचारों को हम सब मिलकर पछाड़ नहीं सकते।वे महाबलि हैं।

पुराने सड़े-गले विचारों को समूल नष्ट करने की भावना हम जब तक अपने मन में नहीं लाते हम आधुनिक मनुष्य नहीं बना सकते।हमने अजीब सा घालमेल किया हुआ है।कपड़े बदल लिए हैं,शिक्षा बदल ली है।व्यवस्था बदल दी है।कम्युनिकेशन के उपकरण बदल दिए हैं,लेकिन विचारों के दुनिया में नए विचारों के प्रवेश को रोक दिया है,विचारों की दुनिया वही सड़े –गले विचारों से लबालब भरी है।

फ्रेडरिक एंगेल्स ने लिखा है जब कोई विचार एकबार जन्म ले लेता है और व्यवहार में आजाता है तो फिर आसानी से वो नष्ट नहीं होता बल्कि एक अवधि के बाद वो भौतिक शक्ति बन जाता है।उसे आप व्यवस्था बदलने के बाद भी हटा नहीं सकते जब तक आप इसके विकल्प को लोगों के मन में न उतार दें। ´गऊ माता है´ के विचार को हम आज तक लोगों के मन से नहीं निकाल पाए,हम कितने असफल हैं,हमारा सिस्टम कितना अक्षम है,हमारी शिक्षा कितनी अधूरी है,यह इस बात का सबूत है।पुराने सड़े-गले विचारों को मन में जब तक बनाए रखोगे फासिस्ट हमले होते रहेंगे,जुनैद-अखलाक जैसे लोग कत्ल होते रहेंगे।



फासिज्म महज कोई एक संगठन विशेष नहीं है,बल्कि वह एक विचारधारा है।मानव इतिहास की सबसे बर्बर विचारधारा है। इसे हमने विदेशों से नहीं मंगाया है बल्कि यह हमें विरासत में मिली है,हमारे संस्कारों में इसकी गहरी जड़ें हैं,अविवेकवाद इसकी बुनियाद है।अविवेकवाद को त्याग दो फासिज्म मर जाएगा।अविवेकवाद को जब तक गले लगाए रखोगे फासिज्म आपसे चिपटा रहेगा और जुनैद जैसे लोग मरते रहेंगे।

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

नंगे का अर्थशास्त्र

         मोदीजी ने जब से नोटबंदी लागू की है,उसने हम सबके अंदर के डरपोक और अज्ञानी मनुष्य को एकदम नंगा कर दिया है।कहने के लिए हम सब पढ़-लिखे,शिक्षित लोग हैं लेकिन हम सबमें सच को देखने के साहस का अभाव है।सच कोई आंकड़ा मात्र नहीं होता,सच तो जीवन की वास्तविकता है और जीवन की वास्तविकता या यथार्थ को तब ही समझ सकते हैं जब जनता के जीवन को अपने मन,सुख और वैभव को मोहपाश से मुक्त होकर नंगी आंखों से देखें।

हम सबमें एक बड़ा वर्ग है जो मान चुका है कि मोदीजी अच्छा कर रहे हैं,कालेधन पर छापा मार रहे हैं,कालाधन सरकार के पास आएगा तो सरकार सड़क बनाएगी ,स्कूल खोलेगी,कारखाने खोलेगी,बैंकों से घरों के लिए सस्ता कर्ज मिलेगा,महंगाई कम हो जाएगी,हर चीज सस्ती होगी,सब ईमानदार हो जाएंगे,चारों ओर ईमानदारी का ही माहौल होगा,इत्यादि बातों को आम जनता के बहुत बड़े हिस्से के दिलो-दिमाग में बैठा दिया गया है,अब जनता इंतजार कर रही है कि कालेधन की मुहिम पचास दिन पूरे कर ले,फिर हम सब ईमानदारी के समुद्र में तैरेंगे ! ये सारी बातें फार्मूला फिल्म की तरह आम जनता के बीच में संप्रेषित करके उनको मोदी-अफीम के नशे में डुबो दिया गया है।

तकरीबन इसी तरह का नशा एक जमाने में नव्य-आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को लागू करते समय सारे मीडिया ने हम सबके मन में उतारा था,वह नशा कुछ कम हो रहा था कि अचानक मोदी अफीम के नशे में जनता को फिर से डुबो दिया गया है। हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं जो नीति जनता के विवेक का अपहरण करके लागू की जाती है वह कभी भी जनहित में नहीं हो सकती। जनता के विवेक को दफ्न करके मोदीजी जिस नीति को लागू कर रहे हैं वह सारे देश के लिए समग्रता में विध्वंसक साबित होगी।

फिदेल कास्त्रो ने ऐसे ही नशीले माहौल को मद्देनजर रखकर कहा था ,´ हममें से जो विद्वान नहीं हैं उनको भी साहस की खुराक चाहिए। दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसे अधिकाधिक जान लेने की कोशिश के बावजूद कभी-कभी हमारे पास यह जानने के लिए समय नहीं होता कि हम जिस अद्वितीय इतिहास प्रक्रिया से गुजर रहे हैं उसके बारे में क्या नए तथ्य और विचार उभरकर सामने आ रहे हैं और हमारे सामने खड़ा अनिश्चित भविष्य कैसा होगा? ´

कालेधन को बाहर निकालने के प्रयास पहले भी विभिन्न सरकारों ने किए हैं,मोदीजी इस मामले में नया कुछ नहीं कर रहे। उन्होंने जो नया काम किया है वह है नोटबंदी।नोटबंदी से कालेधन वालों पर कोई खास असर नहीं होगा।यही वजह है कि उन्होंने नोटबंदी के 20दिन बाद अचानक स्वैच्छिक आय घोषणा योजना-2 की घोषणा की है उसके लिए आयकर कानून में कुछ संशोधन सुझाए हैं। ये संशोधन लागू हो जाने पर भी कालेधन पर कोई अंकुश नहीं लगेगा और कालाधन बाहर नहीं आएगा।

इस प्रसंग मे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था कम से कम कालेधन से नहीं चल रही,कालाधन समानान्तर अर्थव्यवस्था जरूर है लेकिन देश की मूल अर्थव्यवस्था नहीं है।मोदी सरकार आने के बाद सबसे बड़ी समस्या यह हुई है कि मूल अर्थव्यवस्था पंगु हो गयी है।कहीं पर कोई परिणाम नजर नहीं आ रहे।बेकारी और विकास में कोई परिवर्तन नहीं आया।इससे ध्यान हटाने के लिए मोदी सरकार ने नोट नीति की घोषणा की और 500 और 1000 के नोट अमान्य घोषित कर दिए। अब समस्या यह है वे इस नोटबंदी पर सवाल उठाने वालों को देशद्रोही,कालेधन के समर्थक आदि के तमगे लगा रहे हैं। हम जानना चाहते हैं यह कौन सा अर्थशास्त्र है जिसमें सवाल नहीं खड़े कर सकते ॽ

मोदीजी ने जो नोट नीति बनायी है उस पर समानता के आधार पर विभिन्न मतों के अनुसार सवाल उठाने की इजाजत सरकार दे, नीति पर बहस की बजाय सरकार और मीडिया मिलकर नोट नीति के खिलाफ सवाल खड़े करने वालों को अपमानित कर रहे हैं ,सवाल उठाने को ही देशद्रोह और कालेधन की हिमायत कह रहे हैं।यह तो देश की प्रतिभा और जनतांत्रिक मतभिन्नता का अपमान है,यह तानाशाही है और अल्पविवेक का शासन है।

मोदीजी को मालूम होना चाहिए भारत में अर्थशास्त्र की बड़े पैमाने पर पढायी होती है और हमारे यहां सभी किस्म के मत पढाए जाते हैं,विभिन्न किस्म के मतों का अध्ययन करके आने वाले लोगों की यह पहली जिम्मेदारी बनती है कि वे नोट नीति पर खुलकर बोलें,विभिन्न राजनीतिक दलों की भी यह जिम्मेदारी है वे अपने मतों को खुलकर व्यक्त करें। मीडिया और सरकार दोनों मिलकर मतविभन्नता का गला घोंटकर खत्म कर देना चाहते हैं।यह पारदर्शिता का हनन है।



मोदी-मीडिया मिलकर प्रचार कर रहे हैं कि नीति के मामले में हर हालत में अनुशान पैदा करने की जरूरत है,नीति से विचलन और मत-भिन्नता मोदी के लेखे अनुशासनहीनता है,यह देशद्रोह है,कालेधन की सेवा है।इस तरह के तर्क बुनियादी तौर पर फासिस्ट तर्क हैं।किसी भी नीति पर बहस के लिए अनुशासन की शर्त लगाना गलत ही नहीं अ-लोकतांत्रिक भी है।पारदर्शिता और खुलेपन के लिए अनुशासन की विदाई करना पहली जरूरत है।सरकार ने जो नीति जारी की है तो उससे संबंधित सूचनाएं भी जारी करे,नीति पर विभिन्न दृष्टियों से बहस हो,विभिन्न विचारों की रोशऩी में नीति को परखा जाए,विभिन्न कसौटियों पर कसा जाए,यह किए बिना नोट नीति को सीधे लागू करना तानाशाही है। सब जानते हैं मीडिया पर सरकार का संपूर्ण वर्चस्व है और वह इस वर्चस्व का खुला दुरूपयोग कर रही है।नोट नीति लागू करते समय सरकार की शर्त है हमारी बात मानो,नहीं मानोगे तो देशद्रोही कहलाओगे।यह बुनियादी नजरिया लोकतंत्र विरोधी है।

रविवार, 20 नवंबर 2016

यह एंटी करप्शन नहीं फासिज्म है !

       देश में भ्रष्टाचार,बेईमानी और घूसखोरी के खिलाफ जून १९७५ को लाए गए आपातकाल को भारत की जनता भूली नहीं है। इंदिरा गांधी के उन दिनों के भाषणों को देखना चाहिए। मोदीजी इन दिनों जो भाषा बोल रहे हैं वह अधिनायकवाद की भाषा है,जब आपातकाल लगा तो उस समय भी इंदिराजी के साथ एक योगी था नाम था धीरेन्द्र ब्रह्मचारी , तकरीबन वैसा ही इस समय हो रहा है, मोदी के साथ योगी रामदेव हैं।आपातकाल को विनोवा भावे ने अनुशासन पर्व कहा था और इस समय अन्ना हजारे वही भाषा बोल रहे हैं। आरएसएस ने उस समय इंदिराजी को सहयोग देने के लिए तीनपत्र लिखे थे।आज संयोग से वे देश की केन्द्र सरकार चला रहे हैं उनका नायक पीएम है।
मोदी वही भाषा बोल रहे हैं जो आपातकाल लगाते समय श्रीमती इंदिरा गांधी बोल रही थी। वे भी कठोर फैसले लेने के लिए जानी जाती हैं ,मोदीजी भी सख्त हैं।
आपातकाल में सभी अरबपति इंदिरा के साथ थे, मोदी के साथ भी कारपोरेट घराने हैं।जनता पर नसबंदी , राजनीतिक कारणों से गिरफ्तारी के बहाने बेशुमार जुल्म किए गए।

मोदीजी ने नोटबंदी के बहाने जनता जनजीवन और शांति पर सीधे हमला किया है। यह संयोग है बिडला की एक कंपनी ने "एक्टिव एप "के नाम से फासिस्ट नजरिए का विज्ञापन जारी किया है। आपातकाल में १जुलाई१९७५ को घनश्याम दास बिडला के नेतृत्व में देश के सभी अमीरों ने दिल्ली में आपातकाल और बीस सूत्री कार्यक्रम के समर्थन में जुलूस निकाला था।

जनता ने आपातकाल में असीम धैर्य का परिचय दिया था,लेकिन मन में वह कांग्रेस से नफरत करने लगी,किसी को अंदाजा नहीं लगा कि जनता नाराज है। सारा सरकारी तंत्र पीएम को यही कह रहा था जनता आपके साथ है, लेकिन चुनाव होने पर कांग्रेस बुरी तरह हार गयी। ठीक वैसा ही माहौल इन दिनों है, मोदीजी की योजना है कि जनता भडक जाए तो फिर सीधे सेना की मदद लेकर कुचल दिया जाए, मोदीजी ने जिस दिन नोटनीति घोषित की उसी दिन तीनों सेनाध्यक्षों के साथ बैठक की। हमारा अनुमान है यह बैठक पाक के सीमापर हो रहे हमलों को लेकर नहीं हुई।

आपातकाल को अध्यादेश के जरिए लागू किया गया।नोटबंदी को भी सरकारी आदेश के जरिए लागू किया गया है।दोनों ही मामलों में संसद की अवहेलना की गयी।
हम जनता के विवेक और संयम पर भरोसा करते हैं ,किसी भी अवस्था में जनता को संयम और विवेक को छोडना नहीं चाहिए।जरूरत है मोदी सरकार और आरएसएस के प्रति नफरत को और भी गहरा बनाएं और वोट और शांतिपूर्ण प्रतिवाद के जरिए अपना मन वोट में व्यक्त करें।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...