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शनिवार, 4 जुलाई 2015

अव्यवस्थित लोकतंत्र और साहित्यिक पत्रकारिता

परिदृश्य-


आजादी के बाद का साहित्यिक पत्रकारिता का परिदृश्य तकरीबन इकसार रहा है। पहले भी पत्रिकाओं का प्रकाशन निजी पहल पर निर्भर करता था, आज भी यही दशा है, पहले भी साहित्यिक पत्रिकाएं निकलती और बंद होती थीं,यही सिलसिला आज भी जारी है।अनियतकालीन प्रकाशन इसकी नियति है। अधिकतर साहित्यिक पत्रिकाएं निजी अर्थव्यवस्था यानी संपादक के निजी निवेश पर निर्भर हैं, ये पत्रिकाएं संपादकीय जुनून का परिणाम हैं। साहित्यिक पत्रिकाएं साहित्य का माहौल बनाती हैं। हिन्दी में पत्रिकाएं मूलतः गुट विशेष का प्रकाशन हैं,वे गुट विशेष के लेखकों को छापती हैं।

खासकर बुद्धिजीवीवर्ग में सन् 1970-71 के बाद सत्ता सुख का जो मोह पैदा हुआ उसने अधिकांश बड़े लेखकों को सत्ता के करीब पहुँचा दिया और इसका यह परिणाम निकला कि साहित्य और साहित्यकार की नई भूमिका का उदय हुआ। साहित्य अब परिवर्तनकामी कम और सत्ताकामी ज्यादा हो गया। आपातकाल इसका क्लासिक नग्नतम उदाहरण है। आपातकाल के बाद तो स्थितियां लगातार खराब ही हुई हैं। सत्ता के प्रतिष्ठानों के इर्दगिर्द साहित्यकारों को गोलबंद किया गया। कई व्यक्ति और संस्थान सत्ता के केन्द्र बनकर उभरे। इनके हस्तक्षेप के कारण साहित्य का स्वतंत्र विकास बाधित हुआ, साहित्यिक पत्रिकाएं मेनीपुलेशन और प्रमोशन का अस्त्र बन गयीं। चंद व्यक्ति महान बन गए,वे ही तय करने लगे कि कौन लेखक है और कौन लेखक नहीं है ! इस अर्थ में 1970-71 के बाद क्रमशः साहित्य की अवनति हुई ।

साहित्यिक विवेकवाद-

आज हमारे बीच में साहित्यिक पत्रिकाएं हैं,साहित्य भी है लेकिन संपादकीय विवेक नदारत है। विचारधारा है और उसके आधार पर धड़ेबंदी है,लेकिन साहित्यिक विवेकवाद गायब है। साहित्यिक पत्रिकाओं से संपादकीय विवेकवाद का नदारत होना बहुत बड़ी त्रासदी है। नियोजित बहसें हैं, प्रमोशन के लिए आलोचनाएं हैं, मांग-पूर्ति के आधार पर लिखा साहित्य है,किताबें हैं। स्वयं नामवर सिंह कह चुके हैं कि '' मैं फरमाइशी लेखक हूँ'' , वे यह भी रहस्य खोल चुके हैं कि उन्होंने '' कविता के नए प्रतिमान'' किताब को भारत भूषण अग्रवाल के कहने से साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए लिखा था।

साहित्य में इनदिनों लेखन के आधार पर छोटे-बड़े लेखक का फैसला नहीं हो रहा, बल्कि रुतबा,संपदा,ओहदा और सरकारी रसूख के आधार पर फैसले हो रहे हैं। लेखक की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण मूल्य नहीं है ,लेखक के सत्ता संबंध बड़ा मूल्य हो गया है,इसने साहित्यिक पत्रिकाओं में नए किस्म के नियोजित साहित्य विमर्श को प्रतिष्ठित किया है। जिसकी सत्ता में साख है ,वही बड़ा लेखक है। इसका परिणाम यह निकला कि लेखकों में सत्ता से जुड़ने की अंधी दौड़ शुरु हुई है। इसका सबसे बढ़िया केन्द्र बने अकादमिक संस्थान और लेखक संघ। इससे लेखक के कर्म और विचार में गहरी दरार पैदा हुई। लेखन का यथार्थ से संबंध खत्म हो गया। लेखन यानी शब्दों का उत्पादन इसका लक्ष्य है । आज लेखक है,साहित्यिक पत्रिकाएं हैं,संपादक भी है,लेकिन साहित्य का सामाजिक असर नहीं है, लेखक की कोई सामाजिक साख नहीं है। लेखक ने अपने सत्तासुख के कारण सभी किस्म के विमर्शों को प्रशंसा और प्रमोशन में संकुचित कर दिया, 'विचार मंथन' को'साहित्यिक इवेंट' में तब्दील कर दिया।

साहित्य उत्पादक या प्रकाशक -

हिन्दी में साहित्यिक पत्रकारिता को अनेक लेखक प्रतिवादी पत्रकारिता मानते हैं, इस तरह की धारणा रखने वालों में सामान्य लेखक , दलित लेखक और स्त्री लेखिकाएं भी हैं। सामान्यतौर पर देखें तो हिन्दी का साहित्यिक पत्रकारिता का परिदृश्य वैविध्यपूर्ण है और इसमें विधागत समृद्धि भी है। इसका स्वैच्छिक पहलकदमी के आधार पर प्रकाशन होता रहा है। वाल्टर बेंजामिन के अनुसार प्रतिवादी या परिवर्तनकामी पत्रकारिता या साहित्य में अंतर्वस्तु महत्वपूर्ण नहीं है,महत्वपूर्ण है इसके उत्पादन की अवस्था। कईबार यह भी देखा गया है कि बेहतरीन क्रांतिकारी अंतर्वस्तु को श्रेष्ठतम –व्यावसायिक कला रुपों में पिरोकर पेश किया जाता है। इससे क्रांतिकारी कला का स्वरुप प्रभावित होता है। इसलिए यह सवाल नहीं करना चाहिए कि पार्टनर तेरी पॉलिटिक्स क्या है ? या साहित्य की राजनीति क्या है,यह सवाल ही गलत है।सवाल यह होना चाहिए कला के उत्पादन की राजनीति क्या है ? ज्योंही इस सवाल पर विचार करेंगे सही रुप में प्रतिवादी संस्कृति को परिभाषित कर पाएंगे। बेंजामिन तर्क देते हैं कि सही अर्थ में प्रतिवादी संस्कृति उत्पादन की विशेषज्ञतापूर्ण प्रक्रिया का अतिक्रमण करती है। दूसरे शब्दों में प्रतिवादी संस्कृति कलाकार और दर्शक,निर्माता और उपभोक्ता के बीच की विभाजन रेखा को कम करती है। छोटे-बड़े या ऊँच-नीच,श्रेष्ठ और निकृष्ट के श्रम विभाजन को खत्म करती है। वह सबको सृजन के लिए प्रेरित करती है। हमें इस समूची बहस को प्रोडक्ट केन्द्रित न बनाकर प्रोडक्शनकेन्द्रित बनाना चाहिए। वस्तुस्थिति यह है कि हिंदी पत्रिका संपादक साहित्य का उत्पादक नहीं बन पाया,लेकिन प्रकाशक बन गया।वह प्रोडक्ट बनाता है।

आधुनिककाल आने के साथ छापे की मशीन आई,लेखक की स्वायत्तता को सार्वजनिकतौर पर वैधता मिली,निजता और सार्वजनिकता के बीच में नए किस्म का वर्गीकरण हुआ जो पुराने वर्गीकरण से भिन्न था। पुराने जमाने में लेखक के अंदर निजी-सार्वजनिक का घल्लुघारा था। लेखक की स्वायत्तता पहलीबार नजर आई वह जो उचित समझे लिख सकता है ,इस अनुभूति को उसने प्रत्यक्ष वैधरुप में लागू किया। पहलीबार दो तथ्य सामने आए,इन दोनों तथ्यों की रोशनी में लेखन की परीक्षा होने लगी। पहला, लेखक का राजनीतिक नजरिया और दूसरा रचना की गुणवत्ता। लेखक के सही राजनीतिक नजरिए और साहित्यिक गुणवत्ता के बीच नए संबंध का जन्म हुआ। यह भी कही गयी कि जब राजनीति सही होगी तो अन्य चीजें भी दुरुस्त होंगी।

वाल्टर बेंजामिन का मानना है सामाजिक परिस्थितियां उत्पादन की अवस्था को तय करती हैं। और जब भौतिकवादी नजरिए से देखना आरंभ करते हैं तो विचार करते हैं कि सामाजिक संबंधों का तत्कालीन समय के साथ क्या संबंध था ? साहित्य के लिए यह महत्वपूर्ण सवाल है । वेंजामिन ने इसी प्रसंग में दो बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं, पहला सवाल, साहित्य का अपने समय के उत्पादन संबंधों के साथ क्या संबंध है ? क्या वह उनको स्वीकार करता है ? क्या वह प्रतिक्रियावादी है ? अथवा उसका नजरिया परिवर्तनकामी है ? या वह क्रांतिकारी है ?इन सवालों पर विचार करने के पहले हम इस सवाल पर सोचें कि अपने समय के उत्पादन संबंधों के प्रति क्या एटीट्यूट है ? उनका नीतिगत नजरिया क्या है ? यह सवाल असल में सामयिक उत्पादन संबंधों के परिप्रेक्ष्य में साहित्य की भूमिका के जुड़ा है .इसका प्रकारान्तर से''तकनीक'' के सरोकारों से संबंध है.

वेंजामिन के अनुसार '' साहित्यिक तकनीक'' की अवधारणा के आधार पर देखेंगे तो पाएंगे कि साहित्यिक उत्पाद (प्रोडक्ट) सीधे सामाजिक या भौतिक मूल्यांकन के लिए उपलब्ध रहता है। साथ ही साहित्यिकतकनीक की अवधारणा के आधार द्वंद्वात्मक ढ़ंग से विवेचन को आरंभ किया जा सकता है। इसके जरिए साहित्य की रुप और अंतर्वस्तु की निरर्थक बहस से भी बचा जा सकता है।इसके अलावा प्रवृत्ति और गुणवत्ता के निर्धारकों की खोज की जा सकती है। बेंजामिन के अनुसार कृति की राजनीतिक प्रवृत्ति में साहित्यिक गुणवत्ता और साहित्य प्रवृत्ति शामिल है। साहित्य प्रवृत्ति में साहित्यिक तकनीक की प्रगति या प्रतिगामिता भी समाविष्ट है।

साहित्य के उत्पादन पर विचार करते समय इसकी अनिवार्य अवस्था पर भी सोचें । साहित्य किस तरह की अनिवार्य परिस्थितियों में पैदा हो रहा है। इससे लेखन की ठोस परिस्थितियों का पता चलेगा ,यह भी पता चलेगा कि लेखक के पास व्यवहार में कितनी स्वायत्तता है। इस समूची प्रक्रिया पर नजर रखते हुए सही राजनीति और प्रगतिशील साहित्यिक तकनीक के अन्तस्संबंध को समझने में मदद मिलेगी। मसलन्, साहित्यिक पत्रिकाएं लेखक –पाठक को सूचित कर रही हैं ,विवेचन पेश किया जा रहा है। लेखक परिस्थितियों में हस्तक्षेप कर रहा है या दर्शक मात्र है ? हिन्दी पत्रिकाओं में लिखने वाले अधिकांश लेखक रुढ़िबद्ध नजरिए और रुढ़िबद्ध शैली के शिकार हैं। सवाल यह है कि क्या रुढ़िबद्ध लेखन के जरिए सामाजिक परिवर्तन संभव है ? इस तरह के लेखन का किस पर और कितना असर होता है ? इस तरह के लेखन ने लेखक और पाठ के बीच में अलगाव पैदा किया।

'एक्टविज्म ' या प्रतिगामिता -

साहित्यिक पत्रकारिता और खासकर वामपंथी साहित्यिक पत्रकारिता पर बुर्जुआ प्रेस के विकास का क्या असर हुआ है इस पर भी विचार करने की जरुरत है । मुश्किल यह है कि वाम पत्रिकाएं हस्तक्षेप के औजार की तरह इस्तेमाल होती रही हैं, यही काम इन दिनों दलित पत्रिकाएं भी कर रही हैं। इन पत्रिकाओं में बुर्जुआ अवस्था के स्वाभाविक रुझानों और प्रवृत्तियों को लेकर कोई गंभीर विवेचन नजर नहीं आता। ये सल में 'एक्टिविज्म' की पत्रिकाएं हैं,इनकी सतह पर दिखने वाली राजनीतिक प्रवृत्ति क्रांतिकारी लगती है लेकिन असल में वो प्रति-क्रांतिकारी भूमिका अदा करती है। मसलन् , दलित साहित्य पर हिन्दी पत्रिकाओं के अनेक विशेषांक आए हैं,तमाम दलित पत्रिकाएं छप रही हैं। इनकी समग्रता में क्या भूमिका उभरकर सामने आ रही है ? इनकी संस्कारगत सहानुभूति दलित के साथ है लेकिन वे इसके आगे उसे देख ही नहीं पा रहे हैं। उनके पास दलितमुक्ति का कोई ब्लू-प्रिंट नहीं है। ये सभी पत्रिकाएं 'एक्टिविज्म' की केटेगरी में आती हैं। इनमें शाब्दिक जनतंत्र के सहारे दलित के प्रति सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की जा रही है।इसी शब्दकेन्दिकता (लोगोक्रेसी)के सहारे ही बुद्धिजीवियों का समूचा तंत्र खड़ा है। वे 'एक्टिविज्म' के जरिए साहित्य की द्वंद्वात्मक प्रक्रिया पर पर्दा डाले रखना चाहते हैं। वेंजामिन के शब्दों में कहें तो इस तरह के लेखन की अंतर्वस्तु सामूहिक है लेकिन रुप प्रतिक्रियावादी है। फलतः ऐसी रचनाओं का असर क्रांतिकारी नहीं हो सकता।

अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं और लेखकों में सामूहिकताबोध बार-बार व्यक्त हुआ है। लेकिन पत्रिकाएं व्यक्तिगत प्रयासों से ही निकल रही हैं, सामूहिक प्रयासों से निकलने वाली पत्रिकाएं नगण्य हैं। राजनीतिक हालात की पार्टी नीति के अनुरुप व्याख्याएं करना या सत्ताधारी वर्गों के द्वारा प्रक्षेपित मसलों पर लिखना,क्रांतिकारी काम नहीं है,बल्कि प्रति-क्रांतिकारी कार्य है।

कायदे से हमें कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य में रुपान्तरण की प्रक्रिया और रुपान्तरण के क्रांतिकारी उपकरणों का पता होना चाहिए। हमें उत्पादक एपरेट्स और रुपान्तरण के रुपों का ज्ञान होना चाहिए। हमें इस बात का पता रहना चाहिए कि बुर्जुआ एपरेटस में क्रांतिकारी कलाओं और साहित्य रुपों को आत्मसात करके रुपान्तरित करने की अद्भुत क्षमता होती। हम सोचें कि हमारे तमाम किस्म के क्रांतिकारी लेखकों-संगीतकारों आदि को फिल्मी दुनिया ने कैसे हजम कर लिया ? वाम लेखक मनोरंजन का साधन कैसे बन गया ?

राजनीतिक नजरिया-

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के प्रसंग में यह सवाल उठाया ही जा सकता है कि साहित्यिक पत्रिका का कोई राजनीतिक नजरिया है या नहीं, पत्रिका की राजनीतिक समझ के साथ उसमें प्रकाशित सामग्री का किस तरह का संबंध है ? सही राजनीति के तहत निकने वाली पत्रिकाओं की गुणवत्ता और खराब राजनीति या राजनीतिविहीन नजरिए से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं के चरित्र में किस तरह का फर्क होता है। हिन्दी में तीन तरह की पत्रिकाएं हैं पहली कोटि में वे पत्रिकाएं आती हैं जिनका राजनीतिक नजरिया है,दूसरी कोटि में वे पत्रिकाएं आती है जिनका कोई राजनीतिक नजरिया नहीं है,जबकि तीसरीकोटि में वे पत्रिकाएं आती हैं जिनका तदर्थवादी राजनीतिक स नजरिया है।

साहित्यिक पत्रिकाओं की कहानी उनके मालिक-संपादक के आर्थिक पहलु के बिना पूरी नहीं होती, हमारे यहां कभी यह ध्यान ही नहीं दिया गया कि पत्रिका का आर्थिक बोझ संपादक कैसे उठाता है ? पत्रिकाओं में संपादक के आर्थिक संकट के विस्तृत ब्यौरे गायब हैं। हमने स्वतंत्र तौर पर भी कभी संपादक की आर्थिक बर्बादी को पत्रिकाओं में विषयवस्तु नहीं बनाया । पत्रिकाओं की आर्थिक बर्बादी की न तो दलों को चिंता है और न सरकार को ।

पत्रिकाओं के सर्कुलेशन का एक आयाम वितरण और डाक-व्यवस्था के मूल्य सिस्टम से जुड़ा है। सरकार ने कभी सोचा ही नहीं कि पोस्टल-चार्ज ज्यादा रहेगा तो साहित्य का सर्कुलेशन इससे प्रभावित हो सकता है। हमारे सांसदों ,लेखकों और प्रकाशकों ने भी कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया ।

साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन परिदृश्य की बुनियादी समस्या यह है कि संपादकों में अधिकतर पेशेवर नजरिया नहीं रखते । पेशेवर नजरिए के आधार पर पत्रिका का प्रकाशन नहीं करते। वे पूंजीवादी प्रकाशन प्रणाली के आदिम रुपों का इस्तेमाल करते हैं और आदिम वितरण प्रणाली पर निर्भर हैं। इसके कारण वे बड़े पैमाने पर अपना विकास नहीं कर पाए हैं। दुखद यह है कि साहित्यिक पत्रिका प्रकाशन की मददगार संरचनाएं समाज में एकसिरे से गायब हैं ।

साहित्यिक पत्रिकाएं ज्यादा से ज्यादा फलें-फूलें इसके लिए जरुरी है कि उनको सरकारी विज्ञापन प्राथमिकता के आधार पर राज्य और केन्द्र सरकार दे। साथ ही पत्रिकाओं को मिलनेवाले चंदे पर आयकर में राहत दी जाय। डीएवीपी और राज्य सरकारों के सरकारी विज्ञापनों के 25फीसदी विज्ञापन अनिवार्यतः साहित्यिक पत्रिकाओं को दिए जाएं। इसके अलावा विभिन्न मंत्रालयों से प्राथमिकता के आधार 25फीसदी विज्ञापन साहित्यिक पत्रिकाओं को दिए जाएं। पत्रिकाओं के पोस्टल वितरण के लिए सरल कानूनी व्यवस्था की जाय और पत्रिका वितरण को मुफ्त पोस्टल सुविधा दी जाय।

साहित्यिक पत्रिकाएं हमेशा से बड़े के खिलाफ छोटे की जंग रही है। बड़े कम्युनिकेशन या प्रतिष्ठानी कम्युनिकेशन और साहित्यिक कम्युनिकेशन के बीच में अंतर्विरोध रहा है, शासकवर्ग और साहित्यिक पत्रिकाओं के बीच अंतर्विरोध रहा है। इस अंतर्विरोध को विस्तार देने की जरुरत है।

लेखक-

हिन्दी का साहित्यिक पत्रिकाओं ने लेखक की किस तरह की इमेज निर्मित की है और लेखक को वे किस रुप में देखते हैं,यह सवाल विचारणीय है। दुखद यह है कि आपातकाल के दौरान लेखक दायित्व पर अमूर्तन में बातें हो रही थीं, ''आलोचना'' ( जुलाई-दिसम्बर1975) को नमूने रुप में देख सकते हैं। आपात्काल के दौरान या उसके पहले या बाद में लेखक की सबसे बड़ी भूमिका है कि लेखक मात्र लेखक नहीं रहा बल्कि लेखक अब राजनीतिक कार्यकर्ता बनकर सामने आता है, सत्ता का पुर्जा बनकर सामने आता है,साहित्य में राजनीति छा जाती है, यह सिलसिला 1960-61 के बाद से ही सामने आने लगा था,'प्रलेसं' की विरासत से इसका गहरा संबंध है।

साहित्य,साहित्यकार और राजनीति में संबंध का होना अच्छी बात है लेकिन इस क्रम में दलीय राजनीति का पक्षधर बन जाना लेखक की सबसे बुरी बात है। लेखक के लिए देश की जनता के हितों और अधिकारों से ज्यादा अपने दलीय आग्रहों से मोह पैदा हो गया, लोकतंत्र से बड़ा दल हो गया,राजनीति हो गयी, समाज के कटु-यथार्थ की बजाय उसने दलीय राजनीतिक यथार्थ को प्रमुखता देने का मन बना लिया ,न्याय की बजाय उसने सत्ता के हितों के इस या उस पहलू पर केन्द्रित होकर लिखना पसंद किया। इसने लेखक को पूरी तरह राजनीति के मातहत बना दिया।

मजेदार बात यह है कि लेखक आया था राजनीति को दिशा देने लेकिन व्यवहार में राजनीति ने लेखक को दिशा देना आरंभ कर दिया। इससे लेखक का राजनीतिक और नैतिक पतन हुआ। लेखक के इस तरह के पतन में राजनीतिक आग्रहों के अलावा आर्थिक कारणों की बड़ी भूमिका रही है। लेखक ने कभी गंभीरता से अपने आर्थिक कारणों की विवेचना ही नहीं की। लेखक के संकट का बुनियादी कारण आर्थिक है । यह संकट राजनीति का नहीं है यह साहित्य या विज्ञान का भी पैदा किया संकट नहीं है। इसके कारण हमारे समाज में लेखक का आकर्षण घटा है। दूसरी ओर तुलनात्मक तौर पर वैज्ञानिक,समाजविज्ञानी आदि के प्रति आकर्षण बढ़ा है।

इस प्रसंग में मुझे उ.रा.अनन्तमूर्ति का ''भारतीय लेखकःअस्मिता की खोज'' नाम से दिया गया भाषण याद आ रहा है। यह भाषण उन्होंने अरविंद शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिया था और आपातकाल के दौरान ही ''आलोचना'' पत्रिका ने इसे छापा था। यह भाषण अनेक महत्वपूर्ण बिंदुओं पर रोशनी डालता है। खासकर इस सवाल को बारीकी से उठाता है कि भारतीय लेखक की पहचान क्य़ा है ? लेखक की पहचान लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों से बनती है।जब लोकतंत्र पर हमले हो रहे हों,अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली गयी हो, ऐसे में लेखक का सबसे पहला सवाल तो अभिव्यक्ति की आजादी के अपहरण से ही जुड़ा होगा , लेकिन अनंतमूर्ति को यह सवाल दिखाई ही नहीं दिया। इसी तरह आपातकाल में ''आलोचना'' पत्रिका ने कोई संपादकीय नहीं लिखा ,संपादक नामवर सिंह ने कोई निबंध इस प्रसंग में नहीं लिखा, मजेदार बात यह है लेखक आरिगपूड़ी का ''आलोचना '' ( अप्रैल-जून-1976) में '' लेखक का दायित्व'' शीर्षक से लेख छपा है लेकिन आपातकाल का कहीं जिक्र तक नहीं है। मैनेजर पांडेय का लेख छपा है शीर्षक है '' समकालीन इतिहास-विरोधी साहित्य-चिन्तन'', विजेन्द्र का '' समकालीन कविता और सामाजिक यथार्थ'' नामक लेख है, इस तरह के और भी कई लेख हैं लेकिन कहीं पर भी आपातकाल का कोई जिक्र तक नहीं है। गोया, आपातकाल कोई घटना ही न हो । सबसे रोचक बात यह कि जिस समय आपातकाल लगा यानी 25जून1975 के दिन उसके तत्काल बाद आलोचना ने धूमिल की स्मृति में विशेषांक निकाला ,धूमिल की मौत 10फरवरी 1975 को हुई थी,इस पूरे अंक में आपातकाल का जिक्र नहीं है, राजनीति से इस तरह की दूरी या अलगाव क्या किसी भी तर्क से स्वीकार्य है ? इस अंक में धूमिल की सात अप्रकाशित कविताएं छपी हैं,इनमें दो कविताएं ''प्रजातन्त्र के विरुद्ध'', और '' खेवली'' । ''खेवली '' कविता में कवि ने लिखा है- '' वहां न जंगल है न जनतंत्र / भाषा और गूंगेपन के बीच कोई /दूरी नहीं है/ ... और अब तो ऐसा वक्त आ गया है कि सच को भी सबूत के बिना /बचा पाना मुश्किल है।'' ,इस अंक में धूमिल पर काशीनाथ सिंह,विनोद भारद्वाज,विश्वनाथ त्रिपाठी,गोविन्द उपाध्याय,रामकृपाल पाण्डेय,रामवक्ष,विष्णु चन्द्र शर्मा के लेख हैं ,लेकिन किसी में भी आपातकाल पदबंद तक का जिक्र नहीं है। यह अंक चूंकि आपातकाल के तत्काल बाद आया था,इसमें किसी भी रुप में आपातकाल का जिक्र न होना हमें सोचने को विवश करता है कि हम किस तरह की साहित्यिक पत्रकारिता विकसित करना चाहते हैं ? क्या साहित्यिक पत्रकारिता का सामयिक राजनीति से संबंध होना चाहिए ? क्या साहित्यिक पत्रकारिता को राजनीति से दूर रहना चाहिए ? क्या साहित्यिक पत्रिकाओं में सिर्फ साहित्य और उसके विधारुपों पर ही सामग्री होनी चाहिए या फिर उसमें इतिहास,संस्कृति,अर्थशास्त्र आदि विषयों पर भी सामग्री होनी चाहिए।

इस प्रसंग में सबसे बड़ा सवाल यह है कि साहित्यिक पत्रिकाओं ने किस तरह का लेखक निर्मित किया ? हमारा लेखक कैसा है ?उसकी मनोरचना और सामाजिक संरचना किस तरह की है ? आजादी के बाद पैदा हुए लेखक और पहले वाले लेखक में क्या अंतर है ? अनंतमूर्ति ने लिखा है आजादी के पहले के अनुभव से गुजरे लेखक '' आजादी की लड़ाई में शरीक थे और सोचते थे कि वे लोग भारत की आजादी की लड़ाई में शरीक थे और सोचते थे कि भारत की जनता के साथ उनका भाग्य भी जुड़ा है जबकि स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी भारत की जनता के साथ ऐसा कोई तादात्म्य महसूस नहीं करती है। वे स्वयं यह महसूस करते थे कि उन्होंने ऐसा बहुत कुछ लिखा है जो केवल लिजलिजा,भावुकताभरा और पुनर्जागरणवादी है। मुझे तो उनके हाथ से बुनी खादी के कपड़ों तक से ईर्ष्या है जो गाँधीजी के जमाने में एक समतावादी प्रतीक थे लेकिन आज ऐसा नहीं है क्योंकि वैसे कपड़े आज हमारे भ्रष्ट राजनेताओं द्वारा पहने जाते हैं। हम आज ऐसा आत्मविश्वास नहीं रखते कि हम एक साथ पूरी समग्रता से वैयक्तिक और सार्वजनीन हो सकते हैं। किसी भी महान कलासर्जना के लिए ऐसा आत्मविश्वास आवश्यक है। इसी का परिणाम है कि हम केवल'रीएक्ट' करते रहते हैं,'क्रीएट' नहीं करते हैं। हम निहायत असंगत चीजों की हिमायत करते हैं या फिर इसी की प्रतिक्रिया में उस अधिकारिक भारतीय ग्रामीण की प्रशंसा करते हैं –यह सब हमारी अपनी अनिश्चितताओं को मुखौटा पहनाने के लिए ।''(आलोचना,जुलाई-दिसम्बर,1975,)

यह सही है कि पुराने लेखक के पास स्वाधीनता संग्राम का अनुभव था, उस दौर की संवेदनाएं थीं जिनके आलोक में वह लोकतंत्र को देखता था, लेकिन मुश्किल यह है कि यह वह लेखक है जिसने अपने स्वभाव और नजरिए का पूरी तरह लोकतांत्रिकीकरण नहीं किया था। वह लोकतंत्र की चुनौतियों से अनभिज्ञ था। इस लेखक के पास गंभीर सामाजिक नजरिया था लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की जटिलता और उनके निर्माण की प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ था। वह लोकतंत्र में अपने पुराने उपनिवेशविरोधी वैचारिक नजरिए के साथ दाखिल हुआ और इस नजरिए के लेखकों को जल्द ही शीतयुद्धीय राजनीति ने अपनी गिरफ्त में ले लिया। शीतयुद्धीय राजनीति की गिरफ्त से लेखक कैसे मुक्त हो इसे न तो रामविलास शर्मा जानते थे और न अज्ञेय ही जानते थे, जबकि दोनों के पास साम्राज्यविरोधी नजरिया था।फलतः लेखक के जीवन में लोकतंत्र को लेकर सही समझ पैदा होने की बजाय संशय और अनिश्चितता पैदा हुई । त्रासद यह पहलु था कि लेखक रह रहा था लोकतंत्र में लेकिन पुराने साम्राज्यवादविरोघी भावबोध के साथ ,साम्राज्यवाद विरोधी भावबोध को उसने लोकतांत्रिक भावबोध में रुपान्तरित नहीं किया।यही वह बिन्दु हैं जहां पर हम लोकतंत्र पर हमले के समय नामवर सिंह जैसे लेखक को असहाय पाते हैं,रामविलास शर्मा जैसे विचारक को गूंगा पाते हैं। एक अन्य समस्या यह है कि हमने लोकतंत्र और लेखक के रिश्ते की नये दौर और नई सामग्री के आलोक में ठीक से कभी मीमांसा ही नहीं की। लोकतंत्र-साहित्य और साहित्यकार के अंतस्संबंध पर विचार ही नहीं किया, उलटे लोकतंत्र को हिकारत,तिरस्कार और उपेक्षा के भाव से देखा। इसने लेखक को लोकतंत्र में रहने के बावजूद लोकतंत्र के प्रति बेगाना बना दिया ।

अनंतमूर्ति ने लिखा है '' नयी भारतीय अस्मिता का उभार नये और पुराने के मिश्रण से नहीं उठा है बल्कि दोनों के साथ जीने से जो द्वंद्व पैदा होता है उससे उठा है और यही द्वंद्व हमारी भाषाओं की प्रतिभा का बीज है !'' सवाल नए और पुराने के द्वंद्व का नहीं है, सवाल यह है कि लोकतंत्र में लेखक किस तरह की द्वंद्ववादी प्रक्रियाओं से गुजरता है ? द्वंद्ववादी प्रक्रियाएं किस तरह का लेखक निर्मित करती है ? क्या लेखक इस प्रक्रिया से बाकिफ है ?

अनंतमूर्ति ने दो साहित्यों के बीच तीन तरह के संबंधों की चर्चा की है। उन्होंने लिखा है '' पहला मालिक और नौकर का; दूसरा बराबरी का सम्बन्ध;तीसरा एक विकसित देश और विकासमान देश के बीच का सम्बन्ध जैसा पहले सम्बन्ध का उदाहरण गोरे लोगों का काले लोगों पर अपनी संस्कृति थोपने का तरीका,जैसाकि अमेरिका में हुआ है। फिर भी कोई भी आरोपण पूरी तरह से सफल से सफल नहीं हो सकता जैसे संगीत में,साहित्य में काले लोगों की अल्पसंख्यक संस्कृति ऐसे किसी रचनात्मक बिन्दु को सुरक्षित रख सकती है जिसका कि असर पूरे देश के साहित्य पर हो। अंग्रेजी और फ्रांसीसी साहित्य का मिलाप दूसरी तरह के सम्बन्ध का उदाहरण है। जब एक फ्रांसीसी इतिहासकार अंग्रेजी साहित्य का इतिहास लिखता है तो यह सम्भव है कि उसको प्रत्येक महत्वपूर्ण अंग्रेजी लेखक के पीछे कोई फ्रांसीसी लेखक नजर आये।''

''तीसरी तरह का सम्बन्ध पहले दो सम्बन्धों से कुछ ज्यादा जटिल है। मैं पूर्व-पश्चिम के सम्बन्ध जैसे जुमले का प्रयोग न करके आर्थिक विभाजनों के अन्तर्गत ऐसे सम्बन्धों को समझना चाहता हूँ क्योंकि उस तरह के जुमलों में जन्मी विचार पद्धतियाँ बहुधा सीधीसादी होती हैं। जैसाकि मेरी बात से स्पष्ट है इसका परिणाम या तो सीधी नकल है या कोरा कंजरवेटिज्म । क्योंकि मैं भारत में जन्मा हूं सिर्फ इसीलिए मैं यह सोचने से इन्कार करताहूँ कि टॉल्सटॉय या कि शेक्सपियर के बारे में सोचना कोई अपराध हैअथवा मेरी अपनी भाषा के महाकवि पम्प के बारे में सोचने में नहीं। जब मैं यह कहता हूँ तो मुझे इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि मेरी अपनी भाषा के उपन्यासकार कारन्थ के उपन्यास हालाँकि वे विश्वसाहित्य के समकक्ष नहीं रखे जा सकते जिनकी मैं प्रशंसा करता हूँ,लेकिन फिर भी मेरे लिए उनके उपन्यास ही मेरी संवेदना को निर्मित करने में ज्यादा प्रासंगिक हैं ।''

साहित्य में जिन तीन सम्बन्धों के बारे में अनंतमूर्ति ने लिखा है ,वे तीनों सम्बन्ध अपनी जगह सही हैं। लेकिन इसमें एक खास किस्म का स्थानीयतावाद भी है। साहित्य कम से कम स्थानीयतावादी नहीं होता। उसमें देशज भाषा की परंपराएं होती हैं और उनसे लेखक बनता है, प्रभाव ग्रहण करता है, यह सच है कि कारन्थ का उपन्याकार के रुप में अनंतमूर्ति पर असर ज्यादा होगा.लेकिन आधुनिककाल में साहित्य रुपों से लेकर नजरिए तक लेखक पर ग्लोबल परंपराएं और ग्लोबल वैचारिक संघर्ष असर डालते हैं। लेखक की संवेदना मात्र स्थानीय साहित्य से निर्मित नहीं होतीं,यह सही है कि स्थानीय ज्यादा प्रासंगिक होता है लेकिन लेखक के लिए स्थानीय वह भी है उसके युग का नहीं है। मसलन् ऐतिहासिक उपन्यास में लेखक मात्र स्थानीय तक सीमित नहीं रहता।उसे वर्तमान के आलोक में लंबी उड़ान भरनी पड़ती है।

अनंतमूर्ति ने सही कहा कि '' पाश्चात्य साहित्य का प्रभाव या तो वस्तुस्थिति के साथ हमारी शिरकत को और भी मजबूत बना सकता है और या फिर हमारी समस्याओं की ओर से हमारे ध्यान और हमारी प्रासंगिकता को कहीं दूर उड़ा ले जा सकता है।यही समस्या की जड़ है-तब फिर अच्छे सम्बन्ध कैसे सण्भव हैं ? क्या कभी दो समान लोगों के प्रगाढ़ सम्बन्ध तब तक सम्भव हैं जबकि ऐसा प्रयास केवल इकतरफा हो ? अमेरिका को हमारे गुरुओं की जरुरत है,लेकिन क्या वह कभी हमारे कवियों और उपन्यासकारों की जरुरत महसूस करेगा और उनको उतना महत्त्व देगा जितना कि हम अमरीकी लेखकों को देते हैं ? उन्हें ऐसा महत्त्व देना भी जरुरत से ज्यादा है,और यह हमारी दूसरी समस्या है कि हम पाश्चात्य देशों की राय के प्रभाव में आकर बिना किसी आलोचनात्मक दृष्टिकोण के अमरीकी लेखकों को स्वीकार लेते हैं। ''

भारतीय लेखकों में ''पीछे देखनेवाले,इधर-उधर देखने वाले अथवा आगे देखने वाले ' लेखक पाए जाते हैं। अनंतमूर्ति ने लिखा- '' पीछे देखनेवाले लोग इस भ्रान्ति को पालते हैं कि समस्याओं के समाधान भूतकाल को लौटाने में ही हैं।(लेकिन हमारे भूतकाल का कौन-सा पहलू ? ये पुनर्जागरणवादी लोग इस मामले में भी बहुत ही काइयां हैं; ये लोग हमारे भूतकाल के उस संशयवादी और विवेकवादी पहलू को बिलकुल अनदेखा कर देते हैं ।) अगर उच्चवर्गीय भारतीयों की यह स्थिति है तो कॉसमोपोलीटन लोग हमेशा इधर-उधर देखते हैं सोचते हैं,हम अमेरिका जैसे होंगे ? रुस जैसे होंगे ? ब्रिटेन जैसे ? याकि फ्रान्स जैसे ? वे लोग भी भारत के विरासती वैभव के बारे में बहुत बढ़-चढ़कर बोलते हैं,फिर भी अपना बौद्धिक भोजन पाश्चात्य देशों से प्राप्त करते हैं। वे लोग वियतनाम में अमरीकी अत्याचारों को लेकर चिन्तित हो सकते हैं लेकिन वे अपने ही प्रन्त में आंध्र प्रदेश के जमींदारों के द्वारा गरीब हरिजनों की झोपड़ियाँ जला देने पर कुछ नहीं बोलते हैं। वे गिसबर्ग के विरोध की सराहना करते हैं ,उनके सारे भद्दे तरीकों की सराहना करते हैं,लेकिन जब एक बहुत ही ईमानदार मगर उग्र विधानसभा सदस्य ने एक भ्रष्टमंत्री को चप्पलों से पीटा तो वे सहसा चौंक गए, इसलिए कि यह उनको असभ्य तरीका लगा। वे लोग हिप्पियों की पोशाक पहनते हैं मगर कपड़ा वह विदेशी टेरीलीन होता है। ''

लेखक को भारत के विकास के लिए क्या करना चाहिए या क्या सोचना चाहिए । अनंतमूर्ति ने लिखा है '' एक अग्रदर्शी भारतीय को मानवता के मेलजोल के लिए काम करना होगा जो केवल नयी वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपलब्धियों और नये राजनैतिक एवं आर्थिक ढ़ाँचे से ही सम्भव हो सकेगा,जोकि पुनःअंतःसंबंधित है। ''

अधीर लेखक और गुमशुदा पाठक-

मौजूदा दौर हम सबके लिए गंभीर समस्याएं लेकर आया है। साहित्यिक पत्रिकाएं छप रही हैं, साहित्य भी छप रहा है, लेकिन साहित्य का कोई असर समाज पर नजर नहीं दिख रहा।हम सोचें साहित्य क्यों प्रभावहीन हो गया ? पहले साहित्य या कलाओं में कोई चीज दाखिल होती थी तो अन्य कला रुपों में उसका असर दिखता था समाज में वैचारिक विमर्श में असर नजर आता था । विगत तीस सालों में तेजी से आमलोगों में अधीरता का विकास हुआ है। नया लेखक अधीर है। पाठक सोया हुआ है। दूसरी ओर साहित्य सृजन और आलोचना ,संस्कृति और राजनीति आदि के बीच में संबंध पूरी तरह कट चुका है । अखबारों की अंतर्वस्तु ने एक नए माहौल को जन्म दिया है,अब अखबार में जो छपा है वो सच है,इससे लेखन में यह भाव पैदा हुआ है कि मैंने जो लिखा है वह सच है। लेखक अपने लिखे को लेकर अधीर है, बेचैन है,बहुत जल्दी स्वीकृति चाहता है,यश चाहता है, इसे साहित्य की नई अग्नि कह सकते हैं। इसमें घी का काम किया है पाठक की सुप्तावस्था ने । बेचैन लेखक और सुप्त पाठक का नया संबंध उबरकर सामने आया है। आज के पाठक की सुप्त मानसिक अवस्था को निर्मित करने में मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। यह पाठक चाहता है कि अखबारों में उसके हितों का ख्याल रखा जाय। मीडिया का पाठक जब मीडिया का उपभोग करता है तो वह और कुछ नहीं करता बल्कि सिर्फ उपभोग करता है। अखबार के पाठक को रोज अपना भोजन चाहिए, उसे रोज अपने हितों की अभिव्यंजना पढ़ने या देखने की आदत हो गयी है और यही उसकी अधीरता का मूल स्रोत भी है। पाठक की अधीरता का अखबार के संपादकों ने नए स्तंभों का आरंभ करके खूब दोहन किया है। वे विभिन्न स्तंभों के जरिए पाठक की अधीरता,जिज्ञासाओं और सवालों के समाधान पेश करते रहते हैं। इस क्रम में अबाधित और लक्ष्यहीन ढ़ंग से सूचनाओं की बारिस हुई है और पाठक ने बिना सोचे बिचारे प्रक्षेपित सूचनाओं को हजम भी किया है। इस क्रम में पाठक में सामंजस्य और समझौते की भावना पैदा हुई है। हल्का और सतही लेखन क्रमशः पाठक की रुचि का अंग बन गया । फार्मूलाबद्ध लेखन पाठक का अंग बन गया और इसने गंभीर लेखन की अखबारों से छुट्टी कर दी।नए लेखन सिस्टम में शब्द तय हैं और स्थान तय है। अंतर्वस्तु को अब तयशुदा स्थान के लिहाज से पेश करना होता है । वे रचनाएं ज्यादा पढ़ी जा रही हैं जो गंभीर नहीं हैं। गंभीर रचना के पाठक क्रमशः कम होते जा रहे हैं। इसका असर साहित्य पर भी पडा है। साहित्यिक पत्रिकाओं के पाठक कम हुए हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं में हलके लेखन की मांग बढ़ी है। साहित्य में हलके साहित्य की मांग बढ़ी है।

बड़े पैमाने पर बुद्धिजीवी खासकर मीडियाजनित बुद्धिजीवी बेचैन आत्मा की तरह समाज में मंडराते दिखते हैं। आज लेखक की आत्मा, अंतरात्मा, ईमानदारी,निष्ठा,प्रतिबद्धता,साहित्यिकता आदि का कोई मूल्य नहीं है। आज ऐसा लेखक निर्मित हुआ है जो हर किस्म के समझौते करने को तैयार है। हर चीज के साथ समझौता करने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं इसे वह महसूस ही नहीं करता। इसलिए वह बार बार अपनी असफलता का रोना रोता रहता है वह नहीं जानता कि वह असफल क्यों हो रहा है ? सच यह है कि हमने साहित्य की महिमा और शक्ति को ठंड़े बस्ते में बंद करके विज्ञान,समाजविज्ञान,दर्शन आदि का महिमामंडन किया है। अब हम साहित्य में एक ही चीज खोजते हैं वह है पैसा,अफसोस यह है कि वह भी मिलता नहीं है! हमने साहित्य की खोज बंद कर दी है।

रविवार, 11 दिसंबर 2011

डिजिटल युग में लघुपत्रिकाओं की चुनौतियां


    डिजिटल की दुनिया ने हमारे रचना संसार के सभी उपकरणों पर कब्जा जमा लिया है। लघुपत्रिका अथवा साहित्यिक पत्रकारिता जब शुरू हुई थी तो हमने यह सोचा ही नहीं था कि ये पत्रिकाएं क्या करने जा रही हैं। हमारी पत्रकारिता और पत्रकारिता के इतिहासकारों ने कभी गंभीरता से मीडिया तकनीक के चरित्र की गंभीरता से मीमांसा नहीं की। हम अभी तक नहीं जानते कि आखिरकार ऐसा क्या घटा जिसके कारण लघु पत्रिकाएं अभी भी निकल रही हैं।
      आर्थिक दृष्टि से लघु पत्रिका निकालना घाटे का सौदा साबित हुआ है। लघु पत्रिका प्रकाशन अभी भी निजी प्रकाशन है। इस अर्थ में लघु पत्रिका प्रकाशन को निजी क्षेत्र की गैर-कारपोरेट उपलब्धि कहा जा सकता है। संभवत: निजी क्षेत्र में इतनी सफलता अन्य किसी रचनात्मक प्रयास को नहीं मिली। लघु पत्रिकाओं क प्रकाशन को वस्तुत: गैर-व्यावसायिक पेशेवर प्रकाशन कहना ज्यादा सही होगा। समाज में अभी भी अनेक लोग हैं जो लघुपत्रिका को व्यवसाय के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसे लघुपत्रिका आंदोलन कहना पसंद करते हैं। वे क्यों इसे लघुपत्रिका आंदोलन कहते हैं ,यह बात किसी भी तर्क से प्रकाशन की मीडिया कसौटी पर खरी नहीं उतरती।
   लघु पत्रिका प्रकाशन की अपनी दुनिया वहीं है जो प्रकाशन की दुनिया है। फ़र्क इसके चरित्र और भूमिका को लेकर है। आप जितना बेहतर और वैज्ञानिक ढ़ंग से प्रिंट टैकनोलॉजी के इतिहास से वाकिफ होंगे। उतने ही बेहतर ढ़ंग से लघुपत्रिका प्रकाशन को समझ सकते हैं। लघु पत्रिकाओं की आवश्यकता हमारे यहां आज भी है, कल भी थी, भविष्य में भी होगी। लघुपत्रिका का सबसे बड़ा गुण है कि इसने संपादक और लेखक की अस्मिता को सुरक्षित रखा है। हमें जानना चाहिए कि कैसे संपादक की सत्ता और लेखक की पहचान का प्रतिष्ठानी प्रेस अथवा व्यावसायिक प्रेस में लोप हो गया ?
    आज प्रतिष्ठानी प्रेस में संपादक है ,लेखक हैं ,किंतु उनकी कलम और बुद्धि पर नियंत्रण किसी और का है,विज्ञापन कंपनियों का है। संपादक लेखक,स्तंभकार और संवाददाता  की सत्ता को विज्ञापन एजेंसियों ने रूपान्तरित कर दिया है। आज विज्ञापन एजेंसियां तय करती हैं कि किस तरह की खबरें होंगी, किस साइज में खबरें होंगी, किन विषयों पर संपादकीय सामग्री होगी ? किस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इस समूची प्रक्रिया के व्यवसायिक समाचारपत्र और पत्रिका जगत पर क्या असर हुए हैं, इसके बारे में हमने कभी गंभीरता के साथ विचार नहीं किया। हमने कभी यह सोचा ही नहीं कि जब पहलीबार समाचारपत्र आया तो उसने क्या किया और जब समाचारपत्र में विज्ञापन दाखिल हो गया तो क्या बदलाव आने शुरू हुए, लघु पत्रिका प्रकाशन भी इस प्रक्रिया से प्रभावित हुआ है। इन सबको लेकर हमारे पास कुछ अनुभव हैं, कुछ संस्मरण हैं। कुछ किंदन्तियां हैं। किंतु भारत के कम्युनिकेशन तकनीक के इतिहास और उसके परिणामों की कभी गंभीरता से पड़ताल नहीं की। लंबे समय तक हम साहित्य के एक हिस्से के तौर पर लघपत्रिकाओं अथवा साहित्यिक पत्रिकाओं को देखते रहे, उनमें प्रकाशित सामग्री का हमने मीडिया सैध्दान्तिकी अथवा आलोचना के नजरिए से कभी मूल्यांकन ही नहीं किया। यहां तक कि एक स्वतंत्र मीडिया रूप के तौर पर पत्रिकाओं की सत्ता को हमने कभी स्वीकार नहीं किया।
  आज जब हम बातें कर रहे हैं तो स्थिति में कोई मूलगामी किस्म का परिवर्तन नहीं आया है। सिर्फ एक परिवर्तन आया है हमने पत्र-पत्रिकाओं के इतिहास को साहित्य के इतिहास से अलग करके स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता के इतिहास के रूप में पढ़ाना शुरू कर दिया है। पत्र-पत्रिकाओं को स्वतंत्र रूप से पढ़ाने से मामला हल नहीं हो जाता, बल्कि और भी पेचीदा हो उठा है।
    समाचारपत्र का इतिहास हो या लघुपत्रिका का इतिहा हो, इसकी सही समझ तब ही बनेगी जब हम कम्युनिकेशन तकनीक के इतिहास से वाकिफ होंगे। हमारी मुश्किल अभी यहीं पर बनी हुई है, हमें साहित्य से प्रेम है, पत्रिकाओं से प्रेम है, किंतु तकनीक से प्रेम नहीं है। अगर हमारा तकनीक से प्रेम होता तो हम उसके इतिहास को जानने की कोशिश करते।
    हिन्दी में संपादक - लेखकों का एक तबका तैयार हुआ है जो धंधेखोरों की तरह लघुपत्रिका आंदोलन के नाम पर टटुपूंजिया दुकानदारी कर रहा है। इसके बावजूद ये स्वनाम-धन्य विद्वान यह मानकर चल रहे हैं कि लघुपत्रिकाओं के सबसे बड़े हितचिन्तक वे हैं। जबकि सच यह है कि ऐसे संपादकों की बाजार में कोई साख नहीं है। वे अपनी किताबों की बिक्री तक नहीं कर पाते। अपनी पत्रिका को बेच तक नहीं पाते। हमें यह देखना होगा कि लघुपत्रिकाएं क्या साहित्यिक अभिरूचि पैदा करने का काम कर रही हैं अथवा कुछ और काम कर रही हैं ? क्या हमारी लघु पत्रिकाओं ने कभी इस तथ्य पर गौर किया कि कैसे विगत तीस सालों में भारत के पत्रिका प्रकाशन में विस्फोट हुआ है।
   आज पत्रिका प्रकाशन सबसे प्रभावी व्यवसाय है। एक जमाना था जब सारिका,दिनमान, धर्मयुग आदि को विभिन्न बहाने बनाकर बंद किया गया था, किंतु आज स्थिति यह है कि पत्रिका प्रकाशन अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है। आज बाजार में सभी भाषाओं में पत्रिकाओं की बाढ़ आई हुई है। बड़े पैमाने पर पत्रिकाएं बिक रही हैं। अपना बाजार बना रही हैं। लघुपत्रिका का प्रकाशन अभी कम मात्रा में होता है। हंस,पहल,उद्भावना,आलोचना जैसी पत्रिकाएं पांच-सात हजार का आंकड़ा पार नहीं कर पायी हैं। जबकि छोटे से कस्बे से निकलने वाली धार्मिक पत्रिका लाखों की तादाद में बिक रही हैं। हमें बेचने की कला को धार्मिक पत्रिकाओं से सीखना चाहिए। बड़े प्रतिष्ठानी प्रेस ने धार्मिक पत्रिकाओं से यह गुण सीखा है और आज बाजार में हर विषय की एकाधिक पत्रिकाएं मिल जाएंगी ,जिनकी साधारण तौर पर इनकी बिक्री हमारी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं से कई गुना ज्यादा है। धार्मिक पत्रिकाओं से सीखने की बात मैं इसलिए कर रहा हूँ कि आप पत्रिका निकालना यदि चाहते हैं तो दूसरों से सीख लें।
   लघुपत्रिका की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह अपने पाठक की अभिरूचियों को नहीं जानती, अपने पाठक को नहीं जानती, वह सिर्फ साहित्य ,विचारधारा और साहित्यकार को जानती है, उसमे भी वह संकुचित भाव से चयन करती है। यह तो कुल मिलाकर कंगाली में आटा गीला वाली कहावत चरितार्थ हो गयी।
    हमारी लघु पत्रिकाओं का समूचा नजरिया विधा केन्द्रित सामग्री प्रस्तुति पर ही केन्द्रित रहा है। हमने विधा केन्द्रित पैमाना 19वीं  शताब्दी में चुना था, वह पैमाना आज भी बरकरार है, उसमें परिवर्तन की रूरत हमने महसूस नहीं की। हम यह भूल ही गए कि पाठक की भी अभिरूचियां होती हैं। पाठक का भी नजरिया होता है, हम संपादक की रूचि जानते हैं, लेखक का नजरिया जानते हैं किंतु लघु पत्रिकाओं को पढ़कर आप पाठक को नहीं जान सकते। हमें इस सवाल पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए कि क्या गैर-पेशेवर ढ़ंग से लघु पत्रिका प्रकाशन संभव है ? क्या उसका कोई भविष्य है।
   हमें पाठक की अभिरूचि और साहित्य की स्वायत्तता को केन्द्र में रखकर लघुपत्रिका प्रकाशन करना चाहिए। साथ ही इस पहलू पर भी गौर करना चाहिए कि साहित्य की परिभाषा बदल गयी है ? आज साहित्य की वही परिभाषा नहीं रह गई है जो आज से पचास या पच्चीस साल पहले थी। लघु पत्रिका का संसार साहित्य के बदले हुए स्वरूप को परिभाषित किए बिना आगे चला जा रहा है। इस संदर्भ में आलोचना पत्रिका के पुनर्प्रकाशन को प्रस्थान बिंदु के रूप में विश्लेषित करने की जरूरत है। आलोचना पत्रिका का जब पुनर्प्रकाशित हुई तो उसका पहला अंक फासीवाद पर आया। सवाल किया जाना चाहिए कि इस अंक से पहले भी अनेक राजनीतिफिनोमिना आए किंतु उन पर कभी आलोचना पत्रिका के संपाक का ध्यान नहीं गया। मेरा इशारा आपात्काल की तरफ है, आलोचना पत्रिका के द्वारा आपात्काल के बारे में एकदम चुप्पी और साम्प्रदायिकता पर  विशेष अंक इसका क्या अर्थ है ? इस प्रसंग को इसलिए सामने पेश कर रह हूँ कि आप यह जान लें कि विगत पच्चीस वर्षों लघु पत्रिकाएं आम तौर पर उन विषयों पर सामग्री देती रही हैं जो सत्ता प्रतिष्ठानों ने हमारे लिए तैयार किए हैं।
    लघुपत्रिका का विमर्श सत्ता विमर्श नहीं है। लघुपत्रिकाएं  पिछलग्गू विमर्श का मंच नहीं हैं। ये पत्रिकाएं मौलिक सृजन का मंच हैं। साम्प्रदायिकता का सवाल हो या धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न हो अथवा ग्लोबलाईजेशन का प्रश्न हो हमारी पत्रिकाएं सत्ता विमर्श को ही परोसती रही हैं। सत्ता विमर्श कैसे परोसा जाता है इसका आदर्श नमूना है लघु पत्रिकाओं में चलताऊ ढ़ंग से सामयिक प्रश्नों पर छपने वाली टिप्पणियां। लघु पत्रिका का चरित्र सत्ता के चरित्र से भिन्न होता है, यह बात सबसे पहले भारतेन्दु ने समझी किंतु हमारे नए संपादकगण अभी तक नहीं समझ पाए हैं। लघुपत्रिका की हमारी अवधारणा में भी गंभीर समस्याएं हैं। लघु पत्रिकाओं में कारपोरेट जगत की पत्रिकाओं की समस्त बीमारियां घर कर गयी हैं। जिस तरह कारपोरेट घरानों की पत्रिकाओं में पक्षपात होता है,खासकर रचना के चयन को लेकर, लेखक के चयन को लेकर, जिस तरह कारपोरेट पत्रिकाओं के लिए विज्ञापनदाता महत्वपूर्ण और निर्णायक होता है। उसके आधार पर पक्षपात होता है ,ठीक वैसे ही लघु पत्रिकाओं में भी पक्षपात का गुण विचारधारा विशेष के प्रति आग्रह के रुप में कैंसर की तरह घर कर चुका है।
     लघुपत्रिकाओं को दो कमजोरियों से मुक्त करने की जरूरत है , पहला है 'विचारधारात्मक पक्षपात', दूसरा है ' निर्भरता'। ये दोनों ही तत्व लघुपत्रिकाओं के स्वाभाविक विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं।  दूसरी प्रधान समस्या है जो लघुपत्रिका की धारणा से जुड़ी है। अभी हम जिस लघुपत्रिका को निकाल रहे हैं उसके केन्द्र में संस्कृति है। संस्कृति को ही संदर्भ बनाकर हम साहित्य का चयन करते हैं। जबकि सारी दुनिया में संस्कृति के संदर्भ के आधार पर चयन नहीं हो रह, बल्कि अभिरूचि और जीवनशैली के आधार पर सामग्री चयन हो रहा है।
    यदि लघुपत्रिकाएं साहित्य,राजनीति, अर्थनीति, विज्ञान आदि पर केन्द्रित सामग्री प्रकाशित करती हैं तो उन्हें इस संदर्भ में पेशेवर र विशेषज्ञता को ख्याल में रखना चाहिए। हिन्दी के लेखकों का आलम यह है कि वे सभी विषयों के ऊपर लिख सकते हैं और वेकिसी भी क्षेत्र की विशेष जानकारी हासिल नहीं कना चाहते। मौलिक लेखन के नाम पर प्रतिष्ठित लघुपत्रिकाओं में जिस तरह की घटिया और स्तरहीन सामग्री प्रकाशित होती है इसने पाठकों को लघुपत्रिकाओं से दूर किया है। आज स्थिति यह है कि विशेषज्ञान के बिना काम चलने वाला नहीं है। विशेषज्ञता हासिल किए बिना आप स्वीकृति नहीं पा सकते।
   आखिरी समस्या सबसे गंभीर समस्या है जिस  पर गौर किया जाना चाहिए। आज हम डिजिटल के युग में आ गए हैं। हमें पत्रिका को डिजिटल रूप में प्रकाशित करना चाहिए, सीडी और वेबसाइट पत्रिका के रूप में प्रकाशित करना चाहिए।  डिजिटल प्रकाशन पत्रिका प्रकाशन से सस्ता और व्यापक है। इसकी पहुँच दूर-दूर तक है। आप चाहें तो अपनी वेब पत्रिका के लिए सस्ते विज्ञापन भी ले सकते हैं। हमें यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि मौजूदा दौर लाइब्रेरी का नहीं है, डिजिटल लाइब्रेरी का है।          

रविवार, 12 जुलाई 2009

आलोचक कैमरामैन नहीं होता अशोकजी

अशोक बाजपेयी बड़े हंसमुख और सुसंस्‍कृत बुद्धि‍जीवी हैं। पढे़ लि‍खे अंग्रेजी में हैं किंतु हि‍न्‍दी में रमते है। गजब का वि‍भाजि‍त व्‍यक्‍ति‍त्‍व है। यह व्‍यक्‍ति‍त्‍व का वि‍भाजन उनके नजि‍रए का भी अंग है। यह उनके अपने जीवन के यथार्थ से पलायन का भी संकेत है। यथार्थ से पलायन कोई नयी बात नहीं है किंतु इन दि‍नों यह फैशन का रूप ले चुका है। यथार्थ से पलायन का ही दुष्‍परि‍णाम है कि‍ अशोक बाजपेयी ने लि‍खा है '' ज्‍यादातर लोग बहस में पड़ना नहीं चाहते। उसे एक गैर जरूरी बौद्धि‍क व्‍यसन मान लि‍या गया है। बहस से भला क्‍या होता है,कि‍सी बहस का ,साहि‍त्‍य में ,आज तक भला कि‍सी समाधान या समन्‍वय में समापन हुआ है. स्‍त्री वि‍मर्श और दलि‍त वि‍मर्श पर बहसें बासी पड़ चुकी हैं।'' ( जनसत्‍ता ,12 जुलाई 2009) अपने साप्‍ताहि‍क कॉलम में 'बहस की हालत' उपशीर्षक के तहत अन्‍य जो बातें कही हैं उससे असहमत नहीं हुआ जा सकता। वे बेबाकी के लि‍ए धन्‍यवाद के पात्र हैं। किंतु उनका उपरोक्‍त नि‍ष्‍कर्ष सही नहीं है।
समस्‍या यह है कि‍ साहि‍त्‍य में जो प्रति‍ष्‍ठि‍त हैं, जि‍नमें अशोकजी स्‍वयं हैं, वे कि‍तना बहस करते हैं, साहि‍त्‍य की बहस पाठकों से नहीं साहि‍त्‍य के आलोचकों से उठती रही हैं। उसी क्रम में साहि‍त्‍य भी चमका है। साहि‍त्‍य के नामी समीक्षक जब लि‍खना बंद कर दें,दूसरों का लि‍खा हुआ पढ़ना बंद कर दें।गंभीर बहस की बजाय चुटकुलेबाजी और प्रशस्‍ति‍गान करने लगें अथवा कीचड़ उछालने लगें तो बताइए इसके लि‍ए कि‍से जि‍म्‍मेदार ठहराया जाए, क्‍या यह समस्‍या हमारी आपकी सबकी नहीं है कि‍ जि‍न गंभीर सवालों से लेखक,पाठक और नागरि‍क दो चार हो रहा है उस पर अपनी पहलकदमी करें और गंभीर हस्‍तक्षेप करें, उन वि‍षयों पर कि‍ताबे लि‍खें, नि‍बंध लि‍खें, लि‍खि‍त बहस आयोजि‍त करें। जि‍न वि‍षयों पर बहस समापन की बात अशोकजी ने कही है वह सही नहीं है। सच यह है कि‍ हि‍न्‍दी के आलोचकों ने स्‍त्री वि‍मर्श, दलि‍त वि‍मर्श कि‍या ही नहीं है। जब बहस ही नहीं की तो समापन का सवाल ही पैदा नहीं होता । सर्वे के करके देखना चाहि‍ए कि‍ हि‍न्‍दी के स्‍वनामधन्‍य आलोचकों ने इन वि‍षयों पर कि‍तनी कि‍ताबें लि‍खीं, कि‍तने गंभीर लेख लि‍खे।
हि‍न्‍दी की दि‍क्‍कत यह है कि‍ इसका आलोचक अपने पेशे से भटक गया है,उसने आलोचना को अनुशासन के रूप में लंबे समय से ग्रहण करना बंद कर दि‍या है। हि‍न्‍दी आलोचना की जो चलती फि‍रती और लघु पत्रि‍काओं में छपने वाली महान हस्‍ति‍यां हैं उनमें से ज्‍यादातर की गंभीर वि‍षयों में कोई दि‍लचस्‍पी नहीं है। यह सवाल स्‍वयं अशोक बाजपेयी को अपने से करना चाहि‍ए कि‍ उन्‍होंने दलि‍त और स्‍त्री वि‍मर्श पर क्‍या कोई कि‍ताब लि‍खी , मैं नहीं जानता, किंतु वास्‍तवि‍कता यही है कि‍ हि‍न्‍दी के ज्‍यादातर आलोचक इन दोनों ही वि‍षयों पर गंभीर लेखन से कन्‍नी काटते रहे हैं। आलोचना समृद्ध तब होती है जब आलोचक स्‍वयं से सवाल करता है,स्‍वयं की जि‍म्‍मेदारि‍यां परि‍भाषि‍त करता है, आलोचना इस तर्क से वि‍कसि‍त नहीं होती कि‍ क्‍या क्‍या नहीं हो रहा। आलोचक कैमरामैन नहीं है। आलोचक एक नागरि‍क है और वह अपने आलोचकीय नागरि‍क दायि‍त्‍व का साहि‍त्‍य में कैसे और कि‍स कौशल के साथ पालन करता है उससे तय होगा कि‍ आलोचना कैसी है, कि‍सी वि‍षय पर बहस जिंदा है या बासी है।
हिंदी के सुधी वि‍द्वानों के लि‍ए ये वि‍षय कभी आकर्षण के केन्‍द्र में नहीं रहे, वरना कभी तो कि‍सी आलोचक ने स्‍त्री और दलि‍त के सवाल पर कोई आलोचना ग्रंथ लि‍खा होता। हिंदी के अधि‍कांश आलोचक ( अशोक बाजपेयी भी शामि‍ल हैं) हमेशा मरे हुए, पुराने वि‍षयों पर बहस करते हैं और उन पर ही अपनी वीरता और ज्ञान बहादुरी का प्रदर्शन करते हैं। स्‍वयं अशोक जी को ही इस लेख या कॉलम में देखें कि‍ वे कि‍न वि‍षयों पर बहस का सुझाव देते रहते हैं।
अशोक बाजपेयी ने लि‍खा है ' बहस न होना क्‍या संवादहीनता का प्रमाण है,कि‍सी हद तक।' यह संवादहीनता आती कहां से है, इसका सामाजि‍क स्रोत क्‍या है, क्‍या इसका हिंदी लेखक की मानसि‍क बुनाबट के साथ कोई संबंध है, क्‍या मध्‍यवर्ग के चरि‍त्र के साथ कोई संबंध है, इत्‍यादि‍ सवालो पर जब तक गंभीरता के साथ चर्चा नहीं होती हम सतही और चालू तर्क से काम चलाते रहेंगे। संवादहीनता तब पैदा होती है जब यथार्थ का मर्म हाथ से नि‍कल जाता है, हि‍न्‍दी आलोचक के हाथ से कब और कैसे यथार्थ का मर्म छूट गया और आलोचक ग्‍लोबल बि‍यावान में घि‍र गया यह सोचने का वि‍षय है। स्‍वयं अशोक जी जि‍न वि‍षयों पर नि‍रंतर लंबे समय से लि‍ख रहे हैं उसमें भी यही स्‍थि‍ति‍ सहज ही देखी जा सकती है। दूसरी बात यह कि‍ संवादहीनता संचार के अभाव में पैदा होती है। हिंदी आलोचक बोलता है। लि‍खता है । किंतु संचार नहीं करता।
संचार में दुतरफा प्रक्रि‍या चलती है,लेना और देना होता है। हिंदी आलोचक सि‍र्फ अपनी बोलता है अन्‍य की सुनता नहीं है,ग्रहण नहीं करता,ग्रहण के प्रति‍ उसके अंदर वि‍नय भाव का अभाव है।हिंदी आलोचना में गर्वीलापन रामवि‍लास शर्मा से दाखि‍ल होता है और आलोचना में वि‍नय की परंपरा,ग्रहण की परंपरा के अंति‍म आलोचक हैं हजारीप्रसाद द्वि‍वेदी। आलोचना में गर्वीलेपन को वास्‍तव अर्थों में जन्‍म दि‍या प्रगति‍शील लेखक संघ ने। बाद में यह संक्रामक बीमारी के रूप में समूचे साहि‍त्‍य में छा गया। हिंदी में आज सबसे ज्‍यादा दुर्गति‍ भी प्रगति‍शील आलोचना ही झेल रही है, क्‍योंकि‍ हिंदी का यह सुनि‍योजि‍त स्‍कूल था।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...