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शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

लखनऊ बैंच का फैसला और संघ परिवार का पैराडाइम शिफ्ट

  इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच ने जब फैसला सुनाया तो उसके पहले उसने सभी पक्षों के वकीलों को यह आदेश दिया था कि वे मीडिया के सामने तब तक कुछ न बोलें जब तक अदालत के द्वारा फैसले की कॉपी मीडिया वालों को वितरित न हो जाए। लेकिन अदालत के प्रति सामान्य सम्मान तक बनाए रखने में हिन्दू संगठनों के वकील असफल रहे।
     अदालत के बाहर एक मीडिया मंच बना दिया गया था जहां से वकीलों को सम्बोधित करना था ,तय यह हुआ था कि पहले मीडिया को फैसले की कॉपी अदालत देगा और उसके बाद वकील लोग अपनी राय बताएंगे। इस सामान्य से फैसले का हिन्दू संगठनों के वकील सम्मान नहीं कर पाए और उन्होंने फैसला आते ही दौड़कर मीडिया को सम्बोधित करना आरंभ कर दिया।  
    फैसला सुनाए जाने के बाद सबसे पहले भाजपा के नेता और सुप्रीम कोर्ट में वकील रविशंकर प्रसाद ने इस नियम को भंग किया उसके बाद हिन्दूमहासभा और बाद में शंकराचार्य के वकील ने भी नियमभंग में सक्रिय भूमिका अदा की। रामलला के वकील और भाजपा के वकील साहब तो फैसला बताते हुए इतने उन्मत्त हो गए कि  उन्होंने वकील और संघ के स्वयंसेवक की पहचान में से वकील की पहचान को त्याग दिया और संघ के प्रवक्ता की तरह मुसलमानों के नाम अपील जारी कर दी। कहने के लिए यह सामान्य नियमभंग की घटना है लेकिन हिन्दुत्ववादियों में राम मंदिर को लेकर किस तरह की बेचैनी है यह उसका नमूना मात्र है।
     वकील का स्वयंसेवक बन जाना वैसे ही है जैसे रथयात्रा के समय कुछ पत्रकार संवाददाता का काम छोड़कर रामसेवक बन गए थे। इसबार हिन्दुओं के वकील इस फैसले पर हिन्दुत्व की जीत के उन्माद में भरे थे। उनका मीडिया को इस तरह सम्बोधित करना अदालत के आदेश का उल्लंघन था। इसके विपरीत मुस्लिम संगठनों के वकीलों ने संयम से काम लिया और मीडिया को तब ही अपनी राय दी जब अदालत की कॉपी मीडिया को मिल गयी।
      लखनऊ बैंच के फैसले पर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी और आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक-दूसरे के पूरक बयान दिए हैं। इन दोनों बयानों में क्या कहा गया है इसे बाद में विश्लेषित करेंगे ,पहले यह देखें कि लखनऊ बैंच के फैसले से संघ परिवार के रवैय्ये में मूलतः क्या बदलाव आया है।
       एक बड़ा बदलाव आया है संघ परिवार ने अदालत के फैसले का स्वागत किया है। राम मंदिर आंदोलन के दौरान संघ परिवार का स्टैंण्ड था कि हम अदालत का फैसला नहीं मानेंगे, राम हमारे लिए आस्था की चीज है। विगत 20 सालों से उत्तर प्रदेश में राम मंदिर का फैसला आने के पहले संघ परिवार ने जनता और मीडिया में जिस तरह का राजनीतिक अलगाव झेला है उसने संघ परिवार को मजबूर किया है कि वह अदालत का फैसला माने। यह मीडिया और जनता के दबाब की जीत है। हम उम्मीद करते हैं संघ परिवार के संगठन और उसके नेतागण सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी ऐसे ही स्वागत करेंगे चाहे फैसला उनके खिलाफ आए।
     उल्लेखनीय है सिद्धांततः अदालत का फैसला मानने में संघ परिवार को पांच दशक से ज्यादा का समय लगा है और अभी वे एक गलतफहमी के शिकार हैं कि विवादित जमीन पर राममंदिर बनाकर रहेंगे।
     बाबरी मसजिद विध्वंस की आपराधिक गतिविधि के लिए संघ परिवार के कई दर्जन नेताओं पर अभी मुकदमा चल रहा है और उस अपराध से बचना इनके लिए संभव नहीं है। श्रीकृष्ण कमीशन में बाबरी मसजिद विध्वंस के लिए संघ परिवार के अनेक नेताओं को कमीशन ने दोषी पाया है और बाबरी मसजिद विध्वंस का मामला जब तक चल रहा है विवादित जमीन पर कोई भी निर्माण कार्य नहीं हो सकता। वैसे भी यदि सुप्रीम कोर्ट के द्वारा हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी जाती है तो मामला लंबा चलेगा और वैसी स्थिति में संघ का भविष्य में क्या स्टैंण्ड होगा इसका कोई अनुमान नहीं लगा सकता।  
लखनऊ बैंच का फैसला आते ही संघ परिवार के नेताओं ने तत्काल ही अदालत की राय के बाहर जाकर मुसलमानों को मिलने वाली एक-तिहाई जमीन को राममंदिर के लिए छोड़ देने की तत्काल मांग ही कर ड़ाली और आडवाणी जी ने रामजी के भव्यमंदिर के निर्माण के साथ नए किस्म के सामाजिक एकीकरण की संभावना को व्यक्त किया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपील की है कि अतीत को भूल जाएं। हम मांग करते हैं कि बाबरी मसजिद विध्वंस को लेकर संघ परिवार सारे देश से माफी मांगे। बाबरी मसजिद गिराने का महाअपराध करने के बाबजूद अतीत को कैसे भूला जा सकता है।
    लखनऊ फैसले का तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है बाबरी मसजिद-राम मंदिर विवाद के राजनीतिक समाधान की असफलता। अदालत ने जनवरी-सितम्बर 2010 के बीच में सुनवाई करके जिस रिकॉर्ड समय में फैसला किया है वह इस बात का संकेत है कि अदालतें आज भी संसद से ज्यादा विश्वसनीय हैं।
    निश्चित रूप से केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की धर्मनिरपेक्ष दृढ़ता और प्रशासनिक मशीनरी की कुशलता ही है जिसने इस फैसले को एक सामान्य फैसले में बदल दिया । अदालतों में संपत्ति के प्रतिदिन फैसले होते रहते हैं और यह एक रूटिन कार्य-व्यापार है। यह संदेश देने में अदालत और केन्द्र सरकार सफल रही है।
      दूसरी ओर संघ परिवार के लिए यह फैसला गले की हड्डी है । इस फैसले ने राममंदिर के विवादित क्षेत्र को तीन हिस्सों में बांटकर और उसमें मुसलमानों का एक-तिहाई पर स्वामित्व मानकर मुसलमानों को अयोध्या से बहिष्कृत कर देने की संभावनाओं को खत्म कर दिया है। आगे अदालत का कोई भी फैसला आए उसमें हिन्दू-मुसलमानों की विवादित जमीन पर साझेदारी रहेगी।
    इस संदर्भ में ही लालकृष्ण आडवाणी के बयान में कहा गया है कि इस फैसले से ‘न्यू इंटर कम्युनिटी एरा’ की शुरूआत हुई है। यह बयान और अदालत का फैसला अनेक खामियों के बाबजूद जिस बड़ी चीज पर ध्यान खींचता है वह है  ‘न्यू इंटर कम्युनिटी एरा’ , यह संघ परिवार की समूची विचारधारा के ताबूत में कील ठोंकने वाली चीज है।  नया अंतर-सामुदायिक युग, ‘अन्यों’ को खासकर मुसलमानों को बराबर मानता है। यह अदालत के जरिए संघ परिवार की हिन्दुत्ववादी विचारधारा की विदाई का संकेत भी है। अब वे चाहें तो मंदिर ले सकते हैं लेकिन मुसलमानों के साथ मिलकर बाबरी मसजिद की विवादित जमीन पर मसजिद के साथ बराबरी के आधार पर रहना होगा। इससे अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के भेद को दीर्घकालिक प्रक्रिया में समाप्त करने में मदद मिलेगी।
   आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत का यह कहना कि हमें अतीत को भूलकर आगे देखना चाहिए। इस बयान में भी संघ परिवार के संभावित परिवर्तनों की ध्वनियां छिपी हुई हैं। संभवतः संघ परिवार अपने हिन्दुत्ववादी एजेण्डे की बजाय अब विकास की बातें करे जिससे वह युवाओं का दिल जीत सके। क्योंकि राममंदिर आंदोलन ने भारत के युवाओं को संघ परिवार और राममंदिर आंदोलन से एकदम दूर कर  दिया है। यही वजह है राम मंदिर आंदोलन के अतीत को मोहन भागवत भूल जाने की अपील कर रहे हैं। वे जानते हैं राम मंदिर का मसला संघ परिवार को मिट्टी में मिला सकता है यही वजह है कि विगत 10 सालों से किसी लोकसभा या विधानसभा चुनाव में रामंदिर चुनाव का मसला नहीं उठाया गया।  
    संघ परिवार धीरे-धीरे मंदिर विवाद से लखनऊ बैंच के फैसले का स्वागत करते हुए अपने को अलग कर रहा है। देखना है संघ परिवार किस दिशा में जाता है। क्योंकि बाबरी मसजिद विवाद का असली सच तो सुप्रीम कोर्ट ही बताएगा ।           








गुरुवार, 16 सितंबर 2010

सभ्यता के राममार्ग से भटके मोहन भागवत

              ( आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत)
    आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने उत्तर प्रदेश उच्चन्यायालय के फैसले के आने के पहले ही अपनी राय जाहिर कर दी है वे अपने अनुरूप फैसला चाहते हैं । उन्हें बाबरी मस्जिद गिराने का कोई दुख और अफसोस नहीं है। वे अपने मुँह से बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण की बात तक नहीं करना चाहते। उनके इस बयान ने अल्पसंख्यकों में आतंक और भय के संदेश का काम किया है। इन दिनों उत्तर प्रदेश साम्प्रदायिक भावनाओं को लेकर शांत है लेकिन अदालत के फैसले के बाद भी शांत रहेगा कहना मुश्किल है। राममंदिर को लेकर संघ परिवार का जो जिद्दी रूख रहा है उसकी तुलना राजनीति में सिर्फ हिटलर के जिद्दीभाव से कर सकते हैं।
       आरएसएस ने राममंदिर आंदोलन के माध्यम से देश की जो हानि की है उसकी भरपाई शब्दों से नहीं हो सकती। राम के नाम पर उन्होंने समस्त हिन्दुओं की सहिष्णुता को साम्प्रदायिक राजनीति के हाथों गिरवी रख दिया। राम हमारे देवता हैं उनके मार्ग का अनुसरण करने की बजाय संघ परिवार ने शैतान का मार्ग अपनाया । बाबरी मस्जिद तोड़कर सारी दुनिया में भारत की धर्मनिरपेक्ष छबि को कलंकित किया।
    राममंदिर आंदोलन ने धर्मनिरपेक्ष भारत को साम्प्रदायिक भारत का मुकुट पहनाया है। भारत में सभी धर्मों के लोग शांति,सदभाव और सुरक्षा के वातावरण में रहते थे लेकिन इस आंदोलन ने इन तीनों ही चीजों को सामाजिक अशांति,असुरक्षा और अविश्वास में बदल दिया है। खासकर मुसलमानों के प्रति तीव्र घृणा को आम लोगों के जेहन में उतारा है। राममंदिर आंदोलन के द्वारा पैदा की गई घृणा की तुलना सिर्फ दक्षिण अफ्रीका की गोरों की नस्लभेदीय घृणा से की जा सकती है। आज भी समय है संघ अपना जिद्दी रूख त्याग दे। संघ की जिद है हम मंदिर वहीं बनाएंगे। इस नारे का राजनीतिक और सांस्कृतिक रूपान्तरण हो चुका है। भारत के दिल को इस नारे ने पीड़ा पहुँचायी है। भारत के दिल में गरीब बसते हैं। मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा गरीब विरोधी साम्प्रदायिक नारा है।
      राममंदिर की जिद करके मोहन भागवत ने भारत के गरीबों को एकबार फिर से आहत किया है। वे हिन्दू होकर आज तक नहीं समझ पाए हैं कि धर्म गरीबों की आह है। वह राजनीति का मुकुट नहीं है। वह मंदिर की अभिव्यक्ति नहीं है। वह कोई इमारत नहीं है। मूर्ति नहीं है। वह तो गरीबों की आह है। हिन्दू धर्म का किसी भी अन्य धर्म के साथ कोई द्वेष नहीं है,प्रतिस्पर्धा नहीं है। हिन्दू धर्म की आत्मा मूर्ति,इमारत,मंदिर,संघ परिवार,भाजपा आदि में नहीं बसती। हिन्दू धर्म की आत्मा भारत के गरीबों की झोपड़ियों में बसती है। राम मंदिर आंदोलन गरीबों का आंदोलन नहीं था बल्कि कारपोरेट फंडिंग से चला कारपोरेट धर्म का आंदोलन था। यही वजह है कि कारपोरेट घरानों ने करोड़ों  रूपये का चंदा इस आंदोलन को दिया। राममंदिर के नाम पर चंदा वसूली का फायदा हिन्दू धर्म को नहीं मिला, बल्कि संघ परिवार को मिला। संघ परिवार ने करोड़ों रूपये का चंदा बाजार से उठाया है और इसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर देशी कारपोरेट घरानों ने दिल खोलकर मदद की। लेकिन सारा पैसा कहां गया कोई नहीं जानता लेकिन इन्कमटैक्स विभाग के पास इसके प्रमाण हैं कि विश्वहिन्दू परिषद ने राममंदिर आंदोलन के नाम पर करोड़ों की वसूली की।
    राममंदिर आंदोलन का उत्तर प्रदेश और देश के अन्य इलाकों में एक असर हुआ है भाजपा अचानक कारपोरेट घरानों, धर्म के सिंडीकेट चलाने वालों, बाहुबलियों ,बमबाजों की पार्टी बन गयी। अपराधियों और कारपोरेट धर्मगुरूओं की बड़ी -बड़ी टोलियां संघ परिवार के विभिन्न संगठनों में घुस आयीं और संघ परिवार और उसकी राजनीति का उसने चरित्र ही बदल दिया।
    राममंदिर आंदोलन के पहले भाजपा का जनाधार छोटे दुकानदार,व्यापारी और मध्यवर्ग के दब्बू और सभ्य किस्म के लोग हुआ करते थे,लेकिन राममंदिर आंदोलन ने भाजपा और संघ परिवार के संगठनों के इस सामाजिक चरित्र को गुणात्मक तौर पर बदल दिया। अब भाजपा बाहुबलियों और आक्रामक लोगों की पार्टी बन गयी। पहले भाजपा और संघ के लोग छिपकर दंगे करते थे। लेकिन इस आंदोलन के बाद दंगा करना, समूह बनाकर हमले करना,आम बातचीत में हिंसक और घृणा की भाषा बोलना। खासकर मुसलमानों के खिलाफ संघ परिवार ने अहर्निश हिंसाचार का रूख अख्तियार कर लिया। मुसलमानों के खिलाफ वाचिक हिंसा के जरिए माहौल बनाया और उन पर शारीरिक हमले किए।
    राममंदिर आंदोलन के पहले भाजपा और संघ परिवार की जो राजनीतिक इमेज थी वही इमेज इस आंदोलन के बाद नहीं रही। राममंदिर आंदोलन के पहले भाजपा ने भय की भाषा का इस्तेमाल न्यूनतम किया था लेकिन राममंदिर आंदोलन के बाद भय और आतंक की भाषा ने भाजपा के नेताओं और समूचे संगठन पर कब्जा जमा लिया।
     संघ  परिवार की ‘जी’ लगाकर बोलने की शैली खत्म हो गयी और अब संघ के नेता लगातार आक्रामक भाषा, माफिया सरदारों की भाषा बोलने लगे। इनका नया बाहुबली नारा था ‘जयश्रीराम’। ‘जयश्रीराम’ के नारे और राममंदिर आंदोलन के बहाने संघ परिवार ने अपना कायाकल्प किया। अपने को उग्र मुस्लिम विरोधी बनाया। इतिहास को विकृत किया। कानून की अवमानना की। लोकतंत्र का अपमान किया। लोकतंत्र के अपमान की भाषा को राजनीति और मीडिया की आमभाषा बना दिया।
   आरएसएस प्रधान मोहन भागवत का ताजा बयान नए खतरे के संकेतों से भरा है। उन्होंने कहा है कि वे  उपलब्ध कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करेंगे। आश्चर्य की बात है कि संघ परिवार का अभी तक यही मानना रहा है कि वे मंदिर के मसले पर अदालत की राय नहीं मानेंगे। वे सिर्फ वही फैसला मानेंगे जो उनके पक्ष में आएगा। सवाल यह है कि कानून के प्रति यह नजरिया क्या सभ्यता का प्रतीक है ?    
  




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