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शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

भारतीय सभ्यता का परमानंद है दुर्गापूजा

        आज दुर्गा अष्टमी है और पश्चिम बंगाल का माहौल एकदम भिन्न है। समूचा प्रांत दुर्गा में डूबा है। जगह-जगह मंडपों में लाखों लोगों की भीड़ लगी है। लोगों की उत्सवधर्मिता का आलम यह है कि कल शाम को अचानक तेज बारिश हो गयी तो कुछ देर के लिए लगा कि अब लोग नहीं निकलेंगे। लेकिन बारिश थमते ही लोगों की भीड़ का रेला सारे पंडालों में उमड़ पड़ा।
      दुर्गा के नाम पर जनोन्माद और जनोत्सव विलक्षण चीज है। दुर्गापूजा की इस जनधर्मिता पर लोग तरह-तरह से आनंद मना रहे हैं। पूजामंडपों को शानदार तरीकों से सजाया गया है। मंडपों के आसपास बाजार-दुकानें-स्टॉल आदि भी हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं राजनीतिक दलों के साहित्य की दुकानें इनसे लोग किताबें बगैरह भी खरीद रहे हैं। तकरीबन प्रत्येक मंडप के आसपास मार्क्सवादी साहित्य की बिक्री की दुकानें लगी हैं। विभिन्न दलों के स्टॉल भी हैं जिनमें इन दलों के नेता स्थानीय जनता के साथ संपर्क-संबंध बनाने का काम कर रहे हैं। इस आयोजन में कम्युनिस्टों से लेकर कांग्रेसियों की शिरकत सहज देखी जा सकती है। जो लोग कहते हैं कि कम्युनिस्ट धर्म नहीं मानते उनकी धारणा को बंगाल के कम्युनिस्टों की इस महापर्व में सक्रिय हिस्सेदारी खंडित करती है। 
       दुर्गापूजा की सांस्कृतिक विविधता,तरह-तरह के रंगारंग कार्यक्रम और देर रात तक चलने वाली सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं बेहद रोचक और जनशिरकत पर आधारित होती हैं और वे मुझे बेहद आकर्षित करती हैं। इस तरह की प्रतियोगिताएं प्रत्येक मंडप के पास हो रही हैं। इनमें घरेलू स्त्रियों से लेकर युवा और बूढ़ों तक की भागीदारी आनंद में कई गुना वृद्धि करती है।
   एक तरह से देखें तो दुर्गापूजा जनोत्सव है। इसमें राज्य का प्रत्येक परिवार आर्थिक चंदा देता है। कोई भी ऐसा परिवार नहीं है जो पूजामंडप सजाने के लिए चंदा न देता हो। कईबार चंदा देने न देने पर पंगा भी हो जाता है। लेकिन कमोबेश सभी चंदा देते हैं। भारत में कहीं पर भी दुर्गापूजा या अन्य किसी देवता की पूजा के लिए समूचे राज्य की जनता से चंदा एकत्रित नहीं किया जाता। घर-घर जाकर चंदा एकत्रित नहीं किया जाता।   
      दुर्गापूजा का चंदा महज चंदा नहीं होता बल्कि यह प्रतीकात्मक तौर पर जनशिरकत है। हिस्सेदारी है,पूजा की सामाजिक-आर्थिक जिम्मेदारी में हाथ बटाना है। दुर्गापूजा जितनी धर्म और संस्कृति के लिए महत्वपूर्ण है वैसे ही बाजार के लिए भी महत्वपूर्ण और निर्णायक है। दुर्गापूजा के मौके पर की गयी खरीददारी पर पश्चिम बंगाल का समूचा बाजार टिका है। अरबों-खरबों रूपयों की आम जनता खरीददारी करती है। किसी भी दुकान में कुछ भी नहीं बचता। सभी दुकानों का अधिकांश सामान बिक जाता है। गरीब से लेकर अमीर तक पूजा के मौके पर बाजार में खरीददारी के लिए जरूर जाते हैं। इस अर्थ में दुर्गापूजा संस्कृति,सभ्यता और बाजार का परमानंद है।
    दुर्गापूजा में आम लोगों में जिस तरह का उत्सवधर्मीभाव रहता है वह हमारे लिए महत्वपूर्ण है। इस मौके पर अधिकांश लोग कुछ दिन के लिए सारे दुख भूलकर आनंद मनाते हैं और यही इस उत्सव की सबसे विलक्षण चीज है। पूजा के चार-पांच दिन यहां पूजा,आनंद और प्रेम के अलावा और किसी विषय पर बात नहीं कर सकते। सबकी पूजा और सिर्फ पूजा में दिलचल्पी होती है।
     विभिन्न बांग्ला चैनलों में इस अवसर पर सारे दिन चलने वाले कार्यक्रमों से लेकर पंड़ालों से लाइव प्रसारण तक की व्यवस्था की गई है। अखबारों के द्वारा परिशिष्ट निकाले जाते हैं और विज्ञापन उद्योग को इस मौके पर सबसे मोटा फायदा होता है। आम लोगों को आनंद और उद्योग जगत के लिए मोटा मुनाफा मिलता है।  
     यह ऐसा अवसर है जिस पर आपको लगेगा कि पश्चिम बंगाल एक राजनीतिक चेतना सम्पन्न राज्य नहीं है बल्कि संस्कृति सम्पन्न राज्य है। संस्कृति का जितना बड़ा उल्लास इस मौके पर दिखाई देता है वैसा और किसी मौके पर और भारत में कहीं पर भी दिखाई नहीं देता। मसलन आज अधिकतर लोग नए कपड़े पहनेंगे। पूजामंडप में जाएंगे। सुंदर-सुंदर खाना खाएंगे। घरों में इस मौके पर खास किस्म के खान-पान की व्यवस्था रहती है। आम लोगों के पास खाना,सुंदर सजना,पूजा की रोशनी देखना और आनंद की चर्चा करने के अलावा और कोई काम नहीं होता।
     मुझे लगता है दुर्गापूजा का एक और बड़ा महत्व यह है कि इसने मानवीय जीवन में आनंद और प्रेम की प्रतिष्ठा की है। खासकर युवाओं के लिए तो यह मिलनोत्सव है। जाति,धर्म,गोत्र आदि की सभी किस्म की दीवारों को दुर्गापूजा एक ही झटके में गिरा देती है।
     इस मौके पर साम्प्रदायिक सौहार्द देखने लायक होता है। एक जगह दुर्गापूजा के मौके पर एक मुसलमान को दुर्गापूजा की जिम्मेदारी सौंप दी गयी है। इस मुस्लिम दुर्गापूजक का नाम है शाहिद अली। कोलकाता के मुस्लिम बहुल इलाके खिदिरपुर में मुंशीगंज नामक मुहल्ले में ये जनाब रहते हैं और इनको दुर्गापूजा के अर्चक का दायित्व दिया गया है और इन्होंने इसे खुशी-खुशी स्वीकार भी किया है।
    शाहिदभाई विगत सात सालों से दुर्गापूजा के अर्चक की दिम्मेदारी निभा रहे हैं। वे जिस क्लब के मंडप में अर्चक की भूमिका निभा रहे हैं वह है ‘स्टार क्लब’। यह 71 साल पुरानी दुर्गापूजा है जिसे मुसलमान आयोजित करते हैं। मजेदार बात यह है शाहिद भाई षष्ठी से नवमी तक चारों दिन दुर्गापूजा के मौके पर व्रत रखते हैं। साथ ही हिन्दू मंत्रों और हिन्दूशास्त्र के आधार पर पूजा करते-कराते हैं। ऐसा नहीं है शाहिद भाई ने धर्म परिवर्तन कर लिया है। वे मुसलमान हैं और 30 दिन नियमित रोजे भी रखते हैं।     


रविवार, 19 सितंबर 2010

साझा संस्कृति से नफरत है संघ परिवार को


       'साझा संस्कृति' का एक प्रमुख तत्व है- 'हिंदू-मुस्लिम सद्भाव' तथा संस्कृति में हिंदू-मुस्लिम संस्कृतियों का एक-दूसरे में घुल-मिल जाना और इसी आत्मसातीकरण की दुहरी प्रक्रिया में भारतीय संस्कृति की आत्मा का निर्माण हुआ है। 'साझा संस्कृति' की अवधारणा का यह केंद्रीय बिंदु है। 'साझा संस्कृति' का मतलब 'हिंदू-मुस्लिम एकता' भर नहीं है बल्कि इसे बृहत्तर अर्थों में ग्रहण किया जाना चाहिए। भारतीय ज्ञान-विज्ञान, रहन-सहन, खान-पान, ललितकलाएं आदि सभी में 'साझा संस्कृति' की परंपरा घुली-मिली है। सांप्रदायिक विचारधारा साझा संस्कृति का मुखर विरोध करती है, इसके पीछे मूल मकसद है भारतीय संस्कृति की आत्मा की ही हत्या कर देना।

भारतीय संस्कृति में से मुस्लिम अवदान या इस्लाम के अवदान को निकाल देने का मतलब है देश को सांस्कृतिक रूप से खत्म कर देना। आधुनिक दौर में फासिज्म ही एक मात्र ऐसी वियारधारा है जो संस्कृति को खत्म करती है, बर्बरता को स्थापित करती है। यूरोप में फासिस्ट विचारधारा को जैसा आधार एवं अवसर संस्कृति पर प्रत्यक्ष हमला करने का मिला था, अगर वैसा अवसर हमारे यहां सांप्रदायिकता को मिल जाए तो वह उसी भूमिका को अदा करेगी।

बाबरी मस्जिद प्रकरण के दौरान मुस्लिम विरोधी उन्माद को सबने देखा है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सांप्रदायिक शक्तियों का चुनाव जीतकर सत्तारूढ़ हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है। हिटलर भी लोकतंत्र के वोटों से ही आया था। मूल बात है सांप्रदायिक विचारधारा, यह विचारधारा फासिज्म का भारतीय प्रतिरूप है। इसे सांप्रदायिक दंगों, सांप्रदायिक दलों मात्र में सीमित करके नहीं देखना चाहिए बल्कि बृहत्तर विचारधारात्मक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जाना चाहिए।

सांप्रदायिक विचारधारा ने पिछले कुछ वर्षों में अपना जनता से सीधे संवाद बनाया है। जबकि, धर्मनिरपेक्ष विचारधारा अभी जनता में पूरी तरह पहुंची नहीं है। साझा संस्कृति के खंडित हो जाने की जो लोग बात करते हैं, वे संस्कृति को बहुत सीमित अर्थों में ग्रहण करते हैं, जबकि साझा संस्कृति हमारी सांस्कृतिक आत्मा में समा चुकी है। उसे आसानी से नष्ट करना बेहद मुश्किल है। साझा संस्कृति पर हमले की बृहत्तर योजना के तहत ही मुसलमानों को देश से बाहर चले जाने की बात उठाई गई है। इस्लाम धर्म एवं मुसलमानों के अवदान को नकारा जा रहा है। अभी इस अवदान को नकारा जा रहा है। कालांतर में सांप्रदायिक विचारधारा देश में सत्तारूढ़ होने में सफल हो जाए तो वह उन सभी बहुमूल्य तत्वों को चुन-चुनकर नष्ट भी करेगी, जिनका किसी भी रूप में इस्लाम या मुसलमान से कोई नाता रहा हो। क्या हम साझा संस्कृति में से उन तत्वों को निकाल सकते हैं जिनके निर्माण में मुसलमानों एवं इस्लाम धर्म की निर्णायक एवं आविष्कारक की भूमिका रही है। उन आविष्कारों को देश की विरासत से निकालने का मतलब होगा, बर्बरता के युग में लौटना दूसरी बात यह कि क्या साझा संस्कृति के तत्व पूरी तरह खंडित हो गए हैं, या नकारा हो गए हैं ?

साझा संस्कृति के अनेक महत्वपूर्ण तत्व आज भी जिंदा हैं और जब तक सभ्यता रहेगी तब तक जिंदा रहेंगे। ये तत्व साझा संस्कृति की धुरी हैं। वे तत्व क्या हैं-

1. सूफी संत परंपरा एवं सूफी साहित्य हमारी साहित्यिक परंपरा का अभिन्न अंग हैं। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती से लेकर मलिक मुहम्मद जायसी तक सभी सूफी संतों एवं कवियों की भारतीय संस्कृति में जुडे हैं और वे घुल-मिल गए हैं। सूफी संतों-कवियों का प्रेममार्गी साहित्य हमारी साझा संस्कृति का स्फटिक है।

2. हिंदी साहित्य का पहला कवि अमीर खुसरो हमारा साहित्यिक पूर्वज है और साझा संस्कृति का जनक भी। अमीर खुसरो को बहिष्कृत कर देंगे तो हम साहित्यिक अनाथ हो जाएंगे ? हिंदी साहित्य के लिए अमीर खुसरो वैसे ही आवश्यक है जैसे कि मनुष्य के लिए वायु।

3. साझा संस्कृति में शामिल इस्लाम एवं मुस्लिम अवदान को खारिज कर देंगे तो हमारे पास बचेगा क्या? यह सच है कि भारत में कागज एवं बारूद के आविष्कारक मुसलमान थे, आज ये दोनों ही वस्तुएं देश की सुरक्षा एवं ज्ञान के लिए आवश्यक हैं। क्या साझा संस्कृति की सर्जना से कागज एवं बारूद को बहिष्कृत किया जा सकता है? क्या आधुनिक जीवन में यह संभव है?

4. मुसलमानों ने ही मीनाकारी एवं बीदरी का काम शुरू किया। धातुओं पर कलई करके चमक लाने के आविष्कारक वही थे। यह कला ईरान से भारत आई। मुगल राजकुमारों ने ही कपड़े पर कढ़ाई एवं जरी की असंख्य डिजाइनों का आविष्कार किया। इत्रों की खोज की। आज हम सबके जीवन में ये चीजें घुल-मिल गई हैं।

5. साझा संस्कृति के जनक अमीर खुसरो ने ही कव्वाली, तराना का श्रीगणेश किया था। जिलुफ, सरपदा, साजगीरी जैसे रागों को जन्म दिया। अमीर खुसरो ने नायक गोपाल के साथ मिलकर ही सितार एवं तबला का आविष्कार किया। क्या सितार और तबला को बहिष्कृत कर सकते हैं?

6. साझा संस्कृति हिंदू-मुसलमान का शारीरिक सहमेल एवं एकता का मोर्चा मात्र नहीं है बल्कि इससे बढ़कर है। वह एक विचारधारात्मक शक्ति है। हिंदू-मुस्लिम संस्कृति के सहमिलन के कारण ही अनेक अरबी एवं फारसी राग भारतीय संस्कृति में घुल-मिल गए हैं। वे साझा संस्कृति के ही अंग हैं। इनमें कुछ हैं-जिलुक, नौरोज, जांगुला, इराक, यमन, हुसैनी, जिला दरबारी, होज, खमाज ये सभी जनता एवं राजा दोनों में ही लोकप्रिय रहे हैं। भारतीय संगीत की ध्रुपद परंपरा मरणोन्मुखथी पर मुगल दरबारों के संरक्षण के कारण ही बच पाई जिसे कालांतर में तानसेन ने चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया।

7. जौनपुर के सुल्तान हुसैन ने प्रसिद्ध राग हुसैनी, कान्हडा और तोड़ी का आविष्कार किया था। उसके दरबार में हिंदू और मुसलमान दोनों समुदाय के विद्वान थे जिनमें-नायक बख्श, बैजू (बावरा), पांडवी, लोहुंग, जुजूं, ढेंढी और डालू के नाम प्रमुख हैं। अकबर के नवरत्नों में तानसेन सर्वोपरि था।

8. जहांगीर के दरबार में चतरखा, पार्विजाद, जहांगीर दाद, खुर्रम दाद, मक्कू, हमजान और विलास खां (तानसेन का बेटा) प्रमुख थे, जिनका संगीत की साझा परंपरा बनाने में बड़ा योगदान है।

9. मोहम्मद शाह रंगीला ने नादिरशाह के आक्रमण के बावजूद अदारंग, सदारंगा और शोरी आदि के जरिए संगीत की परंपरा को सुरक्षित रखा जिसमें सदारंगा ने ख्याल का आविष्कार किया। हालांकि इसके साथ हुसैन शाह सरकी को भी जोड़ा जाता है। शोरी ने पंजाबी टप्पा को दरबारी राग में रूपांतरित किया। इन सबके अलावा रेख्ता, कौल, तराना, तख्त गजल, कलबना, मर्सिया और सोज के भी गायक थे। वजीर खां बीनकार, प्यारेशाह ध्रुपदिया, मुस्तफा खां ख्याली, फिदा हुसैन सरोदिया, मुहम्मद अली खां रूबाइया को क्या हम साझा संस्कृति से काट सकते हैं? इससे भी बड़ी बात यह कि क्या संस्कृति में संगीत आता है या नहीं? यदि हां तो फिर संगीत परंपरा की उपेक्षा क्यों? क्या यह हमारे संकीर्ण नजरिए का द्योतक नहीं हैं?

10. मुस्लिम संगीतकारों ने कुछ प्रमुख वाद्य यंत्रों का भी आविष्कार किया था। जिनमें कुछ हैं-सारंगी, दिलरूबा, तौस, सितार, रूबाब, सुरबीन, सुर सिंगार, तबला और अलगोजा। मुसलमानों की मदद से ही शहनाई, उन्स (रोशन चौकी) और नौबत (नगाड़ा) का आविष्कार हुआ था। तारों को झंकृत करने वाली मिजराब, मुस्लिम खोज का ही परिणाम है। क्या संगीत की इतनी लंबी परंपरा एवं अवदान को भारतीय संस्कृति और साझा संस्कृति से निकालकर हम अपने समाज को बर्बरता के युग में नहीं ले जाएंगे? संगीत हमारी साझा संस्कृति का बहुमूल्य रत्न है, वह हमारे दिलों को जोड़ता है हमें और ज्यादा मानवीय बनाता है। संगीत की परंपरा में हिंदू मुसलमान का और मुसलमान हिंदू का शिष्य बनता रहा है और दोनों अपने गुरू को देवता की तरह मान्यता देते रहे हैं।

11. 'साझा संस्कृति' का यह दायरा संगीत तक ही नहीं है बल्कि चित्रकला एवं स्थापत्य इसके प्रमुख रूप हैं। सांप्रदायिक विचारधारा ने बाबरी मस्जिद प्रकरण के संदर्भ में साझा संस्कृति की धरोहर ऐतिहासिक पुरातात्विक निधि को ही अपना निशाना बनाया है और इसी तरह की 3,000 मस्जिदें हैं जिनको गिराकर वे मंदिर बनाना चाहते हैं। यूरोप में फासिज्म ने सत्ता पर काबिज होने के बाद संस्कृति को नष्ट किया था। सांप्रदायिक शक्तियां जनता के नाम पर नीचे से दबाव डालकर ऐसा कर रही हैं। यह अचानक नहीं है कि वे मुगलकालीन स्थापत्य को नष्ट करना चाहती हैं बल्कि यह सोची-समझी योजना का हिस्सा है। इस बार स्थापत्य है, अगली बार समूची संस्कृति होगी। अत: इस रणनीति को विफल करना साझा संस्कृति के पक्षधरों की सबसे बड़ी जरूरत है।

12. साझा संस्कृति के एक अन्य तत्व चित्रकला को हम लोग अभी भी भूले नहीं है। चित्रकला में मुगलशैली का अवदान बेमिसाल है और गर्व की वस्तु है। मुगलदरबारों में यह अमूमन होता था कि अगर मुस्लिम चित्रकार ने खाका बनाया है तो हिंदू चित्रकार ने रंग भरे हैं। अकबरनामा में आदम खां के प्राणदंड वाले चित्र का खाका मिस्कीं ने खींचा, पर रंग शंकर ने भरे थे। एक दूसरे चित्र का खाका मिस्कीं ने खींचा रंग सरवन ने भरे, चेहरानामी तीसरे चित्रकार ने किया और सूरतें माधो ने बनाईं।
     मुगल शैली का भारतीय चित्रकला पर प्रभुत्व ढाई सौ साल रहा। इस बीच हजारों चित्र बने। दरबारों में सैकड़ों चित्रकारों को संरक्षण मिलता था। स्वयं अबुल फजल ने सौ चित्रकारों का उल्लेख किया है जिनमें सत्रह प्रधान चित्रकार थे, जिनके चित्रों पर हस्ताक्षर मिलते हैं। 1600 ई. में तैयार की गई हस्तलिपि वाकियाते बाबरी में 22 चित्रकारों के हस्ताक्षर हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें हिंदू चित्रकार अधिक हैं। अबुल फजल ने जिन 17 कलाकार-चित्रकारों का जिक्र किया है, उनमें मात्र चार मुसलमान हैं और तेरह हिंदू हैं। इसी तरह रज्मनामा के हस्ताक्षरों में 21 नाम हिंदुओं के हैं, सात मुसलमानों के हैं। मुगलशैली का राजपूत शैली एवं दकनी शैली पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। क्या आज हम मुगल शैली के प्रभाव को साझा संस्कृति से बहिष्कृत कर सकते हैं? क्या चित्रकला की परंपरा इस अवदान को भूल सकती है? चित्रकला को मुगल शैली की बहुत बड़ी संपदा ब्रिटिश साम्राज्यवादी लूटकर ले गए, पर कला इतिहास की पुस्तकों में इस परंपरा का विस्तृत वर्णन मिलता है। बेहतर होता कि भारत के शासक वह कलाकृतियां किसी भी रूप में वापस लाने का प्रयास करते।

13. मुगलों के अवदान के कारण ही भारतीय पहनावे में भारी परिवर्तन आया। यहां तक कि शिवाजी और महाराणा प्रताप तक भव्य मुगल पोशाकें पहनते थे। भारतीय पोशाक अचकन और पजामा मुगलों की देन है। तुर्क, पठान और मुगलों द्वारा प्रचलित जुराब और मोजा, जोरा और जाया, कुर्त्ता और कमीज,ऐचा, चोगा और मिर्जई भारतीय वस्त्र परंपरा का अभिन्न अंग है।

14. भारतीय जीवन शैली में हिंदू वधू को मुसलमानों का सबसे महत्वपूर्ण उपहार है नथ। आज नथ हिंदू औरत की सुंदरता का प्रतीक है। इसके आविष्कारक मुसलमान ही थे। मुगलों ने ही हिंदू दूल्हें के सिर पर सेहरा और मौर बांधा। सबसे अद्भूत बात है 'रोटी' का भारतीय शब्द-भंडार में समा जाना, 'रोटी' (फुलका या चपाती) शब्द तुर्की शब्द 'रोती' का सहजिया है। जिस पर रोटी सेंकते हैं वह होता है 'तवा' यह भी मुगलों की ही देन है। क्या ये सब 'साझा संस्कृति' में आज भी बरकरार नहीं हैं? तब 'कंपोजिट कल्चर' के खत्म हो जाने की बात बेबुनियाद है। वह कंपोजिट कल्चर खत्म हुई है जिसे बुर्जुआजी नेताओं एवं नेहरू ने विशेष रूप से उछाला था और यह बुर्जुआजी की तात्कालिक रणनीति से उपजी इकहरी धारणा थी।

15. उर्दू साहित्य की परंपरा एवं अवदान को सभी जानते हैं जिसे मैं दोहराना नहीं चाहता। सांप्रदायिक विचारधारा का साझा संस्कृति पर किया गया वैचारिक हमला वस्तुत: हमें संस्कृतिहीन एवं अमानवीय दिशा में ले जाने की एक कोशिश भर है। इस बार हमला स्थापत्य पर है, सन् 1977-78 के वर्षों में इतिहास की पुस्तकों पर था। विशेषकर उन पुस्तकों पर जो सांप्रदायिक इतिहास लेखन के बजाय वैज्ञानिक इतिहास ले¹न पर बल देती थीं। साझा संस्कृति को अगर कोई खतरा है तो सांप्रदायिक विचारधारा और राज्य की निष्क्रिय-कमजोर धर्मनिरपेक्षता से जिसका सांप्रदायिक संगठन लाभ उठा रहे हैं।
  बुर्जुआ विचारकों एवं दलों ने साझा संस्कृति पर होने वाले हमलों को कानून एवं व्यवस्था का मसला बना दिया है, वह इस हमले की विचारधारा से टकराना नहीं चाहते और न ही साझा संस्कृति का संवर्धन करना चाहते हैं क्योंकि बुर्जुआ मूलरूप से संस्कृति का शत्रु होता है और मासकल्चर का संवर्द्धक होता है। क्लासिक रचनाओं और उस युग के अवदान को वह नापसंद करता है। उनसे घृणा करता है, इसलिए वह कभी भी साझा संस्कृति का रक्षक भी नहीं हो सकता। विभिन्न कलारूपों एवं उर्दू भाषा के प्रति उसका विद्वेषभाव जग जाहिर है। अत: नेहरू की तर्ज पर साझा संस्कृति न तो समझी जा सकती है, न उसका संवर्धन संभव है। साझा संस्कृति की शक्ति, सीमा एवं संभावनाएं मार्क्सीय दृष्टि से ही समझी जा सकती हैं।

राम मंदिर आंदोलन से साझा संस्कृति कमजोर हुई

           संघ परिवार ने जो राम मंदिर आंदोलन आरंभ किया था उससे धर्मनिपेक्षता कमजोर हुई तथा 'साझा संस्कृति' को गंभीर झटके भी लगे हैं। 'साझी विरासत' एवं 'साझा संस्कृति' को पिछले दशक में जितनी गंभीर चुनौती सांप्रदायिक विचारधारा ने दी है वह अब तक के इतिहास में बेमिसाल है। इसके कारण कुछ चिंतकों ने यह निष्कर्ष भी निकाल लिया कि 'कंपोजिट कल्चर' की अवधारणा खंडित हो गई है। और वस्तुत: यह अवधारणा ही गलत थी। 'कंपोजिट कल्चर' का खंडित होने का मतलब है, 'अनेकता में एकता की धारणा का खंडित होना क्योंकि 'अनेकता' अपनी पहचान के लिए छटपटा रही है, और 'एकता' से बाहर झांक रही है।
   इसी प्रसंग में एक अन्य नजरिया सांप्रदायिक शक्तियों का भी है वे 'साझा संस्कृति' की अवधारणा को 'अल्पसंख्यक तुष्टीकरण' का मूलमंत्र मानते हैं और बड़े ही जोर-शोर से इसी आधार से 'साझा संस्कृति' का विरोध भी कर रहे हैं। मूलत: ये दोनों दृष्टियां 'साझा संस्कृति' को खंडित मानती हैं, अगर कुछ बचा है तो इसके अलावा सबकुछ! बाबरी मस्जिद प्रकरण के दौरान मुस्लिम-हिंदू सांप्रदायिक विचारधारा ने अपने-अपने तरीके से साझा संस्कृति को नकारा एवं खंडित किया है पर क्या हम साझा संस्कृति की अवधारणा को बुर्जुआ संरचना एवं दृष्टिकोण से विश्लेषित करके सही नतीजे निकाल सकते हैं? मेरा मानना है, नहीं।
हमारे देश की साझा संस्कृति किसी एक नेता या संगठन के दिमाग का फितूर नहीं है और न ही यह इतनी कमजोर है कि उसे इतनी आसानी से तोड़ा जा सके। वह कोई धागा तो नहीं है कि जब मन आया तोड़ दिया। साझा संस्कृति को सांप्रदायिक विचारधारा से निश्चित रूप से तरा पैदा हुआ है पर इस तरे को न तो अतिरंजित करने की जरूरत है और न ही कम करने या नजरअंदाज करने की जरूरत है। साझा संस्कृति की अवधारणा का एक ऐतिहासिक प्रक्रिया एवं ऐतिहासिक अनिवार्यता के गर्भ से जन्म हुआ था ब्रिटिश शासकों के विरोध में साझा मोर्चा बने, हिंदू और मुस्लिम मिलकर लड़ें, यह राजनीतिक दबाव था जिसके कारण साझा संस्कृति पर बुर्जुआजी ने सबसे ज्यादा उस दौर में बल दिया था, इसका तात्कालिक लाभ भी हुआ था। पर बुर्जुआजी ने कंपोजिट कल्चर को सिर्फ राजनीति के सीमित अर्थ में, वह भी राजनीतिक समर्थन जुटाने भर के लिए इसका इस्तेमाल किया। इसके कारण राजनीतिक लामबंदी में कुछ समय के लिए तो सुविधा हुई पर बाकी प्रक्रिया को अधूरा छोड़ दिया। मसलन, संस्कृति के क्षेत्र में साझा संस्कृति के उन्नयन के लिए जो संघर्ष किया जाना था वह नहीं किया गया। साथ ही, उसे राजनीतिक संघर्ष से नहीं जोड़ा। राजनीति अलग और संस्कृति अलग और इन दोनों के संघर्ष भी अलग-अलग। बुर्जुआजी ने साझा संस्कृति का नारा उछालकर सन् 1919 में
राजनीतिक संघर्ष को तो चरम पर पहुंचा दिया था पर उस समय संस्कृति के क्षेत्र में संघर्ष सबसे कमजोर शक्ल में था। अगर राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संघर्ष को अभिन्न अंग से चलाया गया होता तो यह स्थिति न होती। अगर राजनीतिक संघर्ष शक्तिशाली हो तथा चरम पर हो, सांस्कृतिक संघर्ष से द्वंद्वात्मक रिश्ता हो तो सांस्कृतिक क्षेत्र में जो पिछड़ी सामाजिक शक्तियां हैं, उन्हें संघर्ष में शामिल करने,   उनका सांस्कृतिक संस्कार बदलने में आसानी होती है पर स्वाधीनता संग्राम में ऐसा नहीं हो पाया। राजनीतिक संघर्ष तेज होते चले गए और संस्कृति के क्षेत्र का पिछड़ापन कायम रहा। पिछड़ी हुई सामाजिक शक्तियां लोकप्रिय जनता को इस प्रक्रिया में अपनी विचारधारा से प्रभावित करने में सफल रहीं और संस्कृति के क्षेत्र में उन्होंने वर्र्चस्व हासिल कर लिया।
राष्ट्रवादी बुर्जुआ नेतृत्व ने साझा संस्कृति के नाम पर सांस्कृतिक पुनर्जागरण की कोई कोशिश ही नहीं की। यहां प्रश्न उठता है कि उसने ऐसा क्यों किया? इसका प्रधान कारण यह था कि राष्ट्रवादी बुर्जुआ नेतृत्व सामाजिक सुधार एवं सांस्कृतिक जनजागरण को राजनीतिक संघर्ष में बाधक मानता था। वे डरे हुए थे कि उपनिवेश विरोधी राजनीतिक संघर्ष इससे कहीं विघटित न हो जाए। दूसरी बात यह थी कि कंपोटिज कल्चर की बात कहकर वे भीड़ तो जुटाना चाहते थे पर उसके सांस्कृतिक पक्ष को छूना नहीं चाहते थे। इसका परिणाम यह निकला कि सांस्कृतिक संघर्ष ने धार्मिक आधारों पर अपनी दिशा ग्रहण कर ली। स्वाधीनता संघर्ष के दौरान राजनीतिक संघर्ष का जिम्मा जिस दल के पास था, उसके पास सांस्कृतिक संघर्ष का जिम्मा नहीं था। राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संघर्ष करने वाले संगठन अलग-अलग थे। कालांतर में सुधारवादी संगठनों के सांस्कृतिक संघर्षों ने धार्मिक आवरण धारण कर लिया और सांप्रदायिक विचारधारा के लिए सबसे बड़ी ऊर्जा का काम किया। इसके कारण साझा संस्कृति कमजोरी हुई और कमजोर धर्मनिरपेक्षता पैदा हुई। यह इतनी कमजोर थी कि संस्कृति के आवरण में छिपी सांप्रदायिकता की जरा-सी आक्रामक मुद्रा भी उसे झुकने के लिए मजबूर कर देती थी।
'साझा संस्कृति' की विरासत भारतीय समाज में बड़ी पुरानी है। पर विरासत को ओढ़ा नहीं जाता। इससे विरासत जिंदा नहीं रहती। बुर्जुआजी ने इस विरासत को ओढ़ लिया था और सीमित हद तक 'राजनीतिक लामबंदी' के लिए इसका प्रयोग किया था। इससे न तो साझा संस्कृति समृद्ध हुई और न ही धर्मनिरपेक्षता मजबूत हुई बल्कि संस्कृति एवं राजनीति के बीच में विभेदक रेखा खींचने के कारण सांप्रदायिकता को लाभ हुआ। यह कार्य बुर्जुआजी ने किया था क्योंकि वस्तुत: वह संस्कृति मात्र का शत्रु होता है, चाहे वह ब्रिटिश बुर्जुआ हो या भारतीय राष्ट्रवादी बुर्जुआ दोनों ने अलग-अलग ढंग से एक ही काम अंजाम दिया। आज 'साझा संस्कृति' अगर बची हुई है तो जनता की संघर्ष भावना के कारण।
  






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