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शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

फांसी के उन्माद और भ्रष्टाचार में फंसी मनमोहन सरकार


        
  कमजोर का लक्षण है कि वह मीडिया उन्माद से डरता है। यह आभास दिया जा रहा है कि मनमोहन सरकार राजनीतिक तौर पर सबसे कमजोर सरकार है। वह मीडिया के दबाब में फांसी दे रहे है। मीडिया में जब भी किसी मसले को लेकर हो-हल्ला आरंभ होता है ,सरकार ऐसा आभास देती है कि वह मीडिया की सुन रही है। असल में भ्रष्टाचार के आरोपों पर केन्द्र सरकार मीडिया का सामना करने से कतराती रही उसने है और मीडिया के दबाब में हमेशा काम करती रही है। भ्रष्टाचार के मामलों में अपने विवेक से बहुत कम एक्शन लिए हैं।  
     हाल ही में विचारधीन फांसी के कैदियों की मर्सी पिटीशनों पर सरकार ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई है वैसी सक्रियता पहले कभी नहीं दिखाई।
   उल्लेखनीय है दामिनी बलात्कार कांड के प्रतिवाद में जब जुलूस निकल रहे थे और देश में चारों ओर प्रतिवाद हो रहा था उस समय एक ही नारा सभी दिशाओं से मीडिया से गूंज रहा था बलात्कारी को फांसी दो। लगता है इस नारे को केन्द्र सरकार ने अपनी नई न्यायनीति का एक्शन प्लान बना लिया है।
     राष्ट्रपति पद संभालने के बाद प्रणव मुखर्जी की सक्रियता देखने लायक है। केन्द्र सरकार की फांसी की सजा को लागू करने की अतिसक्रियता किसी भी तर्क से स्वीकार्य नहीं है। आज के दौर में अधिकतर देशों में फांसी की सजा खत्म करने की ओर न्यायप्रणाली जा रही है। यहां तक कि दामिनी बलात्कार कांड के बाद बने वर्मा आयोग ने भी बलात्कारी को फांसी की सजा दिए जाने की सिफारिश नहीं की थी। उसने यह रेखांकित किया कि न्याय करते समय या कानून बनाते समय मीडिया के दबाब से बचना चाहिए।
कहा जा रहा है आतंकी कसाब और अफजल गुरू को फांसी दिए जाने के बाद से देश में जिस तरह का माहौल बना है उसने राष्ट्रपति को जल्दी-जल्दी फांसी के मर्सी पिटीशन सिलटाने को प्रेरित किया है। लेकिन आंकड़े इसकी पुष्टि नहीं करते।
    आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2001 से 2011 के बीच में 1455लोगों को फांसी की सजा दी गयी और 4321लोगों की फांसी माफ करके उसे आजन्म कैद में बदला गया । इस अवधि में यूपी में 370 को फांसी दी गयी,बिहार में132,महाराष्ट्र 125, कर्नाटक 95,तमिलनाडु 95,पश्चिम बंगाल 79,दिल्ली 71,गुजरात 57,राजस्थान 38,केरल 34,उड़ीसा 33,हरियाणा31, असम 21,जम्मू-कश्मीर 20,पंजाब 19,छत्तीसगढ़ 18,उत्तराखण्ड 16,आंध्रप्रदेश 8, मेघालय 6,चंडीगढ़,दमन एवं दीउ में प्रत्येक में 4-4,हिमाचल प्रदेश3,मणिपुर 3, त्रिपुरा 2,पांडिचेरी 2 और गोवा में 1 अभियुक्त को फांसी की सजा दी गयी।
हाल ही में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कर्नाटक-तमिलनाडु में सक्रिय चंदन माफिया वीरप्पन के 4 साथियों की मर्सी पिटीशन खारिज कर दी है।अब जल्दी ही उनको भी फांसी देदी जाएगी। इनलोगों पर 9अप्रैल 1993 में पालार में  5पुलिसकर्मियों, 15 पुलिस मुखबिरों और 2 वनकर्मियों सहित 22 लोगों को बारूदी सुरंग के जरिए विस्फोट करके हत्या कर देने का आरोप है।इस मामले की बिडम्बना यह है कि दोषी पाए गए  4में से 2 अपराधियों को पहले अदालत ने आजन्म कैद की सजा सुनाई। बाद में 2004 में सुप्रीमकोर्ट ने चारों को फांसी की सजा सुना दी। जिन अपराधियों की मर्सी पिटीशन राट्रपति ने खारिज की है उनके परिवारीजनों को अभी तक इसकी कोई आधिकारिक जानकारी तक नहीं दी गयी है।
   इसके अलावा राष्ट्रपति ने 7 अन्य मामलों में फांसी की सजा पाए अपराधियों के मर्सी पिटीशन को खारिज करके भेज दिया है। इनसब सूचनाओं को देखकर यह आभास मिलता है कि राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने तेजी से मर्सी पिटीशन सिलटाने के काम को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।
    जिस तरह आतंकी अफज़ल गुरू की फांसी के खिलाफ कश्मीर में उत्तेजना है । ठीक इसी तरह की स्थिति कर्नाटक और तमिलनाडु के उन इलाकों में भी हो सकती है जो चंदन माफिया वीरप्पन के प्रभावक्षेत्र में रहे हैं।एक जमाना था चंदन माफिया वीरप्पन के प्रभाव में कर्नाटक- तमिलनाडु की 50 विधानसभा सीटें हुआ करती थीं और सभी राजनीतिक दल उससे मदद मांगते थे।
सारी दुनिया में जिस तरह मानवाधिकारों की चेतना बढ़ रही है उसी अनुपात में न्याय और दण्ड को रूपान्तरित करने की मांग भी बढ़ रही है।
    सारी दुनिया में फांसी की सजा खत्म करने के खिलाफ आवाजें उठ रही है। लेकिन भारत में अभी तक फांसी के खिलाफ आम जनता से लेकर राजनीतिकदलों तक इस मसले पर आम राय नहीं बन पायी है। इस मसले पर मानवाधिकार संगठन एकस्वर से फांसी की सजा को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन वोटबैंक की राजनीति इस मामले में सभी राजनीतिकदलों को एकमत राय कायम करने से रोक रही है।
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की फांसी पर सक्रियता का एक और कारण है हाल ही में उठा हेलीकॉप्टर घोटाला कांड।इटली के हेलीकॉप्टर सौदे को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के 2005 में रक्षामंत्रीकाल में मंजूरी दी थी और यह मसला इटली की अदालत में विगत 8महिनों से चल रहा है। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इस केस के बारे में जानता है। इस समूची प्रक्रिया में राष्ट्रपति पर आंच न आए इसके लिए ध्यान हटाने की रणनीति के तहत राष्ट्रपति की फांसी के खिलाफ मर्सी पिटीशनों पर सक्रियता बढ़ा दी गयी है। जिससे उनको बेदाग रखा जा सके। यदि हेलीकॉप्टर घोटाले में घूसखोरी के आरोप इटली की अदालत में सिद्ध होते हैं तो यह भारत के लिए बहुत  शर्मनाक होगा।     

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

कारपोरेट मीडिया का अन्ना ऑब्शेसन


 अन्ना हजारे ने अपने अनशन की घोषणा कर दी है। वे 16 अगस्त से अनशन पर बैठेंगे। असल में इस अनशन का कोई अर्थ नहीं है। अन्ना हजारे की राजनीति का आधार है 'मैं सही और सब गलत' । लोकतंत्र में ' मैं' के लिए जितनी जगह है उससे ज्यादा 'अन्य' के लिए जगह रखनी होती है। अन्ना के राजनीतिक एजेण्डे में 'अन्य ' के लिए कोई जगह नहीं है। अन्ना की राजनीति में 'जिद' का बड़ा महत्व है,यह ऐसे व्यक्ति की जिद है जिसकी कोई सामाजिक जबावदेही नहीं है। अन्ना और उनकी टीम की लोकतंत्र के मौजूदा ढ़ांचे में कोई जबाबदेही नहीं है। वे सर्वतंत्र-स्वतंत्र हैं।

     अन्ना की पूरी समझ इस धारणा पर टिकी है कि 'सरकारी लोकपाल' भरोसेमंद नहीं है। वे 'सरकार' के प्रति संदेह की नजर रखते हैं। सरकार के प्रति अविश्वास के आधार पर राजनीति नहीं चलती। सरकार के प्रति आलोचनात्मक हो सकते हैं लेकिन सरकार के पक्ष को पूरी तरह दरकिनार नहीं कर सकते। आखिरकार सरकार भी तो देश की बृहत्तर जनता का प्रतिनिधित्व कर रही है। जबकि अन्ना तो अपने गुटों और सहयोगी संगठनों का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
      अन्ना की एक अन्य दिक्कत है कि वे हथेली पर सरसों जमाना चाहते हैं। लोकतंत्र में यह संभव नहीं है। तानाशाही में यह संभव है कि किसी एक ने कहा और उसे सारे देश पर थोप दिया गया। अन्ना की जिद है जो कहा है उसे मानो।जैसा कह रहे हैं वैसा करो। जिस दिन करने को कह रहे हैं उसदिन करो। अन्ना का स्वभाव लोकतंत्र की प्रक्रियाओं के बाहर रमण करता है। वे चाहते हैं भ्रष्टाचार पर लगाम लगे,भ्रष्ट लोगों को दण्ड मिले लेकिन मुश्किल यह है कि वे इसे अपनी गति और मति के आधार पर करना चाहते हैं।
      अन्ना की गति और मति का लोकतंत्र की गति और मति से दूर-दूर तक तार नहीं जुड़ता। अन्ना लोकतंत्र के डिक्टेटरर हैं। लोकतंत्र में डिक्टेटरशिप नहीं चलती चाहे जितनी भी अच्छी बातें करे डिक्टेटरर। अन्ना की पहले अनशन के समय मांग थी कि सारे देश में  मजबूत लोकपाल की स्थापना हो और उसके लिए तुरंत लोकपाल बिल लाया जाए। केन्द्र सरकार ने उनकी यह मांग बुनियादी तौर पर मान ली है और संसद के अगस्त से आरंभ हो रहे सत्र में लोकपाल बिल पेश होने जा रहा है। अनशन आरंभ होने के बाद अन्ना ने स्टैंड बदला और कहा कि लोकपाल के लिए संयुक्त समिति बने जिसमें सरकार और 'अन्ना ब्रॉण्ड सिविल सोसायटी' के लोग हों। सरकार ने यह भी मान लिया। संयुक्त मसौदा समिति बना दी गयी। बाद में अन्ना स्वयं ही समिति में चले आए जबकि आरंभ में वे किसी समिति में रहना नहीं चाहते थे। मजेदार बात यह है कि अन्ना क्या चाहते हैं और उनकी मांगे क्या हैं उनके विवरण और ब्यौरे बादमें आम जनता में आए। आरंभ में मांग थी लोकपाल बिल लाओ।
अन्ना अब कह रहे हैं केन्द्र सरकार ने लोकपाल बिल का जो मसौदा तैयार किया है वह देश की जनता के साथ छल है। अन्ना जानते हैं  छल तब होता है जब कोई बात छिपायी जाए। धोखा तब होता है जब ठगा जाए। केन्द्र सरकार ने अपने नजरिए से न तो ठगा है और न किसी को धोखा दिया है। केन्द्र सरकार ने कभी नहीं कहा कि वह अन्ना की सारी बातें मानते हैं।
      केन्द्र सरकार ने अपने नजरिए से एक लोकपाल बिल तैयार किया है और उसे वह संसद में पेश करने जा रही है। सांसदों के ऊपर है कि वे उसे किस रूप में पास करें। केन्द्र सरकार ने लोकपाल बिल का वायदा किया था और वे जिस नजरिए से देख रहे हैं उसके आधार पर एक मसौदा संसद में पेश करने जा रहे हैं। सारी चीजें पारदर्शी हैं। अन्ना के लोग खुलेआम जितना बोल रहे हैं और अपनी असहमतियों का इजहार कर रहे हैं वैसा अन्य दल नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि मीडिया ने सारे मसले को अन्ना बनाम सरकार का मसला बना दिया है।
    अन्ना और सरकार के अलावा अनेक राजनीतिक दल हैं और विभिन्न किस्म के सैंकड़ों संगठन हैं जिनकी लाखों-करोड़ों की मेम्बरशिप है। मीडिया की बहस में ये संगठन एकसिरे से गायब हैं। इससे एक बात का पता चलता है कि अन्ना को लेकर मीडिया ऑब्शेसन का शिकार है। मसलन् विभिन्न विचारधारा के महिला,किसान ,मजदूर,युवा और छात्र संगठन हैं,इसके अलावा ऐसे भी स्वयंसेवी संगठन हैं जिनकी सैंकड़ों यूनिटें हैं। इनकी राय एकसिरे से गायब है।
     कारपोरेट मीडिया का अन्ना के प्रति ऑब्शेसन इस बात का सबूत है कि वह भारत की बृहत्तर ओपिनियन की उपेक्षा कर रहा है। विगत दिनों टीवी स्टूडियो में डिशकशन के नाम पर जो भीड़ अन्नाभक्तों की जुटायी गयी थी वह भी कारपोरेट मीडिया के अन्ना ऑब्शेसन को ही सामने लाती है। अन्न्भक्त स्टूडियो में अन्नाटीम से भिन्न राय व्यक्त करने वालों को हूट कर रहे थे।
     अन्नाभक्तों की बॉडी लैंग्वेज में लोकतांत्रिक विनम्रता नहीं है। वे आक्रामक और उद्धत हैं। जबरिया मनवाने में विश्वास करते हैं और मीडियासेवी लोग हैं। इन्हें लोकतंत्र के अधीर नागरिक कहना समीचीन होगा। लोकतंत्र अधीरों से नहीं धीरवान समाज से चलता है। लोकतंत्र में जिद्दीभाव की नहीं लोकतांत्रिक भाव की जरूरत है। लोकतंत्र 'मैं 'का नहीं 'हम' का खेल है।
     लोकतंत्र में व्यक्ति नहीं संस्थान महत्वपूर्ण हैं। अन्ना -मनमोहन,सिविल सोसायटी-कांग्रेस-भाजपा-माकपा आदि से बहुत बड़ा दायरा है लोकतंत्र का। लोकतंत्र का आधार हैं संस्थान। संस्थानों की अपनी काम करने की गति है। उस गति की उपेक्षा करने से लोकतंत्र के नष्ट हो जाने का खतरा है। अन्ना की मुश्किल यह है कि वे लोकतंत्र के साथ संस्थान की गति के बाहर रहकर संबंध बनाना चाहते हैं।
     अन्ना का 16 अगस्त को अनशन पर बैठना एकसिरे से गलत है। उन्हें लोकपाल बिल के अंतिम शक्ल लेने तक का  इंतजार करना चाहिए। अभी पहला चरण है जिसमें मसौदा तैयार हुआ है और वह संसद में जाएगा तो उसको अन्य प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। इसमें जो भी समय लगे वह देना होगा ,लेकिन अन्ना के पास धैर्य नहीं है। अधीरता से अन्ना की छोटी टीम तो चल सकती है लोकतंत्र नहीं चल सकता। लोकतंत्र में प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं और उसके विभिन्न चरणों में गति बनाए रखने के लिए अपार धैर्य की जरूरत है।
     अन्ना की एक और मुश्किल है कि वे लोकतंत्र के काल्पनिक संसार में रहते हैं। लोकतंत्र को कल्पना में पाना और संस्थान की प्रक्रियाओं में ठोस रूप में देखने में जमीन- आसमान का अंतर है। लोकतांत्रिक संस्थाएं भेड़-बकरी नहीं हैं जिन्हें कोई चरवाहा हांककर ले जाए।
    लोकपाल बिल आरंभ है यह अंतिम पड़ाव नहीं है लोकपाल का। अन्ना की मुश्किल है कि वे लोकपाल और भ्रष्टाचार के भविष्य की सारी समस्याएं एक ही साथ पूरे परफेक्शन के साथ सिलटा देना चाहते हैं। लोकतंत्र में परफेक्शन, अनुभव से आता है।ख्यालों से परफेक्ट बिल या कानून हमेशा डिक्टेटर बनाते हैं। इस अर्थ में अन्ना लोकतंत्र के डिक्टेटर हैं। हमें लोकतांत्रिकअन्ना कहीं पर भी नजर नहीं आ रहा जिसमें धैर्य हो, अन्य के लिए जगह हो,संसद की प्रक्रियाओं के प्रति नमनीय भाव हो।
     अन्ना टीम का सारा प्रचार अभियान मीडिया ऑबशेसन पर टिका है। सभी बहसों में अन्नाटीम को सैलीब्रिटी के रूप में रखा जाता है। सामान्यतौर पर स्टूडियो में ऐसे लोग बुलाए जाते हैं जो अन्ना के फेन हैं या अनुयायी हैं। अन्नाटीम को मीडिया ने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं बल्कि सैलीब्रिटी के रूप में कल्टीवेट किया है।
     अन्ना के इस समय जितने अनुयायी नेट पर हैं उतने जमीन पर नहीं है। जमीन पर वेही हैं जो नेट पर हैं। इनमें अधिकांश वे लोग हैं जो सोशल नेटवर्क से जुड़े हैं और सोशल नेटवर्किंग और मीडिया के ऑब्शेसन के शिकार हैं।
     इनमें एक वर्ग उन लोगों काभी है जो भीडतंत्र का हिस्सा हैं। भीडतंत्र और लोकतंत्र में कारपोरेट मीडिया भेद करना नहीं जानता। भीडतंत्र की भाषा में ही बौखलाकर अन्नाटीम ने लोकपाल बिल  को जोकपाल बिल कहा है। भीड़तंत्र के तर्कशास्त्र में सरकार या अधिकारी की बात न मानने का भाव होता है। वे सरकार की जमकर खिल्ली उड़ाते हैं। अन्नाटीम के लोग लोकतंत्र की खिल्ली उड़ा रहे हैं, मतदाता की खिल्ली उड़ा रहे हैं, वे वोटर की अज्ञानता,उपेक्षा,संवादहीनता,शिरकत के अभाव की खिल्ली उड़ा रहे हैं। स्वयं अन्ना हजारे यही हथकंडा अपना चुके हैं। स्वयं अन्ना ने आम नागरिकों की खिल्ली उड़ायी है। अन्नाटीम अपने को ज्ञानी और आम आदमी को मूर्ख मानकर तर्क दे रही है। संस्थान के नियम,कानून का शासन,कानून की गति,सरकार की मजबूरियां और जिम्मेदारियों आदि के प्रति अन्नाटीम का अनैतिहासिक नजरिया है। वे न तो संरचनाओं को ऐतिहासिक नजरिए से देख रहे हैं और न संसद और संविधान को ही।







रविवार, 24 अप्रैल 2011

नव्य उदार यथार्थ और मार्क्सवादी असफलताएं



      मार्क्सवादी आलोचक फ्रेडरिक जेम्सन ने मौजूदा दौर के संदर्भ में मार्क्सवाद की पांच थीसिस प्रतिपादित की हैं। इनमें दूसरी थीसिस में उन्होंने उन खतरों की ओर ध्यान खींचा है जो मार्क्सवाद के लिए आ सकते हैं या आए हैं और जिनसे मार्क्सवादी आंदोलन को धक्का लगा है। उत्तर आधुनिक परिस्थितियों के आने के साथ मार्क्सवादी चिंतन को नव्य उदार आर्थिक नीतियों और उसके गर्भ से पैदा हुए बाजार ने सबसे बड़ा खतरा पैदा किया है।नव्य उदारतावाद के खिलाफ विचारधारात्मक संघर्ष में मार्क्सवादी आम लोगों का दिल जीतने ,उन्हें इसके परिणामों के बारे में समझाने में असमर्थ रहे। इस समस्या के दो स्तर थे, पहला स्तर स्वयं मार्क्सवादियों के लिए था वे खुद समझ ही नहीं पाए कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों का क्या परिणाम निकलेगा। उनका इन नीतियों के प्रति तदर्थ रवैय्या था। जब वे स्वयं दुविधाग्रस्त थे तो वे अन्य को कैसे समझाते ? इससे संकट और भी गहरा हो गया।
   दूसरी समस्या यह आयी कि नव्य उदार परिवर्तनों के गर्भ से जो परिवर्तन पैदा हुए उनसे मार्क्सवादी लाभ नहीं उठा पाए। वे उस यथार्थ को पकड़ ही नहीं पाए जो नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से जन्मा है। उन्हें यह सामान्य सी बात समझ में नहीं आई कि कम्यूटर आज के मनुष्य की अपरिहार्य जरूरत है। भारत में लंबे समय तक अनेक मार्क्सवादी कम्प्यूटरीकरण के पक्ष में नहीं थे। लंबे अर्से के बाद उन्होंने हथियार डाले। इस चक्कर में मजदूरवर्ग को उन्होंने पिछड़ी कठमुल्ला चेतना के हवाले कर दिया। पश्चिम बंगाल और केरल कम्प्यूटर क्रांति में पिछड गए और बाकी देश आगे निकल गया। समूचा सोवियत संघ और पुराना समाजवादी देशों का समूह इस परिवर्तन को नहीं समझने के कारण तबाह हो गया। सोचिए 18 साल तक सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने पार्टी कॉमरेड वैज्ञानिकों को काफ्रेंस में कम्प्यूटर की उपयोगिता पर बहस करने की अनुमति नहीं दी।
   उत्तर आधुनिकतावाद के संदर्भ में मार्क्सवादियों की सफलताएं कम हैं असफलताएं ज्यादा हैं। सबसे बड़ी असफलता है नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से पैदा हुई असुरक्षा, अव्यवस्था,विस्थापन और भय को संगठनबद्ध न कर पाना। नव्य उदार दौर में मजदूरवर्ग के क्षय को वे रोक नहीं पाए और असंगठित मजदूरवर्ग की तबाही को अपने संगठनों के जरिए एकजुट नहीं कर पाए। आज महानगरों में लाखों असंगठित मजदूर हैं जो किसी भी वाम संगठन में संगठित नहीं हैं।
     मजदूरवर्ग के अंदर नव्य उदारतावाद ने जो भय पैदा किया उसे भी प्रभावशाली ढ़ंग से मार्क्सवादी लिपिबद्ध नहीं कर पाए। इसका व्यापक दुष्परिणाम निकला है,मजदूरों की आवाज सामान्य वातावरण से गायब हो गयी है। दूसरी ओर नव्य उदारपंथी एजेण्डा वाम संगठनों में आ घुसा है। वे इससे बचने की युक्ति वे नहीं जानते।
   इसी प्रसंग में फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा, तर्कमूलक संघर्ष (जैसा कि यह सीधी वैचारिक लड़ाई के विरुध्द है) अपने विकल्पों की साख समाप्त करके और थीमैटिक प्रसंगों की एक पूरी श्रृंखला को अनुल्लेखनीय घोषित करके सफलता हासिल करता है। यह राष्ट्रीकरण, विनियमन, घाटा व्यय, कीन्सवाद, नियोजन, राष्ट्रीय उद्योगों की सुरक्षा, सुरक्षा नेट, तथा अंतत: स्वयं कल्याणकारी राज्य जैसी पूर्ववर्ती गंभीर संभावनाओं को निर्णायक रूप में अवैध घोषित करने के लिए क्षुद्रीकरण, निष्कपटता, भौतिकस्वार्थ, 'अनुभव', राजनीतिक भय ऐतिहासिक सबक को 'आधार' मानने का आग्रह करता है। कल्याणकारी राज्य को समाजवाद बताना बाजारवाद का उदारवादियों (अमरीकी प्रयोग में जैसा कि 'न्यू डील लिबरल्स' में किया गया है) तथा वामपंथियों दोनों पर दोहरी जीत दिलाता है। इस प्रकार आज वामपंथ ऐसी स्थिति में आ गया है जब उसे बड़ी सरकारों या कल्याणकारी राज्यों का समर्थन करना पड़ रहा है। सामाजिक प्रजातंत्र की समीक्षा करने की जो वामपंथियों की विस्तृत और परिष्कृत परंपरा रही है, उसके लिए यह कार्य खासकर वामपंथियों को इतिहास की द्वंद्वात्मक समझ जितनी होनी चाहिए उतनी नहीं होने के कारण बेहद लज्जित करने वाला है।
 मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने आगे लिखा है इसी बीच मनोराज्य (यूटोपिया) से जुड़ी चिंताएं जो इस भय से उत्पन्न होती हैं कि हमारी वर्तमान पहचान, हमारी आदतें और आकांक्षा पूर्ति के तरीकों का निर्माण करने वाली चीज कतिपय नई सामाजिक व्यवस्था में समाप्त हो जाएगी तथा सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आज कुछ समय पहले की तुलना में अधिक संभव है। स्पष्टतया दुनिया के आधे से अधिक भाग में और न केवल प्रभावशाली वर्गों में आज निस्सहाय लोगों के जीवन में परिवर्तन की आशा का स्थान 'नष्ट हो जाने के भय' ने ले लिया है। इस प्रकार की मनोराज्य-विरोधी (एंटी-यूटोपियन) चिंताओं को दूर करना अनिवार्य है जो कि सांस्कृतिक निदान और उपचार के रूप में किया जाना चाहिए न कि बाजार के सामान्य बहस और अलंकार की इस या उस विशेषता से सहमति जताकर इससे बचना चाहिए।
मानव-स्वभाव मूल रूप से अच्छा और सहयोगी है या फिर बुरा और आक्रामक। यदि यह सर्वसत्तात्मक राज्य (लेवियाथन) को नहीं तो कम से कम बाजार को वश में रखने की अपेक्षा करता है, ये सारे तर्क वास्तव में मानवतावादी और विचारधारात्मक हैं (जैसा कि अल्थूसर ने कहा है) और इसके स्थान पर रैडिकल परिवर्तन और सामूहिक परियोजना का परिप्रेक्ष्य लाना चाहिए। साथ ही वामपंथियों को बड़ी सरकारों या फिर कल्याणकारी राज्यों का आक्रामक रूप से बचाव करना चाहिए तथा मुक्त बाजार के ऐतिहासिक ध्वंसात्मक रिकार्ड को देखते हुए बाजारवाद पर लगातार प्रहार करते रहना चाहिए ।
     मार्क्सवादी के लिए साम्यवाद या कम्युनिस्ट पार्टी पूजा की चीज नहीं है। मार्क्सवादी के लिए वैज्ञानिक ढ़ंग से इस समाज को समझना और उस परिवर्तन के तर्क को समझना जरूरी होता है जिसके कारण परिवर्तन घट रहे हैं। पुराने साम्राज्यवाद के दौर में पूंजीवाद का केन्द्र था इंग्लैण्ड,बाद में द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर में अमेरिका केन्द्र बना।नव्य उदारतावाद के आरंभ में अमेरिका ही पूंजीवाद का गोमुख था। लेकिन नव्य उदारतावाद के अगले चरण में यानी मौजूदा दौर में पूंजीवाद का केन्द्र चीन है,अमेरिका नहीं। कारपोरेट और लंपट पूंजीवाद की इसमें सभी खूबियां हैं। सब कुछ हजम कर जाने का इसमें भाव है। विश्व बाजार में छा जाने ,सब कुछ बनाने और सस्ता उपलब्ध कराने का नजरिया है। इस समाविष्टकारी भाव से सारी दुनिया में देशज उद्योगों के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया है।
    एक जमाना था चीन में कम से कम चीजें पैदा होती थीं। सारा देश पांच किस्म के कपड़े पहनता था। सारा देश साइकिल पर चलता था। लेकिन विगत 30 सालों में उसने सब कुछ बदल दिया है। उत्पादन और जिन्सों के उत्पादन में तो उसने क्रांति की है। किसी वस्तु को सस्ते में बनाना,बाजार में इफ़रात में उपलब्ध कराना और बाजार को घेरे रखना। बड़ी पूंजी को आकर्षित करना,श्रम और श्रमिक को सस्ते माल में लब्दील करना। मैन्यूफेक्चरिंग की ताकत को ऐसे समय में स्थापित करना जब सारी दुनिया मैन्यूफैक्चरिंग छोड़कर सेवाक्षेत्र की ओर आंखें बंद करके भाग रही थी।अपने आप में महान उपलब्धि है।
     उत्पादन और खूब उत्पादन का नारा लगाकर चीन ने उत्पादन और उत्पादकों की महत्ता स्थापित की है। तंत्रगत संकटों को उसने अभिनव परिवर्तनों और प्रौद्योगिक क्रांति के जरिए संभाला है। विकास की तेजगति को बरकरार रखा है। साथ ही उत्पादन की गति को बनाए रखकर कारपोरेट पूंजीवाद को नए सिरे से पुनर्गठित किया है। इन परिवर्तनों को उत्तर मार्क्सवाद के आधार पर ही परखा जा सकता है। चीन और अमेरिका के नव्य उदार आर्थिक परिवर्तन पुराने मार्क्सवाद से नहीं उत्तर मार्क्सवाद से ही समझ में आ सकते हैं।
  नव्य उदार परिवर्तनों का विश्व में सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है। लेकिन यहां पर हम वामपंथ पर जो प्रभाव पड़ा है उसकी समीक्षा तक ही फिलहाल सीमित रखेंगे। वामपंथ पर नव्य उदारतावाद के प्रभाव को हम इस रूप में देख तकते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां अब अपने बुनियादी मसलों पर विचारधारात्मक संघर्ष नहीं कर रही हैं बल्कि उन मसलों पर संघर्ष कर रही हैं जो पूंजीवादी मसले हैं। पूंजीवादी विचारधारा के द्वारा निर्मित मसले हैं।  
   इन दिनों कम्युनिस्टों का संघर्ष समाजवाद के लिए नहीं चल रहा बल्कि कल्याणकारी राज्य को बचाने के लिए चल रहा है। भारत से लेकर अमेरिका तक सभी जगह कम्युनिस्ट पार्टियां कल्याणकारी राज्य को बचाने के एजेण्डे में फंस गयी हैं।कल्याणकारी राज्य आंतरिक गुलामी का परिवेश तैयार करता है।
  नव्य उदारतावाद के आने के साथ ही अनेक समाजवादी देशों ने समाजवाद को त्यागकर कारपोरेट पूंजीवाद का मार्ग पकड़ लिया। यह काम अकारण सभी किस्म के मार्क्सवादी मूल्यों और मान्यताओं को त्यागकर किया गया। भारत में आज कम्युनिस्ट पार्टियां कल्याणकारी राज्य के एजेण्डे को लेकर ही हल्ला मचा रही हैं। जबकि पूंजीपतिवर्ग ने कल्याणकारी पूंजीवाद के मार्ग को तिलांजलि दे दी है और नव्य उदार आर्थिक कारपोरेट पूंजीवादी विकास का मार्ग ग्रहण कर लिया है। अनेक अवसरों पर कम्युनिस्टों में भी वे तमाम विकृतियां देखने को मिलती हैं जो कल तक पूंजीवादी दलों में हुआ करती थीं। वे पूंजीवादी विकृतियों को समझने और उनके खिलाफ अनवरत संघर्ष चलाने में असमर्थ रहे हैं।
   पहले लोग बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के सवालों को पसंद करते थे। उनके लिए कुर्बानी देने के लिए तैयार रहते थे। लेकिन नव्य उदार प्रचार अभियान के कारण आम आदमी बुनियादी सामाजिक परिवर्तनो से डरने लगा है। जोखिम उठाने से डरने लगा है। बहस करने से बचने लगा है। वह इस या उसकी हां में हां मिलाकर सामंजस्य बिठाकर यथास्थितिवाद के सामने समर्पण कर चुका है। अब हमारे बीच में बुनियादी मसलों पर बहसें कम हो रही हैं,कचरा विषयो पर बहसें ज्यादा हो रही हैं।
    मसलन हाल ही में उठे 2जी घोटाले को ही लें। मीडिया और संसद बहस कर रही है पूर्व संचारमंत्री ए.राजा ने 1 लाख 75 हजार करोड़ का देश को चूना लगा दिया। नियम तोड़े। घूस ली बगैरह-बगैरह। इस प्रसंग में आम लोग,मीडिया और सांसद यह बात नहीं कर रहे कि आखिरकार ये रेडियो तरंगें किसकी हैं  ? क्या इन्हें बेचा जा सकता था ? क्या रेडियो तरंगे कारपोरेट पूंजी की सेवा के लिए आवंटित की जाती हैं ? रेडियो तरंगे राष्ट्र की संपदा हैं और इन्हें हमारा देश अंतर्राष्ट्रीय संचार समझौते के तहत अंतर्राष्ट्रीय संस्था के जरिए आवंटन के माध्यम से प्राप्त करता है। इन्हें बेचा नहीं जा सकता। क्योंकि ये राष्ट्र की संपत्ति हैं। वैसे ही जैसे भारत के ऊपर का आकाश भारत का है उसे बेचा नहीं जा सकता। समुद्र को बेचा नहीं जा सकता। संसद भवन बेचा नहीं जा सकता।ताजमहल बेचा नहीं जा सकता। बजट घाटे को कम करने के नाम पर रेडियो तरंगों का कारपोरेट घरानों को आवंटन देशद्रोह है,देशभक्ति नहीं है। सवाल उठता है देशद्रोह बड़ा अपराध है या भ्रष्टाचार ?कायदे से रेडियो तरंगे बेची नहीं जानी चाहिए। लेकिन संसद में कभी भी किसी भी दल के सांसदों ने रेडियो तरंगों के निजी हाथों बेचे जाने का विरोध नहीं किया,आज भी वे विरोध नहीं कर रहे बल्कि यह कह रहे हैं कि नए सिरे से इनका आवंटन बाजार दर पर करवा दो और राष्ट्र को 1लाख 75 हजार करोड़ रूपये दिलवा दो। उनकी रूचि राष्ट्र को पैसा दिलवाने में हैं तरंगों को राष्ट्र के खाते में बचाने में नहीं है। यहीं पर उत्तर आधुनिक समाज की आयरनी छिपी है। हम जानते ही नही हैं कि राष्ट्र हित क्या हैं ? कारपोरेट हितों को राष्ट्रहित समझ रहे हैं और यही नव्य उदार प्रौपेगैण्डा की जीत है।बजट घाटे को कम करना देशसेवा है चाहे रेडियो तरंगें बेचनी पड़ें। धन्य हैं ये देशभक्त जो देश की संपदा (रेडियो तरंगें) बेचकर देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं।  यह नव्य उदार प्रौपेगैण्डा की जीत है । आज मीडिया में सारे राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी बहस के उन मसलों पर उलझे हैं जो बाजार के मसले हैं,सतही मसले हैं। बहस-मुबाहिसे में बाजार का लक्ष्य प्रधान हो गया है और बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के सवाल बहस से गायब हो गए हैं। उपभोग के सवालों पर बहस कर रहे हैं ,उत्पादन के सवालों पर नहीं। भ्रष्टाचार पर बहस कर रहे हैं भूख पर नहीं। नरेगा के कार्यान्वयन पर उलझे हैं गांव की गरीबी पर नहीं। यह विचारधारात्मक अवमूल्यन है।      


शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

अन्ना हजारे की मीडिया रणनीतियां

            अन्ना हजारे -अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव के बयानों में एक खास किस्म का भ्रष्टाचार निरंतर चल रहा है। इन लोगों की बातों और समझ में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है। यह एनजीओ राजनीति विमर्श की पुरानी बीमारी है। जन लोकपाल बिल का लक्ष्य है आर्थिक भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सक्रिय कानूनी तंत्र का गठन। यह बहुत ही सीमित उद्देश्य है। निश्चित रूप से इतने सीमित लक्ष्य की जंग को आप धर्मनिरपेक्षता, साम्प्रदायिकता, संघ परिवार आदि के पचड़ों नहीं फंसा सकते।
       अरविंद केजरीवाल ने 14 अप्रैल 2011 को टाइम्स आफ इण्डिया में लिखे अपने स्पष्टीकरण में साफ कहा है कि "हमारा आंदोलन धर्मनिरपेक्ष और गैरदलीय है।" सतह पर इस बयान से किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। समस्या है अन्ना हजारे के कर्म की। वे क्या बयान देते हैं उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है उनका कर्म। पर्यावरण के नाम पर उन्होंने जो आंदोलन चलाया हुआ है और अपने हरित गांवों में जो सांस्कृतिक वातावरण पैदा किया है वो उनके विचारधारात्मक चरित्र को समझने के लिए काफी है। कायदे से अरविंद केजरीवाल को मुकुल शर्मा के द्वारा काफिला डॉट कॉम पर लिखे लेख का जबाब देना चाहिए। बेहतर तो यही होता कि अन्ना हजारे स्वयं जबाव दें।
     अरविंद केजरीवाल का टाइम्स ऑफ इण्डिया में जो जबाव छपा है वह अन्ना हजारे को धर्मनिरपेक्ष नहीं बना सकता। अन्ना ने पर्यावरण को धर्म से जोड़ा है। पर्यावरण संरक्षण का धर्म से कोई संबंध नहीं है। अन्ना ने पर्यावरण संरक्षण को हिन्दू संस्कारों और रीति-रिवाजों से जोड़ा है। अन्ना का सार्वजनिक आंदोलन को धर्म से जोड़ना अपने आप में साम्प्रदायिक कदम है।
     अन्ना के तथाकथित एनजीओ आंदोलन की धुरी है संकीर्ण हिन्दुत्ववादी विचारधारा। जिसकी किसी भी समझ से हिमायत नहीं की जा सकती। अन्ना हजारे को लेकर चूंकि मीडिया में महिमामंडन चल रहा है और अन्ना इस महिमामंडन को भुना रहे हैं, इसलिए उनके इस वर्गीय चरित्र की मीमांसा करने की भी जरूरत महसूस नहीं की गई ।
     अन्ना ने अपने एक बयान में कहा है कि "  मेरा अनशन किसी सरकार या व्यक्ति के खिलाफ पूर्वाग्रहग्रस्त नहीं था बल्कि वह तो भ्रष्टाचार के खिलाफ था। क्योंकि इसका आम आदमी पर सीधे बोझा पड़ रहा है।" अन्ना का यह बयान एकसिरे से गलत है अन्ना ने अनशन के साथ ही अपना स्टैंण्ड बदला है। अन्ना का आरंभ में कहना था केन्द्र सरकार संयुक्त मसौदा समिति की घोषणा कर दे मैं अपना अनशन खत्म कर दूँगा। बाद में अन्ना को लगा कि केन्द्र सरकार उनके संयुक्त मसौदा समिति के प्रस्ताव को तुरंत मान लेगी और ऐसे में अन्ना ने तुरंत एक नयी मांग जोड़ी कि मसौदा समिति का अध्यक्ष उस व्यक्ति को बनाया जाए जिसका नाम अन्ना दें। केन्द्र ने जब इसे मानने से इंकार किया तो अन्ना ने तुरंत मिजाज बदला और संयुक्त अध्यक्ष का सुझाव दिया लेकिन सरकार ने यह भी नहीं माना और अंत में अध्यक्ष सरकारी मंत्री बना और सह-अध्यक्ष गैर सरकारी शांतिभूषण जी बने। लेकिन दिलचस्प बात यह हुई कि अन्ना इस समिति में आ गए। जबकि वे आरंभ में स्वयं नहीं रहना चाहते थे। मात्र एक कमेटी के निर्माण के लिए अन्ना ने जिस तरह प्रतिपल अपने फैसले बदले उससे साफ हो गया कि पर्दे के पीछे कुछ और चल रहा था।
       अन्ना हजारे के इस आंदोलन के पीछे मनीपावर भी काम करती रही है इसका साक्षात प्रमाण है मात्र 4 दिन में इस आंदोलन के लिए मिला 83 लाख रूपये चंदा और इस समिति के लोगों ने इसमें से तकरीबन 32 लाख रूपये खर्च भी कर दिए। टाइम्स ऑफ इण्डिया में 15 अप्रैल 2011 को प्रकाशित बयान में इस ग्रुप ने कहा है -
"it has received a total donation of Rs 82,87,668."..  "spokesperson said, they have spent Rs 32,69,900." यानी अन्ना हजारे के लिए आंदोलन हेतु संसाधनों की कोई कमी नहीं थी। मात्र 4 दिनों 83 लाख चंदे का उठना इस बात का संकेत है कि अन्ना के पीछे समर्थ लॉबी काम करती रही है। अन्ना हजारे के आंदोलन की मीडिया हाइप का यह सीधे फल है जो अन्ना के भक्तों को मिला है। एनजीओ संस्कृति नियोजित पूंजी की संस्कृति है। स्वतःस्फूर्त संस्कृति नहीं है बल्कि निर्मित वातावरण की संस्कृति है।
     एनजीओ समुदाय में काम करने वाले लोगों की अपनी राजनीति है।विचारधारा है और वर्गीय भूमिका भी है। वे परंपरागत दलीय राजनीति के विकल्प के रूप में काम करते रहे हैं। अन्ना हजारे के इस आंदोलन के पीछे जो लोग हठात सक्रिय हुए हैं उनमें एक बड़ा अंश ऐसे लोगों का है जो विचारों से संकीर्णतावादी हैं।
       मीडिया उन्माद,अन्ना हजारे की संकीर्ण वैचारिक प्रकृति और भ्रष्टाचार इन तीनों के पीछे सक्रिय सामाजिक शक्तियों के विचारधारा त्मक स्वरूप का विश्लेषण जरूर किया जाना चाहिए। इस प्रसंग में इंटरनेट पर सक्रिय भ्रष्टाचार विरोधी फेसबुक मंच पर आयी टिप्पणियों का सामाजिक संकीर्ण विचारों के नजरिए से अध्ययन करना बेहतर होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय लोग इतने संकीर्ण और स्वभाव से फासिस्ट हैं कि वे अन्ना हजारे के सुझाव से इतर यदि कोई व्यक्ति सुझाव दे रहा है तो उसके खिलाफ अपशब्दों का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। वे इतने असहिष्णु हैं कि अन्ना की सामान्य सी भी आलोचना करने वाले पर व्यक्तिगत कीचड उछाल रहे हैं। औगात दिखा देने की धमकियां दे रहे हैं। यह अन्ना के पीछे सक्रिय फासिज्म है।
    अन्ना की आलोचना को न मानना,आलोचना करने वालों के खिलाफ हमलावर रूख अख्तियार करना संकीर्णतावाद है। इस संकीर्णतावाद की जड़ें भूमंडलीकरण में हैं। अन्ना हजारे और उनकी भक्तमंडली के सामाजिक चरित्र में व्याप्त इस संकीर्णतावाद का ही परिणाम है कि अन्ना हजारे स्वयं भी कपिल सिब्बल की सामान्य सी टिप्पणी पर भड़क गए और उनसे मसौदा कमेटी से तुरंत हट जाने की मांग कर बैठे।
    अन्ना हजारे फिनोमना हमारे सत्ता सर्किल में पैदा हुए संकीर्णतावाद का एनजीओ रूप है जिसका समाजविज्ञान में भी व्यापक आधार है। वरना यह कैसे हो सकता है कि अन्ना हजारे के संकीर्ण हिन्दुत्ववादी विचारों को जानने के बाबजूद बड़े पैमाने पर लोकतांत्रिक मनोदशा के लोग उनके साथ हैं। ये ही लोग प्रत्यक्षतः आरएसएस के साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं हैं लेकिन अन्ना हजारे के साथ खड़े होने के लिए तैयार हैं जबकि अन्ना के विचार उदार नहीं संकीर्ण हैं। इससे यह भी पता चलता है कि एजीओ संस्कृति की आड़ में संकीर्णतावादी -प्रतिगामी विचारों की जमकर खेती हो रही है,उनका तेजी से मध्यवर्ग में प्रचार-प्रसार हो रहा है।
   अन्ना मार्का संकीर्ण विचार के प्रसार का बड़ा कारण है उनका सत्ता के विचारों का विरोध करना। वे सत्ता की विचारधारा का विरोध करते हैं और अपने विचारों को सत्ता के विचारों के विकल्प के रूप में पेश करते हैं। उन्होंने अपने को सुधारवादी -लिबरल के रूप में पेश किया हैं। वे हर चीज को तात्कालिक प्रभाव के आधार पर विश्लेषित कर रहे हैं। वे सत्ता के विकल्प का दावा पेश करते हुए जब भी कोई मांग उठाते हैं ,उसके तुरंत समाधान की मांग करते हैं, और जब वे चटपट समाधान कराने में सफल हो जाते हैं तो दावा करते हैं कि देखो हम कितने सही हैं और हमारा नजरिया कितना सही है। अन्ना हजारे का मानना यही है, उन्होंने जन लोकपाल बिल की मांग की और 4 दिन में केन्द्र सरकार ने उनकी मांग को मान लिया।यही सरकार 42 साल से नहीं मान रही थी,लेकिन अन्ना की मांग को 4 दिन में मान लिया।
    अन्ना हजारे टाइप लोग 'पेंडुलम इफेक्ट' की पद्धति का व्यवहार करते हैं। चट मगनी पट ब्याह। इसके विपरीत लोकपाल बिल का सत्ता विमर्श बोरिंग,दीर्घकालिक और अवसाद पैदा करने वाला था। इसके प्रत्युत्तर में अन्ना हजारे टाइप एक्शन रेडीकल और तुरत-फुरत वाला था। यह बुनियादी तौर पर संकीर्णतावादी आर्थिक मॉडल से जुड़ा फिनोमिना है। 
   अन्ना के एक्शन ने संदेश दिया कि वह चटपट काम कर सकते हैं। जो काम 42 सालों में राजनीतिक दलों ने नहीं किया उसे हमने मात्र 4 दिन में कर दिया। लोकपाल बिल के पास होने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी हमने इसके पास होने की उम्मीदें जगा दी। निराशा में आशा पैदा करना और इसकी आड़ में वैज्ञानिक बुद्धि और समझ को छिपाने की कला काम करती रही है। दूसरा संदेश यह गया कि सरकार परफेक्ट नहीं हम परफेक्ट हैं। सरकार की तुलना में अन्ना की प्रिफॉर्मेंश सही है।जो काम 42 साल से राजनीतिक दल नहीं कर पाए वह काम एनजीओ और सिविल सोसायटी संगठनों ने कर दिया। इस काम के लिए जरूरी है कि सत्ता के साथ एनजीओ सक्रिय भागीदारी निभाएं।
    रामविलास पासवान ने जब लोकपाल बिल की मसौदा कमेटी में दलित भागीदारी की मांग की तो भ्रष्टाचार विरोधी मंच के लोग बेहद खफा हो गए। दूसरी ओर अन्ना ने भी कमेटी के लिए जिन लोगों के नाम सुझाए वे सभी अभिजन हैं। इससे अन्ना यह संदेश देना चाहते हैं कि वे लोकतंत्र में अभिजन के प्रभुत्व को मानते हैं। आम जनता सिर्फ वोट दे,शिरकत करे। लेकिन कमेटी में अभिजन ही रहेंगे। अन्ना हजारे इस सांकेतिक फैसले का अर्थ है लोकतंत्र में सत्ता और आम जनता के बीच खाई बनी रहेगी।
     इसके अलावा अन्नामंडली ने इस पूरे लोकतांत्रिक मसले को गैरदलीय और अ-राजनीतिक बनाकर पेश किया। इससे यह संदेश गया कि  लोकतंत्र में राजनीति की नहीं अ-राजनीति की जरूरत है। अन्ना हजारे के अनशन स्थल पर उमाभारती आदि राजनेताओं के साथ जो दुर्व्यवहार किया गया उसने यह संदेश दिया कि जनता और राजनीति के संबंधों का अ-राजनीतिकरण हो गया है। और आम जनता को राजनीतिक प्रक्रिया से अलग रहना चाहिए राजनीति दल चोर हैं,भ्रष्ट हैं। इस तरह अन्ना मुक्त बाजार में मुक्त राजनीति के नायक के रूप में उभरकर सामने आए हैं।
      
     अन्ना ने एनजीओ राजनीति को उपभोक्ता वस्तु की तरह बेचा है। जिस तरह किसी उपभोक्ता वस्तु का एक व्यावसायिक और विज्ञापन मूल्य होता है।ठीक वैसे ही अन्ना हजारे मार्का आमरण अनशन का मासमीडिया ने इस्तेमाल किया है। उन्होंने अन्ना के आमरण अनशन और उसकी उपयोगिता पर बार बार बलदिया। उसका टीवी चैनलों के जरिए लंबे समय तक लाइव टेलीकास्ट किया।
     अन्ना के आमरण अनशन की प्रचार नीति वही है जो किसी भी माल की होती है। अन्ना ने कहा 'तेरी राजनीति से मेरी राजनीति श्रेष्ठ है।'  इसके लिए उन्होंने नागरिकों की व्यापक भागीदारी को मीडिया में बार बार उभारा और सिरों की गिनती को महान उपलब्धि बनाकर पेश किया।  यह वैसे ही है जैसे वाशिंग मशीन के विज्ञापनदाता कहते हैं कि 10 करोड़ घरों में लोग इस्तेमाल कर रहे हैं तुम भी करो। अन्ना की मीडिया टेकनीक है चूंकि इतने लोग मान रहे हैं अतः तुम भी मानो। यह विज्ञापन की मार्केटिंग कला है।
  टीवी कवरेज में बार-बार एक बात पर जोर दिया गया कि देखो अन्ना के समर्थन में "ज्यादा से ज्यादा" लोग आ रहे हैं। "ज्यादा से ज्यादा" लोगों का फार्मूला आरंभ हुआ चंद लोगों से और देखते ही देखते लाखों -लाख लोगों के जनसमुद्र का दावा किया जाने लगा। चंद से लाखों और लाखों से करोड़ों में बदलने की कला विशुद्ध विज्ञापन कला है। इसका जनता की हिस्सेदारी के साथ कोई संबंध नहीं है। यह विशुद्ध मीडिया उन्माद पैदा करने की कला है जिसका निकृष्टतम ढ़ंग से अन्नामंडली ने इस्तेमाल किया।
टीवी कवरेज में एक और चीज का ख्याल रखा गया और वह है क्रमशः जीत या उपलब्धि की घोषणा। विज्ञापन युद्ध की तरह शतरंज का खेल है। इसमें आप जीतना जीतते हैं उतने ही सफल माने जाते हैं।जितना अन्य का व्यापार हथिया लेते हैं उतने ही सफल माने जाते हैं। अन्नामंडली ने ठीक यही किया आरंभ में उन्होंने प्रचार किया कि केन्द्र सरकार जन लोकपाल बिल के पक्ष में नहीं है। फिर बाद में दो दिन बाद खबर आई कि सरकार झुकी, फिर खबर आई कि सरकार ने दो मांगें मानी,फिर खबर आई कि खाली मसौदा समिति के अध्यक्ष के सवाल पर मतभेद है,बाद में खबर आई कि सरकार ने सभी मांगें मान लीं। क्रमशः अन्ना की जीत की खबरों का फ्लो बनाए रखकर अन्नामंडली ने अन्ना को एक ब्राँण्ड बना दिया। उन्हें भ्रष्टाचारविरोधी ब्राँण्ड के रूप में पेश किया।
      अन्ना के व्यक्तिवाद को खूब उभारा गया। अन्ना के व्यक्तिवाद को सफलता के प्रतीक के रूप में पेश किया गया। मीडिया कवरेज में अन्ना मंडली ने आंदोलन के 'युवापन' को खूब उभारा,जबकि सच यह है कि अन्ना ,अग्निवेश,किरन बेदी में से कोई भी युवा नहीं है। आमरण अनशन का नेतृत्व एक बूढ़ा कर रहा था। इसके बाबजूद कहा गया यह युवाओं का आंदोलन है। आरंभ में इसमें युवा कम दिख रहे थे लेकिन प्रचार में युवाओं पर तेजी से इंफेसिस दिया गया। आखिर इन युवाओं को प्रचार में निशाना बनाने की जरूरत क्यों पड़ी ? आखिर अन्ना के आंदोलन में किस तरह का युवा था ?
     अन्ना की मीडिया टेकनीक 'सफलता' पर टिकी है। 'सफलता' पर टिके रहने के कारण अन्ना को सफल होना ही होगा। यदि अन्ना असफल होते हैं तो संकीर्णतावाद का प्रचार मॉडल पिट जाता है। अन्ना के बारे में बार-बार यही कहा गया कि देखो उन्होंने कितने 'सफल' आंदोलनों का नेतृत्व किया। एनजीओ संस्कृति और संघर्ष की रणनीति में 'सफलता' एक बड़ा फेक्टर है जिसके आधार पर अ-राजनीति की राजनीति को सफलता की ऊँचाईयों के छद्म शिखरों तक पहुँचाया गया।
   अन्नामंडली की मीडिया रणनीति की सफलता है कि वे अपने आंदोलन को नियोजित और पूर्व कल्पित की बजाय स्वतःस्फूर्त और स्वाभाविक रूप में पेश करने में सफल रहे। जबकि यह नियोजित आंदोलन था। जब आप किसी आंदोलन को स्वतःस्फूर्त और स्वाभाविक रूप में पेश करते हैं तो सवाल खड़े नहीं किए जा सकते। यही वजह है अन्ना हजारे,उनकी भक्तमंडली,आमरण अनशन,लोकपाल बिल,भ्रष्टाचार आदि पर कोई परेशानी करने वाला सवाल करने वाला तुरंत बहिष्कृतों की कोटि में डाल दिया जाता है। अन्ना ने इस समूचे प्रपंच को बड़ी ही चालाकी के साथ भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में रखकर पेश किया। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में आमरण अनशन को पेश करने का लाभ यह हुआ कि आमरण अनशन पर सवाल ही नहीं उठाए जा सकते थे। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में पेश करने के कारण ही अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार को अतिसरल बना दिया और उसकी तमाम जटिलताओं को छिपा दिया। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में जब जन लोकपाल बिल और भ्रष्टाचार को पेश किया तो दर्शक को इस मांग और आंदोलन के पीछे सक्रिय विचारधारा को पकड़ने में असुविधा हुई। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस को दैनंदिन जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार के फुटेजों के जरिए पुष्ट किया गया।
    एनजीओ संकीर्णतावाद के पीछे लोगों को गोलबंद करने के लिए कहा गया कि राजनीतिज्ञ ,राजनीतिक प्रक्रिया,चुनाव आदि भ्रष्ट हैं। इससे एनजीओ संकीर्णतावाद और अन्नामंडली के प्रतिगामी विचारों को वैधता मिली।

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

अन्ना हजारे तुम इतने टेढ़े क्यों हो ?


        अन्ना हजारे भले हैं और जो मन में आता है उसे बिना लाग लपेट के बोलते हैं। उनकी इस साफ़गोई पर कोई भी कुरबान हो सकता है। कल उनकी प्रेस कॉफ्रेस थी,उनकी एक तरफं अरविंद केजरीवाल थे दूसरी ओर किरन बेदी बैठी थीं। कुछ अन्ना रह रहे थे कुछ ये दोनों कह रहे थे। इस तरह ये तीनों मिलकर सिविल सोसायटी का भ्रष्टाचार विरोधी नया आख्यान रच रहे थे।
    ये तीनों एक साथ थे। एक दूसरे से सहमत होते हुए बोल रहे थे। उनमें विचार भेद नहीं था। मसलन अन्ना ने जब बिहार और गुजरात के मुख्यमंत्री की प्रशंसा की तो यह मानकर चलना चाहिए कि किरन बेदी और केजरीवाल भी उनके प्रशंसक ही हैं । क्योंकि उन लोगों ने अन्ना की राय का वहां पर विरोध नहीं किया। मैं सोच रहा था मल्लिका साराभाई के बारे में जो अन्ना हजारे को लेकर बेहद उत्साहित थीं और टीवी पर कह रही थीं कि वे अन्ना के मैसेज को गुजरात के गांवों में ले जाएंगी। मैं नहीं जानता कि मोदी की प्रशंसा के बाद मल्लिका के पास क्या बचा है मोदी का विरोध करने के लिए ?  मैं सोच रहा हूँ कांग्रेसनेत्री सोनिया गांधी के बारे में क्या वे मोदी के साथ अन्ना को हजम कर पाएंगी ?
     लोकपाल बिल का सवाल नहीं है वह तो आएगा और उसका स्वरूप ,शक्ति और संभावनाएं क्या होंगी ,इसके बारे में प्रेस कॉफ्रेस में ही अरविन्द केजरीवाल ने बता दिया कि वे एक और सीबीआई जैसा संगठन बनाना चाहते हैं। इसके पास सीबीआई और सीवीसी के अधिकारों को मिलाकर अधिकार होंगे और इसके दायरे को व्यापक रखा जाएगा। इसके पास पुख्ता कानूनी ढ़ांचा होगा।
     इसके अलावा अन्ना हजारे ने प्रेस कॉफ्रेस में एक बेहद अपमानजनक और घटिया बात कही है और यह भारत के नागरिकों के लिए अपमानजनक है। अन्ना से जब पूछा गया कि आप चुनाव लड़ेंगे तो उन्होंने कहा नहीं, मैं चुनाव लडूँगा तो मेरी जमानत जब्त हो जाएगी। इसी क्रम में उन्होंने कहा भारत का मतदाता जागरूक नहीं है। वह सौ रूपये,एक शराब की बोतल में बिक जाता है। सुविधा के लिए टाइम्स ऑफ इण्डिया ( ‍11 अप्रैल 2011) की वह कटिंग यहां पेश कर रहा हूँ-
"His five-day fast for a strong anti-graft law drew groundswell support across the country, but social reformer Anna Hazare feels that if he contested an election, he will lose his security deposit.
"If I stand for election, I will lose my security deposit," Anna Hazare said jest-fully answering a question at a press conference on Sunday.

"(People) Take Rs100 and vote, take bottle of wine to vote, an election costs Rs 6-7 crore," he said.

Anna Hazare stressed that electoral reforms can rectify this situation.

"Give the option of dislike, if all candidates are bad, then voters will not vote for anyone," he said "
अन्ना नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं ? अथवा बहुत ही सुचिंतित ढ़ंग से बोल रहे हैं ? इस बयान में वर्तमान लोकतंत्र को लेकर गहरी घृणा झलक रही है और भारत के मतदाताओं का अपमान भी झलक रहा है।
   अन्ना भारत के अधिकांश वोटर घूसखोर नहीं हैं। यदि ऐसा होता तो 60 साल में लोकतंत्र में गर्व करने लायक कुछ नहीं होता। बहुत छोटा सेक्शन है जो घूस खाता है। लेकिन अधिकांश जनता बिना 100 रूपया लिए और शराब की बोतल लिए ही वोट देने जाती है। अन्ना अपनी झोंपड़ी से बाहर निकलो और पूछो मनमोहन सिंह -सोनिया-मोदी-नीतीश से क्या उन्होंने 100 रूपये और बोलत बांटी है ?
    अन्ना तुमको आज जो कुछ मिला है वह लोकतंत्र के कारण मिला है। सिविल सोसायटी के कारण नहीं। सिविल सोसायटी में गरीब नहीं रहते अन्ना। बहुत पहले अनेक समाजशास्त्री बता गए हैं कि सिविल सोसायटी में किस वर्ग के लोग रहते हैं। सिविल सोसायटी खाए-अघाए  और लोकतंत्र से भागे हुए लोगों का समाज है। ये लोकतंत्र के फल खाना चाहते हैं लेकिन लोकतंत्र के लिए कुर्बानी देने को तैयार नहीं हैं।
     अन्ना एक बात पर गंभीरता से सोचो यदि वोटर भ्रष्ट हो गया है और जैसा आप मानते हैं तो अब तक लोकतंत्र चल कैसे रहा है ? अन्ना क्या अमेरिका में लोकतंत्र की दोषरहित,मनी पावर रहित व्यवस्था है ? अन्ना आप जानते हैं लोकतंत्र कमजोर का अस्त्र है लेकिन इसकी कमाण्ड अभिजन और पूंजीपतियों के हाथों में है।
     अन्ना आप कल्पना में रहते हैं लोकतंत्र कल्पना से नहीं चलता। लोकतंत्र महज नियमों से भी नहीं चलता। लोकतंत्र में जनता की शिरकत और लोकतांत्रिक संरचनाएं ही हैं जो उसे ताकतवर बनाती हैं। लोकतंत्र की धुरी है लोकतांत्रिक मनुष्य। आपकी सिविल सोसायटी और उससे जुड़े चिंतक अपने को डेमोक्रेट नहीं सुपर डेमोक्रेट समझते हैं।
     मेरा सवाल है आप चुनाव में भाग क्यों नहीं लेते ? आपकी बात मानी जाए लोकतंत्र मनीतंत्र से मुक्त हो जाए तब क्या आप और सिविल सोसायटी वाले भाग लेंगे ? लोकतंत्र कैसा होगा यह इस बात से तय होगा कि भारत के लोग कैसे हैं ? लोकतंत्र में जैसा मिट्टी-पानी-सीमेंट लगाएंगे वैसा ही लोकतंत्र बनेगा। लोकतंत्र का कच्चा माल विदेश से नहीं आएगा,स्वर्ग से भी नहीं आएगा। यह काम मात्र चुनाव सुधारों से होने वाला नहीं है। लोकतंत्र मात्र चुनाव सुधार का मसला नहीं है। कितने भी चुनाव सुधार कर लिए जाएं पैसे की सत्ता बनी रहेगी।
  पैसे की सत्ता ,भ्रष्टाचार आदि को खत्म करने का एक ही सुझाव है अन्ना जो किसी जमाने में मार्क्स ने दिया था व्यक्तिगत संपत्ति का खात्मा। अन्ना आप मार्क्स के इस सुझाव को मानेंगे ? जब व्यक्तिगत संपत्ति का स्वामित्व ही नहीं होगा तो संपत्ति से जुड़ी बहुत सारी बीमारियां भी नहीं होगी।
     लेकिन मैं जानता हूँ अन्ना आपको मार्क्स से नफ़रत है। कम्युनिस्टों से घृणा है। आपको तो मोदी से प्यार है। आपके अनुसार मोदी ने ग्रामीण विकास के लिए सुंदर काम किए हैं । अन्ना हम जानना चाहते हैं नरेन्द्र मोदी ने कितने एकड़ जमीन गुजरात के भूमिहीन किसानों में भूमि सुधार कार्यक्रम के तहत वितरित की ? अन्ना इस मामले मे आप नीतीश कुमार से भी पूछ लें कि गांव के गरीबों को क्या उन्होंने फाजिल जमीन दी है ? अन्ना  जरा एनडीए की सभी सरकारों से पूछें कि क्या उन्होंने भूमिसुधार कार्यक्रमों के तहत खेतिहर मजदूरों को जमीन दी है ? नहीं अन्ना नहीं। आप इतनी जल्दी अपने असली अभिजन रंग में सामने क्यों आ गए ?
     अच्छा अन्ना बताओ हिटलर के विकास मॉडल पर आपके क्या विचार हैं ? मोदी ने गुजरात में जो किया है उसे किसी भी कीमत पर माफ नहीं किया जा सकता । मोदी का विकास मॉडल अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारहनन पर आधारित है। क्या आप ऐसे विकास मॉडल को पसंद करते हैं जहां अल्पसंख्यक आतंकित,असुरक्षित रहें ? उनके खिलाफ लगातार घृणा का प्रचार किया जाए ? अन्ना आप कभी गुजरात में हुए अल्पसंख्यक विरोधी हमलों के खिलाफ गुजरात में मोमबत्ती जुलूस लेकर क्यों नहीं निकले ? आपने गुजरात की हिंसा के खिलाफ आमरण अनशन का मन भी नहीं बनाया। अन्ना क्या गांधी ऐसे ही साम्प्रदायिकता से लड़े थे जैसे आप लड़ रहे हैं ?
       अन्ना क्या यह बताने की जरूरत है कि आपने मुंबई और महाराष्ट्र के दूसरे ठिकानों पर राजठाकरे के दल के लोगों के जो बिहारियों पर विगत में जो हिंसक हमले किए थे उस समय आपने हिन्दीभाषियों के महाराष्ट्र में आने पर आपत्ति जतायी थी। आपकी मराठी अंधक्षेत्रीयतावाद के प्रति गहरी आस्थाएं हैं। आप मानते हैं महाराष्ट्र सिर्फ मराठियों के लिए है।
   अन्ना आप कैसे बांधेगे देश को एकसूत्र में ? क्या इस देश को सिविल सोसायटी वाले एकजुट रखे हुए हैं ? क्या राजठाकरे और नरेन्द्र मोदी के विचारों के आधार पर नया भारत बनाना चाहते हैं ? अन्ना आप अच्छी तरह जानते हैं भारत को एकजुट बनाए रखने और लोकतंत्र को गतिशील बनाए रखने में 100 रूपये लेकर वोट देने वाले या शराब की बोतल लेकर वोट देने वाली अनपढ़-जाहिल जनता की केन्द्रीय भूमिका है। सिविल सोसायटी वाले कारपोरेट गुलामों और मीडियावीरों को तो भारत का सही में भूगोल और संस्कृति तक का ज्ञान नहीं है । वे बातों के वीर हैं।कर्मवीर नहीं हैं। सिविल सोसायटी आपके लिए ठीक हैं,लोकतंत्र के लिए नहीं।    
      अन्ना यह सही है आपने राजठाकरे और उनके दल की हिंसा का समर्थन नहीं किया लेकिन हिंसा करने वालों को दण्डित कराने के लिए भी आपने बयान तक नहीं दिया। यह भी सच है आपने मोदी की साम्प्रदायिक हिंसा का समर्थन नहीं किया लेकिन इतने भयानक गुजरात के दंगे देखकर भी आपकी आत्मा बेचैन नहीं हुई और मोदी और उनके लठैतों के खिलाफ आप गुजरात की सड़कों पर नहीं उतरे ?  अन्ना आपने ऐसी कायरता क्यों दिखाई ? गुजरात के दंगाईयों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने को लेकर आपका दिल नहीं मचला ? लोकपाल बिल से ज्यादा दंगों में मारे गए आम आदमी की समस्या महत्वपूर्ण है अन्ना । दंगे सीधे मानवाधिकारों पर हमला है । मानवाधिकारों पर क्रूरतम हमलावर के रूप में मोदी को सारी दुनिया जानती है लेकिन आपने मोदी को ही श्रेष्ठ मुख्यमंत्री का खिताब दे दिया। मोदी के शासन में देवालय,मजार,मस्जिद,चर्च आदि सब पर हमले हुए। अन्ना नहीं यह नहीं चलेगा।
      मोदी मानवाधिकार हनन का नायक है वह विकास पुरूष नहीं है। उसने गुजरात को साम्प्रदायिक आधार पर बांटा है और आप उसको आदर्श बता रहे हैं। अन्ना क्षमा करें मोदी गुजरात में आतंक का पर्याय है। अल्पसंख्यकों के मन और समाज को उसने तबाह किया है। आपको अल्पसंख्यकों की तबाही नहीं दिखाई दी,मेरे लिए इसमें आश्चर्य नहीं हुआ ।क्योंकि आप अपने तथाकथित सर्वजन प्रेम के मुहावरे पर चल रहे हैं। आप जिस भाव में हैं वह कम से कम गांधी का भाव नहीं है। अन्ना इस समय सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार करने वाले कारपोरेट घरानों के संगठन भी आपके साथ हैं। फिक्की से लेकर एस्सोचैम तक सभी ने आपका समर्थन किया है। मनमोहन से लेकर आडवाणी तक,माओवादियों से लेकर मोदीतक,ममता से लेकर माकपा तक भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल बिल के सवाल पर आपके साथ हैं और ये सभी राजनीतिक दल किसी न किसी बहाने कभी न कभी लोकपाल बिल को संसद में आने देने से रोकते रहे हैं।
   अन्ना एक बात का जबाब जरूर दो क्या लोकतंत्र में पैसे के बिना चुनाव लड़ सकते हैं ? क्या अमेरिका-ब्रिटेन -जापान-जर्मनी में लोकतंत्र में पैसा खर्च होता है ? आप जानते हैं लोकतंत्र पैसातंत्र है। इसे लेकर आम जनता को आप कल्पना की लंबी उड़ानों में क्यों ले जा रहे हैं ? आपकी टीम में संतोष हेगडे साहब हैं, ये जजसाहब आरक्षण विरोधी फैसला देने के कारण नाम कमा चुके हैं। जिन श्रीश्री रविशंकर को आपने अनशन तोड़ते धन्यवाद दिया वे भी आरक्षण के विरोधी हैं। अन्ना ध्यान रहे सामाजिक न्याय के बिना लोकपाल बेकार है। लोकपाल पैसे की लूट को कुछ हद तक रोक सकता है लेकिन सामाजिक असमानता,खासकर जातिभेद तो सामाजिक कोढ़ है और इस भेद को कम करने का यदि कोई उपाय सुझाया जाता है तो आपके समर्थकों की तलवारें म्यान से बाहर निकल आ जाती हैं। अन्ना आपकी सिविल सोसायटी में दलितों और मुसलमानों के लिए कोई एजेण्डा है ? आप 60 सालों से इन समुदायों के बारे में खामोश क्यों हैं ?  



















शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

फेसबुक पर बुद्धिजीवियों ने अन्ना हजारे के आमरण अनशन पर उठाए अहम सवाल


फेसबुक पर अन्ना हजारे के आमरण अनशन को लेकर अनेक बुद्धिजीवियों की बहुत ही सधी और सटीक टिप्पणियां विभिन्न वॉल पर प्रकाशित हुई हैं। उनमें से यहां पर कुछ प्रतिक्रियाओं को दे रहे हैं। ये प्रतिक्रियाएं अनेक सवाल पैदा करती हैं जो अन्ना हजारे ,मीडिया और भ्रष्टाचार से जुड़े हैं। हम चानते हैं पाठकगण इन सवालों पर गंभीरता के साथ विचार करें।



Dilip Mandal
अन्ना की एकमात्र मांग है लोकपाल बिल को बनाने में सिविल सोसायटी के लोगों की हिस्सेदारी हो। क्या सिविल सोसायटी के मेंबर्स का चुनाव होगा?

अन्ना हजारे की मांग संविधान विरुद्ध है। वे कानून की प्रक्रिया में उन लोगों की हिस्सेदारी चाहते हैं जो लोकतांत्रिक तरीके से नहीं चुने गए हैं। आप उन्हें चुन नहीं सकते, हटा नहीं सकते। एमपी, एमएलए को तो हम चाहे तो हटा सकते हैं। सिविल सोसायटी के इलीट का क्या करेंगे।


 दिलीप मंडल-
जिंदगी की गति
गांधी अभी जिंदा है! अन्ना की तबियत बिगड़ी तो समझो सरकारों की सेहत खराब होगी!

Dilip Mandal
सिविल सोसायटी वाले इलीट प्रफुल्लित हैं कि बिना चुनाव लड़े और चुनाव हारने के जोखिम के, देश का कानून बनाने में उनकी हिस्सेदारी हो जाएगी।


Dilip Mandal-
इस देश के संविधान में खामियां हो सकती हैं, फिर भी यह लोकतंत्र का आधार है। इसकी वजह से इस देश में लोगों को कई तरह की स्वतंत्रता मिली है। इसे एनजीओ के हाथ में नहीं सौंपा जा सकता।
Dilip Mandal-
अन्ना के अनशन का अंत कैसे होगा? Ravindra Kumar Goliya ji ने दो संभावनाएं बताईं हैं। या तो लंबे अनशन के बाद अन्ना गुजर जाएंगे। या सरकार जनलोकपाल विधेयक पर विचार करने के लिए तैयार हो जाएगी। रवींद्र जी का मानना है कि दूसरी वाली संभावना ज्यादा प्रबल है क्योंकि इसमें सरकार और अन्ना दोनों का काम बनता है।

एक और कमेटी, एक और विधेयक, एक और कानून... और लोकपाल बनेंगे दूसरे ग्रह के लोग जो देश में सुशासन ले आएंगे।





Dilip Mandal
दिल्ली में आदिवासी कोटा खत्म करने के खिलाफ 10,000 से ज्यादा आदिवासी जंतर मंतर पर प्रदर्शन करते हैँ। आपको पता भी नहीं चला क्योंकि मीडिया इस बारे में एक लाइन भी लिखने को तैयार नहीं था। अन्ना के समर्थन में 1,000 लोग मुश्किल से हैं, जिनमें से 200 से 300 या उससे भी ज्यादा मीडिया कर्मी होंगे। लेकिन उनके आंदोलन के बारे में पूरा देश जानता है।



Dilip Mandal
अन्ना का जो करवाना है दो दिन में करवा दीजिए। 8 अप्रैल से भारत बंद होगा। आईपीएल शुरू होगा। 1,000 करोड़ रुपए के विज्ञापन दांव पर होंगे। उस दौरान आप क्या देखेंगे अन्ना का आंदोलन या आईपीएल? मीडिया आपको आईपीएल देखने को मजबूर कर देगा। अन्ना अंदर के पन्नों पर जगह पाएंगे। या पहले पेज पर सिंगल कॉलम या संक्षेप में।... तो?... तो क्या, देखते रहिए।

Dilip Mandal
नीरा राडिया एक चैनल के कर्मचारियों के वेतन का बंदोबस्त करती हैं। उस चैनल ने कल भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना के आंदोलन को जोरदार तरीके से कवर किया। बरखा दत्त के चैनल में अन्ना की कवरेज कैसी है?



Anant Kumar Jha
पत्रकारिता विशुद्ध रूप से  व्यवसाय ही है,फिर एक बार इस बात को भारतीय मीडिया ने साबित किया है.जन लोकपाल विधेयक को लेकर प्रसिद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे द्वारा किए गए आमरण अनशन के समर्थन में पूरा भारतीय मीडिया क्यों और कैसे उतर आया इसे व्यवसायिक रूप से सझने की जरुरत है.पेश है दो उदाहरण:
लाइव इंडिया: इस चैनल ने यह पहल की है कि जो भी हमें देख रहा है और अन्ना के समर्थन में आना चाहते हैं। 53030 पर अपना नाम, शहर का नाम से अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं।
दैनिक भास्कर:दैनिक भास्कर ने भी ऐसी ही पहल करते हुए भ्रष्टाचार से त्रस्त सारा देश, जरूरी आपका भी एक संदेशनाम से एक मुहिम शुरू की है. dbpahal (स्पेस) आपका नाम (स्पेस) आपका संदेश। इसे 54567 पर भेज दीजिए।
 कुल मिलजुलकर यह चोखा धंधा है. भ्रष्टाचार से खिलाफ जनयुद्ध के नाम पर मीडिया क्या गुल खिला रहा है यह तो दिख रहा है.लगे हाथ इस महान कार्य में हाथ बटा रहे मीडिया घरानों को यह भी स्पष्ट कर देना चाहिए की एसएमएस  से होने वाली कुल कमाई का कितना हिस्सा इस पुनीत कार्य पर खर्च करेंगे.

Sandeep Kumar -
corruption like a cast.never go only it could be control in little bit.corruption is a reality like cast.we are talking and running for big fish.but the corruption which has spread on ground zero,how can be removed.how many people is aware about lok pal bill.how many victims of corruption is know the process to lodge the complain through lokpal bill if it implemented now.plz raise-up the voice to change the monopoly of bureaucrats.only and only solution is to enhance the literacy power.Anna hazare or more has awake up when 2g spectrum,aadarsh socety, e.t.c came.where crore has engaged.who is ready to agitate on jantar-mantar about 100,200 rupees which has become the official fees of block and other rural agency. if this types of crore scame were not come then where was our anna hazare,where was our anti-curruption supporter,where was our having intention anti-currupted media.////////kya itne dino se hamara desh ekdam sudh tha.ye media ko world cup ke baad ab trp isme nazar aa rahi hai.


Mukesh Bhargava -
Jan Lokpal bill Aur anna.Inse kuch hoga nhin.Aakhir ek beiman se nikalkar mamla dusre ke pass chala jayega. communal bhasha bol rhe hain anna.Bahut se beiman saath me jud gye hain.Media bahut phayada le jayega.Abhi kuch din pahle cricket ka tamasha chala tha. Kuch kar pane ki koshish hain,Shyad kuch ho paye...... Waise bhi jo bathe log hain kya kum chhal rhe hain.

Abhay Tiwari
सुषमा स्वराज: भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में हम अन्ना के साथ हैं!
(और आम तौर पर हम बेल्लारी बन्धुओं के साथ हैं)

Prabhat Pandey -
और यदुरप्पा के साथ .

Rajya Bardhan
Anna Hajare ne Uma Bharti aur Om Prakash Chautala ko manch se bhaga kar achcha kiya!!! Bhrashtachari bhrashtachar ko door nahi kar sakta..... Lekhakon ko nyatik samarthan dena chahiye......!!!!!!!!!



Ritu Raj
1973 में लोकनायक जय प्रकाश नारायण की उम्र थी 73 वर्ष; 2011 में अन्ना हजारे जी की उम्र है 72 वर्ष. क्या स्वतंत्र भारत के युवाओं को हमेशा बूढ़े कंधों की लाठी की ही ज़रूरत पड़ती रहेगी?

Atal Behari Sharma

Bahut dhansu sawal kiya he Rituraj bhai...... yuva log Cricket or Ketrina me mast he....


Ritu Raj
1975 में हमलोग युवा थे ... लेकिन मस्त थे हेमा और धर्मेन्द्र में ... आज कोई और युवा है ... वह भी मस्त है कैटरीना और क्रिकेट में. 1975 में भी भ्रष्टाचार ही मुद्दा था ... 2011 में भी भ्रष्टाचार ही मुद्दा है. कहीं कुछ अनकही बातें तो नहीं छिपी हुयी हैं इन तथ्यों में??

Upendraprasad Singh -

I feel that always corruption when reaches at certain level where explosion may take place the social system throw Lighting conductor to defuse and 1975 Sampurna Kranti experience tells us that from the womb of fight against corruption the icons of corruption like LALU and his mandali will take birth


Chandra Prakash Jha -

My friend Shahid Akhtar says अन्ना हजारे की मुहिम सेलीब्री‍टीज लूट लेना चाहते हैं। इस मुहिम को सेली‍ब्री‍टीज और मीडिया की चमक नहीं गांव की डगर चाहिए। गांव में जड़ जमाए भ्रष्‍टाचार पर हमला करना जरूरी है।
लेकिन लोग गांव की पगडंडियों तक नहीं जाना चाहते। राजधानी का राजपथ उन्‍हें मीडिया की चमक एवं सुर्खियां दे रहा है। शायद ही कारण है कि क्रिकेट और फिल्‍म के लोग इसमें ब...िछे पड़े हैं। लोगों के साथ अच्‍छे रैपो से उनका ब्रांड मूल्‍य जो बढ़ेगा।
Ritu Raj -
सुमन ... मैं पूरी तरह सहमत हूँ तुम्हारे मित्र से. मैं पिछले दो वर्षों से अपने गाँव में रह रहा हूँ ... यहाँ कि मीठी और कडवी सच्चाइयों को देख रहा हूँ ... अक्सर उन्हें झेल भी रहा हूँ ... हर कदम पर हो रहे भ्रष्टाचार का दर्शक भी हूँ ... और इसी लिय बार बार कह रहा हूँ ... हमारा समाज एक भ्रष्ट समाज है ... हम कभी भ्रस्ताचार के खिलाफ नहीं हैं ... हम भ्रष्टाचार के एक हद से बढ़ाने के खिलाफ हैं ... बस.


Ritu Raj-
 सुमन ... कुछ पत्रकार बंधू भी हैं जो इस बात से अत्यंत उत्साहित हो रहे हैं कि अन्ना जी को लारा दत्ता ने भी अपना समर्थन दिया है. ऐसे एक पत्रकार बंधू के किसी मित्र ने उन्हें टोक कर कह दिया कि लारा ने अपने आनेवाली फिल्म के प्रोमोशन के चक्कर में ऐसा कहा होगा तो वे बुरा मान गए !!!!


Ritu Raj -
फेसबुक पर लोग आमिर खान कि चिट्ठी, जो उनहोंने प्रधान मंत्री को लिखी है, उसे चाव से पढ़ रहे हैं ... लेकिन उन्हीं लोगों को यदि यह कहा जाय कि जाकर थोडा वक्त गाँव में बिताएं और वहाँ के हालातों को सुधारने की कोशिश करें तो वे बिदक जायेंगे.



Chandra Prakash Jha -

Shiv Sena too has supported Anna's latest venture and we know what Shiv Sena is. Anna's last such fast - a couple of years ago- was against some corrupt ministers on the Congress -NCP government in Maharashtra and one of them Suresh Dada Jain is now in Shiv Sena !!shtra


Chandra Prakash Jha -

Forget Lara , think of Barkha Dutts & Veer Sanghvis - do they have any moral right to voice against corruption?


Chandra Prakash Jha -

Won't be surprised if tomorrow A Raja and Shahid Balwa also lend their support from the jail to Anna's cause


Ritu Raj -


मैं बिहार का हूँ ... बिहार के गाँव में रहता हूँ. नीतीश कुमार फिलहाल मीडिया के हीरो हैं ... और भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ होने का दावा भी करते हैं. तरह तरह के नए नए कानून बनाये हैं उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ ... लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आम आदमी आज भी थाने में, ब्लाक में, बिजली विभाग में - अमूमन हर जगह - चूसा जा रहा है. लेकिन वह इस से विचलित नहीं है ... उसकी जीवन शैली का एक अंग बन गया है यह भ्रष्टाचार. आम आदमी इसे अब भ्रष्टाचार मानता ही नहीं है ... वह खुश होता है पैसे दे कर क्योंकि उसका काम हो जाता है ... अक्सर जायज़ काम के लिए भी वह पैसे खर्च करता है और काम करवा कर खुशी और गर्व से फूल कर घर लौट आता है. यह है जमीनी हकीकत ... लेकिन किसी मीडिया में इसकी कोई चर्चा नहीं होती क्योकि इसमें glamour नहीं है. अन्ना हजारे के अनशन में glamour है ... वह खास दिल्ली में है ... उसे आमिर खान और लारा दत्ता का समर्थन मिल रहा है ... फेसबुक गूँज रहा है अन्ना जी के समर्थन में. लेकिन भारत के गाँवों में भ्रष्टाचार बदस्तूर जारी है.

Ritu Raj -


जैसा कि सुमन ने भी थोड़ी देर पहले कहा ... भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून तो पहले से ही मौजूद हैं ... नए नए कानून बनने से भ्रष्टाचार समाज से समाप्त नहीं होगा ... चाहे वह एक नया लोकपाल कानून ही क्यों न हो. भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई दिल्ली में लड़ना बेमानी है ... इसे तो सुमन के मित्र के शब्दों में ... पगडंडियों पर उतरना होगा ... अन्यथा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाइयों का यह सिलसिला चलता रहेगा और भ्रष्टाचार अपनी जगह बरकरार रहेगा.


Chandra Prakash Jha -
Some Numbers : Just now my search on Goggle for 'corruption in India ' yielded' about 30,600,000 results in 0.07 seconds while the search for " Anna Hajare ' had about about 1,070,000 results in 0.08 seconds. Surely Corruption in India has much more base than Anna Hajare.

akshay Bakaya-


The Congress calling the "immensely respected" Anna Hazare a "maverick" & RSS agent is definitely a sign of cold feet.

Even in the 70s, it was Indira's knee-jerk Emergency rule that revived the dying RSS, jailing them and making heroes out of them. As in Tahrir square a corrupt régime's secret hope (or stragegy) would be that participants would commit violence (as too often in Palestine, Kashmir) so that the movement could be quickly labelled terrorist, naxalite, etc. and legitimately repressed by the state's always-stronger violence.

Great things seem possible if imagination and creativity infects this movement. Gene Sharp's handbook of non-violent revolution, as everywhere recently, can be a key source, especially the "198 Methods". See (and do pass on please) :


Asrar Khan-

ये अन्ना हजारे का साथ देने का विल्कुल सही वक्त है /..इसी बीच यह भी पता चला है की हमारे महामहिम प्रधानमंत्री ने कहा है की अन्ना हजारे किसी के बहकावे में आकार आमरण अनशन पर बैठ गए हैं /..इसके बाद लोगों ने प्रधान मंत्री से पूछना शुरू कर दिया है की क्या हजारे साहब बच्चे हैं..? पी यम साहब की बात आप लोगों को कैसी लगी ?

अण्णा हजारे की अगुआई वाले जन आंदोलन को सफलता मिलती दिख रही है और सरकार झुकती हुयी दिख रही हैा ऐसे में दुष्यंोत का एक शेर याद आता है 
कौन कहता है आसमां में नहीं हो सकता सुराख 
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों ।


सत्य को सत्य कहने की कीमत हर एक को चुकानी पड़ती है...कभी कभी तो खाना पीना भी मुश्किल हो जाता है.... यकीन ना हो तो अन्ना हजारे सा. को देख लीजिए...




कुछ महत्त्वाकांक्षी बुद्धिजीवियों और चुके हुए रिटायर्ड महत्त्वाकांक्षियों के अलावा.... अन्ना साहब हजारे के साथ कोई नहीं है.... यह कोई जन-आन्दोलन नहीं... एक समूह की कुछ मांगों को पूरा करवाने का आग्रह है.. हठ है...
......... भ्रष्टाचार कोई सरकारी महकमा नहीं जिसे सरकार पर दबाव बनाकर बंद करवा दिया जाय....भ्रष्टाचार आदमी के जीन में है... कोई बड़ा भ्रष्टाचारी है.. कोई छोटा...कोई बहुत छोटा...
.... पहले आंदोलन के अगुआ अपने निष्कलंक होने का प्रमाण जनता को दें... फिर जनता भी उनके साथ आएगी.....
.. मीडिया भी अपना रवैया ठीक करे.... एक अभिनेता को गाँधी जैसे महान, नेक और निष्पक्ष पुरुष से ऐरे-गैरे की तुलना न करे... गाँधी जी कभी गाँधी-टोपी पहन कर गाँधी बनने का नाटक नहीं करते थे....
इसे जन आंदोलन कहकर न पुकारा जाय... इससे इतिहास की आत्मा पीड़ित होगी...आने वाली पीढ़ी हमारा मजाक बनाएगी....


Ajay Rohilla -
अन्ना हजारे के लिए ....एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यों कहो इस अँधेरी कोठरी में एक रोशनदान है ...-दुष्यंत कुमार


Subodh Shukla -
कुछ प्रूफ रीडर बुद्धिजीवी और पेज ३ समाज-चिन्तक अन्ना के अनशन पर दिए जा रहे छोटे-छोटे भाषणों का पाठ मनु-स्मृति की तरह पेश कर रहे हैं. यह दुखद है. किन्तु संघर्ष और आन्दोलन, विचार की सामाजिक समझ एवं समस्या के व्यापक जनतांत्रिक आयामों की धुरी पर टिके होते हैं. अपनी तमाम सीमाओं और असमर्थताओं के बावजूद अन्ना आज लोकतांत्रिक नेतृत्व की एक विश्वसनीय इकाई बन कर उभरे है. इसमें संदेह नहीं.

पुष्पेन्द्र फाल्गुन-
हिन्दुस्तान एक ऐसा देश जिसे निरंतर किसी न किसी मसीहा की तलाश रहती है..., हर बात, हर काम के लिए मसीहा हैं हमारे पास, एक भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सलीके का मसीहा नहीं था, सो यह तलाश भी पूरी हुई अन्ना हजारे के रूप में..., तलाश पूरी, अपना काम ख़तम, अब भ्रष्टाचार के जिस भी मुद्दे को अपन लोग उठाएंगे, उम्मीद करेंगे कि अन्ना उस मुद्दे को अंजाम तक पहुंचाएं...







भ्रष्टाचार और अन्ना हजारे की मृग-मरीचिका


         समसामयिक दौर में प्रतीकात्मक आंदोलन हो रहे हैं। इन आंदोलनों को सैलीब्रिटी प्रतीक पुरूष चला रहे हैं। इस दौर के संघर्ष मीडिया इवेंट हैं। ये जनांदोलन नहीं हैं।अन्य प्रतीक पुरूषों की तरह अन्ना हजारे मीडिया पुरूष हैं। इवेंट पुरूष हैं। इनकी अपनी वर्गीय सीमाएं हैं और वर्गीय भूमिकाएं हैं। मीडिया पुरूषों के संघर्ष सत्ता सम्बोधित होते हैं जनता उनमें दर्शक होती है। टेलीविजन क्रांति के बाद पैदा हुई मीडिया आंदोलनकारियों की इस विशाल पीढ़ी का योगदान है कि इसने जन समस्याओं को मीडिया टॉक शो की समस्याएं बनाया है। अब जनता की समस्याएं जनता में कम टीवी टॉक शो में ज्यादा देखी -सुनी जाती हैं। इनमें जनता दर्शक होती है। इन प्रतीक पुरूषों के पीछे कारपोरेट मीडिया का पूरा नैतिक समर्थन है।  
     कारपोरेट मीडिया इस तरह की प्रतीकात्मक आंदोलनों को सुंदर कवरेज देता है। जरूरत पड़ने पर प्रतीक पुरूषों की जंग को लेकर उन्मादी ढ़ंग से प्रौपेगैण्डा भी किया जाता है। जैसाकि इन दिनों गांधीवादी अन्ना हजारे के दिल्ली में जंतर-मंतर पर चल रहे आमरण अनशन को लेकर चल रहा है। कारपोरेट मीडिया की इस भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को आने वाले आईपीएल क्रिकेट टूर्नामेंट के पहले खत्म हो जाना है। क्योंकि कारपोरेट मीडिया के बड़े दांव इस टूर्नामेंट पर लगे हैं। मजेदार बात है कि अन्ना हजारे ने विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट से आईपीएल क्रिकेट टूर्नामेंट के बीच की अवधि को अपने आमरण अनशन के लिए चुना है। उनका आमरण अनशन के लिए इस समय का चुनाव अचानक नहीं है। यह सुचिंतित रणनीति के तहत लिया फैसला है। यह क्रिकेट के जरिए हो रहे भ्रष्टाचार विरोधी मीडिया विरेचन की बृहत्तर प्रक्रिया का हिस्सा है।
    आश्चर्य की बात है अन्ना हजारे को केन्द्र सरकार में कोई भ्रष्ट मंत्री नजर नहीं आया ? उन्होंने अपने मांगपत्र में भ्रष्टाचार का कोई मामला नहीं उठाया ? किसी मंत्री का इस्तीफा नहां मांगा ? उन्हें प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगने की जरूरत भी महसूस नहीं हुई ? उन्हें न्यायपालिका में बैठे जजों में भी कभी भ्रष्टाचार नजर नहीं आया ? उन्हें हटाने के लिए भी वे कभी जंग के मैदान में नहीं उतरे। अन्ना हजारे और उनकी भक्तमंडली तो मात्र अपने मनमाफिक लोकपाल कानून चाहती है । सवाल यह है वे कानून बनाने तक ही अपनी जंग क्यों सीमित रखकर लड़ रहे हैं ? उनके पास भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई राजनीतिक कार्यक्रम क्यों नहीं है ? वे किसी भ्रष्ट मंत्री या प्रधानमंत्री को निशाना क्यों नहीं बना रहे ? क्या भ्रष्टाचार अ-राजनीतिक समस्या है ? क्या इसके खिलाफ अ-राजनीतिक संघर्ष से विजय पा सकते हैं ?    
    भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी केन्द्र सरकार के लिए यह सुकुन की घड़ी है। वे अन्ना हजारे को भ्रष्टाचार के खिलाफ चैम्पियन मानने को तैयार हैं। मीडिया भी उन्हें चैम्पियन बनाने में लगा है। केन्द्र सरकार लोकपाल बिल में राजनीतिक दलों के सुझावों को शामिल करने की बजाय अन्ना हजारे के बताए सुझावों को मानने को तैयार है। यह अ-राजनीतिकरण है।  यह देखना दिलचस्प होगा कि अन्ना हजारे ऐसा कौन सा नया सुझाव देते हैं जिसे पहले विभिन्न राजनीतिक दलों ने न दिया हो ?    
     अन्ना हजारे का संघर्ष प्रतीकात्मक है और उसकी सीमाएं हैं। इस संघर्ष में जनता कम है स्वयंसेवी संगठन ज्यादा शामिल हैं। पता किया जाना चाहिए कि देश के विभिन्न इलाकों में स्वयंसेवी संगठनों का कितना जनाधार है ? कई हजार स्वयंसेवी संगठन हैं और उनमें सुंदर सांगठनिक समन्वय है। वे सभी किसी भी मसले को सुंदर मीडिया इवेंट बनाने में माहिर हैं। अन्ना हजारे स्वयंसेवी संगठनों के भीष्म पितामह हैं। वे जब अनशन करते हैं तो सारे देश का मीडिया सुंदर ढ़ंग से हरकत में आ जाता है। उनके सहयोगी राष्ट्रीय स्वयंसेवक भी हरकत में आ जाते हैं।
        कारपोरेट मीडिया का आमतौर पर स्वयंसेवी संगठनों के संघर्षों और नेताओं को लेकर सकारात्मक भाव रहा है।  अनेकबार यह भी  देखा गया है कि स्वयंसेवी संगठनों को कारपोरेट मीडिया जमकर कवरेज देता है। केन्द्र सरकार और खासकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इन स्वयंसेवी संगठनों के पुराधाओं और स्वतंत्र चिंतकों को अपनी राष्ट्रीय परिषद में भी रखे हुए हैं। इससे कम से कम यह बात साफ है कि कांग्रेस का इन संगठनों के साथ विरोध-प्रेम का संबंध है। इस विरोध-प्रेम को हम अनेकबार देख चुके हैं। कांग्रेस को इन संगठनों से विचारधारात्मक तौर पर कोई खतरा नहीं है क्योंकि इनमें से अधिकांश को चुनाव नहीं लड़ना है। सिर्फ जन-जागरण का काम करना है। मनमोहन सिंह की सरकार की घोषित नीति है जन-जागरण का स्वागत है।
    अन्ना हजारे की इसबार की जंग अंततः राजनीतिक साख हो चुकी कांग्रेस की सुंदर रणनीति का अंग है। मसलन्,मनमोहन सिंह और कानूनमंत्री वीरप्पा मोइली ने कभी नहीं कहा कि हम अन्ना हजारे की बात नहीं मानेंगे। वे उनके दो सुझाव मान चुके हैं।देर-सबेर बाकी भी मान लेंगे। यह सत्ता और गांधीवाद की नूरा कुश्ती है। डब्ल्यू डब्ल्यू फाइट है। 
   मनमोहन सिंह की यूपीए-1 सरकार इससे पहले अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों के सूचना अधिकार कानून बनाने संबंधी सुझावों को मान चुकी है। हम थोड़ा वस्तुगत होकर देखें तो सारे देश में इस कानून की दशा-दुर्दशा को आंखों से देख सकते हैं।सवाल किया जाना चाहिए सूचना प्राप्ति अधिकार कानून लागू किए जाने के बाद कितने नेता,अफसर, नौकरशाह जेल गए ? खासकर राजस्थान में । क्योंकि सूचना अधिकार कानून का आधार क्षेत्र यही राज्य रहा है। क्या हम नहीं जानते कि 'नरेगा'  योजना में कितने बड़े पैमाने पर धांधली हुई है ?
      मैं जब अन्ना हजारे आंदोलन को देखता हूँ और उनके पक्ष में कारपोरेट मीडिया का कवरेज देखता हूँ तो मीडिया बुद्धि, विशेषज्ञों की बुद्धि,उनके राजनीतिक ज्ञान और इतिहास ज्ञान को देखकर दुख होता है कि वे कितने सीमित दायरे में अन्ना हजारे को रखकर महिमामंडित कर रहे हैं।
     अन्ना हजारे वैसे ही सरकारी संत हैं जैसे एक जमाने में विनोबा भावे थे जिन्होंने आपातकाल को अनुशासन पर्व कहा था। महान गांधीवादी बाबू जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार में 1973 में संपूर्ण क्रांति आंदोलन चला था और गुजरात में 1974 में नवनिर्माण आंदोलन चला था। गुजरात के आंदोलन की बागडोर गांधीवादी मोरारजी देसाई के हाथों में थी।बिहार में जयप्रकाश जी के हाथों में थी। ये दोनों ही आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ थे। इनमें लाखों लोगों ने शिरकत की थी। इन आंदोलनों से उस समय दिल्ली की गद्दी तक हिल गयी थी  
     आज दिल्ली में कुछ सौ लोग हैं अन्ना हजारे के जलसे में। दिल्ली में बाबू जयप्रकाश नारायण ने 20 लाख की रैली की थी। दिल्ली में कुछ सौ का जमघट और जयप्रकाश नारायण का महान आंदोलन ,जिसने समूचे बिहार को जगा दिया था। पटना में उस समय जितनी बड़ी रैलियां हुई थीं वैसी एक भी रैली अन्ना हजारे अभी तक नहीं कर पाए हैं। गुजरात में भ्रष्टाचार के खिलाफ मोरारजी देसाई ने 13 दिन तक आमरण अनशन किया था और गुजरात के मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। विधानसभा भंग की गई।लाखों लोगों ने उस समय गुजरात में शिरकत की थी।
    नरेन्द्र मोदी,लालूयादव,नीतीश कुमार आदि महान "ईमानदार" और "साफ छवि" वाले नेता इन संघर्षों की ही देन हैं। सबलोग जानते हैं संपूर्ण क्रांति के महान भ्रष्टाचार विरोधी बिगुल को बजाने वाले कालान्तर में बिहार के सबसे भ्रष्टनेता साबित हुए हैं।जे.पी आंदोलन के बाद बिहार में सबसे ज्यादा भ्रष्ट मुख्यमंत्री सत्तारूढ हुए हैं।
    अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बारे में एक सवाल उठता है कि अन्ना हजारे ने यही समय क्यों चुना ? वे ६० सालों से गांधीवादी सेवा कर रहे हैं। इस साल जितने घोटाले सामने आ रहे थे तब वे आमरण अनशन पर क्यों नहीं बैठे ? 
    मूल बात यह है कि मोरारजी देसाई भी तब अनशन पर बैठे जब चिमनभाई पटेल जैसे भ्रष्ट नेताओं का भ्रष्टाचार चरम  पर आ गया था। यही हाल बिहार का था। असल में गांधीवादी और स्वयंसेवी नेतागण पूंजीवादी व्यवस्था के लिए सेफ्टी बॉल्ब का काम करते हैं। अन्ना हजारे भी आमरण अनशन पर तब बैठे हैं तब कांग्रेस की केन्द्र सरकार भ्रष्टाचार के चरम पर पहुँच गयी है।     
    अन्ना हजारे की नजर में भ्रष्टाचार एक कानूनी समस्या है। वे इसके लिए मनमाफिक जन लोकपाल बिल चाहते हैं। मनमोहन सिंह जिस रणनीति पर चल रहे हैं उसमें वे अन्ना हजारे की सारी मांगे मान लेंगे। सवाल उठता है क्या इससे भ्रष्टाचार कम होगा ? क्या लोकपाल को कानूनी शक्तियाँ दे दी जाएंगी तो भ्रष्टाचार रूक जाएगा ? क्या भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जन लोकपाल बिल काफी है ? अन्ना हजारे के अनुसार उन्हें सिर्फ जन लोकपाल बिल चाहिए। अन्ना हजारे की सभी मांगें मानने से किसकी इमेज चमकेगी ? अन्ना हजारे की या मनमोहन सिंह की ? 
    नव्य उदार राजनीति की विशेषता है कि शासक वर्ग जनता की सकारात्मक भावनाओं का अपनी इमेज चमकाने के लिए इस्तेमाल करता है और उस काम में स्वयंसेवी संगठन उनकी मदद करते हैं। अन्ना हजारे का पूरा आंदोलन सीमित लक्ष्य के लिए है। यह जनांदोलन नहीं है। यह मीडिया इवेंट है। यह सैलीब्रिटी आंदोलन है।
   जरा हम लोग ठंड़े दिमाग से सोचें बाबू जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई के जनांदोलन के बाद बिहार और गुजरात में क्या भ्रष्टाचार कम हुआ ? जनता पार्टी की सरकार जिसका जन्म ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने लिए हुआ था उसका हश्र क्या हुआ ? जरा जयप्रकाश भक्त चन्द्रशेखर जी के प्रधानमंत्री काल को याद करें ? प्रधानमंत्री कार्यालय में खुलेआम भ्रष्टाचार होता था और कारपोरेट घरानों और मीडिया के वे सबसे लाडले प्रधानमंत्री थे और उनके पास बमुश्किल 44 सांसद थे। 
   सवाल यह है कि अन्ना हजारे भ्रष्टाचार को लोकपाल बिल तक सीमित क्यों रखना चाहते हैं ? जिस तरह जयप्रकाश नारायण-मोरारजी देसाई के साथ संघ परिवार था वैसे ही अन्ना हजारे के संघर्षों में संघ परिवार सक्रिय है । वे संघी नहीं हैं। गांधीवादी हैं। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस तरह जयप्रकाश नारायण-मोरारजी देसाई के पास ठोस राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था वैसे ही अन्ना हजारे के पास भी कोई दीर्घकालिक कार्यक्रम नहीं है।
    अन्ना हजारे के इस आंदोलन का बड़ा योगदान यह है कि वे मीडिया में भ्रष्टाचार को एक गैर राजनीतिक मुहिम बनाने में सफल रहे हैं। यह अ-राजनीति की राजनीति है। देश में इस तरह की राजनीति करने वाला एक ही संगठन है वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।
    भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी जंग को अ-राजनीतिक बनाना,राजनीतिज्ञों को नपुंसक बनाना,हाशिए पर डालना यह नव्य उदार राजनीति है। इससे संघ परिवार को प्रच्छन्नतः वैचारिक मदद मिलती है। भाजपा के राष्ट्रीय उभार को मदद मिलती है।
     अन्ना हजारे के आमरण अनशन के पहले मीडिया में कई महिनों से भ्रष्टाचार का व्यापक कवरेज आया है ।संसद लंबे समय तक ठप्प रही।  सरकार को मजबूरन वे सारे कदम उठाने पड़े जो वो उठाना नहीं चाहती थी। जिस समय प्रतिदिन भ्रष्टाचार के स्कैण्डल एक्सपोज हो रहे थे अन्ना हजारे चुप थे। संसद ठप्प थी वे चुप थे। सवाल यह है कि उस समय वे आमरण अनशन पर क्यों नहीं बैठे ? अब जब मनमोहन सिंह सरकार को सुप्रीमकोर्ट से लेकर जेपीसी तक घेरा जा चुका है तो अचानक अन्ना हजारे को भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं जन लोकपाल बिल के लिए आंदोलन की याद आयी। यह बिल 42 सालों से पड़ा था उन्होंने कभी संघर्ष नहीं किया। इस बिल में जितने जेनुइन सुझाव विपक्ष ने पेश किए उन्हें कांग्रेस ने कभी नहीं माना। अब ऐसा क्या हुआ है कि वे अन्ना हजारे के बहाने अपनी खोई हुई साख को पाना चाहते हैं ?
      अन्ना हजारे जानते हैं भ्रष्टाचार पूंजीवाद की प्राणवायु है। पूंजीवाद और खासकर परवर्ती पूंजीवाद तो इसके चल नहीं सकता। पूंजीवाद रहे लेकिन भ्रष्टाचार न रहे यह हो नहीं सकता। सवाल किया जाना चाहिए क्या अन्ना हजारे को पूंजीवाद पसंद है ? क्या परवर्ती पूंजीवाद में भ्रष्टाचार से मुक्ति संभव है ? काश ,अन्ना हजारे ने अमेरिका की विगत पांच सालों में भ्रष्टाचार गाथाओं को ही देख लिया होता। चीन के सख्त कानूनों के बाबजूद पनपे पूंजीवादी भ्रष्टाचार को ही देख लिया होता।
    अन्ना हजारे जानते हैं जन लोकपाल बिल इस समस्या का समाधान नहीं है। यह मात्र एक सतही उपाय है। सवाल यह है कि भ्रष्टाचार जैसी गंभीर समस्या के प्रति इस तरह का कानूनी नजरिया अन्ना हजारे ने कहां से लिया ?असल में अन्ना हजारे पूंजीवाद की सडी गंगोत्री में स्वच्छ पानी खोज रहे हैं यह मृग-मरीचिका है।      












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