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शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

मार्क्स और बाज़ार- प्रसिद्ध अर्थशास्त्री गिरीश मिश्र


भले ही सोवियत संघ और उसका समाजवादी खेमा अब अस्तित्व में नहीं है फिर भी वैज्ञानिक समाजवाद के जनक कार्लमार्क्स की प्रासंगिकता कम नहीं हुई हैं। 
वस्तुत: अतिमंदी के वर्तमान दौर में जिन चार चिंतकों के प्रति झुकाव बढ़ा है उनमें कार्लमार्क्स प्रमुख हैं। तीन अन्य है : जॉन मेनार्ड केंस, उपन्यासकार ऐन रैंड और हीमान मिंस्की। वर्ष 2002 में न्यूयार्क से छपी जेर्री जेड मुल्लर की पुस्तक 'द माइंड एंड द मार्केट' में रेखांकित किया गया है कि एक राजनीतिक आन्दोलन के रूप में मार्क्सवाद के प्रति तत्काल आकर्षण कम हुआ लगता है मगर विश्लेषण के आधार और बाजार की समीक्षा के रूप में उसकी प्रासंगिकता बरकरार है। इस आकर्षण के पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला, मार्क्स द्वारा औद्योगिक मजदूर वर्ग की बढ़ती भौतिक विपन्नता का जोरदार तथ्यात्मक विवेचन और उसके पीछे बाजार की भूमिका को उजागर करना। दूसरा बाजार में अन्तर्निहित प्रतिस्पर्धा को मानव संबंधों को पशु संबंधों के बराबर लाने के लिए जिम्मेदार ठहराना। बाजार द्वारा लोगों को हमेशा के लिए पेशा विशेष की जंजीर में जकड़ रखने के तथ्य को उजागर कर उसके अमानवीय स्वभाव को स्पष्ट करना।
मार्क्स का सामना पूंजीवाद बाजार से पहली बार हुआ जब वे 'राइनिशे साइतुंग' के संपादक थे। राइनलैंड के किसानों पर उस समय मुकदमा किया गया था कि उन्होंने जंगल से ईंधन के लिए लकड़ी इकट्ठी की जबकि जंगल सामंतों की निजी संपत्ति थी। जांच के बाद मार्क्स ने पाया कि जंगल से जलावन के लिए किसानों द्वारा लकड़ी लेना नया नहीं था। किसान ऐसा करना अपना परंपरागत अधिकार मानते थे। सामंतों द्वारा उनको इस प्रचलित रिवाज से वंचित करने की कोशिश उनके द्वारा पूंजीवादी दृष्टिकोण अपनाने का परिणाम था। किसानों के साथ उनका पुराना संबंध खत्म हो गया था और उनके ऊपर निजी संपत्ति और मुनाफे का भूत हावी हो चुका था। इस कारण चोरी की परिभाषा भी बदल गई थी।
उधर इंग्लैण्ड में रहते हुए फ्रेडरिक एंगेल्स ने महसूस किया कि बाजार अब पारस्परिकता के सिध्दांत पर आधारित नहीं रह गया है। उस पर लालच सवार हो गया है। यही लालच एडम स्मिथ ने 'स्वहित' के बतौर पेश किया था। एंगेल्स का निष्कर्ष था कि पूंजीवाद प्रतिस्पर्धा पर आधारित होने के कारण आदमी को आदमी से भिड़ाता है। इस तरह सब परस्पर युध्दरत हैं। लोग भुक्खड़ जानवर की तरह एक दूसरे को निगलने के लिए तत्पर हैं। बाजार में व्याप्त अनिश्चितता ने लोगों को सट्टेबाज बना दिया है। मार्क्स पर एंगेल्स के इस विश्लेषण का गहरा असर पड़ा जो उनकी कृतियों को पढ़ने से स्पष्ट है। वर्ष 1844-45 मार्क्स और एंगेल्स ने अपने विचारों को स्पष्ट और सुव्यवस्थित करने में व्यतीत किया। उन्होंने कई खंडन-मंडन वाली पुस्तकें लिखीं। उन सब का प्रकाशन तुरंत न हो सका। जिस पुस्तक का उनके विचारों के सार संग्रह बतौर प्रकाशन हुआ और जिसने यूरोप में तहलका मचा दिया वह थी 'कम्युनिस्ट में निफेस्टो' या 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र'।
इसमें उन्होंने उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का वर्णन किया है जिसने बाजार को जन्म दिया। उन्होंने यह तथ्य उजागर किया कि व्यक्तिगत स्वहित पर आधारित बाजार ने पहले की सारी पहचानों को धराशायी कर दिया है जो पुश्तैनी हैसियत, राष्ट्रीयता, धर्म आदि पर आधारित थीं। इसके परिणामस्वरूप मनुष्य श्रमशक्ति धारक माल यानि क्रय-विक्रय की वस्तु में बदल गए और उनका मानवीय पहलू लुप्त-सा हो गया। उनकी नई कानूनी स्वतंत्रता ऐसा आवरण बन गई जिसने बाजार में माल के रूप में बनी उनकी असली हैसियत को ढंकने का काम किया। वस्तुत: तत्कालीन नई परिस्थितियों में उसने उन्हें नए प्रकार का गुलाम बना दिया। जिनका अपने समय और शरीर पर पहले की अपेक्षा काफी कम नियंत्रण रह गया।
इसके बावजूद मार्क्स ने बाजार द्वारा परम्परागत पहचानों को मिटाए जाने को एक सकारात्मक घटना बतलाई। उसने धार्मिक धारणाओं और रीति-रिवाजों द्वारा युगों से ओढ़ाई गई भ्रांति की चादर को उतार फेंका। जिससे वे अपनी असली पहचान को देख पाने में सक्षम हो गए। उनमें से अधिकतर यह जान पाए कि वे शोषित-उत्पीड़ित मजदूर या सर्वहारा वर्ग के सदस्य हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि पूंजीवाद द्वारा लाई गई संपदा और प्रौद्योगिकी मानव समाज की वास्तविक मुक्ति को संभव बनाएगी और लोग प्रकृति एवं अभाव के बंधनों से स्वतंत्र हो पाएंगे।
मार्क्स का कहना था कि बाजार से सबसे अधिक फायदा पूंजीपति वर्ग को होता है जो आरंभ में क्रांतिकारी भूमिका अदा करता है और निंरतर रूपांतरण की प्रक्रिया को आरंभ करता है। जिसके दूरगामी परिणाम हैं और जिससे कोई भी अछूता नहीं रह पाता। उत्पादन के साधन लगातार बदलते हैं जिनसे न सिर्फ आर्थिक बल्कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी भारी परिवर्तन होते हैं। मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा: अमेरिका की खोज और उत्तमाशा अंतरीय का रास्ता निकाल लेने से उदीयमान पूंजीपति वर्ग के प्रसार के लिए नया क्षेत्र खुल गया। ईस्टइंडीज और चीनी बाजारों, अमेरिका के उपनिवेशीकरण, उपनिवेशों के साथ व्यापार, विनियम के साधनों और माल उत्पादन में आम वृध्दि ने वाणिज्य, नौ परिवहन और उद्योग को, और फलस्वरूप लड़खड़ाते हुए सामंती समाज के क्रांतिकारी तत्वों को तेजी के साथ विकास करने का अभूतपूर्व अवसर दिया।
उद्योग की सामंती प्रणाली, जिसमें औद्योगिक उत्पादन पर बंद दरवाजों वाले शिल्प संघों का एकाधिकार होता था, नए बाजारों की बढ़ती हुई जरूरतों की पूर्ति के लिए अब काफी न थी। अत: उसकी जगह विनिर्माण ने ले ली। शिल्प संघ के उस्ताद कारीगरों को विनिर्माता मध्यम वर्ग ने ढकेलकर एक ओर कर दिया। अलग-अलग निगमित शिल्पसंघों का श्रम-विभाजन प्रत्येक पृथक-पृथक वर्कशाप के श्रम विभाजन के आगे लुप्त हो गया। इस बीच बाजार बराबर बढ़ते गए और माल की मांग भी निंरतर बढ़ती गई। तब भाप और मशीन के उपयोग ने औद्योगिक उत्पादन में क्रांति पैदा कर दी। अत: मैन्युफैक्चर का स्थान दैत्याकार आधुनिक उद्योग ने और मध्यम वर्ग का स्थान औद्योगिक धन्नासेठों ने, पूरी की पूरी औद्योगिक फौजों के नेताओं ने, आधुनिक पूंजीपतियों ने ले लिया। आधुनिक उद्योग ने विश्व बाजार की स्थापना की है, जिसके लिए अमेरिका की खोज ने पथ प्रशस्त कर दिया था। इस बाजार ने वाणिज्य, नौपरिवहन और थल संचार की जबर्दस्त उन्नति की। आगे चलकर इस उन्नति का प्रभाव उद्योग के विस्तार पर पड़ा, और जिस अनुपात में उद्योग, वाणिज्य, नौपरिवहन और रेल्वे में वृध्दि हुई, उसी अनुपात में पूंजीपति वर्ग ने उन्नति की और उसकी पूंजी बढ़ी; और उसने मध्य युग से चले आते हुए प्रत्येक वर्ग को पृष्ठभूमि में ढकेल दिया। पूंजीवादी बाजार के आगे बढ़ने के साथ ही पुराने सामंती संबंध धराशायी हो गए। उसने मनुष्य को अपने स्वाभाविक बड़ों के साथ बांध रखने वाले नाना प्रकार के सामंती संबंधों को निर्ममता से तोड़ डाला, और नग्न स्वार्थ के 'नकद पैसे-कौडी' क़े हृदय शून्य व्यवहार के सिवाय मनुष्यों के बीच और कोई दूसरा संबंध बाकी रहने नहीं दिया। धार्मिक श्रध्दा के स्वर्गोपम आनंदातिरेक को, वीरोचित उत्साह और कूपमंडूकतापूर्ण भावुकता को उसने आना-पाई के स्वार्थी हिसाब-किताब के बर्फीले पानी में डुबो दिया है। मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को उसने विनिमय मूल्य बना दिया है, और पहले के अनगिनत अनपहरणीय अधिकार पत्र द्वारा प्रदत्त स्वातंत्र्यों की जगह अब उसने एक ऐसे अंत:करण शून्य स्वातंत्र्य की स्थापना की है जिसे मुक्त व्यापार कहते हैं। संक्षेप में, धार्मिक और राजनीतिक भ्रमजाल के पीछे छिपे शोषण के स्थान पर उसने नग्न, निर्ला, प्रत्यक्ष और पाशविक शोषण की स्थापना की है।' जिन पेशों के संबंध में अब तक लोगों के मन में आदर और श्रध्दा की भावना थी, उन सब का प्रभामंडल पूंजीपति वर्ग ने छीन लिया। डॉक्टर, वकील, पुरोहित, कवि और वैज्ञानिक सभी को उसने अपना उजरती मजदूर बना लिया है। पूंजीपति वर्ग ने पारिवारिक संबंधों के ऊपर से भावुकता का पर्दा उतार फेंका है और पारिवारिक संबंध को केवल द्रव्य के संबंध में बदल डाला है। पूंजीवाद ने अपने बढ़ते माल उत्पादन के लिए बाजार की खोज में सारी दुनिया की खाक छानी। नवोदित उद्योगों के लिए कच्चे मालों की तलाश में दूरदराज गया। कालक्रम में तैयार और कच्चे माल के बढ़ते बाजार ने राष्ट्रीय एकांगीपन और संकुचित दृष्टिकोण को खत्म करना आरंभ किया। जिसका एक परिणाम हुआ साहित्य का उदय। पूंजीवादी उत्पादन का पैमाना बढ़ने से मालों का मूल्य घटा।
बाजार में टिके रहने की मजबूती उत्पादन के उपकरणों और प्रौद्योगिकी को निरंतर बेहतर बनाने के लए प्रेरित करती है। इस प्रकार पिछली व्यवस्थाओं की तुलना में पूंजीवाद निरंतर गतिशील मगर अस्थिर होता है। पुरानी मान्यताएं, विचार, पूर्वग्रह और मूल्य निरंतर तेजी से धराशायी होते जाते हैं। 'उत्पादन में निरंतर क्रांतिकारी परिवर्तन, सभी सामाजिक अवस्थाओं में लगातार उथल-पुथल, शाश्वत अनिश्चितता और हलचल ये चीजें पूंजीवादी युग को पहले के सभी युगों से अलग करती हैं। सभी स्थिर और जड़ीभूत संबंध, जिनके साथ प्राचीन और पूज्य पूर्वग्रहों तथा मतों की एक पूरी श्रृंखला जुड़ी हुई होती है, मिटा दिए जाते हैं, और सभी नए बनने वाले संबंध जड़ीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते हैं। जो कुछ भी ठोस है वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है वह भ्रष्ट हो जाता है और आखिरकार मनुष्य संजीदा नजर से जीवन की वास्तविक हालतों को मानव-मानव के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है।
बाजार में पूंजीपतियों के ऊपर भारी दबाव होता है जिससे वे श्रमिकों से अधिकाधिक अधिशेष मूल्य उगाहने की हर कोशिश करते हैं। इसके लिए कार्य दिवस को यथासंभव बढ़ाने की कोशिश होती है। इस दृष्टि से अभिनवीकरण द्वारा ऐसी मशीनों, उपकरणों और प्रौद्योगिकी को काम में लाया जाता है जिससे कम समय में यथासंभव अधिशेष मूल्य के सृजन के लिए दबाव हो। कहना न होगा कि बाजार जहां एक ओर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देता है वहीं मेहनतकशों को अपनी ताकत पहचानकर संगठित होने के लिए प्रेरित करता है।


शनिवार, 1 अगस्त 2009

समलैंगि‍कता: ग्‍लोबल गुलाबी बाजार

समलैंगि‍कता गुलाबी है। समलैंगि‍कता के सवाल हठात् मीडि‍या चर्चा के केन्‍द्र में आ गए और लंबी चौडी तर्क पद्धति‍ के जरि‍ए इस समस्‍या के अनेक आयाम खोले गए हैं। समलैंगि‍कता के सामाजि‍क,शारीरि‍क और सांस्‍कृति‍क आयामों के अलावा उसका एक बाजार आयाम भी है जो अन्‍य सभी आयामों से ज्‍यादा ताकतवर और निर्णायक है। समलैंगि‍कता महज शारीरि‍क और मानसि‍क स्‍वतंत्रता की समस्‍या नहीं है,इसका भूमंडलीकरण की प्रक्रि‍या और बाजार के साथ गहरा संबंध है।

समलैंगि‍कता की नयी हवा भूमंडलीकरण के साथ आयी है। उसने पर्यटन और बाजार के आवरण में अपना वि‍कास कि‍या है। पश्‍चि‍मी पर्यटकों का भारत आकर्षक केन्‍द्र बने इसके लि‍ए जरूरी है कि‍ यहां वे तमाम आकर्षण की चीजें मुहैया करायी जाएं जो उन्‍हें लुभा सकें। उन तमाम चीजों में से एक है समलैंगि‍कता। दूसरा महत्‍वपूर्ण कारण है कि‍ भारतीय बाजार को अब समलैंगि‍कों के पिंक ब्रॉण्‍ड की जरूरत है। पिंक ब्रॉण्‍ड को हिंदी में गुलाबी कहते हैं। अंग्रेजों के भारत में आने के पहले से ही समलैंगि‍कों को खासकर समलैंगि‍क लड़कों को गुलाबी लौण्‍डा कहने का भारत में रि‍वाज रहा है। आगरा, दि‍ल्‍ली, मथुरा,हाथरस,अलीगढ,लखनÅ आदि‍ के गुलाबी गालों वाले लड़के समलैंगि‍कों के रूप में चर्चि‍त रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि‍ गुलाबी का समलैंगि‍कता के साथ पुराना संबंध है। इसमें दूसरा तत्‍व मर्दानगी का भी जुड़ता है।

सारी दुनि‍या में मानवाधि‍कारों का जहां हनन होता है, उन मानवाधि‍कारों के हनन में समलैंगि‍कता पर पाबंदी भी शामि‍ल है। सारी दुनि‍या में तकरीबन 80 देश हैं जहां समलैगिंता पर कानूनी पाबंदी है। पश्‍चि‍म पर्यटकों में एक हि‍स्‍सा गे पर्यटकों का भी है और यह बहुत बड़ा पर्यटन बाजार है। कोई भी सरकार इस बाजार की उपेक्षा नहीं कर सकती। अभी तक भारत में पर्यटन की दुनि‍या में समलैंगि‍कता की उपेक्षा होती रही है। अब यह संभव नहीं लगता कि‍ इस बाजार की पर्यटन उद्योग उपेक्षा कर पाएगा। बल्‍कि‍ यह कहना ज्‍यादा सही होगा कि‍ पर्यटन उद्योग की पैकेजिंग का समलैंगि‍कता अन्‍तर्गृथि‍त हि‍स्‍सा बन जाएगी।

समलैंगि‍कों,लेस्‍बि‍यनों आदि‍ को ध्‍यान में रखकर पर्यटन पैकेज और प्रचार अभि‍यान तेजी पकड़ेगा। सारी दुनि‍या का तजुर्बा है कि‍ गे और लेस्‍बि‍यन समुदाय में जो लोग आते हैं उनके पास पैसा काफी होता है, यह बात दीगर है कि‍ हमारे यहां अभी अमीर समलैंगि‍कों की संख्‍या ज्‍यादा नहीं है। लेकि‍न दुनि‍या के अन्‍य देशों के बारे में यह अनुभव है कि‍ समलैंगि‍क ज्‍यादा पैसे वाले होते हैं। ये लोग पर्यटन ज्‍यादा करते हैं। भारत के समलैंगि‍क पर्यटन कम करते हैं। मैं नि‍जी तौर पर ऐसे अनेक समलैंगि‍कों को जानता हूॅ जि‍न्‍होंने कभी भ्रमण ही नहीं कि‍या। समलैंगि‍कों के पास मकान ज्‍यादा होते हैं,कारें खूब होती हैं, वे घूमते भी ज्‍यादा हैं। उनकी इलैक्‍ट्रोनि‍क सामान खरीदने में ज्‍यादा दि‍लचस्‍पी होती है। वे अमूमन नयी लुभावनी वस्‍तु को तुरंत खरीदते हैं। गे और लेस्‍बि‍यन कुल मि‍लाकर बाजार के दस फीसदी ग्राहक हैं।

समलैंगि‍कों की बाजार खरीद वि‍शि‍ष्‍ट प्रस्‍तुति‍ पर टि‍की है। कि‍सी भी कंपनी को अपना माल यदि‍ इस समुदाय के लोगों को बेचना है तो इनके स्‍वभाव,मूल्‍यबोध, संवेदनशीलता और भावबोध का ख्‍याल रखना होता है। खासकर फैशन,ऑटोमोबाइल्‍स, मनोरंजन, पर्यटन,इलैक्‍ट्रोनि‍क्‍स,वस्‍त्र आदि‍ की मार्केटिंग में समलैंगि‍क मुहावरे के प्रयोग आने वाले दि‍नों में बढ़ने की संभावना है। चूंकि‍ हमने अमरीका के बाजार की अंधी नकल करनी शुरू कर दी है अत: समलैंगि‍क बाजार के अमरीकी तर्क और मर्म को भी हमारा बाजार जल्‍दी ही पकड़ने लगेगा।

अकेले अमरीका में समलैंगिंक व्‍यक्‍ति‍यों की खरीददारी का बाजार 660 बि‍लि‍यन डालर का है जि‍सके सन् 2011 तक 835 बि‍लि‍यन डालर हो जाने की संभावना है। सन् 2004 में फार्चुन पत्रि‍का में सूचीबद्ध 100 कंपनि‍यों में से 36 फीसदी कंपनि‍यों ने सीधे समलैंगि‍कों को सम्‍बोधि‍त करते हुए वि‍ज्ञापन बाजार में उतारे। वि‍ज्ञापनों का अधि‍कांश हि‍स्‍सा प्रेस पर खर्च कि‍या गया। तकरीबन 223.3मि‍लि‍यन डालर प्रेस वि‍ज्ञापनों पर खर्च कि‍या गया। जबकि‍ ऑन लाइन गे मीडि‍या पर 20 मि‍लि‍यन डालर खर्च कि‍या गया। इसके अति‍रि‍क्‍त वायकॉम के द्वारा संचालि‍त 'लोगो' गे नेटवर्क पर 20 मि‍लि‍यन डालर खर्च कि‍या गया।

अनेक कंपनि‍यां हैं जो सीधे समलैंगि‍कों के लि‍ए ही प्रचार करती हैं, इनमें प्रमुख हैं एमरो वर्ल्‍ड वाइड , मान ट्रेवल और गे कनाडा । इसके अलावा अमेरि‍की कंपनि‍यों में न्‍यू कंसल्‍टिंग,कम्‍युनि‍टी मार्केटिंग ,पिंक बनाना मीडि‍या के नाम प्रमुख हैं। इंटरनेशनल गे एंड लेस्‍बि‍यन ट्रेवल एसोशि‍एशन दुनि‍या की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी व्‍यापारि‍क संस्‍था है जो गे व्‍यापार के क्षेत्र में अग्रणी है। इसके अलावा 1200 वि‍भि‍न्‍न रंगत के सदस्‍य हैं जो वि‍भि‍न्‍न तरीकों से पर्यटन सेवाओं के माध्‍यम से गे मार्केट को सम्‍बोधि‍त करते हैं। वे जानते हैं कि‍ कौन से हौटल और कौन से रि‍सार्ट को वि‍शेष रूप से समलैंगि‍कों के लि‍ए तैयार कि‍या गया है।

दि‍ल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय के फैसले के बाद भारत में समलैंगि‍कों की संख्‍या में बेतहाशा वृद्धि‍ होने की संभावना है। अमरीकी,ब्रि‍टि‍श, फ्रांस, जर्मनी,बेल्‍जि‍यम,कनाडा और आस्‍ट्रेलि‍याई समलैंगि‍क उद्योग की इस पर गि‍द्ध दृष्‍टि‍ लगी है।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...