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शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

कामुकता का जनोत्सव है बाबा रामदेव फिनोमिना

   बाबा रामदेव फिनोमिना मध्यवर्गीय घरों में घुस आया है। बाबा के सिखाए योगासन के अलावा उनकी बनाई वस्तुओं का भी बड़े पैमाने पर घरों में सेवन हो रहा है। देशी बाजार की उन्नति के लिहाज से यह अच्छा है। बाबा रामदेव को लेकर मुझे कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है। वे बहुत ही अच्छे योगी-व्यापारी हैं। उनका करोड़ों का योग व्यापार है। हजारों एकड़ जमीन की उनके पास संपदा है। करोड़ों रूपयों का उनका टर्न ओवर है। मेरे ख्याल से एक योगी के पास आज के जमाने में यह सब होना ही चाहिए।
    योग का पैसे से कोई अन्तर्विरोध नहीं है। आधुनिक समाज में अच्छा योगी, ज्योतिषी, पंडित, विद्वान, बुद्धिजीवी,राजनेता वह है जिसके पास वैभव हो,दौलत हो, वैभवसंपन्न लोग आते-जाते हों,उसकी ही समाज में प्रतिष्ठा है। आम लोग उसे ही स्वीकृति  देते हैं। जब किसी व्यक्ति का मन प्रतिष्ठा पाने को छटपटाने लगे तो उसे वैभवसमपन्न और संपदा संपन्न लोगों का दामन पकड़ना चाहिए। मीडिया का दामन पकड़ना चाहिए बाकी चीजें स्वतःठीक हो जाएंगी।
    बाबा रामदेव मुझे बेहद अच्छे लगते हैं क्योंकि उन्होंने धीरेन्द्र ब्रह्मचारी के बनाए मानकों को तोड़ा है। उन्होंने महर्षि महेश योगी, रजनीश आदि के बनाए मार्ग का अतिक्रमण किया है। एक जमाने में धीरेन्द्र ब्रह्मचारी का दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में जबर्दस्त रुतबा था। मीडिया रिपोर्ट बताती हैं कि वे स्व.श्रीमती इंदिरा गांधी को योग प्रशिक्षण देतेथे। योग को राजनीति ,संस्थान और बाजार के करीब लाने में स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी की बड़ी भूमिका रही है। वे  नियमित श्रीमती गांधी को योग शिक्षा देते थे। बाद में उन्होंने अपने काशमीर स्थित आश्रम में योग प्रशिक्षण शिविर लगाने शुरू कर दिए और श्रीमती गांधी पर दबाब ड़ालकर योग शिक्षक पदों की सबसे पहले केन्द्रीय विद्यालयों में शुरूआत करायी। मुझे याद है योग शिक्षक की नौकरी में स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी के योग संस्थान के प्रमाणपत्र की अहमियत होती थी।
   स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी ने अपने इर्दगिर्द राजनीतिक शक्ति भी एकत्रित कर ली थी और आपातकाल की बदनाम चौकड़ी के साथ भी उनके गहरे संबंध थे। स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी पहले आधुनिक संयासी थे जो योग को राजनीति के करीब लाए और योग को रोजगार की विद्या बनाया। योग को स्कूलों तक पहुँचाने की शुरूआत की। स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी ने योग को राजनीति से जोड़ा था ,बाबा रामदेव ने योग को देह ,स्वास्थ्य और सौंदर्य से जोड़ा है।
     जिस समय यह सब चल रहा था विदेशों में महर्षि महेश योगी और देश में आचार्य रजनीश ने मिलकर उच्चवर्ग,उच्च मध्यवर्ग और मध्यवर्ग में अपने पैर फैला दिए थे। गांव के गरीबों में बाबा जयगुरूदेव और उनके पहले श्रीराम शर्मा के गायत्री तपोभूमि प्रकल्प से जुड़ी युग निर्माण योजना ने बहुत जबर्दस्त सफलता हासिल की थी।
    मुश्किल यह थी कि स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी से लेकर बाबा जयगुरूदेव तक धर्म उद्योग पूरी तरह बंटा हुआ था,इनमें अप्रत्यक्ष संबंध था ऊपर से। लेकिन धर्म के क्षेत्र में श्रम-विभाजन बना हुआ था।
    बाबा रामदेव की सफलता यह है कि उनके योग उद्योग में उपरोक्त सभी का योग उद्योग में ही समाहार कर लिया है। बाबा के मानने वालों में सभी रंगत के राजनेता हैं। जबकि धीरेन्द्र ब्रह्मचारी का खेल सिर्फ श्रीमती गांधी तक ही सीमित था। बाबा रामदेव ने य़ोग के दायरे में समूचे राजनीतिक आभिजात्यवर्ग को शामिल किया है।
    उसी तरह आचार्य रजनीश की मौत के बाद मध्यवर्ग और उच्चवर्ग के बीच में जो खालीपन पैदा हुआ था उसे भरा है। रजनीश के अपनी ओर खींचा है, उस जनाधार को व्यापक बनाया है।
    महर्षि महेश योगी और रजनीश ने योग को कम्पलीट बहुराष्ट्रीय धार्मिक उद्योग के रूप में स्थापित किया था। बाबा रामदेव ने उसे एकदम मास मार्केट में बदल दिया और इन सबके जनाधार, राजनीतिक आधार,आर्थिक आधार, देशी बाजार,विदेशी बाजार आदि को सीधे सम्बोधित किया है और टेलीविजन का प्रभावी मीडियम के रूप में इस्तेमाल किया है। इस क्रम में अमीर से लेकर निम्न मध्यवर्ग और किसानों तक योग उद्योग का विस्तार किया।
      बाबा रामदेव फिनोमिना ऐसै समय में आया है जब सारे देश में नव्य उदार आर्थिक नीतियां तेजी से लागू की जा रही थीं और उपभोक्तावाद पर जोर दिया जा रहा था। भोग के हल्ले में बाबा रामदेव ने योग के भोग का हल्ला मचाया और भोग की बृहत्तर परवर्ती पूंजीवादी प्रक्रिया के बहुराष्ट्रीय प्रकल्प के अंग के रूप में उसका विकास किया।
    बाबा रामदेव फिनोमिना का कामुकता , कॉस्मेटिक्स और उपभोक्तावाद के अंतर्राष्ट्रीय प्रोजेक्ट के लक्ष्यों के साथ गहरा विचारधारात्मक संबंध है। मजेदार बात यह है कि बाबा रामदेव के भाषणों में बहुराष्ट्रीय निगमों के द्वारा मचायी जा रही लूट की आलोचना खूब मिलेगी। वे अपने प्रत्येक टीवी कार्यक्रम में बहुराष्ट्रीय मालों की आलोचना करते हैं और देशी मालों की खपत पर जोर देते हैं।
     इस क्रम में वे देशी माल और योग के ऊपर विशेष जोर देते हैं। इन दोनों की खपत बढ़ाने पर जोर देते हैं। इस समूची प्रक्रिया में बाबा रामदेव ने कई काम किए हैं जिससे नव्य उदार नीतियां पुख्ता बनी हैं। इन नीतियों के दुष्प्रभाव के कारण जो हताशा,थकान,निराशा और शारीरिक तनाव पैदा हो रहे थे उनका विरेचन किया है। इससे देशी-विदेशी बुर्जुआजी को बेहद लाभ मिला है। उन्हें इस तनाव को लेकर चिन्ता थी वे समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें ,उन्हें यह भी डर था कि कहीं यह तनाव बृहत्तर सामजिक तनाव का कारण न बन जाए। ऐसे में बाबा रामदेव का पूंजीपतिवर्ग ने सचेत रूप से संस्कृति उद्योग के अंग के रूप में विकास किया और उनकी ब्राण्डिंग की ।
    बाबा रामदेव फिनोमिना को समझने के लिए योग और कामुकता के अन्तस्संबंध पर गौर करना जरूरी है। योग का अ-कामुकता से संबंध नहीं है। बल्कि योग का कामुकता से संबंध है। नव्य उदार दौर में संभोग,शारीरिक संबंध,सेक्स विस्फोट,पोर्न का उपभोग, सेक्स उद्योग,सेक्स संबंधी पुरानी रूढियों का क्षय,कामुकता का महोत्सव सामान्य और अनिवार्य फिनोमिना के रूप में उभरकर सामने आए हैं। इस समूची प्रक्रिया को योग ने देशज दार्शनिक आधार प्रदान किया है विरेचन के जरिए।
    योगी लोग सेक्स की बात नहीं करते योग की बातें करते हैं,लेकिन योग का एक्शन अकामुक एक्शन नहीं होता बल्कि कामुक एक्शन होता है। इसका प्रधान कारण है योग की आंतरिक क्रियाओं का कामुक आधार। यह बात जब तक दार्शनिक रूप में नहीं समझेंगे हमें कामुक उद्योग और योग उद्योग के अन्योन्याश्रित संबंध को समझने में असुविधा होगी।  
   योगासन का समूचा तंत्र कामुकता से जुड़ा है। योग को तंत्रवाद का हिस्सा माना जाता है।  तंत्रवाद दार्शनिक तौर पर कामुक भावबोध,कामुक अंगों की इमेज और समझ से जुड़ा है। ऐतिहासिक तौर पर तंत्रवाद में सबसे ज्यादा उन अनुष्ठानों पर बल दिया जाता था जो स्त्री की योनि पर केन्द्रित थे. इसके लिए संस्कृत का सामान्य शब्द है ‘भग’,तंत्रवाद की विशिष्ट शब्दाबली में इसे लता कहते हैं।
      इस प्रकार भग केन्द्रित धार्मिक क्रियाओं को भग यज्ञ कहा गया जिसका शाब्दिक अर्थ है स्त्री के गुप्तांग का अनुष्ठान या लता साधना। उल्लेखनीय है कि तांत्रिक यंत्रों में ,अर्थात इसके प्रतीकात्मक रेखाचित्रों में स्त्री के गुप्तांग पर ही बल दिया जाता है। स्त्री की नग्नता का आख्यान सिर्फ भारत में ही उपलब्ध नहीं है बल्कि इसकी चीन,अमेरिका आदि देशों में परंपरा मिलती है। इसका स्त्रियों के कृषि अनुष्टानों के साथ गहरा संबंध है। यह विश्वव्यापी फिनोमिना है।
    भारत में भग योग या लता साधना पर गौर करें तो पाएंगे कि  तंत्रवाद में स्त्री की योनि का संबंध प्राकृतिक उत्पादकता से था। वह भौतिक समृद्धि की प्रतीक मानी गयी है. तांत्रिक परंपरा में भग को भौतिक समृद्धि के छःरूपों या ‘षड् ऐश्वर्य’के संपूर्ण योग का नाम दिया गया है।
    पुराने  विश्वास के आधार पर स्त्री की योनि सभी प्रकार की भौतिक समृद्धि का स्रोत है। स्त्री के गुप्तांग का भौतिक संपत्ति के साथ क्या संबंध रहा है इसके बारे में सैंकड़ों सालों से समाज ने सवाल पूछने बंद कर दिए हैं। किंतु यह उचित प्रश्न है और इसका एक ही उत्तर है कि स्त्री योनि भौतिक समृद्धि का स्रोत है। स्त्री के गुप्तांग के साथ समृद्धि कैसे जुड़ गयी इसके बारे में हम आगे कभी विस्तार से चर्चा करेंगे।
      बाबा रामदेव फिनोमिना और परवर्ती पूंजीवाद में एक बुनियादी साम्य है कि ये दोनों देहचर्चा करते हैं और दोनों ने देह को प्रतिष्ठित किया है उसे सार्वजनिक विचार विमर्श और केयरिंग का विषय बनाया है। देह की महत्ता को स्थापित करने मे कास्मेटिक उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस अर्थ में बाबा रामदेव और कॉस्मेटिक उद्योग एक जगह आकर मिलते हैं कि दोनों की चर्चा के केन्द्र में देह है।
    उल्लेखनीय है तंत्रवाद में सबसे ज्यादा देहचर्चा मिलती है। योग में सबसे ज्यादा देहचर्चा मिलती है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में देहचर्चा मिलती है,विज्ञापनों की धुरी है देहचर्चा। इस समूची प्रक्रिया में योगासन और प्राणायाम के नाम पर चल रहा समूचा कार्य-व्यापार देहचर्चा को धुरी बनाकर चल रहा है।
     देहचर्चा की खूबी है कि इसमें विभिन्न किस्म के भेद खत्म हो जाते हैं सिर्फ जेण्डरभेद रह जाता है। लेकिन स्त्री-पुरूष का भेद खत्म हो जाता है। देहचर्चा करने वाले स्त्री-पुरूष को समान मानते हैं।
   देहचर्चा ने जातिप्रथा और वर्णाश्रम व्यवस्था का तीखा विरोध किया था। प्राचीन कवि सरह पाद ने तो ‘देहकोश’ के नाम से महत्वपूर्ण किताब ही लिखी थी। सरह पाद ने ‘देहकोश’ में धर्म के औपचारिक नियमों और विधान की तीखी आलोचना लिखी थी।  एस.वी.दासगुप्त ने ‘आव्स्क्योर रिलीजस कल्ट्स ऐज बैकग्राउण्ड ऑफ बेंगाली लिटरेचर’’(1951) में लिखा है उसका प्रथम विद्रोह समाज को चार वर्णों में विभाजित करने की उस रूढ़िवादी प्रणाली के विरूद्ध था जिसमें ब्राह्मणों को सबसे उच्च स्थान पर रखा गया था। सरह का मानना है कि एक जाति के रूप में ब्राह्मणों को श्रेष्ठतम मानना युक्तिसंगत नहीं हो सकता क्योंकि यह कथन कि ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुए थे, कुछ चतुर और धूर्त लोगों द्वारा गढ़ी गई कपोल कल्पना है।’’
   मूल बात यह है कि देहचर्चा भौतिकवादी दार्शनिकों के चिंतन के केन्द्र में रही है। तंत्र और योग वालों ने इस पर कुछ ज्यादा ध्यान दिया है। सहजिया साहित्य में तो यहां तक कहा गया है कि ‘‘जिस व्यक्ति को अपनी देह का ज्ञान हो गया है वही सबसे प्रज्ञावान है। और यही संदेश सभी धर्मग्रंथों का है।’’ वे यह भी मानते हैं कि ‘‘सभी ज्ञान शाखाओं का आधार यह देह है।’’आगे लिखा है ‘‘ यहां (इस देह के अंदर) गंगा और यमुना है,यहीं गंगा सागर ,प्रयाग और काशी है और इसी में सूर्य तथा चंद्र हैं।यहीं पर सभी तीर्थस्थल हैं-पीठ और उपपीठ हैं।मैंने अपनी देह जैसा परम आनंद धाम और पूर्ण तीर्थ स्थल कभी नहीं देखा।’’
    कोई भी व्यक्ति जब योग-प्राणायाम करता है तो वह अपने शरीर को स्वस्थ रखता है साथ ही इसका मूल असर उसकी कामुकता पर होता है। उसकी कामुक इच्छाएं बढ़ जाती हैं. कामुक इच्छाओं का उत्पादन और पुनर्रूत्पादन करना इसका बुनियादी लक्ष्य है ,दूसरा लक्ष्य है देह को सुंदर बनाना और इस प्रक्रिया में वे तमाम वस्तुएं जरूरी हैं जो देह को सुंदर रखें और यहीं पर बाबा रामदेव अपने पूरे पैकेज के साथ दाखिल होते हैं। उनके पास देह को सुंदर बनाने की सारी चीजें हैं और यह काम वे बडे ही कौशल के साथ करते हैं। भारतीय परंपरा के प्राचीन ज्ञानाधार और चेतना के रूपों का योग-प्राणायाम के जरिए दोहन करते हैं और उसे संस्कृति उद्योग की संगति में लाकर खड़ा करते हैं। यह एक भौतिक और सभ्य बनाने वाला काम है।        






मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

पोर्नोग्राफी , कम्प्यूटर और औरत


       सामान्यत: पोर्न फिल्मों अथवा फिल्म में गैर-परंपरागत सेक्स के दृश्य रहते हैं। गैर-परंपरागत सेक्स की कोटि में मुख मैथुन, गुदा मैथुन,समूह मैथुन, मैथुन के वे रूप जो सामान्य मैथुन से भिन्न हैं और जिसमें शरीर को काफी कसरत करनी पड़े,अथवा जिसमें जटिल आसन आदि को रखा जा सकता है। जबकि गैर-परंपरागत सेक्स के स्थानों में घर ,होटल या बिस्तर के अलावा स्थानों को रखा जा सकता है। मसलन् किसी फर्नीचर पर सेक्स को गैर-परंपरागत सेक्स स्थान की कोटि में रखा जा सकता है। इस तरह के सेक्स को आए दिन फिल्मों और पोर्न फिल्मों में देखा जा सकता है। रोमैण्टिक संबंध में उन्मादी संबंध,पहली मुलाकात,यदाकदा मिलना,सुचिन्तित रूप में मिलना आदि को रखा जा सकता है।         
        विगत पच्चीस वर्षों में जिस तरह कम्प्यूटर नेटवर्क का प्रसार हुआ है  उसके कारण कम्प्यूटर और स्त्री के अन्तस्संबंध से जुड़े सवालों ध्यान गया है।इस प्रसंग में मुख्य सवाल यह है कि कम्प्यूटर साइंस और नेटवर्किंग में औरतों की हिस्सेदारी का स्वरूप क्या है ? सामाजिक संपर्क में स्त्री की क्या भूमिका है ? पोर्नोग्राफी में स्त्री की क्या भूमिका है ?
     सामान्यत: कम्प्यूटर साइंस के नेटवर्क से औरतों का अच्छा-खासा हिस्सा जुड़ा है। किन्तु शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी कम लड़कियां कम्प्यूटर साइंस पढ़ रही हैं। कम्प्यूटर नेटवर्क के कामकाज में लगी औरतों को आए दिन अनेक किस्म के शारीरिक उत्पीड़न और परेशानियों से गुजरना पड़ता है।खासकर सेक्सुअल उत्पीडन उसमें प्रमुख है। इंटरनेट ने सामाजिक संपर्क और संबंध की एक नई दुनिया का उदघाटन किया है। इससे कम्प्यूटिंग में भी मूलगामी बदलाव पैदा किया है , शिक्षा और सामाजिक संपर्क में मूलगामी परिवर्तनों की शुरूआत की है।
      अमेरिका में जहां सूचना क्रांति का श्रीगणेश हुआ,वहां पर कम्प्यूटर साइंस पढ़ने वालों में लड़कियों की संख्या नगण्य है। जेनेट कॉटरेल के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में 97 फीसदी फैकल्टी सदस्य (कम्प्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग विभाग) मर्द हैं, दो-तिहाई विभाग ऐसे हैं जहां एक भी औरत काम नहीं करती। अमेरिकी समाज में इस तरह के आंकड़े चौंकाने वाली बात नहीं है।
     बल्कि यह स्वाभाविक लगता है खासकर बच्चों में खिलौनों के प्रयोग के पीछे छिपे लिंगभेद को देखें तो बात समझ में जाएगी। अमेरिका में लड़कों में गणित के खिलौने और लड़कियों में बारवी डॉल का चलन है। इसके कारण बच्चों की मानसिकता बनाने में बड़े पैमाने पर मदद मिली है। वीडियोगेम और शिक्षा संबंधी सॉफ्टवेयर में आक्रामक खिलौनों जैसे बंदूक, मशीनगन, सैटेलाइट,मिसाइल,स्पेशशिप आदि को लड़कियां पसंद नहीं करतीं। लड़कियां कम्प्यूटर के एयरकंडिशंन लॉकरनुमा बंद कमरे का माहौल देखकर भी इस पेशे को नहीं अपनातीं। क्योंकि लॉकरनुमा बंद कमरा मूलत: मर्दवादी प्रकृति को व्यक्त करता है। यही वजह है कि कम्प्यूटर साइंस के माहौल को औरतों के स्वागतयोग्य बनाने,अनुकूल बनाने, स्त्री के लिए शारीरिक तौर पर सुरक्षित बनाने, कम्प्यूटर वाले कमरे में या स्क्रीन पर पोर्न के दृश्यों को लगाने,औरतों के प्रशिक्षण की अलग से व्यवस्था करने पर खास तौर पर ध्यान देने की जरूरत है।
      कम्प्यूटराइज संपर्क खासकर चित्रमय संपर्क बेहद खतरनाक है।इसका कभी भी दुरूपयोग हो सकता है। शिक्षा के मकसद से किया गया संपर्क जिसमें पाठ की भूमिका हो, वह उपयोगी है। किन्तु चित्र के माध्यम से किया गया संपर्क कभी भी खतरा पैदा कर सकता है।
     कम्प्यूटर और इंटरनेट में पोर्न का इस्तेमाल नैतिक रूप से सही है या गलत है,यह सवाल अभी तक हल नहीं हो पाया है। पोर्न का अबाध प्रसारण जारी है। यह जानते हुए भी कि पोर्न सामाजिक तौर पर और खासकर स्त्री के लिए घातक है,सारी दुनिया के देश इसका प्रसारण कर रहे हैं।
     पोर्न क्या है ? क्या पोर्न समाज के लिए घातक है ? पोर्न के संदर्भ में अभिव्यक्ति की आजादी और सेंसरशिप का अर्थ क्या है ? कम्प्यूटर पोर्नोग्राफी,कामुक उत्पीडन, कामुक हिंसाचार के बीच किस तरह का संबंध होता है ? इत्यादि सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं।
      औरतों के संदर्भ में इतनी परेशानियों के बावजूद औरतें बड़ी तादाद में कम्प्यूटर और इंटरनेट का प्रयोग कर रही हैं। क्योंकि यह तकनीक मूलत: औरतों के अनुकूल माहौल बनाती है। आज औरतों के लिए सबसे अच्छे संसाधन नेट पर उपलब्ध हैं।औरतों की समस्याओं पर काम करने वाले संगठनों की सामग्री और संपर्क उपलब्ध हैं। इसके कारण महिला सशक्तिकरण की दिशा में समाज आगे बढ़ा है। जरूरत इस बात की है कि औरतों को ज्यादा से ज्यादा नेट का उपयोग करना सिखाया जाए। यह सच है कि अभी भी नेट का पूरा माहौल मर्दवादी है,किन्तु यह स्थिति बदलनी चाहिए,इसके लिए स्त्रियों को आगे आना होगा, समाज के बाकी हिस्सों को उनमें साहस का संचार करना होगा।
           नेट का वर्चुअल जगत यूटोपिया के लिए आदर्श जगत है। यूटोपिया में जीने वालों के लिए इससे सुंदर जगह कहीं नहीं है। इसीलिए कुछ लोग इसे न्यूटोपिया भी कहते हैं। साइबरस्पेस हमारे पाठ की प्रकृति को बदल रहा है। इलैक्ट्रोनिक टेक्स्ट हमें गैर-टेक्स्ट के युग में ले जा रहा है।इसका अर्थ यह है कि अब हमें लिखने के लिए कागज की जरूरत नहीं होगी।अब लेखन पूरी तरह इलैक्ट्रोनिक अनुभव होकर रह जाएगा। साइबरस्पेस में मुद्रित सामग्री की आवश्यकता नहीं होगी। साइबर स्पेस स्वायत्त व्यक्ति का संसार बनकर रह जाएगा।इसका अर्थ है स्वयं की ईमानदारी ही सामाजिक प्रतिष्ठा का एकमात्र निर्धारक तत्व बन जाएगी।
    मुद्रित शब्द की सत्ता के लोप के बाद और ईमेल के विकेन्द्रीकृत रूप के आने के बाद लेखक और पाठक के नए संबंधों की शुरूआत हुई है। एक जमाना था मुद्रित सामग्री का मालिक संपादक हुआ करता था,यह सिलसिला अभी भी जारी है किन्तु भविष्य में ऐसा नहीं होगा।
     अब मुद्रित शब्द का मालिक लेखक ही होगा। वही उसका नियन्ता होगा।अब किसी भी बड़े लेखक के साथ कोई भी गुमनाम लेखक / लेखिका यूजनेट के खुले मंच पर अपनी रचना प्रकाशित कर सकता है। इसके कारण उसकी सामाजिक हैसियत भी बदल सकती है। लेखकों में छोटे-बड़े का भेदभाव ,महान् लेखक का बोध,रचना के चौकीदार के रूप में संपादक की भूमिका आदि में भी परिवर्तन गया है। लेखकों के बीच में नए किस्म का सामुदायिक भावबोध पैदा हो रहा है। यही स्थिति स्त्रीवाद की भी है।
    आज स्त्रीवाद के बारे में जितनी जानकारियां नेट पर उपलब्ध हैं उतनी जानकारियां पहले कभी नहीं थीं।महिला आन्दोलन और स्त्री के उत्पीडन का जितने व्यापक स्तर पर नेट ने उद्धाटन किया है वैसा पहले कभी नहीं हुआ। आज महिला आन्दोलन और स्त्री विमर्श सारी दुनिया के साथ संवाद और विमर्श कर रहा है। दूसरी ओर स्त्री विरोधी ताकतों के हमले भी तेज हुए हैं। पितृसत्ता के खिलाफ हमला करने वालों के खिलाफ एक तरह का जेहाद छेड़ दिया गया है।
लड़कियों के साथ खासकर कॉलेज / विश्वविद्यालय मे पढ़ने वाली लड़कियों के साथ उनके सहपाठियों के द्वारा की गई छेड़खानी अथवा गंदे चुटकुले सुनाने की प्रवृत्ति का भी मीडिया में अध्ययन किया गया है। इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण है परिभाषा। लड़की के साथ छेडखानी किसे कहा जाए ? यह छेड़खानी ऐसे सहपाठियों के द्वारा होती है जो साथ ही पढ़ते हैं। इन्हें प्रत्यक्षत: कोई विशेष अधिकार हासिल नहीं हैं। ये अपने साथ पढ़ने वाली लड़की को गंदे-गंदे चुटकुले ,कामुक आक्रामक टिप्पणियां या फब्तियां ,आवाजकशी , चिढ़ाना, कामुक ढ़ंग से निहारना,गंदे हावभाव का प्रदर्शन करना,अवांछित स्पर्श और चुम्बन के जरिए परेशान करते हैं,उत्पीडित करते हैं।
        मीडिया पंडितों में पोर्न के प्रभाव को गंभीर बहस चल रही है। पोर्न का दर्शकों के एटीटयूट्स और व्यवहार पर किस तरह का प्रभाव होता है ? सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि मीडिया में प्रसारित पोर्न सामग्री दर्शक के अन्दर कामुक झगड़ा और बलात्कार को जन्म देती है। हिंसक कामुकता का प्रदर्शन हिंसक प्रभाव पैदा करता है। प्रत्यक्ष नग्न सामग्री का आस्वाद औरतों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करता है।ऐसी सामग्री के दर्शकों में औरतों के प्रति हिंसाभाव ज्यादा पाया जाता है। हिंसक पोर्न के दर्शकों पर किए एक बड़े अनुसंधान से यह तथ्य सामने आया कि दर्शक यह मानते थे कि कामुक औरत के प्रति जो हिंसा दर्शायी गयी ,वह सही थी, क्योंकि वह औरत इसी के लायक थी। हिंसक वीडियो,फिल्म आदि के दर्शकों पर किए गए अनुसंधान बताते हैं कि इनका दर्शकों में हिंसाबोध पैदा करने में महत्वपूर्ण अवदान रहा है। कुछ ऐसे भी अनुसंधान हुए हैं जो यह मानते हैं प्रत्यक्ष कामुकता वाली मीडिया सामग्री का दर्शकों पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।



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