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मंगलवार, 26 जुलाई 2016

लेखकों में पतित बनने की होड़

        इस समय हिन्दी के सत्ताधारी प्रगतिशील-कलावादी लेखक बड़े कष्ट में हैं।इन लेखकों की मुश्किल यह है कि वे वगैर राजनेता के संरक्षण के साहित्य-सेवा नहीं कर सकते।नामवर सिंह अपनी साहित्य टीम लेकर मोदीजी के पाले में चले गए हैं ।जबकि प्रगतिशीलों की दूसरी टीम जिसके मुखिया अशोक बाजपेयी हुआ करते हैं, वे नीतीश कुमार से मिले हैं, उनके सान्निध्य में साहित्य-रक्षा की कसमें ली गयी हैं, उनके साथ मंगलेश डबराल,अपूर्वानंद,विष्णुनागर,सीमा मुस्तफा,प्रिय दर्शन आदि मिले हैं, ये लोग राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प सुझाएंगे।

कायदे से लेखकों को इस तरह के राजनीतिक संरक्षण से बचना चाहिए।हम जानना चाहते हैं कि क्या जर्मनी के किसी लेखक ने हिटलर से लड़ने के लिए राजनीतिक संरक्षण मांगा थाॽ यह कौन सी राजनीति हो रही है कि लेखक को समाज में काम करने के लिए राजनीतिक संरक्षण चाहिए ! राजनीतिक संरक्षण वस्तुतः लेखक की गुलामी है । कम से कम नीतीश कुमार के बारे में यह साफ रहना चाहिए कि उनका कला-साहित्य-संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है।यदि वे साहित्य-कलाओं के प्रति इतने ही गंभीर होते तो बिहार की दुर्दशाग्रस्त अवस्था न होती। लेखक काम करना चाहते हैं तो करें स्वतंत्र रूप से काम।कौन रोक रहा है।लेकिन संरक्षण लेकर काम करना लेखक के लिए मुसीबतें पैदा करता है।

असल में नामवरसिंह और अशोक बाजपेयी में यह सत्ता का अघोषित बंटबारा है, नामवरजी आप मोदी को संभालें, मैं (अशोक बाजपेयी) गैर मोदी सरकारों को संभालता हूं। इस तरह के साहित्यिक श्रम-विभाजन से साहित्य-कला –संस्कृति का कोई भला होने वाला नहीं है।दूसरी बात यह कि नीतीश बाबू चाहते हैं अशोक मंडली दिनकर को केन्द्र में रखे।हम जानना चाहते हैं क्या दिनकर के साहित्यिक बोझ को भी आज उठाना सही होगा ॽ

रविवार, 29 अप्रैल 2012

अमेरिकी पूंजी ,अशोक वाजपेयी और आलोचना का अवमूल्यन



            भारत में जब से फोर्ड फाउंडेशन जैसी अमेरिकी संस्थाओं का कला,साहित्य,संस्कृति,सिक्षा आदि में पैसा आना आरंभ हुआ है उसके बाद तेजी से आलोचना और अकादमिक अवमूल्यन आरंभ हुआ है। हिन्दी आलोचना और साहित्य में अमेरिकी हस्तक्षेप कोई नयी चीज नहीं है। कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के हिन्दी में आगमन के साथ यह सिलसिला 1951-52 के आसपास से आरंभ होता है।भारत भवन में फोर्ड फाउंडेशन के सहयोग से अशोक वाजपेयी एंड कंपनी का वैभव नई बुलंदियों को प्राप्त करता है।
   कांग्रेस का और खासकर स्व.अर्जुनसिंह का अक्षम्य सांस्कृतिक अपराध यह है कि इन लोगों ने भारत के शिक्षा संस्थानों और संस्कृति केन्द्रों के द्वार अमेरिकी संस्थाओं और फाउण्डेशनों के लिए खोल दिए।आज संस्कृति और शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में अमेरिकी दानदाता संस्थाओं की पूंजी का कृषि से लेकर संस्कृति तक व्यापक नेटवर्क फैला हुआ है। खासकर कृषि विश्वविद्यालयों से लेकर स्पीकमैके जैसी संस्थाओं, अकादमिक फैलोशिप से लेकर लाइब्रेरी तक यह नेटवर्क काम कर रहा है। अमेरिकी दानदाता संस्थाओं की व्यापक भूमिका को विस्तार देने में स्वयंसेवी संस्थाओं की भी बड़ी भूमिका रही है। इन संस्थाओं में अमेरिकी दौलत का खेल कई हजार करोड़ रूपये सालाना तक फैला हुआ है।शोध संस्थानों से लेकर विश्वविद्यालयों तक इस पैसे की नेटवर्किंग काम करती रही है।
      अमेरिकी बहुराष्ट्रीय सांस्कृतिकनिगमों की दान राशि के आने के बाद से ज्ञान,विज्ञान, कृषि,साहित्य,संस्कृति आदि के क्षेत्र में अवमूल्यन की प्रक्रिया ने तेज गति पकड़ी है। संयोग की बात है कि कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के साथ जुड़ने में जयप्रकाश नारायण,अज्ञेय,रामवृक्ष बेनीपुरी,पीलू मोदी आदि की भूमिका के बारे में कभी बहस ही नहीं हुई। इसी तरह एक जमाने में भारत भवन और फोर्ड फाउंडेशन के अंन्तस्संबंधों को लेकर थोड़ी बहुत बहस भी हुई ,लेकिन इस संबंध का हिन्दी आलोचना और साहित्य पर क्या असर हो सकता है इसकी ओर कभी ध्यान ही नहीं गया। प्रगतिशील लेखकों को राजनीतिरहित लेखक ते रूप में पेश करने में अशोक वाजपेयी के जमाने में भारत भवन से छपने वाली पत्रिकाओं की बड़ी भूमिका रही है और इस काम को प्रोत्साहन देने में प्रगतिशील लेखक संघ की पूरी लेखकमंडली का सक्रिय सहयोग रहा है।नामवर सिंह जैसे बड़े आलोचक ने भी अमेरिकी पूंजी के सांस्कृतिक प्रभाव को लेकर कभी एक शब्द भी नहीं बोला। यह आश्चर्य की बात है कि वे भारतभवन के सभी कार्यक्रमों में पूरी टीम के साथ हमेशा उपलब्ध रहते थे।
    साहित्य में अमेरिकी प्रभाव का सबसे प्रभावशाली मंत्र है साहित्य और साहित्यकार को राजनीति से मुक्त करके विश्लेषित करो। साहित्य को ग्लैमर बनाओ। इवेंट बनाओ। इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर साक्षात्कार और पूर्वाग्रह पत्रिकाओं ने हिन्दी के तमाम प्रगतिशील लेखकों पर अमेरिकी साहित्यवादी नजरिए से मोटे-मोटे अंक निकाले और इन अंकों में लिखने वाले लेखकों में हिन्दी के जाने-माने लेखकों की बड़ी भूमिका थी और इस भूमिका को नियोजित करने में अशोक वाजपेयी का मूल्यवान योगदान रहा है।        
    यह तथ्य रेखांकित किया जाना चाहिए तकि फोर्ड फाउंडेशन ,कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम आदि संस्थाओं के फंड के जरिए और अमेरिकी लक्ष्यों के अनुरूप लेखकों-साहित्यकारों –चित्रकारों-संगीतकारों और बुद्धिजीवियों को गोलबंद करने में भारत भवन ,अशोक वाजपेयी,अज्ञेय आदि की बड़ी भूमिका रही है।
    भारत भवन ,अमेरिकी नजरिए, प्रगतिशीलता की जुगलबंदी का यह दुष्परिणाम निकला कि प्रगतिशील लेखकों का एक बड़ा धड़ा भारतभवन और उसके 'सुकार्यों' का खुशी खुशी हिस्सा बन गया।  ये 'भोले लेखक' यह भूल ही गए कि सत्ता और अमेरिकी कारपोरेट पूंजी के सहमेल से महान समीक्षा और महान साहित्य नहीं रचा जाता। इतिहास ने यह सच साबित किया है कि भारतभवन से न तो कोई साहित्य आंदोलन पैदा हुआ और न नया साहित्य ही सामने आया। बल्कि साहित्य के आयोजनों के जरिए लेखकों के वैचारिक पंख कतर दिए गए। इस काम को अशोक वाजपेयी ने बड़ी दक्षता के साथ अंजाम तक पहुँचाया।
     संक्षेप में कहें तो भारतभवन और उनके प्रकाशनों के जरिए प्रगतिशील लेखकों के राजनीतिविहीन-विचारधाराविहीन मूल्यांकन करते हुए जो विशेष अंक आए उन्होंने आलोचना के अवमूल्यन का मार्ग प्रशस्त किया। इस समूची प्रक्रिया के सूत्रधार बने अशोक वाजपेयी।इस अर्थ में आलोचना के अवमूल्यन के भी वे ही प्रमुख सूत्रधार हैं। हिन्दी आलोचना की यह त्रासदी है वह इस प्रवृत्ति को पहचानने से भागती रही है और तकरीबन सभी समर्थ आलोचक इन दिनों अशोक वाजपेयी की मित्रमंडली का हिस्सा हैं और अब वे लोग मित्र-संवाद करते हैं, आलोचना नहीं करते।अशोक वाजपेयी के नजरिए में निहित आलोचना के अवमूल्यन का ताजा नमूना है 'जनसत्ता'( 23अप्रैल 2012) में एंड्रीन रीच पर लिखी छोटी सी टिप्पणी। इस टिप्पणी में अनेक बातें हैं जो रीच के आलोचक व्यक्तित्व पर रोशनी डालती हैं। इस सामान्य सी टिप्पणी में भी अशोक वाजपेयी अपने विचारधारात्मक खेल को खेलने से बाज नहीं आए हैं। अशोक वाजपेयी ने लिखा है " रीच का मत था कि सच्ची कविता विचारधारात्मक आज्ञापालक वृत्ति से बिलकुल अलग होती है।वह अज्ञात, अपरिचित,अनचीन्हे के बोझ को सहती है। उसे मनुष्य का भविष्य याद रहता है।" रीच के समग्र नजरिए के संदर्भ में देखें तो मामला कुछ और ही है।
रीच की चर्चित किताब है ," What is Found There: Notes on Poetry and Politics" , इसमें उन्होंने लिखा है कि 'कविता पढ़ना नजारे देखना नहीं है और कविता ठंड़ेपन के साथ ग्रहण भी नहीं की जाती। कविता का अस्तित्व तब है जब वो पढ़ी जाए। कविता का अस्तित्व पाठक से है और कविता में पाठक को होना चाहिए।'
 रीच असल में लेखक और पाठक दोनों की भूमिका को देखती हैं। उनका मानना है ' तुम जरूर लिखो और पढो, क्योंकि आपकी जिंदगी इस पर निर्भर है।... लिखो इसलिए क्योंकि जीवन निर्भर है अपने विश्वासों और पढ़ने पर।  लेखन में स्नप्निल संसार की तरंगे और सामान्य जीवन की कायिक संवेदनाएं व्यक्त होती हैं। '
     रीच ने सवाल उठाया है लेखक जो लिखता है क्या उस पर विश्वास किया जाय ? क्या लेखन भाषा का दुरूपयोग है ? होसकता है लेखक की कोई अप्रत्यक्ष मंशा हो ,जिसमें वह पाठक को कारण की तरह शामिल कर रहा हो, पाठक को गलियों में भेज रहा हो और आपकी संवेदनाओं की जानी-परखी प्राथमिकताओं की क्षमता को भाषा के जरिए अस्थिर करने की कोशिश कर रहा हो ?
    रीच की कविता की विशेषता है कि वे अपने ही लिखे पाठ के साथ निरंतर संवाद करती हैं , उनकी कोई अप्रत्यक्ष मंशा नहीं होती। अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि 'एड्रीन रिच कविता के महत्त्व को अतिरंजित करने से गुरेज करती रहीं, हालांकि वे मानती थीं कि हमारे कठिन समय में कविता की अनिवार्य भूमिका है। पर वे स्पष्ट थीं कि कविता राहत देने वाला कोई मरहम, कोई भावात्मक मालिश, एक तरह की भाषिक एरोमाथेरापी नहीं होती। न ही वह कोई ब्लूप्रिंट, कोई निर्देश-संहिता, न ही बिलबोर्ड होती है। कोई सार्वभौम कविता नहीं है- कई तरह की कविता और कई काव्यशास्त्र हैं।'
   'रिच यह लक्ष्य करने से नहीं चूकी थीं कि कविता के बारे में आलोचना-विमर्श में हमारे भौतिक अस्तित्व, वर्तमान और अतीत के बारे में बहुत कम कहा जाता है। वह इन छोटी सच्चाइयों को हिसाब में नहीं लेता कि कैसे हमारे भावात्मक जीवन पर यही छोटी चीजें अपनी छाप छोड़ती हैं: हम कैसे देखते हैं हवा में धुएं का एक धब्बा, दुकान की शो-विंडो में जूतों की एक जोड़ी, अपनी कार में सोई एक स्त्री, सड़क के मोड़ पर जमा लोगों का एक समूह, कैसे हम सुनते हैं एक हेलीकॉप्टर की मंडराती आवाज, छत पर बारिश, ऊपर की मंजिल पर रेडियो से आता संगीत, कैसे हम पड़ोसी की आंखों में या कि किसी अजनबी की आंखों में ताकते हैं या उन्हें बरकाते हैं। ये सभी दबाव हमारे देखने को प्रभावित करते हैं। अच्छी कविता इन्हें हिसाब में लेती है, इन्हीं से अपनी काया गढ़ती है।रिच का मत था कि सच्ची कविता विचारात्मक आज्ञापालक वृत्ति से बिलकुल अलग होती है। वह अज्ञात, अपरिचित, अनचीन्हे के बोझ को सहती है। उसे मनुष्य का भविष्य याद रहता है।'
सवाल यह है कि कविता की विचारधारा होती है या नहीं ? अशोक वाजपेयी अच्छी तरह जानते हैं कि एंड्रीन रीच की विचारधारा क्या है और वे कविता को किस रूप में देखती हैं और किस तरह अमेरिका के प्रगतिशील साहित्य,स्त्रीवादी आंदोलन,स्त्री साहित्य आदि के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वाजपेयी की रीच की आलोचना में जो चीज गायब है वह है अन्तर्विरोध का सवाल। एंड्रीनी रीच ने इस तथ्य की ओर ध्यान खींचा है कि कुछ लेखक  आत्म-सेंसरशिप का इस्तेमाल करते हैं,इसका गहरा संबंध उनके मूल्यबोध से है। इससे उनके सौंदर्यबोध का निर्माण भी होता है। खासकर राजनीतिक कविता के संदर्भ में रीच ने लिखा है कि राजनीतिक कविता के जल्द ही नारेबाजी में तब्दील हो जाने का खतरा रहता है। फलतः वह एकायामी,सरल,दैनंदिन आंदोलनवाली हो जाती है और उसे ही हम 'प्रतिवादी साहित्य' कहते हैं। इस तरह की कविता पुंस,गौरवर्ण,हैट्रोसेक्सुअल या मध्यवर्गीय परिप्रेक्ष्य की नहीं होती बल्कि हम उसमें सार्वभौम की कुर्बानी देते हैं। सिर्फ अन्याय पर कविताएं लिखकर हम कविता का दायरा सीमित करते हैं।
      अशोक वाजपेयी जानते हैं कि रीच की कविता राजनीतिक कविता है। रीच ने लिखा है राजनीतिक कविता में अन्तर्विरोध का केन्द्रीय महत्व है। राजनीतिक कविता को अनेक लोग बुरी कविता मानते हैं। उसमें सब-वर्सिब शक्ति मानते हैं। रीच ने इस तरह की आलोचना का खंडन करते हुए लिखा है कि "बुरे लेखन" में शक्ति कैसे आ सकती है ? इस प्रसंग में एंड्रीन रीच ने "सिएटल टाइम्स "(फरवरी,1999) को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि राजनीतिक कविता पदबंध का आलोचकों के द्वारा प्रयोग होस्टाइल मनोभाव से हुआ है।वे यह मानते हैं कि प्रौपेगैण्डा के लिए काव्य- सौंदर्य की बलि चढ़ा दी गयी है। लेकिन कविता की दुनिया बहुत बड़ी होती है। कविता में सार्वभौम क्षमता होती है,वह अपने अंदर विभिन्न विमर्श समेटे होती है ,फलतः सौंदर्य और राजनीति दोनों की अभिव्यक्ति करती है। रीच के अनुसार 'कविता को कवि के दैनंदिन जीवन से अलग नहीं किया जा सकता।सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन कवि के भावों को पुष्ट करते हैं।वह उनके साथ दीर्घकालिक तौर पर बंधा और व्यस्त होता है। फलतः कवि की कविता में ऐतिहासिक निरंतरता होती है इसके कारण वह न तो ऐतिहासिक निरंतरता से ऊपर होता है और न इतिहास के बाहर होता है।'


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शनिवार, 21 अप्रैल 2012

नव्यउदार पूंजीवाद के नए ढिंढोरची अशोक वाजपेयी



         
हिन्दी आलोचना में नव्यउदार पूंजीवादी चारणों के बारे में जब भी सोचता हूँ तो रह-रहकर अशोक वाजपेयी याद आते हैं। इन जनाव की भजनमंडली में ऐसे 2 दर्जन लेखक हैं। अशोक वाजपेयी की शिक्षा-दीक्षा अव्वल दर्जे की रही है,सरकारी पद भी अव्वल रहे हैं ,उनके पास चमचे भी अव्वलदर्जे के रहे हैं , हिन्दी के अव्वल अखबार में वे नियमित कॉलम भी लिखते हैं। देश के अव्वल कांग्रेसी नेताओं का उन पर वरदहस्त रहा है। पूंजीवादी विनयपत्रिका भी वे अव्वल लिखते हैं।
    अशोक वाजपेयी की खूबी है कि वे अपने पूंजीवादी नजरिए से एकदम टस से मस होने को तैयार नहीं हैं। इन जनाव की खूबी है कि ये हर विषय के ज्ञानी हैं और जब भी जैसे मौका मिलता है सुंदर-असुंदर दोनों किस्म का लिखते हैं। इधर उन्होंने जनसत्ता में अपने कॉलम में मार्क्सवाद पर एक अज्ञान से भरी टिप्पणी लिखी है,जिसे पढ़कर सिर्फ एक ही बात कहने की इच्छा होती है कि इस तरह की बेसिर-पैर की बातें हिन्दी में ही छप सकती हैं और जनसत्ता जैसा अखबार ही छाप सकता है। इस अखबार का संपादकीय स्तर कितना गिर चुका है इससे यह भी पता चलता है।
     अशोक वाजपेयी और उनके जैसे लोग और जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठानी अखबार आए दिन तथ्यहीन ढ़ंग से अमेरिकी ढिंढोरची की तरह मार्क्सवादी दर्शन पर हमले करते रहे हैं। दूसरी ओर मार्क्सवादी लोग चुपचाप पढ़ते रहते हैं और प्रतिवाद नहीं करते। पहले मार्क्सवाद के खिलाफ बोलने वाले के खिलाफ मार्क्सवादी जबाव दिया करते  थे। लेकिन इन दिनों हिन्दी में सर्वधर्म सदभाव की तरह सर्व विचारधारा मित्रमंडली का दौर चल रहा  है। यह अंतर करना मुश्किल होता है कि मार्क्सवादी कौन है और मार्क्सवाद विरोधी कौन है? मार्क्सवादी लोग इन दिनों अशोक वाजपेयी के लेखन की आलोचना तक नहीं करते,जबकि ये जनाव मार्क्सवाद विरोधी ढिंढोरची की तरह आए दिन मार्क्सवाद के बारे में कु-प्रचार करते रहते हैं।
      साहित्य और संस्कृति में अमेरिकी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का झंड़ा बुलंद करने वाले अशोक वाजपेयी के लेखन और साहित्य-प्रशासनिक कर्मकांड को अभी लोग भूले नहीं हैं। इन जनाव ने साहित्य में आधुनिकता के पतनशील मूल्यों की हमेशा हिमायत की है पूंजीवादी संसार और अमेरिकी संस्कृति के पैरोकार और एजेण्ट की तरह हिन्दी में भारत भवन की स्थापना के समय जमकर काम भी किया है।
     अशोक वाजपेयी को अचानक इलहाम हुआ है कि "इन दिनों अकसर यह लगता है कि हमने दुनिया बदलने या विकल्प खोजने का सपना देखना बंद कर दिया है: हम जो सपने देखते हैं वे अगर टुच्ची आकांक्षाओं के नहीं तो बहुत छोटी चीजों के लिए हो गए हैं।" सवाल यह है कि आखिरकार ऐसे हालत पैदा क्यों हुए कि लोगों ने बड़े सपने देखने बंद कर दिए ? समाजवादी या मार्क्सवादी विचारक इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं ,बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था और उसका आक्रामक रूख इसके लिए जिम्मेदार है। लेकिन अशोक वाजपेयी ने कभी विस्तार से पूंजीवाद के आक्रामक रवैय्ये की आलोचना नहीं की । उलटे भारत में अमेरिका के पहरूए की तरह काम करते रहे हैं।
     सपनों के मरने में पूंजीवाद की भूमिका को न देखना स्वयं पूंजीवाद की भूमिका पर पर्दा डालना है। अशोक वाजपेयी को गलतफहमी है कि भारत में बाहर भी लोगों ने सामाजिक परिवर्तन के सपने देखना बंद कर दिया है। सामाजिक परिवर्तन के सपने या दुनिया को बदलने के सपने लैटिन अमेरिका के क्रांतिकारियों ने देखने बंद नहीं किए हैं ,वहां पर वे विभिन्न देशों में सामाजिक परिवर्तन के नए विकल्पों की खोज और निर्माण में लगे हैं। लैटिन के साहित्यकारों ने भी बुनियादी परिवर्तन के सपने देखना बंद नहीं किया है। समाजवाद के पराभव के बाद वहां एक विशाल जनउभार आया है।लोकतंत्र और क्रांति में नए किस्म के अंतस्संबंध के निर्माण के प्रयास हो रहे हैं।
    समाजवादी यथार्थवाद और आलोचनात्मक यथार्थवाद से आगे की मंजिल के साहित्य के नए-नए प्रयोग वे ही लेखक कर रहे हैं जो लैटिन अमेरिका में किसी न किसी किस्म के सामाजिक परिवर्तन के वामपंथी आंदोलन से जुड़े हैं या उसके समर्थक हैं,मजदूरों और किसानों के संगठनों की जुझारू क्षमता भी इन देशों में जगजाहिर है ।और इसका सुपरिणाम है कि समूचे लैटिन अमेरिका में आज अमेरिकी साम्राज्यवाद हाशिए पर है और लैटिन अमेरिकी देशों में एकजुटता पैदा करने और संघर्ष करके समाज बदलने की भावना को निर्मित करने में मार्क्सवादी अग्रणी कतारों में हैं। यह सारा परिवर्तन सोवियत संघ और समाजवादी समूह के पूर्वी यूरोपीय देशो में समाजवादी व्यवस्था के पतन के बाद का है।
    अशोक वाजपेयी ने तारिक अली को उद्धृत करते हुए लिखा है- "मार्क्सवाद को धर्म बनाना गलत था और है तथा मार्क्स या अन्य चिंतकों के अंतर्विरोधों को नजरअंदाज करना भी गलत था और है।" यह धारणा भी गलत है। मार्क्सवाद कभी भी धर्म नहीं रहा है कम्युनिस्टों के यहां। कम्युनिस्ट पार्टी का अंधानुकरण और समाजवादी लोकतंत्र के अभाव के कारण समाजवादी व्यवस्था का पराभव हुआ और जनता को बड़े पैमाने पर कष्ट उठाने पड़े और इस तथ्य को रूस से लेकर अन्य देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों ने माना और फिर से लोकतंत्र की ओर देश को धकेला है। दूसरी बड़ी बात यह कि मार्क्सवादी चिन्तकों ने चाहे भारत हो या रूस हो,जर्मनी हो चीन हो, कहीं पर भी मार्क्स के अंतर्विरोधों  की अनदेखी नहीं की गयी है। अनेक मामलों में भारत के मार्क्सवादी अपने लेखन में एशियाई उत्पादन संबंधों के सवाल से लेकर जातिप्रथा तक, अंग्रेजों की भूमिका से लेकर सामंतवाद के चरित्र के सवालों पर मार्क्स से भिन्न नजरिए का प्रतिपादन करते रहे हैं।
    अशोक वाजपेयी ने अपने टिपिकल मार्क्सवाद विरोधी अंदाज में लिखा है - "यह सवाल उठता है कि मार्क्सवाद पर आधारित तानाशाहियों ने जो किया और उनका जो हश्र हुआ उनसे क्या सबक लिया जाए। जाहिर है कि मरणोत्तर आलोचना एक तरह का सुविधापरक लगभग अवसरवादी काम है, हालांकि इस वजह से आलोचना से बचना या उसे स्थगित नहीं करना चाहिए। मनुष्य की मुक्ति और समानता का सपना दृश्य पर फिर से आए यह जरूरी है, लेकिन अब क्या यह सपना फिर से मार्क्सवादी पदावली में देखा-समझा जा सकता है? एक तरह से सोवियत और चीनी साम्यवादियों और उनकी राजव्यवस्थाओं को इसके लिए माफ नहीं किया जा सकता कि उन्होंने एक महान मुक्ति-दर्शन को संहार और दमन का, मुक्ति के हनन का, अन्याय की व्यवस्था बनाकर उसे हमेशा के लिए लांछित-दूषित, विकृत करने का पाप किया है। पर दूसरी ओर इस सचाई को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि अगर एक दर्शन का इतने दशकों तक ऐसा दुर्विनियोजन संभव हुआ तो उस दर्शन के मूल में कहीं कोई खोट होगी, जिसने इतनी सारी सामाजिक-सांस्कृतिक विकृतियों को जन्मा और पोसा। अकेले लेनिन, स्टालिन और माओ भर दोषी नहीं हैं- मार्क्स की भी जिम्मेदारी बनती है।"
       इन जनाब को मार्क्सवादी दर्शन में खोट नजर आ रहा है और मार्क्स में भी खोट नजर आ रहा है। सवाल यह है कि मार्क्स में कौन सा खोट है जो इन जनाव को तकलीफ दे रहा है ? समाजवादी व्यवस्था में जो गड़बड़ियां हुईं उनके बारे में इन जनाब के पास कोई एक-दो बड़ी मिसाल नहीं हैं जो कही जाए। स्वयं कम्युनिस्ट पार्टियों और कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थिंकरों के द्वारा जो बातें आलोचना में कही गयी है वे ही समाजवादी व्यवस्था की गड़बड़ियों को समझने के लिए काफी है। इनमें सबसे खतरनाक है उदार बुर्जुआ मूल्यों का समाज में विकास किए बगैर सीधे सामंतवाद से समाजवाद में छलांग लगाना समाजवादी व्यवस्था को काफी महंगा साबित हुआ है। दूसरे बड़ी समस्या राज्यतंत्र के पर्याय के रूप में पार्टीतंत्र का उभरना था। इससे समाजवादी जनतंत्र का सपना नष्ट हुआ। सर्वहारा के अधिनायकवाद की जगह पार्टी के नेताओं का अधिनायकवादी तंत्र पैदा हुआ। लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक, साहित्यिक,वैज्ञानिक क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति हुई। समूची दुनिया में पूंजीवाद को अपना रास्ता बदलने के लिए समाजवादी देशों ने दबाब पैदा किया और कल्याणकारी राज्य के पूंजीवादी सपने और कार्यक्रम का जन्म हुआ। मनुष्यों के लिए जिन अधिकारों की स्थापना समाजवाद ने की उनमें से अनेक अधिकारों को कालान्तर में पूंजीवादी देशों को अपने यहां भी लागू करना पड़ा।
    इससे भी बड़ा सवाल यह है कि समाजवाद को तानाशाही के रूप में नहीं देखा जा सकता। समाजवाद यदि तानाशाही है तो उसके बिखरने के बाद तो दुनिया में खुशहाली आनी चाहिए थी ? ऐसा क्यों हुआ कि अमेरिका और भी आक्रामक हो गया ? युद्ध दैनंदिन संस्कृति बन गए हैं ? परवर्ती पूंजीवाद की नई विश्व व्यवस्था सामने आई जो समाजवादी व्यवस्था के देशों के अभाव में और भी ज्यादा बर्बर ढ़ंग से विभिन्न देशों के साथ व्यवहार करती रही है।
    समाजवादी व्यवस्था का जन्म पूंजीवाद विरोधी व्यवस्था के रूप में हुआ था। अशोक वाजपेयी ने बड़ी ही चालाकी के साथ अमेरिकी बर्बरता पर कुछ भी नहीं कहा है। सवाल है कि  क्या पूंजीवाद पुण्यात्माओं की व्यवस्था है ? इस संसार पर दो-दो विश्वयुद्ध किसने थोपे ? इन युद्धों में करोड़ों लोग मारे गए हैं। इराक-अफगानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व में काम कर रही नाटो सेनाओं के अत्याचारों के खून के धब्बे अभी तक धुले नहीं हैं। अशोक वाजपेयी साहब अपने टिपिकल मार्क्सवाद विरोधी और पूंजीवाद के चारणों की पदावली का इस्तेमाल करते हुए पूंजीवाद को धर्म बताने का काम कर रहे हैं। पूंजीवाद के जरिए इस दुनिया की मुक्ति संभव नहीं है। यह बात सबसे पहले मार्क्स ने ही कही थी और उनकी यही भविष्यवाणी बार बार सही साबित हुई है। अशोक वाजपेयी भूल गए है कि चीन ने बहुत ही कम समय में अपने देश की अर्थव्यवस्था में जो लंबी छलांग लगाई है वैसी छलांग पहले किसी भी पूंजीवादी मुल्क ने नहीं लगाई है।  पूंजीवाद से मुक्ति का आज भी एक ही विज्ञान है और वह है मार्क्सवाद। मार्क्स ने कभी नहीं कहा कि वे जो लिख रहे हैं वह पत्थर की लकीर है और उनके अनुयायियों को उनकी बातों को आँखें बंद करके मानना चाहिए. मार्क्सवाद का नाम अनुकरण नहीं है। यह जीवन का विज्ञान है, विश्व दृष्टिकोण है। दुनिया के परिवर्तन का सबसे प्रभावशाली दर्शन है ,और करोड़ों लोग आज भी अपनी मुक्ति के संघर्ष में मार्क्सवाद से प्रेरणा ले रहे हैं। 

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

मुंबई अंधेरा शहर नहीं सलमान रूशदी-अशोक बाजपेयी

अशोक बाजपेयी साहि‍त्‍य के धुरंधर वि‍द्वान हैं। परमादरणीय हैं । लेकि‍न लि‍खते हैं 'मासूमि‍यत' और 'चालाकी' के साथ। हाल ही में 'जनसत्‍ता' (6 सि‍तम्‍बर 2009) के स्‍तम्‍भ 'कभी कभार' में जो लि‍खा है वह गंभीर चि‍न्‍ता की चीज है। उनके लि‍खे को पढकर लगता है दुनि‍या के बारे में वे बहुत जानते हैं,लेकि‍न देश के बारे में 'कम' जानते हैं अथवा 'मासूम' और 'भोले' हैं। उन्‍होंने सलमान रूशदी के बहाने कुछ बातें कही हैं। बाजपेयी ने लि‍खा, '' एक बातचीत में रूशदी ने कहा कि‍ वे हमेशा ही ऐसी पुस्‍तक (उपन्‍यास) लि‍खना चाहते रहे हैं जो राजनीति‍क न हो।'' सवाल यह है कि‍ क्‍या अशोक बाजपेयी की भी यही राय है ? क्‍या उनका मकसद रूशदी को उद्धृत मात्र करना है ? यदि‍ वे असहमत थे, कहीं पर लि‍खा क्‍यों नहीं ? उपन्‍यास गैर राजनीति‍क वि‍धारूप नहीं है। उपन्‍यास के स्‍वभाव में राजनीति‍ है। यह रूशदी का 'भोलापन' नहीं 'काईंयापन' है । वे जानबूझकर ऐसी गलतबयानी कर रहे हैं। कि‍सी भी वि‍षय पर उपन्‍यास लि‍खें,राजनीति‍ से बच नहीं सकते। यहां तक कि‍ आधुनि‍ककाल में कि‍सी भी वि‍षय और वि‍धा में लि‍खें राजनीति‍ से बच नहीं सकते। साहि‍त्‍य और राजनीति‍ के गहरे संबंध की स्‍थापना का श्रेय उपन्‍यास को जाता है। उपन्‍यास के आने के पहले साहि‍त्‍य में राजनीति‍ प्रच्‍छन्‍न हुआ करती थी। उपन्‍यास वि‍धा आने के बाद साहि‍त्‍य और राजनीति‍ का गहरा रि‍श्‍ता बना है। अशोक बाजपेयी ने लि‍खा है ,'' सलमान को लगता है कि‍ अब नि‍जी जिंदगी और सार्वजनि‍क जिंदगी के बीच जगह गायब हो गयी है।'' अरे सलमान भाई आपको दो सौ साल बाद पता चला ! आश्‍चर्य की बात है कि‍ सलमान रशदी ने एक बडी ही घटि‍या बात कही है। अपमानि‍त करने वाली और असत्‍य बात कही है। उसे पढकर कि‍सी भी भारतीय को और खासकर अशोक बाजपेयी जैसे वि‍द्वान को तो गुस्‍सा आना चाहि‍ए था, लेकि‍न नहीं आया। सलमान की अवास्‍तवि‍क टि‍प्‍पणी अशोक बाजपेयी के शब्‍दों में पढें,लि‍खा '' मुंबई आज पचास-साठ के दशकों के बंबई के मुकाबले ज्‍यादा अंधेरा शहर हो गया है।'' यह बयान एकसि‍रे से गलत और तथ्‍यहीन है। मुंबई पहले की तुलना में ज्‍यादा सहि‍ष्‍णु और उदार बना है। सर्जना का सबसे बड़ा महानगर है। भाईचारे का सबसे बडा केन्‍द्र है। सर्जना का महाकेन्‍द्र नहीं होता तो व्‍यापार और मासकल्‍चर का वि‍श्‍व का हॉलीवुड के बाद का सबसे बडा केन्‍द्र ही नहीं बन पाता। सलमान और अशोक बाजपेयी जानते हैं कि‍ वि‍गत साठ सालों में हॉलीवुड ने सारी दुनि‍या को सांस्‍कृति‍क तौर पर रौंदा है, हॉलीवुड की पराजय का महाकाव्‍य मुंबई ने ही लि‍खा है। हॉलीवुड की सांस्‍कृति‍क दुर्बलता अगर कि‍सी के सामने नजर आती है तो वह है मुंबई का सि‍नेमा उद्योग।आज हॉलीवुड से लेकर पाकि‍स्‍तान तक के कलाकार ,चाहे वे मुसलमान हों या क्रि‍श्‍चि‍‍यन हों ,मुंबई को अपना घर मानते हैं। हम सलमान को याद दि‍लाना चाहेंगे, भारत वि‍भाजन के समय मंटो रह नहीं पाए थे मुंबई में, उन्‍हें पाकि‍स्‍तान जाना पडा था । भारत चि‍भाजन के बाद,खासकर 90 के मुंबई के बदनाम दंगों, शि‍वसेना और दाउद के उत्‍पातों के कारण कि‍सी भी कलाकार ने मुंबई नहीं छोडा है। सवाल यह है सलमाल रूशदी वि‍देश में रहते हैं, वे यहां के यथार्थ से कम से वाकि‍फ हैं। लेकि‍न अशोक बाजपेयी तो भारत में ही रहते हैं। उन्‍होंने सलमान रूशदी के बयान का खण्‍डन क्‍यों नहीं कि‍या ? रूशदी का मुंबई का मूल्‍यांकन 'अयथार्थ' और घृणा से भरा है।सलमान रूशदी का यह बयान एक बड़े फि‍नोमि‍ना का अंश है।संक्षेप में जान लें यह फि‍नोमि‍ना क्‍या है।
अमीरों ने 'यथार्थ' को 'अयथार्थ' में तब्‍दील कि‍या है। 'यथार्थ' को 'अयथार्थ' में तब्‍दील करने का नेटवर्क चारों ओर फैला है। हम लोग इस 'अयथार्थ' को पैसा देकर खरीदते हैं। आनंद लेते हैं। और कुछ समय बाद इसकी ही नकल करने लगते हैं। इसको ही सच मानने लगते हैं। नए युग के सांस्‍कृति‍क युद्ध में मानवीय यथार्थ दांव पर लगा है। कुछ लोग हैं जो इस परि‍घटना से आंखें बंद कि‍ए हैं। कुछ हैं जो इस परि‍घटना को वैसा महत्‍व नहीं देते जैसा वे अन्‍य चीजों देते हैं। साधारण नागरि‍क को लगने लगा है 'अयथार्थ' ही 'यथार्थ' है। 'यथार्थ' के सतही,अति‍रंजि‍त और कि‍स्‍सागो रूपों की हमारे बीच में बाढ आयी हुई है। हमने 'यथार्थ' के साथ हो रहे अहर्निश हिंसाचार के बारे में चि‍न्‍ति‍त होना बंद कर दि‍या है। 'अयथार्थ' के रूपायन के कारण संस्‍कृति‍ में प्रति‍गामि‍ता बढी है। 'अयथार्थ' के उत्‍पादन ने गैर कथा वि‍धाओं को भी प्रभावि‍त करना शुरू कर दि‍या है। सलमान रूशदी का मुंबई मूल्‍यांकन इसकी आदर्श मि‍साल है।
रूशदी ने एक और तथ्‍यहीन बयान दि‍या है। अशोक ने लि‍खा है '' उनके अनुसार वहां की अनकही कहानी राजनीति‍क गि‍रोहों और अपराधी गि‍रोहों के बीच की लड़ाई की है।'' अरे मासूमो सरलीकरण और सतहीपन बेहद घटि‍या चीज है।मूल्‍यांकन में इसे स्‍टीरि‍योटाईप लेखन कहते हैं। यह गद्य का घटि‍या रूप है। इस तरह मुंबई का चि‍त्रण करोगे तो कोई भी मुंबई वाला नाराज हो जाएगा। मुंबई गि‍रोहों में बंटा शहर नहीं है। अभी मुंबई ,कोलम्‍बि‍या नहीं बना है।अपराधी गि‍रोह,माफि‍या, शि‍वसेना आदि‍ मुंबई के बृहत्‍तर लोकतांत्रि‍क यथार्थ का बेगाना और बहुत छोटा हि‍स्‍सा हैं,इन्‍हें मुंबई का समग्र समझने की भूल नहीं करनी चाहि‍ए।

[ deshkaal.com और मोहल्‍ला लाइव डॉट कॉम पर 9 सि‍तम्‍बर2009 को प्रकाशि‍त )

बुधवार, 2 सितंबर 2009

'हम सही' की बीमारी और अशोक बाजपेयी

अशोक बाजपेयी 'हम सही ' की बीमारी के शि‍कार हैं। अब 'हम' और 'तुम' का जमाना खत्‍म हो चुका है। अब सि‍र्फ लेखन है। 'हम' और 'तुम' उसमें वि‍लीन हो चुके हैं। यह सृजन का सर्वोच्‍च क्षण है। नामवर सिंह जैसी क्षमता और नजरि‍या अर्जित करना मुश्‍कि‍ल चीज है। वे इस क्षण का आईना हैं। आज के युग में लेखक कि‍सी एक का नहीं होता,वह सबका होता है। उदयप्रकाश हों या नामवर सिंह हों,उन दोनों ने कोई गलती नहीं की है। जो लोग लेखक को वर्ग,प्रति‍बद्धता,वि‍चारधारा,पार्टी के खूंटे से बांधकर देखते हैं, वे अभी तक सभ्‍यता के वि‍कास को समझ ही नहीं पाए हैं,लेखक में अछूतभाव नहीं होता, लेखक के लि‍ए कोई अछूत नहीं होता। 'यहां जाओगे, वहां नहीं जाओगो,इससे इनाम लोगे, उससे नहीं लोगे,उस वर्ग के चरि‍त्रों पर लि‍खोगे,इस वर्ग के चरि‍त्रों पर नहीं लि‍खोगे।' इस तरह का अछूतभाव लेखक के कर्म का हि‍स्‍सा नहीं है। उदयप्रकाश की जि‍न लोगों ने आलोचना की उन्‍हें आलोचना का हक है, आज कोई नामवर सिंह की आलोचना करना चाहे तो उसे भी लोकतांत्रि‍क हक है। बुनि‍यादी चीज है लेखन, न कि‍ लेखक। आज नामवरसिंह ,उदयप्रकाश,अशोक बाजपेयी आदि‍ की लेखक,आलोचक के रूप में पहचान या सत्‍ता खत्‍म हो चुकी है। नामवर सि‍ह यह तथ्‍य जानते हैं और मानते भी हैं। उनका यही बाकी हि‍दी लेखकों से अंतर है। अभी सि‍र्फ लेखन बचा है। हम लेखक,आलोचक,वि‍धाएं ,नैति‍कता,अनैति‍कता आदि‍ केटेगरी में सोच रहे हैं जबकि‍ इन सबका लेखन में वि‍लय हो चुका है। अब सि‍र्फ लेखन बचा है, अशोक बाजपेयी अंग्रेजी के वि‍द्वान हैं और अच्‍छी तरह जानते हैं कि‍ देरि‍दा ने इस प्रसंग में क्‍या लि‍खा है। लेखन ने समस्‍त पहचान के रूपों को खत्‍म कर दि‍या है। कम्‍प्‍यूटर युग में एक ही पहचान बची है लेखन की पहचान। लेखन में कोई अछूत नहीं होता। लेखक में अछूतभाव के न होने का ही सुफल है कि‍ हमारे तमाम बड़े लोग आज भी नोबुल पुरस्‍कार को सबसे बडा मानते हैं जबकि‍ उस पुरस्‍कार को देने वाले संस्‍थान का हथि‍यार बनाने से संबंध है। हम अच्‍छी तरह जानते हैं कि‍ ग्‍लोबलाईजेशन के खि‍लाफ सारी दुनि‍या में जेहाद बोलने वाले संगठनों के मददगारों में अमेरि‍का के सबसे घटि‍या इजारेदार घरानों के चंदे का खुला इस्‍तेमाल कि‍या गया है। हम जि‍से वर्ल्‍ड सोशल फोरम के नाम से जानते हैं उसके चंदादाताओं में ग्‍लोबलाईजेशन का समर्थन करने वाली कंपनी फोर्ड फाउंडेशन का नाम शामि‍ल है,भारत में तकरीबन 4000 हजार करोड रूपये वि‍भि‍न्‍न कि‍स्‍म के स्‍वयंसेवी संगठनों को वि‍देशी कंपनि‍यों के द्वारा दि‍या जाता है, इसमें दर्जनों वे कंपनि‍यां हैं जो खुली लूट खसोट के लि‍ए बदनाम हैं, युद्ध में सक्रि‍य हैं। इसके बावजूद यदि‍ ये स्‍वयंसेवी संस्‍थाएं पवि‍त्र हैं तो इसका प्रधान कारण है इनका कर्म, न कि‍ चंदा। आज आप वैचारि‍क, वर्गीय, जाति‍गत आधार पर छुआछूत बनाए नहीं रख सकते। नामवर सिंह ने जसवंत सिंह के पुस्‍तक लोकार्पण में जाकर कुछ भी गलत नहीं कि‍या, ठीक वैसे ही उदयप्रकाश ने भी कुछ गलत नहीं कि‍या था,हिंदी में बहस करने वालों की मुश्‍कि‍ल है कि‍ वे जानते ही नहीं हैं कि‍ समाज कि‍स युग में पहुंच गया है, चीजों को कैसे देखें। अशोक बाजपेयी जैसे बडे लेखक की बुद्धि‍ भी अभी भी पुराने प्रेसयुगीन और मध्‍यकालीन वर्गीकरणों में फंसी हुई है,यह देखकर आश्‍चर्य लगता है। अशोक बाजपेयी कलावंत हैं,चि‍त्रकारों के इति‍हास और उनकी सृजन प्रक्रि‍या को भी जानते हैं, उन्‍होंने नैति‍कता के बारे में जो नजरि‍या पेश कि‍या है क्‍या उसी पैमाने से कि‍सी चि‍त्रकार के द्वारा कि‍सी औरत को भाडे पर अपने स्‍टूडि‍यो में लाने,नग्‍न करके बि‍ठाने और फि‍र उसे देखकर चि‍त्र बनाने को सही ठहराया जा सकता है ? क्‍या रचनाकारों और बुद्धि‍जीवि‍यों की वेश्‍याओं के साथ उठक बैठक को सही माना जा सकता है ? हम यह भूल ही गए हैं कि‍ अब नामवर सिंह, उदयप्रकाश,अशोक बाजपेयी नहीं बचे हैं लेखक के रूप में उनका अंत हो चुका है अब सिर्फ उनका लेखन बचा है। उनकी नैति‍कता,अनैति‍कता,वि‍चारधारा, प्रति‍बद्धता आदि‍ का फैसला उनके लेखन के आधार पर ही होगा। अशोक बाजपेयी की दि‍क्‍कत यह है कि‍ वे लेखन पर नहीं, लेखक के आनेजाने पर बोल रहे हैं। नैति‍कता पर बोल रहे हैं। लेखक की नैति‍कता का आईना उसका लेखन है उसे अन्‍यत्र नहीं खोजा जाना चाहि‍ए।
(अशोक बाजपेयी के द्वारा जनसत्‍ता में लि‍खे लेख पर देशकाल डॉट कॉम में चली बहस पर लि‍खी टि‍प्‍पणी,इस टि‍प्‍पणी में बाजपेयी ने मांग की थी कि‍ नामवरसिंह ने जसवंत सिंह के पुस्‍तक लोकार्पण में जाकर वैसे ही गलत कि‍या जैसे उदयप्रकाश ने भाजपासांसद से पुरस्‍कार लेकर गलत कि‍या,उदयप्रकाश की आलोचना हुई किंतु नामवर की वामपंथि‍यों ने आलोचना क्‍यों नहीं की,उपरोक्‍त टि‍प्‍पणी उसी प्रसंग में लि‍खी गयी है।)

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