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रविवार, 8 मार्च 2015

'स्त्री असभ्यता' हमारी चिंता में क्यों नहीं है !

       औरत सभ्य होती है,लेकिन औरत के अंदर अनेक ऐसी आदतें,परंपराएं और मूल्य हैं जो उसे असभ्यता के दायरे में धकेलते हैं। औरत को संयम और सही नजरिए से स्त्री के असभ्य रुपों को निशाना बनाना चाहिए। असभ्य आयाम का एक पहलू है देवीभाव ।  औरत को देवीभाव में रखकर देखने की बजाय मनुष्य के रुप में,स्त्री के रुप में देखें तो बेहतर होगा । औरत में असभ्यता कब जाग जाए यह कहना मुश्किल है लेकिन असभ्यता के अनेक रुप दर्ज किए गए हैं। खासकर औरत के असभ्य रुपों की स्त्रीवादी विचारकों ने खुलकर चर्चा की है। हमें भारतीय समाज के संदर्भ में और खासकर हिन्दू औरतों के संदर्भ में उन  क्षेत्रों में दाखिल होना चाहिए जहां पर औरत के असभ्य रुप नजर आते हैं।
       औरत की असभ्य संस्कृति के निर्माण में पुंसवाद की निर्णायक भूमिका है। इसके अलावा स्वयं औरत की अचेतनता भी इसका बहुत बड़ा कारक है। मसलन्, जब कोई लड़की शिक्षित होकर भी दहेज के साथ शादी करती है , दहेज के खिलाफ प्रतिवाद नहीं करती तो वह असभ्यता को बढ़ावा देती है।हमने सभ्यता के विकास को शिक्षा,नौकरी आदि से जोड़कर इस तरह का स्टीरियोटाइप विकसित किया है कि उससे औरत के सभ्यता के मार्ग का संकुचन हुआ है।  
    हमारी शिक्षा लड़कियों को सभ्य कम और अनुगामी ज्यादा बनाती है। औरत सभ्य तब बनती है जब वह सचेतन भाव से सामाजिक बुराईयों के खिलाफ जंग करती है। औरत की जंग तब तक सार्थक नहीं हो सकती जब तक हम उसे आम औरत के निजी जीवन तक नहीं ले जाते। हमारे सभ्य समाज की आयरनी यह है कि वह सभ्य औरत तो चाहता है लेकिन उसे सभ्य बनाने के लिए आत्मसंघर्ष करने की प्रेरणा नहीं देता। मसलन्,औरतों में दहेज प्रथा के खिलाफ जिस तरह की नफरत होनी चाहिए वह कहीं पर भी नजर नहीं आती।
    औरत सभ्य है या असभ्य है यह इस बात से तय होगा कि वह अपने जीवन से जुड़े बुनियादी सवालों और समस्याओं पर विवेकवादी नजरिए से क्या फैसला लेती है ? समाज ने स्त्री के लिए अनुकरण और निषेधों की श्रृंखला तैयार की है और उसे वैध बनाने के तर्कशास्त्र, मान्यताएं और संस्कारों को निर्मित किया है। इसके विपरीत यदि कोई औरत अनुकरण और निषेधों का निषेध करे तो सबसे पहले औरतें ही दवाब पैदा करती हैं कि तुम यह मत करो,ऐसा मत करो, परिवार की इज्जत को बट्टा लग जाएगा। औरत को बार-बार परिवार की इज्जत का वास्ता देकर असभ्य कर्मों को करने के लिए कहा जाता है। खासकर युवा लड़कियों के अंदर दहेज प्रथा के खिलाफ जब तक घृणा पैदा नहीं होगी, औरत को सभ्य बनाना संभव नहीं है। औरत सभ्य बने इसके लिए जरुरी है कि वह उन तमाम चीजों से नफरत करना सीखे जो उसको सभ्य बनने से रोकती हैं। दहेज प्रथा उनमें से एक है।
    औरत के अंदर असभ्यता का आधार है अनुगामी भावबोध ,जब तक औरतें अनुगामी भावबोध को विवेक के जरिए अपदस्थ नहीं करतीं वे सभ्यता को अर्जित नहीं कर पाएंगी। समाज में अनुगामी औरत को आदर्श मानने की मानसिकता को बदलना होगा।
   औरत को असभ्य बनाने में दूसरा बड़ा तत्व है, औरतों और खासकर लड़कियों का सचेतभाव से मूर्खतापूर्ण हरकतें करना, मूर्खता को वे क्रमशः अपने जीवन का आभूषण बना लेतीं हैं। तमाम किस्म के स्त्रीनाटक इस मूर्खतापूर्ण आचरण के गर्भ से निकलते हैं।स्त्री की  मूर्खतापूर्ण हरकतें अधिकांश पुरुषों को अच्छी लगती हैं। फलतः लड़कियां सचेत रुप से मूर्खता को अपने जीवन का स्वाभाविक अंग बना लेती हैं। इससे स्त्री की छद्म इमेज बनती है। स्त्री सभ्य बने इसके लिए जरुरी है कि वह छद्म इमेज और छद्म मान्यताओं में जीना बंद करे।
    छद्म इमेज का आदर्श है लड़कियों में फिल्मी नायिकाओं को आदर्श मानने का छद्मभाव। मसलन्, माधुरी दीक्षित ,रेखा,ऐश्वर्या राय में कौन सी चीज है जिससे लड़कियां प्रेरणा लेती हैं ?  क्या सौंदर्य-हाव-भाव आदि आदर्श हैं ? यदि ये आदर्श हैं तो इनसे सभ्यता का विकास नहीं होगा। सौंदर्य के बाजार और प्रसाधन उद्योग का विकास होगा। यदि इन नायिकाओं के कैरियर और उसके लिए इन नायिकाओं द्वारा की गयी कठिन साधना और संघर्ष को लड़कियां अपना लक्ष्य बनाती हैं तो वे सभ्यता का विकास करेंगी और पहले से ज्यादा सुंदर दिखने लगेंगी। ये वे नायिकाएं हैं जिन्होंने अपने कलात्मक जीवन को सफलता की ऊँचाईयों तक पहुँचाने के लिए कठिन रास्ता चुना और समाज में सबसे ऊँचा दर्जा हासिल किया। अपने अभिनय के जरिए लोगों का दिल जीता।

    कहने का अर्थ है कि फिल्मी नायिका से सौंदर्य टिप्स लेने की बजाय,उसके सौंदर्य का अनुकरण करने की बजाय, कलात्मक संघर्ष की भावनाएं और मूल्य यदि ग्रहण किए जाते तो देश में हजारों माधुरी दीक्षित होतीं! दुर्भाग्य की बात है कि हम यह अभी तक समझ नहीं पाए हैं कि औरत का सौंदर्य उसके शरीर में नहीं उसकी सभ्यता में होता है ! औरत जितनी सभ्य होगी वह उतनी ही सुंदर होगी। सभ्यता के निर्माण के लिए जरुरी है कि औरतें स्वावलंबी बनें। अनुगामी भाव से बचें। 

बुधवार, 11 जून 2014

सभ्यता से डरे हम लोग


      हमारे देश में लोग बदमाश से नहीं डरते ।बल्कि बदमाशों के साथ रहते हैं। दंगाई से नफरत नहीं करते बल्कि उसको वोट देते हैं और पूजा करते हैं। हमारे देश में पत्थर की मूर्तियों से दूर नहीं रहते बल्कि उनकी रोज पूजा करते हैं। उनको घर में रखते हैं।सम्मान करते हैं। हमारे देश में लोग जिस चीज से डरते हैं वह है सभ्यता।

सभ्यता और सभ्य आदमी से लोग डरते हैं। सभ्य को मित्र नहीं बनाते असभ्य को मित्र बनाते हैं। ईमानदार से दूर रहते हैं,धूर्त-चालाक और बेईमान के साथ गलबहियां देकर रहते हैं। औरत के साथ विवाह करते हैं,बेटी की तरह पैदा करते हैं,माँ की तरह मानते हैं, लेकिन औरतों के साथ सबसे ज्यादा हिंसाचार करते हैं। हिंसा और असभ्यता के माहौल को हमारे देखकर यही महसूस होता है कि हमारे देश में सभ्य होना गाली है !

सवाल यह है सभ्य से हम क्यों दामन छुडाना चाहते हैं ? सभ्य होना क्या बुरी बात है ? सभ्य क्या सक्षम नहीं होते ? फेसबुक और सामाजिक जीवन में असभ्यता का जो वैभव दिखाई देता है वह बार बार यही संदेश देता है कि सभ्य होना सही नहीं है! असभ्य रहो,मजे में रहो!

सभ्यता की मांग है कि विवेकवाद अर्जित करें। हमारे यहां उल्टी हवा चल रही है। इरेशनल या विवेकहीन बातों को तवज्जह दी जाती है। नॉनशेंस की पूजा की जाती है। इरेशनल से बड़ा असभ्यता का कोई रुप नहीं है। हम भारतवासी जितनी ऊर्जा नॉनसेंस चीजों पर खर्च करते हैं उसका आधा वक्त भी विवेकवादी और सभ्य चीजों पर खर्च करें तो भारत सोने की चिडिया हो जाय।

फिलहाल स्थिति यह है किभारत में चिडियाएं भी रहना पसंद नहीं करतीं, वे भी कम हो रही हैं। मौसम बिगडा हुआ है। हम हैं कि विवेक से काम लेने की बजायभगवान की कृपा का इंतजार कर रहे हैं। प्रकृति और पर्यावरण के साथ विवेकपूर्ण संबंध बनाएं तो चीजें सुधर सकती हैं। हमने प्रकृति और पर्यावरण के साथ विवेकपूर्ण संबंध नहीं बनाया है बल्कि केजुअल संबंध बनाया है। उपभोग का संबंध बनाया है।

हम कितने सभ्य हैं और कितने असभ्य हैं ? इसका कोई सटीक मानक बनाना तो संभव नहीं है लेकिन यह तय है कि सभ्यता वंशानुगत नहीं होती,उसे अर्जित करना पड़ताहै। हमारी मानसिकता यह है कि हम अर्जित करने के लिए श्रम नहीं करना चाहते। हम चाहते हैं कि कोई ऐसा फार्मूला हो जो हमें घर बैठे सभ्य बना दे। हमें यह भी सिखाया गया है कि फलां-फलां वस्तुएं घर में हों तो सभ्यता घर में दाखिल हो जाती है। वस्तुएं के जरिए सभ्य कहलाने की आशा मृगतृष्णा है।

वस्तुएं सभ्य नहीं बनातीं। सभ्य बनने के लिए पहली शर्त है कि हम यह मानें कि निज को बदलेंगे और सचेत रुप से बदलेंगे। सभ्य वह है जो निज को और अन्य को प्यार करना जानता है।जिसके मन में अन्य के लिए जगह नहीं है वह सभ्य नहीं हो सकता। जब तक आप निजी जंजालों में फंसे रहेंगे सभ्य नहीं बन सकते। निजी जंजालों के बाहर निकलकर सामाजिक होने, अन्य के प्रति निजी सरोकारों को व्यक्त करने से सभ्यता का विकास होता है।अपने लिए न पढ़कर,देश के लिए पढ़ना, अपने लिए न लिखकर अन्य के मसलों और जीवन की समस्याओं पर लिखना, हर क्षण अन्य की चिन्ताओं को अपनी चिन्ताएं बनाने से सभ्यता का विकास होता है।

सभ्य बनने के लिए अपने से बाहर निकलकर झांकने की कला विकसित करनी चाहिए। निहित-स्वार्थों में डूबे रहना और अनालोचनात्मक ढ़ंग से चीजों, वस्तुओं,व्यक्तियों और विचारों को देखने से सभ्यता का विकास बाधित होता है।



सभ्यता के विकास के लिए जरुरी है कि हम चीजों को व्यापक फलक पर रखकर देखने का नजरिया विकसित करें। सभ्य वह है जिसके पास व्यापक फलक में रखकर देखने का नजरिया है। आप जितना व्यापक फलक रखकर देखेंगे वस्तुएं,घटनाएं आदि उतनी ही साफ नजर आएंगी। हम बौने क्यों हो गए क्योंकि हमने दुनिया को देखने का फलक छोटा कर लिया। हम अनुदार क्यों हुए क्यों कि हमारी समझ निजी दृष्टि से आगे बढ़ नहीं पायी। हमें निजी दृष्टिकोण की नहीं विश्वदृष्टिकोण की जरुरत है।सभ्यता हमें विश्व दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करती है। विश्व दृष्टिकोण के आधार पर देखने के कारण हम अनेक किस्म की सीमाओं और कट्टरताओं से सहज ही मुक्त हो सकते हैं।

रविवार, 20 मार्च 2011

होली पर मथुरा का अविस्मरणीय महामूर्ख सम्मेलन

      मथुरा की होली  सचमुच विलक्षण हुआ करती है। इधर कई सालों से देख नहीं पाया हूँ। लेकिन मानकर चल रहा हूँ कि होली की मस्त बयार मथुरा में आज भी बह रही होगी। होली का मजा वहां एक माह (पूरे फाल्गुन महीने) चलता था होली के बाद भी शहर में होली 8 दिनों तक चलती थी। अब इतना लंबा उल्लास मनाने की क्षमता नहीं रह गयी है लोगों में।
मथुरा की होली का सबसे अविस्मरणीय क्षण है गले मिलना। लोग होली पर पहल करके एक-दूसरे से गले मिलते हैं। घर जाकर गले मिलते हैं। जैसे आज धुलेंड़ी है तो सारे दिन रंग पड़ेगा,रंग में गले मिलेंगे। शाम को डेम्पियर पार्क में शहर के सभी लोग एकत्रित होते हैं और एक-दूसरे से गले मिलते हैं। यह काम बड़े शालीन भाव से होता है। दुश्मन के भी लोग गले मिलते हैं, जिनसे पुश्तैनी रंजिशें चल रही हैं ,वेभी एक-दूसरे से गले मिलते हैं। भांग और ठंडाई में शहर के अधिकांश मस्त मर्द डूबे रहते हैं। भांग पीना होली संस्कार है। कोई भी अकेले नहीं पीता,बुलाकर पीते हैं,पिलाकर पीते हैं।
     मथुरा की होली का दूसरा शानदार पहलू है महामूर्ख सम्मेलन। धुलेंड़ी के पहले वाली शाम को महामूर्ख सम्मेलन और महामूर्खों का विशाल प्रदर्शन निकलता था। इसमें शहर के सभी शानदार ,सभ्य, नामी, शिक्षित,प्रोफेशनलों को शिरकत के लिए बुलाया जाता था ।साथ ही महामूर्ख सम्मेलन के जुलूस का मुखिया हमेशा शहर के सबसे प्रतिष्ठित आदमी को बनाया जाता था। अनेकबार उसे गधे पर बिठाकर निकालते थे और सारा शहर उस जुलूस का आनंद लेता था। इस जुलूस के बारे में एक बड़ा पोस्टर छपवाकर सारे शहर में लगाया जाता था जिसमें लिखा रहता था कि इस साल का महामूर्ख कौन है ।
     इसके अलावा एक बड़ा पोस्टर और प्रकाशित किया जाता था जिसमें शहर के सभी नामी लोगों को गंदी और चुभती भाषा में उपाधियां और गुणों से विभूषित किया जाता था। इसके अलावा एक अश्लील पर्चा होता था जिसमें एक सुंदर अश्लील लंबी तुकबंदी वाली कविता होती थी और तकरीबन 10 हजार की संख्या में यह पर्चा छापकर बांटा जाता था। यह मथुरा का लोकल होली काव्य था। इसमें सामयिक मसले अश्लील भाषिक काव्य सौंदर्य के साथ उठाए जाते थे। सारा शहर उसे रस लेकर पढ़ता था। हमारे एक दोस्त और पड़ोसी थे मोहनलाल प्रेमी वे कविता में निपुण थे और वे यह होली काव्य बड़े ही लोकलुभावन भाव से लिखते थे। हम लोगों ने अपने तरीके से इस होली की विलक्षण परंपरा का निर्माण किया था। इस आयोजन के सारे फैसले सड़क किनारे खड़े होकर लिए जाते थे,कोई औपचारिक मीटिंग नहीं होती थी,किसी खाली बंद पड़ी दुकान के तख्ते पर बैठकर गप्पें करते हुए महामूर्ख सम्मेलन और पोस्टर-पर्चे आदि के बारे में फैसले लेते थे और पैसे की जरूरत नहीं पड़ती थी सारे काम मुफ्त में लोगों की मदद से होते थे। काश ‍यह परंपरा जिंदा रहती !      





मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

फेसबुक पर गालियों पर ऐसे चली बहस

 जगदीश्वर चतुर्वेदी-आम तौर पर हिन्दी में पढ़े लिखे लोग गालियों का खूब प्रयोग करते हैं। हम उसे तरह-तरह से वैध बनाने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन कायदे से हमें अश्लील भाषा के खिलाफ दृढ़ और अनवरत संघर्ष आरंभ करना चाहिए। यह काम सौंदर्यबोध के साथ शैक्षिक दृष्टि से भी जरूरी है।इससे हम भावी पीढ़ी को बचा सकेंगे। आपकी क्या राय है ।
9 hours ago ·  · 
    • Deepak Bajpai bilkul sahi kaha. pryas to aaj say hi karna chiya.
      9 hours ago · 
    • Jagadishwar Chaturvedi देखिए हमें इन सवालों पर खुली बहस चलानी चाहिए। बगैर बहस के गालियां पीछा नहीं छोड़ने वालीं।
      9 hours ago · 
    • Deepak Bajpai par bahas hi galiyo ki vajah hai. isliya apnay app ko sudarna hoga. har vykti ko ya baat socni chiya.
      9 hours ago · 
    • Jagadishwar Chaturvedi बहस करके करो यह काम। बहस से दिमाग की विभिन्न परतों की धुलाई करने की जरूरत है।
      9 hours ago ·  ·  1 person
    • Deepak Bajpai sahi baat khi apnay.
      9 hours ago · 
    • Jagadishwar Chaturvedi एक बात और वह यह कि गालियां मिथ्या साहस की अभिव्यक्ति हैं।
      9 hours ago ·  ·  3 people
    • Ajay Gathala baat sahi hai...vaise angrezi mein apshabdon ka prayog hindi se jyada hota hai(bolchal mein)
      9 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jagadishwar Chaturvedi गाली एक सस्ती,घृणित और नीच अश्लीलता है।
      9 hours ago ·  ·  1 person
    • Abinash 'Kafir' Mishra आपके इस बात से मैं पूर्णत; सहमत हूँ।
      9 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jai Prakash Pathak नमस्कार!
      गालियाँ हिन्दी वाले भी देते हैं और अंग्रेजी वालेभी . काश हमारे नौजवान भाषा संस्कार कापालन करते और अपने प्रिय मित्रों को प्रिय संबोधन करते. नमस्कार.
      9 hours ago · 
    • Vijay Sharma 
      भाषा बहुत जटिल पद्धति से हमारे पास आती है। इसमें पाठ्यपुस्तक-स्कूल -कॉलेज का योगदान कुछ खास नहीं,उलटे यह भाषा को नुकसान ही पहुंचाती है।किसी शब्द का कोई पर्यायवाची नहीं हो सकता,इसी लिये अंग्रेजी में सिनॉनमस कहते हैं। जो जिस शब्दावली दे परिचि...See More
      8 hours ago ·  ·  2 people
    • Jagadishwar Chaturvedi विजय जी,गालियां देकर और लिखकर आपने ठीक नहीं किया।
      8 hours ago · 
    • Jaikumar Jha गाली एक विरोध के भावना को दर्शाता है जो भ्रष्ट मंत्रियों और कुकर्मी उद्योगपतियों के खिलाप हर घर के दरवाजे पे आज लिखे जाने की जरूरत है.......जैसे रतन टाटा हरामी तथा इस देश व समाज का गद्दार है.....शरद पवार जैसा कुत्ता एक सौ हरामी के मरने के बाद पैदा होता है....ऐ रजा जैसे साले हरामियों को सरे आम फांसी दिया जाना चाहिए.....
      8 hours ago ·  ·  1 person
    • Abinash 'Kafir' Mishra ‎@झा जी: गाली कमजोरों का अप्रभावी अस्त्र है। अगर आप हार चुके हैं तो अपनी संतुष्टि के लिये इसका प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं कर सकता है वर्‌न बढाने के।
      8 hours ago via Facebook Mobile ·  ·  1 person
    • Abinash 'Kafir' Mishra बुद्धिजीवियों के लिये गाली का प्रयोग करना उनके अधूरे ज्ञान को दर्शाता है।
      8 hours ago via Facebook Mobile ·  ·  1 person
    • Vijay Sharma जयकुमार जी मैं ऐसी गालियों के पक्ष में नहीं हूं,जगदीश्वर जी से ज्यादा मुत्तासिर हूं। मैंने तो रसभरी,खिलवाड़ी,कर्णप्रिय,काव्यात्मक कूट भाषा के बारे में लिखा है। जगदीश्वर जी ,आप मुझे टपोरी भाषा का समर्थक न मानें,। यह तो लेखक की कमजोरी दिखाती है। मैं गुलेरी जी ,बिज्जी की भाषा सामर्थ्य का कायल हूं।
      8 hours ago ·  ·  1 person
    • Jaikumar Jha 
      ‎@Abinash 'Kafir' Mishra जी
      मैं भारत का आम नागरिक हूँ और ईमानदारी तथा इंसानियत की भयंकर बीमारी से पीड़ित भी हूँ.......और भारत में मेरे जैसा व्यक्ति कभी मजबूत और कामयाब नहीं रहा ...इस देश में हमेशा गद्दार,चोर,उचक्के और गिरगिट की तरह रंग बदलने...See More
      8 hours ago ·  ·  1 person
    • Parshuram Tiwari मैं जगदीश्वर जी से सहमत हूँ ...!
      8 hours ago · 
    • Jagadishwar Chaturvedi विजय जी की बहसशैली मुझे अपील करती है। वे सुलझे बुद्धिजीवी भी हैं। मैं एक अन्य पहलू की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ गालियां महज यांत्रिक आघात नहीं करतीं। इनसे न तो सेक्सी बिम्ब उभरते हैं और न कामुक अनुभूतियां ही पैदा होती हैं।
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Jagadishwar Chaturvedi सेक्सी गालियां हमारी अरूचिकर और अस्वास्थ्यकर संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति हैं।
      7 hours ago ·  ·  2 people
    • Parshuram Tiwari गलियां असभ्यता की निशानी हैं ...!
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Uttamrao Kshirsagar गालि‍यॉं स्‍वीकार्य नहीं होती...गालि‍यों से भाषा समृद्ध नहीं होती....
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Jagadishwar Chaturvedi गाली हमारी चेतना में बैठी आदिमचेतना की अभिव्यक्ति हैं।ये औरतों के लिए अपमानजनक हैं और बच्चों के लिए हानिकारक।भाषा में गालियों के महत्व का खत्म हो जाना इस बात का संकेत है कि गालियां सभ्यता के दायरे के परे हैं।
      7 hours ago · 
    • Jagadishwar Chaturvedi बंधुवर, अश्लील गालियां, अश्लील मजाक के जरिए परपीड़न होता है।गंदे किस्से,चुटकुले,चालू अश्लील शब्द मानवीयसौंदर्य की गरिमा को कम करते हैं।
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Ashok Kumar Pandey बिल्कुल ठीक बात है। सारी गालियाँ दलित और स्त्रियों के ख़िलाफ़ हैं।
      7 hours ago ·  ·  2 people
    • Vijay Sharma साथियों 'गाली' से मेरा आशय उसने कहा था कि शुरुआत से है,बिज्जी के गद्य से है,या फिर कृशनचंदर के आधे घंटे का खुदा से है। ये रामगोपाल वर्मा-सौरभ शुक्ला वाली बम्बईय्या फिल्मी गाली तो कोई भाषा ही नहीं है। कमसकम गुरुदत्त की शुरुआती या अबरार अल्वी की बात करें। बंगला में इसे कांचा(कच्ची) 'खिश्ती' कहते है। यह तो जबान पे आ जाये तो मुंह फिनाईल से धोना चाहिये-फिर उबला नीम हलक में उतारना चाहिये,फिर बालू की रोट बना कर खाकर सोयें ,दूसरे दिन शायद शरीर स्वच्छ हो..
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Jagadishwar Chaturvedi अशोक जी, मानव इतिहास आदिम शरीरक्रियात्मक मानकों को कूड़े के ढ़ेर पर फेंक चुका है। लेकिन अभी भी हमारे अनेक मित्र गालियों की हिमायत कर रहे हैं।
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Girish Mishra हिंदी एक बहुआयामी भाषा है, जहा पर मामा, काका, नाना, और दादा का फर्क सिर्फ संबोधन से समझ में आ जाता है, गलियों की कोई भाषा नहीं होती, गलिया सभी भाषाओं में उतनी ही सडांध रखती है जितनी शायद हिंदी रखती हो लेकिन साहब खतरा हिंदी से नहीं है खतरा अंग्रेजी के गानों और उनके सिनेमा से है हो यदि आप अनुवाद करे तो शायद बोल भी न पाए. भावी पीढ़ी को यदि बचाना है तो रचनात्मक हिंदी का प्रयोग पहले हम सब घर पर करे और गालियों का प्रयोग बंद करे, बच्चा वो ही सीखता है जो उसे उसका माहोल सिखाता है
      7 hours ago ·  ·  5 people
    • Jagadishwar Chaturvedi विजयजी, मुझे आपकी बात पर प्रसिद्ध रूसी शिक्षाशास्त्री अन्तोन माकारेंको याद आ रहे हैं उनकी शानदार किताब है 'एक पुस्तक माता-पिता के लिए' में लिखा- पुराने जमाने में शायद गाली-गलौज की गंदी भाषा कमजोर शब्दावली तथा मूक-निरक्षरता के लिए सहायक की तरह अपने ही ढ़ंग से काम आतीथीं। स्टैंडर्ड गाली की सहायता से आद्य-भावों को अभिव्यक्त किया जा सकता था, जैसे क्रोध,प्रसन्नता, आश्चर्य,निंदा और ईर्ष्या । लेकिन अधिकांशतः यह किसी भी भावना को व्यक्त नहीं करती थी,बल्कि असम्बद्ध ,मुहावरों और विचारों को जोड़ने के साधन का काम देती थी।
      7 hours ago ·  ·  1 person
    • Jagadishwar Chaturvedi बंधुवर हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि हिन्दी में गालियां कहां से आ रही हैं।गालियों के मामले में हम लोकल और ग्लेबल एक ही साथ होते जा रहे हैं। जाने-अनजाने असभ्यता का विश्व विनिमय कर रहे हैं।
      7 hours ago · 
    • Muneer Ahamed Momin आपने सही कहा जगदीश्वर जी, शब्दों के मामलों में कबीर के इस दोहे को चरितार्थ करने की आवश्यकता है कि -
      शब्द-शब्द सब कोय कहै, शब्द का करो विचार |
      एक शब्द शीतल करै, एक शब्द दे जार ||
      7 hours ago · 
    • Santbetra Ashoka Sehmat hai Sir.

      Santbetra Ashoka
      7 hours ago · 
    • Musafir Baitha galiyon ka ek apna manovigyan hota hai,galiyan sabhya-asabhya hone ki nishani nhin hai.itihas ya vartman ke adhikansh tathakthit sabhya bhi galiyon ki sewa kabhi na kabhi kisi na kisi vidhi le chuke hain/hote hain. is manovigyan ka ek bda hissa dalito-striyo (as above indicated by ashok ji) jaise smaj ke kamjor hisson ke hisse aaye hain.
      6 hours ago · 
    • Arman Neyazi Bahut sahi Janab. Adab wohi hai jismein be adbi nahin.. ek sanghursh chediye main aap ke saath hoon
      6 hours ago · 
    • Musafir Baitha 
      ‎...aur kabir ne hi yh bhi kaha hai (ise aap pta nhin,gali manenge ki kya)-



      pahn pujai to hari mile to main puju pahad,
      ...See More
      6 hours ago · 
    • Vijay Sharma यह भी देखें कि जो पिछड़े और स्त्री गालियों के शिकार है,वे भी खूब गाली देते हैं। कल लक्ष्मण जी कोट कर रहे थे 'जी भर कर गालियां दो,पेट भर कर बद्दुआ...'दुष्यंत। जगदीश्वर जी गाली पूरब आते-आते जैसी होती जाती है,वैसी दिल्ली के पशिचम में नहीं। खासकर बृज की गाली,राजस्थान की गाली,खासकर बीकानेर की गाली। यह भी कहते हैं कि गाली न दें तो क्या सुवाली दें। गोया सुवाली नमकीन होती है,गाली मीठी। ....ललित निबंध
      5 hours ago · 
    • Raakesh Manjul गालियों और अश्लीलता के बीच सीधा सम्बन्ध नहीं है. पर यह भी सही है कि हिन्दी वाले अब वैधानिक तरह से रचनाओ में गलियों का प्रयोग करने लगे है .वह सिनेमा हो या साहित्य अक्सर इन गालियों का प्रयोग मात्र आकर्षित करने के लिए होता है . गालियाँ तो राग दरबारी में भी है ,पर अश्लील नहीं लगती .
      5 hours ago ·  ·  2 people
    • Sagar Jnu bahut zaroori hai sir in gaaliyon k khilaaf aandolan krna...
      5 hours ago · 


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