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गुरुवार, 25 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाड़ा - अंधविश्वास और मार्क्सवाद

              अंधविश्वास सामाजिक कैंसर है। अंधविश्वास ने सत्ता और संपत्ति के हितों को सामाजिक स्वीकृति दिलाने में अग्रणी भूमिका अदा की है। आधुनिक विमर्श का माहौल बनाने के लिए अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता बेहद जरूरी है। आमतौर पर साधारण जनता के जीवन में अंधविश्वास घुले-मिले होते हैं।

अंधविश्वासों को संस्कार और एटीटयूट्स का रूप देने में सत्ता और सत्ताधारी वर्गों को सैकड़ों वर्ष लगे हैं। अंधविश्वासों की शुरुआत कब से हुई इसका आरंभ वर्ष तय करना मुश्किल है। फिर भी ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि सामाजिक विकास के क्रम में जब राजसत्ता का निर्माण कार्य शुरू हुआ था उस समय साधारण लोग किसी से डरते नहीं थे। किसी भी किस्म का अनुशासन मानने के लिए तैयार नहीं थे, राजा की सत्ता को स्वीकार नहीं करते थे। सत्ता के दंड का भय नहीं था। यही वह ऐतिहासिक संदर्भ है जब अंधविश्वासों की सृष्टि की गई।

आरंभिक दौर में अंधविश्वासों को संस्कार और जीवन मूल्य से स्वतंत्र रूप में रखकर देखा जाता था। कालांतर में अंधविश्वासों ने सामाजिक जीवन में अपनी जड़ें इस कदर मजबूत कर लीं कि अंधविश्वासों को हम सच मानने लगे।

अंधविश्वास का दायरा बहुत बड़ा है। इसके दायरे में सामाजिक मान्यताएं, सामाजिक आचार-व्यवहार से लेकर कला, ललित कला, साहित्य, राजनीति, व्यापार तक आता है। इसके कारण सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया बाधित हुई है।

भारत में विगत दो हजार वर्षों में किसी भी किस्म की सामाजिक क्रांति नहीं हुई। हम लोगों ने कभी भी इस सवाल पर सोचा नहीं कि हमारे समाज में विगत दो हजार वर्षों में सामाजिक क्रांति क्यों नहीं हुई? तमाम किस्म की कुर्बानियों के बावजूद आधुनिक भारत में कोई सामाजिक क्रांति क्यों नहीं हुई? यदि गंभीरता से भारतीय समाज पर नजर डालें तो पाएंगे कि भारत में सामाजिक क्रांति न होने के जिन कारणों की ओर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ध्यान खींचा था उनकी तरह हमारे समाज ने पूरी तरह ध्यान नहीं दिया।

हजारीप्रसाद द्विवेदी का मानना था कि भारत में सामाजिक क्रांति न होने के तीन प्रमुख कारण हैं। पहला, अंधविश्वास, दूसरा, पुनर्जन्म की धारणा और तीसरा कर्मफल का सिध्दांत। हमारी समूची चेतना इन तीन सिद्धांतों से परिचालित रही है। अंधविश्वास के कारण ही रूढ़ियों ने जन्म लिया। साहित्य एवं कलारूपों में रूढ़ियां और सामाजिक जीवन में रूढ़ियां अंधविश्वास की ही देन हैं।
आधुनिककाल आने के बाद साहित्य से रूढ़ियों का खात्मा हुआ बल्कि सामाजिक जीवन में रूढ़ियां बनी रहीं , अंधविश्वासों के खिलाफ सामाजिक संघर्ष लड़ा नहीं गया। वहीं दूसरी ओर, पूंजीवाद ने बड़े कौशल के साथ अंधविश्वास को अपनी मासकल्चर, विज्ञापन रणनीति और मार्केटिंग का अंग बनाकर नई शक्ल दे दी।

आज बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने बाजार के विकास के लिए जिन दो तत्वों का प्रचार रणनीति में सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रही हैं वह है धार्मिक संप्रेषण की पध्दति और दूसरा है अंधविश्वास। इन दो के जरिए जहां एक ओर उपभोक्तावाद का तेजी से विकास हो रहा है वहीं दूसरी ओर अंधविश्वासों के प्रति भी आस्था बढ़ रही है।

जो लोग सामाजिक परिवर्तन करना चाहते हैं उन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों की धार्मिक संप्रेषण की रणनीति और अंधविश्वास की जुगलबंदी को तोड़ना होगा। उन तमाम क्षेत्रों में हमले तेज करने होंगे जिनसे इन दो तत्वों को संजीवनी मिलती है। इसके अलावा पुनर्जन्म और कर्मफल के सिध्दांत के प्रति आम जनता में आलोचनात्मक रवैय्या पैदा करना होगा। आज अंधविश्वास संस्कृति उद्योग का अनिवार्य तत्व बन गया है। संभवत: कुछ लोगों को यह बात समझ में न आए और कुछ लोगों की भावनाएं भी आहत हों। किंतु इस डर से अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता पैदा करने के काम को छोड़ा नहीं जा सकता।

प्रश्न उठता है अंधविश्वास क्या है? इसे किन तत्वों से मदद मिलती है? इसका सामाजिक आधार कौन सा है? इससे किस तरह का समाज निर्मित होता है? किस तरह के कला रूप जन्म लेते हैं? और इसका विकल्प क्या है? ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो पाएंगे कि अंधविश्वास की धारणा का बुनियादी सारतत्व एक जैसा रहा है। मिस्र, यूनान और भारत में अंधविश्वासों की शुरुआत तकरीबन एक ही तरह हुई।

अंधविश्वास की बुनियादी विशेषता है अंधानुकरण, वैज्ञानिक विवेक का त्याग और स्वतंत्र चिंतन का विरोध। सामाजिक जीवन में इसका लक्ष्य था आम लोगों को अपने श्रेष्ठजनों के किसी भी आदेश के पालन का अभ्यस्त बनाया जाए। दूसरा , वे उन्हीं पर भरोसा करना सीखें जो हर मामले में समान भाव से धार्मिक विधि-विधानों का पालन करते हों। कलाओं की दुनिया में इसने नयनाभिराम चित्रों और मधुर गीतों की सृष्टि की। नयनाभिराम चित्रों और मधुर गीत-संगीत को मंदिरों में मानदंड के रूप में स्थापित किया गया। कला के क्षेत्र में किसी को यह इजाजत नहीं थी कि उनमें परिवर्तन करे। इसके कारण कलाओं के रूप सैकड़ों वर्षों तक अपरिवर्तित रहे। किसी ने यह साहस नहीं दिखाया कि कलाओं और मधुर गीतों में परिवर्तन करे। ये कलारूप सैकड़ों वर्षों से एक जैसे हैं। मिस्र के कलारूप इस अंधानुकरण के आदर्श उदाहरण हैं। विगत दस हजार साल से उनकी शैली में किसी तरह का परिवर्तन नहीं हुआ है। इस दौरान वे न तो बेहतर बन पाए और न बदतर ही बन पाए।
इसी तरह अंधविश्वास को जनप्रिय बनाने में झूठ खासकर इष्टकर झूठ की बहुत बड़ी भूमिका रही है। एक ऐसा झूठ, उदात्त झूठ जिसके सहारे संपूर्ण समुदाय को, संभव हो सके तो शासकों को भी स्वीकार करने के लिए राजी किया जा सके।

इस तरह के झूठ के आदर्श उदाहरण हैं हमारे रीति-रिवाज और संस्कार जिनकी प्रशंसा करते हुए हमारे शास्त्र थकते नहीं हैं। रीति-रिवाज और संस्कारों की प्रशंसा के क्रम में सबसे ज्यादा हमला स्वतंत्र चिंतन पर किया गया, उन लोगों पर हमले किए गए जो स्वतंत्र चिंतन के हिमायती थे। जो प्रत्येक बात पर शंका करते थे। प्रश्न करते थे।
आज हम रोम की महानता के गुण गाते हैं किंतु यह भूल जाते हैं कि रोम की महानता का आधार अंधविश्वास था। रोम की महानता के बारे में पोलिबियस ने लिखा कि मैं साहसपूर्वक यह बात कहूंगा कि संसार के शेष लोग जिस चीज का उपहास करते हैं, वह रोम की महानता का आधार है और उस चीज का नाम अंधविश्वास है। इस तत्व का उसके निजी और सार्वजनिक जीवन के सभी अंगों में समावेश कराया गया है और इसने ऐसी खूबी से उनकी कल्पनाशक्ति को आक्रांत कर लिया है कि उस खूबी को बेहतर नहीं बनाया जा सकता। संभवत: बहुत से लोग इसकी विशेषता समझ नहीं पाएंगे, लेकिन मेरा मत है कि ऐसा लोगों को प्रभावित करने के लिए किया गया है। यदि किसी ऐसे राज्य की संभावना होती, जिसके सभी नागरिक तत्वज्ञ होते तो इस तरह की चीज से हम बचे रह सकते थे। लेकिन सभी राज्यों में जनता अस्थिर है, निरंकुश भावनाओं, अकारण क्रोध और हिंसक आवेगों से ग्रस्त है। इसलिए केवल यही किया जा सकता है कि जनता को अदृश्य के भय से, और इसी किस्म के पाखंडों से काबू में रखा जाए। यह अकारण नहीं, बल्कि सुविचारित चाल थी कि पुराने जमाने के लोगों ने जनता के दिमाग में देवताओं और मृत्यु के बाद के जीवन की बातें बैठाईं। हमारी मूर्खता और विवेकहीनता यह है कि हम इस प्रकार की भ्रांतियों को दूर करना चाहते हैं।
इसके अलावा जिस विधा का निर्माण किया गया वह है चमत्कारवर्णन और दंतकथा। चमत्कारवर्णन और दंतकथाओं ने अंधविश्वासों को आम जनता के जीवन में उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। किसी भी दर्शनवेत्ता और धर्मशास्त्री के उपदेशों के द्वारा पुरुषों और औरतों के समूहों को श्रध्दा, भक्ति और विश्वास की ओर नहीं मोड़ा जा सकता था। इनको प्रभावित करने के लिए अंधविश्वास का लाभ उठाना पड़ता था। यह कार्य चमत्कारवर्णन और दंतकथाओं के बिना संभव नहीं था। कालांतर में इसने नागरिक जीवन की प्राचीन व्यवस्था और साथ ही, वास्तविक सृष्टि संबंधी स्थापनाओं में मिथकशास्त्र के रूप में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर लिया।
कौटिल्य का अंधविश्वास में विश्वास नहीं था किंतु उन्होंने राज्य के कौशल के तौर पर अर्थशास्त्र में अंधविश्वास की चर्चा की है। उनका न तो राजा के दैवी अधिकार और उसकी सर्वज्ञता की सच्चाई में विश्वास था और न वे यह चाहते थे कि स्वयं शासक इस तरह की वाहियात बात को सच मानें। वे सुझाव देते हैं कि राज्य को अपनी आंतरिक और बाह्य स्थितियों को सुदृढ़ करने के लिए सामान्य लोगों की अंधमान्यताओं का लाभ उठाना चाहिए।

कौटिल्य अर्थशास्त्र में अनेक ऐसे सुझाव देते हैं जो अंधविश्वासों पर आधारित हैं। संयोग से जिन उपायों को सुझाया गया है वे थोड़े फेरबदल के साथ अब भी लागू किए जाते हैं। कौटिल्य ने कुछ ऐसे साधनों को अपनाने की सलाह दी जो बहुत ही भद्दे थे और जिनका दोहरा उद्देश्य था। वे न केवल जनता के बीच अंधविश्वासमूलक भय उत्पन्न करते थे, बल्कि अंधविश्वास के विरोध में यथार्थ और ठोस कदम उठाने वाले प्रचारकों का शारीरिक रूप से सफाया करने की ओर भी लक्षित थे।

अंधविश्वास के साथ-साथ पुनर्जन्म और कर्मफल की प्राप्ति की धारणा का भी व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इसका साहित्य पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार साहित्य में काव्य-रूढ़ियों का चलन शुरू हुआ।

यह मान लिया गया कि जो कुछ हो रहा है उसका उचित कारण है ज़िस कार्य में असामंजस्य है, वह अवश्य भविष्य में करने वाले को दंड देने का साधन बनेगा। इस विचार ने भारतीय साहित्य में सामंजस्यवादी दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा की है। समाज की विषमताओं और अनमेल परिस्थितियों को कभी विद्रोही दृष्टि से नहीं देखा गया।

यह मान लिया गया नाटक दुखांत नहीं होना चाहिए। असंतोष और विद्रोह के अभाव में कवि की बुध्दि अधिकाधिक सूक्तियों और चमत्कारों में उलझती गई। साहित्य में सिर्फ रस और रस में भी सिर्फ श्रृंगार रस की रचनाओं का बाहुल्य इस मार्ग के अनुसरण का स्वाभाविक परिणाम था।
उल्लेखनीय है रस की अवधारणा की उत्पत्ति का समय तकरीबन वही है जब अंधविश्वास, पुनर्जन्म और कर्मफल की प्राप्ति के सिध्दांत का जन्म हुआ। रसों में हमारे प्राचीन लेखकों ने सिर्फ श्रृंगार रस पर ही मुख्यत: जोर दिया और अन्य रसों की उपेक्षा की।

तात्पर्य यह है कि अंधविश्वास के साथ आनंदमूलक मनोरंजन, कामुकता, स्त्री के सौंदर्यमूलक हाव-भावों का गहरा संबंध है। यह संबंध मध्यकाल से विकसित हुआ और आधुनिक काल तक चला आया है। अंधविश्वास के समूचे कार्य-व्यापार को यदि इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि समाज में कलाओं में नकल की प्रवृत्ति वस्तुत: अंधविश्वास के प्रति सहिष्णु भाव पैदा करती है।
नकल की प्रवृत्ति को पूंजीवाद का प्रधान गुण माना जाता है। इस अर्थ में पूंजीवाद अपने विकास के साथ-साथ सामंती और पूर्व सामंती कला रूपों और मूल्यबोध को बरकरार रखता है।कलाओं में अंधानुकरण आधुनिक काल में नकल में रूपांतरित कर लेता है। इससे जहां कभी न खत्म होने वाले मनोरंजन की सृष्टि करने में मदद मिलती है वहीं दूसरी ओर अंधानुकरण के एटीटयूट्स, रवैए और संस्कार का विकास होता है। कलाओं से यथार्थ गायब हो जाता है। उसकी जगह काल्पनिक यथार्थ या आभासी यथार्थ ले लेता है।

इसी तरह अंधविश्वास या नकल की संस्कृति का परजीवीपन और पेटूपन की संस्कृति से गहरा संबंध है। इसका स्वतंत्राता के विचार से विरोध है, यह उन तमाम विचारों को अस्वीकार करती है जो नकल या अंधानुकरण के विरोधी हैं।

पूंजीवाद अपनी सामान्य प्रकृति के अनुसार अंधविश्वासों को भी वस्तु के रूप में बदल देता है, उन्हें संस्थागत रूप दे देता है। अंधविश्वासों को कामुकता एवं रोमांस के साथ प्रस्तुत करता है और यह कार्य फिल्म, टी.वी. और वीडियो फिल्मों के संगठित औद्योगिक माल के उत्पादन के रूप में करता है।

कामुकता, पोर्नोग्राफी, अतिलयात्मक गीत और संगीत तथा नकल के आधार पर निर्मित कलाएं जितनी ज्यादा बनेंगी उतना ही ज्यादा अंधविश्वास भी बढ़ेगा। उतनी ही ज्यादा सामाजिक असुरक्षा, भेदभाव और तनाव की सृष्टि होगी। इसका प्रधान कारण यह है कि आज अंधविश्वास को मासकल्चर ने अपना सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बना लिया है।

अंधविश्वास की रणनीति और धार्मिक संप्रेषण की शैलियों को अपनाकर विज्ञापन, फिल्म और टी.वी. उद्योग तेजी से अपना विकास कर रहा है। पहले अंधविश्वास के माध्यम से राज्य अपने लिए जहां एक ओर धन जुटाता था वहीं दूसरी ओर जनता के दिलो-दिमाग पर शासन करता था। आज भी इस स्थिति में बुनियादी फर्क नहीं आया है। सिर्फ तरीका बदला है और इस कार्य में परंपरागत अंधविश्वास प्रचारकों के अलावा जो नया तत्व आकर जुड़ा वह है पूंजीपति वर्ग, बाजार और संस्कृति उद्योग।

अब अंधानुकरण की प्रवृत्ति का बाजार की शक्तियां खुलकर अपने मुनाफों के विस्तार के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। अंधानुकरण के लिए जरूरी है कि स्टीरियोटाइप प्रस्तुतियों पर जोर दिया जाए। इनमें खर्च कम और मुनाफा ज्यादा होता है और प्रस्तुतियां जल्दी ही समझ में आ जाती हैं। इस तरह की प्रस्तुतियां यथार्थ के निषेध और स्वतंत्र सृजन या मौलिक सृजन के निषेध को व्यक्त करती हैं।

वे ऐसे उन्माद, आनंद और मनोरंजन की सृष्टि करती हैं जो प्रभेदों का सृजन करता है। ध्यान रहे, प्रभेद वहीं पैदा होते हैं जहां भय हो, अंधविश्वास हो या जहां एक-दूसरे को धोखा देकर हराने का प्रयत्न किया जाता है। वहां परस्पर व्यवहार में सहज भाव नहीं होता।

अंधविश्वास मूलत: ऐसी स्वाधीनता की हिमायत करते हैं जो मनुष्य को पीड़ित करती है। यह संबंधहीन स्वाधीनता है। यह बुनियादी तौर पर नकारात्मक स्वाधीनता है। अंधविश्वास तरह-तरह के धार्मिक उपकरणों को जमा करने और धार्मिक उपकरणों के माध्यम से अंधविश्वासों से राहत पाने का रास्ता सुझाते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में, 'मानव जीवन में जहां अभाव है वहीं उपकरण जमा होते हैं। ... इस अभाव और उपकरण के पक्ष मेंर् ईष्या है, द्वेष है, वहां दीवार है, पहरेदार है, वहां व्यक्ति अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है और दूसरों पर आघात करना चाहता है।'

अंधविश्वास, पुनर्जन्म और कर्मफल के सिध्दांत से मुक्ति पाने के लिए जरूरी है कि तर्क और विमर्श के पुराने पैराडाइम को बदलें। पुराने पैराडाइम से जुड़े होने के कारण हम प्रभावी ढंग से अंधविश्वास का विरोध नहीं कर पा रहे हैं। तर्क के पैराडाइम को बदलते ही हम विकल्प की दिशा में बढ़ जाएंगे। पैराडाइम को बदलते ही विचारों में मूलगामी परिवर्तन आने लगेगा।

आम तौर पर हमारे बहुत से बुध्दिजीवी पुराने पैराडाइम को बनाए रखकर तर्कों में परिवर्तन कर लेते हैं। ध्यान रहे, अंधविश्वास को तर्क और विवेक से अपदस्थ नहीं किया जा सकता। जब तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर नया पैराडाइम निर्मित नहीं किया जाता तब तक अंधविश्वास को अपदस्थ करना मुश्किल है।

अंधविश्वास का जबाव तर्क नहीं विज्ञान है। जो लोक तर्क में विश्वास करते हैं वे पैराडाइम बदलते ही असली शक्ल में सामने आ जाते हैं। ध्यान रहे, जब पैराडाइम बदलते हैं तो उसके साथ ही, सारी दुनिया भी बदल जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि पैराडाइम बदलते ही हमारा विश्व दृष्टिकोण बदल जाता है, नए का जन्म होता है, वैज्ञानिक चेतना के विकास की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं। यही वह बिंदु है जिस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

अंधविश्वास का जबाव तर्क से देंगे तो अंतत: पराजय हाथ लगेगी यदि पैराडाइम बदलकर विज्ञानसम्मत चेतना से इसका जबाव देंगे तो अंधविश्वास को अपदस्थ कर पाएंगे। हमारे रैनेसां के चिंतकों ने अंधविश्वास का प्रत्युत्तर तर्क से देने की चेष्टा की और इसका अंतत: परिणाम यह निकला कि हम आज अंधविश्वास से संघर्ष में बहुत पीछे चले गए हैं। तर्क को आज अंधविश्वास ने आत्मसात कर लिया है। अंधविश्वास का तर्क से बैर नहीं है उसकी लड़ाई तो विज्ञानसम्मत चेतना के साथ है।

अंधविश्वास के कारण बौध्दिक अधकचरापन पैदा होता है। इन दिनों विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना के बजाय मिथकीय चेतना पर जोर दिया जा रहा है। आज विज्ञान को सत्य की खोज के काम से हटाकर व्यावहारिक उपयोग, उद्योग और युध्द के साजो-सामान के निर्माण में लगा दिया गया है। यहां तक कि धर्म और विज्ञान में सहसंबंध स्थापित करने की कोशिशें चल रही हैं। अब विज्ञान को पूंजीवाद ने महज एक चिंतन का रूप या शुध्द विज्ञान बना दिया है या उपयोगी रूप तक सीमित कर दिया है।

एक जमाना था विज्ञान पर विश्वास था। किंतु एक अर्से के बाद विज्ञान के प्रति संशय का भाव पैदा हुआ। शुरू में विज्ञान के प्रति प्रशंसाभाव था। बाद में मोहभंग हुआ और विज्ञान के प्रति संशय भाव पैदा हुआ। आज पूंजीवादी वैज्ञानिक निराश और हताश हैं कि क्या करें? वे पीछे मुड़ नहीं सकते। आगे किस तरह बढ़ना है? बढ़ गए तो कहां पहुचेंगे? आज विज्ञान के पूंजीवादी पक्षधर परेशान हैं कि विज्ञान के इतने विराट जुलूस को कहां ले जाएं? इसके कारण विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना के प्रति अविश्वास और गहरा हुआ है।

आम लोगों से लेकर बुध्दिजीवियों तक संशयवाद बढ़ा है। इसके कारण पुन: एकसिरे से अंधविश्वास और आध्यात्मिकता की बाढ़ आ गई है। कुछ लोग मानव स्वभाव की उन्नतिशीलता को लेकर कुछ भी होता न देखकर हताशा में डूबे जा रहे हैं और विज्ञान को तिलांजलि दे रहे हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो पहले से ही यह मानकर चल रहे हैं कि विज्ञान की सामाजिक परिणतियों पर कोई भी विचार-विमर्श हानिकर होने को बाध्य है।

कुछ ऐसे लोग भी हैं जो विज्ञान के व्यावहारिक उपयोग के अलावा और किसी भूमिका पर सोचने के लिए तैयार नहीं हैं। कुछ लोगों के लिए विज्ञान का विनाश के अलावा और किसी काम में उपयोग संभव नहीं है। कुछ के लिए यह संपत्तिा और मुनाफों के अंबार खड़ा कर देने का साधन मात्रा है। यह सही है कि पूंजीवाद समाजों में विज्ञान का सही उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। यह भी सच है कि वैज्ञानिक वेतनभोगी कर्मचारी होकर रह गए हैं।

आज वैज्ञानिक या तो किसी विश्वविद्यालय में काम करता है या किसी उद्योग या संस्था में काम करता है। निजी साधनों से वैज्ञानिक अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिक अब दुर्लभ हो गए हैं। जाहिरा तौर पर वैज्ञानिक जहां काम करता है वहां के हितों की उसे सबसे पहले पूर्ति करनी होगी। यही ्रूबदु है जहां पर हमें विज्ञान की सामाजिक भूमिका पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि विज्ञान बंदी है और वैज्ञानिक खरीदा जा चुका है तब अंधविश्वास के खिलाफ विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना की भूमिका शून्य के बराबर होगी।

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

नव्य उदार आर्थिकयुगीन युवा की सच्चाईयां

   
भूमंडलीकरण की केन्द्रीय विशेषता है आत्ममुग्धता ,आत्महनन और आत्म-व्यस्तता ।  सन् 1990-91 के बाद से युवाओं में यह प्रवृत्ति तेजी से पैदा हुई है। इसने उसे सामाजिक सरोकारों से काटा है। पहले यह प्रवृति उच्चवर्ग में थी लेकिन भूमंडलीकरण के बाद से इस प्रवृत्ति ने निचले वर्गों में पैर पसारने आरंभ कर दिए।
     आत्ममुग्ध भाव की विशेषता है आप स्वयं को जानने की कोशिश नहीं करते। वे तमाम क्षमताएं त्याग देते हैं जिसके जरिए आत्म को जानने में मदद मिले। आत्म या खुद को न जानने के कारण व्यक्ति के अंदर अन्य को जानने की इच्छा भी खत्म हो जाती है।फलतः ये युवा अन्य की मदद नहीं कर पाते। वे निजी जीवन में व्यस्त रहते हैं। निज से परे कोई संसार है जिसे जानना चाहिए उसको ये युवा सम्बोधित ही नहीं करते। यह ऐसा युवा है जो अपने अलावा किसी में दिलचस्पी नहीं ले जाता। ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं यह सुनना बंद कर देता है, रुचि लेना बंद कर देता है।
     नए युवा देखने में आकर्षक,नए भाव-भंगिमा वाले हैं वे देखने में सुंदर लगते हैं। आरंभ में ये अन्य को जल्दी प्रभावित भी कर लेते हैं लेकिन ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं ये अपने को समेटना आरंभ कर देते हैं। इन युवाओं में एक बड़ा अंश है जो अपने चारों ओर की दुनिया से एकदम बेखबर है।
    अमेरिका में इस तरह के युवा की एक नागरिकता परीक्षा ली गयी। अमेरिका में अक्टूबर 2009 से अगस्त 2013 के दौरान ली गयी नागरिकता परीक्षा में 30लाख से ज्यादा आप्रवासी युवाओं ने हिस्सा लिया।  इस परीक्षा को 92प्रतिशत युवाओं ने पास किया। इन उत्तीर्ण युवाओं में 29फीसदी को अमेरिका के उपराष्ट्रपति का नाम तक नहीं मालूम था। 43फीसदी नागरिक अधिकारों को परिभाषित करने में असमर्थ रहे,40 फीसदी नहीं जानते थे कि अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान और जर्मनी से युद्ध किया था। 73 फीसदी नहीं जानते थे कि शीतयुद्ध के दौरान साम्यवाद ही मुख्य समस्या थी। 67 प्रतिशत नहीं जानते थे कि वे जिस आर्थिक व्यवस्था में रहते हैं उसे पूंजीवाद कहते हैं।
एक अन्य सर्वे में पता चला कि चार में से एक अमेरिकन को संविधान प्रदत्त पांच स्वाधीनताओं का ज्ञान नहीं था। वे एक से अधिक स्वाधीनता का नाम नहीं जानते थे। जिन लोगों में सर्वे किया गया उनमें से आधे से अधिक लोग  “सिम्पसन कार्टून फैमिली ” के दो चरित्रों के नाम तक नहीं जानते थे। इन सर्वेक्षणों पर विशेषज्ञों ने कहा कि बच्चों की इस दशा के लिए पब्लिक स्कूल सिस्टम जिम्मेदार है। क्योंकि वे ठीक से बच्चों को इतिहास,भूगोल और नागरिकशास्त्र नहीं पढ़ाते। इन लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि इंटरनेट ने ऐसी पीढ़ी पैदा की है जो आत्मलीन,एडिक्ट,चंचलमन और अचेत है। यह भी देखा गया  अनेक लोग अमेरिका में निजी स्वार्थ को देखकर वोट देते हैं न कि देश के स्वार्थ को देखते हैं। अमेरिका के पतन का बड़ा कारण है कि अनेक अमेरिकन देश के बारे में नहीं सोचते ,सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं।  एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा कि जब युवा हमारे संविधान को ही नहीं जानते तो उसकी रक्षा में या संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए वे खड़े कैसे होंगे ?  



सोमवार, 19 मई 2014

मुक्त व्यापार,मुक्त बाज़ार का मुक्त नायक केजरीवाल

अरविंद केजरीवाल पर मीडिया के लट्टू होने की वजह धीरे धारे साफ़ होती जा रही हैं। साथ ही नव्य उदार आर्थिक नीतियों के हिमायती युवाओं के उसके प्रति आकर्षण के वैचारिक कारण भी सामने आने लगे हैं । हमें यह भ्रम भी नहीं पालना चाहिए कि केजरीवाल सिस्टम में परिवर्तन करने के लिए राजनीति में आए हैं । वे भी यह नहीं मानते ।
अरविंद केजरीवाल ने साफ़ कहा है कि वह 'क्रोनी कैपीटलिज्म" ( लंपट पूँजीवाद) के ख़िलाफ़ है। लेकिन पूँजीवाद के पक्ष में है। सीआईआई के जलसे में बोलते हुए केजरीवाल ने कहा

"We are not against capitalism, we are against crony capitalism", ( बिज़नेस स्टैंडर्ड, 17फरवरी 2014)
यह भी कहा 'हम ग़लती कर सकते हैं लेकिन हमारी मंशाएँ भ्रष्ट नहीं हैं।'
केजरीवाल की मंशाएँ साफ़ हैं और लक्ष्य भी साफ़ हैं। पहलीबार केजरीवाल ने आर्थिक नीतियों के सवाल पर अपना नज़रिया व्यक्त करते हुए जो कुछ कहा है वह संकेत है कि आख़िरकार वे देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं ?
केजरीवाल पर बातें करते समय उनके आम आदमी पार्टी के गठन के पहले के बयानों और कामों के साथ मौजूदा दौर में दिए जा रहे बयानों का गहरा संबंध है फिर भी हमें राजनेता केजरीवाल और सामाजिकनेता केजरीवाल में अंतर करना होगा ।
आम आदमी पार्टी के गठन के बाद केजरीवाल यह पहला महत्वपूर्ण नीतिगत बयान है। यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उनके दल के साथ सोशलिस्टों, अतिवामपंथी, उदार देशभक्त और जानेमाने वामपंथी विचारधारा के लोग भी शामिल हैं। ये सब वे लोग हैं जो कल तक विभिन्न मंचों से अपने जो विचार रख रहे थे उनसे केजरीवाल के आर्थिक विचारों का मेल बिठाने में असुविधाएं हो सकती हैं ।
केजरीवाल ने साफ़ शब्दों में अपने नज़रिए की बुनियादी धारणा पेश की है , उन्होंने कहा है
"Time has come to define what is the government's role," Kejriwal said, adding the government has no business to be in business, which is best left to private players.

He said whatever the form of government, it has three primary tasks - providing security, justice and a corruption-free administration."

यानी केजरीवाल चाहते हैं सरकार या राज्यसत्ता की बाज़ार के नियमन में कोई भूमिका न हो । वे चाहते हैं सरकार का काम है सिर्फ़ प्रशासन चलाना ।व्यापार के काम को निजी क्षेत्र के रहमोकरम पर छोड़ दिया जाय।
नव्य उदार आर्थिक नीति की भी यही माँग रही है। इसी माँग की पूर्ति के लिए कांग्रेस काम करती रही है और बाज़ार की शक्तियाँ ही तय करती रही हैं कि व्यापार में क्या हो?
यह अचानक नहीं है कि केजरीवाल 48दिन दिल्ली में सरकार में रहे लेकिन उन्होंने महँगाई नियंत्रण के लिए कोई क़दम नहीं उठाया । यहाँ तक कि व्यापारियों की लूट -खसोट के ख़िलाफ़ कोई बयान तक नहीं दिया।
केजरीवाल ने अपने बयान में मूलत: मुक्त बाज़ार की धारणाओं की हिमायत की है और जो फ़ार्मूला सुझाया है वह विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष विगत कई दशकों से सुझाता रहा है । यह नीति लगातार सभी देशों में पिटती रही है यहाँ तक कि अमेरिका में भी पिटी है।
मुक्त बाज़ार का मतलब भारत जैसे देश के लिए आत्मघाती है। इसका यह भी अर्थ है कि मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा जो जनविरोधी आर्थिक नीतियाँ लागू होती रही हैं उनको लेकर बुनियादी तौर पर केजरीवाल का कोई बुनियादी सैद्धांतिक मतभेद नहीं है। केजरीवाल की मनमोहन सिंह के बारे में जो धारणा है वह जानें,कहा है,
"The world's best economic expert is our Prime Minister Manmohan Singh. During the last 10 years of UPA tenure, you saw best economic policies but the biggest drawback was lack of honest politics. As there was no honest politics, those economic policies could not be implemented,"
यानी मनमोहन सिंह की नीतियाँ सही हैं लेकिन संकट है तो ईमानदार राजनीति का । ईमानदार राजनीति हो और मनमोहन सिंह की नीतियाँ रहें तो बस सोने में सुहागा समझो !
ईमानदार राजनीति का जनहितकारी नीतियों से गहरा संबंध है। मनमोहन सिंह की जनविरोधी नीतियों का भ्रष्ट राजनीति से गहरा संबंध है । मनमोहन सिंह की नीतियाँ " लंपट पूँजीवाद" की जनक हैं। समस्या ईमानदार नेता और बेईमान नेता में से चुनने की नहीं है ।
समस्या यह है मनमोहन सिंह की नीतियाँ रहें या जाएँ ? क्या केजरीवाल के पास मनमोहन सिंह की सुझायी और लागू की गयी नीतियों का कोई विकल्प है ? केजरीवाल के बयान से लगता है उनके पास मनमोहन सिंह की नीतियों का कोई विकल्प नहीं है। नीति मनमोहन सिंह की और राजनीति केजरीवाल की !
केजरीवाल का यह कहना कि सरकार का काम है प्रशासन चलाना और व्यापार के काम से सरकार को बाहर रहना चाहिए । इसका क्या अर्थ लें ?
केजरीवाल के अनुसार व्यापार के नियम व्यापारी बनाएँ , सरकार उस काम में हस्तक्षेप न करे। यानी वे व्यापारियों को मनमानी करने का अबाधित हक़ देना चाहते हैं। बाज़ार को सरकारी चंगुल से पूरी तरह मुक्त करते हुए वे क्या करना चाहते हैं इस पर साफ़तौर पर कुछ नहीं कहा ।
मसलन केजरीवाल से पूछा जाना चाहिए कि रेडियो तरंगों का मालिक कौन रहेगा ? सरकार रहेगी या निजी क्षेत्र ? क्या रेडियो तरंगों के बाजिव दाम मिल जाएँगे तो रेडियो तरंगों को निजी क्षेत्र को बेच दिया जाय ?
यह सच है केन्द्र सरकार ने रेडियो तरंगें निजी क्षेत्र को बेचकर राष्ट्र को भारी क्षति पहुँचायी है । रेडियो तरंगों को किसी भी क़ीमत पर निजी क्षेत्र को बेचना राष्ट्रहित में नहीं है। ये तरंगें राष्ट्र के लिए आवंटित हैं और राष्ट्र की संपदा हैं। इसी तरह मुनाफ़ा देने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के कारख़ानों के निजीकरण के प्रयासों को देखा जाना चाहिए ।
आम आदमी पार्टी का सार्वजनिक क्षेत्र के कारख़ानों और संस्थानों को लेकर क्या नज़रिया है ? इस पर केजरीवाल चुप रहे ? लेकिन उनकी मुक्तबाजार की धारणा साफ़ बता रही है कि वे सार्वजनिक क्षेत्र के पक्ष में नहीं हैं ।
यानी केजरीवाल को मौक़ा मिलेगा तो वे सार्वजनिक क्षेत्र को तेज़ी से निजी हाथों में सौंपेंगे ।
असल में अरविंद केजरीवाल का 'लंपट पूँजीवाद' का विरोध भी नक़ली है । वे चालाकी से इस बात को छिपा रहे हैं कि 'लंपट पूँजीवाद' तो पूँजीवाद के स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया के गर्भ से पैदा हुआ है ।
अमेरिका को 'लंपट पूँजीवाद' का जनक माना जाता है और वहाँ पर बड़े पैमाने पर इसके दुष्परिणाम जनता को भोगने पड़े हैं । मुक्त बाज़ार का सिद्धांत अंततः 'लंपट पूँजीवाद' में जाकर ही शरण लेता है ।
'लंपट पूँजीवाद' के आदर्श नायकों का जनक नव्य आर्थिक उदारीकरण है । केजरीवाल से लेकर मेधा पाटकर तक किसी को इसे लेकर समस्या नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि स्वयंसेवी संगठनों का जो नेटवर्क विगत 25 सालों में पैदा हुआ था उसका बहुत बड़ा हिस्सा इनदिनों आम आदमी पार्टी में समाहित हो चुका है । इसमें वे लोग भी हैं जो कल तक नव्य आर्थिक पूँजीवाद का विरोध कर रहे थे ,ज़मीनी संघर्ष चला रहे थे । लेकिन केजरीवाल के सीआईआई में दिए गए बयान ने साफ़ कर दिया है कि इन सभी रंगत के सामाजिक संगठनों का नव्य आर्थिक उदारीकरण का विरोध तात्कालिक और अवसरवादी था ।

केजरीवाल के द्वारा 'मुक्त व्यापार' की हिमायत करने को एक बड़ी राजनीतिक सफलता के रुप में भी देख सकते हैं । कम से कम केजरीवाल के ज़रिए वे तमाम संगठन जो कल तक मेधा पाटकर से लेकर लिंगराज के नेतृत्व में नव्य आर्थिक पूँजीवादी नीतियों का विरोध कर रहे थे , वे अब खुलकर मुक्त व्यापार के पक्ष में आ गए हैं। यह एनजीओ मार्का परिवर्तनकामी राजनीति में आया नया परिवर्तन है और त्रासद परिवर्तन है ।

केजरीवाल का मुक्त व्यापार की हिमायत में दिया गया बयान माओवादी,नव्य वामपंथियों और दिल्ली के फ़ैशनेबुल सोशलिस्टों के अब तक के नीतिगत बयानों का अतिक्रमण करता है ।
सवाल यह है क्या ये लोग अब भी केजरीवाल के मुक्त बाज़ार ,मुक्त व्यापार और राज्य की भूमिका को लेकर दिए गए बयान से सहमत हैं ? और साथ रहना चाहते हैं ? क्या मुक्त व्यापार का नारा सिस्टम को बदल सकता है ? क्या मुक्त व्यापार की नीतियों से आम जनता के हितों की रक्षा संभव है ? क्या मुक्त व्यापार की नीतियों के चलते 'लंपट पूँजीवाद' से बचना संभव है ? राज्य को व्यापार से पूरी तरह मुक्त करके केजरीवाल किन वर्गों की सेवा करना चाहते हैं ?
केजरीवाल जिस मुक्त व्यापार की हिमायत कर रहे हैं उसकी एक ज़माने में स्वतंत्र पार्टी और संगठन कांग्रेस ने जमकर हिमायत की थी और देश की संसद ने मुक्त व्यापार के सिद्धांत को अनेकबार ठुकराया है। 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' का रास्ता मुक्त व्यापार के ख़िलाफ़ विचारधारात्मक संघर्ष के क्रम में ही जन्मा था ।
मनमोहन सिंह ने विगत २० सालों में मुक्त व्यापार की हिमायत करते हुए बार बार सार्वजनिक क्षेत्र पर हमला किया है और दूरसंचार से लेकर बिजली तक सभी क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के हाथों औने-पौने दामों पर सरकारी संपत्ति को बेचा है । विनिमयन के नाम पर मुक्त बाज़ार और बाज़ार की शक्तियों को अबाध अधिकार दिए हैं । केजरीवाल की नज़र में यह सब जायज़ दाम वसूली का मामला मात्र है । मसलन् रेडियो तरंगें हों या कोयला खदानें उनको यदि जायज़ दामों पर बेच दिया जाता तो उनको कोई आपत्ति नहीं होती । समस्या यहीं पर है।
राज्य की संपदा को निजी क्षेत्र को क्यों बेचें ? क्या सरकार संपदा का प्रबंधन सही तरीक़ों और कौशलपूर्ण ढंग से नहीं कर सकती ? क्या सरकारी प्रबंधन और संचालन की नई नीति नहीं बनायी जा सकती ?
केजरीवाल का मानना है सरकार का काम ख़ाली प्रशासन चलाना है ।व्यापार करना नहीं है । नौकरी देना सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है वह तो निजी क्षेत्र की ज़िम्मेदारी है । इस तरह के कल्पना विलासी नेता से तो जनता के हितों की रक्षा करना संभव नहीं लगता ।
मुक्त बाज़ार और मुक्त व्यापार की हिमायत मूलत: जनतंत्र का विलोम है। मुक्त व्यापार में जनतंत्र तो अमीरों की रखैल है।
अमेरिका में मुक्त व्यापार है और वहाँ लोकतंत्र के नाम पर धनतंत्र है। आम आदमी की कोई हैसियत नहीं है। भारत में अभी भी लोकतंत्र में ग़रीब को ताक़त हासिल है और उसके बिना आप कुछ नहीं कर सकते ।
मुक्त व्यापार में लोकतांत्रिक संरचनाएँ मनमाने नियमों के तहत काम करती हैं। याद करें अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के पहले राष्ट्रपति चुनाव परिणामों को वहाँ मतपत्रों की गिनती पूरी किए बिना ही उनको राष्ट्रपति बना दिया गया , हमारे देश में यह संभव नहीं है। मुक्त व्यापार के जगत में नीतियों का फ़ैसला सीधे कारपोरेट घराने लेंगे और वह स्थिति भारत के लिए बेहद ख़तरनाक हो सकती है ।
केजरीवाल अपनी भाषणकला के ज़रिए नीतिगत सवालों से कन्नी काटते रहे हैं और घूम फिरकर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चले आते हैं। भ्रष्टाचार से लड़ना ज़रुरी है लेकिन अन्य समस्याओं से भी लड़ना ज़रुरी है।
आम आदमी पार्टी को सोचना होगा कि वे मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों पर चुप क्यों रहे ? वे गुजरात के दंगों या सिख दंगों पर बोलते हैं लेकिन मुज़फ़्फ़र नगर के दंगों पर चुप रहते हैं,यह नहीं चलेगा।दंगों में से चुनने का सवाल नहीं है । उसी तरह मोदी की साम्प्रदायिकता पर हमले करें लेकिन दिल्ली में एक जाति विशेष के लोगों या हरियाणा में जाति विशेष के लोगों द्वारा फैलाए जा रहे ज़हर का वोटबैंक की राजनीति के दबाव के कारण विरोध ही न करना ग़लत है ।
भारत में मुक्त व्यापार की हिमायत कल्पना विलास है और इससे जनता की मौजूदा बदहाली को ख़त्म नहीं किया जा सकता । केजरीवाल के पास अभी भी समय है और सोचें कि देश की आर्थिक उन्नति के लिए उनके पास नया क्या है ? मुक्त व्यापार की हिमायत तो नई बोतल में पुरानी शराब ही है और भारत की जनता यह शराब बार बार ठुकरा चुकी है ।

रविवार, 4 मई 2014

अस्मिता ,वर्चस्व और अमेरिकी जेल व्यवस्था

अमेरिका ने अपने देश में इस तरह की संस्कृति निर्मित की है जिसमें पुलिस और न्याय की हिंसा सामान्य और वैध लगती है। जिस तरह हमारे देश में आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज करना आमलोगों को वैध लगता है वैसे ही अमेरिकी समाज में भी पुलिस की हिंसा और आतंक को मीडिया प्रचार ने वैध बनाया है। सामान्य नागरिकों पर की गई पुलिस हिंसा को आजकल अमेरिका में लोग नॉर्मल एक्ट की तरह लेते हैं। एक जमाना था कि साधारण सी पुलिस कार्रवाई पर सारा देश हुंकार भर उठता था लेकिन लेकिन इन दिनों ऐसा कुछ भी नहीं होता।

आमलोगों में पुलिस के खिलाफ प्रतिवाद की भावना के लोप में मीडिया के रीगनयुगीन मॉडल की केन्द्रीय भूमिका है।यह प्रचार किया गया कि जो पुलिस के खिलाफ प्रचार या प्रतिवाद करते हैं वे क्रिमिनल हैं। यह भावना पैदा की गयी है कि पुलिस के खिलाफ वे ही लोग ज्यादा हल्ला मचाते हैं जो गलत धंधा करते हैं। ये ही लोग कानून तोड़ते हैं, नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं , गुण्डागर्दी करते हैं या हिंसा करते हैं ,आदि।

प्रसिद्ध मार्क्सवादी मीडिया सिद्धांतकार बौद्रिलार्द के अनुसार रीगनयुगीन अमेरिकी परिप्रेक्ष्य में सीनिरियो या परिदृश्य महत्वपूर्ण है। अब सब कुछ सीनिरियो के कमिटमेंट और प्रस्तुति पर निर्भर है। अपराध हुआ है फोटो दिखाओ,कैमरे में कैद करो,टीवी पर प्रसारित करो। किसी व्यक्ति का गिरफ्तार होना और फिर उसका टीवी फोटो या सीन में प्रसारण ही महत्वपूर्ण मान लिया गया है। सीनिरियो के लिए कमिटमेंट असल में रीगन युग में जन्म लेता है। रीगन स्वयं फिल्म अभिनेता थे और कैलीफोर्निया के थे। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद मीडिया में मूलगामी परिवर्तन यह आया कि सीनिरियो की प्रस्तुति महत्वपूर्ण मान ली गयी। खासकर विज्ञापन से लेकर टीवी तक सीनिरियो का महत्व बढ़ गया। विज्ञापन और टीवी दृश्यों के जरिए ही इमेजों के निर्माण,विध्वंस ,नियंत्रण और मेनीपुलेशन की पूरी दुनिया में बाढ़ आ गयी।

रीगन ने अपनी फिल्मी इमेज को अमेरिका की फिल्मी इमेज के निर्माण में सफलता के साथ इस्तेमाल किया। सामान्य जिंदगी जीने के लिए ब्लैकमेलिंग का मूलभूत गुण के रूप में इस्तेमाल किया। मीडिया प्रस्तुतियों में कहा गया सामान्य जिंदगी जीना चाहते हो तो ब्लैकमेलिंग करो। सहजजीना चाहते हो तो व्यक्तिगत हितों को तरजीह दो सामाजिक हितों की उपेक्षा करो।

अमेरिका आज जिस संकट में घिरा है उसका समाधान तब तक संभव नहीं लगता तब वह सामूहिक समाधान की धारणा को महत्ता नहीं देता। रीगनशासन ने इमेज को महान बनाया। कमाते हो तो अच्छे हो,इसमें यह महत्वहीन हो गया कि कैसे कमाते हो। अब प्रिफॉर्मेस पर जोर था। विज्ञापन ने लुक को महत्ता दी। इमेज प्रचारित रहे, चाहे जो करो। लुक के आधार निजी और सामाजिक बीमारियों को भी छिपा लिया गया। रीगन को कैंसर था लेकिन कैंसर जैसी बीमारी को भी लुक की ओट में छिपा लिया गया। यानी नई रणनीति में बीमारी भी लुक का हिस्सा बना दी गयी।

अब राजनीतिक खामियां या व्वस्था की खामियां या बेबकूफियां महत्वहीन हो गयीं, महत्वपूर्ण थी तो बस अमेरिका की इमेज। सुंदर,चमकीले,साफ-सुथरे,न्यायप्रिय,बहुलतावादी अमेरिका की इमेज की अहर्निश वर्षा ने अमेरिकी समाज के स्याह इलाकों को सामने आने ही नहीं दिया। इन स्याह इलाकों में से एक है अमेरिकी जेलप्रणाली।

अमेरिका की रीगनयुग से मीडिया में जिस तरह की इमेज वर्षा होती रही है उसके आधार पर अमेरिकी समाज और उसके तानेबाने को समझना मुश्किल है। मीडिया निर्मित इमेजों के आधार पर अमेरिका के राजनीतिक सत्य को नहीं जान सकते। यही हाल इन दिनों भारत का है। हमारी समस्त सरकारें खास किस्म के स्थायी शासन का भरोसा देती रही हैं। राजनीतिक स्थायित्व के ऊपर जोर देने के कारण भूलों, भ्रष्टाचार और असफलताओं को सरकार के लिए विध्वंसक नहीं माना जाता। अब भूलों और गलतनीतियों के कारण सरकारों का पतन नहीं होता। अब नेताओं पर जनता गर्व नहीं करती और नेता भी अपने फैसलों पर गर्व नहीं करते। यह वह परिदृश्य है जिसे रीगनयुग ने निर्मित किया और इस पैराडाइम में हम अभी भी जी रहे हैं।

अमेरिकी समाज में पुलिस और न्यायपालिका के खिलाफ नागरिकों के प्रतिवाद को मीडिया से एकदम धो-पोंछकर साफ कर दिया गया है। नई सूचना तकनीक के रूप में इंटरनेट और मोबाइल के आने के बाद से समूचे समाज की नजरदारी बढ़ा दी गयी है। अमेरिकी शासक जितना अपने देश के बाहर आतंकित और असुरक्षित हैं अपने देश में भी उतने ही आतंकित और असुरक्षित हैं। बाहर वे सीधे सेना,सूचना और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और बहुराष्ट्रीय निगमों के जरिए हमला करते हैं देश में पुलिस नजरदारी और गिरफ्तारी के जरिए नागरिक अधिकारों पर हमले करते हैं।

अमेरिकी समाज में कारपोरेट घरानों की लूट और मनमानी के खिलाफ प्रतिवाद संभव नहीं है साथ ही पुलिस हिंसाचार और अत्याचार के विरोध में भी प्रतिवाद करना संभव नहीं है।आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में जेलबंदियों में आधे के करीब लोग नशीले पदार्थो की तस्करी या अवैध सेवन संबंधी मामलों में गिरफ्तार किए गए हैं। " नेशनल ड्रग कंट्रोल पॉलिसी" संगठन के द्वारा जारी सन् 2009 की रिपोर्ट में अमेरिका के 10 महानगरों में किए गए एक सर्वे में कहा गया है कि इन शहरों में गिरफ्तार किए गए 87 फीसदी लोग अवैध नशीले पदार्थों के सेवन के शिकार पाए गए हैं। तरूणों में वैध नशीली दवाओं का प्रयोग अच्छी-खासी मात्रा में होता है।

सवाल यह उठता है कि अमेरिकी समाज में अवैध नशीले पदार्थों के सेवन का इतना व्यापक सामाजिक आधार क्यों और कैसे बना ? असल में ,शीतयुद्धीय राजनीति के तहत रीगन प्रशासन ने ड्रगवार के नाम से जो नीति अख्तियार की उसने अमेरिका के बाहर और अंदर आमलोगों को नशीले पदार्थों की लत का शिकार बनाया और यह काम बड़े सुनियोजित ढ़ंग से किया गया। ड्रगवार से लैटिन अमेरिका के साथ अमेरिका के अंदर का युवावर्ग भी बड़ी संख्या में प्रभावित हुआ।

ड्रगवार के कारण नशे की लत और अपराधकर्म में तेजी से इजाफा। विदेशों में ड्रगवार को माफिया गिरोहों, भाड़े के सैनिकों और अमेरिकी सैन्यहितों के विस्तार के साथ लागू किया गया और देश के अंदर युवाओं में नशे की लत,पॉपकल्चर,पॉप म्यूजिक और अपराधकर्म का त्रिकोणीय फार्मूला लागू किया गया इसके नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पुलिस प्रणाली और जेल व्यवस्था का विस्तार किया गया। जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को जेलों में बंद रखकर जहां एक ओर गुलामी को बढ़ावा दिया गया वहीं दूसरी ओर ड्रगवार के जरिए जन नियंत्रण के लक्ष्य को भी हासिल किया गया। नॉम चोम्स्की ने “डिटरिंग डेमोक्रेसी” नामक किताब में लिखा है कि नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों के कारण संगठित अपराधकर्म को बढ़ावा मिला। यह माना जाता है कि अमेरिका की करव्यवस्था में आधे से ज्यादा कर तो ड्र्ग ट्रेड से ही आता है। नशीले पदार्थ वैध बिकें या अवैध बिकें वे असल में नशीले पदार्थ ही हैं। उल्लेखनीय है अमेरिका में तम्बाकू वैध है , मरिजुआना वैध नहीं है।क्योंकि मरिजुआना को कहीं पर भी पैदा किया जा सकता है। मरिजुआना की बिक्री करना मुश्किल है। जबकि तम्बाकू के साथ ऐसा नहीं है। यही वजह है अमेरिका की 60 फीसदी से ज्यादा आबादी मरीजुआना पीती है.इधर के तीन दशकों में अमेरिकी युवाओं में मरिजुआना को छोड़कर अन्य ज्यादा नशीले पदार्थों के सेवन की ओर उन्मुख हुए हैं। इसके कारण समाज में अनेक किस्म की गंभीर बीमारियां भी फैली हैं। तम्बाकू और शराब के सेवन से मरने वाले युवाओं की संख्या का अनुपात जेलों में बंद कैदियों की संख्या से भी ज्यादा है। नशेड़ियों को सजा और जुर्माने के जरिए भी प्रशासन को बड़ी मात्रा में धन मिलता है।

चोम्स्की ने लिखा है कि सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिकी विश्व नीति में तीसरी दुनिया के देशों के खिलाफ हिंसाचार और जोर-जबर्दस्ती प्रभुत्व में लेने का मनोभाव व्यक्त हुआ है। घरेलू स्तर पर आम जनता को विभिन्न तरीकों से नियंत्रण में रखने और धमकाने के साथ तुरंत गिरफ्तार करके सजा दिलाने के मैथड का जमकर दुरूपयोग किया गया है।

बंदीजनों को अमेरिकी समाज में सामान्य नागरिक से भिन्न नजर से देखा जाता है। सामान्य नागरिक को अमेरिकी प्रशासन ने “हम” और बंदीजन को “तुम” की कोटि में रखकर विभाजित किया है। इसमें “हम” के पास नागरिक अधिकार हैं,”तुम” के पास नागरिक अधिकार नहीं हैं। “तुम” केटेगरी के लोगों को नियंत्रण में रखने लिए अमेरिका के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा कानून-व्यवस्था के ढाँचे पर खर्च होता है। यही स्थिति अमेरिका के बाहर है अमेरिका ने पाकिस्तान इराक,अफगानिस्तान, लीबिया आदि में विकास पर कम और सैन्य साजो -सामान खरीदने के लिए सहायता ज्यादा दी है।

अमेरिका ने ड्रगवार के बहाने देश के बाहर पराए मुल्कों यानी लैटिन अमेरिकी देशों की जनता की सेना से ठुकाई की, देश की जनता की पुलिस से ठुकाई करायी। देश के बाहर प्रतिक्रांतिकारी ताकतों को संगठित किया और देश में माफिया गिरोहों को संगठित किया।

कैदी नागरिक होता है। कैदी को अ-नागरिक मानकर किया गया बर्ताब सीधे मानवाधिकार का उल्लंघन है। अमेरिकी समाज में किसी भी अपराध में सजा पाए व्यक्ति को मतदान देने के नागरिक अधिकार से वंचित कर दिया जाता है और इस कारण लाखों अमेरिकी बाशिंदे नागरिक अधिकारों से वंचित हैं और दोयमदर्जे के नागरिक की हैसियत से जी रहे हैं। कोई व्यक्ति अपराध करने के कारण जब नागरिक अधिकार से वंचित किया जाता है तो यह उसके लिए दोहरी सजा है और यह सजा फांसी की सजा से भी बदतर है। नागरिक अधिकारों को किसी बहाने नहीं छीना जा सकता। इस समूचे पहलू को अस्मिता और मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य में समझें तो बेहतर ढ़ंग से देख पाएंगे।

मैं क्या हूँ यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि मैं समाज में जिंदा हूँ और एक मनुष्य के रूप में जब मेरी उपस्थिति है तो यह मेरी मनुष्य के रूप में उपस्थिति है और मनुष्य के अलावा जितनी भी अस्मिताएं या पहचान के रूप है वे अप्रासंगिक हैं। व्यक्ति की पहचान को स्थान के आधार पर तय करना ठीक नहीं है। मैं घर पर रहूँ या जेल में। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।इससे मेरी पहचान तय नहीं हो सकती। ज्योंही आप किसी व्यक्ति की पहचान को उसके जेल में रहने के कारण निर्धारित करते हैं आप पाते हैं कि इस तरह संबंधित व्यक्ति की ही नहीं उसके परिवारीजनों,नाते-रिश्तेदारों और जाति या समुदाय या धार्मिक समूह की भीपहचान तय करने लगते हैं। अतः स्थान विशेष के आधार पर व्यक्ति और समुदाय की पहचान निर्धारित नहीं की जानी चाहिए। जेल के आधार पर जब किसी व्यक्ति की पहचान तय करते हैं तो उस व्यक्ति के अंदर स्थायी तौर पर अपराधबोध और कुंठा भर देते हैं। जेलबंदी का जिस पर लेबिल लगा होता है उसे हमेशा दागी अपराधी के रूप में देखा जाता है।

सवाल यह है कि अस्मिता के जब विभिन्न रूप बदलते हैं तो उनको अवस्था विशेष से जोड़कर देखा जाता है। मसलन् एक अविवाहित लड़की की अस्मिता विवाह करते ही बदलती है,वह विवाहिता कहलाने लगती है,माँ बनते ही वह माँ की अस्मिता हासिल कर लेती है। एक ही लड़की एक ही साथ लड़की,पत्नी,माँ आदि की अस्मिताओं से गुजरती है। यानी व्यक्ति की अस्मिता उसकी अवस्था के अनुसार बदलती रहती है,ऐसी अवस्था में एक जेलबंदी की अस्मिता को स्थायी तौर पर दागी अपराधी के रूप में देखना सही नहीं है। वह जब तक जेल में था वह अपराधी था। लेकिन जब वह सजा काट चुका वह अपराधी नहीं रहा।

अमेरिका में अपराधी व्यक्ति पर लगा दाग उसका,उसके परिवार का और उसके समुदाय का कभी पीछा नहीं छोड़ता और इस तरह व्यक्ति अहर्निश अपराधबोध से ग्रस्त कुंठा और हताशा में जीता है। यह अपराध और अपराधी के प्रति साम्राज्यवादी नजरिया है। जरूरत है इस नजरिए को बदलने की।

मैं अभी प्रोफेसर हूँ और नागरिक भी हूँ। बुनियादी पहचान मेरी नागरिक की है।नागरिक की पहचान के परिप्रेक्ष्य में ही मेरी पहचान के बाकी रूपों को परिभाषित किया जाना चाहिए। लेकिन 60 साल बाद नौकरी से अवकाश ग्रहण कर लूँगा तब में प्रोफेसर नहीं रहूँगा। मेरी प्रोफेसर की पहचान कक्षा में उपस्थिति के समय प्रमुख होगी और नागरिक की पहचान गौण होगी। लेकिन कक्षा के बाहर में नागरिक हूँ, पिता हूँ,चतुर्वेदी हूँ,पति हूँ आदि। इनमें से पहचान का प्रत्येक रूप किसी न किसी सामाजिक अवस्था से जुड़ा है।मैंने ज्योतिष से आचार्य भी किया है तो मैं जब किसी का फलादेश बता रहा होता हूं तो मेरी पहचान एक ज्योतिषी के रूप में होगी न कि एक प्रोफेसर के रूप में। इसी तरह एक कैदी जब तक जेल में है वह कैदी है साथ में नागरिक भी है।

आधुनिक युग में नागरिक अस्मिता के बिना अन्य किसी पहचान का कोई मूल्य नहीं है।आधुनिक समाज में नागरिक होना ही आधुनिक होना है। नागरिक के अधिकारों,मान्यताओं और मूल्यों की रोशनी में हमें पहचान के सभी रूपों को परिभाषित करना चाहिए। नागरिक की पहचान सभी किस्म की अस्मिता या पहचान का मूलाधार है। पहचान के जितने भी रूप हैं वे नागरिक की पहचान के साथ मिलकर ही अपनी स्थिति निर्धारित करते हैं। नागरिक नहीं तो आधुनिक नहीं।अमेरिकी न्याय की यह आयरनी है कि नागरिक को जब किसी अपराध में सजा मिलती है तो उसको मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है।

आमतौर पर संकीर्णतावादी और फंडामेंटलिस्ट विचारधारा के लोग यह मांग करते देखे जाते हैं कि अपराधियों को कठोर से कठोर सजा दी जाय। इन लोगों का मानना है कठोर सजा देने से अपराधी फिर से अपराध नहीं करता। लेकिन यह धारणा व्यवहार में सच साबित नहीं हुई है। अमेरिका में कठोर सजाएं सुनाए जाने के बाद भी अपराधों में गिरावट नहीं आई है।इस तरह के विचारक आमतौर पर अपराध को नैतिकता से जोड़कर देखते हैं और बढ़ते अपराधों को नैतिक ह्रास का लक्षण बताते हैं। सच यह नहीं है। बल्कि ऐसा करके वे नैतिकता के क्षय का भय पैदा करते हैं और कठोरतम दण्ड के प्रावधान की मांग करते हैं। अपराधी के लिए कठोर दंड़ और नैतिकता के क्षय का भय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ये दोनों कंजरवेटिव और फासिस्ट विचारधाराओं से जुड़ा नजरिया है।

कठोर दंड की मांग अंततःराजनीति में अधिनायकवाद को जन्म देती है।अमेरिकी सत्ता की मनमानी से आज सारी दुनिया परेशान है।वहां सत्ता पर कारपोरेट तानाशाही का कब्जा है। अपराध और कठोरदंड से भय के कारण लोकतंत्र बाधित हुआ है और सर्वसत्तावादी विचारधाराएं मजबूत हुई हैं। कारपोरेट अधिनायकवाद का मार्ग प्रशस्त हुआ है । ये लोग आए दिन न्याय के अधिनायकवादी समाधान सुझाते रहते हैं और इसके बहाने हाशिए के लोगों पर वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश करते हैं।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो अमेरिकी जेल प्रणाली 200साल पुरानी है। इसमें दो तरह के प्रयोग किए किए गए। पहला प्रयोग गरीबों को दंडित करने के लिहाज से कारागार बनाकर आरंभ किया गया। 18वीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में यह प्रणाली आरंभ की गयी।आरंभ में अस्थायी बंदीघर के रूप में जेल का इस्तेमाल किया जाता था।जब तक कोई बंदी मुकदमे से बरी नहीं हो जाता उसे बंदी कराए रखने के लिए जेलों का इस्तेमाल करते थे और उसे बंदी रखते थे।इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि अमीरलोग तो जुर्माना देकर छूट जाते थे लेकिन गरीबों को जुर्माना न भरने के कारण जेलों में बंद रखा जाता था।गरीबों को जेलों में तरह-तरह की यातनाएं दी जाती थीं और अनेक मामलों में सार्वजनिक तौर पर दंडित किया जाता था।यह पूरी प्रणाली अनेक उपनिवेशों में भी लागू की गयी।उनदिनों सार्वजनिक तौर पर दंडित करने का प्रावधान था।

पूंजीवाद के आगमन के समय बड़े पैमाने पर समूचे यूरोप में चोरियां हो रही थीं, छोटे छोटे चोरों को सुधारने के लिहाज से 1557 से बड़े पैमाने पर खाली घरों में सुधारघर बनाए गए और चोरों को इनमें बंदी बनाकर रखा जाता था। खासकर ब्रिटेन में इस तरह के सुधारघर थे।इनमें बंद लोगों से जबरिया श्रम कराया जाता था और यह प्रयोग काफी सफल रहा।कालांतर में इस तरह के संस्थान समूचे ब्रिटेन और यूरोप में फैल गए।लेकिन उस जमाने में सुधारघरों मे जो बंदी थे वे छोटे-मोटे अपराधों में बंदी हुआ करते थे और ये गरीब लोग थे।इन बंदियों को यातनाएं दी जाती थीं,दण्डित किया जाता था और अन्यत्र भी भेज दिया जाता था। इस तरह के बंदीघर या सुधारघर का विचार सबसे पहले इंग्लिश समाजसुधारक जॉन हार्वर्ड के दिमाग में आया और इस तरह के सुधारघर सबसे पहले ब्रिटिश उपनिवेश अमेरिका में बनाए गए।बाद में ब्रिटेन में बने।

उस जमाने में शारीरिक दंड़ और फांसी दोनों का ही विलियम पेन ने जमकर विरोध किया और कहा कि इन दोनों किस्म के दण्ड देने से बेहतर है लंबी सजाएं देना।अमेरिकी क्रांति के दौरान भी जेलों में शारीरिक यातनाएं देने का जमकर विरोध हुआ और ब्रिटिश औपनिवेशिक न्याय प्रणाली की जमकर आलोचना की गयी। इस तरह की आलोचना करने वालों में डा. बेंजामिन रश का नाम सबसे ऊपर आता है।रश साहब पेनसिलवेनिया में सर्जन थे और अमेरिकी स्वाधीन क्रांति के अमर जनगायक भी थे। उनके लिखे दो चर्चित पर्चे हैं। इन दोनों पर्चों ने अमेरिका में जेलसुधार की प्रक्रिया को जन्मदिया और विगत 200सालों में वह विभिन्न पड़ावों से गुजरती हुई मौजूदा प्रणाली तक पहुंची है।बाद में कैदी को जेल में पृथक कमरे में बंद रखने,एक निश्चित स्थान तक आने-जाने, उस पर नजर रखने के प्रावधान किए गए।

उस समय जेलप्रणाली का प्रधान लक्ष्य था कैदी के लिए एकांत, श्रम, और अहर्निश नजरदारी। ऐतिहासिक नजरिए से देखें तो अमेरिकी जेलप्रणाली ने आरंभ में जो मॉडल अपनाया उसका लक्ष्य था वर्गीय नियंत्रण और नस्लीय नियंत्रण। सन् 1814 के न्यूयार्क जेल के रिकॉर्ड बताते हैं कि जेल में बंद 29फीसदी लोग काले थे। सन् 1833 की रिपोर्ट बताती है कि जिन राज्यों में जनसंख्या में 1नीग्रो और 30गोरेलोग रहते थे,वहीं पर इन राज्यों की जेलों में 1काला और 4गौरवर्ण के कैदी बंद थे।दक्षिणी राज्यों में 19वीं सदी में जेलों में बंद कैदियों की संख्या 75प्रतिशत के करीब थी। इन राज्यों में आमतौर पर कैदियों को निजी लोगों को ठेके पर दे दिया जाता था।इसके कारण दक्षिणी राज्यों में खुलेआम गुलामप्रथा फलीफूली। इसे ठेकेदारी प्रथा भी कहते हैं।अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में काले लोगों के खिलाफ जिस नग्नतम रूप में अमानवीय व्यवहार किया जाता था वह उस दौर में एक मिसाल माना जाता है।मसलन् सामान्य से अपराध के मामले में उस जमाने में पुलिस वाला नीग्रो को पकड़कर ले जाता था और फिर उसे लंबी सजा देकर बंद कर दिया जाता था, इस तरह नीग्रो जाति पर बर्बर जुल्म ढाए गए उनको गुलामी के लिए मजबूर किया गया। यही वजह है अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में गुलामगिरी के खिलाफ सबसे तेज प्रतिक्रिया हुई। अमेरिकी जेलों में बंद कैदियों को सुनियोजित ढ़ंग से नशे की लत डाली जाती थी। उनको कोकीन,हेरोइन,अफीम आदि सप्लाई दी जाती थी। इस दुष्परिणाम यह होता था कि वे जब जेलों से बाहर निकलते थे तो नशे के आदी हो चुके होते थे और बाहर निकलकर फिर से अपराधकर्म में लिप्त हो जाते थे और फिर से लौटकर जेल में पहुँच जाते थे।

अमेरिकी जेलप्रणाली में दूसरा बड़ा प्रयोग 1929-30 की मंदी के समय किया गया। इस प्रयोग के दौरान यह पाया गया कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय जेलों में कैदी कम थे और उसके पहले और बाद में कैदियों की संख्या ज्यादा थी।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में अमेरिका में नशीले पदार्थों के सेवन और उससे जुड़े अपराधों की बाढ़ आती है। फलतः इसदौर की जेलप्रणाली में नशीले पदार्थों के सेवन को आधार बनाकर चिन्तन आरंभ हुआ। सन् 1929 के आसपास आई मंदी के दौर में देखा गया कि तेजी से बेकारी बढ़ी है और अपराध भी बढ़े हैं। अपराधों का सिलसिला बंद हुआ है द्वितीय विश्वयुद्ध आने के साथ।युद्ध के दौरान अपराध का आंकड़ा तेजी से कम हो जाता है। लेकिन ज्योंही युद्ध खत्म होता है अपराधियों और बेकारों की संख्या में तेजी से उछाल आता है।यही वह दौर है जब दंड की टिकाऊ प्रणाली की हिमायत की जाती है।बेकारीऔर मंदी के कारण अपराधियों की संख्या में आया उछाल आंकड़ों से भी पुष्ट होता है।

सन् 1999 में अमेरिकी जेलों में प्रति एक लाख लोगों में 476लोग बंदी थे।यह संख्या 1929 की मंदी में जेलों में बंद लोगों की संख्या से तीन गुना ज्यादा है।अमेरिकी फेडरल जेलों में बंद लोगों की संख्या 1999 से 2000 में 9फीसदी बढ़ी है ।यानी अमेरिका के समस्त राज्यों की जेलों में 1990 में प्रति एक लाख की आबादी में 458लोग जेल में बंद थे जो 2000 में बढ़कर 702 हो गए।

सन् 2000 में फेडरल जेलों में बीस लाख लोग जेलों में बंद थे।ताजा आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका के विभिन्न राज्यों में जेलों में कैदियों की संख्या बेशुमार है। इन जेलों में जेलों की क्षमता से 33 फीसदी ज्यादा कैदी बंद हैं। जून 2003 में न्याय सांख्यिकी विभाग के द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार विगत 4सालों ( 1999-2003)में जेलों में बंदियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।जेलों में बंद कैदियों में औरतों की भी बड़ी तादाद है। इन चार सालों में कुल जेलबंदियों में 5.0प्रतिशत औरतों की संख्या बढ़ी है। खासकर टैक्सास और कैलीफोर्निया में बंदियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।जबकि 9राज्यों में बंदियों की संख्या में गिरावट दर्ज की गयी है। अमेरिकी जेलों में बंदी लोगों का प्रोफाइल बताता हैकि कैदियों में 60फीसदी अल्पसंख्यक हैं।इनकी उम्र 20साल से नीचे है।अमेरिका की समग्र जेल बंदी संख्या सन् 2003 में 6.9 मिलियन यानी 70लाख दर्ज की गयी थी ।

नई अमेरिकी जेल प्रणाली और न्याय प्रणाली कठोर दण्ड देने की नीति पर आधारित है और इसके अनुकूल परिणाम नहीं निकले हैं। बंदियों पर किए गए अनुसंधान बताते हैं बंदियों को कड़े दण्ड देने की नीति के कारण अपराधों में कोई कमी नहीं आई है। इसके विपरीत कठोर दण्ड देने से हिंसक और आक्रामक व्यवहार में इजाफा हुआ है। अपराधियों को कठोर देने से उनमें आक्रामकता बढ़ी है और वे और भी हिंसक हो उठे हैं। जेलों में इन बंदियों के आक्रामक व्यवहार का अन्य कैदियों पर भी बुरा असर देखा गया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि अपराधी को दुरूस्त करने के लिए दण्ड देकर सुधारने की बजाय सामाजिक व्यवहार और सामाजिक शिक्षा से दुरूस्त करने पर जोर दिया जाना चाहिए। लेकिन अमेरिकी न्यायप्रणाली में इसके लिए कोई जगह ही नहीं है।

अमेरिका में बढ़े अपराध और जेलों में स्थान के अभाव के कारण अमेरिकी प्रशासन ने एक पद्धति इजाद की और उन अपराधों को रेखांकित किया है जिनमें कम से कम सजा दी जाए। कम सजा के प्रावधान का समाज पर क्या असर हुआ उसका मूल्यांकन करने के लिए एक कमीशन बनाया गया जिसने 20साल के अनुभवों को समेटते हुए अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में बताया गया कि कम अवधि की सजा पाने वाले कैदियों की संख्या में 155फीसदी इजाफा हुआ है। 52 फीसदी जजों ने माना कि न्यूनतम सजा देने के मामले में विषमता देखी गयी है। 62फीसदी जजों ने कहा कि सभी किस्म के मामलों में न्यूनतम सजा देने का औसत प्रतिशत बहुत ज्यादा रहा है। ये राय सन् 2010 की है।

अमेरिका में एक फिनोमिना यह भी देखने में आया है कि समुदाय विशेष के लोगों को चिह्नित करके अपराधी की केटेगरी में बदनाम कर दिया जाता है। जिस व्यक्ति को एकबार जेल हो जाती है उसके बाद उसका परिवार और सामाजिक समुदाय हमेशा अपराधी के नाम से जाना जाता है फलतःएक तरह की सामूहिक यंत्रणा से संबंधित नागरिक को गुजरना पड़ता है।

मसलन, न्यूयार्क को ही लें,पूर्वी न्यूयार्क के इलाके में रहने वाले लोगों में अपराध एक कॉमन फिनोमिना बना दिया गया है। इन बस्तियों में ऐसे परिवार ज्यादा रहते हैं जिनका कोई न कोई सदस्य किसी न किसी समय जेल में रहा है या जाने वाला है। यह फिनोमिना अकेले न्यूयार्क शहर में ही नहीं है अन्य अमेरिकी शहरों में भी इस फिनोमिना को देख सकते हैं।

अमेरिका की समस्त जेलों ( संघ और केन्द्र की ) में आधे से ज्यादा बंदी काले लोग हैं। गोरे बंदियों की तुलना में काले बंदियों की संख्या सात गुना ज्यादा है। सन् 1996 तक के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका की समग्र काली आबादी के 30फीसदी लड़के कभी न कभी जेल में बंद जरूर रहे हैं। गोरी औरतों से 421फीसदी ज्यादा काली औरतें नशीले पदार्थों के सेवन के चक्कर में जेलों में बंद रही हैं। बंद औरतों में तीन-चौथाई औरतों के बच्चे हैं। 15लाख से ज्यादा बंदी औरतों के छोटे-छोटे बच्चे हैं। जेलों में बंद आधी से ज्यादा काली औरतें अपने बच्चों को जेल में रहते हुए कभी नहीं देख पाएंगी।

अमेरिकी न्यायप्रणाली में अपराध के कारण अपराधी के साथ-साथ पूरा परिवार टूट जाता है। यही वजह है कि अमेरिका में पितारहित बच्चों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। अमेरिकी सिस्टम की दूसरी पीड़ादायक बात यह है कि जिन लोगों को एकबार जेल हो जाती है उनका मतदान का अधिकार खत्म हो जाता है। सरकारी घर पाने का अधिकार खत्म हो जाता है,बैंक से कर्ज नहीं मिलता,विकास योजनाओं के लाभों से इनको वंचित कर दिया जाता है। इन स्थितियों में जब कोई बंदी सजा काटकर सामाजिक जीवन में वापस लौटकर एक भले शहरी की जिंदगी गुजारना चाहे तो उसके लिए कोई संभावना ही नहीं बचती। बल्कि उसे पहले से भी कठिन सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह एक तरह से अमेरिकी प्रणाली में नस्लवादी शोषण और उत्पीड़न का अंतहीन चक्र है जिसमें काले लोगों को जीना पड़ता है। यह भी कह सकते हैं कि अमेरिकी समाज में जेल यात्रा कर आए व्यक्ति के लिए नए सिरे से भले आदमी की जिन्दगी जीने की अमेरिकी सत्ता कोई संभावनाएं ही नहीं छोड़ती।

अमेरिकी समाज में काले और हिस्पनिक समुदाय के अघिकांश लोग घेटो में रहते हैं। एकदम दमघोंटू अभावग्रस्त माहौल में रहते हैं। हर शहर में इनके लिए दमघोंटू घेटो बस्तियां बनी हैं जो शहर के भीतरी इलाकों में बसी हैं। इन घेटो बस्तियों में रहने वालों की जीवनशैली बेहद खराब है। उल्लेखनीय है अमेरिकी जेलों में बंद लोगों में आधी संख्या उनकी है जो नशीले पदार्थों के सेवन के जुर्म में पकड़े गए हैं। उल्लेखनीय है घेटो में रहने वालों की शिक्षा पर कम और जेलों के रखरखाब पर ज्यादा खर्चा किया जा रहा है। रेण्ड कारपोरेशन के द्वारा कराए एक सर्वे से पता चला है कि नशीले पदार्थों के सेवन के लिए दिए गए कठोर दंड की व्यवस्था ने समाज में असुविधाएं ज्यादा पैदा की हैं। कठोर दंड देने से लोग और ज्यादा बिगड़े हैं, पीड़ितों के परिवार में तबाही मची हुई है।

कायदे से देखें तो अमेरिका में जेल-औद्योगिक समूह का निर्माण हो चुका है। आमलोग खेतों-खलिहानों में काम करने की बजाय जेल की चौकीदारी ज्यादा पसंद करते हैं। अमेरिकी सामाजिक सेवाओं की तरह जेल व्यवस्था का भी निजीकरण कर दिया गया है। जेल बनाना और उनको चलाना बहुत बढ़िया मुनाफे का धंधा है। लगातार नए-नए जेलों का प्रत्येक शहर में निर्माण हो रहा हैऔर ये स्थानीय निजी जेल भी अमेरिकी जनगणना के रिकॉर्ड का हिस्सा है।

मसलन् विगत 30सालों में न्यूयार्क में घेटो वाले इलाकों में 30 नए बहुमंजिला जेल बनाए गए हैं। इन जेलों के रखरखाब पर आम करदाता जनता का पैसा खर्च होता है। मसलन् 1997 में प्रति कैदी 8डालर खर्चा आता था जो 1999 में बढ़कर 30 डॉलर हो गया। एक अनुमान के अनुसार जेल में बंदी व्यक्ति पर सालाना पन्द्रह फीसदी खर्चा बढ़ा है। चूंकि जेल और कैदी अब कारपोरेट मुनाफावृद्धि का हिस्सा हैं अतः अब गिरफ्तारियां और सजाएं भी खूब हो रही हैं। जितनी ज्यादा लोगों को गिरफ्तारी और सजा उतना ही ज्यादा मुनाफा। जेल-उद्योग में लगे कारपोरेट घरानों के दबाब के चलते ही अमेरिका की अधिकांश सरकारी जेलों को भी निजी हाथों में सौंप दिया गया है। सन् 1990 के बाद से अमेरिका के तकरीबन सभी राज्यों ने कानून बनाकर सरकारी जेलों को निजी हाथों में सौंप दिया है। विभिन्न जेलों के साथ विभिन्न वस्तुओं की उत्पादक बड़ी कंपनियों का समझौता है और बंदियों के बनाए सामान को ये कंपनियां खरीदकर बाजार में बेचती हैं। अथवा वे अपना माल कैदियों से बनवाते हैं।

सन् 1980 से सन् 2000 के बीच में जेलबंदियों ने तकरीबन 2विलियन डॉलर का सामान बनाया । मसलन् साबुन,कम्प्यूटर पुर्जे,ऑफिस फर्नीचर,गोल्फ वॉल,कपड़े,चटाई आदि बनानेवाले बंदी को 1.10 डॉलर प्रतिघंटे मजदूरी मिलती है। जबकि सामान्य नियम के तौर पर एक मजदूर को जेल के बाहर 10 डॉलर प्रतिघंटा देना होता है। अतः बाहर काम कराना महंगा पड़ता है ,यही वजह है कि कंपनियां बंदियों से सस्ती दर पर काम कराती हैं। यह एक तरह की गुलाम प्रथा है।

अमेरिकी जेलों में सस्ते श्रम को कारपोरेट घराने व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे और बंदियों से वस्तुतः गुलामों की तरह काम ले रहे हैं,साथ ही इनका सामाजिक जीवन भी दोयमदर्जे के नागरिक जैसा है। शोषण की स्थिति यह है कि एयरलाइंस कंपनियों से लेकर हीरो होण्डा कंपनी तक के कामों में ये बंदी जुटे रहते हैं। एक जमाने में ओहिओ राज्य में ट्रांसवर्ल्ड एयरलाइंस जेल में बंद कैदी को फोन से टिकट बुक करने का 5डॉलर प्रतिघंटा देती थी। इसी तरह हीरो होण्डा अपने एसेम्बली लाइन काम के लिए जेलकैदी को 2.05डॉलर प्रतिघंटा देती थी, इसके खिलाफ मजदूर यूनियनों ने जमकर प्रतिवाद किया था और उसके बाद यह योजना बंद कर दी गयी।

अमेरिकी न्यायप्रणाली की न्यायप्रियता की आमतौर पर मीडिया में बड़ी प्रशंसा की जाती है और उसके अन्यायपूर्ण पहलुओं की अनदेखी की जाती है। अमेरिकी न्यायप्रणाली में गोरी नस्ल का वर्चस्व है और गैर-गौरवर्ण के नागरिकों को आएदिन अन्याय झेलना पड़ता है। अमेरिकी न्याप्रणाली में नस्लभेदीय रूझानों की कभी मीडिया और सार्वजनिक जीवन में चर्चा नजर नहीं आती।अमेरिकी न्यायप्रणाली का लक्ष्य है अफ्रीकी –अमेरिकियों को नियंत्रण में रखना।

पूंजीवादी व्यवस्था की यह सामान्य विशेषता है कि वह जहां पर अपना पैर पसारती है वहीं पर सामाजिक मनुष्य की मौत हो जाती है। एकाकीपन, अलगाव,एकांत,अजनबियत आदि को इतनी जल्दी प्रसार मिलता है कि नागरिक समझ नहीं पाता कि आखिर यह सब कैसे हो रहा है। सामाजिक की मौत ही वह प्रस्थान बिन्दु है जहां से राज्य आसानी से नागरिक पर अपना अधिकार जमा लेता है और शासकवर्ग उसे अपनी विचारधारा के घेरे में ले लेता है। एक अध्ययन के अनुसार अमेरिकी जेलों में बंद अमेरिकी नागरिकों की संख्या विलक्षण रूप से बहुत ज्यादा है। अध्ययन बताता है कि विश्व की 5फीसदी आबादी अमेरिका में रहती है और उसके 25फीसदी लोग जेलों में बंद हैं। जेलबंदियों के मामले में भी अमेरिका का दुनिया में फीसदी और संख्या के लिहाज से सर्वोच्च स्थान है।

अमेरिकी जेलों में बंद लोगों का प्रोफाइल बताता है कि बंदी बनाने के मामले में भी अमेरिका में नस्लभेद है। मसलन् युवा अफ्रीकी-अमेरिकन कैदियों की संख्या गोरे कैदियों की संख्या से ज्यादा है। स्थिति यहां तक खराब है कि जेलखाने गुलामी के लिए पट्टे पर दिए जाते हैं। अमेरिका में यह मिथ प्रचारित है कि काले लोग बलात्कारी होते हैं और गोरी औरतें मानती हैं उनको गुलाम बनाए रखना ,मारदेना और काले लोगों पर सख्त निगरानी आदि जायज हैं।

अमेरिका के नागरिकों की पश्चिमी यूरोप के नागरिकों की तुलना में आय 5 से 8 गुना ज्यादा है। जबकि अहिंसक अपराधों के मामले में अमेरिका में जापान की तुलना में सत्रह गुना ज्यादा अपराध होते हैं। सन् 1970 की तुलना में अमेरिका के राज्यों में अपराधों में 500 गुना इजाफा हुआ है। अपराधों की हालत यह है अहिंसक अपराधों में लंबी सजाएं भोगने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है और जेलों में जगह नहीं है।

मिशेल फूको ने “डिसप्लिन एंड पनिश”( 1975) में विस्तार से यह बात रेखांकित की है कि जेल प्रणाली से अपराधों में कमी नहीं आई है बल्कि अपराधी ज्योंही जमानत पर छूटते थे वे पहला केस खत्म होने के पहले फिर जेल में आ जाते थे।जो लोग जेलों में बंदी हुआ करते थे उनसे काम कराया जाता था और उनको श्रम के गुण और ईमानदारी का पाठ भी पढ़ाया जाता था।

मिशेल फूको ने अपनी किताब में विस्तार के साथ फ्रांसीसी जेलों की दशा और सामाजिक स्थिति का सुंदर वर्णन किया है। जेलप्रणाली के सुधार के वर्षों में जेल में श्रम कराने और उस श्रम से बनी वस्तुओं को बाजार में बेचकर मुनाफा कमाने की परंपरा आरंभ हो गयी थी।अब जेल और फैक्ट्री एक हो गए थे। बेंथम ने विस्तार के साथ इस पहलू पर ध्यान खींचा है।जेरेमी बेंथम ने लिखा है कि जेल और फैक्ट्री दोनों को एकांत में संगठित किया जाता था और दोनों पर अहर्निश नजरदारी रखी जाती थी। इससे व्यक्ति को बांटने और श्रम कराने में मदद मिलती थी। उन दिनों जेलों में कैदियों के सुधार पर कम और उनसे मुनाफे के लिए श्रम ज्यादा कराया जाता था। फलतः इससे कैदी सुधरे कम लेकिन उन्होंने मुनाफा ज्यादा पैदा किया।

बेंथम ने उदार दण्ड प्रणाली का एक तरह से मॉडल पेश किया।जिसमें अपराधी को वैध एकाकी शोषण के लिए तैयार किया जाता था।इसके विपरीत कार्ल मार्क्स ने ’’पवित्र परिवार’’ नामक पुस्तक में लिखा अपराध के लिए एकाकी व्यक्ति को सजा नहीं दी जानी चाहिए बल्कि अपराध के अ-सामाजिक स्रोत को नष्ट किया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को मनुष्य की तरह विकास करने का अवसर दिया जाना चाहिए।यदि व्यक्ति को वातावरण बनाता है तो वातावरण को मानवीय होना चाहिए। यदि मनुष्य स्वभावतः सामाजिक है तो वह समाज की सही प्रकृति का विकास करेगा। उसकी शक्ति की प्रकृति को एकाकी व्यक्ति के आधार पर नहीं बल्कि समाज की शक्ति के आधार पर परखा जाना चाहिए।कालांतर में पूंजी(भाग-1) में मार्क्स ने लिखा कि अधिकांश अपराधी अति जनसंख्या वाले निचले तबकों से आते हैं और ये वे लोग हैं बेकार हैं।मार्क्स ने यह भी लिखा है कि बेकारों की संख्या जितनी घटती जाती है अपराधियों की समाज में संख्या उसी अनुपात में घटती जाती है। यानी बेकारी घटने का अर्थ है बेकारों की फौज और अपराधियों की संख्या मॆं गिरावट।

मार्क्स ने रेखांकित किया है कि अपराध को व्यक्तिगत की बजाय सामाजिक आधार पर देखा जाना चाहिए।यह एक तरह से वर्चस्वशाली ताकतों के सामाजिक वर्चस्व की अभिव्यक्ति भी है। अपराध को जन्म देने वाली परिस्थितियों को बनाए रखकर वर्चस्वशाली ताकतें अपने सामाजिक-आर्थिक वर्चस्व को बनाए रखती हैं।







शुक्रवार, 2 मई 2014

उत्तर आधुनिकता का पुनर्पाठ


फ़्रेडरिक जेम्सन ने कहा 'उत्तर आधुनिकता परवर्ती पूँजीवाद का सांस्कृतिक तर्क है।' यानी यह न बुरा है और न अच्छा है बल्कि यह तो एक अवस्था है जिसमें सबको रहना है और इसे लेकर सबको राय ज़ाहिर करनी है ।
भारत और यूरोप में उत्तर आधुनिक परिस्थितियों में बुनियादी अंतर है । यूरोप में उत्तर आधुनिकता आई है सत्तर के बाद के वर्षों में वहाँ पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के निर्माण की प्रक्रिया शिखर पर थी जापान के निर्माण का काम ख़त्म हो चुका था । पूँजीवादी विकास शिखर पर था । मुद्रा स्थिर थी ।बाज़ार सामानों से भरे पड़े थे। अमेरिका वियतनाम में करारी हार के कगार पर था । अमेरिकी समाज में ज़बर्दस्त आंदोलन थे । महँगाई थी। विकास एक जगह जाकर ठहर गया था । क़र्ज़ बढ़ रहे थे । डेविडहर्वे के शब्दों में कहें तो पूँजी को डी रेगुलेट किया गया , सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का निजीकरण किया गया। मुद्रा का अवमूल्यन हुआ। मज़दूरों के हकों पर हमले बढे।
इसके विपरीत भारत की स्थिति थी। यहाँ पर बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। पाक से १९७१ में हम युद्ध जीते । शानदार रेल हड़ताल हुई। बड़े पैमाने पर १९७४-७५ में आंदोलन हुए। आपातकाल आया।इंदिरा हारी । इंदिरा की वापसी हुई । लेकिन १९९०-९१ तक आते आते देश गहरे संकट में फँस गया और मनमोहन अर्थशास्त्र का जन्म हुआ। बेकारी और महँगाई के साथ सरकारी ख़ज़ाने में बहुत कम मुद्रा थी।
आपातकाल में उपग्रह छोड़ा गया । राजीवयुग में कम्प्यूटर क्रांति हुई । टीवी का विकास हुआ। सन् १९८० के बाद धीरे धीरे कुछ ऐसा घटा जिसको देखकर लगता था कि लोग इतिहास से बदला लेने पर आमादा हैं । मसलन् ओबीसी आरक्षण, राममंदिर आंदोलन, असम और पंजाब के आंदोलन आदि की एक ही धुन थी कि इतिहास में जो ग़लतियाँ की गयी हैं उनको दुरुस्त करना है । दलितसाहित्य और स्त्री साहित्य में भी इसे लेकर बग़ावत दिखाई दी। वे भी साहित्य में इतिहास के ख़िलाफ़ थे। इतिहास को नहीं मानते थे।
पहले रेगुलेशन पर ज़ोर था ,अब डी रेगुलेशन पर ज़ोर था । पहले लाइसेंस राज था अब लाइसेंस राज का खात्मा कर दिया गया। हर क्षेत्र में डीरेगूलेशन को लागू किया गया ।काम के घंटे बढ़ा दिए गए। पूरे सिस्टम का कम्प्यूटरीकरण आरंभ हुआ । प्रिंटयुग से कम्प्यूटर युग में आ गए। बाज़ार से माॅल के दौर में आ गए। महिलाओं ,अल्पसंख्यकों , किसानों ,मज़दूरों और आदिवासियों पर हमले तेज़ हुए। जातीय घृणा में इज़ाफ़ा हुआ। कल्याणकारी राज्य का चरित्र बदलने का प्रयास किया गया।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कारोबार अंधाधुँध गति से बढ़ा। विश्व व्यापार संगठन के ढाँचे और नियमों से हमने अपने को बाँध लिया और देश में सभी क्षेत्रों में डीरेगूलेशन या विनिमयन को लागू कर दिया। सार्वजनिक संपदा और संसाधनों की खुली लूट हुई और उसे औने-पौने दामों पर निजी क्षेत्र को सौंप दिया गया । एक तरह से सार्वजनिक संपदा और कृषिभूमि के ख़िलाफ़ कारपोरेट युद्ध की घोषणा थी।
समूचे देश में नव-धनाढ्यों की आँधी आ गयी। देखते ही देखते हर शहर में करोड़पति पैदा हो गए । मध्यवर्ग के लोग करोड़पति हो गए। यह नए क़िस्म के फ्लेगजिबिल , फ़्री फ्लोटिंक और सामंजस्यवादी नए क़िस्म के यथार्थ का आगमन था।
मसलन पहले कार वाला अमीर था और अमीर से हम नफरत करते थे ,लेकिन नई वास्तविकता यह है कि हर मध्यवर्गीय व्यक्ति के पास कार है और कार अब अमीरी का प्रतीक नहीं रह गयी है। कलर टीवी अमीरों की चीज़ थी लेकिन अब नहीं है। फ़ोन बड़े लोगों के यहाँ हुआ करता था ,आज सबके हाथ में है।
हर स्तर पर सर्जनात्मक क्रांति हुई है। विज्ञापन से लेकर पुस्तक प्रकाशन तक सर्जनात्मक सौंदर्य की वर्षा हो रही है। नए क़िस्म की ग्लोबल अस्मिता ने पैर फैला दिए हैं। पहले पूँजी का सौंदर्य पर प्रभाव सीमित क्षेत्र तक था । लेकिन नई स्थितियों में पूँजी के वैभव ने आम जीवन पर असर डालना आरंभ कर दिया है । सब्सीडी पर हमले हो रहे हैं।
ग्लोबल स्तर पर चीन का पूँजीवादी बाज़ार के रुप में उदय बहुत बड़ी परिघटना है । इसने बहस के समूचे आधार को ही बदल दिया है । मज़ेदार बात यह है कि हमारा हिंदी का लेखक अभी भी नक्सलबाडी आंदोलन में फँसा है या शीतयुद्ध के मानकों में उलझा पड़ा है।
नए युग की ख़ूबी है तकनीक हमारे संचार ,राजनीति, संस्कृति आदि का निर्धारण कर रही है। समाजवाद का विघटन और कम्युनिस्ट पार्टियों के जनाधार में ज़बर्दस्त गिरावट ने मेहनतकश जनता को असहाय अवस्था में छोड़ दिया है।
महाख्यान का अंत हुआ है। बाज़ार में भयानक प्रतिस्पर्धा जन्म ले चुकी है और इससे राजनीति भी प्रभावित हुई है । अमेरिकी वर्चस्व में गिरावट आई है। चीन का महाशक्ति के रुप में उदय हुआ है । नई परिस्थितियों में राज्य के पास पूँजी निवेश को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं रहा। राज्य जब निवेश को नियंत्रित नहीं कर सकता तो वह सूचना को भी नियंत्रित नहीं कर सकता ।
किसी एक नरेटिव पर लोगों की नज़र नहीं टिकी है बल्कि लोग अलग अलग क़िस्म के नरेटिव में ध्यान लगाए हैं । यही महाख्यान के अंत का अर्थ है ।
नव्य आर्थिक उदारीकरण के दौर में व्यक्ति के निजी हितों को तरजीह दी गयी। सामाजिक हित के सवालों को पीछे छोड़ दिया गया।
फ़्रेडरिक जेम्सन ने उत्तर आधुनिकता को परवर्ती पूँजीवाद का सांस्कृतिक तर्क कहा । लेकिन इसे नव्य आर्थिक उदारीतरण की विचारधारा भी कह सकते हैं। यह कोई आकाश से टपकी धारणा नहीं है बल्कि ऐतिहासिक तौर पर विकसित हुई अवधारणा है ।
बाज़ार से लेकर व्यक्ति तक मेकओवर का ग्लोबल रुप देखने में आ रहा है । इस पर सोचने की ज़रुरत है।
हिंदी में " उत्तर आधुनिकतावाद "नाम सुनकर ही समीक्षक भड़क जाते हैं । मैं तो स्वयं यह ग़ुस्सा अनेकबार देख चुका हूँ। नाम सुनकर राय बनाना और फिर उलटी सीधी राय बनाना यह हिंदी में आम बात है और दुर्भाग्यजनक बात यह है कि यह काम समीक्षकों ने किया है।
समस्या नामकरण की नहीं है समस्या बदले हुए यथार्थ को समझने और उसकी सही समझ बनाने से जुड़ी है। हिंदी समीक्षा अभी शैशव काल में है। यहाँ किसी भी अवधारणा पर कोई गंभीर लेखन नहीं हो रहा । ठोस धारणाओं के निर्माण और विमर्श का काम नहीं हो रहा। जो काम हुआ है वह हमें अवधारणाओं की सही समझ नहीं देता।
मसलन हमने आलोचना में आधुनिकतावाद , रैनेसां, औद्योगिकीकरण , प्रगतिशील साहित्य ,लोकतंत्र, भारत विभाजन ,भूमंडलीकरण आदि को लेकर कोई गंभीर अवधारणात्मक विवेचन का काम नहीं किया है । हमारे यहाँ तात्कालिक या सांगठनिक या मित्रतावश या उत्सवधर्मी आलोचना है इसमें वस्तुगतता का भयानक अभाव है।
साहित्य समीक्षा के अनेक मार्ग हैं । किसी को रैनेसां का मार्ग पसंद है ।किसी को भक्ति आंदोलन का मार्ग पसंद है ।किसी को १९१७ की अक्टूबर क्रांति से प्रभावित मार्ग पसंद है।किसी को प्रतिवाद का नक्सलबाडी मार्ग पसंद है ।कोई आधुनिकता तो कोई दलितसाहित्य या स्त्री साहित्य के मार्ग से गुज़रना चाहता है। किसी को विवेकवादी परंपरा का मार्ग पसंद है किसी को राष्ट्रवादी परंपरा का मार्ग पसंद है।
यानी साहित्य समीक्षा में हम एक नहीं अनेक मार्गों से यात्रा करते हैं । कोई अस्मिता के मार्ग से समीक्षा की यात्रा कर रहा है तो कोई समुदाय या वर्ग के मार्ग से साहित्य समीक्षा के मार्ग पर चल पडा है । इन सभी मार्गों में अंतर्क्रियाएं हैं जिनकी हमें अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
साहित्य की आलोचना के जिस मार्ग से भी यात्रा करें सवाल यह है कि जाना कहाँ है ? किस तरह के साहित्य के ज़रिए जाना चाहते हैं और अंततः क्या करना चाहते हैं ?
साहित्य समीक्षा में रमण करते समय अंतर्क्रियाएं और प्रक्रिया महत्वपूर्ण हैं । यदि अंतर्क्रियाओं और प्रक्रिया की उपेक्षा करेंगे तो यह संभव है कि समीक्षा अविवेकवाद के टीले पर खड़ी मिली ।
मसलन दलित साहित्य या स्त्री साहित्य पर बातें करते समय अन्य साहित्य रुपों और विचारधाराओं के साथ चल रही अंतर्क्रियाओं और प्रक्रिया की अनदेखी न करें। वरना स्त्रीसाहित्य के नाम पर समीक्षा में अविवेकवाद पैदा होगा और इससे स्त्रीसाहित्य का स्वाभाविक विकास और साहित्यबोध बाधित होगा । इससे साहित्यिक अधिनायकवाद पैदा होगा ।
उत्तर आधुनिक नज़रिए से देखें तो पाएँगे कि हम सब असंपूर्ण साहित्य परंपरा में जी रहे हैं। किसी मार्ग विशेष के ज़रिए साहित्य का समग्र नज़रिया बनाना कठिन हो गया है ।
साहित्य में दृष्टियों की अंतर्क्रियाओं को हमें सिद्धांतत: मानना पड़ेगा और अंतर्विषयवर्ती पद्धति से काम लेना होगा।प्रधान और गौण के वर्गीकरण के बाहर निकलकर बहुलतावादी नज़रिए से देखना पड़ेगा ।

उत्तर आधुनिक अवस्था और समाज को जानने के लिए नई संवेदना और नई चेतना की ज़रुरत है। यह ऐसा समाज है जिसमें लोग तमाशा देखते हैं ,हस्तक्षेप नहीं करते।अराजक राजनीतिक आंदोलन पैदा हो जाते हैं ।
समूचे समाज में पूँजीवाद का बोलबाला है। साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ जन्म लिया है। आधुनिकतावादी रुपों के प्रति असंतोष व्यापक तौर पर व्यक्त हो रहा है। रुढिबद्धता, बोरियत और नक़ली आशाओं का संचार में वर्चस्व है। स्थानीय स्तर पर पश्चिमी संस्कृति के प्रति ग़ुस्सा कम और प्रेम ज़्यादा है। मीडिया से लेकर स्थापत्य तक और संस्कृति से लेकर प्रफाॅर्मिंग आर्ट तक बड़े मूलगामी परिवर्तन हुए हैं।

लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संरचनाओं के विकास के साथ तीव्रगामी भूमंडलीय कम्युनिकेशन नेटवर्क का विकास हुआ है ।
आधुनिककाल आने के साथ जो कलारुप विकसित होते हैं वे पुराने कलारुपों को रुपान्तरण के लिए मजबूर करते हैं। कम्युनिकेशन की तकनीक की संगति में भाषा ,कला और साहित्य रुपों का तेज़ी से विकास होता है । सामान्यतौर पर हमने कम्युनिकेशन तकनीक एवं कलाओं के अंतस्संबंध की अनदेखी की है। लेकिन उत्तर आधुनिक अवस्था हमें साहित्य और कम्युनिकेशन तकनीक के अंतस्संबंध पर विचार के लिए मजबूर करती है।
रेल,दूरसंचार ,प्रेस , रेडियो और फ़िल्म के आने के साथ कला एवं साहित्यरुपों में किस तरह के बदलाव आए हमने कभी गंभीरता से उनका विश्लेषण नहीं किया ।
कम्युनिकेशन तकनीक के नए रुपों ने कला और साहित्य में स्टाइल या शैलियों की बाढ़ पैदा की है । स्टाइल में जितने प्रयोग इस दौर में हुए हैं उतने पहले कभी नहीं हुए।
आधुनिककाल में नए प्रयोगों की आधार स्थली है उपन्यास विधा। कम्युनिकेशन तकनीक और आम संचार के रिश्ते में बुनियादी बदलाव आया है ।
आधुनिकता के साथ आमलोगों में "औचक "भाव से चीज़ों को देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
हर क्षेत्र में "नए" की माँग बढ़ी है । "नए" के पदबंध का हर क्षेत्र में उपयोग बढ़ा है ।
ल्योतार के अनुसार उत्तर आधुनिकतावाद का मतलब यथार्थवाद का अंत नहीं है। बल्कि इसका मतलब है कि लेखक को समुदाय के रुप में देखें और समुदाय के रुप में स्वीकृति प्रदान की जाय अथवा उसे बीमार मानकर उसका उपचार किया जाय। हमारे बीच ऐसे अनेक लेखक हैं जिनके पास आधुनिकतावाद या प्रगतिवाद की कोई विरासत नहीं बची है। इसके कारण वे आधुनिकतावाद या प्रगतिवाद की परंपरा या दायरों का अतिक्रमण गए हैं। लेखक के वैचारिक अतिक्रमण को कभी गंभीरता से विश्लेषित नहीं किया गया। इसके कारण न तो कभी लेखक की मदद कर पाए और नहीं समझ ही पाए ,उलटे उसके प्रति संदेह बढ़ा । उस पर हमले किए।
विगत चालीस सालों में यथार्थ के नाम पर जो बहसें चलीं उससे सामयिक यथार्थ को समझने में मदद कम मिली। दूसरी ओर बुर्जुआजी की इतिहास में प्रतिष्ठा बढ़ती चली गयी ।यथार्थवाद के बहाने या यथार्थ रुपान्तरण के बहाने सिस्टम के जो चित्र पेश किए गए उनसे यथार्थ कम और कृत्रिम यथार्थ ज़्यादा सामने आया ।
नए तकनीकी जगत ने इतिहास के हरक्षण को मूल्यवान बना दिया है। एक फ़ोटो के हज़ार फ़ोटो ,हर क्षण के फ़ोटो ,आदि की प्रक्रिया ने इतिहास में हर अनुभव और संवेदना को सुरक्षित करने और दर्ज करने की संभावनाएँ पैदा की हैं। अब भाषा के हर रुप और सभी क़िस्म के वाक्यों के संरक्षण की संभावनाएं पैदा हो गयी हैं। इस क्रम में कम्युनिकेशन की नयी संहिता या कोड भी पैदा हुआ है । आप यदि इस कोड को खोलना जानते हैं तो यथार्थ समझ पाएँगे।
इधर के दौर में "यथार्थ" और "अस्मिता"पर केन्द्रित ख़ूब लिखा गया है । लेकिन यह युग इनके लिए पाठकों या दर्शकों की गारंटी नहीं देता । अब साहित्य में " सौंदर्य क्या है ? पर बात नहीं हो रही बल्कि "कला में क्या कहा जा रहा है " इस पर बातें हो रही हैं। फलतः यथार्थ के सवालों की जमकर उपेक्षा हो रही है और अकादमिक माँग-पूर्ति या उपयोगितावादी या नारेबाज़ी का साहित्य ख़ूब लिखा जा रहा है ।
आम जनता में समस्याओं को लेकर बेचैनी है लेकिन वह रेडीमेड समाधान चाहती है। जनता के अनुभवों में अवसाद ने बड़ी जगह घेर ली है। जनता चाहती है कि सरल ढंग से कहा जाए।इस बीच में जनता की जीवनशैली बदली है और उपभोग की डिक्टेटरशिप ने हमारे जीवन में आधिपत्य स्थापित कर लिया है । मनोरंजन की धारणा बदली है और "ख़ाली समय " की धारणा लोकप्रिय हुई है । "यथार्थ की नब्ज़" से लेखक की पकड़ से छूट गयी है जिसे वह संकीर्ण क़िस्म के ऐतिहासिक विवरण और ब्यौरों के ज़रिए भर रहा है । इसका परिणाम यह निकला है कि वह जो लिख रहा है उसमें सामयिक यथार्थ की कहीं से गंध नहीं मिलती फलत: उसका पाठक और समाज से अलगाव भी बढ़ा है । यह नीत्शे के शब्दों में एक तरह का निहिलिज्म है।
उत्तर आधुनिक दशा हो या आधुनिकता हो वहाँ पर दर्द और आनंद का द्वंद्वात्मक संबंध और अंतर्क्रियाएं साफ़ नज़र आती हैं। आनंद के जितने भी विषय हैं वे व्यक्ति के निजीदर्द से ही पैदा हुए हैं।
उत्तर आधुनिक लेखन में ऐसा बहुत सा लेखन आ रहा है जिसमें समीक्षकों के अनुसार सौंदर्य नहीं है। ऐसा भी लेखन आ रहा है जो "रुपरहित रुप" से गढ़ा हुआ है।
नया फिनोमिना है रुपरहित ,संवेदनारहित प्रस्तुतियों पर ज़ोर और वर्तमान के प्रति अंधप्रेम।
उत्तर आधुनिक अवस्था के कारण लेखक नियमरहित लेखन पर ज़ोर दे रहे हैं। यह वह दौर है जब चीज़ें घट जाने के बाद नियम बनते हैं। हमने क्या किया उसके बाद नियम बनते हैं ।
लेखन में शब्द इवेंट की तरह आ रहे हैं ।ये वे इवेंट हैं जो लेखक के ज़ेहन में बहुत देर से आए हैं। या यों कहें जिनको बहुत देर से साहित्य में व्यंजित होने का मौक़ा मिला है ।
उत्तर आधुनिक लेखन हमेशा बिडम्बनाओं के गर्भ से ख़ासकर भविष्य की बिडम्बनाओं के गर्भ से पैदा होता है ।
ल्योतार का मानना है हमारा काम यथार्थ सप्लाई करना नहीं है। बल्कि ऐसी कल्पनाओं की सृष्टि करना है जो पहले कभी लेखक के मन में नहीं आईं। या कभी पेश नहीं की गयीं । इस प्रसंग में हम दलित और स्त्री साहित्य देख सकते हैं।
उत्तर आधुनिक भाषाखेल को समझें ,इस खेल की ख़ूबी है कि यह रुपान्तरणकारी है। नया नारा है "सीमाएँ तोड़ो अंतराल भरो", लोग विभिन्न रुपों में सीमाएँ तोड़ रहे हैं । यह नारा आलोचना से लेकर विधा तक सबकी सीमाएँ तोड़ी जा रही हैं। साहित्य और सामाजिक यथार्थ के जटिल संबंधों की ओर ध्यान गया है। इन दिनों साहित्य के पाठकों पर वैचारिक या राजनीतिक प्रभाव की व्यापक चर्चा हो रही है ।
परंपरागत समीक्षा ने श्रेष्ठ और बाज़ारू साहित्य का अंतर किया था लेकिन उत्तर आधुनिकों ने इस विभाजन को नहीं माना। "डिफरेंस" और " हाइब्रीडिटी" पर ज़ोर दिया गया। विधाओं में मिश्रण से लेकर पापुलरकल्चर तक के प्रयोगों पर ज़ोर दिया ।
ल्योतार ने लिखा उत्तर आधुनिकतावाद का अर्थ है स्थानीय परिस्थितियों को सीमित संदर्भ में देखा जाय। इसमें व्यक्ति के स्तरों को खोजा जाय ।
बौद्रिलार्द के अनुसार यह युग इमेज और सूचना के उत्पादन का युग है । पहले भौतिक वस्तुओं के उत्पादन पर ज़ोर था । उत्तर आधुनिकता में स्थानीयअवस्था पर ज़ोर है और सार्वभौम का निषेध है।
उत्तर आधुनिक अवस्था में अस्मिता की राजनीति केन्द्र में आ गयी है। रीतिवादी ढंग से इसके रुपों की सृष्टि हुई है। अस्मिता पर बहस कम और सृजन पर ज़ोर ज़्यादा है। अस्मिता के लेखक ठहरकर संवाद नहीं करना चाहते , वे उसके मसलों पर बहस करने की बजाय मनवाने पर ज़ोर ज़्यादा दे रहे हैं। यानी अस्मिता है और मानो। जो नहीं मानता उसको अछूतभाव से देखा जा रहा है। इसने अस्मिता की राजनीति का आतंक पैदा किया है । वस्तुगत तौर पर देखें तो अस्मिता की राजनीति का अस्मिता से ही पंगा है। अस्मिता की उपयोगिता के सवाल बड़े सवाल हो गए हैं ।
संवादहीन अस्मिता विमर्श वस्तुत:अस्मिता का रीतिवाद है। यह अस्मिता के प्रति आलोचनात्मक नज़रिए से वाद-विवाद-संवाद का निषेध करता है। इसकी अस्मिता के जड़ इतिहास में दिलचस्पी है । अस्मिता के गतिशील और रुपान्तरित पक्षों में कोई दिलचस्पी नहीं है। दलित और स्त्री आत्मकथाओं पर चल रही बहसों में हम इसे साफ़तौर पर देख सकते हैं।

साहित्य में सार्वभौम भाषा या साहित्यांदोलन की भाषा के प्रयोग की परंपरा रही है। लेकिन उत्तर आधुनिक लेखकों ने सार्वभौम भाषा का निषेध किया है । इसके विकल्प के तौर पर "निजी (प्राइवेट)भाषा", "निजी शैली" या "निजी मैनरिज्म" पर ज़ोर दिया । सामाजिक जीवन के चित्र सार्वभौम भाषा में पेश करने की बजाय निजी भाषा में पेश किए हैं। आज बड़े पैमाने पर दलित साहित्य या स्त्री साहित्य में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है वह "निजी भाषा" है। विलक्षण बात यह है कि पेशेवर लोगों में यह भाषा आ गयी है । आज लेखक इस तरह से लिख रहा है गोया वह किसी अन्य द्वीप का बाशिंदा हो। वह ऐसी भाषा बोल रहा है जो उसे सबसे भिन्न बनाती है। यह वह भाषा है जिसे विविधता के नाम पर पढ़ें और भूलें।
"निजी भाषा" का आर्थिक निजीकरण की प्रक्रिया से गहरा संबंध है । इसके अलावा "मृतभाषा" के जमकर प्रयोग हो रहे हैं। ख़ासकर नेताओं के भाषणों में यह भाषा ख़ूब इस्तेमाल की जा रही है।
"मृतभाषा" की शुरुआत आपातकाल के साथ होती है। सन् 1977 के बाद यह परवान चढ़ती है और राममंदिर आंदोलन, आरक्षण आंदोलन ,पृथकतावादी आंदोलन और आतंकी आंदोलन में यह मांसल बनती है और सोनिया,माया,मुलायम ,अन्ना हज़ारे आदि इसके नायक हैं। यह भाषणकला से बेहतरीन गद्यभाषा की विदाई की सूचना भी है।
उत्तर आधुनिक अवस्था के आने के साथ "व्यक्तिवाद" और "व्यक्ति" का एक विषय के रुप में साहित्य में अंत हो जाता है । ख़ासकर विगत 40 सालों में आई आत्मकथाओं में इसे आसानी से देखा जा सकता है। दलित और स्त्री की आत्मकथाओं में "व्यक्ति" के तौर पर कम और समूह या समुदाय के सदस्य के रुप पर ज़्यादा ज़ोर है।
आधुनिकता के दौर में व्यक्ति और व्यक्तिवाद एक महत्वपूर्ण फिनोमिना के तौर पर पैदा होता है वहीं पर " मैं" और "निजी अस्मिता" की अभिव्यक्ति पर भी ज़ोर था । उत्तर आधुनिकता के आते ही पुराने व्यक्तिवाद और व्यक्ति का अंत हो जाता है ।

भाषा में समय भी होता है। इसमें सामाजिक समय , मानवीय समय, अतीत ,भविष्य और स्मृति भी समाहित होती है। इसमें निजी अस्मिता भी होती है। ये सब समय के साथ बदलते रहते हैं। भाषा में समय की अनुभूतियाँ भी होती हैं । वाक्य स्थिर नहीं होते। वे "समय" के साथ
चलते हैं। इसलिए भाषा और समय को एक साथ रखकर देखना चाहिए ।
नई उत्तर आधुनिक भाषा में एक पहलू उन्मादी भाषिक अनुभव का भी है। यह ऐसी भाषा है जो लेखक के भौतिक आधार से पूरी तरह कटी है। निजी अस्मिता को नहीं जानती। "मैं" को नहीं जानती। वह लेखन को 'अन्य' के लेखन से जोड़कर नहीं देखती। उसके साथ अंतर्क्रिया नहीं करती। यह संवृत्ति दलित और स्त्री लेखन में है।
जबकि पुराने मध्यकालीन स्त्री और दलितलेखन में यह नहीं है। यह उत्तर आधुनिक लेखक समय पर सवारी करने की कोशिश में है जो कि असंभव कार्य है। वह ऐसे यथार्थ को रच रहा है जिसमें आनंद नहीं है। बल्कि आनंद का विलोम ज़्यादा व्यक्त हुआ है । 

शनिवार, 20 जुलाई 2013

भारतीय मध्यवर्ग के वहशी रूप

              
भारत में मध्यवर्ग का तेजगति से पतन हो रहा है ।इतनी तेजगति से अन्य किसी वर्ग का पतन नहीं हुआ है। मध्यवर्ग के आदर्शनायक आईएएस -आईपीएस अफसरों में बहुत बड़ा समुदाय तैयार हुआ है जो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। ये वे लोग हैं जिनके पास सब कुछ है।सबकुछ होते हुए भी ये क्यों भ्रष्ट हो रहे हैं ?
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भारत के मध्यवर्ग ने सामाजिक-आर्थिक शक्ति अर्जित करते ही सामाजिक-राजनीतिक दायित्वों और लोकतांत्रिक लक्ष्यों से अपने को सचेत रूप से अलग किया है।
अधिकतर मध्यवर्गीय शिक्षितलोग राजनीति को बुरा मानते हैं या भ्रष्ट राजनीति की हिमायत करते हैं या अधिनायकवादी या फासिस्ट राजनीति की हिमायत करते हैं।मध्यवर्ग का इस तरह का चरित्र बताता है कि भारत में संपन्नता जिन वर्गों में पहुंची है उनमें लोकतांत्रिक मूल्य अभी तक नहीं पहुंचे हैं।
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भारत में मध्यवर्ग में सांस्कृतिक परवर्जन तेजी से बढ़ा है। दुनिया के अनेक देशों में आधुनिककाल में वैज्ञानिकचेतना और स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों का मध्यवर्ग में विकास हुआ है ,लेकिन भारत में उलटी गंगा बह रही है। 
भारत के मध्यवर्ग में इन दिनों प्रतिगामिता की आंधी चल रही है। सेक्स से लेकर धर्म तक इसे सहज ही देखा जा सकता है। मध्यवर्ग में प्रतिगामिता के कारण इस वर्ग के बहशीयाना चरित्र की आए दिन परतें खुल रही हैं। 
आश्चर्य की बात है इस वर्ग के पतनशील मूल्यों पर हम सबने हमले करने बंद कर दिए हैं। प्रतिगामिता के साथ हमसब सामंजस्य बिठाकर जीने लगे हैं। मध्यवर्गीय प्रतिगामिता अब हमारे अंदर गुस्सा पैदा नहीं करती। यह स्थिति बदलनी चाहिए।
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मध्यवर्ग की पतनशीलता के तीन बड़े क्षेत्र हैं ,एक है स्त्री उत्पीड़न-शोषण , दूसरा है खुला भ्रष्टाचार और तीसरा है तिकड़मबाजी।

मध्यवर्ग के लोगों में शिक्षितों में आज स्त्री उत्पीड़न ,हिंसाचार,यौनशोषण आदि जिस तरह सतह पर आ गया है,उसने हमें सारी दुनिया में सभ्य कहलाने लायक नहीं छोड़ा। यही हाल भ्रष्टाचार का है। तिकड़मबाजी में तो मध्यवर्ग के नायक सबसे आगे हैं। इन तीनों प्रवृत्तियों को देखकर यही लगता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का मध्यवर्गीय मूल्य-संरचना पर सकारात्मक असर बहुत कम पड़ा है।

बुधवार, 5 जून 2013

शीतयुद्धोत्तर परिप्रेक्ष्य की तलाश और मार्क्सवादी रूढ़ियां


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फेसबुक पर हिन्दीलेखकों में लेखकीय ध्रुवीकरण शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क से बंधा है। कायदे से शीतयुद्धीय राजनीति और सीआईए- -सोवियत कम्युनिज्म के दायरे से बाहर निकलकर चीजों को देखने की जरूरत है। खासकर मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य शीतयुद्धीय राजनीति के पक्ष-विपक्ष मे बांधता है।
नए जमाने की मांग है लोकतंत्र और दुर्भाग्य की बात है कि सीआईए या अमेरिकी साम्राज्यवाद या समाजवाद दोनों ही लोकतंत्र की सत्ता-महत्ता और स्वायत्तता को स्वीकार नहीं करते। मंगलेश डबराल,वीरेन्द्रयादव, अशोक पाण्डेय आदि ने मेरी पोस्ट पर अशोक पाण्डेय की फेसबुक वॉल पर जो बहस चलायी है उसमें भागलेने वाले सुधीजन शीतयुद्ध की राजनीति के दायरे के बाहर निकलकर नहीं सोच पाए हैं।
चार्ली चैप्लिन,ब्रेख्त आदि सभी नामी प्रगतिशील लेखकों के नजरिए की मुश्किलें वही हैं जो शीतयुद्धीय राजनीति की हैं। वे भी उसके दायरे के बाहर नहीं देख पाते। प्रगतिशीलों का शीतयुद्धीय राजनीति को समाजवाद के नजरिए से देखना मार्क्सवादी रूढ़िवाद है। मार्क्सवादी रूढ़िवाद हमें लोकतांत्रिक नजरिए से सोचने में बाधाएं पैदा करता है।
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शीतयुद्धोत्तर परिप्रेक्ष्य की तलाश और मार्क्सवादी रूढ़ियां-1-

फेसबुक पर हिन्दीलेखकों में लेखकीय ध्रुवीकरण शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क से बंधा है। कायदे से शीतयुद्धीय राजनीति और सीआईए- -सोवियत कम्युनिज्म के दायरे से बाहर निकलकर चीजों को देखने की जरूरत है। खासकर मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य शीतयुद्धीय राजनीति के पक्ष-विपक्ष मे बांधता है।
नए जमाने की मांग है लोकतंत्र और दुर्भाग्य की बात है कि सीआईए या अमेरिकी साम्राज्यवाद या समाजवाद दोनों ही लोकतंत्र की सत्ता-महत्ता और स्वायत्तता को स्वीकार नहीं करते। मंगलेश डबराल,वीरेन्द्रयादव, अशोक पाण्डेय आदि ने मेरी पोस्ट पर अशोक पाण्डेय की फेसबुक वॉल पर जो बहस चलायी है उसमें भागलेने वाले सुधीजन शीतयुद्ध की राजनीति के दायरे के बाहर निकलकर नहीं सोच पाए हैं।
चार्ली चैप्लिन,ब्रेख्त आदि सभी नामी प्रगतिशील लेखकों के नजरिए की मुश्किलें वही हैं जो शीतयुद्धीय राजनीति की हैं। वे भी उसके दायरे के बाहर नहीं देख पाते। प्रगतिशीलों का शीतयुद्धीय राजनीति को समाजवाद के नजरिए से देखना मार्क्सवादी रूढ़िवाद है। मार्क्सवादी रूढ़िवाद हमें लोकतांत्रिक नजरिए से सोचने में बाधाएं पैदा करता है।
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तीसरी मार्क्सवादी रूढ़ि है -मार्क्सवादी कल्पनाशीलता। भारत में विभिन्न रंगत के मार्क्सवादियों में एक विलक्षण साम्य है वे रहते पूंजीवाद में हैं,अधिकार पूंजीवाद के चाहते हैं,पूंजीवादी संरचनाओं के दुरूस्तीकरण के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन चाहते हैं समाजवाद ।
हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों-आलोचकों ने कभी गंभीरता के साथ "कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य और साहित्य" के अन्तस्संबंध पर विचार नहीं किया ।वे पूंजीवाद के सरलीकरणों और अमेरिकी बहानेबाजी के जरिए अपने दायित्व से भागते रहे हैं।
भारतीय समाज के निर्माण में कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की प्रधान भूमिका रही है। इसे सोवियत समाजवादी नजरिए या अमेरिकी नजरिए से नहीं समझा जा सकता। इसे समाजवाद के आग्रह के नजरिए से भी नहीं समझा जा सकता।
समाजवाद का आग्रह लोकतंत्र की शक्ति को समझने में बाधा पैदा करता है। भारत का वर्तमान लोकतंत्र से निर्धारित हो रहा है और भविष्य में भी लोकतंत्र से जल्दी मुक्ति मिलने वाली नहीं है। समाजवाद यहां के लिए कल्पनाशीलता है। लोकतंत्र को हमें लोकतंत्र के नजरिए से देखना होगा। समाजवाद के नजरिए से लोकतंत्र को देखना मार्क्सवादी कल्पनाशीलता है ।
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मार्क्सवादी रूढ़िवाद की चौथी रूढ़ि है लोकतंत्र को हिकारत की नजर से देखना। हिन्दी के प्रगतिशील  लेखकों में बड़ा हिस्सा है जो समाजवाद के आख्यान और गुणों को जानता है लेकिन भारत में लोकतंत्र में लेखकीय और नागरिक अधिकारों की चेतना से शून्य है।
    मसलन्, हिन्दीलेखकों में  लेखक के अधिकारों को लेकर कोई गुस्सा नहीं है। मसलन्, हमने यह कभी नहीं सुना कि नामवर सिंह या अन्य किसी लेखक ने राजकमल के मालिक से लेखकों की रॉयल्टी समय पर देने के लिए कभी संघर्ष किया हो।
     मैं निजी तौर पर दर्जनों लेखकों को जानता हूँ जिनको प्रकाशक रॉयल्टी नहीं देता और लेखकसंघ चुप तमाशा देखते रहते हैं।
      भारत के लेखक के लिए उसके अधिकारों की चेतना समाजवादी चेतना से ज्यादा महत्वपूर्ण है। लेखक के अधिकारों की चेतना लोकतंत्र के प्रति प्रेम और आस्था पैदा करके ही पैदा की जा सकती है। लोकतंत्र में हिकारत से देखना लोकतंत्र का निषेध है।
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हिन्दी लेखकों में मार्क्सवादीदंभ बहुत बड़ी समस्या है । मार्क्सवादीदंभ भाव रहने वाले लेखक बेहतर न लिखकर भी अपने लेखकीय श्रेष्ठत्व का दावा करते हैं।
इसके कवच के तौर पर वे मार्क्सवाद को पहले सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं ,बाद में मार्क्सवादियों और फिर अपने को सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं। ये लेखक भूल गए हैं कि मार्क्सवाद का जन्म श्रेष्ठता के सिद्धांत और संस्कार के प्रतिवाद में हुआ था।
मार्क्सवाद ,मार्क्सवादी और निज को श्रेष्ठ मानने का विचार अवैज्ञानिक है। मार्क्सवाद ने कभी श्रेष्ठता का दावा नहीं किया। स्वयं मार्क्स ने श्रेष्ठ होने का दावा नहीं किया।
एक अच्छा मार्क्सवादी दंभी नहीं संवेदनशील होता है,विनयी होता है,अन्य को सम्मान देता है।
दंभी की भाषा हेटभाषा होती है, रूप में भी और अंतर्वस्तु में भी। एक अच्छा मार्क्सवादी वह है जिसके पास अन्य के विचारों और विचारधारा के लिए जगह है। अन्य हैं इसलिए मार्क्सवाद उनसे भिन्न और वैज्ञानिक है।
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मार्क्सवादी लेखकों की इस दौर में सबसे बड़ी असफलता है कि वे शीतयुद्ध में साहित्य के अवमूल्यन को नहीं रोक पाए। साहित्य के जो मानक रचे गए उनमें इजाफा नहीं कर पाए।साहित्य के नए पैराडाइम को पकड़ नहीं पाए। फलतःआज वे हाशिए के बाहर चले गए हैं। लंबे समय से हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचना की कोई किताब बाजार में नजर नहीं आई और हिन्दी के मार्क्सवादी आलोचकों ने समीक्षा का कोई नया मानक नहीं बनाया।
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शीतयुद्ध और उसके बाद के दौर में जातीय विध्वंस का ग्लोबल चक्र चला है। पूर्व समाजवादी समाजों से लेकर कांगो-सोमालिया-इराक अफगानिस्तान आदि तक इसका दायरा फैला हुआ है। एक जमाने में समाजवादी समाज में जातीय समस्या के समाधान का हिन्दी में खूब गुणगान किया गया लेकिन जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो इस जातीय विघटन पर हिन्दी में अधिकांश मार्क्सवादी चुप रहे। यहां तक कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां और माओवादी-नक्सल भी चुप रहे। यह चुप्पी अचानक नहीं है बल्कि शीतयुद्धोत्तर यथार्थ को वैज्ञानिक ढ़ंग से न देख पाने का फल है।
शीतयुद्धोत्तर यथार्थ पहले की तुलना में ज्यादा जटिल और संश्लिष्ट है। नए यथार्थ और नई राजनीतिक समस्याओं के खिलाफ मोर्चा लेते हुए आप स्वयंसेवी संगठनों और व्यक्तियों के समूहों को देख सकते हैं लेकिन मार्क्सवादी दलों-संगठनों को कहीं पर भी नहीं देखेंगे।

मसलन् यूनियन कारबाइड के खिलाफ विगत 25 सालों में कौन संघर्ष कर रहा है ?मोदी के दंगों के खिलाफ कौन केस लड़ रहा है ?आदि अनेक समस्याएं हैं जहां पर छोटे स्वयंसेवी संगठन संघर्ष कर रहे हैं ,कम्युनिस्टदल सोए हैं।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...