जवाहरलाल नेहरु लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जवाहरलाल नेहरु लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 10 मई 2016

भारत का मर्म और पंडित नेहरू


      भारत की आत्मा को समझने में पंडित जवाहरलाल नेहरू से बढ़कर और कोई बुद्धिजीवी हमारी मदद नहीं कर सकता।पंडितजी की भारत को लेकर जो समझ रही है ,वह काबिलेगौर है।वे भारतीय समाज,धर्म, संस्कृति,
इतिहास आदि को जिस नजरिए से व्यापक फलक पर रखकर देखते हैं वह विरल चीज है।

       पंडित नेहरू ने लिखा है ''जो आदर्श और मकसद कल थे,वही आज भी हैं,लेकिन उन पर से मानो एक आब जाता रहा है और उनकी तरफ बढ़ते दिखाई देते हुए भी ऐसा जान पड़ता है कि वे अपनी चमकीली सुंदरता खो बैठे हैं,जिससे दिल में गरमी और जिस्म में ताकत पैदा होती थी।बदी की बहुत अकसर हमेशा जीत होती रही है लेकिन इससे भी अफसोस की बात यह है कि जो चीजें पहले इतनी ठीक जान पड़ती थीं,उनमें एक भद्दापन और कुरूपता आ गई है। '' चीजें क्रमशःभद्दी और कुरूप हुई हैं,सवाल यह है कि यह भद्दापन और कुरूपता आई कहां से ॽक्या इससे बचा जा सकता था ॽयदि हां तो उन पहलुओं की ओर पंडितजी ने जब ध्यान खींचा तो सारा देश उस देश में सक्रिय क्यों नहीं हुआ ॽ

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है" हिंदुस्तान में जिंदगी सस्ती है। इसके साथ ही यहां जिंदगी खोखली है,भद्दी है,उसमें पैबंद लगे हुए हैं और गरीबी का दर्दनाक खोल उसके चारों तरफ है।हिंदुस्तान का वातावरण बहुत कमजोर बनानेवाला हो गया है।उसकी वजहें कुछ बाहर से लादी हुई हैं,और कुछ अंदरूनी हैं,लेकिन वे सब बुनियादी तौर पर गरीबी का नतीजा हैं। हमारे यहां के रहन-सहन का दर्जा बहुत नीचा है और हमारे यहां मौत की रफ्तार बहुत तेज है।" पंडितजी और उनकी परंपरा ´मौत की रफ्तार´ को रोकने में सफल क्यों नहीं हो पायी ॽ पंडित जानते थे कि भारत में जहां गरीबी सबसे बड़ी चुनौती है वहीं दूसरी ओर धर्म और धार्मिकचेतना सबसे बड़ी चुनौती है।

पंडित नेहरू ने लिखा है- "अगर यह माना जाये कि ईश्वर है,तो भी यह वांछनीय हो सकता है कि न तो उसकी तरफ ध्यान दिया जाये और न उस पर निर्भर रहा जाये। दैवी शक्तियों में जरूरत से ज्यादा भरोसा करने से अकसर यह हुआ भी है और अब भी हो सकता है कि आदमी का आत्म-विश्वास घट जाए और उसकी सृजनात्मक योग्यता और सामर्थ्य कुचल जाये।"

धर्म के प्रसंग में नेहरूजी ने लिखा- "धर्म का ढ़ंग बिलकुल दूसरा है।प्रत्यक्ष छान-बीन की पहुंच के परे जो प्रदेश है,धर्म का मुख्यतःउसीसे संबंध है और वह भावना और अंतर्दृष्टि का सहारा लेता है। संगठित धर्म धर्म-शास्त्रों से मिलकर ज्यादातर निहित स्वार्थों से संबंधित रहता है और उसे प्रेरक भावना का ध्यान नहीं होता।वह एक ऐसे स्वभाव को बढ़ावा देता है,जो विज्ञान के स्वभाव से उलटा है। उससे संकीर्णता,गैर-रवादारी, भावुकता,अंधविश्वास,सहज-विश्वास और तर्क-हीनता का जन्म होता है। उसमें आदमी के दिमाग को बंद कर देने का सीमित कर देने का,रूझान है।वह ऐसा स्वभाव बनाता है,जो गुलाम आदमी का,दूसरों का सहारा टटोलनेवाले आदमी का, होता है।" आम आदमी के दिमाग को खोलने के लिए कौन सी चीज करने की जरूरत है ॽक्या तकनीकी वस्तुओं की बाढ़ पैदा करके आदमी के दिमाग को खोल सकते हैं या फिर समस्या की जड़ कहीं और है ॽ

पंडित नेहरू का मानना है - "हिन्दुस्तान को बहुत हद तक बीते हुए जमाने से नाता तोड़ना होगा और वर्तमान पर उसका जो आधिपत्य है,उसे रोकना होगा। इस गुजरे जमाने के बेजान बोझ से हमारी जिंदगी दबी हुई है। जो मुर्दा है और जिसने अपना काम पूरा कर लिया है,उसे जाना होता है।लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गुजरे जमाने की उन चीजों से हम नाता तोड़ दें या उनको भूल जाएं ,जो जिंदगी देनेवाली हैं और जिनकी अहमियत है।" यह भी लिखा, "पिछली बातों के लिए अंधी भक्ति बुरी होती है।साथ ही उनके लिए नफ़रत भी उतनी ही बुरी होती है।उसकी वजह है कि इन दोनों में से किसी पर भविष्य की बुनियाद नहीं रखी जा सकती।"

"गुजरे हुए जमाने का -उसकी अच्छाई और बुराई दोनों का ही-बोझ एक दबा देने वाला और कभी-कभी दम घुटाने वाला बोझ है,खासकर हम लोगों में से उनके लिए ,जो ऐसी पुरानी सभ्यता में पले हैं,जैसी चीन या हिन्दुस्तान की है। जैसाकि नीत्शे ने कहा है- " न केवल सदियों का ज्ञान,बल्कि ,सदियों का पागलपन भी हममें फूट निकलता है।वारिस होना खतरनाक है।"इसमें सबसे महत्वपूर्ण है ´वारिस´वाला पहलू।इस पर हम सब सोचें।हमें वारिस बनने की मनोदशा से बाहर निकलना होगा।

पंडित नेहरू ने लिखा है- "मार्क्स और लेनिन की रचनाओं के अध्ययन का मुझ पर गहरा असर पड़ा और इसने इतिहास और मौजूदा जमाने के मामलों को नई रोशनी में देखने में मदद पहुँचाई। इतिहास और समाज के विकास के लंबे सिलसिले में एक मतलब और आपस का रिश्ता जान पड़ा और भविष्य का धुंधलापन कुछ कम हो गया।" भविष्य का धुंधलापन कम तब होता है जब भविष्य में दिलचस्पी हो,सामाजिक मर्म को पकड़ने, समझने और बदलने की आकांक्षा हो।इसी प्रसंग में पंडित नेहरू ने कहा "असल में मेरी दिलचस्पी इस दुनिया में और इस जिंदगी में है,किसी दूसरी दुनिया या आनेवाली जिंदगी में नहीं।आत्मा जैसी कोई चीज है भी या नहीं मैं नहीं जानता.और अगरचे ये सवाल महत्व के हैं,फिर भी इनकी मुझे कुछ भी चिंता नहीं।"पंडितजी जानते थे भारत में धर्म सबसे बड़ी वैचारिक चुनौती है।सवाल यह है धर्म को कैसे देखें ॽ



पंडितजी का मानना है " 'धर्म' शब्द का व्यापक अर्थ लेते हुए हम देखेंगे कि इसका संबंध मनुष्य के अनुभव के उन प्रदेशों से है,जिनकी ठीक-ठीक मांग नहीं हुई है,यानी जो विज्ञान की निश्चित जानकारी की हद में नहीं आए हैं।" फलश्रुति यह कि जीवन के सभी क्षेत्रों में विज्ञान को पहुँचाएं,विज्ञान को पहुँचाए वगैर धर्म की विदाई संभव नहीं है।









रविवार, 3 मई 2015

पंडित जवाहरलाल नेहरु और धर्मनिरपेक्षता की चुनौतियाँ

                
         भारत जब आजाद हुआ तो उसकी नींव साम्प्रदायिक देश- विभाजन पर रखी गयी।फलतः साम्प्रदायिकता हमारे लोकतंत्र में अंतर्गृथित तत्व है। लोकतंत्र बचाना है तो इसके खिलाफ समझौताहीन रवैय्या रखना होगा। साम्प्रदायिकता के औजार हैं आक्रामकता और मेनीपुलेशन । इसने सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक संरचनाओं को गंभीरता से प्रभावित किया है। त्रासद पक्ष यह है कि हाल के वर्षों में साम्प्रदायिकताविरोधी चेतना का ह्रास हुआ है।खासकर आपातकाल के बाद पैदा हुए नागरिकों में यह फिनोमिना व्यापक रुप में नजर आता है। साम्प्रदायिकता को हम तदर्थवादी और वोटवादी धर्मनिरपेक्ष कॉमनसेंस नजरिए से देखते हैं।फलतः यह भी कहने लगे हैं सभी राजनीतिक दल एक जैसे होते हैं। इस धारणा ने साम्प्रदायिक और गैर-साम्प्रदायिकदल के बीच के भेद को खत्म करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। जबकि सच यह है साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता एक ही चीज नहीं है। साम्प्रदायिकदल और धर्मनिरपेक्षदल एक ही जैसे नहीं होते। हम इनमें समानताएं दरशाने के लिए राजनीतिक एक्शन के बीच समानताएं बताने लगते हैं। राजनीतिक एक्शनों में समानताओं के आधार पर कोई भी निर्णय सही नहीं हो सकता। सवाल विचारधारा का है। साम्प्रदायिक विचारधारा और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के नजरिए में समानता का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता बल्कि ये दोनों एक-दूसरे के अंतर्विरोधी हैं।
     साम्प्रदायिकता को  धर्मनिरपेक्ष कॉमनसेंस के जरिए अपदस्थ नहीं किया जा सकता।पंडित नेहरु का 'विविधता में एकता' का नारा धर्मनिरपेक्ष कॉमनसेंस केन्द्रित नारा था, जिसके आधार पर हम साम्प्रदायिकता को हाशिए पर ठेलने की कोशिश करते रहे हैं। यह सबसे असफल नारा साबित हुआ है। कायदे से 'विविधता और लोकतंत्र' के आधार पर समाज को संगठित किया जाता तो बेहतर सामाजिक-सांस्कृतिक परिणाम हासिल किए जा सकते थे।
पंडित जवाहरलाल नेहरु ने आजादी के साथ ही 'विविधता में एकता' का नारा दिया। यह नारा सतह पर आकर्षक है लेकिन इसकी वैचारिक जड़ें खोखली हैं और इसमें राजनीतिक अवसरवाद की अनंत संभावनाएं  हैं। आमतौर पर यह मान लिया गया कि पंडित नेहरु सही कह रहे हैं। लेकिन सच यह है 'विविधता में एकता' के नाम पर देश में समय –समय पर साम्प्रदायिक ताकतों के प्रति नरम रुख की कांग्रेस के अंदर से ही शुरुआत हुई। मसलन्, महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर जब प्रतिबंध लगा दिया गया तो कायदे से यह प्रतिबंध हटाने की जरुरत नहीं थी, लेकिन यह जानते हुए भी कि संघ की विचारधारा क्या है उस पर से प्रतिबंध हटा लिया गया,उसे खुलकर काम करने का मौका दिया गया। सवाल यह है क्या साम्प्रदायिक संगठन को लोकतंत्र में काम करने की अनुमति देनी चाहिए ? लोकतंत्र में उन संगठनों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए जो लोकतंत्रविरोधी आचरण करते हैं। साम्प्रदायिकता वस्तुतःलोकतंत्रविरोधी विचारधारा है और इसे हमने फलने-फूलने का अवसर देकर यह भावना पैदा की कि लोकतंत्र में सबके लिए समान अधिकार हैं यानी उन विचारधाराओं के लिए भी समान अधिकार हैं जो लोकतंत्र को नहीं मानतीं और लोकतंत्र विरोधी आचरण करती हैं। सामाजिक कार्य हो या राजनीतिक कार्य हो, यदि उससे साम्प्रदायिकता फैलती है तो हमें उसे हर स्तर पर राजनीतिक और प्रशासनिक तौर पर रोकने के बारे में सोचना होगा।
      पंडित नेहरु साध्य और साधन की एकता में गहरा विश्वास करते थे लेकिन आचरण करते समय साध्य-साधन के बीच में सामंजस्य रखने में एकसिरे से असफल रहे। मसलन् 1962 में भारत- चीन युद्ध के समय रास्ता वे रास्ता चूक गए और आरएसएस से मदद मांग बैठे,उनके जमाने में ही गणतंत्र दिवस की परेड में संघ की टुकड़ी मार्च करते हुए दिल्ली में राजपथ पर निकली थी । कहने का आशय यह है कि धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष पहली शर्त है। इसी तरह लोकतांत्रिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक आदेशों का ईमानदारी से पालन करना दूसरी शर्त है। पंडित नेहरु में शासन में आने के बाद लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अ-सम्मान का भाव सबसे पहले पैदा हुआ। केरल की पहली कम्युनिस्ट सरकार को जो 1957 में चुनकर आई थी उसे 1959 में एक आंदोलन के बहाने  उन्होंने गिरा दिया गया।जबकि यह सरकार पांच साल के लिए चुनकर आई थी।  बाद के वर्षों में कांग्रेस ने इस तरह की अनेक गलतियां लगातार कीं। 
    कहने का तात्पर्य यह कि धर्मनिरपेक्षता का भविष्य दो बातों पर टिका है ,पहला, साम्प्रदायिकता के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष,दूसरा लोकतांत्रिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक आदेशों का अडिगभाव से पालन। भारत में साम्प्रदायिकता पर विचार करते समय यह भी ख्याल रखें कि साम्प्रदायिकता कभी भी पृथकतावाद या क्षेत्रीयतावाद में रुपान्तरित हो सकती है। यही बात पृथकतावाद और क्षेत्रीयतावाद पर लागू होती है वे कभी भी साम्प्रदायिक रंग में रुपान्तरित हो सकते हैं। इसी तरह राजनीति,राज्यसत्ता को धर्म और धार्मिकता से पूरी तरह विच्छिन्न किया जाय। धर्म और धार्मिकता के साथ इनका संबंध साम्प्रदायिकता के प्रचार-प्रसार में मदद करता है।
       लोकतंत्र का स्वस्थ व्यवस्था के तौर पर विकास करने के लिए जरुरी है कि राजनीति से लेकर समाज तक सबको अतीत के बोझ से मुक्त करें। अतीत के मलबे के जरिए जनता में एकता कायम करने से साम्प्रदायिकता तात्कालिक तौर पर कमजोर होती दिखती है लेकिन वह कमजोर नहीं होती। अतीत का मलबा साम्प्रदायिकता को ईंधन देता है ,उसे दीर्घजीवी बनाता है। लोकतंत्र में अतीत प्रेम कैंसर है। इससे आप टाइमपास कर सकते हैं लेकिन सामाजिक विकास नहीं कर सकते। लोकतंत्र में अतीत को जानना चाहिए लेकिन अतीत को पाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। साम्प्रदायिक ताकतों ने अपने विकास के लिए अतीत के मसलों को औजार की तरह इस्तेमाल किया है। पंडित नेहरु ने लिखा है '' गुजरे जमाने का- उसकी अच्छाई और बुराई दोनों का ही- बोझ एक दबा देनेवाला
और कभी –कभी दम घुटानेवाला बोझ है,खासकर हम लोगों के लिए,जो ऐसी पुरानी सभ्यता में पले हैं,जैसी चीन या हिंदुस्तान की है। जैसा कि नीत्शे ने कहा है -'' न केवल सदियों का ज्ञान ,बल्कि सदियों का पागलपन भी हममें फूट निकलता है। वारिस होना खतरनाक है।'' 
        हमारी मुश्किल है कि हमने विरासत के नाम पर बहुत सारी चीजों का बोझ अपने लोकतंत्र पर लाद दिया है। लोकतंत्र को पुरानी चीजों का वारिस न बनाया जाया।लोकतांत्रिक मनुष्य को पुराने लबादों में न बांधा जाय, लोकतंत्र पर अतीत की विरासत का एक ही असर है और एक ही मूल्यवान चीज है जो हमें विरासत मिली है वह है शिरकत। लोकतंत्र शिरकत के जरिए विकास करता है। अतीत की चीजें भी मानवीय शिरकत से बनी थीं, हमें बाकी अतीत को उसके हाल पर छोड़कर आगे निकल जाना चाहिए।
    पंडित नेहरु पर महात्मा गांधी का गहरा असर था और उन्होंने गांधी को 'हिंदुस्तान की कहानी' में उद्धृत किया है ,लिखा ,' मुझे गांधीजी के वे लफ्ज याद हैं,जो उन्होंने 7अगस्त,1942 की भविष्य –सूचक शाम को कहे थे-

'' दुनिया की आंखें अगरचे आज खून से लाल हैं,फिर भी हमें दुनिया का सामना शांत और साफ़ नज़रों से करना चाहिए। ''

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

गीता इवेंट नहीं है

           श्रीमद्भगवद्गीता को लेकर देश में अचानक बहस हो रही है और इस बहस को पैदा करने में संघ समर्थित संतों-महंतों और-मीडिया की बड़ी भूमिका है। इवेंट बनेगा तो मीडिया हो-हल्ला होगा! इवेंट बनाना मासकल्चर का अंग है जबकि गीता संस्कृति का अंग है। गीता जयन्ती के मौके पर विभिन्न संघी नेताओं के भाषणों ने मनोरंजन करके गीता की ओर ध्यान खींचा है। गीता को सनसनी बनाना, संविधान से महान बताना,मनोरोग के उपचार की पुस्तक बताना अपने आपमें विवादास्पद और अविवेकपूर्ण बातें हैं।अविवेक हमेशा से फासिस्टों का ईंधन रहा है। संघ-संत और मीडिया के लिए गीता का इवेंट और अविवेकवाद से अधिक महत्व नहीं है। गीता-गीता कहने से भाजपा या किसी भी दल के मतों में इजाफा होने वाला नहीं है। क्योंकि गीता में जो विचार निहित हैं वे भाजपा-संघ-संतसमाज के स्वभाव से मेल नहीं खाते।

गीता के बारे में सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि सैंकड़ों सालों के बाद आज भी गीता जनप्रिय क्यों है ? भारत का अन्य कोई ग्रंथ इतना जनप्रिय क्यों नहीं है ? गीता की जनप्रियता दिनों-दिन क्यों बढ़ी? भाजपा-संघ- तय कर लें कि उनको गांधी-नेहरु-आंबेडकर का गीता का आख्यान चाहिए ? या फिर गपोड़ी संतों की व्याख्या चाहिए ? गीता को संतों ने नहीं विद्वानों –दार्शनिकों और सामाजिक हस्तियों ने जनप्रिय बनाया है । गीता को समझने के लिए उसकी शाब्दिक व्याख्या में जाने की बजाय उसके मर्म की खोज की जानी चाहिए।

गीता को इवेंट बनाने के चक्कर में संतों –संघियों ने गीता का जन्मदिन खोज निकाला,जो कि अनैतिहासिक है, अनैतिहासिकता के पैमाने फासिज्म की वैचारिक मदद करते हैं, इस अनैतिहासिकता का फासिस्ट चरमोत्कर्ष तब सामने आया जब एक संघी नेता ने गीता को संविधान से भी ऊपर दर्जा देने की बात कही! दूसरे ने मनोरोगों के इलाज की रामबाण दवा कहकर पेश किया! इस तरह का इरेशनलिज्म हमेशा से फासिज्म की अभिव्यक्ति शैली का अभिन्न हिस्सा रहा है। इस प्रसंग में पंडित जवाहरलाल नेहरु ने लिखा है ''गीता का संदेसा सांप्रदायिक या किसी एक खास विचार के लोगों के लिए नहीं है।क्या ब्राह्मण और क्या अजात,यह सभी के लिए है। यह कहा गया है कि '' सभी रास्ते मुझ तक पहुँचाते हैं।'' इसी व्यापकता की वजह से सभी वर्ग और सम्प्रदाय के लोगों को गीता मान्य हुई है।''

गीता मात्र हिन्दुओं का ग्रन्थ नहीं है ,वह पूरे भारतीय जनता की विरासत का अंग है,वैसे ही जैसे नाथों-सिद्धों का साहित्य समूची मानवता की विरासत का अंग है,जिस तरह चार्वाक हमारी विरासत का अंग हैं।सवाल यह है विरासत में से क्या चुनें और उसे किस नजरिए से देखें ? पंडित नेहरु ने लिखा है ''बौद्धकाल से पहले जब इसकी रचना हुई,तब से आजतक इसकी लोकप्रियता और प्रभाव घटे नहीं है,और आज भी इसके लिए हिंदुस्तान में पहले –जैसा आकर्षण बना हुआ है।विचार और फ़िलसफ़े का हर एक सम्प्रदाय इसे श्रद्धा से देखता है और अपने-अपने ढ़ंग से व्याख्या करता है।संकट के वक़्त,जब आदमी का दिमाग सन्देह से सताया हुआ होता है और अपने फ़र्ज के बारे में उसे दुविधा दो तरफ़ खींचती होती है,वह रोशनी और रहनुमाई के लिए गीता की तरफ ओर भी झुकता है,क्योंकि यह संकट–काल के लिए लिखी गयी कविता है- राजनैतिक और सामाजिक संकटों के अवसर के लिए और उससे भी ज्यादा इन्सान की आत्मा के संकट-काल के लिए। ''

सवाल यह है क्या संघ परिवार आज किसी संकट से गुजर रहा है ? क्या वे अपने अंदर विचारधारा का संकट देख रहे हैं और उससे निकलने का मार्ग गीता में खोज रहे हैं ? पंडित नेहरु ने साफ लिखा है गीता ''संकट-काल के लिए लिखी कविता'' है। नेहरु ने गीता के मर्म को उद्घाटित करते हुए लिखा '' यह हमें जिंदगी के फ़र्जों और कर्तव्यों का सामना करने के लिए पुकारती है,लेकिन हमेशा इस तरह कि इस रुहानी ज़मीन और विश्व के बड़े मकसद को नज़र-अंदाज़ न किया जाय।हाथ-पर-हाथ रखकर बैठ रहने की बुराई की गयी है और यह बताया गया है कि काम और ज़िदगी को युग के सबसे ऊँचे आदर्शों के अनुसार होना चाहिए,क्योंकि हर एक युग में ख़ुद आदर्श बदलते रहते हैं। एक खास जमाने के आदर्श-युग-धर्म- का सदा ध्यान रखना चाहिए।''

'' चूंकि आज के हिंदुस्तान पर मायूसी छायी हुई है और उसके चुपचाप रहने की भी एक हद हो गई है,इसलिए काम में लगने की यह पुकार ख़ासतौर पर अच्छी मालूम पड़ती है।यह भी मुमकिन है कि जमाने-हाल के लफ़्जों में,इस पुकार का समाज के सुधार की और समाज-सेवा की और अमली,बेगरज़ देशभक्ति के और इन्सानी दर्दमंदी के पुकार की सेवा समझा जाय।गीता के अनुसार ऐसा काम अच्छा होता है,लेकिन इसके पीछे रुहानी मकसद का होना लाजिमी है।यह काम त्याग की भावना से किया जाना चाहिए और उसके नतीजों की फ़िक्र न करनी चाहिए। अगर काम सही है,तो नतीजे भी सही होंगे,चाहे वे फौरन न जाहिर हों,क्योंकि कार्य-कारण का नियम हर-हालत में अपना काम करेगा ही ।''

सोमवार, 17 नवंबर 2014

स्वाधीनता सेनानी कमला नेहरु

                पंडित नेहरु के जीवन पर बातें हों और उनकी पत्नी कमला पर बातें न हों,यह हो नहीं सकता। विचारणीय पहलु यह है कि लेखक के नाते नेहरु को कौन सी चीजें कमला में रेखांकित करने की जरुरत पड़ी ? पहली चीज जिसे नेहरु मूल्यवान मानते हैं वह है इन्सानी रिश्ता। इन्सानी रिश्ते को राजनीति और अर्थशास्त्र की बहसों के बहाने नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर पति-पत्नी के संबंधों के बीच इन्सानी रिश्तों का एहसास रहना चाहिए।नेहरु ने रेखांकित किया है कि भारत और चीन में इन्सानी रिश्तों के एहसास को नजर-अंदाज नहीं किया गया। यह हमारी पुरानी अक्लमंद तहज़ीब की देन है। इंसानी एहसास व्यक्ति में संतुलन और हम-वज़नीपन पैदा करता है। नेहरु लिख रहे हैं कि इन दिनों यह एहसास कम हो गया है। इसी क्रम में नेहरु ने लिखा '' यक़ीनी तौर पर इसे मुमकिन होना चाहिए कि भीतरी संतुलन का बाहरी तरक्की से,पुराने ज़माने के ज्ञान का नये जमाने की शक्ति और विज्ञान से मेल क़ायम हो। सच देखा जाय, तो हम लोग दुनिया के इतिहास की एक सी मंज़िल पर पहुँच गए हैं कि अगर यह मेल न क़ायम हो सका,तो दोनों का ही अंत और नाश रखा हुआ है।'' नेहरु चाहते थे हम मानव-सभ्यता की अबतक की सभी महान उपलब्धियों को आत्मसात करके विकास करें।  कमला के बारे में उनका लेखन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे उसे अपनी पत्नी के रुप में नहीं देखते थे,वे उसे भारत की औरतों का प्रतीक मानते थे।
       नेहरु ने लिखा '' मेरे लिए वह हिंदुस्तान की महिलाओं ,बल्कि स्त्री-मात्र,की प्रतीक बन गई। कभी-कभी हिंदुस्तान के बारे में मेरी कल्पना में वह एक अज़ीब तरह से मिल-जुल जाती,उस हिंदुस्तान की कल्पना में ,जो अपनी सब कमजोरियों के बावजूद हमारा प्यारा देश है,और जो इतना रहस्यमय और भेद-भरा है। कमला क्या थी ? क्या मैं उसे जान सका था ,  उसकी असली आत्मा को पहचान सका था ? क्या उसने मुझे पहचाना  और समझा था ? क्योंकि मैं भी अनोखा आदमी रहा हूँ और मुझमें भी ऐसा रहस्य रहा है ,ऐसी गहराईयाँ रही हैं,जिनकी थाह मैं खुद नहीं लगा सका हूँ। कभी-कभी मैंने ख़याल किया है कि वह मुझसे इसीवजह से ज़रा सहमी रहती थी। शादी के मामले में मैं खातिर-ख़ाह आदमी न रहा हूं , न उस वक्त था। कमला और मैं,एक-दूसरे से कुछ बातों में बिलकुल ज़ुदा थे,और फिर भी कुछ बातों में हम एक-जैसे थे।हम एक-दूसरे की कमियों को पूरा नहीं करते थे। हमारी जुदा-जुदा ताकत ही आपस के व्यवहार में कमजोरी बन गई। या तो आपस में पूरा समझौता हो ,विचारों का मेल हो,नहीं तो कठिनाईयां तो होंगी ही।हममें कोई भी साधारण गृहस्थी की ज़िन्दगी गुजारे,उसे कुबूल करते हुए ,नहीं बिता सकते थे।''
    कमला की बीमारी के समय पंडित नेहरु उनके साथ रहे और उनकी देखभाल भी की, यह एकमात्र उनके करीब रहने और एक-दूसरे से शेयर करने का सबसे बेहतरीन समय था। कमला की खूबी थी कि वह निडर और निष्कपट थीं। वे नेहरु के राजनीतिक लक्ष्यों को जानती,मानती और उसमें यथाशक्ति मदद भी करती थी।सन् 1930 में जब कांग्रेस के सभी नेता जेलों में बंद थे उन्होंने राजनीति में जमकर रुचि दिखाई। मजेदार बात यह थी उस समय सारे देश में औरतें सड़कों पर संघर्ष के मैदान में उतर पड़ीं, इन औरतों में कमला भी थी। मैदान में उतरनेवाली औरतों में सभी वर्गों और समुदायों की औरतें थीं। नेहरु ने 'हिंदुस्तान की कहानी' में इसका जिक्र किया है। उस समय मोतीलाल नेहरु ने बीमारी की हालत में कांग्रेस के आंदोलन का नेतृत्व किया और बड़ी संख्या में औरतों ने उस आंदोलन में हिस्सा लिया। यह घटना 26जनवरी1931 की है। इस दिन सारे देश में आजादी की सालगिरह मनाने का फैसला लिया गया। देश में हजारों जलसे हुए उनमें एक ''यादगार प्रस्ताव'' पास किया गया। यह प्रस्ताव हर सूबे की भाषा में था। कमला ने इसके पहले1921के असहयोग आंदोलन में भाग लिया। कमला दिखने में सामान्य थी, लेकिन कर्मठता के मामले में असाधारण थी।  उनकी क्षयरोग के कारण 28फरवरी 1936 में स्विटजरलैंड में मृत्यु हुई। नेहरु ने अंतिम समय का वर्णन करते हुए लिखा है, '' ज्यों-ज्यों आखिरी दिन बीतने लगे,कमला में अचानक तबदीली आती जान पड़ी। उसके जिस्म की हालत,जहांतक हम देख सकते थे,वैसी ही थी,लेकिन उसका दिमाग अपने इर्द-गिर्द की चीज़ों पर कम ठहरता। वह मुझसे कहती कि कोई उसे बुला रहा है या कि उसने किसी शक़्ल या आदमी को कमरे में आते देखा,जबकि मैं कुछ न देख पाता था।
   28फरवरी को, बहुत सबेरे उसने अपनी आखिरी सांस ली।इंदिरा वहां मौजूद थी,और हमारे सच्चे दोस्त और इन महीनों के निरंतर साथी डाक्टर अटल भी मौजूद थे।
   कुछ और मित्र स्विटजरलैंड के पास के शहरों से आ गए और हम उसे लोज़ान के दाहघर में ले गए।चंद मिनटों में वह सुंदर शरीर और प्यारा मुखड़ा,जिस पर अकसर मुस्कराहट छाई रहती थी,जलकर ख़ाक हो गया। और अब हमारे पास सिर्फ़ एक बरतन रहा,जिसमें उस सतेज,आबदार और जीवन से लहलहाते प्राणों की अस्थियां हमने भर ली थीं।''
नेहरु जब कमला की अस्थियां लेकर लौट रहे थे तो उनका मन एकदम खिन्न और उदास था,उस क्षण को याद करते हुए लिखा है, '' मैंने ऐसा महसूस किया कि मुझमें कुछ नहीं रह गया है और मैं बिना किसी मकसद का हो गया हूं।मैं अपने घर की तरफ़ अकेला लौट रहा था,उस घर की तरफ़ जो अब घर नहीं रह गया था,और मेरे साथ एक टोकरी थी,जिसमें राख़ का एक बरतन था।कमला का जो कुछ बच रहा था,यही था।और हमारे सब सुख सपने मर चुके थे और राख़ हो चुके थे। वह अब नहीं रही,कमला अब नहीं रही-मेरा दिमाग़ यही दुहराता रहा।'' नेहरु ने अपनी आत्मकथा कमला को समर्पित करके बेहतरीन श्रद्धांजलि दी।

रविवार, 16 नवंबर 2014

नेहरु का पत्नी प्रेम

     व्यक्तित्व मूल्यांकन का आधार नैतिकता नहीं, नजरिया होना चाहिए।व्यक्ति के नजरिए और निजी जीवनशैली को जोड़कर देखना चाहिए। भारतीय परंपरा में नजरिए की उपेक्षा करके नैतिकता के आधार पर हमेशा सामंती और फासिस्ट ताकतें हमले करती रही हैं। ये ताकतें नेहरु को भी ऩिशाना बनाती रही हैं। नेहरु की आलोचना का कोई मुद्दा नहीं मिलता तो ये नैतिकता के ठेकेदार उनके निजी जीवन के मसलों पर हमले आरंभ कर देते हैं। हमारे यहाँ फेसबुक से लेकर तमाम किस्म के किताबी संस्मरणों तक नेहरुजी की निजी जिंदगी के पहलुओं के विकृतिकरण की खूब कोशिशें होती रही हैं। नेहरु जैसे बड़े व्यक्तित्व को देखने –समझने के लिए अभी हमारे देश में खुलकर विमर्श करने की जरुरत है। नेहरु के निजी पहलुओं को नेहरु के नजरिए के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। मुश्किल यह है कि नेहरु पर हमले करने वाले, पहलु नेहरु का चुनते हैं, और नजरिया अपना जोड़ देते हैं ,और इस तरह वे नेहरु की 'कलंकगाथा' निर्मित करते हैं। नेहरु के व्यक्तित्व और आचरण से हम आधुनिक मूल्यों और मानवतावादी नजरिए को लेकर बहुत कुछ सीख सकते हैं। इस प्रसंग में पहली शर्त है कि व्यक्ति के रुप में नेहरु के निजी विषयों पर लिखे- कहे पर विश्वास करें।

नेहरु का समूचा व्यक्तित्व आधुनिक था,इसकी खूबी थी अन्य के जीवन में हस्तक्षेप न करना, अन्य का सम्मान करना और अन्य को समानता के नजरिए से देखना। आधुनिक होने की ये पूर्व शर्तें हैं। हमालोगों में मुश्किल यह है कि हमने आधुनिकता का अर्थ नए कपड़े,नए हाव-भाव,नए किस्म का घर,नया फर्नीचर,नई गाडी,नया घर मान लिया। आधुनिक होने का ये चीजें प्रमाण नहीं हैं। आधुनिक होने के लिए आधुनिक नजरिए का होना बेहद जरुरी है। नेहरु इस अर्थ में आधुनिक थे कि उनके पास आलोचनात्मक विवेक था,विज्ञान और न्याय की कसौटी या वैज्ञानिक कसौटी पर चीजों,वस्तुओं,विचारों और व्यक्तियों के आचरण को वे परखकर देखते थे। उन्होंने स्वयं को वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतारने की भरसक कोशिश की। आधुनिक होने का अर्थ पुराने का विरोधी नहीं है, आधुनिक होने का अर्थ है विज्ञान और न्यायसम्मत नजरिए से लैस होना। अपने समूचे आचरण को विज्ञान और न्यायसम्मत बनाना। अन्य का सम्मान करना,मानवाधिकारों का सम्मान करना, उनको मानना। इस नजरिए से नेहरु के अपनी पत्नी के साथ संबंधों को ध्यान से देखें तो बेहतर होगा।

पंडित नेहरु अपनी पत्नी को बेहद प्यार करते थे और उस प्यार से उनको शक्ति मिलती थी।हिन्दी में जो लेखक-आलोचक इन दिनों आत्मकथाओं के नाम पर अल्लम-गल्लम लिख रहे हैं वे नेहरु के आत्मकथा लेखन से बहुत कुछ सीख सकते हैं। नेहरु ने कमला के बारे में लिखा है '' कुछ थोड़ी सी तालीम के अलावा उसे कायदे से शिक्षा नहीं मिली थी। उसका दिमाग शिक्षा की पगडंडियों में से होकर नहीं गुजरा था। हमारे यहां वह एक भोली लड़की तरह आई और जाहिरा उसमें कोई ऐसी जटिलताएं नहीं थीं, जो आजकल आमतौर से मिलती हैं। चेहरा तो उसका लड़कियों –जैसा बराबर बना रहा,लेकिन जब वह सयानी होकर औरत हुई ,तब उसकी आंखों में एक गहराई, एक ज्योति, आ गई और यह इस बात की सूचक थी कि इन शांत सरोवरों के पीछे तूफ़ान चल रहा है। वह नई रोशनी की लड़कियों –जैसी न थी,न तो उसमें वे आदतें थीं, वह चंचल थी। फिर भी नए तरीकों में वह आसानी से घुल-मिल जाती थी। दर-असल वह एक हिंदुस्तानी और खासतौर पर कश्मीरी लड़की थी-चैतन्य और गर्वीली,बच्चों-जैसी और बड़ों –जैसी,बेवकूफ़ और चतुर। अजनबी,लोगों से और उनसे,जिन्हें वह पसंद नहीं करती थी,वह संकोच करती थी;लेकिन जिन्हें वह जानती और पसंद करती थी,उनसे वह जी खोलकर मिलती और उनके सामने उसकी खुशी फूटी पड़ती थी।चाहे जो शख्स हो उसके बारे में झट से अपनी राय कायम कर लेती। यह राय उसकी हमेशा सही न होती,और न इन्साफ़ की नींव पर बनी होती,लेकिन अपनी इस सहज पसंद या विरोध पर वह दृढ़ रहती। उसमें कपट नाम को न था। अगर वह किसी व्यक्ति को नापसंद करती और यह बात जाहिर हो जाती ,तो वह उसे छिपाने की कोशिश न करती। कोशिश भी करती तो शायद वह उसमें कामयाब न होती। मुझे ऐसे इन्सान कम मिले हैं.जिन्होंने मुझ पर अपनी साफ-दिली का वैसा प्रभाव डाला हो,जैसा उसने डाला था।''(हिदुस्तान की कहानी,पृ.49-50)

इस समूचे उद्धरण में जो चीज समझने की है वह ध्यान में रखें तो आत्मकथाओं के बारे में, उनमें आए चरित्रों के बारे में सही नजरिया बना सकते हैं। मसलन् , आत्मकथा में देखें कि चरित्रों की राय ''इन्साफ़ की नींव पर '' आधारित है या नहीं ? व्यक्तित्व की आंतरिक बुनाबट किस तरह की है उसमें छल और निष्कपट भावबोध की क्या भूमिका है ? नेहरु के इस बयान से एक बात और साफ होती है कि कमला को वे बेइंतिहा प्यार करते थे। इस प्यार की अभिव्यक्ति में वे अपने मन की उन तमाम बातों को स्पष्ट ढ़ंग से कहते हैं जो वे कमला के बारे में महसूस करते थे। उन्होंने आत्मालोचना करते हुए लिखा , '' मैंने अपने ब्याह के शुरु के सालों का ख़याल किया,जबकि बावजूद इस बात के कि मैं उसे हद से ज्यादा चाहता था,मैं करीब-करीब उसे भूल गया था,और उसे उस संग से वंचित रखता था,जिसका उसे हक़ था,क्योंकि उस वक्त उस मक़सद को पूरा करने में लगा रहता था,जिसे मैंने अपनाया था। '' आगे लिखा '' जब-जब और धंधों से निपटकर उसके पास आता,तो मुझे ऐसा अनुभव होता कि किसी सुरक्षित बंदरगाह में पहुँच गया हूँ। अगर घर से कई दिनों के लिए बाहर रहता ,तो उसका ध्यान करके मेरे मन को शांति मिलती और मैं बेचैनी के साथ घर लौटने की राह देखता। अगर वह मुझे ढ़ाढ़स और साहस देने के लिए न होती और मेरे थके मन और शरीर को नया जीवन न देती रहती,तो भला मैं कर ही क्या पाता ? '' नेहरु के इन शब्दों में साफ कहा कि '' मैं उसे हद से ज्यादा चाहता था''।

कमला के व्यक्तित्व के बारे में नेहरु ने लिखा '' वह जो कुछ मुझे दे सकती थी,उसे मैंने उससे ले लिया था।इसके बदले में इन शुरु के दिनों में मैंने उसे क्या दिया ? जाहिरा तौर पर मैं नाकामयाब रहा,और मुमकिन है कि उन दिनों की गहरी छाप उस पर हमेशा बनी रही हो। वह इतनी गर्वीली और संवेदनशील थी कि मुझसे मदद मांगना नहीं चाहती थी,अगरचे जो मदद मैं उसे दे सकता था , वह दूसरा नहीं दे सकता था।वह राष्ट्रीय लड़ाई में अपना अलग हिस्सा लेना चाहती थी; महज़ दूसरे के आसरे रहकर या अपने पति की परछाईं बनकर वह नहीं रहना चाहती थी। वह चाहती थी कि दुनिया की निगाहों में ही नहीं,बल्कि अपनी निगाहों में वह खरी उतरे।'' नेहरु ने रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाटक की चित्रा को उद्धृत करते हुए लिखा '' मैं चित्रा हूँ,देवी नहीं हूँ कि मेरी पूजा की जाय। अगर तुम खतरे और साहस के रास्ते में मुझे अपने साथ रखना मंज़ूर करते हो,अगर तुम अपनी जिन्दगी के बड़े कामों में मुझे हिस्सा लेने की इजाजत देते हो,तो तुम मेरी असली आत्मा को पहचानोगे।'' नेहरु जी ने लिखा यह बात कमला ने '' शब्दों में नहीं कही ,धीरे-धीरे यह संदेश मैं उसकी आंखों में पढ़ पाया।''

नेहरुजी का कमला के बारे में मानना था '' मेरे लिए वह हिन्दुस्तान की महिलाओं,बल्कि स्त्री-मात्र ,की प्रतीक बन गयी।''



गुरुवार, 13 नवंबर 2014

पंडित जवाहरलाल नेहरु के जन्मदिन पर विशेष- ''क्लिक कल्चर'' के प्रतिवाद में पंडित नेहरु

          
          नई डिजिटल कल्चर 'क्लिक कल्चर' है। 'क्विक' कल्चर है।इसने 'पुसबटन' और इमेज को महान और लोकतांत्रिक मूल्यों और विचारों को खोखला और निरर्थक बनाया है। सम्प्रति टीवी से लेकर फेसबुक तक अनेक संगठन और नेता इसके शैतान खिलाड़ी के रुप में खेल रहे हैं और भारत की मासूम युवापीढ़ी को इमेजों के जरिए दिग्भ्रमित करने में लगे हैं। 'क्लिक कल्चर' ने युवाओं के विवेक पर सीधे हमला बोला हुआ है।  कहा जा रहा है 'क्लिक ' इमेज ही सत्य है,विचार तो बकबास होते हैं,बोर करते हैं,कमाना मूल्यवान काम है,सोचना फालतू चीज है, व्यवहारवादी बनो,जनवादी मत बनो,  धर्मनिरपेक्षता फालतू चीज़ है,लोकतंत्र में रहो लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों के बिना। लोकतांत्रिक मूल्य तो बोझा हैं, वोट दो, लेकिन विवेकवाद के आधार पर सोचो मत, सार्थक है सिर्फ चुनाव जीतना। इस 'क्लिक कल्चर' के नायक इन दिनों पंडित नेहरु का भी 'क्लिक संस्कार' करने में मशगूल हैं।
     उल्लेखनीय है पंडित जवाहरलाल नेहरु देश के सामान्य प्रधानमंत्री नहीं थे, वे सामान्य राजनेता भी नहीं थे। आमतौर पर लोकतंत्र में नेता आते हैं और जाते हैं।औसत नेता ही लोकतंत्र की संपदा के रुप में नजर आते हैं, भारत में अनेक औसत नेता प्रधानमंत्री बने,लेकिन आधुनिक विचारवान विरल प्रधानमंत्री तो एकमात्र पंडितजी ही थे। वे ऐसे प्रधानमंत्री थे जिनके पास आधुनिक भारत का विज़न था,आधुनिक विचार थे ,आधुनिक जीवनशैली थी और इन सबसे बढ़कर अपने विचारों के लिए जोखिम उठाने का साहस था।
      नेहरु को पूजना आसान है,उनकी विरासत को समझना और उनके विचारों की दिशा में जोखिम उठाकर चलना बहुत मुश्किल काम है। खासकर वे लोग जो आधुनिक विचारों,वैज्ञानिक सचेतनता ,धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के मर्म से अनभिज्ञ हैं या जो लोग  आए दिन इनकी जड़ों में मट्ठा डालने का काम करते हैं,उनके लिए नेहरु को पाना बेहद मुश्किल है। नेहरु 'क्लिक कल्चर' की देन नहीं थे, वे तो संस्कृति की देन थे। नेहरु को पाने के लिए भारत की संस्कृति के पास जाना होगा। संस्कृति का मार्ग बेहद जटिल और जोखिम भरा है ,वह फेसबुक की वॉल पर लिखी 'क्विक' इबारत नहीं है, नेहरु कोई किताब नहीं है,कोई कुर्सी नहीं है या मूर्ति नहीं है जिसके साथ खड़े होकर फोटो क्लिक करो और नेहरु की पंक्ति में शामिल हो जाओ! भारत के प्रधानमंत्री बनने के बावजूद नेहरु की पंक्ति में खड़े होना संभव नहीं है। क्योंकि नेहरु कुर्सी नहीं बल्कि देश का आधुनिक विज़न हैं। नेहरु के आधुनिक विज़न को सचेत रुप से अर्जित करना होगा तब ही सही मायने में नेहरु की रुह को स्पर्श किया जा सकता है। महसूस किया जा सकता है।
     नेहरु को महान जिस चीज ने बनाया वह था जीवन के प्रति उनका विवेकवादी नजरिया। नेहरु के लिए साधन और साध्य एक थे। उन्होंने लिखा है '' शुरुमें जिंदगी के मसलों की तरफ़ मेरा रुख़ कमोबेश वैज्ञानिक था,और उसमें उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के शुरु के विज्ञान के आशावाद की चाशनी भी थी। एक सुरक्षित और आराम के रहन-सहन ने और उस शक्ति और आत्म-विश्वास ने ,जो उस समय मुझमें था,आशावाद के इस भाव को और बढ़ा दिया था।'' हमारे नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं में एक बड़ा अंश है जो अंधविश्वासी और धर्म का अंधपूजक है। वे धर्म को आलोचनात्मक विवेक की आंखों से देखते ही नहीं हैं। ऐसे अंधपूजक हमारे देश के प्रधानसेवक भी हैं। जबकि नेहरु में ये चीजें एकदम नहीं थीं। नेहरु ने लिखा है, '' मजहब में – जिस रुप में मैं विचारशील लोगों को भी उसे बरतते और मानते हुए देखता था,चाहे वह हिन्दू-धर्म ,चाहे इस्लाम या बौद्ध-मत या ईसाई-मत-मेरे लिए कोई कशिश न थी । अंध-विश्वास और हठवाद से उनका गहरा ताल्लुक था और जिन्दगी के मसलों पर ग़ौर करने का उनका तरीक़ा यक़ीनी तौर पर विज्ञान का तरीक़ा न था। उनमें एक अंश जादू-टोने का था और बिना समझे-बूझे यकीन कर लेने और चमत्कारों पर भरोसा करने की प्रवृत्ति थी।''
  '' फिर भी यह एक जाहिर-सी बात है कि मज़हब ने आदमी की प्रकृति की कुछ गहराई के साथ महसूस की हुई जरुरतों को पूरा किया है और सारी दुनिया में,बहुत ज्यादा कसरत में ,लोग बिना मज़हबी अकीदे के रह नहीं सकते। इसने बहुत-ऊँचे किस्म के मर्दों और औरतों को पैदा किया है ,और साथ ही तंग-नज़र और ज़ालिम लोगों को भी।इसने इन्सानी ज़िन्दगी को कुछ निश्चित आंकें दी हैं और अगरचे इन आंकों में से कुछ आज के ज़माने पर लागू नहीं हैं.बल्कि उसके लिए नुकसानदेह भी हैं,दूसरी ऐसी भी हैं, जो अख़लाक़ और अच्छे व्यवहार लिए बुनियादी हैं।''
नेहरु ने लिखा है '' असल में मेरी दिलचस्पी इस दुनिया में और इस जिंदगी में है,किसी दूसरी दुनिया या आनेवाली जिंदगी में नहीं।'' पंडितजी पुनर्जन्म की धारणा में यकीन नहीं करते थे,अंधविश्वासों के विरोधी थे।दिमागी अटकलबाजी में यकीन नहीं करते थे। वे चीजों,घटनाओं,व्यक्तियों,समुदाय और वस्तुओं को वैज्ञानिक नजरिए से देखने में विश्वास करते थे। उन्होंने माना '' मार्क्स और लेनिन की रचनाओं के अध्ययन का मुझ पर गहरा असर पड़ा और इसने इतिहास और मौजूदा जमाने के मामलों को एक नई रोशनी में देखने में बड़ी मदद पहुँचाई। इतिहास और समाज के विकास के लंबे सिलसिले में एक मतलब और आपस का रिश्ता जान पड़ा और भविष्य का धुंधलापन कुछ कम हो गया।''

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...