हिन्दी कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हिन्दी कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 21 नवंबर 2010

अज्ञेय जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष- बलाओं की मां है साम्प्रदायिकता

    स.ही.वा.अज्ञेय हिन्दी के बड़े साहित्यकार हैं। उनकी प्रतिष्ठा उनमें भी है जो उनके विचारों से सहमत नहीं हैं। अज्ञेय के बारे में प्रमुख समस्या है कि उन्हें किस रूप में याद करें ? क्या उन्हें धिक्कार और अस्वीकार के साथ देखें ? क्या वे सचमुच में ऐसा कुछ लिख गए हैं जिसके कारण उन्हें याद किया जाए ?
    मेरे मन में अज्ञेय को लेकर लंबे समय से कई सवाल उठते रहे हैं मसलन् क्या एक व्यक्ति मार्क्सवाद में दीक्षित होने के बाद उसके प्रभाव से मुक्त हो जाता है ? क्रांतिकारी अज्ञेय और आधुनिकतावादी अज्ञेय में ऐसे कौन से तत्व हैं जिनसे हम सीख सकते हैं ? हिन्दी के समीक्षकों ने अज्ञेय के साथ क्या न्याय किया है ? क्या क्रांतिकारी अज्ञेय का लेखन आज के दौर में हमारी कोई मदद कर सकता है ?
   मुझे अज्ञेय इसलिए पसंद हैं कि वे साहित्य को अभिव्यक्ति नहीं संप्रेषण मानते हैं। हिन्दी के अधिकांश आलोचकों ने साहित्य को अभिव्यक्ति माना है। अज्ञेय ने संप्रेषण माना है। अज्ञेय ने लिखा है-‘‘ मैंने हमेशा माना है कि रचना का पहला धर्म अभिव्यक्ति नहीं है,संप्रेषण है।’’ साहित्य को संप्रेषण मानने का अर्थ है उसे कम्युनिकेशन के रूप में देखना। यह साहित्य का विकसित नजरिया है।
    एक और महत्वपूर्ण बात है जो अपील करती है वह है लेखक के नाते उनका यह कहना कि कहानी लेखन मुझे इसलिए बंद करना पड़ा ,क्योंकि कहानी लिखने से अर्थवत्ता का एहसास नहीं हो रहा था।
    संप्रेषण के लिए उन्हें जब कहानी नाकाफी लगने लगी तो उन्होंने कहानी लिखना बंद कर दिया।  उन्हें जो नजरिया नाकाफी लगा उसे छोड़ दिया। वे आज के तमाम हिन्दी लेखकों की तरह नहीं हैं जो किसी नजरिए से इसलिए चिपके हैं क्योंकि उन्हें उससे प्यार है,पुराना संबंध है,विचारधारात्मक लगाव है,लेकिन व्यवहार में उसे नहीं लागू करते।
    ऐसे ढ़ेर सारे लेखक हैं जिनके नजरिए ,साहित्य और जीवन में महा-अंतराल है। अज्ञेय इस अर्थ में बड़े लेखक हैं कि वे जिस विचार को मानते थे उसे व्यवहार में, साहित्य में ,पत्रकारिता में उतारने की क्षमता भी रखते थे।
   अज्ञेय के नजरिए के दो छोर हैं ,पहला है अर्थवत्ता, और दूसरा है संप्रेषण। अर्थवत्ता की तलाश में उनको विचारधारात्मक रूपान्तरण करना पड़ा और संप्रेषण के लिए विधा रूपों में नए प्रयोगों की ओर जाना पड़ा।
    अज्ञेय लिखने के लिए लिखने में विश्वास नहीं करते थे। विचारधारात्मक आग्रहों के आधार पर नहीं लिखते थे बल्कि संप्रेषण के लिए लिखते थे। लेखन को संप्रेषण मानना बड़ी उपलब्धि है और यह हिन्दी की पहली और दूसरी परंपरा से भिन्न परंपरा है। संप्रेषण पर जोर देने का अर्थ है समाज और पाठक को केन्द्र में रखकर लिखना। उसे साथ लेकर चलना।
     अज्ञेय उन चंद लेखकों में हैं जो मौजूदा दौर की बेहतर समझ रखते थे। सामयिक यथार्थ को ज्यादा गहराई से पहचानते थे। उन्होंने लिखा है- ‘‘ जानकारी हासिल करने के (या जानकारी को विकृत करके जबरन वह विकृति स्वीकार कराने के ) साधन लगातार ऐसे लोगों के दृढ़तर नियंत्रण में चले जा रहे हैं जिन पर हमारा नियंत्रण लगातार कमजोरतर होता जा रहा है। यहां तक कि स्वयं हम कहां खड़े,और जिस युग अथवा काल-खंड में जी रहे हैं वह वास्तव में क्या है ,उससे हमारा रिश्ता क्या अथवा कैसा है ,यही पहचानना हमारे लिए दिन-प्रतिदिन कठिनतर होता जा रहा है। ’’
   अज्ञेय का मुझे अच्छा लगने का एक और कारण है उनका साम्प्रदायिकता और अधिनायकवाद विरोधी नजरिया। इस प्रसंग में मुझे उनकी एक कहानी ‘मुस्लिम-मुस्लिम भाई -भाई’ याद आ रही है। यह छोटी बड़ी शानदार कहानी है। इस कहानी में मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बेपर्दा किया गया है। पूरी कहानी का ढ़ांचा एकदम धर्मनिरपेक्ष है। इस कहानी के आरंभ में अज्ञेय ने साम्प्रदायिकता को ‘डर’ और 'छूत' की बीमारी कहा है। लिखा है डर ‘‘बला नहीं बलाओं की माँ है।’’ ..‘‘ जहां डर आता है,वहां तुरंत घृणा और द्वेष और कमीनापन आ घुसते हैं, और पीछे-पीछे न जाने मानवात्मा की कौन कौन-सी दबी हुई व्याधियां !’’
अज्ञेय ने जिस तरह मुस्लिम साम्प्रदायिकता को नंगा करते हुए ‘मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई’ कहानी लिखी थी। उसी तरह हिन्दू साम्प्रदायिकता को निशाना बनाते हुए ‘रमंते तत्र देवता’ कहानी लिखी थी। इन दोनों कहानियों में रेखांकित किया गया है कि किस तरह दोनों ही रंगत की साम्प्रदायिकता  ने औरतों को निशाना बनाया है। यह कहानी 1946 के कलकत्ता में हुए दंगों पर लिखी गयी है। उस समय कोलकाता कैसा था इस पर अज्ञेय ने लिखा ‘‘शहर बहुत से छोटे-छोटे हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में बंट गया था। जिनकी सीमाओं की रक्षा पहरेदार नहीं करते थे, लेकिन जो फिर भी परस्पर अनुल्लंघ्य हो गए थे। लोग इसी बंटी हुई जीवन-प्रणाली को लेकर भी अपने दिन काट रहे थे।’’
   इसी कहानी में एक अन्य जगह लिखा है ‘‘ नफ़रत के एक-एक बीज से हमेशा सौ-सौ जहरीले पौधे उगे हैं। नहीं तो यह जंगल यहां उगा कैसे ,जिसमें आज हम-आप खो गए हैं और क्या जानें निकलेंगे कि नहीं ? हम रोज़ दिन में नफ़रत का बीज बोते हैं और पौधा फलता है तो चीखते हैं कि धरती ने हमारे साथ धोखा किया !’’   
                 

शनिवार, 26 जून 2010

चाक्षुषभाषा के रचनाकार उदयप्रकाश

   (कथाकार उदयप्रकाश)                   
      उदयप्रकाश पर लिखना मुश्किल काम है। इसके कई कारण हैं पहला यह कि वह मेरे दोस्त हैं। दूसरा उनका जटिल रचना संसार है। उदयजी को मैं महज एक लेखक के रूप में नहीं देखता । बल्कि पैराडाइम शिफ्ट वाले लेखक के रूप में देखता हूँ। हिन्दी कहानी की परंपरा में पैराडाइम शिफ्ट वाले दो ही कथाकार हुए हैं,पहले हैं प्रेमचंद, दूसरे हैं उदयप्रकाश। पैराडाइम शिफ्ट से मतलब है युगीन नए मीडिया के साथ अन्तर्क्रियाएं करते हुए कथा या विधा के नए ढ़ांचे का निर्माण।
      प्रेमचंद ने नए मीडिया के रूप में कहानी और फिल्म की अन्तर्क्रियाओं का विकास करते हुए कहानी का नया ढ़ांचा बनाया जिसे हिन्दी में यथार्थवादी कहानी कहते हैं। उसी तरह उदयजी ने वृत्तचित्र और टीवी की चाक्षुषभाषा का प्रयोग करके हिन्दी कहानी को नयी दिशा दी। कहानी की नई संरचना को जन्म दिया। किसी भी कथाकार की महानता तब सामने आती है जब वह युगीन मीडिया की अभिव्यक्ति की प्रभावशाली प्रवृत्ति को साहित्य की विधा में रूपान्तरित करते हुए उसके मूल रूप को बदलता है।
       मैं उदयप्रकाश को आज भी संघर्षशील लेखक के रूप में देखता हूँ। मेरा उनसे 1980-81 से परिचय है। उन्होंने मुझे जेएनयू में एक सेमिस्टर पढ़ाया था। उदयप्रकाश और देवेन्द्र कौशिक एक ही साथ शिलॉग के विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे,स्थानीय राजनीतिक उथल-पुथल ने उन्हें शिलांग की शिक्षक की नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया।
      देवेन्द्र कौशिक ने संस्कृत काव्यशास्त्र पढ़ाया था,बाद में उनकी दिल्ली वि.वि. के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में नौकरी लग गयी,लेकिन शिलांग की नौकरी छोड़ने के बाद उदयप्रकाश को दोबारा प्राध्यापक की नौकरी नहीं मिल पायी, इसका प्रधान कारण गुरूदेव नामवर सिंह का उनसे नाराज रहना है।
     गुरूदेव क्यों नाराज थे यह अभी तक रहस्य है। नामवरजी की यह विशेषता है कि वे जब किसी से नाराज होते हैं तो नाराजगी को मन मे बड़े कौशल से छिपा लेते हैं। उदयप्रकाश जैसे लेखक को हिन्दी में शिक्षक की नौकरी न मिलना यह इस बात का भी संकेत है कि हिन्दी विभाग अभी तक सामंती सोच में कैद हैं। साथ ही हिन्दी में नामवर सिंह जैसे लोगों की नाराजगी कितनी महंगी हो सकती है।
       उदयप्रकाश और नामवरजी के रिश्ते छात्र जीवन से तल्ख रहे हैं और बाद में अनेक मसलों पर नामवरजी के साथ वैचारिक मुठभेड़ों में यह वैचारिक तल्खी व्यक्त हुई है।
   उदयप्रकाश के बारे में समग्रता में यह कहा जा सकता है कि वह 80 के बाद का सबसे प्रखर, विचारोत्तेजक और सही परिप्रेक्ष्य में गद्य लिखने वाला हिन्दी का अकेला समर्थ लेखक है। आमतौर पर यह माना जाता है कि हिन्दी का श्रेष्ठ गद्य रामविलास शर्मा ने लिखा है लेकिन मेरी व्यक्तिगत राय है कि 80 के बाद का हिन्दी श्रेष्ठ गद्य उदयप्रकाश ने लिखा है।
    हिन्दी में आलोचना का धंधा करने वालों के पास उदयप्रकाश के गद्य का कोई विकल्प नहीं है। हमारे सामने हिन्दी के जितने सुधी आलोचक हैं वे इस मामले में उदयप्रकाश से अभी काफी पीछे हैं। सन् 80 के बाद हिन्दी गद्य का नया ठाठ राजेन्द्र यादव ,उदयप्रकाश और सुधीश पचौरी के यहां दिखता है। यह ऐसा गद्य है जो हिन्दी में पहले नहीं लिखा गया।
     उदयप्रकाश की जिंदगी की जंग रोज़ आरंभ होती है। उसके पास कोई निश्चित आय नहीं है उसने सारी जिंदगी टुकड़ों और किश्तों में अस्थायी काम करते गुजार दी। वे स्वभाव से सहृदय और संवेदनशील लेखक हैं। उनकी सारी साहित्यिक सफलताओं की धुरी है उनकी पत्नी और उसका अबाधित समर्थन। उनकी पत्नी की पक्की नौकरी ने ही उदयप्रकाश को जिंदा रखा हुआ है वरना हिन्दी के मठाधीश उनकी मौत का सारा इंतजाम कर चुके हैं। उदयप्रकाश की दिली इच्छा थी कि शिक्षक बनूँ और साहित्य सृजन करूँ। क्योंकि शिक्षक की नौकरी करते हुए उन्हें दैनन्दिन जीवन में समझौते नहीं करने पड़ते।
    उदयप्रकाश बुनियादी तौर पर नव्य-उदारवादी यथार्थ का लेखक है उसकी रचनाओं में विस्थापन और अस्मिता ये दो महत्वपूर्ण समस्याएं हैं जो बार-बार उभरकर सामने आई हैं। नव्य-उदारतावाद के दौर में हाशिए के लोगों के साथ-साथ निम्नमध्यवर्ग के लोगों पर किस तरह की मुसीबतें आ रही हैं इन्हें बड़े ही कलात्मक ढ़ंग से उन्होंने अभिव्यक्त किया है। इस क्रम में आम आदमी की तकलीफें केन्द्र में चली आई हैं।
   उदयप्रकाश के बारे में राजेन्द्र यादव जैसे संपादकों ने यह बात फैला दी कि उदय की कहानियां जादुई यथार्थवाद को व्यक्त करती हैं। सच्चाई यह नहीं है। उदयप्रकाश ही क्यों भारत के किसी भी लेखक का जादुई यथार्थवाद से कोई संबंध नहीं है। भारत और लैटिन अमेरिका की परिस्थितियों में कोई साम्य नहीं है और जिस तरह का नग्न यथार्थ लैटिन के साहित्यकारों के यहां व्यक्त हुआ है वैसे यथार्थ की सृष्टि उदयप्रकाश ने नहीं की है।
       उदयप्रकाश की कहानियां मुक्तिबोध की कहानीकला से काफी मिलती हैं। इसके अलावा उनकी कहानियों में टेलीविजन की चाक्षुषभाषिक चमक है। भाषायी प्रयोगों में चाक्षुषभाषा के सफल प्रयोग करने में उदयप्रकाश सफल रहे हैं। कहानी में चाक्षुषभाषा का इसके पहले प्रेमचंद के यहां प्रयोग मिलता है। प्रेमचंद ने सिनेमा की भाषा को कहानी की भाषा बनाया था। वहीं उदयप्रकाश की कहानियों में टीवी की भाषा का प्रयोग मिलता है। ये दोनों कथाकार दो भिन्न मीडियायुग की देन हैं। इसके अलावा वृत्तचित्र की भाषा को कहानी की अपरिहार्य भाषा बनाने में उदयप्रकाश को सफलता मिली है।
     उदयप्रकाश सिर्फ कहानी में चाक्षुषभाषा का प्रयोग नहीं करते बल्कि कविता और निबंधों में भी इसका प्रयोग करते हैं। कहानी कब डाकूमेंटरी में बदल गयी इसे जानना हो तो उदयप्रकाश की कहानियों को पढ़ना दिलचस्प होगा। यही डाकूमेंटरी का फॉरमेट उनकी कई कविताओं में झलकता है।               

शनिवार, 8 मई 2010

मार्कण्डेय की एक्सरे जैसी आंखें - सरला माहेश्वरी(भू.पू.माकपा राज्यसभा सांसद)

(स्व. कथाकार मार्कण्डेय)
       पिछले वर्ष दो अक्टूबर को पिताजी हमें छोड़ कर चले गये। पिताजी की शब्दावली में, शहरीले जंगल में सांसों की हलचल अचानक थम सी गयी। कोलाहल के आंगन में जैसे सन्नाटा पसर गया। इस सन्नाटे को कोई कैसे स्वराए? किससे बात करे एकाकी मन ? सागर जैसा एकाकीपन, नीले जल सा खारा तनमन, थकेथके से मन हिरना को किस दूरी की आस बंधाएं? लेकिन फिर पिताजी की आवाज सुनाई पड़ती उड़ना मन मत हार सुपर्णे! सुधियां साथ निभाएंगी। पिताजी की रचनाओं की वह अनुपम सौगात, वह अनमोल, अकूत विरासत हमारी सबसे बड़ी शक्ति है, हमारे जीने का संबल है। उनके गीतों की आहटें दिनरात ध्वनिप्रतिध्वनियों की तरह हमारे साथ है।

अभी इसी शक्ति को संजो ही रही थी कि साल के शुरू में ही ज्योति बसु चल बसे। बीकानेर से मॉं का फोन आया। भर्राई हुई आवाज में उन्होंने कहा – ‘एक बाप बीकानेर में छोड़ कर चला गया और अब कलकत्ते का बाप भी छोड़ कर चला गया।मॉं ने तो बहुत सहज सरल रूप में यह बात कही थी। ज्योति बसु जैसे कम्युनिस्ट पार्टी के इतने बड़े नेता हम सबके लिये पिता समान ही थे। हां मॉं ने उन्हें हमारे परिवार के सभी बड़े समारोहों में आते जरूर देखा था। लेकिन ज्योति बसु सचमुच मेरे पिता समान थे। उन्होंने मेरे सिर पर एक पिता की तरह अपना प्यार और आशीर्वाद तब बरसाया था जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।
      आपदा का एक और पहाड़ टूट पड़ा जब मार्कण्डेय भाई के चले जाने का समाचार मिला। यकीन ही नहीं हो रहा था। अभी पांच फरवरी को तो मैं और अरुण उनसे मिल कर आये थे। इस बार हम लोग यही सोच कर दिल्ली गये थे कि मेरे चेकअप के बाद हर हाल में मार्कण्डेय भाई से मिलकर ही आना है। 
      हम लोग सुबह आठ बजे ही उनसे मिलने जाने वाले थे। ड्राईवर के आने में हो रही देरी हर पल हमारी बेचैनी को बढ़ा रही थी। हम कस्तूरबा गांधी मार्ग पर बंग भवन में टिके हुए थे और हमें जाना था राजीव गांधी कैंसर हास्पिटल। खैर, किसी तरह बड़ी मुश्किल से हम इतनी लंबी दूरी को पार कर उस जगह पर पहुंचे जहां वे हास्पिटल के पास ही कोई घर लेकर रह रहे थे। वैसे बीमारी की हालत में हमने पहले भी उन्हें देखा था। लेकिन इस बार उनकी आंखों में देखने का साहस नहीं हो रहा था । उनकी आंखें भर आई थी। वे मुझे भी बीमारी के बाद पहली बार देख रहे थे। उनकी आंखों ने मेरी दूसरी ही सूरत की कल्पना कर रखी थी। लेकिन मुझे पुराने रूप में देखकर मुस्कुराहट उनके चेहरे पर पसर गयी। गले में तकलीफ के बाद भी मार्कण्डेय भाई का बोलना जारी रहा। 
      साहित्य की दुनिया में इस वक्त क्या हो रहा है, उन्हें हर चीज की जानकारी थी। अभी पुस्तक मेले में नामवरजी की चार किताबों का एक साथ विमोचन उनकी नजर में था। हम लोग उन्हें बारबार आश्वस्त करते रहे कि रेडिएशन पूरा होने के बाद वे फिर से स्वस्थ हो जायेंगे। लेकिन दूसरे के मन की अंतरकथा जानने वाला कथाकार अपने भीतर की कथा भी बखूबी पढ़ रहा था और हम लोग गीली आंखें लिये उनसे विदा हो गये। मन मैं कहीं डर बैठ गया था कि यह मुलाकात कहीं आखिरी मुलाकात तो नही? लेकिन यह अंत इतना जल्दी सामने आ जायेगा इसका अंदाज तो नहीं था। मार्कण्डेय भाई में हमेशा मुझे कुछकुछ अपने पिता की छवि नजर आती थी। दोनों की मौत में भी अजीब साम्य था। दोनों के परिवार की भी एक मिलीजुली कहानी थी।
       मार्कण्डेय भाई से पहली मुलाकात जनवादी लेखक संघ के निर्माण के सिलसिले में इलाहबाद में हुई। मैं, अरुण और इसराइल साहब तीनों ‘82 में इलाहाबाद गये थे। इसराइल साहब उन्हें मार्कण्डेय भाई कहकर बुलाते थे। हम लोग भी उन्हें इसी नाम से पुकारने लगे। इलाहाबाद की वह पहली यात्रा मेरी यादों में हमेशा जीवंत बनी रही, हालांकि उसके बाद भी कई बार वहां जाने का मौका मिला।
       मुझे आज भी याद पड़ता है किस तरह घर पहुंचने के साथ ही हंसते हुए उन्होंने हमारा स्वागत किया था। मिंटो रोड में उनके पुराने घर के प्रवेश द्वार के साथ ही लगी हुई एक छोटी सी बैठक थी, जिसमें सामने ही उनकी विख्यात चौकी लगी थी। हम लोग नहाधोकर वहीं बैठ गये। बातें चलती रही, वहीं चाय नाश्ता भी आता रहा। देखते ही देखते कई लेखकों का वहां जमावड़ा हो गया। 
       भैरव प्रसाद गुप्त, शेखर जोशी, चंद्रभूषण तिवारी, दूधनाथ सिंह आदि सभी लेखक गहरी शिद्दत के साथ इस बात को महसूस कर रहे थे कि किस तरह प्रगतिशील लेखक संघ अपनी गलत और अवसरवादी नीतियों के चलते मौजूदा समय की चुनौतियों को समझने और उनसे लड़ने में एकदम नाकारा साबित हो चुका है। 
      आंतरिक आपातकाल का समर्थन करके तो उस संगठन ने अपनी रहीसही विश्वसनीयता भी खत्म कर दी है। ऐसे समय में देश भर के जनवाद पसंद लेखकों का यह कर्तव्य बन जाता है कि वे हमारे देश की गौरवपूर्ण राष्ट्रीय और जनवादी परम्परा की रक्षा के लिये तथा उन मूल्यों को आज की परिस्थतियों में आगे बढ़ाने के लिये संगठित हों। 
       सभी लोग इस बात पर एकमत थे कि लेखकों के एक ऐसे संगठन की फौरन जरूरत है जो जनवाद और जनवादी मूल्यों की रक्षा के लिये काम करें। इसके पहले कोलकाता में भी कलमके संपादकमंडल की एक बैठक के समय लेक प्लेस स्थित पार्टी के केंद्रीय कमेटी के कार्यालय में कामरेड बी टी रणदिवे से इस विषय में बातों का एक दौर पूरा हो चुका था जिसमें मार्कण्डेय भाई भी चंद्रबली सिंह, भैरव प्रसाद गुप्त, चंद्रभूषण तिवारी, अयोध्या सिंह, इसराइल और अरुण के साथ मौजूद थे।
      इलाहाबाद में शुरू हुई इन बातों के बीच से मार्कण्डेय भाई का व्यक्तित्व मेरे सामने खुलता चला जा रहा था। सारा वातावरण मुझे अपने बीकानेर के घर जैसा ही लग रहा था। लोगों का जमावड़ा और बातों का अनवरत सिलसिला, चायनाश्ते का चक्र सबकुछ वैसा ही जैसा देखते हुए मैं बड़ी हुई हूं। पिता को देखकर किसी भी व्यक्ति को यह समझने में देर नहीं लगती थी कि यह आदमी ऊपर से लेकर नीचे तक सिर्फ‍ कवि है और इसलिये लोग उन्हें कविवर ही कहते थे।
      मार्कण्डेय भाई को देखकर मुझे पहली नजर में यह समझ में आ गया था कि वे एक कथाकार हैं। आदमी के अंदर झांकने की पैनी दृष्टि, छोटीछोटी बातों की गहराई में जाकर डुबकी लगाना, पूरे विस्तार से उसका वृत्तांत पेश करना और वहां से कुछ अनकहा निकाल लाने की गजब क्षमता थी उनमें। मुझे लगता था कि इस आदमी की आंखों में एक्सरेज लगी हुई हैं, जो आपके भीतर का सबकुछ देख रही है। एक दिन अचानक खाने पर मार्कण्डेय भाई ने कहा कि सरला तुम सब्जी एकदम नहीं खाती हो। मैं तीन दिन से देख रहा हूं तुम सब्जी नहीं खा रही हो। मुझे आखिर कहना पड़ा कि मार्कण्डेय भाई आप बताइये इलाहबाद में क्या भिंडी के अलावा और कोई सब्जी नहीं होती। तीन दिनों से हम लोग कितनी जगहों पर खाना खाने गये, सब जगह खाने को भिंडी की सब्जी ही मिली। मुझे भिंडी इतनी पसंद नहीं है। मार्कण्डेय भाई जोर से खिलखिलाकर हंस पड़े। उन्होंने उसी समय आवाज लगाई अपनी पत्नी को, वे दौड़ी हुई आई। मार्कण्डेय भाई ने कहा देखो जब तक सरला यहां है, भिंडी नहीं बनेगी। उस यात्रा में मार्कण्डेय भाई से जो अंतरंग संबंध बने वे परवर्ती काल में और दृढ़ होते गये।
       आजादी के बाद के भारत के ग्रामीण जीवन को उन्होंने जितनी गहराई से समझने की कोशिश की उनकी कहानियां और उपन्यास इसके साक्षी हैं। मार्कण्डेय इस बात को मानते थे कि ‘‘जीवन की एक निश्चित परिभाषा ही कहां? सच्चाइयां सहज, एकरूप और समस्तरीय तो नहीं होती। फिर आज की कहानी जो जीवन के निकटतम सूत्रों से अपना तानबाना बुनने के लिये आतुर है, फामू‍र्लों में बंधकर कैसे चल सकती है? "
       फामू‍र्लाबद्ध आलोचना करने वाले आलोचकों की और लेखकों की भी इसलिये मार्कण्डेय भाई जमकर खिंचाई भी करते थे। वे कहते थे कि आज नयी कहानी नाम से प्रचारित अधिकांश रचनाएं भाव बोध के स्तर पर नवीनता से कोसों दूर है, और लेखक कहीं का ईंट, कहीं का पत्थर मिलाकर एक ऐसा घालमेल कर रहे हैं जिसमें नयी वास्तविकता अथवा युगबोध की तो बात ही दूर रही, शिल्प और चरित्रगत मनोविज्ञान की प्रारम्भिक समझ तक का अभाव है। कल्पना द्वारा निर्मित मानव चरित्रों को किसी भी सामाजिक परिवेश में रखकर लेखक अपने वर्णनों के बल पर पिछले दिनों जो भ्रमपूर्ण मनोविज्ञान की सृष्टि किया करते थे, उसी के प्रभाव में कई नये कहानी लेखक आज भी लिख रहे हैं।
       लेकिन मार्कण्डेय भाई के पास वह पारखी नजर थी जो अपने समसामयिक यथार्थ को सिर्फ‍ देखती ही नहीं थी बल्कि उस यथार्थ को भी पकड़ने की कोशिश करती थी कि वह बदल कहां रहा है, इस नये बदलते हुए आदमी की पहचान ही उनके साहित्य की विशिष्टता है। गुलरा के बाबा, वासवी की मां, हंसा जाई अकेला, बीच के लोग, गनेसी, प्रिया सैेनी जैसी उनकी कहानियां और अग्निबीज जैसा कालजयी उपन्यास मार्कण्डेय भाई की रचनाशीलता के उज्जवल हस्ताक्षर हैं।
     मार्कण्डेय भाई की एक कविता याद आ रही है जिसमें वे कहते हैं मेरे जैसे नवोदित कवि के पास/ किरण भी है/दृष्टि भी,/मालूम है अतापता उनका/ जो आंखे चुराते हैं,/ करते गुमराह है किरण को/ दूंगा मैं सुराग/ बताऊंगा सबको/ कहां क्या है, कैसे है, क्यों हैं।
     कहां क्या है, कैसे है, क्यों है इसकी असली थाह पाना ही एक लेखक के लिये सबसे बड़ी चुनौती है। मार्कण्डेय भाई कहते थे, ‘‘त्रिभुज के तीन कोणों पर लेखक की चेतना, पात्र की चेतना और उसका परिवेश तथा युगबोध जिसे तत्कालीन समाज की औसत सच्चाई की चेतना कह सकते हैं, बैठे हुए हैं। इन्हीं के पारस्परिक समवाय से नये जीवन की अधिकतम वास्तविकताओं का चित्रण संभव है।"
      मार्कण्डेय भाई ने इस पारस्परिक समवाय को बहुत अच्छी तरह साधा था। मुझे याद आती है वह टकराहट जब अरुण अग्निबीज की समीक्षा लिख रहा था। अरुण के अपने वैचारिक आग्रह थे, जो बारबार उससे कुछ और कहलवाना चाहते थे और हम उससे सहमत नहीं हो पा रहे थे। अरुण बेहद उलझन में था। ग्रामीण जीवन का परिवेश और उसमें जमीन का प्रश्न एक सिरे से अनुपस्थित! ऐसा कैसे हो सकता है। हम लोगों में, पूरे परिवार के स्तर पर तब  लगातार विचारमंथन चल रहा था। लेकिन अंतत: अरुण ने अग्निजबीज की जो समीक्षा लिखी, उसे देख कर यही लगा कि साहित्य के आकलन में विचार नहीं, जिंदगी का यथार्थ ही सबसे बड़ा मानदंड है और उस समीक्षा में विचारों की नहीं, सच की जीत हुई थी। 
      मार्कण्डेय भाई की विदाई अग्निबीजकी नायिका श्यामा के बेमेल विवाह के बाद उसकी विदाई के दृश्य की याद दिला रही है शोक का ऐसा उमड़ताउफनता सागर गांव में कभी किसी ने नहीं देखा था। ... आज यह गांव सूना हो गया, बेटी। आशा की वह अकेली किरण ही हमसे अलग हो रही है, जिसके उजाले में हम जी रहे थे।"श्यामा को विदा करते समय सिर्फ हम पाठक ही नही, खुद लेखक भी बहुत रोया होगा। आज मार्कण्डेय भाई की विदाई पर पूरा साहित्य जगत गमगीन है। अपने पीछे साहित्य सृजन और चेतना के जो अग्निबीज वे छोड़ गये हैं वे हमारी अमूल्य धरोहर है।


विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...