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सोमवार, 19 सितंबर 2016

कम्प्यूटर युग में हिन्दी

          

सरकार की आदत है वह कोई काम जलसे के बिना नहीं करती। सरकार की नजर प्रचार पर होती है वह जितना हिन्दीभाषा में काम करती है उससे ज्यादा ढोल पीटती है।
सवाल यह है दफ्तरी हिन्दी को प्रचार की जरूरत क्यों है ॽ जलसे की जरूरत क्यों है ॽ भाषा हमारे जीवन में रची-बसी होती है।अंग्रेजी पूरे शासनतंत्र में रची-बसी है,उसको कभी प्रचार की या हिन्दी दिवस की तरह अंग्रेजी दिवस मनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। भाषा को जब हम जलसे का अंग बनाते हैं तो राजनीतिक बनाते हैं।हिन्दी दिवस की सारी मुसीबत यहीं पर है।यही वह बिन्दु है जहां से भाषा और राजनीति का खेल शुरू होता है।भाषा में भाषा रहे,जन-जीवन रहे,लेकिन अब उलटा हो गया है। भाषा से जन-जीवन गायब होता जा रहा है।हम सबके जन-जीवन में हिन्दी भाषा धीरे धीरे गायब होती जा रही है,दैनंदिन लिखित आचरण से हिन्दी कम होती जा रही है।भाषा का लिखित आचरण से कम होना चिन्ता की बात है।हमारे लिखित आचरण में हिन्दी कैसे व्यापक स्थान घेरे यह हमने नहीं सोचा,उलटे हम यह सोच रहे हैं कि सरकारी कामकाज में हिन्दी कैसे जगह बनाए।यानी हम हिन्दी को दफ्तरी भाषा के रूप में देखना चाहते हैं !

हिन्दी सरकारी भाषा या दफ्तरी भाषा नहीं है। हिन्दी हमारी जीवनभाषा है,वैसे ही जैसे बंगला हमारी जीवनभाषा है।हम जिस संकट से गुजर रहे हैं ,बंगाली भी उसी संकट से गुजर रहे हैं।अंग्रेजी वाले भी संभवतः उसी संकट से गुजर रहे हैं।आज सभी भाषाएं संकटग्रस्त हैं।हमने विलक्षण खाँचे बनाए हुए हैं हम हिन्दी का दर्द तो महसूस करते हैं लेकिन बंगला का दर्द महसूस नहीं करते।भाषा और जीवन में अलगाव बढ़ा है।इसने समूचे समाज और व्यक्ति के जीवन में व्याप्त तनावों और टकरावों को और भी सघन बना दिया है।

इन दिनों हम सब अपनी -अपनी भाषा के दुखों में फंसे हुए हैं। यह सड़े हुए आदमी का दुख है।नकली दुख है।यह भाषाप्रेम नहीं ,भाषायी ढ़ोंग है।यह भाषायी पिछड़ापन है।इसके कारण हम समग्रता में भाषा के सामने उपस्थित संकट को देख ही नहीं पा रहे।हमारे लिए आज महत्वपूर्ण यह नहीं है कि भाषा और समाज का अलगाव कैसे दूर करें,हमारे लिए जरूरी हो गया है कि सरकारी भाषा की सूची में अपनी भाषा को कैसे बिठाएं।सरकारी भाषा का पद जीवन की भाषा के पद से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है और यही वह बुनियादी घटिया समझ है जिसने हमें अंधभाषा प्रेमी बना दिया है।हिन्दीवाला बना दिया है।यह भावबोध सबसे घटिया भावबोध है।यह भावबोध भाषा विशेष के श्रेष्ठत्व पर टिका है।हम जब हिन्दी को या किसी भी भाषा को सरकारी भाषा बनाने की बात करते हैं तो भाषाय़ी असमानता की हिमायत कर रहे होते हैं।हमारे लिए सभी भाषाएं और बोलियां समान हैं और सबके हक समान हैं।लेकिन हो उलटा रहा है।तेरी भाषा-मेरी भाषा के क्रम में हमने भाषायी विद्वेष को पाला-पोसा है।बेहतर यही होगा कि हम भाषायी विद्वेष से बाहर निकलें। जीवन में भाषाप्रेम पैदा करें।सभी भाषाओं और बोलियों को समान दर्जा दें।किसी भी भाषा की निंदा न करें,किसी भी भाषा के प्रति विद्वेष पैदा न करें।दुख की बात है हमने भाषा विद्वेष को अपनी संपदा बना लिया है,हम सारी जिन्दगी अंग्रेजी भाषा से विद्वेष करते हैं और अंग्रेजी का ही जीवन में आचरण करते हैं।हमने कभी सोचा नहीं कि विद्वेष के कारण भाषा समाज में आगे नहीं बढ़ी है। प्रतिस्पर्धा के आधार पर कोई भी भाषा अपना विकास नहीं कर सकती।

मेरे लिए हिन्दी जीवन की भाषा है।इसके बिना मैं जी नहीं सकता।मैं सब भाषाओं और बोलियों से वैसे ही प्यार करता हूँ जिस तरह हिन्दी से प्यार करता हूँ।हिन्दी मेरे लिए रोजी-रोटी की और विचारों की भाषा है।भाषा का संबंध आपके आचरण और लेखन से है।राजनीति से नहीं।भाषा में विचारधारा नहीं होती।भाषा किसी एक समुदाय,एक वर्ग,एक राष्ट्र की नहीं होती वह तो पूरे समाज की सृष्टि होती है।



जब बाजार में कम्प्यूटर आया तो मैंने सबसे पहले उसे खरीदा,संभवतःबहुत कम हिन्दी शिक्षक और हिन्दी अधिकारी थे जो उस समय कम्प्यूटर इस्तेमाल करते थे।मैंने कम्प्यूटर की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली।मैं कम्प्यूटर के तंत्र को नहीं जानता,लेकिन मैंने अभ्यास करके कम्प्यूटर पर लिखना सीखा ,अपनी लिखने की आदत बदली,कम्प्यूटर पर पढ़ने का अभ्यास डाला।कम्प्यूटर आने के बाद से मैंने कभी हाथ से नहीं लिखा,अधिकांश समय किताबें भी डिजिटल में ही पढ़ता हूँ।जब आरंभ में लिखना शुरू किया तो उस समय यूनीकोड फॉण्ट नहीं था,कृति फॉण्ट था,उसमें ही लिखता था।बाद में जब पहलीबार ब्लॉग बनाया तो पता चला कि इंटरनेट पर यूनीकोड फॉण्ट में ही लिख सकते हैं और फिर मंगल फॉण्ट लिया,फिर लिखने की आदत बदली,और आज मंगल ही मंगल है।कहने का आशय यह कि हिन्दी या किसी भी भाषा को विकसित होना है तो उसे लेखन के विकसित तंत्र का इस्तेमाल करना चाहिए। भाषा लेखन से बदलती है,समृद्ध होती है।भाषा बोलने मात्र से समृद्ध नहीं होती।

हमारे एक मित्र हैं ,प्रोफेसर हैं,जब भी कोई उनसे पूछता है भाईसाहब आपकी विचारधारा क्या है तुरंत कहते हैं हम तो मार्क्सवादी हैं! लेकिन ज्यों ही भाषा की समस्या पर सवाल दाग दो तो उनका मार्क्सवाद मुरझा जाता है! वे उस समय आरएसएस वालों की तरह हिन्दीवादी हो जाते हैं।मार्क्सवाद और संघी विचारधारा के इस खेल ने ही हिन्दी को कमजोर बनाया है।हिन्दी को कमजोर संवैधानिक भाषादृष्टि ने भी बनाया है।हम संविधान में अपनी भाषा के अलावा और किसी भाषा को देखना नहीं चाहते।हम भूल जाते हैं कि हिन्दी संविधान या राष्ट्रवाद या राष्ट्र की नहीं जनता की भाषा है।वह भाषायी मित्रता और समानता में जी रही है,संविधान में नहीं।





मित्रता के मायने

        एक जमाना था जब राजनीति देखकर मित्र बनाया जाता था।मित्रता की राजनीति पर बातें होती थीं,केदारनाथ अग्रवाल और रामविलास शर्मा के बीच का मित्र संवाद जगजाहिर है।

मित्रता में राजनीति की तलाश का दौर क्या अब खत्म हो गया है ?मुझे लगता है अब खत्म हो गया है,अब स्वार्थों की मित्रता रह गयी है।यह उत्तर शीतयुद्धीय मित्रता का दौर है।इसमें मित्रता नहीं स्वार्थ बड़ा है।

सबसे अच्छी मित्रता वह है जो अज्ञात से ज्ञात की ओर ले जाए,लेकिन इन दिनों बीमारी यह है कि मित्रता में हम ज्ञात से ज्ञात की ओर ही जाते हैं।इस क्रम में वर्षों दोस्त रहते हैं लेकिन एक-दूसरे से कुछ नहीं सीखते। इस तरह के मित्र अज्ञात से डरते हैं,अज्ञात सामने आता है तो नाराज हो जाते हैं,बुरा मान जाते हैं।मुक्तिबोध के शब्दों में कहें " यह तो अपनी ही कील पर अपने ही आसपास घूमते रहना है।यह अच्छा नहीं है।इसलिए अज्ञात से डरने की जरूरत नहीं है। "

मुक्तिबोध ने मित्रता की पेचीदगियों के समाधान के रूप में बहुत महत्वपूर्ण समाधान पेश किया है,मैं स्वयं भी मुक्तिबोध के समाधान का कायल रहा हूँ और इसका पालन करता रहा हूँ।

मुक्तिबोध के अनुसार- "हम अपने जीवन को एक-उपन्यास समझ लें,और हमारे जीवन में आनेवाले लोगों को केवल पात्र,तो ज्यादा युक्ति-युक्त होगा और हमारा जीवन भी अधिक रसमय हो जाएगा।"

सवाल यह उठता है मैं आज यह सब क्यों लिख रहा हूँ इसलिए कि आज की जिन्दगी में एक-दूसरे को लेकर जहर बहुत उगला जा रहा है,इस जहर से बचने का एकमात्र रास्ता है मुक्तिबोधीय समाधान।

हमारे जो मित्र साहित्य में सत्य खोज रहे हैं ,सत्य की कसौटी खोज रहे हैं,साहित्य की प्रासंगिकता के सवालों के उत्तर खोज रहे हैं,वे एकायामी नजरिए के शिकार हैं। सत्य की कसौटी साहित्य नहीं ,मनुष्य का जीवन है,उसका अन्तर्जगत है।

साहित्य में सत्य नहीं होता,सत्य का आभास होता है।इसी तरह जो मित्र साहित्य में प्रकाश ही प्रकाश खोज रहे हैं,वे भूल कर रहे हैं,साहित्य का प्रकाश सत्य से भिन्न होता है। इसी प्रसंग में मुक्तिबोध ने एक बहुत ही मार्के की बात कही है, "साहित्य पर आवश्यकता से अधिक भरोसा रखना मूर्खता है।"

मुक्तिबोध के अनुसार "आत्म-साक्षात्कार बहुत आसान है,स्वयं का चरित्र साक्षात्कार अत्यन्त कठिन है।" यहीं पर हमारी मित्रता की अनेक गुत्थियों के सवालों के उत्तर छिपे हैं।

अनेक मित्र मेरी तरह-तरह से आलोचना और विश्लेषण करते हैं,मैं उनकी बातों को आमतौर पर चुप सुन लेता हूँ ,बाद में सोचता हूँ,उसमें कोई बात ऐसी लगे जो मेरी कमजोरियों को सामने लाए तो तत्काल मान भी लेता हूँ।लेकिन मैं किसी भी मित्र के द्वारा किए गए व्यक्तित्व विश्लेषण को अंतिम मानने को तैयार नहीं हूँ।क्योंकि मैंने अपने को लगातार सुधारा है। लेकिन मुझे मुक्तिबोध की ही तरह स्वयं-कृत व्यक्तित्व विश्लेषण अविवेकपूर्ण लगता है।मौजूदा दौर उसी का है।

इस दौर में हमारे मित्र स्वयं-कृत व्यक्तित्व विश्लेषण को बड़ी निष्ठा और दृढ़ आस्था के साथ करते हैं।इस तरह के विश्लेषण को मुक्तिबोध ने अविवेकपूर्ण माना है।

मित्रता के लिए जरूरी है "मैं" भाव को न छोड़ें।अनेक मित्र हैं जो अपने स्वार्थ के लिए मुझे "मैं" भाव से दूर ले जाना चाहते हैं।इसके कारण अविवेकपूर्ण अधिकार भावना का भी प्रदर्शन करते हैं,इससे बचने की सलाह मुक्तिबोध देते हैं।नए दौर में मित्रता का मुहावरा सीखना हो तो मुक्तिबोध से सीखना चाहिए।

मित्रता में जब प्यार नाटकीय रूपों में व्यक्त होने लगे तो समझो मित्रता गयी पानी भरने ! मुक्तिबोध को घिन आती थी ऐसी मित्रता और इस तरह के मित्रों से ! इस तरह की मित्रता घरघोर आत्मबद्ध भाव की शिकार होती है।वह इल्जाजिक पर सवार होकर आती है।इस तरह की मित्रता तथाकथित "हृदय की गाथाओं" से गुजरकर हम तक आती है।इसमें अहंकार कूट-कूटकर भरा है।इसमें खास किस्म का मनोवैज्ञानिक स्वार्थ भी है।

मित्रता का नया पैमाना है आत्मरक्षा और उसके संबंध में अपनी दृढता के भावबोध का प्रदर्शन,मुक्तिबोध इसके गहरे आलोचक थे।

सबसे अच्छी दोस्त होती है माँ! दोस्त बनना है तो माँ जैसा त्याग और निस्वार्थ प्रेम पैदा करो।

सबसे अच्छा दोस्त वह जो एकांत दे!

सबसे अच्छा मित्र वह जो परेशान न करे !





रविवार, 7 अगस्त 2016

पुंसवाद का नया चेहरा और फेसबुक

        भारत में स्त्री पर लिखने वाली लेखिकाएं स्त्री के दुर्गुणों पर कम लिखती हैं,उसके दुखों पर ज्यादा लिखती हैं।यह सच है स्त्री के अनेक दुख हैं लेकिन इस मामले में हमें यूरोप की लेखिकाओं से जरूर सीखना चाहिए,वे स्त्री के दुख और व्यक्तित्व के नकारात्मक आचरण और मूल्यों को भी साथ में रखकर विश्लेषित करती हैं।जबकि हमारे यहां इकहरापन है,सिर्फ दुख है,उत्पीड़न है।हम कभी स्त्री के व्यक्तित्व की नकारात्मक चीजों की खुलकर मित्रवत आलोचना क्यों नहीं करते ?

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पुंसवादी गुलामी के नए स्त्री मंत्र हैं-दक्षता,पहल और समर्पण।

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हमारे देश में कितनी कंपनियां हैं जिनको कंपनी सैक्रेट्री चला रही हैं,कभी आपने कंपनी सचिवों की हड़ताल के बारे में सुना है ?क्या उनके कामकाज में सब कुछ ठीक चल रहा है ?यदि नहीं तो वे कभी सड़कों पर नारे लगाती नजर क्यों नहीं आतीं !!

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भारतीय समाज में नई औरतों में एक बड़ा वर्ग ऐसा सामने आया है जो कुछ इस तरह रहता है जैसे घर में फर्नीचर रहता है,वे घरेलू फर्नीचर की तरह शालीन और जरूरी वस्तु की तरह घर में रहती हैं।स्वामिभक्ति में इस तरह की औरतें बेमिसाल हैं।वे खुश रखने की कला में पारंगत हैं।

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इन दिनों एक ट्रेड चल रहा है सुंदर दिखो लेकिन उत्तेजक नहीं,यह भाव मूलतःकंपनी की निजी सचिव महोदया का है।दूसरा भाव है- दुर्गंधनाशक का प्रयोग करो।यह नए किस्म का पुंसवाद है जो औरतों के जेहन में उतारा जा रहा है।

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भारतीय राष्ट्र जिस तरह स्त्रियों को समान काम के लिए समान वेतन नहीं दे सकता,उसी तरह वह स्त्रियों को वित्तीय सामंतवाद से मुक्त नहीं कर सकता।वित्तीय सामंतवाद से मुक्ति के विकल्प खोजे जाएं। एक सुझाव यह है कि केन्द्र सरकार पतित्यक्ताओं के लिए राष्ट्रीय बीमा योजना शुरू करे।

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आधुनिक औरतों में एक वर्ग ऐसा है जो मर्दों के सभी काम कर लेना चाहता है,मर्दाना भाव धारण कर लेना चाहता है,स्त्री को मर्दाने भाव में ढालने के इस तरह के प्रयास स्त्री को और भी बर्बर और संवेदनहीन बना सकते हैं।समस्या यह नहीं है कि औरत को मर्दाने भाव दिए जाएं।हम तो यही चाहते हैं स्त्री को स्त्री और पुरूष को पुरूष रहने दो,इनकी विशिष्टताओं को बना रहने दो सिर्फ इन दोनों में से पुंसवाद की विदाई कर दो।पुंसवाद वस्तुतःसबसे बर्बर विचारधारा है जो मनुष्य को मनुष्यता को खा रही है।मनुष्य को पशु बना रही है।

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कम्प्यूटर संचालित समाज स्त्री की आक्रामकता बढ़ा देता है,यह पुंसवाद के पीड़ादायक बंधनों को नए सिरे से परिभाषित करता है।यह संभावना है कि जो स्त्री पुंसवाद के खतरों से बेखबर होकर कम्प्यूटर संचालित समाज में दाखिल होती है वह जल्दी ही गुलामी के दूसरे विकल्पों में बंध जाय।

गुलामी का सबसे विकृत रूप है असभ्यता के बंधनों को सहज और स्वाभाविक मान लेना।सवाल उठता है संचार क्रांति ने स्त्री को किस दिशा में ठेला है ,गुलामी की ओर या मुक्ति की ओर,हमारा मानना है इस समय प्रवाह गुलामी की ओर ठेल रहा है,बहुत कम संख्या में औरतें हैं जो पुंसवाद को जानकर सक्रिय हैं,अधिकतर तो तकनीकी प्रवाह में बह रही हैं।

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जर्मेन ग्रीयर ने लिखा है- "आशावाद और रूमानी भावनाओं से ओतप्रोत होकर विवाह और मातृत्व में प्रवेश करने वाली स्त्रियाँ ही अपनी हताशा के बारे में मुखर होती हैं।खुद में अपनी माँ की व्यामोहग्रस्त रूचि से सबसे ज्यादा परेशान उन्हीं के बच्चे होते हैं।"

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दूसरी ओर भारतीय समाज में बड़ी संख्या में ऐसी औरतें भी हैं जो पुरूष की शर्तों पर जी रही हैं,पुरूष के नजरिए से सोचती हैं,पुरूष के अनुकूल आचरण करती हैं,पुंसवाद और पुंसवादी हिंसाचार में हिस्सा लेती हैं,वे पुरूष की अनुगामिनी हैं,खोखली हैं और दासभाव से भरी हैं।

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भारतीय समाज धीरे धीरे बदल रहा है,आज ऐसी औरतों की संख्या बढ़ रही है जो अपनी शर्तों पर जी रही हैं और अपने फैसले स्वयं ले रही हैं और स्वयं को केन्द्र में रखकर सोचती हैं,यह एकदम भिन्न किस्म की नई औरत है,यह भारतीय पुंस परम्परा से भिन्न स्त्री है।

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बुधवार, 20 जुलाई 2016

फेसबुक सूक्तियाँ




नियमित अच्छी चीजों को पढ़ने की आदत होनी चाहिए।नियमित रीडिंग बेहतर इंसान बनाती है।

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मनुष्य के अंदर का खालीपन सिर्फ दो चीजों से भरा जा सकता है ,वह है प्रेम और त्याग ।

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जो धर्म भय पैदा करे वह धर्म नहीं है,धर्म वह है जो अभय दे।

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रामचरित मानस में रचित राम को एक ही चीज पसंद है प्रेम।प्रामाणिक प्रेम प्रसन्नता का जनक है।

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सत्य के लिए आक्रामकता नहीं त्याग और विनम्रता चाहिए।

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सत्य को धैर्य के बिना नहीं पा सकते।वह स्वाभाविक चीज है।

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सद्गुरू सबसे समर्थ वैद्य है।

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श्रद्धा का स्थान फेसबुक नहीं मनुष्य का हृदय है।

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मानव समाज में विचारों का दान श्रेष्ठ दान है।

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अभिभावक के बिना लड़का-लड़की की पहचान होती है,जब पहचान होती है तो फिर हर जगह अभिभावक का नाम क्यों लिखते हो,सीधे नाम लिखो पता लिखो,बंदे के बारे में विवरण लिखो,अभिभावक पिता होगा या माँ,इन दोनों के दबाव से व्यक्ति की पहचान को निकालना चाहिए।व्यक्ति को व्यक्ति की तरह देखो,वंशधर की तरह नहीं।

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ग़ज़ब का फिल्मीगेम है ये फ़िल्म में हीरो -हीरोइन दोनों होते हैं लेकिन खबर बनती है सलमान की फ़िल्म हिट! अमीर की फ़िल्म हिट! कभी अनुष्का का भी नाम ले लिया करो मीडियावालो।हीरोइन के बिना फ़िल्म नहीं बनती फिर प्रचार में हीरो का ही जयगान क्यों ?

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मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर ने व्यंग्य करते हुए कहा "आखिर शादी के लिए जितनी पूछ आईएएस, इंजीनियर, डॉक्टर आदि अन्य

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पेशों के युवकों की है उतनी पूछ वकीलों की क्यों नहीं है? ऐसा इसलिए है क्योंकि आईएएस, इंजीनियर और चिकित्सक बनना उतना आसान नहीं है लेकिन जो देखो वही वकील बन जाता है। शायद यही कारण है कि शादी के लिए वकीलों की पूछ नहीं होती है।’

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ठठेरेबाजी और नॉनसेंस भाषा को एमटीवी आदि टीवी चैनल ने रियलिटी शो का अनिवार्य अंग बनाकर रद्दी को मुनाफे में बदल दिया है। आज के युवाओं को इस तरह के रियलिटी शो की तू-तड़ाक की भाषा प्रभावित कर रही है।

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मैं गंभीर लोगों से डरता हूं।मुझे गंभीरता नहीं व्यंग्य पसंद है।

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आत्मा,परमात्मा,अन्तर्मन,अंतर्दृष्टि,परमपिता,परम तत्व,परम,अन्तरात्मा आदि पदबंध अप्रासंगिक हो गए हैं।

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मेरे लिए फेसबुक खेल है और खेल में सूरदास के अनुसार- खेलन में को काकों गुसईंया। यानी सब समान हैं।

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किसी भी कला का ज्ञान मनुष्य को बूढा नहीं होने देता।

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धर्म पुरानी जीवन संहिता है,संविधान नई जीवन संहिता है। तय करो किस ओर हो तुम।

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सही ज्ञान वह है जो मनुष्य को सही-गलत की पहचान कराए।

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तर्क में परास्त करना सबसे घटिया चीज है,इससे आनंद नष्ट होता है।सुंदर तर्क वह है जो संवाद में खींचे,संवाद खुला रखे।

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बौद्ध धर्म की सबसे बड़ी कमजोरी है उसकी पुनर्जन्म की धारणा में आस्था।

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अंतर्दृष्टि जैसी कोई चीज नहीं होती।

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महाभारत तो कुरूक्षेत्र के बिना लिखा गया।

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पवित्रता सबसे घटिया शब्द है,इसने सबसे ज्यादा पीड़ित किया है।

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मोक्ष का मतलब मरना नहीं है, मोक्ष का मतलब मोह रहित सावधानी से जीना है।

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जो धर्म मातहत भाव का प्रचार करे वह धर्म नहीं अधर्म है।

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जिस तरह दुख की कोई सीमा नहीं होती,उसी तरह सुख की भी कोई सीमा नहीं है।

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विवेकहीन भक्ति और प्रेम अंततःदुख देते हैं।

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भक्ति और प्रेम में विधि निषेध नहीं होते,बल्कि सभी किस्म के विधि निषेधों का अंत हो जाता है।

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दुनिया से विरक्ति पैदा कर दे वह गुरू नहीं बल्कि दुनिया को समझाए वह है गुरू।

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व्यक्ति के विकास के लिए एकांत जरूरी है।

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आधुनिक धार्मिक प्रचारक इन दिनों धर्म-चर्चा कम राजनीतिक और व्यापारिक चर्चाएं ज्यादा करते हैं।इनमें से अधिकांश के साथ कारपोरेट घरानों में से कोई न कोई बंदा काम कर रहा है।धर्म इन सबके कारण अधर्म में रूपान्तरित हो गया है।धर्म यदि धर्म का मार्ग छोड़कर अन्य मार्ग ग्रहण कर ले तो समझो धर्म का अंत हो गया .वह राजनीति बन गया।दिलचस्प बात यह है कि इन नए धर्म प्रचारकों को टीवी बहुत पसंद है,बिना टीवी के इनके विचारों का प्रसार नहीं होता।टीवी से धर्म का प्रचार धर्म को धर्म नहीं रहने देता,बल्कि राजनीतिक बनाता है।

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मेरे साइबर शत्रु

       कुछ दिन पहले एक पुराने शत्रु से मुलाकात हुई,देखते ही मैंने पूछा कैसे हो,गुस्से में बोले ठीक हूं,मैंने कहा कम से कम यह बात तो हंसकर कह दो,बोले तुम्हारी शक्ल देखते ही घृणा होती है,मैंने कहा शक्ल नहीं चरण देखो,घुटना देखो,शक्ल ही क्यों देखते हो ,बोले ,पता नहीं क्यों बार -बार तुम्हारे चेहरे पर ही नजर जाकर टिक जाती है,मैंने कहा तो मन लगाकर चेहरा देखो,बोले फेसबुक में यही करता रहता हूँ,तुम्हारी वॉल पर जाता हूँ और निहारता रहता हूँ,कुछ फोटो भी प्रिंट करा लिए हैं, मैं सब समय तुम्हारे बारे में बुरा सोचता हूँ लेकिन तुम्हारी शक्ल भूल नहीं पाता ,मैंने कहा चलो चाय पी लेते हैं,फिर बढ़िया पान खाते हैं,वे बोले तुम्हारे साथ अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा,तुम शैतान हो,कमीने हो,मैंने कहा सब सुनूँगा लेकिन यह बताओ क्या पीछे से फेसबुक फोटो को भी गालियां देते हो,बोले नहीं,वहां मेरी आवाज ही नहीं निकलती,बल्कि नींद आ जाती है।मैंने कहा तुम बहुत भले हो।आनंद लो फेसबुक में ही मिलते हैं,वहीं वर्चुअल चाय पिलाएंगे,एक कप तुम्हारा होगा और दूसरा कप हमारा होगा।

फेसबुक का मजा यह है कि इसमें दुश्मन को खोजकर पढ़ते हैं,दुश्मन की खबर रखते हैं,उसके विचारों को सहेजकर रखते हैं,जो बेगाने हैं ,वे बेगाने रहते हैं लेकिन मिलते हैं,छुपकर पढ़ते हैं,गजब मजा है,जिसकी शक्ल देखनी पसंद नहीं है उसकी वॉल पर रोज जा रहे हैं,जिसको गाली देते हैं,उसको रोज पढ़ रहे हैं।फेसबुक बंधनहीन आदत है।



मंगलवार, 12 जुलाई 2016

कश्मीर में बुरहान वानी कैसे बनता है !

            कश्मीर पर ठंडे दिमाग से सोचने की जरूरत है,उग्रभाषा,मैं-तुम में विभाजित करके देखने से बचें। इकतरफा प्रचार ,निहितस्वार्थ और झूठ से बचें। इससे तनाव में इजाफा हुआ है। समस्या यह है कि पुलिसबल या खुफियातंत्र किसी भी झूठी खबर पर कार्रवाई करके जब किसी निर्दोष को मार दे तब जनता क्या करे ॽ मारे गए निर्दोष व्यक्ति के रिश्तेदार क्या करें ॽ राज्य में इस तरह की प्रशासनिक संरचनाएं नहीं हैं जो इन शिकायतों पर ध्यान दें। आज भी कश्मीर में सैंकड़ों निर्दोष नौजवानों की मौत को लेकर संदेह है जिनको पुलिस ने आतंकवादी होने के संदेह में मार दिया। राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार तक,यहां तक कि अदालतों तक से इस तरह के लोगों को न तो न्याय मिला और न मुआवजा। मसलन्,हाल की हिंसा में मारे गए 31लोग कम से कम आतंकवादी नहीं हैं।इस तरह के कश्मीर में बड़ी संख्या में और भी लोग मारे गए हैं।

कश्मीर पर जब भी बात हो तो कश्मीर के नजरिए से हो,मानवीय नजरिए से हो।उस तरह की प्रशासनिक संरचनाओं का निर्माण किया जाय जहां पीड़ित लोग निर्भय होकर अपनी तकलीफों को कह सकें और उस पर राज्य प्रशासन गंभीरता से कार्रवाई करे।पिछले दिनों राज्य सरकार ने पत्थरबाजी की घटनाओं में शामिल युवाओं के ऊपर चल रहे मुकदमों के बारे में फैसला लिया था,यह एक सही फैसला था।इसी तरह अन्य केसों पर भी सहानुभूति के साथ विचार करके युवाओं पर चल रहे मुकदमे तुरंत खत्म करने की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है।वहां के युवा तेजी से सामाजिक विकास में सक्रिय भूमिका निभाएं और आतंकी समूहों से अलग रहें इसके लिए जरूरी है कि युवाओं को विभिन्न किस्म की विकास योजनाओं में शामिल करने के बारे में पहल की जाय ,सस्ते ब्याज पर नए कारोबार शुरू करने के लिए राष्ट्रीयकृत बैंकों से कर्ज मुहैय्या कराया जाय.

बुरहान वानी फिनोमिना से सबक लेने की जरूरत है। इन दिनों कश्मीर के युवाओं में आतंकी-पृथकतावादी संगठन हथियारों के जरिए नहीं विचारों और सामाजिकीकरण के जरिए स्वीकृति बनाने में लगे हैं।स्थानीय स्तर पर वे साइबर तकनीक और सामाजिक संबंधों के सहमेल के जरिए अपना जनाधार बना रहे हैं। दिलचस्प बात यह है पुलिस और सेना चप्पे -चप्पे पर लगी है लेकिन युवाओं में काम कर रहे आतंकी उनको नजर नहीं आ रहे। बुरहान वानी के चरित्र का चिन्ताजनक पहलू यह है कि वह हथियार से नहीं साइबर संपर्क के जरिए युवाओं को बांधे था। कश्मीर के युवाओं में लोकतांत्रिक आकांक्षाएं हैं और वे बड़े पैमाने पर उसे सोशलमीडिया आदि के जरिए व्यक्त कर रहे हैं,उनके स्थानीय स्तर पर समूह बने हुए हैं जो एक-दूसरे से जोड़ते हैं।कश्मीर के इन युवाओं का दिल जीतने के लिए आरएसएस मार्का साइबर प्रचार अपील नहीं कर सकता।उलटे उनके मन में भय-आशंका और अनास्था पैदा करता है। आरएसएस के लोग साइबर जगत में अपने साम्प्रदायिक लेखन के दूरगामी प्रभावों से अनजान हैं यह तो नहीं कह सकते।लेकिन उनके साइबर प्रचार अल्पसंख्यक,आदिवासी युवक आतंकित और चिन्तित हैं।मोदीजी कश्मीर को लेकर कितने फिक्रमंद हैं इसका अंदाजा उनके कश्मीर प्रचार से कर सकते हैं। मोदीजी के साइबर समूह की ओर से विगत दो सालों में कश्मीर के संदर्भ में कोई भी सकारात्मक प्रचार अभियान साइबर जगत में नहीं चलाया गया। इसके विपरीत आरएसएस के लोग बेगानों की तरह कश्मीर पर अ-यथार्थपरक टिप्पणियां करते रहते हैं,भाजपा और आरएसएस के जो लोग मीडिया से लेकर साइबर तक लिख रहे हैं वे जरा गंभीरता से सोचें कि बुरहान जैसा नौजवान स्थानीय स्तर पर साइबर के जरिए अपील बना लेता लेकिन मोदीजी या आरएसएस के किसी नेता की कश्मीर के युवाओं में कोई साइबर अपील नहीं है।जबकि सच यह है आरएसएस सबसे संगठित साइबर संगठन है।उसके प्रचार में कश्मीर कहीं पर भी नहीं है यदि चुनाव के मौके पर साइबर प्रचार नजर भी आया तो वह सिर्फ वोटों तक सीमित था।

इसके विपरीत बुरहान वानी ने मात्र साइबर प्रचार के जरिए अपने को युवाओं में जनप्रिय बना लिया,उसने स्थानीय स्तर पर इस तरह का संगठन खड़ा कर लिया जो उसके विचारों से सहमत युवाओं से भरा है ,यानी बिना बंदूक चलाए विचारों के जरिए उसने युवाओं को आतंकी संगठन के पीछे अपने सामान्य कम्युनिकेशन के जरिए जोड़ लिया। यह सच है बुरहान का आतंकी संगठन से संबंध था,मीडिया रिपोर्ट और स्थानीय पुलिस के बयान बताते हैं कि उसने कभी कोई एक्शन में भाग नहीं लिया,उसका नाम था,इसी बिना पर उसके ऊपर दस लाख का इनाम पुलिस ने घोषित कर दिया।



पहलीबार एक ऐसा आतंकी सामने आया है जिसने गोली नहीं चलाई लेकिन इलाके के लोगों का दिल जीत लिया,उसने बंदूक के भय के बिना,मात्र विचारों और संचार के जरिए अपने लिए स्थानीय जनता के दिलों में जगह बना ली।इससे हम साफ समझें कि विचारों की ताकत बंदूक की ताकत से ज्यादा प्रभावशाली होती है।यही वह बिंदु है जिसे समझने की जरूरत है। कश्मीर बदलने के लिए जरूरी है कश्मीर के बारे में पहले विचार बदलो।

शनिवार, 15 जनवरी 2011

साइबर हिन्दी की नई अनंत संभावनाएं

    हिन्दी की दुनिया तेजी से बदल रही है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के शब्दों में कहें तो हिन्दी अब नई चाल में ढ़ल रही है। नई चाल में हिन्दी कैसे ढ़ल रही है। इसके बारे में अभी हमने सोचना आरंभ नहीं किया है। हमें हिन्दी के बदले मानकीकरण को गौर से देखना चाहिए। हाल ही में भारत में ‘W3C ’ नामक कंपनी ने अपना मुख्यालय खोला है। इस कंपनी का काम होगा बेव पर भारत की संविधान स्वीकृत 22राजभाषाओं के मानकीकरण के काम की निगरानी करना। यह काम भारत सरकार के सूजचना तकनीकी विभाग के सहयोग से किया जाएगा।
     इसके पहले भारत सरकार ने आईसीएएनएन यानी ‘दि इंटरनेट कारपोरेशन फॉर एसाइननेम्स एंड नम्बर्स ’ में भारतीय भाषाओं में डोमेन नेम दर्ज करने का आनेदन किया है। भारत सरकार ने सात भाषाओं में डोमेन नेम दर्ज करने का अनुरोध किया है। ये भाषा हैं- हिन्दी,बांग्ला,पंजाबी,उर्दू,तमिल,तेलुगू और गुजराती। अभी स्थिति यह है कि हिन्दी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली तीसरे नम्बर की भाषा है। बांग्ला का आठवां स्थान है। लेकिन इंटरनेट पर इस्तेमाल होने वाली 10 सर्वोच्च भाषाओं में भारत की एक भी भाषा का नाम नहीं है।
     भाषावार स्थिति इस प्रकार है- अंग्रेजी 464 मिलियन,चीनी 321 मिलियन,स्पेनिस 131 मिलियन,जापानी 94 मिलियन ,फ्रेंच 74 मिलियन,पोर्तुगीज 73 मिलियन,जर्मन 65 मिलियन, अरबी 41 मिलियन ,रशियन 38 मिलियन और कोरियन भाषा  का 37 मिलियन यूजर इस्तेमाल करते हैं। कुल मिलाकर 10 भाषाओं के इंटरनेट पर 1,338 मिलियन यूजर हैं। बाकी भाषाओं के 259 मिलियन यूजर हैं। सारी दुनिया में 1,596 मिलियन भाषायी यूजर हैं।
    इसी तरह अनुवाद उद्योग पर नजर डालें तो वयापक असंतुलन नजर आएगा। सबसे ज्यादा जिन 20 भाषाओं की रचनाओं का अनुवाद हो रहा है ,वे हैं-अंग्रेजी,फ्रेंच,जर्मन, रशियन, इटालियन, स्पेनिश, स्वीडिश,लैटिन,डेनिश,डच,चेक,एनशिएंट ग्रीक,जापानी,पोलिश, हंगेरियन, अरबी,नॉर्वेजियन, पोर्तुगीज,हिब्रू, चीनी।
       इन भाषाओं का जिन भाषाओं में अनुवाद हो रहा है वे हैं जर्मन,स्पेनिश, फ्रेंच,जापानी, अंग्रेजी, डच, पोर्तुगीज,पोलिस,रशियन,डेनिश,इटालियन,चेक,हंगेरियन,फिनिस, नॉर्वेजियन, स्वीडिश, मॉडर्न ग्रीक,बल्गेरियन,कोरियन और स्लोवाक।
   भारतीय भाषाओं के नेट पर अवरूद्ध विकास के कुछ कारण हैं। मसलन अभी भारत में पीसी साक्षरों की संख्या मात्र 62 मिलियन यानी कुल शहरी आबादी का यह मात्र 26 प्रतिशत है। सर्वोच्च चार बड़े महानगरों में इंटरनेट 21प्रतिशत आबादी तक ही पहुँच पाया है। इसके बाद के चार महानगरों में 21 प्रतिशत आबादी तक पहुँच पाया है। नैर महानगरों में 23 प्रतिशत आबादी तक पहुँच पाया है। पांच से एक लाख की आबादी  वाले इलाकों में 16 प्रतिशत तक ही पहुँच पाया है।  5 लाख की आबादी वाले टाउन में मात्र 4 प्रतिशत तक ही इंटरनेट पहुँच पाया है। स्थानीय भाषा के प्रयोग के लिहाज से चीन,जापान और कोरिया सबसे ऊपर आते हैं। भारत में अधिकांश लोग जानते ही नहीं हैं कि स्थानीय भाषा में सॉफ्टवेयर कहां मिलता है।
    एक सर्वे के अनुसार भारत के महानगरों के 35 प्रतिशत इंटरनेट यूजर नहीं जानते कि ऑनलाइन भारतीय भाषाओं का सॉफ्टवेयर कहां पर मिलता है। गैर महानगरीय यूजरों में यह संख्या 53 प्रतिशत तक बढ़ गयी है।
   भारत में आमतौर पर रोमन लिपि में लिखने की आदत बढ़ती जा रही है। इस समस्या से भी भारतीय भाषाओं को जल्दी ही मुक्ति मिल जाएगी। ‘दि वर्ल्ड वाइड वेब कंसोर्टियम ने 7 सितम्बर 2010 को यह फैसला लिया है कि नेट पर एशिय़ाई भाषाओं के बहुभाषी स्पीच सिस्टम को आरंभ कर दिया जाएगा। इस सिलसिले में चीन,भारत और ग्रीस में वर्कशॉप भी हो चुकी हैं।
    इसी क्रम में भारत में ‘स्पीच सिंथेसिस मार्कप लैंग्वेज ( एसएसएमएल 1.1) की व्यवस्था लागू होने जा रही है। इसके तहत आवाज के नियंत्रण,उच्चारण,ध्वनि के वोल्यूम और स्तर को नियंत्रित किया जा सकेगा। इससे भाषा के सटीक उच्चारण को समझने में मदद मिलेगी।
       साइबर संस्कृति के संदर्भ में यदि एशिया को देखें तो व्यापक भाषायी असंतुलन नजर आएगा। यह माना जा रहा है कि आने वाले एक बिलियन से ज्यादा इंटरनेट यूजर एशियाइ देशों से आएंगे। लेकिन इंटरनेट पर इस इलाके की भाषाओं का कंटेंट बहुत कम है। इंटरनेट के सकल कंटेंट का मात्र 13.83 प्रतिशत ही एशियाई भाषाओं में है। यह सामग्री सिर्फ चीन,कोरिया और जापान जैसे विकसित देशों की है। इनके अलावा सभी एशियाई देशों का इंटरनेट पर सन् 2011 तक मात्र 0.03 प्रतिशत रहेगा। उम्मीद है कि एशियाई भाषाओं का ऑनलाइन कंटेंट बढ़कर 14.69 प्रतिशत हो जाएगा। अभी दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की भाषाओं का कंटेंट कुल मिलाकर 10 मिलियन पन्ने है। जबकि सारी दुनिया के नेट यूजरों में एशिया की संख्या 41.3प्रतिशत है। यह संख्या सन् 2012 तक बढ़कर 50 प्रतिशत हो जाएगी। इसके बाबजूद सच यह है कि एशिया में इंटरनेट की पहुँच मात्र 17.2 प्रतिशत तक ही हो पायी है। इसके विपरीत पश्चिम देशों में इंटरनेट का विकास सर्वोच्च स्तर तक पहुँच गया है। पश्चिमी देशों में 73.1 प्रतिशत आबादी इंटरनेट के दायरे में है। अब इन देशों में इंटरनेट के विकास की बहुत कम संभावनाएं बची हैं।        

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

साइबरकल्चर का एशियाई परिप्रेक्ष्य

            परवर्ती पूंजीवाद ने एशिया में विकास की नयी राजनीतिक संभावनाओं को खोला है। उसके कारण एशिया इस समय सबसे समर्थ आर्थिक शक्ति बन गया है। शीतयुद्ध की समाप्ति और संचार क्रांति ने विश्व की अर्थनीति में एशिया को ताकतवर बनाया है। एशिया आज जितना ताकतवर है वैसा ताकतवर वह कभी नहीं था। नयी परिस्थितियों में तीन बड़े परिवर्तन हुए हैं पहला परिवर्तन यह हुआ है कि चीन में समूचा वातावरण बदला है। बंदिशें कम हुई हैं। चीन के बदले हुए वातावरण ने एशिया में मासकल्चर को नई बुलंदियों पर पहुँचा दिया है और सामाजिक-आर्थिक विश्व शक्ति संतुलन को भी इसने प्रभावित किया है। मासकल्चर,संचार उद्योग और संस्कृति उद्योग के मालों का चीन आज सबसे बड़ा उत्पादक देश है । चीन में मजदूरों का शोषण बढ़ा है। मालों की खपत बढ़ी है।   
    एशियाई देशों की साझा समस्या है कारपोरेट लूट, पृथकतावाद और फंडामेंटलिज्म ।इन तीन विराट दैत्यों से कैसे संघर्ष करें ? मजेदार बात यह है कि जिस समय सारी दुनिया में समाजवाद और शीतयुद्ध से मुक्ति का मार्ग खोजा जा रहा था ठीक उसी समय जातीयताओं और अल्पसंख्यकों पर हमले तेज हुए हैं। जातीयसंकट गहरा हुआ है। इससे एशिया में लोकतंत्र का रास्ता क्षतिग्रस्त हुआ है। एशिया में लोकतांत्रिक प्रणाली को सबसे बड़ी चुनौती इसी दौर में दी गई । समाजवाद टूटा।खासकर सोवियत संघ और चीन में गैर समाजवादी मार्ग का अनुसरण किया गया। लंपट लोकतंत्र का उदय हुआ। अबाध कारपोरेट लूट के पूंजीवादी मार्ग का विकास हुआ।
    इसके अलावा देशज स्तर पर भाषायी असहिष्णुता कम हुई । दूसरी ओर भाषाओं के भूमंडलीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई। संचार क्रांति के अनेक नकारात्मक लक्षण हो सकते हैं लेकिन एक सकारात्मक लक्षण है भाषाओं का भूमंडलीकरण।
      भाषा के भूमंडलीकरण ने अस्मिता के समूचे विमर्श को,समाजवाद और शीतयुद्ध के दौर में बनी धारणाओं को गंभीर चुनौती दी और उन्हें नष्ट किया। फलतःआज भाषा विवाद की नहीं संवाद और संपर्क का माध्यम है।        
     रूस और चीन में घटित परिवर्तनों ने नव्य-उदारतावाद की दिशा ही गड़बड़ा दी है। जिस तरह समाजवादी सोवियत संघ के उदय ने पूंजीवाद के छंद को बेसुरा बनाया था और उन्हें कल्याणकारी राज्य के निर्माण की दिशा में जाने या समाजवाद अपनाने के लिए मजबूर किया था। ठीक वैसे ही चीन ने नव्य उदारतावाद को अपनाकर अमरीकी नव्य उदारतावाद को नई ऊँचाईयों पर पहुँचा दिया। सोवियत संघ जैसे सारी दुनिया को समाजवाद और कल्याणकारी राज्य का पाठ पढ़ाते पढ़ाते समाजवाद का पाठ भूल गया यहीदशा अमेरिका की हुई है। वह नव्य उदारतावाद का पाठ पढ़ाते हुए उसकी स्वयं की गाड़ी नव्य उदारतावाद की पटरी से उतर गयी है। समाजवाद के पराभव के समय अमेरिका ने सोवियत कम्युनिस्टों की मदद की. ठीक उसी तरह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने आर्थिकमंदी में अमेरिका की मदद की। आज बिडम्बना यह है कि समाजवाद रूस सेचला गया और नव्य उदारतावाद अमेरिका से जाने के लिए छटपटा रहा है।और चीन समाजवाद और नव्य उदारतावाद के बीच में फंसा हुआ लोकतंत्र की राह का यात्री बन चुका है। 
    इस क्रम में संस्कृति हाशिए पर चली गयी है और मासकल्चर ,फंडामेंटलिज्म और शरणार्थी समस्या सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने हैं। हिन्दी के संदर्भ में पहली बात यह कहनी है कि हिन्दी का प्रसार हुआ है लेकिन हिन्दी की शिक्षा का ह्रास हुआ है। संस्कृति के रूप अपनी स्वायत्त स्थिति खो चुके हैं। हिन्दी का मीडिया बड़ा हुआ है, कारपोरेट मीडिया बना है। संस्कृति उद्योग की ताकतवर भाषा के रूप में हिन्दी का विस्तार हुआ है।  दूसरी ओर हिन्दी में आलोचनात्मक स्पेस कम हुआ है।
    नयी सांस्कृतिक दुनिया सरकारी विनिमय शर्तों के परे जाकर काम कर रही है। खासकर उपग्रह टेलीविजन,विज्ञापन और इंटरनेट की यूनीकोड भाषा ने हिन्दी को ग्लोबल संचार भाषा बना दिया है। इससे हिन्दी का आंतरिक संसार बुनियादी तौर पर बदला है। संचार क्रांति ने सांस्कृतिक विनिमय को बढ़ाया है। संस्कृति के उपभोग को बढ़ाया है। संस्कृति के ग्लोबल बाजार का निर्माण किया है।
        एशियाई देशों में समस्याओं का एक छोर आंतरिक है और दूसरा ग्लोबल है। आंतरिक समस्याएं लोकतंत्र के अभाव और अवरूद्ध विकास से जुड़ी हैं। अवरूद्ध विकास में सहयोगी हैंअंधजातीयतावाद,पृथकतावाद और धार्मिक टकराव। बाहरी समस्याओं की जड़ें नव्य उदारतावाद और युद्ध से संबंधित हैं। इन दोनों ही किस्म की समस्याओं ने अस्थिरता और विस्थापन और शरणार्थी समस्या को जन्म दिया है। यही वह परिदृश्य है जिसमें एशिया में संचार क्रांति हुई है, ग्लोबल मीडिया उद्योग का विकास हुआ है। हिन्दी में साइबरकल्चर का जन्म हुआ है।
      साइबर युग में हिन्दी की दुनिया तेजी से बदली है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के शब्दों में कहें तो हिन्दी अब नई चाल में ढ़ल रही है। नई चाल में हिन्दी कैसे ढ़ल रही है। इसके बारे में अभी हमने सोचना आरंभ नहीं किया है। हमें हिन्दी के बदले मानकीकरण को गौर से देखना चाहिए। हाल ही में भारत में ‘W3C ’ नामक कंपनी ने अपना मुख्यालय खोला है। इस कंपनी का काम होगा वेब पर भारत की संविधान स्वीकृत 22 राजभाषाओं के मानकीकरण के काम की निगरानी करना। यह काम भारत सरकार के सूचना तकनीकी विभाग के सहयोग से होगा।
     इसके पहले भारत सरकार ने आईसीएएनएन यानी ‘दि इंटरनेट कारपोरेशन फॉर एसाइननेम्स एंड नम्बर्स ’ में भारतीय भाषाओं में डोमेन नेम दर्ज करने का आवेदन किया है। भारत सरकार ने सात भाषाओं में डोमेन नेम दर्ज करने का अनुरोध किया है। ये भाषा हैं- हिन्दी,बांग्ला,पंजाबी,उर्दू,तमिल,तेलुगू और गुजराती। अभी स्थिति यह है कि हिन्दी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली तीसरे नम्बर की भाषा है। बांग्ला का आठवां स्थान है। लेकिन इंटरनेट पर इस्तेमाल होने वाली 10 सर्वोच्च भाषाओं में भारत की एक भी भाषा का नाम नहीं है।
     भाषावार स्थिति इस प्रकार है- अंग्रेजी 464 मिलियन,चीनी 321 मिलियन,स्पेनिस 131 मिलियन,जापानी 94 मिलियन ,फ्रेंच 74 मिलियन,पोर्तुगीज 73 मिलियन,जर्मन 65 मिलियन, अरबी 41 मिलियन ,रशियन 38 मिलियन और कोरियन भाषा  का 37 मिलियन यूजर इस्तेमाल करते हैं। कुल मिलाकर 10 भाषाओं के इंटरनेट पर 1,338 मिलियन यूजर हैं। बाकी भाषाओं के 259 मिलियन यूजर हैं। सारी दुनिया में 1,596 मिलियन भाषायी यूजर हैं।
    इसी तरह अनुवाद उद्योग पर नजर डालें तो व्यापक असंतुलन नजर आएगा। सबसे ज्यादा जिन 20 भाषाओं की रचनाओं का अनुवाद हो रहा है ,वे हैं-अंग्रेजी,फ्रेंच,जर्मन, रशियन, इटालियन,स्पेनिश,स्वीडिश,लैटिन,डेनिश,डच,चेक,एनशिएंट ग्रीक,जापानी,पोलिश, हंगेरियन, अरबी,नॉर्वेजियन, पोर्तुगीज,हिब्रू, चीनी।
       इन भाषाओं का जिन भाषाओं में अनुवाद हो रहा है वे हैं जर्मन,स्पेनिश, फ्रेंच,जापानी,अंग्रेजी,डच,पोर्तुगीज,पोलिस,रशियन,डेनिश,इटालियन,चेक,हंगेरियन,फिनिस, नॉर्वेजियन, स्वीडिश,मॉडर्न ग्रीक,बल्गेरियन,कोरियन और स्लोवाक।
   भारतीय भाषाओं के नेट पर अवरूद्ध विकास के कुछ कारण हैं। मसलन अभी भारत में पीसी साक्षरों की संख्या मात्र 62 मिलियन यानी कुल शहरी आबादी का यह मात्र 26 प्रतिशत है। सर्वोच्च चार बड़े महानगरों में इंटरनेट 21प्रतिशत आबादी तक ही पहुँच पाया है। इसके बाद के चार महानगरों में 21 प्रतिशत आबादी तक पहुँच पाया है। गैर महानगरों में 23 प्रतिशत आबादी तक पहुँच पाया है। पांच से एक लाख की आबादी  वाले इलाकों में 16 प्रतिशत तक ही पहुँच पाया है।  5 लाख की आबादी वाले टाउन में मात्र 4 प्रतिशत तक ही इंटरनेट पहुँच पाया है। स्थानीय भाषा के प्रयोग के लिहाज से चीन,जापान और कोरिया सबसे ऊपर आते हैं। भारत में अधिकांश लोग जानते ही नहीं हैं कि स्थानीय भाषा में सॉफ्टवेयर कहां मिलता है।
    एक सर्वे के अनुसार भारत के महानगरों के 35 प्रतिशत इंटरनेट यूजर नहीं जानते कि ऑनलाइन भारतीय भाषाओं का सॉफ्टवेयर कहां पर मिलता है। गैर महानगरीय यूजरों में यह संख्या 53 प्रतिशत तक बढ़ गयी है।
   भारत में आमतौर पर रोमन लिपि में लिखने की आदत बढ़ती जा रही है। इस समस्या से भी भारतीय भाषाओं को जल्दी ही मुक्ति मिल जाएगी। ‘दि वर्ल्ड वाइड वेब कंसोर्टियम ने 7 सितम्बर 2010 को यह फैसला लिया है कि नेट पर एशिय़ाई भाषाओं के बहुभाषी स्पीच सिस्टम को आरंभ कर दिया जाएगा। इस सिलसिले में चीन,भारत और ग्रीस में वर्कशॉप भी हो चुकी है।
    इसी क्रम में भारत में ‘स्पीच सिंथेसिस मार्कप लैंग्वेज ( एसएसएमएल 1.1) की व्यवस्था लागू होने जा रही है। इसके तहत आवाज के नियंत्रण,उच्चारण,ध्वनि के वोल्यूम और स्तर को नियंत्रित किया जा सकेगा। इससे भाषा के सटीक उच्चारण को समझने में मदद मिलेगी।
       साइबर संस्कृति के संदर्भ में यदि एशिया को देखें तो व्यापक भाषायी असंतुलन नजर आएगा। यह माना जा रहा है कि आने वाले एक बिलियन से ज्यादा इंटरनेट यूजर एशियाइ देशों से आएंगे। लेकिन इंटरनेट पर इस इलाके की भाषाओं का कंटेंट बहुत कम है। इंटरनेट के सकल कंटेंट का मात्र 13.83 प्रतिशत ही एशियाई भाषाओं में है। यह सामग्री सिर्फ चीन,कोरिया और जापान जैसे विकसित देशों की है। इनके अलावा सभी एशियाई देशों का इंटरनेट पर सन् 2011 तक मात्र 0.03 प्रतिशत रहेगा। उम्मीद है कि एशियाई भाषाओं का ऑनलाइन कंटेंट बढ़कर 14.69 प्रतिशत हो जाएगा। अभी दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की भाषाओं का कंटेंट कुल मिलाकर 10 मिलियन पन्ने है। जबकि सारी दुनिया के नेट यूजरों में एशिया की संख्या 41.3प्रतिशत है। यह संख्या सन् 2012 तक बढ़कर 50 प्रतिशत हो जाएगी। इसके बाबजूद सच यह है कि एशिया में इंटरनेट की पहुँच मात्र 17.2 प्रतिशत तक ही हो पायी है। इसके विपरीत पश्चिम देशों में इंटरनेट का विकास सर्वोच्च स्तर तक पहुँच गया है। पश्चिमी देशों में 73.1 प्रतिशत आबादी इंटरनेट के दायरे में है। अब इन देशों में इंटरनेट के विकास की बहुत कम संभावनाएं बची हैं। यही वह परिदृश्य है जो हमें आगे बढ़ने और ज्यादा से ज्यादा ईसाक्षर बनाने का एहसास पैदा करता है।        

सोमवार, 1 नवंबर 2010

इंटरनेट का लक्ष्य है ग्लोबल कम्युनिकेशन

   मेरे प्रवक्ता डॉट कॉम पर प्रकाशित धारावाहिक लेखों से अनेक लोग परेशान हैं कि मैं इतना क्यों लिखता हूँ ? प्रवक्ता डॉट कॉम पर संजीव जी मेरे इतने लेख क्यों छापते हैं ? मेरे कॉमरेड दोस्त नाखुश हैं मैं संघ के व्यक्ति के द्वारा संचालित वेबसाइट पर क्यों लिखता हूँ ? प्रवक्ता के पन्नों पर संघ के पक्ष में सुंदर लेख रहते हैं और जिस तरह हिन्दुत्ववादी मेरे लेखों को प्रवक्ता पर देखकर नाराज हैं और संजीवजी को सवालों के घेरे में ले आए हैं,वैसे ही मेरे कुछ कम्युनिस्ट दोस्त भी भ्रमित हैं। कुछ लोगों को आपत्ति है कि मैं अपने लेखों पर उठाए गए सवालों के जबाब क्यों नहीं देता। इन सब सवालों को मिलाकर तीन सवाल बनते हैं इंटरनेट पर कैसे लिखें ? किस नजरिए से लिखें ? किसके लिए लिखते हैं ?
प्रवक्ता डॉट कॉम की विचारधारा क्या है ? यह वेब के परिप्रेक्ष्य में अप्रासंगिक प्रश्न है। प्रेस या अखबार या पत्रिका आदि के संदर्भ में माध्यम की विचारधारा,संचालक की विचारधारा,संपादक की विचारधारा आदि के सवाल प्रासंगिक हैं। कम्प्यूटर और उपग्रह क्रांति ने माध्यम से ही नहीं जीवन से लेकर राजनीति तक विचारधारा के तमाम सवालों को हाशिए पर ड़ाल दिया है।

सभी क्षेत्रों में फिसलन ही फिसलन है। आप कहीं पर भी पैर जमाकर खड़े नहीं हो सकते। आप किसी एक सवाल पर किसी एक राय पर कायम होकर खड़े नहीं रह सकते। खास किस्म का व्यवहारवाद हम सबके जीवन में आ गया है और जो व्यवहारवादी होने के लिए तैयार नहीं थे, जैसे मार्क्सवादी,हिन्दुत्ववादी,माओवादी,स्वयंसेवी अरूंधती राय, सोशलिस्ट, भाजपाई,कांग्रेसी,सभी रंगत के कम्युनिस्ट सभी को अपने विचारधारात्मक टैंट से बाहर आकर इस नई वास्तविकता का सामना करना पड़ रहा है कि वे जिन विचारों को प्राण से भी ज्यादा प्यार करते थे,उन्हीं विचारों को तिलांजलि देकर जनता के बीच में काम करने को मजबूर हैं।

हम सोच नहीं सकते थे कि भाजपा और संघ परिवार जिन मांगों को सबसे ज्यादा प्यार करते थे ,उन्हीं मांगों को सत्ता और राजनीति में मोर्चा बनाने के लिए हमेशा के लिए छोड़ देंगे। हम सोच नहीं सकते हैं कि एक जमाने में दोहरी सदस्यता के सवाल पर सोशलिस्टों ने जनता पार्टी की सरकार गिरा दी ,बाद में वे ही लोग भाजपा और संघ के दोस्त बन गए ।

कल तक माकपा का केरल में जिस मुस्लिम कट्टरपंथी दल से नापाक गठबंधन था उसे लोकसभा चुनाव के बाद उसने त्याग दिया और कांग्रेस ने हाल ही में सम्पन्न पंचायत और नगरपालिका चुनाव में उस दल को अपना लिया। यह नमूनाभर है विचारधारा की विदाई का।

इंटरनेट लोकतांत्रिक माध्यम है। यहां पर विचारधारा की भूमिका सिर्फ शब्दों तक सीमित है। इससे न तो पाठक प्रभावित होता है और न समाज प्रभावित होता है। यदि ऐसा ही होता तो अफगानिस्तान और इराक के संदर्भ में लाखों दस्तावेज जारी करने के बावजूद अमेरिका में युद्धापराधों के लिए जिम्मेदार राजनेताओं को कठघरे में खड़ा करने की मांग के लिए अमेरिका-ब्रिटेन आदि देशों में अभी तक एक भी प्रदर्शन क्यों नहीं हुआ ?

प्रेस के जमाने में इसी अमेरिका में वाटरगेट कांड ने राष्ट्रपति सिंहासन की चूलें हिला दी थीं। भारत में मात्र 62 करोड़ रूपये की बोफोर्स दलाली के सवाल पर केन्द्र सरकार गिर गयी थी और आज अरबों करोड़ रूपये के कॉमनवेल्थगेम भ्रष्टाचार के असंख्य प्रमाण आने के बाबजूद कहीं पर कोई चिन्ता की रेखा नजर नहीं आ रही है। कोई प्रतिवाद नहीं है,प्रधानमंत्री का इस्तीफा तक किसी ने नहीं मांगा है। प्रतिदिन बड़े-बड़े घोटाले आ रहे हैं और ठंड़े बस्ते में जा रहे हैं, कहीं पर भी उनसे किसी की सत्ता को कोई खतरा नहीं हो रहा है। इस सबका प्रधान कारण है भारत में बदला हुआ मीडिया पैराडाइम। यह असाधारण परिवर्तन है। इंटरनेट और कम्प्यूटर ने हमारी समूची जीवनप्रणाली, विचारधारा,सामाजिक संरचनाओं आदि को पूरी तरह प्रभावित किया है। हम सबको सूचना मात्र में रूपान्तरित कर दिया है।

इंटरनेट लोकतांत्रिक माध्यम है। यह विचारधारा के प्रचार का माध्यम नहीं है, यह छोटे-बड़े के भेद का माध्यम नहीं है। यह संपादक की तानाशाही की समाप्ति करने वाला माध्यम है। यह धर्म का माध्यम नहीं है। यह हिन्दुत्व,मार्क्सवाद,साम्यवाद,फासीवाद आदि के प्रचार का माध्यम नहीं है। यह सिर्फ संचार,संपर्क और संवाद का ग्लोबल माध्यम है। आप अपनी विचारधारा के खूब जोर से नगाड़े बजाएं कोई असर नहीं होगा। आप किसी को नंगा कर दें,कोई असर नहीं होगा। क्लिंटन-लॉबिंस्की सेक्सकांड का उद्धाटन वेब ने ही किया था लेकिन परिणाम क्या निकला ? क्लिंटन की कुर्सी बची रही।

नेट पर गाली दें, निंदा करें, गंभीर लिखें,फालतू लिखें,सब कुछ संचार में रूपान्तरित हो जाता है। नेट की समस्त सामग्री का संचार में समाहार वैसे ही हो रहा है जैसे कम्प्यूटर में इसके पहले के सभी माध्यमों का कनवर्जन हो गया है। अब हिन्दी में इसे लेखन कहते हैं। बहुत पहले फ्रांसीसी दार्शनिक ज्यॉक देरिदा ने इस पहलू की ओर ध्यान दिलाया था। अब न विधाएं हैं। न मीडिया है। न विचारधारा है। अब तो सिर्फ लेखन है और संचार है। अनेक लोगों को अभी यह बात समझ में नहीं आएगी क्योंकि हमारी सोचने की अनेक आदतें और समझ प्रेसक्रांति से निर्मित विचारों से बंधी हैं।

प्रवक्ता डॉट कॉम ने जब लोकतांत्रिक मंच बनाया तो उन्होंने इंटरनेट को माध्यम के रूप में सही पकड़ा। हमारे वामपंथी दलों के लोग इंटरनेट के लोकतांत्रिक और जनशिरकत वाले रूप को अभी तक समझ नहीं पाए हैं। वे अपनी वेबसाइट पर सिर्फ अपनी बातें लिखते हैं ,वहां विचारों का संचार नहीं होता बल्कि सिर्फ प्रचार होता है।

इंटरनेट प्रचार का नहीं संचार का माध्यम है। इसमें संचार बहुस्तरीय होता है, दुतरफा होता है। संचार के माध्यम के रूप में हम इंटरनेट के साथ कैसे रिश्ता बनाएं इसे सीख ही नहीं पाए हैं। हमारे बहुत सारे दोस्त इस भ्रम में हैं कि मैं वामपंथी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए लिखता हूँ। जी नहीं ,मैं विचारधारा के प्रचार के लिए नहीं लिखता। मैं तो सिर्फ लिखता हूँ। यह मात्र संचार है,कम्युनिकेशन है।संवाद है। अनौपचारिक वर्चुअल बातचीत है। यहां गाली,निंदा,घृणा,विचारधारा,दलीय राजनीति, गली मुहल्ले की तू-तू मैं मैं आदि के लिए कोई जगह नहीं है। यह शुद्ध संचार है और संचार के अलावा कुछ भी नहीं।

यहां सामने सिर्फ वर्चुअल शब्द होते हैं। कोई व्यक्ति नहीं होता । विचारधारा नहीं होती। अब हम तय करें कि शब्दों और संचार के साथ किस तरह का संबंध बनाना चाहते हैं। वर्चुअल पन्ने का प्रभाव तब तक ही रहता है जब तक वह आपके सामने खुला है। पन्ना बंद तो प्रभाव भी खत्म । यही वजह है कि इंटरनेट पर आप कुछ भी लिखिए सब कुछ वर्चुअल में विलीन हो जाएगा। यानी शब्द नश्वर है। यह मंत्र याद कर लेना होगा।

अगर मैं भर्तृहरि के ‘वाक्यपदीय’ ग्रंथ के हवाले से कहूँ तो अनुमान और तर्क की सहायता से ही हम शब्द का सम्पूर्ण अर्थ समझते हैं। पाणिनी ने भी लिखा था शब्दों का भी सम्यक ज्ञान तर्क की सहायता से ही हो सकता है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए भर्तृहरि ने लिखा सभी शब्दों के अर्थ का ज्ञान तर्क पर निर्भर है। तर्क की कभी सार्थकता होती है और कभी नहीं। उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बात कही थी, प्रत्यक्षज्ञान और शब्दज्ञान दोनों ही अस्थिर और अविश्वसनीय हैं।

लंबे अनुभव के बाद इंटरनेटयुग आने के बाद,वर्चुअल संस्कृति आने बाद सारी दुनिया को यह बोध हुआ कि प्रत्यक्षज्ञान और शब्दज्ञान दोनों ही अस्थिर और अविश्वसनीय हैं।

अब मैं मधुसूदन जी के कुछ सवालों के बारे में कहना चाहता हूँ।

मधुसूदन जी ने सवाल उठाया है ,‘‘चतुर्वेदी जी पाठकों के, प्रश्नों के उत्तर क्यों नहीं देते? कोई उत्तर है? कि अपने लेखों का नंबर बढाने में लगे होते हैं? या पाठक को नगण्य मानते हैं? क्या, यह पाठकों का अपमान करना चाहते हैं? कुछ कठोर सोद्देश्य कहा है।’’ बंधुवर, सवाल सही हों तो जबाब देना भी अच्छा लगता है। सवाल किया है-

‘‘आपने कभी कोई इस्लामी प्रथा की आलोचना की है? क्यों नहीं?’’ मधुसूदनजी आपकी मुश्किल यह है कि आप चाहते हैं कि मैं उन विषयों पर लिखूँ जो आप बताएं। यह कैसे हो सकता है। विषय का चयन लेखक करता है पाठक नहीं। आपको मेरे लेख पर लिखना चाहिए,उसमें व्यक्त विचारों पर राय देनी चाहिए। आपमें साहस है तो कहो कि आप मुसलमानों से घृणा करते हो। आपको स्वयं मुसलमानों की या इस्लामी प्रथा की आलोचना लिखने से किसने रोका है। आप समझदार आदमी हैं ,मेहनत करके इस्लामिक प्रथाओं पर लिखें ,हम भी पढ़ेंगे। आप इंतजार करें और देखें कि मुसलमानों के यहां सच क्या है ?



मधुसूदन जी का सवाल है- ‘‘दो अलग अलग लेखकों के "हृदय के आदेश" अगर मत भिन्नता के कारण एक दूसरे से विपरीत होकर Conflict करें, टकरा जाए, तो महान लेखक शोलोखोव उसे कैसे सुलझाते हैं ?’’ शोलोखोव यही चाहेंगे कि दोनों के ही विचार समाज में रहें। अन्तर्विरोधी विचार,अन्तर्विरोधीवर्ग आदि में न्यूनतम सामाजिक मान्यताओं के आधार पर सामंजस्य बना रहे । जैसे आप और हम में लोकतंत्र के न्यूनतम कार्यक्रम,नियम,कायदे कानून आदि के आधार पर सामंजस्य है।

मधुसूदन जी ने सवाल किया है ‘‘लेखक का कोई राष्ट्र नहीं होता, राष्ट्रवाद नहीं होता। धर्म नहीं होता। वह समूची मानवता का होता है और सत्य का पुजारी होता है। सत्य के अलावा वह कोई चीज स्वीकार नहीं करता। उसके अंदर *राष्ट्रप्रेम नहीं* सत्यप्रेम होता है। वह किसी का भोंपू नहीं होता वह महान रूसी लेखक शोलोखोव के शब्दों में हृदय के आदेश पर बोलता, सोचता और लिखता है।” ...

प्रश्न [क] क्या इस उद्धरण का उपयोग करके, सारे लेखकों को राष्ट्रद्रोह के लिए आप लायसेन्स देकर उकसा तो नहीं रहे हैं?’’ जी नहीं। लेखन राष्ट्रद्रोह नहीं होता है। वह क्या है ,इसके बारे में आपको कोई वकील अच्छी तरह समझा देगा,वैसे अरूंधती प्रकरण पर हाल में हल्ला मचाने वालों को केन्द्र सरकार ने समझा दिया है कि अरूंधती राय का बयान राष्ट्रद्रोह की केटेगरी में नहीं आता। अरे भाई आपने यह कैसा पाठ पढ़ा है कि कानून की किताब में लिखी बात को भी समझने में दिक्कत हो रही है !

उनका अगला सवाल है -‘‘[ग] मान लीजिए, कि, चतुर्वेदी जी भारत विरोधी और चीन के पक्षमें, लेख लिखकर भारत में क्रांति करवाएंगे, तो उन्हे एक लेखक होने के नाते { उन्हे ऐसा सत्य प्रतीत हो, तो,} ऐसा करने का पूरा अधिकार है? क्यों कि लेखक का कोई राष्ट्र नहीं होता, राष्ट्रवाद नहीं होता, ……. इत्यादि इत्यादि।’’

अरे भाई सोल्झेनित्सिन को भूल गए ? वह कहां पर रहकर सोवियत संघ के समाजवाद का विरोध कर रहा था ? वह जनतांत्रिक था । इसी तरह जर्मनी के अनेकों लेखकों ने हिटलर के फासीवाद का विदेश में रहकर जमकर विरोध किया था। उनका ऐसा करना मानवता की महान सेवा में गिना जाता है। भारत के राजा महेन्द्रप्रताप ने विदेश में रहकर भारत की सरकार बनायी थी,सैंकड़ों बुद्धिजीवियों ने विदेशों में रहकर,खासकर ब्रिटेन में रहकर ब्रिटिश शासकों की औपनिवेशिक शासन प्रणाली का विरोध किया था। फ्रांस की राज्य क्रांति से सारी दुनिया प्रभावित हुई है। उससे प्रेरणा लेने वालों में भारत भी है। ध्यान रहे फ्रांस की राज्य क्रांति हुई थी फ्रांस में ,लेकिन उसने सारी दुनिया के लेखकों और राजनेताओं को प्रभावित किया। लेखक कैसे प्रभावित थे,उसका एक ही उदाहरण दूँगा।

बायरन अंग्रेजी साहित्य के बड़े कवि हैं। जिस समय फ्रांस की राज्य क्रांति हुई थी उस समय इंग्लैंड में बादशाही चल रही थी। बायरन ने लिखा ‘‘ बादशाह नहीं ,मुझे प्रजातंत्र चाहिए। बादशाहों के दिन लद गए। खून पानी की तरह बहेगा और आंसू कुहासे की तरह झरेंगे। लेकिन जनता अंत में विजयी होगी। मैं यह सब देखने के लिए नहीं रहूँगा किन्तु भविष्य के गर्भ में मैं उसे देख रहा हूँ।’’

बायरन ने ही 1811 में ‘ द कर्स ऑफ मिनरवा’ नामक महान कविता लिखी थी। इस कविता से हमारे लेखक बहुत कुछ सीख सकते हैं। रामविलास शर्मा ने लिखा है मिनरवा नाम की देवी इंगलैंड के निवासियों को शाप देती है। अंग्रेजों को स्वाधीनता प्राप्त हुई है लेकिन वे अपनी स्वाधीनता का दुरूपयोग कर रहे हैं ,वे दूसरों को गुलाम बना रहे हैं ।जिन्हें वे गुलाम बना रहे हैं,वे एक दिन अवश्य विद्रोह करेंगे। और इन्हें अपने देश से निकाल बाहर करेंगे। मिनरवा अंग्रेजों से कहती हैः ‘ पूरब की तरफ देखो।गंगा के किनारे ये जो काले आदमी हैं,वे तुम्हारे अत्याचारी साम्राज्य को उसकी जड़ सहित हिला देंगे। देखो,वह विद्रोह अपना भयावना सिर उठा रहा है । और देशीजनों की मृत्यु का प्रतिशोध दहक रहा है। सिंधु नदी लाल रक्त की धारा जैसी बह रही है। उत्तर के निवासियों का रक्त वह माँगती रही है,वह बहुत पुरानी माँग अब पूरी हो रही है। इसी तरह तुम्हारा नाश हो। पैलास देवी ने जब तुम्हें स्वाधीन नागरिकों के अधिकार दिए थे,तब उसने निषेध किया था कि दूसरों को दास मत बनाना।’

इन पंक्तियों में बायरन ने अपने देश के शासकों का जमकर विरोध किया है और उनके विनाश की कामना की है। उनकी धारणा थी कि भारतवासी हमेशा गुलाम नहीं रहेंगे। वरन एक दिन प्रतिशोध लेंगे और अंग्रेजों की दासता से अपने को मुक्त करेंगे।

भारत में जो लोग क्रांति करना चाहते हैं वे बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के प्रति वचनवद्ध हैं। जनता के प्रति वचनवद्ध हैं। वे किसी देश,सरकार, राष्ट्रवाद आदि के प्रति वचनवद्ध नहीं हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि मधुसूदन जी थोड़ा स्वाध्याय करें और जो सवाल उन्हें सता रहे हैं उनके उत्तर जानने और लिखने की कोशिश करें। सवाल के नाम पर सवाल उठाना,ऐसे सवाल उठाना जो बुनियादी रूप से गलत हैं, बहस को सही दिशा देना नहीं है। यही वजह है कि मैं आपके और आपके जैसे बहुत सारे दोस्तों के सवालों के जबाब नहीं दे पाता। वे पढ़ने और ज्ञान अर्जित करने के लंबे काम को अपनी ईमेल मार्का टिप्पणियों से पूरा करना चाहते हैं। यदि सवाल उठते हैं तो थोड़ा विश्व साहित्य पढ़ें जबाब मिल जाएंगे।





























     

ईमेल संस्कृति के आरपार

   प्रवक्ता डॉट कॉम ने बहस चलाकर अच्छा काम किया है। मैं इधर-उधर की बातें न करके पहले सिर्फ उस फिनोमिना के बारे में कहना चाहता हूँ। जो पंकज और उनके जैसे लेखकों और युवाओं में घुस आया है। यह नव्य उदार संस्कृति का प्लास्टिक पोलीथीन फिनोमिना है। यह ईमेल संस्कृति है।  इसमें सारवान कुछ भी नहीं है।   
     ये एक व्यक्ति के विचार नहीं हैं बल्कि यह एक फिनोमिना है। एक प्रवृत्ति है। पहले मैं यही सोच रहा था कि पाठकों की राय पर प्रतिक्रिया नहीं दूँगा। लेकिन इधर कुछ असभ्यता ज्यादा हो रही है। इसलिए बोलना जरूरी है। मैं बहुत सोच समझकर लिख रहा हूँ कि पंकजजी ने अपने लेख में जो कुछ लिखा है और उनके पक्ष में जिस तरह की टिप्पणियां लोगों ने लिखी हैं। वे सबकी सब वेब संस्कृति के सभ्य विमर्श का हिस्सा नहीं बन सकतीं। हां,वे वेब संस्कृति के असभ्य विमर्श का हिस्सा जरूर हैं। जैसे पोर्नोग्राफी है। उन्हें व्यक्ति या व्यक्तियों की राय के रूप में न देखकर एक फिनोमिना के रूप में देखें तो बेहतर होगा। सवाल यह है वेब पर दीनदयाल उपाध्याय (विचार-विमर्श की परेपरा) के लेख हैं और पोर्नोग्राफी भी है,हम किस परंपरा में जाना चाहते हैं ?
      मेरी समस्या पंकजजी नहीं हैं। वह फिनोमिना है जिसकी वे अभिव्यक्ति कर रहे हैं। वह असभ्य भाषा है जिसकी वे अभिव्यक्ति कर रहे हैं। यह हिन्दी की इज्जत को मिट्टी में मिलाने वाली भाषा है। यह भाषा इस बात की द्योतक है कि हिन्दी का युवाओं में अपकर्ष हो रहा है। यह इस बात का भी संकेत है कि हिन्दी में ऐसे युवाओं का समूह  पैदा हो गया है जो विचारों में गंभीरता के साथ अवगाहन करने से भाग रहा है। वह विचार विमर्श को ईमेल कल्चर में तब्दील कर रहा है।
   विचार-विमर्श को ईमेल संस्कृति में तब्दील करने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती। ईमेल संस्कृति की विशेषता है पढ़ा और नष्ट किया। यही पोलिथीन प्लास्टिक फिनोमिना की विशेषता है। यह वेब विमर्श नहीं है।  यह ईमेल विमर्श है।  यह इस बात का प्रतीक है कि अभी हमारे युवाओं का एक हिस्सा वेबसंस्कृति के लायक सक्षम नहीं बन पाया है। ये लोग ईमेल संस्कृति और विमर्श संस्कृति में अंतर करना नहीं जानते। इसे हम इसे वेब असभ्यता कहते हैं।  
      कायदे से पंकजजी का लेख न छपता तो बेहतर था। फिर भी संपादक की उदारता है कि उसने इस लेख और इस पर आई टिप्पणियों को प्रकाशित किया। पंकजजी ने जिस भाषा और जिस अविवेक के साथ लिखा है उससे मेरी यह धारणा पुष्ट हुई है कि हिन्दी को अभी माध्यम साक्षरता की सख्त जरूरत है। मुझे समझ नहीं आता कि इतना पढ़ लिखकर पंकजजी ने क्या सीखा ? अज्ञान की पराकाष्ठा के कुछ नमूने उनके लेख से देखें- लिखा है-
‘‘किसी व्यक्ति की तारीफ़ या निंदा में किये गए लेखन सामान्यतः निकृष्ट श्रेणी का लेखन माना जाता है. लेकिन 2 दिन में ही अगर यह लेखक दुबारा ऐसा निकृष्ट काम करने को मजबूर हुआ है तो इसके निहितार्थ हैं. खैर’’
उनके लेखे, मेरा लेखन निकृष्ट श्रेणी का लेखन है। यह निकृष्ट काम है। अरे भाई,यह किस स्कूल में पढ़ी भाषा है। विचार-विमर्श की यह भाषा नहीं है। लेखन तो सिर्फ लेखन है वह निकृष्ट और उत्कृष्ट नहीं होता।  वे यह भी मानते हैं कि मैं अपने ‘‘कुतर्क थोपना’’ चाहता हूँ।जिससे असहमत हैं उसे कुतर्क कहना किस गुरू ने सिखाया है ? मैंने मुद्दे पर केन्द्रित लिखा है। उन्हें पूरा हक है कि वे किसी भी वामपंथ से संबंधित विषय पर प्रामाणिक ढ़ंग से आलोचना लिखें। पंकजजी नहीं जानते कि वे लेख नहीं लिखते, वे ईमेल लिखते हैं । ईमेल और लेख में अंतर होता है। यह विवेक उन्हें अर्जित करना होगा।
   मैं सोच-समझकर हिन्दुत्व और उससे विषयों पर ही नहीं अन्य सैंकड़ों विषयों पर अपनी पहलकदमी से लिखता रहा हूँ। उसका एक सैद्धांतिक आधार है। मैं अनेक बार उस आधार की अपने लेखों में चर्चा भी करता हूँ। जिससे पाठक उन किताबों तक पहुँचे। ईमेल फिनोमिना ने सबसे बुरा काम किया है विचारों और विचारकों का असभ्यों की तरह उपहास करके। मार्क्स,लुकाच, आदि किसी से भी असहमत हो सकते हैं,लेकिन उन्हें पढ़ें और फिर लिखें लेकिन वे बिना पढ़े ही लिख रहे हैं।
   मैं उनके लेख से सहज ही अनुमान लगा सकता हूँ कि वे प्रवक्ता के संसाधनों और मंच का दुरूपयोग कर रहे हैं और अपना पैसा भी बर्बाद कर रहे हैं। भारत की गरीब जनता का पैसा ,संजीवजी और उनके मित्रों के प्रयासों से चल रहे प्रवक्ता डॉट कॉम का स्पेस अनर्गल बातों के लिए घेरकर हम क्या अच्छा काम नहीं कर रहे ।
     वेबसाइट पर खर्चा आता है और इसका सभ्यता विमर्श,पाठकों की चेतना बढ़ाने,उन्हें समाज के प्रति और भी जागरूक बनाने लिए इस्तेमाल होना चाहिए। न कि ईमेल की बेबकूफियों के लिए। मैं जानता हूँ कि संजीवजी किस विचारधारा के हैं लेकिन क्या इसके लिए उनपर आरोप लगाना ठीक होगा ?
    जो अपना दायित्व समझते हैं वे थोड़ा ठंड़े दिमाग से सोचें कि क्या उन्होंने इतने दिनों में एक भी ऐसा लेख लिखा जो बाद में प्रवक्ता वाले अपने लिए संपत्ति समझें ? वे लगातार ईमेल लिखते रहे हैं और ईमेल पढ़ते ही बेकार हो जाता है,अनेक बार उसे लोग पढ़ते भी नहीं हैं। यही वजह है प्रवक्ता पर पंकजजी और ऐसे ही लोगों के विचार जिस क्षण आते हैं ,उसी क्षण मर जाते हैं। इस तरह वे अपनी और प्रवक्ता की बौद्धिक और आर्थिक क्षति कर रहे हैं।
     प्रवक्ता फोकट की कमाई से नहीं चलता। संजीव वगैरह किस तरह कष्ट करके उसके लिए संसाधन जुटाते होंगे,हम समझते हैं। प्रवक्ता या ऐसी ही अन्य वेब पत्रिकाओं के प्रति जो स्वैच्छिक प्रयासों से और सामाजिक तौर पर कुछ करने के इरादे से चलायी जा रही हैं उनका हमें बौद्धिक रूप से सही इस्तेमाल करना चाहिए। वेब पत्रिका कचरे का डिब्बा नहीं है कि उसमें कुछ भी फेंक दिया जाए। यह विचारों के आधान-प्रदान का गंभीर मंच है। उसे हमें ईमेल का मंच नहीं बनाना चाहिए। एक नमूना और देखें-  

‘‘गरीब के भूखे पेट को अपना उत्पाद बना कर बेचने वाले इन दुकानदारों को अपचय, उपचय और उपापचयपर बात करने के बदले सीधे थेसिस, एंटीथेसिस और सिंथेसिसतक पहुचते हुए देखा जा सकता है. क्रूर मजाक की पराकाष्ठा यह कि भूखे पेटको मार्क्स के उद्धरण बेच कर इनके एयर कंडीशनर का इंतज़ाम होता है. इन लोगों ने कोला और पेप्सी की तरह ही अपना उत्पाद बेचने का एक बिलकुल नया तरीका निकाला हुआ है. जिन-जिन कुकर्मों से खुद भरे हों, विपक्षी पर वही आरोप लगा उसे रक्षात्मक मुद्रा में ला दो. ताकि उसकी तमाम ऊर्जा आरोपों का जबाब देने में ही लग जाय. आक्रामक होकर वे इनकी गन्दगी को बाहर लाने का समय ही न सकें।’’
इस पूरे पैराग्राफ का मेरे प्रवक्ता पर प्रकाशित मेरे 200 से ज्यादा लेखों में से किसी से भी कोई लेना देना नहीं है। मैं नहीं जानता कि पंकजजी और उनके दोस्तों ने मेरी लिखी किताबें या मेरे ब्लॉग को गंभीरता से पढ़ा है या नहीं। वे आसानी से समझ सकते हैं कि मैं क्यों और किस नजरिए से लिखता हूँ।
    मैं आज भी यही मानता हूँ कि हिन्दी में अभी बहुत ज्यादा विविध किस्म के गंभीर विचारों के उत्पादन और पुनर्रूत्पादन की जरूरत है। हमें गंभीरता और छिछोरेपन में अंतर करना चाहिए। हमें तर्क और कुतर्क में अंतर करना चाहिए। विचारधारा और कॉमनसेंस में अंतर करने की तमीज विकसित करनी चाहिए। विद्वानों ,राजनेताओं आदि से लेखन में कैसे सम्मान के साथ संवाद करें इसके बारे में सीखना चाहिए। दुख के साथ कहना पड़ रहा है ईमेल फिनोमिना यह नहीं समझता,नहीं समझ सकता।   
     उनके कुतर्क का एक और नमूना देखें- ‘‘लेखक के विचारों को आप कानून की तराजू में रखकर तौलेंगे तो बांटे कम पड़ जाएंगे…..!अब आप सोचें….. फासीवाद का इससे भी बड़ा नमूना कोई हो सकता है? यह उसी तरह की धमकी है जब कोई आतंकवादी समूह कहता है कि मुझे गिरफ्तार करोगे तो जेल के कमरे कम पड जायेंगे।’’ वे समझ ही नहीं पाए हैं कि मैं लेखक की अभिव्यक्ति के विशाल दायरे से जुड़ा सवाल सामने रख रहा था और वे शैतानी भरे तर्क दे रहे हैं।
     पंकजजी की निकृष्टतम मानसिकता और ईमेल असभ्यता का नमूना है उनका यह कथन   ‘‘तो अगर पंडित जी की बात मान ली जाय तो देश रसातल में पहुचेगा ही साथ ही कुत्सित मानसिकता का परिवार से लेकर राष्ट्र तक में कोई आस्था नहीं रखने वाला हर वामपंथी, स्वयम्भू लेखक मस्तरामकी तरह बन बाप-बेटी, भाई-बहन तक में सम्‍बन्ध स्थापित करने वाला लेख लिख वैचारिक हस्तमैथुन कर मस्त रहेगा.’’।
    वे जानबूझकर इस तरह की घटिया भाषा लिख रहे हैं। इन पंक्तियों को देखकर कोई भी संपादक कैसे लेख प्रकाशित कर सकता है  ? कैसे कोई पाठक इन पंक्तियों के लिखे जाने के बाद पंकजजी को बधाईयां दे सकता है। पंकजजी जानते हैं उन्होंने यह क्या लिखा है-फिर से पढ़ें - ‘‘स्वयम्भू लेखक मस्तरामकी तरह बन बाप-बेटी, भाई-बहन तक में सम्‍बन्ध स्थापित करने वाला लेख लिख वैचारिक हस्तमैथुन कर मस्त रहेगा.’।
    यह वैचारिक स्तर सिर्फ ऐसे व्यक्ति का ही हो सकता है जिसने अपने को सभ्य न बनाया हो। जो ईमेल सभ्यता में कैदहो। वे जानते हैं वैचारिक हस्तमैथुन किसे कहते हैं ? उन्होंने कभी मेरी किताबें नहीं देखी हैं ? बाजार में उपलब्ध हैं और वे माध्यम साक्षर बनाने के लिए ही लिखी गयी हैं। अपमानजनक ,अश्लील भाषा में लिखकर ईमेल फिनोमिना ने मेरी धारणा को ही पुष्ट किया है कि अभी हिन्दी में सामान्य विचार-विमर्श बहुत पीछे है और इस दिशा में और भी ज्यादा लिखने की जरूरत है।
      पंकजजी की समस्या यह है कि प्रवक्ता वाले मेरे इतने लेख क्यों छापते हैं ? दिक्कत उनकी समझ में है। मैं लिखता हूँ इसलिए छापते हैं , उनकी संपादकीय नीति के दायरे में लिखता हूँ इसलिए छापते हैं।
    पंकजजी को आश्चर्य हो रहा है मेरे एक सप्ताह में एक दर्जन लेख प्रवक्ता पर देखकर। यदि वे मेरी एक साल में कभी-कभी आने वाली किताबों को देख लेंगे तो उनके हृदय की धड़कन बंद हो जाएगी। मैं एकमात्र लेखक हूँ जिसकी एक साथ नियमित कई किताबें आती रही हैं,मैं कभी खुशामद नहीं करता,मैं कभी सरकारी खरीद में किताब की बिक्री का प्रयास नहीं करता।मैंने कभी अपनी किताबों के पक्ष में आलोचनाएं नहीं लिखवायीं,इसके बावजूद वे बिकती हैं। मैं पंकजजी और उनके दोस्तों के ज्ञानवर्द्धन के लिए अपनी किताबों की एक सूची दे रहा हूँ। साथ में यह खबर भी कि ये किताबें महंगी हैं और बेहद सुंदर हैं। इन्हें एकबार पढ़ने के बाद आप कम से कम मीडिया में बहुत कुछ अनर्गल लिखना बंद कर देंगे।
    मैं यदि कोई विषय चुनता हूँ तो उस पर एक नहीं कई लेख लिखता हूँ जिससे उस विषय को ठोस ढ़ंग से विस्तार के साथ सामने रखा जाए पाठकों को उस पर सोचने के लिए मजबूर किया जाए। मैं लेखन के लिए लेखन नहीं करता बल्कि माध्यम साक्षरता के परिप्रेक्ष्य में लिखता हूँ। इसका मकसद है आलोचनात्मक विवेक पैदा करना। इसका मकसद किसी विचारधारा को थोपना नहीं है। इस प्रसंग की अन्य बातें अगले लेख में जरूर पढ़ें।
    अंत में एक बात प्रवक्ता से अनुरोध के रूप में कहनी है कि वे विषय पर केन्द्रित और सारवान लेख ही छापें,वे ईमेल और लेख में अंतर करें। अन्यथा उन्हें बार-बार पंकजजी जैसे फिनोमिना का सामना करना पड़ेगा। इससे प्रवक्ता की साख खराब होगी। प्रवक्ता का काम है आम पाठक की चेतना का स्तर ऊँचा उठाना। उसका काम यह नहीं है कि वह पाठक की चेतना के सबसे निचले धरातल पर ले चला जाए।
   हिन्दी का पाठक पहले से ही चेतना के सबसे निचले स्तर पर जी रहा है। इसे ईमेल संस्कृति ,फेसबुक की दो पंक्ति के लेखन की संस्कृति और ट्विटर की 140 अक्षरों की संस्कृति ने हवा दी है। यह व्यक्ति को असभ्यता के धरातल से बांधे रखती है। हमें इससे बचना चाहिए। लेखन ,मीडिया और कम्युनिकेशन का मकसद है व्यक्ति को चेतना के निचले स्तर से ऊपर उठाना,उसे जोड़ना। यह काम करने के लिए पाठक की चेतना के सबसे निचले स्तर पर जाने की जरूरत नहीं है। इससे प्रवक्ता का मूल लक्ष्य ही नष्ट हो जाएगा।    
प्रकाशित पुस्तकें
  1. दूरदर्शन और सामाजिक विकास,1991,डब्ल्यू न्यूमैन एंड कंपनी,कोलकाता.
  2. मार्क्सवाद और आधुनिक हिन्दी कविता,1994,राधा पब्लिकेशंस,दिल्ली
  3.आधुनिकतावाद और उत्तर आधुनिकतावाद,1994,सहलेखन, संस्कृति प्रकाशन ,कोलकाता
  4.जनमाध्यम और मासकल्चर, 1996,सारांश प्रकाशन दिल्ली.
  5.हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास की भूमिका,1997,अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर प्रा.लि. दिल्ली
  6.स्त्रीवादी साहित्य विमर्श ,2000,अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर प्रा.लि.दिल्ली
  7.सूचना समाज ,2000, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीग्यूटर प्रा.लि. दिल्ली.
  8.जनमाध्यम प्रौद्योगिकी और विचारधारा, 2000,अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर प्रा.लि.दिल्ली
  9.माध्यम साम्राज्यवाद ,2002,अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर प्रा.लि. दिल्ली
  10. जनमाध्यम सैध्दान्तिकी, 2002,सहलेखन, अनामिका पब्लिशर्स एड डिस्ट्रीब्यूटर प्रा.लि. दिल्ली
  11.टेलीविजन,संस्कृति और राजनीति, 2004,अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर. प्रा. लि. दिल्ली
  12.उत्तर आधुनिकतावाद ,2004,स्वराज प्रकाशन, दिल्ली.
  13.साम्प्रदायिकता,आतंकवाद और जनमाध्यम,,2005,अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर प्रा.लि.दिल्ली
  14.युध्द,ग्लोबल संस्कृति और मीडिया ,2005,अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर प्रा. लि.दिल्ली
  15.हाइपर टेक्स्ट,वर्चुअल रियलिटी और इंटरनेट ,2006,अनामिका पब्लिकेशंस एंड डिस्ट्रीब्यूटर प्रा.लि.
  16.कामुकता,पोर्नोग्राफी और स्त्रीवाद, 2007,(सहलेखन) आनंद प्रकाशन, कोलकाता.
  17.भूमंडलीकरण और ग्लोबल मीडिया,2007,(सहलेखन),अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर,प्रा.लि.दिल्ली
  18. नंदीग्राम मीडिया और भूमंडलीकरण ,2007, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर,प्रा.लि.दिल्ली
  19.प्राच्यवाद वर्चुअल रियलिटी और मीडिया,(शीघ्र प्रकाश्य),अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर,प्रा.लि. दिल्ली
  20.  वैकल्पिक मीडिया , लोकतंत्र और नॉम चोम्स्की (2008),अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर,प्रा.लि. दिल्ली
 21.तिब्बत दमन और मीडिया,2009, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर,प्रा.लि. दिल्ली
 22. 2009 लोकसभा चुनाव और मीडिया,अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर,प्रा.लि.  
      दिल्ली.
23.ओबामा और मीडिया,2009, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर,प्रा.लि. दिल्ली
24.डिजिटल युग में मासकल्चर और विज्ञापन, (2010),सहलेखन,अनामिका पब्लिशर्स एंड   
    डिस्ट्रीब्यूटर,प्रा.लि. दिल्ली .
 
    सम्पादित पुस्तकें
25.बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद,1991,डब्ल्यू न्यूमैन एंड कंपनी,कोलकाता.
26.प्रेमचंद और मार्क्सवादी आलोचना, सहसंपादन,1994,संस्कृति प्रकाशन,कोलकाता.
27.स्त्री अस्मिता,साहित्य और विचारधारा,सहसंपादन, 2004,आनंद प्रकाशन ,कोलकाता.
28.स्त्री काव्यधारा, सहसंपादन,2006,अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर प्रा.लि. दिल्ली.
29.स्वाधीनता-संग्राम,हिन्दी प्रेस और स्त्री का वैकल्पिक क्षेत्र,सहसंपादन, 2006, अनामिका प्रा.लि. दिल्ली 




मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

फेसबुक के खतरे और राजनीति

   हिन्दी में इंटरनेट पर जो कुछ भी लिखा जा रहा है उसमें अनेक मजेदार बातें सामने आ रही हैं। इंटरनेट पर ब्लॉग से लेकर फेसबुक पर लिखने वालों में उदारवादी नजरिए को लोग ज्यादा उदार ढ़ंग से पेश आ रहे हैं जबकि अनुदार लोगों की आक्रामकता और अनुदारभाव बढ़ गया है।वे और भी ज्यादा कंजरवेटिव होते जा रहे हैं।
    मैं जब भी उदार नजरिए से जब भी साम्प्रदायिक समस्या पर रोशनी ड़ालने की कोशिश करता हूँ तो पाता हूँ कि हठात मेरे ब्लॉग का नियमित पाठक नाराज है और उसके अंदर से हिन्दुत्ववादी विचार आक्रामक रूप में बाहर आने शुरू हो जाते हैं।
     मैंने यह भी देखा है कि उदार नजरिए से मोहल्ला लाइव जैसे वेबसाइट पर जब भी कोई मूल्यांकन या आलोचनात्मक टीका-टिप्पणी हुई है तो उस पर भी अनुदारपंथी नजरिया ही खुलकर सामने आया है।
    हिन्दुत्ववादी अथवा अतिवामपंथी नजरिए के नेट यूजर,साइबर लेखक पूरी कोशिश करते हैं कि किसी भी तरह उदारवादी नजरिए के साथ राजनीतिक एकजुटता तैयार न होने दी जाए।
     कायदे से देखें तो ब्लॉगलेखक डिजिटल शरणार्थी हैं। इनके साथ अनुदार विचार विमर्श करना सही नहीं है। ब्लॉग पर चलने वाली राजनीतिक बहसों के बारे में अभी यही कहा जा सकता है कि यह शैशव अवस्था में है। हिन्दी-अंग्रेजी दोनों में चलने वाली राजनीतिक बहसें राजनीतिक दलों को स्पर्श नहीं करतीं। जमीनी हकीकत पर उनका न्यूनतम असर भी नहीं होता।
    वास्तविकता है कि साहित्य संबंधी ब्लॉग पर लोग तुलनात्मक तौर पर ज्यादा नहीं जाते। कभी-कभार जाते हैं। प्रतिक्रियावादी विषयों के ब्लॉगों पर भीड़ ज्यादा होती है अथवा अतिवामपंथी विचारों के ब्लॉगों पर भीड़ ज्यादा होती है। ऐसे भी खिचड़ी ब्लॉग हैं जिन पर पर भीड़ ज्यादा होती है जैसे भडास ब्लॉग।
    दूसरी ओर फिल्मी समीक्षा या मीडिया की खबरों के ब्लॉग पर ज्यादा लोग जाते हैं। तुलनात्मक तौर पर भाजपा की वेबसाइट पर कांग्रेस की वेबसाइट से ज्यादा ट्रैफिक है। हिन्दी ब्लॉगिंग में वामपंथियों की नगण्य उपस्थिति है।  
    ब्लॉगिंग का प्रेस के साथ आदान-प्रदान बढ़ा है। विभिन्न अखबारों ने अपने ब्लॉग बनाए हैं। साथ ही वे ब्लॉगों में से चुनकर लेख वगैरह प्रकाशित करते रहते हैं। लेकिन मीडिया को प्रभावित करने की क्षमता अभी तक ब्लॉग अर्जित नहीं कर पाए हैं। नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता अभी पैदा नहीं कर पाए हैं। इसका प्रधान कारण है भारत के ज्यादातर बुद्धिजीवियों का डिजिटल लेखन से अलगाव। वे नेट पर नियमित लिखते ही नहीं हैं। यह बात दीगर है कि वे प्रिंट में भी नियमित नहीं लिखते।
    आज भी हिन्दी के अधिकांश लेखक-साहित्यकार-बुद्धिजीवी मीडिया लेखन को घटिया मानते हैं। पैसा कमाने का बुरा जरिया मानते हैं। वे एसएमएस तक खोलना नहीं जानते,ठीक से कभी ईमेल तक नहीं करते,इंटरनेट पर नियमित पढ़ना तो अभी बहुत दूर की बात है। जो इंटरनेट पर पढ़ता नहीं है वह लिखने में कितना पीछे होगा और जो इंटरनेट पर लिखता नहीं है वह डिजिटल मुद्दों पर विचार-विमर्श में कितना पीछे होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। मैं कम से कम अपने मास्टर होने के नाते यह कह सकता हूँ कि ज्यादातर कॉलेज और विश्वविद्यालय शिक्षक इंटरनेट पर नहीं जाते,न वे लाइब्रेरी जाते हैं। वे किताब की दुकान पर किताब खरीदने भी नहीं जाते। वे सीधे नौकरी करते हैं। नोट्स बना लेते हैं और उससे ही सारी जिंदगी काम चलाते हैं। शिक्षकों के द्वारा किताबों की व्यक्तिगत खरीद एकदम जीरो है। इक्का-दुक्का प्रोफेसर किताबें खरीदते हैं। वे मानते हैं कि जब बिना पढ़े ही काम चल रहा है तो पढ़ने की क्या जरूरत है। जब बिना पढ़े ही पगार मिल रही है तो फिर पढ़ने के लिए क्यों प्रयास किया जाए।
    सामान्य स्थिति यह है कि भाजपा को छोड़कर किसी भी पार्टी ने वेब को विगत लोकसभा चुनाव में गंभीरता से नहीं लिया। ज्यादातर उम्मीदवारों और दलों ने इस पर कोई भी पैसा खर्च नहीं किया। इससे यह भी पता चलता है कि हमारे देश में संचारक्रांति का अभी क-ख-ग भी नहीं लिखा गया है। हिन्दी में वेबसाइट वालों के पास संसाधनों का अभाव है। विज्ञापन नहीं हैं.पैसे नहीं हैं।
  सोशल नेटवर्क के बारे में चूंकि अभी राजनीतिक सचेतनता नहीं है इसलिए राजनीतिक दिक्कतें भी कम हैं ,लेकिन अमेरिका में राजनीतिज्ञों की दिक्कतें ज्यादा है। वे वेब के जरिए धन संग्रह करने पर जोर दे रहे हैं और बड़े पैमाने पर धन एकत्रित भी कर रहे हैं। वे सोशल नेटवर्क पर आने-जाने वालों की अभिरूचियों और राजनीतिक विचारों का गंभीरता के साथ अध्ययन कर रहे हैं और उसके अनुसार राजनीतिक रणनीतियां बना रहे हैं। विगत राष्ट्रपति चुनाव में अमेरिका के दोनों प्रधान राजनीतिक दलों ने वेब का जमकर इस्तेमाल किया था। सोशल वेबसाइट पर आने-जाने वालों की व्यक्तिगत चीजों को जानने के चक्कर में नागरिकों की प्राइवेसी का उल्लंघन भी किया गया।
    हाल ही में यह भी देखा गया है कि अमेरिकी प्रशासन सोशल नेटवर्क का गंभीरता के साथ इस्तेमाल कर रहा है। सीआईए और दूसरी गुप्तचर संस्थाएं नागरिकों की निगरानी कर रही हैं। इस काम के लिए सीआईए ने ‘ओपन सोर्स सेण्टर’ नामक संस्था का 2005 में गठन किया है और यह काम उसके जरिए किया जा रहा है। इसके जरिए वे ब्लॉग,वेबसाइट,टीवी कार्यक्रम,रेडियो प्रसारण आदि की निगरानी कर रहे हैं। इस सेंटर के मूल्यांकन आम लोगों के लिए उनकी वेबसाइट opensource.gov पर उपलब्ध हैं। इस पर वीडियो रिपोर्ट,इंटरनेट क्लिपिंग, अनुवाद,खास विषय का विश्लेषण आदि उपलब्ध है।
     इसके अलावा एफबीआई का अलग सिस्टम है जो इस क्षेत्र में काम कर रहा है। भारत में ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जहां सरकार ध्यान देती हो. उन गतिविधियों का मूल्यांकर करती हो जो इंटरनेट पर हो रही हैं। वह पूरी तरह अपने काम के लिए लगता है अमेरिकी संस्थाओं पर निर्भर है।
       एफबीआई ने अरिजोना विश्वविद्यालय  में ‘डार्क बेव’ प्रोजेक्ट खोला है। इसके जरिए उसने नेट पर आतंकी गतिविधियों की निगरानी की जा रही है।  वे इस प्रकल्प के जरिए इंटरनेट के उन अंधेरे कोनों की खोज करते रहते हैं जहां आतंकी छिपे हैं और अपनी गतिविधियों को नेट के जरिए संयोजित कर रहे हैं। वे इंटरनेट कंटेंट की निगरानी करने के अलावा गुमनाम लेखकों और टिप्पणीकारों पर भी नजर रखे हुए हैं।  इन लोगों ने Writeprint नामक प्रोग्राम बनाया है जो अनाम संदेशों और गुमनाम लोगों की छानबीन करता रहता है। उनकी प्रोफाइल तैयार करता रहता है।
     सोशल नेटवर्क के लिए सात कौन से खतरे हैं। उनके बारे में कारपोरेट परिप्रेक्ष्य में एलन लुस्टिंगर ( डायरेक्टर ऑफ इनफॉर्मेशन सिक्योरिटी फॉर गैन कैपीटल होल्डिंग) ने लिखा हैं। वे सात खतरे इस प्रकार है-
1. Searching social sites for company names yields partial company rosters, which is a start toward softening them up for social networking attacks.
2. Work e-mail addresses gleaned from social sites can provide valuable information. If the e-mail naming scheme (first initial followed by last name or first name, underscore, last name) is the same as the password scheme that undermines security. "You're halfway to breaking their user name and password," he says.
3. Information posted on social sites give clues for passwords to try – names of children, favorite food, sports teams, etc.
4. Phony contests advertised on social sites that request all sorts of data that could be used to reset passwords – where you went to school, name of your first pet, and your favorite uncle.
5. Shortened URLs commonly used on Twitter can lead to anywhere, and there are no clues in the shortened URLs themselves about where that might be.
6. Mining bulletin boards can produce news of IT job openings at specific companies. . Attackers could line up an interview, during which they gather details about the corporate network in the course of discussing the potential job and their experience with specific gear.
7. Google Latitude's use of GPS posts where you are right now, also revealing all the places you aren't. People seeking an excuse to be inside a corporate facility can use this to drop by and ask for an employee they know isn't there.
 लुस्टिंगर का मानना है कि सभी किस्म की सामाजिक धोखाधड़ी करने वाले इन दिनों फेसबुक आदि सोशल नेटवर्क पर आ रहे हैं और उनसे सावधान रहने की जरूरत है।










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