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सोमवार, 23 नवंबर 2009

छद्म मर्दानगी है समलैंगि‍कता



जब आप संस्कृति पैदा करते हैं तो वह सीधे अस्मिता को चुनौती देती है। यही वजह है कि समलैंगिक अपनी पहचान को उभारने की कोशिश करते हैं। पहचान को बनाने की कोशिश करते हैं। फूको इस बात से बहुत चिन्तित है कि इस संस्कृति को कोई व्यक्ति की आत्मा की मुक्ति के साथ जोड़कर पेश करे। फूको ने पुरूषों के समलैंगिक आन्दोलन को छद्म मर्दानगी की उप संस्कृति के रूप में व्याख्यायित किया है।
       ''छदम मर्दानगी गहरे अर्थ में हिंसा से जुड़ी है।वह  हिंसा ,आक्रामकता,मूर्खता से मुक्त करती है,  हम सब अच्छी तरह जानते हैं कि वे लोग जो कुछ कर रहे हैं ,वह आक्रामक नहीं है।वे अपने शरीर के विलक्षण अंगों के जरिए, शरीर को कामुक बनाते हुए नए किस्म के आनंद की संभावनाएं खोज रहे हैं। मै सोचता हँ यह एक तरह का सृजन है। सृजनात्मक कार्य व्यापार है। इसके लक्षणों में से एक लक्षण है आनंद का विकामुकीकरण... अपने शरीर का विभिन्न रूपात्मक आनंद के तौर पर इस्तेमाल महत्वपूर्ण चीज है। मसलन् यदि आप परंपरागत आनंद को देखें तो वहां पर शारीरिक आनंद,नशा,खाना, भोग आदि को आनंद की कोटि में रखा गया है। इससे हमारी शरीर और आनंद के बारे में सीमित समझ बनती है।''
     फूको कहता है कि सवाल मुक्तिकामी आनंद का नहीं है ,बल्कि सृजनात्मक आनंद का सवाल है,नयी पहचान बनाने का है। छद्म मर्दानगी उनमें से एक संभावना है। '' कोई कह सकता है कि यह पावर का कामुकीकरण है।बुनियादी संबंधों का कामुकीकरण है।... छद्म मर्दानगी एक मजेदार खेल है क्योंकि इसमें बुनियादी संबंध शामिल है ,यह हमेशा तरल रहता है।यह सच है कि इसमें भूमिकाएं हैं, किन्तु यह सब जानते हैं कि इसमें भूमिकाएं बदल सकती हैं,  कभी कभी दृश्य मालिक और गुलाम से शुरू होता है। किन्तु अंत में देखा गया कि गुलाम मालिक बन गया। अथवा जब भूमिकाएं स्थिर हो जाती हैंतब भी आप अच्छी तरह जानते हैं कि यह तो खेल है,  इसके नियमों में रूपान्तरण होता रहता है। अथवा यह भी देखा गया है कि समझौता हो गया है , घोषित और अघोषित तौर पर वे जानते हैं कि इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। यह बुनियादी खेल शारीरिक आनंद का रोचक स्रोत है।''
फूको का मानना है कि बुनियादी धारणा है कि कामुकता को कानून के सहारे नियंत्रित नहीं किया जा सकता। शरीर और आनंद की अर्थव्यवस्था अलग-अलग है। इसी प्रसंग में विलियम रीख की धारणा का जिक्र करना समीचीन होगा। रीख का मानना था कि  सामाजिक राजनीतिक सुधार बगैर कामुक मुक्ति के असंभव है। स्त्रतंत्रता और कामुक स्वास्थ्य एक ही चीज है।हम जब औरतों के लिए समान अधिकार की बात करें तो हमें बच्चों और तरूणों के कामुक अधिकारों के बारे में भी सोचना चाहिए।
      फूको ने 'बायो पावर' (शारीरिक शक्ति) को एक गतिशील तत्व के रूप में व्याख्यायित किया है। यह एक तरह से अनिवार्य श्रमशक्ति है। समाज में अनिवार्य श्रमशक्ति को जब प्रत्यक्ष नियंत्रण के बाहर ले जाते हैं तो कामुकता का अनंत क्षेत्रों में विस्तार होता है।फलत: कामुकता कम से कम प्रतिगामी बन जाती है। अन्तोनी गिदेन का मानना है कि 'वायो पावर' जैसी कोई चीज नहीं होती। आधुनिक सामाजिक संरचनाओं के विकास को फूको जिस तरह विश्लेषित करते हैं, हमें उस तरह विश्लेषित नहीं करना चाहिए। आधुनिक सामाजिक संरचनाओं और संस्थानों का प्रकृति के समाजीकरण और पुनरूत्पादन के साथ कोई सबंध नहीं है। बुनियादी प्रक्रियाएं प्रत्यक्षत: कामुकता से जुड़ी हैं। किन्तु उन्हें वैसे नहीं देखना चाहिए जैसे फूको देखता है। जहा तक आधुनिक काल में निगरानी का सवाल है , उसके बारे में फूको की धारणा से सहमत हुआ जा सकता है। गिदेन कहता है कि व्यक्तिगत जीवन के अनेक पहलुओं की तरह कामुकता को भी घेर लिया गया है। इसके बारे में सत्ता केन्द्रों के निर्देश भी हैं। आधुनिक संरचनाएं, जिसमें आधुनिक राज्य भी शामिल है, यह स्थानीय स्तर तक इस कदर घुस चुके हैं ,जिनको हमने पूर्व-आधुनिक संस्कृति में कभी नहीं देखा।
         पृथक्कृत प्रकृति और कामुकता जटिल रूप में पुनर्रूत्पादन के समाजीकरण से जुड़े हैं। कामुकता का तब तक स्वायत्त अस्तित्व संभव नहीं है जब तक वह कामुक व्यवहार से जुड़ी है। कामुक व्यवहार या कामुक गतिविधि प्रजनन से जुड़ी है। इसका पुनर्रूत्पादन और श्रृंगारी साहित्य या कला रूपों में वर्गीकरण किया गया है। इसके लस्वरूप औरत का शुध्द और अशुध्द में वर्गीकरण किया गया। अनुभव का पृथक्करण आधुनिकतावादी संस्थानों को परंपरा से अलग करता है। नियंत्रण के संस्थानों का व्यापक रूप में विकास का नैतिक और एथिकल मान्यताओं पर सीधा असर हुआ, पुनर्रूत्पादन पर असर हुआ। यह एक तरह का विनिमय है जो आधुनिक सामाजिक जीवन सुरक्षा के नाम पर करता है। इसी तरह हमें दमनात्मकता को देखना चाहिए , दमनात्मकता का अर्थ है 'भूल जाओ'  किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि आप कुण्ठा के बोझ में दब जाएं। शर्म के तंत्र को इसने आत्माभिव्यक्ति में बदल दिया। अकेले की शर्म को इसने प्रभावहीन बना दिया। अकेले का जीवन अर्थहीन या खोखला बना दिया। अकेला जीवन,एक शरीर ,अधूरा उपकरण बन गया।
       व्यक्ति जब आत्माभिव्यक्ति करता है तो अपने आन्तरिक संदर्भों को खोलता है।जिसमें जबर्दस्त ऊर्जा भरी हुई है। इसे व्यक्तिगत या सामूहिक व्यस्तता के रूपों में देख सकते हैं। इसके कारण कामुक क्षेत्र का बड़े पैमाने पर बदलाव हो जाता है। स्वायत्तता और प्रसन्नता पैदा होती है। आधुनिक संस्कृति पर विचार करते समय यह सवाल भी पैदा होता है कि आखिरकार कामुकता के प्रति इतना आग्रह क्यों है ? मार्कूज के अनुसार आधुनिक संस्कृति में वस्तुकरण का वर्चस्व है। इसके कारण कामुकता का वस्तुकरण हुआ है। कामुकता से आनंद और सिर्फ आनंद की सृष्टि होती है। अथवा हम यह कह सकते हैं कि वह आनंद का वायदा करती है।इससे पूंजीवादी समाज में मालों के लिए बाजार का रास्ता खुलता है। माल की बिक्री के संदर्भ  में कामुक इमेजों का व्यापक उपयोग किया जाता है और वे सब जगह नजर आती हैं। इस क्रम में सेक्स का वस्तुकरण होता है। इसका अर्थ है कि वह जनता का उसकी वास्तविक जरूरतों से ध्यान हटाता है। इस नजरिए से देखें तो कामुकता असल में पूंजीवादी व्यवस्था के उपकरण के रूप में दाखिल होती है। जो श्रम ,अनुशासन और आत्म-अस्वीकार पर निर्भर है। इसके कारण ही समाज में उपभोक्तावाद और पुंसवाद का प्रसार होता है। इस तरह के तर्क की सीमा यह है कि उससे इस बात का ज्ञान नहीं होता कि आखिरकार पूंजीवाद में कामुकता को इतनी महत्ता क्यों दी जाती है ,यदि उपभोक्तावाद का सेक्स शक्तिशाली संचालक शक्ति है तो इसका अर्थ यह भी है कि संचालक शक्ति के रूप में वह पहले से मौजूद है। इसके अनेक प्रमाण दिए जा सकते हैं कि कामुकता के प्रभाववश चिन्ताएं ,परेशानियां और तनाव पैदा होता है। उपभोक्तावादी समाज में कामुकता का आनंद अनेक अन्तर्विरोधी चीजों को जन्म देता है।
(  लेखक-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी,सुधा सिंह)
      



शनिवार, 1 अगस्त 2009

समलैंगि‍कता: ग्‍लोबल गुलाबी बाजार

समलैंगि‍कता गुलाबी है। समलैंगि‍कता के सवाल हठात् मीडि‍या चर्चा के केन्‍द्र में आ गए और लंबी चौडी तर्क पद्धति‍ के जरि‍ए इस समस्‍या के अनेक आयाम खोले गए हैं। समलैंगि‍कता के सामाजि‍क,शारीरि‍क और सांस्‍कृति‍क आयामों के अलावा उसका एक बाजार आयाम भी है जो अन्‍य सभी आयामों से ज्‍यादा ताकतवर और निर्णायक है। समलैंगि‍कता महज शारीरि‍क और मानसि‍क स्‍वतंत्रता की समस्‍या नहीं है,इसका भूमंडलीकरण की प्रक्रि‍या और बाजार के साथ गहरा संबंध है।

समलैंगि‍कता की नयी हवा भूमंडलीकरण के साथ आयी है। उसने पर्यटन और बाजार के आवरण में अपना वि‍कास कि‍या है। पश्‍चि‍मी पर्यटकों का भारत आकर्षक केन्‍द्र बने इसके लि‍ए जरूरी है कि‍ यहां वे तमाम आकर्षण की चीजें मुहैया करायी जाएं जो उन्‍हें लुभा सकें। उन तमाम चीजों में से एक है समलैंगि‍कता। दूसरा महत्‍वपूर्ण कारण है कि‍ भारतीय बाजार को अब समलैंगि‍कों के पिंक ब्रॉण्‍ड की जरूरत है। पिंक ब्रॉण्‍ड को हिंदी में गुलाबी कहते हैं। अंग्रेजों के भारत में आने के पहले से ही समलैंगि‍कों को खासकर समलैंगि‍क लड़कों को गुलाबी लौण्‍डा कहने का भारत में रि‍वाज रहा है। आगरा, दि‍ल्‍ली, मथुरा,हाथरस,अलीगढ,लखनÅ आदि‍ के गुलाबी गालों वाले लड़के समलैंगि‍कों के रूप में चर्चि‍त रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि‍ गुलाबी का समलैंगि‍कता के साथ पुराना संबंध है। इसमें दूसरा तत्‍व मर्दानगी का भी जुड़ता है।

सारी दुनि‍या में मानवाधि‍कारों का जहां हनन होता है, उन मानवाधि‍कारों के हनन में समलैंगि‍कता पर पाबंदी भी शामि‍ल है। सारी दुनि‍या में तकरीबन 80 देश हैं जहां समलैगिंता पर कानूनी पाबंदी है। पश्‍चि‍म पर्यटकों में एक हि‍स्‍सा गे पर्यटकों का भी है और यह बहुत बड़ा पर्यटन बाजार है। कोई भी सरकार इस बाजार की उपेक्षा नहीं कर सकती। अभी तक भारत में पर्यटन की दुनि‍या में समलैंगि‍कता की उपेक्षा होती रही है। अब यह संभव नहीं लगता कि‍ इस बाजार की पर्यटन उद्योग उपेक्षा कर पाएगा। बल्‍कि‍ यह कहना ज्‍यादा सही होगा कि‍ पर्यटन उद्योग की पैकेजिंग का समलैंगि‍कता अन्‍तर्गृथि‍त हि‍स्‍सा बन जाएगी।

समलैंगि‍कों,लेस्‍बि‍यनों आदि‍ को ध्‍यान में रखकर पर्यटन पैकेज और प्रचार अभि‍यान तेजी पकड़ेगा। सारी दुनि‍या का तजुर्बा है कि‍ गे और लेस्‍बि‍यन समुदाय में जो लोग आते हैं उनके पास पैसा काफी होता है, यह बात दीगर है कि‍ हमारे यहां अभी अमीर समलैंगि‍कों की संख्‍या ज्‍यादा नहीं है। लेकि‍न दुनि‍या के अन्‍य देशों के बारे में यह अनुभव है कि‍ समलैंगि‍क ज्‍यादा पैसे वाले होते हैं। ये लोग पर्यटन ज्‍यादा करते हैं। भारत के समलैंगि‍क पर्यटन कम करते हैं। मैं नि‍जी तौर पर ऐसे अनेक समलैंगि‍कों को जानता हूॅ जि‍न्‍होंने कभी भ्रमण ही नहीं कि‍या। समलैंगि‍कों के पास मकान ज्‍यादा होते हैं,कारें खूब होती हैं, वे घूमते भी ज्‍यादा हैं। उनकी इलैक्‍ट्रोनि‍क सामान खरीदने में ज्‍यादा दि‍लचस्‍पी होती है। वे अमूमन नयी लुभावनी वस्‍तु को तुरंत खरीदते हैं। गे और लेस्‍बि‍यन कुल मि‍लाकर बाजार के दस फीसदी ग्राहक हैं।

समलैंगि‍कों की बाजार खरीद वि‍शि‍ष्‍ट प्रस्‍तुति‍ पर टि‍की है। कि‍सी भी कंपनी को अपना माल यदि‍ इस समुदाय के लोगों को बेचना है तो इनके स्‍वभाव,मूल्‍यबोध, संवेदनशीलता और भावबोध का ख्‍याल रखना होता है। खासकर फैशन,ऑटोमोबाइल्‍स, मनोरंजन, पर्यटन,इलैक्‍ट्रोनि‍क्‍स,वस्‍त्र आदि‍ की मार्केटिंग में समलैंगि‍क मुहावरे के प्रयोग आने वाले दि‍नों में बढ़ने की संभावना है। चूंकि‍ हमने अमरीका के बाजार की अंधी नकल करनी शुरू कर दी है अत: समलैंगि‍क बाजार के अमरीकी तर्क और मर्म को भी हमारा बाजार जल्‍दी ही पकड़ने लगेगा।

अकेले अमरीका में समलैंगिंक व्‍यक्‍ति‍यों की खरीददारी का बाजार 660 बि‍लि‍यन डालर का है जि‍सके सन् 2011 तक 835 बि‍लि‍यन डालर हो जाने की संभावना है। सन् 2004 में फार्चुन पत्रि‍का में सूचीबद्ध 100 कंपनि‍यों में से 36 फीसदी कंपनि‍यों ने सीधे समलैंगि‍कों को सम्‍बोधि‍त करते हुए वि‍ज्ञापन बाजार में उतारे। वि‍ज्ञापनों का अधि‍कांश हि‍स्‍सा प्रेस पर खर्च कि‍या गया। तकरीबन 223.3मि‍लि‍यन डालर प्रेस वि‍ज्ञापनों पर खर्च कि‍या गया। जबकि‍ ऑन लाइन गे मीडि‍या पर 20 मि‍लि‍यन डालर खर्च कि‍या गया। इसके अति‍रि‍क्‍त वायकॉम के द्वारा संचालि‍त 'लोगो' गे नेटवर्क पर 20 मि‍लि‍यन डालर खर्च कि‍या गया।

अनेक कंपनि‍यां हैं जो सीधे समलैंगि‍कों के लि‍ए ही प्रचार करती हैं, इनमें प्रमुख हैं एमरो वर्ल्‍ड वाइड , मान ट्रेवल और गे कनाडा । इसके अलावा अमेरि‍की कंपनि‍यों में न्‍यू कंसल्‍टिंग,कम्‍युनि‍टी मार्केटिंग ,पिंक बनाना मीडि‍या के नाम प्रमुख हैं। इंटरनेशनल गे एंड लेस्‍बि‍यन ट्रेवल एसोशि‍एशन दुनि‍या की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी व्‍यापारि‍क संस्‍था है जो गे व्‍यापार के क्षेत्र में अग्रणी है। इसके अलावा 1200 वि‍भि‍न्‍न रंगत के सदस्‍य हैं जो वि‍भि‍न्‍न तरीकों से पर्यटन सेवाओं के माध्‍यम से गे मार्केट को सम्‍बोधि‍त करते हैं। वे जानते हैं कि‍ कौन से हौटल और कौन से रि‍सार्ट को वि‍शेष रूप से समलैंगि‍कों के लि‍ए तैयार कि‍या गया है।

दि‍ल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय के फैसले के बाद भारत में समलैंगि‍कों की संख्‍या में बेतहाशा वृद्धि‍ होने की संभावना है। अमरीकी,ब्रि‍टि‍श, फ्रांस, जर्मनी,बेल्‍जि‍यम,कनाडा और आस्‍ट्रेलि‍याई समलैंगि‍क उद्योग की इस पर गि‍द्ध दृष्‍टि‍ लगी है।

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