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बुधवार, 27 जुलाई 2016

नामवरजी अब खेलो ´अंत´का साहित्यखेल!

         नामवरजी के व्यक्तित्व के वैसे ही अनंत पहलू हैं जैसे किसी सामान्य व्यक्ति के होते हैं। अनंत पहलुओं में से व्यक्ति किसी भी दिशा में अपना विकास कर सकता है।नामवरजी का साहित्येतिहास और आलोचना में योगदान रहा है।वे कम से कम यह तो बता ही सकते हैं कि हिन्दी में आरएसएस और मोदीयुग का क्या योगदान है जिसके कारण उनके साथ जुड़ने की जरूरत आन पड़ी ॽ हम समझ सकते हैं हिन्दीसाहित्येतिहास में कांग्रेस,कम्युनिस्ट,समाजवादी,उदारतावाद,फोर्ड फाउंडेशन,नव्य़ आर्थिक उदारीकरण आदि विचारधाराओं का योगदान रहा है,इन विचारधाराओं ने किसी न किसी रूप में हिन्दी साहित्य और लेखकों को प्रभावित किया है, लेकिन आरएसएस का क्या योगदान है ॽ ऐसी कौनसी विपत्ति आन पड़ी कि दूसरी परंपरा को आरएसएस की मालाओं की जरूरत पड़ी! क्या दूसरी परंपरा का हिन्दुत्व से कोई संबंध बनता है ॽ यदि हां,तो कम से कम कुछ तो आपकी साहित्यिक टीम कल के आयोजन में रोशनी डालेगी !

नामवरजी आपको लेकर मुझे एक पुराना दार्शनिक रूपक याद आ रहा है।जंगल में जब पेड़ गिरता है तो वह शब्द जरूर करता है लेकिन उसके गिरने की ध्वनि को कोई नहीं सुनता।उसके गिरने की ध्वनि कोई अंतर पैदा नहीं करती।यही दशा आपकी है आप मोदी-आरएसएस की गोदी में गिरे तो हैं।समाज में आपका वैचारिक पतन तो हुआ है लेकिन हिन्दी साहित्य की प्रतिवादी परंपरा पर इसका कोई असर नहीं होने वाला।लेकिन यह सच है कि वृक्ष गिरा है।आरएसएस वाले सोच रहे हैं आपके और आपकी साहित्य टीम के उनके साथ चले जाने का साहित्य में बहुत बड़ा असर होगा ! लेकिन वे गलतफहमी में हैं।आप भी जानते हैं आरएसएस की विचारधारा सर्जनात्मकता विरोधी बर्बर विचारधारा है।बांझ विचारधारा है। वे लोग अब तक साहित्य पर कोई असर नहीं छोड़ पाए,वे लोग आज तक बेहतरीन रचनाकार पैदा नहीं कर पाए।ऐसी बांझ अवस्था में आपके जरिए हिन्दू साहित्य की परंपरा का विकास कैसे होगा यह देखना बाकी है !

नामवरजी हम यह नहीं मानते कि आपके आरएसएस के खेमे में जाने का कोई असर नहीं होगा।जंगल में वृक्ष के गिरने से एक परिवर्तन जरूर हुआ है।इसने जंगल का नक्शा बिगाड़ दिया है। प्रगतिशील साहित्य की शक्ल बिगाड़ दी है।यह वह शक्ल है जिसको बनाने में एक जमाने में आपकी और आपकी साहित्यटीम की भूमिका रही है।आपके इस एक कदम ने प्रगतिशील लेखकों के सामने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं ,उनकी भूमिका को सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है।हम जानते थे मोदी सरकार आने के बाद आपकी टीम को असुविधा होगी,सत्ता के भत्तों और संरक्षण पर आपकी टीम का समूचा कारोबार चलता रहा है।मैंने समय-समय पर उसकी तीखी आलोचना भी लिखी है।लेकिन आपकी टीम तो महान साहित्य टीम है, उसमें महान मार्क्सवादी आलोचक हैं,ये ऐसे आलोचक हैं जो किसी की आलोचना पर ध्यान ही नहीं देते।यही इसबार भी हुआ।मैंने फेसबुक पर कई बार आने वाले संकट की ओर संकेत भी किया था,लेकिन लोगों ने मेरी बात को गंभीरता से नहीं लिया,मैं जानता हूँ आपने साहित्य का परिदृश्य इतना गंदा ,भ्रष्ट और विचारधाराहीन बना दिया है कि अब लेखक का मूल्यांकन ही बंद हो गया है। अब लेखक के लिए संपर्क-संबंध और सत्ता के कनेक्शन मुख्य हो गए हैं,इस परंपरा को निर्मित करने में नामवरजी आपकी निश्चित तौर पर निर्णायक भूमिका रही है। पहले लेखक के सामान्य से वैचारिक विचलन पर बहस होती थी,लेखक संगठनों के बयान आते थे, लेकिन आज परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है,नामवरजी और उनकी साहित्यटीम पूरी तरह मोदीमंडली में शामिल हो चुकी है लेकिन लेखक संगठनों का कोई बयान तक नहीं आया है,लेखकों की ओर से कोई प्रतिवाद नहीं है।

नामवरजी आपका मोदी की गोद में जाना सामान्य घटना नहीं है।यह युगांतरकारी घटना है।इसने हिन्दी साहित्येतिहास की दिशा बदल दी है। साहित्येतिहास अपनी दिशा तब बदलता है जब वह अपने लक्ष्य बदलता है।नामवरजीने इसी संदर्भ में साहित्य की भूमिका,लेखक की भूमिका आदि को बुनियादी तौर पर आपने बदलकर रख दिया है।



नामवरजी और उनकी साहित्य टीम के आलोचक हिन्दी के मंचों पर आएदिन ´अंत´ पदबंध की खिल्ली उड़ाते थे।लेकिन इस टीम ने ही ´अंत ´को साकार कर दिया।नामवरजी का मोदी की गोदी में जाना ´साहित्य का अंत´है।´विचारधारा का अंत ´है। यह उस भ्रम का भी अंत है कि ये लोग अंत के विरोधी हैं।नामवरजी अब खेलो अपने हाथों ´अंत´का साहित्यखेल!

शनिवार, 14 मई 2016

कीर्तन ,संस्कृति और राजनीति


       
कीर्तन-भजन हमारा समाज कब से कर रहा है यह ठीक-ठीक बताना मुश्किल है।भजन के लिए पवित्र मंत्र चाहिए।जबकि कीर्तन के लिए संगीत और लय चाहिए।भजन अकेले की साधना है ,जबकि कीर्तन सामूहिक आनंद है।कीर्तन बुनियादी तौर पर शास्त्रीय संगीत का विकल्प है।शास्त्रीय संगीत में गायक प्रमुख है। जबकि कीर्तन एकल नहीं सामूहिक होता है।शास्त्रीय संगीत में गायक-श्रोता आमने-सामने होते हैं। उनमें विभाजन या अंतराल बना रहता है।जबकि कीर्तन में श्रोता की भिन्न स्थिति नहीं होती।बल्कि कीर्तन में वह शामिल होता है।गायक-श्रोता का वर्गीकरण कीर्तन के लिए बेमानी है।

शब्द का अपना इतिहास होता है,मंशा होती है और उससे जुड़ी राजनीति भी होती है।मजदूरों की बस्ती में जब कीर्तन होता है तो उसका लक्ष्य वही नहीं रहता जो मन्दिर में होने वाले कीर्तन का है।कईबार दंगों के पहले कीर्तन का आयोजन करके दंगों के लिए माहौलबनाया गया है।अपराधी लोग अपने को पुण्यात्मा के रूप में स्वीकृति दिलाने के लिए कीर्तन कराते हैं।इस नजरिए से देखें तो कीर्तन का अर्थ संदर्भ और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।फलतःकीर्तन भिन्न भिन्न परिस्थितियों में भिन्न अर्थ की सृष्टि करता है।नए विमर्शों को जन्म देता है।

हिन्दीभाषी क्षेत्रों से लेकर पश्चिम बंगाल और उत्तरपूर्व के राज्यों तक कीर्तन के अनेक रूप प्रचलन में हैं।कीर्तन की विशेषता है किसी मंत्र विशेष का संकीर्तन।जैसे-हरे राम हरे राम ,राम राम हरे हरे,हरे कृष्णा हरे कृष्णा,कृष्णा-कृष्णा हरे हरे।यह वैष्णव सम्प्रदाय का जनप्रिय कीर्तन है।इन दिनों इस कीर्तन में पश्चिम और पूर्व का सम्मिश्रण खूब हो रहा है।हरे राम हरे कृष्णा सम्प्रदाय से लेकर श्रीश्री रविशंकर आदि तमाम धार्मिक गुरूओं के यहां कीर्तन के सम्मिश्रित रूपों को आसानी से देखा जा सकता है। कीर्तन में मंत्र,शरीर, और संगीत लय इस कदर गुंथे होते हैं कि उनसे निकलकर सोचना असंभव होता है।



कीर्तन में नाद का आनंद और उन्माद अंतर्ग्रथित है।अंतमें शिरकत करने वाले के पास कीर्तन की स्मृति मात्र रह जाती है।कीर्तन ने संगीत प्रस्तुति के प्रभुत्वशाली रूपों को चुनौती दी है और शिरकत के भावबोध को जन्म दिया है। कीर्तन में हर कोई शिरकत कर सकता है।इस अर्थ में कीर्तन सेकुलर है। प्रिफॉर्मर और श्रोता के बीच के भेद को कीर्तन खत्म कर देता है।कीर्तन में हर कोई अपनी लय,भाव,भाषा और भंगिमा के साथ शिरकत करता है।कीर्तन में कोई भी गीत या मंत्र बार-बार दोहराया जाता है और पुनरावृत्ति के क्रम में ही संगीत की लय में एकता और आनंद की सृष्टि होती है।पुनरावृत्ति समर्पण और धर्मनिरपेक्ष भावबोध निर्मित करती है।इस अर्थ में कीर्तन धर्मनिरपेक्षीकरण का महत्वपूर्ण औजार है। कीर्तन में शरीर,शब्द और गीतात्मक ये तीनों मिलकर नए परिवेश और अनुभूति की सृष्टि करते हैं।यह प्रक्रिया अशिक्षित-शिक्षित में अंतर्क्रियाओं को जन्म देती है,ध्वनि और शब्द की अंतर्क्रियाओं को जन्म देती है।इसमें अंतर्निहित द्वयार्थात्मकता भी अपना खतरनाक खेल खेलती है।अभी तक हम मानते रहे हैं कि शब्द सबसे ताकतवर होता है,हठात कीर्तन हमें यह बोध देता है लय और नाद ताकतवर होते हैं। वेद की ऋचाओं के पाठ के जरिए नाद की जो परंपरा आरंभ हुई वह सचेत रूप से कीर्तन में चली आई है,उसी तरह वैदिक ऋचाओं का पाठ जिस नाद की सृष्टि करता है वह ऋचाओं में निहित अर्थ को छिपाने का काम करता है।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां पर हमें सोचना चाहिए और सवाल उठाना चाहिए कि कीर्तन की मंशा क्या है ॽ विचारधारा क्या है ॽविचारधारा का संबंध मंशा से है।आयोजक कौन है और किसलिए आयोजन किया जा रहा है ॽऔर किस स्थान पर आयोजन किया जा रहा हैॽ ये सवाल कीर्तन से गहरे जुड़े हैं,इनके आधार पर कीर्तन की विचारधारा को रेखांकित करने में मदद मिल सकती है।

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

फेसबुक और विचार


फेसबुक लेखन को कचड़ा लेखन मानने वालों की संख्या काफी है। ऐसे भी सुधीजन हैं जो यह मानते हैं कि केजुअल लेखन के लिए फेसबुक ठीक है गंभीर विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए यह माध्यम उपयुक्त नहीं है। यह धारणा बुनियादी तौर पर गलत है। फेसबुक पर आप चाहें तो विचारों का गंभीरता के साथ प्रचार-प्रसार भी कर देते हैं।


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फेसबुक पर व्यक्त विचारों का वैसे ही असर होता है जैसा असर किसी के भाषण को सुनते हुए होता है। एक ही शर्त है विचार खुले मन और बिना शर्त के साथ व्यक्त हों। पढ़ने वाला माने तो ठीक न माने तो ठीक। फेसबुक विचारों की कबड्डी का मैदान है। 


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फेसबुक में विचार महान होता है बोलने वाला नहीं। यहां पर आप अपने विचारों को अनौपचारिक तौर पर वैसे ही पेश करें जैसे चाची अपने विचार पेश करती है। बातों बातों में विचारों की प्रस्तुति ही फेसबुक की विचार-कला की धुरी है। 


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फेसबुक में विचार रखें और चलते बनें,विचारों के शास्त्रार्थ की यह जगह नहीं है। यह कम्युनिकेशन का मंच है और विचार को भी कम्युनिकेशन के ही रूप में आना चाहिए।फलतः विचार को विचारधारा के बंधनों से यहां मुक्ति मिल जाती है। विचार यहां कम्युनिकेशन है ,विचारधारा नहीं। कम्युनिकेशन सबका होता है ,जबकि विचारधारा वर्ग विशेष की होती है।
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फेसबुक पर अनेक विचारवान लोग हैं जो अपने सुंदर विचारों को व्यक्त इसलिए नहीं करते क्योंकि उनके विचारों को कोई चुरा लेगा।

विचारों की चोरी अच्छी बात है इसका ज्यादा से ज्यादा विकास होना चाहिए। यह विचारों का लोकतांत्रिकीकरण है। फेसबुक ने इस अर्थ में ज्ञान और विचार के लोकतांत्रिकीकरण को डिजिटल आयाम दिया है।यहां व्यक्त विचार कभी नहीं मरते। 


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मनुष्य का दिमाग बना है विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए, वह विचारों को कैदगाह करने के लिए नहीं बना। फेसबुक ने रीयल टाइम कम्युनिकेशन की संभावनाओं को साकार करके विचारों के पंखों को साकार किया है। संसार में विचारों से सस्ती कोई चीज नहीं है।

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विचार तो जीवन का मूल्यवान उपहार है। आप किसी व्यक्ति को कोई अच्छा विचार सम्प्रेषित करते हैं तो मूल्यवान गहना देते हैं। विचारों को पढ़ना और सुनना चाहिए। इससे मानवीयबोध समृद्ध होता है। फेसबुक की थुक्का-फजीहत और शैतानियों से निजात दिलाने में अच्छे विचार बड़ी मदद कर सकते हैं।


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फेसबुक की खूबी है कि इसमें आप इमेजों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इमेजों के साथ विचारों को भी बदलना चाहिए। हमारे अनेक फेसबुक मित्र हैं उनको उन्मुक्त भावों की इमेज या फोटो तो अपील करती है लेकिन उन्मुक्त उदार विचार अपील नहीं करते। मसलन् दुर्गा की इमेज तो अपील करती लेकिन दुर्गा के विचार अपील नहीं करते। इमेज बदलने के साथ विचारों में बदलाव आता है।


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फेसबुक पर सामान्य और विशिष्ट, शिक्षित और विद्वान सभी किस्म के लोग हैं जो लिख रहे हैं। बड़े दिमाग के बड़े आइडिया को सही परिप्रेक्ष्य में देखने में फेसबुक कम मदद करता है। बड़े आइडिया को कम बुद्धि के लोग जब देखते हैं तो उलझन में पड़ जाते हैं और अंटशंट लिखने लगते हैं। वे अपनी कम बुद्धि से बड़े विचारों को प्रदूषित करने की असफल चेष्टा करते हैं। 
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फेसबुक पर ऐसे भी मित्र हैं जो किसी भी विचार को पसंद नहीं करते और बकबास करने में सिद्धहस्त हैं। इस तरह के लोग अमूमन व्यक्तिगत हमले करते हैं। फेसबुक पर की गई बकबास अंततः बकबास है वह विचार नहीं है।
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फेसबुक पर ऐसे भी लोग है जिनके कोई विचार नहीं हैं लेकिन वे किसी न किसी विचार की छाया में रहते हैं। विचार की छाया में रहना ,विचारों में रहना नहीं है। ये वे लोग हैं जो विचार को ग्रहण नहीं कर पाए हैं,समझ ही नहीं पाए हैं। यानी वे विचार को मानते हैं,जानते नहीं।

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

विचारधारा का कम्युनिकेशन में अवमूल्यन है फेसबुक


                   
       फेसबुक के 85 करोड़ यूजर हैं और इसने पिछले साल 3.7 बिलियन डॉलर का मुनाफा कमाया है। कंपनी का मानना है कि वह आगामी दिनों में बाजार से 5बिलियन डॉलर शेयर बेचकर उठाएगी। इस कंपनी की हैसियत 100 बिलियन से ऊपर आंकी जा रही है।
फेसबुक महज एक कंपनी नहीं है वह नए युग की कम्युनिकेशन, सभ्यता-संस्कृति की रचयिता भी है। यह बेवदुनिया की पहली कंपनी है जिसके एक माह में 1 ट्रिलियन पन्ने पढ़े जाते हैं। प्रतिदिन फेसबुक पर 2.7बिलियन लाइक कमेंटस आते हैं। किसी भी कम्युनिकेशन कंपनी को इस तरह सफलता नहीं मिली ,यही वजह है कि फेसबुक परवर्ती पूंजीवाद की संस्कृति निर्माता है। वह महज कंपनी नहीं है।
गूगल के सह-संस्थापक सिर्गेयी ब्रीन ने इंटरनेट के भविष्य को लेकर गहरी चिन्ता व्यक्त की है। इंटरनेट की अभिव्यक्ति की आजादी को अमेरिका और दूसरे देशों में जिस तरह कानूनी बंदिशों में बांधा जा रहा है उससे मुक्त अभिव्यक्ति के इस माध्यम का मूल स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा।
फेसबुक पर यदि कोई यूजर कहीं से सामग्री ले रहा है और उसे पुनः प्रस्तुत करता है और अपने स्रोत को नहीं बताता तो इससे नाराज नहीं होना चाहिए। यूजर ने जो लिखा है वह उसके विचारधारात्मक नजरिए का भी प्रमाण हो जरूरी नहीं है।
फेसबुक तो नकल की सामग्री या अनौपचारिक अभिव्यक्ति का मीडियम है। यह अभिव्यक्ति की अभिव्यक्ति  या कम्युनिकेशन का कम्युनिकेशन है। यहां विचारधारा, व्यक्ति, उम्र,हैसियत,पद. जाति, वंश, धर्म आदि के आधार पर कम्युनिकेशन नहीं होता। फेसबुक में संदर्भ और नाम नहीं कम्युनिकेशन महत्वपूर्ण है। फेसबुक की वॉल पर लिखी इबारत महज लेखन है। इसकी कोई विचारधारा नहीं है। फेसबुक पर लोग विचारधारारहित होकर कम्युनिकेट करते हैं। विचारधारा के आधार पर कम्युनिकेट करने वालों का यह मीडियम " ई" यूजरों से अलगाव पैदा करता है।
फेसबुक विचारधारात्मक संघर्ष की जगह नहीं है। यह मात्र कम्युनिकेशन की जगह है। इस क्रम में मूड खराब करने या गुस्सा करने या सूची से निकालने की कोई जरूरत नहीं है। हम कम्युनिकेशन को कम्युनिकेशन रहने दें। कु-कम्युनिकेशन न बनाएं। फेसबुक कम्युनिकेशन क्षणिक कम्युनिकेशन है। अनेक बार फेसबुक में गलत को सही करने के लिए लिखें ,लेकिन इसमें व्यक्तिगत आत्मगत चीजों को न लाएं। दूसरी बात यह कि फेसबुक मित्र तो विचारधारा और पहचानरहित वायवीय मित्र हैं। आभासी मित्रों से आभासी बहस हो।यानी मजे मजे में कम्युनिकेट करें। असल में ,विचारधारा का कम्युनिकेशन में अवमूल्यन है फेसबुक।
        एक अन्य सवाल उठा है कि  क्या फेसबुक और ट्विटर ने अकेलेपन को कम किया है या अकेलेपन में इजाफा किया है ? यह अकेले व्यक्ति को और भी एकांत में धकेलता है। संपर्क तो रहता है ,लेकिन संबंधों का बंधन नहीं बंधने देता। दोस्त तो होते हैं लेकिन कभी मिलते नहीं हैं।
     फेसबुक ने मनुष्य की मूलभूत विशेषताओं को कम्युनिकेशन का आधार बनाकर समूची प्रोग्रामिंग की है। मनुष्य की मूलभूत विशेषता है शेयर करने की और लाइक करने की। इन दो सहजजात संवृत्तियों को फेसबुक ने कम्युनिकेशन का महामंत्र बना डाला। इसमें भी फोटो शेयरिंग एक बड़ी छलांग है। यूजर जितने फोटो शेयर करता है वह नेट पर उतना ही ज्यादा समय खर्च करता है। आप जितना समय खर्च करते हैं उतना ही खुश होते हैं और फेसबुक को उससे बेशुमार विज्ञापन मिलते हैं । विगत वर्ष फेसबुक को विज्ञापनों से 1 बिलियन डॉलर की कमाई हुई है। असल में फेसबुक सामुदायिक साझेदारी का माध्यम है।यदि कोई इसे घृणा का माध्यम बनाना चाहे तो उसे असफलता हाथ लगेगी। फेसबुक में धर्म,धार्मिक प्रचार, राजनीतिक प्रचार आदि सब सतह पर विचारधारात्मक लगते हैं लेकिन प्रचारित होते ही क्षणिक कम्युनिकेशन में रूपान्तरित हो जाते हैं। विचारधारा और विचार का महज कम्युनिकेशन में रूपान्तरण एक बड़ा फिनोमिना है। जिनकी तरीके से देखने की आदत है वे इस तथ्य को अभी भी पकड़ नहीं पा रहे हैं।
     इंटरनेट के समानान्तर सैटेलाइट टीवी और मोबाइल कम्युनिकेशन का भी तेजी से विस्तार हुआ है। नई पूंजीवादी संचार क्रांति समाज को स्मार्ट मोबाइल क्रांति की ओर धकेल रही है। स्मार्ट मोबाइल के उपभोग के मामले में चीन ने सारी दुनिया को पीछे छोड़ दिया है। भारत में बिजली की कमी के अभाव में रूकी संचार क्रांति निकट भविष्य में स्मार्ट मोबाइल फोन से गति पकड़ेगी ।  स्मार्ट फोन के जरिए हम पीसी-लैपटॉप को भी जल्द ही पीछे छोड़ जाएंगे ।  

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         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...