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बुधवार, 11 मई 2011

बांग्ला चैनलों में प्रतिगामी राजनीति का अंत


   बांग्ला चैनलों के आने बाद से पश्चिम बंगाल का राजनीतिक वातावरण बुनियादी तौर पर बदला है। बांग्ला चैनलों ने नए सिरे से राजनीतिक ध्रुवीकरण किया है। नव्य उदार आर्थिक नीतियों और पूंजीवाद विरोधी वातावरण को तोड़ा है। यह प्रक्रिया 2006 में आरंभ हुई थी। इस समय तारा न्यूज,महुआ खबर,स्टार आनंद,24 घंटा,न्यूज टाइम,कोलकाता टीवी, आर न्यूज , आकाश आदि आधे दर्जन से ज्यादा समाचार चैनल हैं जिनसे अहर्निश खबरों का प्रसारण होता है। इनमें '24 घंटा' और 'आकाश' चैनल की 'वामचैनल' हैं।माकपा के प्रति इनकी सहानुभूति है। अन्य चैनलों का किसी दलविशेष से संबंध नहीं है। इन्हें 'अ-वाम चैनल' कहना समीचीन होगा। इन चैनलों की राजनीतिक खबरों का फ्लो वामविरोध पर आधारित है। वामविरोधी समाचार फ्लो बनाए रखने के नाम पर वाम उत्पीड़न पर इन चैनलों ने व्यापक कवरेज दिया है।  अन्य विषयों को मुश्किल से 5 फीसदी समय दिया है।
    'अ-वाम चैनलों' की प्रस्तुतियों ने स्टीरियोटाइप वक्ता और रूढ़िबद्ध तर्कों के आधार पर वाम राजनीति के बारे में नए आख्यान को जन्म दिया है। इससे वामविरोधी राजनीतिक दलों की इमेज चमकी है। इससे वामविरोधी समूहों को एकताबद्ध करने में मदद मिली और नव्यउदार राजनीति के प्रति आकर्षण हुआ है। साथ ही माकपा की वैचारिक घेराबंदी टूटी है। मसलन् एक जमाने में वामदलों ने नव्य आर्थिक उदारवाद के खिलाफ जमकर प्रचार अभियान चलाया था लेकिन विगत पांच सालों में चैनल संस्कृति का असर है कि वामदलों ने नव्य उदारतावाद के खिलाफ अपना राजनीतिक प्रतिवाद धीमा किया है। साथ ही नव्य उदार संस्कृति के विभिन्न रूपों को धीमी गति से राज्य में पैर फैलाने में मदद की है। आज टीवी संस्कृति के दबाव के कारण वाम और गैर-वाम दोनों ही धड़े नव्य उदार संस्कृति के प्रभावमंडल में चमक रहे हैं।
   टेलीविजन में अंतर्वस्तु महत्वपूर्ण नहीं होती 'फ्लो' महत्वपूर्ण होता। वामचैनलों 'चौबीस घंटा" और "आकाश" ने  अधिनायकवादी मॉडल को आधार बनाकर इसबार विधानसभा का चुनाव कवरेज दिया है। इन चैनलों की समस्त कार्यप्रणाली और अंतर्वस्तु को माकपा के मीडिया बॉस ऊपर से नियंत्रित करते हैं।  संवाददाताओं की रिपोर्ट में किसी भी किस्म का पेशेवर भाव नहीं होता। वे बड़े उग्र भाव से पार्टी सदस्य की तरह डिस्पैच भेजते हैं।  संवाददाता जब पार्टी का भोंपू बन जाता है तो सत्य की हत्या कर बैठता है। यह बीमारी किसी भी दल में पैदा हो सकती है। 'वाम चैनल' मानकर चल रहे हैं जनता अनुगामी है और उसे जो बताया जाएगा वह उस पर विश्वास करेगी। यह मॉडल आम दर्शकों में साख नहीं बना पाता क्योंकि दर्शक अन्य चैनलों  का कवरेज भी देखते हैं। वाम चैनलों की आक्रामक प्रस्तुतियों में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों पर जोर कम है और वामदलों की नीतियों पर जोर ज्यादा रहा है। इस तरह का प्रसारण दर्शक को लोकतंत्र से बांधने की बजाय विचारधारा से बांधता है। फलतः वामचैनल तटस्थ दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पाते। इसबार वामचैनलों ने ममता बनर्जी की रेल मंत्रालय की गतिविधियों को निशाना बनाया था। मजेदार बात यह है रेल मंत्रालय का राज्य विधानसभा चुनाव से कोई संबंध नहीं है। इस प्रौपेगैण्डा मॉडल की स्थिति यह है कि इसमें सत्य अनुपस्थित नहीं रहता अपितु भिन्न किस्म का सत्य रहता है। इसमें अर्द्ध सत्य,सीमित सत्य और संदर्भ के बाहर का सत्य भी शामिल है। रेल मंत्रालय का सत्य पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाहर का सत्य है।यह राज्य का सत्य नहीं है। माकपा नियंत्रित चैनलों ने माकपा समर्थक बुद्धिजीवियों और शिक्षितों को सबसे ज्यादा असुरक्षित किया है। ये लोग इकतरफा प्रचार अभियान से सबसे ज्यादा परेशान हैं और अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं। वाम चैनलों ने वाम की पूर्वनिर्मित इमेज,धारणाओं और एटीट्यूट को प्रचारित किया। वाम की पहले से जो राय रही है उसका ही प्रचार करता है। सिर्फ गौतमदेव के भाषणों में वाम की पूर्व निर्धारित नीतियों का विकल्प तेजी से सामने आया। माकपा नियंत्रित प्रचार अभियान लोकतंत्र को आधार नहीं बनाता बल्कि पार्टी और उसकी नीतियों को आधार बनाता है। इस तरह के प्रचार का लक्ष्य है पार्टी के पीछे आम लोगों को गोलबंद करना। इस प्रचार का सामान्य लोकतांत्रिक प्रचार मॉहल के साथ तीखा अंतर्विरोध है।इसके विपरीत  'अ-वाम चैनलों' के समूचे समाचार फ्लो और टॉकशो फ्लो ने तटस्थ सूचनाओं और गैर वाम विकल्पों को व्यापक कवरेज दिया है। इस क्रम में विभिन्न रूपों में लोकतंत्र को बुनियादी आधार के रूप में प्रचारित किया।  'अ-वाम चैनलों' ने सत्ता और जनता के बीच में व्याप्त असमानता और वैषम्यपूर्ण संबंधों को उजागर किया । सत्ता में जनता के प्रति उपेक्षा, अलगाव और संवेदनहीनता से जुड़ी खबरों को तत्परता के साथ उजागर किया है। सत्ता के अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने की भावना पैदा करके आंदोलनों में जनता की शिरकत को बढ़ाया है। जनता की आंदोलनों में शिरकत बढ़ाना मीडिया की लोकतांत्रिक भूमिका है। इन चैनलों से जो खबरें आयी हैं उनमें कम से कम झूठी खबरें अभी तक दिखाई नहीं दी हैं। ऐसी खबर नहीं दिखाई गयी जो घटना घटी ही न हो। 'अ-वाम चैनलों'  ने उन समस्याओं,घटनाओं ,राजनीतिक विकल्पों को सामने रखा जिनकी राज्य प्रशासन और वामचैनलों ने उपेक्षा की या दबाया।  'अ-वाम चैनल' उस वातावरण को नष्ट करने में सफल हुए हैं जिसे वामदलों ने भय और असुरक्षा के आधार पर निर्मित किया था। निर्भीक होकर बोलने की आजादी का विस्तार किया है। बंद दिमागों को खोला है। यह संदेश भी दिया है कि मुक्त दिमाग के खिलाफ पार्टीतंत्र का बौना है। इस तरह की प्रस्तुतियां स्वैच्छिक और विकेन्द्रित हैं। इसके विपरीत 'वाम चैनलों' में आत्म-नियमन और आत्म-सेंसरशिप हावी रही है। इन चैनलों ने एक ओर समाचारों को नियंत्रित करने की कोशिश की वहीं दूसरी ओर खबरों को नियंत्रित किया। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य  ने वाम चैनलों के अलावा अन्य चैनलों को एकदम समय नहीं दिया।यह स्वयं में अलोकतांत्रिक है। दूसरी ओर ममता बनर्जी का वामचैनलों ने इंटरव्यू नहीं लिया। राज्य के दो बड़े नेताओं का यह भावबोध भविष्य में टीवी और इन दो नेताओं के बीच में टकराव के बने रहने का संकेत है।  
      

बुधवार, 19 जनवरी 2011

ममता बनर्जी खबर नहीं प्रौपेगैण्डा है

     बांग्ला चैनलों में इन दिनों माओवादियों के नृशंस कर्मों का प्रतिदिन महिमामंडन चल रहा है। बांग्ला चैनलों में ममता बनर्जी और राजनीतिक हिंसा के अलावा सभी खबरें तकरीबन हाशिए पर डाल दी गयी हैं या नदारत हैं। बांग्ला चैनलों में टॉकशो से लेकर खबरों तक सभी कार्यक्रमों में ममता,माओवाद और हिंसा का महिमामंडन सुनियोजित रणनीति के तहत किया जा रहा है। यह ममता बनर्जी का सुनियोजित प्रौपेगैण्डा है। यह बांग्ला समाचार चैनलों के प्रौपेगैण्डा चैनलों में रूपान्तरण की सूचना है। यह पश्चिम बंगाल की जनता को सूचना दरिद्र बनाने की गंभीर साजिश है। बांग्ला चैनलों को देखकर यही लगता है कि ममता बनर्जी ही खबर है। इस अवधारणा के आधार पर तैयार प्रस्तुतियों में खबरों के अकाल का एहसास होता है। ममता बनर्जी के भाषण खबर नहीं प्रौपेगैण्डा हैं। ममता बनर्जी की मुश्किल है कि उनके पास मुद्दा नहीं है वे अपने भाषण और हिंसक घटनाओं को मुद्दा बनाने की असफल कोशिस कर रही हैं। वे यह भूल गयी हैं कि हिंसा को आज के दौर में मुद्दा नहीं बनाया जा सकता। यदि ऐसा हो पाता तो नरेन्द्र मोदी गुजरात का चुनाव कभी का हार गए होते।
   टीवी कवरेज में माओवादी हिंसा अपील नहीं करती ,बल्कि वितृष्णा पैदा करती है। यह वर्चुअल हिंसा है। टीवी पर हिंसा का कवरेज निष्प्रभावी होता है। टीवी वाले माओवादी हिंसा से जुड़े बुनियादी सवालों पर चर्चा नहीं कर रहे हैं।  सवाल उठता है माओवादी संगठनों का मौजूदा हिंसाचार जायज है ? इस हिंसाचार से पश्चिम बंगाल के किसानों के जानो-माल की रक्षा हो रही है ? माओवादी संगठनों के प्रभाव वाले इलाकों में किसान और आम आदमी चैन की नींद सो रहे हैं ? प्रभावित इलाकों में माओवादी नेता साधारण लोगों से जबरिया धनवसूली क्यों कर रहे हैं ? माओवादियों के पास कई हजार सशस्त्र गुरिल्ला हैं और उनकी पचासों टुकडियां हैं, इन सबके लिए पैसा कहां से आता है ? गोला-बारूद से लेकर पार्टी होलटाइमरों और सशस्त्र गुरिल्लाओं के मासिक वेतन का भुगतान किन स्रोतों से होता है ? इसका जबाब बांग्ला चैनलों,तृणमूल कांग्रेस,माकपा और माओवादियों को देना चाहिए।  
   माओवादियों और ममता बनर्जी के अनुसार आदिवासी अतिदरिद्र हैं। ऐसीस्थिति में वे कम से कम माओवादियों के लिए नियमित चंदा नहीं दे सकते। माओवादियों को कभी किसी ने शहरों में भी चंदा की रसीद काटकर या कूपन देकर चंदा वसूलते नहीं देखा। ऐसी स्थिति में वे धन कहां से प्राप्त करते हैं ?   
       आज तक राजनीतिक,वैचारिक ,सामाजिक और धार्मिक बहुलतावाद के प्रति माओवादियों का घृणास्पद और बर्बर व्यवहार रहा है । वे भारत के बहुलतावादी सामाजिक और राजनीतिक तानेबाने को नहीं मानते। वर्गशत्रु और उसके एजेण्ट को ‘ऊपर से छह इंट छोटा कर देने’ या मौत के घाट उतारदेने या इलाका दखल की राजनीति करने के कारण माओवादियों से भारत के बहुलतावादी तानेबाने के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है। माओवादी जिन इलाकों में वर्चस्व बनाए हुए हैं वहां पर आज भी राजनीतिक स्वाधीनता नहीं है।  उन इलाकों में विभिन्न रंगत के मार्क्सवादी,राष्ट्रवादी,उदारवादी और अनुदारवादी पूंजीवादी दल अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करते। आज बुर्जुआ संविधान के तहत जितनी न्यूनतम आजादी मिली हुई है माओवादी इलाकों में वह भी नहीं हैं।  
    यह भ्रम है कि माओवाद प्रभावित 136 जिलों में सामाजिक-राजनीतिक शक्ति संतुलन माओवादियों के पक्ष में है। असल में वे आतंक की राजनीति करके इन इलाकों में लोकतंत्र को पंगु बनाए हुए हैं। साथ ही पृथकतावादी,फासिस्ट,अंधराष्ट्रवादी और अपराधी गिरोहों के साथ मिलकर समानान्तर व्यवस्था चला रहे हैं ।       
      राजनीतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र एक सिक्के के ही दो पहलू हैं। माओवादियों की भारत के लोकतंत्र और बहुलतावाद में कोई आस्था नहीं है। ममता बनर्जी की इन दोनों में आस्था है। ऐसे में ममता बनर्जी का माओवादियों से समर्थन मांगना नाजायज है। एक अन्य सवाल उठता है कि माओवादी अंधाधुंध कत्लेआम क्यों कर रहे हैं ? आज भारत में नव्य उदारतावाद विरोधी एजेण्डा पिट चुका है। दूसरा कारण है माओवादी आंदोलन का चंद क्षेत्रों तक सीमित हो जाना। हिन्दुस्तान के अन्य वर्गों की समस्याएं उनके आंदोलन के केन्द्र में नहीं हैं। नव्य-उदारतावाद के खिलाफ उनका संघर्ष किसानों से लेकर मध्यवर्ग तक अपील खो चुका है। समाजवाद के अधिकांश मॉडल पिट चुके हैं ऐसी अवस्था में माओवादी समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें ?
      माओवादियों ने हाल के वर्षों में नव्य-उदारतावाद के खिलाफ संघर्ष करके जो थोड़ी -बहुत जमीन बनायी थी वह खतरे में है।नव्य-उदारतावाद विरोध की आर्थिकमंदी के साथ ही विदाई हो चुकी है। नव्य-उदारतावाद की विदाई की बेला में माओवादियों के पास सही एजेण्डे का अभाव है यही बुनियादी वजह है जिसके कारण वे हताशा में अंधाधुंध हत्याएं कर रहे हैं। आदिवासियों में वे अपना जनाधार विचारधारा और संघर्ष के आधार पर सुरक्षित नहीं रख पा रहे हैं। जिन इलाकों में माओवादी सक्रिय हैं उन इलाकों में लोकतांत्रिक राजनीति की बजाय इलाका दखल की राजनीति हो रही है। फलतः उनकी विचारधारात्मक अपील घटी है। यही वजह है लालगढ़ में माकपा को अपने खोए हुए जनाधार को पाने में सफलता मिली है। दूसरी ओर माओवादियों के अंदर एक गुट अब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के सहयोग से विधानसभा चुनावों में भाग लेने का मन बना चुका है। वे लालगढ़ में पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी के बैनरतले आगामी विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं और इस दिशा में तैयारियां चल रही हैं। यह हिंसा की राजनीति को वैध बनाने की कोशिश है। आगामी दिनों में वाममोर्चे की यह कोशिश होगी कि लालगढ़ की हिंसा को मीडिया उन्माद के जरिए किसी तरह वैधता न मिले।साथ ही लालगढ़ में किसी भी तरह माओवादी और ममता बनर्जी को चुनावी सफलता न मिले।
   
    
   


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