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सोमवार, 5 सितंबर 2016

एक शिक्षक का दुख

       आज शिक्षक दिवस है।फेसबुक पर हजारों पोस्ट देख सकते हैं।अपने शिक्षक की प्रशंसा भरी पोस्ट भी देख सकते हैं।लेकिन हम कभी शिक्षक के दुख को नहीं देखते।एक शिक्षक का क्या दुख है यह हमने कभी जानने की कोशिश ही नहीं की। शिक्षक के बिना समाज की कल्पना असंभव है,शिक्षक के दुखों को जाने बिना समाज को जानना भी असंभव है।कोई समाज कैसा है यह तय करना हो तो शिक्षकों को देखो ,उनकी समस्याओं को देखो,उनके जीवन में घट रहे अंतर्विरोधों को देखो।शिक्षक के दुख निजी और सार्वजनिक दोनों किस्म के हैं।मैं यहां जिस दुख की ओर ध्यान खींचना चाहता हूँ वह सार्वजनिक दुख हैं,जिनसे एक शिक्षक को गुजरना पड़ रहा है।

आज के शिक्षक का सबसे बड़ा दुख यह है कि वह ´विदेशी´की जकड़बंदी में कैद है। ´विदेशी´ बनने में उसे बहुत ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ रही है। ´विदेशी´ बनने की पीड़ा उसकी अपनी निजी पीड़ा नहीं है बल्कि उस पर व्यवस्था ने थोपी है। ´विदेशी´भावबोध अर्जित करने के लिए इन दिनों भयानक होड़ मची हुई है।इस क्रम में शिक्षक अनुवाद कर रहा है। अनुवाद में जी रहा है।शिक्षक का अनुवाद में जीना,अनुवाद में सोचना उसकी सबसे बड़ी पीड़ा है।वो कक्षा में जाता है तो अंग्रेजी में पढ़ाता है और अंग्रेजी का मन ही मन अनुवाद करता रहता है।हर चीज को अंग्रेजी के माध्यम से सम्प्रेषित करने की कोशिश करता है। अंग्रेजी में वो जब पढ़ाता है ,तो जाने-अनजाने अपनी स्वाभाविक भाषा,परिवेस की भाषा से अलग हो जाता है।

किसी शिक्षित व्यक्ति का अभिव्यक्ति प्रक्रिया में अपनी भाषा से अलग हो जाना सबसे त्रासदी है। एक शिक्षक की सबसे बड़ी ताकत उसकी भाषा होती है,वह अपनी भाषा में जितना रमण कर सकता है उतना वह अन्य भाषा में रमण नहीं कर सकता।हमारे बीच में अब हालात इस कदर बदतर हो गए हैं कि अपनी भाषा से कट जाने को हम शिक्षक की पीड़ा या दुख नहीं मानते बल्कि खुश होते हैं और गर्व के साथ कहते हैं कि वो अंग्रेजी माध्यम से बढ़िया पढ़ाते हैं,हम यह भूल ही जाते हैं कि वे अंग्रेजी का अनुवाद करके पढ़ाते हैं,अंग्रेजी उनकी नेचुरल भाषा नहीं है।

एक शिक्षक के हाथों जब अपनी भाषा मरती है तो मुझे बहुत कष्ट होता है। मैं बार-बार महसूस करता हूँ कि एक शिक्षक को अपनी स्वाभाविक भाषा में पढ़ाना चाहिए।अंग्रेजी हमारे शिक्षक की स्वाभाविक भाषा नहीं है वह अनुवाद की भाषा है।शिक्षक जब स्वाभाविक भाषा में नहीं पढ़ाएगा तो विषय के मर्म को न तो समझ पाएगा और न समझा पाएगा। यही वजह है हमारे यहां जो शिक्षितवर्ग निकल रहा है वह शिक्षा के अर्थबोध से ही वंचित है।उसके पास डिग्री है लेकिन वह डिग्री का वास्तविक अर्थ नहीं जानता।

अनुवाद की भाषा अंततःशिक्षक के मूल मंतव्य और आशय को समझने में सबसे बड़ी बाधा के रूप में खड़ी रहती है।यही वजह है हमारे देश में डिग्रीधारी तो अनेक हैं लेकिन शिक्षित लोग बहुत कम हैं।हमने एक ऐसा शिक्षक तैयार किया है जो अनुवाद की भाषा में काम चला रहा है।मेरा सबसे बड़ा दुख यही है कि मेरे शिक्षक की स्वाभाविक भाषा खत्म हो रही है।कोई इस ओर ध्यान देने को तैयार नहीं है। अंग्रेजी माध्यम से पठन-पाठन की महत्ता और सत्ता का इन दिनों जिस तरह जयघोष चल रहा है उसको देखते हुए वह दिन दूर नहीं जब अपनी भाषाओं को पढ़ने -पढ़ाने के लिए हम विदेश जाया करेंगे।

एक शिक्षक की पहली जिम्मेदारी है कि वह अंग्रेजी की कैद से बाहर निकले।यदि हम सच में शिक्षक और शिक्षा का दर्जा ऊँचा करना चाहते हैं तो हमें अपना रवैय्या बदलना होगा।ग्लोबल होने का अर्थ अनुवाद की भाषा में जीना नहीं होता।ग्लोबल का लोकल के बिना कोई सार्थक अर्थ निर्मित नहीं होता।



मेरा दुख यह है कि विद्यार्थी अपरिचित भाषा में,परायी भाषा में पढ़ता है,जीता है।मैं सभी शिक्षकों का सम्मान करते हुए विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि अंग्रेजी माध्यम के जरिए पढ़ाने से छात्रों में मौलिक चिंतन का विकास नहीं हो पाता।वे अपरिचित भाषा के जाल में फंसे रहते हैं। अंग्रेजी में पढ़ने का एक दुष्परिणाम यह भी हुआ है बच्चों में रटने की आदत का विकास हुआ है,वे सवालों पर सोचते नहीं हैं बल्कि रटे-रटाए उत्तर देकर परीक्षा पास कर लेते हैं।इस समूची प्रक्रिया में कुछ ही छात्र अपना विकास कर पाते हैं अधिकतर तो डिग्रीधारी होकर रह जाते हैं।एक शिक्षक के नाते मेरा सबसे बड़ा दुख यह है कि मैंने छात्र पैदा नहीं किए, डिग्रीधारी पैदा किए।यह मेरी सबसे बड़ी असफलता भी है।

सोमवार, 8 अगस्त 2016

शिक्षा और अंधविश्वास

       हमारे नेता आए दिन कहते हैं देश का विकास करना है तो देश को शिक्षित करना होगा।हमारा मन इस बात को ग्रहण करने में हिचकता है। शिक्षितों में बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की है जो अंधविश्वास में आकंठ डूबे हुए हैं,स्वतंत्र बुद्धि और विज्ञान से जिनको नफरत है।शिक्षा से यदि इस तरह के मनुष्यों का निर्माण होता है तो भगवान बचाए ऐसी शिक्षा और शिक्षितों से।देश के विकास का यह सबसे घटिया समाधान है इसे हम मानने को तैयार नहीं हैं। यह विकास के नाम पर अंधकार जगत में ले जाने की कोशिश है।

हमारे समाज के अधिसंख्य लोगों ने प्रचलित विश्वासों और चिरागत प्रथाओं के सामने पूरी तरह आत्म- समर्पण कर दिया है।इन दिनों शिक्षित और अशिक्षित के बीच में प्रचलित अंधविश्वास में कितना अंतर रह गया है,इस पर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा, " हममें और अशिक्षित लोगों में केवल इतना ही प्रभेद रह जाता है कि वे अपने अन्धविश्वास के कारण बेखटके सोए रहते हैं,और हम आत्म-विस्मृत होकर अफ़ीम की नींद में पड़े रहते हैं,हम कुतर्क द्वारा अपनी लज्जा बचाना चाहते हैं,जो काम जड़ता या कायरता के कारण करते हैं उसके लिए सुनिपुण या अनिपुण व्याख्या तैयार करते हैं और यह दिखाते हैं कि वह काम वास्तव में गर्व का विषय है।लेकिन वकालत के जोर से दुर्गति को छिपाया नहीं जा सकता।"

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा जिस देश के लोग शीतला-माता को चेचक का कारण समझकर निष्क्रिय बैठे रहते हैं,उस देश में शीतला देवी का आसन भी जम जाता है और चेचक जाने का नाम नहीं लेती।वहाँ शीतला माता मानसिक परवशता का प्रतीक है,बुद्धि के स्वातन्त्र्य-नाश का कुत्सित लक्षण है।



शुक्रवार, 13 मई 2016

भक्त प्रोफेसरों के प्रतिवाद में -

           जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की एकेडमिक कौंसिल की बैठक में शिक्षकों ने जिस एकजुटता का परिचय दिया है वह हम सबके लिए गौरव की बात है।इससे देश के प्रोफेसरों को सीखना चाहिए। जेएनयू के शिक्षकों ने अपने संघर्ष और विवेक के जरिए जेएनयू कैंपस के लोकतांत्रिक परिवेश और लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत किया है।हमारे देश के विश्वविद्यालयों के अधिकांश प्रोफेसर यह भूल गए हैं कि उनका स्वतंत्र अस्तित्व तब तक है जब तक विश्वविद्यालय स्वायत्त हैं।प्रोफेसर अपने पेशे के अनुरूप आचरण करें।लेकिन हमारे अधिकांश प्रोफेसरों ने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु विश्वविद्यालय के स्वायत्त स्वरूप पर हमलों को सहन किया ,हमलों में मदद की ,इसके कारण राजनेताओं और मंत्री का मन बढ़ा है।इस तरह के प्रोफेसरों को ´भक्त प्रोफेसर´ कहना समीचीन होगा। प्रोफेसर का पद गरिमा और बेहतरीन जीवनमूल्यों से बंधा है उसकी ओर भक्तप्रोफेसरों ने आलोचनात्मक ढ़ंग से देखना बंद कर दिया है।वे शासन की भक्ति में इसकदर मशगूल हैं कि उनको देखकर प्रोफेसर कहने में शर्म आती है,इस तरह के ´भक्तप्रोफेसरों´ की स्थिति गुलामों जैसी है।हमें हर हाल में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता की रक्षा करनी चाहिए और विश्वविद्यालय के अंदर और बाहर स्वायत्तता,अकादमिक स्वतंत्रता और अकादमिक गरिमा के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।

हमारे सामने नमूने के तौर पर दिल्ली के दो विश्वविद्यालय हैं और वहां दो भिन्न किस्म के रूख प्रोफेसरों के नजर आ रहे हैं।जेएनयू में शिक्षकसंघ लोकतांत्रिक हकों के पक्ष में खड़ा है और लड़ रहा है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ और डीयू के अधिकांश प्रोफेसरों का रवैय्या चिंता पैदा करने वाला है।स्मृति ईरानी ने आदेश दे दिया है कि दिविवि की अकादमिक कौंसिल की बैठक का एजेण्डा पहले मंत्रालय से स्वीकृत कराओ उसके बाद अकादमिक परिषद की बैठक करो,कोई फैसला लेने के पहले मंत्री से अनुमति लो।यह सीधे डीयू की स्वायत्तता पर हमला है लेकिन भक्तप्रोफेसर चुप हैं,वे चुप क्यों हैं ॽ शिक्षकसंघ चुप क्यों है ॽकोई जुलूस या धरना इस आदेश के खिलाफ क्यों नहीं निकला ॽ क्या इस तरह चुप रहकर विवि की स्वायत्तता की रक्षा होगी ॽ पीएम की डिग्रियों को लेकर विवाद हो रहा है लेकिन दिविवि शिक्षक संघ चुप है ॽकौन रोक रहा है प्रतिवाद करने से ॽ हमें शिक्षक संघों को निहित स्वार्थी घेरेबंदी से बाहर निकालना होगा। हमें प्रोफेसर की मनो-संरचना में घुस आई भक्ति को नष्ट करना होगा।इस भक्ति का ज्ञान से बैर है।यह भक्ति वस्तुतःनए किस्म की गुलामी है जिसे हम विभिन्न रूपों में जीते हैं।

उस मनो-संरचना के बारे में गंभीर सवाल खड़े करने चाहिए जिसमें जिसमें विवि के प्रोफेसर रहते हैं। प्रोफेसर का पद स्वतंत्र और स्वायत्त चिंतनशील नागरिक का पद है।इस पद को हमने तमाम किस्म के दबाव-अनुरोध-मित्रता और निहित स्वार्थी राजनीतिक पक्षधरता का गुलाम बना दिया है।अब हमारे प्रोफेसरों को स्वतंत्र और स्वायत्त विचार पसंद नहीं हैं, अनुगामी विचार पसंद हैं।हमें बस्तर के माओवादियों की जंग तो अपील करती है लेकिन विवि में उपकुलपति के अ-लोकतांत्रिक फैसले नजर नहीं आते।मंत्री के हमले देखकर हमारा खून नहीं खौलता।ये असल में भक्त प्रोफेसर हैं,जो हर हाल में वीसी के भक्त बने रहने में अपनी भलाई समझते हैं।

हमने प्रोफेसर के नाते किसी न किसी राजनीतिकदल के लठैत का तमगा अपने सीने पर चिपका लिया है।प्रोफेसर जब अपने शिक्षा के काम को राजनीतिक दल के लक्ष्यों के अधीन बना देता है तो वह वस्तुतःआत्महत्या कर लेता है।यही वह बुनियादी बिंदु है जहां से स्वायत्तत प्रोफेसर का अंत होता है और भक्त प्रोफेसर जन्म लेता है। भक्त प्रोफेसर ´ पर उपदेश कुशल बहुततेरे´ की धारणा से ऊपर से नीचे तक लिपा-पुता होता है।इन लोगों ने ही अकादमिक गरिमा,स्तर,मूल्य आदि की गिरावट में बहुमूल्य योगदान किया है।भक्त प्रोफेसर शिक्षा में कैंसर हैं।वे स्वयं को नष्ट करते हैं,छात्रों को नष्ट करते हैं और विवि की स्वायत्ता को भी नष्ट करते हैं।





सोमवार, 23 नवंबर 2015

लोकतंत्र का अनंत और भाषिकचेतना



लोकतंत्र के बारे में छात्रों से जब भी बात होती है तो यह भाषा सुनने को मिलती है। “मैं तो चुनाव के समय राजनीतिक बहस सुनता हूँ”,”मैं कभी राजनीति में सक्रिय रुप से शामिल नहीं हुआ”,”मैंने कभी सक्रिय रुप से किसी भी मसले पर सार्वजनिक तौर पर पक्ष-विपक्ष में बहस में भाग नहीं लिया ”, “मैं खबरें सुनता हूँ लेकिन उन पर ध्यान नहीं देता,” “अपनी दैनंदिन समस्याओं से ही मुक्ति नहीं मिलती,राजनीति पर कब बात करूँ”, “मैं वोट देता हूँ,लेकिन सक्रिय राजनीति में कभी भाग नहीं लेता,”, “ मैं वोट देता हूँ,थोड़ा बहुत काम कर देता हूँ,इससे ज्यादा मेरी राजनीति में दिलचस्पी नहीं है,”, मैंने मतदान के दिन वोट दिया है लेकिन मेरी राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है”, यानी लोकतंत्र में निरपेक्ष या साधुभाव से भाग लेने वालों की यह मनोदशा अपने-आप में बहुत कुछ कह देती है । छात्रों का एक बड़ा वर्ग लोकतंत्र का मतलब वोट देना ही समझता है। यह सीमित लोकतंत्र की समझ है। हम इस तरह की मनोदशा के मित्रों से कहना चाहेंगे कि आप इस सीमा के बाहर निकलें और किसी अंतर्राष्ट्रीय-राष्ट्रीय मसले पर नियमित वाद-विवाद-संवाद जरुर करें। यह काम करने से आपको लोकतंत्र का भिन्न रुप नजर आएगा।लोकतंत्र वोट डालना भर नहीं है , वह ज्ञानकांड भी है। इनमें से कई छात्र तो यह भी कहते मिले कि हम तो चुनाव के समय ही राजनीति पर ध्यान देते हैं ,क्योंकि वोट देने जाना होता है,सवाल यह है इस तरह के युवाओं को इस दायरे के बाहर कैसे लाया जाय ।

हमारे शिक्षकों के पास लोकतांत्रिक अकादमिक अनुभव की कमी है फलतः उनके मन में अनेक किस्म के सेंसर या भय काम करते रहते हैं।वे विवादास्पद चीजें पढ़ाने से डरते हैं,वे डरते हैं कि कहीं लेबल चस्पां न कर दिया जाय, लेकिन हमें इस सबसे डरना नहीं चाहिए,हमें डरकर विवादास्पद विषय उठाने से डरना नहीं चाहिए। हम यदि चाहते हैं कि अधिकांश छात्र सक्रिय रुप से राजनीति में भाग लें तो हमें विवादास्पद विषयों को नियमित उठाना चाहिए। इससे विवाद होगा,छात्रों की शिरकत बढ़ेगी। साथ ही सामाजिक –न्याय के लक्ष्य को अपने नजरिए के केन्द्र में रखना चाहिए। हम यह भी देखें कि हमने लोकतंत्र का जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में विकास किस रुप में किया है ? उस विकास का स्वरुप और सीमाएं क्या हैं।यह बात हमेशा ध्यान रहे कि लोकतंत्र असीम है,उसकी कोई सीमा नहीं है। इस क्रम में हमें लोकतंत्र की अवधारणात्मक समझ को भी बहस के केन्द्र रखना चाहिए। सामान्य तौर पर आम लोगों की लोकतंत्र के बारे में समझ क्या है ,नमूने देखें- “लोकतंत्र यानी स्वतंत्रता या आजादी”, “चुनने का अधिकार” , “हम लोकतांत्रिक समाज में रहते हैं,हमें पसंदीदा व्यक्ति को चुनने के बहाने अपनी राय जाहिर करने का हक है”, “हम उन सभी मसलों पर वोट करते हैं जो हमारे सामाजिक सरोकारों और आस्थाओं की अभिव्यंजना करते हैं”, लोकतंत्र की इस तरह की जनप्रिय समझ दरशाती है कि लोकतंत्र को हम अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं।

इसी तरह लोकतंत्र पर बातें करते समय “अदर” या अन्य या हाशिए के लोगों का ख्याल रखा जाना चाहिए। हम”अदर” को जितना बेहतर ढ़ंग से जानेंगे उतनी ही गहरी हमारी लोकतांत्रिक समझ बनेगी। “अदर” के प्रति हमारा अज्ञान इन दिनों चरम पर है जिसे हम हमेशा छिपाते हैं। इसने यह स्थिति पैदा की है कि हम अन्य से नफरत करने लगे हैं या फिर उसके मसलों को लेकर गंभीर नहीं हैं,उनकी उपेक्षा करते हैं। हाल में पैदा हुआ आरक्षण विरोध इस दृष्टि की ताजा अभिव्यंजना है। हमें ध्यान रखना होगा कि “स्वतंत्रता” और “लोकतंत्र” पर बातें करते समय “अदर” का ज्ञान,उसके प्रति प्रतिबद्धता का होना जरुरी है।

इन दिनों हम कह रहे हैं कि “राष्ट्रभक्ति” पर बहस हो,या “राष्ट्रभक्ति” दिखाओ, लेकिन जब आप बहस करेंगे तो आपको “राष्ट्रद्रोह” पर भी बहस करनी होगी। यह संभव ही नहीं है कि देभक्ति पर बहस हो लेकिन देशद्रोह पर बहस न हो, ये दोनों एक ही साथ बहस के केन्द्र में आएंगे,इन दिनों संघी बटुक कह रहे हैं जो देशभक्त नहीं है वह राष्ट्रद्रोही है।जो कि एकदम गलत है।

लोकतंत्र की बुनियादी शिक्षा चार बुनियादी तत्वों से जुड़ी है। ये हैं-1.नागरिकचेतना का ज्ञान, 2.नागरिकचेतना के ज्ञानात्मक उपकरणों की समझ,3.नागरिक जीवन में हर स्तर पर कौशलपूर्ण शिरकत,4.नागरिकता के प्रति समर्पणभाव। इनमें से ज्योंही किसी भी एक चीज से जुडेंगे दूसरी चीज अपने आप खुलने लगेगी।एक शिक्षक की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने कौशल का इस्तेमाल करके इन चारों चीजों को खोले। इन चीजों को खोलते समय विवादास्पद सवाल भी आएंगे,उन सवालों को बड़े ही कौशल के साथ हल करना चाहिए। इसीलिए कहा गया है कि लोकतंत्र तो कौशल,ज्ञान,एटीट्यूट और एक्शन इन सबके संतुलन की मांग करता है।



लोकतंत्र के प्रसंग में बहुलतावाद को विगत 65 सालों में विभिन्न रुपों में पेश किया गया है।पंडित नेहरु से लेकर मोदी तक सभी बहुलतावाद की बातें कर रहे हैं। सच यह है सर्वसत्तावादी राजनीति के लिए बहुलतावाद भाषिक उपकरण से अधिक महत्व नहीं रखता। ये नेतागण कभी बहुलतावाद को आचार-व्यवहार में लागू नहीं करते,संस्कार में शामिल नहीं करते और यथार्थ से जोड़कर नहीं देखते। पंडित नेहरु की बहुलतावाद की समझ का ही यह दुष्परिणाम या खोखलापन है कि सच्चर कमीशन को बताना पड़ा कि मुसलमानों की देश में किस तरह की दुर्दशापूर्ण स्थिति है, यही हाल औरतों का भी है। यह कैसा बहुलतावाद है जो हिंसक-उत्पीडक है।हाशिए के लोगों को हाशिए के बाहर निकलने ही नहीं देता। पीएम मोदी की भी मूलतःवही स्थिति है। उनके लिए बहुलतावाद या भारत की विविधता भाषिक अलंकारमात्र है। उनके आचरण,उनके दल (संघ) के आचरण और उनकी नीतियों का बहुलतावाद के साथ तीन-तेरह का संबंध है। इसलिए लोकतंत्र में बहुलतावाद पर जब भी बातें हों तो बहुलताओं का सम्मान मात्र न करें,उसके आगे निकलें और देखें कि बहुलतावाद के विकास के लिए हमारे पास कौन सी नीतियां और योजनाएं हैं।

रविवार, 22 नवंबर 2015

शिक्षा और लोकतंत्र की चुनौतियां


        भारत की शिक्षा प्रणाली खासकर स्कूली शिक्षा पर बातें करते समय हमें बहुत ही कठिन सवालों से गुजरना होगा। मुश्किल यह है कि शिक्षा के कठिन सवालों पर देश में हमने लंबे समय से व्यापक स्तर पर कोई बहस ही नहीं चलायी है, समय-समय पर जब कोई नीति घोषित होती है तो उत्सवधर्मी भाव से कुछ सेमीनार,कन्वेंशन,संगोष्ठियां हो जाती हैं, कुछ प्रस्ताव संसद या विधानसभा में पास हो जाते हैं लेकिन गंभीर विस्तृत चर्चा नहीं होती,जनांदोलन नहीं होता। सवाल यह है कि क्या शिक्षा ऐसा विषय है जिस पर कोई बात ही न की जाए ?

हमने आजादी के बाद शिक्षा का जो ढांचा चुना और नीतिगत रास्ता चुना उस समय भी निचले स्तर पर कोई बड़ी बहस नहीं हुई। बाद में 1990-91 में भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के साथ नत्थी होकर हमारे शासकों ने जो शिक्षा का मार्ग चुना उस समय भी जनबहस नहीं हुई,इस बात को कहने का मकसद यह है कि हमारा समाज जानता ही नहीं है कि हमारे यहां शिक्षा का क्या हाल है और उसके सामने किस तरह की चुनौतियाँ हैं।

शिक्षा के विकास का नेहरु मॉडल पूरी तरह देश में असफल रहा,देश के हर कोने में और प्रत्येक समुदाय के पास शिक्षा पहुँचाने में यह मॉडल असफल रहा।इस मॉडल की सबसे बड़ी खामी यही है कि सने आरंभ से ही सीमित शिक्षा के लक्ष्य को सामने रखा । सीमित शिक्षा,सीमितचेतना और सीमित शिरकत यही इस मॉडल की विशेषता थी। “सबको शिक्षा” का नारा महज नारा ही बना रहा। सभी बच्चे स्कूल में हों यह सपना ही रह गया। बच्चों के स्कूल न जाने का अर्थ है उन्हें मानवाधिकार से वंचित रखना। हम इस पहलू पर विचार करें कि शिक्षा के जरिए मानवाधिकारों का हम कहां तक प्रसार करते हैं ?

उल्लेखनीय है मानवाधिकारों पर जिस गति से हमले बढ़ें हैं उस गति से मानवाधिकारों का प्रसार नहीं हुआ है। स्कूली शिक्षा व्यवस्था के स्वरुप पर गंभीरता से विचार करें तो पाएंगे कि भारत सरकार की प्राथमिकताओं में स्कूली शिक्षा कभी नहीं रही। आज भी नहीं है। जो लोग आए दिन शिक्षा के निजीकरण की हिमायत करते हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि स्कूली शिक्षा का समूचा बोझ उठाने या दायित्व पूरा करने में निजी क्षेत्र एकदम असमर्थ है। आज भी स्कूली शिक्षा का मात्र 10फीसदी नेटवर्क निजी क्षेत्र के दायरे में आता है 90फीसदी क्षेत्र सरकारी स्कूलों के दायरे में आता है। आज यदि सारे देश को स्कूली शिक्षा के दायरे में लाना है तो सालाना 73हजार करोड़ रुपये की हर साल आगामी छह वर्षों तक जरुरत होगी और केन्द्र और राज्य सरकारें यह पैसा खर्च करना नहीं चाहतीं। अकेले बिहार को स्कूली शिक्षा के दायरे में लाने के लिए आगामी नौ सालों तक प्रतिवर्ष 9,500करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। इस स्थिति से एक अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं कि स्कूली शिक्षा की अवस्था बहुत बेहतर नहीं है। हमें स्कूली शिक्षा के विकास के लिए सही नीति,समुचित संसाधन और राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरुरत है। आज ज्यादातर स्कूलों-कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पैरा टीचर बड़ी संख्या में काम कर रहे हैं। सारे देश के स्कूलों में तीन लाख से ज्यादा पैराटीचर काम कर रहे हैं। वहीं कॉलेजों में तकरीबन 50फीसदी से ज्यादा पदों पर पार्टटाइम-अतिथि शिक्षक काम कर रहे हैं। यही हाल विश्वविद्यालयों का भी है।यानी देश का बहुत बड़ा हिस्सा ठेके पर काम करने वाले शिक्षकों पर निर्भर है। यही दशा निजी क्षेत्र की है,वहां पर भी कॉन्ट्रेक्ट के आधार पर शिक्षक पढ़ा रहे हैं। स्थिति की भयीवहता का अंदाजा लगाने के लिए एक ही उदाहरण बताना यथेष्ट होगा। पश्चिम बंगाल में कुछ महिने पहले टीइटी शिक्षकों की भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन मांगे गए थे,उस समय तकरीबन 22लाख छात्रों ने आवेदन किया, राज्य सरकार को इस आंकड़े को देखकर परीक्षा रद्द करनी पड़ी।क्योंकि इतनी बड़ी तादाद में परीक्षा-इंटरव्यू संपन्न करने में तकरीबन दो साल लगते।

शिक्षा ,साक्षरता और उपभोक्ता-

सन् 1990-91 के बाद से देश में स्कूली शिक्षा का अर्थ ही बदल गया है। अब शिक्षा का अर्थ बच्चे के ज्ञान और क्षमता का विकास करना नहीं है। इसके विपरीत शिक्षा का अर्थ है प्रयोजनमूलक शिक्षा या साक्षरता। यानी बाजार की जरुरत के अनुसार पढ़ो,सीखो और बाजार में उतरो। अब साक्षर बनाने पर जोर है, क्षमता बढ़ाने पर जोर नहीं है। जबकि एक जमाने में शिक्षा का अर्थ था बच्चे की ग्रहण क्षमता और ज्ञानक्षमता का विकास करना। लेकिन इन दिनों ये दोनों काम शिक्षाप्रणाली ने छोड़ दिए हैं और अब ज्यादा से ज्यादा साक्षर बनाने पर जोर दिया जा रहा है,इससे स्थिति बेहद खराब हुई है।अब प्रशिक्षित शिक्षकों को पैराटीचरों ने अपदस्थ कर दिया है।मसलन्, बिहार सरकार ने 1991 में घोषित किया कि स्कूल टीचर के लिए प्रशिक्षण आवश्यक नहीं होगा। असल में 1980 के दशक में शिक्षा को साक्षर बनाने की जो प्रक्रिया शुरु हुई वह अपना सारे देश में चक्र पूरा कर चुकी है। आज सारे देश में तकरीबन तीन से लाख से ज्यादा पैरा टीचर हैं। अब शिक्षा पर नहीं साक्षरता पर जोर है।समूची शिक्षा व्यवस्था का वस्तुकरण हो चुका है। अब बच्चों को साक्षर बनाने पर जोर है शिक्षा देकर उनकी बौद्धिक क्षमता बढ़ाने पर जोर नहीं है। जबकि शिक्षा का मकसद है छात्रों में बौद्धिक क्षमता, ग्रहण क्षमता,सामाजिकचेतना और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना पैदा करना। आज ये सारे लक्ष्य किनारे कर दिए गए हैं और नौकरी पाना ही प्रधान लक्ष्य है। यही वजह कि अधिकांश छात्र समझ ही नहीं पाते कि समाज में सही या गलत क्या हो रहा है ? वे तो मीडिया से संचालित होकर अपनी राय बनाते हैं। वे मीडिया को ही अपना सर्वे-सर्वा मानते हैं । मीडिया और खासकर विज्ञापन और जनसंपर्क तो उनके लिए खुदा है, उसके हर वाक्य को वे आप्त वाक्य मानते हैं। यही वजह है वे साक्षरता के आगे अपनी चेतना का विकास नहीं कर पाए हैं। उनके पास डिग्री है ,लेकिन चेतना का स्तर साक्षरों के बराबर है।

नई समझ यह बनायी जा रही है कि छात्र को उपभोक्ता मानो। शिक्षा को सेवाक्षेत्र मानो। इस समझ ने छात्र की पहचान को उपभोक्ता की पहचान के जरिए अपदस्थ कर दिया है। शिक्षा का बड़े पैमाने पर व्यवसायीकरण हो रहा है ,शिक्षा को बाजार की जरुरतों के साथ जोड़ दिया है। इसके कारण शिक्षा का क्षय तो हुआ ही है,शिक्षकों का भी क्षय हुआ है,एक जमाना था शिक्षक “पब्लिक इंटेलेक्चुअल” हुआ करते थे,लेकिन आज कोई भी शिक्षक इस कोटि में नहीं है।अब शिक्षक भी एक “माल” हैं,स्कूल एक बाजार है और छात्र उसके उपभोक्ता हैं। प्राइवेट स्कूलों से लेकर निजी विश्वविद्यालयों तक छात्रों को उपभोक्ता की तरह सेवाएं प्रदान की जा रही हैं और उनसे हर सेवा के पैसे लिए जाते हैं। इस समूची प्रक्रिया ने छात्र-शिक्षक के संबंध को खत्मकर दिया है. आज शिक्षकों पर दवाब है कि वे बाजार की जरुरतों और मांगों की पूर्ति के लिए पढाएं, इस तरह का पाठ्यक्रम पढाओ जिससे छात्रों को नौकरी मिले,वे काम करे, “काम करने” को इतना महत्व दिया गया है कि सोचने-विचारने के लक्ष्य को बहुत कहीं पीछे छोड़ दिया गया है। इस क्रम में हमने कभी सोचा ही नहीं कि इससे देश ताकतवर बनेगा या कमजोर बनेगा !

सवाल यह है हम लोकतंत्र के लिए “नागरिक” चाहते हैं या “उपभोक्ता” ? यदि “उपभोक्ता” के जरिए लोकतंत्र का निर्माण करना चाहते हैं तो लोकतंत्र की प्रकृति अलग होगी.यदि नागरिक के जरिए लोकतंत्र बनाना चाहते हैं तो लोकतंत्र की प्रकृति अलग होगी। “उपभोक्ता” और “नागरिक” में गहरा अन्तर्विरोध है। “उपभोक्ता” के “अन्य” के प्रति कोई सामाजिक सरोकार नहीं होते,वह सिर्फ अपने बारे में सोचता है, निहित स्वार्थों को सामाजिकता कहता है।इसके विपरीत “नागरिक” के निजी नहीं सामाजिक स्वार्थ होते हैं,सामाजिक लक्ष्य होते हैं , उसे अपने से ज्यादा “अन्य” की चिन्ता होती है। लोकतंत्र के विकास के लिए हमें “उपभोक्ता”नहीं “नागरिक” चाहिए। लोकतंत्र कभी भी उपभोक्ता के जरिए समृद्ध नहीं होता, नागरिक और नागरिकचेतना के जरिए समृद्ध होता है। शिक्षा के सेवाक्षेत्र में जाने और छात्र के उपभोक्ता बन जाने का प्रकारान्तर से असर यह हुआ कि छात्र-शिक्षक का संबंध खत्म हो गया। दूसरा, “छात्र(उपभोक्ता) हमेशा सही होता है”,इस धारणा को बल मिला। यही वह धारणा है जिसके आधार पर कहा जा रहा है कि शिक्षकों की भूमिका का छात्र मूल्यांकन करेंगे।यह असल में बाजार की मांग-पूर्ति के गर्भ से उपजा प्रपंच है।तीसरा,दवाब यह है कि शिक्षक वही पढाएं जो छात्र को बाजार में खड़े होने में मदद करे,प्रतिस्पर्धा में खड़े होने में मदद करे। चौथा, यह भ्रम निकाल दें कि निजी स्कूल,निजी क्षेत्र में खुल रहे विश्वविद्यालय आदि शिक्षा के मंदिर हैं ,ये तो “नौकरी” देने वाले संस्थान हैं,शिक्षा देना इनका मकसद नहीं है।निजी क्षेत्र में चल रहे विश्वविद्यालय और स्कूल आदि तो शिक्षा की गुणवत्ता के आधार पर नहीं चल रहे ये तो मीडिया निर्मित इमेज और जनसंपर्क अभियान के जरिए चल रहे हैं। ये कारपोरेट फंडिंग,अनुदान,व्यवसायिक हिस्सेदारी,मुनाफे और नियंत्रण पर आधारित हैं। इन संस्थानों में किसी भी स्तर पर लोकतांत्रिक संरचनाएं और लोकतांत्रिक माहौल नहीं हैं।

देश में स्कूली शिक्षा की स्थिति बेहद खराब है। कक्षा एक से पांच के बीच पढाई के दौरान बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने वाले विद्यार्थियों की संख्या तकरीबन 61 प्रतिशत है।यही संख्या बिहार में 75प्रतिशत है।इनमें अनुसूचित जाति-जनजाति के छात्रों की संख्या काफी ज्यादा है। इनमें अनुसूचित जाति के 70फीसदी और जनजाति के 78प्रतिशत छात्र बीच में ही पढाई छोड़ जाते हैं। आज भी 30प्रतिशत बच्चे स्कूल नहीं पहुँच पाए हैं। बिहार में 50फीसदी बच्चे स्कूल के बाहर हैं। बच्चों को स्कूल से बाहर रखने का अर्थ है उनको मानवाधिकार से वंचित करना। इसी प्रसंग में हम निजी और सरकारी क्षेत्र की भूमिका पर भी सोचें। आज हकीकत यह है कि 90फीसदी स्कूल सरकारी क्षेत्र में हैं और मात्र 10फीसदी स्कूल निजी क्षेत्र में हैं। निजी क्षेत्र में सब बच्चों को पढ़ाने की क्षमता ही नहीं है। मौटे तौर पर स्कूली शिक्षा का स्तर बेहद खराब है।

लोकतांत्रिक शिक्षा व्यवस्था-

सवाल उठता है कि छात्रों को इतिहास,अंग्रेजी और विज्ञान पढ़ाएंगे तो क्या देश का विकास होगा या देश में लोकतंत्र को मजबूत करने में मदद मिलेगी ? क्या विज्ञानसम्मत पाठ्यक्रम पढ़ाने मात्र से बेहतर व्यक्ति पैदा होता है ? उत्तर होगा नहीं। वास्तविकता यह है कि हमारे पाठ्यक्रम,छात्र,शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था का “सामाजिक न्याय” की अवधारणा के साथ गहरा अन्तर्विरोध है। हमारे शिक्षक-छात्रों में से अधिकांश कभी सामाजिक न्याय के नजरिए से न तो समाज के बारे में सोचते हैं और न शिक्षा व्यवस्था के बारे में सोचते हैं। हमने तो “मैं” या व्यक्तिवाद के आधार शिक्षा का समूचा ढाँचा तैयार किया है। हम जो पाठ्यक्रम पढ़ाते हैं वह सामाजिक यथार्थ जोड़ता नहीं है। मसलन्, हमारे छात्र कहीं पर भी यह नहीं जान पाते कि आखिर गेंहूं की बाली कैसी होती है,चमेली का पौधा कैसा होता है। प्रयोजनमूलक किताब और अंततःकिताब ही उनके ज्ञान का सर्वस्व है। इसके कारण एक कमाऊ व्यक्ति तो शिक्षा बना देती है,सिस्टम के लिए आदमी बना देती है लेकिन समाज के लिए “नागरिक” नहीं बना पाती। शिक्षानीति का आधार जब तक “सामाजिक न्याय” और नागरिकचेतना” को नहीं बनाते हम शिक्षा को बाजार के दवाब से मुक्त नहीं कर सकते। समाज में सर्वसत्तावादी राजनीति को हमेशा उपभोक्ता-छात्र से मदद मिलती रही है,यही वह छात्र है जो “अ-राजनीति” की राजनीति रहा है और खुलेआम सर्वसत्तावादी राजनीति के साथ खड़ा नजर आता है।जबकि वैकल्पिक राजनीति करने वालों के लिए जरुरी है कि वे छात्र को नागरिक बनाएं,मानवाधिकारों की चेतना दें,उसे छात्र जीवन में ,शिक्षा में राजनीति करने,शिक्षा के लोकतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया का अंग बनाने और लोकतांत्रिक राजनीति करने के लिए तैयार करें। आज बड़े पैमाने पर जिस संविधानविरोधी और धर्मनिरपेक्षताविरोधी चेतना को युवाओं के एक बड़े समूह में सरेआम देख रहे हैं यह असल में वही समुदाय है जिसे उपभोक्ता-छात्र राजनीति ने तैयार किया है। मुश्किल यह है कि सर्वसत्तावाद की राजनीति करने वाले दोनों प्रधान दल कांग्रेस और भाजपा दोनों को “अ-राजनीति” की राजनीति सही लगती है,वे उसकी दैनंदिन अकादमिक जीवन में वकालत करते हैं और इन्हीं दोनों दलों के बीच उपभोक्ता छात्रों का बड़ा समूह आज आपको खड़ा दिखाई देगा।

देशकी शिक्षा नीति राजनीतिक दल और संसद तय कर रहे हैं,फंड भी राजनीतिक नजरिए से तय हो रहा है,संसाधनों का आवंटन भी राजनीति के आधार पर हो रहा है तो फिर स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय के स्तर पर छात्रों को राजनीति करने से मना क्यों किया जा रहा है ? कायदे से शिक्षा संस्थानों में संविधानसम्मत राजनीति की गंभीरता के साथ शिक्षा देनी चाहिए। संविधानसम्मत लक्ष्यों के अनुरुप शिक्षकों के दिलो-दिमाग को रुपान्तरित करने, लोकतांत्रिक नजरिया,लोकतांत्रिक संस्कार और आदतें विकसित करने के प्रयास किए जाने चाहिए। आज देश को संविधानसम्मत विवेक से लैस लोकतांत्रिक शिक्षक चाहिए।

सवाल यह है हम शिक्षा के जरिए किस तरह का व्यक्ति निर्मित करना चाहते हैं ? हम “नागरिक बनाना चाहते हैं या धार्मिक प्राणी या फिर उपभोक्ता बनाना चाहते हैं ? लोकतंत्र के विकास की बुनियाद है “नागरिक” और लोकतंत्र की विचारधारा है मानवाधिकार या संविधानप्रदत्त अधिकार। “नागरिक” बनाए वगैर संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा करना संभव नहीं है। आज स्थिति यह है कि शिक्षितों में बहुत बड़ा अंश है जो “नागरिकबोध” से वंचित है,देश में रहते हैं,देश का उपभोग कर रहे हैं लेकिन नागरिकचेतना से शून्य हैं। इसने इफ़रात में मध्यवर्ग के अंदर सर्वसत्तावादी राजनीति का आधार बनाया है।इस तरह के लोग जाने-अनजाने संविधान,लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ आए दिन आचरण करते नजर आते हैं।

आज जो शिक्षित है उसे लोकतंत्र नहीं ,तानाशाही अच्छी लगती है। यही हमारी शिक्षा की आयरनी है। यह वर्ग अपने निहित-स्वार्थों से आगे जाकर देख ही नहीं रहा। यही वह वर्ग है जिसको “सामाजिक न्याय” के नजरिए से चिढ़ है।यही वह वर्ग है जो शिक्षा और समाज के प्रति अपनी जवाबदेही से भागता है। उपेक्षितों से इसने खास दूरी बनायी है। समय-समय उनके हितों पर हमले किए हैं। आज देश में आरक्षण, धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सबसे ज्यादा वैचारिक और राजनीतिक हमले इसी वर्ग की ओर से हो रहे हैं और देश के सबसे घृणित राजनीतिक समूह (हिन्दुत्ववादियों) के द्वारा इस समूचे घृणा अभियान को शिक्षितों में नियोजित ढ़ंग से चलाया जा रहा है।एक जमाने में यही वर्ग आपातकाल में श्रीमती इंदिरागांधी और मनमोहन सिंह सरकार के साथ खड़ा था।

लोकतांत्रिक शिक्षा के लिए जरुरी है कि विश्वविद्यालय से लेकर स्कूल स्तर तक शिक्षा का समूचा तंत्र लोकतांत्रिक,पारदर्शी और जनशिरकत वाला बनाया जाय। शिक्षा में शामिल लोगों की व्यक्तिगत,सामुदायिक और सामाजिक जवाबदेही तय की जाय। आज स्थिति इतनी भयावह है कि सरेआम संविधान प्रदत्त अधिकारों और मूल्यों को चुनौती दी जा रही है और शिक्षितों में से उसका प्रतिवाद नजर नहीं आ रहा,बल्कि उलटे शिक्षितों का बड़ा समूह हमले कर रहा है।आज सतह पर निजीतौर पर जिम्मेदार नागरिक,शिरकत करने वाला नागरिक और न्याय केन्द्रित नागरिक दिख जाएगा। लेकिन हमें तो ऐसा नागरिक चाहिए जो नागरिकचेना के प्रति वचनवद्ध हो। हमें टुकड़ों में नागरिक हकों से प्यार करने वाला नागरिक नहीं चाहिए। एक अन्य चीज है जिस पर गौर करने की जरुरत है वह है अनुकरण और देशभक्ति, ये दोनों तत्व बेहद दुखदायी हैं, इनसे लोकतांत्रिक लक्ष्यों को हासिल करने में मदद नहीं मिलती, उलटे बाधाएं उठ खड़ी होती हैं। इसी तरह पड़ोसी से अच्छा बर्ताव या ईमानदारी पर अतिरिक्त जोर देने की जरुरत नहीं है ये तो लोकतंत्र के अंतर्निहित गुण हैं।

हमारी शिक्षा का तंत्र वस्तुतःगूंगे-बहरों का तंत्र है। इसमें आने वाले समाज की बहसें और मसलों पर वैचारिक सरगर्मी नजर नहीं आती। क्या हम मान बैठे हैं कि यथास्थिति बनाए रखें ? भविष्य में कुछ भी बदलना नहीं चाहते ? भविष्य के सवालों और समस्याओं पर अकादमिक जगत में सन्नाटा बताता है हमारा शिक्षित समुदाय किस कदर समाज निरपेक्ष है और उसे समाज के भविष्य की कोई चिन्ता नहीं है। यह उसके परजीवी विवेक का आदर्श नमूना है। सवाल यह है हमारी शिक्षा व्यवस्था यथास्थितिवादी है या परिवर्तनशील है ? बहुलतावादी संवेदना निर्मित करती है या धार्मिकचेतना निर्मित करती है ? साम्प्रदायिक ,जातिगत और धार्मिकभेदों को यह समाप्त क्यों नहीं कर पाई ? सच तो यही है कि बहुलतावाद के ऊपरी आवरण को हटा दें तो शिक्षा ने जमीनी स्तर पर भेदों की समाप्ति करने की बजाय भेदों की सृष्टि करने वाली संस्कृति,मूल्य और मानसिकता को निर्मित किया है।

लोकतांत्रिक शिक्षा का लक्ष्य है आलोचनात्मक विवेक पैदा करना। जबकि उपभोक्ता केन्द्रित मौजूदा शिक्षा का लक्ष्य है सर्वसत्तावादी विवेक पैदा करना। इसलिए मौजूदा मॉडल को अंदर और बाहर हर स्तर पर आलोचना के केन्द्र में रखने की जरुरत है। लोकतांत्रिक शिक्षा का परिवेश सामाजिक बहस के नए मुद्दों को जन्म दे सकता है,लोकतंत्र में पॉजिटिव भूमिका निभाने का माहौल बना सकता है। शिक्षकों की पॉजिटिव इमेज बना सकता है और छात्र को नागरिक बना सकता है।

लोकतांत्रिक अध्यापक- लोकतांत्रिक शिक्षा के लिए लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य,लोकतांत्रिक अकादमिक परिवेश और लोकतांत्रिक शिक्षक का होना जरुरी है। लोकतांत्रिक शिक्षक के बिना लोकतांत्रिक छात्र का निर्माण संभव नहीं है। शिक्षा को बदलने के लिए जरुरी है कि शिक्षकों के नजरिए,संस्कार,आदतें आदि को लोकतांत्रिक बनाया जाय, शिक्षक अपना कायाकल्प करें। लोकतंत्र की धारणा को स्पष्ट तौर पर समझें,लोकतंत्र का मतलब अ-राजनीतिक तंत्र नहीं है,वोट देना मात्र नहीं है,लोकतांत्रिक समाज का मतलब अ-राजनीतिक समाज नहीं है। लोकतंत्र का मतलब है राजनीतिक समाज,ऐसा समाज जिसमें समाज के सभी वर्गों और समुदायों के विकास,मूल्य ,आचार-व्यवहार आदि को लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी पर परखा जाय जो मूल्य खरे उतरें उन्हें बचाएं और जो अप्रासंगिक हैं उनको ठुकराएं। समानता, धर्मनिरपेक्षता ,सामाजिक न्याय और समाजवाद इसके भावी लक्ष्य हैं जिनको प्राप्त करना है।

आज हमारे बीच में इस तरह के लोग है जो शिक्षा के लोकतांत्रिकीकरण का खुलकर विरोध करते हैं और कहते हैं कि शिक्षा को राजनीति से मुक्त रखो। इस तरह के लोगों से यही कहना है कि लोकतंत्र में रहना है तो राजनीतिक होकर रहना होगा। राजनीति के बिना लोकतंत्र संभव नहीं है। लोकतांत्रिक राजनीतिक शिरकत और लोकतांत्रिक राजनीतिकबोध के बिना संवैधानिक मान्यताओं और मूल्यों की रक्षा करना संभव नहीं है। देश में राजनीतिकदलों और संसद से ऊपर है संविधान और उसकी मान्यताएं,हमें किसी भी कीमत पर संविधान के दर्जे को कम नहीं होने देना चाहिए। आज विभिन्न तरीकों से संविधान प्रदत्त मूल्यों और हकों पर हमले हो रहे हैं इन हमलों के खिलाफ आम जनता के साथ शिक्षित समुदाय को मिलकर संघर्ष करने की जरुरत है।आने वाले समय में मोदी सरकार नई शिक्षा नीति लाने जा रही है ,इस सरकार के रंग-ढ़ंग को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है ये लोग किस रास्ते देश की शिक्षा व्यवस्था को ले जाना चाहते हैं। यही वजह है हमें अभी से शिक्षा जगत में विभिन्न स्तरों पर आने वाली शिक्षा नीति के बारे में सचेत होकर जागरण अभियान चलाने की जरुरत है। अब तक के शिक्षा के अनुभवों को शेयर करने की जरुरत है,नए हमलों को विस्तार से अकादमिक जगत को बताने की जरुरत है,क्योंकि यह वर्ग सम-सामयिक यथार्थ से पूरी तरह विच्छिन्न है और उसे सम-सामयिक यथार्थ के लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य के साथ जोड़ने की जरुरत है।

शिक्षा के मौजूदा ढाँचे पर बातें करते समय एक पहलू है सरकारी नीति का,दूसरा पहलू है शिक्षक की अवधारणा का और तीसरा पहलू है छात्र के स्वरुप का। भारत में लोकतंत्र है और लोकतंत्र के बहुमुखी विकास में मदद करना हमारी शिक्षा प्रणाली का बुनियादी लक्ष्य होना चाहिए। इसके लिए जरुरी है कि हम लोकतंत्र की समझ बेहतर और गंभीर बनाएं।एक शिक्षक को आचार-व्यवहार और परिप्रेक्ष्य के लिहाज से लोकतांत्रिक होना चाहिए।वह अपने विषय़ को गंभीरता से जाने , छात्रों में अध्ययन और श्रम के प्रति गहन रुचि पैदा करने की उसमें क्षमता हो।वह पढ़ाई के अत्याधुनिक तरीकों से वाकिफ हो,अपने काम की जगह स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखना सिखाए,पुस्तकीय सामग्री और कम्युनिकेशन उपकरणों के उपयोग के तरीकों से परिचित हो।छात्रों में सबके साझे कार्यों में शिरकत की भावना पैदा करे, सामाजिक शिरकत और पहलकदमी के लिए प्रेरित करे। साथ ही छात्रों में समाज के प्रति सही दृष्टिकोण पैदा करे। हम यह ध्यान रखें कि शिक्षक के आचार-व्यवहार का छात्रों की सक्रियता पर असर पड़ता है। जो शिक्षक अपने छात्रों को सक्रिय न कर सके ,वह कमजोर शिक्षक माना जाएगा। छात्र में सक्रियता,शिरकत और पहलकदमी की भावना निर्मित करने में स्कूल शिक्षक बुनियाद निर्माण का काम कर सकते हैं। शिक्षा में सक्रियता का अर्थ है बच्चों को सोद्देश्य बौद्धिक क्रियाओं की ओर सक्रिय करना,बौद्धिक क्रिया और वस्तुजगत की एकता पर जोर देना। यदि यह प्रक्रिया एक बार आरंभ हो जाती है तो छात्रों को सही-गलत का फैसला करने में मदद मिलती है। साथ ही श्रम के महत्व को बच्चों के आचरण का अंग बनाना भी जरुरी है। हमारे बच्चे श्रम को पसंद नहीं करते,अपना काम अपने आप नहीं करते।इससे उनके अंदर श्रम विरोधी नजरिया पैदा होता है।



बुधवार, 23 सितंबर 2015

भ्रष्टाचार और माकपा



माकपा के पश्चिम बंगाल में निरंतर ह्रास के कारणों की पड़ताल की जानी चाहिए। बिना गंभीर पड़ताल के यह पता लगाना मुश्किल है कि माकपा इस दुर्दशापूर्ण अवस्था में कैसे पहुँची।   माकपा के अंदर और माकपा के बाहर बहुस्तरीय भ्रष्टाचार हमने करीब से देखा है। मैं 2005 तक पार्टी में था,बाद में पार्टी छोड़ दी। मसलन्, राज्य के विश्वविद्यालय सिस्टम में पेशागत सीनियरटी का कोई महत्व नहीं है। वाम जमाने में ऐसा सिस्टम बनाया गया कि उसमें पार्टी वफादार ही सीनियर होता था,उसे ही पदों पर बिठाया गया।विश्वविद्यालय के अंदर लोकतांत्रिकीकरण के नाम पर दलीय आदेश पर विभिन्न पदों पर लोग बिठाए गए और उनका मनमाफिक ढ़ंग से इस्तेमाल किया गया। किसी भी किस्म की सीनियरटी और अकादमिक विद्वत्ता को कभी भी माकपा ने कोई जगह नहीं दी। इस तरह के लोगों  को पश्चिम बंगाल में प्रोफेसर बनाया गया जिन्होंने एक निबंध लिखा,किसी विद्यार्थी को पीएचडी तक नहीं करायी,न स्वयं पीएचडी की। इस तरह की पदोन्नति और नियुक्ति पाने वाले लोगों में भाजपा से लेकर माकपा के लोग शामिल हैं,सभी किस्म की पदोन्नतियों और नियुक्तियों में माकपा का होना या माकपा की सिफारिश का होना ही एकमात्र शर्त थी। इस तरह के लोगों को उपकुलपति बनाया गया जिनका औसत अकादमिक रिकॉर्ड था। स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि यूजीसी के द्वारा प्रस्तावित अनेक नियमों की खुलेआम अवहेलना की गयी। विश्वविद्यालय के स्तर पर बनने वाली तमाम कमेटियों में उन लोगों को संयोजक और सदस्य बनाकर रखा गया जिनको नियमानुसार उसमें नहीं होना चाहिए। मसलन्, 60साल की उम्र पर रिटायर होने के बाद विश्वविद्यालय और विभाग की विभिन्न कमेटियों में वफादारों को बिठाकर रखा गया।यह काम इतने निर्लज्ज ढ़ंग से किया गया कि इसकी मिसाल सारे देश में मिलना संभव नहीं है। मैं यहां सभ्यता के नाते नाम नहीं लिख रहा । मेरे लिए दुखद बात यह भी रही है कि नियम-भंग की घटनाओं को विश्वविद्यालय प्रशासन की जानकारी में लाने के बावजूद कोई सुधार नहीं हुआ,यहां तक कि नियम-भंग में शामिल प्रोफेसरगण भी 60साल के बाद कमेटियों से कहने के बावजूद नहीं हटे। इस तरह माकपा ने लालझंड़े को तो कलंकित किया ही समूची अकादमिक व्यवस्था को भ्रष्ट लोगों से भर दिया।जिसके कारण राज्य में उच्चशिक्षा का समूचा ढ़ांचा बुरी तरह चरमरा गया । 

बुधवार, 25 जून 2014

डीयू शिक्षक आंदोलन के अछूते प्रश्न


         डीयू के शिक्षक आंदोलन कर रहे हैं, वे बड़े आंदोलन कर चुके हैं और अनेक आंदोलन जीत भी चुके हैं,यह भी सच है उनके अंदर अपने शिक्षकों के हितों की रक्षा का भाव बड़ा प्रबल है। शिक्षकों में इस तरह का जागरुक संगठन सभी कॉलेज-विश्वविद्यालयों में होता तो बहुत अच्छा होता। मैंने निजी तौर पर उनके अनेक संघर्षों में समर्थक के नाते हिस्सा भी लिया है। वहां संगठन करने वाले नेताओं में एक अच्छा-खासा अंश बेहद संवेदनशील और जागरुक है। लंबे संघर्षों को लड़ने का जो तजुर्बा डीयू के शिक्षकसंघ के पास है वैसा अनुभव अन्यत्र किसी भी विश्वविद्यालय के शिक्षक संगठन को नहीं है।

शिक्षकों के अनेक मूल्यवान हकों को दिलाने में डीयू शिक्षकसंघ की महत्वपूर्ण और नेतृत्वकारी भूमिका रही है। लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि डीयू के शिक्षकसंघ का इस विश्वविद्यालय के अकादमिक स्तर को ऊँचा उठाने में बहुत कम योगदान है। मसलन् शिक्षकों के द्वारा अकादमिक जिम्मेदारियों का ठीक से पालन हो इस ओर शिक्षकसंघ ने ध्यान ही नहीं दिया। इस विश्वविद्यालय के शिक्षकों के पास भारत में सबसे अधिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुविधाएं हैं, संसाधन हैं,पगार भी बेहतरीन है।लेकिन शैक्षणिक वातावरण में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है । उलटे अकादमिक वातावरण में गिरावट आई है।

शिक्षकों में भाई-भतीजावाद चरम पर है. शिक्षकों की कक्षाओं में अनुपस्थिति खूब रहती है। प्रिफार्मेंस जरुरत के अनुरुप नहीं है। शिक्षकसंघ को इन चीजों को देखना चाहिए।

शिक्षक संघ में इसके विपरीत एक बीमारी घुस आई है कि वे शिक्षकों को गैर-पेशेवर बनाने में लगे रहते हैं। वे गैर-अकादमिक कार्यों में मशगूल रखते हैं। शिक्षक संघ का काम सिर्फ आंदोलनकारी निर्मित करना नहीं है बल्कि उसका काम पेशेवर शिक्षण को बढ़ावा देना भी है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में तीन साला कोर्स रहे या चारसाला कोर्स रहे, यह महत्वपूर्ण नहीं है। पढ़ाने वाले कैसे हैं ? क्या पढ़ाने वाले शिक्षकों के स्तर में सुधार आएगा ? विश्वविद्यालय और कॉलेजों में समस्या कोर्स के साथ साथ शिक्षक की भूमिका की भी है। शिक्षकों में एक बड़ा वर्ग ऐसा पैदा हुआ है जो शिक्षा के दायित्वों को मांग-पूर्ति के फ्रेमवर्क में निभाता रहा है। इसमें भी अनुपस्थित शिक्षकों की तादाद बहुत बड़ी है। ये लोग कभी कक्षा में नहीं जाते।

शिक्षकसंघ की यह भूमिका भी है कि शिक्षकों को मजबूर करे कि वे समय पर कक्षा में जाएं और अपनी टीचिंग के स्तर को गुणवत्तापूर्ण बनाएं। मुझे नहीं मालूम कि शिक्षक संघ ने कभी इससे जुडे मसलों पर आंदोलन किया हो या शिक्षकों में जनजागरण अभियान चलाया हो।

शिक्षकों की सामान्य मानसिकता है कि वे हर चीज को रूटिन या रूढि में बदल देते हैं। शिक्षक की मानसिकता रुढिबद्धता से मुक्त होकर कक्षा और अनुसंधान मेंभूमिका निभाए इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया।

जो शिक्षक समाज का प्रेरक है उसके हकों के लिए लड़ना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण है शिक्षक को पेशेवर शिक्षक में रुपान्तरित करना। शिक्षक को पेशेवर शिक्षक में रुपान्तरित किए बिना शिक्षा को नहीं बचा सकते।इस समाज को मरने से नहीं बचा सकते।

शिक्षकों में राजनीति हो, लेकिन पेशेवर शिक्षा की चेतना भी हो। हमारे शिक्षकों और शिक्षक संगठनों ने दुनिया से बहुत कुछ सीखा है लेकिन पेशेवर शिक्षण की कला बहुत कम शिक्षकों ने सीखी है। हम लोगों के बीच पेशेवर शिक्षक दुर्लभ होते जा रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में स्थिति तो और भी भयावह है। शिक्षक संगठनों ने शिक्षक को पेशवर शिक्षक बनाने की जिम्मेदारी निभायी होती तो जो चीजें डंडे से चलायी जा रही हैं वे बातों से हल हो सकती थीं।

शिक्षकों में पेशेवराना नजरिए को विकसित न कर पाने के कारण हम दुनिया में पिछड़ते जा रहे हैं। चारसाला कोर्स के प्रसंग में टीवी पर आए कवरेज में यह बात सामने आई कि इस कोर्स का स्तर बड़ा घटिया है या इसमें प्राथमिक स्तर की चीजें पढाई जा रही हैं। सवाल यह है कि यह प्राथमिक स्तर का कोर्स भी डीयू के शिक्षकों ने बनाया है। हमें इस सवाल पर सोचना चाहिए कि शिक्षको में ज्ञान का ऊँचा स्तर क्यों नहीं है ? डीयू के प्रशासक भी शिक्षक हैं,इसके बावजूद शिक्षा में निम्नस्तर के साल जब उठ रहे हैं तो यह इस बात का संकेत है कि डीयू का समग्रता में अकादमिक स्तर जितना ऊँचा होना चाहिए वैसा नहीं बन पाया है।

शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने में प्रशासन के अलावा शिक्षक संगठन की बड़ी भूमिका हो सकती है लेकिन इस भूमिका की ओर शिक्षकसंघ ने कभी ध्यान नहीं दिया। मूल सवाल यह है कि शिक्षकसंघ ने पेशेवर शिक्षक के निर्माण में भूमिका अदा क्यों नहीं की ? क्या शिक्षकसंघ इस जिम्मेदारी से बच सकते हैं ?

शिक्षकसंघ यदि हकों की जंग लड़ना जानता है तो उसे यह भी जानना चाहिए कि पेशेवर शिक्षा का माहौल कैसे बनाया जाता है ? शिक्षकों के हकों की लडाई तात्कालिक होती है लेकिन पेशेवर शिक्षा का माहौल बनाए रखने की लडाई अहर्निश लड़नी पड़ती है। हमारे शिक्षक संघ शिक्षा की पेशेवर जंग के एकदम विपरीत खड़े रहते हैं, शिक्षकहकों की रक्षा के नाम पर कामचोर और नियमविरुद्ध काम करने वाले शिक्षकों के साथ ही हमेशा नजर क्यों आते हैं ?

शिक्षकों के लोकतांत्रिक हकों में पेशेवर गुणवत्ता विकसित करने की कला का भी स्थान है। पेशेवर कौशल हासिल करना मानवाधिकार का अंग है। मानवाधिकारों में सिर्फ सुविधाएं ही नहीं आतीं।राजनीतिक हक ही नहीं आते अपितु पेशवराना कौशल निर्मित करना भी आता है। डीयू के शिक्षकसंघ ने आंदोलन किए और जीते लेकिन पेशेवर शिक्षक तैयार करने की ओर ध्यान नहीं दिया।



जो शिक्षकसंघ को ट्रेड यूनियन की तरह चला रहे हैं वे क्या बताएंगे कि यदि किसी फैक्ट्री में मजदूर काम में गैर पेशेवर हो,अकुशल ढ़ंग से काम करे तो क्या कोई मालिक उसे सहन करेगा ? क्या कारखाने का स्तर बचा रहेगा ? फिर शिक्षा में ही अकुशल शिक्षक की हिमायत क्यों की जाती है ? अकुशल शिक्षकों को नौकरी से क्यों नहीं निकाला जाता ? क्या शिक्षा का काम फैक्ट्री मजदूर के काम से कम महत्व का है ? जिस तरह अकुशल मजदूर कारखाने के लिए मुसीबत होता है वैसे ही अकुशल शिक्षक भी। हमें अपना नजरिया बदलना होगा। हम अकुशल वकील पसंद नहीं करते अकुशल डाक्टर पसंद नहीं करते हम अकुशल शिक्षक क्यों बनाए रखते हैं और पसंद करते हैं ?

रविवार, 17 जून 2012

ब्रात्य बसु की कल्पनाशीलता के शिक्षा में नए रंग


रंगकर्मी-अध्यापक ब्रात्य बसु को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक साल पहले उच्चशिक्षामंत्री बनाकर शिक्षा में परिवर्तन का जो सपना देखा था उसके अभीप्सित फल पाने आरंभ हो गए हैं। ब्रात्य बसु की रंगकर्मी के नाते सर्जनात्मक मेधा धीरे धीरे रंग दिखाने लगी है। उच्चशिक्षा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन करने में ब्रात्य बसु को सफलता मिली है इससे पश्चिम बंगाल के अकादमिक जगत में शांति और स्वायत्तता का माहौल लौटा है। अकादमिक परिवर्तनों के प्रति आम शिक्षक का विश्वास भी लौटा है।

पश्चिम बंगाल का सारे देश में बेहतरीन शिक्षा व्यवस्था के लिए सुनाम रहा है। वाममोर्चा के 34 साल के शासन में इस सुनाम में कुछ कमी आई ,लेकिन शिक्षा का माहौल मोटेतौर पर सारे देश की तुलना में बेहतर रहा है। अकादमिक नियुक्तियों में अनेकबार शिकायतें आईं ,लेकिन वाममोर्चा सरकारों ने उन शिकायतों की बार -बार अनदेखी की। यदि अनदेखी न करके समय रहते हस्तक्षेप किया जाता तो बेहतर परिणाम आने की संभावनाएं थीं। इसके बाबजूद सन् 1977 में वामशासन आने के बाद अकादमिक जगत में व्याप्त अराजकता,मनमानी और राजनीतिक हस्तक्षेप पर पाबंदी लगी। कक्षाएं और परीक्षाएं जो अराजक ढ़ंग से होती थीं. उनको नियमित किया गया। शिक्षासंस्थाओं का लोकतांत्रिकीकरण किया गया। विभिन्न स्तरों पर नियमों के अनुसार काम करने,नियमों के अनुसार नियुक्तियां करने और उच्चशिक्षा के विकास के साथ प्राइमरी शिक्षा के विकास को प्रधान एजेण्डा बनाया गया।

पश्चिम बंगाल में सन् 1990 के बाद पठन-पाठन में शिथिलता आई थी जिसे बाकायदा नियमित करके दुरूस्त किया गया लेकिन विभिन्न स्तरों पर माकपा के हस्तक्षेप को नियंत्रित करने और विभिन्न कमेटियों को सुचारू रूप से चलाने में जो दिक्कतें आ रही थीं उनके सुधार के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया।

एक साल पहले राज्य में ममता सरकार विशाल बहुमत से जीतकर सत्ता में आयी तो उसने वायदा किया कि राजनीतिक हस्तक्षेप से शिक्षाक्षेत्र की नीतियों और नियुक्तियों को मुक्त रखा जायगा। विगत एक साल में इन दो मोर्चों पर ममता सरकार और खासकर राज्य शिक्षामंत्रालय की भूमिका प्रसंशनीय रही है। ममता सरकार आने के बाद पहला बड़ा काम यह हुआ है कि शिक्षासंस्थाओं में राजनीतिक दबाब और आतंक का माहौल टूटा है। आम शिक्षक-छात्र आज पहले की तुलना में ज्यादा मुक्त वातावरण का अनुभव कर रहे हैं। जिन लोगों को पुराने माहौल का अनुभव है ,जो पुराने माहौल के अंधभक्त हैं ,उनके लिए यह परिवर्तन गले नहीं उतर रहा है।

यह सच है कि शिक्षासंस्थाओं में विभिन्न राजनीतिकदलों के लोग काम करते हैं।प्रशासनिक ईकाइयों में भी वे हैं। यह स्थिति पहले भी थी। लेकिन एक बड़ा अंतर आया है। नीतियों को लागू करते समय झंड़े के रंग पर नजर न होकर नीतियों के अनुपालन पर जोर दिया जा रहा है। नीतियों का पालन करते हुए निजीतौर पर कोई भी व्यक्ति मतभिन्नता रख सकता है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। शिक्षानीति या विश्वविद्यालय प्रशासन या उच्चशिक्षा परिषद के फैसलों को पार्टी फैसले के रूप में यांत्रिक तौर पर लागू करने पर जोर दिया गया और पार्टीतंत्र का हर स्तर पर दुरूपयोग किया गया।जबकि इस स्थिति से बचा जा सकता था।

वाममोर्चे के विगत शासन की सबसे बड़ी असफलता यह थी कि वहां पर पार्टीतंत्र और शिक्षा की स्वायत्त व्यवस्था का भेद ही खत्म हो गया था। ममता सरकार ने पार्टीतंत्र से स्वतंत्र होकर शिक्षानीति के अनुपालन को सुनिश्चित करने के बारे में जो नीतिगत फैसले लिए हैं वे स्वागतयोग्य हैं। इससे शिक्षा को स्वायत्त और आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिलेगी।

पश्चिम बंगाल में जिस तरह का राजनीतिक ध्रुवीकरण है उसमें राजनीतिकदलों से शिक्षातंत्र में काम करने वालों की प्रतिबद्धता में कमी नहीं आएगी । लेकिन शिक्षा संबंधी फैसलों को पेशेवराना ढ़ंग से लागू करने से पार्टी और शिक्षा के बीच में जो घालमेल हुआ था वह कम होगा।

इसके अलावा पूरे राज्य में कॉलेज और विश्वविद्यालयों के स्तर पर शिक्षक –कर्मचारी और छात्रसंघों के चुनाव इक्का-दुक्का त्रासद घटनाओं को छोड़कर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढ़ंग से हुए हैं।राज्य सरकार की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है।

नई सरकार को आए एक साल हो गया है और शिक्षा के क्षेत्र में नई सरकार के नए कदमों की आहट महसूस की जा सकती है। राज्य सरकार ने शिक्षा नीति के मामले में कई सटीक नए कदम उठाए हैं जिनके सुफल कुछ अर्सा बाद दिखेंगे। आम शिक्षकों और विद्यार्थियों में यह धारणा है कि शिक्षा क्षेत्र में ममता सरकार कुछ खास नहीं कर पाएगी। लेकिन शिक्षामंत्री ब्रात्य बसु और उच्चशिक्षा परिषद की कल्पनाशील बुद्धि के कारण इस मिथ को तोड़ने में सफलता मिली है। यह सच है वामशासन में शिक्षा संस्थाओं में बना लोकतांत्रिक ढ़ांचा मुश्किलें पैदा कर रहा था।उस ढ़ांचे की जगह नए ढ़ांचे की परिकल्पना को साकार करके नई संरचनाएं बनायी गयी हैं जिनके बारे में शिक्षकों के एकवर्ग में संशय है। लेकिन शिक्षामंत्रालय और उच्चशिक्षा परिषद ने जिस कौशल और पेशेवराना ढ़ंग से राज्य की समूची शिक्षा व्यवस्था को संभालना आरंभ किया है उससे भविष्य में शिक्षा में सुधार की संभावनाएं पैदा हुई हैं।

मसलन् विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति पदों पर पेशेवर योग्यता को महत्व देकर नियुक्तियां की गयी हैं और इस मामले में राज्य सरकार ने राजनीतिक-निरपेक्षता का अपना वायदा निभाया है। कुलपतियों की नियुक्तियों में अकादमिक-प्रशासनिक क्षमताओं का ख्याल करके नियुक्तियां करके शिक्षा संस्थानों के मुखिया के पद को पेशेवर बनाकर नई दिशा दी है। इसी तरह समग्रता में देखें तो नीतिगत मसलों पर ममता सरकार ने पुरानी वाममोर्चा सरकार के द्वारा बनायी कई बुनियादी नीतियों को जारी रखा है ,जहां असहमति थी वहां नए सुधार किए गए हैं। इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण है राज्य में उच्चशिक्षा के क्षेत्र में चली आ रही दाखिला नीति में मूलभूत परिवर्तन। इस परिवर्तन के तहत 2012-13 के सत्र से ही स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में राज्य के बाहर के विद्यार्थियों के लिए 50 फीसदी सीटें आरक्षित करने का उच्चशिक्षा परिषद का सुझाव है। उल्लेखनीय है अभी तक मात्र 5 फीसदी सीटें बाहर के छात्रों के लिए आरक्षित थीं। इस सुझाव को उच्चशिक्षा परिषद ने समस्त विश्वविद्यालयों के कुलपतिपतियों को भेजा है और अनुरोध किया है कि वे अपने यहां इसी साल से यह सुझाव लागू करने की कोशिश करें।इससे शिक्षा के क्षेत्र में चला आ रहा अंधक्षेत्रीयतावादी सोच बदलेगा।

इसके अलावा अगले साल से स्नातक-स्नातकोत्तर कक्षाओं में राज्यस्तरीय प्रवेश परीक्षा के आधार पर दाखिले लिए जाने की संभावनाओं पर विचार चल रहा है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता और शैक्षणिक क्षमता का विकास करने में मदद मिलेगी। मेधावी विद्यार्थियों को दाखिला पाने में सुविधा होगी। विभिन्न विश्वविद्यालयों में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए जा रहे हैं,इससे विश्वविद्यालय प्रशासन ,परीक्षा और कक्षाओं के सुचारू संचालन में मदद मिलेगी।

कायदे से शिक्षामंत्री को विश्वविद्यालयों के नियमित अकस्मात दौरे करने चाहिए और कुलपतियों और विभिन्न अधिकारियों को भी कक्षाओं के दौरे करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इससे अकादमिक वातावरण में तेजी से सुधार आएगा। राज्य सरकार ने अकादमिक गुणवत्ता में सुधार के लिए इसी सत्र से विभिन्न विश्वविद्यालयों में छात्रों के द्वारा शिक्षकों के शिक्षणकार्य का मूल्यांकन कराने का फैसला लिया है। इससे शिक्षकों की जबावदेही बढ़ेगी और पठन-पाठन के माहौल को और भी प्रभावशाली बनाने में मदद मिलेगी। पिछली वाममोर्चा सरकार के कदमों का अनुसरण करते हुए स्नातक-स्नातकोत्तर स्तर पर 10 फीसद सीटों में इजाफा किया गया है। इससे शिक्षा और भी ज्यादा लोगों तक पहुँचेगी। लेकिन मुश्किल यह है कि अनेक विभागों में बैठने की सुविधा ही नहीं है।ऐसी स्थिति में सर्जनात्मक ढ़ंग से इस फैसले को लागू किया जाय। यांत्रिक ढ़ंग से लागू करने से अनेक दिक्कतें खड़ी हो सकती हैं। इसके अलावा उच्चशिक्षा मंत्रालय को राज्य के शिक्षक-कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार उनकी बकाया राशि का जल्द भुगतान करना चाहिए इससे शिक्षक-कर्मचारियों का राज्य सरकार के कामों के प्रति विश्वास और भी पुख्ता बनेगा।

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

पश्चिम बंगाल की शिक्षा में बाहुबलियों की जंग के निहितार्थ

पश्चिम बंगाल के शिक्षाजगत में वफादारों और बाहुबली गिरोहों में जंग छिड़ी हुई है। राज्य में छात्रसंघ चुनावों का सच है कि वाम छात्र संगठन अपने विरोधी को नामांकन जमा नहीं करने देते। फलतःहिंसा हो रही है। एक-दूसरे पर हिंसक हमले किए जा रहे हैं। मीडिया प्रबंधन ने हिंसा को अर्थहीन और रूटिन घटना में तब्दील कर दिया है। हिंसा करने वाले शर्मिंदा होने की बजाय गर्वित महसूस कर रहे हैं। बढ़-चढ़कर बयान दे रहे हैं। असल में शिक्षा में नंदीग्राम के प्रेत घुस आए हैं। इन प्रेतों के हमलों के कारण ही हावड़ा के अंदूल में एक छात्र की मौत हो गयी, एक छात्र को अपनी आंखों से हाथ धोना पड़ा। नंदीग्राम के प्रेत किसी एक दल में नहीं है बल्कि एकाधिक दलों में हैं। इनकी पद्धति है  शिक्षामंदिरों में नंदीग्राम की तर्ज पर नकली मसले उठाना और हिंसा करना। पश्चिम बंगाल के विभिन्न कॉलेज और विश्वविद्यालयों में नंदीग्राम के प्रेत जिस तरह हिंसाचार कर रहे हैं उसने उच्चशिक्षा से लेकर प्राथमिक शिक्षा तक सभी स्तरों पर अराजकता ,भय और असुरक्षा के वातावरण की सृष्टि की है। सारे राज्य में विवेकहीन बहादुरी के नारे के आधार पर हिंसा का तांडव चल रहा है। इसके कारण अपराधी गिरोहों की बल्ले-बल्ले हो गयी है। भय और असुरक्षा का वातावरण बना है।
    विवेकहीन बहादुरी की राजनीति पहले हाशिए पर थी आज केन्द्र में है। पश्चिम बंगाल में उच्चशिक्षा का स्तर देश के विभिन्न राज्यों से कईगुना बेहतर है। परीक्षाएं और कक्षाएं समय पर होती है। परीक्षाफल समय पर निकलते हैं। उच्चशिक्षा की कक्षाओं में पढ़ने वाले छात्र भरे रहते हैं। कम फीस ली जाती है। विभिन्न विषयों में सालाना भर्ती होने वाले छात्रों की संख्या बढ़ी है। चंद अपवादों को छोड़कर शिक्षा संबंधी सभी फैसले नियमों के आधार पर लिए जाते हैं। शिक्षा में शांति का वातावरण है। लेकिन कुछ सालों से शिक्षा विवेकहीन बहादुरों के निशाने पर है।
   विवेकहीन बहादुरों का मानना है शिक्षा में राजनीति नहीं चलेगी। यह नकारात्मक माफिया नारा है। इसके बहाने शिक्षा के लोकतांत्रिक ढ़ांचे पर भीतर और बाहर से हमले हो रहे हैं। वामदल अंदर से हमले कर रहे हैं तो गैर वामदल बाहर से हमले कर रहे हैं। दोनों उत्तेजक नारे और नकली मांगों के आधार पर सीधे एक्शन में हैं। यह सिलसिला विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में देखा जा सकता है।दोनों पक्ष सीधे एक्शन में हैं।  सीधे एक्शन का अर्थ है तोड़फोड़,मारपीट, धमकी, हिंसा, बमबाजी आदि। इसका मकसद है शिक्षादखल। शिक्षादखल माफिया फंडा है। इससे शिक्षा माफिया पैदा होगा। अनुयायी और माफिया दोनों की राजनीति का यही मूल साझा लक्ष्य है। दोनों एक-दूसरे को हिंसा के हथियार से मारना चाहते हैं। एकबार हिंसा या विवेकहीन बहादुरी का फिनोमिना युवाओं के दिमाग में घुस गया तो बाद में उससे समूची शिक्षा व्यवस्था को ही खतरा पैदा हो जाएगा। चाकू और बम की नोंक पर चुनाव जीतने वाले कितनी भी जेनुइन मांगें उठाएं अंततः सारे फैसले चाकू की नोंक पर ही होंगे। इन दिनों सुनियोजित ढ़ंग से कॉलेज और विश्वविद्यालयों के आसपास जितने भी विभिन्न दलों के पार्टी दफ्तर हैं उनमें काम करने वाले सक्रिय कार्यकर्ता ऐसे लोगों को रखा गया है जो बाहुबली हैं। जिनका अपराधी अतीत है। ये छात्रों-शिक्षकों और कर्मचारियों में भय और आतंक की सृष्टि कर रहे हैं।  
   राज्य की शहरी आम राजनीति का मूलाधार है छात्र राजनीति । पश्चिम बंगाल के अर्द्घ-फासी आतंक के हिंसक माहौल को नष्ट करके सामान्य शांति का वातावरण बनाने और राज्य में सुव्यवस्था स्थापित करने में छात्र राजनीति की केन्द्रीय भूमिका रही है। कम से कम 35 साल के शासन में पश्चिम बंगाल की छात्र राजनीति ने गुण्डे-अपराधी छात्रनेता पैदा नहीं किए । फलतः पश्चिम बंगाल में ईमानदार और सभ्य इमेज के वामनेताओं का आज भी राज्यस्तर पर दबदबा है, स्वयं मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य साफ-सभ्य और सुसंस्कृत छात्र राजनीति का आदर्श नमूना हैं। उनकी अनेक बातों पर आलोचना की जा सकती है लेकिन उनकी व्यक्तिगत इमेज एक ईमानदार, सुसंस्कृत आदमी की है।
    उच्चशिक्षा में इन दिनों जो हिंसा हो रही है उसके अनेक कारण हैं उसमें सबसे बड़ा कारण है छात्र राजनीति में अधूरा जनतंत्र। इसके लिए वामदल जिम्मेदार हैं। वामदलों ने शिक्षा के लोकतांत्रिकीकरण का जो मॉडल यहां लागू किया है उसने विपक्ष के सफाए का काम किया है,लोकतंत्र का अर्थ विपक्ष को हजम कर जाना नहीं है। शिक्षा में लोकतांत्रिकीकरण ने भिन्न मतों और दलों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी है। इसके कारण विभिन्न स्तरों पर छात्रों-शिक्षकों की फैसलेकुन कमेटियों में शिरकत घटी है। पक्षपात  और गैर पेशेवर लोगों का मनमानापन बढ़ा है। इसके कारण शिक्षा में व्यापक असंतोष पैदा हुआ है। इसका गैर वामदल फायदा उठा रहे हैं फलतःहिंसक टकराव हो रहे हैं।
    वामदलों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को इस कदर सजाया है कि उसमें अन्य के लिए कोई जगह नहीं है। ध्यान रहे अन्य के बिना लोकतंत्र निरर्थक है। यह स्थिति बदलनी चाहिए। गैर वाम विचारों के छात्रों-शिक्षकों और कर्मचारियों के प्रति दोस्ताना और समान नजरिया व्यवहार में विकसित किया जाना चाहिए। विभिन्न स्तरों पर अकादमिक पेशेवर कुशलता ,अनुभव और श्रेष्ठता को बढ़त मिलनी चाहिए। शिक्षा में लोकतंत्र के नाम पर अकादमिक वरिष्ठता के उल्लंघन से बचना चाहिए। शिक्षा में वफादार और माफिया दोनों से लड़कर ही लोकतंत्र स्थापित हो सकता है। शिक्षा में लोकतांत्रिकीकरण के नाम पर वाम ने वरिष्ठता और सामयिक अकादमिक जरूरतों की उपेक्षा की है। शिक्षा में लोकतंत्र को पार्टीतंत्र में रूपान्तरित किया है इसके कारण हिंसा पैदा हो रही है। उच्चशिक्षा में गैर पेशेवरों को महिमामंडित किया है ,पद दिए हैं,नौकरियां दी हैं ,इससे उच्चशिक्षा व्यवस्था गंभीर संकट में फंस गयी है। शिक्षा में अकादमिक श्रेष्ठता की बजाय पार्टी बफादारी पर बल दिया है। जिसके कारण उच्च शिक्षा में मंदमतियों की बाढ़ आ गयी है।वाम राजनीति को बचना है तो वफादारों के गिरोहों से बाहर आना होगा। ये बातें वाम सरकार के उच्चशिक्षा पर बने अशोक मित्र कमीशन की अप्रकाशित रिपोर्ट में रेखांकित की गयी हैं।   

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

अमेरिका और ब्रिटेन में शिक्षकों पर बढ़ते हमले

   शिक्षकों पर विभिन्न बहानों से अमेरिका और ब्रिटेन में हमले बढ़ रहे हैं। जो लोग ओबामा के आने के बाद अमेरिका में जनतंत्र के लिए भविष्य का सपना देख रहे थे। उनके लिए बुरी खबर है कि ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों के अधिकारों पर हमले बढ़े हैं। इन हमलों के लिए तथाकथित नैतिकता के पैमानों का,खासकर फेसबुक पर अभिव्यक्ति के रूपों को बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। यहां हम एक पूरा आलेख अंग्रेजी में दे रहे हैं । यह लेख वर्ल्ड सोशलिस्ट वेब साइट http://www.wsws.orgसे साभार लिया गया है। 
Teachers’ democratic rights under attack in US
By Isabelle Belanger
22 October 2010

The following article was written by a public school teacher in western New York.

Public school teachers are not only being scapegoated for low test scores and hit with wage and job cuts, they are also facing an increasing assault for exercising their basic democratic rights while off the job. There has been a steady and alarming rise in the number of teachers being persecuted for activities conducted during their personal time under the guise of protecting children from immoral influences.
This includes penalties and termination for consuming or purchasing alcohol while off duty, expressing frustrations over work-related issues on social networking websites, voicing or participating, outside of the work place, in political activities such as serving as an escort at a Planned Parenthood clinic.

The victimization of teachers for such “offenses” is inseparable from the attack on public education being spearheaded by the Obama administration. Political and school authorities who have no moral qualms about stripping children of the right to decent education insist that teachers uphold arbitrary moral standards or face the loss of their jobs.
Officials are fishing for any excuse to destroy the hard-won right to tenure and job security, which opponents of public education have long denounced as the greatest obstacle to firing “bad” teachers. Secondly, the arbitrary dismissals are being used to restrict free speech and regiment teachers, and will ultimately be used to intimidate opponents of the attack on teachers and the right to public education.

There is the now famous story of Ashley Payne, the Georgia teacher who was fired from her job after she posted summer vacation photos on her Facebook page, several of which showed her sitting with beer or wine glasses nearby or in her hand, but none depicting signs of intoxication or illegal activity. In addition, an obscenity was found on her page. For these reasons alone, she was called into her principal’s office and told she had to resign immediately.
Then there is the case of the Florida teacher fired after photos of her in a bikini surfaced on a website that also revealed she worked a part time job as a “bikini girl” for a charter fishing boat outfit. She defended herself, stating that she worked the second job because her teaching job did not pay enough, but she was fired from her teaching position anyway.
Another teacher was suspended for 30 days from her job, without pay, when a photo of her surfaced on Facebook taken at a bachelorette party. What is most alarming about this incident is that the teacher did not even post the picture herself, but rather it was posted unbeknownst to her on a friend’s page. Then there is also the case of a non-Catholic teacher, hired in Catholic school in Sacramento, California. Although hiring practices maintain that teachers do not have to be Catholic to teach there, this particular teacher was fired when a parent of a student noticed the teacher serving as an escort for clientele at a Planned Parenthood clinic on a Saturday morning.
Similar attacks are occurring in other countries too, including Britain, where the General Teaching Council was ostensibly created “to contribute to improving standards of teaching and the quality of learning, and to maintain and improve standards of professional conduct among teachers, in the interests of the public.” The Council, which was immediately unpopular with teachers in the UK, was nevertheless forced upon teachers, who were required to sign up and follow its mandates. Since then, teachers have found themselves in the position of being charged with immoral conduct by members of the public, for everything from drinking in public establishments, to modeling nightwear as a second career. Like teachers in America, they are often encouraged to resign their positions immediately, to avoid a prolonged and embarrassing public trial, where their careers suffer more damage than if they had just resigned.

In the late 19th and early 20th centuries, rules of moral conduct were imposed on American teachers that appear absurd in light of contemporary values, beliefs in the separation of church and state, and how we view ourselves as members of a democratic society. Here are a few examples taken from the Rules for Teachers published in 1872 (courtesy of the Portage County Historical Society in Wisconsin):
Each teacher will bring a bucket of water and a scuttle of coal for the day’s session.
Men teachers may take one evening each week for courting purposes, or two evenings a week if they go to church regularly.
After 10 hours in school, the teachers may spend the remaining time reading the Bible or other good books.
Women teachers who marry or engage in unseemly conduct will be dismissed.
Every teacher should lay aside from each pay a goodly sum of his earnings for his benefit during his declining years so that he will not become a burden on society.
Any teacher who smokes, uses liquor in any form, frequents pool or public halls, or gets shaved in a barbershop will give good reason to suspect his worth, intention, integrity and honesty.
The teacher who performs his labor faithfully and without fault for five years will be given an increase of 25 cents per week in his pay, providing the Board of Education approves.

Likewise, New Hampshire published its own rules for teachers in 1915, which repeat, in so many words, those listed above, but also included a few other interesting restrictions:
You are not to keep company with men.
You must be home between the hours of 8 p.m. and 6 a.m. unless at a school function.
You may not loiter downtown in any of the ice cream stores.
You may not smoke cigarettes.
You may not dress in bright colors.
Your dresses may not be any shorter than 2 inches above the ankles.
Many may laugh at these restrictive and ridiculous rules, but they were only overturned through great social struggles. New Jersey became the first state to pass tenure legislation when, in 1910, it granted fair-dismissal rights to college professors. The suffrage movement of the 1920s and the mass labor struggles of the 1930s, led to the extension of such rights to elementary and high school teachers.
However, during the anti-communist witch-hunts of the 1950s, hundreds of public school teachers were forced to resign and were blacklisted after refusing to sign “loyalty oaths,” inform on other teachers, or simply because of their political beliefs. According to FBI records, from 1951-1955, the FBI disseminated derogatory personal and political information to the employers of more than 400 public school teachers and college professors. The cost to the victims of the McCarthyism was not only economic and professional; consider the example of Minnie Gertrude, an unassuming public school teacher who took her own life in 1948, after being questioned by investigators about her politics and being threatened with insubordination when she refused to cooperate.

In the late 1960s and early 70s, teachers pushed back intrusive rules and arbitrary victimization, through job security protections gained in the course of militant trade union battles. Since the 1980s, however, the teachers unions have worked hand-in-hand with the two big business parties to undermine gains made by teachers. This has culminated in the open collaboration by the American Federation of Teachers and the National Education Association with the Obama administration in the greatest assault on teachers and public education in history.

The intrusive attack on teachers’ private lives prompted one educator to write on a teachers’ blog: “I live far away from…friends and family and Facebook has been a great way…to share…what’s going on in our lives. But since I’m held to some imaginary higher standard, I’m not allowed to have my Facebook page? No wonder our best and brightest are going into other careers. Work incredibly hard, don’t get paid enough, be responsible for curing all of society’s ills, and be held to a standard that no one else can live up to. Yep, that’s being a teacher!”
While one naturally laughs when reading the rules imposed on teachers a century and more ago, perhaps we should think about the rules being imposed on teachers today, and how they might look to a reader 100 years from now:
Each teacher will bring school supplies, purchased with his or her own funds, to furnish students too poor to afford their own.
Each teacher will supply snacks in his or her classroom, purchased with his or her own funds, for students who are too impoverished to receive adequate sustenance at home.
While teachers are allowed to socialize during their off hours, they should be careful to do so far from their home district (50 miles away is a good recommendation), and to refrain from drinking alcohol or participating in any activity to which a parent could object, including smoking cigarettes, wearing of a bathing suit, going to adult-themed parties such as bachelor or bachelorette parties, or overtly flirting with another person. Also, do not purchase alcohol in a store, as a parent may be present, or a student with a camera phone, who could take a picture of you and distribute such evidence to friends.
Under no circumstances should you allow anyone to take a photograph of you at any public gathering in which alcohol is present or other adult activities are taking place.
Teachers shall not share political or religious views in any public setting, or participate in such, even if it is done on their own time. Even if you use a fabricated name or do so anonymously, you will be held responsible if anyone discovers and reveals your real identity.
Do not have a social networking page, even if you do so privately and do not accept or invite students or parents as friends. Do not have a page with your own identity, even if it is the only way for friends and family members to find you, as anything you share, no matter how seemingly innocent, can and will be held against you.
The teacher who performs his or her labor faithfully for three years will be given tenure, which actually does not mean anything anymore, and your wages will be frozen to help the economy. Furthermore, your retirement benefits will be slowly chipped away at until there are none, so you should expect to lay aside a goodly sum from your earnings for your benefit during your declining years so that you do not become a burden on society.
Teachers cannot hope to have their rights, nor their wages and benefits, protected by either of the two major political parties, nor by the corrupt unions, which claim to represent them. Rather, they should fight to build a political movement of the entire working class for socialism in order to restore dignity and democratic rights, and a decent living wage and benefits, to all educators.



गुरुवार, 13 मई 2010

जेएनयू में जातिवाद की धुरी हैं अभिजन संरचनाएं

(जेएनयू की जातिवादी संरचनाओं के विरोधी छात्र नेता बाएं से देवीप्रसाद त्रिपाठी,चन्द्रशेखर टिवरीवाल,रमेश दीक्षित) 
        हम लोग जब पढ़ते थे तब भी जेएनयू में जातिवाद था लेकिन सुसंस्कृतभाव से जातिवादी ऑपरेशन चलता था,छात्रों में जातिवाद नहीं था। प्रशासन में जातिवाद था। प्रशासन में जो लोग बैठे थे उनकी दिलचस्पी अभिजन समुदाय को तैयार करने में थी। जेएनयू में 1979-1986 के बीच पढ़ने का मौका मिला । इस दौर में जमकर छात्र राजनीति भी की।
      इस दौर में सामान्य से तथ्य से प्रशासन में व्याप्त जातिवादी मनोदशा को सहज ही समझा जा सकता है कि उस समय सारे जेएनयू में 3-4 एससीएसटी शिक्षक थे। जबकि एससीएसटी के लिए आरक्षित पद थे 27 प्रतिशत। संवैधानिक तौर पर ये पद निर्धारित तक नहीं किए गए थे।
     उदाहरण के लिए हिंदी-उर्दू विभाग को ही लें वहां एक भी रिजर्व केटेगरी के तहत शिक्षक नहीं था। समूचे लैंग्वेज स्कूल में किसी भी विभाग में एक भी शिक्षक रिजर्व केटेगरी से नहीं था। बाकी स्कूलों की भी यही दशा थी। मुश्किल से 3-7 प्रतिशत रिजर्व सीटें छात्रों की भर पाती थीं। बड़ी ही चालाकी से हमारे ‘प्रगतिशील’ प्रशासकों ने जेएनयू में जातिवाद के खेल को चलाया हुआ था। उस समय छात्रसंघ की प्रमुख मांग थी शिक्षकों और छात्रों में एससीएसटी कोटे की सीटें हर हालत में भरी जाएं।
   विचारणीय समस्या यह है कि प्रशासनिक संरचनाएं अभिजनमुखी होंगी तो क्या जातिवादी मनोदशा के पनपने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं ? कृपया बताएं अभिजनोन्मुख संरचनाओं से मुक्ति का रास्ता या विकल्प क्या ?  


हमारी पहली टिप्पणी पर फेसबुक पर कुछ पुराने जेएनयू के दोस्तों ने लिखा है। कुछ टिप्पणियां और आयी हैं ,देखें-  

      चन्द्रप्रकाश झा-  aapke sawalon ke jawab dene ke main kabil nahin - lekin yeh bahas honi hi chahiye ki hum madhyayugin yug mein kyon laut rahe hain - Rajendra Sharma ( LokLahar ) ke putra Kabir ( Mattu ) ki ek baat mujhe yaad aati hai - jab KABIR jati mein yakin nahin karte the toh mere naam ke saath SHARMA surname jod kar KABIR ka naam kyon bigad diya gaya


जगदीश्वर-  सवाल नाम का नहीं रवैय्ये का है। आप अपनी तरफ से संक्षेप में ही सही कह गए।

चन्द्रप्रकाश झा-   aapko sahi laga - dhanyawad , ek baat aur SAMPRADAYIKTA se ladna jaatiwad se ladne ke mukable shayad jyada aasan hai - shahar mein curfew ke lekhak - Vibhuti Narain Rai ko dekh lijiye Vardha mein Namwar Singh ki sangat mein

 Kandarpa Das :

"As far I understand, it is an iminent effect of the post Mandal era. The whole north India have been effected during the last two decades and JNU is cannot be an isolation. Politics of North Indian always effected JNU. Remember, during the anti Mandal movement in Delhi, JNU was also effected (during Amit Sengupta's Presidency). The left forces were sidelined. I remember the evening when Atul Aneja and othes were attacked at Purvanchal. 
There has been a polarisation in JNU on caste line since than. Winning elections by SFI-AISF in between does not mean anything different. Another important factor, according to me is the caste politics played by our so called Ultra left. "

Kandarpa Das :

"I think it is the effect of the post Mandal North-Indian politics. Though JNU is supposed to be an all India University, North Indian politics always effected JNU student politics.(SYS during 1970s, NSUI during 1980s, ABVP during 1990s and AISA now)  Remember the days of Anti Mandal movements in Delhi. JNU was also effected . When Amit Sengupta was theJNUSU president, a whole gang of anti-Mandal castiest created big problem in JNU campus. I still remember the evening in 1990, when Atul Aneja and others were attacked by these forces in Purvanchal.  
During the last two decades castiest forces did consolidate their position. Many students Union elections were also fought in these lines. SFI-AISF alliance winning elections doesnot say anything. Moreover, many of our friends in the ultra left in JNU also play lower caste politics. All these have contributed to this. According to me only khate-pite parivar ke bande hi jati me ulazhte hei. ...........One thing I must add, since there is no castiesm in North-east like the north India,NE students in JNU are free from this.  "

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