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बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

मैं और मेरा स्वभाव-

         मेरी मुसीबत यह है कि मैं अपने स्वभाव का दास हूं,यह स्वभाव मुझे विरासत से नहीं मिला बल्कि यह मैंने सचेत रूप से अर्जित किया है।विरासत से जो चीजें स्वभाव में मिलीं वे बहुत ही पीडादायक थीं,अहंकार से भरी थीं,पुराने मूल्यों के बोझ से दबी हुई थीं,मेरी प्रकृति पुराने मूल्यों में जीने की नहीं है.पुराना मुझे एकदम पसंद नहीं है लेकिन दूसरों का मन रखने के लिए मैं अनेकबार पुराने को मान लेता हूं, लेकिन पुराना मेरे स्वभाव से गायब हो चुका है।

जीने के लिए न्यूनतम चीजें चाहिए और वे ही चीजें जुगाड़ करके मैं रखता हूं। मेरे पास कोई संपत्ति नहीं, कोई वैभव नहीं और न यश -मान-प्रतिष्ठा पाने की मन में कोई कामना है। यश-मान-प्रतिष्ठा-पद-गरिमा आदि अंतत: मुश्किलों में फँसा देते हैं। आए दिन प्रियजनों के उलाहने सुनता हूं कि यह नहीं किया वह नहीं किया, उसने तुमको सताया ,इसने तुमको सताया ,उन सबको करारा जवाब नहीं दिया, देखो वह कितना बडा आदमी बन गया और तुम वहीं के वहीं हो,तुम्हारे पास क्या है ?

मैं हकीकत में कुछ न कर पाना , संपत्ति न जोड़ पाना, यश की पगडंडियाँ न बना पाना अपनी असफलता मानता हूं।लेकिन अपने स्वभाव का दास हूं मुझे ये चीजें पसंद नहीं हैं, ये चीजें मुझे प्रभावित भी नहीं करतीं।यहां तक कि मेरे मन में कभी एक घर बनाने या ख़रीदने का कभी सपना तक नहीं आया , इसलिए कभी जीवन में कोई कर्ज किसी से नहीं लिया।जो मिल गया जैसा मिल गया उसके साथ एडजस्ट कर लिया।जीवन में एक ही सपना था विश्वविद्यालय शिक्षक बनूँ और नए नए विषयों पर लिखूँ और पढ़ूँ।ये दोनों चीजें हासिल करने में ही अब तक की सारी उम्र कट गयी।

अमूमन लोग संचय करने को ही जीवन का लक्ष्य मानकर चलतेहैं लेकिन मैं उलटा सोचता हूं।जीवन में सृष्टि करना चाहते हो तो संचय नहीं विसर्जित करने की आदत डालो।विसर्जन करने में कोई दायित्व नहीं होता , लाचारी नहीं होती।जैसाकि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है " हमारा आनंद,हमारा प्रेम,अकारण ही आत्म विसर्जन में अपने को चरितार्थ करता है।" "आत्मा भी लेने में खुश नहीं होती है, वह देने में खुश होती है।"

मेरी हमेशा से "क्षुदित अहं" वाले भावबोध से जंग रही है।जो लोग इस भाव में रहते हैं वे कंगाल की तरह सब कुछ अपनी मुट्ठी में भर लेना चाहते हैं।जो लेने के मतलब के अलावा कुछ देता नहीं है, वह फल पाने के अलावा और कुछ करता नहीं है।मैंने सचेत रुप से इस अहं से लडाई की है और यह अभी भी जारी है।



सवाल यह है जीवन को अहं से संचालित करना चाहते हैं या आत्मा के जरिए ? अहं बनाम आत्मा के संघर्ष में दाखिल होने से हम बचते रहे हैं जबकि होना चाहिए उलटा।टैगोर के अनुसार "अहं का स्वभाव है भीतर की ओर खींचना और आत्मा का स्वभाव है बाहर की तरफ देना।" इन दोनों में मेल बिठाना संभव नहीं है, तय करें हमें अहं से प्रेम है या आत्मा से!मुझे तो आत्मा से प्रेम है।

सहज जीवन जीना क्यों जरूरी है


       सामान्यतः यह माना जाता है कि मनुष्य सहज प्राणी है।लेकिन आचरण में यह चीज बहुत कम नजर आती है।हम यदि अपने पुराण-उपनिषद आदि को देखें तोवहां सहज जीवन और सहज स्वभाव का आधिक्य मिलेगा।सहज स्वभाव हमारे धर्म की आत्मा है।यह ऐसी आत्मा है जिसे वस्तुओं के प्रेम,आडम्बर, यश की कामना,सामाजिक हैसियत आदि अर्जित नहीं कर सकते।यह प्रदर्शन की चीज नहीं है।सहज जीना,स्वस्थ सामाजिक विकास का लक्षण है।यदि हमारा जीवन असहज हो रहा है,जटिल बन रहा है तो इसका प्रधान कारण है हमारे जीवन की अवस्था के साथ जीवन का अंतर्विरोध।हम सामाजिक अंतर्विरोधों पर बातें करते समय राजनीतिक—आर्थिक अंतर्विरोधों पर बहुत ध्यान देते हैं लेकिन जीवन और समाज के बीच बन रहे अंतर्विरोध,सरल और जटिल जीवन के बीच पैदा हो रहे अंतर्विरोध की आमतौर पर चर्चा नहीं करते।इससे हमारी समूची जीवनशैली सुखकी बजाय दुख देने लगी है।महात्मा बुद्ध,ईसा मसीह,महात्मा गांधी के जीवन को महान बनाने में उनकी सहज क्रियाओं और सहज-सरल मन की निर्णायक भूमिका थी।सहजता कोई फालतू तत्व नहीं है।वह कोई संयासियों और मूर्खों की चीज नहीं है।सरल को हम आमतौर पर मूर्ख मानकर चलते हैं।बोलते भी बड़े सरल हैं,मूर्ख भी हैं,चीजें समझते नहीं हैं।चालाकी,धूर्तता,तिकड़म आदि की इसकी तुलना में मूल्यवान समझते हैं।जो चालाक है-चतुर है वह दुनियादार है,उसकी आए दिन सफलताओं की चर्चा करते नहीं अघाते।

हमारे उपनिषद का सुंदर कथन है ´स्वाभाविकी ज्ञानवल क्रिया च।´यानी उस एक की ही ज्ञान क्रिया और बल क्रिया स्वाभाविक है।यानी हमारी इच्छा का मंगल-इच्छा से जब सामंजस्य हो जाता है तो सारी क्रियाएं सहज हो जाती हैं।उसके बाद अहंकार हमें धकेलता नहीं है। सामाजिक गुटबंदी,यश की कामना,किसी तरह का उत्पीड़न आदि हमारी इच्छाओं को धकेलता नहीं है। सामाजिक विकास के क्रम में हमारी इच्छाएं प्रबल होती गयी है लेकिन मंगल-इच्छा के साथ निजी इच्छाओं के सामंजस्य को हम भूल गए,फलतःहमारे जीवन में जटिलताओं ने जन्म ले लिया है।मसलन् ,हमारी इच्छा है कि दीपावली पर पटाखे चलाएं लेकिन इसका सामाजिक मंगल के साथ टकराव है,इसे हम अनदेखी कर रहे हैं।व्यक्ति की निजी इच्छा और सामाजिक मंगलइच्छा इन दोनों के बीच में सामंजस्य से ही ज्ञानबल और क्रियाबल की अभिव्यक्ति होती है। जो आदेश हमारी निजी इच्छा को सामाजिक मंगल की इच्छा से जोड़ते हैं वे हमें इन दिनों अच्छे नहीं लगते।

हम ज्ञान में पिछड़े क्यों क्योंकि हम स्वाभाविक नहीं रहे,सरल नहीं रहे।हमारे यहां सब कुछ जटिल है,तामझाम से युक्त है।मंगल इच्छा से संचालित नहीं है। कुछ साल पहले की घटना है इटली के प्रधान मार्क्सवादी और विश्व के जीवित सबसे बड़े बुद्धिजीवी उम्ब्रेतो इको दिल्ली आए थे,उनकी सादगी ,सरलता और सज्जनता देखने लायक थी।मैं कोलकता से चलकर उनके दिल्ली व्याख्यान को सुनने आया था।उनका जेएनयू में भी कार्यक्रम था, उन्होंने जेएनयू में ´टेस्ट´या ´अभिरूचि´ के सवाल पर बहुत सुंदर व्याख्यान दिया ,इसके लिए उन्होंने भरत के रस सिद्धांत को आधार बनाया था और अभिनव गुप्त-आनंदवर्द्धन की मदद ली।दिलचस्प बात यह थी कि इको कार्यक्रम शुरू होने के समय आ चुके थे,लेकिन बाहर कहीं बैठकर कॉफी पी रहे थे किसी ने उनसे कहा कि लोग सुनने आ गए हैं वे तुरंत कॉफी लेकर हॉल में चले आए और कॉफी का कप हाथ में लिए मंच पर चढ़ने वाली चीढ़ियों पर सहज भाव से बैठ गए और आराम से उन्होंने पहले कॉफी पी। उनकी इस सहजता को देखकर सभी लोग मंत्रमुग्ध थे।दिलचस्प बात थी कि हॉल में उपस्थिति अधिकांश अंग्रेजीदां लोग भरत-आनंदवर्द्धन-अभिनवगुप्त आदि के नाम तक से अपरिचित थे,अनेक फैकल्टी मेम्बर एक-दूसरे से पूछ रहे थे कि आनंदवर्द्धन कौन हैं,अभिनव गुप्त कौन हैं ॽ पहलीबार मुझे बड़ा झटका लगा कि जिस जेएनयू पर हम गर्व करते हैं वहां अनेक ऐसे भी विद्वान हैं जो आनंदवर्द्धन के नाम तक को नहीं जानते।





रविवार, 30 जुलाई 2017

क्रांतियाँ बेकार नहीं जातीं -


                 
    विश्व विख्यात इतिहासकारों में एरिक हॉब्सबाम अग्रणी हैं।उनके लेखन की विशेषता है इतिहासलेखन को विशेषज्ञों के अध्ययन-अध्यापन के दायरे से बाहर लाकर जनोपयोगी बनाना,साधारण पाठक के लिए बोधगम्य बनाना। साधारण पाठक और इतिहासकार इन दोनों के बीच इतिहास को किस तरह जनप्रिय बनाया जाए इसी बुनियादी लक्ष्य को सामने रखकर उन्होंने 4प्रमुख किताबें लिखीं,वे हैं,1.क्रांति का युग,2.पूंजी का युग,3. साम्राज्य का युग और 4.अतिरेकों का युग।इन चारों किताबों के अनुवाद संवाद प्रकाशन,मेरठ ने छापे हैं। हमारी समीक्षा के केन्द्र में ´पूंजी का युग´ नामक किताब है।अंग्रेजी में यह ´एज आफ कैपीटल´नाम से प्रकाशित है।
     एरिक हॉब्सबाम ने´´पूंजी का युग´´(इतिहास 1848-1875) में लिखा ´बुर्जुआ समाज की विजय जितनी विज्ञानके अनुकूल थी,उतनी कला के लिए नहीं रही।´ यह सच है बुर्जुआ समाज के जन्म के साथ विज्ञान के क्षेत्र में सबसे तेजगति से विकास होता है लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि लेखकों-कलाकारों के अंदर व्यक्तिवादी मूल्यों के विकास के कारण साहित्य को नित नई ऊँचाईयों को स्पर्श करने का मौका मिला,इसके अलावा छापे की मशीन के आने के साथ ही साहित्य का लोकतांत्रिकीकरण हुआ। रचना के केन्द्र में मनुष्य आया और ईश्वर की विदाई हुई।कमोबेश यह प्रक्रिया हर देश में बुर्जुआ समाज के उदय के साथ घटित हुई।साहित्य और कला के मध्यकालीन मूल्यों की जगह नए आधुनिक कला मूल्यों का जन्म हुआ।
      एरिक हॉब्सबाम की कृति ´पूंजी का युग´कई मायनों में महत्वपूर्ण है।इस किताब में ´पूंजी´ को आधार बनाकर आधुनिककालीन राजनीतिक-आर्थिक और कलागत परिवर्तनों की व्याख्या पेश की गयी है।यह किताब आधुनिककाल का वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य बनाने में मददगार साबित हो सकती है। इस पुस्तक का अनुवाद वंदना राग ने किया है,अनुवाद बेहतरीन है और पढ़ते हुए लगता ही नहीं है कि यह पुस्तक अनुदित है।हिंदी पत्रिका जगत की मुश्किल यह है कि विश्व विख्यात लेखकों की वैचारिक किताबें हिंदी में खूब छप रही हैं लेकिन उन पर चर्चा या उनके मूल्यांकन या पुस्तक समीक्षा के काम को साहित्यिक पत्रिका के संपादक उपेक्षा की नजर से देखते हैं।जबकि इस तरह की वैचारिक किताबों के बारे में व्यापक  चर्चा होनी चाहिए। इससे हिंदी के विचार-जगत और पाठक जगत को विश्व के वैचारिक विमर्श के साथ जोड़ने और आलोचना में छाई अवधारणाहीन बहसों से बचने में मदद मिल सकती है।
     इस किताब का सबसे रोचक पहलू है ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´के प्रकाशन के साथ तत्कालीन क्रांतियों के संबंध की खोज।´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´ अज्ञात जर्मन लेखकों के नाम से 24फरवरी 1848 जर्मन में प्रकाशित होता है।बाद में इसे अंग्रेजी,फ्रेंच,इटालियन आदि अनेक भाषाओं में अनुदित करके छापा गया। हॉब्सबाम ने लिखा ´यह कहना सही होगा कि इसके राजनैतिक आग्रहों का जर्मन क्रांतिकारियों के छोटे तबके से बाहर बहुत कम प्रभाव रहा.अलबत्ता1870 के बाद प्रभाव बढ़ा.कुछही हफ्तों में और मैनीफेस्टो के प्रकाशन के कुछ ही घंटों बाद,मसीहाओं की आशाएं,आशंकाएं सब साकार होने को आईं.फ्रांसीसी राजशाही को बग़ावत के बाद सत्ता से अपदस्थ कर दिया गया.गणतंत्र राज्य की घोषणा कर दी गई और यूरोपीय क्रांति का आग़ाज हो गया।´
  ´आधुनिक दुनिया के इतिहास में कई महत्वपूर्ण क्रांतियां हुई हैं.कई क्रांतियां इससे अधिक सफल रही हैं.मगर जंगली आग की तरह इस तीव्रता से चारों ओर फैलने वाली,सरहदों, राज्यों, देशों और महासागरों के पार जाने वाली क्रांतियां कम ही हुई हैं´ दिलचस्प बात यह है 24 फरवरी को ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´प्रकाशित होता है और उसी दिन फ्रांस ने गणतंत्र राज्य की घोषणा की। हॉब्सबाम ने लिखा है ´दो मार्च तक क्रांति दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी,छह मार्च बवेरिया,ग्यारह मार्च बर्लिन,तेरह मार्च वियना और तत्काल ही हंगरी,अठारह मार्च मिलान और फिर इटली में फैल गई।´उल्लेखनीय है उन दिनों सबसे तेज संचार व्यवस्था  राथ्सचाइल्ड बैंक की थी ,वह भी पेरिस से वियना तक खबर पांच दिन से कम में नहीं पहुँचाती थी,लेकिन उससे भी तेज गति से क्रांति की आग चारों ओर फैल गयी।उन दिनों कुछ ही हफ्तों में यूरोप के दस से ज्यादा देशों में ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´के प्रकाशन के साथ ही क्रांति हो गई।उस क्रांति के असर से कोई भी सरकारी तंत्र अपना अस्तित्व नहीं बचा पाया।अन्य क्षेत्रों में भी इसके निश्चित प्रभाव दिखाई दिए।हॉब्सबाम कहते हैं कि गंभीर अर्थों में यह वैश्विक क्रांति थी।इस क्रांति ने 1848 में यूरोप के विकसित और पिछड़े दोनों ही किस्म के देशों को प्रभावित किया।हालांकि यह क्रांति सबसे व्यापक थी लेकिन यह सबसे कम सफल साबित हुई.इसके घटित होने के 6माह के बाद ही यह भविष्यवाणी की जा सकती थी कि इसकी विश्वव्यापी असफलता निश्चित है.लगभग 18 महीनों बाद सिर्फ़ एक को छोड़ सारी अपदस्थ सत्ताएं वापस,दोबारा सत्ता पर काबिज़ हो चुकीं थीं। हॉब्सबाम के अनुसार ´1848 की क्रांतियां विलक्षण ढ़ंग से इस किताब से अपना रिश्ता जोड़ती हैं।´ एक क्रांतिकारी किताब के रूप में ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´की सामाजिक-राजनीतिक ताकत का इससे एहसास होता है।हॉब्सबाम ने लिखा ´1848 की क्रांतियों के लिए व्यापक अध्ययन की आवश्यकता है और राज्य,जनता तथा भौगोलिक क्षेत्रों की अलग पड़ताल ज़रूरी है।यहां यह संभव नहीं।फिर भी उन सभी लोगों में कुछ बातें सामूहिक रूप से थीं.यह समझा जा सकता है.सिर्फ़ यह नहीं कि उनके घटित होने का समय एक था,बल्कि यह भी कि उनका एक साझा मिज़ाज था और एक साझा शैली थी.वह एक रहस्यमय-यूटोपियन माहौल था और उससे मिलता-जुलता आडंबरपूर्ण वक्तृत्व था´, ´शुरूआती दौर में स्वतंत्र होने का एहसास,जबर्दस्त आशा और आशावादी भ्रम.यह लोगों का वसंत था-और ठीक वसंत की तरह,स्थायी नहीं था इसलिए दीर्घायु नहीं हो पाया।´इन सभी क्रांतियों की प्रमुख साझा बात थी ´कि वे सब विजयी हुए फिर जल्द ही पराजित हुए´,´शुरूआती दिनों में ज़्यादातर क्रांति के क्षेत्रों की सरकारें या तो पूरी तरह ध्वस्त हुई हैं या असमर्थता की शिकार हुईं.सारी सरकारें बिना चुनौती के समर्पण कर गईं।अपेक्षाकृत बहुत ही कम समय में क्रांतियों ने अपनी पहलकदमी खो दी।´ अगस्त 1849 तक फ्रांस को छोड़कर सभी देशों में क्रांति मृतप्रायः हो गई। ´सारे पुराने सत्ताशाली अपनी सत्ताओं पर विराजमान हो चुके थे,कई जगहों पर पहले की अपेक्षा और शक्तिशाली अंदाजों में,क्रांतिकारी निर्वासित हो इधर-उधर बिखर गए थे.सारे संस्थागत बदलाव,सारे राजनैतिक और सामाजिक स्वप्न,जो1848 के वसंत में देखे गए थे,वे सारे के सारे नेस्तनाबूत हो चुके थे।´
      ´पूंजी के युग´ ने कला और साहित्य के क्षेत्र में जिन चीजों को जन्म दिया वे पहले के किसी भी युग में संभव नहीं थीं।यह सच है आधुनिककाल के पहले बहुत कुछ बेहतरीन साहित्य और दर्शन लिखा गया,उच्च कोटि के स्थापत्य और कला रूपों का निर्माण हुआ।लेकिन उन सबके बनाए मानकों और मूल्यों के दायरे और लेखकीय दायित्वों को आधुनिककाल में लेखक ने नए सिरे से परिभाषित किया। ´पूंजी के युग´ की केन्द्रीय विशेषता है हर चीज को बार-बार परिभाषित करना ।यहां तक कि तयशुदा चीजों,परिभाषाओं,संबंधों आदि को भी बार-बार परिभाषित करने की जरूरत पड़ती है,इसने साहित्य में ´समकालीनता´की धारणा को जन्म दिया।पहले साहित्य तो था लेकिन ´समकालीनता´ की धारणा नहीं थी।पहले लेखक नैसर्गिक भाव से लिखता था अब उसमें नया तत्व जुड़ा ´समकालीनता´।नए युग की रूचियां,स्वाद और मूल्य  ´समकालीनता´से प्रभावित थे।यह सच है कि कलाओं और साहित्य में गुणवत्ता के लिहाज से गिरावट आई,लेकिन ´उपन्यास´विधा के जन्म ने साहित्य के समूचे संसार को ही बदल दिया।
     ´पूंजी के युग´की महानतम साहित्यिक उपलब्धि है उपन्यास।हॉब्सबाम ने उपन्यास के बारे में लिखा ´साहित्य-उपन्यास के माध्यम से पोषित हुआ।यह एक ऐसा फार्म था जो बुर्जुआ समाज के उद्भव एवं अंतर्द्वद्वों से मुठभेड़ कर अपनी बात सक्षम ढ़ंग से रख रहा था।´ उल्लेखनीय है पुराने विधा रूपों नाटक,काव्य,महाकाव्य आदि में नए बुर्जुआ समाज को अभिव्यक्ति करने की साहित्यिक क्षमता ही नहीं थी,उपन्यास के जन्म के साथ पूर्व के सभी विधारूपों के चरित्र में उपन्यास की संगति में बदलाव आए।उल्लेखनीय है उपन्यास ,साहित्य की विभिन्न विधाओं में से एक विधा नहीं है।बल्कि यह विधाओं का राजा है।उसने अपने जन्म के साथ यह घोषणा की कि पहले से प्रचलित विधाएं अपने चरित्र को बदलें और उपन्यास की संगति में अपना विकास करें,जो विधा यह नहीं कर पाएगी वह अप्रासंगिक होने को अभिशप्त है।सन् 1848 के बाद शहरों और भवनों की संरचनाओं और स्थापत्य में बदलाब आया।भवन निर्माण कला को राजसी और आध्यात्मिक भवन कला के दायरे बाहर लाया गया।अब स्थापत्य कला के क्षेत्र में धर्मनिरपेक्ष और नागरिकबोध संपन्न इमारतों का जन्म हुआ। पहले वाले भवन पुराने किलों और राजसी वैभव के प्रतीक हुआ करते थे लेकिन नए भवन –स्थापत्य के केन्द्र में इसके लिए कोई जगह ही नहीं थी।
     हॉब्सबाम के अनुसार ´वियना शहर के पुराने किलों और दीवारों को 1850 के वर्षों में ढहा दिया गया और उससे उपजी ख़ाली जगहों में शानदार चक्करदार सड़कें बनाकर उनके पास बड़े भवनों को निर्मित कर दिया गया।वे कौन -से भवन थेॽ वे क्या थे ॽ एक स्टॉक एक्सचेंज(विनिमय-बाज़ार) का प्रतिनिधि था,दूसरा धर्म का (वोतिवखीशें),तीन उच्च शिक्षण संस्थान ,नागरिक सुविधा और सार्वजनिक मसलों से जुड़े प्रशासनिक भवन थे जैसे शहर की नगरपालिका,न्यायपालिका तथा संसद के महल, और लगभग आठ थिएटर संग्रहालय,शिक्षण-संस्थान आदि थे।´
     यह असल में बुर्जुआजी के विनीत भाव की अभिव्यक्ति का युग भी है।इस प्रक्रिया में बाजार भी बदला,नए किस्म के बाजार का जन्म हुआ।नए विस्तृत और वैभवशाली बाजार ने जन्म लिया।19वीं सदी में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अर्जित उपलब्धियों ने इन सभी क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तनों को जन्म दिया।जनोत्पादन और जनोपभोग को नई ऊँचाईयां मिलीं।हर स्तर पर ये दोनों प्रवृत्तियां नजर आने लगीं।जनोत्पादन के कारण हर चीज सस्ते और पुनरूत्पादित रूप में सामने आई।पुनरूत्पादन की तकनीक ने साहित्य,पत्रकारिता,शिक्षा आदि में क्रांतिकारी परिवर्तनों को जन्म दिया।इन क्षेत्रों का लोकतांत्रिकीकरण हुआ।साथ ही कलाओं और साहित्य में अवमूल्यन के तत्व का भी प्रवेश हुआ।पहले कला और साहित्य रूपों का अवमूल्यन नहीं होता था लेकिन नए युग में तेजी से कला और साहित्य रूपों का अवमूल्यन होने लगा।तकनीकी विकास ने साहित्य और कला के आभामंडल को छिन्न-भिन्न कर दिया।पहले लेखक राज्याश्रित था,उसके ही सहारे आजीविका के लिए जिंदा था लेकिन नए ´पूंजी के युग´में वह ´पूंजी´पर आश्रित था,´पूंजी´के नियमों से संचालित था।हॉब्सबाम ने लिखा है ´कला अपने स्वरूप में वैभवशाली और धन का उपार्जन करने वाली थी।सर्जनात्मक प्रतिभा जन-मानस को आकर्षित करती थी और स्तरहीन भी नहीं थी´, ´हम उन लोगों को खोज सकते हैं,जो बुर्जुआ समाज के प्रतिरोध में खड़े  या उन्हें हतप्रभ करने की योजना बना रहे थे।या उन लोगों को भी जो ग्राहक खोजने में असफल रहे। यह विशेषतया फ्रांस में हुआ।´
    ´पूंजी के युग´ में एक नए किस्म के कलाबोध,जीनियस और व्यक्तिगत-उद्यम को जन्म दिया।हॉब्सबाम के अनुसार ´इस दौर में स्त्री-पुरूष वस्तुओं से सुविधासंपन्न हो रहे थे और साथ ही सम्मान भी पा रहे थे।राजसत्ताओं,रजवाड़ों और कुलीन-वर्ग के समाज में कलाकार सज्जा प्रदान करनेवाला व्यक्ति ही नहीं था,बल्कि स्वयं सज्जा का पर्याय बन राजदरबार में उपस्थित रहता था अथवा महंगी विलासिता प्रदान करने वाली वस्तुओं का देयकर्ता होता था,जैसे केश-सज्जा करनेवाले,पोशाक बनानेवाले जिनकी आवश्यकता फ़ैशनेबल लोगों को बनाए रहती थी।बुर्जुआ समाज के लिए वह ´जीनियस´(विलक्षण) था,जो दरअसल व्यक्तिगत उद्यम का ग़ैर-वित्तीय संस्करण था।वह एक ऐसा ´आदर्श´था जो भौतिक सुख-सुविधा को ताज मुहैय्या कराता था और साथ ही आध्यात्मिक  मूल्यों को भी जिलाए रखता था।´
    ´पूंजी के युग´में कला की नई समझ पैदा हुई,जिसके तहत कहा गया कि कला को संपूर्ण मांगों का पूर्तिकर्ता होना चाहिए।पारंपरिक धर्म की जगह पढ़े-लिखे स्वतंत्र लोगों के बीच उसने अपने लिए जगह हासिल कर ली।इस वर्ग को हम मद्यमवर्ग के रूप में जानते हैं।यह इस युग का नया वर्ग था।इसके अलावा नए वर्ग के रूप में मजदूरवर्ग सबसे ताकतवर वर्ग के रूप में  जन्म लेता है।साहित्य में इन दोनों वर्गों की पक्षधरता,जीवनदृष्टि और चित्रण को लेकर सबसे ज्यादा लिखा गया।इस तरह के लेखन में बुर्जुआ और मजदूरवर्ग के आत्मविश्वास से भरपूर नजरिए का जमकर चित्रण हुआ। ´आत्मविश्वास´ इस दौर की सबसे बड़ी लेखकीय पूंजी है।
    ´पूंजी के युग´ में सृजन के हर क्षेत्र में एक ही प्रश्न छाया हुआ था ,वह था ´यह आखिर है क्या ´,यह इस युग का जायज सवाल है।इसके ही गर्भ से यथार्थवाद का जन्म हुआ। ´यथार्थ´ और ´जीवन´ को लेकर साहित्य और अन्य कला रूपों में सबसे ज्यादा वैचारिक-सर्जनात्मक बहसें हुईं। ´शाश्वत साहित्य´ की धारणा का अंत हुआ, ´साहित्य´की नई धारणा का उदय हुआ,साहित्य का मतलब ही है परिवर्तन,समाज और साहित्य की अंतर्क्रियाओं को समझने की ओर ध्यान गया और यह मान लिया गया कि जिस तरह समाज प्रतिक्षण बदलता है वैसे ही साहित्य भी बदलता है।इसी प्रकार पहले लेखक महत्वपूर्ण था लेकिन ´य़थार्थवाद´के युग में लेखक को हल्का बनाया गया और ´य़थार्थवाद´को प्रमुख और वजनी बनाया गया।पुराना साहित्य अतीत से जोड़ता था,नए युग का साहित्य भविष्य से जोड़ता है,यह बुनियादी अंतर हरेक कला रूप में अभिव्यंजित हुआ।
     सन् 1848 का कला और साहित्य पर राजनैतिक दृष्टि से असर यह हुआ कि राजनीतिक प्रतिबद्धता के बिना कला संभव ही नहीं थी।इस दौर में ´जो आंखें देखती हैं´,नारे के तहत साहित्य और फोटोग्राफी के बीच एक नए रिश्ते की शुरूआत हुई।वास्तविकता भी यही थी कि ’पूंजी के युग´की नायिका है फोटोग्राफी और नायक है उपन्यास।ये दोनों मिलकर समूचे समाज को वृहत्तर स्तर पर प्रभावित करते हैं।इस दौर के बारे में हॉब्सबाम ने लिखा ´बदलाव,तकनीकी ईजादों ,तथा विषयवस्तुओं को लेकर समकालीनता नए अर्थ गढ़ती है।´ इस प्रक्रिया में रचना में एक नए गुण का समावेश होता है वह है ´वर्तमान´।अब कला,साहित्य, राजनीति,दर्शन आदि को ´वर्तमान´की कसौटी पर रखकर परखा जाने लगा।साहित्य और जीवन, कला और जीवन, दर्शन और जीवन के बीच मौजूद महा-अंतराल का इसने अंत कर दिया।
पुस्तक का नाम- पूंजी का युग
लेखक-एरिक हॉब्सबाम
अनुवाद-वंदना राग
प्रकाशक-संवाद प्रकाशन,मुंबईःमेरठ।  
(इंद्रप्रस्थ भारती मेंप्रकाशित)

बुधवार, 30 नवंबर 2016

धर्म और फिदेल कास्त्रो

फिदेल कास्त्रो के बारे में यह सब जानते हैं कि वे क्रांतिकारी थे,मार्क्सवादी थे,लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं कि फिदेल बेहतरीन धार्मिक समझ वाले व्यक्ति भी थे।फिदेल ने धर्म को लेकर जिस नजरिए को व्यक्त किया उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।यह सच है धर्म का जो रूप हम आज देखते हैं वह बहुत कुछ मूल रूप से भिन्न है।एक बेहतरीन मार्क्सवादी वह है जो धर्म को उसके सही रूप में समझे और धर्म की सही सामाजिक भूमिका पर जोर दे।
          हमारे यहां राजसत्ता और उसके संचालक धर्म के प्रचलित रूपों के सामने समर्पण करके रहते हैं, धर्म की विकृतियों के खिलाफ कभी जनता को सचेत नहीं करते,धर्म की गलत मान्यताओं को कभी चुनौती नहीं देते हैं ,धर्म का अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए दुरूपयोग करते हैं और इसके लिए सर्वधर्म समभाव की संवैधानिक समझ की आड़ लेते हैं।संविधान की आड़ लेकर धर्म की ह्रासशील प्रवृत्तियों को संरक्षण देने के कारण ही आज हमारे समाज में धर्म,संत-महंत,पंडे,पुजारी,तांत्रिक ,ढोंगी आदि का समाज में तेजी से जनाधार बढ़ा है,इन लोगों के पास अकूत संपत्ति जमा हो गई है।इसके कारण समाज में अ-सामाजिकता बढ़ी है, लोकतंत्र विरोधी ताकतें मजबूत हुई हैं।

यह सच है हम पैदा होते हैं धर्मकी छाया में और सारी जिंदगी उसकी छाया में ही पड़े रहते हैं।धर्म की छाया में रहने की बजाय उसके बाहर निकलकर समाज की छाया में रहना ज्यादा सार्थक होता है। धर्म की छाया यानी झूठ की छाया । हम सारी जिंदगी झूठ के साथ शादी करके रहते हैं,झूठ में जीवन जीते हैं,झूठ से इस कदर घिरे रहते हैं कि सत्य की आवाज हमको बहुत मुश्किल से सुनाई देती है।झूठ के साथ रहते-रहते झूठ के अभ्यस्त हो जाते हैं और फिर झूठ को ही सच मानने लगते हैं। इसका परिणाम यह निकलता है कि सत्य से हम कोसों दूर चले जाते हैं।

धर्म पर बातें करते समय उसके मूल स्वरूप पर हमेशा बातें करने की जरूरत है।धर्म को झूठ से मुक्त करने की जरूरत है।धर्म को झूठ से मुक्त करने का अर्थ है धर्म को धार्मिक प्रपंचों से बाहर ले जाकर गरीब के मुक्ति प्रयासों से जोड़ना। इन दिनों धर्म को संतों-पंडितों ने अपहृत कर लिया है।अब हम धर्म के मूल स्वरूप और मूल भूमिका के बारे में एकदम नहीं जानते लेकिन उन तमाम किस्म की भूमिकाओं को जरूर जानते हैं जिनको कालांतर में धर्म के धंधेबाजों ने पैदा किया है। सवाल यह है धर्म यदि गरीब का संबल है तो राजनीति में धर्म को गरीबों की राजनीति से रणनीतिक तौर पर जुड़ना चाहिए।लेकिन होता उलटा है गरीबों की राजनीति करने वालों की बजाय धर्म और धार्मिक संस्थानों का अमीरों की राजनीति करने वालों की राजनीति से गहरा संबंध नजर आता है।

धर्म गरीब के दुखों की अभिव्यक्ति है।मार्क्सवाद भी गरीबों के दुखों की अभिव्यक्ति है।इसलिए धर्म और मार्क्सवाद में गहरा संबंध बनता है।लेकिन धर्म और मार्क्सवाद के मानने वालों में इसे लेकर विभ्रम सहज ही देख सकते हैं। फिदेल कास्त्रो इस प्रसंग में खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। वे धर्म की व्याख्या करते हुए गरीब को मूलाधार बनाते हैं और कहते हैं कि ईसाईयत और मार्क्सवाद दोनों के मूल में है गरीब की हिमायत करना,गरीब की रक्षा करना,गरीब को गरीबी से मुक्त करना। इसलिए ईसाईयत और मार्क्सवाद में स्थायी रणनीतिक संबंध है।इसी आधार पर वे पुख्ता नैतिक,राजनैतिकऔर सामाजिक आधार का निर्माण करते हैं।

फिदेल के धर्म संबंधी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली शानदार किताब है ´फिदेल एंड रिलीजन´,यह किताब FREI BETTO ने लिखी है।इसमें फिदेल से उनकी 23घंटे तक चली बातचीत का विस्तृत लेखाजोखा है।यह किताब मूलतःक्यूबा और लैटिन अमेरिका में धर्म और मार्क्सवाद,धर्म और क्रांतिकारियों के अंतस्संबंधों पर विस्तार से रोशनी डालती है।इस बातचीत में फिदेल से 9 घंटे तक सिर्फ धर्म संबंधी सवालों को पूछा गया।धर्म और मार्क्सवाद के अन्तस्संबंध को समझने के लिए यह पुस्तक मददगार साबित हो सकती है।इस किताब को भारत में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने 1987 में अंग्रेजी में छापा था। इस किताब में लिए गए इंटरव्यू कई बैठकों में संपन्न हुए।ये इंटरव्यू 1985 में लिए गए थे।ये किसी समाजवादी राष्ट्र राष्ट्राध्यक्ष के द्वारा धर्म पर दिए गए पहले विस्तृत साक्षात्कार हैं। आमतौर पर मार्क्सवादी शासकों ने धर्म पर इस तरह के इंटरव्यू नहीं दिए हैं।













शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

मार्क्सवादी प्रकाशक श्याम बिहारी राय

डा.श्याम बिहारी राय हिन्दी प्रकाशन जगत का जाना-पहचाना चेहरा है।हिन्दी का आदर्श प्रकाशक कैसा हो और उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए,प्रकाशन के जरिए मार्क्सवाद का प्रचार -प्रसार कैसे करें,इन सब सवालों के उत्तर लेने हैं तो राय साहब से मिलो।
राय साहब बेहद सुलझे मार्क्सवादी हैं,एमए पीएचडी हैं,हिन्दी के प्रख्यात आलोचक नंददुलारे बाजपेयी के छात्र रहे हैं।अनेक वर्ष केन्द्र सरकार के संस्थान नीपा में काम करने के बाद प्रकाशन में लगे हुए हैं।उनसे मैं जब भी मिलता हूँ,मुझे मन में शांति मिलती है।उनके साथ मेरा परिचय तकरीबन 35सालों से हैं।मैं जब जेएनयू पढ़ने आया तो उनसे मेरी मुलाकात हुई ,मित्रता हुई,हम दोनों लंबे समय तक एक-दूसरे के सुख-दुख के साझीदार भी रहे हैं।राय साहब जैसा बेहतरीन मनुष्य,बेहतरीन निष्ठावान मार्क्सवादी मैंने नहीं देखा।
इस समय राय साहब ग्रंथ शिल्पी के नाम से प्रकाशन चलाते हैं।संभवतः भारत में यह अकेला प्रकाशन है जो सिर्फ अनुवाद छापता है।समाजविज्ञान, शिक्षा, साहित्य,मीडिया,दर्शन आदि की तकरीबन 300 से ज्यादा विश्व विख्यात किताबें अकेले राय साहब ने छापी हैं।इतनी किताबें भारत का कोई भी बड़ा प्रकाशक नहीं छाप पाया है।
राय साहब ने जिस निष्ठा के साथ हिन्दी की सेवा की है वह अपने आपमें विरल चीज है।ईमानदारी से प्रकाशन करना,लेखक और अनुवादक को नियम से हर साल रॉयल्टी देना,पेशेवर ढ़ंग से प्रकाशन चलाना ,ये ऐसे गुण हैं जिनको देखकर राय साहब का मित्र होने पर गर्व होता है।
राय साहब बहुत थोड़ी पूंजी से प्रकाशन चलाते रहे हैं।लेकिन ईमानदारी और पेशेवर नजरिए को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा।मेरी किताबों के प्रकाशन में उनकी केन्द्रीय भूमिका रही है।
इन दिनों राय साहब बुजुर्ग हो गए हैं लेकिन सुबह नौ-साढ़े नौ बजे ठीक दुकान पर पहुँच जाते हैं और शाम को पांच बजे निकल देते हैं।संभवतःभारत में कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी इतनी मार्क्सवाद की किताबें नहीं छापी हैं जितनी अकेले राय साहब ने छापी हैं।हम यही चाहते हैं राय साहब इसी तरह सक्रिय रहें और मार्क्सवाद की सेवा करते रहें।

बुधवार, 7 सितंबर 2016

वल्गर मार्क्सवाद के खतरे

        वल्गर आलोचना और वल्गर मार्क्सवाद का गहरा संबंध है।यह संयोग की बात है कि जब मार्क्सवाद की वल्गर धारणाएं सामने आई हैं उसी दौर में सबसे ज्यादा वल्गर साहित्यालोचना भी लिखी गयी है।दोनों में एक चीज साझा है और वह है सत्य की वस्तुगत सत्ता का अस्वीकार।वे जगत और कलाओं के यांत्रिक और इच्छित चित्रण और इच्छित व्याख्या पर जोर देते हैं।इच्छित आलोचना संसार रचने के लिए अपने पक्ष में मनमाने और अप्रासंगिक उद्धरणों का उपयोग करते हैं जिससे यथार्थ को और भी आँखों से ओझल कर सकें।यह काम आलोचना बचाने और आलोचना संवारने के नाम पर करते हैं।इससे आलोचना संवरती नहीं है बल्कि पसर जाती है।

बेहतर आलोचक वह है जो आलोचना के सारवान सवालों को उठाए और उन पर केन्द्रित होकर बहस सृजित करे।बहस सृजित करने के लिए पुराने प्रचलित आलोचना के ढाँचे और साँचों से बाहर निकलने की जरूरत है।नया पाठक सीधे विषय पर केन्द्रित लेखन पढ़ना चाहता है ,वह आलोचना को आलोचना के रूप में देखना चाहता है।वह आलोचना और साहित्य के सुसंगत संबंध को देखना चाहता है।वह समस्या पर केन्द्रित विवाद देखना चाहता है।वह महाख्यान नहीं सुनना चाहता।वह हिमायत में दिए गए उद्धरणों को नहीं ,समस्या के विश्लेषण को देखना चाहता है।

आज के जमाने में इमेज,प्रक्रिया और ज्ञान के विकास से जुड़े पहलुओं पर केन्द्रित होकर विचार करने की जरूरत है।इस पक्ष की ओर सबसे पहले लेनिन ने ध्यान खींचा था।आप यदि विश्लेषण करते हुए इकतरफा ढ़ंग से विवेचन करते हैं तो भाववादी पद्धति के शिकार हो जाते हैं।चाहे आपका नजरिया कुछ भी हो।इकतरफा ढ़ंग से सोचने और लिखने की कला बुर्जुआ कला है,इसका मार्क्सवाद से कोई लेना-देना नहीं है।जब आप अपने विषय के प्रति अंधभाव से देखने और लिखने लगते हैं तो बुर्जुआ विचारधारा के नजरिए से देखने लगते हैं और संयोग की बात है अरूण माहेश्वरी की किताब ´आलोचना के कब्रिस्तान से´किताब में यह प्रवृत्ति ठोस रूप में अभिव्यक्त हुई है।

मैं यहां सिर्फ एक ही समस्या की ओर ध्यान खींचना चाहूँगा। अरूण माहेश्वरी की ´अध्यापकीय शैली´ और ´अध्यापकीय आलोचना´की अपने लेखों में कई जगह तीखी आलोचना की है और उसकी व्यर्थता की ओर ध्यान खींचा है।यह सच है साहित्यालोचना का एक अंश ऐसा भी है जिसमें अस्वीकार करने लायक बहुत कुछ है लेकिन हिन्दी के संदर्भ में यह भी सच्चाई है कि आलोचना का अधिकांश हिस्सा वही है जिसे अध्यापकों ने ही लिखा है।खासकर प्रगतिशील और उदार आलोचना के निर्माण में अध्यापकों की बहुत बड़ी भूमिका रही है।

हिन्दी आलोचना का सबसे मूल्यवान वही है जो अध्यापकों ने लिखा है।इतिहास से लेकर आलोचना तक इन अध्यापकों का लेखन फैला हुआ है।मैं अरूण माहेश्वरी के नजरिए का एक नमूना देना चाहूँगा। लिखा है ´जहां तक शुक्लजी का संबंध है,उनकी इतिहास-दृष्टि के साथ कोई निश्चित विश्व-दृष्टि जुड़ी हुई थी,यह दावा तो उनके बड़े से बड़े प्रशंसक भी नहीं करते।´यह निष्कर्ष तथ्य और सत्य से कहीं से भी मेल नहीं खाता।इसी तरह रामविलास शर्मा,नंददुलारे बाजपेयी आदि के बारे में भी अरूण माहेश्वरी ने आत्मगत निष्कर्ष निकाले हैं। आलोचना का यह तरीका स्वयं में समस्यामूलक है,इससे यह पता चलता है आलोचना की किसी भी पद्धति और परिप्रेक्ष्य में अरूण माहेश्वरी की कोई दिलचस्पी नहीं है।साहित्य समीक्षा को बिना किसी आलोचना पद्धति के सहारे लिखने के कारण इस तरह के मनमाने निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

मैं पहले अरूण माहेश्वरी की किताब पर लिखने से बच रहा था लेकिन उसने जिस तरह प्रतिवाद में लिखा है उसने मजबूर कर दिया है कि उसकी उठाई समस्याओं पर वस्तुगत ढ़ंग से बात की जाय।पहली बात यह कि भारत में नवजागरण जैसी कोई परिघटना घटित नहीं हुई है।इसलिए नवजागरण के परिप्रेक्ष्य में साहित्य मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन करने से बचना चाहिए।कम से कम भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर प्रेमचंद तक निराला से लेकर य़शपाल तक के लेखन में कहीं पर भी नवजागरण पदबंध नहीं आता।इनमें से कोई भी लेखक नवजागरण पदबंध का प्रयोग नहीं करता।यहां तक कि बंगाल –महाराष्ट्र के राष्ट्रीय जागरण को नवजागरण नहीं कहा जा सकता,इसमें यूरोप नवजागरण से मिलते-जुलते न तो तत्व हैं और न परिस्थितियां ही हैं। भारत में नवजागरण आलोचकों की इच्छित कल्पना का परिणाम है,इसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।

मार्क्सवाद के नजरिए से यथार्थ की वस्तुगत सत्ता और उसकी साहित्यिक अभिव्यंजना का मूल्यांकन होना चाहिए। न कि इच्छित धारणा और चुनिंदा यथार्थ के बीच के संबंध का। अभी भी साहित्यालोचना में अनंत अनसुलझी समस्याएं पड़ी हुई हैं। दिलचस्प बात यह है 19वीं शताब्दी के विमर्श के जरिए हम बहुत कुछ नया जान पाए हैं लेकिन अभी भी बहुत बड़ा यथार्थ ऐसा है जिसे हमने कभी जानने या उद्घाटित करने की कोशिश नहीं की है।यही दशा मध्यकालीन समाज की है।

मार्क्सवादी आलोचक की चिन्ताएं दो स्तरों पर काम करती हैं,पहला,जो मूल्यांकन किया गया है वह उसके सारवान अंशों को ग्रहण करता है ,दूसरा,यथार्थ के अदृश्य पहलुओं को सामने लाता है।अरूण माहेश्वरी सिर्फ अपनी आलोचना में आलोचकों ने जो लिखा है उसको अस्वीकार करने और खारिज करने में ही सारी शक्ति लगा देते हैं।इस तरह के लेखन का मार्क्सवाद से कोई संबंध नहीं है।

19वीं शताब्दी का राष्ट्रीय जागरण सार्वभौम परिघटनाओं और संवृत्तियों को अपने अंदर समेटे हुए है। उसमें सार्वभौम अंतर्विरोध भी हैं।उसका जितना महत्व है,उसके अंतर्विरोधों का भी उतना ही महत्व है।उसके मिश्रित और शुद्ध रूपों का भी महत्व है।यहां तक कि उसके अधूरेपन का भी महत्व है।हमें उसके विकास के सामाजिक गति के नियमों की खोज करनी चाहिए।हमें यह काम करते समय मूल्य-निर्णय करने,खारिज करने,तिरस्कार करने आदि से बचना चाहिए।अफसोस है कि अरूण माहेश्वरी की उक्त किताब में यह चीज हर निबंध में है।

हमारे लिए फिनोमिना महत्वपूर्ण है,आलोचक नहीं।हमारे लिए समस्या महत्वपूर्ण है आलोचक महत्वपूर्ण नहीं है,उसका पेशा महत्वपूर्ण नहीं है।आलोचना की प्रत्येक पद्धति में अधूरापन है,उसकी सीमाएं,इसके बावजूद उसमें से ही नई संभावनाओं के द्वार खुलते हैं।आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,रामविलास शर्मा,हजारी प्रसाद द्विवेदी,मुक्तिबोध,नामवर सिंह के लेखन की सीमाएं हैं,उनके मूल्यांकन में बहुत कुछ ऐसा है जो छूट गया लगता है लेकिन बात वहीं से शुरू होनी चाहिए।वल्गर मार्क्सवाद इस सबको देख ही नहीं पाता।

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

पब्लिक इंटिलेक्चुअल नहीं हैं नामवर सिंह-


मैं गरम लिखता हूँ,नरम भी लिखता हूं,मार्क्सवादी भी लिखता हूँ,बुर्जुआ दृष्टिकोण से भी लिखता हूँ,मुझे अनेक बातें बुर्जुआजी की पसंद हैं,अनेक बातें क्रांतिकारियों की पसंद हैं,मुझे नास्तिक प्यारे हैं लेकिन मैंआस्तिकों का भी सम्मान करता हूं।पेशे से शिक्षक हूँ,आमतौर पर मुझे मार्क्सवाद पसंद है,लेकिन मैं क्रांतिकारी नहीं हूं,मैं उस समय भी क्रांतिकारी नहीं था जब जेएनयूएसयू का अध्यक्ष बना था,उन दिनों भी क्रांतिकारी नहीं था जब मैं माकपा का सक्रिय सदस्य था,मेरे अधिकतर दोस्त कम्युनिस्ट हैं।इसके बावजूद मैं क्रांतिकारी नहीं हूँ।मैं सही अर्थ में मार्क्सवादी भी नहीं हूँ।हां सच बोलना,सच देखना,सच के साथ खड़े होना मैंने कम्युनिस्टों से ही सीखा है।इसके बावजूद मैं क्रांतिकारी नहीं हूँ,मैं पेशेवर शिक्षक हूँ,बुद्धिजीवी हूँ ,फर्श पर बैठकर मैंने संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की है,जाहिर है यह सुख

नामवरजी को भी नसीब नहीं हुआ।वे फर्श पर बैठकर कभी नहीं पढ़े।मैंने साम्यवाद की शिक्षा कैरियर के लिए नहीं लीसाम्यवादी विचार बड़े ही स्वाभाविक ढ़ंग से मथुरा में यमुना की तरंगों की तरह मेरे जीवन में शामिल हुए हैं।निम्न-मध्यवर्गीय परिवार में जन्म हुआ,ऐसे परिवार में पढ़कर मथुरा के परिवेश में यथार्थको देखने,राजनीति करने की शिक्षा मुझे उन तमाम मित्रों से मिली जो मध्यवर्ग से आते थे,जेएनयू जाकर मुझे कुछ पक्के समर्पित क्रांतिकारियों से मिलने का मौका मिला।

उसके पहले मैं निजी तौर पर दो पेशेवरक्रांतिकारियों से परिचय प्राप्त कर चुका था वे हैं का.सुनीत चोपड़ा और का.प्रकाश कारात,इन दोनों से मेरा परिचय मथुरा में ही आपातकाल में हुआ था। मैं ये बातें इसलिए लिख रहा हूं कि मेरे बारे में भ्रम है कि मैं मार्क्सवादी हूँ।मैं कतई मार्क्सवादी नहीं हूँ।मुझे वैष्णव सम्प्रदाय पसंद है,शाक्त सम्प्रदाय में मेरी दीक्षा हुई और अंत में ईश्वरमु्क्त हो गया,लेकिन बीच-बीच में मुझे भगवान की याद वैसे ही सताती है,जिस तरह मनुष्य को अतीत याद आता है।मैं मजदूरों-किसानों की पक्ष में खड़ा होना सामाजिकजिम्मेदारी मानता हूँ।मुझे अन्याय नापसंद है।उसी तरह जालिमाना हरकतें नापसंद हैं।मैं पेशे से क्रांतिकारी नहीं शिक्षक हूँ।चमचागिरी से मुझे सख्त नफरत है।मैं कोई भी बात इसलिएनहीं मान लूँगा कि वह बात किसी मार्क्सवादी ने कही है,मैंने मार्क्सवाद को यथार्थ की कसौटी पर कसने की कला मार्क्स से सीखी है,नामवर सिंह ने यदि कुछ सही लिखा है तो मैंने माना है,लेकिन गलत लिखा है या गलत बोला है तो उसकी तत्काल आलोचना की है।मैं जानता हूं हिन्दी में बहुत बड़ा वर्ग है प्रोफेसरों का,जो नामवरजी का ऋणी है,उनके नाम पर अहर्निश झूठी प्रशंसा करता है,इस तरह के प्रोफेसरों ने नामवर सिंह का नुकसान किया है साथ ही हिन्दी के बौद्धिक परिवेश को क्षतिग्रस्त किया है। हिन्दी विभागों में अनपढों या कमपढों की नियुक्तियां करके नामवरजी ने हिन्दी जगत की जितनी क्षति की है उसके लिए उनको कभी हिन्दी जगत माफ नहीं कर सकता।इतनी व्यापक क्षति होने के बावजूद यदि दिल्ली विश्वविद्यालय का एक प्रोफेसर बेहूदे किस्म के कमेंटस हम लोगों पर लिखने की कोशिश कर रहा है तो हम उससे यही कहना चाहेंगे नामवर सिंह के नोटस या किसी किताब या किसी निबंध पर पहले खुलकर आलोचना लिखकर दिखाओ,पहले वह आलोचकीय विवेक पैदा करो जो नामवरजी से पढ़कर हमने हासिल किया है।हमने नामवरजी का श्रेष्ठग्रहण किया है,घटिया ग्रहण नहीं किया है।नामवरजी की हमने प्रशंसा भी लिखी तो उनके सामाजिक-साहित्यिक लेखन की आलोचना भी लिखी।हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं,नामवरजी विद्वान हैं,बुद्धिजीवी हैं,बेहतरीन शिक्षक हैं,लेकिन पब्लिक इंटेलेक्चुअल नहीं हैं।वे मंच पर बैठे बुद्धिजीवियों में शोभा देते हैं।लेकिन वे पब्लिक इंटिलेक्चुअल नहीं हैं।वे आम जनता के हितों ,नीतियों और कार्यक्रमों से जुड़े सवालों पर निरंतर न तो बोलते रहे हैं और न लिखते रहे हैं।पब्लिक इंटिलेक्चुअल हमेशा जनता में सच के साथ खड़ा रहता है,वह नफा नुकसान देखकर राय व्यक्त नहीं करता।नामवरजी तो इस मामले में पक्के बनिया हैं,वे नफा-नुकसान देखकर रायदेते हैं।पब्लिक इंटिलेक्चुअल सत्य का हिमायती होता है।नामवरजी तो अवसरवादी राजनाति के पक्ष में खड़े रहे हैं। संक्षेप में इतना ही,बाकी प्रोफेसर गोपेश्वर सिंह के उत्तर आने के बाद।

बुधवार, 24 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- नव्य उदार यथार्थ और मार्क्सवादी असफलताएं


             
मार्क्सवादी आलोचक फ्रेडरिक जेम्सन ने मौजूदा दौर के संदर्भ में मार्क्सवाद की पांच थीसिस प्रतिपादित की हैं। इनमें दूसरी थीसिस में उन्होंने उन खतरों की ओर ध्यान खींचा है जो मार्क्सवाद के लिए आ सकते हैं या आए हैं और जिनसे मार्क्सवादी आंदोलन को धक्का लगा है। उत्तर आधुनिक परिस्थितियों के आने के साथ मार्क्सवादी चिंतन को नव्य उदार आर्थिक नीतियों और उसके गर्भ से पैदा हुए बाजार ने सबसे बड़ा खतरा पैदा किया है।नव्य उदारतावाद के खिलाफ विचारधारात्मक संघर्ष में मार्क्सवादी आम लोगों का दिल जीतने ,उन्हें इसके परिणामों के बारे में समझाने में असमर्थ रहे। इस समस्या के दो स्तर थे, पहला स्तर स्वयं मार्क्सवादियों के लिए था वे खुद समझ ही नहीं पाए कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों का क्या परिणाम निकलेगा। उनका इन नीतियों के प्रति तदर्थ रवैय्या था। जब वे स्वयं दुविधाग्रस्त थे तो वे अन्य को कैसे समझाते ? इससे संकट और भी गहरा हो गया।
दूसरी समस्या यह आयी कि नव्य उदार परिवर्तनों के गर्भ से जो परिवर्तन पैदा हुए उनसे मार्क्सवादी लाभ नहीं उठा पाए। वे उस यथार्थ को पकड़ ही नहीं पाए जो नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से जन्मा है। उन्हें यह सामान्य सी बात समझ में नहीं आई कि कम्यूटर आज के मनुष्य की अपरिहार्य जरूरत है। भारत में लंबे समय तक अनेक मार्क्सवादी कम्प्यूटरीकरण के पक्ष में नहीं थे। लंबे अर्से के बाद उन्होंने हथियार डाले। इस चक्कर में मजदूरवर्ग को उन्होंने पिछड़ी कठमुल्ला चेतना के हवाले कर दिया। पश्चिम बंगाल और केरल कम्प्यूटर क्रांति में पिछड गए और बाकी देश आगे निकल गया। समूचा सोवियत संघ और पुराना समाजवादी देशों का समूह इस परिवर्तन को नहीं समझने के कारण तबाह हो गया। सोचिए 18 साल तक सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने पार्टी कॉमरेड वैज्ञानिकों को काफ्रेंस में कम्प्यूटर की उपयोगिता पर बहस करने की अनुमति नहीं दी।
उत्तर आधुनिकतावाद के संदर्भ में मार्क्सवादियों की सफलताएं कम हैं असफलताएं ज्यादा हैं। सबसे बड़ी असफलता है नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से पैदा हुई असुरक्षा, अव्यवस्था,विस्थापन और भय को संगठनबद्ध न कर पाना। नव्य उदार दौर में मजदूरवर्ग के क्षय को वे रोक नहीं पाए और असंगठित मजदूरवर्ग की तबाही को अपने संगठनों के जरिए एकजुट नहीं कर पाए। आज महानगरों में लाखों असंगठित मजदूर हैं जो किसी भी वाम संगठन में संगठित नहीं हैं।
मजदूरवर्ग के अंदर नव्य उदारतावाद ने जो भय पैदा किया उसे भी प्रभावशाली ढ़ंग से मार्क्सवादी लिपिबद्ध नहीं कर पाए। इसका व्यापक दुष्परिणाम निकला है,मजदूरों की आवाज सामान्य वातावरण से गायब हो गयी है। दूसरी ओर नव्य उदारपंथी एजेण्डा वाम संगठनों में आ घुसा है। वे इससे बचने की युक्ति वे नहीं जानते।
इसी प्रसंग में फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा, तर्कमूलक संघर्ष (जैसा कि यह सीधी वैचारिक लड़ाई के विरुध्द है) अपने विकल्पों की साख समाप्त करके और थीमैटिक प्रसंगों की एक पूरी श्रृंखला को अनुल्लेखनीय घोषित करके सफलता हासिल करता है। यह राष्ट्रीकरण, विनियमन, घाटा व्यय, कीन्सवाद, नियोजन, राष्ट्रीय उद्योगों की सुरक्षा, सुरक्षा नेट, तथा अंतत: स्वयं कल्याणकारी राज्य जैसी पूर्ववर्ती गंभीर संभावनाओं को निर्णायक रूप में अवैध घोषित करने के लिए क्षुद्रीकरण, निष्कपटता, भौतिकस्वार्थ, 'अनुभव', राजनीतिक भय ऐतिहासिक सबक को 'आधार' मानने का आग्रह करता है। कल्याणकारी राज्य को समाजवाद बताना बाजारवाद का उदारवादियों (अमरीकी प्रयोग में जैसा कि 'न्यू डील लिबरल्स' में किया गया है) तथा वामपंथियों दोनों पर दोहरी जीत दिलाता है। इस प्रकार आज वामपंथ ऐसी स्थिति में आ गया है जब उसे बड़ी सरकारों या कल्याणकारी राज्यों का समर्थन करना पड़ रहा है। सामाजिक प्रजातंत्र की समीक्षा करने की जो वामपंथियों की विस्तृत और परिष्कृत परंपरा रही है, उसके लिए यह कार्य खासकर वामपंथियों को इतिहास की द्वंद्वात्मक समझ जितनी होनी चाहिए उतनी नहीं होने के कारण बेहद लज्जित करने वाला है।
मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने आगे लिखा है इसी बीच मनोराज्य (यूटोपिया) से जुड़ी चिंताएं जो इस भय से उत्पन्न होती हैं कि हमारी वर्तमान पहचान, हमारी आदतें और आकांक्षा पूर्ति के तरीकों का निर्माण करने वाली चीज कतिपय नई सामाजिक व्यवस्था में समाप्त हो जाएगी तथा सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आज कुछ समय पहले की तुलना में अधिक संभव है। स्पष्टतया दुनिया के आधे से अधिक भाग में और न केवल प्रभावशाली वर्गों में आज निस्सहाय लोगों के जीवन में परिवर्तन की आशा का स्थान 'नष्ट हो जाने के भय' ने ले लिया है। इस प्रकार की मनोराज्य-विरोधी (एंटी-यूटोपियन) चिंताओं को दूर करना अनिवार्य है जो कि सांस्कृतिक निदान और उपचार के रूप में किया जाना चाहिए न कि बाजार के सामान्य बहस और अलंकार की इस या उस विशेषता से सहमति जताकर इससे बचना चाहिए।
मानव-स्वभाव मूल रूप से अच्छा और सहयोगी है या फिर बुरा और आक्रामक। यदि यह सर्वसत्तात्मक राज्य (लेवियाथन) को नहीं तो कम से कम बाजार को वश में रखने की अपेक्षा करता है, ये सारे तर्क वास्तव में मानवतावादी और विचारधारात्मक हैं (जैसा कि अल्थूसर ने कहा है) और इसके स्थान पर रैडिकल परिवर्तन और सामूहिक परियोजना का परिप्रेक्ष्य लाना चाहिए। साथ ही वामपंथियों को बड़ी सरकारों या फिर कल्याणकारी राज्यों का आक्रामक रूप से बचाव करना चाहिए तथा मुक्त बाजार के ऐतिहासिक ध्वंसात्मक रिकार्ड को देखते हुए बाजारवाद पर लगातार प्रहार करते रहना चाहिए ।
मार्क्सवादी के लिए साम्यवाद या कम्युनिस्ट पार्टी पूजा की चीज नहीं है। मार्क्सवादी के लिए वैज्ञानिक ढ़ंग से इस समाज को समझना और उस परिवर्तन के तर्क को समझना जरूरी होता है जिसके कारण परिवर्तन घट रहे हैं। पुराने साम्राज्यवाद के दौर में पूंजीवाद का केन्द्र था इंग्लैण्ड,बाद में द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर में अमेरिका केन्द्र बना।नव्य उदारतावाद के आरंभ में अमेरिका ही पूंजीवाद का गोमुख था। लेकिन नव्य उदारतावाद के अगले चरण में यानी मौजूदा दौर में पूंजीवाद का केन्द्र चीन है,अमेरिका नहीं। कारपोरेट और लंपट पूंजीवाद की इसमें सभी खूबियां हैं। सब कुछ हजम कर जाने का इसमें भाव है। विश्व बाजार में छा जाने ,सब कुछ बनाने और सस्ता उपलब्ध कराने का नजरिया है। इस समाविष्टकारी भाव से सारी दुनिया में देशज उद्योगों के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया है।
एक जमाना था चीन में कम से कम चीजें पैदा होती थीं। सारा देश पांच किस्म के कपड़े पहनता था। सारा देश साइकिल पर चलता था। लेकिन विगत 30 सालों में उसने सब कुछ बदल दिया है। उत्पादन और जिन्सों के उत्पादन में तो उसने क्रांति की है। किसी वस्तु को सस्ते में बनाना,बाजार में इफ़रात में उपलब्ध कराना और बाजार को घेरे रखना। बड़ी पूंजी को आकर्षित करना,श्रम और श्रमिक को सस्ते माल में लब्दील करना। मैन्यूफेक्चरिंग की ताकत को ऐसे समय में स्थापित करना जब सारी दुनिया मैन्यूफैक्चरिंग छोड़कर सेवाक्षेत्र की ओर आंखें बंद करके भाग रही थी।अपने आप में महान उपलब्धि है।
उत्पादन और खूब उत्पादन का नारा लगाकर चीन ने उत्पादन और उत्पादकों की महत्ता स्थापित की है। तंत्रगत संकटों को उसने अभिनव परिवर्तनों और प्रौद्योगिक क्रांति के जरिए संभाला है। विकास की तेजगति को बरकरार रखा है। साथ ही उत्पादन की गति को बनाए रखकर कारपोरेट पूंजीवाद को नए सिरे से पुनर्गठित किया है। इन परिवर्तनों को उत्तर मार्क्सवाद के आधार पर ही परखा जा सकता है। चीन और अमेरिका के नव्य उदार आर्थिक परिवर्तन पुराने मार्क्सवाद से नहीं उत्तर मार्क्सवाद से ही समझ में आ सकते हैं।
नव्य उदार परिवर्तनों का विश्व में सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है। लेकिन यहां पर हम वामपंथ पर जो प्रभाव पड़ा है उसकी समीक्षा तक ही फिलहाल सीमित रखेंगे। वामपंथ पर नव्य उदारतावाद के प्रभाव को हम इस रूप में देख तकते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां अब अपने बुनियादी मसलों पर विचारधारात्मक संघर्ष नहीं कर रही हैं बल्कि उन मसलों पर संघर्ष कर रही हैं जो पूंजीवादी मसले हैं। पूंजीवादी विचारधारा के द्वारा निर्मित मसले हैं।
इन दिनों कम्युनिस्टों का संघर्ष समाजवाद के लिए नहीं चल रहा बल्कि कल्याणकारी राज्य को बचाने के लिए चल रहा है। भारत से लेकर अमेरिका तक सभी जगह कम्युनिस्ट पार्टियां कल्याणकारी राज्य को बचाने के एजेण्डे में फंस गयी हैं।कल्याणकारी राज्य आंतरिक गुलामी का परिवेश तैयार करता है।
नव्य उदारतावाद के आने के साथ ही अनेक समाजवादी देशों ने समाजवाद को त्यागकर कारपोरेट पूंजीवाद का मार्ग पकड़ लिया। यह काम अकारण सभी किस्म के मार्क्सवादी मूल्यों और मान्यताओं को त्यागकर किया गया। भारत में आज कम्युनिस्ट पार्टियां कल्याणकारी राज्य के एजेण्डे को लेकर ही हल्ला मचा रही हैं। जबकि पूंजीपतिवर्ग ने कल्याणकारी पूंजीवाद के मार्ग को तिलांजलि दे दी है और नव्य उदार आर्थिक कारपोरेट पूंजीवादी विकास का मार्ग ग्रहण कर लिया है। अनेक अवसरों पर कम्युनिस्टों में भी वे तमाम विकृतियां देखने को मिलती हैं जो कल तक पूंजीवादी दलों में हुआ करती थीं। वे पूंजीवादी विकृतियों को समझने और उनके खिलाफ अनवरत संघर्ष चलाने में असमर्थ रहे हैं।
पहले लोग बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के सवालों को पसंद करते थे। उनके लिए कुर्बानी देने के लिए तैयार रहते थे। लेकिन नव्य उदार प्रचार अभियान के कारण आम आदमी बुनियादी सामाजिक परिवर्तनो से डरने लगा है। जोखिम उठाने से डरने लगा है। बहस करने से बचने लगा है। वह इस या उसकी हां में हां मिलाकर सामंजस्य बिठाकर यथास्थितिवाद के सामने समर्पण कर चुका है। अब हमारे बीच में बुनियादी मसलों पर बहसें कम हो रही हैं,कचरा विषयो पर बहसें ज्यादा हो रही हैं।
मसलन हाल ही में उठे 2जी घोटाले को ही लें। मीडिया और संसद बहस कर रही है पूर्व संचारमंत्री ए.राजा ने 1 लाख 75 हजार करोड़ का देश को चूना लगा दिया। नियम तोड़े। घूस ली बगैरह-बगैरह। इस प्रसंग में आम लोग,मीडिया और सांसद यह बात नहीं कर रहे कि आखिरकार ये रेडियो तरंगें किसकी हैं ? क्या इन्हें बेचा जा सकता था ? क्या रेडियो तरंगे कारपोरेट पूंजी की सेवा के लिए आवंटित की जाती हैं ? रेडियो तरंगे राष्ट्र की संपदा हैं और इन्हें हमारा देश अंतर्राष्ट्रीय संचार समझौते के तहत अंतर्राष्ट्रीय संस्था के जरिए आवंटन के माध्यम से प्राप्त करता है। इन्हें बेचा नहीं जा सकता। क्योंकि ये राष्ट्र की संपत्ति हैं। वैसे ही जैसे भारत के ऊपर का आकाश भारत का है उसे बेचा नहीं जा सकता। समुद्र को बेचा नहीं जा सकता। संसद भवन बेचा नहीं जा सकता।ताजमहल बेचा नहीं जा सकता। बजट घाटे को कम करने के नाम पर रेडियो तरंगों का कारपोरेट घरानों को आवंटन देशद्रोह है,देशभक्ति नहीं है। सवाल उठता है देशद्रोह बड़ा अपराध है या भ्रष्टाचार ?कायदे से रेडियो तरंगे बेची नहीं जानी चाहिए। लेकिन संसद में कभी भी किसी भी दल के सांसदों ने रेडियो तरंगों के निजी हाथों बेचे जाने का विरोध नहीं किया,आज भी वे विरोध नहीं कर रहे बल्कि यह कह रहे हैं कि नए सिरे से इनका आवंटन बाजार दर पर करवा दो और राष्ट्र को 1लाख 75 हजार करोड़ रूपये दिलवा दो। उनकी रूचि राष्ट्र को पैसा दिलवाने में हैं तरंगों को राष्ट्र के खाते में बचाने में नहीं है। यहीं पर उत्तर आधुनिक समाज की आयरनी छिपी है। हम जानते ही नही हैं कि राष्ट्र हित क्या हैं ? कारपोरेट हितों को राष्ट्रहित समझ रहे हैं और यही नव्य उदार प्रौपेगैण्डा की जीत है।बजट घाटे को कम करना देशसेवा है चाहे रेडियो तरंगें बेचनी पड़ें। धन्य हैं ये देशभक्त जो देश की संपदा (रेडियो तरंगें) बेचकर देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं। यह नव्य उदार प्रौपेगैण्डा की जीत है । आज मीडिया में सारे राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी बहस के उन मसलों पर उलझे हैं जो बाजार के मसले हैं,सतही मसले हैं। बहस-मुबाहिसे में बाजार का लक्ष्य प्रधान हो गया है और बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के सवाल बहस से गायब हो गए हैं। उपभोग के सवालों पर बहस कर रहे हैं ,उत्पादन के सवालों पर नहीं। भ्रष्टाचार पर बहस कर रहे हैं भूख पर नहीं। नरेगा के कार्यान्वयन पर उलझे हैं गांव की गरीबी पर नहीं। यह विचारधारात्मक अवमूल्यन है।

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- ´मार्क्सवाद´ पदबंध कैसे आया ॽ


       कार्ल मार्क्स का नाम और विचार भारत के लिए नया नहीं है।भारत में लंबे समय से मार्क्सवाद जनप्रिय रहा है।लेकिन विगत नव्य-आर्थिक उदारीकरण और समाजवादी सरकारों के पराभव के बाद के विगत 25-26 सालों में इसकी लोकप्रियता कम हुई है।लेकिन अभी भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण समूह है जो मार्क्सवाद को मानता और जानता है।लेकिन नए जनमाध्यमों के रूप में सोशलमीडिया में जो युवावर्ग या अन्य समुदाय के लोग सक्रिय हैं उनमें बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो मार्क्सवाद को नहीं जानते लेकिन उनके पास मार्क्सवाद विरोधी प्रचार निरंतर पहुँच रहा है।हम विनम्रता के साथ कहना चाहते हैं मार्क्सवाद विरोधी प्रचार वस्तुतः मानवता विरोधी है,मानवाधिकार विरोधी प्रचार है।

मार्क्सवाद का लक्ष्य है मानवता और मानवाधिकारों की रक्षा करना उनका प्रचार-प्रसार करना।हमारे बीच में ऐसे भी संशयवादी लोग हैं जो मानवता की बातें सुनते ही आग बबूला हो जाते हैं और नमूने के तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी शासित सरकारों के मानवताविरोधी कामों का हवाला देकर मार्क्सवाद को खारिज करते रहते हैं,मार्क्सवाद के प्रति घृणा फैलाते रहते हैं।हम साफ कहना चाहते हैं कि कम्युनिस्ट शासित सरकारों का मार्क्स के विज़न के साथ कोई संबंध नहीं है।

मार्क्सवाद पर जब बातें हों तो कार्ल मार्क्स और एंगेल्स के लेखन को केन्द्र में रखकर बातें होनी चाहिए। हमें अखबारी कतरनों,कम्युनिस्ट नेताओं,पूर्व समाजवादी सरकारों आदि के कारनामों की कसौटी पर मार्क्सवाद को परखने से बचना चाहिए। कार्ल मार्क्स पर जब बातें हों तो हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि ´मार्क्सिज्म´पदबंध से स्वयं मार्क्स अपरिचित थे।संक्षेप में वाकया यह है कि जब मार्क्स के दामाद पॉल लाफ़ार्ज ने मार्क्स को यह कहा कि आपने जो लिखा है उससे सिद्धांत के तौर पर ´मार्क्सिज्म´ निकलता है।मार्क्स ने तत्काल कहा कि मेरे लेखन से यदि मार्क्सिज्म जैसी सैद्धांतिक व्यवस्था निकलती है तो मैं इसे नहीं मानता।कार्ल मार्क्स जिस समय यह सब लिख रहे थे तब तक उनके विश्व दृष्टिकोण का सुंगत ढ़ंग से विकास नहीं हो पाया था।लेकिन लाफार्ज पहले विद्वान थे जिन्होने ´मार्क्सिज्म´पदबंध का प्रयोग किया गया।इसके बाद जी.प्लेखानोव ने पहलीबार द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की व्याख्या के क्रम में ´मार्क्सवाद समग्र विश्वदृष्टि´ पदबंध का इस्तेमाल किया।मार्क्स के नजरिए का मूल संबंध सर्वहारा के नजरिए से राजनीतिक अर्थशास्त्र की मीमांसा से जुड़ा हुआ है।इसके अलावा इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा के विकास को उन्होंने प्राथमिकता के साथ विश्लेषित किया।इस क्रम में सम-सामयिक और पुरानी भाववादी विचारधाराओं की आलोचना विकसित की।मार्क्स ने राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना के लिए इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा का बुनियादी तौर पर इस्तेमाल किया।



हम इस पखवाड़े भर चलने वाले आयोजन में समाज, इतिहास, राजनीति,संस्कृति,कला,न्याय,दर्शन आदि के क्षेत्र में जो अवैज्ञानिक विचारधाराएं प्रचलन में हैं उनकी हम क्रमशः पड़ताल करेंगे।

रविवार, 27 दिसंबर 2015

माकपा के पार्टी प्लेनम के सामने प्रमुख चुनौतियां

         आज से कोलकाता में माकपा पार्टी प्लेनम आरंभ होरहा है। यह प्लेनम इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसके ज़रिए माकपा अपने विकास का मार्ग तलाश करने का प्रयास करेगी। खासकर पश्चिम बंगाल में पुन: सत्ता में वापसी हो यह चिंता भी है। माकपा को यदि पश्चिम बंगाल की जनता का विश्वास जीतना है तो उसे निम्न सवालों के दवाब खोजने होंगे-
१. पश्चिम बंगाल की समूची शिक्षा व्यवस्था को किन नीतियों और फ़ैसलों ने पतन के स्तर पर पहुँचाया? समूची शिक्षा का ढाँचा कैसे बर्बाद हुआ? कौन लोग उसके लिए ज़िम्मेदार हैं? शिक्षा का अपराधीकरण कैसे हुआ ?
२. पार्टी संगठन और जनसंगठनों के अपराधीकरण के लिए किस तरह की नीतियाँ और कौन से नेता ज़िम्मेदार हैं?
३.समूचे पश्चिम बंगाल में वामशासन के अंतिम १० साल आम जनता के लिए बेहद तकलीफ़देह रहे हैं,सामाजिकतौर पर माकपा के नेता और कार्यकर्ताओं ने आम जनता के जीवन में जिस तरह हस्तक्षेप किया उसके कारण राजनीति और समाज का अपराधीकरण हुआ। आम जनता को अकल्पनीय मानसिक- सामाजिक यातनाएँ सहन करनी पड़ी हैं, इस समूची प्रक्रिया के लिए जो लोग ज़िम्मेदार रहे हैं वे आजतक पार्टी में हैं जबकि उनको दल से निकालना चाहिए, इस तरह के व्यापक अपराधीकरण के मूल कारणों को रेखांकित किया जाना चाहिए,साथ ही अपराधी मनोदशा के पार्टी सदस्यों और नेताओं को पार्टी ने निकालना चाहिए।
४.पार्टी की सांगठनिक प्रणाली को लोकतांत्रिक बनाया जाय और सदस्यों को पहल करके काम करने देने की नीति बनायी जाय।
५. पार्टी यह तय करे कि वह अपराधी तत्वों से दूर रहेगी और आम जनता से अपने वामशासन में हुई गलतियों के लिए घर घर जाकर माफ़ी माँगेगी,आम जनता का विश्वास जीतने के लिए यह ज़रूरी है।
उपरोक्त पाँचों समस्याओं पर समग्रता में कार्रवाई की योजना लेकर पार्टी सामने आए तो आम जनता से जुड़ने में मदद मिल सकती है।
  उल्लेखनीय है माकपा के दस लाख से ज्यादा सदस्य हैं।90हजार से ज्यादा ब्रांच-प्राथमिक इकाईयां हैं।तकरीबन 10हजार से ज्यादा होलटाइमर हैं।इतने बड़े नेटवर्क के बावजूद यदि माकपा में ठहराव और संकट है तो उसकी जड़ें कहीं गहरी होंगी जिनको प्लेनम को खोजना चाहिए। सामयिक संकट का प्रधान कारण है पार्टी सदस्यों का सामंती मनोभाव,सामंती आदतेंऔर आत्मसंघर्ष करके बदल न पाने की स्थिति।इसके अलावा पूंजीवाद और पूंजीपतिवर्ग के प्रति अंधघृणा।सामंतीबोध और अंध- पूंजीवादी घृणा के आधार पर सांगठनिक विकास संभव नहीं है।
लोकतंत्र के अनुरूप जिस उदार मनोदशा को विकसित होना चाहिए वह मनोदशा पार्टी अपने सदस्यों में विकसित ही नहीं कर पायी है।उदारवादी मूल्यों,संस्कारों और क्रांतिकारी मूल्यों -संस्कारों में अंतर्क्रिया का एकसिरे से अभाव है।इसके विपरीत पार्टी में गुटबाजी का,खासकर पश्चिम बंगाल में बोलवाला है।जिन नेताओं की इमेज खराब है या फिर जो एकसिरे से अप्रासंगिक हो चुके हैं,उनसे पार्टी अपने को मुक्त नहीं कर पायी,उनके साथ पार्टी ने सामंती वफादारों जैसा संबंध बनाया हुआ है।सामंती वफादारी के आधार पर क्रांतिकारी पार्टी का विकास संभव ही नहीं है।यही सामंतीभावबोध है जिसके कारण उत्तरभारत में पार्टी अपना विकास नहीं करपायी है।पार्टी के अंदर सामंती भावबोध,सामंती वफादारी आदि के खिलाफ संघर्ष का माकपा अभी तक कोई ब्लूप्रिंट तैयार नहीं करपायी है।यही वजह है नेकनीयत के बावजूद पार्टी अपना विकास नहीं कर पा रही है।
आज के राजनीतिक हालात में भारत के राजनीतिक दलों में तुलनात्मक तौर पर माकपा सबसे बेहतरीन राजनीतिक दल है,इसके पास बेहतरीन ईमानदार केन्द्रीय नेतृत्व है।निचले स्तर पर बहुत बड़ी संख्या में समर्पित कार्यकर्ता हैं। नीतियों के मामले में यह बेजोड़ है। आज माकपा जिस राजनीतिक संकट और ठहराव में फंसी है उसमें से यह पार्टी देर-सबेर निकलेगी,इसका प्रधान कारण है भारत की परिस्थितियां।
भारत की मौजूदा परिस्थितियों में माकपा की भूमिका बढ़ गयी है,जरुरत इस बात की है कि नेता-कार्यकर्ता वैचारिक पहल करें,नए नजरिए को अपनाएं,पुराने संकीर्णतावादी रूझानो से संगठन को मुक्त करें और नए सामाजिक यथार्थ के अनुरुप पार्टी का सांगठनिक ढाँचा बनाएं।
पार्टी का मौजूदा सांगठनिक ढाँचा एकसिरे से अप्रासंगिक हो चुका है,यह आम जनता के सवालों पर त्वरित कार्रवाई करने में असमर्थ है।आज कम्युनिस्ट पार्टी सदस्यों को रीयल टाइम में फैसले लेने,राय व्यक्त करने और आम लोगों को सार्वजनिक संचार माध्यमों के मंचों पर लोकतांत्रिक आचरण करने,लोकतांत्रिक नजरिए से पार्टी की राय रखने या निजी तौर पर हस्तक्षेप करने की आदत डालनी होगी।
कम्युनिस्ट पार्टी को रीयल टाइम में रेस्पांस देने की शिक्षा अपने सदस्यों और नेताओं को देने की व्यवस्था करनी चाहिए।यह दौर राजनीतिक पहल और राजनीतिक संचार का दौर है।इस दौर में मार्क्सवाद के विकास की अनंत संभावनाएं हैं।खासकर युवाओं के बीच सक्रिय रहने की जरुरत है।
युवाओं को जोड़ने का सोशलमीडिया सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है।इस माध्यम में पार्टीलाइन की नहीं लोकतांत्रिक संवाद और लोकतांत्रिक नजरिए,लोकतांत्रिक वेबसाइट या लोकतांत्रिक साइबर समूहों में गोलबंद करने की जरुरत है। साइबर संचार के जरिए लोकतांत्रिक और मार्क्सवादी विचार सामग्री के नए-नए साइबर मंचों के निर्माण की जरुरत है।इस दिशा में माकपा को व्यापक पहल करने की जरूरत है।
माकपा के सांगठनिक ढाँचे के सामने सबसे बड़ी चुनौती वैचारिक है,इस समय जो सदस्य हैं उनमें अधिकांश को मार्क्सवाद का क ख ग तक नहीं आता।यह स्थिति जितनी जल्द खत्म हो उतना ही अच्छा है। भारत में सामाजिक परिवर्तन के लिए अच्छे पढाकू और अच्छे लड़ाकू कॉमरेडों की जरुरत है। लट्ठ कॉमरेडों की नहीं।विगत दो दशकों में पश्चिम बंगाल में हमने कॉमरेडों के ज्ञान के स्तर में जो क्षय देखा है वह अकल्पनीय है। अधिकांश के लिए माकपा एक कैरियर संगठन रहा है।माकपा और उसके जनसंगठन कैरियर प्रमोशन स्कीम का अंग नहीं है। राजनीतिकचेतना की बजाय कैरियरचेतना पर कॉमरेडों ने काम किया है और उन सभी को पार्टी नेतृत्व ने पाला-पोसा है जो कैरियर के रुप में पार्टी में शामिल हुए,सरकारीतंत्र की मलाई खाई,ऐसे ही कॉमरेडों ने संगठन को सबसे ज्यादा क्षतिग्रस्त किया है। इसे लेनिन की भाषा में राजनीतिक अवसरवाद कहते हैं। राजनीतिक अवसरवाद किसी भी कम्युनिस्टपार्टी के लिए जहर है।
देश में जिस तरह का राजनीतिक संकट और नीतिहीनता का माहौल है उसमें वामपंथी ताकतों को नए नीतिगत परिप्रेक्ष्य और पद्धतियों के साथ आम जनता और लोकतांत्रिक राजनीतिक ताकतों को एकजुट करने के बारे में सोचना होगा।इसमें दो स्तरों पर कदम उठाने के बारे में पार्टी प्लेनम निर्णय ले,पहला, पूर्व माकपा सदस्यों और हमदर्दों को कैसे वापस साथ लिया जाए और उनके साथ निचले स्तर पर संपर्क-संबंध बनाने के लिए प्लेनम सीधे सभी इकाईयों को निर्देश दे,जो पार्टी जनपार्टी बनना चाहती है वह अपने बिछुड़े या त्यागे या भागे हुए सदस्यों हमदर्दों को उसे हर हालमें अपने साथ जोड़ना चाहिए।यह काम आत्मालोचना और विनम्रता के साथ किया जाना चाहिए। पार्टी में आए अहंकार को हर स्तर पर सीधे चुनौती दी जानी चाहिए। माकपा सदस्यों में अहंकार क्यों है और उससे कैसे मुक्ति पायी जाए,यह बड़ी चुनौती प्लेनम के सामने है। अहंकार तो कम्युनिस्ट को अमानुष बना देता है।

वामशासन के दौरान सरकार और पार्टीतंत्र का अंतर खत्म हो गया था।पार्टी मेम्बर समूचे राज्य तंत्र को उसके नियमों से चलाने की बजाय पार्टी नियमों और पार्टी आदेशों के जरिए चलाते रहे इसके कारण आम जनता के हितों को गंभीर नुकसान पहुँचा।इसने प्रत्येक स्तर पर पेशेवर कौशल और स्वायत्तता को क्षतिग्रस्त किया।इसके कारण विभिन्न स्तरों पर दलीय आधार पर भेदभाव हुआ।ये वे मसले हैं जिनका हल प्लेनम को खोजना चाहिए।

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

बंगाल की धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली और वाम

    
    आम तौर पर जो लोग कलकत्ता या प.बंगाल में घूमने जाते हैं तो उनको एक भिन्न किस्म का का सामाजिक परिवेश नजर आता है। कहने को पश्चिम बंगाल भारत में है लेकिन भारत से भिन्न भी है। पश्चिम बंगाल की भिन्नता है धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली का वर्चस्व। धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली  का गुण है कि वह राजनीतिक सचेतन, सहज,स्वाभाविक,मानवीय और संवेदनशील होती है।  इसमें 'स्व' के प्रति आलोचनात्मक विवेक प्रबल होता है।
      आजादी के साथ ही पश्चिम बंगाल हिन्दू-मुसलिम सामाजिक विभाजन की आग में जल रहा था। भारत-विभाजन का सबसे तीव्र असर यहां पड़ा था.बड़े पैमाने पर दंगे हुए थे, इन दंगों ने यहां के जनमानस को अंदर तक पीड़ित किया था। उस पीड़ा का समाधान करने में धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बंगाल से हमें यह जीवनशैली सीखनी चाहिए। साम्प्रदायिक मनोदशा से लड़ने का आज भी यह सबसे कारगर अस्त्र है।        
        प.बंगाल में धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली के निर्माण में आम जनता और बुर्जुआदलों के अलावा कम्युनिस्टों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कम्युनिस्टों की भूमिका न बिना धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। यह एक सच है कि  आम जनता में साम्प्रदायिक सद्भाव को प्रधान एजेण्डा बनाने में कम्युनिस्टों की निर्णायक भूमिका रही है। वे साम्प्रदायिक सद्भाव के संदेशवाहक के तौर पर राज्य में अग्रणी कतारों में रहे हैं,आम जनता के जीवन से साम्प्रदायिक भेद कैसे खत्म हुआ होगा यह बात आज की युवा पीढ़ी के लिए समझना बहुत ही मुश्किल है ।
   भारत-विभाजन क्यों और कैसे हुआ यह सवाल आज बेमानी है,कौन इसके लिए जिम्मेदार था,यह सवाल भी बेमानी है। भारत विभाजन के समय कम्युनिस्टों का नजरिया सही नहीं था,वह गलत उसूलों पर आधारित था,इसको बाद में कम्युनिस्ट पार्टी ने भी माना। लेकिन भारत विभाजन के कारण जो साम्प्रदायिक भेदभाव,हिंसाचार और घृणा समाज में फैली थी उसको खत्म करने के मामले में कम्युनिस्टों ने उस दौर में धर्मनिरपेक्ष ताकतों के साथ मिलकर कंधे से कंधा मिलाकर काम किया । उस दौर को लेकर कम्युनिस्टों ने कुछ सबक भी हासिल किए जिनको व्यवहार में लागू किया गया।
    पहला सबक यह था कि आम जनता में जड़ें मजबूत बनानी हैं तो अंतर्राष्ट्रीयतावाद के जंजाल में फंसने की बजाय राष्ट्रीय परंपराओं को समझना होगा, राष्ट्रीयता की भावना को पुख्ता बनाना होगा। कौमी परंपरा की नए सिरे से खोज करनी होगी। देश में और खासकर पश्चिम बंगाल में जनाधार बनाने के लिए कौमी परंपरा का निर्माण करना होगा। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से कम्युनिस्टों का रुपान्तरण आरंभ होता है। पंडित जवाहर लाल नेहरु ने सही लिखा है '' पिछली बातों के लिए अंधी भक्ति बुरी होती है । साथ ही उनके लिए नफ़रत भी उतनी ही बुरी है। उसकी वजह है कि इन दोनों में से किसी पर भविष्य की बुनियाद नहीं रखी जा सकती। वर्तमान का और भविष्य लाजिमी तौर से भूतकाल से जन्म होता है और उन पर उसकी छाप होती है। इसको भूल जाने के मानी हैं इमारत को बुनियाद से काट देना ।उसके मानी हैं इन्सान पर असर रखने वाली एक सबसे बड़ी ताकत को भुला देना। राष्ट्रीयता असल में पिछली तरक्की ,परंपरा और अनुभवों की एक समाज के लिए सामूहिक याद है। '' कम्युनिस्टों ने इस ''सामूहिक याद'' को नए सिरे से अर्जित किया ।
     सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीयता की पुरानी यादों के सहारे समाज का विकास संभव है ? पुरानी सामूहिक यादों ने विरेचन का काम किया। समाज से साम्प्रदायिक विद्वेष को खत्म किया। पुरानी सामूहिक यादों को कम्युनिस्टों सामाजिक दुश्मनी को खत्म करने के औजार के रुप में इस्तेमाल किया। मिश्रित संस्कृति और सभ्यता के रुपों की नए सिरे खोज आरंभ की। उसका ही यह सुफल है कि कोलकाता  साम्प्रदायिक प्रदूषण से मुक्त महानगर बन पाया। आजादी के बाद  देश के बाकी हिस्सों में साम्प्रदायिक ताकतें फली-फूली हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में आरएसएस और उसके सहयोगी को संगठनों को जनाधार नहीं मिला, मुस्लिम लीग जनविहीन हो गयी। आम बंगाली के मन से साम्प्रदायिक विद्वेष क्रमशः खत्म होता चला गया।
     यह वामदलों के प्रयासों का ही सुफल है कि आज समूचा बंगाल साम्प्रदायिकचेतना से मुक्त है।आजादी के बाद साम्प्रदायिक विभाजन की  तमाम कोशिशें हुई हैं लेकिन इस राज्य में वे सभी विफल रही हैं। वामदलों के प्रयास का ही यह सुफल  है कि आम जीवनशैली में धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया तेजगति से चली है। आम जीवन में धर्मनिरपेक्षता एक ताकतवर विचार के रुप में काम करता रहा है। यह स्थिति तब है जबकि देश के विभिन्न इलाकों में साम्प्रदायिकता की आंधी चलती रही है। मसलन्,राममंदिर रथयात्रा,बाबरी मसजिद विध्वंस, इंदिरा गांधी की हत्या और सिख जनसंहार, गुजरात का बर्बर जनसंहार आदि बड़ी घटनाएं पश्चिम बंगाल की मनोदशा को प्रभावित करने में असफल रही हैं। यह साधारण बात नहीं है।
    आमतौर पर पश्चिम बंगाल की जीवनशैली का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना है। धर्मनिरपेक्षता यहां वोटबैंक राजनीति तक सीमित नहीं है बल्कि एक विकसित आधुनिक जीवनशैली है। धर्मनिरपेक्ष आधुनिक जीवनशैली की परिकल्पना को वामदलों ने आम जनता की मदद से साकार किया है। आज सारे देश में जातिगत विद्वेष और जातिगत गोलबंदियां  हैं,लेकिन पश्चिम बंगाल इससे एकदम अछूता है। जाति-उत्पीडन यहां  एकसिरे से नदारत है। धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली जब निर्मित होगी तो जातिवाद कमजोर होगा, जाति की पहचान कमजोर होगी। पश्चिम बंगाल में जाति की पहचान कमजोर हुई है और जातीयता या नैशनेलिटी की पहचान पुख्ता हुई है। राज्य में जब भी भेदकारी ताकतों ने सिर उठाने की कोशिश की है उसका आम जनता ने ''हम सब बंगाली हैं'' की एकजुट धर्मनिरपेक्ष भावना के साथ सामना किया है। वामदलों ने राष्ट्रीयनेताओं की परंपराओं को अपनाया और उनका व्यवहार में पालन किया। इसके चलते वामदलों ने अपने लिए नए सिरे से राष्ट्र की खोज की।
     एक जमाना था जब कम्युनिस्ट हर बात में अंतर्राष्ट्रीयतावादी भावनाओं को व्यक्त करते थे लेकिन आजादी के बाद क्रमशः उनमें यह समझ बनी कि देश के विकास के लिए राष्ट्रीयताबोध का पुख्ता बोध का होना जरुरी है। उन्होंने राष्ट्रीय महापुरुषों की इज्जत करना सीखा और उनकी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया। राष्ट्रीयता और कम्युनिस्ट पार्टी की अंतर्कियाओं को बुर्जुआ परंपराओं और नजरिए ने क्रमशःप्रभावित किया। यह भी कह सकते हैं बंगाली लिबरल परंपराओं ने कम्युनिस्ट कतारों को सीधे प्रभावित किया। इस क्रम में बंगाली समाज की मान्यताओं और परंपराओं के साथ अंतर्क्रियाएं भी आरंभ हुईं,फलतः कम्युनिस्टों ने बंगाली परंपराओं और रिवाजों को समझना और सामंजस्य बिठाना सीखा । खासकर खुले दिमाग की बंगाली और भारतीय मनोदशा ने कम्युनिस्टों में लिबरल आचार-व्यवहार के प्रति आकर्षण पैदा किया।देशज संस्कृति,जातीय परंपरा, खुला दिमाग और विवेकवाद ये चार चीजें कम्युनिस्टों को बंगाली समाज से विरासत में मिलीं और इसका कम्युनिस्टों ने आम जनता में जमकर प्रचार किया इससे समूचे समाज में धर्मनिरपेक्ष जीवनशैली निर्मित करने में मदद मिली।      

       

बुधवार, 11 जून 2014

सभ्यता से डरे हम लोग


      हमारे देश में लोग बदमाश से नहीं डरते ।बल्कि बदमाशों के साथ रहते हैं। दंगाई से नफरत नहीं करते बल्कि उसको वोट देते हैं और पूजा करते हैं। हमारे देश में पत्थर की मूर्तियों से दूर नहीं रहते बल्कि उनकी रोज पूजा करते हैं। उनको घर में रखते हैं।सम्मान करते हैं। हमारे देश में लोग जिस चीज से डरते हैं वह है सभ्यता।

सभ्यता और सभ्य आदमी से लोग डरते हैं। सभ्य को मित्र नहीं बनाते असभ्य को मित्र बनाते हैं। ईमानदार से दूर रहते हैं,धूर्त-चालाक और बेईमान के साथ गलबहियां देकर रहते हैं। औरत के साथ विवाह करते हैं,बेटी की तरह पैदा करते हैं,माँ की तरह मानते हैं, लेकिन औरतों के साथ सबसे ज्यादा हिंसाचार करते हैं। हिंसा और असभ्यता के माहौल को हमारे देखकर यही महसूस होता है कि हमारे देश में सभ्य होना गाली है !

सवाल यह है सभ्य से हम क्यों दामन छुडाना चाहते हैं ? सभ्य होना क्या बुरी बात है ? सभ्य क्या सक्षम नहीं होते ? फेसबुक और सामाजिक जीवन में असभ्यता का जो वैभव दिखाई देता है वह बार बार यही संदेश देता है कि सभ्य होना सही नहीं है! असभ्य रहो,मजे में रहो!

सभ्यता की मांग है कि विवेकवाद अर्जित करें। हमारे यहां उल्टी हवा चल रही है। इरेशनल या विवेकहीन बातों को तवज्जह दी जाती है। नॉनशेंस की पूजा की जाती है। इरेशनल से बड़ा असभ्यता का कोई रुप नहीं है। हम भारतवासी जितनी ऊर्जा नॉनसेंस चीजों पर खर्च करते हैं उसका आधा वक्त भी विवेकवादी और सभ्य चीजों पर खर्च करें तो भारत सोने की चिडिया हो जाय।

फिलहाल स्थिति यह है किभारत में चिडियाएं भी रहना पसंद नहीं करतीं, वे भी कम हो रही हैं। मौसम बिगडा हुआ है। हम हैं कि विवेक से काम लेने की बजायभगवान की कृपा का इंतजार कर रहे हैं। प्रकृति और पर्यावरण के साथ विवेकपूर्ण संबंध बनाएं तो चीजें सुधर सकती हैं। हमने प्रकृति और पर्यावरण के साथ विवेकपूर्ण संबंध नहीं बनाया है बल्कि केजुअल संबंध बनाया है। उपभोग का संबंध बनाया है।

हम कितने सभ्य हैं और कितने असभ्य हैं ? इसका कोई सटीक मानक बनाना तो संभव नहीं है लेकिन यह तय है कि सभ्यता वंशानुगत नहीं होती,उसे अर्जित करना पड़ताहै। हमारी मानसिकता यह है कि हम अर्जित करने के लिए श्रम नहीं करना चाहते। हम चाहते हैं कि कोई ऐसा फार्मूला हो जो हमें घर बैठे सभ्य बना दे। हमें यह भी सिखाया गया है कि फलां-फलां वस्तुएं घर में हों तो सभ्यता घर में दाखिल हो जाती है। वस्तुएं के जरिए सभ्य कहलाने की आशा मृगतृष्णा है।

वस्तुएं सभ्य नहीं बनातीं। सभ्य बनने के लिए पहली शर्त है कि हम यह मानें कि निज को बदलेंगे और सचेत रुप से बदलेंगे। सभ्य वह है जो निज को और अन्य को प्यार करना जानता है।जिसके मन में अन्य के लिए जगह नहीं है वह सभ्य नहीं हो सकता। जब तक आप निजी जंजालों में फंसे रहेंगे सभ्य नहीं बन सकते। निजी जंजालों के बाहर निकलकर सामाजिक होने, अन्य के प्रति निजी सरोकारों को व्यक्त करने से सभ्यता का विकास होता है।अपने लिए न पढ़कर,देश के लिए पढ़ना, अपने लिए न लिखकर अन्य के मसलों और जीवन की समस्याओं पर लिखना, हर क्षण अन्य की चिन्ताओं को अपनी चिन्ताएं बनाने से सभ्यता का विकास होता है।

सभ्य बनने के लिए अपने से बाहर निकलकर झांकने की कला विकसित करनी चाहिए। निहित-स्वार्थों में डूबे रहना और अनालोचनात्मक ढ़ंग से चीजों, वस्तुओं,व्यक्तियों और विचारों को देखने से सभ्यता का विकास बाधित होता है।



सभ्यता के विकास के लिए जरुरी है कि हम चीजों को व्यापक फलक पर रखकर देखने का नजरिया विकसित करें। सभ्य वह है जिसके पास व्यापक फलक में रखकर देखने का नजरिया है। आप जितना व्यापक फलक रखकर देखेंगे वस्तुएं,घटनाएं आदि उतनी ही साफ नजर आएंगी। हम बौने क्यों हो गए क्योंकि हमने दुनिया को देखने का फलक छोटा कर लिया। हम अनुदार क्यों हुए क्यों कि हमारी समझ निजी दृष्टि से आगे बढ़ नहीं पायी। हमें निजी दृष्टिकोण की नहीं विश्वदृष्टिकोण की जरुरत है।सभ्यता हमें विश्व दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करती है। विश्व दृष्टिकोण के आधार पर देखने के कारण हम अनेक किस्म की सीमाओं और कट्टरताओं से सहज ही मुक्त हो सकते हैं।

बुधवार, 5 जून 2013

शीतयुद्धोत्तर परिप्रेक्ष्य की तलाश और मार्क्सवादी रूढ़ियां


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फेसबुक पर हिन्दीलेखकों में लेखकीय ध्रुवीकरण शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क से बंधा है। कायदे से शीतयुद्धीय राजनीति और सीआईए- -सोवियत कम्युनिज्म के दायरे से बाहर निकलकर चीजों को देखने की जरूरत है। खासकर मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य शीतयुद्धीय राजनीति के पक्ष-विपक्ष मे बांधता है।
नए जमाने की मांग है लोकतंत्र और दुर्भाग्य की बात है कि सीआईए या अमेरिकी साम्राज्यवाद या समाजवाद दोनों ही लोकतंत्र की सत्ता-महत्ता और स्वायत्तता को स्वीकार नहीं करते। मंगलेश डबराल,वीरेन्द्रयादव, अशोक पाण्डेय आदि ने मेरी पोस्ट पर अशोक पाण्डेय की फेसबुक वॉल पर जो बहस चलायी है उसमें भागलेने वाले सुधीजन शीतयुद्ध की राजनीति के दायरे के बाहर निकलकर नहीं सोच पाए हैं।
चार्ली चैप्लिन,ब्रेख्त आदि सभी नामी प्रगतिशील लेखकों के नजरिए की मुश्किलें वही हैं जो शीतयुद्धीय राजनीति की हैं। वे भी उसके दायरे के बाहर नहीं देख पाते। प्रगतिशीलों का शीतयुद्धीय राजनीति को समाजवाद के नजरिए से देखना मार्क्सवादी रूढ़िवाद है। मार्क्सवादी रूढ़िवाद हमें लोकतांत्रिक नजरिए से सोचने में बाधाएं पैदा करता है।
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शीतयुद्धोत्तर परिप्रेक्ष्य की तलाश और मार्क्सवादी रूढ़ियां-1-

फेसबुक पर हिन्दीलेखकों में लेखकीय ध्रुवीकरण शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क से बंधा है। कायदे से शीतयुद्धीय राजनीति और सीआईए- -सोवियत कम्युनिज्म के दायरे से बाहर निकलकर चीजों को देखने की जरूरत है। खासकर मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य शीतयुद्धीय राजनीति के पक्ष-विपक्ष मे बांधता है।
नए जमाने की मांग है लोकतंत्र और दुर्भाग्य की बात है कि सीआईए या अमेरिकी साम्राज्यवाद या समाजवाद दोनों ही लोकतंत्र की सत्ता-महत्ता और स्वायत्तता को स्वीकार नहीं करते। मंगलेश डबराल,वीरेन्द्रयादव, अशोक पाण्डेय आदि ने मेरी पोस्ट पर अशोक पाण्डेय की फेसबुक वॉल पर जो बहस चलायी है उसमें भागलेने वाले सुधीजन शीतयुद्ध की राजनीति के दायरे के बाहर निकलकर नहीं सोच पाए हैं।
चार्ली चैप्लिन,ब्रेख्त आदि सभी नामी प्रगतिशील लेखकों के नजरिए की मुश्किलें वही हैं जो शीतयुद्धीय राजनीति की हैं। वे भी उसके दायरे के बाहर नहीं देख पाते। प्रगतिशीलों का शीतयुद्धीय राजनीति को समाजवाद के नजरिए से देखना मार्क्सवादी रूढ़िवाद है। मार्क्सवादी रूढ़िवाद हमें लोकतांत्रिक नजरिए से सोचने में बाधाएं पैदा करता है।
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तीसरी मार्क्सवादी रूढ़ि है -मार्क्सवादी कल्पनाशीलता। भारत में विभिन्न रंगत के मार्क्सवादियों में एक विलक्षण साम्य है वे रहते पूंजीवाद में हैं,अधिकार पूंजीवाद के चाहते हैं,पूंजीवादी संरचनाओं के दुरूस्तीकरण के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन चाहते हैं समाजवाद ।
हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों-आलोचकों ने कभी गंभीरता के साथ "कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य और साहित्य" के अन्तस्संबंध पर विचार नहीं किया ।वे पूंजीवाद के सरलीकरणों और अमेरिकी बहानेबाजी के जरिए अपने दायित्व से भागते रहे हैं।
भारतीय समाज के निर्माण में कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की प्रधान भूमिका रही है। इसे सोवियत समाजवादी नजरिए या अमेरिकी नजरिए से नहीं समझा जा सकता। इसे समाजवाद के आग्रह के नजरिए से भी नहीं समझा जा सकता।
समाजवाद का आग्रह लोकतंत्र की शक्ति को समझने में बाधा पैदा करता है। भारत का वर्तमान लोकतंत्र से निर्धारित हो रहा है और भविष्य में भी लोकतंत्र से जल्दी मुक्ति मिलने वाली नहीं है। समाजवाद यहां के लिए कल्पनाशीलता है। लोकतंत्र को हमें लोकतंत्र के नजरिए से देखना होगा। समाजवाद के नजरिए से लोकतंत्र को देखना मार्क्सवादी कल्पनाशीलता है ।
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मार्क्सवादी रूढ़िवाद की चौथी रूढ़ि है लोकतंत्र को हिकारत की नजर से देखना। हिन्दी के प्रगतिशील  लेखकों में बड़ा हिस्सा है जो समाजवाद के आख्यान और गुणों को जानता है लेकिन भारत में लोकतंत्र में लेखकीय और नागरिक अधिकारों की चेतना से शून्य है।
    मसलन्, हिन्दीलेखकों में  लेखक के अधिकारों को लेकर कोई गुस्सा नहीं है। मसलन्, हमने यह कभी नहीं सुना कि नामवर सिंह या अन्य किसी लेखक ने राजकमल के मालिक से लेखकों की रॉयल्टी समय पर देने के लिए कभी संघर्ष किया हो।
     मैं निजी तौर पर दर्जनों लेखकों को जानता हूँ जिनको प्रकाशक रॉयल्टी नहीं देता और लेखकसंघ चुप तमाशा देखते रहते हैं।
      भारत के लेखक के लिए उसके अधिकारों की चेतना समाजवादी चेतना से ज्यादा महत्वपूर्ण है। लेखक के अधिकारों की चेतना लोकतंत्र के प्रति प्रेम और आस्था पैदा करके ही पैदा की जा सकती है। लोकतंत्र में हिकारत से देखना लोकतंत्र का निषेध है।
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हिन्दी लेखकों में मार्क्सवादीदंभ बहुत बड़ी समस्या है । मार्क्सवादीदंभ भाव रहने वाले लेखक बेहतर न लिखकर भी अपने लेखकीय श्रेष्ठत्व का दावा करते हैं।
इसके कवच के तौर पर वे मार्क्सवाद को पहले सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं ,बाद में मार्क्सवादियों और फिर अपने को सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं। ये लेखक भूल गए हैं कि मार्क्सवाद का जन्म श्रेष्ठता के सिद्धांत और संस्कार के प्रतिवाद में हुआ था।
मार्क्सवाद ,मार्क्सवादी और निज को श्रेष्ठ मानने का विचार अवैज्ञानिक है। मार्क्सवाद ने कभी श्रेष्ठता का दावा नहीं किया। स्वयं मार्क्स ने श्रेष्ठ होने का दावा नहीं किया।
एक अच्छा मार्क्सवादी दंभी नहीं संवेदनशील होता है,विनयी होता है,अन्य को सम्मान देता है।
दंभी की भाषा हेटभाषा होती है, रूप में भी और अंतर्वस्तु में भी। एक अच्छा मार्क्सवादी वह है जिसके पास अन्य के विचारों और विचारधारा के लिए जगह है। अन्य हैं इसलिए मार्क्सवाद उनसे भिन्न और वैज्ञानिक है।
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मार्क्सवादी लेखकों की इस दौर में सबसे बड़ी असफलता है कि वे शीतयुद्ध में साहित्य के अवमूल्यन को नहीं रोक पाए। साहित्य के जो मानक रचे गए उनमें इजाफा नहीं कर पाए।साहित्य के नए पैराडाइम को पकड़ नहीं पाए। फलतःआज वे हाशिए के बाहर चले गए हैं। लंबे समय से हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचना की कोई किताब बाजार में नजर नहीं आई और हिन्दी के मार्क्सवादी आलोचकों ने समीक्षा का कोई नया मानक नहीं बनाया।
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शीतयुद्ध और उसके बाद के दौर में जातीय विध्वंस का ग्लोबल चक्र चला है। पूर्व समाजवादी समाजों से लेकर कांगो-सोमालिया-इराक अफगानिस्तान आदि तक इसका दायरा फैला हुआ है। एक जमाने में समाजवादी समाज में जातीय समस्या के समाधान का हिन्दी में खूब गुणगान किया गया लेकिन जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो इस जातीय विघटन पर हिन्दी में अधिकांश मार्क्सवादी चुप रहे। यहां तक कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां और माओवादी-नक्सल भी चुप रहे। यह चुप्पी अचानक नहीं है बल्कि शीतयुद्धोत्तर यथार्थ को वैज्ञानिक ढ़ंग से न देख पाने का फल है।
शीतयुद्धोत्तर यथार्थ पहले की तुलना में ज्यादा जटिल और संश्लिष्ट है। नए यथार्थ और नई राजनीतिक समस्याओं के खिलाफ मोर्चा लेते हुए आप स्वयंसेवी संगठनों और व्यक्तियों के समूहों को देख सकते हैं लेकिन मार्क्सवादी दलों-संगठनों को कहीं पर भी नहीं देखेंगे।

मसलन् यूनियन कारबाइड के खिलाफ विगत 25 सालों में कौन संघर्ष कर रहा है ?मोदी के दंगों के खिलाफ कौन केस लड़ रहा है ?आदि अनेक समस्याएं हैं जहां पर छोटे स्वयंसेवी संगठन संघर्ष कर रहे हैं ,कम्युनिस्टदल सोए हैं।

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