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रविवार, 16 अगस्त 2015

सम्राट अकबर के मायने


        अकबर के शासन में भारत की जो इमेज बनी वह हम सबके लिए गौरव की बात है। एक शक्तिशाली राष्ट्र के रुप में भारत को निर्मित करने में अकबर का अतुलनीय योगदान था। भारत को शक्तिशाली राष्ट्र बनाकर अकबर ने भारतीय जनता की जो सेवा की है उसके सामने सभी मुस्लिमविरोधी आलोचनाएं धराशायी हैं। भारत के मुसलमान कैसे हैं और कैसे होंगे अथवा भारत नागरिक कैसे होंगे, यह तय करने में अकबर की बड़ी भूमिका थी । राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है अकबर के जमाने में हिन्दू जितने रुढ़िवादी और कूपमंडूक थे,उसकी तुलना में मुसलमान उदार हुआ करते थे। मसलन्,हिन्दुओं में इक्का-दुक्का लोग ही विदेश जाते थे जबकि मुसलमानों में बहुत बड़ा हिस्सा हज करने के बहाने  मक्का यानी विदेश जाता था। अकबर के जमाने में भारत में यूरोपीय लोग गुलाम की तरह बिकते थे,यह रिवाज अकबर को नापसंद था। उसने अनेक यूरोपीय गुलामों को मुक्ति दिलाई और उनको पोर्तुगीज पादरियों के हवाले कर दिया,इनमें अनेक रुसी थे। दुखद पहलू यह है अकबर के बाद जो शासक सत्ता में आए उनमें वैसी अक्ल और विवेक नहीं था,फलतः अकबर के जमाने में पैदा हुई अनेक परंपराएं आगे विकसित नहीं हो पायीं।
       अकबर को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने पहलीबार जनाना बाजार की अवधारणा साकार की,मीना बाजार का निर्माण किया।अकबर यह भी चाहता था कि भारत में बहुपत्नी प्रथा बंद हो और एकपत्नी प्रथा आरंभ हो। लेकिन वह इस मुतल्लिक कानून बनाने में असफल रहा। अकबर की धारणा थी कि भारत की औरतें आजाद ख्याल हों और उन पर कोई बंधन न हो। मीना बाजार के बहाने अकबर ने पहलीबार औरतों को पर्दे,महलों और घरों की बंद चौहद्दी से बाहर निकाला। मीना बाजार में औरतें खूब आती थीं, एक-दूसरे से मिलती थी,औरतें ही दुकानें चलाती थीं। जिस दिन जनाना बाजार लगता था उसे “खुशरोज” (सुदिन) कहा जाता था। मीना बाजार में यदि कोई लड़की पसंद आ जाती थी तो लड़का-लड़की में प्रेम हो जाता था। जैन खाँ कूका की बेटी पर यहीं सलीम आशिक हो गया था , लड़की की शादी नहीं हुई थी,मालूम होने पर  अकबर ने खुद शादी कर दी। अकबर के जमाने में बाजार में प्रेम की परंपरा की नींव पड़ी,अकबर ने इसे संरक्षण दिया और आज यह परंपरा युवाओं में खूब फल-फूल रही है। पर्दा प्रथा की विदाई हुई।
     अकबर की विशेषता थी कि वह दासता का विरोधी था। उसने अपने दासों को मुक्त कर दिया था। अबुलफजल के अनुसार अकबर ने सन् 1583 में दासमुक्ति का आदेश दिया। लेकिन समाज में दासों की समस्या बनी रही। अकबर के रुढ़िवादी रुप का आदर्श रुप था उसका दाढ़ी विरोधी नजरिया। अकबर और उसका बेटा दाढ़ी नहीं रखते थे। दाढियों से अनेक रुढ़ियां चिपकी हुई थीं,इसलिए अकबर ने दाढ़ी को निशाना बनाया। अकबर और उसके शाहजादे ने दाढ़ी नहीं रखी।जहाँगीर ने सारी जिन्दगी दाढ़ी नहीं रखी।  लेकिन शाहजहाँ और उसके बाद के जमाने में दाढ़ी लौट आयी। अकबर के दाढ़ी न रखने का आम जनता में व्यापक असर पड़ा और हजारों लोगो ने अपनी दाढ़ियां मुडवा दीं।
    
    अकबर का दिमाग पूरी तरह आधुनिक था उसने  भारत में व्यापक स्तर पर बारुद का इस्तेमाल किया। बारुदी हथियारों का प्रयोग किया।  जबकि बाबर ने ईरान के शाह इस्माइल के सहयोग से बारुद और तोपों के इस्तेमाल की कला सीख ली थी।  तोपों का सबसे पहले प्रयोग किया। अकबर पहला ऐसा शासक था जिसको मशीनों से प्रेम था,मशीनों के जरिए आविष्कार करना उसे पसंद था।  जेस्वित साधु पेरुश्ची के अनुसार “ चाहे युद्ध सम्बन्धी बात हो या शासन सम्बन्धी बात हो या कोई यांत्रिक कला ,कोई चीज ऐसी नहीं है,जिसे वह नहीं जानता या कर नहीं सकता था।” राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है “ अकबर ने महल के अहाते के भीतर भी कई बड़े-बड़े मिस्त्री खाने कायम किये थे,जिनमें वह अक्सर स्वयं अपने हाथ से हथौड़ी –छिन्नी उठाने से परहेज नहीं करता था। उसने हथियारों और यन्त्रों में कई आविष्कार किये थे,जिनका उल्लेख ‘आईन अकबरी’ में अबुलफजल ने किया है।  चित्तौड़ के आक्रमण के समय उसने अपनी देख-रेख में आध-आध मन के गोले ढलवाये ।बन्दूक चलाने में वह बड़ा ही सिद्धहस्त था शायद ही उसका कोई निशाना खाली जाता था।”   

मंगलवार, 11 अगस्त 2015

इस्लाम के उदारचेता मनस्वी सैयद महम्मद जौनपुरी

          यह एक मिथ है कि भारत के मुसलमान फंडामेंटलिस्ट हैं,यहां मुसलमानों में कोई धर्मनिरपेक्ष परंपरा नहीं है। सब कुछ शरीयत के हिसाब से होता रहा है। मुसलमानों के बारे में ये सभी बातें एकसिरे से बेबुनियाद हैं। मुगल सल्तनत के जमाने में भारत में मुस्लिम बुद्धिजीवियों की निडर धर्मनिरपेक्ष परंपरा रही है और उसकी मध्यकाल में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ये वे लोग हैं जो न तो शरीयत से खौफ़ खाते थे ,न खुदा के नाम से डरते थे, इनका हिन्दुस्तान की जनता से गहरा लगाव था। मजेदार बात यह है कबीर आदि भक्ति आंदोलन के कवि जिस समय सामाजिक न्याय की काल्पनिक बयार बहा रहे थे उस समय मुसलमानों में तीन बहुत बड़े कद के महापुरुष हुए हैं,ये हैं, सैयद महम्मद जौनपुरी,मियाँ अब्दुल्ला नियाजी और शेख अल्लाई । हिन्दी के  महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इन तीनों को मुस्लिम साम्यवादी कहा है।      राहुल सांकृत्यायन ने “अकबर”(1957) में  लिखा है “ यह आश्चर्य की बात नहीं है कि यदि हिन्दू नहीं ,बल्कि ये मुस्लिम सल्तनतें हमारे प्रादेशिक साहित्य के निर्माण में सबसे पहले आगे आईं। इस्लाम –प्रभावित हिन्दी अर्थात् उर्दू का साहित्य बहमनियों के समय शुरु हुआ। बंगाल की भी यही बात है। जौनपुर की शर्की-सल्तनत ने हमें कुतुबन,मंझन और जायसी जैसे रत्न प्रदान किए। जौनपुर ने हमारी धरती में बहुत नीचे तक घुसने की कोशिश की। 15वीं सदी में, एक सौ साल ऊपर तक, वर्तमान उत्तरप्रदेश और बिहार की सांस्कृतिक और राजनीतिक राजधानी जौनपुर रही। उसके महत्व को बहुत कम लोग समझते हैं। इसी जौनपुर में सैयद मुहम्मद जौनपुरी का जन्म हुआ था। इनकी मृत्यु 1505-6 ई.(हिजरी911) में हुई। जान पड़ता है ,यह 15वीं शताब्दी के मध्य पैदा हुए। उनकी जवानी के समय देश की अवस्था बड़ी ही दयनीय थी। चारों ओर बदअमनी छाई हुई थी। जौनपुर ने काफिरों के साथ अपना घनिष्ठ सम्बन्ध जोड़कर कुफ्र की ओर एक कदम उठा लिया था। हिन्दू-मुस्लिम शासक  या धर्माचार्य पसन्द नहीं करता था । चावल-उड़द की तरह उनका मेल हो,इसके मानने वाले भी बहुत नहीं थे,तो भी उसका उतना विरोध नहीं होता था।शेरशाह ने जौनपुर में हिन्दू मुसलमान की एकता देखी ,वहीं उसका बचपन बीता था। यही शेरशाह प्रायः हर बात में अकबर का मार्ग-प्रदर्शक रहा।”
      यही वह माहौल है जिसमें पहला मुस्लिम साम्यवादी सैयद महम्मद जौनपुरी जन्म लेता है और नए विचारों की रोशनी मशाल लेकर सामने आता है। वह कबीर का समकालीन था । उस समय शासकों के खिलाफ धर्म की आड़ में बगावत का साहित्य लिखा गया। यही बाद में   अन्त-ल्-मेहदी ( तू मेहदी है) के नाम से मशहूर हुए। राहुल ने लिखा है “ मेहदी का शब्दार्थ शिक्षक या अंतिम है। इस्लाम में हजरत महम्मद के बाद आने वाले सबसे अन्तिम पैगम्बर को मेहदी कहा जाता है। मेहदी का इस्लाम में वही स्थान है जोकि हिन्दुओं में कल्कि अवतार का । मुल्लों के लिए यह बड़ी कड़बी घूँट थी।सौभाग्य से सैयद महम्मद दिल्ली में नहीं, जौनपुर में पैदा हुए जहाँ अधिक खुलकर साँस ली जा सकती थी।”
    अतीत की इन बातों की ओर ध्यान दिलाना इसलिए भी जरुरी है जिससे हम यह समझ सकें कि भारत में इस्लाम की परंपरा वही नहीं है जिसको शरीयत के कट्टरपंथी व्याख्याकारों ने बनाया है। बल्कि भारत में इस्लाम की परंपरा भिन्न रही है। बल्कि कई परंपराएं रही हैं।      राहुल ने लिखा है “ मेहदी के प्रचार का ढ़ंग और उनकी बातें ऐसी थीं कि लोग उनकी तरफ आकृष्ट होने लगे। अनुयायियों को बढ़ते देख इस्लाम के झण्डेबरदार चुप कैसे रह सकते थे ? जौनपुर में उनका रहना असम्भव हो गया । वह वहाँ से चलकर गुजरात पहुँचे ।गुजरात में भी दिल्ली से बागी होकर जौनपुर की तरह की ही एक सल्तनत कायम हुई थी। वहाँ मेहदी के उपदेशों का प्रभाव केवल मुस्लिम जनसाधारण पर ही नहीं पड़ा, बल्कि अबुल फजल के अनुसार सुल्तान महमूद स्वयं उनका अनुयायी हो गया। बहुत दिनों तक वहाँ भी वह टिक न सके। अन्त में वहाँ से अरब गए।मक्का-मदीना देखा। घूमते-घामते ईरान में निकल गए। वहाँ पर भी उनके पास भक्तों की भीड़ लगने लगी। शाह इस्माइल ने ईरान की राष्ट्रीयता को उभाड़ने के लिए  और उसके द्वारा अपने राजवंश को मजबूत करने के लिए शिया धर्म को राजधर्म स्वीकृत किया था। शिया धर्म ने कट्टर इस्लाम की बहुत-सी बातें छोड़ दीं थी। मेहदी जौनपुरी वहां एक और शाख लगाना चाहते थे । यह न पसन्द कर शाह इस्माइल ने कड़ाई की। सैयद को ईरान छोड़ना पड़ा। ईरान के मज्दक के अनुयायी जिन्दीक के नाम से उस समय भी मौजूद थे ,इसलिए अपने विचारों को मेहदी जौनपुरी के मुँह से सुनकर वह यदि उनकी शिष्यमण्डली  में शामिल होने लगे तो ,तो आश्चर्य नहीं। और पीछे भी मेहदी से मिलती-जुलती विचारधारा यदि ईरान में मौजूद रही ,तो उसका श्रेय मेहदी को नहीं ,बल्कि मज्दकी कुर्बानियों को देना होगा।”  
      

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