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रविवार, 24 अप्रैल 2011

आकाशवाणी और संगीत की धरोहर -कुलदीप कुमार


                                       ( वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप कुमार)
 
हमारे संगीत के संरक्षण और संवर्धन में ऑल इंडिया रेडियो यानी आकाशवाणी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है. यह दीगर बात है कि अब आकाशवाणी को अपनी इस ऐतिहासिक भूमिका का ज़्यादा अहसास नहीं रह गया है और संगीत, विशेषकर शास्त्रीय संगीत, के प्रति उसका रवैया उदासीनता का बनता जा रहा है. मुझे मालूम है कि आकाशवाणी और उसके अधिकारी संगीत के कार्यक्रमों का विवरण और आंकड़े देकर तत्काल इसका प्रतिवाद करेंगे, लेकिन जिसे भी आकाशवाणी के गौरवशाली इतिहास और संगीत के प्रचार-प्रसार और संरक्षण-संवर्धन में उसकी भूमिका की जानकारी है, वह इस आकलन से असहमत नहीं होगा.
 
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में घटी दो राजनीतिक घटनाओं ने उत्तर भारत के साहित्य और संगीत की दुनिया पर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ा. 1856 में लखनऊ के नवाब वाजिदअली शाह की गद्दी छीनकर ईस्ट इंडिया कंपनी ने  उन्हें कोलकाता के पास मटियाबुर्ज़ में बसा दिया. अगले साल सिपाही विद्रोह हुआ जिसे अंग्रेजों ने ग़दर और कार्ल मार्क्स ने भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा. इसके परिणामस्वरूप मुग़ल राजवंश की प्रतीकात्मक सत्ता भी ख़त्म हो गयी और दिल्ली के अधिकाँश मूर्धन्य संगीतकार, जिनमें दिल्ली घराने के शीर्षस्थ गायक उस्ताद तानरस खां भी शामिल थे, रामपुर, हैदराबाद, मुंबई और ऐसी ही अनेक जगहों पर शरण लेने के लिए मजबूर हो गए. यह समय भारत में औद्योगिक एवं वाणिज्यिक पूंजी के विकास और मुंबई तथा कोलकाता के औद्योगिक महानगरों में बदलने की प्रक्रिया के शुरू होने का भी था. इसलिए संगीतकारों को शौक़ीन ज़मींदारों, नवाबों और महराजाओं के अलावा संगीतरसिक सेठों का प्रश्रय भी मिलने लगा. 
बीसवीं शताब्दी के आते-आते संगीत में दो विभूतियों ने क्रांतिकारी परिवर्तन का सूत्रपात किया. पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने देश भर में घूम-घूमकर उस्तादों से बंदिशें एकत्रित करने, विभिन्न रागों पर उनसे चर्चा करके उनके मानक रूप निर्धारित करने और संगीतशास्त्र के रहस्यों से पर्दा उठाते हुए अनेक विद्वत्तापूर्ण पुस्तकें लिखने का महत्कार्य किया. उधर पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने टिकट लगाकर संगीत के सार्वजनिक कार्यक्रम करने की परम्परा शुरू की और लाहौर में पहला संगीत विद्यालय खोला. इन दोनों क्रांतदर्शी संगीतज्ञों के प्रयासों के फलस्वरूप शास्त्रीय संगीत अभिजात वर्ग की महफ़िलों से बाहर निकलकर मध्यवर्ग तक पहुंचा. बीसवीं शताब्दी की आरंभिक वर्षों में ही ध्वनि-टंकण यानी रिकॉर्ड करने की टेक्नोलॉजी आ गयी और 1902 में उस ज़माने की सबसे मशहूर गायिका गौहर जान के रिकॉर्ड बाज़ार में आये. संक्षेप में कहें तो यह शास्त्रीय संगीत के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत थी क्योंकि अब संगीत किसी के भी द्वारा कभी भी और कहीं भी सुना जा सकता था. वह सीधे लोगों के घरों के भीतर प्रवेश पा गया था. अब उसे सुनने के लिए किसी रईस के घर की महफ़िल में उपस्थित होना ज़रूरी नहीं रह गया था.
लेकिन टेक्नोलॉजी की सीमा यह थी कि ये रिकॉर्ड तीन से चार मिनट के ही हो सकते थे. रेडियो ने इस सीमा को तोड़ दिया. भारत में रेडियो का युग 1923 में शुरू हुआ और 1936 के आते-आते ऑल इंडिया रेडियो की स्थापना हो गयी. रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एआईआर को आकाशवाणी की संज्ञा दी. आकाशवाणी ने पहली बार संगीतकारों को अखिल भारतीय मंच प्रदान किया. अब उनके कार्यक्रम देश के विभिन्न हिस्सों में बैठे श्रोता एक ही समय पर एक साथ सुन सकते थे.
आज़ादी आने के साथ ही संगीतकारों को मिलने वाला सामंती राज्याश्रय समाप्त हो गया. ऐसे में आकाशवाणी ने उन्हें संभाला और अपने यहाँ नौकरियाँ और काम देकर उनके भरण-पोषण का कुछ हद तक प्रबंध  किया. रेडियो संगीत सम्मेलन और राष्ट्रीय कार्यक्रम के द्वारा उसने शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार और संगीतकारों को प्रोत्साहन देने का ऐतिहासिक कार्य किया. इसी क्रम में उसके पास मूर्धन्य संगीतकारों की प्रस्तुतियों का अनमोल खजाना जमा हो गया जो इस समय उसके संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहा है. यूं यह कहना अधिक सही होगा कि वहां धूल खा रहा है. 
किसी को भी यह नहीं पता कि आकाशवाणी के संग्रहालय में किस-किसकी रिकॉर्डिंग है. पारदर्शिता के इस युग में भी, जब सभी सूचनाएं वेबसाइट पर डालने का चलन है, आकाशवाणी की वेबसाइट पर संग्रहालय के बारे में कोई भी सूचना नहीं है. इस वेबसाइट का हाल यह है कि इस पर यदि आप आकाशवाणी के विभिन्न चैनलों पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की जानकारी लेना चाहें, तो वह भी उपलब्ध नहीं है. पहले आकाशवाणी हीनी और अंग्रेजी में एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया करती थी जिसमें अगले एक माह के कार्यक्रमों की पूरी जानकारी दी जाती थी. लेकिन इनका प्रकाशन बंद कर दिया गया है. इन पत्रिकाओं को बंद हुए कम से कम एक दशक तो हो ही गया होगा. हमारे अखबार केवल टीवी चैनलों पर प्रसारित होने कार्यक्रमों की जानकारी देने में रूचि रखते हैं. रेडियो को उन्होंने भी भुला दिया है. नतीजतन आज किसी भी संगीतप्रेमी के लिए यह संभव नहीं कि वह यह जान सके कि अगले दिन सुबह आठ बजे के समाचार बुलेटिन के बाद किस संगीतकार का गायन या वादन प्रसारित होने वाला है या आज रात को वह किस संगीतकार को सुन सकता है. चूंकि आकाशवाणी संग्रहालय में क्या-कुछ जमा है, इसके बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए किसी श्रोता के लिए यह भी संभव नहीं कि वह अपनी फरमाइश आकाशवाणी के पास भेज सके. 
कुछ समय पहले आकाशवाणी के एक उच्चाधिकारी ने मेरे साथ बातचीत के दौरान बेबाकी के साथ कहा कि उनके संगठन की नीति अपनी संगीत सम्पदा या उसके बारे में जानकारी को जनता के साथ बांटने की नहीं है. आकाशवाणी एक जन प्रसारण संस्था है और उसका काम संगीत का प्रसारण करना है, जो वह बखूबी कर रही है.
तकनीकी नज़रिए से देखें तो उनकी बात ठीक है. आकाशवाणी से रोज़ ही संगीत का प्रसारण होता है. लेकिन यह प्रसारण कैसा है, इसे आकाशवाणी के कार्यक्रमों को सुनने वाले बदकिस्मत श्रोता ही जानते हैं. आप चौंकिए मत यदि धमार की जगह आपको  'धामड़' सुनने को मिले और राग पूरिया राग प्रिया बन जाए. कभी-कभी आप केदार में राग ख़याल भी सुन सकते हैं.
आकाशवाणी को अपने संग्रहालय के बांरे में जानकारी जनता के साथ बांटने में तो गुरेज़ है ही, वह अपने स्टाफ के साथ भी शायद इसे नहीं बांटना चाहती. इसीलिए इन्द्रप्रस्थ चैनल पर, जिसे पहले हम दिल्ली ए के नाम से जानते थे, हर मंगलवार रात दस बजे प्रसारित होने वाले कार्यक्रम 'चयन' की यह दुर्गति न होती. इस कार्यक्रम में आकाशवाणी के संग्रहालय से चुनकर रिकॉर्डिंग प्रसारित की जाती हैं. लेकिन अब हाल यह है कि इसमें कुछ गिने-चुने कलाकारों की कुछ गिनी-चुनी रिकॉर्डिंग ही पूरे साल हर दो-तीन माह के अंतराल पर दुहराई जाती हैं, मानों संग्रहालय में इनके अलावा और कुछ हो ही नहीं. 
किसी समय आकाशवाणी ने एचएमवी के साथ मिलकर पुराने दिग्गज संगीतकारों के एलपी रिकॉर्ड और कैसेट निकाले थे. बाद में टी-सिरीज़ के साथ मिलकर उस्ताद अलाउद्दीन खां, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां और उस्ताद अली अकबर खां जैसे कई महान कलाकारों के सीडी सेट जारी किये गए. लेकिन अब ये सभी अप्राप्य हैं. इन्हें संगीतप्रेमियों को फिर से सुलभ कराने की ओर आकाशवाणी का बिलकुल ध्यान नहीं है. उसने स्वयं पिछले कुछ वर्षों के दौरान उस्ताद अमीर खां, बेगम अख्तर, पंडित डी वी पलुस्कर और पंडित कृष्णराव शंकर पंडित जैसे मूर्धन्य संगीतकारों के सीडी जारी किये हैं, लेकिन इनकी मार्केटिंग की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया है. यदि कोई संगीतप्रेमी इन्हें खरीदना चाहे, तो उसे संसद मार्ग स्थित आकाशवाणी भवन जाकर वहां बने काउंटर से ही उन्हें लेना होगा. यानी दिल्ली जैसी जगह में उसे एक दिन सिर्फ इस काम के लिए समर्पित करना होगा. कितने लोग ऐसा कर सकते हैं? और फिर, इस बात की क्या गारंटी कि जाने पर कांउटर खुला ही मिलेगा? उसे संभालने वाला छुट्टी पर नहीं होगा या फिर लंच के लिए नहीं गया हुआ होगा? भारत के सरकारी दफ्तरों के लंच और उनकी लगातार लंबी होती जाती अवधि तो अब विश्व भर में प्रसिद्द हो चुकी है.
आकाशवाणी ने अधिकांशतः उन्हीं संगीतकारों के सीडी जारी किये हैं जिनके एलपी, कैसेट या सीडी पहले से ही बाज़ार में उपलब्ध हैं. बेहतर हो यदि वह अपने संग्रहालय से ऐसे लोगों की रिकॉर्डिंग चुने जिनका संगीत अब श्रोताओं को उपलब्ध नहीं है, या यदि है भी तो बेहद कम.
यह तभी हो सकता है जब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में हो जिसे स्वयं संगीत में दिलचस्पी हो. अभी तक इस मंत्रालय को केवल दो ही ऐसे मंत्री नसीब हुए हैं--बी वी केसकर और वसंत साठे. या फिर आकाशवाणी को कोई ऐसा महानिदेशक मिले जो संगीत और उसकी गौरवशाली महिमामयी परम्परा के संरक्षण और संवर्धन में गहरी रूचि रखता हो. वर्ना इस अनमोल खजाने का भी वही हश्र होगा जो ज़मीन में गड़े खजानों का होता है. वे किसी के भी काम नहीं आते.   

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

26/11 के सबकः आतंकवादी खबरों के उत्पादक थिंक टैंक

मुम्बई की 26/11 की घटना के बाद से आतंकवाद पर मीडिया में काफी चर्चा हुई है। इस चर्चा के केन्द्र में आमतौर आतंकी कसाब पर चल रहा मुकदमा सुर्खियों में रहा है। यह कवरेज कैसे आया और अतिरंजित ढ़ंग  से क्यों आया ? इस पर कभी मीडिया के लोगों का ध्यान नहीं गया। इस प्रक्रिया में आतंकियों के प्रति सतर्कता और सावधानी के सवालों पर कम ध्यान दिया गया ।

     पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के आने के साथ यह अनुभूति पैदा करने की कोशिश की गई थी कि मुंबई में आतंकी हमला हो सकता है। लेकिन सामान्यतौर पर मुम्बई में आतंकी हमला कोई समस्या नहीं रहा है। इसी तरह अन्य महानगरों में भी आतंकवाद समस्या नहीं है।
      केन्द्र सरकार बड़े उत्सवधर्मी ढ़ंग से सतर्कता वार्ता जारी करती रहती है ,आज भी जारी की गई है। सवाल उठता है भारत के लिए क्या आतंकवाद सचमुच में एक बड़ी समस्या है ? यदि ऐसा है तो विगत एक वर्ष में सारी दुनिया में आतंकी हमले में कितने हिन्दुस्तानी मारे गए ? काश्मीर को छोड़कर देश के अन्य भागों में कितने लोग विगत एक साल में आतंकी हमले में मारे गए ?
    इसी तरह हम अमेरिकी मीडिया में आतंकवाद के खतरे के बारे में खूब हंगामा देखते हैं। लेकिन सच क्या है ? कितने अमेरिकी सारी दुनिया में आतंकी हमलों में मारे गए ? गूगल पर सर्च करने जाओगे तो इसके उत्साहजनक परिणाम नहीं मिलेंगे। अमेरिका के गृहमंत्रालय के अनुसार 2009 में सारी दुनिया में 9 अमेरिकी मारे गए। कोई भारतीय विगत एक साल में आतंकियों के हाथों नहीं मारा गया।
   भारत में आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे का भोंपू की तरह प्रचार करने वाले मीडिया,सरकारी तंत्र और रिसर्च संगठनों के बीच की सांठगांठ को इसी प्रसंग में समझना बेहतर होगा। अमेरिका स्थित पेनसिलवेनिया विश्वविद्यालय के थिंक टैंक एण्ड सिविल सोसायटी प्रोग्राम के तहत आंकड़े एकत्र किए हैं। मसलन अमेरिका में2000 थिंक टैंक संगठन हैं। भारत में 422 थिंक टैंक संगठन हैं। यानी सारी दुनिया में अमेरिका के बाद दूसरा नम्बर हमारे देश के थिंक टैंक संगठनों का है। 422 संगठनों में से 63 सुरक्षा संबंधी रिसर्च और विदेशनीति पर काम कर रहे हैं। इन्हें विश्व के बड़े शस्त्र निर्माताओं से सालाना मोटा फंड सप्लाई किया जाता है। इन संगठनों में सैन्य-पुलिस के बड़े अफसरों के साथ भू.पू.राजनयिक भी काम कर रहे हैं। ये संगठन मूलतः शस्त्र उद्योग के जनसंपर्क फोरम की तरह काम करते हैं। ये लोग फेक आतंकी खबरें बनाते हैं और फिर उन्हें मीडिया और गुप्तचर एजेंसियों के जरिए प्रचारित करते हैं। वे आदिवासी ,दलितों और अल्पसंख्यकों में विस्फोटक सामग्री का प्रचार और इस्तेमाल करते हैं, फेक धमाके कराते है,या नियोजित धमाके कराते हैं जिससे अत्याधुनिक शस्त्रों की खरीद को वैधता प्रदान की जा सके।
    हाल के दिनों में हिन्दू आतंक की अधिकांश खबरें इसी लॉबी के द्वारा तैयार करके प्रसारित करायी गयी हैं। इस समूची प्रक्रिया में पहला लाभ यह हुआ है कि आरएसएस को बदनाम करने का मौका मिला है। दूसरा लाभ यह मिला है कि इन थिंक टैंक के थिंकरों को अपने निजी हितों का विस्तार करने का अवसर मिला है। इसके बदले में  बड़े अफसरों को समृद्ध देशों में नागरिकता,मकान,बैंक में धन,उनके बच्चों को विदेशों में पढ़ाई की शानदार व्यवस्था करा दी जाती है।
      उल्लेखनीय है भारत को दुनिया का सबसे बड़ा शस्त्र खरीददार माना जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत ने 2000-07 के बीच में सारी दुनिया में हथियार खरीददारों में दूसरा स्थान पाया है। सारी दुनिया के सकल शस्त्रों का 7.5 फीसदी हथियार भारत ने खरीदे हैं। चीन,रूस और अमेरिका के बाद हथियारों पर खर्च करने वाला चौथे नम्बर का देश है।
    सारी दुनिया में 1,130 कंपनियां हथियार बनाने का काम करती हैं। इनमें से 90 फीसदी  अमेरिका, ब्रिटेन,रूस, चीन और फ्रांस की हैं। ये परंपरागत हथियार बनाती हैं। जबकि अफ्रीका,एशिया,लैटिन अमेरिका,मध्यपूर्व में सारी दुनिया के 51 फीसदी भारी हथियार लगे हुए हैं।
      ग्लोबल पीस इंडेक्स के अनुसार भारत का स्थान सबसे नीचे 122 वें नम्बर पर 2.422 स्कोर के साथ है। हिन्दुत्वादी ताकतों का मीडिया,नौकरशाही,शासकों आदि में जिस तरह का व्यापक प्रभाव है उसके चलते यह भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि थिंक टैंकों के एक हिस्से के साथ हिन्दुत्ववादियों की सांठगांठ भी हो सकती है। लेकिन भारत में शस्त्र उद्योग और उसके थिंक टैंक संगठन जिस तरह की आबोहवा बनाने में लगे हैं उससे भारत में लोकतंत्र के लिए सीधे खतरा पैदा हो गया है।




मंगलवार, 16 नवंबर 2010

साइबरकल्चर का एशियाई परिप्रेक्ष्य

            परवर्ती पूंजीवाद ने एशिया में विकास की नयी राजनीतिक संभावनाओं को खोला है। उसके कारण एशिया इस समय सबसे समर्थ आर्थिक शक्ति बन गया है। शीतयुद्ध की समाप्ति और संचार क्रांति ने विश्व की अर्थनीति में एशिया को ताकतवर बनाया है। एशिया आज जितना ताकतवर है वैसा ताकतवर वह कभी नहीं था। नयी परिस्थितियों में तीन बड़े परिवर्तन हुए हैं पहला परिवर्तन यह हुआ है कि चीन में समूचा वातावरण बदला है। बंदिशें कम हुई हैं। चीन के बदले हुए वातावरण ने एशिया में मासकल्चर को नई बुलंदियों पर पहुँचा दिया है और सामाजिक-आर्थिक विश्व शक्ति संतुलन को भी इसने प्रभावित किया है। मासकल्चर,संचार उद्योग और संस्कृति उद्योग के मालों का चीन आज सबसे बड़ा उत्पादक देश है । चीन में मजदूरों का शोषण बढ़ा है। मालों की खपत बढ़ी है।   
    एशियाई देशों की साझा समस्या है कारपोरेट लूट, पृथकतावाद और फंडामेंटलिज्म ।इन तीन विराट दैत्यों से कैसे संघर्ष करें ? मजेदार बात यह है कि जिस समय सारी दुनिया में समाजवाद और शीतयुद्ध से मुक्ति का मार्ग खोजा जा रहा था ठीक उसी समय जातीयताओं और अल्पसंख्यकों पर हमले तेज हुए हैं। जातीयसंकट गहरा हुआ है। इससे एशिया में लोकतंत्र का रास्ता क्षतिग्रस्त हुआ है। एशिया में लोकतांत्रिक प्रणाली को सबसे बड़ी चुनौती इसी दौर में दी गई । समाजवाद टूटा।खासकर सोवियत संघ और चीन में गैर समाजवादी मार्ग का अनुसरण किया गया। लंपट लोकतंत्र का उदय हुआ। अबाध कारपोरेट लूट के पूंजीवादी मार्ग का विकास हुआ।
    इसके अलावा देशज स्तर पर भाषायी असहिष्णुता कम हुई । दूसरी ओर भाषाओं के भूमंडलीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई। संचार क्रांति के अनेक नकारात्मक लक्षण हो सकते हैं लेकिन एक सकारात्मक लक्षण है भाषाओं का भूमंडलीकरण।
      भाषा के भूमंडलीकरण ने अस्मिता के समूचे विमर्श को,समाजवाद और शीतयुद्ध के दौर में बनी धारणाओं को गंभीर चुनौती दी और उन्हें नष्ट किया। फलतःआज भाषा विवाद की नहीं संवाद और संपर्क का माध्यम है।        
     रूस और चीन में घटित परिवर्तनों ने नव्य-उदारतावाद की दिशा ही गड़बड़ा दी है। जिस तरह समाजवादी सोवियत संघ के उदय ने पूंजीवाद के छंद को बेसुरा बनाया था और उन्हें कल्याणकारी राज्य के निर्माण की दिशा में जाने या समाजवाद अपनाने के लिए मजबूर किया था। ठीक वैसे ही चीन ने नव्य उदारतावाद को अपनाकर अमरीकी नव्य उदारतावाद को नई ऊँचाईयों पर पहुँचा दिया। सोवियत संघ जैसे सारी दुनिया को समाजवाद और कल्याणकारी राज्य का पाठ पढ़ाते पढ़ाते समाजवाद का पाठ भूल गया यहीदशा अमेरिका की हुई है। वह नव्य उदारतावाद का पाठ पढ़ाते हुए उसकी स्वयं की गाड़ी नव्य उदारतावाद की पटरी से उतर गयी है। समाजवाद के पराभव के समय अमेरिका ने सोवियत कम्युनिस्टों की मदद की. ठीक उसी तरह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने आर्थिकमंदी में अमेरिका की मदद की। आज बिडम्बना यह है कि समाजवाद रूस सेचला गया और नव्य उदारतावाद अमेरिका से जाने के लिए छटपटा रहा है।और चीन समाजवाद और नव्य उदारतावाद के बीच में फंसा हुआ लोकतंत्र की राह का यात्री बन चुका है। 
    इस क्रम में संस्कृति हाशिए पर चली गयी है और मासकल्चर ,फंडामेंटलिज्म और शरणार्थी समस्या सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने हैं। हिन्दी के संदर्भ में पहली बात यह कहनी है कि हिन्दी का प्रसार हुआ है लेकिन हिन्दी की शिक्षा का ह्रास हुआ है। संस्कृति के रूप अपनी स्वायत्त स्थिति खो चुके हैं। हिन्दी का मीडिया बड़ा हुआ है, कारपोरेट मीडिया बना है। संस्कृति उद्योग की ताकतवर भाषा के रूप में हिन्दी का विस्तार हुआ है।  दूसरी ओर हिन्दी में आलोचनात्मक स्पेस कम हुआ है।
    नयी सांस्कृतिक दुनिया सरकारी विनिमय शर्तों के परे जाकर काम कर रही है। खासकर उपग्रह टेलीविजन,विज्ञापन और इंटरनेट की यूनीकोड भाषा ने हिन्दी को ग्लोबल संचार भाषा बना दिया है। इससे हिन्दी का आंतरिक संसार बुनियादी तौर पर बदला है। संचार क्रांति ने सांस्कृतिक विनिमय को बढ़ाया है। संस्कृति के उपभोग को बढ़ाया है। संस्कृति के ग्लोबल बाजार का निर्माण किया है।
        एशियाई देशों में समस्याओं का एक छोर आंतरिक है और दूसरा ग्लोबल है। आंतरिक समस्याएं लोकतंत्र के अभाव और अवरूद्ध विकास से जुड़ी हैं। अवरूद्ध विकास में सहयोगी हैंअंधजातीयतावाद,पृथकतावाद और धार्मिक टकराव। बाहरी समस्याओं की जड़ें नव्य उदारतावाद और युद्ध से संबंधित हैं। इन दोनों ही किस्म की समस्याओं ने अस्थिरता और विस्थापन और शरणार्थी समस्या को जन्म दिया है। यही वह परिदृश्य है जिसमें एशिया में संचार क्रांति हुई है, ग्लोबल मीडिया उद्योग का विकास हुआ है। हिन्दी में साइबरकल्चर का जन्म हुआ है।
      साइबर युग में हिन्दी की दुनिया तेजी से बदली है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के शब्दों में कहें तो हिन्दी अब नई चाल में ढ़ल रही है। नई चाल में हिन्दी कैसे ढ़ल रही है। इसके बारे में अभी हमने सोचना आरंभ नहीं किया है। हमें हिन्दी के बदले मानकीकरण को गौर से देखना चाहिए। हाल ही में भारत में ‘W3C ’ नामक कंपनी ने अपना मुख्यालय खोला है। इस कंपनी का काम होगा वेब पर भारत की संविधान स्वीकृत 22 राजभाषाओं के मानकीकरण के काम की निगरानी करना। यह काम भारत सरकार के सूचना तकनीकी विभाग के सहयोग से होगा।
     इसके पहले भारत सरकार ने आईसीएएनएन यानी ‘दि इंटरनेट कारपोरेशन फॉर एसाइननेम्स एंड नम्बर्स ’ में भारतीय भाषाओं में डोमेन नेम दर्ज करने का आवेदन किया है। भारत सरकार ने सात भाषाओं में डोमेन नेम दर्ज करने का अनुरोध किया है। ये भाषा हैं- हिन्दी,बांग्ला,पंजाबी,उर्दू,तमिल,तेलुगू और गुजराती। अभी स्थिति यह है कि हिन्दी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली तीसरे नम्बर की भाषा है। बांग्ला का आठवां स्थान है। लेकिन इंटरनेट पर इस्तेमाल होने वाली 10 सर्वोच्च भाषाओं में भारत की एक भी भाषा का नाम नहीं है।
     भाषावार स्थिति इस प्रकार है- अंग्रेजी 464 मिलियन,चीनी 321 मिलियन,स्पेनिस 131 मिलियन,जापानी 94 मिलियन ,फ्रेंच 74 मिलियन,पोर्तुगीज 73 मिलियन,जर्मन 65 मिलियन, अरबी 41 मिलियन ,रशियन 38 मिलियन और कोरियन भाषा  का 37 मिलियन यूजर इस्तेमाल करते हैं। कुल मिलाकर 10 भाषाओं के इंटरनेट पर 1,338 मिलियन यूजर हैं। बाकी भाषाओं के 259 मिलियन यूजर हैं। सारी दुनिया में 1,596 मिलियन भाषायी यूजर हैं।
    इसी तरह अनुवाद उद्योग पर नजर डालें तो व्यापक असंतुलन नजर आएगा। सबसे ज्यादा जिन 20 भाषाओं की रचनाओं का अनुवाद हो रहा है ,वे हैं-अंग्रेजी,फ्रेंच,जर्मन, रशियन, इटालियन,स्पेनिश,स्वीडिश,लैटिन,डेनिश,डच,चेक,एनशिएंट ग्रीक,जापानी,पोलिश, हंगेरियन, अरबी,नॉर्वेजियन, पोर्तुगीज,हिब्रू, चीनी।
       इन भाषाओं का जिन भाषाओं में अनुवाद हो रहा है वे हैं जर्मन,स्पेनिश, फ्रेंच,जापानी,अंग्रेजी,डच,पोर्तुगीज,पोलिस,रशियन,डेनिश,इटालियन,चेक,हंगेरियन,फिनिस, नॉर्वेजियन, स्वीडिश,मॉडर्न ग्रीक,बल्गेरियन,कोरियन और स्लोवाक।
   भारतीय भाषाओं के नेट पर अवरूद्ध विकास के कुछ कारण हैं। मसलन अभी भारत में पीसी साक्षरों की संख्या मात्र 62 मिलियन यानी कुल शहरी आबादी का यह मात्र 26 प्रतिशत है। सर्वोच्च चार बड़े महानगरों में इंटरनेट 21प्रतिशत आबादी तक ही पहुँच पाया है। इसके बाद के चार महानगरों में 21 प्रतिशत आबादी तक पहुँच पाया है। गैर महानगरों में 23 प्रतिशत आबादी तक पहुँच पाया है। पांच से एक लाख की आबादी  वाले इलाकों में 16 प्रतिशत तक ही पहुँच पाया है।  5 लाख की आबादी वाले टाउन में मात्र 4 प्रतिशत तक ही इंटरनेट पहुँच पाया है। स्थानीय भाषा के प्रयोग के लिहाज से चीन,जापान और कोरिया सबसे ऊपर आते हैं। भारत में अधिकांश लोग जानते ही नहीं हैं कि स्थानीय भाषा में सॉफ्टवेयर कहां मिलता है।
    एक सर्वे के अनुसार भारत के महानगरों के 35 प्रतिशत इंटरनेट यूजर नहीं जानते कि ऑनलाइन भारतीय भाषाओं का सॉफ्टवेयर कहां पर मिलता है। गैर महानगरीय यूजरों में यह संख्या 53 प्रतिशत तक बढ़ गयी है।
   भारत में आमतौर पर रोमन लिपि में लिखने की आदत बढ़ती जा रही है। इस समस्या से भी भारतीय भाषाओं को जल्दी ही मुक्ति मिल जाएगी। ‘दि वर्ल्ड वाइड वेब कंसोर्टियम ने 7 सितम्बर 2010 को यह फैसला लिया है कि नेट पर एशिय़ाई भाषाओं के बहुभाषी स्पीच सिस्टम को आरंभ कर दिया जाएगा। इस सिलसिले में चीन,भारत और ग्रीस में वर्कशॉप भी हो चुकी है।
    इसी क्रम में भारत में ‘स्पीच सिंथेसिस मार्कप लैंग्वेज ( एसएसएमएल 1.1) की व्यवस्था लागू होने जा रही है। इसके तहत आवाज के नियंत्रण,उच्चारण,ध्वनि के वोल्यूम और स्तर को नियंत्रित किया जा सकेगा। इससे भाषा के सटीक उच्चारण को समझने में मदद मिलेगी।
       साइबर संस्कृति के संदर्भ में यदि एशिया को देखें तो व्यापक भाषायी असंतुलन नजर आएगा। यह माना जा रहा है कि आने वाले एक बिलियन से ज्यादा इंटरनेट यूजर एशियाइ देशों से आएंगे। लेकिन इंटरनेट पर इस इलाके की भाषाओं का कंटेंट बहुत कम है। इंटरनेट के सकल कंटेंट का मात्र 13.83 प्रतिशत ही एशियाई भाषाओं में है। यह सामग्री सिर्फ चीन,कोरिया और जापान जैसे विकसित देशों की है। इनके अलावा सभी एशियाई देशों का इंटरनेट पर सन् 2011 तक मात्र 0.03 प्रतिशत रहेगा। उम्मीद है कि एशियाई भाषाओं का ऑनलाइन कंटेंट बढ़कर 14.69 प्रतिशत हो जाएगा। अभी दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की भाषाओं का कंटेंट कुल मिलाकर 10 मिलियन पन्ने है। जबकि सारी दुनिया के नेट यूजरों में एशिया की संख्या 41.3प्रतिशत है। यह संख्या सन् 2012 तक बढ़कर 50 प्रतिशत हो जाएगी। इसके बाबजूद सच यह है कि एशिया में इंटरनेट की पहुँच मात्र 17.2 प्रतिशत तक ही हो पायी है। इसके विपरीत पश्चिम देशों में इंटरनेट का विकास सर्वोच्च स्तर तक पहुँच गया है। पश्चिमी देशों में 73.1 प्रतिशत आबादी इंटरनेट के दायरे में है। अब इन देशों में इंटरनेट के विकास की बहुत कम संभावनाएं बची हैं। यही वह परिदृश्य है जो हमें आगे बढ़ने और ज्यादा से ज्यादा ईसाक्षर बनाने का एहसास पैदा करता है।        

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

भूमंडलीकरण और विकास - 3- फिदेल कास्त्रो

     लैटिन अमरीका के देशों ने हाल के वर्षों में आर्थिक रक्तस्राव के जो सबसे खराब रूप देखे हैं, उनमें पूंजी पलायन भी एक है। यह विदेशी निवेशकों द्वारा अर्जित लाभ के अंतरण के रूप में नहीं है और न ही यह पलायन उन विदेशी ऋणों के भुगतान के रूप में है जो तानाशाह और भ्रष्ट शासकों के लिए थे जिन्होंने देश की निधियों को उड़ाया और उनका गबन किया, निजी बैंकों से लिए गए निजी ऋण या उसका उपयोग को अदा करने के लिए किया। यह पूंजी पलायन असमान विनिमय के सुविख्यात तत्व के कारण हुए नुकसान का परिणाम भी नहीं है। यह देश के भीतर निर्मित निधियों, कम वेतन पाने वाले मजदूरों की कीमत पर अर्जित बेशी मूल्य या बुध्दिजीवी कार्यकर्ताओं और व्यावसायियों की ईमानादार बचतों या छोटे उद्योगों, कारोबारों और सेवाओं के लाभों के पलायन का मामला है।
लैटिन अमरीकी देशों से घातक पूंजी पलायन का कारण बगैर किसी रोक-टोक और जरूरत के राष्ट्रीय मुद्रा से दुर्लभ मुद्रा की खरीद है। पवित्र नव उदार सिध्दांत के रूप में यह फार्मूला अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संगठनों द्वारा लादा गया है। ऐसा अनुमान है कि वेनेजुएला जैसे देशों से पिछले 40 वर्षों की अवधि के दौरान लगभग 250 अरब डालर का पूंजी पलायन हुआ। अर्जेंटीना, ब्राजील, मैक्सिको तथा अन्य लैटिन अमरीकी देशों से निकली राष्ट्रीय निधियों को भी इसमें जोड़ें।
बहादुर वेनेजुएलाई अवाम और उनके साहसी नेता को शाबासी जिन्होंने विनिमय दर पर नियंत्रण कायम कर लिया है। इससे इस देश से उक्त त्रासदी का अंत हो गया है।
मुझे याद है कि 1959 में क्यूबाई क्रांति की जीत के समय लैटिन अमरीका का कुल ऋण केवल पांच अरब डालर था। उस समय इसकी आबादी 21 करोड़ 44 लाख थी जो अब बढ़कर 54 करोड़ 34 लाख हो गई है। इसमें से 22 करोड़ 40 लाख लोग गरीब हैं और 5 करोड़ से अधिक निरक्षर हैं। 2003 में उसका कुल ऋण कम से कम 800 अरब डालर हो गया था।
विश्व युध्द के बाद गोलार्ध के इस क्षेत्र ने उतना विकास क्यों नहीं किया है जितना कि कनाडा, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने किया है। कभी ये भी यूरोप के उपनिवेश थे। ये तो हमारे मुकाबले भी कम समृध्द और विकसित थे। क्या यह अमरीका के पिछवाड़े रहने के संदिग्ध सौभाग्य का परिणाम है? या क्या यह इस वजह से है कि हम श्वेतों, अश्वेतों, इंडियनों और वर्ण संकरों के घृणित समूह हैं और मानव जीन का यह अध्ययन तथा वैज्ञानिक अनुसंधान गलत है कि मानव जाति में विभिन्न प्रजातियों की बौध्दिक क्षमता में कोई अंतर नहीं है? दोष कहां पर है?
मैंने यह कहकर अपनी बात शुरू की थी कि जो कुछ मौजूद था या आज कुछ मौजूद है वह सब मानवता पर लादा गया है। मैं कार्ल मार्क्स के इस कथन से पूरी तरह सहमत हूं कि जब उत्पादन और वितरण की पूंजीवादी प्रणाली अस्तित्व में नहीं रहेगी और इसके साथ मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण खत्म हो जाएगा तो यह मानव जाति के प्राक्-इतिहास के अंत का सूचक होगा। उनका यह तर्क हमारी जाति के इतिहास के द्वंद्वात्मक विकास पर आधारित है।
बहुत से लोगों को यह विचार अति सरलीकरण और पुराना लग सकता है। मार्क्स ने पूंजीवाद के प्रथम चरण का अध्ययन किया था। यह वह युग था जिसमें एक नए वर्ग का जन्म हुआ, जिसे समाज का कायाकल्प करना था और जो बाद में अनिवार्यत: शोषक और बेरहम बन गया। इससे नई तथा अधिक न्यायपूर्ण दुनिया का मार्ग खुला। जब उन्होंने अपने विचार रखे उस समय बिजली, टेलीफोन, आंतरिक दहन इंजिन, आधुनिक जहाज जो बहुत तेज गति से चलते हैं और भारी सामान ले जाते हैं, आधुनिक रसायन विज्ञान, सिंथेटिक उत्पाद, विमान जो सैकड़ों यात्रियों को लेकर कुछ ही घंटों में अटलांटिक को पार कर जाते हैं, रेडियो, टेलीविजन और कंप्यूटर नहीं थे। उन्होंने यह भयंकर नजारा नहीं देखा था कि मनुष्य द्वारा गैर जिम्मेदाराना रूप में किस तरह से आधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल वनों के विनाश, मिट्टी के कटाव, लाखों हेक्टेयर उपजाऊ भूमि के मरुस्थल में बदलने, समुद्रों के अतिशोषण और प्रदूषण, पौधों और पशुओं की पूरी जाति को नष्ट करने तथा पेयजल, हवा में जहर फैलाने के लिए किया जा रहा है।
मार्क्स ने अपने सिध्दांत का विकास उस समय के सर्वाधिक विकसित देश इंगलैंड में किया। उन्होंने मजदूर-किसान साहचर्य की जरूरत नहीं बताई। न ही उन्होंने उस समय की उपनिवेशी दुनिया से पैदा होने वाली विकट समस्या के बारे में सोचा। यह कार्य उनके मेधावी शिष्य लेनिन ने रूस की विशेष परिस्थितियों में उनके विचार का अनुसरण करके बाद में किया।
मार्क्स ने इंगलैंड की औद्योगिक क्रांति का त्वरित विकास तथा जर्मनी और फ्रांस के शुरुआती विकास को देखा। उस समय कोई भी यह नहीं कह सकता था कि उनकी मृत्यु के मुश्किल से 60 वर्ष बाद अमरीका इस तरह की भूमिका अदा करेगा।
माल्थस ने निराशा के बीज बोए, मार्क्स ने आशा जगाई। उन दिनों धरती के भूगोल और जीवमंडलभूमि, वन, समुद्र और हवा को शासित करने वाले नियमों के बारे में बहुत कम जानकारी थी। बाह्य अंतरिक्ष के बारे में भी बहुत कम ज्ञान था। सापेक्षता का सिध्दांत नहीं आया था तथा बिग बैंग के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा गया था।
मानव इतिहास में पहली बार हमारी जाति के सामने संपूर्ण विनाश का खतरा पैदा हो गया है। केवल प्राकृतिक वास को ही खतरा नहीं है बल्कि गहरी राजनीतिक धमकियों और परिष्कृत हथियारों से भी खतरा है। मार्क्स ने यह सोचा भी नहीं होगा कि सैलफोनों के जरिए लोग धरती के एक कोने से दूसरे कोने तक प्रकाश की गति के साथ बात कर सकेंगे और शेयरों, मुद्राओं तथा हैज प्रचालनों तथा अपनी जगह से तिल भर नहीं हिलाई गई वस्तुओं तथा दूसरी प्रतिभूतियों का खरबों डालर का लेनदेन होगा तथा सट्टेबाजी से होने वाला लाभ बेशी मूल्य से अधिक हो जाएगा।
मार्क्स का उत्पादक ताकतों के विकास तथा विज्ञान और मानव प्रतिभा की अनंत संभावनाओं में विश्वास था। उनका मानना था कि समाज की मौलिक तथा मानसिक जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी वस्तुओं के उत्पादन में सक्षम सामाजिक व्यवस्था दुनिया के पूरी तरह से विकास द्वारा ही कायम की जा सकती है। उन्होंने एक देश में क्रांति की बात नहीं सोची। उन्होंने भविष्य में इतना जरूर झांका कि वह भूमंडलीकृत दुनिया का विचार दे सके, एक ऐसी दुनिया जो शांति के साथ एक होकर रह सके और सब उसमें उपलब्ध धन का पूरा आनंद ले सकें। उन्होंने अमीर और गरीब के बीच बंटी दुनिया के बारे में सोचा भी नहीं होगा। 'दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ!' उन्होंने घोषणा की। आज की वास्तविक दुनिया में इसे आम विनाश और प्राणघातक तथा विनाशकारी ताकत से जुड़े अतिवादी सिध्दांतों के खिलाफ शारीरिक और बौध्दिक मजदूरों, किसानों और गरीबों के एक होने के आह्वान के रूप में लिया जा सकता है।
दुनिया के लिए ये आशा और शांति के दिन नहीं हैं। युध्द होने ही वाला है। यह समान ताकतों के बीच मुकाबला नहीं होगा। एक ओर आधिपत्यवादी महाशक्ति होगी जिसके पास बेइंतहा सैनिक ताकत और तकनीक है तथा जिसे अपने मुख्य साथी का समर्थन प्राप्त है जिसके पास परमाणु क्षमता है और जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य है। दूसरी ओर एक ऐसा देश है जिसके लोग अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा मान्यताप्राप्त स्वतंत्र देश कुवैत पर कब्जे से उत्तेजित गैर बराबर युध्द के बाद दस वर्षों से रोजाना बमबारी से जूझ रहे हैं और जहां लाखों लोग विशेषकर बच्चे भूख और बीमारी से मर रहे हैं।
व्यापक विश्व जनमत नए युध्द के खिलाफ है। वे अंतर्राष्ट्रीय नियमों तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की शक्ति और प्राधिकार की परवाह न करने वाली अमरीकी सरकार के एकतरफा निर्णय के खिलाफ है। यह अनावश्यक युध्द है जिसके लिए बनाया गया बहाना न तो विश्वसनीय है और न सही सिध्द हुआ है।
1991 में अमरीका के खिलाफ युध्द के बाद इराक पूरी तरह से कमजोर हो गया था।
उल्लेखनीय है कि ईरान के खिलाफ उसके युध्द के दौरान पश्चिम ने उसका समर्थन किया था तथा भारी मात्रा में हथियार दिए थे। अब उसमें बिलकुल भी क्षमता नहीं बची है जिससे वह अमरीका के आक्रमणात्मक और सुरक्षात्मक हथियारों का मुकाबला कर सके। इसके विपरीत यदि इराक के पास वास्तव में परमाणु, रासायनिक या जैव हथियार हैं तो उनके खतरों को खत्म करने के लिए अमरीका के पास पूरी क्षमता है। इराक के पास ऐसे हथियार होने की कतई संभावना नहीं है और यदि उसके पास हैं भी तो उनके प्रयोग का प्रयास राजनीतिक दृष्टि से असंगत तथा सैनिक दृष्टि से आत्मघाती होगा।
असली खतरा यह है कि इस तरह का सशस्त्र हमला इराकी लोगों के लिए देशभक्ति पूर्ण युध्द बन जाएगा। उनके प्रत्युत्तर और विरोध का अग्रिम तौर पर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता है। इसका कोई अनुमान नहीं कि युध्द कब तक चलेगा, इससे कितनी मौतें और कितना विनाश होगा तथा प्रत्येक प्रतिद्वंद्वी के लिए इसके कितने मानवीय, आर्थिक और राजनीतिक परिणाम होंगे।
दुनिया के सामने पहले से ही मौजूद आर्थिक संकट के मद्देनजर इस युध्द के निश्चित रूप से जबर्दस्त आर्थिक जोखिम होंगे। ऐसे हालात में तेल की कीमतों का क्या होगा कोई नहीं जानता।


मुर्दा बयानों के नायक

                   आरएसएस के पूर्व सरसंघसंचालक के.सी. सुदर्शन साहब दो दिन पहले भोपाल में बोले और खूब बोले। किसी को उनके बोलने पर आपत्ति नहीं है। उन्हें भारत के धर्मनिरपेक्ष कानून और संविधान ने यह अधिकार दिया है वे और उनके अनुयायी इसका उपयोग करें।
   मजेदार बात यह है स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला मौका था जब आरएसएस के लोगों पर आतंकी घटनाओं में शामिल होने के आरोप लगे हैं। उनकी गिरफ्तारियां हुई हैं और अदालत में चार्जशीट भी दाखिल हुई हैं। आरएसएस का मानना है उसके लोगों को राजनीतिक विद्वेष के कारण मिथ्या आरोपों में फंसाया जा रहा है और कांग्रेस उनके खिलाफ मिथ्या प्रचार कर रही है। आरएसएस का चरित्रहनन करने की कोशिश की जा रही है। इस सबके प्रतिवाद में सारे देश में आरएसएस ने 10 नवम्बर 2010 को प्रतिवाद दिवस मनाया। इस मौके पर सभी संघी नेताओं को धरने,प्रदर्शन और जुलूसों में देखा गया और यह आरएसएस को धर्मनिरपेक्ष संविधान ने हक दिया है वे अपने साथ किए जा रहे अन्याय का प्रतिवाद करें। 
  समस्या यह नहीं है कि आरएसएस क्या है ? समस्या यह है कि आरएसएस के नेता के.सी.सुदर्शन ने इस तरह अशालीन बयान क्यों दिया ? आरएसएस आतंकी है या साम्प्रदायिक है,यह फैसला आसानी से संभव नहीं है। आरएसएस ने आम लोगों में हिन्दुत्व का जितना ज़हरीला प्रचार किया है उसके कारण अनेक लोग तो अब मान ही चुके हैं संघ ही देश का भविष्य है। हिन्दुत्व ही भारत की आत्मा है। हिन्दूराष्ट्र ही भारत के भाग्य का चन्द्रमा है।
    के.सी. सुदर्शन के बयान पर कांग्रेस ने हल्ला किया है,वह भी सारे देश में प्रतिवाद करेंगे । मजेदार बात यह है कि कांग्रेस को आतंकी संघ परिवार की हरकतों के खिलाफ प्रतिवादस्वरूप जुलूस निकालने की याद नहीं आयी ,लेकिन सोनिया गांधी के बारे में के.सी. सुदर्शन के बयान पर प्रतिवाद स्वरूप सड़कों पर उतरने की याद आयी। इससे एक बात तो कम से कम कह सकते हैं कि मसला कांग्रेस के लिए भी हिन्दू आतंकवाद नहीं है। बल्कि सोनिया गांधी के बारे में के.सी. सुदर्शन के द्वारा दिया गया वह घटिया बयान है जिसमें उन्होंने सभ्यता और शालीनता के सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं।
        के.सी. सुदर्शन संघ परिवार में गंभीर विचारों के धनी हैं और उनकी सारी इन्द्रियाँ दुरूस्त हैं। उन्होंने पूरे होशोहवास में अपना बयान दिया है और यह बयान संघ परिवार की भावी राजनीतिक कार्रवाईयों के लिए मार्गदर्शक का काम करेगा। इस बयान को हल्के ढ़ंग से नहीं लेना चाहिए। राममंदिर आंदोलन के बाद लंबे अंतराल के बाद संघ परिवार राजनीति के मैदान में आने जा रहा है। 10 नवम्बर का प्रतिवाद उसकी शुरूआतभर है। इस प्रतिवाद की राजनीतिक मंशाएं राममंदिर आंदोलन से भी ज्यादा गहरी हैं।
     हिन्दू आतंकवाद का विरोध करने के बहाने संघ अपने को नए कलेवर में रूपान्तरित करने की तैयारियां कर चुका है। इस राजनीतिक प्रक्रिया में संघ परिवार आने वाले समय में खूब कीचड़ उछालेगा। सोनिया गांधी पर किया गया तथ्यहीन और अशालीन वाचिक हमला आरएसएस के स्वयंसेवकों के लिए हरी झंड़ी है कि जाओ और जो भी मन में आए बको। जितना इच्छा झूठ बोलो।
    चूंकि असत्य प्रचार का आरंभ संघ के बड़े नेता ने किया है इसलिए अब संघ परिवार के लोग राममंदिर आंदोलन के समय से भी ज्यादा सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाएंगे। यह संघ परिवार को आतंकी विचारधारा का कवच पहनाने की बड़ी योजना का हिस्सा है।
   संघ परिवार में पहले हिन्दुओं को हजम करने की कोशिश की गयी और जब उसमें सफलता नहीं मिली तो नयी बदली हुई परिस्थितियों में संघ परिवार ने नया राजनीतिक मार्ग ग्रहण किया है और वह है आतंकी हिंसा के आयोजन,संगठन और प्रचार का। सोनिया गांधी पर किया गया वैचारिक हमला इस बड़ी डिजाइन का हिस्सा है।
   आरएसएस के लोग जानते हैं कि वे देश के विभिन्न हिस्सों में साम्प्रदायिक हिंसाचार में लिप्त रहे हैं और बड़ी ही चालाकी से वे अपने को इससे अलग दिखाने का प्रयास भी करते रहे हैं। लेकिन गुजरात के जनसंहार के समय से उन्होंने हिंसा से अपने को अलगाने या छिपाने का काम बंद कर दिया है। गुजरात के दंगों के बाद से वे अब खुल्लमखुल्ला खेलने लगे हैं। गुजरात की हिंसा के पहले उनके जो प्रेरक थे वे भी बदल गए हैं। अब उन्हें जिन तत्वों से प्रेरणा मिल रही है उनका भारत की किसी भी किस्म की राजनीतिक परंपरा से कोई संबंध नहीं है। विश्व में चल रही अलकायदा-तालिबान आदि संगठनों का वायरल बुखार उन्हें भी स्पर्श कर गया है।
    संघ अपने बुनियादी कार्यक्रम को बंद नहीं करना चाहता। मीडिया के अनुसार बुनियादी कार्यक्रम है हिंसा और घृणा फैलाना। हिन्दुत्व के नाम पर वे जिस तथाकथित ऐतिहासिक सत्य और तथ्य का प्रचार करते रहे हैं वह अब प्रेरणा देने का काम नहीं कर रहा। नई बदली हुई परिस्थितियों में वे कुछ वैसा करना चाहते हैं जिसकी तुलना हिटलर से न की जाए। मुसोलिनी से न की जाए। वे अपने आलोचकों के द्वारा की गयी पुरानी तुलनाएं सुन-सुनकर बोर हो गए हैं वे अपने लिए नयी तुलनाओं की तलाश में हैं। वे पुरानी हिन्दुत्ववादी की पहचान से बाहर आना चाहते हैं,वे पुराने तौर-तरीकों से बाहर आना चाहते हैं,उन्हें अलकायदा-तालिबान की चमक और दबदबा आकर्षित करने लगा है। उन्हें माओवादियों का हिंसक आचरण अपील करने लगा है। वे अपने संगठन के पास अलकायदा जैसी विश्वव्यापी शक्ति की कल्पना के सपने देख रहे हैं।
    वे मानते हैं कि वे साम्प्रदायिक नहीं हैं ,हिन्दू आतंकी नहीं है। इन नामों से उन्हें सम्बोधित नहीं किया जाए। वे अपने नए वैचारिक झंझावात से सभी किस्म के ऐतिहासिक सत्यों पर पर्दा डाल देना चाहते हैं। के.सी. सुदर्शन जब भोपाल में बोल रहे थे तो उनका सारा जोर इसी बात पर था कि संघ परिवार के बारे में जो कुछ भी कहा जा रहा है वह असत्य है। उन्होंने यह भी बताया कि हिन्दू आतंकी कर्म से उनका कोई लेना देना नहीं है। हो सकता है सुदर्शनजी की बात में सच्चाई हो। लेकिन आज के जमाने में मुश्किल यह है कि मीडिया के जरिए छनकर हम तक हिन्दू आतंक की खबरे पहुँची हैं। ये खबरें किसी ने बनायी नहीं हैं। ये वास्तव खबरें हैं। मीडिया के जरिए ही उन त्रासद घटनाओं के विवरण और ब्यौरे हम तक पहुँचे हैं जिनमें बताया गया है कि संघ परिवार आतंकी बम धमाकों में हाथ था। हो सकता है संघ के हाथ होने वाली बात में सच्चाई न हो। लेकिन उस त्रासद घटना को असत्य नहीं कहा जा सकता।
     हमें हिन्दुत्ववादी संगठनों की हिस्सेदारी वाली घटनाओं के लक्षणों और प्रवृत्तियों पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए। हो सकता है संघ परिवार के लोग प्रमाणों के अभाव में आतंकी घटनाओं से बरी हो जाएं। लेकिन वे उस सत्य से बरी नहीं हो सकते जो उनके साथ जुड़ गया है। उनके साथ नया सत्य है आतंकी का। इस कलंक को वे धा नहीं पाएंगे।
    संघ परिवार के लोग जानते हैं कि अदालत में प्रमाणित सत्य से बड़ा सामाजिक सत्य होता है। आज के युग में सत्य मीडिया निर्मित यथार्थ है। मीडिया सत्य यह है कि आरएसएस धीरे धीरे अपना हिन्दुत्व का मुखौटा त्यागकर दूसरा मुखौटा खोज रहा है। बतर्ज सीबीआई और कांग्रेस नेताओं के संघ ने अपने लिए हिन्दू आतंकी का मुखौटा चुन लिया है। इस मुखौटे को संघ परिवार क्या जल्दी ही अपने चेहरे से हटा पाएगा ? जी नहीं। महात्मा गांधी की हत्या के बाद जो मुखौटा मीडिया ने संघ को पहनाया था उससे आज तक वे मुक्त नहीं हो पाए हैं। राममंदिर आंदोलन ने जो मुखौटा पहनाया था उसे वे अभी तक उतार नहीं पाए हैं। अब कई आतंकी हमलों की घटनाओं में संघ परिवार के लोगों के नाम आए हैं उससे संघ को एक नया मुखौटा मिला है और इसे भी जल्दी उतारना उनके लिए संभव नहीं है। हमें ध्यान रखना चाहिए मीडिया जो मुखौटा पहना देता है उसे आप चाहकर भी नहीं उतार सकते।
   संघ परिवार अपने मुखौटों से तब ही मुक्त हो सकता है जब वह संबंधित मसले और व्यक्तियों को पूरी तरह त्याग दे। जिन लोगों का हिंसाचार में नाम आया है उन्हें सीने से लगाए रखने से मीडिया का मिथ पुख्ता बनेगा।
    संघ परिवार के लोग जानते हैं कि उनके आदमी ने क्या किया है ? वे यह भी जानते हैं कि एकबार मीडिया में कलंक का टीका लग जाने के बाद लाख कोशिशें करने के बाबजूद भी साफ होने वाला नहीं है।
    संघ वाले कितना ही हल्ला मचाएं बाबरी मसजिद को ढहाए जाने के अपराध से वे मुक्त नहीं हो सकते भले ही उनके पक्ष में अदालत का फैसला आ जाए। सच को आप किसी साबुन से धोकर साफ नहीं कर सकते। सच सच है उसे संघ के धरने,प्रदर्शन बदल नहीं सकते। सच को लोग भूलते नहीं हैं। वह स्मृति में रहता है। सामाजिक चेतना में रहता है।
     सोनिया गांधी के बारे में सुदर्शनजी ने जो कुछ कहा है वह पूर्णतः असत्य है। असत्य बोलकर सत्य की सृष्टि नहीं की जा सकती। हिटलर से लेकर अलकायदा तक असत्य को सत्य और सत्य को असत्य बनाने में लगे हैं लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली है। संघ परिवार के लोग गुजरात में चुनाव जीत सकते हैं लेकिन गुजरात में हुई हिंसा के कलंक से अपने को मुक्त नहीं कर सकते।
     सत्य सबसे बड़ा होता है ,भाषण,मीडिया, संगठन, सरकार, हिन्दुत्व ,आतंकवाद, भगवा आतंकवाद आदि से बड़ा होता है। संघ परिवार को साहस दिखाकर उन आतंकी घटनाओं के सत्य का उदघाटन करना चाहिए जिनमें वे शामिल बताए जा रहे हैं। वे सत्य की तलाश नहीं कर रहे बल्कि यह कह रहे हैं कि संघ पर हिन्दू आतंक का आरोप गलत है। हो सकता है यह आरोप गलत हो। लेकिन यह आरोप सही भी हो सकता है । ऐसी स्थिति में क्या करेंगे ?
    संघ परिवार की मुश्किल यह है कि वह मीडिया निर्मित इमेजों में घिर गया है। इमेजों में घिरने के बाद उनके बाहर निकलना असंभव है। दूसरी बात यह है कि अपराध और दण्ड में कोई समानता नहीं होती। संघ वाले अपराधी करार दिए जाएंगे तो क्या इससे किसी को राहत मिलेगी ? चैन मिलेगा ? अपराध का क्या सजा के साथ समान रूप में विनिमय संभव है ? जी नहीं।
हमारा समाज मीडिया निर्मित मिथकों के युग में दाखिल हो चुका है। अब मीडिया ही सारी घटनाओं को निर्मित करता है। वही मिथ बनाता है। इस अर्थ में वर्तमान समय मीडिया निर्मित मिथकों से भरा है। मीडिया मिथ इसलिए सफल हैं क्योंकि उनमें लक्ष्यीभूत संगठन,समूह,विचारधारा आदि को शामिल कर लिया जाता है।
   हिन्दू आतंकी या भगवा आतंकी के मिथ में जब एकबार संघ परिवार को मीडिया ने शामिल कर दिया है तो उस इमेज से बाहर निकलना असंभव है। मीडिया ने इस चक्कर में आतंकी अपराध को भी धार्मिक मिथ बना दिया है। यह काम उसने इस्लाम के संदर्भ में किया है,ईसाई और सिख धर्म के संदर्भ में किया है और अब वह यह काम हिन्दू धर्म के संदर्भ में भी कर रहा है। इस क्रम में मीडिया सबसे पहले ऐतिहासिक यथार्थ को पूरी तरह नष्ट कर देता है। चीजें ऐतिहासिक तौर पर रहेंगी तो मिथ बनाने में असुविधा होती है। नया मीडिया हथकंडा है ऐतिहासिकता को नष्ट करो ,फिर मिथ बनाओ। संघ के लोग अपने इतिहास को लेकर घूम रहे हैं लेकिन उसका कोई दाम नहीं है। कोई सुनने वाला नहीं है।
    नया संसार ऐसा है जिसमें अतीत की समस्त कल्पना और फैंटेसियों का वैभव गायब हो चुका है। हिंसा और यथार्थ की समस्त पूंजी गायब है। मसलन युवाओं की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि बाबरी मसजिद किसने गिरायी, गुजरात में दंगे किसने किए,दंगा पीडित कैसे हैं इत्यादि इत्यादि। यह हिंसा और यथार्थ की पूंजी के लोप का ही परिणाम है कि नरेन्द्र मोदी गुजरात का नायक है। माओवादी हीरो हैं।
    कहने का अर्थ है मौजूदा दौर में मीडिया ने यथार्थ को विभ्रम में बदल दिया है। सुदर्शन जी इस सत्य को जानते हैं। हम लाख प्रमाण दें संघ ऐसा है वैसा है,कोई सुनने वाला नहीं है क्योंकि यथार्थ का इस दौर में लोप हो चुका है। आज की वास्तविकता है यथार्थ का लोप। यथार्थ का लोप ही आज का सबसे बड़ा यथार्थ है।
    अब ऐसे बयान दिए जा रहे हैं जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।  सुदर्शन जी के बयान की भी यही दशा है उसका सोनिया गांधी के जीवन की वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। वे जो बातें कह रहे हैं वे सब कल्पना की बातें हैं।
    ध्यान रहे यह अंतहीन मुर्दा बयानों का दौर है। मीडिया में अंतहीन मुर्दा बयानों का सिलसिला बना हुआ है। ये बयान किसी भी दल के हों,इनका अंतहीन सिलसिला बना रहेगा। अब संचार नहीं हो रहा है,अंतहीन संचार हो रहा है। मीडिया में मुर्दा बयानों की बाढ़ आयी हुई है। सुदर्शनजी का बयान भी एक मुर्दा बयान है। मुर्दा बयानों में सत्य नहीं होता।





शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

तथ्य से भागे हुए लोग

       आमतौर पर यह देखा गया है कि साधारण आदमी विज्ञानसम्मत बातों को मानने की बजाय कॉमनसेंस ,पुरानी धारणाओं और विश्वासों पर सहज विश्वास कर लेता है। आप उसे कितना ही विज्ञानसम्त बातें कहें, व्यक्ति की यह सामान्यप्रकृति है कि पुरानी मान्यताओं पर विश्वास ज्यादा करता है और विज्ञानसम्मत बातों को कम मानता है। विज्ञानसम्मत बातें सत्य होती हैं लेकिन पुरानी मान्यताओं के आधार पर सोचने वाले लोग सत्य को जानना और सुनना आम तौर पर पसंद नहीं करते। इस धारणा को हाल ही में बाबरी मस्जिद पर आए अदालत के फैसले के संदर्भ में और कुछ अर्सा पहले क्लाईमेट चेंज की बहस के संदर्भ में देखा गया। आम लोग यह मानने को तैयार नहीं होते कि विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं बल्कि वे अपनी अवैज्ञानिक मान्यताओं पर अगाध आस्था बनाए रखते हैं। हाल ही में जरनल ऑफ रिस्क रिसर्च में एक रिसर्च प्रकाशित हुई है जिसमें इस बात की ओर ध्यान खींचा गया है। रिपोर्ट पढ़ें-

People Are Allergic to the Facts
By Tom Jacobs, Miller-McCune.com
Posted on October 8, 2010, Printed on October 9, 2010
http://www.alternet.org/story/148318/

A clear consensus of opinion emerges within the scientific community on an important issue, such as climate change. But the public, and its elected leaders, remains unconvinced and unreceptive to well-founded warnings.

With this phenomenon growing frustratingly familiar, researchers can be forgiven if they begin to feel like Rodney Dangerfields in lab coats. From their perspective, they don’t get no respect.

Newly published research suggests that’s not entirely true: Americans do believe and trust researchers. But we focus our attention on those experts whose ideas conform with our preconceived notions. The others tend to get discounted or ignored.

“Scientific opinion fails to quiet societal disputes on such issues (as climate change) not because members of the public are unwilling to defer to experts, but because culturally diverse persons tend to form opposing perceptions of what experts believe,” a team of scholars writes in the Journal of Risk Research. “Individuals systematically overestimate the degree of scientific support for positions they are culturally predisposed to accept.”

The research team, led by Dan Kahan of Yale Law School, studied “a broadly representative sample” of 1,500 Americans in 2009. Through a series of questions, their cultural beliefs were measured on what can be called a left-right scale (although the researchers do not use the terms “liberal” and “conservative” in their paper). Those strongly holding egalitarian and communitarian outlooks were on one end of the spectrum, while those with hierarchical and individualistic views were on the other.

Participants were then presented with a series of statements and asked whether in their view most experts concurred with them. Three of the statements represented the consensus of scientific opinion: “Global temperatures are increasing,” “Human activity is causing global warming,” and “Radioactive wastes from nuclear power can be safely disposed of in deep underground storage facilities.”

Finally, the participants were introduced to a fictional expert on one of those subjects, who either agreed or disagreed with their position. After reviewing the researcher’s credentials and reading a bit of their writing, each participant rated the degree to which they found the expert knowledgeable and trustworthy.

On the first question, participants were predisposed to believe that a majority of experts agreed with their personal point of view. Among those with an egalitarian/communitarian mindset (i.e., liberals), 78 percent reported (correctly) that there is a scientific consensus that climate change is occurring.

But among those with a hierarchical/individualistic attitude (i.e., conservatives), only 19 percent said there was a scientific consensus that climate change is real. Fifty-six percent reported the scientific community is divided on the issue, and another 25 percent insisted that most scientists agree with them that climate change is not real.

Before you start cursing close-minded conservatives, consider this: When it came to the issue of safely storing nuclear waste, the opposite effect was found (although the differences between the two groups were not as large). Thirty-seven percent of those on the right reported, correctly, that the scientific consensus supported their view. In contrast, 35 percent of those on the left inaccurately believe the scientific consensus reflects their opinion.

When it came to assessing the imaginary expert, the attitude he purportedly held “dramatically affected the responses” of the participants, Kahan and his colleagues report. If his writing sample reflected the belief the planet is at high risk from global warming, 87 percent of those on the left agreed he was trustworthy and knowledgeable, compared to 23 percent of those on the right. The numbers reversed when the expert, with the exact same credentials, stated that climate-change risks are low: 86 percent of conservatives called him knowledgeable and trustworthy, compared to 47 percent of liberals.

The bottom line: We seek out, and find comforting confirmation from, experts who agree with our pre-existing beliefs. The researchers call this a matter of “cultural cognition.” As Kahan put it in a recent editorial in the journal Nature:

“People find it disconcerting to believe that behavior that they find noble is nevertheless detrimental to society, and behavior that they find base is beneficial to it. Because accepting such a claim could drive a wedge between them and their peers, they have a strong emotional predisposition to reject it.”

Whether that intense inclination is exclusively peer-based or due in part to internal factors, such as a genetic predisposition to a particular ideological outlook, remains an open question. But either way, scientists and policymakers who base their decisions on science have a problem. Kahan and his colleagues offer some possible ways around this dilemma, but they’re admittedly sketchy and tentative.

“To overcome this effect,” they write, “communicators must attend to the cultural meaning as well as the scientific content of information.” The researches recommend “crafting messages to evoke narrative templates that are culturally congenial to target audiences.”

Kahan gives a couple of examples in his Nature editorial, suggesting that people with individualistic values might be more receptive to climate change arguments “if made aware that the possible responses to climate change include nuclear power and geoengineering, enterprises that to them symbolize human resourcefulness.

“Similarly, people with an egalitarian outlook are less likely to reflexively dismiss evidence of the safety of nanotechnology if they are made aware of the part that nanotechnology might play in environmental protection, and not just its usefulness in the manufacture of consumer goods,” he adds.

In other words, scientists need to do some radical reframing if they hope to get through to people whose world view is threatened by their results. While there’s no guarantee that effort will succeed, Kahan and his colleagues convincingly argue that the effort is “critical to enlightened democratic policymaking.” Otherwise, our gut instincts will remain the experts we rely upon the most.

Tom Jacobs is a veteran journalist with more than 20 years experience at daily newspapers. He has served as a staff writer for the Los Angeles Daily News and the Santa Barbara News-Press. His work has also appeared in the Los Angeles Times, Chicago Tribune and Ventura County Star.

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रविवार, 3 अक्टूबर 2010

उत्तरआधुनिक युग में फैशन से अनजाने और फैशन में डूबे लोग ?

    फैशन पर विचार करते समय फैशन से दूरी आवश्यक है। दूरी न हो तो फैशन में फंसने की संभावना होती है। रोलां बार्थ ने लिखा कि फैशन के लेखकों की यह खूबी होती है कि वे रोज नई-नई भाषा का निर्माण करते हैं। नई भाषा फैशन को जीवन में उतारने में सफल हो जाती है। पुरानी वस्तु, पुराने फैशन रूप को तथाकथित नए रूप में उतारने में फैशन की भाषा महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है, जबकि फैशन आलोचक की भूमिका फैशन लेखक से भिन्न होती है। वह चीजों को भूलता नहीं, फैशन को मानव-सभ्यता के विकास के क्रम में रखकर देखता है। यह लक्ष्य तब ही प्राप्त कर सकता है जब वह फैशन के चक्कर से मुक्त हो। आज फैशन में समूचे मानवीय कार्य-व्यापार को अपने दायरे में शामिल कर लिया है। शरीर, चलने का ढंग, अभिव्यक्ति की शैली, स्वास्थ्य, बीमारी, हाव-भाव आदि इसके दायरे में आ चुके हैं।
      प्रसिद्ध फैशन आलोचक एस.आर. स्टीनमेट्ज ने 'फैशन' शीर्षक निबंध में इसकी परिभाषा देते हुए लिखा : 'फैशन का अर्थ है युगानुरूप स्टाइल में चरित्रागत परिवर्तन। फैशन शुध्दत: तथ्यपरक होता है, उसमें सामाजिक परिवर्तन और नियंत्राण के कारण परिवर्तन आते रहते हैं।' इसका प्रधान कारण है परांपरागत फॉर्म या रूप का अप्रासंगिक हो जाना। परिणामत: फैशन को नए को आत्मसात करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यह नई परिस्थितियों का आत्मसातीकरण है। फैशन समय-केंद्रित होता है। सामाजिक गतिशीलता से उसका गहरा संबंध है। फैशन के उपभोग की जब इच्छाएं पैदा हो जाती हैं तब उसमें स्थिरता आती है। फैशन कभी भी लक्ष्यहीन और निर्विरोधपूर्ण परिवर्तनों के साथ समाप्त नहीं होता। फैशन में दिखावे और प्रदर्शन के तत्व समाहित रहते हैं। जब तक चंद लोग किसी फैशन का व्यवहार करते हैं उस पर फैशन के तौर पर बात नहीं की जा सकती। फैशन तब ही फैशन का दर्जा अख्तियार करता है जब व्यापक जनता के हिस्से प्रयोग करने लगें। फैशन का जब कोई रूप जन्म लेता है तो उसके प्रसार एवं बृहत्तर व्यवहार को रोकना मुश्किल होता है। उसका समूचे समाज पर प्रभाव होता है। इसीलिए यह कहा जाता है कि फैशन का एकांत में विकास नहीं होता। उसे विश्व रंगमंच चाहिए। फैशन से स्टाइल ही नहीं बदलता अपितु वह आत्मसातीकरण या समाहार की प्रक्रिया को रिवाज की तरह जीवन का अंग बना देता है। फैशन के प्रसार की प्रक्रिया में सामाजिक संस्कार और सामाजिक नैतिक मानदंड दबाव का काम करते हैं। फैशन के प्रसार के लिए जरूरी है कि इसके दायरे में उन लोगों को लाया जाए जो इसके दायरे से बाहर हैं।
फैशन की विशेषता है कि जो उसका विरोध करते हैं वे भी इसका अंग बन जाते हैं। अमूमन फैशन के प्रतिवाद का उदय तब होता है जब वह सार्वभौम रूप ग्रहण कर लेता है। फैशन को संवृत्ति बनानेवाले तत्व हमेशा वर्तमान समय में रहते हैं। नए के प्रति आकर्षण फैशन का भविष्य तय करता है। नए के प्रति उत्सुकता असुरक्षा से पैदा होती है। इसके लिए वह सब जगह से सामग्री ग्रहण करता है। फैशन का जन्म व्यापार के कारण नहीं होता। फैशनोन्मुख व्यवहार की अनुपस्थिति में फैशन का व्यापार नहीं
है। फैशनोन्मुख व्यवहार पूरी तरह खुला होता है। यही फैशन के व्यापार के लिए ऊर्जा का कार्य करता है। व्यापार उसकी अंतर्वस्तु तय करता है। फैशन अपरिचित के प्रति अप्रतिरोधात्मक आकर्षण पैदा करता है। यह प्रक्रिया संक्रमण काल में पैदा होती है।
मसलन, बीसवीं सदी में हृष्ट-पुष्ट स्वास्थ्य की जगह देखने में आकर्षक इकहरे या छरहरे शरीर की संरचना पर जोर दिया जा रहा है। सीधे और सुव्यवस्थित हाव-भाव के लिए सूर्य जैसी चमकीली त्वचा को आदर्शीकृत किया जा रहा है। इसके लिए लोशन, पाउडर एवं प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा त्वचा रक्षा के उपायों पर बल दिया जा रहा है। इसके लिए प्रेरक व्यक्तित्व के तौर पर हीरो, हीरोइन, लोकप्रिय व्यक्तित्व, खिलाड़ी, बिजनेस एक्जीक्यूटिव, उदीयमान व्यापारी आदि का फैशन के चरित्रा के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
कपड़ों या अन्य वस्तुओं के विज्ञापनों में आनेवाले पुरुष चरित्रों में चौड़े कंधे वालों को उभारा जा रहा है। अगर किसी मॉडल के कंधे चौड़े नहीं होते तो उसके लिए पैड का इस्तेमाल किया जाता है। आज के पुरुष के कंधे अपने परबाबा के कंधों से भी चौड़े हो गए हैं। अब जैकेट ढीली हो गई है। पैंट 'बैगी' हो गई है। लंबे-चौड़े ढीले-ढाले वैस्ट कोट को फुटबॉल की जर्सी ने अपदस्थ कर दिया है। यहां तक कि फुटबॉल की जर्सी कोट के नीचे ये लोग भी पहनने लगे हैं जिन्होंने कभी फुटबाल का मैदान तक नहीं देखा। इस तरह के पहनावे के कारण हमारी मुद्राएं काफी शांत, कम सख्त हो गई हैं। सीधे और आराम से पहनने लायक वस्त्रों को पहनने के कारण हमारे चलने का ढंग अति सतर्क और नजाकत भरा हो गया है। हमारी भुजाएं ज्यादा गतिशील और कम रचनात्मक हो गई हैं। इसी दौरान कलफ दिए गए कमीज के कालर के लोप ने गतिशीलता को उभारा है। पुराने वेस्ट कोट का पुनरोदय हुआ है। पुरुष की पैंट में आई शिथिलता का औरतों के वस्त्रों की लंबाई-चौड़ाई पर भी असर हुआ है।
         फैशन के बारे में यह कहना मुश्किल है कि कृत्रिम कहां है और स्वाभाविक कहां है। इस तरह का विभाजन बेमानी है। उसकी पहचान न तो कृत्रिम से होती है और न स्वाभाविक से। उसकी पहचान के अपने नियम हैं। इन नियमों की कोई सीमा नहीं है। फैशन का प्रारंभ मॉडलिंग और शारीरिक मुद्राओं से होता है। इसका दायरा एटीटयूड, पेशे, विचारों और व्यक्ति के हितों तक फैला हुआ है। अगर इकहरा शरीर फैशन के केंद्र में है तो औरतें दुबली होने की कोशिश करती हैं। युवा लड़की और भी ज्यादा छोटी उम्र की दिखने की कोशिश करती है।
आम जीवन का सघन विकास, अनेक फैशन रूपों का सृजन और लोप, जीवन में फैशन की गति को बढ़ा देता है। फैशन आज के सांस्कृतिक आविष्कार का कारखाना है जो सनक के साथ आता है और खारिज फैशन रूपों का अंबार खड़ा करके चला जाता है। फैशन के एक रूप के लोप के साथ ही नया रूप जन्म ले लेता है। यहां नए को कभी हतोत्साहित नहीं किया जाता। इससे मनुष्य की रचनात्मक समृध्दि का पुनर्निर्माण होता रहता है जो मनुष्य की रचनात्मक क्षमता को उभारता है। उम्र और वर्गगत अंतर ड्रेस में किस तरह की भूमिका अदा करते हैंऌस विषय पर हरबर्ट स्पेंशर की कृति प्रिंसिपल्स ऑफ सोशियोलाजी (चार खंड) में विस्तार से प्रकाश डाला गया है। वह लिखता है कि 'फैशन का उच्च और निम्नवर्ग विकास करते हैं। निम्नवर्गों के द्वारा फैशन का कोई रूप अपना लिये जाने के बाद उच्च वर्गों पर दबाव पड़ता है कि वे अपनी वेशभूषा बदलें।' स्पेंशर ने फैशन को हैसियत से जोड़ा है। यह पूर्व-औद्योगिक समाज में प्रचलित नजरिए का ही विकास है। एस.आर. स्टीनमेट्ज ने 'फैशन' शीर्षक निबंध में स्पेंशर के दृष्टिकोण का दृढ़ता से खंडन किया है। उनकी धारणा है कि 'पूंजीवादी समाज में फैशन में वर्गीय अंतर्विरोध दिखाई नहीं देते। अत: सामाजिक हैसियत को फैशन का एकमात्रा स्रोत नहीं मानना चाहिए।'
फैशन का सामाजिक हैसियत से भी रिश्ता होता है, इसके बगैर फैशन पर चर्चा संभव ही नहीं है। दूसरी बात यह कि फैशन का उदय हमेशा उच्चवर्गों में हुआ। फैशन को लेकर इसी वर्ग में प्रतिस्पर्धा रही है। प्रतिस्पर्धा के कारण अनेक नए रूपों ने जन्म लिया। उच्चवर्ग के फैशन रूपों के प्रयोग की निम्नवर्गों को किसी अवसर विशेष पर ही अनुमति दी जाती थी, यह स्थिति पूर्व-आधुनिक दौर में थी।




सोमवार, 27 सितंबर 2010

प्रगतिशील परंपरा- 'दुनिया के अंधेरे कोने'- फिदेल कास्त्रो

     हम बहुत मुश्किल समय में रह रहे हैं। हाल के महीनों में हमने दिल दहलाने वाले शब्द और विचार सुने हैं। वेस्ट प्वाइंट के कैडिटों को 1 जून 2002 को दिए गए भाषण में अमरीका के राष्ट्रपति ने यह घोषणा की :
'हमारी सुरक्षा के लिए आपकी सेना के रूप को बदलना होगा उसे ऐसी सेना बनाना होगा जो एक क्षण की सूचना पर दुनिया के किसी अंधेरे कोने पर आघात कर सके।'
उसी दिन उसने रोकथाममूलक तथा औचक युध्द के सिध्दांत की घोषणा की। विश्व के राजनीतिक इतिहास में पहले कभी ऐसी बात नहीं सुनी गई। इसके कुछ महीनों बाद इराक के खिलाफ अनावश्यक लेकिन लगभग तयशुदा कार्रवाई का उल्लेख करते हुए उसने घोषणा की कि यदि उन्हें लड़ने के लिए बाध्य किया गया तो वे अपनी सशस्त्र सेनाओं की पूरी ताकत के साथ लड़ेंगे।
यह बात किसी छोटे और कमजोर देश की सरकार ने नहीं कही थी। यह बात दुनिया के सबसे धनवान देश और सैनिक ताकत के प्रमुख ने कही जिसके पास दुनिया को कई बार नष्ट कर देने में सक्षम हजारों परमाणु हथियार हैं तथा व्यापक विनाश की भयंकर सैनिक विधियां हैं।
हम क्या हैं : 'दुनिया के अंधेरे कोने।' कुछ लोग तीसरी दुनिया के देशों को इसी रूप में देखते हैं। हमारी इससे बेहतर व्याख्या किसी ने नहीं की होगी और न ही किसी ने इतना तिरस्कार किया होगा। जिन शक्तियों ने दुनिया को बांट कर शताब्दियों तक लूटा उनके पूर्व उपनिवेश हम विकासशील देशों के समूह के रूप में जाने जाते हैं। हममें से कोई भी पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं है, किसी के साथ उचित और बराबरी का व्यवहार नहीं होता, किसी की भी राष्ट्रीय सुरक्षा नहीं है; किसी के पास भी वीटो का अधिकार नहीं है, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संगठनों में कोई फैसला नहीं ले सकता है, कोई अपनी प्रतिभाओं को अपने पास नहीं रख सकता है,कोई पूंजी पलायन, आर्थिक दृष्टि से विकसित देशों के फिजूलखर्च, स्वार्थी और अतिलालची उपभोक्तावाद के कारण प्रकृति और पर्यावरण के विनाश से खुद को नहीं बचा सकता।
1940 के दशक के कत्लेआम के बाद हमसे शांतिपूर्ण दुनिया, अमीर और गरीब के बीच कम खाई तथा अत्यधिक विकसित देशों द्वारा कम विकसित देशों की सहायता का वायदा किया गया था। यह सब बहुत बड़ा झूठ था। उन्होंने हमारे ऊपर न चल सकने वाली तथा असह्य विश्व व्यवस्था लाद दी है। दुनिया को एक रास्ते वाली गली में ले जाया जा रहा है। सिर्फ 150 साल में हमने वह गैस और तेल खत्म कर दिया है जिसे इकट्ठा करने में धरती को 30 करोड़ वर्ष लगे।
      केवल 100 सालों में आबादी में 1.5 अरब की वृध्दि हुई। अब यह आबादी 6 अरब  है। उन्हें उस ऊर्जा स्रोत पर निर्भर रहना पड़ेगा जिसकी अभी खोज हो रही है और विकास किया जा रहा है। गरीबी बढ़ रही है। नई-पुरानी बीमारियों से पूरे राष्ट्रों के खत्म हो जाने का खतरा है। मिट्टी कट रही है और उसकी उर्वरता समाप्त हो रही है। जलवायु बदल रही है। हवा, पीने का पानी और समुद्र लगातार दूषित होते जा रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्य में बाधा पैदा की जाती है और उसे नष्ट किया जा रहा है; विकासशील देशों के लिए सहायता कम कर दी गई है; तीसरी दुनिया के देशों से 2.5 खरब अमरीकी डालरों का कर्ज चुकाने के लिए कहा जाता है। मौजूदा हालात में इसे चुकाना असंभव है। दूसरी ओर परिष्कृत तथा मारक हथियारों पर प्रतिवर्ष खरबों डालर खर्च किए जाते हैं। किसलिए ?
इतना ही धन करोड़ों-करोड़ लोगों में उपभोक्तावादी भूख पैदा करने के लिए विज्ञापनों में खर्च किया जा रहा है। क्यों और किसके लिए? मनुष्य की अपनी बेवकूफी के कारण हमारी पूरी जाति के तबाह हो जाने का खतरा है। हम सब उनकी 'सभ्यता' के शिकार हैं। लेकिन हम बहुसंख्यकों के लिए कोई नहीं लड़ेगा। यह कार्य हमें ही करना पड़ेगा। इसके लिए हमें विकसित देशों के लाखों श्रमिकों और बुद्धिजीवियों को साथ लेना होगा जो यह देख रहे हैं कि यह महाविपत्ति उनके अपने देशों को प्रभावित करेगी। विचार बोने होंगे, जागरूकता पैदा करनी होगी, दुनिया तथा अमरीकी लोगों में जनमत तैयार करना होगा। तभी हमारी जाति को बचाया जा सकेगा।उन्हें कुछ बताने की आवश्यकता नहीं है। यह बात आप अच्छी तरह से समझते हैं। हमारा सबसे पवित्र काम संघर्ष है और हम संघर्ष करते रहेंगे!






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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...