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मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी-7-यशपाल

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आजाद को अच्छी-अच्छी पुस्तकें लाकर साथियों को पढ़ाने का बहुत शौक था परंतु उपन्यास या यौन विषय (सेक्स) संबंधी पुस्तकें देखकर उन्हें बहुत ही चिढ़ उठती थी। ब्रह्मचर्य का एक बहुत रूढ़िवादी आदर्श उस समय तक आजाद के मस्तिष्क में था। उससे पहले दो-एक दफे दल में ऐसे कांड हो चुके थे कि साथियों ने नारी के आकर्षण के कारण अपने कर्तव्य में निर्बलता दिखाई थी। आजाद को नारी, प्रेम और सौंदर्य की चर्चा से ही चिढ़ हो गई थी। कसरत स्वयं करने और दूसरों को कराने का भी शौक था। यदि कोई और काम न हो तो आजाद का मन लगातार बातचीत करने से या हवाई पिस्तौल ले कर किसी बारीक चीज पर निशाने का अभ्यास करते रहने से बहलता था।
      उस समय आजाद और दूसरे साथियों की ब्रह्मचर्य, नारी और सौन्दर्य के बारे में कैसी धारणायें थीं, यह दो-एक बहुत छोटे-छोटे उदाहरणों से स्पष्ट हो जायेगा। प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप में स्त्री का प्रसंग चलते ही आजाद एतराज किये बिना न रह सकते थे- ''फिर 'चुम्बक' की बात। यह साला 'चुम्बक' जिसे लगा ले डूबा। सिपाही को औरत से क्या मतलब '' उस समय ऐसी धारणा केवल आजाद की थी। दूसरे साथियों को स्त्री और प्रेम की चर्चा से कोई परहेज नहीं था। हां, सुखदेव भी इस प्रसंग में कम ही रस लेता था परंतु आदर्श की दृष्टि से कोई विरोध न था। उसका कहना था-'जब औरत है नहीं तो उस की चर्चा से क्या फायदा।'
      आजाद का सब से प्रिय गाना था-'मां हमें विदा दो, जाते हैं हम विजयकेतु फहराने आज।' वे प्राय: ही भगत सिंह या राजगुरु और बाद में बच्चन (वैशम्पायन) से यह गाना सुनाने के लिए अनुरोध करते। राजगुरु यों तो धीर स्वभाव था परंतु चुटकियां लेने में उसे मजा आता। जब आजाद उसे गाने के लिए कहें तो वह जरूर ही कोई इश्किया गजल गुनगुनाने की चेष्टा करने लगता। यह गजलें वह प्राय: भगत सिंह से सुन कर याद कर लेता था। भगत सिंह को शायरी से भी बहुत शौक था। महाराष्ट्रीय होने के कारण राजगुरु का उर्दू उच्चारण बहुत विचित्र था। गजल में वह आशिक और 'माशूक' को प्राय: ही 'आशुक' और 'माशिक' कह जाता और खूब हंसता। यदि आजाद 'विजयकेतु' वाला गाना सुनने पर जिद्द ही करें तो वह हंस कर उत्तर देता-'अभी पुलिस आता है विजयकेतु लेकर।'
      एक रोज राजगुरु कहीं से बहुत सुंदर स्त्री की तस्वीर का एक कैलेण्डर ले आया और लाकर 'नाई की मंडी' आगरा वाले मकान में दीवार पर लटका दिया। आजाद कहीं बाहर से लौटे। बच्चन (वैशम्पायन) ने उस कैलेंडर की और  संकेत किया-''भैया, देखा! यह कौन ले आया है?''
      आजाद ने कैलेंडर की ओर देखा। माथे पर बल पड़ गए। कैलेंडर को कील समेत दीवार से खींच लिया और फाड़ कर फेंक दिया।
      कुछ देर बाद राजगुरु लौटा। दीवार से अपना कैलेंडर गायब देखकर वह ऊंचे स्वर में पुकार उठा-''अरे, हमारे कैलेंडर का क्या हुआ?''
      बच्चन ने ओंठ दबाकर फर्श पर पड़े कैलेंडर के टुकड़ों की ओर देखा। राजगुरु ने झुंझलाहट और क्रोध के स्वर में प्रश्न किया-''यह किस ने किया?''   ''हमने किया।'' आजाद भला किसी से डरते थे।
      आजाद के प्रति आदर से स्वर को कुछ धीमा कर राजगुरु ने विरोध किया-''आपने क्यों फाड़ डाला? हम इतने शौक से तस्वीर लाये थे।''
      ''हमें-तुम्हें ऐसी तस्वीरों से क्या मतलब?'' आजाद ने डपट दिया।
      ''वाह, इतनी खूबसूरत तस्वीर थी।''
      ''हमें-तुम्हें खूबसूरत से मतलब?'' नाराजगी से ऊंचे स्वर में आजाद ने डांटा।
      ''तो जो कुछ खूबसूरत होगा उसे फाड़ डालोगे, तोड़ डालोगे?'' राजगुरु भी अड़ गया।
      ''हां तोड़ डालेंगे?'' आजाद ने सीना तान लिया।
      ''तो जाकर ताजमहल को भी तोड़ डालो'' राजगुरु ने चुनौती दी।
      ''हां तोड़ डालेंगे, जब हमारा बस चलेगा।'' आजाद की आंखों में सुर्ख डोरे उभर आए।
      दूसरे साथियों को होंठ दबाये, आंखें चुराते देख कर राजगुरु की झल्लाहट भी मुस्कराहट में बदल गई।
      ब्रह्मचर्य के विषय में 1929 के आरंभ में आजाद की ऐसी ही धारणा थी परंतु एक ही वर्ष में उन का दृष्टिकोण बहुत ही स्वाभाविक और यथार्थवादी हो गया था। अनाचार और उच्छृंखलता से तो आजाद को सदा ही घृणा रही परंतु 1930 के जाड़ों की बात मुझे याद है कि कानपुर के 'चुन्नीगंज' मुहल्ले में आजाद मुझ से बात किया करते थे कि क्रांति को जीवन भर का काम बना लेने वाले आदमी को क्रांतिकारी स्त्री से विवाह कर लेना चाहिए। कभी मजे में आकर सम्भावित पत्नी का जिक्र करते हुए कल्पना किया करते थे:
      ''...पहाड़-पहाड़ घूम रहे हों, एक राइफल उसके कंधे पर हो और एक हमारे     कंधे पर। दुश्मन से घिर जायें। वह राइफलें भरती जाए और हम दनादन-दनादन गोली चलाते जायें।''(क्रमशः)
                       

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -5-यशपाल


     भगत सिंह के विक्षुब्ध रहने का कारण सरदार किशन सिंहजी का व्यवहार था। भगत सिंह काफी समय दिल्ली और कानपुर रह आया था। उस का यह प्रवास गुप्त ही था। पिता के बार-बार पूछने पर भी उसने उस प्रवास के रहस्य उन्हें नहीं बताये थे परंतु उसके लक्षणों से इस फरारी का कारण भांप लेना कठिन नहीं था। सरदारजी को यह आशंका बनी हुई थी कि लड़का फिर किसी समय अंतर्धान हो जा सकता है। बीच-बीच में दो-चार दिन के लिए वह उड़ भी जाता था। सी.आई.डी. उस का पीछा कर रही थी। यह देख कर सरदारजी और भी चिन्तित थे। वे सोचते ही नहीं बल्कि भगत सिंह को समझाते भी थे कि सी.आई.डी. का सन्देह दूर करने के लिए उसे अक्ल से काम लेना चाहिये!
      भगत सिंह को घर पर बांध लेने का उपाय जो सरदारजी ने सोचा सो कोई नया नहीं था; वही पुराना तरीका कि लड़के का विवाह कर दिया जाये। एक अच्छे अमीर देहाती सिख परिवार में उन्होंने लड़की भी निश्चित कर ली थी। विवाह के लिए भगत सिंह को तैयार न देख कर सरदारजी और भी क्रुध्द और चिंतित रहने लगे।
      सरदारजी ने विवाह के प्रति आपत्तिा का कारण पूछा। भगत सिंह ने उत्तार दिया कि वह जब तक आर्थिक रूप से अपने पांव पर खड़ा न हो जाए शादी करना ठीक नहीं समझता। सरदार किशन सिंह जी ने उत्तार दिया, ''तू हमें ही रास्ता बताना चाहता है? विवाह कर ले और अपने पांव पर खड़े होने की कोशिश भी कर। हम मना करते हैं? विवाह हो जाने से तुझे कौन झंझट हो जाएगा? ''
      भगत सिंह ने अपनी उम्र कम होने का भी एतराज किया। सरदारजी ने उत्तर दिया, ''और सब बातों के लिए जो बुर्जुर्ग बनता है, बस शादी के लिए ही कमसिन है? शादी हो जाने दो। बहू को घर तभी बुलाना जब जरूरत जान पडे।'' सरदारजी को इस विवाह से काफी बड़े दहेज की भी आशा थी। लड़की वाले बात पक्की कर लेना चाहते थे। इसलिए सरदारजी भगत सिंह के इनकार के कारण मानसिक ज्वर की-सी अवस्था में दिखाई देने लगे।
      बहुत दबाव पड़ता देखकर भगत सिंह ने एतराज किया कि वह शादी करेगा ही तो पढ़ी लिखी लड़की से करेगा। उसे यह मालूम हो चुका था कि सरदारजी ने जो लड़की तलाश की है, वह गांव के अच्छे  बड़े जमींदार की लड़की है। गांव में लड़कियों का स्कूल कहां थे? बहुत होगा, लड़की कुछ गुरुमुखी जानती होगी। भगत सिंह ने जिद्द की कि वह कम से कम मैट्रिक पास लड़की से शादी करेगा। इस उत्तार से सरदार जी और भी बौखला उठे।
      भगत सिंह को कभी-कभी तो दल के काम-काज से भी घर से बाहर रह जाना पड़ता था और कभी-कभी पिता के सदा बिगड़ते ही रहने के कारण भी वह घर न जाता। मेरे यहां या भगवतीचरण के यहां टिक जाता और कभी कहीं और। इस बात से सरदारजी और भी अधिक विक्षिप्त हो जाते। हम सभी सरदारजी के निरंतर क्रोध के कारण उनसे डरने लगे। कभी हम लोग आपस में मजाक ही कर रहे होते और वे अचानक आ जाते तो चुप हो जाते। बुजुर्गों के सामने सभी तरह की बातें भी तो नहीं की जा सकतीं। सरदारजी अनुमान कर लेते कि यह लोग राजनैतिक-षडयंत्रा की बातें कर रहे थे, मुझे देख कर चुप हो गए हैं। उनका क्षोभ और क्रोध और भी बढ़ आता।
      सरदारजी मच्छीहट्टा में मेरी जगह पर कभी नहीं आए थे। एक दिन पूछते-तांछते हाथ में लाठी लिए, वे मेरे यहां आ पहुंचे। उनका चेहरा देख कर ही भांप गया कि वे बहुत ही नाराज और बिगड़े हुए थे। आते ही क्रोध भरी आत्मीयता में उन्होंने मुझे सम्बोधन किया-''तू भगत सिंह को समझाता क्यों नहीं? आखिर वह शादी क्यों नहीं करता? अभी तुम लोग बड़े भारी क्रांतिकारी ब्रह्मचारी बने फिरते हो, चार दिन बाद गलियों में लहंगे सूंघते फिरोगे।'' उन्होंने कुछ ऐसे विकट शब्दों और उपमाओं का प्रयोग किया उन्हें दोहराया नहीं जा सकता।
      मैंने भगत सिंह की ओर से सफाई दी कि शादी करने से तो वह इन्कार नहीं करता। उसे पढ़ने-लिखने का शौक है। वह चाहता है कि लड़की पढ़ी-लिखी हो।
      सरदार जी उबल पड़े-''पढ़ी-लिखी लड़की में कुछ और बढ़ जाता है क्या? पढ़ी-लिखी औरत से क्या पढ़े-पढ़ाये बच्चे होते हैं?''
      उनका क्रोध बढ़ता ही गया, वे साफ-साफ गालियां देने लगे...''तू और जयचंद्र दोनों बहुत कमीने हो। अपने आपको बहुत चालाक समझते हो। खुद तो तुम लोग नौकरी कर रहे हो, दूसरों को बिगाडते फिरते हो। तू उसे समझा नहीं सकता?''
      उस समय यदि मैं उनसे यह कह देता कि मैं उसे क्या समझाऊं वही मुझे समझा रहा है, तो जाने वे मुझे क्या-क्या सुना देते। इसलिए मैं यही कहता रहा कि मैं तो उसे हमेशा समझाता रहता हूँ कि घर का काम देख, ''देखिये, मैं तो नौकरी कर रही रहा हूं ''।
      मेरे अज्ञान प्रकट करने पर सरदारजी बिगड़ उठे-''उसने तो मुझसे यही कहा था कि तेरे यहां रह जाता है।'' एक जिम्मेवार व्यक्ति का नाम लेकर वे बोले- ''... ने भी भगत को आज सुबह तेरे साथ देखा था, तुझे पता नहीं तो किसे पता है?''...उन्होंने एक अच्छी जोरदार गाली दे कर कहा-''मैं तेरे बाप की जगह हूं। तू मुझे चराता है बदजात!''
      कसम खाकर विश्वास दिलाया कि भगत मेरे यहां आज नहीं आया बाजार में मिला था। इस पर उन्होंने पूछा-''सुखदेव कहां रहता है?''
      यह बताना मुश्किल था क्योंकि सुखदेव उन दिनों 'कन्हैयालाल बिल्डिंग' में जयगोपाल के साथ एक कमरा लेकर अप्रकट रूप से रह रहा था। मैंने सरदारजी को टालने के लिए दो-चार जगहों के नाम बता दिए कि हो सकता है वहां कहीं हो।
      सरदारजी ने उन सभी जगहों का चक्कर लगाया। बदकिस्मती से इन्हीं में से एक  जगह भगत सिंह मिल गया।
      भगत सिंह ने आकर क्रोध में इस मुलाकात का जो हाल सुनाया तो मेरी ग्लानि का अन्त न रहा। सौ कसमें खाकर उसे यकीन दिलाया कि मुझे विश्वास था कि तुम आजकल वहां नहीं आते होगे। इसीलिए मैंने उन जगहों का नाम ले दिया था। भगत सिंह ने घुटनों, कोहनियों और कन्धों पर लाठी की मार के चिह्न दिखाये और फिर हंस-हंस कर उन मौलिक गालियों के नये-नये समास बताये जिनका आविष्कार सरदारजी ने उस पर अपना क्षोभ प्रकट करने के लिए किया था।
      1927 में लाहौर में दशहरे के अवसर पर एक बम विस्फोट हुआ था। यह किसी विकृत मस्तिष्क की करतूत थी। घनी भीड़ में बम विस्फोट होने से बहुत लोग जख्मी हो कर अस्पताल में भरती हुए  थे। मैं सेवा समिति की ओर से इन लोगों की सेवा-सुश्रुषा के लिए अस्पताल जाता रहता था। दशहरे की भीड़ में हिंदुओं की संख्या तो ज्यादा थी ही, इसीलिए हिंदू भाइयों ने कल्पना कर ली कि यह बम विस्फोट मुसलमानों की शरारत थी।
      पुलिस ने संदेह में कुछ आदमियों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें से एक भगत सिंह था दूसरा हमारे कालिज का विद्यार्थी बाबूसिंह। पुलिस ने भगत सिंह को प्राय: दो सप्ताह हवालात में रखा। वकीलों की ओर से उसे अदालत में पेश किए जाने की मांग की जा रही थी। पुलिस कोई मामला न गढ़ पाई थी। उसे अदालत में पेश किये बिना ही जमानत पर छोड़ दिया गया। जमानत की रकम थी चालीस हजार रुपए। इस भारी जमानत पर होने के कारण, जामिनों को संकट में न डालने के लिए भगत सिंह को अपने घर में कैद हो जाना पड़ा। वह कहीं भी आता-जाता तो पुलिस के खुफिया उसके पीछे छाया की तरह लगे रहते। खुफिया पुलिस को चकमा दे देना तो मामूली बात थी किंतु  चकमा देने का अर्थ होता, उस विषय में पुलिस के सन्देह को मजबूत कर देना।

      मैंने डाक्टर गोपीचंद भार्गव की मार्फत पंजाब असेंबली में भगत सिंह को बिना कारण बताये जमानत पर रखकर परेशान करने के संबंध में प्रश्न का नोटिस दिला दिया। डाक्टर साहब को मुझ पर पूरा विश्वास था ही। उनके प्रश्न वगैरह मैं ही बना दिया करता था। चिकित्सा और कांग्रेस के दूसरे कामों से उन्हें रात के एक-एक बजे तक फुरसत न मिल पाती थी। असेंबली में प्रश्न का नोटिस देने पर भगत सिंह की जमानत वापस कर दी गई। कुछ दिन तो भगत सिंह साधु बना घर पर टिका रहा परंतु फिर ऐसा अन्तर्धान हुआ कि 1929 मार्च में केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने और परचा बांटने के बाद ही गिरफ्तार हो कर प्रकट हुआ।
      भगत सिंह भी अपनी कल्पना में एक दुबली-पतली, पीली-पीली सी लड़की को जो उन दिनों एक कालिज में पढ़ रही थी, अपने मन में 'मेवाड़पतन' की 'मानसी' बनाये बैठा था। मुझे अब 'मेवाड़पतन' की कहानी तो याद नहीं पर भगत सिंह की 'मानसी' याद है। इस 'मानसी' ने भगत सिंह से कोई प्रतिज्ञा भी नहीं की थी। यह केवल भगत सिंह के मन का पढ़ी-लिखी, सुसंस्कृत दिखाई देने वाली लड़की के प्रति स्वत: आकर्षण मात्र था। अस्तु, जब 'मानसी' ने देश के प्रति उत्सर्ग को अपने मतलब की बात न समझ कर एक समृध्द नौजवान के शिष्ट वेश और व्यवहार के प्रति आकर्षित होकर उससे सगाई कर ली तो भगत सिंह की कल्पना के आदर्शों की मीनार भी ठसक गई। वह भी दो-चार दिन लंबी-लंबी सांसें लेकर अपने घर के इक्के में, घोड़ों के बीमार हो जाने के कारण ऊंट के दूध के कलसे शहर में पहुंचाता हुआ क्रांति की बात सोचने लगा।(क्रमशः)





बुधवार, 30 मार्च 2011

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -3-यशपाल


नेशलन कालिज में भाई परमानंद प्राध्यापक थे। वे पढ़ने-लिखने में ही लगे रहते। एक प्रकार से भाई परमानंद ही लाला लाजपत रायजी की ओर से नेशलन कालिज के व्यवस्थापक थे। भाई परमानंदजी की स्थिति के व्यक्ति का केवल कुर्ता-धोती पहनना और वह मोटे और घर के धोये, बिना स्त्री किए विशेष ध्यान आकर्षित करता था। उन्हें साधारणत: लोग त्याग मूर्ति भाई परमानंदजी कहते थे।

भाई परमानंदजी को पायजामा और कोट पहनने वाले विद्यार्थियों के प्रति खासी वितृष्णा थी। जो विद्यार्थी जुल्फें रखकर तेल और कंघी का व्यवहार करते थे, उन्हें तो वे बिल्कुल जनखा ही समझते थे। वे कालेज में इतिहास पढ़ाते थे और साधारणत: विद्यार्थियों में राष्ट्र सेवा की भावना को उत्साहित भी करते थे। जिनमें ऐसी रुचि देखते उन्हें प्रोत्साहित भी करते। इस प्रसंग में यदि किसी ऐसे विद्यार्थी का नाम उन्हें सुझाया जाता जो धोबी के धुले साफ कपड़े पहनने का शौक रखता हो, तो वे उसकी ओर से तुरंत ही निराशा प्रकट कर देते।

नेशनल कालेज के प्रिंसिपल आचार्य जुगल किशोरजी थे। आचार्यजी 1951 में उ.प्र. कांग्रेस के प्रधान और तदनंतर श्रमविभाग के मंत्री हो गए थे। उ.प्र. कांग्रेस के प्रधान आचार्यजी कुछ ही समय पहले इंग्लैंड में शिक्षा के लिए कई बरस रहकर लौटे थे। उस समय उन्हें हिंदुस्तानी की अपेक्षा अंग्रेजी बोलने में ही अधिक सुविधा होती थी। कालेज में शिक्षा का माध्यम हिंदुस्तानी हिंदी और अंग्रेजी था। पुस्तकें सब अंग्रेजी में ही थीं। परंतु अध्यापक लोग हिंदुस्तानी में भी समझाने की चेष्टा करते थे। केवल आचार्यजी और प्रोफेसर जी.सी.मेहता हिंदुस्तानी नहीं बोल पाते थे। आचार्यजी का दृष्टिकोण मुख्यत: अध्ययन को प्रोसाहन देने का ही था। उन्होंने कालेज में गांधी आश्रम की पध्दति को लागू करने का यत्न नहीं किया। वे प्राय: विद्यार्थियों के अध्ययन को उचित धाराओं की ओर प्रेरित करने की चेष्टा भी करते।

कॉलेज के प्रोफेसरों की विचारधारा का प्रभाव विद्यार्थियों के विचारों पर काफी पड़ा। इनमें प्रो. जयचंद्र विद्यालंकार का नाम विशेषत: उल्लेखनीय है। जयचंद्रजी प्राय: ही विद्यार्थियों की तर्क और जिज्ञासा की प्रकृति को उकसाते रहते थे। वे भारतीय इतिहास और राजनीति के अध्यापक थे। उनकी चेष्टा रहती थी कि विद्यार्थी इतिहास को श्रुति और स्मृति मानकर केवल विश्वास द्वारा ही न अपनाते चले जाएं बल्कि तर्क और खोज के दृष्टिकोण से उसका अध्ययन करें। उनकी कक्षा में अनेक प्रकार के विषयांतरों पर भी वाद-विवाद हो जाता था, जैसे आस्तिकता-नास्तिकता, आत्मवाद और भौतिकवाद। उनका दृष्टिकोण विद्यार्थियों को बहुत ही सुलझा हुआ जान पड़ता था। इसलिए जिज्ञासु और अध्ययनशील विद्यार्थियों का एक गिरोह उनके चारों ओर इकट्ठा हो गया था जिसे भविष्य में तैयार हो जाने वाले क्रांतिकारी दल की पृष्ठभूमि कहा जा सकता है। उस गिरोह में से अधिकांश विद्यार्थी छंट गए और कुछ नए भी आ मिले।

नेशनल कालेज में अधिकांश विद्यार्थी राजनीति, अर्थशास्त्रा और इतिहास की शिक्षा ले रहे थे। यों फारसी और संस्कृत भी पढ़ाई जाती थी। फारसी पढ़ने वाले केवल दो या तीन विद्यार्थी थे और संस्कृत पढ़ने वाले पांच या छह। कुछ पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि भगत सिंह संस्कृत पढ़ता था। संस्कृत में भगत सिंह की रुचि का कारण उस समय बहुत हदतक उसके परिवार की आर्यसमाजी रुचि समझी जा सकती थी। डी.ए.वी. स्कूल में संस्कृत अनिवार्य होने के कारण उसने कुछ संस्कृत वहां भी पढ़ी थी। साहित्य की ओर उसकी प्रवृत्ति तो थी ही।

भगत सिंह मैट्रिक पास किये बिना और काफी समय गुरुद्वारा आंदोलन वगैरह में लगा कर हमारा सहपाठी बना था। इस कारण वह पढ़ाई में, खास कर पाठयक्रम में दूसरे साथियों से अपने आपको कुछ पिछड़ा हुआ अनुभव कर रहा था। कक्षा में प्रोफेसरों से उसे डांट-फटकार भी काफी सुननी पड़ती थी। भगत सिंह के स्वभाव में सब से बड़ी बात समय और परिस्थिति के अनुकूल सट जाने की थी। पढ़ाई की अपनी कमी को पूरा करने के लिए वह विशेष यत्न कर रहा था परंतु कक्षा में हम लोग यदि गुट बांधकर कोई शरारत करते तो वह पीछे नहीं रहता था। यह शरारतें अधिकतर होती थीं हमें भारतीय इतिहास पढ़ाने वाले प्रोफेसर सोंधी और प्रोफेसर मेहता की अंग्रेजी की कक्षा में। प्रोफेसर सोंधी कुछ औंघाते-औंघाते अपना लेक्चर देते थे। कोई भी सवाल कर देने पर उलझ बैठते-''तुम लिंक आफ थौट को डिस्टर्ब कर देते हो।'' उनका एक बार यह कहना था कि हम लोग अप्रासंगिक प्रश्नों की झड़ी लगा देते। परिणाम होता कि सोंधी साहब कक्षा छोड़ देते और हम लोग दंगे के लिए बाहर निकल जाते।

प्रोफेसर मेहता पढ़ाते बहुत लगन से थे परंतु उनका हिंदुस्तानी का ज्ञान बहुत परिमित था, हिंदुस्तानी शब्दों का उच्चारण और भी विचित्र। किसी भी शब्द का हिंदुस्तानी पर्यायवाची शब्द उनसे पूछ लेना मजाक आरंभ करने के लिए काफी था और फिर ठेठ पंजाबी का कोई ऊटपटांग शब्द उन्हें सुझा देना। दूसरे विद्यार्थियों के खिलखिला पड़ने पर मेहता साहब परेशान हो जाते और सबसे पहले झंडासिंह की ओर संकेत कर हुक्म दे देते-'गेट आउट आफ दि क्लास।' उसके बाद मेरी बारी आती फिर सुखदेव की फिर भगत सिंह की और दूसरे दो-एक साथियों की।

पंडित चेतरामजी शर्मा हमारे हिंदी के पहले अध्यापक थे और संगीत के विशेष अनुरागी। पंड़ित जी बहुत ही गंभीर थे और छंदों की व्याख्या करते समय उनके मात्रा और अनुपात इत्यादि को प्राय: संगीत के क्रियात्मक प्रदर्शन से समझाने की चेष्टा करते। पंडितजी को संगीत का ज्ञान गहरा होने पर भी कंठ काफी बोझल था। हम लोग संगीत की शुध्दता क्या जानें? हंसी रोकना कठिन हो जाता परंतु पंडितजी की शिष्टता का लिहाज इतना था कि अपने ऊपर जब्र करना पड़ता। हमारी मुस्कानों और आंखों में भरी शरारत की पंडितजी विशेष चिंता भी न करते थे।


प्रोफेसर जयचंद्रजी विद्यालंकार की कक्षा में किसी शरारत के लिए अवसर नहीं रहता था। उनकी बात की उपेक्षा करने में अपना ही नुकसान था। कोई भी बेतुका प्रश्न सुनकर जयचंद्रजी एक क्षण के लिए चुप हो जाते और फिर प्रश्न का उत्तर से आंखें मिला पूछ लेते-'प्रस्तुत विषय से तुम्हारे प्रश्न का क्या संबंध है?' इसलिए कोई वास्तविक समस्या होने पर ही प्रश्न किये जाते थे। जयचंद्रजी का पाठय विषय तो राजनैतिक सिध्दांत और शासन-व्यवस्था संबंधी ऐतिहासिक विश्लेषण था परंतु बातचीत प्राय: सत्याग्रह-आंदोलन पर भी चल जाती थी। और विद्यार्थी उसकी विफलता पर मनन किए बिना न रह सकते थे। अपने देश के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति की लगन मन में रखने वाले विद्यार्थियों के लिए इस मनन का एक ही परिणाम हो सकता था कि वे अपने राष्ट्र की राजनैतिक समस्या के समाधान का कोई दूसरा मार्ग सोचें।

सत्याग्रह-आंदोलन की विफलता के अनुभवों और दूसरे मार्ग की खोज की इच्छा के समय हम लोगों के हाथ कौन-सा साहित्य पड़ा? डैनब्रीन की-'माई फाइट फार आइरिश फ्रीडम', मैजिनी और गैरबाल्डी की जीवनियां, फ्रांसीसी राज्यक्रांति का इतिहास, बोल्तेर और रूसो के रूढ़िवाद विरोधी क्रांतिकारी विचार, रूसी क्रांतिकारियों की जीवनियां, 'वीराफिगन' 'क्रौपोटकिन' आदि और इस के साथ-साथ भारत में सत्याग्रह से भिन्न देश की स्वतंत्राता के लिए किये गए प्रयत्नों का परिचय जिनमें सान्याल दादा की आप बीती 'बंदी जीवन' प्राथमिक पुस्तक के रूप में थी और फिर 'रौलेट कमेटी की रिपोर्ट।'

रौलेट कमेटी ने अपनी रिपोर्ट रौलेट बिल बनाया जाने की आवश्यकता प्रमाणित करने के लिए लिखी थी। इस में भारत में हुए सशस्त्रा क्रांति की चेष्टा के प्रयत्नों का काफी ब्योरेवार वर्णन है। रिपोर्ट इन प्रयत्नों को अपराध प्रमाणित करने के लिए लिखी गई थी परंतु लेखकों का दृष्टिकोण ऐतिहासिक या वास्तविकता का यथासंभव यथार्थ (आक्जेक्टिव) चित्राण करना था। इस पुस्तक को पढ़ कर हम लोगों पर यह प्रभाव नहीं पड़ा कि भारतीय क्रांतिकारी अपराधी थे। हम इस परिणाम पर पहुंचे कि उन्होंने अपनी परिस्थितियों में एक स्वाभाविक मार्ग का अवलम्बन किया था और उस प्रयत्न के लिए संभावना का बहुत विस्तृत क्षेत्र है। हमें उन कार्यों और मार्ग का भी कुछ परिचय मिल गया।

यह याद नहीं कि किस साथी ने इन पुस्तकों को पढ़ने की बात मुझे सुझाई। इनमें से अधिकांश पुस्तकें तो कालिज के छोटे से पुस्तकालय में ही थीं। शेष कहां से कैसे आ जाती थीं, यह अब याद नहीं। उस समय उस की खोज करने की आवश्यकता भी अनुभव न हुई थी। यह भी नहीं कहा जा सकता कि इन पुस्तकों को हम कुछ लोग ही, भगत सिंह और सुखदेव जैसे ही पढ़ते हों। सभी विद्यार्थी इन पुस्तकों को पढ़ते थे।

एक दिन मैं और भगत सिंह रावी नदी में नौका खेने का अभ्यास करने गए थे। हम दोनों ही थे, तीसरा कोई साथ नहीं था। यह तो याद नही कि प्रसंग कैसे चला परंतु एकांत देखकर मैंने भगत सिंह से एक बात पूर्ण विश्वास से कह डाली- 'हम लोग अपना जीवन देश के लिए अर्पण करने की प्रतिज्ञा कर लें।'

भगत सिंह ने सहसा गंभीर हो कर अपना हाथ मेरी ओर बढ़ा दिया- 'मैं प्रतिज्ञा करता हूं।'

हाथ मिलाने के बाद हम दोनों ही कुछ देर तक चप्पू चलाना छोड़ निश्चल बैठे रहे। उस समय सूर्यास्त हुआ ही था, आकाश पर लाली थी। अंधेरा होता देखकर हम लोगों ने नाव किनारे लगाकर मांझी को सौंप दी। लौटते समय भी हम लोग चुप ही रहे, बोले नहीं। यह बात इतनी भावुकता से हुई थी कि उस की याद बनी है।


सन् 1925 की एक घटना याद है। पंजाब में हिंदी साहित्य सम्मेलन की नयी-नयी स्थापना हुई थी। उर्दू प्रधान लाहौर में सम्मेलन की ओर बहुत कम लोगों की रुचि थी। नेशनल कालेज के कुछ विद्यार्थी और संस्थाओं के हिंदी अध्यापक ही प्राय: उस में योग देते। सम्मेलन ने किसी एक विषय पर सर्वोत्ताम निबन्ध लिखने के लिए पचास रुपये के पुरस्कार की घोषणा की थी। मैंने निबंध लिखा था। कई महीने तक परिणाम की प्रतीक्षा करने पर पता लगा कि पुरस्कार किसी व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता क्योंकि निर्णायकों ने तीन निबन्धों को एक ही कोटि का ठहराया था। यह भी मालूम हो गया कि उन तीनों में से एक निबंध मेरा था। दूसरे दो निबंध लेखकों के नाम जानने के लिए खोज की तो पता लगा कि दूसरा निबंध भगत सिंह का था और तीसरा जयचंद्रजी की मां जी का था।
लिखने की ओर भगत सिंह की प्रबल रुचि थी। मैं केवल हिंदी में लिखता था। भगत सिंह उर्दू में भी लिखता था। कुछ दिन बाद स्थानीय उर्दू पत्रों में उस की लिखी छोटी-छोटी चीजें प्रकाशित भी होने लगी थीं। अपने विचारों के प्रचार के लिए अथवा सन 1924-25 में प्राय: सोई राष्ट्रीय भावना को जगाने के लिए, नेशनल कालिज के विद्यार्थियों ने नाटकों का माध्यम भी अपनाया था। इस चेष्टा के दोनों ही कारण थे, नाटक खेलने की इच्छा और नाटक को अपने विचारों के प्रचार का साधन बनाना भी। किसी लेखक का 'महाभारत' नाटक था। उसके वार्तालापों में जगह-जगह परिवर्तन करके हम लोगों ने अपने लिए उपयोगी बना लिया। इस नाटक का नाम रखा गया था 'कृष्ण विजय'। व्यंजना से अंग्रेजों को कौरव और देश भक्तों को पांडव बना लिया था। इस में कुछ गाने, विशेष कर प्रहसन भाग में, सम्मिलित कर लिए थे। इन में से एक गाना था-'कदे तूं बी हिंदिया होश सम्भाल ओ' (ऐ हिंद कभी तू भी होश सम्भाल! तेरा घरबार विदेशी लूट ले गया और तू भी बेखबर सो रहा है। ओ लूटने वाले हमारे साथ ज्यादतियां न कर। हम तेरी सब चालकियां समझ चुके है... इत्यादि।
यह गाना सरदार अजीत सिंह के एक पुराने गीत-'पगड़ी सम्भाल ओ जट्टा' (अरे बेखबर किसान तेरे सिर की पगड़ी उतरी जा रही है) के भाव को लेकर बनाया गया था। सरदार अजीतसिंह के उस गीत को सरकार ने गैरकानूनी कर दिया था। हमारे नाटकों के ऐसे विदेशी सरकार-द्रोही भागों को भी गैरकानूनी करार दे दिया गया था। कुछ दिन हम लोगों को नाटक खेलने का खूब शौक रहा। दो नाटक हम लोगों ने लाहौर में खेले। फिर 'गुजरांवाले' में प्रांतीय-कांग्रेस की कांफ्रेंस के अवसर पर भी 'भारत दुर्दशा' नाटक खेला।
नाटकों का आरंभ किया गया था देहरादून में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के मौके पर 1924 में राजा भोज के कवि दरबार का नाटक खेलने से। राजा भोज के दरबार में आधुनिक हिंदी कवियों की उपस्थिति की कल्पना जयचंद्रजी के मस्तिष्क की उपज थी। इसमें मैंने राजा भोज की भूमिका की थी। भगत सिंह भी 'भारत दुर्दशा' आदि कई नाटकों में अभिनय करता रहा। नाटकों के कार्यक्रम में साथी झंडासिंह (अब सरदार जसवंत सिंह) धर्माभिलाषी, हुंडू और बलदेव जो अब रिजर्व बैंक आफ इंडिया में बहुत जिम्मेवार पद पर हैं, बहुत अग्रणी भाग लिया करते थे। इन दिनों भगत सिंह और सुखदेव प्राय: कालेज से गायब रहने लगे थे। भगत सिंह का व्यवहार मजाक के अलावा कामकाज के बारे में कुछ सख्त हो गया था ।
इस समय दल के संगठन की बात कुछ-कुछ स्पष्ट होने लगी थी। हिंदुस्तानी प्रजातंत्र दल(एच.आर.ए.) का एक परचा लाहौर में बलराज के दस्तखत से बांटा गया था। इस खतरनाक परचे का सफल बंटवारा संगठन और आयोजन के बिना नहीं हो सकता था। मैं सहयोग तो दे रहा था परंतु स्कूल में अपनी नौकरी और परीक्षा की तैयारी छोड़ने के लिए तैयार न था। सत्याग्रह के मार्ग की विफलताओं पर हम लोगों की बहस उन दिनों बहुत चलती थी और प्रजातंत्र और समाजवादी पध्दति की भी चर्चा काफी जोर से होती थी। समाजवाद की ओर ध्यान जाने का सीधा-सादा कारण था, रूस के संबंध में साहित्य हाथ आना। 'तिलक स्कूल आफ पालिटिक्स' और 'सरवेंट्स आफ पीपुल्स सोसाइटी' के अतिरिक्त लाला लाजपत रायजी ने अपने पिता के नाम पर 'द्वारकादास पुस्तकालय' की भी स्थापना की थी। इस पुस्तकालय में राजनैतिक पत्र-पत्रिकाएं और सामयिक साहित्य काफी मात्रा में आता था।

कानपुर के प्रसिध्द समाजवादी राजाराम शास्त्री इस पुस्तकालय के पुस्तकालयाध्यक्ष थे। हम लोग प्राय: समवयस्क थे और शास्त्रीजी को हमारे विचारों से भी सहानुभूति थी इसीलिए 'द्वारकादास पुस्तकालय' हम लोगों का अच्छा-खासा अब बन गया था। इस पुस्तकालय में सुविधा यह थी कि आस-पास अनेक कालेजों के बोर्डिंग होने के कारण यहां विद्यार्थी राजनैतिक अथवा क्रांतिकारी साहित्य में रुचि रखते थे।
शास्त्रीजी स्वभाव से विनोदी, मिलनसार और कद में काफी छोटे हैं। इसलिए प्राय: उनके ना ना करते रहने पर भी लाइब्रेरी से जरूरत के मुताबिक पुस्तकें झपट ली जा सकती थीं। कभी रात-बिरात घूम-घाम कर आने पर उनकी खाट या कमरे पर भी जबर्दस्ती दखल कर लिया जा सकता था। एच.आर.ए. का परचा बांटने में भी शास्त्राीजी का पूरा सहयोग था।(क्रमशः)

मंगलवार, 29 मार्च 2011

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -2-यशपाल


     आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद ने यद्यपि विदेशी शासन से विद्रोह की पुकार नहीं उठाई थी, अपने धर्मग्रंथ 'सत्यार्थप्रकाश' में उन्होंने राजभक्ति का भी उपदेश जरूर दिया है परंतु वे यह लिखे बिना भी नहीं रह सके कि विदेशी शासन चाहे जितना भी सुखदायक और उन्नतिशील क्यों न हो, अपनी जाति के स्वतंत्र शासन से अच्छा नहीं हो सकता। आर्यसमाज के आंदोलन से प्रभावित होने वाले लोगों की भावना पर स्वामीजी के इस वाक्य का प्रभाव न पड़ा हो, यह नहीं हो सकता। यह सामाजिक चेतना का अनिवार्य परिणाम था। एक समय ऐसा था कि कोई भी व्यक्ति आर्यसमाजी बन जाने से ही सरकार की दृष्टि में राजनैतिक रूप से संदिग्ध हो जाता था। उस समय किसी नवयुवक के आर्यसमाजी बन जाने पर परिवार के लोग ऐसे ही चेहरा लटका लेते थे जैसे कि आजकल घर के लड़के के कम्युनिस्ट बन जाने पर आशंका अनुभव की जाती है।
      आर्यसमाज के प्रभाव से देश की अधोगति के प्रति असंतोष, समाज को पतन से बचाने की इच्छा और विदेशी शासन के प्रति मूक विरोध की भावना दो तरह प्रकट हो रही थी। इसका एक रूप था- भारत की प्राचीन समृध्दि और शक्ति का अत्युक्तिपूर्ण प्रचार। इसका अभिप्राय था अपने देश और समाज को हीन न समझ कर आत्मविश्वास का भाव पैदा करना। अपने समाज की श्रेष्ठता के विश्वास का अर्थ था; अपने समाज में गिरी हुई अवस्था से उन्नति करने का साहस उत्पन्न करना; परंतु जब अपनी श्रेष्ठता के विश्वास के कारण हम ने संसार के दूसरे देशों में हुई प्रगति से आंखें मूंद लीं, तो यह मिथ्या विश्वास हमें उन्नति से रोकने लगा।
      आर्यसमाज द्वारा उत्पन्न की गई सुधार की भावना का दूसरा रूप था- विदेशी सरकार के नियंत्राण से मुक्त अपनी शिक्षण संस्थाएं स्थापित करना। स्वतंत्र देश और समाज की उन्नति की आशा जनता में शिक्षा द्वारा ही जगाई जा सकती थी।
      आर्यसमाज में संगठनात्मक रूप से दो पार्टियां रही हैं, एक कालिज पार्टी और दूसरी गुरुकुल पार्टी। कालिज पार्टी में सरकारी नौकरों, वकीलों और सरकारी विश्वविद्यालयों से संबंधित शिक्षण संस्थाओं के लोगों की अधिकता रही है। यह पार्टी राजभक्ति की दृष्टि से विदेशी सरकार के अधिक समीप थी। दूसरी, गुरुकुल पार्टी का मुख्य आधार प्राचीन शिक्षा प्रणाली और प्राचीन संस्कृत का पुनरुत्थान रहा है। गुरुकुल पार्टी की शिक्षण संस्थाओं का सरकारी यूनिवर्सिटियों से कोई संबंध नहीं रहा इन के सामने सरकार द्वारा अस्वीकृति कर दिए जाने का भय नहीं था। इसलिए इस पार्टी से संबंधित लोगों में विदेशी सरकार के प्रति घृणा और विरोध का भाव भी अपेक्षाकृत उग्र रहा है, परंतु गुरुकुल पार्टी भी राजद्रोही समझ ली जाने के भय से सर्वथा मुक्त न थी और समय-समय पर हर उच्च पदस्थ अंग्रेज हाकिमों को अपनी संस्थाओं में निमंत्रण दे-दे कर यह विश्वास दिलाने की चेष्टा किया करती थी कि वह केवल धार्मिक संस्था मात्रा है। राजनीति से उसका कोई संबंध नहीं है। विदेशी शासन के प्रति इन के मन में घृणा और विरोध था परंतु उसे प्रकट करने का साहस इन में भी न था।
      बचपन में मैं स्वयं लगभग सात वर्ष गुरुकुल में रहा हूं। मुझे याद है कि गुरुकुलकांगड़ी विश्वविद्यालय के संस्थापक महात्मा मुन्शीराम जी, जो बाद में संन्यास ग्रहण करके स्वामी श्रध्दानंद कहलाने लगे थे, प्रांतीय गवर्नरों और वाइसरायों को गुरुकुल आमंत्रिात करके उनका प्रेमपूर्वक सत्कार करने का पाखंड करते रहते थे। जब दिल्ली में लार्ड हार्डिंग पर बम फेंका गया और लाट साहब बाल-बाल बच गए तो गुरुकुल में ईश्वर की इस कृपा पर धन्यवाद देने के लिए एक सभा की गई थी। लार्ड और लेडी हार्डिंग के चित्र विद्यार्थियों को बांटे गए। उनके दीर्घ जीवन के लिए ईश्वर से प्रार्थना की गई थी। पाखंड शब्द का उपयोग मैंने इसलिए किया है कि गुरुकुल कांगड़ी के वातावरण में अंग्रेज और विदेशी शासन के प्रति उत्कट घृणा थी। विदेशी शासन के प्रति वहां परवशता का भाव था, प्रेम का नहीं।
      गुरुकुल पार्टी में राजनैतिक चेतना अधिक होने का प्रमाण कालिज पार्टी के प्रमुख नेता महात्मा हंसराज और गुरुकुल पार्टी के प्रमुख नेता स्वामी श्रध्दानंद के व्यवहार से ही स्पष्ट हो जाता है। 1921 में जब जलियांवाला बाग की घटना के कारण विदेशी शासन और देश की जनता के आंदोलन की टक्कर ने उग्र रूप धारणा कर लिया तो स्वामी श्रध्दानंद राजभक्ति की अपनी पुरानी घोषणाओं के बावजूद राष्ट्रीय आंदोलन के अगले मोर्चे पर आए बिना न रह सके और उनकी गणना कांग्रेस के उग्र राजनैतिक नेताओं में होने लगी। दूसरी ओर कालिज पार्टी के अधिकारी विद्यार्थियों के राजनैतिक दमन में सरकार का साथ दे रहे थे।
      सरदार अजीत सिंह ने मुख्यत: और सरदार किशन सिंह ने भी विदेशी शासन  विरोधी राजनैतिक आंदोलन में भाग लिया था। उस समय अभी कृष्ण मंदिर (जेल) में तपस्या करके आत्मिक शक्ति द्वारा स्वराज्य प्राप्त कर लेने के गांधीवादी सिध्दांत का विकास नहीं हो पाया था। इसलिए सरदार अजीत सिंह पुलिस के हाथ पड़ कर जेल में सड़ते रहने के बजाय फरार होकर अपना काम करते रहे। गिरफ्तारी से बचने के लिए अम्बाप्रसाद सूफी के साथ वे भारत के अनेक भागों और नैपाल की तराई में फिरते रहे और फिर इस देश में कुछ कर पाने का अवसर न देखकर विदेश चले गए। विदेश में भी वे लाला हरदयाल, राजा महेंद्र प्रताप और बरकतुल्ला आदि दूसरे प्रमुख क्रांतिकारियों के सहयोग से जैसे तैसे भारत में राजनैतिक क्रांति की तैयारी के लिए प्रयत्न करते ही रहे। इटली से लौटे एक मित्र का कहना है कि दूसरे महायुध्द के समय रोम से रेडियो पर जो ब्रिटिश विरोधी प्रचार हिंदुस्तान में होता था और जिस की भाषा में ब्रिटिश साम्राज्यशाही और भारतीय ब्रिटिश सरकार के प्रति अदम्य घृणा और विरोध उबला पड़ता था वह सरदार अजीत सिंह के ब्रिटिश सरकार से आमरण टक्कर लेते रहने की भावना का ही परिणाम था।
      सरदार अजीत सिंह के लिए 1948 से पहले भारत लौट सकना संभव न हुआ। जिस समय वे लौटे, अत्यंत वृध्द और निरंतर संघर्ष से जीर्ण हो चुके थे। शीघ्र ही उन का देहांत हो गया। सरदार किशन सिंह भी कुछ हद तक अपने भाई का साथ देते रहे
ब्रिटिश विरोधी प्रचार हिंदुस्तान में होता था और जिस की भाषा में ब्रिटिश साम्राज्यशाही और भारतीय ब्रिटिश सरकार के प्रति अदम्य घृणा और विरोध उबला पड़ता था वह सरदार अजीत सिंह के ब्रिटिश सरकार से आमरण टक्कर लेते रहने की भावना का ही परिणाम था।
      सरदार अजीत सिंह के लिए 1948 से पहले भारत लौटना संभव न हुआ। जिस समय वे लौटे, अत्यंत वृध्द और निरंतर संघर्ष से जीर्ण हो चुके थे। शीघ्र ही उनका देहांत हो गया। सरदार किशन सिंह भी कुछ हद तक अपने भाई का साथ देते रहे।रौलेट-कानून विरोधी हड़ताल उसी समय टूटी जब गांधी ने अपनी भूल पर पश्चाताप करके हड़ताल को तुरंत तोड़ देने की आज्ञा दे दी। यह हड़ताल केवल लाहौर में ही नहीं अमृतसर, गुजरावाला आदि कई शहरों में भी इसी रूप में हुई।
      रौलेट कानून के विरुध्द प्रदर्शनों और हड़तालों को रोक कर गांधीजी और कांग्रेस ने सरकार द्वारा किए गए दमन की जांच की जाने की मांग और प्रार्थना अंग्रेज सरकार से आरम्भ की। कांग्रेस की यह मांग सरकार द्वारा स्वीकार न की जाने पर असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ। पंजाब केसरी लाला लाजपत राय कई वर्ष के विदेश वास के बाद उसी समय भारत लौटे थे। देश में राजनैतिक उत्साह देख कर उन्होंने पंजाब में असहयोग आंदोलन का नेतृत्व आरंभ किया। पंजाब में इस आंदोलन ने खूब उग्र रूप ले लिया। कांग्रेस ने सरकारी खिताबों, नौकरियों, अदालतों और स्कूल कालिजों से असहयोग की  पुकार की। खिताब, नौकरियां और अदालतें तो कम ही लोगों ने छोडीं होंगी परंतु विद्यार्थियों ने स्कूल कालिज बड़ी संख्या में छोड़ दिये। इन्हीं असहयोगी विद्यार्थियों को योग्य राष्ट्रीय कार्यकर्त्ता बनाने के लिए लालाजी और पंजाब के कांग्रेसी नेताओं ने लाहौर में पंजाब नेशनल कालिज की स्थापना की थी।
      भगत सिंह असहयोगी विद्यार्थियों में से था। राष्ट्र की पुकार पर उसने शायद नवीं कक्षा से स्कूल छोड़ दिया था और वह कांग्रेस के स्वयं सेवकों में भर्ती होकर राष्ट्रीय  काम करने लगा था। सन् 1922 में गांधीजी के सत्याग्रह स्थगित कर देने के कारण राष्ट्रीय आंदोलन फिर दब गया। जो विद्यार्थी राष्ट्र की पुकार पर स्कूल कालिज छोड़ आए थे, वे ठगे गए से अनुभव करने लगे। उनकी परिस्थिति कठिन हो गई। आंदोलन स्थगित होने का प्रभाव केवल विद्यार्थियों पर ही नहीं बल्कि आंदोलन के लिए उत्साहित हो जाने वाली सम्पूर्ण जनता पर विचित्र ढंग से पड़ा। जनता गांधीजी की सन् 1921 के 31 दिसम्बर तक स्वराज्य प्राप्त कर लेने की प्रतिज्ञा पर विश्वास कर बहुत उत्साहित और
मरने- मारने के लिए तैयार हो चुकी थी। 22 फरवरी, 1922 की घोषणा से स्वराज्य प्राप्त किये बिना ही आंदोलन पूर्णत: स्थगित हो गया।
      आंदोलन के यों स्थगित हो जाने से जनता में जाग उठी संघर्ष की भावना को ऐसा धक्का लगा जैसे तेज चाल से चलती रेलगाड़ी को सहसा रोक देने से रेलगाड़ी के डिब्बे आपस में ही टकराने लगते हैं। जनता में जाग उठी उग्रता और संघर्ष की भावना कई लाभदायक और हानिकारक रूपों में परिणित हो गई। सांप्रदायिक दंगे भी हुए परंतु उसके साथ सांप्रदायिक सुधारवादी आंदोलन, उदाहरणत: सिक्खों में 'गुरुद्वारा-आंदोलन' भी वेग से चल पड़े।
      इसमें संदेह नहीं कि गुरुद्वारा आंदोलन सांप्रदायिक क्षेत्रा में ही सीमित था और इस का उद्देश्य गुरुद्वारों (सिख मंदिरों) से अनाचार दूर करना था परंतु इसकी भावना उग्र   सुधारवादी और अपने सीमित क्षेत्रा में क्रांतिकारी भी अवश्य थी। यह गुरुद्वारे  कुछ महंतों की पैतृक और वैयक्तिक संपत्तिा के रूप में चले आ रहे थे। गुरुद्वारों में भेंट के रूप में आने वाली लाखों की सम्पत्तिा और गुरुद्वारों से जुड़ी हुई जागीरों की आय इन महंतों की व्यक्तिगत या पारिवारिक आमदनी समझी जाती थी। इन महंतों के स्वामित्व में यह  गुरुद्वारे प्राय: तमाशबीनी और व्यभिचार के अव्े बन चुके थे। गुरुद्वारा आंदोलन का उद्देश्य इन मन्दिरों को महन्तों की पैतृक और व्यक्तिगत सम्पत्ति न रहने  देकर संगत (संप्रदाय) की सामाजिक संपत्ति बना देना और इन गुरुद्वारों का तथा उनकी आमदनी-खर्च का प्रबंध निर्वाचित पंचायतों द्वारा करना था। यह गुरुद्वारों के सामाजीकरण की मांग थी।
      सरकार मंदिरों की संपत्ति के सामाजीकरण करने के विरुध्द और मंदिरों की संपत्ति पर महंतों के पैतृक स्वामित्व के अधिकार की रक्षा करने के पक्ष में थी। सुधार चाहने वाली सिख जनता ने यह आंदोलन सत्याग्रह के रूप में चलाया। सिखों के नि:शस्त्रा जत्थे गुरुओं की वाणी का पाठ करते हुए इन मंदिरों और मठों पर सामाजिक अधिकार कायम करने के लिए जाते थे। महंतों के पालतू गुंडे और पुलिस की बड़ी-बड़ी गारदें इन नि:शस्त्रा स्वयंसेवकों पर लाठियों की अंधाधुंध बौछार करते थे। कई जगह गोली चली। प्राय: मंदिरों की जमीन खून से रंग जाती थी। मूर्छित होकर गिर पडे स्वयंसेवकों को ले जाकर जेलों में बंद कर दिया जाता था। गुरुद्वारा आंदोलन के संघर्ष का अनुमान 'ननकाना साहब गुरुद्वारे' के उदाहरण से ही किया जा सकता है। इस मंदिर पर अधिकार करने के लिए लगभग दो सौ स्वयं सेवकों की जानें गर्इं।
      सन् 1922 में राष्ट्रीय आंदोलन के स्थगित हो जाने पर भगत सिंह गुरुद्वारा आंदोलन में भाग लेने लगा था। इस आंदोलन में भाग लेने वाले क्रांतिकारियों के प्रतिश्रध्दा के कारण और इस आंदोलन में भाग ले सकने का अवसर पाने के लिए उस ने भी सिर पर केश रखा लिए थे। वह अकाली बन कर काली पगड़ी पहनने और कृपाण भी रखने लगा था। इन दिनों और भी अनेक हिंदू युवक सिख और अकाली सज गए थे। काली पगड़ी युवकों में फैशन ही बन गई थी। कृपाण के प्रति भगत सिंह की श्रध्दा इसलिए थी कि कृपाण के आधार पर सरकार द्वारा लगाये हुए प्रतिबंध का विरोध करने के लिए सिखों ने 'कृपाण-आंदोलन' चलाया था और सिख लोग तीन फीट लम्बी तलवारें हाथ में लिए कानून भंग करते थे।
      जब भगत सिंह नेशनल कालिज में पहुंचा, वह नियम से काली पगड़ी ही बांधता था परंतु गुरुद्वारा आंदोलन समाप्त हो चुका था। अब काली पगड़ी सांप्रदायिकता का ही चिह्न बन गई थी। भगत सिंह का काली पगड़ी बांधने का नियम धीरे-धीरे शिथिल हो गया। गुरुद्वारा आंदोलन में सिखों के सफल हो जाने पर उन में सांप्रदायिक संकीर्णता का अहंकार और रूढ़िवाद जोर पकड़ने लगे थे। नवयुवकों और भगत सिंह को अकाली संगठन से विरक्ति होने लगी थी। उन दिनों वह कभी भी गुरुद्वारे में नहीं जाता था।

सोमवार, 28 मार्च 2011

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -1-यशपाल


                 ( क्रांतिकारी और महान कथाकार स्व.यशपाल)
 मैं यह कहानी व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर लिख रहा हूं। भगत सिंह, सुखदेव और मैं कालिज के सहपाठी थे। भगवतीचरण हम लोगों से दो बरस आगे थे। सहपाठी ही नहीं, हम लोगों में विशेष आंतरिकता भी थी। इस आंतरिकता का भी कुछ कारण रहा होगा। इस आंतरिकता द्वारा मैं उन लोगों की परिस्थितियों को भी जान सका हूं।
      भगत सिंह का पारिवारिक घर लाहौर से लगभग कुछ मील दूर सांडा गांव में था। सुखदेव लायलपुर का रहने वाला था। भगवतीचरण वोहरा लाहौर के ही रहने वाले थे। मेरे परिवार का आदिम स्थान तो कांगड़े का पहाड़ी जिला है परंतु पंजाब नेशनल कालिज में मैं फिरोजपुर से गया था। लाहौर के पंजाब नेशनल कालिज में, जहां कि एच.एच.आर.ए. की प्रथम धूनी सुलगी, हम लोगों का आकर मिल जाना जैसी परिस्थितियों में संभव हुआ और जिन प्रवृत्तियों के कारण हम लोग एक दूसरे की ओर आकर्षित हुए या हमने एक दूसरे में कुछ ऐसी बात विश्वास के योग्य पाई जिसके कारण जिंदगी-मौत के खेल में साथी बन गए।
      सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन के जिस काल से मेरा व्यक्तिगत संबंध रहा है उसमें भगत सिंह का स्थान महत्वपूर्ण था। क्रांति की चेष्टा या राजनीतिक बातों के अलावा भी सहपाठी और मित्र के रूप में भगत सिंह की संगति में बहुत बड़ा आकर्षण था। वह स्वयं बहुत विनोदप्रिय होने के साथ-साथ दूसरों के लिए विनोद का अच्छा खासा साधन भी बन सकता था। भगत सिंह के उस समय के रूप और उसके वर्तमान ऐतिहासिक महत्व और स्थान में बहुत अंतर है। भगत सिंह के जो सुघड़ और चुस्त चित्र हैट पहने और मूंछ मुर्री दिए आज जगह-जगह दिखाई देते हैं, उनसे भगत सिंह के उस समय के रूप और व्यवहार की कल्पना नहीं की जा सकती। कद लंबा और चेहरे का रंग साफ होने पर भी हल्की-हल्की दाढी-मूंछ से घिरा चेहरा परंतु हल्की भवें और छोटी-छोटी आंखें। सिर पर ढीले-ढाले बांधे केशों पर दोनों ओर लटकती  छोटी-सी पगड़ी। खद्दर के मैले और प्राय: शरीर से बेनाप कपड़े। कमर में अक्सर पायजामे की जगह लुंगी पहन कर ही वह कालिज आ जाता। हम लोगों का सहपाठी झंडा सिंह उस की आंखों की उपमा लड्डू में चिपके बादामों से और उसके रूप की उपमा जवान अल्हड़ बोते (ऊंट) से दिया करता था।     
दूसरी और समय आने पर उसी भगत सिंह का रूप और करतूत दोनों ही ऐसे निखरे कि उसे फांसी दी जाने के समाचार की पहली चोट जब हल्की पड़ गयी तो उस अनिवार्य चोट को सह्य मजाक बना डालने के लिए पंजाब की एक प्रमुख महिला कह बैठीं- 'आज जाने देश की कितनी महत्वाकांक्षी कुमारियों के हृदय विधवा हो गए होंगे।' भगत सिंह देश के युवक-युवतियों के स्वप्नों का आदर्श बन गया था। लोग उस के रूप को भी उसकी कीर्ति की छाया में ही देखने लगे। कालिज के दिनों में भगत सिंह को बुध्दू बनाने में मजा आता था। मैं स्वयं भी काफी बुध्दू बनता रहा हूं। हम सभी को किसी न किसी समय बुध्दू बनना ही पड़ता था। एक समय खिलवाड़ का साधन भगत सिंह अपनी कर्मशीलता और निष्ठा से आज गौरव का कारण बन गया है। इसके अतिरिक्त कितनी ही रहस्यमय दंतकथाओं ने भी भगतसिंह की स्मृति को लपेट लिया है।
      आखिर भगत सिंह के हृदय में क्रांति की भावना और प्रवृत्ति इतनी उग्र क्यों थी? यहां क्रांति की भावना और शूरवीरता या साहस को अलग-अलग रखकर बात करना चाहता हूं। भगत सिंह क्यों विशेष बेचैन और उग्र जान पड़ता था... ? मैं समझता हूं इसके कारण उस की परिस्थितियों में खोजे जा सकते हैं।
      भगत सिंह के अधिकांश चित्रों में सिर पर केश पगड़ी नहीं हैट दिखायी देता है। नाम में 'सिंह' जुड़ा रहने से पंजाब से बाहर के लोग उसे प्राय: राजपूत ठाकुर समझ लेते हैं। भगत सिंह का जन्म सिख परिवार में हुआ था। अब तो शायद उसके छोटे भाइयों में से किसी के भी सिर पर केश नहीं हैं। सिख संप्रदाय में भी हिंदुओं की तरह ब्राह्मणों और खत्रियों की कई उपजातियां हैं। भगत सिंह का परिवार साधारण किसान था, जिसे जाट कहा जाता है। भगत सिंह और उनके पिता सरदार किशन सिंह के नाम के साथ सरदार की उपाधि जुड़ी देख कुछ लोग इस शब्द को उनके वंश की उपाधि ही समझ लेते हैं। ऐसी कोई बात नहीं है। पंजाब में प्रत्येक सिख सरदार पुकारा जाता है ठीक वैसे ही जैसे कि निरक्षर ब्राह्मण भी पंडित पुकारे जाते हैं। भगत सिंह को कभी किसी ऐतिहासिक पुरातन महापुरुष से अपने वंश का संबंध जोड़ने का गर्व करते नहीं सुना।
      भगत सिंह के परिवार का संप्रदाय सिख था परंतु सिख सांप्रदायिकता के प्रति इस परिवार में कोई रूढ़िवादी आस्था नहीं थी। भगत सिंह के पिता से मेरा घनिष्ट परिचय रहा है। उसके दादा को भी जानता हूं। सिर पर केश होने के बावजूद यह लोग सिख की अपेक्षा आर्यसमाजी ही अधिक थे। भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह तो सामाजिक प्रश्नों पर सांप्रदायिकता की उपेक्षा कर उन्हें केवल राजनैतिक दृष्टि से ही देखते थे। कांग्रेस में वे रहे तो सदा ही परंतु रहे असंतुष्ट आलोचक के रूप में वामपक्ष की ओर। सरदार किशन सिंह, आर्यसमाज के समाज-सुधार के कार्यक्रमों में काफी दिलचस्पी रखते थे। लाहौर में आर्यसमाज का वार्षिक उत्सव होन पर वहां अवश्य दिखाई दे जाते। यह शायद इसलिए कि पुराने सहयोग के कारण आर्यसमाज के कार्यकर्ताओं से उन के व्यक्तिगत संपर्क चले आते थे। किसी सांप्रदायिक अनुष्ठान, पूजापाठ, हवन-  संध्या के प्रति उन में रुचि नहीं देखी। दादा अर्जुन सिंह जी जरूर धार्मिक अनुष्ठान के प्रति निष्ठा रखते थे परंतु किस अनुष्ठान के प्रति?
      सन् 1925 के जाड़ों की बात है। सरदार किशन सिंह जी एक इन्श्योरेंस कंपनी की एजेंसी कर रहे थे। उनका दफ्तर लाहौर में लुहारी दरवाजे के भीतर बाजार में दुमंजिले पर था। जब यह जगह मौजूद थी तो भगत सिंह के मित्रों को कोई दूसरा मकान किराये पर लेने की जरूरत क्या थी? उस समय जोरू-जाता किसी के था ही नहीं। सरदार किशन सिंह जी एजेंसी तो जरूर लिए थे परंतु उन दिनों अधिक धन कमा सकने की आशा में उनकी रुचि खेती और दूध विक्रय की ओर ही अधिक थी। वे प्राय: सांडा गांव में रहते थे। एजेंसी का यह दफ्तर हम लोगों के लिए आराम का डेरा बना हुआ था।
      मैं उन दिनों लाहौर के नेशनल स्कूल में पढ़ा रहा था। नेशनल कालिज समाप्त होकर केवल नेशनल हाईस्कूल ही रह गया था। भगत सिंह अनिच्छा से थोड़ा बहुत समय घर के कारोबार में लगाता, शेष समय पढ़ता और गुप्त संगठन के लिए भूमि तैयार करने में लगा रहता। सुखदेव कभी लायलपुर अपने घर चला जाता। वहां उसके परिवार ने उसे आटे की एक चक्की लगवा दी थी। लाहौर आता तो भगत सिंह के साथ ही बना रहता। हमारे सहपाठी झंडा सिंह और जयदेव गुप्त भी वहीं रहते थे। झंडा सिंह 'गांधी खद्दर भंडार' में काम कर रहा था और उसी में जुटा रहा। जयदेव गुप्त सरदार के बीमे के काम में सहयोग दे रहा था। खाना हम लोग किसी तंदूर पर खा लेते और दफ्तर में बिछी दरी पर बिस्तरा लगा कर रात काट देते। दफ्तर में मेज-कुर्सी मौजूद होने से पढ़ने लिखने की भी सुविधा थी।
      एक दिन स्कूल में छुट्टी थी। दूसरे लोग मकान पर मौजूद नहीं थे। मैं अपनी सनक में मेज पर बैठा कोई लेख या कहानी लिख रहा था। मेज के नीचे टीन की क्या चीज पड़ी है, यह खयाल न कर उस पर जूते जमा कर रख लिए थे। संभव है अचेतन रूप से यही धारणा रही हो कि रद्दी की टोकरी के तौर पर कोई डिब्बा है। लिखते समय विचारों को ठेलने के लिए मेज के नीचे उस टीन की चीज को जूते से एड़ दिए जा रहा था।
      जीने पर भारी कदमों से धम-धम करते हुए एक वृध्द सिख सज्जन अपने ग्रामीण वेश में ऊपर दफ्तर में आ गए। मैंने एक दफे नजर उठा कर उनकी ओर देखा और लिखने में तन्मय रहा। सरदारजी के ऐसे अनेक संबंधी गांवों से आते-जाते रहते थे। इन सज्जन की दाढ़ी खूब प्रशस्त, बर्फ की तरह श्वेत और चेहरा खूब तेजोमय गुलाबी रंग का था। मैंने उन की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। आगंतुक भी मुझ से आदर की प्रतीक्षा न कर एक कुर्सी खींच कर चुपचाप दीवार के पास बैठ गए। मैं मालिक बना बैठा लिखता रहा और मेज के नीचे टीन की चीज पर जूते की ठोकरें भी जमाता रहा।
      अचानक वजनी गालियों से भरी एक करारी डांट सुन कर आंख उठा कर देखा कि वयोवृध्द भव्य मूर्ति की आंखें लाल और चेहरा क्रोध से तमतमा उठा है और वे हाथ में थमी लाठी को फर्श पर ठोक रहे हैं।
      ''गधा, उल्लू, नास्तिक, बदमास, सिर तोड़ दूंगा...।'' उन के हाथ की लाठी मेरे सर पर पड़ा ही चाहती थी। वृध्द ने अपने आवेश को कठिनता से वश में कर मेज के नीचे संकेत करते हुए फटकारा ''उल्लू, यही तेरी तमीज है?''
      मेज के नीचे झांक कर देखा तो अपने जूतों के बीच पाया एक औंधा पड़ा हवनकुंड। सब कुछ समझ में आ गया। उपेक्षा के कारण पहचानने में भूल हुई थी। भगत सिंह से सुन रक्खा था कि दादा जी नित्य हवन करते हैं। जहां जाते हैं, पोटली में हवनकुंड और हवन सामग्री साथ बांध ले जाते हैं।
      भगत सिंह के दादा सरदार अर्जुन सिंह की सांप्रदायिक आस्था वैदिक कार्य के आर्यसमाजी ढंग की थी। सिख परिवार में पैदा होकर, भगवान द्वारा सिर पर लाद दिए गए संप्रदाय की अवहेलना करके जो व्यक्ति अपनी बुध्दि से किसी दूसरे संप्रदाय को तर्क संगत समझ कर स्वीकार कर लेता है, वह प्रकृति से विचार स्वतंत्राता चाहने वाला और अपने ज्ञान की सीमा तक क्रांतिकारी ही होगा। भगत सिंह की इस पारिवारिक परिस्थिति का प्रभाव उसके मानसिक विकास पर पड़ना अनिवार्य था। सरदार अर्जुन सिंह न केवल व्यक्तिगत रूप से ही अपने धार्मिक विचारों के अनुसार आचरण करते थे बल्कि अपने गांव में भी बिरादरी और बस्ती के विरोध की परवा न कर आर्यसमाज का जलसा और प्रचार करने के लिए लोहा लेते रहते थे।
      भगत सिंह के परिवार का पुराना स्थान पंजाब के होशियारपुर जिले में था। चिनाब नदी की नहर बन जाने पर लायलपुर के रेतीले जिले में नई बस्ती बसने लगी। यह लोग अपने पैतृक स्थान में खेती की भूमि का अभाव अनुभव कर लायलपुर के एक गांव में आ बसे।
      भगत सिंह से इस गांव की एक बड़ी विचित्रा घटना सुनी। दादा अर्जुन सिंह जी के गांव की भूमि तम्बाकू की उपज के लिए बहुत अनुकूल है परंतु गांव में पूरी आबादी सिखों की होने के कारण वहां तम्बाकू की खेती नहीं होती थी। सरदार अर्जुन सिंह इस रूढ़िवाद या कुसंस्कार को कब तक सहते जाते? उन्होंने अपने खेतों में तम्बाकू बो दिया। गांव भर में पंचायतें हुर्इं पर वे डटे रहे। फसल तैयार हो जाने पर तम्बाकू घर में जमा भी कर लिया। खेतों तक तम्बाकू का रखना एक बात थी पर उसका एक सिख के घर में रख लिया जाना सिख बिरादरी किसी तरह न सह सकती थी। सरदारजी को बिरादरी से अलग कर दिया गया। सिख बिरादरी में हुक्के का तो प्रश्न ही नहीं उठता इसलिए सरदारजी का पानी और उनसे व्यवहार बंद  हो गया। सरदारजी अपनी बिरादरी को तर्क द्वारा समझाने की विफल चेष्टा करते रहे।
      एक दिन उस तम्बाकू का ग्राहक भी आ पहुंचा। तम्बाकू बिक गई। मुनाफा घर में आ गया। अब सरदारजी ने बिरादरी से कहा ''मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूं कि मैंने अति अपवित्र वस्तु को छुआ और अपने घर में रखा परंतु अब वह मेरे घर से निकल  चुकी है। घृणित से घृणित वस्तु को छू कर भी सफाई कर लेने से मनुष्य पवित्र हो जाता है। गुरुओं की आज्ञा है कि कोई व्यक्ति, अछूत या मुसलमान भी 'अमृत छक' कर सिख धर्म में दीक्षित हो सकता है। आप जिस तरह कहें, मैं अपने मकान की शुध्दि करने को तैयार हूं।'' सरदारजी फिर बिरादरी में शामिल हो गए। अपने मित्रों को उन्होंने समझाया ''जहां तर्क नहीं चलता वहां उदाहरण काम देता है। मेरी बिरादरी के सामने यह उदाहरण तो है कि तम्बाकू जैसे निषिध्द पदार्थ को छू लेने वाला व्यक्ति भी गुरुओं की आज्ञा द्वारा फिर पवित्र हो सकता है। इतनी सी बात पर मैं आयु भर के लिए बिरादरी से अलग हो जाऊं यही क्या तर्कसंगत है?''
      उपरोक्त घटना से यह स्पष्ट है कि रूढ़िवाद से मुक्त पारिवारिक वातावरण में भगत सिंह ने तर्क, विद्रोह और साहस की दीक्षा स्वाभाविक रूप से पाई थी। भगत सिंह के परिवार की आर्यसमाज के प्रति अनुरक्ति विचार-स्वतंत्रता और क्रांति की ओर प्रवृत्ति के कारण ही थी। आज आर्यसमाज के आंदोलन और संगठन ने मठ और रूढ़िवाद का जैसा रूप धारण कर लिया है, उससे उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के आरंभिक काल के आर्यसमाजियों की भावना का अनुमान ठीक-ठीक नहीं हो सकता; जैसे कि आज अमरीकन और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की ईसाइयत को देख कर रोमन साम्राज्य के समय ईसाई धर्म द्वारा किए गए परलोक के विश्वास के सहारे नीरु के दमन और अत्याचार के विरुध्द लड़ने वाले ईसाई दासों और गरीब इसाई लोगों की मनोभावना का अनुमान नहीं किया जा सकता।
      उस समय भी आर्यसमाजी आंदोलन का रूप सांप्रदायिक जरूर था। वह वैदिक धर्म पुन: स्थापना की घोषणा करता था। वैदिक धर्म की पुन: स्थापना की पुकार का अर्थ मुख्यत: हिंदू संप्रदाय को असंगत, रूढ़ियों, कुसंस्कारों और मिथ्या विश्वासों से मुक्त करना था। उसका कार्यक्षेत्रो सांप्रदायिक सीमाओं के भीतर प्रगतिवादी और क्रांतिकारी भी था। उस समय आर्यसमाज के आंदोलन का विशेष रुझान सामाजिक समस्याओं की ओर था। शिक्षा-प्रचार, विधवा-विवाह, जन्म से वर्ण-व्यवस्था की धारणा को तोड़ना और अछूत समझी जाने वाली जातियों के लिए मनुष्यता के अधिकारों की मांग इस आंदोलन के प्रमुख भाग थे। इन प्रगतिशील भावनाओं का स्वाभाविक परिणाम विदेशी दासता से असंतोष भी हुआ। सामाजिक प्रगति के पथ पर कदम रखने से व्यक्ति राजनैतिक दृष्टि से सचेत हुए बिना नहीं रह सकता। यही कारण था कि पंजाब में आर्यसमाज द्वारा सामाजिक  सुधार की चेतना फैलने के साथ-साथ ही विदेशी दासता के विरोध की चेतना भी फैलने लगी। उस समय पंजाब के प्राय: सभी राजनैतिक कार्यकर्ता लाला हरदयाल, अम्बाप्रसाद सूफी, लाला लाजपत राय और अजीत सिंह आदि 'आर्यसमाजी विचार स्वतंत्रता' द्वारा प्रभावित थे। 1914-1915 लाहौर षडयंत्र के मामले में भाई परमानंदजी आदि भी आर्यसमाज की प्रगतिशील चेतना की ही उपज थे।(क्रमशः)

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