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सोमवार, 18 जनवरी 2010

'बसु के जाने से राजनीति का एक अध्याय समाप्त हो गया'





17 Jan 2010, 1534 hrs IST,भाषा  
 पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु के निधन पर गहरा शोक जताते हुए कहा 
कि बसु के निधन से राजनीति का एक अध्याय समाप्त हो गया। वाजपेयी ने बसु को कुशल प्रशासक और जुझारू राजनीतिक कार्यकर्ता बताते हुए कहा कि वह कर्मठ व्यक्तित्व के धनी थे।

अपने शोक संदेश में पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि ज्योति दा ने पश्चिम बंगाल में न केवल सर्वाधिक समय तक शासन करने वाले मुख्यमंत्री का रेकॉर्ड बनाया, बल्कि अनेक दूरगामी कदम उठाए। वह अपने विचारों के प्रति अडिग और उसके लिए संघर्ष करने वालों में से थे। वह अपने परिश्रम से मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे थे।

उन्होंने कहा कि बसु के जाने से राजनीति का एक अध्याय समाप्त हो गया है। मैं उनके प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। मैं परमात्मा से प्रार्थना करता हूं कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे और उनके परिजनों व सहयोगियों को यह असीम दु:ख सहने की शक्ति दे।


बसु के निधन पर आंसुओं में डूब गया कोलकाता



 

सीपीएम के कद्दावर नेता ज्योति बसु के निधन की खबर जैसे ही फैली, पूरा कोलकाता गम के सागर में डूब गया और लोग अपने दिवंगत नेता को आख
िरी श्रद्धांजलि देने के लिये अस्पताल में उमड़ पड़े। कई लोगों को आंसुओं में डूबे हुए देखा जा सकता था। फिल्म ऐक्टर मिथुन चक्रवर्ती भी भीड़ में अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश करते नजर आए।

सीपीएम पोलित ब्यूरो के सदस्य और राज्य सचिव विमान बोस अस्पताल से भावुक होकर दोपहर 12 बजकर 12 मिनट पर बाहर निकले और 96 वर्षीय बसु के निधन की घोषणा की। उन्होंने कहा कि एक बुरी घोषणा करनी है। हमारे प्रिय नेता ज्योति बसु नहीं रहे।

इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम, मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी और कई वाम नेता अस्पताल पहुंचे। सीपीएम महासचिव प्रकाश करात और वृंदा करात भी वहां मौजूद थे।

सॉल्ट लेक स्थित अस्पताल की ओर जाने वाला रास्ता भी पुलिस ने यातायात के कारण बंद कर दिया। वहां बड़ी संख्या में गाड़ियां जमा हो गई थीं। (नवभारत टाइम्स)

कष्ट और कुर्बानी से बने थे ज्योति बाबू




आम आदमी की जिंदगी जीना सबसे मुश्किल काम है। अभिजन परिवार में पैदा होने और सुखों से भरी जिंदगी छोड़ने की किसी की इच्छा नहीं होती। खासकर इन दिनों सभी रंगत के राजनीतिक दलों में सुख और वैभव के साथ राजनीति करने की होड़ मची है । ऐसी अवस्था में ज्योति बाबू का चले जाना क्रांतिकारी कतारों को तो बड़ा झटका है ही। साथ ही देश की स्वच्छ राजनीति के लिए भी गहरा झटका है।
    ज्योति बाबू सही अर्थ में गांधी के दरिद्र नारायण के प्रतीक पुरुष थे। उनके व्यक्तित्व में भारत के मजदूरों का बिंब झलकता था। भारत में महात्मा गांधी ने राजनीति को जहां छोड़ा था ज्योति बाबू ने देश की राजनीति को उस बिंदु से आगे बढ़ाया। गांधी ने भारत की आजादी की जंग में प्रेरक प्रतीक की भूमिका अदा की थी ,साम्प्रदायिकता को रोकने की प्राणपण से चेष्टा की थी,राष्ट्र के सम्मान और जनता के हितों की रक्षा करने के लिए अपने जीवन के समस्त सुखों को त्याग दिया था, ठीक यही प्रस्थान बिंदु है जहां से ज्योति बाबू अपनी कम्युनिस्ट जिंदगी आरंभ करते हैं।
     लंदन से बैरिस्टरी पास करके भारत आने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के पूरावक्ती कार्यकर्त्ता का जीवनपथ स्वीकार करते हैं। उल्लेखनीय है  ज्योति बाबू के यहां दौलत की कमी नहीं थी, गरीब मजदूरों -किसानों की सेवा के लिए उन्होंने सादगीपूर्ण जीवनशैली अपनायी। सादगी और कष्टपूर्ण जीवन का मंत्र उन्हें मजदूरों से मिला था। अभिजनवर्ग के स्वभाव ,वैभव,मूल्य और राजनीति का विकल्प गरीबों के जीवन में खोजा, जिस समय राजनेता गांधी की विचारधारा के पीछे भाग रहे थे उस समय ज्योति बाबू गरीबों के हितों और सम्मान की रक्षा के लिए खेतों -खलिहानों से लेकर कारखाने के दरवाजों पर दस्तक दे रहे थे। गांधी की राजनीति खेतों और कारखानों के पहले खत्म हो जाती थी जबकि ज्योति बाबू की राजनीति वहां से आरंभ होकर संसद-विधानसभा के गलियारों तक जाती थी।
  ज्योति बाबू ने सही अर्थों में गरीब और संसद के बीच में सेतु का काम किया था। गरीबों के बोध में जीकर ज्योति बाबू ने अपने मार्क्सवादी सोच को परिष्कृत किया था। कल बांग्ला चैनल स्टार आनंद पर साक्षात्कार में पश्चिम बंगाल के भू.पू. मुख्यमंत्री सिद्धार्थशंकर राय ने कहा वे ज्योति बाबू के घर नियमित आते -जाते थे। साथ ही रसोईघर में भी जाते थे , उन्होंने कहा मैंने कभी उनके यहां मांस-मछली का खाना बनते हुए नहीं देखा। उस समय ज्योति बाबू विधायक थे, और आधा विधायक भत्ता पार्टी ले लेती थी। भत्ता भी कम मिलता था। आधे भत्ते में ज्योति बाबू किसी तरह गुजारा करते थे। एकदिन सिद्धार्थशंकर राय ने प.बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री विधानचन्द्र राय से कहा कि ज्योति बाबू बेहद कष्ट में जीवनयापन कर रहे हैं ,उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बना दीजिए और भत्ता भी बढ़ा दीजिए ,उन्होंने तुरंत ज्योति बाबू को विपक्ष का नेता बना दिया और भत्ता बढ़ाकर 750 रुपये कर दिया। ज्योति बाबू ने यह भत्ता कभी नहीं लिया। और कष्टमय जीवन जीना पसंद किया। सिद्धार्थशंकर राय ने कहा कि ज्योति बाबू ने सारा जीवन कष्ट और कुर्बानी देकर गुजारा। उनके जैसा बेहतरीन इंसान होना असंभव है।  

रविवार, 17 जनवरी 2010

ज्योति बसु की मृत्यु - भारतीय साम्यवाद के स्वर्णयुग का अंत




    ज्योति बाबू ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में जो काम किए वैसे मुश्किल काम सिर्फ समाजवाद में संभव माने जाते थे। मसलन् पश्चिम बंगाल में व्यापक स्तर पर भूमिसुधार कार्यक्रम लागू किया गया। पश्चिम बंगाल के अलावा जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला और केरल में ईएमएस नम्बूदिरीपाद को भूमिसुधार राज्यस्तर पर लागू करने का श्रेय जाता है।
   ज्योति बाबू के व्यक्तित्व में बंगाली अभिजन और मार्क्सवादी संस्कारों का विलक्षण मिश्रण था। उनका व्यक्तित्व जन और अभिजन के साझा रसायन से बना था। इसके कारण उनकी जन-अभिजन दोनों के प्रति लोचदार और सामंजस्यवादी समझ थी। अपने इसी लचीले स्वभाव को उन्होंने राजनीति के नए संसदीय मार्क्सवाद में रुपान्तरित कर लिया था। उन्हें संसदीय मार्क्सवाद का दादागुरु माना जाता था। संभवत: सारी दुनिया में ज्योति बाबू अकेले कम्युनिस्ट थे जिनसे संकट की घड़ी में सभी रंगत के पूंजीवादी नेता सलाह लेते थे।
   ज्योति बाबू की इमेज के निर्माण में उनकी सादगीपूर्ण जीवनशैली की केन्द्रीय भूमिका थी। अमीर खानदान में पैदा होने और शानदार अभिजन सुलभ उच्च शिक्षा पाने के बावजूद उन्होंने अमीरों के भवनों में रहने और अमीरों की राजनीतिक सेवा करने की बजाय कम्युनिस्ट पार्टी का होल टाइमर होना पसंद किया। संपत्ति और पूंजी के सभी प्रपंचों से दूर रखा। दूसरों के दुख और खासकर गरीबों के दुखों को अपने जीवन संघर्ष का अभिन्न हिस्सा बना लिया। इस प्रक्रिया में ज्योति बाबू का व्यक्तित्वान्तरण हुआ साथ ही कम्युनिस्ट पार्टी का भी चरित्र बदला, खासकर पश्चिम बंगाल में पार्टी का चरित्र बदलने में सफलता मिली। उन्होंने किसान की मुक्ति को प्रधान राजनीतिक एजेण्डा बनाया। 
     ज्योति बाबू ने सन् 1977 में पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री पद की जब कमान संभाली तो पार्टी पूरी तरह पूंजी और उद्योग के प्रति नफरत से भरी थी। इस मनोदशा को बदलने में उन्हें कठिन विचारधारात्मक संघर्ष से गुजरना पड़ा और आज समूची माकपा तमाम राजनीतिक दबाबों के बावजूद उद्योग के एजेण्डे पर सक्रिय है।
  ज्योति बाबू ने भारत के कम्युनिस्टों को लोकतंत्र के दो प्रमुख मंत्र सिखाए किसान और उद्योग की सेवा करो। देशहित और जनहित को पार्टी हितों के ऊपर रखो। पार्टी अनुशासन को मानो और मार्क्सवाद और लोकतंत्र के विकास के लिए विकल्पों पर नजर रखो, कभी विकल्पहीनता में मत रहो, विकल्प जहां से भी मिलें उन्हें सामूहिक फैसले के जरिए लागू करो।          
   
               

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