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शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

उठो और जागोःसंवैधानिक मान्यताएं खतरे में हैं

         बिहार के घटनाक्रम को मात्र भ्रष्टाचार का मामला न समझें।नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार कई स्तरों पर संवैधानिक मान्यताओं और परंपराओं को नष्ट करने का काम कर रही है।अफसोस की बात है आम लोगों को यह नजर ही नहीं आ रहा।हो सकता है लालू यादव के परिवार ने भ्रष्टाचार किया हो लेकिन उससे लड़ने और निबटने के लिए महागठबन्धन को तोड़ना तो गले नहीं उतरता।

महागठन्धन जब बना था तब भी बिहार और लालू के परिवार में भ्रष्टाचार था,लेकिन एक अंतर था,महागठबंधन का निर्माण साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए किया गया था।उसके उद्देश्यों में कहीं पर भ्रष्टाचार का जिक्र नहीं है।लेकिन बिहार में चीजें जिस तरह संचालित की गयी हैं, न्यायपालिका की देश में जिस तरह खुली अवहेलना हो रही है, संसदीय मर्यादाओं को ताक पर रखकर जिस तरह हंगामे किए जा रहे हैं,मीडिया को सत्य और विवेक की हत्या के लिए जिस तरह नग्नतम रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है वह अपने आपमें विरल घटना है।

बिहार में जदयू का महागठबंधन से निकलकर भाजपा के साथ सरकार बनाना ,कोई साधारण घटना नहीं है।यह घटना संकेत है कि संसदीय लोकतंत्र और जनादेश की हमारे नेताओं में कोई इज्जत नहीं है। उल्लेखनीय है इस तरह की घटनाएं पहले भी हुई हैं लेकिन बिहार हर मामले में अजूबा है,इसबार समूचे जनादेश को ही पलट दिया गया । बिना दल-बदल के समूचे जदयू का स्वैच्छिक भाव से राजनीतिक मन परिवर्तन करके रख दिया गया है। मात्र कुछ एफआईआर के बहाने, कुछ छापों के बहाने यह सब हुआ है।इसका अर्थ यह भी है कि मोदी से लेकर नीतीश कुमार तक किसी के मन में जनादेश को लेकर कोई वचनवद्धता नहीं है।

असल में मोदीजी ने समूची राजनीति में पैसे और सत्ता की भूमिका को महानतम बना दिया है।इस भूमिका को आमलोगों के जेहन में उतारने में मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका है। मोदी फिनोमिना की सबसे बड़ी विशेषता है कि अब भाजपा कहीं पर आंदोलन नहीं करती, सिर्फ मीडिया हमले करवाती है, संगठित प्रचार अभियान चलाती है और उसके बाद लक्ष्य को निशाना बनाकर गिरा देती है।भाजपा की समूची रणनीति यह है कि हर हालत में भाजपा और मोदी का वैचारिक-प्रशासनिक वर्चस्व मानो।इसके लिए साम-दाम-दंड-भेद और मीडिया के हठकंड़ों का खुलकर प्रयोग हो रहा है।

भाजपा-मोदी का वर्चस्व स्थापित करने के लिए एक बात आम लोगों के जेहन में उतारी जा रही है कि ´मोदी सही और बाकी गलत´,मोदी की मानो,चैन से रहो।मोदी की मनवाने के लिए पहले प्यार से घूस देकर फुसलाया जाता है, बाद में मीडिया के कोड़े लगवाए जाते हैं,अंत में प्रशासनिक हमले होते हैं।मसलन्,यदि आप विपक्ष में हैं तो पहले भाजपा कोशिश करती है कि आप उसके साथ चले जाएं,यदि साथ नहीं जाते तो दल-बदल कराया जाता है, दल-बदल से भी मामला न संभले तो मीडिया हमले कराकर बदनाम किया जाता है, तब भी न संभले तो सीबीआई-आईडी आदि के छापे और मीडिया से अहर्निश बदनामी करके हर एक्शन को देशहित, ईमानदारी की रक्षा में,जनता की सेवा में समर्पित कर दिया जाता है।इस समूची प्रक्रिया में सत्य क्या यह महत्वपूर्ण नहीं रह जाता ,सिर्फ मीडिया में जो बताया गया है वह महत्वपूर्ण रह जाता है।मीडिया के जरिए दिमागों की इस तरह की नाकेबंदी ने हमारे सोचने-समझने और स्वतंत्र रुप से फैसले लेने की क्षमता पूरी तरह खत्म कर दी है।अब हम मीडिया में जो कहा जा रहा है उसे सत्य, न्याय, जनहित आदि के पैमानों पर नहीं परखते अपितु हमारी आदत हो गयी है कि मीडिया में जो कहा जा रहा उसे आँखें बंद करके मानने लगे हैं।

मोदी की मीडिया रणनीति की धुरी है ´घृणा´,कल तक हम मुसलमानों से नफरत कर रहे थे, विभिन्न किस्म के प्रचार अभियानों के जरिए इसे जेहन में उतारा गया,बाद में लवजेहाद के जरिए,कांग्रेस हटाओ-देश बचाओ,घृणा के तत्व के आधार पर कांग्रेस विरोधी प्रचार संगठित किया गया, घृणा के आधार पर पाकविरोधी, आतंकविरोधी प्रचार चलाया गया और अब घृणा के आधार पर ही तेजस्वी यादव और उनके परिवारीजनों के खिलाफ प्रचार अभियान चलाया गया। घृणा के आधार पर मोदी विरोधियों पर हमले किए जा रहे हैं।´घृणा´के आवरण के रूप में भ्रष्टाचार विरोध का इस्तेमाल किया गया, लेकिन मूल चीज है ´घृणा´।कहने का आशय यह कि ´घृणा´के बिना मोदी से प्यार पैदा नहीं होता। मोदी के गुण क्या हैं, मोदी ने कौन सा अच्छा काम किया है, ये चीजें मोदी प्रेम का आधार नहीं हैं बल्कि ´घृणा´ही मोदी प्रेम का आधार है। इस ´घृणा´को हम हर मसले पर मीडिया प्रस्तुतियों में सक्रिय भूमिका अदा करते सहज ही देख सकते हैं। मसलन् , मीडिया वाले गऊ गुंडई से लेकर तेजस्वी प्रकरण तक इसे साफतौर पर देख सकते हैं।यानी ´घृणा´का इतने व्यापक मॉडल के रूप में भारत में प्रयोग विगत ढाई हजार सालों में कभी नहीं देखा गया।हमारे यहां ´घृणा´थी लेकिन नैतिक रूप में। एक वैचारिक अस्त्र के रूप में मोदी ने इसका आविष्कार करके देश को गहरे संकट में डाल दिया है।अब हम गलत में मजा लेने लगे हैं,गलत हमें अच्छा लगने लगा है।यह ´घृणा´के मॉडल की सबसे बड़ी उपलब्धि है।´घृणा´के मॉडल की विशेषता है सभी किस्म के तर्क और विवेक का अंत। मोदी के व्यक्तित्व के सामने आज हम इस कदर अभिभूत हैं कि किसी भी चीज को वास्तव रूप में देखना ही नहीं चाहते।वास्तव से नफरत करने लगे हैं।





मंगलवार, 26 जुलाई 2016

लेखकों में पतित बनने की होड़

        इस समय हिन्दी के सत्ताधारी प्रगतिशील-कलावादी लेखक बड़े कष्ट में हैं।इन लेखकों की मुश्किल यह है कि वे वगैर राजनेता के संरक्षण के साहित्य-सेवा नहीं कर सकते।नामवर सिंह अपनी साहित्य टीम लेकर मोदीजी के पाले में चले गए हैं ।जबकि प्रगतिशीलों की दूसरी टीम जिसके मुखिया अशोक बाजपेयी हुआ करते हैं, वे नीतीश कुमार से मिले हैं, उनके सान्निध्य में साहित्य-रक्षा की कसमें ली गयी हैं, उनके साथ मंगलेश डबराल,अपूर्वानंद,विष्णुनागर,सीमा मुस्तफा,प्रिय दर्शन आदि मिले हैं, ये लोग राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प सुझाएंगे।

कायदे से लेखकों को इस तरह के राजनीतिक संरक्षण से बचना चाहिए।हम जानना चाहते हैं कि क्या जर्मनी के किसी लेखक ने हिटलर से लड़ने के लिए राजनीतिक संरक्षण मांगा थाॽ यह कौन सी राजनीति हो रही है कि लेखक को समाज में काम करने के लिए राजनीतिक संरक्षण चाहिए ! राजनीतिक संरक्षण वस्तुतः लेखक की गुलामी है । कम से कम नीतीश कुमार के बारे में यह साफ रहना चाहिए कि उनका कला-साहित्य-संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है।यदि वे साहित्य-कलाओं के प्रति इतने ही गंभीर होते तो बिहार की दुर्दशाग्रस्त अवस्था न होती। लेखक काम करना चाहते हैं तो करें स्वतंत्र रूप से काम।कौन रोक रहा है।लेकिन संरक्षण लेकर काम करना लेखक के लिए मुसीबतें पैदा करता है।

असल में नामवरसिंह और अशोक बाजपेयी में यह सत्ता का अघोषित बंटबारा है, नामवरजी आप मोदी को संभालें, मैं (अशोक बाजपेयी) गैर मोदी सरकारों को संभालता हूं। इस तरह के साहित्यिक श्रम-विभाजन से साहित्य-कला –संस्कृति का कोई भला होने वाला नहीं है।दूसरी बात यह कि नीतीश बाबू चाहते हैं अशोक मंडली दिनकर को केन्द्र में रखे।हम जानना चाहते हैं क्या दिनकर के साहित्यिक बोझ को भी आज उठाना सही होगा ॽ

बुधवार, 19 अगस्त 2015

नीतीश -मोदी और विभ्रम -


लोकतंत्र में विभ्रम निर्णायक हैं,जनता के वोट से लेकर दिमाग तक विभ्रम का खेल तूफान की तरह चलता है। मोदी से लेकर नीतीश तक सबके पास विभ्रम हैं। हम में से कोई भी रियलिटी देखना नहीं चाहता और रियलिटी पर बातें करना नहीं चाहता।
विभ्रम का सबसे ज्यादा असर हम मध्यवर्ग के लोगों पर होता है। हमें विभ्रम बड़े प्यारे हैं, हम विभ्रम में अहर्निश विचरण करना पसंद करते हैं।पहले मनमोहन सिंह के विभ्रम से घिरे थे अब मोदी के विभ्रमों में फंसे हैं।हम भूल जाते हैं कि समाज को विभ्रमों से ऊर्जा नहीं मिलती,बल्कि विभ्रमों का जितना दवाब होता है संकट उतना ही गहराता चला जाता है। विभ्रम का खेल देखें कि मनमोहन से नफरत करते थे लेकिन मोदी से प्यार करने लगे जबकि नीतियां वही हैं। बेकारी चरम पर है महंगाई रोज बढ़ रही है,सामाजिक असुरक्षा बढ़ी है,पाक से तनाव बरकरार है,घूसखोरी चरम पर है,सीबीआई के पास मनमोहन सिंह के जमाने की तुलना में मोदीशासन में ज्यादा करप्शन केस दर्ज हुए हैं, अदालतें चरमरा गयी हैं। लेकिन हम हैं कि विभ्रम में आनंदित हैं,मोदी-मोदी के नशे में मस्त हैं।
लोकतंत्र में विभ्रम संकट को नजरों से कुछ समय के लिए ओझल रखते हैं,लेकिन एक अवधि के बाद जब संकट सतह पर आ जाता है और हम असंतुष्ट होने लगते हैं शासकवर्ग नए विभ्रमों की सृष्टि करते हैं और हम फिर से आनंद में डूब जाते हैं और संकट भूल जाते हैं।
सोचिए रॉबर्ट बाड्रा के खिलाफ कोई केस क्यों नहीं हुआ अभी तक,जबकि मोदी खुलकर हमले कर रहे थे, शीला दीक्षित पर कोई केस नहीं हुआ जबकि केजरीवाल-मोदी दोनों ही हमले कर रहे थे, पश्चिम बंगाल में 34साल शासन करने वाले वामनेताओं के खिलाफ कोई करप्शन केस न तो राज्य सरकार ने किया न केन्द्र सरकार ने किया, जबकि ममता-मोदी दोनों ही आम जनता को वाम नेताओं के बारे में झूठी कहानियां सुना-सुनाकर व्यस्त करने,आनंदित करने में सफल रहे,वाम हार गया लेकिन सच तो नहीं बदला,सच यह है कि वामनेताओं का शासन बेदाग था।
लोकतंत्र को पुख्ता बनाना है तो विभ्रमों से बचो,बिहार के प्रसंग में मोदी फिर से विभ्रमों की वर्षा करने जा रहे हैं, इस रणनीति को समझने की जरुरत है। बिहार की सच्चाई को खुली आंख देखने की जरुरत है। जो सच है उसके आधार देखें।
सच यह है बिहार में पहले की तुलना अपराध कम हुए हैं, कम से कम मीडिया में विगत पाँच साल में अपराधों का कवरेज एकसिरे से कम हुआ है,सामाजिक टकराव की घटनाएं तकरीबन नहीं हुई हैं। सड़कों का जाल फैला है। यह सब ऐसी अवस्था में हुआ था जब बिहार का सिस्टम पूरी तरह बैठ गया था।
यह सच है कि बिहार में अभी भी बहुत कुछ होना बाकी है,नीतीश से आपके मतभेद हो सकते हैं,लेकिन नीतीश कुमार बेदाग नेता हैं।उनके खिलाफ न तो दंगा कराने का आरोप है और न भ्रष्टाचार के आरोप हैं। उनके बारे में कोई यह नहीं कह सकता कि वे कारपोरेट घरानों के बंधुआनेता हैं और उनके हितों के लिए काम कर रहे हैं। जबकि ये सारी बाते नरेन्द्र मोदी पर खरी उतरती हैं।
नीतीश कुमार के बारे में सबसे अच्छी बात यह है वह कभी काल्पनिक वायदे नहीं करते। अनर्गल नहीं बोलते,मुख्यमंत्री के रुप में नियमित ऑफिस जाते हैं,विधानसभा सत्र के समय सदन में रहते हैं। लेकिन नरेन्द्र मोदी के बारे में यह नहीं कह सकते, वे मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक हवा-हवाई की धुन में रहे हैं।
मूल बात यह विभ्रमों से बचो रियलिटी पर बातें करो। जो व्यक्ति दिल्ली की गद्दी पर बैठकर एक भी समस्या का डेढ़ साल में समाधान नहीं कर पाया उसे बिहार को सौंपने का अर्थ है बिहार को पुनःअपराधी गिरोहों के हवाले करना।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

भूखा किसान,नीतीश की जीत और मीडियाखेल

     बिहार में नीतीश बाबू विधानसभा चुनाव जीत गए लेकिन किसान पर कोई कृपादृष्टि किए बगैर। लालू यादव ने इसे एनडीए की रहस्यमय जीत कहा है। एनडीए ने अपने प्रचार में मीडिया फ्लो को ध्यान में रखकर मध्यवर्गीय एजेण्डे को केन्द्र में रखा था। सवाल उठता है एनडीए और खासकर नीतीश कुमार जैसे पुराने समाजवादियों को बिहार में चुनाव लड़ते हुए किसानों की समस्याएं नजर क्यों नहीं आईं ? मीडिया के तथाकथित कवरेज से बिहार का किसान क्यों गायब था ? बिहार के विभिन्न जिलों से आने वाले किसी भी टॉक शो में किसान को प्रधान एजेण्डा क्यों नहीं बनाया गया ? इसके कारण क्या हैं ? क्या बिहार के विकास का कोई भी नक्शा किसान को दरकिनार करके बनाया जा सकता है ? जी नहीं। लेकिन मीडिया में एनडीए के चतुर खिलाडियों ने यही ज्ञान बांटा है बिहार तरक्की पर है और एनडीए उसके कारण ही जीता है। यह प्रचार है इसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।
    जरा बड़ी तस्वीर पर नजर ड़ालें तो चीजें साफ दिखने लगेंगी। टेलीविजन विज्ञापनों में खाना खाता किसान नजर नहीं आता। आमतौर पर मध्यवर्ग के बच्चे,औरतें और पुरूष खाना खाते या पेय पदार्थ पीते नजर आते हैं। चॉकलेट खाते नजर आते हैं। मैगी खाते नजर आते हैं। मध्यवर्गीय सुंदर रसोई नजर आती है। होटल के कुक नजर आते हैं। मध्यवर्गीय औरतें खाना बनाने की विधियां बताती नजर आती हैं लेकिन किसान औरतों का चूल्हा और खाना बनाने की विधियां नजर नहीं आती।  
   टेलीविजन या मीडिया में किसान की कभी-कभार आत्महत्या की खबर आती है। स्वाभाविक खबरें नहीं आतीं। किसान को हमने भूख के साथ जीना सिखा दिया है और मीडिया भी इस काम में सक्रिय भूमिका अदा कर रहा है। महान किसान नेता सहजानंद सरस्वती ने लिखा है ‘‘अमीर और जमींदार लोग, कानून की पाबन्दी और उस पर अमल कराने वाले लोग और जो लोग कानून बनाते हैं उनसे,  सभी से यदि कहा जाए कि भूखे रहकर यह काम कीजिए तो धीरे से सलाम करके चट हट जाएँगे। साफ कहेंगे कि बाबा,   यह काम हमसे न होगा। लीजिए हमारा इस्तीफा। नहीं-नहीं, भूखे रहना तो दूर रहे। जरा चाय न मिले, एक समय नाश्ता और जलपान न मिले तो भी उनके माथे में चक्कर आता है और बीमार पड़ जाते हैं। फलत: उनकी सारी ऐंठ और सारा कारोबार ही रुक जाता है।’’
      किसान की स्थिति इससे थोड़ा भिन्न है। उसकी भूख,उसकी सामाजिक-आर्थिक जरूरतें, उसकी राजनीतिक इच्छाएं आदि को मीडिया कभी व्यक्त नहीं करता। मीडिया कवरेज से लेकर राजनीतिक हंगामे तक कहीं पर भी बिहार का किसान और उसकी समस्याएं चर्चा के केन्द्र में नहीं थीं। विकास का तथाकथित एजेण्डा बुर्जुआ एजेण्डा है। किसान एजेण्डा नहीं है। प्रकारान्तर से बिजली,पानी,सड़क और कानून व्यवस्था के सवाल चर्चा के केन्द्र में थे। ये विश्व बैंक और विश्व की नामी वित्तीय संस्थाओं का सुझाया एजेण्डा है। इसमें भी दो कामों की ओर बिहार की नीतीश सरकार ने ध्यान दिया था। वह है सड़क निर्माण और कानून व्यवस्था । कानून व्यवस्था में आए सुधार का बहुत गहरा संबंध माफिया गिरोहों को सड़क निर्माण के धंधे में खपा देने के साथ है। माफिया गिरोहों में सत्ता की लूट का विभाजन बड़े ही कौशल के साथ किया गया है और तथाकथित सड़क निर्माण और ऐसे ही कार्यों में बाहुबलियों को स्थानांतरित कर दिया गया है। सरकारी खजाने की विभिन्न मदों में हुई लूट में हिस्सेदारी दे दी गयी है। इसका परिणाम यह निकला कि आम जनजीवन में कानूनभंजन की घटनाओं का ग्राफ तेजी से गिर गया। बाकी वोटों के प्रबंधन में सामाजिक समीकरण के गणित को लगा दिया गया।
    किसान को भूखा रखकर आई यह जीत कितनी बिहार के लिए भविष्य में कितनी सार्थक होगी यह तो भविष्य ही बताएगा। लेकिन एक बात तय है कि किसान की भूख को अभी बिहार में प्रमुख एजेण्डा बनना है। सहजानंद सरस्वती के शब्दों में कहें ‘‘लेकिन वही लोग उम्मीद करते हैं कि भूखों रहकर और दिन-रात खप-मर के किसान लगान और टैक्स चुकता करे सलामी और नजराना दे और सुन्दर-सुन्दर पदार्थ उन्हें भोग लगाने को मुहय्या करे ? किसान उनसे पूछता क्यों नहीं कि 'खुदरा फजीहत, दीगरे रा नसीहत?' आप लोग स्वयं तो जरा सी नाश्ते में देर बर्दाश्त नहीं कर सकते और घी-दूध के बिना काम ही नहीं कर सकते। तो फिर हमीं से वैसी आशा क्यों करते हैं ? हम भूखों रहके सब-कुछ गैरों के लिए उपजावें ऐसा क्यों सोचते हैं ? क्या आपका शरीर एवं दिल दिमाग खून मांस वगैरह से बना है और हमारा पत्थर और मिट्टी से कि हमारा काम यों ही चल जाएगा ? हमारे साथ आप भी भूखों रह के काम कीजिए। तब तो पता चलेगा कि लेक्चर और हुक्म देना कितना आसान है और भूख कितनी बुरी है। ऊँट को तभी पता चलेगा कि जितना आसान बलबलाना है, उतना पहाड़ पर चढ़ना नहीं है।’’
       सहजानंद सरस्वती ने लिखा है किसान का काम है कि वह कानूनी ढिंढोरा पीटने वालों से और उसका खून चूसने वालों से सीधा कह दे कि बिना कोयला-पानी के निर्जीव और लोहे का बना इंजिन भी काम नहीं करता और आगे नहीं बढ़ता, चाहे ड्राइवर मर जाए। यदि घोड़े को दाना और घास न दें और पानी न पिलाएँ। मगर पीठ पर सवार होकर कोड़े मारकर ही उसे चलाना और दौड़ाना चाहें तो यह असम्भव है। वह तो सिर्फ आगे बढ़ने से इन्कार ही नहीं करता, किन्तु अगले पाँवों को उठाकर खड़ा हो जाता और अपना शरीर बुरी तरह झकझोर के सवार को नीचे गिरा देता है। तब सवार को अक्ल आती है। फलस्वरूप चाहे घोड़े को और कोड़े भले ही लगें। मगर सवार की हड्डियाँ तो चूर हो ही जाती हैं। हम भी अब यही करेंगे यदि हमें दिक किया गया। हम तो पहले खाएँ-पिएँगे। पीछे और कुछ करेंगे।
बिहार में चूंकि नव्य उदार आर्थिक नीतियों को लागू किया जा रहा है तो जमीन-मकान-जायदाद के धंधे में उछाल आएगा। इससे स्थानीय  बाहुबलियों का वर्चस्व मजबूत होगा। नई सरकार तेजी से सेज प्रकल्पों की ओर भी बढ़ेगी इस सबसे प्राकृतिक असंतुलन और बढ़ेगा। अवरूद्ध विकास के कारण पहले से ही बिहार प्राकृतिक असंतुलन को झेल रहा है। प्राकृतिक तबाही झेल रहा है। आश्चर्य की बात है बिहार के सैंकड़ों लड़के पूरे देश में एनजीओ कर रहे हैं लेकिन बिहार के प्राकृतिक विनाश पर उनका ध्यान ही नहीं जाता।
      सहजानंद सरस्वती के शब्दों में बिहार के सामने तीन बड़ी समस्याएं हैं वे हैं हवा,   पानी और खाना। हवा बिना एक क्षण भी जिन्दा रहना गैर-मुमकिन है। इसलिए प्रकृति ने उसे सब जगह इफरात से बनाया है। बिना विशेष यत्न के ही वह सर्वत्र सुलभ है। सो भी जितनी चाहें उतनी। इस कदर सुलभ और ज्यादा है कि हम उसे यों ही गन्दा और खराब बनाते रहते हैं, बिना कारण के ही और प्रकृति को उसे शुद्ध बनाने के लिए न जाने कितने उपाय करने पड़ते हैं। मगर इतने से रंज हो के उसने हमारी जरूरत-भर हवा नहीं दी है और न जरूरत में कमी ही की है। जो जितना ही जरूरी है वह यदि उतना ही सुलभ और पर्याप्त हो, तभी काम चल सकता है। यही नियम इस बात से सिद्ध होता है।

   हवा के बाद स्थान है पानी का। यह हवा जितना जरूरी है नहीं। मगर भोजन से तो कहीं ज्यादा जरूरी है। पानी पीके कुछ दिन जिन्दा रह सकते हैं बिना खाये भी। इसीलिए पुराने लोगों ने पानी का नाम जीवन भी रखा है। यह पानी भी हवा जैसा सुलभ, सर्वत्र प्राप्य न होने पर भी जरूरत के लिए मिल ही जाता हैं। जहाँ ऊपर नहीं है वहाँ थोड़ी सी जमीन खोदने पर जितना चाहे पा सकते हैं। यों तो नदियाँ,   तालाब, झरने और मेघ उसे पहुँचाते ही रहते हैं। सहारा के रेगिस्तान और बीकानेर के तालुकामय मरुस्थली में भी ऊँटों और जंगली लोगों के लिए प्रकृति ने ऐसा सुन्दर प्रबन्ध कर दिया है कि आश्चर्यचकित होना पड़ता है। जहाँ पानी का पता नहीं। मेघ भी शायद ही कभी भूल-चूक से थोड़ा कभी बरस जाए। दिन-रात लू चलती रहती है। वहीं पर जमीन के थोड़ा ही नीचे मनों वजन के तरबूजे (मतीरे) होते हैं जो बारह महीने पाए जाते हैं। उनमें खाना और पानी दोनों हैं। वह इतने मीठे होते हैं कि कहिए मत। उनकी खेती कोई नहीं करता जमीन के भीतर ही उनकी लताएँ फैलती और फलती हैं। वहाँ के निवासियों के लिए यह प्रकृति का खास (special-arrengement) है।

    तीसरा नम्बर भोजन का आता है। रोशनी, मकान, कपड़े आदि के बिना भी हम जिन्दा रह सकते हैं। मगर भोजन के बिना कितने दिन टिक सकते हैं। जैसे-तैसे मर-जी के कुछ ही दिन के बाद जीना असम्भव है यदि खाना न मिले। इसीलिए सहारा और राजपूताने में जहाँ पेड़ नहीं हैं, प्रकृति का खास इन्तजाम खाने-पीने के बारे में बताया है। यह भी तो देखिए कि जब किसान या दूसरा आदमी नन्हा-सा बच्चा था और माता के पेट से अभी-अभी बाहर आया था, तो उसके खाने-पीने का प्रबन्‍ध पहले से ही था। माता के स्तनों में इतना मीठा दूध बिना कोशिश के ही मौजूद था कि खाने और पीने दोनों ही,  का काम करता था। पशुओं के लिए भी यही बात है। बच्चे कमा नहीं सकते और न हाथ-पाँव चला सकते हैं। इसलिए भगवान या प्रकृति ने खुद पहले से सुन्दर इन्तजाम कर दिया। जंगलों और पहाड़ों और सारी जमीन पर घास-पात और फल-फूल की, जड़ और मूल की इतनी बहुतायत है कि सभी पशु-पक्षी खा-पी सकते हैं। यहाँ तक कि किसान जब निरा बच्चा है तब तक वह अमृत जैसा माँ का दूध पीने को पाता है।

     मगर सयाना होने पर ? हाथ-पाँव चलाने और दिन-रात एड़ी-चोटी का पसीना एक करने पर ? उसका पेट नहीं भरता और भूखों मरता है। क्या यह बात समझ में आने की है ? लोग कहते हैं कबीर ने उल्टी बातें बहुत कही हैं, जैसे 'नैया बीच नदिया डूबी जाए' मगर क्या यह नैया बीच नदिया का डूबना नहीं है ? वर्तमान सामाजिक व्यवस्था ने अमन और कानून ने जो यह भूखों मरने की व्यवस्था कमाने वालों के लिए,  किसानों के लिए,  बना रखी है और जिसका समर्थन सारी शक्ति लगा कर किया जाता है, क्या वह प्रकृति को पसन्द है ? प्रकृति ने तो हवा, पानी, दूध आदि प्रचुर मात्रा में प्रस्तुत करके बता दिया है कि भोजन जैसी जरूरी चीज जरूरत-भर पाने का हर किसान को नैतिक अधिकार है, कुदरती हक है। मगर अभागा किसान समझे तब न ?















गुरुवार, 25 नवंबर 2010

बिहार के परिणाम- धुर दक्षिणपंथी विकास मॉडल का नया उभार

  बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम आ चुके हैं। इन परिणामों का भारत की भावी राजनीति के लिए बड़ा महत्व है। इन परिणामों ने पश्चिम बंगाल के वामनेताओं की बेचैनी बढ़ा दी है।  बिहार में नीतीशकुमार की जीत का प्रधान कारण है शांतिपूर्ण ढ़ंग से चुनावों का होना। पश्चिम बंगाल में भी यदि हिंसारहित चुनाव होते हैं तो वाम मोर्चे का आगामी विधानसभा चुनाव जीतना असंभव है। वामनेता इस बात से परेशान हैं कि हिन्दीभाषी उनके साथ नहीं हैं। यहां रहने वाले हिन्दीभाषी अमूमन बिहार और यू.पी. की राजनीति से सीधे प्रभावित होते हैं। मौजूदा रूझान वाममोर्चे के लिए खतरे की सूचना हैं।
क्योंकि बिहार में सभी रंगत के वामदलों की चुनावी एकजुटता असरहीन साबित हुई है। एक अन्य संदेश यह है कि ममता बनर्जी के कद को राहुल गांधी-सोनिया गांधी के जरिए छोटा नहीं किया जा सकता। राहुल-सोनिया का जादू खत्म हो चुका है। 
   बिहार के मुस्लिंम मतदाता केन्द्र सरकार के मुसलमानों के विकास के लिए  कई हजार करोड़ रूपयों के अनेक विकास कार्यक्रमों से एकदम प्रभावित नहीं हुए हैं। यह माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के लिए नौकरियों में आरक्षण करके वाममोर्चा मुसलमानों का दिल जीतने का जो सपना देख रहा है वह शायद पूरा न हो।  मुसलमानों के लिए विशेष आर्थिक पैकेज का कोई लाभ कांग्रेस को बिहार में नहीं मिला है। मुसलमान अभी भी कांग्रेस से नाराज हैं। मुसलमान जिन कारणों से कांग्रेस से नाराज हैं वे पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे के साथ जुड़े हैं। अतः यहां ममता के साथ मुसलमानों की सहानुभूति को वामदल तोड़ नहीं पाएंगे।
बिहार के मुस्लिम बहुल इलाकों में 49 सीटें हैं इनमें से 36 पर भाजपा-जदयू का जीतना बड़ी उपलब्धि है। इनमें ज्यादातर सीटें भाजपा को मिली हैं।अब भाजपा मुसलमानों के लिए अछूत पार्टी नहीं है। मुसलमानों में बाबरी मसजिद मसले का कोई महत्व नहीं रह गया है।
    नीतीश सरकार की नक्सलों के प्रति सहानुभूति रही है इसका उन्हें फायदा मिला है। नक्सल प्रभावित इलाकों में 56 में से सत्तारूढ़ मोर्चे को 41 सीटें मिली हैं।इसबार नक्सलों ने वहां चुनाव बहिष्कार का नारा नहीं दिया था। इसी तरह यादव बहुल 36 सीटों में से सत्तारूढ़ मोर्चे को 29सीटें मिली हैं। जबकि शहरी इलाकों की 42 सीटों में से 37 सीटें सत्तारूढ़ मोर्चा जीता है।
    ममता बनर्जी और नीतीश कुमार में कई समानताएं हैं। पहली समानता यह है कि दोनों ने वोटर के मैदान में उन लोगों को बड़ी संख्या में उतारा है जो अभी तक वोट नहीं दे पाते थे। दूसरा साम्य पिछड़ेपन के विरोध को लेकर है। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के पिछड़ेपन को वैसे ही मुद्दा बनाया हुआ है जैसा नीतीश ने बिहार में बनाया है। यहां भाजपा की आंतरिक सहानुभूति ममता बनर्जी के साथ है और भाजपा के पक्ष में आम जनता के बढ़ते रूझान का पश्चिम बंगाल में वामविरोधी वोटों को एकजुट करने में निश्चित असर होगा। इन सब कारणों से वामनेताओं की बेचैनी बढ़ गयी है।
बिहार के इसबार के चुनाव को नए ढ़ंग से देखें तो बेहतर निष्कर्ष निकाल सकते हैं।यह राष्ट्रीय राजनीति में भावी परिवर्तनों का संकेत है। देश की राजनीति और भी ज्यादा दक्षिणपंथी शक्ल लेगी। मनमोहन सिंह खैरात में दक्षिणपंथ को सत्ता सौंपकर जाएंगे। जैसे पहले अटलजी को कांग्रेस सौंपकर गयी थी । तीसरा मोर्चा खत्म हो गया है उसके आधार पर कोई राजनीति संभव नहीं है। वाम को अपने एजेण्डे पर नए सिरे से सोचना होगा। वाम के एजेण्डे को जनता सुन नहीं रही है। राजनीति में दक्षिणपंथी दबाब और बढ़ेंगे। नव्य उदारतावाद की गति तेज होगी।
    नीतीश कुमार की जीत को मीडिया अतिरंजित ढ़ंग से पढ़ रहा है। बिहार में अव्यवस्था और जातिवाद बने हुए हैं। अंतर यह है कि एनडीए ने जातीय समीकरण को प्रचार में छिपाया है विकास को सामने रखा है।  भारत के जातीय समीकरण को नष्ट करना किसी के वश का काम नहीं है। विकास का नारा सत्तारूढ़ मोर्चे की मीडिया प्रबंधन कला की देन है। इसका जमीनी हकीकत से कम संबंध है। लेकिन एक अच्छी बात हुई है कि बिहार में चुनाव शांतिमय रहा और विकास के नाम पर  हुआ।
     विकास के नाम पर चुनाव होना और विकास होना दो अलग-अलग चीजें हैं। नीतीश कुमार की विकासपुरूष की इमेज का बिहार की जमीनी हकीकत से कम संबंध है। यह मीडिया प्रबंधन और प्रौपेगैण्डा की देन है। एक और सवाल उठा है क्या विकास के नाम पर विचारधारा के सवालों को दरकिनार कर दिया जाए ?नीतीश का मॉडल है विचारधाराहीन विकास का। यह किसका मॉडल है ? लोहिया-जयप्रकाश नारायण ने कभी विचारधाराहीन विकास की बातें नहीं की थीं।
     विचारधाराहीन विकास का मॉडल वस्तुतः नव्य उदार आर्थिक नीतियों का मनमोहन मॉडल है। जिसे नीतीश एंड कंपनी विकास कह रहे हैं वह तो मनमोहन की लाइन है। जिसे इन दिनों सभी नव्य उदारपंथी बोल रहे हैं। नीतीश के मॉडल में मनमोहन मॉडल से भिन्न क्या है ? एक बड़ी भिन्नता है नीतीश कुमार धुर दक्षिणपंथी भाजपा के साथ मिलकर यह मॉडल लागू करने जा रहे हैं और इसमें किसानों की तबाही खूब होगी। उनकी जीत इस बात की गारंटी नहीं है कि किसान सुरक्षित रहेंगे। बिहार में जातिवाद प्रधान समस्या नहीं है। किसानों की बदहाली प्रधान समस्या है। देखना होगा बिहार में किसानों की बदहाली बढ़ती है या घटती है ? विचारधाराहीन विकास से किसान बचता नहीं है। आंध्र,महाराष्ट्र आदि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।




                

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