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बुधवार, 18 नवंबर 2009

मुक्‍ति‍बोध जन्‍म सप्‍ताह : पंडि‍त नेहरू और मार्क्‍सवाद के हि‍मायती मुक्‍ति‍बोध -चंचल चौहान





मुक्तिबोध का पूरा लेखन विश्व की उन तमाम राजनीतिक शक्तियों जो सर्वहारावर्ग और उसकी विचारधारा ––मार्क्सवाद व लेनिनवाद–– के प्रति समर्पित हैं के पक्ष में खड़ा है और उन तमाम शक्तियों के खिलाफ है जो जनवादविरोधी हैं और साम्राज्यवाद और सामंतवाद की पिट्ठू हैं । देश के स्तर पर भी उनका लेखन तमाम शोषणकारी जनवादविरोधी फासिस्ट और सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ है जो भारत की प्रगति में बाधा उत्पन्न करती हैं जिन्हें ‘प्रतिक्रियावादी’ कहा जाता है । ये शक्तियां ‘भारतीयता’, ‘भारतीयतावाद’ या ‘राष्ट्रवाद’ का जाप करती रहती हैं मगर साम्राज्यवाद तथा बड़े धन्नासेठों और रजवाड़ों का हित साधन करती हैं । यह भी उनके लेखों से स्पष्ट है कि काव्यांदोलन के रूप में ‘प्रगतिवाद’ का पक्षपोषण उन्होंने किया और उसकी विचारधारा को कला के सर्वोच्च बिंदु पर पहुंचाया । उनका समूचा लेखन मध्यवर्ग से यही कहता है कि ‘तय करो किस ओर हो तुम’ । या ‘पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है ?’
      मुक्तिबोध को मार्क्सवादी विचारधारा ने यह सिखाया था कि समाज का विकास उत्पादन के साधनों यानी टेक्नालाजी के विकास से होता है , आदिम काल में औजार आदिम थे, दासयुग में उससे बेहतर हुए, फिर सामंतवाद में और अधिक विकसित हुए । पूंजीवाद के आगमन से तमाम तरह का वैज्ञानिक विकास हुआ और आज भी हो रहा है । पूंजीवाद के इस प्रगतिशील रोल को खुद मार्क्स और हर मार्क्सवादी चिंतक की तरह मुक्तिबोध भी जानते थे । इसके लिए फ्रांस की क्रांति पर उनकी जो टिप्पणियां हैं उन्हें देखा जा सकता है । पूंजीवादी दौर में निजी संपत्ति के अधिकार और लाभलोभ पर आधारित व्यवस्था से पैदा हुए दुगु‍र्णों का और मनुष्‍य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत समाजवाद की स्थापना से संभव होगा, ऐसा उनका विश्वास था । लेकिन मुक्तिबोध यह भी जानते थे कि भारत या चीन जैसे अविकसित देशों में अभी सीधे समाजवाद की मंजिल का नारा नहीं दिया जा सकता और निजी संपत्ति के अधिकार को खत्म करने की वस्तुगत स्थिति भी अभी नहीं है । इसलिए विकास की मंजिल का निर्धारण अलग अलग देशों में अलग अलग तरीके से होगा और कम्यूनिस्ट पार्टियां जहां सत्ता हासिल करेंगी वहां भी मुख्य दिशा सामाजिक आर्थिक विकास और उत्पादन प्रणाली को वैज्ञानिक तरीके से आगे बढ़ाने की रहेगी । उन्होंने लिखा था कि  ‘मार्क्सवाद के अनुसार समाजवाद की बुनियादी बातों में, खेती तथा उद्योगों का समाजीकरण, और राष्ट्र विकास के लिए बहुत आर्थिक आयोजन का काम शामिल है । एक बार इस बुनियादी लक्ष्य को स्वीकार करने के बाद, देश–देश की अपनी–अपनी परिस्थितियों तथा विकासावस्थओं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्थायी–अस्थायी अनेक प्रकार की संस्थाएं और कार्यक्रम चलाये जा सकते हैं । यहां तक कि व्यक्तिगत उद्योग तथा व्यक्तिगत खेती तथा निजी संपत्ति तक को प्रश्रय दिया जा सकता है । चीन ने, एक ओर, सामाजिक सत्ता के अंतर्गत पूंजीवाद को न केवल प्रश्रय दिया, वरन् उसका इस ढंग से विकास किया कि जिससे वह सामाजिक सत्ता के बल को बढ़ा सके और उसकी उत्पादित वस्तुएं वही हों जिनकी आवश्यकता समाज को है ।’
उनके तमाम लेख इस बात के गवाह हैं कि वे भारत के औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण के खिलाफ नहीं थे । मुक्तिबोध ने जवाहरलाल नेहरू की भूमिका की कई जगह पूरी तरह सराहना ही की है, नेहरू ही नहीं, हर स्वतंत्रता सेनानी की, यहां तक कि संघियों के पितामह वीर सावरकर के शुरू के दिनों की भी सराहना की, आलोचनात्मक दृष्टि के बावजूद मुक्तिबोध ने किसी भी स्वतंत्रता सेनानी की आजादी के बाद के दिनों में भी निंदा या छीछालेदर नहीं की जैसी कि बहुत से तत्वों ने की, निंदा ही नहीं, गांधी जी का तो ​​हिंदू सांप्रदायिक तत्वों ने कत्ल ही करवा दिया । कोई मार्क्सवादी या जनतंत्र में विश्वास रखने वाला जनता को कभी भूल गलती करने वाला नहीं मानता, मुक्तिबोध ने जगह जगह जनता को सम्मान के साथ चित्रित किया है, भूल गलती करने वाली अपढ़ या जाहिल शक्ति नहीं । हर ज्ञानवान कवि ने उसे निराला की तरह शक्ति माना है, समाज का बदलाव करने वालों को उसकी पूजा करनी होगी ।


           अंधेरे में कविता में भी निराला की तरह उन्होंने कहा कि
मिट्टी के लोंदे में किरगीले कण कण
गुण हैं जनता के गुणों से ही संभव भावी का उद्भव जनवाद विरोधी मानसिकता ही जनता को दोषी बताती रहती है । किसी भी जगह यदि कोई उनकी पसंद का नेता हार जायेगा तो वे जनता को भूल–गलती करने वाला बतायेंगे । ब्रेख्त ने मजाक में ऐसे लोगों से यही कहा कि ‘दूसरी जनता चुन लो’ ।
      जवाहरलाल नेहरू के तमाम वि‍देशनीति‍ गत फैसलों को  मुक्तिबोध सकारात्मक नजरि‍ए से देख रहे थे, हालांकि उनको इस गणतंत्र का वर्गचरित्र मालूम था, वे जानते थे कि यह जनतंत्र पूंजीवादी–सामंती व्यवस्था का ही एक आधुनिक रूप है, फिर भी देश के विकास और हित में लिये गये ये फैसले सराहनीय थे और मुक्तिबोध ने इसके लिए भारतीय नेतृत्व की सराहना की। शिक्षकों की एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि  ‘पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में, देश समाजवादी निर्माण की ओर चल पड़ा है । जो लोग यह सोचते है कि हम उस प्रवृत्ति को खत्म कर सकते हैं वे बड़े भारी भ्रम में हैं । देश ही नहीं, संपूर्ण जगत में जनता जाग्रत हो उठी है और अपनी चेतना के स्तर के अनुसार स्वयं अपने मुक्तिमार्ग पर चल पड़ी है । ’
इसी तरह कई लेखों और टिप्पणियों में उन्होंने पं. नेहरू की नीतियों की सराहना की क्योंकि उनसे देश में औद्योगिक विकास और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को बल मिल रहा था और पुराने दकियानूसी विचारों और मध्ययुगीन सड़े गले तौर तरीकों को झटका लग रहा था जिन्हें आज भी बहुत से पढ़े लिखे लोग भी ‘भारतीयता’ या ‘भारतीय संस्कृति’ या ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ समझने की भूल गलती करते रहते हैं । मुक्तिबोध ने अपनी इतिहास वाली पुस्तक में भी गांधी, तिलक आदि सभी की सकारात्मक भूमिका का कविसुलभ संवेदना से वर्णन किया, सिर्फ‍ सांप्रदायिक तत्वों को ब्रिटिश हुकूमत के औजार के रूप में चित्रित किया, महात्मा गांधी की भूमिका का प्रशंसात्मक वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा कि ‘इस बीच अंग्रेज सरकार, एक ओर, जनता का भयानक दमन करती, तो दूसरी ओर, संप्रदायवादियों के जरिये देश में फूट फैलाती ।’उसी पुस्तक में ‘भारत की स्वाधीनता का सूर्य’ शीर्षक अध्याय में उन्होंने पहले वाक्य से ले कर अंत तक जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व की सराहना की । शुरू का पैरा तो पूरी तरह नेहरू की ही तारीफ में लिखा :

‘ प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारतीय जनतंत्र की प्रतिष्ठा हुई । भारत उत्तरोत्तर प्रगति करता गया । आज हमारा देश विश्व में सम्मानित होता है और उसकी आवाज को ध्यान से सुना जाता है । इसका मूल कारण पंडित नेहरू का महान व्यक्तित्व और नेतृत्व है । पंडित नेहरू की नीति विश्व में अधिकाधिक सदभावना तथा मैत्री के प्रसार के लिए है । यह आवश्यक है, भय से विश्व मुक्त हो । शांति के वातावरण में रह कर ही, विश्व और भारत उन्नति कर सकता है। पंडित नेहरू के पास देश का एक स्वप्न है । भारत शक्तिशाली– आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर– हो सम्पन्न हो, जनता शिक्षित और सुसंस्कृत बने ।’

             मुक्तिबोध ने बिल्कुल वैज्ञानिक तरीके से उन घटनाओं को लिया जो उन दि‍नों सामने खड़ी थीं,और आशा जगायी कि ये समस्याएं भी सुलझ जायेंगी, उन्हीं के शब्दों में ‘काश्मीर का एक भाग जो पाकिस्तान ने हथिया लिया, और काश्मीर का उत्तरी सीमांत का कुछ हिस्सा जो चीन ने ले लिया–– ये समस्याएं अभी बची हुई हैं । धैर्य और शांति, सदभावना और शक्ति, मैत्री और बल दोनों के प्रयोग से ये समस्याएं भी धीरे धीरे सुलझ जायेंगी ।’ इन समस्याओं के उल्लेख के तुरत बाद वे फिर भारत की प्रगति का बखान करते हुए कहते हैं कि ‘आज भारत विश्व के अन्यतम देशों में है । उसकी आवाज सब देशों को सुननी पड़ती है । ...उस सबका श्रेय विश्व के अन्यतम राजनीतिज्ञ पंडित जवाहरलाल नेहरू को है ।’
 हमारे यहां तमाम मुफ्तखोर साधू महात्मा दिन रात वैज्ञानिक प्रगति और भौतिकवाद को ‘पश्चिमी’ बता कर कोसते रहते हैं मगर पश्चिम के हर नये आविष्कार का भरपूर फायदा उठाते हैं, मोबाइल फोन, एयरकंडीशन्ड गाडियां, राजमहल जैसे आश्रम और अधुनातम आफिस तंत्र (वेबसाइट, इंटरनेट, ईमेल आ​दि) सब कुछ उनके पास होता है । पूछा जाना चाहिए कि ये सब आधुनिक साधन कहां से मिलते यदि भारत में औद्योगीकरण नहीं होता और अन्य देशों से ज्ञानविज्ञान और मशीनें आदि नहीं लेते ? जो पश्चिमी औद्योगीकरण की इन देनों को नहीं चाहते वे जंगलों में जा कर रह लें, नेहरू या कम्युनिस्टों को कोसने की क्या जरूरत जो भारत देश के विकास के लिए औद्योगीकरण को जरूरी मानते हैं । मुक्तिबोध यह जानते थे कि जो देश टेक्नालाजी में कमजोर होगा, वह पिछड़ जायेगा, उनकी बात सच साबित हुई ।
सोवियत संघ का विघटन इसी वजह से हुआ कि वह युद्ध सामग्री में तो अधुनातम रहा मगर समाज की जरूरतों के अनुकूल उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में साम्राज्यवादी देशों से पिछड़ गया, हर क्षेत्र में उसे पूंजीवादी देशों से आगे जाना चाहिए था, उत्पादन के साधनों को विकसि‍त करना ही तो क्रांति का लक्ष्य होता है । किसी भी देश की जनता उन ताकतों को धकेल देती है जो उत्पादन की नयी प्रणालियों को विकसित होने में बाधा डालते हैं । नेपाल की जनता आज सामंती व्यवस्था को इसीलिए ध्वस्त करना चाहती है क्योंकि वहां उत्पादन की नयी टेक्नालाजी के विकास में सामंती व्यवस्था बाधा बन रही है । वहां पूंजीवाद का विकास वस्तुगत जरूरत है, और वह होगा ही । वहां के माओवादियों को भी यह समझना होगा कि वहां सीधे समाजवाद की छलांग नहीं लगायी जा सकती । आखिर नयी उत्पादन प्रणाली यानी टैक्नालाजी के नये विकास के लिए पूंजी कहां से आयेगी, जाहिर है वहां पूंजीवाद के विकास के दरवाजे खोलने होंगे । इसलिए वहां उसी के अनुरूप राजनीतिक ढांचा भी बनेगा । मुक्तिबोध की समझ इस मामले में कितनी वैज्ञानिक थी, कि जैसे वे भविष्य देख रहे हों जब उन्होंने यह कहा कि जरूरत के हिसाब से समाजवादी देशों में भी ‘व्यक्तिगत उद्योग तथा व्यक्तिगत खेती तथा निजी संपत्ति तक को प्रश्रय दिया जा सकता है ।’ चीन में हाल के वर्षों में इसी दि‍शा में बदलाव हुए हैं,अन्‍य समाजवादी देश भी इस दि‍शा में गए हैं।


                             






रविवार, 4 अक्टूबर 2009

हरीश भादानी की अंति‍मयात्रा : स्‍वतंत्रचेता मुक्‍तपुरूष का महाप्रयाण

जनकवि‍ हरीश भादानी जी को 3 अक्‍टूबर 2009 को बीकानेर में हजारों लोगों ने अश्रुपूरि‍त नयनों से अंति‍म वि‍दाई दी। उनकी अंति‍म वि‍दाई के मौके पर राजस्‍थान के मुख्‍यमंत्री अशोक गहलौत श्रद्धांजलि‍ देने जयपुर से सीधे बीकानेर पहुँचे। हरीश जी की अंति‍म इच्‍छा थी कि‍ उनका अंति‍म संस्‍कार न करके मेडीकल कॉलेज को देह दान कर दि‍या जाए। उनकी इसी इच्‍छा के अनुरूप उनका देहदान बीकानेर मेडीकल कॉलेज को कि‍या गया। यहां पर दो बडे हि‍न्‍दी दैनि‍कों की अंति‍म यात्रा की रि‍पोर्ट पेश करना चाहता हँ। यह रि‍पोर्ट एक महत्‍वपूर्ण पक्ष की ओर ध्‍यान खींचती हैं कि‍ हिंदी में हरीशजी वि‍रल वि‍भूति‍ थे, उन्‍होंने सभी वर्गों और जाति‍यों के लोगों में अपनी साख कायम की थी और पूरा राजस्‍थान उन्‍हें प्‍यार करता था। उनकी शवयात्रा में जि‍स तरह हजारों लोगों का सैलाव उमड़ा वह स्‍वयं में इस बात का प्रतीक है कि‍ वे सचमुच में जनगायक और स्‍वतंत्रचेता, मुक्‍त पुरूष थे। स्‍वतंत्रचेता ,मुक्‍तपुरूष होने के नाते ही उन्‍हें आरएसएस से लेकर सीपीएम,कांग्रेस से लेकर समाजवादी वि‍चारधारा के लोग समान रूप से प्‍यार करते थै। इसके अलावा बड़े पैमाने पर जनसाधारण की उनकी शवयात्रा में उपस्‍थि‍ति‍ को देखकर रवीन्‍द्रनाथ टैगोर की अंति‍म यात्रा का दृश्‍य याद आ रहा था ,रवीन्‍द्रनाथ की मौत पर जि‍स तरह का जनसैलाव कलकत्‍ते में उमड़ा था ठीक वैसा ही जनसैलाव बीकानेर की सड़कों पर 3 अक्‍टूबर 2009 को दि‍खाई दि‍या।
राजस्‍थान पत्रि‍का ने लि‍खा-

”बीकानेर। रोटी नाम सत है, खाये सो मुकत है, मैंने नही कल ने बुलाया है जैसे सैंकडों गीतों के जरिए जागृति की अलख जगाने वाले जन कवि हरीश भादाणी की देह उनकी इच्छा के मुताबिक आज सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज प्रशासन को सौंप दी गई। उनका शुक्रवार तडके निधन हो गया था।

भादाणी के पार्थिव शरीर को शहर के छबीली घाटी स्थित उनकी पुत्री कविता व्यास के निवास पर दर्शनार्थ रखा गया था, जहां सैंकडों लोगों ने पहुंच कर पुष्पांजलि अर्पित की। उनकी पुत्री एवं पूर्व सांसद सरला माहेश्वरी के कोलकाता से आज सुबह यहां पहुंचने के बाद उनके पार्थिव शरीर को फूलों से सजी खुली जीप में रख कर देहदान के लिए मेडिकल कॉलेज ले जाया गया।

जन कवि भादाणी की अंतिम यात्रा में भाजपा विधायक गोपाल कृष्ण जोशी, भाजपा के शहर अध्यक्ष नन्दकिशोर सोलंकी सहित साहित्यकार, पत्रकार तथा सभी वर्ग के लोग शामिल थे। शहर के प्रमुख मार्गो से होते हुए देहदान यात्रा जैसे ही सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज पहुंची डॉक्टरों ने पंक्तिवद्ध होकर पुष्पांजलि अर्पित की।

भादाणी 76 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। अपनी वसीयत में भादाणी ने देहदान की इच्छा जताई थी। उनके एक पुत्र और तीन पुत्रियां हैं। बिहारी सम्मान, मीरा पुरस्कार सहित अन्य पुरस्कारों से सम्मानित भादाणी आमजन की भाषा में जनता की समस्याओं और विदु्रपताओं पर कविता लेखन लिए प्रख्यात रहे।”
दैनि‍क भास्‍कर ने लि‍खा-

” बीकानेर. जनकवि हरीश भादानी के निधन से संपूर्ण साहित्य जगत को गहरा आघात पहुंचा है। साहित्य से जुड़े व्यक्तियों, राजनीतिज्ञों, समाजसेवियों ने भादानी के निधन पर दुख प्रकट करते उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए हैं।
जनवादी लेखक संघ के पदाधिकारियों ने भादानी के निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। जिला सचिव नरेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि एक कवि, गीतकार, लेखक, संपादक, जन साक्षरता, आंदोलनकर्ता के रूप में भादानी के जीवन संघर्ष का विवरण देना सूरज को दीपक दिखाने के समान है।
अजित फाउंडेशन में आयोजित शोकसभा में लक्ष्मीदेवी व्यास ने कहा कि भादाणी के रूप में संपूर्ण भारतवर्ष में साहित्य का अमूल्य रत्न खो दिया है। संस्था अध्यक्ष विजयशंकर व्यास ने जयपुर कार्यालय से दूरभाष पर भादानी के निधन पर शोक जताया। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) ने भादानी के निधन को साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।
देहात भाजपा के अध्यक्ष जालमसिंह भाटी, खींवसिंह भाटी, मीडिया प्रभारी सुनिल बांठिया ने कहा कि भादानी ने अपनी कविताओं को राष्ट्रीयस्तर पर लोकप्रियता दिलाकर बीकानेर का नाम रोशन किया था। भारतीय राष्ट्रीय ट्रांसपोर्ट कर्मचारी फैडरेशन (इंटक) के सचिव हेमन्त किराड़ू, राजस्थान ऑटोचालक यूनियन के अहमद कोहरी, संपतसिह राजपुरोहित, अब्दुल गफूर छोटू व बीकानेर कार जीप टैक्सी यूनियन (इंटक) के मदन पंवार ने भादानी के निधन पर शोक जताया है।
पूर्व पार्षद सरताज हुसैन ने कहा कि भादानी बीकानेर के साहित्यिक जगत के एक अध्याय थे। ब्राrाण अंतरराष्ट्रीय संगठन (युवा) राजस्थान प्रदेश के प्रदेशाध्यक्ष योगेन्द्र कुमार दाधीच ने भादानी के निवास स्थान पर जाकर उनकी पार्थिव देह पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धासुमन अर्पित किए। श्री पुष्टिकर पुरोहित भादानी पंचायत ट्रस्ट के अध्यक्ष रमेश कुमार भादानी, शिवशंकर भादानी, गोपालदास भादानी, लालचंद भादानी, गोपाल भादानी, शांतिलाल भादानी, रमेश गहलोत, कमल रंगा ने जनकवि हरीश भदानी को पुष्पांजलि अर्पित की।

पूर्व न्यास अध्यक्ष सोमचंद सिंघवी ने शोक प्रकट करते हुए कहा कि भादानी के निधन से साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। राजस्थानी साहित्यकार शिवराज छंगाणी ने शोक व्यक्त करते कहा कि वे समर्पित सृजक एवं अत्यंत भावुक-संवेदनशील इंसान थे। राजस्थानी भाषा एवं साहित्य के उन्नयन में उनका अनुपम योगदान रहा।”

हरीश भादानी की अंति‍म यात्रा के बारे में दैनि‍क भास्‍कर ने लि‍खा

'' बीकानेर. शहर की जिन गलियों से वे कभी पैदल ही कंधे पर झोला डाले निकलते दिखाई देते थे, उन्हीं गलियों में आज हजारों लोग उनके साथ थे। फर्क सिर्फ यह था कि आज कोई उन्हें ‘रोटी नाम सत् है, खाये वो मुगत है..’ सुनाने के लिए नहीं कह रहा था बल्कि सभी इस गीत को गा रहे थे।
चिरनिंद्रा में लीन जननायक-जनकवि हरीश भादानी को यह जगाने का यत्न था या भावभीनी विदाई का उपक्रम लेकिन रुंधे कंठों के बाद भी जोशीला स्वर बार-बार यह अहसास करवा रहा था कि हरीश भादानी अमर रहेंगे। अमरता को वरण कर चुके हरीश भादानी की महाप्रयाण यात्रा शनिवार को छबीली घाटी से प्रारंभ हुई तो गलियों के मुहाने भर गए। सड़क पर तिल रखने की जगह नहीं रही और चौक-चौराहे पुष्पों से भर उठे। लोग श्रद्धावनत थे।खड़े रहे तपती धूप में अपने प्रिय कवि के अंतिम दर्शन के लिए जिसने कई बार नंगे पांव चलकर इस शहर को जगाया। आज शहर के साहित्यकार, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, कर्मचारी नेता, पत्रकार सभी उनके पीछे-पीछे चल रहे थे, उनकी छोड़ी हुई विरासत को सहेजे रखने की संकल्पना के साथ। महाप्रयाण यात्रा पर चले हरीशजी को विदा करने साथ आईं उनकी पत्नी जमुनादेवी हों या वाहन की आगे वाली सीट पर बैठी उनकी बेटी पूर्व सांसद सरला माहेश्वरी। दोनों बिल्कुल शांत थीं। जैसे उन्हें अहसास था कि बिलखती हुई पुष्पा खड़गावत और कविता व्यास को उन्हें ही संभालना है। इसी तरह खुद को जज्ब किए रहे डॉ.नंदकिशोर आचार्य, नंद भारद्वाज, भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’, यू.सी.कोचर आदि जो जानते थे उनकी एक सिसकी भी यहां आंसुओं का सैलाब खड़ा कर सकती है। डॉ.नंदकिशोर आचार्य को देख पत्रकार अभयप्रकाश भटनागर खुद पर काबू नहीं रख सके लेकिन आचार्य ने उन्हें संभाला।
सरल विशारद बार-बार अपनी रुलाई को यह कहकर रोकने की कोशिश करते रहे कि मैं बिल्कुल भी नहीं टूटा हूं। उनसे मिलने वाला हर व्यक्ति सच को जानता था लेकिन उनकी हां में हां मिला रहा था।
रांगेय राघव की पुत्री और सीमंतनी यहां अनुवादक पूर्वायागिक कुशवाह को लेकर यहां पहुंची लेकिन उनके शब्द भी जवाब दे चुके थे। नाटककार निर्मोही व्यास अस्वस्थ होने के बावजूद पहुंचे लेकिन उनके चेहरे पर अपने दोस्त को खोने की पीड़ा साफ नजर आ रही थी। साहित्यकार लक्ष्मीनारायण रंगा बिल्कुल संयत दिख रहे थे लेकिन उनके मन में मचा हाहाकार भी चेहरे पर झलक रहा था।
ऐसा ही हाल महबूब अली, शुभू पटवा, मनोहर चावला, श्रीलाल मोहता, हरदर्शन सहगल, श्रीलाल जोशी, मालचंद तिवाड़ी, दीपचंद सांखला, कमल रंगा कामरेड वाई.के.शर्मा योगी, प्रसन्न कुमार, रामेश्वर शर्मा, राजेंद्र जोशी का था, सब चुप थे लेकिन असहनीय दर्द के साथ। वातावरण में लगातार गूंजता रहा ‘जब तक सूरज-चांद रहेगा, भादानीजी का नाम रहेगा।’
यात्रा के दौरान उनके लिए लाल-सलाम का उद्घोष होता रहा तो कविताएं गूंजती रही। छबीली घाटी से गुजरों की मस्जिद, जेल रोड, कोटगेट, महात्मागांधी मार्ग, मॉडर्न मार्केट से आंबेडकर सर्किल होते हुए हरीश भादानी की महाप्रयाण यात्रा सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज पहुंची जहां उनके देहदान का संकल्प पूरा हुआ। कॉलेज के प्राचार्य डॉ.आर.बी.पंवार, पीबीएम अस्पताल के अधीक्षक डॉ.विनोद बिहाणी सहित समूचा स्टाफ, स्टूडेंट्स भादानी को पुष्पांजलि अर्पित करने गेट पर ही मौजूद थे।
माकपा की राज्यशाखा की ओर से भादानी की पार्थिव देह पर पुष्पचक्र अर्पित करने के साथ ही माकपा का झंडा चढ़ाया गया। इन्होंने भी दी श्रद्धांजलि : नगर निगम के महापौर मकसूद अहमद, बीकानेर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र के विधायक डॉ.गोपाल जोशी, भाजपा शहर अध्यक्ष नंदकिशोर सोलंकी, भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य सत्यप्रकाश आचार्य, नगर परिषद के पूर्व सभापति चतुभरुज व्यास, राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ.महेंद्र खड़गावत, सचिव पृथ्वीराज रतनू आदि ने भी श्रद्धांजलि अर्पित की।
और म्यूजियम का हिस्सा बन जाएंगे भादानी
मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी म्यूजियम में हर ओर बड़े-बड़े मर्तबानों में भरे रसायनों के बीच मानव शरीर के अलग-अलग हिस्से प्रदर्शित हैं। शरीर संरचना के प्रायोगिक प्रशिक्षण के बाद इन्हें मर्तबानों में सुरक्षित रखा गया है। देहदानी हरीश भादानी के अंग भी इन मर्तबानों में नजर आएंगे। मेडिकल कॉलेज को स्वैच्छिक देहदान के रूप में यह पांचवां शरीर मिला है।
धनपालसिंह माथुर ने बीकानेर में इस महादान की शुरुआत की। कुछ दिन पहले ही हनुमानगढ़ में वृद्धाश्रम चलाने वाले जट्टूराम ग्रोवर की देहदान यात्रा भी इस कॉलेज पहुंची है। मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग के प्रोफेसर डा.बी.एल.मेहता के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में ही देहदान के प्रति लोग प्रेरित हुए हैं। दो साल पहले बीकानेर के स्टूडेंट्स को पढ़ाने के लिए जयपुर से मृत शरीर मंगवाए गए थे।
फिलहाल कॉलेज के पास 13 पार्थिव मानव शरीर मौजद हैं। एक वर्ष में प्रशिक्षण के लिए चार शरीर चाहिए। ऐसे में भादानी की पार्थिव देह तीन साल तक रसायनों में सुरक्षित रहेगी और इसके बाद ही इस पर प्रशिक्षण शुरू होगा। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए एमबोल्मिंग की गई है। गुरुत्वाकर्षण के आधार पर फिमोरल आर्टरी करने के साथ ही फ्रीजर और रसायनयुक्त जलकुंड में शव को रखा जाएगा। ऐसे में एक देह के दान से सालों तक स्टूडेंट्स अध्ययन और रिसर्च कर सकेंगे।''

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

सामयि‍क युवा संस्‍कृति‍ के बि‍ना 'नयापथ'

जनवादी लेखक संघ कमाल का संगठन है यह संगठन सामयि‍क संसार के साथ संवाद कम से कम करता है। वि‍गत छह महीनों में इस संगठन की साहि‍त्‍यि‍क पत्रि‍का 'नयापथ' के दो 'युवा अंक' आए हैं। इन दोनों अंकों के सम्‍पादकीय और प्रकाशि‍त सामग्री को देखकर यह महसूस होगा कि‍ भारत के युवाओं की कोई समस्‍या नहीं है। उनकी एकमात्र समस्‍या है क्रांति‍कारी प्रेरणा का अभाव। इस अभाव की पूर्ति‍ को केन्‍द्र में रखकर दोनों अंक तैयार कि‍ए गए हैं। वि‍चारणीय सवाल यह है कि‍ अगर हि‍न्‍दी-उर्दू लेखकों की पत्रि‍का में युवालेखन के मूल्‍यांकन के नाम पर यदि‍ शून्‍य है तो भारत का भवि‍ष्‍य क्‍या होगा ? क्‍या हि‍न्‍दी-उर्दू के युवा लेखकों के मूल्‍यांकन की जरूरत नहीं है ? सवाल उठता है कि‍ हि‍न्‍दी-उर्दू से लेकर भारत की कि‍सी भी भाषा के सामयि‍क युवा लेखन को संपादकों ने मूल्‍यांकन योग्‍य क्‍यों नहीं समझा ? युवा लेखन के प्रति‍ इस उपेक्षाभाव की जमकर आलोचना की जानी चाहि‍ए। अप्रैल-जून 2009 के अंक में एकमात्र बजरंग बि‍हारी ति‍वारी का '' भारतीय दलि‍त लेखन:मौजूदा परि‍दृश्‍य''नामक लेख है। दो अंकों में युवालेखन के मूल्‍यांकन पर मात्र चार पन्‍ने। अनेक युवा लेखकों की रचनाएं दोनों अंकों में हैं। लेकि‍न मूल्‍यांकन नहीं है। हि‍न्‍दी उर्दू का कोई युवा आलोचक भी उन्‍हें नहीं मि‍ला जि‍सकी आलोचना पर चर्चा कर लेते।
सवाल यह है कि‍ क्‍या भारत के युवा को सि‍र्फ प्रेरक पुरूषों की जरूरत है ? युवाओं को प्रेरणा देने का तरीका आज पूरी तरह पि‍ट चुका है। युवाओं के दि‍ल,दि‍माग, जीवनशैली ,वि‍चारधारा आदि‍ को प्रेरक पुरूषों के संस्‍मरण लेखन से प्रभावि‍त नहीं कि‍या जा सकता । आज के युवा समुदाय की दुनि‍या पूरी तरह बदल चुकी है,आज वह ज्‍यादा यथार्थवादी और व्‍यवहारवादी है। क्‍या उसकी समस्‍याओं पर चर्चा कि‍ए बगैर उसका दि‍ल जीता जा सकता है ? ऐसा क्‍यों हुआ कि‍ जनवादी लेखक संघ के संपादकद्वय (मुरली मनोहरप्रसाद सिंह और चंचल चौहान) अति‍थि‍ संपादक संजीव कुमार, युवाओं की कि‍सी भी समस्‍या को वि‍वेचन लायक नहीं समझते ? दूसरी महत्‍वपूर्ण बात यह कि‍ युवाओं के सामने समस्‍याओं की जो फेहरि‍स्‍त संपादकद्वय ने गि‍नायी है उसमें से कि‍सी भी समस्‍या को वि‍श्‍लेषि‍त करने योग्‍य क्‍यों नहीं समझा गया ? क्‍या राजनीति‍क दलों की तरह युवा समस्‍या का वर्णनात्‍मक गद्य ही युवाओं के प्रति‍ सही समझ बनाने के लि‍ए काफी है ? युवा समस्‍याओं को यदि‍ राजनीति‍क नारेबाजी की शक्‍ल में प्रस्‍तुत कि‍या जाएगा तो न तो समस्‍या समझ में आएगी और न युवावर्ग ही समझ में आएगा। भारत के युवावर्ग के दि‍लो-दि‍माग और सर्जनात्‍मकता के मूल्‍यांकन में दोनों अंक एकदम वि‍फल रहे हैं। इस पहलू को लेकर कोई भी सामग्री इन दोनों अंकों में नहीं है। दूसरी ओर इन दोनों अंकों में भारत के युवावर्ग के प्रति‍ अवैज्ञानि‍क समझ का जमकर महि‍मामंडन कि‍या गया है। युवाओं की सर्जनात्‍मकता ,आनंद,मनोरंजन, जीवनशैली के प्रति‍ अवि‍श्‍वास,संशय, हि‍कारत और धि‍क्‍कार भाव व्‍यक्‍त हुआ है। संपादक द्वय ने लि‍खा है '' युवा वे ही देख पा रहे हैं जो इस भूमंडलीय वि‍त्‍तीय पूंजी का नि‍र्लज्‍जतापूर्वक प्रचार करने वाले मीडि‍या तंत्र द्वारा दि‍खाया जा रहा है।यह तंत्र युवाओं को बता रहा है कि‍ उनके लि‍ए सत्‍य केवल पैसा और पद है और इसी के पीछे भागते जाना ही वास्‍तवि‍क संघर्ष है और इसके लि‍ए दूसरों को धोखा देना बौद्धि‍क प्रति‍भा का सही उपयोग है। जीवन की सार्थकता उसकी सफलता में है,चाहे उसे कैसे भी हासि‍ल कि‍या जाए। यदि‍ आज हम सफल हैं तो दुनि‍या कल रहे या न रहे,यह हमारी चि‍न्‍ता क्‍यों बने।क्‍या इस स्‍वार्थ-लोलुप वि‍कृत मानसि‍कता के साथ एक बेहतर दुनि‍या का नि‍र्माण संभव है ?''
इन दोनों अंकों की सबसे बड़ी कमजोरी है युवा अस्‍मि‍ता और युवा संस्‍कृति‍ को स्‍वतंत्र रूप में न देख पाना। जनवादी पहले चाहते हैं कि‍ युवा कैसे बनें और इसके लि‍ए उन्‍होंने अपने पसंदीदा आदर्श पुरूषों का वि‍वेचन पेश कि‍या है। युवाओं के प्रति‍ यह नजरि‍या सही नहीं कहा जा सकता। यह तो वैसे ही हुआ कि‍ पहले युवा फि‍देल कास्‍त्रो,भगतसिंह आदि‍ जैसे बनें ,क्रांति‍कारी बनें, अथवा पूर्ण स्‍वाधीनता के मार्ग को अर्जित करें। उसके‍ बाद वे अपने बारे में सोचें। इस तरह देखने से युवाओं के दि‍ल,दि‍माग,जिंदगी का हमने बाह्य उद्देश्‍यों के साथ संबंध जोड दि‍या है। क्‍या युवाओं का अभीप्‍सि‍त लक्ष्‍य क्रांति‍ हो सकता है ? क्‍या युवाओं का लक्ष्‍य खद्दरधारि‍यों का देश नि‍र्मित करना लक्ष्‍य हो सकता है ? क्‍या युवाओं को चरखे, राष्‍ट्रीय ध्‍वज आदि‍ के साथ नत्‍थी कि‍या जा सकता है। क्‍या युवाओं का एकमात्र लक्ष्‍य अपने देश के गौरवमय इति‍हास को याद रखना और उसका पारायण करते रहना है ? क्‍या युवाओं को बाह्य सवालों और सरोकारों से बांधकर सही मार्ग पर लाया जा सकता है ? हम अपने युवा में पूर्ण मनुष्‍यत्‍व का उदबोधन क्‍यों नहीं करना चाहते, क्‍या पूर्ण मनुष्‍यत्‍व के आह्वान के बि‍ना युवाओं को जाग्रत कि‍या जा सकता है ? क्‍या कि‍सी दल वि‍शेष का राजनीति‍क एजेण्‍डा युवाशक्‍ति‍ को पूर्णत: जाग्रत कर सकता है ? जी नहीं, हमने युवाओं में पूर्ण मनुष्‍यत्‍व का वि‍वेक पैदा करने की कभी कोशि‍श ही नहीं की। दलीय एजेण्‍डे के साथ युवाशक्‍ति‍ का कल्‍याण हो जाता तो युवाओं को दलीय एजेण्‍डे के बाहर जाने की जरूरत ही महसूस नहीं होती, दलीय एजेंडे से युवा शक्‍ति‍ को पूर्ण मनुष्‍यता नहीं मि‍लती। यह बात में हमें सोवि‍यत संघ के पराभव और चीन के बदलावों से सीखने की जरूरत है। चीन की कम्‍युनि‍स्‍ट पार्टी आज युवाओं को क्रांति‍कारी पाठ पढाने की स्‍थि‍ति‍ में नहीं है। सोवि‍यत कम्‍युनि‍स्‍ट पार्टी का युवा संगठन तो समाप्‍त ही हो गया है। युवाओं को यदि‍ आप सि‍र्फ बाह्य एजेण्‍डे से बांधेंगे तो इससे युवा शक्‍ति‍ जगने वाली नहीं है। हमें युवाशक्‍ति‍ को समग्रता में वर्गीय और दलीय एजेण्‍डे से भि‍न्‍न बृहत्‍तर मानवीय लक्ष्‍यों की ओर ले जाना होगा। भारत में मार्क्‍सवादी कम्‍युनि‍स्‍ट पार्टी और वामदलों का पश्‍चि‍म बंगाल के युवा समुदाय में सबसे बड़ा संगठन है। तकरीबन एक करोड़ युवा वामदलों के वि‍भि‍न्‍न युवासंगठनों में हैं,इसके बावजूद स्‍थि‍ति‍ क्‍या है ? क्‍या इन युवाओं में कि‍सी भी कि‍स्‍म की बृहत्‍तर मानवीय उदबोधन के भाव का वाम राजनीति‍ नि‍र्माण कर पायी है ? कहने का तात्‍पर्य यह है कि‍ युवाशक्‍ति‍ को इच्‍छि‍त वि‍चारों और लक्ष्‍यों में ढालकर हमने संकुचि‍त और संकीर्ण बनाया है।
'नयापथ' के संपादक युवाओं को कि‍सी न कि‍सी सामाजि‍क इकाई के सहयोगी समूह के रूप में देखते हैं। युचावर्ग कि‍सी का सहयोगी या पूरक समुदाय नहीं है। युवाओं के बारे में कि‍सी भी कि‍स्‍म का सरलीकरण और साधारणीकरण संभव नहीं है। कि‍सी भी देश में युवा समुदाय कैसा और उसका मानसि‍क-सामाजि‍क संरचनात्‍मक स्‍वरूप क्‍या है इसे गंभीरता के साथ परवर्ती पूंजीवाद के संदर्भ में समझने की जरूरत है। हमें यह तथ्‍य नहीं भूलना चाहि‍ए कि‍ रोजगार,उद्योग-धंधे,शि‍क्षा,राष्‍ट्रप्रेम,पार्टी प्रेम,क्रांति‍कारि‍ता आदि‍ के खूंटे से बांधकर यदि‍ युवाओं को देखा जाएगा तो हमेशा गलत नि‍ष्‍कर्ष नि‍कलेंगे। हम भारत को सोवि‍यत संघ जैसा बेरोजगारी रहि‍त देश कभी नहीं बना सकते। सोवि‍यत संघ में तकरीबन साठ बरसों तक युवाओं में अशि‍क्षा,बेकारी आदि‍ का नामोनि‍शान नहीं था आज क्‍या स्‍थि‍ति है वहां के क्रांति‍कारी युवा संगठन की ? चीन ने अपने नि‍र्माण काल के दौरान जि‍स आदर्श को युवाओं का कंठहार बनाया था आज क्‍या स्‍थि‍ति‍ है उसकी ? सारी दुनि‍या के क्रांति‍कारी संगठनों से लेकर बुर्जुआ संगठन अपने को परवर्ती पूंजीवाद के संदर्भ में पुनर्परि‍भाषि‍त कर रहे हैं। लेकि‍न भारत के क्रांति‍कारी यह काम करना नहीं चाहते।
भारत में कभी भी युवा संस्‍कृति‍ को देखने और परि‍भाषि‍त करने का प्रयास ही नहीं कि‍या गया। युवासंस्‍कृति‍ को हमारे जनवादी समझते नहीं हैं। जनवादि‍यों की युवाओं को सीख क्‍या है ? पहले क्रांति‍कारी वि‍चारों को जानो,मानो तब ही असली युवा बनोगे। युवाओं को क्रांति‍कारी बनाने से सामाजि‍क परि‍वर्तन नहीं आएगा,इससे युवा सुधरने से रहा। इससे देशभक्‍ति‍ भी पैदा नहीं होगी। युवाओं में मनुष्‍यता के प्रति‍ आग्रह पैदा कि‍या जाए,उनके स्‍वायत्‍त संसार की हर स्‍थि‍ति‍ में रक्षा,संवर्द्धन कि‍या जाए,युवा संस्‍कृति‍ के वैवि‍ध्‍यमय संसार को स्‍वीकृति‍ दी जाए और हजार फूल खि‍लने दो कि‍ तर्ज पर युवाओं में सांस्‍कृति‍क-राजनीति‍क बहुलतावाद की रक्षा की जाए। युवाओं को एक ही सॉंचे में ढालने के अभी तक के सभी प्रयास अंतत: असफल हुए हैं। हमें युवाओं से प्‍यार करना चाहि‍ए,उन्‍हें संस्‍कृति‍ और मूल्‍यबोध के आधार पर वर्गीकृत करके प्‍यार नहीं करना चाहि‍ए। हमें युवा संस्‍कृति‍ के अंदर मौजूद वि‍भि‍न्‍न स्‍तरों और सांस्‍कृति‍क वैवि‍ध्‍य को गंभीरता से लेना चाहि‍ए। युवा संस्‍कृति‍ को संस्‍कृति‍ के जरि‍ए अपदस्‍थ नहीं करना चाहि‍ए। युवा संस्‍कृति‍ को यदि‍ कि‍सी भी कि‍स्‍म के स्‍टीरि‍योटाईप वि‍चारों के जरि‍ए अपदस्‍थ कि‍या जाएगा तो युवाओं को आकर्षित नहीं कि‍या जा सकता। हमें भारत में युवा संस्‍कृति‍ के पैराडाइम की तलाश करनी चाहि‍ए। हमें युवा संस्‍कृति‍ को मातहत संस्‍कृति‍ के रूप में ,घृणा और धि‍क्‍कार की संस्‍कृति‍ के रूप में नहीं देखना चाहि‍ए। युवा संस्‍कृति‍ मूलत: वि‍रेचन की संस्‍कृति‍ है। हमारे जनवादी संपादक युवाओं को जो चीज परोस रहे हैं उसका युवा संस्‍कृति‍ से कोई लेना देना नहीं है। युवा को आप कि‍सी एक वि‍चारधारा, संस्‍कृति‍ और एक ही कि‍स्‍म की राजनीति‍ और एक ही कि‍स्‍म के मूल्‍यबोध में बांधकर देखेंगे तो युवा समुदाय समझ में नहीं आएगा। 'नयापथ' के संपादक खास कि‍स्‍म के नजरि‍ए के खूंटे से बांधकर युवा को मातहत सामाजि‍क इकाई के रूप में देखते हैं। फलत: उन्‍हें न तो भारत का युवा नजर आया और नहीं युवा संस्‍कृति‍ ही दि‍खाई दी।
हमें वि‍चार करना चाहि‍ए कि‍ भारत में क्रांति‍कारि‍यों,जनवादि‍यों और प्रगति‍शीलों ने युवा संस्‍कृति‍ और युवा अस्‍मि‍ता को स्‍वतंत्र सामाजि‍क इकाई के रूप में क्‍यों नहीं देखा, जब भी युवा संस्‍कृति‍ के सवाल आते हैं वे 'पतन हो गया' 'पतन हो गया' का राग अलापना क्‍यों शुरू कर देते हैं ? युवा संस्‍कृति का बुनि‍यादी आधार संस्‍कृति‍ और क्रांति‍ के तथाकथि‍त पैराडाइम‍ के बाहर है। उसे संस्‍कृति‍ के परंपरागत पैराडाइम में लाकर जब भी देखा जाएगा उससे न तो युवा समझ में आएगा और न युवा संस्‍कृति‍ ही समझ में आएगी। क्‍या युवा संस्‍कृति‍ का कोई भी वि‍मर्श मासकल्‍चर के बि‍ना संभव है ?
युवा संस्‍कृति‍ पर कोई भी चर्चा मासकल्‍चर के प्रति‍ अवि‍वेकपूर्ण नजरि‍ए से आरंभ नहीं हो सकती। 'नयापथ' के दोनों 'युवाअंक' मासकल्‍चर और युवा के अन्‍तस्‍संबंध को देख ही नहीं पाते। वे यह भी नहीं देख पाते कि‍ युवा संस्‍कृति‍ में अनेक उपसंस्‍कृति‍यां भी हैं। इनके शास्‍त्र हैं। युवा संस्‍कृति‍ के अज्ञान का परम सौंदर्य को इन दोनों अंकों के संपादकीय में भरा पड़ा है। हमारे संपादकगण भूल ही गए हैं कि‍ युवाओं में कि‍सी खास वि‍चार, वि‍चारक,क्रांति‍ आदि‍ का असर क्षणि‍क होता है,दीर्घकालि‍क प्रभाव युवा संस्‍कृति‍ का होता है, युवा अस्‍मि‍ता का होता है। इसकी धुरी है मासकल्‍चर।

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

हाईटेक औरत का गहना है वि‍श्‍वास

मैत्रेयी पुष्‍पा बड़ी लेखि‍का हैं। उनका लि‍खा वजनदार होता है। लेकि‍न जि‍स तरह से उन्‍होंने 'देशकाल' पर एक लेख में प्रति‍क्रि‍या दी है। वह स्‍वीकार्य नहीं है। उन्‍होंने जो बातें कही हैं, वह औरत ,स्‍त्री वि‍मर्श ,स्‍त्रीभाषा और स्‍त्रीवाद के संदर्भ में पुंसवादी हैं। संयम, बंदि‍श, उपदेश, भवि‍ष्‍य,इति‍हास,मूल्‍य,मान-मर्यादा,परंपरा,रीति‍-रि‍वाज , सुकून, स्‍थास्‍थ्‍य, अकलमंदी, बुद्धि‍मानी इत्‍यादि‍ पदबंध औरत के सामने आकर दम तोड़ देते हैं। औरत की दुनि‍या अनुभूति‍ की दुनि‍या है। उसके यहाँ सारे फैसले अनुभूति‍ के आधार पर ही लि‍ए जाते हैं। अनुभूति‍ की कसौटी पर ही वह सारी दुनि‍या को कसकर देखती है।
ज्ञान,वि‍वेक,मूल्‍य,मान-मर्यादा आदि‍ पदबंधों से औरत को कोई लेना देना नहीं है। ये पुंसवादी वि‍मर्श और स्‍त्री को पुंसवादी घेरे में बांधने वाले पदबंध हैं। जि‍स वि‍ज्ञापन की भाषा का मैत्रेयी जी ने अपने लेख में जि‍क्र कि‍या है वह वि‍ज्ञापन है और वि‍ज्ञापन की भाषा उसकी शब्‍दरचना में नहीं होती। उसके अन्‍तर्नि‍हि‍‍त संदेश में होती है। यहां संदेश या सूचना गोली की है, आनंद की नहीं। मैत्रेयी जी की उपदेश और शापग्रस्‍त भाषा समूचे लेख में छायी हुई है। यह भाषा स्‍त्री को अब तक दण्‍डि‍त करती रही है। मैत्रेयी जी का मानना है ''नई तकनीक ने बहुत सारी सुविधाएं दीं-मोबाइल फोन, रसोई के साधन, सफाई के लिए डिटर्जेंट। सचमुच यह औरत की दुनिया में क्रांति है।'' यानी औरत को कैसी होना चाहि‍ए और क्‍या करना चाहि‍ए ,औरत की तथाकथि‍त क्रांति‍कारी दुनि‍या क्‍या है ? उपरोक्‍त पंक्‍ति‍यां बहुत साफ हैं,कि‍सी व्‍याख्‍या की जरूरत नहीं है। एक बडी लेखि‍का के मुँह से इस कदर मर्द भाषा तकलीफ देती है। यह स्‍त्री के असम्‍मान की भाषा है। यह ऐसी भाषा है जि‍सका स्‍त्री के यथार्थ से कोई लेना देना नहीं है। वे जि‍स गोली और उसकी भाषा को लेकर परेशान हैं,काश वह गोली प्रत्‍येक औरत के पास होती।
औरतें अनचाहे गर्भ के कारण आज भी सबसे ज्‍यादा तकलीफ उठाती हैं। यहां तक कि‍ प्रति‍वर्ष हजारों औरतें मर जाती हैं। लाखों औरतों को गर्भपात के चक्‍कर में अनेक नीम हकीमों के हाथों स्‍थायी बीमारि‍यों को अपने शरीर में लेकर घर लौटना होता है। औरत प्‍यार करे, कैसे करे, प्‍यार करे या नहीं करे,बच्‍चा धारण करे या न करे,बॉयफ्रेंड रखे या न रखे, हम कौन हैं जो उसे सलाह दे रहे हैं। हमारा सलाह देना ही स्‍त्री के जीवन में हस्‍तक्षेप है। हम उसकी स्‍वायत्‍तता और स्‍वतंत्रता को शक की नि‍गाह से क्‍यों देखते हैं। औरत को स्‍वतंत्रता खैरात में नहीं मि‍ली है,यह कि‍सी की दया का परि‍णाम भी नहीं है। दि‍न-प्रति‍दि‍न की कुर्बानि‍यों के बाद औरत को स्‍वतंत्रता की थोडी सी संभावनाएं दि‍ख रही हैं उन्‍हें भी हम सहन नहीं कर पा रहे हैं। मैत्रेयी पुष्‍पा ने लि‍खा है ' हाईटेक शताब्दी की युवतियों की ट्रेजैडी यही है'। औरतों के बारे में खासकर हाईटेक औरतों के बारे में यह स्‍टीरि‍योटाईप समझ मैत्रेयीजी को कहां से मि‍ली ? क्‍या उनकी जैसी बड़ी लेखि‍का जि‍सकी औरत के मन पर वि‍द्वत्‍ता की हद तक पकड़ है। उल्‍लि‍खि‍त नि‍ष्‍कर्ष सही है।यह एकदम तथ्‍यहीन है। पहली बात यह कि‍ हाईटेक औरत स्‍वच्‍छंद,उच्‍छृंखल और गर्भपात की शि‍कार नहीं है। यह नि‍ष्‍कर्ष हाइटेक औरत के तथ्‍य और सत्‍य से मेल नहीं खाता। हाइटेक औरतें कैसी होती हैं और क्‍या करती हैं,कैसे शाम गुजारती हैं,कैसा और कि‍तना परि‍श्रम करती हैं,वे कि‍तना अपने लि‍ए समय नि‍काल पाती हैं,यह सब कुछ देखने के लि‍ए थोड़ा सा समय नि‍कालकर बंगलौर या हैदराबाद अथवा अमेरि‍का के कि‍सी हाईटेक हब में चले जाएं तो शायद ऐसा नहीं सोचेंगे।
असल में मैत्रेयी जी का औरत पर वि‍श्‍वास ही नहीं है। वि‍श्‍वास के अभाव के कारण ही वे हाईटेक औरत को संदेह की नजर से देखती हैं। मैत्रेयी जी प्रच्‍छन्‍नत: यही कह रही हैं कि‍ हाईटेक औरतों के पास सेक्‍स करने के अलावा और कोई काम नहीं है। सेक्‍स करने के लि‍ए हाईटेक होने जरूरत नहीं है। सेक्‍स तो बगैर हाईटेक हुए ही सदि‍यों से चला आ रहा है। इससे भी बड़ी समस्‍या है कि‍ वे नैति‍कता के पैमाने पर रखकर औरत की ग‍ति‍वि‍धि‍यों को देख रही हैं। नैति‍कता औरत की सबसे मजबूत बेड़ी है। इसे जि‍तना जल्‍दी औरतें तोड़ दें उतना ही अच्‍छा है। गर्भनि‍रोधक गोलि‍यां परि‍वार नि‍योजन के अनेक उपायों में से एक उपाय है। इससे ज्‍यादा कुछ भी नहीं। परि‍वार नि‍योजन के उपायों का सबसे ज्‍यादा इस्‍तेमाल परंपरागत औरतें करती हैं। गर्भनि‍रोधक गोलि‍यां हों अथवा गर्भ गि‍राने वाली गोलि‍यां हों इन सबने औरत को कष्‍ट दि‍ए हैं। लेकि‍न औरत के जीवन की सबसे बड़ी वि‍पत्‍ति‍ से मुक्‍ति‍ दि‍लाने में मदद की है। औरत को 'संयम','स्‍वतंत्रता', 'गुलामी' आदि‍ कुछ भी नहीं चाहि‍ए उसे सि‍र्फ अपने मन की करने दो, औरत पर वि‍श्‍वास करो।वह गलती करेगी तो दुरूस्‍त भी कर लेगी। लेकि‍न संदेह और अवि‍श्‍वास की नजर से औरत को नहीं देखा जाना चाहि‍ए। औरत खरगोश नहीं है। उसके पास अपना वि‍वेक है हमें उस पर वि‍श्‍वास करना चाहि‍ए। औरत को हमारा समाज अवि‍श्‍वास और संदेह के कारण खोता रहा है। अवि‍श्‍वास के आधार पर औरत से संवाद संभव नहीं है। अवि‍श्‍वास और संदेह करने वालों को औरत अपने मन के पास फटकने नहीं देती। गर्भनि‍रोधक गोलि‍यॉं या परि‍वार नि‍योजन के उपाय औरत पर मनुष्‍य की आस्‍था को पुख्‍ता बनाते हैं। हमें औरतों को 'पुरूषों को चलाने' की चालाकि‍यों के बुढ़ि‍या पुराण के नजरि‍ए से भी नहीं देखना चाहि‍ए।
औरत है ,उसका स्‍वतंत्र अस्‍ति‍त्‍व है। स्‍वायत्‍त संसार है। उसे उपदेश की नहीं हमारे वि‍श्‍वास की जरूरत है,वह कुछ भी करे हमें उस पर वि‍श्‍वास करना चाहि‍ए। वह हमारी है। हम अवि‍श्‍वास और संदेह व्‍यक्‍त करके उसे परायी न बनाएं। औरत के प्रति‍ पराएभाव ने उसे समाज का हि‍स्‍सा ही नहीं बनने दि‍या।औरत के प्रति‍ संशय की नहीं वि‍श्‍वास की जरूरत है।वह भोली,मासूम,नादान,चालाक कुछ भी नहीं है वह तो औरत है उसके पास मन है, दि‍ल है और दुनि‍या को बदलने की आकांक्षा है हमें सि‍र्फ अपना वि‍श्‍वास उसे देना है उपदेश नहीं।हम सि‍र्फ यही कहें स्‍त्री कुछ भी करे हम उसके साथ हैं। औरत को आज के दौर में हमारा वि‍श्‍वास चाहि‍ए। उस पर अवि‍श्‍वास करने वाली बातें उसे आहत करती हैं। हमें इससे बचना चाहि‍ए।

बुधवार, 16 सितंबर 2009

लेखक अब डर गए हैं: चन्‍द्रबली सिंह

हाल ही में कोटा से प्रकाशि‍त पत्रि‍का 'अभि‍व्‍यक्‍ति‍' का नया अंक देखने को मि‍ला। इस अंक में हिंदी के सबसे बडे लेखक और आलोचक चन्‍द्रबली सिंह का एक शानदार साक्षात्‍कार छपा है। चन्‍द्रबली सिंह का व्‍यक्‍ति‍त्‍व और कृतित्‍व हिंदी लेखकों से छि‍पा नहीं है। वे हिंदी के शि‍खरपुरूष स्‍व.रामवि‍लास शर्मा से लेकर जीवि‍त शि‍खर पुरूष नामवर सिंह के ज्ञानगुरू हैं। हिंदी की वैज्ञानि‍क आलोचना के नि‍र्माण में उनका बहुमूल्‍य योगदान रहा है। उनकी‍ मेधा के सामने रामवि‍लास शर्मा से लेकर नामवर सिंह तक सभी नतमस्‍तक होते रहे हैं। चन्‍द्रबली जी हिंदी के ज्ञानगुरू हैं। हिंदी के लेखक जब भी गंभीर संकट में फंसे हैं उनके पास गए हैं और उनके द्वारा दि‍शा नि‍र्देश पाते रहे हैं। चन्‍द्रबली सिंह प्रगतिशील लेखक संघ से लेकर जनवादी लेखक संघ तक सभी में शि‍खर नेतृत्‍व का हि‍स्‍सा रहे हैं। पि‍छले पैंसठ साल से भी ज्‍यादा समय से प्रगति‍शील आलोचना को दि‍शा देते रहे हैं। इन दि‍नों चन्‍द्रबली सिंह अस्‍वस्‍थ हैं और बनारस में अपने घर पर ही बि‍स्‍तर पर पडे आराम कर रहे हैं। 'अभि‍व्‍यक्‍ति‍' के संपादक 'शि‍वराम' ने उनका साक्षात्‍कार प्रकाशि‍त करके हिंदी की बडी सेवा की है। स्‍वयं शि‍वराम भी राजस्‍थान में सबसे ज्‍यादा सक्रि‍य परि‍वर्तनकामी लोकतांत्रि‍क नजरि‍ए के लेखक हैं।
अपने साक्षात्‍कार में चन्‍द्रबली सिंह ने जो कहा है वह हिंदी के लेखक संगठनों की उदासीनता और बेगानेपन के खि‍लाफ तल्‍ख टि‍प्‍पणी है। चन्‍द्रबली जी ने लेखक संगठनों के बारे में कहा है '' लेखक संगठन जो काम कर रहे हैं,बहुत संतोषजनक तो नहीं है,उनका अस्‍ति‍त्‍व औपचारि‍क हो गया है। '' हिंदी लेखक संगठनों के बारे में यह टि‍प्‍पणी ऐसे समय में आयी है जब हिंदी के लेखक सबसे ज्‍यादा असहाय महसूस कर रहे हैं। लेखक संगठनों की नि‍ष्‍क्रि‍यता, वि‍चारधारात्‍मक उदासीनता और स्‍थानीय गुटबंदि‍यां चरमोत्‍कर्ष पर हैं। अब लेखक संगठन प्रतीकात्‍मक रूप में काम कर रहे हैं। लेखक संगठन प्रतीक क्‍यों बनकर रह गए हैं ? औपचारि‍क संगठन बनकर क्‍यों रह गए हैं ,उनके अंदर कोई वैचारि‍क और सर्जनात्‍मक सरगर्मी नजर क्‍यों नहीं आती ? हिन्‍दी में तीन बडे लेखक संगठन हैं,प्रगति‍शील लेखक संगठन,जनवादी लेखक संगठन,जनवादी सांस्‍कृति‍क मोर्चा। इनके अलावा और अनेक स्‍थानीय स्‍तर के लेखक संगठन हैं। लेकि‍न तीन बडे संगठनों में कि‍सी भी कि‍स्‍म का समन्‍वय नहीं है। इन संगठनों की कार्यप्रणली में इनके साथ जुडे राजनीति‍क दलों की राजनीति‍क संकीर्णताएं घुस आयी हैं। इस प्रसंग में चन्‍द्रबली सिंह ने कहा '' कुछ को ऑर्डि‍नेशन राजनीति‍क तौर पर हुआ है,पर उनकी राजनीति‍ से जुड़े जो सांस्‍कृति‍क संगठन हैं उनमें कोई समन्‍वय नहीं हुआ है। जहॉं तक कि‍ साहि‍त्‍यि‍क मतभेदों का सवाल है वह तो हर बौद्धि‍क संगठन में होना चाहि‍ए।... लेखकों का संगठन राजनैति‍क संगठन की तर्ज पर नहीं चल सकता।'' आगे बड़ी ही प्रासंगि‍क दि‍क्‍कत की ओर ध्‍यान खींचते हुए चन्‍द्रबली जी ने कहा '' राजनैति‍क पार्टी में तो डेमोक्रेटि‍क सेन्‍ट्रलि‍ज्‍म के नाम पर जो तय हो गया,वह हो गया। पर लेखक संगठनों में तो यह नहीं हो सकता कि‍ फतवा दे दें कि‍ जो ऊपर तय हो गया तो हो गया। दि‍क्‍कत तो है। सम्‍प्रति‍ कोई ऐसी संस्‍था नहीं है कि‍ समन्‍वय की ओर बढ़ सके। हम तो यह महसूस करते हैं कि‍ इन संगठनों में जो नेतृत्‍व है वह नेतृत्‍व भी जो वि‍चार-वि‍मर्श करना चाहि‍ए,वह नहीं करता है।पार्टी को इतनी फुर्सत नहीं है कि‍ इन समस्‍याओं की ओर ध्‍यान दें।
चन्‍द्रबली सिंह ने एक रहस्‍योद्घाटन कि‍या है कि‍ लेखक संगठनों की समन्‍वय समि‍ति‍ बने यह प्रस्‍ताव नामवर सिंह ने दि‍या था ,चन्‍द्रबली जी भी उससे संभवत: सहमत थे। लेकि‍न पता नहीं क्‍यों यह प्रस्‍ताव अमल में अभी तक नहीं आ पाया है। चन्‍द्रबलीजी ने कहा है, '' मैंने समन्‍वय समि‍ति‍ का,नामवर ने जो प्रस्‍ताव रखा था कि‍ यदि‍ एक न हों तो समन्‍वय समि‍ति‍ हो जाए।पार्टियॉं जो हैं उनमें तो समन्‍वय समि‍ति‍ बनी ही है‍। पर लेखक संगठन व्‍यवहार में यह स्‍वीकार नहीं करते हैं कि‍ वे पार्टियों से जुडे हैं। समन्‍वय की प्रक्रि‍या शुरू करने के लि‍ए जब तक दबाव नहीं बनाया जाएगा तब तक यह सम्‍भव नहीं है। बि‍ना दबाव के यह हो नहीं पाएगा।'' पुराने जमाने और आज के जमाने के लेखक संगठनों की बहसों की तुलना करते हुए चन्‍द्रबली जी ने कहा '' ऐसा लगता नहीं है कि‍ जैसी पहले मोर्चाबंदी हुई थी एक जमाने में,वैसी अब होती हो। वैसी अब दि‍खाई नहीं देती।वैसा वैचारि‍क संघर्ष दि‍खाई नहीं देता। गड्ड-मड्ड की स्‍थि‍ति‍ है। खास तौर से जो पत्र- पत्रि‍काएँ नि‍कलती हैं उनमें उस तरह की स्‍पष्‍टता और मोर्चाबंदी नजर नहीं आती। कभी -कभी ऐसा लगता है कि‍ लेखक मंच पर भी व्‍यक्‍ति‍यों के साथ आता है। उसके सारे गुण और दोष इन संगठनों में वह ग्रहण करता है। लीडरशि‍प के नाम पर लेखकों में एक सैक्‍टेरि‍यन दृष्‍टि‍कोण पनपता है।पतनशील प्रवृत्‍ति‍यों से कोई संघर्ष नहीं है। ये प्रवृत्‍ति‍यॉं मौजूद रहती हैं।'' चन्‍द्रबली सिंह ने एक बडी ही मार्के की बात कही है। '' मैं तो यहाँ जलेस से कहता हूँ‍ ,जि‍समें ज्‍यादातर कवि‍ ही हैं। वे कवि‍ता सुना जाते हैं। उनसे कहता हूँ कि‍ अपनी कवि‍ताऍं,जनता के बीच में जाओ,उन्‍हें सुनाओ।फि‍र देखो क्‍या प्रति‍क्रि‍या होती है। जनता समझती है या नहीं।पाब्‍लो नेरूदा जैसा कवि‍ जनता के बीच जाकर कवि‍ता सुनाता था। जनता को उसकी कवि‍ताऍं याद हैं। जनता को जि‍तना मूर्ख हम समझते हैं वह उतनी मूर्ख नहीं है। यदि‍ वह तुलसी और कबीर को समझ सकती है तो तुम्‍हें भी तो समझ सकती है।बशर्ते उसकी भाषा में भावों को व्‍यक्‍त कि‍या जाए।'' समीक्षा के वर्तमान मठाधीश प्रगति‍शील लेखकों की उपेक्षा करते हैं। इस पर चन्‍द्रबली जी ने कहा '' कहते तो हैं अपने को प्रगति‍शील और जनवादी पर कहीं न कहीं कलावादि‍यों का प्रभाव उन पर है। आज के शीर्षस्‍थ जो आलोचक हैं,नामवरसिंह ,उनके जो प्रति‍मान हैं,वे सारे प्रति‍मान लेते हैं,वि‍जयनारायण देव साही से।'' चन्‍द्रबली जी ने बडी ही मार्के की एक अन्‍य बात कही है '' लेखक अब डर गए हैं।'' लेखकों में यह डर कहां से आया ? प्रगति‍शील लेखकों का वैचारि‍क जुझारूपन कहॉं गायब हो गया,आज वे अपने सपनों और वि‍चारों के लि‍ए तल्‍खी के साथ लि‍खते क्‍यों नहीं हैं ? लेखक अपने वि‍चारों के प्रति‍ जब तक जुझारू नहीं होगा तब तक स्‍थि‍ति‍ बदलने वाली नहीं है। लेखकों को अपना डर त्‍यागना होगा,अपने लेखन और व्‍यक्‍ति‍त्‍व को नि‍हि‍तस्‍वार्थों के दायरे के बाहर लाकर वैचारि‍क संघर्ष करना होगा। बुद्धि‍जीवि‍यों को दलीय वि‍चारधारा के फ्रेम के बाहर नि‍कलकर मानवाधि‍कार के परि‍प्रेक्ष्‍य में अपने वि‍चारधारात्‍मक सवालों को नए सि‍रे से खोलना होबा। हिंदी के बुद्धि‍जीवि‍यों में एक तरु डर है तो दूसरी औ व्‍यवहारवाद भी गहरी जडें जमाए बैठा है। हम अपने लेखन से कि‍सी को नाराज नहीं करना चाहते। लेखक के नाते हमें यह याद रखना होगा, कि‍ लेखक का काम दि‍ल बहलाना नपहीं है। लेखन की दि‍ल बहलाने वाली भूमि‍का में अगर हमारा लेखन चला जाता है तो जसने-अनजाने दरबारी सभ्‍यता और संस्‍कृति‍ का गुलाम बनकर रह जाएगा। दि‍ल बहलाने वाले साहि‍त्‍य में जीवन की गंध,दुख,दर्द और प्रति‍वाद के स्‍वर व्‍यक्‍त नहीं होते। दि‍ल बहलाने का काम लेखक का नहीं है। दि‍ल बहलाने के लि‍ए खि‍लौने बाजार में मि‍लते हैं। हम बाजार जाएं अपने लि‍ए दि‍ल बहलाने का सामान खरीद लाएं और घर बैठे आनंद लें। लेखक का काम आम लोगों को बेचैन करना और स्‍वयं भी बेचैन रहना,अपना डर नि‍कालना साथ समाज का भी डर नि‍कालना। लेखक कि‍सी एक का नहीं होता वह सबका होता है कठोरता,नि‍र्भीकता और ममता से भरा होता है।
( 16 सि‍तम्‍बर 2009 को 'मोहल्‍ला लाइव डॉट कॉम ' और 'भड़ास ब्‍लाग'पर भी प्रकाशि‍त )

सोमवार, 14 सितंबर 2009

साइबरस्‍पेस में घायल प्रभाष जोशी -राजेन्‍द्र यादव

साइबर संस्‍कृति‍ से परहेज करने वालों की इन दि‍नों शामत आयी हुई है।प्रभाष जोशी-राजेन्‍द्र यादव जैसे बडे लेखक जो नेट से नफरत करते हैं अथवा नेट पर लि‍खे को संवाद योग्‍य नहीं समझते,उनकी दि‍माग की नसें तनी हुई हैं। वे नेट से होने वाले हमलों से घायल हैं और कराह रहे हैं। साइबर घायलों का कहीं इलाज नहीं होता, कोई अस्‍पताल उनकी केयर नहीं करता।यहां तक कि‍ गांठ की बुद्धि‍ भी काम नहीं देती।समझ में ही नहीं आता कि‍ नेट पर इतने ताबडतोड हमले के पीछे राज क्‍या है ? वह भी ऐसे लेखकों से जि‍नका साहि‍त्‍य और पत्रकारि‍ता में कुछ भी दांव पर नहीं लगा है। नेट लेखकों का यदि‍ जमीनी स्‍तर पर कहीं कुछ दांव पर लगा हो तो वे अपने लगुए-भगुओं से कहकर ठीक भी करा दें। लेकि‍न इस नेट का क्‍या करें इसने तो रातों की नींद और दि‍न का चैन हराम कर दि‍या है। नेट पर इन दोनों महानुभावों के बारे में कोई तीखी आलोचना प्रकाशि‍त होती है,तुरंत भक्‍तगण दौडे जाते हैं,महाराज कुछ करो ये चुप नहीं हो रहे। वे दोनों अपने भक्‍तों से कहते हैं जाओ और धावा बोल दो। धावा बोलने के चक्‍कर में कुछ लोग वापस अपने घर आकर सो जाते हैं। जि‍नकी मजबूरी है वे उल्‍टी सीधी टि‍प्‍पणि‍यां लि‍खकर अपने गुरू के प्रति‍ दायि‍त्‍व की इति‍श्री समझ लेते हैं।
प्रभाष जोशी-राजेन्‍द्र यादव को 'हिंदीयुगल' कहना ठीक होगा। इन दोनों की तान को जि‍स तरह नेट ने बेताला कि‍या है उसने नेट लेखन और प्रिंट लेखन से जुडे कुछ बडे सवालों को उठा दि‍या है। 'हिंदीयुगल' पर हुए हमले का पहला सबक है नेट का हमला स्‍थानीय नहीं ग्‍लोबल होता है। 'जनसत्‍ता' या 'हंस' को स्‍थानीय पाठक पढते हैं । नेट को ग्‍लोबल पाठक पढ़ते हैं। दूसरा सबक ,नेट लेखन और इमेज वर्षा अंतत: वर्चुअल यथार्थ है,यथार्थ नहीं है। इसकी यथार्थ से संगति‍ खोजना बेवकूफी है।
नेट लेखन,इमेज,भाषा,प्रतीक आदि‍ कि‍सी को भी पढने,लि‍खने और समझने के लि‍ए हमें वर्चुअल रि‍यलि‍टी से वाकि‍फ होना होगा। यह लेखन और इमेज का रेगि‍स्‍तान है। लेखन के रेगि‍स्‍तान के नि‍यम वैसे ही होते हैं जैसे रेगि‍स्‍तान के होते हैं। लेखन के रेगि‍स्‍तान में लि‍खे को देखकर हिंदी के इन लेखकों के भक्‍तों को यह भी लगा कि‍ इस प्रक्रि‍या में कोई 'फेक' लि‍ख रहा है। मजेदार बात यह थी कि‍ अनेक 'फेक' नाम से बहस में राय भी दे रहे थे, इससे 'फेक' जैसा भी रहा था। नेट लेखन का 'फेक' लगना और अखबार लेखन का वास्‍तव लगना यह अपने आपमें आनंद की चीज है।
जब नेट पर बहस चल नि‍कली तो बेलगाम थी। जि‍सके मन में जो आ रहा था लि‍ख रहा था। कोई अनुशासन नहीं,कोई संपादक नहीं।कोई सेंसरशि‍प नहीं। सब कुछ पारदर्शी वर्चुअल था। बहस में बार बार वि‍षयान्‍तर हो रहा था लोग बहस को पकड़कर मुद्दे पर ला रहे थे और बार-बार बहस हाथ नि‍कली जा रही थी और यही नेट के रेगि‍स्‍तान की खूबी है। जैसे रेगि‍स्‍तान में अंधड मि‍ट्टी के टीले को एक जगह से उठाकर दूसरी जगह ले जाता है ठीक वैसे ही नेट लेखन चीजें जहां हैं वहां नहीं रहने देता। सबवर्सि‍ब भूमि‍का अदा करता है।
नेट की बहसों में लेखकगण नि‍जी कल्‍पनाशीलता के आधार पर शि‍रकत करते हैं। यथार्थ के आधार पर शि‍रकत नहीं करते हैं। वि‍भि‍न्‍न वेबसाइट वालों ने प्रभाष जोशी के रवि‍वार डॉट कॉम वाले साक्षात्‍कार को प्रकाशि‍त करके उस पर जब बहस चलायी और यूजरों से प्रति‍क्रि‍याएं मांगी तो प्रभाष जोशी का साक्षात्‍कार बार-बार उनकी बडी ही त्रासद छवि‍ बना रहा था। पढने वाले प्रभाष जोशी को बडे ही दुखी भाव से देख रहे थे और मन ही मन कह रहे थे प्रभाषजी आपने ऐसा क्‍यों कहा। यदि‍ यह सब न कहते तो इतनी फजीहत तो कम से कम नहीं होती। इस मामले में नेट लेखक रि‍यलि‍टी टीवी के पैटर्न का अनुगमन करते हैं। नेट पर जो आता जो आता गया अपना राग सुनाता गया और चीजों को पारदर्शी रूप में देखता गया। आप प्रभाष जोशी के पक्ष में बोलें या वि‍पक्ष में अंत में नाटक तो प्रभाषजोशी-राजेन्‍द्रयादव का ही हो रहा था। नेट लीला का यह रि‍यलि‍टी टीवी रूप था,जि‍समें वर्चुअल रि‍यलि‍टी अपना खेल खेल रही थी। इसमें 'अच्‍छे' और 'बुरे' के बीच का वर्गीकरण भी चल रहा था।
नेट लेखन में सामान्‍य लेखन की तरह नैति‍क पक्ष भी प्रच्‍छन्‍न रूप में आ धमकता है। इस पूरी प्रक्रि‍या से सबसे ज्‍यादा प्रभावि‍त और पीडि‍त महसूस प्रभाष-राजेन्‍द्र यादव और उनकी भक्‍तमंडली महसूस कर रही थी। नेट की शक्‍ति‍ ने प्रभाषजोशी-राजेन्‍द्र यादव की पूरी कि‍स्‍सागो क्षमता को सोख लि‍या था,पढने वाले तकलीफ पा रहे थे,कुछ आराम महसूस कर रहे थे। अब प्रभाषजोशी- राजेन्‍द्रयादव स्‍वयं नेट पर एक कहानी बनकर रह गए थे। वे दोनों परेशान थे कि‍ हमने जो कहा नहीं, कि‍या नहीं, पता नहीं कहां से खोज खोजकर हमारे आख्‍यान के साथ नत्‍थी कर दि‍या गया और जो आख्‍यान बनाया जा रहा था वह टुकडों में बि‍खरा हुआ था। कोई टुकडा इस वेब पर था तो कोई दूसरा टुकड़ा अन्‍य वेब पर था। इन दोनों की कहानी का एक हि‍स्‍सा 'क' के बयान में था तो अन्‍य पहलू 'ख' के बयान में था। ये दोनों महारथी अपनी नेट कहानी पहचान नहीं पा रहे थे। इन्‍हें अपने चेहरे और वि‍चार अपने नजर नहीं आ रहे थे। इसी को कहते हैं नेट वि‍पर्यय।
ये दोनों ही लेखक अपने शब्‍दों के असर को पहचान नहीं पा रहे थे, सोचने में असमर्थ पा रहे थे कि‍ उनके शब्‍दों का इतना व्‍यापक प्रभाव है। जो तल्‍खी और गुस्‍सा इन दोनों पर चली बहस में सामने आया है वह यह बताने के लि‍ए पर्याप्‍त है कि‍ शब्‍दों के प्रभाव को ध्‍यान में रखकर लि‍खना चाहि‍ए। जो मन में आया बोल दि‍या,जो मन में आया लि‍ख दि‍या, इसका कम से कम लेखक और बडे लेखक को तो खास तौरपर ख्‍याल रखना चाहि‍ए। इन दोनों के लेखन पर चली बहस ने नेट पाठकों का अच्‍छा खासा मनोरंजन भी कि‍या,कुछ मर्माहत हुए तो कुछ लोगों को अपना गुस्‍सा जाहि‍र करने का मौका मिला।
नेट लेखन में नि‍ज-संदर्भ,बि‍डम्‍वना,प्रामाणि‍कता और पुनरावृत्‍ति पर सबसे ज्‍यादा लि‍खा जाता है। यह उत्‍तर आधुनि‍क खेल यहां पर भी चला। जो आलोचनात्‍मक टि‍प्‍पणि‍यां आयीं वे यथार्थ का अति‍क्रमण करने वाली थीं।‍ यथार्थ में इन दोनों लेखकों ने जो कहा उसकी इनके लेखन के सांस्‍कृति‍क संदर्भ में मीमांसा की गई। प्रभाष जोशी-राजेन्‍द्र यादव के भक्‍त चाहते थे,अतीत को अतीत रहने दो उसे अब सामने लाने से क्‍या लाभ जबकि‍ अन्‍य कह रहे थे जब बहस उनके लेखन के सांस्‍कृति‍क संदर्भ पर हो रही है तो हमें उनके अतीत और व्‍यवहार को भी वि‍वादि‍त गद्य के साथ जोडकर देखना चाहि‍ए। वे इन दोनों लेखकों के बहाने वर्तमान में प्रेस और समाज की दशा पर भी बातें कर रहे थे।
'हिंदीयुगल' के भक्‍त मानकर चल रहे थे नेट की बहस मूर्त्‍तिभंजन है। जबकि‍ अन्‍य ऐसा नहीं मानते। इस बहस में सब कुछ नि‍र्मि‍त था,कुछ भी स्‍वाभावि‍क नहीं था,इन दोनों का इति‍हास भी नि‍र्मि‍त था। हम असल में यथार्थ लेखकों से मुठभेड नि‍र्मि‍त लेखक के जरि‍ए कर रहे थे। उसका वैकल्‍पि‍क इति‍हास भी बना रहे थे। वर्चुअल रि‍यलि‍टी का नि‍यम है कि‍ जब तक लोग हजम नहीं कर लेते तब तक समझो कुछ नहीं हुआ है। प्रभाष जोशी-राजेन्‍द्र यादव को जब लोगों ने हजम कर लि‍या तब ही पता चला कि‍ आखि‍र हुआ क्‍या है ?
'हिंदीयुगल' का वैकल्‍पि‍क इति‍हास वह है जो यूजरों के अनुभवों से छनकर सामने आया,इसकी हमें कम जानकारी थी। यूजरों ने अपने व्‍यक्‍ति‍गत अनुभवों की एक-एक रेखा खींचकर जो चि‍त्र बनाया वह वास्‍तव लेखक की प्रचारि‍त इमेज से एकदम भि‍न्‍न था। यह वह इति‍हास है जो इन दोनों की व्‍यावसायि‍क इमेज और प्रति‍ष्‍ठा के बाहर है। जब लोग अपनी राय दे रहे थे तो कुछ लोग प्रमाण मांगरहे थे उनसे यही कहना है कि‍ प्रमाण तो लि‍खि‍त पंक्‍ति‍यां ही हैं।इस प्रक्रि‍या में इन दोनों के बारे में बना हुआ भक्‍ति‍ का प्रभामंडल नष्‍ट हुआ । नेट लेखन मूलत: प्रभामंडल नष्‍ट करता है। यदि‍ आपने भक्‍ति‍ भाव से लि‍खा है तो यूजर उसे कभी ग्रहण नहीं करेगा। नेट की बहस में यूजर अपने अनुभवों के साथ दाखि‍ल हो रहे थे और इन दोनों के आभामंडल को नष्‍ट कर रहे थे। साथ ही इन दोनों की रोमैंटि‍क इमेज को भी इस बहस ने नष्‍ट कि‍या। नेट पर सस्‍ती भावुकता और भक्‍ति‍ अपील नहीं करती बल्‍कि‍ आलोचनात्‍मक वि‍वेक अपील करता है। वै‍कल्‍पि‍क नजरि‍या अपील करता है।
( मोहल्‍ला लाइव पर 14 सि‍तम्‍बर 2009 को प्रकाशि‍त )

रविवार, 13 सितंबर 2009

14 सि‍तम्‍बर हिंदी दि‍वस पर वि‍शेष- संचार क्रांति‍ में हिंदी रैनेसां

साइबर युग में हिंदी दि‍वस का वही महत्‍व नहीं है जो आज से बीस साल पहले था। संचार क्रांति‍ ने पहलीबार भाषा वि‍शेष के वर्चस्‍व की वि‍दाई की घोषणा कर दी है। संचार क्रांति‍ के पहले भाषा वि‍शेष का वर्चस्‍व हुआ करता था, संचार क्रांति‍ के बाद भाषा वि‍शेष का वर्चस्‍व स्‍थापि‍त करना संभव नहीं है। अब कि‍सी भी भाषा को हाशि‍ए पर बहुत ज्‍यादा समय तक नहीं रखा जा सकता। अब भारत की सभी 22 राजकाज की भाषाओं का फॉण्‍ट मुफ्त में उपलब्‍ध है। भारतीय भाषाओं का साफ्टवेयर बनना स्‍वयं में भाषायी वर्चस्‍व की समाप्‍ति‍ की घोषणा है। संचार क्रांति‍ ने यह संदेश दि‍या है कि‍ भाषा अब लोकल अथवा स्‍थानीय नहीं ग्‍लोबल होगी। भाषा की स्‍थानीयता की जगह भाषा की ग्‍लोबल पहचान ने ले ली है। अब प्रत्‍येक भाषा ग्‍लोबल है। कोई भाषा राष्‍ट्रीय,क्षेत्रीय अथवा आंचलि‍क नहीं है।

उपग्रह क्राति‍ के साथ ही संचार क्रांति‍ हुई और हम सब नए भाषायी पैराडाइम में दाखि‍ल हुए हैं। भाषा की स्‍थानीयता खत्‍म हुई है। बहुभाषि‍कता का प्रसार हुआ है। अब वि‍भि‍न्‍न भाषाओं में लोग आसानी के साथ संवाद कर रहे हैं। एक- दूसरे को संदेश और सामग्री संप्रेषि‍त कर रहे हैं। अब हिंदी की स्‍थानीय अथवा राष्‍ट्रीय स्‍वीकृति‍ की समस्‍या नहीं है। बल्‍कि‍ संचार क्रांति‍ ने हिंदी और अन्‍य सभी भाषाओं को ग्‍लोबल स्‍वीकृति‍ दि‍लायी है। आज वे कंपनि‍यां और कारपोरेट घराने हिंदी का कारोबार करने के लि‍ए मजबूर हैं जो कभी यह मानते थे कि‍ वे सि‍र्फ अंग्रेजी का ही व्‍यवसाय करेंगे। इस प्रसंग में रूपक मडरॉक के स्‍वामि‍त्‍व वाले 'न्‍यूज कारपोरेशन' का उदाहरण देना समीचीन होगा। इस कंपनी की प्रति‍ज्ञा थी कि‍ वह समाचारों का सि‍र्फ अंग्रेजी में ही प्रसारण करेगा, और उसने सारी दुनि‍या में अंग्रेजी के ही न्‍यूज चैनल खोले,लेकि‍न भारत में आने के बाद पहलीबार उसे अपनी प्रति‍ज्ञा हिंदी के आगे तोड़नी पड़ी और स्‍टार न्‍यूज का हिंदी में पहलीबार प्रसारण शुरू हुआ। हिंदी सत्‍ता और महत्‍ता का लोहा एमटीवी संगीत चैनल ने भी माना। एमटीवी के सारी दुनि‍या में अंग्रेजी संगीत चैनल हैं,इस कंपनी ने भारत में जब संगीत चैनल खोलने का फैसला कि‍या तो हिंदी संगीत चैनल के रूप में एमटीवी आया। संचार क्रांति‍ के दबावों के कारण ही भारत सरकार ने तकरीबन 1300 करोड रूपया भारतीय भाषाओं के सॉफ्टवेयर के नि‍र्माण और मुफ्त सप्‍लाई पर खर्च कि‍या है। भाषाओं के उत्‍थान के लि‍ए इतना ज्‍यादा पैसा पहले कभी खर्च नहीं कि‍या गया। इसका सुफल जल्‍दी ही सामने आने वाला है। अब तेजी से हिंदी और भारतीय भाषाओं में भाषान्‍तरण हो रहा है भाषाओं का पहले की तुलना में आज भाषान्‍तरण और संवाद तेजी से हो रहा है। आप सहज ही अपनी भाषा में लि‍खी सामग्री को कि‍सी भी देशी वि‍देशी भाषा में रूपान्‍तरि‍त कर सकते हैं।सि‍र्फ कम्‍प्‍यूटर चलाना आता हो और इंटरनेट कनेक्‍शन हो। उपग्रह क्रांति‍ ने भाषाओं रीयल टाइम में संवाद और संचार को जन्‍म दि‍या है। भाषाओं में तत्‍क्षण संवाद की संभावना पहले कभी नहीं थीं। व्‍यक्‍ति‍ के मि‍लने के बाद ही संवाद होता था,अब तो व्‍यक्‍ति‍ नहीं भाषाएं मि‍ल रही हैं। भाषाओं के लि‍ए संचार क्रांति‍ रैनेसां लेकर आयी है।

उपग्रह क्रांति‍ के कारण यह संभव हो पाया है कि‍ आज भारतीय भाषाओं के टीवी और रेडि‍यो चैनल वि‍श्‍वभर में कहीं पर भी डीटीएच सेवाओं के जरि‍ए देखे और सुने जा सकते हैं।इंटरनेट के जरि‍ए भाषायी प्रेस सारी दुनि‍या में पढा जाता है। इस प्रक्रि‍या में भाषाओं की स्‍थानीयता खत्‍म हुई है। भाषाओं के रैनेसां का युग है। हिंदी आज स्‍वाभावि‍क तौर पर भारत की पहचान का मूलाधार बन गयी है। यह सब संचार क्रांति‍ के कारण संभव हुआ है।

नाइन इलेवन की घटना के बाद अमेरि‍का में जि‍स तरह के सुरक्षा उपाय कि‍ए गए हैं उसके कारण वहां पर सुपर कम्‍प्‍यूटर में सारी दुनि‍या के सभी भाषाओं के ईमेल और तमाम कि‍स्‍म की सामग्री की छानबीन अहर्निश चलती रहती है। इसके कारण अमेरि‍का ने तय कि‍या कि‍ वह अपने देश के स्‍कूलों में चीनी,हिंदी,रूसी आदि‍ भाषाओं के पठन-पाठन की खास व्‍यवस्‍था करेगा। सुरक्षा कारणों और सैन्‍य वर्चस्‍व को बनाए रखने के लि‍हाज से अमेरि‍का में हिंदी के अध्‍यापन की व्‍यापक व्‍यवस्‍था पर ध्‍यान दि‍या जा रहा है। न्‍यूज कारपोरेशन, डि‍जनी,सीएनएन,सोनी,एमटीवी आदि‍ कंपनि‍‍यां भारत के मीडि‍या बाजार में प्रवेश करने के लि‍ए सबसे पहले हिंदी में चैनल ,प्रेस और मीडि‍या प्रोडक्‍ट लेकर आई हैं। अब वे देशी समाचारपत्रों में पैसा लगा रहे हैं।

बांग्‍ला के आनंद बाजार प्रकाशन,जागरण प्रकाशन,अमर उजाला प्रकाशन ,हिंदुस्‍तान टाइम्‍स,टाइम्‍स ऑफ इंडि‍या आदि‍ में वि‍देशी कंपनि‍यों का पूंजी नि‍वेश इस बात का संकेत है कि‍ भाषायी मीडि‍या में बहुराष्‍ट्रीय मीडि‍या कंपनि‍यां नतमस्‍तक होकर पैसा लगाने आ रही हैं और अंग्रेजी की तुलना में देशज भाषाओं की महत्‍ता को स्‍वीकार कर रही हैं। इस क्रम में हिंदी को स्‍वाभावि‍क बढत मि‍ली है,अन्‍य भाषाएं भी इस प्रक्रि‍या में अपना वि‍कास करेंगी। इस अर्थ में यह भाषाओं के नवजागरण का दौर है। हिंदी में अनुवाद और डबिंग का इतना व्‍यापक बाजार पैदा हुआ है इसके बारे में हमने कभी सोचा भी नहीं था। अनुवाद का ही तकरीबन 12 हजार करोड रूपये का भारत में बाजार है।कई हजार करोड रूपये का डबिंग का बाजार है,अभी तो कई बाल चैनल 24 घंटे हिंदी में डब कि‍ए गए कार्यक्रम दि‍खाते रहते हैं। वि‍ज्ञापनों में हिंदी वि‍ज्ञापन अकेले 7-8 हजार करोड के बाजार को घेरे हुए हैं। पहले अनूदि‍त वि‍ज्ञापन होते थे अब हिंदी के मौलि‍क वि‍ज्ञापन तैयार हो रहे हैं।

कोई भाषा कि‍तनी ताकतवर है यह इस बात से तय होता है कि‍ व्‍यापार और आर्थि‍क मीडि‍या उसमें है या नहीं। अंग्रेजी के बाद हिंदी अकेली भाषा है जि‍समें व्‍यापारि‍क चैनल और अखबार हैं, जैसे एनडीटीवी प्रोफि‍ट,जी बि‍जनेस, सीएनबीसी आवाज आदि‍। इसी तरह बि‍जनेस स्‍टैंडर्ड, इकोनॉमि‍क टाइम्‍स जैसे आर्थि‍क अखबार सस्‍ते दामों पर हिंदी में नि‍कल रहे हैं। आर्थि‍क अखबार और टीवी चैनलों का हिंदी में आना ,हिंदी में धडाधड इंटरनेट सामग्री का आना, तेजी से ब्‍लॉग संस्‍कृति‍ का वि‍कास इस बात का संकेत हैं कि‍ हिंदी अब ग्‍लोबल भाषा है सही अर्थों में देशी वि‍देशी नागरि‍कों की वि‍श्‍वभाषा है। सैटेलाइट हिंदी चैनलों के करोड़ों दर्शक भारत के बाहर हैं यह सब संभव हुआ है संचार क्रांति‍,उपग्रह क्रांति‍, कम्‍प्‍यूटर और डि‍जि‍टलाईजेशन के कारण।

कहने का तात्‍पर्य यह है हिंदी आज वास्‍तव अर्थों में ग्‍लोबल भाषा है । हिंदी मीडि‍या ग्‍लोबल स्‍तर पर संचार कर रहा है। यह हिंदी का नया पैराडाइम है। यह राज्‍य,कारपोरेट जगत और तकनीकी कैद से मुक्‍त एक नए रैनेसां की शुरूआत है। आओ हम संचार क्रांति‍ का स्‍वागत करें और अपने को हिंदी संस्‍कृति‍ के साथ 'ई' साक्षर भी बनाएं। 'ई' साक्षरता के बि‍ना हम और हमारी भाषाएं नहीं बचेगी। आज प्रत्‍येक हिंदीभाषी की यह जि‍म्‍मेदारी है कि‍ वह अपने को संचार क्रांति‍ से जोड़े और अपने को 'ई' साक्षर बनाए।
(भड़ास ब्‍लाग पर 13 सि‍तम्‍बर 2009 को प्रकाशि‍त )

शनिवार, 12 सितंबर 2009

फैंटेसी के युग में लेखक का अवमूल्‍यन

यह लेखक और लेखन के अवमूल्यन का दौर है। इस दौर में लेखन का मूल्य आंकना सबसे मुश्किल काम है। लेखकीय प्रमोशन लेखन के बल पर नहीं होरहा बल्कि प्रमोशन योजनाओं के जरिए हो रहा है। लेखकों में आज के सवाल और आज का साहित्य गंभीरता के साथ विश्लेषित नहीं हो रहा बल्कि प्रचार अभियान में शिरकत का महत्व बढ़ गया है। सब कुछ प्रायोजित हो रहा है। समीक्षा से लेकर सम्मेलन के बहस-मुबाहिसों तक प्रायोजन का चक्र चल रहा है।
बुर्जुआ विचारधारा पर बातें करने की बजाय निहितस्वार्थ के सवालों पर बातें कर रहे हैं। भुखमरी और मजदूरों की कम पगार ,छंटनी आदि के सवालों पर बातें करने की बजाय श्रम के कमोडिफिकेशन पर बातें कर रहे हैं। उपभोग,वि‍नि‍मय और वि‍तरण के सवालों पर सतही वि‍मर्श कर रहे हैं। प्रति व्यक्ति स्कूल और कॉलेज में क्या व्यय किया जा रहा है उन पर बातें कर रहे हैं। अथवा हम स्वयं को महत्व देने वाले सवालों पर ज्यादा चर्चा कर रहे हैं। अन्य के बारे में बातें करने की फुरसत ही नहीं है। अथवा जब मौका मिल जाता है तो मार्क्‍सवाद को कैसे बदनाम किया जाए उसकी साख कैसे नष्ट हो रही है अथवा कैसे उसकी साख नष्ट की जाए ,इसके बारे में मशगूल हैं। इस तरह का विमर्श अच्छे बौध्दिक परिवेश का लक्षण नहीं है।
स्लोवाक ज़ीजेक के शब्दों को उधार लेकर कहें तो यह फैंटेसी की महामारी का दौर है। इमेजों ने हमारी तर्कबुध्दि को पूरी तरह घेर लिया है। ऑडियो-वीडियो मीडिया ने इसे चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया है। हमारी समूची कार्यप्रणाली पर सीडीरूम पध्दति हावी हो गयी है। सीडीरूम पध्दति का अर्थ है '' यहां क्लिक करो, वहां जाओ, इस फ्रेगमेंट का इस्तेमाल करो, अथवा इस स्टोरी और सीन का इस्तेमाल करो।'' फैंटेसी की महामारी का व्यवहार में परिणाम यह निकला है कि अब प्रत्येक काम अर्जेंसी के रूप में किया जाता है।
इस युग की मुख्य लाक्षणिक विशेषता है कि इसमें पूर्व-आधुनिक विचारधाराएं हठात् केन्द्र में आ गयी हैं। इसके अलावा फंडामेंटलिज्म,राष्ट्रवाद, जनजातिवाद आदि तमाम किस्म की इरेशनल विचारधाराएं भी केन्द्र में आ गयी हैं। प्रगति अमूर्त हो गयी है। व्यवहारवादी तर्क केन्द्र में हैं। कॉमनसेंस का प्रभुत्व बढ़ गया है। यह '' गैर-विचारधारा'' अथवा '' उत्तर-विचारधारा '' का क्षेत्र है। लोग यह भी कहने लगे हैं कि विचारधारा के युग का अंत हो गया है। जबकि सच यह है कि यह सब भी विचारधारा का क्षेत्र है।
'उत्‍तर वि‍चारधारा' में आत्म की प्रस्तुति पर सबसे ज्यादा जोर दिया जा रहा है। आत्म पर जोर के कारण प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष किसी न किसी रूप में विचारधारा के सवालों को हमने त्याग दिया है। 'मैं' और सिर्फ 'मैं' में लेखक उलझा हुआ है। 'मैं' की भूमिका महत्वपूर्ण होकर रह गयी है। विचारधारात्मक सरोकारों की जगह निजी सरोकारों ने ले ली है। निजी रूचि,इच्छा,मंशा आदि‍ की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ ने ले ली है। अब विचारधारा को सांस्कृतिक विश्लेषण के एक उपकरण के रूप में हमने इस्तेमाल करना बंद कर दिया है। 'आत्म' अथवा 'मैं' पर जोर देने के कारण हमारे लेखक अब नव्‍य उदारतावादी राजनीति की सेवा में लग गए हैं।अब उन्होंने परि‍वर्तनकामी विचारधारा की सेवा करनी बंद कर दी है। इसमें हमारे वामपंथी लेखकों का अधिकांश हिस्सा शामिल है।
'' उत्तर -विचारधारा'' के युग में मीडिया निर्मित इमेजों और सेतुओं से हम गुजर रहे हैं। उन्हीं के गर्भ से जो सवाल उठ रहे हैं उनमें उलझ रहे हैं। प्रतीकों की व्यवस्था के शिकार बन रहे हैं और स्वयं भी प्रतीक बन रहे हैं। हमने विचारधारा के आधार पर विश्लेषित करना एकदम बंद कर दिया है। हम जब इस तरह करने लगते हैं तो व्यक्ति को पूरी तरह गुलाम बना देते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि व्यक्ति के औपनिवेशिकरण को कैसे खत्म किया जाए,इसके उपाय सोचने की जरूरत है। आज व्यक्ति और परमानंद के बीच का अंतराल खत्म हो चुका है। आनंददायी फेंटेसियों ने हमें घेरा हुआ है। हम जब चाहते हैं हमें आनंद उपलब्ध है। आनंद और व्यक्ति के बीच की दूरी का खात्मा बहुत ही बड़ी त्रासदी है। आज आप किसी भी किस्म की मनोवैज्ञानिक फैंटेसी को संगठित कर सकते हैं। उसका प्रबंधन कर सकते हैं। अब युध्द भी फैंटेसी में बदल चुका है। मौत अथवा त्रासदी के आख्यान फैंटेसी का हिस्सा हैं।
नव्‍य उदारतावादी जनतंत्र अपने द्वारा पैदा की गई समस्याओं के अधूरे समाधान पेश कर रहा है। असमानता चरमोत्कर्ष पर है। इसे दूर करने का परवर्ती पूंजीवाद के पास कोई समाधान नहीं है। वे यह भी बता पा रहे हैं कि आखिरकार पूंजीवाद की अबाधि‍त विजय के बावजूद असमानता निरंतर क्यों बढ़ती रही है। यहां तक कि कल्याणकारी राज्य का सपना भी असमानता को खत्म नहीं कर पाया। इतनी बड़ी असफलता के बावजूद परवर्ती पूंजीवाद के विचारक दावा कर रहे हैं कि उन्होंने बाजी मार ली !
परवर्ती पूंजीवाद का सबसे बड़ा गुण है वह फेक अथवा नकली को मूल्यवान बना देता है। नकली में ही हम असली का आनंदबोध लेने लगते हैं। नकल को असल समझने लगते हैं। नकल को वर्चुअल के जरिए ग्रहण करते हैं, देखते हैं। फेक का वर्चुअल होना और वर्चुअल अभौतिक होना अथवा अप्रासंगिक होना स्वयं अनेक किस्म की समस्याओं को पैदा कर रहा है। फेक और वर्चुअल के नेटवर्क ने अपना भौतिक आधार बना लिया है। आज वह स्वयं भौतिक शक्ति बन गया है। इसके फलस्वरूप व्यक्ति ऐतिहासिक और परा-ऐतिहासिक दोनों ही रूप में एक साथ नजर आ रहा है। वर्चुअल तकनीक ने व्यक्ति और समाज की नए किस्म की भूमिकाओं को जन्म दिया है। नए किस्म के सरोकार पैदा किए हैं। नए किस्म का आनंद और नये किस्म की ज्ञानचर्चा को जन्म दिया है। यह वर्चुअल की नयी मुक्तिदायी शक्ति है जिसे समझने की जरूरत है। हमें वर्चुअल रियलिटी के बारे में संकीर्णतावादी नजरिए से नहीं देखना चाहिए। हमें समझना चाहिए कि किस तरह नयी वर्चुअल अवस्था ,वास्तव अवस्था से भिन्न है। किस तरह वर्चुअल यथार्थ ,सामाजिक यथार्थ से भिन्न है।
वर्चुअल यथार्थ में और सामाजिक यथार्थ में बुनियादी अंतर है। वर्चुअल यथार्थ एक तरह से सामाजिक यथार्थ का फैंटेसीमय तर्क है। यह सामाजिक यथार्थ का चरम है। इसी वजह से परिचित और अपरिचित दोनों लगता है। वर्चुअल रियलिटी और सामाजिक यथार्थ के बीच के अंतराल का साइबरस्पेस रेडीकलाइजेशन कर देता है। यही हमारे आत्मगतबोध का निर्माता है। यहां तक कि हमारी ईगो को भी वर्चुअल बना देता है।
साइबर संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में यदि लेखक और लेखन को देखें तो नए किस्म की चीजें सामने नजर आएंगी। आज प्रामाणि‍क अथवा ऑथेन्टिक के सवाल केन्द्रीय सवाल हैं। साइबर संस्कृति में प्रामाणिकता की पुष्टि पहले की जाती है। बाद में अन्य बातें होती हैं। पहले व्यक्ति स्वयं प्रमाण था। आज उसे प्रमाण देना होता है। आज आप जब फोन करके अपना बिल का पता करना चाहते हैं तो फोन पर बैठी साइबर कन्या प्रमाण मांगती है। जन्ततिथि पूछती है। जन्मतिथि आपकी प्रामाणिक पहचान बन गयी है। यदि जन्मतिथि ठीक नहीं बता पाते हैं तो मामला गड़बड़ा सकता है। साइबर संस्कृति का मंत्र है '' बनाओ और दो।'' इसके बीच में यथार्थपरक प्राथमिकताएं काम नहीं करतीं। आप जब अपनी प्रामाणिकता का प्रमाण दे रहे होते हैं तो यह भी बता रहे होते हैं कि आप क्या हैं और क्या करना चाहते हैं। इसी अर्थ में क्या हैं और क्या करना चाहते हैं , को अलग करके नहीं देखा जा सकता।
लेखक या पत्रकार के नाते हम किसी घटना या विषय का चयन करते हैं और फिर उसे पेश करते हैं। लोग जानते हैं कि घटना घटी है तो उसका क्या अर्थ है ? हम घटना की छवि लेते हैं। उसके बारे में लिखते हैं। हम भरसक कोशिश करते हैं कि प्रामाणिक रूप में पेश करें। प्रामाणिक प्रस्तुति मीडिया में भी करते हैं और साहित्यिक विधाओं में भी प्रामाणिक प्रस्तुति पर जोर देते हैं। लोग देखते और पढ़ते हैं। वे समझते भी हैं। किंतु ज्योंही आप अपनी बात कहकर खत्म करते हैं तो लोग उम्मीद करते हैं घटना का भिन्न रूप प्रस्तुत क्यों नहीं किया गया। क्योंकि किसी भी घटना अथवा विषयवस्तु की प्रस्तुति अनेक रूपों में हो सकती है। भिन्न रूप में चीजों को सजाया भी जा सकता है। लेखक अथवा पत्रकार से यथार्थ की भिन्न प्रस्तुति की मांग के प्रति हमेशा प्रतिरोध व्यक्त किया जाता है। यह प्रतिरोध और कोई नहीं स्वयं लेखक अथवा पत्रकार करते हैं। वे सत्ता के आख्यान और नजरिए से इस कदर बंधे होते हैं कि भिन्न प्रस्तुति कर ही नहीं पाते। यथार्थ की भिन्न प्रस्तुति के कारण ही गोदान महान रचना बन पायी। कफन कहानी क्लासिक कहानी बन पायी। यथार्थ की भिन्न प्रस्तुति के प्रति लेखक यहां अपना प्रतिरोध व्यक्त नहीं करता। यही वह बिंदु है जहां हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए। एक ही घटना की प्रस्तुति में अनेक किस्म के नजरिए सक्रिय रहते हैं। घटना में शामिल सभी पक्ष अपने तरीके से यथार्थ को पेश करना चाहते हैं और अपने ही पक्ष पर बल देना चाहते हैं। किंतु यदि सीधे-सीधे घटना में शामिल वर्गों या समूहों अथवा व्यक्तियों की बातों को सीधे पेश कर दिया जाए तो इससे न तो यथार्थ के मर्म को संप्रेषित कर पाएंगे और न इससे यथार्थ का दर्जा ही ऊँचा उठा पाएंगे। यथार्थ का दर्जा ऊँचा उठाने के लिए जरूरी है कि घटना में अथवा यथार्थ में शामिल पात्रों के नजरिए से पेश करने की बजाय भिन्न नजरिए से मर्म को चित्रित किया जाए। प्रेमचंद के समूचे चित्रण विशेषता है कि वह यथार्थ के मर्म को पात्रों से भिन्न नजरिए से उद्धाटित करते हैं। यह वह मर्म है जो छिपा है। हमें कथानक कहते समय यह ध्यान रखना चहिए कि आखिरकार हम किस फ्रेमवर्क में अपनी बातें कह रहे हैं।
हमें यह भी सवाल करना चाहिए कि आखिरकार लेखन क्या है ? रोलां बार्थ ने सही लिखा है कि लेखन प्रत्येक आवाज ,प्रत्येक विचार के उदय का विध्वंस है। लेखन तटस्थ,सामंजस्यपूर्ण,विकल्प के स्थानों से भरा, जिसमें व्यक्ति छिपा रहता है। नकारात्मक इस अर्थ में कि इसमें सभी किस्म की अस्मिताओं का लोप हो जाता है। जबकि उसका आरंभ ही अस्मिता और लेखन से होता है। लेखक जब लिखता है तो वह स्वयं का ही लोप कर बैठता है। लेखन का आरंभ लेखक की मौत है।

( भड़ास ब्‍लाग पर 14 सि‍तम्‍बर 2009 को प्रकाशि‍त)

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

मंगलेश डबराल ये अंधकारयुग नहीं है

मंगलेश डबराल सहृदय कवि‍ हैं। प्रमुख हिंदी कवि‍यों में उनकी गणना होती है। हाल ही उनका लेख 'चरनदास चोर नहीं'( 'एक जि‍द्दी धुन' ब्‍लाग पर देखें,वैसे यह लेख जनसत्‍ता में प्रकाशि‍त हो चुका है ) नजरों के सामने से गुजरा। यह लेखक शानदार गद्य और बहस का बेहतर उदाहरण है। इस लेख में मंगलेश डबराल ने कुछ ऐसी बातें कहीं हैं। कुछ ऐसे सवाल उठाए हैं जि‍न पर गंभीरता के साथ गौर करने की जरूरत है। मंगलेश डबराल के इस लेख की सबसे बडी कमजोरी है मौजूदा समय की गलत समझ। उन्‍होंने लि‍खा है, ''हमारे समाज में अगर यह बाजार का युग है तो साहित्य में इसे अंधकार का ही युग कहा जाना चाहिए। खासकर हिंदी समाज में अब न कोई बड़ा विचार रह गया है न कोई बड़ा स्वप्न और न कोई बड़ी रचना जो इन दोनों के मेल से उपजती है। इस अंधेरे में कभी कोई महाश्वेता देवी, कोई अरुंधति रॉय, कोई वरवर राव दिख जाते हैं जो प्रतिरोध के विचार को अपनी नैतिकता की तरह मानते हैं और हमें चेतावनियां देते रहते हैं जिन्हें हम उतनी ही तत्परता से अनसुना कर देते हैं। ''
'बाजारयुग' यानी 'अंधकारयुग',इस जमीन से खड़े होकर यदि‍ दुनि‍या को देखा जाएगा,परवर्ती पूंजीवाद के समस्‍त क्रि‍याकांड़ों को देखा जाएगा तो हम गलत नि‍ष्‍कर्षों पर पहुंचेंगे। इससे गलत समझ बनेगी। मौजूदा युग 'अंधकार युग' नहीं है। अपार संभावनाओं से भरा युग है। असंख्‍य वि‍कल्‍पों का युग है। परवर्ती पूंजीवाद के पहले हमारे समाज में सीमि‍त वि‍कल्‍प थे आज असीमि‍त वि‍कल्‍प हैं। प्रत्‍येक क्षेत्र में अनंत वि‍कल्‍प हैं। अभि‍व्‍यक्‍ति‍ से लेकर समाज व्‍यवस्‍था तक सभी क्षेत्रों में वि‍कल्‍पों की बाढ आयी हुई है। पहले दो ही वि‍कल्‍प थे। क्रांति‍ और बुर्जुआ व्‍यवस्‍था ।या सामंती व्‍यवस्‍था। आज अनेक कि‍स्‍म के प्रयोग क्रांति‍कारी और पूंजीवादी कतारों में चल रहे हैं। आप लैटि‍न अमेरि‍का में चल रहे परि‍वर्तनों को देखें, इन परि‍वर्तनों की कभी संभावना कि‍सी क्रांति‍कारी ने नहीं की थी।जो लोग हथि‍यारबंद जंग में मशगूल थे वे अब वोट के जरि‍ए सत्‍ता पर काबि‍ज हैं। चि‍ली में सन् 1973-74 में एलेंदे इस सपने को साकार करने के चक्‍कर में अपनी जान से हाथ धो बैठे। आज लैटि‍न अमेरि‍का में ऐसा नहीं है। लोकतंत्र के प्रति‍ क्रांति‍कारी कतारों में पैदा हुआ नया जोश और नयी समझ हमारे देश के उन लेखकों के लि‍ए भी मार्गदर्शन कर सकती है जो इस देश के लोकतंत्र को हि‍कारत ,अवि‍श्‍वास,बुर्जुआ व्‍यवस्‍था,जनवि‍रोधी व्‍यवस्‍था आदि‍ पदबंधों के जरि‍ए इकहरे ढ़ंग से देखते रहे हैं। संयोग से मंगलेश डबराल भी उनमें आते हैं। मंगलेश डबराल यह भूल ही गए हैं कि‍ सारी दुनि‍या में लोकतंत्र के प्रति‍ आस्‍थाएं पुख्‍ता हुई हैं। भारत में भी लोकतंत्र के प्रति‍ आस्‍थाएं पुख्‍ता हुई हैं। समाजवादी मुल्‍कों को भी लंगडाते हुए लोकतंत्र के रास्‍ते पर लौटना पडा है,लोकतंत्र के खि‍लाफ साम्‍यवादी और क्रांति‍कारी वि‍चारकों का तर्कशास्‍त्र अर्थहीन और अप्रासंगि‍क हो चुका है। परवर्ती पूंजीवाद ने समाज को देखने का स्‍टीरि‍योटाईप नजरि‍या,वि‍चारशास्‍त्र अप्रासंगि‍क बना दि‍या है। देंग जि‍याओं पिंग से लेकर राहुल कास्‍त्रो,पुति‍न से लेकर कि‍म इल सुंग सबके वि‍चारशास्‍त्र बदल रहे हैं। हिंदी लेखकों का भी स्‍टीरि‍योटाईप टूटेगा लेकि‍न सबसे अंत में। मंगलेश डबराल को तकलीफ है '' हिंदी समाज में अब न कोई बड़ा विचार रह गया है न कोई बड़ा स्वप्न और न कोई बड़ी रचना।'' बडे वि‍चार,स्‍वप्‍न आदि‍ के लि‍ए बडे सत्‍य को पकडने की जरूरत होती है ,हिंदी का लेख पुराने सत्‍य,लघु सत्‍य में उलझा हुआ है। वह बोलने वालों की आवाज हो गया है। कायदे से उसे गूंगे लोगों की आवाज बनना चाहि‍ए। साहि‍त्‍य जब तक गूंगे लोगों की आवाज नहीं बनेगा,अदृश्‍य यथार्थ का उद्घाटन नहीं करेगा,तब तक बड़ा वि‍चार पैदा नहीं होगा।यह स्‍थि‍ति ज्‍यादा दि‍न चलने वाली नहीं है।‍
हिंदी में देर से परि‍वर्तन होता है। सारी दुनि‍या में वि‍कल्‍पों की आंधी चल रही है। हिंदी में इसकी आहटें सुनी जा सकती हैं। तमाम कि‍स्‍म के स्‍वयंसेवी संगठनों के द्वारा परंपरागत राजनीति‍क सांगठनि‍क संरचनाओं के परे जाकर जनता के हि‍तों के सवालों पर लडते देख सकते हैं। ये वे लोग हैं जो कारपोरेट घरानों से धन लेते हैं और जनहि‍तों के सवालों पर आमलोगों को गोलबंद करते हैं। ये ऐसे संगठन हैं जि‍नकी आय के स्रोत के बारे में केन्‍द्र सरकार जानती है। अभी भी परंपरागत राजनीति‍क दलों की आय के स्रोत के बारे में केन्‍द्र सरकार बहुत कम जानती है। कहने का अर्थ है कि‍ लोकतांत्रि‍क पारदर्शिता को स्‍वयंसेवी संगठनों ने अपनी कार्यप्रणाली का आधार बनाया है और यह राजनीति‍क तौर पर लोकतंत्र के लि‍ए शुभ संकेत है। आज से चालीस साल पहले हम सोच ही नहीं सकते थे कि‍ भारत में इतने स्‍वयंसेवी संगठन होंगे। इस परि‍प्रेक्ष्‍य में देखें तो समझ पाएंगे कि‍ यह वि‍कल्‍पों का युग है अंधकार का नहीं।
दूसरी बात यह कि‍ प्रति‍रोध का वि‍चार हमेशा नैति‍कता के आधार से ही चुनौती देता है,वह सामाजि‍क आधार से चुनौती नहीं देता,खासकर अरून्‍धती राय वगैरह के वि‍चारों का कोई तयशुदा सामाजि‍क‍ स्रोत नहीं है। ये घुमंतू वि‍चारक हैं। वे वि‍चारों में जि‍तने तेज हैं वैचारि‍क परि‍वर्तन के मामले में भी उतने ही तेज हैं। इस तरह के 'तेज वि‍चारकों' ने ही परवर्ती पूंजीवाद का शास्‍त्र रचा है। साथ ही पूंजीवाद में नैति‍कता के जो कि‍ले वि‍चारशास्‍त्र तोड नहीं पाया उन सभी कि‍लों को परवर्ती पूंजीवाद की नयी तकनीक ,नए वि‍चारकों और नयी वि‍चारप्रणाली ने ध्‍वस्‍त कि‍या है। यह प्रक्रि‍या जारी है। जो पहले नहीं टूटा वह अब टूट रहा है। जो पहले नहीं बदला वो अब बदल रहा है। जो पहले नहीं मानता था अब मान रहा है। परवर्ती पूंजीवाद का एक ही मंत्र है 'वि‍कल्‍पों को मानो और टि‍के रहो।' जो पुराने लोग वैकल्‍पि‍क समाज व्‍यवस्‍था बनाने की जंग में लगे हैं ,उन्‍हें भी अपना पुराना जड़ वि‍कल्‍पराग त्‍यागकर नया वि‍कल्‍पराग अपनाना होगा। वरना आउट। मंगलेश डबराल भोले हैं।मंगलेश डबराल ने लि‍खा है, ''''उदय प्रकाश जिन सरलीकरणों की आलोचना करते दिखते हैं, खुद भी उनके शिकार लगते हैं। वे उत्तर-आधुनिक फैशन में महावृत्तांतों और मोनोलिथ वैचारिकताओं को सरलीकृत और उनके टूटने से पैदा हुई अस्मिताओं को जटिल संरचना मानते हैं। महावृत्तांतों को वे एक गहरे संशय से देखते हैं, लेकिन लघुविविमर्शों के लिए कोई आलोचनात्मक कसौटी नहीं अपनाते। ''
अब 'कसौटी' नाम की अब कोई चीज नहीं हो सकती। 'कसौटी' पर कसने के चक्‍कर में यह भूल ही गए हैं कि‍ 'कसौटी' कोई टि‍काऊ या जड़ चीज नहीं है। यथार्थ बदला है तो कसौटी भी बदलेगी। अनेक चीजों का लोप हुआ है तो 'कसौटी' का भी लोप होगा। यह कैसे हो सकता है यथार्थ नया हो और कसौटी पुरानी रहे। पुरानी कसौटी पर नए यथार्थ को परखने से सही रूप में चीजें दि‍खाई नहीं देतीं और ठीक से समझ में भी नहीं आतीं। नए युग की वि‍शेषता है 'कसौटी' का अंत। अब यथार्थ है अथवा 'फेक यथार्थ' है। अथवा नि‍र्मित यथार्थ है।
नि‍र्मि‍त यथार्थ की वर्चुअल तकनीक के कारण संभावनाएं बढ गयी हैं और अभी वर्चुअल यथार्थ आक्रामक है लेकि‍न यथार्थ भी आक्रामक शक्‍ल ले सकता है,अनेक देशों में आर्थि‍क मंदी ने यथार्थ को आक्रामक बना दि‍या है, उसके कारण परवर्तीं पूंजीवाद के द्वारा पैदा की गयी वर्चुअल चमक अब प्रभावि‍त नहीं करती। इस प्रक्रि‍या में महावृत्‍तान्‍त का अंत नहीं हुआ है नए कि‍स्‍म के महावृत्‍तान्‍त रचे जा रहे हैं,अंतर यह है कि‍ पहले सि‍र्फ महावृत्‍तान्‍त पर ही बहस होती थी अब लघुवृत्‍तान्‍तों पर ज्‍यादा बहस होती है। फलत: महावृत्‍तान्‍त और लघुवृत्‍तान्‍त के बीच का असंतुलन कम हुआ है।
मंगलेश डबराल ने लि‍खा है, ''उदय प्रकाश ने पूछा है कि ‘विरोध और भर्त्सना के अलावा हम और क्या कर सकते हैं।’ इसका जवाब यही हो सकता है कि हम विरोध और भर्त्सना का मूल कर्तव्य न छोड़ें। खासकर तीसरी दुनिया के लिए एडवर्ड सईद की यह सलाह शायद हमेशा याद रखने लायक है कि बुद्धिजीवियों को प्रतिपक्ष की ही भूमिका निभानी होगी।''
एडवर्ड सईद ने यह नहीं कहा था कि‍ बुद्धि‍जीवी को प्रति‍पक्ष की भू‍मि‍का अदा करनी होगी। बल्‍कि‍ यह कहा था बुद्धि‍जीवी को सत्‍य का हि‍मायती होना चाहि‍ए। सत्‍य के पक्ष में हर कीमत पर खडा रहना चाहि‍ए। सत्‍य की पक्षधरता के अभाव में फूट का जितना व्यापक कैनवास भारत के बुध्दिजीवियों के बीच में दिखता है उतना व्यापक कैनवास अन्यत्र दिखाई नहीं देता। भारत के अधिकांश बुध्दिजीवियों में मानवाधिकार चेतना का पूरी तरह विकास नहीं हुआ है। मानवाधिकारों के साथ वे अपनी कलम और जिन्दगी का मिश्रण तैयार नहीं कर पाए हैं।
बुध्दिजीवियों में सत्य पाने का आग्रह कम हुआ है। भारत का बुध्दिजीवी सत्य को पाने और खोजने में अपनी शक्ति व्यय नहीं करता बल्कि राजनीतिक विचार विशेष की अभिव्यक्ति में उसकी दिलचस्पी ज्यादा रहती है। तदर्थ सत्य में दिलचस्पी ज्यादा होती है। बुध्दिजीवी में सत्य को पाने का आग्रह जितना प्रबल होगा उतना ही प्रबल आग्रह सत्य की अभिव्यक्ति का भी होगा। सत्य को पाए बिना सत्य के साथ खड़े होना मुश्किल है। सत्य को पाने का अर्थ है मानवता और न्याय के पक्ष में अविचलभाव से खड़ा होना।
भारत का बुध्दिजीवी जाने-अनजाने सत्य को अकादमिक आंखों से देखता है, अकादमिक आंखों से देखने से सत्य हमेशा अस्पष्ट,विभाजित,भ्रमित करने वाला नजर आता है। इसके कारण ही बुध्दिजीवी कतारों में मानवीय सवालों पर भेद और फूट नजर आती है। हमारे बुध्दिजीवी के लिए सत्य किताबी चीज है। वह सत्य को देखकर उद्वेलित नहीं होता,यही स्थिति वाम बुध्दिजीवियों की भी है।
सत्य को पाने के लिए, सत्य को खोजने का आग्रह होना चाहिए, सत्य के आग्रह के लिए सत्य के प्रति वचनवध्दता होनी चाहिए। सत्य को राजनीति नहीं समझना चाहिए। राजनीतिक नजरिए से जब भी सत्य को देखेंगे सत्य पर भेद का पर्दा गिर जाएगा। बुध्दिजीवी को सत्य को बगैर किसी पर्दे के देखना चाहिए। बगैर किसी सहारे के देखना चाहिए। पर्दे या सहारे के जरिए देखा गया सच भ्रम पैदा करता है,भेदबुध्दि पैदा करता है। बुध्दिजीवी का मूल कार्य भेदबुध्दि को नष्ट करना ,भ्रमों को नष्ट करना है।
बुध्दिजीवी वह है जो सभी किस्म के पर्दों को उद्धाटित करते हुए सत्य तक पहुँचता है। सत्य को पाने के लिए जुनून का होना बेहद जरूरी है। हमारे समाज में सत्य के जुनूनी बुध्दिजीवी कम और राजनीतिक जुनूनी बुध्दिजीवी ज्यादा हैं।



(देशकाल डॉट कॉम पर (10 सि‍तम्‍बर 2009 ) पर भी प्रकाशि‍त)

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

घि‍न आ रही है राजेन्‍द्र यादव ?

राजेन्‍द्र यादव जी, आप पूरी तरह चुक गए हैं, नामवर सिंह को छोटा बनाकर अपने बडे बनना चाहते हो,बडा घि‍नौना खेल है यह। अपने बारे में बोलो इतने खोखले हो क्‍यों गए हो ?'हंस' पत्रि‍का का इस तरह का दि‍शाहीन संपादकीय कैसे लि‍ख पाते हो़ ? तुम्‍हारे लि‍खे को देखकर लगता ही नहीं है कि‍ कभी तुमने अरून्‍धतीराय और रामचन्‍द्र गुहा से भी कुछ सीखा है ? बताओ राजेन्‍द्र यादव तुम इतने बौद्धि‍कतावि‍हीन क्‍यों हो ? क्‍या प्रेमचंद तुम्‍हें इस हाल में देखकर स्‍वर्ग में अपना सि‍र नहीं धुन रहे होंगे ? सच -सच बताओ राजेन्‍द्र यादव तुम्‍हारे अंदर गांव के कि‍सानों के लि‍ए कि‍तना दर्द है ? कि‍तने संपादकीय लि‍खें हैं कि‍सानों पर ? और कि‍तनी कहानि‍यां लि‍खी हैं ? नामवर सिंह को उनके हाल पर छोड दो,उनसे फि‍र कभी नि‍बट लेना, वैसे भी वे जब बोल रहे थे तब ही क्‍यों मसले को नि‍बटा नहीं लि‍या ? कि‍सने रोका था वहां पर नामवर सिंह की 'धुनाई' करने से। जानते हैं राजेन्‍द्रजी यह सम्‍पादकीय बेईमानी है पीछे से हमला करना। नामवर सिंह से सामने बोले होते तो ज्ञान के सारे अंजर-पंजर ढीले कर देते। अब पीछे से पत्रि‍का के संपादकीय पन्‍नों का दुरूपयोग कर रहे हो। घि‍न आती है ऐसी पत्रकारि‍ता पर। यह सि‍र्फ हि‍न्‍दी में ही संभव है। प्रति‍ष्‍ठानी प्रेस से कम से कम संपादकीय उसूल तो सीख लेते। कम से कम प्रेमचंद से ही सीख लेते। वैसे मैं 'टायरवाला' के तर्कों का कायल हूं। क्षमता हो तो संपादकीय लि‍खकर 'टायरवाला' की बातों का जबाव दो। (देशकाल डॉट कॉम पर प्रकाशि‍त इस माह के 'हंस' के संपादकीय की प्रति‍क्रि‍या में )

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

मलबे का मालि‍क 'हिंदी आलोचक'

आप शीर्षक देखकर भड़कें नहीं,आलोचक और साहि‍त्‍यकार इसे अपना नि‍जी अपमान भी न समझें। यह सच है और सच बड़ा बेरहम होता है। 'हिंदी आलोचक' नाम की 'हिंदी प्राध्‍यापक','हिंदी वि‍चारक',हिंदी लेखक',हिंदीवाला' आदि‍ कोटियां‍ बेहूदगि‍यों से भरी हैं। आज हिंदी में साहि‍त्‍य,आलोचना,शोध,सृजन के नाम पर जि‍तना मलबा जमा है, उतना शायद अन्‍य कि‍सी भाषा में नहीं मि‍लेगा। आखि‍रकार इस मलबे का मालि‍क कौन है ? इतना मलबा आया कहां से ? जब भी कोई गंभीर चर्चा शुरू होती है बि‍न मांगे मलबे का उत्‍पादन शुरू हो जाता है। आखि‍रकार इतना कचरा ज्ञान और वह भी दंभ, पद,शोहरत और शोहदों के साथ सांस्‍थानि‍क शक्‍ल कैसे लेने में सफल हो गया ? हिंदी में सबसे पहली समस्‍या है आप कुछ भी लि‍खें मामला व्‍यक्‍ति‍गत होकर रहेगा। कि‍सी भी मामले को व्‍यक्‍ति‍गत बनाने का अर्थ है अपने ऊपर और समाज के ऊपर मलबा फेंकना। जि‍स समाज में इतने बड़े पैमाने पर मलबा फेंकने वाले हों ,अर्थ का अनर्थ करने वाले हों,वहां पर सभी कि‍स्‍म की क्रांति‍यां सि‍र पटककर मर जाएं कुछ होने वाला नहीं है,मलबे के मालि‍क अपनी गंदगी पर मुग्‍ध हैं कि‍ हमने उसे पछाड दि‍या,हमने प्रभाष जोशी को नंगा कि‍या,नामवर को कपड़े पहना दि‍ए,राजेन्‍द्र यादव को टोपी पहना दी।आलोक मेहता को बेनकाब कर दि‍या। इस तरह की मनोदशा में कि‍सी भी कि‍स्‍म का वि‍वाद अंतत: मलबे में ही तब्‍दील होगा और हम खुश भी होते हैं कि 'हमने साले का कचरा कर दि‍या'।
यह हिंदी की कचरा संस्‍कृति‍ है, इसे प्रति‍वादी संस्‍कृति‍ समझने की भूल नहीं करनी चाहि‍ए। हमें प्रति‍वाद करना चाहि‍ए,लेि‍कन कचरा उत्‍पादन से बचना चाहि‍ए। कचरा संस्‍कृति‍ के उत्‍पादकों से उम्‍मीद नहीं करनी चाहि‍ए कि‍ वे सुधरेंगे,आप थक जाएंगे वे सुधरकर नहीं देंगे,वे सारे प्रसंगों को व्‍यक्‍ति‍ बनाने की आलोचना में माहि‍र हैं। लेकि‍न जो समझदार हैं और हिंदी के उत्‍थान को लेकर प्रयत्‍नशील हैं उन्‍हें इस बदले परि‍दृश्‍य पर गंभीरता से सोचना चाहि‍ए। इसके बारे में लोकप्रि‍य चर्चाएं होनी चाहि‍ए। नेट इन चर्चाओं का शानदार स्‍थल हो सकता है। नए युग का मूल मंत्र है सार्वजनि‍क तौर पर बोलो अथवा गायब हो जाओ। हमें उन सभी सवालों को नए सि‍रे से खोलना चाहि‍ए जि‍न्‍हें तय मान लि‍या गया है।
हम साहि‍त्‍य और वि‍भि‍न्‍न वि‍धाओं के परंपरागत अर्थ को अपदस्‍थ करने से डरते हैं और हमेशा कि‍सी रामचन्‍द्र शुक्‍ल या नामवरसिंह का इंतजार करते हैं कि‍ वह अर्थ परि‍वर्तन कर दे। हमें अर्थ परि‍वर्तन से डर लगता है। हम साहि‍त्‍य में वि‍खंडन से डरते हैं और तुरंत ही हल्‍ला मचाना शुरू कर देते हैं देरि‍दा आया, देरि‍दा आया,भगाओ भगाओ साहि‍त्‍य में वि‍जातीय तत्‍व आ गया हमारी समझ वि‍खंडन से नहीं रामचन्‍द्र शुक्‍ल से ही बनेगी।ज्‍यों ही आप ऐसा करते हैं मलबा फेंकना शुरू कर देते हैं और बेशुमार मलबा जमा हो जाता है और खुश होकर अपने हाथों अपनी पीठ थपथपाने लगते हैं कि‍ देरि‍दा को खदेड दि‍या। साहित्य में विखंडन का कार्य है परंपरागत अर्थ को अपदस्थ करना और यह बताना कि कृति किस तरह परंपरागत अर्थ का उल्लंघन करती है। हमारे जुझारू आलोचक जब कि‍सी धारणा पर वि‍चार करते हुए नया खोज नहीं पाते तो तुरंत ही हल्‍ला करना शुरू कर देते हैं, यह 'असंभव' है।'असंभव' का व्यापक इस्तेमाल करते हैं। हिंदी का मलबे का मालि‍क यह भूल ही जाता है कि‍ ''असंभव'' का यदि विखंडन किया जाएगा तो 'संभव' निकलेगा। 'असंभव' कुछ भी नहीं है। ऐसी अवस्था में 'संभव' सबसे ज्यादा खतरनाक पदबंध साबित होगा। खतरनाक से तात्पर्य है संभव के सभी नियम , प्रक्रिया,पध्दति, और पाने के अभ्यास उपलब्ध होंगे। इस समूची प्रक्रिया में दाखिल होने का अर्थ है कुछ असंभव का अनुभव भी हो सकता है। इस अर्थ में विखंडन खोज है अथवा कुछ भी नहीं है। इसको पध्दति के रूप में ही समाप्त नहीं कर सकते। बल्कि यह रास्ते खोलता है।आगे जाने के लिए प्रेरित करता है। मसलन् 'दलि‍त साहि‍त्‍य' पर हिंदी में मच रहे हंगामे पर ही नजर डालें कि‍ आखि‍रकार 'दलि‍त साहि‍त्‍य' पर वि‍चार करते हुए 'दलि‍त साहि‍त्‍य' नि‍कलेगा या 'साहि‍त्‍य' नि‍कलेगा ? 'स्‍त्री साहि‍त्‍य' पर वि‍वाद करते करते 'स्‍त्री साहि‍त्‍य' नि‍कलेगा या 'साहि‍त्‍य' नि‍कलेगा ? जाति‍वाद पर बहस करते हुए जाति‍ नि‍कलेगी या मनुष्‍य की सत्‍ता उभरकर आएगी ? हमारे दोस्‍त यह समझने की चेष्‍टा ही नहीं करते कि‍ वे जि‍स चीज पर वि‍वाद कर रहे हैं उससे क्‍या नि‍कलेगा। ये भोले आलोचक सोचते हैं कि‍ जि‍स मसले पर ,जि‍स नजरि‍ए से वि‍चार कर रहे हैं, उससे वही नि‍कलेगा जो वह नि‍कालना चाहते हैं। इसी तरह सोचें कि‍ प्रभाष जोशी के साक्षात्‍कार पर बातें करते हुए क्‍या नि‍कलेगा ? मंथन की प्रक्रि‍या चीजों,वि‍चारों,मूल्‍यों और स्‍थि‍ति‍यों को वे जैसी हैं वैसा नहीं रहने देतीं। मलबे के मालि‍क चाहते हैं कि‍ मलबे को मलबा रहने दो, दोस्‍त कचरा जब रि‍साईकिंलिंग प्‍लांट में पुनर्संशोधन प्रक्रि‍या में चला जाता है तो मलबा नहीं रह जाता, उसकी प्रकृति‍,उपयोग,भूमि‍का,लक्ष्‍य आदि‍ सभी कुछ बदल जाते हैं। हि‍न्‍दी वाले मलबे के मालि‍क बडे ही जि‍द्दी स्‍वभाव के हैं वे यह मानकर बैठे हैं कि‍ हम नहीं बदलेंगे। बहस करते समय हमेशा यह ध्‍यान रखना चाहि‍ए कि‍ आखि‍रकार पहुंचना कहां है ?

( मोहल्‍ला लाइव पर प्रकाशि‍त )

बुधवार, 2 सितंबर 2009

'हम सही' की बीमारी और अशोक बाजपेयी

अशोक बाजपेयी 'हम सही ' की बीमारी के शि‍कार हैं। अब 'हम' और 'तुम' का जमाना खत्‍म हो चुका है। अब सि‍र्फ लेखन है। 'हम' और 'तुम' उसमें वि‍लीन हो चुके हैं। यह सृजन का सर्वोच्‍च क्षण है। नामवर सिंह जैसी क्षमता और नजरि‍या अर्जित करना मुश्‍कि‍ल चीज है। वे इस क्षण का आईना हैं। आज के युग में लेखक कि‍सी एक का नहीं होता,वह सबका होता है। उदयप्रकाश हों या नामवर सिंह हों,उन दोनों ने कोई गलती नहीं की है। जो लोग लेखक को वर्ग,प्रति‍बद्धता,वि‍चारधारा,पार्टी के खूंटे से बांधकर देखते हैं, वे अभी तक सभ्‍यता के वि‍कास को समझ ही नहीं पाए हैं,लेखक में अछूतभाव नहीं होता, लेखक के लि‍ए कोई अछूत नहीं होता। 'यहां जाओगे, वहां नहीं जाओगो,इससे इनाम लोगे, उससे नहीं लोगे,उस वर्ग के चरि‍त्रों पर लि‍खोगे,इस वर्ग के चरि‍त्रों पर नहीं लि‍खोगे।' इस तरह का अछूतभाव लेखक के कर्म का हि‍स्‍सा नहीं है। उदयप्रकाश की जि‍न लोगों ने आलोचना की उन्‍हें आलोचना का हक है, आज कोई नामवर सिंह की आलोचना करना चाहे तो उसे भी लोकतांत्रि‍क हक है। बुनि‍यादी चीज है लेखन, न कि‍ लेखक। आज नामवरसिंह ,उदयप्रकाश,अशोक बाजपेयी आदि‍ की लेखक,आलोचक के रूप में पहचान या सत्‍ता खत्‍म हो चुकी है। नामवर सि‍ह यह तथ्‍य जानते हैं और मानते भी हैं। उनका यही बाकी हि‍दी लेखकों से अंतर है। अभी सि‍र्फ लेखन बचा है। हम लेखक,आलोचक,वि‍धाएं ,नैति‍कता,अनैति‍कता आदि‍ केटेगरी में सोच रहे हैं जबकि‍ इन सबका लेखन में वि‍लय हो चुका है। अब सि‍र्फ लेखन बचा है, अशोक बाजपेयी अंग्रेजी के वि‍द्वान हैं और अच्‍छी तरह जानते हैं कि‍ देरि‍दा ने इस प्रसंग में क्‍या लि‍खा है। लेखन ने समस्‍त पहचान के रूपों को खत्‍म कर दि‍या है। कम्‍प्‍यूटर युग में एक ही पहचान बची है लेखन की पहचान। लेखन में कोई अछूत नहीं होता। लेखक में अछूतभाव के न होने का ही सुफल है कि‍ हमारे तमाम बड़े लोग आज भी नोबुल पुरस्‍कार को सबसे बडा मानते हैं जबकि‍ उस पुरस्‍कार को देने वाले संस्‍थान का हथि‍यार बनाने से संबंध है। हम अच्‍छी तरह जानते हैं कि‍ ग्‍लोबलाईजेशन के खि‍लाफ सारी दुनि‍या में जेहाद बोलने वाले संगठनों के मददगारों में अमेरि‍का के सबसे घटि‍या इजारेदार घरानों के चंदे का खुला इस्‍तेमाल कि‍या गया है। हम जि‍से वर्ल्‍ड सोशल फोरम के नाम से जानते हैं उसके चंदादाताओं में ग्‍लोबलाईजेशन का समर्थन करने वाली कंपनी फोर्ड फाउंडेशन का नाम शामि‍ल है,भारत में तकरीबन 4000 हजार करोड रूपये वि‍भि‍न्‍न कि‍स्‍म के स्‍वयंसेवी संगठनों को वि‍देशी कंपनि‍यों के द्वारा दि‍या जाता है, इसमें दर्जनों वे कंपनि‍यां हैं जो खुली लूट खसोट के लि‍ए बदनाम हैं, युद्ध में सक्रि‍य हैं। इसके बावजूद यदि‍ ये स्‍वयंसेवी संस्‍थाएं पवि‍त्र हैं तो इसका प्रधान कारण है इनका कर्म, न कि‍ चंदा। आज आप वैचारि‍क, वर्गीय, जाति‍गत आधार पर छुआछूत बनाए नहीं रख सकते। नामवर सिंह ने जसवंत सिंह के पुस्‍तक लोकार्पण में जाकर कुछ भी गलत नहीं कि‍या, ठीक वैसे ही उदयप्रकाश ने भी कुछ गलत नहीं कि‍या था,हिंदी में बहस करने वालों की मुश्‍कि‍ल है कि‍ वे जानते ही नहीं हैं कि‍ समाज कि‍स युग में पहुंच गया है, चीजों को कैसे देखें। अशोक बाजपेयी जैसे बडे लेखक की बुद्धि‍ भी अभी भी पुराने प्रेसयुगीन और मध्‍यकालीन वर्गीकरणों में फंसी हुई है,यह देखकर आश्‍चर्य लगता है। अशोक बाजपेयी कलावंत हैं,चि‍त्रकारों के इति‍हास और उनकी सृजन प्रक्रि‍या को भी जानते हैं, उन्‍होंने नैति‍कता के बारे में जो नजरि‍या पेश कि‍या है क्‍या उसी पैमाने से कि‍सी चि‍त्रकार के द्वारा कि‍सी औरत को भाडे पर अपने स्‍टूडि‍यो में लाने,नग्‍न करके बि‍ठाने और फि‍र उसे देखकर चि‍त्र बनाने को सही ठहराया जा सकता है ? क्‍या रचनाकारों और बुद्धि‍जीवि‍यों की वेश्‍याओं के साथ उठक बैठक को सही माना जा सकता है ? हम यह भूल ही गए हैं कि‍ अब नामवर सिंह, उदयप्रकाश,अशोक बाजपेयी नहीं बचे हैं लेखक के रूप में उनका अंत हो चुका है अब सिर्फ उनका लेखन बचा है। उनकी नैति‍कता,अनैति‍कता,वि‍चारधारा, प्रति‍बद्धता आदि‍ का फैसला उनके लेखन के आधार पर ही होगा। अशोक बाजपेयी की दि‍क्‍कत यह है कि‍ वे लेखन पर नहीं, लेखक के आनेजाने पर बोल रहे हैं। नैति‍कता पर बोल रहे हैं। लेखक की नैति‍कता का आईना उसका लेखन है उसे अन्‍यत्र नहीं खोजा जाना चाहि‍ए।
(अशोक बाजपेयी के द्वारा जनसत्‍ता में लि‍खे लेख पर देशकाल डॉट कॉम में चली बहस पर लि‍खी टि‍प्‍पणी,इस टि‍प्‍पणी में बाजपेयी ने मांग की थी कि‍ नामवरसिंह ने जसवंत सिंह के पुस्‍तक लोकार्पण में जाकर वैसे ही गलत कि‍या जैसे उदयप्रकाश ने भाजपासांसद से पुरस्‍कार लेकर गलत कि‍या,उदयप्रकाश की आलोचना हुई किंतु नामवर की वामपंथि‍यों ने आलोचना क्‍यों नहीं की,उपरोक्‍त टि‍प्‍पणी उसी प्रसंग में लि‍खी गयी है।)

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