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बुधवार, 15 जून 2011

सिविल सोसायटी का संकीर्णतावाद


अण्णा हजारे के नेतृत्व वाले सिविल सोसायटी आंदोलन ने पुनः लोकपाल बिल पर वार्ताओं में शामिल होने का फैसला किया है उनकी शर्त है कि बंद कमरों में जो भी बातें हों उनको लाइव टेलीकास्ट किया जाए। यह मांग अपने आपमें बेतुकी है। वे जानते हैं जन लोकपाल बिल बनाने की प्रक्रिया आरंभ हो गई है और उसमें अब सरकार पीछे नहीं जा सकती। इस बिल के दायरे में प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को रखा जाए या नहीं यह निर्णय राष्ट्रीय विमर्श के बाद ही हो पाएगा। संसद में फैसला लिए जाने तक उन्हें इंतजार करना होगा। कारपोरेट मीडिया ने अण्णा हजारे और सिविल सोसायटी का जिस तरह महिमामंडन किया है उससे अण्णा का जमीनी यथार्थ समझ में नहीं आ सकता। सिविल सोसायटी के लोग कभी भी दैनंन्दिन जीवन के यथार्थ सवालों को नहीं उठाते,वे हमेशा उन्हीं सवालों को उठाते हैं जो नव्य उदार आर्थिक नीतियों की संगति में आते हैं। मसलन वे महंगाई रोकने और भूमि सुधार लागू करने के लिए आंदोलन नहीं करते। उल्लेखनीय है अण्णा हजारे ने अपनी स्वयंसेवी राजनीति की धुरी धर्म को बनाया है। महाराष्ट्र के रेलीगांव सिद्धि में उन्होंने पर्यावरण को धर्म से जोड़ा है। पर्यावरण संरक्षण को हिन्दू संस्कारों और रीति-रिवाजों से जोड़ा है। अण्णा का सार्वजनिक आंदोलन को धर्म से जोड़ना अपने आप में साम्प्रदायिक कदम है। इस इलाके में अन्ना का सैन्य अनुशासन है। इस इलाके में हिन्दी फिल्मी गाने सुनना मना है। फिल्में देखना मना है। सिर्फ भजन सुन सकते हैं और धार्मिक फिल्में देख सकते हैं। अण्णा के सारे फैसले मंदिर में भगवान के नाम पर होते हैं। वहां पंचायत के चुनाव नहीं होते। दलित दोयमदर्जे का व्यवहार झेलते हैं। मासकल्चर के विभिन्न रूपों पर एकदम पाबंदी है। 
          अण्णा ने अपने एक बयान में कहा है कि "  मेरा अनशन किसी सरकार या व्यक्ति के खिलाफ पूर्वाग्रहग्रस्त नहीं था बल्कि वह तो भ्रष्टाचार के खिलाफ था। क्योंकि इसका आम आदमी पर सीधे बोझा पड़ रहा है।" असल में अन्ना ने अनशन के साथ ही अपना स्टैंड बदला है। अण्णा का आरंभ में कहना था केन्द्र सरकार संयुक्त मसौदा समिति की घोषणा कर दे मैं अपना अनशन खत्म कर दूँगा। बाद में अन्ना ने तुरंत एक नयी मांग जोड़ी कि मसौदा समिति का अध्यक्ष उस व्यक्ति को बनाया जाए जिसका नाम मैं दूं। केन्द्र ने जब इसे मानने से इंकार किया तो अन्ना ने तुरंत मिजाज बदला और संयुक्त अध्यक्ष का सुझाव दिया लेकिन सरकार ने यह भी नहीं माना और अंत में अध्यक्ष सरकारी मंत्री बना और सह-अध्यक्ष गैर सरकारी शांतिभूषण जी बने। लेकिन दिलचस्प बात यह हुई कि अन्ना इस समिति में आ गए। जबकि वे आरंभ में स्वयं नहीं रहना चाहते थे। मात्र एक कमेटी के निर्माण के लिए अन्ना ने जिस तरह प्रतिपल अपने फैसले बदले उससे साफ हो गया कि पर्दे के पीछे कुछ और चल रहा था।
       अण्णा हजारे के आंदोलन के पीछे मनीपावर काम कर रही है मात्र 4 दिन में 83 लाख रूपये चंदा इकट्ठा कर लिया गया। जिसमें से तकरीबन 32 लाख रूपये खर्च भी कर दिए गए। यानी अन्ना हजारे के लिए आंदोलन हेतु संसाधनों की कोई कमी नहीं थी।
असल में स्वयंसेवी संगठनों की एनजीओ संस्कृति नियोजित कारपोरेट पूंजी की संस्कृति है। स्वतःस्फूर्त संस्कृति नहीं है। भारत में हजारों एनजीओ हैं जिनको विदेशों से सालाना पांच हजार करोड़ रूपये से ज्यादा चंदा विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों के संगठनों द्वारा प्रदान किया जाता है।एनजीओ समुदाय में काम करने वाले लोगों की अपनी राजनीति है। विचारधारा है और वर्गीय भूमिका भी है। वे परंपरागत दलीय राजनीति के विकल्प के रूप में काम करते हैं। अण्णा हजारे के इस आंदोलन के पीछे जो लोग सक्रिय हुए हैं उनमें एक बड़ा अंश ऐसे लोगों का है जो विचारों से संकीर्णतावादी हैं।
       मीडिया उन्माद,अण्णा हजारे की संकीर्ण वैचारिक प्रकृति और भ्रष्टाचार इन तीनों के पीछे सक्रिय सामाजिक शक्तियों के विचारधारात्मक स्वरूप का विश्लेषण जरूर किया जाना चाहिए। इस प्रसंग में इंटरनेट पर सक्रिय भ्रष्टाचार विरोधी फेसबुक मंच पर आयी टिप्पणियों का सामाजिक संकीर्ण विचारों के नजरिए से अध्ययन करना बेहतर होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय लोग इतने संकीर्ण और फासिस्ट हैं कि वे अण्णा हजारे के सुझाव से इतर यदि कोई व्यक्ति सुझाव दे रहा है तो उसके खिलाफ अपशब्दों का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। वे इतने असहिष्णु हैं कि अण्णा की सामान्य सी भी आलोचना करने वाले व्यक्तिगत पर कीचड उछाल रहे हैं। औकात दिखा देने की धमकियां दे रहे हैं। यह अण्णा के पीछे सक्रिय फासिज्म है। अण्णा की आलोचना को न मानना,आलोचना करने वालों के खिलाफ हमलावर रूख अख्तियार करना संकीर्णतावाद है। इस संकीर्णतावाद की जड़ें भूमंडलीकरण में हैं। अन्ना हजारे फिनोमिना हमारे सत्ता सर्किल में पैदा हुए संकीर्णतावाद का एनजीओ रूप है। इसका लक्ष्य है राजनीतिक दलों को बेमानी करार देना। संसद-विधानसभा आदि के द्वारा तय लोकतांत्रिक प्रक्रिया और परंपराओं का उल्लंघन करना। आयरनी यह है कि अण्णा हजारे के संकीर्ण हिन्दुत्ववादी विचारों को जानने के बाबजूद बड़े पैमाने पर लोकतांत्रिक मनोदशा के लोग उनके साथ हैं। ये ही लोग प्रत्यक्षतः आरएसएस के साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं हैं लेकिन अन्ना हजारे के साथ खड़े होने के लिए तैयार हैं जबकि अन्ना के विचार उदार नहीं संकीर्ण हैं। असल में एनजीओ संस्कृति की आड़ में संकीर्णतावादी -प्रतिगामी विचारों की जमकर खेती हो रही है।इनका तेजी से मध्यवर्ग में प्रचार-प्रसार हो रहा है। ये सत्ता के विकल्प का दावा पेश करते हैं। तुरंत समाधान की मांग करते हैं। यह 'पेंडुलम इफेक्ट' पद्धति है। इसमें चट मगनी पट ब्याह। यह संकीर्णतावादी आर्थिक मॉडल से जुड़ा फिनोमिना है। वे छद्म संदेश दे रहे हैं सरकार परफेक्ट नहीं हम परफेक्ट हैं। सरकार की तुलना में अन्ना की प्रिफॉर्मेंश सही है। जो काम 42 साल से राजनीतिक दल नहीं कर पाए वह काम एनजीओ और सिविल सोसायटी संगठनों ने कर दिया। असल में सिविल सोसायटी आंदोलन की धुरी है लोकतांत्रिक संस्थाओं ,नियमों और परंपराओं की अवहेलना करना।इसे मनमोहन सरकार बढ़ावा दे रही है।
          


शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

अन्ना हजारे की मीडिया रणनीतियां

            अन्ना हजारे -अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव के बयानों में एक खास किस्म का भ्रष्टाचार निरंतर चल रहा है। इन लोगों की बातों और समझ में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है। यह एनजीओ राजनीति विमर्श की पुरानी बीमारी है। जन लोकपाल बिल का लक्ष्य है आर्थिक भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सक्रिय कानूनी तंत्र का गठन। यह बहुत ही सीमित उद्देश्य है। निश्चित रूप से इतने सीमित लक्ष्य की जंग को आप धर्मनिरपेक्षता, साम्प्रदायिकता, संघ परिवार आदि के पचड़ों नहीं फंसा सकते।
       अरविंद केजरीवाल ने 14 अप्रैल 2011 को टाइम्स आफ इण्डिया में लिखे अपने स्पष्टीकरण में साफ कहा है कि "हमारा आंदोलन धर्मनिरपेक्ष और गैरदलीय है।" सतह पर इस बयान से किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। समस्या है अन्ना हजारे के कर्म की। वे क्या बयान देते हैं उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है उनका कर्म। पर्यावरण के नाम पर उन्होंने जो आंदोलन चलाया हुआ है और अपने हरित गांवों में जो सांस्कृतिक वातावरण पैदा किया है वो उनके विचारधारात्मक चरित्र को समझने के लिए काफी है। कायदे से अरविंद केजरीवाल को मुकुल शर्मा के द्वारा काफिला डॉट कॉम पर लिखे लेख का जबाब देना चाहिए। बेहतर तो यही होता कि अन्ना हजारे स्वयं जबाव दें।
     अरविंद केजरीवाल का टाइम्स ऑफ इण्डिया में जो जबाव छपा है वह अन्ना हजारे को धर्मनिरपेक्ष नहीं बना सकता। अन्ना ने पर्यावरण को धर्म से जोड़ा है। पर्यावरण संरक्षण का धर्म से कोई संबंध नहीं है। अन्ना ने पर्यावरण संरक्षण को हिन्दू संस्कारों और रीति-रिवाजों से जोड़ा है। अन्ना का सार्वजनिक आंदोलन को धर्म से जोड़ना अपने आप में साम्प्रदायिक कदम है।
     अन्ना के तथाकथित एनजीओ आंदोलन की धुरी है संकीर्ण हिन्दुत्ववादी विचारधारा। जिसकी किसी भी समझ से हिमायत नहीं की जा सकती। अन्ना हजारे को लेकर चूंकि मीडिया में महिमामंडन चल रहा है और अन्ना इस महिमामंडन को भुना रहे हैं, इसलिए उनके इस वर्गीय चरित्र की मीमांसा करने की भी जरूरत महसूस नहीं की गई ।
     अन्ना ने अपने एक बयान में कहा है कि "  मेरा अनशन किसी सरकार या व्यक्ति के खिलाफ पूर्वाग्रहग्रस्त नहीं था बल्कि वह तो भ्रष्टाचार के खिलाफ था। क्योंकि इसका आम आदमी पर सीधे बोझा पड़ रहा है।" अन्ना का यह बयान एकसिरे से गलत है अन्ना ने अनशन के साथ ही अपना स्टैंण्ड बदला है। अन्ना का आरंभ में कहना था केन्द्र सरकार संयुक्त मसौदा समिति की घोषणा कर दे मैं अपना अनशन खत्म कर दूँगा। बाद में अन्ना को लगा कि केन्द्र सरकार उनके संयुक्त मसौदा समिति के प्रस्ताव को तुरंत मान लेगी और ऐसे में अन्ना ने तुरंत एक नयी मांग जोड़ी कि मसौदा समिति का अध्यक्ष उस व्यक्ति को बनाया जाए जिसका नाम अन्ना दें। केन्द्र ने जब इसे मानने से इंकार किया तो अन्ना ने तुरंत मिजाज बदला और संयुक्त अध्यक्ष का सुझाव दिया लेकिन सरकार ने यह भी नहीं माना और अंत में अध्यक्ष सरकारी मंत्री बना और सह-अध्यक्ष गैर सरकारी शांतिभूषण जी बने। लेकिन दिलचस्प बात यह हुई कि अन्ना इस समिति में आ गए। जबकि वे आरंभ में स्वयं नहीं रहना चाहते थे। मात्र एक कमेटी के निर्माण के लिए अन्ना ने जिस तरह प्रतिपल अपने फैसले बदले उससे साफ हो गया कि पर्दे के पीछे कुछ और चल रहा था।
       अन्ना हजारे के इस आंदोलन के पीछे मनीपावर भी काम करती रही है इसका साक्षात प्रमाण है मात्र 4 दिन में इस आंदोलन के लिए मिला 83 लाख रूपये चंदा और इस समिति के लोगों ने इसमें से तकरीबन 32 लाख रूपये खर्च भी कर दिए। टाइम्स ऑफ इण्डिया में 15 अप्रैल 2011 को प्रकाशित बयान में इस ग्रुप ने कहा है -
"it has received a total donation of Rs 82,87,668."..  "spokesperson said, they have spent Rs 32,69,900." यानी अन्ना हजारे के लिए आंदोलन हेतु संसाधनों की कोई कमी नहीं थी। मात्र 4 दिनों 83 लाख चंदे का उठना इस बात का संकेत है कि अन्ना के पीछे समर्थ लॉबी काम करती रही है। अन्ना हजारे के आंदोलन की मीडिया हाइप का यह सीधे फल है जो अन्ना के भक्तों को मिला है। एनजीओ संस्कृति नियोजित पूंजी की संस्कृति है। स्वतःस्फूर्त संस्कृति नहीं है बल्कि निर्मित वातावरण की संस्कृति है।
     एनजीओ समुदाय में काम करने वाले लोगों की अपनी राजनीति है।विचारधारा है और वर्गीय भूमिका भी है। वे परंपरागत दलीय राजनीति के विकल्प के रूप में काम करते रहे हैं। अन्ना हजारे के इस आंदोलन के पीछे जो लोग हठात सक्रिय हुए हैं उनमें एक बड़ा अंश ऐसे लोगों का है जो विचारों से संकीर्णतावादी हैं।
       मीडिया उन्माद,अन्ना हजारे की संकीर्ण वैचारिक प्रकृति और भ्रष्टाचार इन तीनों के पीछे सक्रिय सामाजिक शक्तियों के विचारधारा त्मक स्वरूप का विश्लेषण जरूर किया जाना चाहिए। इस प्रसंग में इंटरनेट पर सक्रिय भ्रष्टाचार विरोधी फेसबुक मंच पर आयी टिप्पणियों का सामाजिक संकीर्ण विचारों के नजरिए से अध्ययन करना बेहतर होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय लोग इतने संकीर्ण और स्वभाव से फासिस्ट हैं कि वे अन्ना हजारे के सुझाव से इतर यदि कोई व्यक्ति सुझाव दे रहा है तो उसके खिलाफ अपशब्दों का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। वे इतने असहिष्णु हैं कि अन्ना की सामान्य सी भी आलोचना करने वाले पर व्यक्तिगत कीचड उछाल रहे हैं। औगात दिखा देने की धमकियां दे रहे हैं। यह अन्ना के पीछे सक्रिय फासिज्म है।
    अन्ना की आलोचना को न मानना,आलोचना करने वालों के खिलाफ हमलावर रूख अख्तियार करना संकीर्णतावाद है। इस संकीर्णतावाद की जड़ें भूमंडलीकरण में हैं। अन्ना हजारे और उनकी भक्तमंडली के सामाजिक चरित्र में व्याप्त इस संकीर्णतावाद का ही परिणाम है कि अन्ना हजारे स्वयं भी कपिल सिब्बल की सामान्य सी टिप्पणी पर भड़क गए और उनसे मसौदा कमेटी से तुरंत हट जाने की मांग कर बैठे।
    अन्ना हजारे फिनोमना हमारे सत्ता सर्किल में पैदा हुए संकीर्णतावाद का एनजीओ रूप है जिसका समाजविज्ञान में भी व्यापक आधार है। वरना यह कैसे हो सकता है कि अन्ना हजारे के संकीर्ण हिन्दुत्ववादी विचारों को जानने के बाबजूद बड़े पैमाने पर लोकतांत्रिक मनोदशा के लोग उनके साथ हैं। ये ही लोग प्रत्यक्षतः आरएसएस के साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं हैं लेकिन अन्ना हजारे के साथ खड़े होने के लिए तैयार हैं जबकि अन्ना के विचार उदार नहीं संकीर्ण हैं। इससे यह भी पता चलता है कि एजीओ संस्कृति की आड़ में संकीर्णतावादी -प्रतिगामी विचारों की जमकर खेती हो रही है,उनका तेजी से मध्यवर्ग में प्रचार-प्रसार हो रहा है।
   अन्ना मार्का संकीर्ण विचार के प्रसार का बड़ा कारण है उनका सत्ता के विचारों का विरोध करना। वे सत्ता की विचारधारा का विरोध करते हैं और अपने विचारों को सत्ता के विचारों के विकल्प के रूप में पेश करते हैं। उन्होंने अपने को सुधारवादी -लिबरल के रूप में पेश किया हैं। वे हर चीज को तात्कालिक प्रभाव के आधार पर विश्लेषित कर रहे हैं। वे सत्ता के विकल्प का दावा पेश करते हुए जब भी कोई मांग उठाते हैं ,उसके तुरंत समाधान की मांग करते हैं, और जब वे चटपट समाधान कराने में सफल हो जाते हैं तो दावा करते हैं कि देखो हम कितने सही हैं और हमारा नजरिया कितना सही है। अन्ना हजारे का मानना यही है, उन्होंने जन लोकपाल बिल की मांग की और 4 दिन में केन्द्र सरकार ने उनकी मांग को मान लिया।यही सरकार 42 साल से नहीं मान रही थी,लेकिन अन्ना की मांग को 4 दिन में मान लिया।
    अन्ना हजारे टाइप लोग 'पेंडुलम इफेक्ट' की पद्धति का व्यवहार करते हैं। चट मगनी पट ब्याह। इसके विपरीत लोकपाल बिल का सत्ता विमर्श बोरिंग,दीर्घकालिक और अवसाद पैदा करने वाला था। इसके प्रत्युत्तर में अन्ना हजारे टाइप एक्शन रेडीकल और तुरत-फुरत वाला था। यह बुनियादी तौर पर संकीर्णतावादी आर्थिक मॉडल से जुड़ा फिनोमिना है। 
   अन्ना के एक्शन ने संदेश दिया कि वह चटपट काम कर सकते हैं। जो काम 42 सालों में राजनीतिक दलों ने नहीं किया उसे हमने मात्र 4 दिन में कर दिया। लोकपाल बिल के पास होने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी हमने इसके पास होने की उम्मीदें जगा दी। निराशा में आशा पैदा करना और इसकी आड़ में वैज्ञानिक बुद्धि और समझ को छिपाने की कला काम करती रही है। दूसरा संदेश यह गया कि सरकार परफेक्ट नहीं हम परफेक्ट हैं। सरकार की तुलना में अन्ना की प्रिफॉर्मेंश सही है।जो काम 42 साल से राजनीतिक दल नहीं कर पाए वह काम एनजीओ और सिविल सोसायटी संगठनों ने कर दिया। इस काम के लिए जरूरी है कि सत्ता के साथ एनजीओ सक्रिय भागीदारी निभाएं।
    रामविलास पासवान ने जब लोकपाल बिल की मसौदा कमेटी में दलित भागीदारी की मांग की तो भ्रष्टाचार विरोधी मंच के लोग बेहद खफा हो गए। दूसरी ओर अन्ना ने भी कमेटी के लिए जिन लोगों के नाम सुझाए वे सभी अभिजन हैं। इससे अन्ना यह संदेश देना चाहते हैं कि वे लोकतंत्र में अभिजन के प्रभुत्व को मानते हैं। आम जनता सिर्फ वोट दे,शिरकत करे। लेकिन कमेटी में अभिजन ही रहेंगे। अन्ना हजारे इस सांकेतिक फैसले का अर्थ है लोकतंत्र में सत्ता और आम जनता के बीच खाई बनी रहेगी।
     इसके अलावा अन्नामंडली ने इस पूरे लोकतांत्रिक मसले को गैरदलीय और अ-राजनीतिक बनाकर पेश किया। इससे यह संदेश गया कि  लोकतंत्र में राजनीति की नहीं अ-राजनीति की जरूरत है। अन्ना हजारे के अनशन स्थल पर उमाभारती आदि राजनेताओं के साथ जो दुर्व्यवहार किया गया उसने यह संदेश दिया कि जनता और राजनीति के संबंधों का अ-राजनीतिकरण हो गया है। और आम जनता को राजनीतिक प्रक्रिया से अलग रहना चाहिए राजनीति दल चोर हैं,भ्रष्ट हैं। इस तरह अन्ना मुक्त बाजार में मुक्त राजनीति के नायक के रूप में उभरकर सामने आए हैं।
      
     अन्ना ने एनजीओ राजनीति को उपभोक्ता वस्तु की तरह बेचा है। जिस तरह किसी उपभोक्ता वस्तु का एक व्यावसायिक और विज्ञापन मूल्य होता है।ठीक वैसे ही अन्ना हजारे मार्का आमरण अनशन का मासमीडिया ने इस्तेमाल किया है। उन्होंने अन्ना के आमरण अनशन और उसकी उपयोगिता पर बार बार बलदिया। उसका टीवी चैनलों के जरिए लंबे समय तक लाइव टेलीकास्ट किया।
     अन्ना के आमरण अनशन की प्रचार नीति वही है जो किसी भी माल की होती है। अन्ना ने कहा 'तेरी राजनीति से मेरी राजनीति श्रेष्ठ है।'  इसके लिए उन्होंने नागरिकों की व्यापक भागीदारी को मीडिया में बार बार उभारा और सिरों की गिनती को महान उपलब्धि बनाकर पेश किया।  यह वैसे ही है जैसे वाशिंग मशीन के विज्ञापनदाता कहते हैं कि 10 करोड़ घरों में लोग इस्तेमाल कर रहे हैं तुम भी करो। अन्ना की मीडिया टेकनीक है चूंकि इतने लोग मान रहे हैं अतः तुम भी मानो। यह विज्ञापन की मार्केटिंग कला है।
  टीवी कवरेज में बार-बार एक बात पर जोर दिया गया कि देखो अन्ना के समर्थन में "ज्यादा से ज्यादा" लोग आ रहे हैं। "ज्यादा से ज्यादा" लोगों का फार्मूला आरंभ हुआ चंद लोगों से और देखते ही देखते लाखों -लाख लोगों के जनसमुद्र का दावा किया जाने लगा। चंद से लाखों और लाखों से करोड़ों में बदलने की कला विशुद्ध विज्ञापन कला है। इसका जनता की हिस्सेदारी के साथ कोई संबंध नहीं है। यह विशुद्ध मीडिया उन्माद पैदा करने की कला है जिसका निकृष्टतम ढ़ंग से अन्नामंडली ने इस्तेमाल किया।
टीवी कवरेज में एक और चीज का ख्याल रखा गया और वह है क्रमशः जीत या उपलब्धि की घोषणा। विज्ञापन युद्ध की तरह शतरंज का खेल है। इसमें आप जीतना जीतते हैं उतने ही सफल माने जाते हैं।जितना अन्य का व्यापार हथिया लेते हैं उतने ही सफल माने जाते हैं। अन्नामंडली ने ठीक यही किया आरंभ में उन्होंने प्रचार किया कि केन्द्र सरकार जन लोकपाल बिल के पक्ष में नहीं है। फिर बाद में दो दिन बाद खबर आई कि सरकार झुकी, फिर खबर आई कि सरकार ने दो मांगें मानी,फिर खबर आई कि खाली मसौदा समिति के अध्यक्ष के सवाल पर मतभेद है,बाद में खबर आई कि सरकार ने सभी मांगें मान लीं। क्रमशः अन्ना की जीत की खबरों का फ्लो बनाए रखकर अन्नामंडली ने अन्ना को एक ब्राँण्ड बना दिया। उन्हें भ्रष्टाचारविरोधी ब्राँण्ड के रूप में पेश किया।
      अन्ना के व्यक्तिवाद को खूब उभारा गया। अन्ना के व्यक्तिवाद को सफलता के प्रतीक के रूप में पेश किया गया। मीडिया कवरेज में अन्ना मंडली ने आंदोलन के 'युवापन' को खूब उभारा,जबकि सच यह है कि अन्ना ,अग्निवेश,किरन बेदी में से कोई भी युवा नहीं है। आमरण अनशन का नेतृत्व एक बूढ़ा कर रहा था। इसके बाबजूद कहा गया यह युवाओं का आंदोलन है। आरंभ में इसमें युवा कम दिख रहे थे लेकिन प्रचार में युवाओं पर तेजी से इंफेसिस दिया गया। आखिर इन युवाओं को प्रचार में निशाना बनाने की जरूरत क्यों पड़ी ? आखिर अन्ना के आंदोलन में किस तरह का युवा था ?
     अन्ना की मीडिया टेकनीक 'सफलता' पर टिकी है। 'सफलता' पर टिके रहने के कारण अन्ना को सफल होना ही होगा। यदि अन्ना असफल होते हैं तो संकीर्णतावाद का प्रचार मॉडल पिट जाता है। अन्ना के बारे में बार-बार यही कहा गया कि देखो उन्होंने कितने 'सफल' आंदोलनों का नेतृत्व किया। एनजीओ संस्कृति और संघर्ष की रणनीति में 'सफलता' एक बड़ा फेक्टर है जिसके आधार पर अ-राजनीति की राजनीति को सफलता की ऊँचाईयों के छद्म शिखरों तक पहुँचाया गया।
   अन्नामंडली की मीडिया रणनीति की सफलता है कि वे अपने आंदोलन को नियोजित और पूर्व कल्पित की बजाय स्वतःस्फूर्त और स्वाभाविक रूप में पेश करने में सफल रहे। जबकि यह नियोजित आंदोलन था। जब आप किसी आंदोलन को स्वतःस्फूर्त और स्वाभाविक रूप में पेश करते हैं तो सवाल खड़े नहीं किए जा सकते। यही वजह है अन्ना हजारे,उनकी भक्तमंडली,आमरण अनशन,लोकपाल बिल,भ्रष्टाचार आदि पर कोई परेशानी करने वाला सवाल करने वाला तुरंत बहिष्कृतों की कोटि में डाल दिया जाता है। अन्ना ने इस समूचे प्रपंच को बड़ी ही चालाकी के साथ भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में रखकर पेश किया। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में आमरण अनशन को पेश करने का लाभ यह हुआ कि आमरण अनशन पर सवाल ही नहीं उठाए जा सकते थे। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में पेश करने के कारण ही अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार को अतिसरल बना दिया और उसकी तमाम जटिलताओं को छिपा दिया। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में जब जन लोकपाल बिल और भ्रष्टाचार को पेश किया तो दर्शक को इस मांग और आंदोलन के पीछे सक्रिय विचारधारा को पकड़ने में असुविधा हुई। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस को दैनंदिन जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार के फुटेजों के जरिए पुष्ट किया गया।
    एनजीओ संकीर्णतावाद के पीछे लोगों को गोलबंद करने के लिए कहा गया कि राजनीतिज्ञ ,राजनीतिक प्रक्रिया,चुनाव आदि भ्रष्ट हैं। इससे एनजीओ संकीर्णतावाद और अन्नामंडली के प्रतिगामी विचारों को वैधता मिली।

रविवार, 10 अप्रैल 2011

वर्चुअल अन्ना का नकली मीडिया संग्राम

अन्ना हजारे बड़े हैं। आदरणीय हैं। संघर्षपूर्ण जीवन जीते रहे हैं। लेकिन जन्तर-मन्तर में उन्होंने इसबार आम जनता के साथ आंदोलन का जो नाटक खेला है उसे श्रद्धा को एक तरफ रखकर राजनीतिक भाषा में पढ़ने की जरूरत है। इस बात को कहने का यह अर्थ नहीं है कि उनके प्रति किसी तरह की मेरे मन श्रद्धा कम हो गयी है लेकिन राजनीति की भाषा में कहें तो अन्ना हजारे लोकपाल बिल पर जन्तर-मन्तर में जो खेल कर रहे थे वह कांग्रेस का प्रायोजित खेल था। कांग्रेस ने अन्ना हजारे के माध्यम से यह खेल क्यों खेला इसका जबाब अन्ना हजारे ही दे सकते हैं। हम तो सिर्फ सामने इंटरनेट और मीडिया में जो घट रहा है उसकी ओर ध्यान खींच रहे हैं। अन्ना के आमरण अनशन के बाद की गयी घोषणाएं इस बात की सूचना है कि अन्ना के बहाने विभिन्न स्तरों पर नए सिरे दबाब की राजनीति का अलोकतान्त्रिक खेल भविष्य में होगा। पहले हम संक्षेप में उस राजनीति को पढ़ें जो अन्ना ने की है।
       अन्ना हजारे ईमानदार हो सकते हैं। लेकिन उन्हें और उनके समर्थकों को सोनिया गांधीके सत्ता के तंत्र से अलग रखना होगा।सन् 1974 में कम से कम बाबू जयप्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाते समय सत्ता के गलियारों में सक्रिय किसी भी नेता या कांग्रेसी सलाहकार बुद्धिजीवी को अपने साथ नहीं रखा था।इस नजरिए से देखें तो अन्ना की जंग नकली जंग है और सरकार और सोनिया नियंत्रित जंग है। कैसे है यह जंग सरकार नियंत्रित उसका भंडाभोड यहां पर देखें।
     लोकपाल बिल पर जो कमेटी बनी है उसमें अन्ना हजारे के जो लोग हैं वे सोनिया गांधी की अध्यक्षता में काम करने वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में भी हैं। खासकर लोकपाल बिल पर बनी कमेटी में वे सभी लोग हैं जिनको अन्ना ने प्रस्तावित किया है। लोकपाल बिल का नाटक शुरू होने के पहले अन्ना हजारे की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से 15 मिनट बातचीत हुई। इसके पहले लोकपाल बिल के मसौदे पर भी सोनिया गांधी की नजरदारी में बैठक हुई। यह बात राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की वेबसाइट पर दी गयी सूचना में कही गयी है। लोकपाल बिल का मसौदा तैयारी की प्रक्रिया में है और इसे तैयार करने वाली कमेटी में जस्टिस संतोष हेगड़े हैं,प्रशान्तभूषण है,शांतिभूषण है,अरविंद केजरीवाल हैं, सिर्फ अन्ना हजारे इसमें नहीं हैं। बाकी अन्ना हजारे के सुझाए 4 आदमी उस कमेटी में हैं जिसने नए लोकपाल बिल का मसौदा तैयार किया है। लोकपाल बिल की समस्त जानकारी और उन सलाहकारों के नाम यहां सीधे पेस्ट कर रहे हैं जिससे अन्ना हजारे के इस सरकारी नाटक को समझ सकें।
    अन्ना हजारे यदि सचमुच में ईमानदारी से संघर्ष करना चाहते हैं तो उन्हें और उनके सलाहकारों को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद से अपने को अलग करना चाहिए।सत्ता के तमाम पापों को विभिन्न किस्म के नामों से पुण्य में बदलने का यह परिषद काम कर रही है। यह सत्ता की सलाहकार परिषद है। जनता के हितों की संरक्षक परिषद नहीं है। इस परिषद का काम वही है जिसे एक जमाने में कांग्रेस में युवा तुर्क अंजाम दिया करते थे। उन्होंने कांग्रेस में समाजवादी मंच बनाया हुआ था,संयोग से उसके अवशेष के रूप में शशिभूषण आज भी कांग्रेस के इस मंच में मौजूद हैं। अन्ना हजारे का संघर्ष किसी भी अर्थ में तब ही प्रामाणिक और ईमानदार बनेगा जब वे और उनके सलाहकार सत्ता की इस परिषद से बाहर आकर लड़ें।
       अन्ना हजारे की तथाकथित जंग,सत्ता द्वारा प्रायोजित जंग है। सत्ता के द्वारा जो लक्ष्मण रेखा खींची गयी है उसके भीतर ही रहकर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के लोग विभिन्न स्तरो पर और विभिन्न किस्म के एनजीओ में काम कर रहे हैं। यह नव्य उदार राजनीति का नया तरीका है काम करने का। सवाल यह नए लोकपाल बिल पर जब इतना काम आगे बढ़ चुका था तो आमरण अनशन का नाटक करने और आम जनता की आंखों में धूल झोंकने की क्या जरूरत थी ? जिन लोगों को अविश्वस हो वे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की वेबसाइट पर दी गयी लोकपाल बिल संबंधी जानकारी को पढ़ लें और इस नाटक को जान लें।

Lokpal Bill

The National Advisory Council (NAC) took a decision on February 26, 2011 to examine the Lokpal Bill by the Transparency, Accountability & Governance Working Group. The NAC Working Group on Transparency, Accountability and Governance held its first consultation with civil society groups on the Lokpal Bill under the convenership of Smt. Aruna Roy on 4th April, 2011. The meeting discussed the draft prepared by various people’s movements and groups. After exhaustive discussions, there was consensus on most of the general principles underlying the draft Bill, though some provisions need to be examined further. The NAC WG on TA & G, will finalize the principles and framework, on the basis of this discussion. Another meeting of the WG is scheduled before the National Advisory Council meets on April 28, 2011. The attendees included S/Shri/Ms: Shanti Bhushanji, Prabhat Kumar, Aruna Roy, Trilochan Sastry, Jagdeep Chhokar, Kamal Jaswal, Zaware, Santosh Hegde, Narendra Jadhav, Nikhil Dey, Shekhar Singh, Vrinda Grover, Harsh Mander, Wajahat Habibullah, Arvind Kejriwal, Swami Agnivesh, Sarvesh Sharma, Usha Ramanathan, Amitabh Mukhopadhyay, Santosh Mathew, Shanti Narain, Prashant Bhushan, Sandeep Pandey and members of the NAC Secretariat

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

अन्ना हजारे, एनजीओ राजनीति और मीडिया का कटु सत्य

अन्ना हजारे वायदे के मुताबिक आज सुबह 10 बजे अनशन तोड़ देंगे और अपने ठीया पर चले जाएंगे। अन्ना हजारे का अनशन निश्चित रूप से एक सकारात्मक अनशन था। यह अनशन नव्य उदार राजनीति की दबाब की राजनीति का हिस्सा है। नव्य उदार राजनीति अनेक काम जनता के दबाब से करती है।सत्ता पर्दे के पीछे रहती है और आंदोलनकारी आगे रहते है। यह पॉलिटिक्स फ्रॉम विलो का खेल है। आम तौर पर जमीनी राजनीति प्रतिवादी होती है रीयलसेंस में। लेकिन नव्य उदार परिप्रेक्ष्य में काम करने वाले संगठनों के द्वारा सत्ता,संगठन और आंदोलन का दबाब की राजनीति के लिए इस्तेमाल हो रहा है। अन्ना हजारे का आमरण अनशन उसका ही हिस्सा है।
अन्ना हजारे ने जो कहा और किया है उस पर कम से कम इस आंदोलन के संदर्भ में गंभीरता के ताथ विचार करने की जरूरत है। अन्ना का मानना है लोकपाल बिल के लिए जो कमेटी बने उसका प्रधान किसी ऐसे व्यक्ति को बनाया जाए जो अ-राजनीतिक हो। आयरनी यह है कि अन्ना की तरफ से सह-अध्यक्ष के रूप में शांतिभूषण का नाम दिया गया जो आजीवन राजनीति करते रहे हैं ,देश के कानून मंत्री रहे हैं। वे वाम ऱूझान की राजनीति करते रहे हैं। अतः अन्ना की कथनी और करनी में अंतर है।
दूसरी बात यह कि एनजीओ की राजनीति करने वाले संगठनों में सूचना अधिकार रक्षा आंदोलन से जुड़े केजरीवाल भी राजनीति कर रहे हैं। यह बात दीगर है कि वे किसी दल से जुड़े नहीं हैं। जनाधिकार,मानवाधिकार आंदोलनों से जुड़े प्रशांतभूषण पेशे से वकील है लेकिन मानवाधिकार राजनीति से जुड़े हैं। हां संतोष हेगडे राजनीति से जुड़े नहीं हैं। उससे भी बडा सवाल यह है कि एनजीओ वाले जिस अ-राजनीति की राजनीति की हिमायत करते हैं उसका लक्ष्य भी राजनीति है।
भारतीय लोकतंत्र में नामांकित लोकतंत्र नहीं चलता जैसा अन्ना हजारे और उनके जैसे समाजसेवी सोच रहे हैं। वे जानते हैं कि अमेरिका में सिविल सोसायटी आंदोलन बहुत ताकतवर है लेकिन वे लोकतंत्र में चुनाव नहीं जीत पाते।सिविल सोसायटी आंदोलन का आर्थिक स्रोत है कारपोरेट घराने। अन्ना हजारे और उनके समर्थकों को राजनीति की गंदगी को साफ करना है तो उन्हें चुनाव लड़ना चाहिए। चुनाव लड़कर ईमानदार छवि के लोगों को जिताना चाहिए। वे यह भी देखें कि आम जनता कितनी उनकी सुनती है ? कितना उनके साथ है ?यह भी तय हो जाएगा कि मोमबत्ती मार्च और जनता के मार्च में कितना साम्य और बैषम्य है ? मोमबत्ती वाले युवा कितने टिकाऊ हैं ? कितने संघर्षशील है ?

अन्ना हजारे जानते हैं तथाकथित सिविल सोसायटी के नेतागण सिर्फ मीडियावीर हैं। जनता में बहुमत का समर्थन पाना उनके बूते के बाहर है। लोकतंत्र को हम सिविल सोसायटी के नाम पर ऐसे लोगों के रहमोकरम पर नहीं छोड़ सकते जिनकी कोई राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं है।भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबू जयप्रकाश नारायण का जनता पार्टी का प्रयोग पूरी तरह फेल हुआ है। केन्द्र में सत्ता मिलने के बाबजूद जनता पार्टी की सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल पास नहीं करवा पायी। उस सरकार में स्वयं शांतिभूषण भी थे। आज वही शांतिभूषण कह रहे हैं कि हम 1978 का लोकपाल बिल पास कराना चाहते हैं। अजब बात है जब स्वयं सत्ता में थे तो कर नहीं पाए और अब दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाना चाहते हैं।

अन्ना हजारे जानते हैं राजनीतिक दलों में वामपंथियों ने लंबे समय से लोकपाल बिल के दायरे में प्रधानमंत्री को भी शामिल करने की मांग की थी,उस समय इसका सभी ने विरोध किया। यहां तक बाबू जयप्रकाश नारायण भी पीछे हट गए।भाजपा और कांग्रेस ने भी विरोध किया था। खैर अब देखना होगा कि वामदलों की लोकपाल बिल के बारे में एक जमाने में सुझायी सिफारिशों के अलावा कौन सी नई चीज है जिसे नयी कमेटी सामने लाती है।
अन्ना हजारे का टेलीविजन चैनलों से जिस तरह धारावाहिक कवरेज हुआ है वह अपने आप में खुशी की बात है लेकिन इस कवरेज में एक बात साफ निकलकर आयी है लोग भ्रष्टाचार से दुखी हैं। वे इससे मुक्ति की आशा में ही आए थे,लेकिन लोकपाल बिल का आम जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार से कोई संबंध नहीं है। इसका संबंध जन प्रतिनिधि के भ्रष्टाचार से है। सरकारी अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी ढ़ेर सारे कानून आज भी हैं और सबसे ज्यादा भ्रष्ट कौन हैं ? हमारे आईएएस-आईपीएस अफसरान ।
विगत 60 सालों में भ्रष्ट अफसरों की एक पूरी पीढ़ी पैदा हुई है। यह पीढ़ी भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों के होते हुए पैदा हुई है। इनसे भी ज्यादा करप्ट हैं देशी-विदेशी कारपोरेट घराने जो येन-केन प्रकारेण काम निकालने के लिए खुलेआम भ्रष्ट तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। कारपोरेट भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे ने कोई मांग क्यों नहीं उठायी ? अन्ना जानते हैं कि सरकारी बैंकों का 80 हजार करोड़ रूपया बिना वसूली के डूबा पड़ा है और उसमें बड़ी रकम कारपोरेट घरानों के पास फंसी पड़ी है। क्या कोई समाधान है जन लोकपाल बिल में ?कारपोरेट करप्शन के 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में हाल के बरसों में टाटा-अम्बानी आदि का नाम आया है। क्या राय है अन्ना हजारे की ? किसने हल्ला मचाया करपोरेट लूट के खिलाफ ? राजनीतिक दलों ने।

देश के एनजीओ आंदोलन की धुरी है देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों का डोनेशन। इसके जरिए विभिन्न स्रोतों से 5 हजार करोड़ रूपये से ज्यादा पैसा विदेशों से एनजीओ संगठनों को आ रहा है । क्या गांधी के अनुयायियों को यह पैसा लेना शोभा देता है ? गांधी ने भारत में आंदोलन के लिए विदेशी धन नहीं लिया था। लेकिन एनजीओ आंदोलन,सिविल सोसायटी आंदोलन , तथाकथित गांधीवादी,मानवाधिकारवादी,पर्यावरणपंथी संगठन विदेशी फंडिंग से चल रहे हैं।
    सवाल यह है कि वे देश की जनता की सेवा के लिए यहां की जनता से चंदा लें,विदेशी ट्रस्टों,थिंकटैंकों,कारपोरेट धर्मादा दानदाता संस्थाओं से चंदा क्यों लेते हैं ? क्या यह गांधीवादी राजनीति के साथ राजनीतिक भ्रष्टाचार नहीं है ?यदि है तो अन्ना हजारे सबसे पहले एनजीओ संगठनों को विदेशी धन लेकर संघर्ष करने से रोकें। ध्यान रहे एनजीओ को विदेशी धन ही नहीं आ रहा , राजनीति करने के विदेशी विचार भी सप्लाई किए जा रहे हैं। वे विदेशी राजनीति की भारतीय चौकी के रूप में काम कर रहे हैं। काश अन्ना उसे रोक पाते !

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

फेसबुक पर बुद्धिजीवियों ने अन्ना हजारे के आमरण अनशन पर उठाए अहम सवाल


फेसबुक पर अन्ना हजारे के आमरण अनशन को लेकर अनेक बुद्धिजीवियों की बहुत ही सधी और सटीक टिप्पणियां विभिन्न वॉल पर प्रकाशित हुई हैं। उनमें से यहां पर कुछ प्रतिक्रियाओं को दे रहे हैं। ये प्रतिक्रियाएं अनेक सवाल पैदा करती हैं जो अन्ना हजारे ,मीडिया और भ्रष्टाचार से जुड़े हैं। हम चानते हैं पाठकगण इन सवालों पर गंभीरता के साथ विचार करें।



Dilip Mandal
अन्ना की एकमात्र मांग है लोकपाल बिल को बनाने में सिविल सोसायटी के लोगों की हिस्सेदारी हो। क्या सिविल सोसायटी के मेंबर्स का चुनाव होगा?

अन्ना हजारे की मांग संविधान विरुद्ध है। वे कानून की प्रक्रिया में उन लोगों की हिस्सेदारी चाहते हैं जो लोकतांत्रिक तरीके से नहीं चुने गए हैं। आप उन्हें चुन नहीं सकते, हटा नहीं सकते। एमपी, एमएलए को तो हम चाहे तो हटा सकते हैं। सिविल सोसायटी के इलीट का क्या करेंगे।


 दिलीप मंडल-
जिंदगी की गति
गांधी अभी जिंदा है! अन्ना की तबियत बिगड़ी तो समझो सरकारों की सेहत खराब होगी!

Dilip Mandal
सिविल सोसायटी वाले इलीट प्रफुल्लित हैं कि बिना चुनाव लड़े और चुनाव हारने के जोखिम के, देश का कानून बनाने में उनकी हिस्सेदारी हो जाएगी।


Dilip Mandal-
इस देश के संविधान में खामियां हो सकती हैं, फिर भी यह लोकतंत्र का आधार है। इसकी वजह से इस देश में लोगों को कई तरह की स्वतंत्रता मिली है। इसे एनजीओ के हाथ में नहीं सौंपा जा सकता।
Dilip Mandal-
अन्ना के अनशन का अंत कैसे होगा? Ravindra Kumar Goliya ji ने दो संभावनाएं बताईं हैं। या तो लंबे अनशन के बाद अन्ना गुजर जाएंगे। या सरकार जनलोकपाल विधेयक पर विचार करने के लिए तैयार हो जाएगी। रवींद्र जी का मानना है कि दूसरी वाली संभावना ज्यादा प्रबल है क्योंकि इसमें सरकार और अन्ना दोनों का काम बनता है।

एक और कमेटी, एक और विधेयक, एक और कानून... और लोकपाल बनेंगे दूसरे ग्रह के लोग जो देश में सुशासन ले आएंगे।





Dilip Mandal
दिल्ली में आदिवासी कोटा खत्म करने के खिलाफ 10,000 से ज्यादा आदिवासी जंतर मंतर पर प्रदर्शन करते हैँ। आपको पता भी नहीं चला क्योंकि मीडिया इस बारे में एक लाइन भी लिखने को तैयार नहीं था। अन्ना के समर्थन में 1,000 लोग मुश्किल से हैं, जिनमें से 200 से 300 या उससे भी ज्यादा मीडिया कर्मी होंगे। लेकिन उनके आंदोलन के बारे में पूरा देश जानता है।



Dilip Mandal
अन्ना का जो करवाना है दो दिन में करवा दीजिए। 8 अप्रैल से भारत बंद होगा। आईपीएल शुरू होगा। 1,000 करोड़ रुपए के विज्ञापन दांव पर होंगे। उस दौरान आप क्या देखेंगे अन्ना का आंदोलन या आईपीएल? मीडिया आपको आईपीएल देखने को मजबूर कर देगा। अन्ना अंदर के पन्नों पर जगह पाएंगे। या पहले पेज पर सिंगल कॉलम या संक्षेप में।... तो?... तो क्या, देखते रहिए।

Dilip Mandal
नीरा राडिया एक चैनल के कर्मचारियों के वेतन का बंदोबस्त करती हैं। उस चैनल ने कल भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना के आंदोलन को जोरदार तरीके से कवर किया। बरखा दत्त के चैनल में अन्ना की कवरेज कैसी है?



Anant Kumar Jha
पत्रकारिता विशुद्ध रूप से  व्यवसाय ही है,फिर एक बार इस बात को भारतीय मीडिया ने साबित किया है.जन लोकपाल विधेयक को लेकर प्रसिद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे द्वारा किए गए आमरण अनशन के समर्थन में पूरा भारतीय मीडिया क्यों और कैसे उतर आया इसे व्यवसायिक रूप से सझने की जरुरत है.पेश है दो उदाहरण:
लाइव इंडिया: इस चैनल ने यह पहल की है कि जो भी हमें देख रहा है और अन्ना के समर्थन में आना चाहते हैं। 53030 पर अपना नाम, शहर का नाम से अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं।
दैनिक भास्कर:दैनिक भास्कर ने भी ऐसी ही पहल करते हुए भ्रष्टाचार से त्रस्त सारा देश, जरूरी आपका भी एक संदेशनाम से एक मुहिम शुरू की है. dbpahal (स्पेस) आपका नाम (स्पेस) आपका संदेश। इसे 54567 पर भेज दीजिए।
 कुल मिलजुलकर यह चोखा धंधा है. भ्रष्टाचार से खिलाफ जनयुद्ध के नाम पर मीडिया क्या गुल खिला रहा है यह तो दिख रहा है.लगे हाथ इस महान कार्य में हाथ बटा रहे मीडिया घरानों को यह भी स्पष्ट कर देना चाहिए की एसएमएस  से होने वाली कुल कमाई का कितना हिस्सा इस पुनीत कार्य पर खर्च करेंगे.

Sandeep Kumar -
corruption like a cast.never go only it could be control in little bit.corruption is a reality like cast.we are talking and running for big fish.but the corruption which has spread on ground zero,how can be removed.how many people is aware about lok pal bill.how many victims of corruption is know the process to lodge the complain through lokpal bill if it implemented now.plz raise-up the voice to change the monopoly of bureaucrats.only and only solution is to enhance the literacy power.Anna hazare or more has awake up when 2g spectrum,aadarsh socety, e.t.c came.where crore has engaged.who is ready to agitate on jantar-mantar about 100,200 rupees which has become the official fees of block and other rural agency. if this types of crore scame were not come then where was our anna hazare,where was our anti-curruption supporter,where was our having intention anti-currupted media.////////kya itne dino se hamara desh ekdam sudh tha.ye media ko world cup ke baad ab trp isme nazar aa rahi hai.


Mukesh Bhargava -
Jan Lokpal bill Aur anna.Inse kuch hoga nhin.Aakhir ek beiman se nikalkar mamla dusre ke pass chala jayega. communal bhasha bol rhe hain anna.Bahut se beiman saath me jud gye hain.Media bahut phayada le jayega.Abhi kuch din pahle cricket ka tamasha chala tha. Kuch kar pane ki koshish hain,Shyad kuch ho paye...... Waise bhi jo bathe log hain kya kum chhal rhe hain.

Abhay Tiwari
सुषमा स्वराज: भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में हम अन्ना के साथ हैं!
(और आम तौर पर हम बेल्लारी बन्धुओं के साथ हैं)

Prabhat Pandey -
और यदुरप्पा के साथ .

Rajya Bardhan
Anna Hajare ne Uma Bharti aur Om Prakash Chautala ko manch se bhaga kar achcha kiya!!! Bhrashtachari bhrashtachar ko door nahi kar sakta..... Lekhakon ko nyatik samarthan dena chahiye......!!!!!!!!!



Ritu Raj
1973 में लोकनायक जय प्रकाश नारायण की उम्र थी 73 वर्ष; 2011 में अन्ना हजारे जी की उम्र है 72 वर्ष. क्या स्वतंत्र भारत के युवाओं को हमेशा बूढ़े कंधों की लाठी की ही ज़रूरत पड़ती रहेगी?

Atal Behari Sharma

Bahut dhansu sawal kiya he Rituraj bhai...... yuva log Cricket or Ketrina me mast he....


Ritu Raj
1975 में हमलोग युवा थे ... लेकिन मस्त थे हेमा और धर्मेन्द्र में ... आज कोई और युवा है ... वह भी मस्त है कैटरीना और क्रिकेट में. 1975 में भी भ्रष्टाचार ही मुद्दा था ... 2011 में भी भ्रष्टाचार ही मुद्दा है. कहीं कुछ अनकही बातें तो नहीं छिपी हुयी हैं इन तथ्यों में??

Upendraprasad Singh -

I feel that always corruption when reaches at certain level where explosion may take place the social system throw Lighting conductor to defuse and 1975 Sampurna Kranti experience tells us that from the womb of fight against corruption the icons of corruption like LALU and his mandali will take birth


Chandra Prakash Jha -

My friend Shahid Akhtar says अन्ना हजारे की मुहिम सेलीब्री‍टीज लूट लेना चाहते हैं। इस मुहिम को सेली‍ब्री‍टीज और मीडिया की चमक नहीं गांव की डगर चाहिए। गांव में जड़ जमाए भ्रष्‍टाचार पर हमला करना जरूरी है।
लेकिन लोग गांव की पगडंडियों तक नहीं जाना चाहते। राजधानी का राजपथ उन्‍हें मीडिया की चमक एवं सुर्खियां दे रहा है। शायद ही कारण है कि क्रिकेट और फिल्‍म के लोग इसमें ब...िछे पड़े हैं। लोगों के साथ अच्‍छे रैपो से उनका ब्रांड मूल्‍य जो बढ़ेगा।
Ritu Raj -
सुमन ... मैं पूरी तरह सहमत हूँ तुम्हारे मित्र से. मैं पिछले दो वर्षों से अपने गाँव में रह रहा हूँ ... यहाँ कि मीठी और कडवी सच्चाइयों को देख रहा हूँ ... अक्सर उन्हें झेल भी रहा हूँ ... हर कदम पर हो रहे भ्रष्टाचार का दर्शक भी हूँ ... और इसी लिय बार बार कह रहा हूँ ... हमारा समाज एक भ्रष्ट समाज है ... हम कभी भ्रस्ताचार के खिलाफ नहीं हैं ... हम भ्रष्टाचार के एक हद से बढ़ाने के खिलाफ हैं ... बस.


Ritu Raj-
 सुमन ... कुछ पत्रकार बंधू भी हैं जो इस बात से अत्यंत उत्साहित हो रहे हैं कि अन्ना जी को लारा दत्ता ने भी अपना समर्थन दिया है. ऐसे एक पत्रकार बंधू के किसी मित्र ने उन्हें टोक कर कह दिया कि लारा ने अपने आनेवाली फिल्म के प्रोमोशन के चक्कर में ऐसा कहा होगा तो वे बुरा मान गए !!!!


Ritu Raj -
फेसबुक पर लोग आमिर खान कि चिट्ठी, जो उनहोंने प्रधान मंत्री को लिखी है, उसे चाव से पढ़ रहे हैं ... लेकिन उन्हीं लोगों को यदि यह कहा जाय कि जाकर थोडा वक्त गाँव में बिताएं और वहाँ के हालातों को सुधारने की कोशिश करें तो वे बिदक जायेंगे.



Chandra Prakash Jha -

Shiv Sena too has supported Anna's latest venture and we know what Shiv Sena is. Anna's last such fast - a couple of years ago- was against some corrupt ministers on the Congress -NCP government in Maharashtra and one of them Suresh Dada Jain is now in Shiv Sena !!shtra


Chandra Prakash Jha -

Forget Lara , think of Barkha Dutts & Veer Sanghvis - do they have any moral right to voice against corruption?


Chandra Prakash Jha -

Won't be surprised if tomorrow A Raja and Shahid Balwa also lend their support from the jail to Anna's cause


Ritu Raj -


मैं बिहार का हूँ ... बिहार के गाँव में रहता हूँ. नीतीश कुमार फिलहाल मीडिया के हीरो हैं ... और भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ होने का दावा भी करते हैं. तरह तरह के नए नए कानून बनाये हैं उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ ... लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आम आदमी आज भी थाने में, ब्लाक में, बिजली विभाग में - अमूमन हर जगह - चूसा जा रहा है. लेकिन वह इस से विचलित नहीं है ... उसकी जीवन शैली का एक अंग बन गया है यह भ्रष्टाचार. आम आदमी इसे अब भ्रष्टाचार मानता ही नहीं है ... वह खुश होता है पैसे दे कर क्योंकि उसका काम हो जाता है ... अक्सर जायज़ काम के लिए भी वह पैसे खर्च करता है और काम करवा कर खुशी और गर्व से फूल कर घर लौट आता है. यह है जमीनी हकीकत ... लेकिन किसी मीडिया में इसकी कोई चर्चा नहीं होती क्योकि इसमें glamour नहीं है. अन्ना हजारे के अनशन में glamour है ... वह खास दिल्ली में है ... उसे आमिर खान और लारा दत्ता का समर्थन मिल रहा है ... फेसबुक गूँज रहा है अन्ना जी के समर्थन में. लेकिन भारत के गाँवों में भ्रष्टाचार बदस्तूर जारी है.

Ritu Raj -


जैसा कि सुमन ने भी थोड़ी देर पहले कहा ... भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून तो पहले से ही मौजूद हैं ... नए नए कानून बनने से भ्रष्टाचार समाज से समाप्त नहीं होगा ... चाहे वह एक नया लोकपाल कानून ही क्यों न हो. भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई दिल्ली में लड़ना बेमानी है ... इसे तो सुमन के मित्र के शब्दों में ... पगडंडियों पर उतरना होगा ... अन्यथा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाइयों का यह सिलसिला चलता रहेगा और भ्रष्टाचार अपनी जगह बरकरार रहेगा.


Chandra Prakash Jha -
Some Numbers : Just now my search on Goggle for 'corruption in India ' yielded' about 30,600,000 results in 0.07 seconds while the search for " Anna Hajare ' had about about 1,070,000 results in 0.08 seconds. Surely Corruption in India has much more base than Anna Hajare.

akshay Bakaya-


The Congress calling the "immensely respected" Anna Hazare a "maverick" & RSS agent is definitely a sign of cold feet.

Even in the 70s, it was Indira's knee-jerk Emergency rule that revived the dying RSS, jailing them and making heroes out of them. As in Tahrir square a corrupt régime's secret hope (or stragegy) would be that participants would commit violence (as too often in Palestine, Kashmir) so that the movement could be quickly labelled terrorist, naxalite, etc. and legitimately repressed by the state's always-stronger violence.

Great things seem possible if imagination and creativity infects this movement. Gene Sharp's handbook of non-violent revolution, as everywhere recently, can be a key source, especially the "198 Methods". See (and do pass on please) :


Asrar Khan-

ये अन्ना हजारे का साथ देने का विल्कुल सही वक्त है /..इसी बीच यह भी पता चला है की हमारे महामहिम प्रधानमंत्री ने कहा है की अन्ना हजारे किसी के बहकावे में आकार आमरण अनशन पर बैठ गए हैं /..इसके बाद लोगों ने प्रधान मंत्री से पूछना शुरू कर दिया है की क्या हजारे साहब बच्चे हैं..? पी यम साहब की बात आप लोगों को कैसी लगी ?

अण्णा हजारे की अगुआई वाले जन आंदोलन को सफलता मिलती दिख रही है और सरकार झुकती हुयी दिख रही हैा ऐसे में दुष्यंोत का एक शेर याद आता है 
कौन कहता है आसमां में नहीं हो सकता सुराख 
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों ।


सत्य को सत्य कहने की कीमत हर एक को चुकानी पड़ती है...कभी कभी तो खाना पीना भी मुश्किल हो जाता है.... यकीन ना हो तो अन्ना हजारे सा. को देख लीजिए...




कुछ महत्त्वाकांक्षी बुद्धिजीवियों और चुके हुए रिटायर्ड महत्त्वाकांक्षियों के अलावा.... अन्ना साहब हजारे के साथ कोई नहीं है.... यह कोई जन-आन्दोलन नहीं... एक समूह की कुछ मांगों को पूरा करवाने का आग्रह है.. हठ है...
......... भ्रष्टाचार कोई सरकारी महकमा नहीं जिसे सरकार पर दबाव बनाकर बंद करवा दिया जाय....भ्रष्टाचार आदमी के जीन में है... कोई बड़ा भ्रष्टाचारी है.. कोई छोटा...कोई बहुत छोटा...
.... पहले आंदोलन के अगुआ अपने निष्कलंक होने का प्रमाण जनता को दें... फिर जनता भी उनके साथ आएगी.....
.. मीडिया भी अपना रवैया ठीक करे.... एक अभिनेता को गाँधी जैसे महान, नेक और निष्पक्ष पुरुष से ऐरे-गैरे की तुलना न करे... गाँधी जी कभी गाँधी-टोपी पहन कर गाँधी बनने का नाटक नहीं करते थे....
इसे जन आंदोलन कहकर न पुकारा जाय... इससे इतिहास की आत्मा पीड़ित होगी...आने वाली पीढ़ी हमारा मजाक बनाएगी....


Ajay Rohilla -
अन्ना हजारे के लिए ....एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यों कहो इस अँधेरी कोठरी में एक रोशनदान है ...-दुष्यंत कुमार


Subodh Shukla -
कुछ प्रूफ रीडर बुद्धिजीवी और पेज ३ समाज-चिन्तक अन्ना के अनशन पर दिए जा रहे छोटे-छोटे भाषणों का पाठ मनु-स्मृति की तरह पेश कर रहे हैं. यह दुखद है. किन्तु संघर्ष और आन्दोलन, विचार की सामाजिक समझ एवं समस्या के व्यापक जनतांत्रिक आयामों की धुरी पर टिके होते हैं. अपनी तमाम सीमाओं और असमर्थताओं के बावजूद अन्ना आज लोकतांत्रिक नेतृत्व की एक विश्वसनीय इकाई बन कर उभरे है. इसमें संदेह नहीं.

पुष्पेन्द्र फाल्गुन-
हिन्दुस्तान एक ऐसा देश जिसे निरंतर किसी न किसी मसीहा की तलाश रहती है..., हर बात, हर काम के लिए मसीहा हैं हमारे पास, एक भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सलीके का मसीहा नहीं था, सो यह तलाश भी पूरी हुई अन्ना हजारे के रूप में..., तलाश पूरी, अपना काम ख़तम, अब भ्रष्टाचार के जिस भी मुद्दे को अपन लोग उठाएंगे, उम्मीद करेंगे कि अन्ना उस मुद्दे को अंजाम तक पहुंचाएं...







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