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शनिवार, 13 अगस्त 2011

'आरक्षण' फिल्म और खोखली दलित चिन्ताएं


       आरक्षण फिल्म रिलीज हो गयी। तीन राज्यों उत्तरप्रदेश,पंजाब और आंध्र ने इसके प्रदर्शन पर रोक लगायी हुई है। आंध्र में कांग्रेस ,यू.पी. में बहुजन समाज पार्टी और पंजाब में अकाली-भाजपा की राज्य सरकार है। यह संकेत है कला और राजनीति के अन्तर्विरोध का। सुप्रीम कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट में मामला विचाराधीन है।  इस फिल्म का सारा हंगामा इसके प्रोमो को देखकर आरंभ हुआ। उसके आधार पर शिकायतें की गयीं। बाद में फिल्म देखकर एससी-एसटी कमीशन ने आपत्तियां व्यक्त कीं। इससे यह तथ्य भी सामने आया कि हमारे राजनेता अभी कलाबोध से कोसों दूर हैं। राजनीतिज्ञों को कलाविद भी होना चाहिए। कलाविहीन राजनेता फासिस्ट होते हैं।

     फिल्म के संदर्भ में संवैधानिक संस्थाओं में किसकी मानें ? मसलन फिल्मों के मामले में सेंसरबोर्ड ,मुख्यमंत्री ,एससी-एसटी कमीशन,अदालत आदि में कौन है निर्धारण करने वाली संस्था ? बॉम्बे हाईकोर्ट ने सेंसरबोर्ड को ही अंतिम फैसला लेने वाली संस्था कहा है। यदि ऐसा है तो फिर आरक्षण पर तीन राज्यों ने रोक क्यों लगायी ? क्या यह अदालत और सेंसरबोर्ड का अपमान है ?
      भारत में फिल्म और राजनीति का अन्तर्विरोध पुराना है। राजनेता किसी भी माध्यम से उतना नहीं डरते जितना फिल्म से डरते हैं। यही वजह है कि वे आए दिन किसी न किसी फिल्म पर प्रतिवाद और हंगामा करते हैं। नीतिगत मामले में पश्चिम की नकल करने वाले राजनेता और राजनीतिकदल कम से कम पश्चिमी देशों से इस मामले में बहुत कुछ सीख सकते हैं। पश्चिम में नेतागण किसी फिल्म पर इस तरह गुलगपाड़ा नहीं मचाते। राजनेता और उनके छुटभैय्ये भूल जाते हैं कि फिल्म से वोट नहीं कटते और न वोटों में इजाफा होता है। फिल्म भी अन्य कलारूपों की तरह संचार का प्रभावशाली कलारूप है। 
हैडलाइन टुडे चैनल पर एससी-एसटी कमीशन के चेयरमैन से आरक्षण फिल्म के संदर्भ में फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप ने पूछा कि आपको किसने शिकायत की ? बिना फिल्म देखे उस व्यक्ति ने कैसे शिकायत की ?आपने उस व्यक्ति को यह क्यों नहीं कहा कि फिल्म जब रिलीज ही नहीं हुई है तो उसके बारे में आपत्तियां कैसी ? बिना फिल्म देखे आपने उसकी आपत्तियों को विचारयोग्य कैसे मान लिया ?  चेयरमैन साहब अंत तक जबाब नहीं दे पाए। कायदे से बिना देखे ,जाने और समझे कलाओं के बारे में सवाल नहीं उठाने चाहिए। यदि सवाल भी उठें तो वे प्रतिबंध की शर्त के साथ नहीं।   
       इन दिनों टीवी के साथ सांठगांठ करके छुटभैय्ये नेता किसी भी मसले पर बाइटस की बमबारी आरंभ कर देते हैं। टीवी चैनल बगैर किसी नीति के चल रहे हैं और हर विवाद पर बहस चला देते हैं और अंत में टीवी कार्यक्रमों को दबाब की राजनीति के अंग के रूप में प्रशासन पर प्रभाव पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आरक्षण फिल्म के बारे में यही हुआ है। बाइटस की बमबारी को हम आम जनता का प्रतिवाद समझने लगते हैं। इस चक्कर में टीवी वीले अपने को जनता के प्रतिबिम्ब के रूप में पेश करते हैं।यह टीवी वालों का विभ्रम है। टीवी बाइटस विभ्रम पैदा करती है। वह सत्य और तथ्य के बीच में मेनीपुलेशन है। उसे आम जनता की राय,तथ्यपूर्ण राय,सत्य आदि कहना सही नहीं है।
    सेंसरबोर्ड की चेयर पर्सन ने हैडलाइन टुडे से कहा यदि इस फिल्म का नाम आरक्षण न होता तो इतना हंगामा न होता। यह बात एक हद तक सच है।  फिल्ममेकर अनुराग कश्यप ने कहा आरक्षण फिल्म वस्तुतः आरक्षण का पक्ष लेती है। उन्होंने एससी-एसटी कमीशन के अध्यक्ष से सवाल किया फिल्म देखने के बाद क्या महसूस होता है ? क्या यह फिल्म आरक्षण विरोधी संदेश देती है ? इस सवाल का वे सीधे जबाब नहीं दे पाए।
    असल बात यह है फिल्म या कलाएं आनंद देती हैं, घृणा का प्रचार नहीं करतीं । सर्जकों के नजरिए की अभिव्यक्ति हैं। अनुराग कश्यप ने सुझाव दिया है राजनेताओं के लिए फिल्मों का एक फिल्म एप्रिशियेसन का कोर्स पढ़ाया जाना चाहिए । उनका दूसरा सुझाव है  फिल्मों के बहाने हो रही सुपरसेंसरशिप बंद होनी चाहिए और समूचे फिल्म जगत को इसका एकजुट होकर विरोध करना चाहिए। सेंसरबोर्ड ने एस-एसटी अध्यक्ष की आपत्तियों की कानूनी हैसियत जानने के लिए भारत सरकार के महाधिवक्ता की राय मांगी है।
मुश्किल यह है फिल्म कला है तो व्यापार भी है। व्यापार में व्यापारियों में एकजुटता का होना विरल घटना है। बॉम्बे फिल्म उद्योग में कलाकार हैं,कला उत्पादन होता है लेकिन कलाओं के संसार के मालिक पूंजीपति भी हैं जो बाजार की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में लगे हैं।
     फिल्मों को लेकर उठे विवाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार की स्वतंत्रता के विवाद हैं। इन मसलों पर प्रत्येक फिल्ममेकर को निजी जंग लड़नी होगी। सामूहिक जंग हो यह बेहतर स्थिति है, लेकिन व्यापार की प्रतिस्पर्धा कभी एकजुट नहीं रखती। वरना जावेद अख्तर को यह बयान देने की क्या जरूरत थी कि जब फना पर पाबंदी लगी तो लोग क्यों नहीं बोले ? जावेद साहब न बोलने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन उनका यह कहना कि फना पर या अन्य किसी फिल्म पर पाबंदी के समय फिल्मजगत क्यों नहीं बोला ? एक लेखक के मुँह से इस तरह के बयान शोभा नहीं देते। फना हो या आरक्षण हो ,कोई भी फिल्म हो ,फिल्ममेकर को सेंसरबोर्ड के अलावा किसी के दबाब में नहीं आना चाहिए। खासकर राजनेताओं के दबाब में आकर फिल्म में अंश निकालने का काम कभी नहीं करना चाहिए। हिन्दी सिनेमा का यह दुर्भाग्य है मणिरत्नम की फिल्म बॉम्बे से लेकर अमिताभ बच्चन की फिल्मों तक यह राजनीतिक दबाब में आकर कट करने का सिलसिला चला आ रहा है। फिल्मों के मालिक एकबार पैसा लगा देने के बाद येन-केन प्रकारेण पैसा निकलना चाहते हैं और कलाकारों पर दबाब पैदा करते है।
    फिल्मवालों को ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए कि कोई उपन्यासकार-कहानीकार किसी भी राजनीतिक दबाब के आगे झुककर अपनी कृति से विवादित अंश नहीं निकालता। इस तरह की दृढ़ता फिल्ममेकरों और फिल्म कलाकारों में क्यों नहीं है ? सलमान रूशदी ने सारी दुनिया में विवाद उठने कस बाबजूद सैटेनिक वर्शेज को वापस नहीं लिया,विवादित अंश नहीं निकाले और वे मजे में सारी धमकियों के बाबजूद जिंदा हैं। फिल्ममेकरों को अपनी कला से प्यार है तो फिल्मों की कटिंग या सुपरसेंसरशिप से बचना होगा। मकबूल फिदा हुसैन देश छोड़कर चले गए लेकिन अपनी कलाकृतियों को लेकर फंडामेंटलिस्टों के सामने घुटने नहीं टेके। जब तक यह दृढ़ता फिल्ममेकर में नहीं आती वह बार -बार मार खाएगा और कट करने के लिए बाध्य किया जाएगा।
आरक्षण फिल्म के खिलाफ समुदाय की राजनीति और कारपोरेट मीडिया फासिज्म वस एक-दूसरे के पूरक की भूमिका अदा की हैं।टीवी ने इसके पक्ष-विपक्ष में बहस आयोजित करके प्रेशर की फासिस्ट राजनीति को हवा दी है। कायदे से सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेकर सेंसरबोर्ड से पास फिल्मों के प्रदर्शन को सुनिश्चित बनाने के लिए राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार को आदेश देना चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस नहीं की जा सकती। जो लोग आरक्षण फिल्म पर बहस करा रहे हैं वे वस्तुतः फासिज्म की सेवा कर रहे हैं। आरक्षण फिल्म के प्रसारण का सवाल अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल है। यह फिल्म आरक्षण का सिद्धान्ततः विरोध नहीं है। इसके बावजूद हमारे देश में आरक्षण का विरोध करने की राजनीतिक स्वतंत्रता है। जो लोग यह सोच रहे हैं कि आरक्षण संवैधानिक है ,तो वे जानते हैं कि इस देश का एक बड़ा राजनीतिक समुदाय आरक्षण का विरोध करता रहा है। वे लोग संसद से लेकर सड़कों तक भाषण करते रहे हैं। कोई अधिकार संवैधानिक है तो उस पर बात नहीं की जा सकती,मतभिन्नता का प्रदर्शन नहीं किया जा सकता,यह मान्यता स्वयं में फासिस्ट मनोवृत्ति को व्यक्त करती है। दुर्भाग्य से हमारे कुछ अच्छे दलित नेताओं ने आरक्षण फिल्म को इसी नजरिए से देखा है ।
आरक्षण फिल्म के खिलाफ जिस तरह की 'समुदाय' की दबाब की राजनीति हो रही है यह भारत के भावी खतरनाक भविष्य का संकेत भी है।हम एक ऐसे युग में हैं जहां कलाविहीन लोग कलाओं पर फैसले सुना रहे हैं।यह वैसे ही है जैसे बीमार की चिकित्सा के लिए डाक्टर को बुलाने की बजाय झाड़-फूंकवाले ढ़ोंगी बाबा से इलाज कराया जाए।
     आरक्षण फिल्म को सेंसरबोर्ड की अनुमति मिल जाने के बाद उसे प्रदर्शन से रोकना अन्याय है। यू.पी.पंजाब , आंध्र आदि राज्य सरकारों ने कभी भी दलित और पिछड़वर्ग के लोगों के सामाजिक सवालों और दलित महापुरूषों पर कोई फिल्म नहीं बनायी। वे कभी कोशिश नहीं करते कि दलितों में अच्छे सिनेमा का प्रचार प्रसार हो,वे कभी दलितों के लिए फिल्म शो आयोजित नहीं करते। वे दलितों में राजनीतिक प्रचार करते हैं कलाओं का प्रचार नहीं करते। दलित विचारकों को यह सवाल दलितनेताओं से पूछना चाहिए कि दलितों में कलाओं के प्रचार-प्रसार के लिए राज्य सरकारों ने क्या किया ? कितने फिल्म क्लब या फिल्म सोसायटी बनायी गयीं? कितनी कला प्रदर्शनियां दलितों के इलाकों में आयोजित की गयीं ? कितने दलितलेखकों की रचनाओं को खरीदकर राज्य सरकारों ने दलितों को मुफ्त में मुहैय्या कराया ? मेरे कहने का आशय है कि राजनेताओं और उनके कलमघिस्सुओं का दलितप्रेम नकली और निहित स्वार्थी है,उसमें दलितों को कला सम्पन्न बनाने की न तो पीड़ा है और न पहलकदमी ही है।
    किसी फिल्ममेकर को घेरना आसान है लेकिन दलितों के लिए नियमित मुफ्त फिल्म प्रदर्शन आयोजित करना,साहित्य गोष्ठियां आयोजित करना,कला प्रदर्शनी आयोजित करना मुश्किल है। किसी टीवी चैनल में दलितों की हिमायत में बोलना जितना जरूरी है उतना ही दलितों के बीच में कलाओं और पापुलरकल्चर को संगठित ढ़ंग से ले जाना भी जरूरी है। यह सवाल भी उठा है कि दलितहितों की रक्षक सरकारों ने दलित महापुरूषों या सामान्य दलित जीवन के विभिन्न प्रसंगों पर केन्द्रित कितनी फिल्में और सीरियल बनाए हैं ? कितनी स्क्रिप्ट लिखीं हैं ? किसने रोका है दलितों को सिनेमा-फिल्मों में आगे आने से ? कम से कम फिल्म निर्माण में तो ये लोग अपना भाग्य आजमा सकते हैं।
   साहित्य में दलित लिख रहे हैं तो लोग उनका लोहा मान रहे हैं। यदि वे फिल्में भी बनाने लगेंगे तो हो सकता है वहां भी लोग लोहा मानने लगें। यह दुख की बात है कि दलितनेताओं को दलितों के कलात्मक उत्थान की कोई चिंता नहीं है। दलितों को कला,फिल्म,सीरियल आदि कौन देगा ? क्या दलित विचारक,एससी-एसटी कमीशन इस ओर कोई ठोस कदम उठाएंगे ? दलितों का मंदिर प्रवेश निषेध अपराध है लेकिन दलितों के बीच में कलाओं का न पहुँचना उससे भी भयानक अपराध है। दलितों को मंदिर तक पहुँचाने की चिंता करने वालों को उनके पास कलाओं को ले जाने का काम करना चाहिए। कलाओं से दलितों की दूरी खत्म की जानी चाहिए। दलितों को भगवान से ज्यादा कलाओं की जरूरत है।


बुधवार, 23 जून 2010

महाभारत ने रामायण को बाजार में पछाड़ा

( फिल्म रावण का दृश्य)
मुंबई सिनेमा में ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ के बीच प्रतिस्पर्धा जारी है। ‘महाभारत’ की तर्ज पर ‘राजनीति’ फिल्म आई है वहीं दूसरी ओर मणिरत्नम की रामायण का तर्ज पर ‘रावण’ फिल्म थियेटर में आयी है। व्यापार करने के मामले में महाभारत ने रामायण को पीछे छोड़ दिया है। ‘राजनीति’ ने 620 मिलियन रूपये यानी 13.4 मिलियन डॉलर का कारोबार किया है। सारी दुनिया में इसे 2200 सिनेमा हॉल में दिखाया गया। जबकि ‘रावण’ को हिन्दी,तमिल और तेलुगू भाषाओं में एक ही साथ सारी दुनिया में जारी किया गया और उसने 530 मिलियन रुपये यानी 11.5मिलियन डॉलर का कारोबार किया। यह भी उतने ही सिनेमा हॉल में दिखाई गयी जितने में ‘राजनीति’ दिखाई गयी थी।  

शुक्रवार, 18 जून 2010

मुंबई फिल्म उद्योग में ‘हिटलर’ पर बनने वाली फिल्म पर हंगामा

     मुंबई में इन दिनों हिटलर पर बबाल मचा हुआ है। मुंबई में रहने वाले यहूदियों ने हिटलर बनायी जा रही फिल्म पर जबर्दस्त प्रतिवाद किया है। इस प्रतिवाद के कारण हिटलर पर बनने वाली फिल्म से बड़े कलाकारों ने अपना नाम वापस लेना आरंभ कर दिया है। यह फिल्म हिटलर के आखिरी दिनों पर बन रही है और यह विषय अपने आप में मुंबई फिल्म उद्योग के लिए नया है।
    इस फिल्म में मुख्य भूमिका अनुपम खेर को निभानी थी लेकिन यहूदियों के प्रतिवाद  के चलते अनुपम खेर ने अपने को इस फिल्म से अलग कर लिया है। आज उन्होंने एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से कहा है कि इस प्रकल्प पर प्रशंसकों के हंगामे के कारण उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए मैं इस फिल्म से अपने को अलग कर रहा हूँ। फिल्म नाम है ‘डिअर फ्रेंड हिटलर’।
    इस फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे हिटलर महान बना,उसका जादू कैसे जनता के सिर पर चढ़कर बोलता था। उल्लेखनीय है भारत में पांच हजार के करीब यहूदी रहते हैं। इनके संगठन के अध्यक्ष जोनाथन सोलोमन ने ‘रायटर’ से कहा है कि "Whoever is making this film is doing so with ignorant, if not more sinister motives ... they are hurting the feelings of a community that has suffered a great deal."
    उल्लेखनीय है मुम्बई में 2006 में एक दुकानदार ने अपने रेस्टोरैंट का नाम ‘हिटलर क्रास’ रख लिया था उस पर भी बबाल मचा था और अंत में दुकानदार को बदलकर ‘क्रॉस कैफे’ नाम रखना पड़ा।  इसी तरह 2007 में एक फर्नीचर की दुकान वाले ने मुम्बई में ‘‘नाजी’’ नाम से बेडस्प्रेड बनाया था और स्वस्तिक को अपने प्रमोशनल ब्रोसर में इस्तेमाल किया था । उस समय भी यहूदियों ने प्रतिवाद किया था। हिटलर पर फिल्म बनाने वाले निर्देशक राकेश रंजन कुमार ने कहा है कि उनकी फिल्म में हिटलर का महिमामंडन नहीं किया गया है।  

सोमवार, 29 मार्च 2010

फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 4-

(हैदराबाद स्थित अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में दीप प्रज्वलित करते जगदीश्वर चतुर्वेदी)

हिन्दी सिनेमा में राजनीति आरंभ से ही रही है। हिन्दी सिनेमा की यह विशेषता है कि इसके जितने भी बड़े हीरो हैं वे किसी न किसी न किसी रुप में भारत की राजनीति के प्रधान नेता के भावों और विचारों को व्यक्त करते रहे हैं। फिल्मों में ग्राम्य जीवन,कृषिदासता,भूमि विवाद, जाति संघर्ष, भारत-चीन युद्ध,भारत-पाक विवाद, मुसलमानों का स्टीरियोटाईप, औद्योगिक संस्कृति,राजनीतिक संवृत्तियां,राजनीतिक विमर्श की चालू भाषा आदि चीजें हैं जो बार बार आती रही हैं।
    ग्लोबलाइजेशन में कलाओं के सामने क्या चुनौती है और फैशन उद्योग में क्या चलेगा,इसका फैसला फिल्मों में होता है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं है बल्कि आधुनिककाल के उद्योग और राजनीतिक विमर्श के वातावरण निर्माण का उपकरण या माध्यम भी है।
     एक जमाना था सिनेमा में वाम की भाषा दिखती थी और आज वाम की प्रतिवादी भाषा नजर नहीं आती। अब सिनेमा की भाषा में दृश्यों के माध्यम से परवर्ती पूंजीवाद के दृश्यों का बाहुल्य नजर आता है। सिनेमा के दृशय ही हैं जो उसकी भाषा बनाते हैं। सिनेमा में राजनीति के आने के कारण फिल्मी कहानी का चरित्र भी बदला और नए किस्म की कहानी आई जिसके केन्द्र में नए किस्म का ढ्रामा भी आया। अब छोटी कहानी होती है लेकिन लोकेशन अर्थों से भरी होती है। जैसे नए भवन,सूचना की नई तकनीक, विशाल इमारतों और शानदार सड़कों का जाल। फिल्मी भाषा का नया संसार भूमंडलीकरण की ग्लोबल भाषा में आया है,इसे विज्ञापन से लेकर फिल्मों के दृश्यों में सहज देखा जा सकता है।     
   सिनेमा कैसे राजनीति करता है इसका आदर्श नमूना है फिल्मी कथानक,नायक-नायिका आदि में आया बदलाव। इस बदलाव का सुंदर नमूना है हीरो की बदली हुई प्रकृति। नायक संस्कृति दो नमूने हैं अमिताभ बच्चन (पूर्व शाहरुख) और शाहरुख खान। शाहरुख खान नव्य-उदारवाद का नायक है, इसका समूचा तानाबाना भूमंडलीकरण और आप्रवासी भारतीय और जाति अस्मिता से जुड़ा है। यह ऐसा नायक है जिसकी अतीत की स्मृतियां फिल्म कहानी से गायब हैं। पुराने फिल्मी हीरो के पास अतीत था,बचपन था। उसकी मनुष्य या व्यक्ति की पहचान थी। पुराने हीरो की जाति,क्षेत्रीय या धर्म की पहचान नहीं होती थी, (एकाध अपवाद छोड़कर)। इसके विपरीत नए हीरो के पास जाति-क्षेत्रीय पहचान है। मसलन् नया हीरो शाहरुख पंजाबी,समृद्ध और उच्चजाति का है। ये चीजें पुराने हीरो में गायब हैं। पुराने हीरो ने नाम देखें, ‘मि.अमर’, ‘ मि.आनंद’, ‘मि.राज’, ‘विजय’, ‘ जय’ ‘वीरु’ आदि। कुछ फिल्मों में मुस्लिम नाम आए ,जैसे ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘कुली’, ईसाइ रुप में ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘नसीब’ ,हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई के रुप में ‘जान जानी जनार्दन’ आयी,किंतु पुरानी फिल्मों में जाति पहचान नहीं थी।
    आर्थिक उदारीकरण आने के बाद फिल्मों में ‘राहुल’ और ‘प्रेम’ जैसे नायकों का चरित्र जाति और क्षेत्रीय पहचान को लेकर आता है,टिपिकल मल्होत्रा और खन्ना सामने आते हैं,समृद्ध पंजाबी के रुप में क्षेत्रीय पहचान सामने आती है। नायिका के रुप में ‘सिमरन’, ‘अंजलि’ सामने आती हैं और उनके साथ ओबेराय और ग्रेवाल जाति पहचान भी सामने आती है।
 पुराने हीरो के पास अतीत की स्मृतियां थीं जिनकी उसे जब याद आती थी तो वह प्रतिवाद करता था,बदला लेता था,हिंसा करता था,इसी तरह नायक-नायिका में अमीर-गरीब का बायनरी अपोजीशन भी था। सजनी अमीर साजन गरीब का फार्मूला खूब चला। गरीब हीरो में संपदा के प्रति घृणा का भाव था। हीरो यदि अमीर होता था तो उसकी सहानुभूति गरीबों के प्रति हुआ करती थी। कहने का तात्पर्य यह है कि गरीब और गरीबी का संदर्भ फिल्मी कथानक का अनिवार्य हिस्सा था। लेकिन अब ऐसा नहीं होता। 
    नव्य उदारीकरण के  नायकों के खान बंधुओं की त्रिमूर्ति ने (शाहरुख,आमिर, सलमान) ने नया आख्यान रचा है। इसमें गरीब,किसान,मजदूर और गरीबी गायब है। ये ऐसे नायक हैं जिनका कोई अतीत नहीं है। नया हीरो गुस्सा नहीं करता,पर्तिवाद नहीं करता। ‘राहुल’ और ‘प्रेम’ को कभी गुस्सा नहीं आता। बल्कि जिससे गुस्सा करना चाहिए उससे सामंजस्य बिठाने पर ज्यादा जोर है। इन्हें सामाजिक असमानता परेशान नहीं करती। नए नायक का कोई इतिहास नहीं है,बचपन नहीं है। पुरानी स्मृतियां नहीं हैं। उसकी वैभव और संपदा से भरी जिंदगी है। चूंकि नए हीरो के पास अतीत की स्मृतियां नहीं हैं अतः उसे गुस्सा भी नहीं आता। उसका कोई इतिहास नहीं है। फलतः इतिहास के प्रति इसके अंदर केयरिंग का भाव भी नहीं है।
   ‘लगान’ फिल्म अपवाद है और उसमें भी ‘क्रिकेट राष्ट्रवाद’ को भुनाना प्रधान लक्ष्य है। इस फिल्म की जनप्रियता का दूसरा बड़ा कारण है संगीत। सामयिक सिनेमा में गोविन्दा अकेला नायक है जो लुंपन सर्वहारा का रुपायन करता नजर आता है।
     नई फिल्मों में आप्रवासी सभ्य ,सुसंस्कृत और संस्कारी है। गॉव के लोग बर्बर, असभ्य और खून के प्यासे चित्रित किए जा रहे हैं। इसे ‘शक्ति’ फिल्म में देख सकते हैं।
 (हैदराबाद स्थित अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के हिन्दी और भारतीय अध्ययन विभाग के द्वारा आयोजित सेमीनार सिनेमा और संस्कृति विषय पर जगदीश्वर चतुर्वेदी के भाषण पर आधारित) 







रविवार, 28 मार्च 2010

फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 3-

     मासकल्चर के उत्पादन का सबसे बड़ा कारखाना है सिनेमा। सिनेमा का संस्कृति के उत्पादन से कम और मासकल्चर के उत्पादन से ज्यादा संबंध है। भारत में सिनेमा निर्माण के 5 केन्द्र है,ये हैं-मुम्बई,मद्रास,हैदराबाद,कोलकाता और बैंगलौर। ये पांचों केन्द्र धीरे-धीरे माध्यम साम्राज्यवाद के दायरे में कैद होते चले जा रहे हैं। हाल ही में जारी ‘माई नेम इज खान’फिल्म की सफलता और इसके पहले की सफल फिल्मों और फिल्म उद्योग में देशी-विदेशी इजारेदार और बहुराष्ट्रीय पूंजी के निवेश और निरंतर फैलते साम्राज्य को ध्यान से देखें तो हमें फिल्म उद्योग में आ रहे परिवर्तनों और संकट का सही ढ़ंग से आभास मिल सकता है।
    एक जमाना था हिन्दी सिनेमा में पूंजी निवेश देशी था,इसमें वैध-अवैध दोनों ही किस्म का पैसा लगा था। यह सारा पैसा गैरइजारेदार घरानों का था। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे लुंपन पूंजीपति या समानान्तर अर्थव्यवस्था कहते हैं या ब्लैकमनी भी कहते हैं। आज यह स्थिति नहीं है। आज सिनेमा उद्योग में अनिल अम्बानी से लेकर रुपक मडरॉक का पैसा लगा है। यह मूलत:ग्लोबलाइजेशन की विश्वव्यापी प्रक्रिया का हिस्सा है। देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों का फिल्म उद्योग में पूंजी निवेश भारतीय सिनेमा उद्योग की प्रकृति में आ रहे मूलगामी परिवर्तनों का द्योतक है।
        कारपोरेट घराने फिल्म निर्माण के साथ सिनेमाघरों की खरीद पर भी जोर दे रहे हैं। इस ग्रुप ने विदेशों में भी सिनेमाघर खरीदने पर जोर दिया है।अमेरिका,ब्रिटेन आदि देशों में इस ग्रुप ने कई सिनेमाघर खरीदे हैं। इसके अलावा स्पिलवर्ग की कंपनी ‘ड़्रीमवर्क’ के साथ समझौता किया है जिसके अनुसार अंबानी ग्रुप 825 मिलियन डॉलर निवेश करेगा। इससे स्पिलवर्ग 6 फिल्में बनाएंगे। अनिल अंबानी की कंपनी ने 2009-10 में 350 करोड़ रुपये फिल्म निर्माण पर खर्च करने का फैसला किया था। इसके तहत 15 फिल्में बननी थीं, जिनमें 8 हिंदी और बाकी क्षेत्रीय भाषाओं  -जैसे तमिल, भोजपुरी, बांग्ला,मलयालम,पंजाबी - की फिल्में बननी थी।
         विश्व विख्यात अमेरिकी वित्तीय संस्था जेपी मॉर्गन ने पीवीआर पिक्चर में 60 करोड़ रुपये निवेश करने का फैसला लिया है। भारत सरकार ने 250 करोड़ रुपये निवेश करने का फैसला लिया है। यह पैसा मूलतः एनीमेशन फिल्मों के निर्माण,गेमिंग और विजुअल प्रभाव के म्यूजियम के निर्माण पर खर्च किया जाएगा।   
     भारतीय रिजर्ब बैंक ने भी बैंकों से फिल्म निर्माण के लिए कर्ज मुहैय्या कराने का प्रावधान किया है,मजेदार बात यह है कि रिजर्ब बैंक ने कर्ज के नियम कारपोरेट घरानों के फिल्म उद्योग में आने के पहले नहीं बनाए। बैंकों में एक्सिम बैंक सबसे ज्यादा कर्जा दे रही है। इसके अलावा बीमा कंपनियां भी फिल्मों का बीमा कर रही हैं। इससे फिल्मों का सही समय पर निर्माण करने में मदद मिल रही है। साथ शेयर और बॉण्ड के जरिए भी फिल्म निर्माण के लिए बाजार से पैसा उठाया जा रहा है। इस तरह से पैसा जुगाड़ करने वाली कई वित्तीय संस्थाएं सामने आ गयी हैं। कहने का मतलब यह है कि हिन्दी सिनेमा का अर्थशास्त्र बुनियादी तौर पर बदल गया है। यह लुंपन अर्थशास्त्र से कारपोरेट पूंजी के राजनीतिक अर्थशास्त्र में रुपान्तरण की बेला है। इसका फिल्म के दर्शक,कहानी, नायक- नायिका और समाज के प्रति बदले नए नव्य-उदारतावादी ग्लोबल सरोकारों के साथ गहरा संबंध है।    
    भारत का फिल्म उद्योग बहुभाषी है। भारत की 20 भाषाओं में प्रतिवर्ष 1000 से ज्यादा फिल्में रिलीज होती हैं, सालाना इससे ज्यादा फिल्में तैयार होती हैं। भाषायी फिल्में अपने ही राज्यों में सीमित प्रचार-प्रसार पाती हैं, एकमात्र हिन्दी सिनेमा है जो गैर हिन्दी राज्यों और विदेशों में भी अपना प्रसार करने में सफल रहा है। इसके अलावा हॉलीवुड की फिल्मों का नव्य-उदारीकरण के दौर में व्यापक बाजार टेलीविजन से लेकर सिनेमा हॉल तक तैयार हुआ है।
     सारी दुनिया में 10 करोड़ लोग प्रति सप्ताह 13,000 सिनेमाघरों में मुम्बई सिनेमा देखते हैं।उल्लेखनीय है बॉम्बे को मुंबई नाम 1995 में दिया गया। फिक्की और केपीएमजी के द्वारा तैयार रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि बॉक्स ऑफिस और सिनेमा से होने वाली अन्य किस्म की आमदनी में बहुत ज्यादा उछाल आने की संभावना नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार सन् 2009 में फिल्म उद्योग 2.2 बिलियन डॉलर (109.2 करोड़ रुपये) का कारोबार करेगा। केबल और सैटेलाइट पर फिल्मों की बिक्री में भी गिरावट आएगी। इसके बावजूद फिल्म उद्योग की सालाना विकासदर सन् 2013 तक 9.1प्रतिशत रहने की संभावना है। इसका अधिकतम व्यापार 3.4 बिलियन डॉलर (168-6बिलियन रुपये) तक जाने की संभावना है। भारत में इस समय 50 से बड़ी फिल्म निर्माता कंपनियां हैं।
    फिल्म निर्माण के बारे में यह मिथ है कि बड़े बजट की फिल्म ज्यादा कारोबार करती है, यह सच नहीं है, बड़े बजट और बड़े स्टार की फिल्मों की फ्लॉप दर ड्यादा है। कम बजट और बड़े स्टार के बिना बनने वाली फिल्मों का सफलता दर बेहतर रही है।
    फिल्म उद्योंग में देशी-विदेशी इजारेदार घरानों के पूंजी निवेश के बाद भारतीय सिनेमा का चरित्र पूरी तरह बदल गया है। इसी तरह आइनॉक्स वगैरह में तैयार हुए नए टाइप के सिनेमाघरों में बड़ी पूंजी का निवेश हुआ है। पहलीबार फिल्म उद्योग का समग्रता में बड़ी पूंजी के पैराडाइम में रुपान्तरण हुआ है। नव्य-उदारीकरण के पहले तक भारतीय सिनेमा गैर कारपोरेट-लंपट पूंजी के खेल में फंसा हुआ था, फलत: सिनेमा तकनीक का विकास नहीं हो पाया, कारपोरेट पूंजी के पैराडाइम में जाने के कारण फिल्म निर्माण की उच्च तकनीक और हॉलीवुड के हुनरमंद निर्देशकों का भी उसे तजुर्बा हासिल होता। विचारणीय सवाल यह है कि भारतीय बैंकों ने फिल्म उद्योग की तरफ नव्य-उदारतावाद के पहले रुख क्यों नहीं किया ?
   एक अन्य फिनोमिना यह भी है कि हॉलीवुड में पूंजी का अभाव है, इसके कारण भी हॉलीवुड के निर्माता भारतीय पूंजी और मध्य-पूर्व के तेल उत्पादक देशों की ओर भाग रहे हैं। मध्य-पूर्व और भारत के बड़ी पूंजी के खिलाड़ी जिस गति से मीडिया उद्योग में पूंजी निवेश कर रहे हैं उससे माध्यमों की दुनिया में तीसरी दुनिया का वर्चस्व बढ़ेगा। हॉलीबुड कमजोर होगा और मीडिया मुगलों के कारोबार पर भी असर होगा, यह असर विश्वव्यापी होगा। बुनियादी तौर पर इससे माध्यम साम्राज्यवाद से तीसरी दुनिया के मीडिया अन्तर्विरोध तेज होंगे।          
      फिल्म उद्योग अब इजारेदार पूंजी के पैराडाइम में दाखिल हो चुका है। खासकर 1995-96 के बाद से इस दिशा में प्रयास तेज हुए हैं। अब तक का फिल्म उद्योग का सारा विमर्श ‘लुंपन पूंजी’ पर चल रहा था,भूमंडलीकरण के बाद देशी-विदेशी इजारेदार पूंजी का प्रवेश हुआ है। इस प्रक्रिया का आरंभ नरसिंहाराव के शासनकाल में हुआ था। उस समय हॉलीवुड की फिल्मों के अबाध प्रवेश की अनुमति दी गयी,बाद में प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति दी गयी।
    आमतौर पर पहले फिल्म उद्योग में भारत के पूंजीपतिवर्ग की कोई दिलचस्पी नहीं थी, किंतु दूरसंचार और इलैक्ट्रोनिक मीडिया को निजी क्षेत्र के लिए खोल देने के कारण इजारेदार पूंजी का मीडिया और दूरसंचार के क्षेत्र में जबर्दस्त निवेश हुआ है। इससे भारत का कई स्तरों पर सांस्कृतिक- राजनीतिक नुकसान हुआ है। मीडिया में इजारेदाराना केन्द्रीयकरण बढ़ा है। यह सारा खेल ज्यादा चैनल,ज्यादा खबरें,ज्यादा अभिव्यक्ति की आजादी, ज्यादा मनोरंजन के नाम पर हुआ है। हमें ठंड़े दिमाग से सोचना चाहिए कि क्या हमें इनमें से कोई भी चीज ज्यादा मिली है ? ज्यादा पाने के चक्कर में हम मीडिया के बुनियादी सवालों से कोसों दूर चले गए हैं। हमने अपनी सांस्कृतिक संप्रभुता को दांव पर लगा दिया है।
    आज हम खुश हैं कि ‘माई नेम इज खान’ ने बड़ा कारोबार किया, लेकिन हम भूल गए कि मुंबईया सिनेमा को इस प्रक्रिया में हमने हॉलीवुड के हवाले कर दिया है। आज हम मुंबईया सिनेमा की स्वायत्तता पर खतरे के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं। भारत की फिल्में फ्लॉप हो रही हैं और हॉलीवुड की हिन्दी फिल्में भारत और भारत के बाहर हिट हो रही हैं।जो बाजार कल तक भारतीय सिनेमा के पास था उसे हॉलीवुड उठाकर लिए जा रहा है। यह प्रक्रिया दो तरह से चल रही है,एक तरफ भारतीय पूंजीपति हॉलीवुड में पैसा लगा रहा है दूसरी ओर हॉलीवुड कंपनियां सिनेमा निर्माण के क्षेत्र में आ रही हैं, सिनेमा थियेटरों को खरीद रही हैं। इस पूरी प्रक्रिया के क्या परिणाम निकलेंगे और किस तरह के अन्तर्विरोध पैदा हो रहे हैं इस पर वाम और दक्षिण दोनों ही चुप्पी लगाए बैठे हैं। मुंबईया सिनेमा में हॉलीवुड का दखल  बढ़ना हमारे सिनेमा उद्योग के भविष्य पर सवालिया निशान लगाता है। यह मूलतः सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की दिशा में लंबी छलांग है।   
     






फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 2-

भारतीय सिनेमा में सांस्कृतिक संवाद का मूलाधार है आनंद। इसके तीन मुख्य तत्व हैं, ये हैं, भारतीय संस्कार, गाने और संगीत। ये तीनों ही तत्व मिश्रित संस्कृति का रसायन तैयार करते हैं। मिश्रित संस्कृति का संचार करने के कारण ही हिन्दी की फिल्में किसी भी विकसित और अविकसित पूंजीवादी मुल्क से लेकर समाजवादी सोवियत संघ तक में कई बार वर्ष की सर्वोच्च 10 या 20 फिल्मों में स्थान बनाती रही हैं। सांस्कृतिक बहुलतावाद की लोकतांत्रिक भावबोध के साथ जैसी सेवा हिन्दी सिनेमा ने की है वैसी सेवा हॉलीवुड भी नहीं कर पाया। यही वजह है कि बॉलीवुड का हिन्दी सिनेमा शीतयुद्ध के समय में हॉलीवुड के सामने चट्टान की तरह अड़ा रहा। पूरे शीतयुद्ध के दौरान हॉलीवुड सिनेमा ने दुनिया के अधिकांश देशों के सिनेमा उद्योग को बर्बाद कर दिया। किंतु भारत में उसे पैर जमाने में सफलता नहीं मिली।    
     द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर में भारत का एक बड़ा फिनोमिना है आप्रवासी भारतीय। इसमें विविध किस्म के भारतीय हैं और ये अमेरिका से दक्षिण अफ्रीका,मारीशस से कैरिबियन देशों ,मध्यपूर्व के देशों से लेकर समूचे यूरोप तक फैले हैं। इनमें भारत की जातीय-सांस्कृतिक विविधता साफ नजर आती है। हम यह भी कह सकते है कि भारतीय संस्कृति का इन लोगों के कारण विश्वव्यापी प्रसार हुआ है। यही वह बुनियादी कारक है जिसके कारण हिन्दी फिल्मों में आप्रवासी एशियाई संस्कृति की व्यापक अभिव्यक्ति होती रही है। आप्रवासियों का अपनी संस्कृति से प्रेम ही है जो ‘प्राचीन भारत’ से जोड़े रखता है। इस कार्य में भारत की फैंटेसी,संस्कार,यथार्थ,गाने आदि का व्यापक इस्तेमाल किया जाता है।
  उल्लेखनीय है आप्रवासी भारतीयों दोहरे दबाब में हैं,एक तरफ वे अपने काम की जगह पर आए दिन भेदभाव के शिकार होते रहते हैं और दूसरी ओर प्राचीन भारत की उम्मीदें उन्हें घेरे रहती हैं। यही वजह है कि आप्रवासी भारतीय भारत  में बनी फिल्में खूब देखते हैं, यह काम वे आजादी के पहले से कर रहे हैं। हाल के वर्षों में ग्लोबल भारतीय सिनेमा में वितरण, माइग्रेसन और स्थानीयतावाद का प्रवेश हुआ है।
    सिनेमा ने बड़े पैमाने पर साहित्य खासकर कथा साहित्य का उपयेग किया है। सिनेमा और उपन्यास के बीच किस तरह का आदान-प्रदान हो रहा है और हमें उसके कारण किस तरह के साहित्यिक परिवर्तनों को देखना पड़ा है यह चीज हमारी आलोचना की आंखों से ओझल रही है। हमारे आलोचकों ने सिनेमा के कथा साहित्य और सामान्यतः साहित्य पर पड़ने वाले प्रभाव की अनदेखी क्यों की यह तो वही जानें किंतु इस प्रसंग में कुछ बातों की ओर ध्यान खींचना चाहता हूँ।
     सिनेमा का सीधा प्रधान असर यह हुआ है कि कलाओं और साहित्य के प्रचलित वर्गीकरण गड़बड़ा गए हैं,अप्रासंगिक हो गए हैं। अब आधुनिकतावाद और आधुनिकता पर कोई भी बहस सिनेमा और इलैक्ट्रोनिक मीडिया के प्रभाव का अध्ययन किए बिना नहीं कर सकते। हिन्दी आलोचना में इस मसले पर जितनी भी बहस है वह सिर्फ साहित्य को केन्द्र में रखकर चली है,आधुनिकता के आख्यान के कारक तत्वों का एक बड़ा हिस्सा साहित्येतर संचार रुपों में विकसित होता रहा है। हम भूल ही गए कि सिनेमा ने आधुनिक संस्कार,आचार-व्यवहार और एटीट्यूट बनाने में केन्द्रीय माध्यम की भूमिका अदा की है।    
     




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