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शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

मुक्तांचल की जंग है माओवाद

    अंग्रेजीमार्का बहुत सारे बुद्धिजीवी इन दिनों माओवाद पर फिदा हैं। वे बीच-बीच में आदिवासियों घूम आते हैं । प्रेस को फोटोसत्र के लिए बुला लेते हैं । चंद घंटों या चंद रोज की यात्रा के बाद बताते हैं कि माओवादी न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। इन अंग्रेजीदा बुद्धिजीवियों की बांकी अदाओं पर बलिहारी मध्यवर्ग के युवाओं की बड़ी तादाद है।      
     मीडिया में वे कह रहे हैं माओवादी न्याय के लिए लड़ रहे हैं। हम कहना चाहते हैं न्याय के लिए वहां जंग होती है जहां अन्याय हो रहा हो। अन्याय वहां होता है जब  सरकार ने किसानों की जबर्दस्ती जमीन ली हो, उन्हें बेदखल किया हो। लेकिन जहां न किसी की जमीन ली गयी है और न किसी को बेदखल किया है, न किसी को मारा है न पीटा है,वहां पर न्याय की जंग के नाम पर खूनी खेल क्यों चल रहा है ? लालगढ़ ऐसा ही एक इलाका है।
    लालगढ़ में माओवादी किसके लिए लड़ रहे हैं और क्या वे सचमुच में आंदोलन कर रहे हैं ? लालगढ़ में माओवादी कोई आंदोलन नहीं चला रहे। वहां पर उनकी कोई मांगें नहीं हैं। इसके बावजूद यदि कोई यह कहे कि माओवादी न्याय के लिए लड़ रहे हैं तो सफेद झूठ बोलता है। माओवाद के नाम पर वे सिर्फ कत्ल कर रहे हैं,निर्दोष लोगों की हत्याएं कर रहे हैं।
    हत्या करना न्याय नहीं है। बल्कि अपराध है। हमें न्याय और अपराध में अंतर करना चाहिए। जहां वे लोकतांत्रिक ढ़ंग से संघर्ष कर रहे हैं वहां पर उनकी न्याय की जंग हो सकती है। लेकिन जहां पर वे अकारण हत्याएं कर रहे हैं वहां पर उनका खाता हत्या के अपराधियों के नाम से ही तैयार होगा।
      माओवादी हत्याएं करते हुए तर्क दे रहे हैं कि वे हत्या नहीं कर रहे बल्कि वर्ग उन्मूलन कर रहे हैं। शोषकवर्ग और उसके समर्थकों का सफाया कर रहे हैं। शारीरिक तौर पर मौत के घाट उतारने को वर्ग उन्मूलन नहीं कहते यह तो जनसंहार है जिसे किश्तों में संपन्न किया जा रहा है।
     माओवादी अच्छी तरह जानते हैं  उनके हिंसाचार से आदिवासियों और किसानों की जिन्दगी में खुशहाली आने वाली नहीं है। माओवादी जानते हैं बंदूक और बमों से क्रांतिकारी चेतना का निर्माण नहीं होता।
   बम और बंदूक से यदि क्रांति निकलती तो माफिया गिरोह आसानी से क्रांतिकारी  बन जाते । हत्याओं से सामाजिक वर्गों का उन्मूलन नहीं होता। जो लोग हिंसा और घृणा को प्रत्येक समस्या की रामबाण दवा मानते हैं उन्हें सोचना चाहिए कि क्या इससे उन्हें अपना अभीप्सित लक्ष्य प्राप्त करने में सफलता मिल सकती है ?
    माओवादी बताएं कि उनके हथियारबंद गिरोहों के लिए हथियार ,गोली-बारूद, बम, लैंडमाइन आदि के लिए पैसा कहां से आता है ? क्या हम मान लें कि उनके लिए गांव के गरीब किसान और आदिवासी पैसा देते हैं ? क्या यह संभव है जिन आदिवासियों-किसानों के पास स्वयं खाने को एक फूटी कौड़ी न हो वे माओवादियों को चंदे में मोटी रकम देते होंगे ? शहरों में माओवादी कहीं पर भी चंदा इकट्ठा करते नजर नहीं आते, तथाकथित बौद्धिकों की सभाओं में उन्हें कभी-कभार चंदा जरूर मिलता है । लेकिन उससे माओवादियों का विशाल नेटवर्क नहीं चल सकता।
    माओवादियों का मानना है वे जबरिया धन वसूलते नहीं हैं,किसी से फिरौती नहीं लेते। डाकेजनी नहीं करते। चौथ नहीं वसूलते। ऐसी स्थिति में तो यह सवाल और भी प्रासंगिक है कि उन्हें पैसा कहां से मिलता है ?
   माओवादियों के पास कई हजार हथियारबंद कैडर हैं जिन्हें मासिक भत्ता मिलता है, इसके अलावा उनके सैंकड़ों पूरावक्ती कार्यकर्त्ता हैं जो मासिक वेतन पर उनके लिए काम करते हैं। आखिर इस विशाल कैडर और गुरिल्लावाहिनी के लिए पैसा कहां से आता है ? क्या माओवादियों को विदेशों से पैसा आता है ? क्या भारत के कारपोरेट घराने उन्हें पैसा देते हैं ? क्या वे तस्करों के नेटवर्क की मदद से पैसा पाते हैं ? या फिर उन्हें भगवान पैसे देता है ?
     माओवादियों का संगठन शुद्ध विचारधारा के आधार पर नहीं चल रहा है। उसकी दौलत की गंगोत्री कहां है ? इसके बारे में गंभीरता के साथ पता किया जाना चाहिए। विभिन्न राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह बताएं माओवादी कहां से रसद प्राप्त कर रहे हैं ? कम से कम इतना तय है  माओवादियों को धन किसी पवित्र स्रोत से नहीं मिल रहा है।
      जो लोग यह कहते हैं कि लालगढ़ का आंदोलन न्यायपूर्ण आंदोलन है उन्हें माओवादी नेता किशन जी का ‘फ्रंटलाइन’ को दिया साक्षात्कार पढ़ना चाहिए,इस साक्षात्कार में किशनजी ने कहा है कि उनके संगठन का प्रधान लक्ष्य है पश्चिम बंगाल में लिबरेटेड क्षेत्र बनाना। पत्रिका ने पूछा कि पश्चिम बंगाल को लेकर क्या योजना है, किशनजी ने कहा  ‘‘Very simply, to establish a liberated area. We decided in 2007 that this [the Jangalmahal] would be a guerilla area. Since then we have progressed a lot, we have already reached out to more than half the population of the region and made it politically aware. I can tell you only so much. Our politburo does not allow us to divulge the tactical aspects of our programmes.’’ (Volume 26 - Issue 22 :: Oct. 24-Nov. 06, 2009)
यानी माओवादी पश्चिम बंगाल में न्याययुद्ध नहीं लड़ रहे बल्कि मुक्त क्षेत्र या गुरिल्लाक्षेत्र बनाने की जंग लड़ रहे हैं और उन्हें ममता बनर्जी समर्थन कर रही है।
    विभिन्न राजनीतिक दलों,केन्द्र और राज्य सरकारों से सवाल पूछा जाना चाहिए कि वे मुक्तक्षेत्र की धारणा के बारे में क्या सोचते हैं ? ममता बनर्जी,कांग्रेस, भाजपा, माकपा,भाकपा आदि सभी दलों को अपना स्टैंड साफ करना चाहिए कि वे मुक्तक्षेत्र की धारणा के बारे में क्या सोच रहे हैं ?
    उन तमाम बुद्धिजीवियों से भी सवाल है कि क्या वे भारत के संविधान के तहत गांवों को चलाना चाहते हैं या मुक्तक्षेत्र के नाम पर माओवादी अदालतों और अपराधियों के झंड़े तले शासन चलाना चाहते हैं ? संविधान और कानून का शासन होना चाहिए या मुक्तांचल का शासन होना चाहिए ?
     इस सवाल का जबाब अरूंधती राय,मेधा पाटेकर,महाश्वेता देवी आदि को भी देना चाहिए कि वे संविधान के तहत शासन चलाना चाहते हैं या मुक्तांचल का स्वयंभू माओवादी शासन चाहते हैं? यदि मुक्तांचल जरूरी है तो पहले हमारे इन प्यारे बुद्धिजीवियों को अपने डेरे शहरों से माओवाद प्रभावित गांवों में जल्दी से स्थानान्तरित कर देने चाहिए। संविधान,लोकतंत्र, और पूंजीवादी सुविधाओं और वातावरण का परित्याग करके जंगलमहल में चले जाना चाहिए। वे शहरों में घरों में रहते हैं लालगढ़ में वे जंगलमहल में रहेंगे तो उससे अनेक लोगों को लाभ होगा। किसानों -आदिवासियों को भी सांस्कृतिक बनाने का अवसर मिलेगा। कम से कम पहले चरण में इन अभिजात्य बुद्घिजीवियों से गांव के गरीबों को बहुत कुछ देश-देशान्तर के बारे में सीखने को मिलेगा।      








रविवार, 19 सितंबर 2010

हरमदवाहिनी का मिथ और यथार्थ

    पश्चिम बंगाल में तमाम समाचार पत्रों में ‘हरमदवाहिनी’ के पदबंध का कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के खिलाफ दुष्प्रचार आम बात है। इस नाम से माओवादी-ममता और मीडिया के लोग माकपा को कलंकित करना चाहते हैं वे बार-बार मीडिया में यह प्रचार कर रहे हैं कि लालगढ़ इलाके में माकपा संचालित ‘हरमद वाहिनी’ के कैंप हैं। इनमें हथियारबंद गुण्डे रहते हैं जिनका काम है हत्या करना और ऐसे कैंपों की एक सूची माओवादियों के हमदर्दों द्वारा संचालित बेवसाइट ‘संहति’ पर उपलब्ध है। 
    इस सूची में 86 कैंप के नाम हैं और इनमें भी इनमें कितने लोग हैं उनकी संख्या भी बतायी गयी है। यह पूरी सूची http://sanhati.com/articles/2716/ पर देख सकते हैं। समस्या यह है कि इन कैंपों को किस रूप में व्याख्यायित करें। माओवादियों के लिए ये माकपा के गुण्डाशिविर हैं और माकपा के हिसाब से ये माओवादी हिंसाचार के कारण बेघर हुए शरणार्थियों के कैंप हैं। सच क्या है इसके बारे में सिर्फ  अनुमान ही लगा सकते हैं।
   सवाल उठता है किस कैंप में कितने गुण्डे हैं यह दावा माओवादी किस आधार पर कर रहे हैं ? क्योंकि इन इलाकों में मीडिया अनुपस्थित है।  माओवादी इस प्रसंग में किस तरह मिथ्या प्रचार कर रहे हैं उसकी बानगी देखें, ‘संहति’ बेवसाइट की रिपोर्ट में कहा गया है कि The armed CPI(M) cadres, called locally as harmads, have been raiding villages, burning and looting houses, killing people, raping women and working closely with the joint forces in tracking down and killing leaders of the PCAPA, all in the name of regaining lost territory in the Lalgarh area.
    सारे देश के अखबार और स्थानीय अखबार भरे पड़े हैं कि विगत एक साल में माओवादियों ने किस तरह लालगढ़ में आतंक की सृष्टि की है और माकपा के सदस्यों और हमदर्दों की हत्याएं की हैं और उन्हें बेदखल किया है। माकपा के ऊपर खासकर ‘हरमद वाहिनी’ के नाम से हमले,लूटपाट,हत्या,औरतों के साथ बलात्कार आदि के जितने भी आरोप लगाए गए हैं वे सब बेबुनियाद हैं। एक साल में एक भी घटना ऐसी नहीं घटी है जिसमें माकपा के लोगों ने किसी पर भी लालगढ़ में एक भी हमला किया हो इसके विपरीत माओवादी हिंसाचार ,हत्याकांड और स्त्री उत्पीडन की घटनाएं असंख्य मात्रा में घटी हैं ।
     कोई भी व्यक्ति जो बांग्ला या अंग्रेजी बेवसाइट पढ़ सकता हो तो उसे लालगढ़ में माओवादी हिंसाचार की असंख्य घटनाओं की खबरें मिलेंगी। विगत एक साल से स्थानीय खबरों में भी माकपा के सदस्यों द्वारा किसी भी किस्म की हिंसा किए जाने की खबर नहीं आयी है।
     सवाल यह है माओवादी इसके बाबजूद सफेद झूठ क्यों बोल रहे हैं ? माओवादियों और ममता बनर्जी के पास माकपा या अर्द्ध सैन्यबलों के लालगढ़ ऑपरेशन के दौरान किसी भी किस्म के अत्याचार,उत्पीड़न आदि की जानकारी हो तो उसे अखबारों को बताना चाहिए, टीवी पर बताना चाहिए,अपने केन्द्र सरकार में बैठे गृहमंत्री को बताना चाहिए। कांग्रेस के द्वारा बिठाए गए राज्यपाल को बताना चाहिए। इनमें से किसी को भी ठोस प्रमाण देकर बताने की बजाय ममता बनर्जी और माओवादी मिलकर मिथ्या प्रचार अभियान चलाए हुए हैं कि माकपा के लालगढ़ में हथियारबंद गुण्डाशिविर लगे हैं और उन्हें हटाया जाए। जब तक माओवादी और ममता बनर्जी लालगढ़ में गुण्डागर्दी और उत्पीड़न के ठोस प्रमाण नहीं देते तब तक उनके आरोप को मिथ्या प्रचार की कोटि में ही रखा जाना चाहिए।
   दूसरी ओर माकपा ने यह कभी नहीं कहा कि उनके लालगढ़ में शिविर नहीं हैं। वे कह रहे हैं कि उनके शिविर हैं और इनमें माओवादी हिंसा के कारण शरणार्थी बने ग्रामीण रह रहे हैं। ममता बनर्जी जिन्हें गुण्डाशिविर कह रही हैं वे असल में शरणार्थी शिविर हैं ।  
    दूसरी एकबात और वह यह कि लालगढ़ में माकपा को रहने का हक है या नहीं ? ममता और माओवादी चाहते हैं कि माकपा को लालगढ़ से बाहर किया जाए। इसके लिए जो भी करना हो वह किया जाए और इसी काम के लिए ममता बनर्जी ने माओवादी हिंसाचार और पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी के हिंसाचार का खुला समर्थन किया है। ममता का मानना है माकपा को लालगढ़ से बाहर करने के लिए जो भी कर सकते हो करो ममता तुम्हारे साथ है। इस आश्वासन के साथ माओवादी दनादन हत्याएं कर रहे हैं और इन हत्याओं के बदले में वे ममता बनर्जी से संभवतः धन भी वसूल रहे हैं।
     ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और माओवादी संगठन मिलकर लोकसभा चुनाव के बाद से एक भी माकपा हमले की घटना का जिक्र नहीं कर रहे। यहां तक कि बांग्ला का कारपोरेट मीडिया जो अहर्निश माकपा विरोधी प्रचार में लगा रहता है वह भी एक भी ऐसी घटना रिपोर्ट पेश नहीं कर पाया है जिसमें लालगढ़ में माकपा ने हमला किया हो। अभी कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी तीन दिन के पश्चिम बंगाल दौरे पर आए हुए थे वे भी लालगढ़ पर चुप थे वे इसके पहले भी आए थे उस समय भी लालगढ़ पर चुप थे।
      यदि माकपा के लोग लालगढ़ में हमले कर रहे होते,बलात्कार कर रहे होते.उत्पीड़न कर रहे होते तो कहीं से तो खबर बाहर आती। लालगढ़ से साधारण लोग बाहर के इलाकों की यात्रा कर रहे हैं और प्रतिदिन सैंकड़ों-हजारों लोग यातायात करते हैं इसके बाबजूद भी माकपा के द्वारा लालगढ़ में अत्याचार किए जाने की कोई खबर बाहर प्रकाशित नहीं हुई है।
     यह सच है कि मीडिया पर लालगढ़ जाने पर रोक है। लेकिन ममता बनर्जी की लालगढ़ रैली में तो लाखों लोग आए थे। माओवादी भी आए थे। ममता बनर्जी ने माकपा के द्वारा  लालगढ़ में सताए गए एक भी व्यक्ति को पेश नहीं किया। माओवादियों के दोस्त मेधा पाटकर और अग्निवेश भी मंच पर थे वे भी किसी उत्पीडित को पेश नहीं कर पाए। उन्हें वहां पर कोई रोकने वाला नहीं था। नंदीग्राम में जिस तरह तृणमूल कांग्रेस ने माकपा के अत्याचार के शिकार लोगों को मीडिया के सामने पेश किया था वैसा अभी तक लालगढ़ में वे नहीं कर पाए हैं। जब तक वे कोई ठोस प्रमाण नहीं देते तब तक लालगढ़ में ‘हरमद वाहिनी’ के नाम पर माकपा को बदनाम करने की कोशिश से कुछ भी हाथ लगने वाला नहीं है।
    अंत में , मेरी उपरोक्त बात रखने का यह अर्थ नहीं है माकपा संतों का दल है। जी नहीं माकपा एक संगठित कम्युनिस्ट पार्टी है। उसके पास एक विचाराधारा से लैस कैडरतंत्र है जो इस विचारधारा की रक्षा के लिए जान निछाबर कर सकता है। विचारधारा से लैस कैडर को पछाड़ना बेहद मुश्किल काम है। माकपा के पास गुण्डावाहिनी नहीं है लेकिन विचारधारा के हथियारों से लैस कॉमरेड हैं। विचारों के हथियार सचमुच के हथियारों से ज्यादा पैने-धारदार और आत्मरक्षा में मदद करने वाले होते है।
     दूसरी बात यह है कि माकपा के पास लंबे समय से पश्चिम बंगाल में हथियारबंद गिरोहों से आत्मरक्षा करने और लड़ने का गाढ़ा अनुभव है। यह अनुभव माकपा ने लोकतंत्र पर कांग्रेसियों और नक्सलों के हमलों से जूझते हुए हासिल किया है। माकपा भारत का एकमात्र राजनीतिक दल है जिसने लोकतंत्र की रक्षा के लिए हथियारों के हमले झेले हैं और जरूरी होने पर हथियारों से हमले किए हैं। लेकिन लोकतंत्र को बचाया है। 1972-77 का खूनी अनुभव और 1977 के बाद पश्चिम बंगाल में हिंसक हमलों में काम करते हुए लोकतंत्र का 35 सालों से सफल प्रयोग करने में माकपा को सफलता मिली है। लोकतंत्र और राजनीतिक दल के रूप में कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने आत्मरक्षा की जो मिसाल कायम की है वह बेजोड़ है।
   जिसे ‘हरमद वाहिनी ’ कहा जा रहा है वैसा संगठन कहीं पर भी अस्तित्व में नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि माकपा के साथ गुण्डे नहीं हैं,जी नहीं, अपराधियों का एकवर्ग माकपा के साथ भी है उनका माकपा के लोग सहयोग भी करते हैं। लेकिन लालगढ़ जैसे राजनीतिक ऑपरेशन को सफल बनाने में गुण्डे मदद नहीं कर रहे बल्कि कैडर काम कर रहे हैं और लोकतंत्र में माकपा को अपनी राजनीतिक जमीन बचाने और उसका विस्तार करने का पूरा हक है।
     लोकतंत्र कमजोरों का तंत्र नहीं है। ताकत का तंत्र है। वर्चस्व का तंत्र है। इस तंत्र पर वही सवारी कर सकता है जिसमें ताकत हो और वर्चस्व स्थापित करने की क्षमता हो। लालगढ़ में वर्चस्व की जंग चल रही है। इस जंग में लोकतंत्र के संरक्षक के रूप में माकपा अग्रणी कतारों में है इसलिए उस पर ही हमले सबसे ज्यादा हो रहे हैं।
          केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के द्वारा माओवाद के खिलाफ अभियान में माकपा ने लालगढ़ में जनता और पुलिसबलों के बीच में सेतु का काम किया है। कायदे से ममता बनर्जी के दल को यह काम करना चाहिए था,लेकिन वह जनता और पुलिसबलों के बीच में विरोधी की भूमिका अदा कर रही हैं। माओवाद या उग्रवादियों या आतंकवादियों या पृथकतावादियों के खिलाफ राज्य के अभियान में पुलिस या सेना को स्थानीय जनता की मदद स्थानीय राजनीतिक दलों के सहयोग से ही मिलती है और यदि कोई राजनीतिक दल लोकतंत्र की रक्षा में अपनी इस भूमिका को नहीं समझता तो वह राष्ट्र विरोधी की कतारों में रखा जाना चाहिए। हम उत्तर-पूर्व से लेकर कश्मीर तक राजनतिक दलों की भूमिका पर जरा एक नजर डालें तो सारी स्थिति तत्काल समझ में आ जाएगी।
     लालगढ़ में माकपा के लोग इसलिए नहीं मारे ता रहे कि वे माकपा के सदस्य हैं, इसलिए भी नहीं मारे जा रहे कि उनका माओवादियों या पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी के लोगों से व्यक्तिगत पंगा है, यह इलाका दखल की लड़ाई भी नहीं है। यहां किसी किसान की जमीन का भी राज्य सरकार ने अधिग्रहण नहीं किया है। माकपा के कार्यकर्त्ता इसलिए मारे जा रहे हैं क्योंकि वे लालगढ़ के गांवों में लोकतंत्र को बचाने की कोशिश कर रहे हैं और लोकतंत्र की खातिर मारे जा रहे हैं। वे न तो गुण्डे हैं और न महज पार्टी मेम्बर हैं। वे लोकतंत्र के रक्षक हैं ।
    लोकतांत्रिक संरचनाओं और लोकतांत्रिक वातावरण पर लालगढ़ में जो हमला माओवादी कर रहे हैं उसका वे प्रतिवाद कर रहे हैं और लोकतंत्र को बचाना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है दुर्भाग्य की बात यह है कि ममता बनर्जी ने अपनी सारी शक्ति अंध कम्युनिस्ट विरोध में लगा दी है और इसके कारण वह माकपा की लोकतांत्रिक शक्ति को देख ही नहीं पा रही हैं।       










रविवार, 25 अक्टूबर 2009

माओवादि‍यों से बि‍ना शर्त बात करो



        माओवादियों ने पहलीबार कि‍सी गि‍रफतार थानेदार को जिंदा छोड़ा है। संक्राली पुलि‍स थाने के प्रभारी अतीन्‍द्रनाथ दत्‍ता सुरक्षि‍त अपने घर पहुँच गए हैं। इस थानेदार को माओवादि‍यों ने क्‍यों छोड़ दि‍या ? अन्‍य दो अन्‍य बंदी पुलि‍सवालों को अभी तक क्‍यों नहीं छोड़ा ? इस रि‍हाई के बदले राज्‍यसरकार ने क्‍या सौदा कि‍या ? कि‍सके जरि‍ए सौदा कि‍या ? इन सब सवालों पर अनेक दृष्‍टि‍यों से लि‍खा जा सकता है। अधि‍कांश टीवी चैनलों से लेकर दैनि‍क अखबारों तक पश्‍चि‍म बंगाल के मुख्‍यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की आलोचना हो रही है। कुछ लोग तर्क दे रहे हैं राज्‍य सरकार माओवादि‍यों के सामने झुक गयी,कुछ कह रहे हैं,इससे पुलि‍सबल और माकपा के कैडरों का मनोबल टूटेगा। कुछ लोग तर्क दे रहे हैं  यह सीधे केन्‍द्र सरकार की हि‍दायत का उल्‍लंघन है। केन्‍द्र सरकार का मानना है माओवादि‍यों के साथ तब तक कोई बातचीत नहीं होगी जब तक वे हिंसा का रास्‍ता नहीं त्‍यागते। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि‍ आखि‍रकार माओवादि‍यों से राष्‍ट्र को सख्‍ती से ही नि‍बटना होगा। इस प्रसंग को कुछ देर के लि‍ए मीडि‍या उत्‍तेजना के दायरे के बाहर जाकर देखें तो चीजें साफ नजर आएंगी।
     माओवादी संगठनों के प्रति‍ माकपा ,पश्‍चि‍म बंगाल सरकार का जो रूख है वही रूख कांग्रेस का नहीं है। इन दोनों दलों के माओवादि‍यों के प्रति‍ राजनीति‍क व्‍यवहार में भी अंतर है। माओवादि‍यों के चंगुल से एक थानेदार का छूटकर आना राज्‍य प्रशासन के राजनीति‍क कौशल की जीत है। यह काम न तो रमनसिंह कर पाए और राजशेखर रेड्डी ही कर पाए थे।
      एक व्‍यक्‍ति‍ को मौत के मुँह बचाकर लाना नि‍स्‍संदेह खुशी की बात है। हाल ही में ऐसी कोई मि‍साल याद नहीं पड़ती कि‍ माओवादि‍यों ने कभी कि‍सी पुलि‍स अफसर को बंदी बनाने के बाद जिंदा छोड़ा हो। दूसरी बात यह है कि‍ माओवादी इसी देश की राजनीति‍क मि‍ट्टी का हि‍स्‍सा हैं। उनका हिंसाचार निंदनीय है लेकि‍न जो मसला वे उठा रहे हैं उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। माओवादी जि‍स तरह से आदि‍वासि‍यों की समस्‍या हल करना चाहते हैं,वह रास्‍ता भी सही नहीं हो सकता, लेकि‍न जि‍स समस्‍या पर वे ध्‍यान खींच रहे हैं। वह वास्‍तव समस्‍या है। उसे सभी दल मानते हैं।
     पश्‍चि‍म बंगाल सरकार ने देर से ही सही,राजनीति‍क सौदेबाजी के तहत ही सही, यह बात स्‍वीकार की है कि‍ जि‍न लोगों की अदालत में जमानत का सौदेबाजी के तहत वि‍रोध नहीं कि‍या गया वे माओवादी नहीं थे बल्‍कि‍ उन्‍होंने माओवादि‍यों के आंदोलन में हि‍स्‍सा लि‍या था। उल्‍लेखनीय है कि‍ माओवादि‍यों ने यह मांग रखी थी कि‍ उनके जेल में बंद 28 लोगों की जमानत की अर्जी का राज्‍य सरकार वि‍रोध न करे। राज्‍य सरकार ने उन लोगों की जमानत का वि‍रोध नहीं कि‍या। फलत: उन लोगों को जमानत मि‍ल गयी। उन लोगों के खि‍लाफ सामान्‍य राजनीति‍क आरोप थे,जैसे इलाके में सड़कें खोदना,रास्‍ता जाम करना आदि‍। अब तक राज्‍य सरकार के वि‍रोध के कारण इन लोगों को जमानत नहीं मि‍ली थी। इनमें से ज्‍यादातर लोग साधारण ग्रामीण हैं। राजनीति‍ एकदम नहीं जानते। इनमें से अनेक को पुलि‍स ने समय-समय पर प्रताडि‍त भी कि‍या था,ये सारी बातें तब प्रकाश में आईं जब जेल से रि‍हा होने के बाद सभी महि‍लाओं ने अपनी आपबीती प्रेस को बतायी। वस्‍तुगत तौर पर इन 28 लोगों का जमानत पर रि‍हा होना और थानेदार का माओवादि‍यों की कैद से रि‍हा होना ये दोनों फैसले सकारात्‍मक और सुखद हैं। मीडि‍या को इस सकारात्‍मक और सुखद में तकलीफ हो रही है। दूसरी बात यह है कि‍ पश्‍चि‍म बंगाल सरकार हो या केन्‍द्र सरकार उसे यह बात ध्‍यान में रखनी होगी कि‍ माओवादी चुनौती राजनीति‍क  है। यह कानून-व्‍यवस्‍था की समस्‍या नहीं है। इसका फैसला मीडि‍या कवरेज के आधार पर नहीं राजनीति‍क वि‍वेक के आधार पर होना चाहि‍ए।
     पश्‍चि‍म बंगाल सरकार ने राजनीति‍क वि‍वेक का परि‍चय देते हुए अपने थानेदार को ही नहीं बचाया बल्‍कि‍ उन 28 लोगों की जमानत का रास्‍ता भी खोला है जो गंभीर अपराध में लि‍प्‍त नहीं थे। यह सरकार और माओवादि‍यों का मानवीय भाव है। संभवत: यह भवि‍ष्‍य की संभावनाओं के द्वार भी खोल रहा है। संभवत:जल्‍दी ही माओवादी और राज्‍य सरकार आमने-सामने हों। बगैर कि‍सी जि‍द और पूर्व शर्त के आमने सामने हों। व्‍यापक हि‍त में माओवादि‍यों के सामने कोई पूर्व शर्त रखे बि‍ना बातचीत की जानी चाहि‍ए। बुद्धदेव भट्टाचार्य ने जि‍स राजनीति‍क दूरदर्शिता का परि‍चय दि‍या है वह इसके लि‍ए बधाई के पात्र हैं। उन्‍हें इस प्रसंग में स्‍व.श्रीमती इंदि‍रा गांधी से सीखना चाहि‍ए। इंदि‍राजी से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी सीखना चाहि‍ए। उत्‍तर-पूर्व में लालडेंगा के साथ बगैर कि‍सी शर्त के बातचीत की गयी थी,लालडेंगा के समर्थकों ने हिंसा का रास्‍ता नहीं त्‍यागा था और समाधान की तलाश में वि‍देशों में थर्ड चैनल के जरि‍ए बर्षों बातें हुईं। अंत में समझौता हुआ। आज लालडेंगा कहां है उनका संगठन कहां है,उनका हिंसाचार कहां है, कोई नहीं जानता। माओवादी संगठन से भी बगैर शर्त बातचीत होनी चाहि‍ए और उनकी उन तमाम मांगों पर कार्रवाई का मन बनाना चाहि‍ए जो भारत के संवि‍धान के तहत संभव हैं। उनकी मांगों में दो मांगे प्रमुख हैं बंदी नेताओं को रि‍हा कि‍या जाए,मुकदमे वापस लि‍ए जाएं। अवि‍कसि‍त आदि‍वासी इलाकों के वि‍कास के लि‍ए वि‍शेष पैकेज घोषि‍त कि‍ए जाएं। ‍इस प्रसंग में बुद्धदेव भट्टाचार्य ने शुरूआत की है,उन्‍हें अपने प्रयास और भी तेज करने चाहि‍ए।
      माओवादी संगठनों की मांगें मानने से माकपा और बुद्धदेव का राजनीति‍क कद बड़ा होगा। तृणमूल कांग्रेस के न्‍यूसेंस और अराजकभाव को धक्‍का लगेगा। इससे भवि‍ष्‍य में माकपा और वाममोर्चे के जनाधार में इजाफा होने की भी पूरी संभावनाएं हैं। आज नागालैंड में लालडेंगा की नहीं कांग्रेस और अन्‍य शांति‍कामी संगठनों की तूती बोलती है। यही दशा भवि‍ष्‍य में लालगढ की भी हो सकती है। ज्‍यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है,असम में बोडोलैंड वाले माओवादि‍यों की ही तरह हिंसा कर रहे थे,घीसिंग ने भी हिंसा का कार्ड खेला था,त्रि‍पुरा में आदि‍वासि‍यों में अनेक ऐसे ही हिंसक संगठन थे,लेकि‍न राजनीति‍क समझौते के बाद वे धीरे धीरे गायब हो गए। माओवादि‍यों के साथ बि‍ना कि‍सी पूर्व शर्त की बातचीत होनी चाहि‍ए। उसके दूरगामी अच्‍छे परि‍णाम नि‍कलेंगे।  


सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

लालगढ़-बीनपुर में माओवादी जबरि‍या धन वसूली

लालगढ़ का पुलि‍सि‍या मीडि‍या ट्रॉयल जारी है। कोलकाता से प्रकाशि‍त ‘दि‍ टेलीग्राफ’(5 अक्‍टूबर 2009) ने पुलि‍स के हवाले से खबर दी है कि‍ छत्रधर महतो के नेतृत्‍व वाली ‘पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी’ लालगढ-बीनपुर इलाके के लोगों से जबरि‍या मासि‍क चंदा वसूल करती थी। वि‍भि‍न्‍न केटेगरी के लोगों से अलग अलग राशि‍ वसूल की जाती थी। वि‍भि‍न्‍न मदों में मासि‍क धन वसूली का काम वि‍भि‍न्‍न लोगों के जि‍म्‍मे था। कुल मि‍लाकर इलाके से 80 लाख रूपये वसूल कि‍ए जाते थे।
सूची इस प्रकार है-
1. सरकारी सहायता प्राप्‍त 16 हाईस्‍कूल शि‍क्षकों से मासि‍क – 15 लाख रूपये
2. दस डाकघरों के कर्मचारि‍यों से मासि‍क – 5 लाख रूपये
3. इलाके के दस बैंकों के कर्मचारि‍यों से मासि‍क – 5 लाख रूपये
4. वनवि‍भाग में कार्यरत दो अफसरों से मासि‍क – 2 लाख रूपये
5. दस पंचायत समि‍ति‍ के दफ्तरों में कार्यरत कर्मचारि‍यों से मासि‍क- 2 लाख रूपये
6. 78 शि‍शु शि‍क्षा केन्‍द्रों से मासि‍क – 50 हजार रूपये
7. 6 माध्‍यमि‍क शि‍क्षा केन्‍द्रों से मासि‍क – 20 हजार रूपये
8. 5 सार्वजनि‍क स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्रों सेमासि‍क – 25 हजार रूपये
9. दूरसंचार एक्‍सचेंज में कार्यरत कर्मचारि‍यों से मासि‍क – 20 हजार रूपये
10. 10 इंटीग्रेटेड बाल वि‍कास योजना केन्‍द्रों में कार्यरत 300 कर्मचारि‍यों से मासि‍क – 40
हजार रूपये फि‍रौती के रूप में वसूल कि‍ए जाते हैं।
पुलि‍स को ये सारे तथ्‍य ‘पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी’ के कोषाध्‍यक्ष की गि‍रफ्तारी के बाद जांच के दौरान पता लगे हैं। यह धन वसूली का धंधा लालगढ और बीनपुर इलाके में वि‍गत दस महीनों से चल रहा है। पुलि‍स उन खातों का भी पता लगाने में लगी है जहां यह पैसा जमा होता था। अखबार ने लि‍खा है कि‍ पुलि‍स ने मासि‍क जबरि‍या धन वसूली के जो आंकडे दि‍ए हैं वे पूरी तरह बैंक खातों के आधार पर ही तैयार करके दि‍ए हैं। पुलि‍स का यदि‍ यह दावा सही है तो इसकी समस्‍त जानकारी सबसे पहले अदालत को दी जानी चाहि‍ए। वाम वि‍रोधी अखबार को इस जानकारी को जारी करना क्‍या महज प्रचार अभि‍यान तो नहीं है ? जि‍न खातों के आधार पर यह जानकारी दी गई उन खातों के ब्‍यौरे भी प्रेस में आते और अन्‍य स्रोतों से उसकी पुष्‍टि‍ होती तब ही यह वि‍श्‍वसनीय होता। इसके बावजूद सबसे बड़ी समस्‍या यह है कि‍ लालगढ-बीनपुर इलाके का कोई पीडि‍त व्‍यक्‍ति‍ जब तक ‘पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी’ के खि‍लाफ जबरि‍या धन वसूली की शि‍कायत नहीं करता तब तक पुलि‍स जबरि‍या धन वसूली के सवाल पर कानून की नजरों में कुछ भी नहीं कर सकती । क्‍या पुलि‍स के पास जबरि‍या धन वसूली की शि‍कायतें हैं ? शि‍कायतें और चश्‍मदीद गवाह होने पर ‘पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी’ के लोगों को घेरा जा सकता है।

शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

महाश्‍वेता देवी का हिंसा प्रेम और प्रगति‍शील-जनवादि‍यों की चुप्‍पी अपमानजनक है

आज के अखबारों में महाश्‍वेता देवी का एक बयान छपा है। जि‍समें उन्‍होंने बेशर्मी के साथ लालगढ़ कत्‍लेआम की हि‍मायत की है। महाश्‍वेता देवी ने कहा है कि‍ छत्रधर महतो को कलकत्‍ते के बुद्धि‍जीवि‍यों ने चंदा नहीं दि‍या, क्‍योंकि‍ उनके पास धन नहीं होता। उन लोगों ने तो सि‍र्फ भावनात्‍मक समर्थन दि‍या था। सवाल यह है कि‍ छत्रधर महतो जब आरंभ में पुलि‍स दमन के खि‍लाफ लड़ रहे थे तब महाश्‍वेता देवी और उनके भक्‍तों द्वारा छत्रधर महतो एंड कंपनी का समर्थन करने वाली बात कुछ समझ में आती है।उस समय पुलि‍स से गलति‍यॉं भी हुई थीं। राज्‍य सरकार को आन्‍दोलनकारि‍यों की मांग मान लेनी चाहि‍ए थी। किंतु जब से लालगढ में माओवादि‍यों के साथ मि‍लकर माकपा और पुलि‍स एजेण्‍ट के नाम पर साधारण गरीबों का कत्‍लेआम शुरू हुआ है तब महाश्‍वेता देवी और उनके समर्थक बुद्धि‍जीवि‍यों का समर्थन समझ में नहीं आता। मैं नहीं समझता कि‍ हि‍न्‍दुस्‍तान में इतनी नि‍र्लज्‍जता के साथ कि‍सी भी लेखक ने कत्‍लेआम का इस कदर समर्थन कि‍या है। उल्‍लेखनीय है इनमें से अधि‍कतर की तथाकथि‍त वामपंथी छवि‍ है जि‍सका लंबे समय तक वाममोर्चे ने लाभ उठाया था। नंदीग्राम-सिंगूर की घटना और माकपा के स्‍थानीय नेताओं के असभ्‍य और हिंसक व्‍यवहार ने इन बुद्धि‍जीवि‍यों को ममता के खेमे में ठेल दि‍या। ममता के साथ ये लोग क्‍यों हैं ,इन्‍हें क्‍या मि‍ल रहा है और वाममोर्चे के साथ क्‍यों थे और वहॉं से क्‍या क्‍या प्राप्‍त कि‍या इसका भी हि‍साब लगा लि‍या जाए तो चीजें साफ समझ में आ जाएंगी। ममता बनर्जी ने रेलवे के वि‍शेष पास उन तमाम बंगाली बुद्धि‍जीवि‍यों को जारी कि‍ए हैं जि‍न्‍होंने ममता के पक्ष में प्रचार कि‍या था। इनमें से अनेक बुद्धि‍जीवी एक जमाने में वाममोर्चे की सरकार से सस्‍ती जमीनें पॉस इलाके में ले चुके हैं, इनमें महाश्‍वेता देवी भी शामि‍ल हैं।इनमें एक दर्जन से ज्‍यादा रंगकर्मी केन्‍द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय से समय- समय लाखों रूपये की सालाना आर्थि‍क मदद भी प्राप्‍त करते रहे हैं। ये लोग एक ही साक कांग्रेस ,तृणमूल कांग्रेस और वाम शासन से मोटी मदद प्राप्‍त करते रहे हैं। सवाल यह है कि‍ बंगाल में इन ढुलमुल व्‍यक्‍ति‍त्‍व के बुद्धि‍जीवि‍यों की पूरी फौज आखि‍र कि‍स वि‍चारधारात्‍मक मि‍ट्टी से तैयार हुई ? क्‍या इसका क्रांति‍ के महान लक्ष्‍य से कोई लेना देना है ? यह वि‍शुद्ध बौद्धि‍क अवसरवाद है। इन बुद्धि‍जीवि‍यों की सत्‍य की रक्षा में कोई दि‍लचस्‍पी नहीं है। वे सत्‍य को देखना नहीं चाहते। सत्‍य पर सुवि‍धानुसार बोलते हैं। सत्‍य के प्रति‍ तदर्थ भाव के कारण ही वे तरह तरह के नकली मुखौटे लगाकर आते हैं। इसी प्रसंग में दूसरी समस्‍या यह भी है कि‍ माकपा और वाममोर्चे के हमदर्द बुद्धि‍जीवी लालगढ में वि‍गत चार महीने से चल रहे कत्‍लेआम पर चुप क्‍यों हैं ? इन दलों के सांस्‍कृति‍क संगठन चुप क्‍यों हैं ? प्रेस में इनके कहीं पर हिंसा की नि‍न्‍दा करने वाले बयान तक नजर नहीं आते। यह चुप्‍पी टूटनी चाहि‍ए। वाम बुद्धि‍जीवि‍यों को सत्‍य को बोलना चाहि‍ए। वाम मोर्चे को लालगढ की जनता कभी क्षमा नहीं करेगी क्‍योंकि‍ उसने अपने कार्यकर्त्‍ताओं को असहाय अवस्‍था में माओवादि‍यों के हाथों कत्‍ल होने के लि‍ए छोड दि‍या है।जनवादी लेखक संघ और प्रगति‍शील लेखक संघ भी लालगढ के कत्‍लेआम पर चुप हैं ? आखि‍र ये लोग कि‍स महान वि‍पत्‍ति‍ का इंतजार कर रहे हैं? लालगढ के वि‍पदाग्रस्‍त, आतंकि‍त, उत्‍पीडि‍त लोगों के आख्‍यान कहीं से भी मीडि‍या में नहीं आ रहे। यह वाममोर्चे और खासकर माकपा की सबसे बड़ी असफलता है। हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहने से माओवादी हिंसा बंद होने वाली नहीं है,उसका चौतरफा सत्‍यनि‍ष्‍ठ प्रति‍वाद करना चाहि‍ए।
एक अन्‍य पहलू जि‍स पर गौर करना चाहि‍ए। लालगढ़ के संदर्भ में समस्‍या इसके या उसके चंदा देने की नहीं है। पश्‍चि‍म बंगाल पुलि‍स यदि‍ मीडि‍या ट्रायल चलाएगी तो लालगढ के हत्‍यारों पर से ध्‍यान हट जाएगा। माकपा के सदस्‍यों और हमदर्दों को जि‍स तरह अकारण मौत के घाट उतारा जा रहा है उसके बारे में ज्‍यादा केन्‍द्रि‍त होकर चर्चा होनी चाहि‍ए,दूसरी बात यह कि‍ पश्‍चि‍म बंगाल की पुलि‍स यदि‍ कोई गलती करती है तो उसकी सार्वजनि‍क आलोचना होनी चाहि‍ए। लालगढ का पुलि‍स ऑपरेशन ठीक है,हमने उसका समर्थन भी कि‍या है किंतु इसके बारे में प्रचार अभि‍यान की जो पद्धति‍ पुलि‍स ने अपनायी है वह सही नहीं है। जो बुद्धि‍जीवी खुलेआम लालगढ में कत्‍लेआम का समर्थन कर रहे हैं,वे गलत रास्‍ते पर हैं। उन्‍होंने अंध कम्‍युनि‍स्‍ट वि‍रोध का मैकार्थीवादी मार्ग चुन लि‍या है उन्‍हें वि‍चारधारात्‍मक तौर पर नंगा कि‍या जाना चाहि‍ए। यह काम पुलि‍स नहीं कर सकती, बुद्धि‍जीवी ही कर सकते हैं। हमें दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि‍ माकपा और वामदलों के पास हजारों बुद्धि‍जीवि‍यों की फौज है,ये ऐसे बुद्धि‍जीवी हैं जो वि‍चारधारा और सर्जनात्‍मक क्षमता में आज भी बेजोड़ हैं। सवाल यह है कि‍ लालगढ में चल रहे अहर्नि‍श कत्‍लेआम पर वे चुप क्‍यों हैं ? हम चाहते हैं कि‍ लालगढ में जो कत्‍लेआम माओवादी मचा रहे हैं,साथ ही देश के दूसरे इलाकों में वे जि‍स तरह का हिंसाचार कर रहे हैं उसको ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों तक पहुँचाया जाए,यह कार्य तथ्‍य और सत्‍य की रक्षा करते हुए होना चाहि‍ए। कि‍सी भी बुद्धि‍जीवी के लि‍ए वह दुर्भाग्‍य का दि‍न होगा कि‍ वह हिंसकों को चंदा दे। जि‍न बुद्धि‍जीवि‍यों ने लालगढ में कत्‍लेआम करने वालों को चंदा दि‍या है वे नैति‍क तौर पर हत्‍याओं के लि‍ए जि‍म्‍मेदार हैं। लेकि‍न पुलि‍स को इस प्रसंग में जि‍तने भी तथ्‍य मि‍लते हैं उन्‍हें अदालत को सबसे पहले बताना चाहि‍ए। पुलि‍स के जरि‍ए माओवादि‍यों के खि‍लाफ प्रचार अभि‍यान चलाकर पश्‍चि‍म बंगाल सरकार को न तो नैति‍क बल मि‍लेगा और नहीं राजनीति‍क लाभ ही होगा। पुलि‍सि‍या प्रचार अंतत: हत्‍यारों की मदद करता है।नंदीग्राम हिंसाचार का यही सबसे बड़ा सबक है जि‍ससे वाममोर्चे को सीखना चाहि‍ए।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

छत्रधर महतो पर मीडि‍या मुकदमा

लालगढ से हाल ही में गि‍रफतार कि‍ए गए बागी नेता छत्रधर महतो फि‍लहाल पुलि‍स हि‍रासत में हैं। पश्‍चि‍म बंगाल पुलि‍स उनसे पूछताछ कर रही है। पूछताछ के नाम पर अब प्रेस में 'आधि‍कारि‍क तथ्‍य' भी आने लगे हैं। राज्‍य पुलि‍स के एक अधि‍कारी ने प्रेस को बताया कि‍ छत्रधर महतो का एक करोड़ रूपये का जीवन बीमा पॉलि‍सी है। ऐसा स्‍वयं महतो ने पुलि‍स को बताया है । इसमें सत्‍य क्‍या है यह तो जीवन बीमा नि‍गम ही बता पाएगा। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि‍ क्‍या क्षत्रधर महतो को एक करोड़ की बीमा पॉलि‍सी कराने का हक है ? नागरि‍क के नाते छत्रधर महतो को यह हक है,इसके बावजूद मीडि‍या में यह बात कुछ इस तरह पेश की जा रही है गोया ,एक करोड़ की बीमा पॉलि‍सी का हक उसे नहीं है, उसका ऐसा करना अवैध है। दूसरा सनसनीखेज तथ्‍य पुलि‍स ने यह दि‍या है कि‍ छत्रधर महतो के पास उड़ीसा के मयूरभंज में एक मकान है। क्‍या मकान होना अपराध है ? तीसरा सनसनीखेज तथ्‍य यह दि‍या है कि‍ छत्रधर महतो के नेतृत्‍व में चलने वाली 'पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी' के लि‍ए चंदा देने वालों में 150 लोगों के नाम हैं इनमें अनेक वि‍ख्‍यात लेखकों और संस्‍कृति‍कर्मियों के नाम हैं। वस्‍तुगत तौर पर वि‍चार करें तो पुलि‍स को ये सारे तथ्‍य अदालत में रखने चाहि‍ए थे। पुलि‍स का जांच के तथ्‍यों को अदालत को बताने से पहले सीधे प्रेस को कानून की अवमानना है। इससे एक चीज जाहि‍र है कि‍ पुलि‍स की लालगढ में कत्‍ल कर रहे लोगों तक पहुँचने में कोई दि‍लचस्‍पी नहीं है उसकी सारी दि‍लचस्‍पी उन चीजों में है जि‍नका लालगढ में मारे गए नि‍र्दोष लोगों की मौत से कोई लेना देना नहीं है। छत्रधर महतो करोडपति‍ है या खाकपति‍ है इस चीज का लालगढ के कत्‍लेआम और अराजकता से कोई संबंध नहीं है। आश्‍चर्य की बात है कि‍ मीडि‍या ने भी पुलि‍स के द्वारा दी गयी सूचनाओं को मुखपृष्‍ठ पर बड़ी खबर बनाया है। यह गलत को सही और अवैध को वैध बनाने की मीडि‍या साजि‍श है। मीडि‍या की पुलि‍सि‍या गुलामी है। पुलि‍स को छत्रधर महतो के बारे में चल रही जांच-पड़ताल को इस तरह सार्वजनि‍क करने का कोई कानूनी हक नहीं है।
दूसरी ओर मीडि‍या को तथ्‍य,सत्‍य,वैध,अवैध में फर्क करना चाहि‍ए। मीडि‍या बेहूद‍गि‍यों के कारण मीडि‍या की साख खत्‍म हो चुकी है। इससे भी बड़ी बात यह है कि‍ छत्रधर महतो के नेतृत्‍व में चलने वाली 'पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी' वैध संगठन है। उसके लि‍ए चंदा लेना और देना कानूनन वैध है। अत: इस कमेटी को चंदा देने वालों का राष्‍ट्रद्रोही के रूप में प्रस्‍तुति‍करण सही नहीं है। इस संदर्भ में 'एसोसि‍एशन फॉर प्रोटेक्‍शन ऑफ डेमोक्रेटि‍क राइटस' (एपीडीआर) प्रधान सुजातो भद्र का कहना एकदम सटीक है कि‍ ''पुलि‍स के सामने दि‍या गया बयान अदालत में ग्रहण योग्‍य नहीं होता। कोई नहीं जानता कि‍ आखि‍रकार कि‍न परि‍स्‍थि‍ति‍यों में यह बयान लि‍या गया है। यह भी हो सकता है पुलि‍स चुनकर या वि‍कृत करके मीडि‍या को सूचनाएं दे रही हो। पुलि‍स आन्‍दोलन को लांछि‍त करना चाहती है।'' सुजातो भद्र ने सही कहा है कि‍ '' पीसीपीए को चंदा देना अपराध नहीं है।''

रविवार, 23 अगस्त 2009

लालगढ़ के असली अपराधी हैं माओवादी

संतोष राणा के आलेख में बड़े ही वि‍स्‍तार और पारदर्शिता के साथ लालगढ़ आन्‍दोलन के बारे में वि‍श्‍लेषण कि‍या गया है ।यह वि‍श्‍लेषण जि‍स चीज पर रोशनी डालता है वह है लालगढ़ आन्‍दोलन की असफलता। क्‍या लालगढ़ में कोई आंदोलन चल रहा था ? लालगढ़ में कोई आंदोलन नहीं चल रहा था,सालबनी की बारूदी सुरंग वि‍स्‍फोट की घटना के बाद जि‍स तरह का बर्बर व्‍यवहार पुलि‍स ने कि‍या था उसके लि‍ए राज्‍य प्रशासन ने यदि‍ स्‍थानीय लोगों की मांगों को मान लि‍या होता तो यह समस्‍या उसी दि‍न खत्‍म हो जाती। राज्‍य सरकार ने अपनी दीर्घकालि‍क योजना के तहत पुलि‍स कैंप हटाने का फैसला लि‍या था, जनता का यदि‍ इलाके में कोई आंदोलन रहा होता तो वि‍गत बीस सालों से नि‍कम्‍मे लोग पंचायतों से लेकर लोकसभा तक चुनाव नहीं जीत पाते,इस इलाके में माकपा का वि‍गत बीस सालों से राजनीति‍क वर्चस्‍व नहीं है बल्‍कि‍ अन्‍य दलों का है। लालगढ़ में माओवादि‍यों ने जो हिंसाचार कि‍या है,जनता को उत्‍पीड़ि‍त कि‍या है,सजाएं दी हैं,माकपा और अन्‍य दलों के कार्यकर्त्‍ताओं की हत्‍याएं की हैं, उन्‍हें लेकर क्‍या कानूनी और राजनीति‍क कदम उठाए जाने चाहि‍ए ? दूसरी बात, आन्‍दोलन और संगठन के दम पर ‘इलाका दखल’ की राजनीति‍ मूलत: फासीवादी राजनीति‍ है, दुर्भाग्‍य यह है कि‍ माकपा से लेकर माओवादि‍यों तक,तृणमूल कांग्रेस से लेकर कांग्रेस तक सभी दल अपने- अपने तरीके से समय-समय पर इसका दुरूपयोग करते रहे हैं। माओवादी संगठनों के पूर्वज ‘इलाका दखल’ के जनक हैं ,बाकी तो उनके अनुयायी मात्र हैं। समस्‍या यह है क्‍या भारत में लोकतंत्र और लोकतांत्रि‍क संस्‍थाओं को बंद करा दें अथवा उन्‍हें सुचारू रूप से काम करने दें ? माओवादि‍यों के जो गि‍रोह ‘इलाका दखल’ अभि‍यान में लगे हैं उनके बयान कि‍तने ही क्रांति‍कारी हों, वे मूलत: लोकतंत्र वि‍रोधी हैं और राजनीति‍क और सामाजि‍क अपराधी की कोटि‍ में रखे जाने योग्‍य हैं। नागरि‍कों के जीवन , संपत्‍ति‍, वातावरण,रहन-सहन, स्‍वतंत्रताओं के हनन को ‘जनउभार’ कहना सही नहीं है। माओवादि‍यों की कार्यशैली मूलत: माफि‍या सरदारों से जैसी होती है,उसमें ‘क्रांति‍’ ‘जनउभार’ और ‘सामाजि‍क परि‍वर्तन’ के तर्क खोजना एकसि‍रे से गलत है। ‘क्रांति‍कारी’ भय पैदा करके,दमन करके,दंडि‍त करके यदि‍ वर्चस्‍व स्‍थापि‍त करना चाहेंगे तो बुर्जुआ राज्‍य उन्‍हें चैन की नींद सोने नहीं देगा चाहे उसके लि‍ए जो भी कीमत अदा करनी पड़े। हमें यह मानना पडे़गा कि‍ भारत में लोकतंत्र की पुख्‍ता बुनि‍याद है और उसमें सबके लि‍ए जगह है आप राजनीति‍ करें,संगठि‍त करें,जनता के लि‍ए संघर्ष करें और लोकतंत्र बनाए रखें, भारतीय लोकतंत्र में प्रति‍वाद और वि‍कल्‍प राजनीति‍ के लि‍ए पर्याप्‍त जगह है।माओवाद के भारतीय संस्‍करण स्‍वभावत: भारतीय मनोदशा के वि‍परीत हैं।
( उपरोक्‍त वि‍चार प्रसि‍द्ध नक्‍सलनेता संतोष राणा के 'काफि‍ला' वेबसाइट पर प्रकाशि‍त लेख के संदर्भ में व्‍यक्‍त कि‍ए गए हैं,उस लेख को देखने के लि‍ए kafila पर जाएं। )

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

मनमोहन सिंह: व्‍यवहारवादी राजनीति‍ की असफलता का नायक

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कल मुख्‍यमंत्रि‍यों के सम्‍मेलन में जो कहा उसे गंभीरता से लि‍या जाए तो कई रास्‍ते नि‍कलते हैं साथ ही यह भी समझ में आएगा कि‍ आखि‍रकार नव्‍य उदार भारतीय राजनीति‍ नपुंसक क्‍यों हो गयी है ? अप्रभावी क्‍यों है ?प्रधानमंत्री के भाषण की खूबी है कि‍ इसमें नीति‍,राजनीति‍ और वि‍चारधारा कम और व्‍यवहारवाद ज्‍यादा जोर है । व्‍यवहारवाद जनता पर अप्रत्‍यक्ष असर छोड़ता है। किंतु समस्‍या को सम्‍बोधि‍त नहीं करता। ठेठ हि‍न्‍दी में इसे थोथे गाल बजाना कहते हैं।
व्‍यवहारवाद नव्‍य उदार राजनीति‍ की धुरी है। ओबामा से लेकर मायावती तक मनमोहन सिंह से लेकर बुद्धदेव भट्टाचार्य तक सभी इस पर चल रहे हैं । सबने अपनी राजनीति‍ और वि‍चारधारा को ति‍लांजलि‍ दे दी है। व्‍यवहारवाद से वि‍चारधारा को पराजि‍त नहीं कि‍या सकता।व्‍यवहारवाद अमेरि‍की राजनीति‍ का प्रधान दर्शन है और हमारे राजनीति‍क दल इसे अनालोचनात्‍मक भाव से अपनाते जा रहे हैं।
व्‍यवहारवाद यदि‍ वि‍चारधारा से ज्‍यादा शक्‍ति‍शाली अस्‍त्र होता तो अमेरि‍का की वि‍न लादेन के हाथों आज जो दुर्गति‍ हो रही है वह नहीं हुई होती। हमारे देश के प्रधानमंत्री और उनके अनुयायी मुख्‍यमंत्रीगण भी व्‍यवहारवाद का ही अनुकरण करके उग्रवाद,आतंकवाद, माओवाद, साम्‍प्रदायि‍कता, पृथकतावाद आदि‍ वि‍चारधाराओं से लड़ना चाहते हैं और बार-बार पराजय का सामना कर रहे हैं।भारत की राजनीति‍ में व्‍यवहारवाद कब और कैसे घुस आया इसकी गंभीरता के साथ पड़ताल करने की जरूरत है। व्‍यवहारवाद से वि‍चारधारा को पराजि‍त नहीं कि‍या जा सकता।
प्रधानमंत्री का यह कहना कि‍ पाक स्‍थि‍त आतंकी गुट भारत पर हमले की तैयारी कर रहे हैं और हाल के दि‍नों में तकरीबन 200 आतंकी पाक सीमा लांघकर जम्‍मू-कश्‍मीर में घुस आए हैं और वे अत्‍याधुनि‍क हथि‍यारों से लैस हैं। क्‍या कि‍सी भी प्रधानमंत्री को इस तरह का सटीक बयान देना शोभा देता है ? प्रधानमंत्री की सूचना इतनी ही सटीक है तो इन आतंकि‍यों को रोका या पकड़ा क्‍यों नहीं गया ? भारत की पाक सीमा पर कई लाख सैनि‍कों की मौजूदगी यदि‍ आतंकि‍यों के प्रवेश को रोक नहीं पा रही है तो फि‍र साधारण आदमी कि‍स पर वि‍श्‍वास करे ? दूसरी महत्‍वपूर्ण बात यह कि‍ भारत का आतंकी गुटों के प्रति‍ आक्रामक रवैयया उतना धारदार नहीं है जि‍तना धारदार होना चाहि‍ए।
आतंकी गुटों के खि‍लाफ वातावरण बनाने में मीडि‍या प्रभावशाली भूमि‍का अदा कर सकता है किंतु भारत सरकार के अब तक मीडि‍या प्रयासों की वरीयता में आतंकवाद के खि‍लाफ जनजागरण नहीं आता। प्रसार भारती के प्रसारणों और सरकार समर्थित अखबारों के पन्‍नों पर प्रकाशि‍त सामग्री इसकी गवाह है। आतंकवाद कोई कानून- व्‍यवस्‍था की समस्‍या नहीं है बल्‍कि‍ एक वि‍चारधारा है इसे लेकर जब तक आम जनता को भारत सरकार शि‍क्षि‍त करने का काम नहीं करती तब तक आतंकी गुटों को उनके जमीनी आधार से अलग करना मुश्‍कि‍ल होगा। मीडि‍या के मामले में कम से कम मनमोहन सिंह सरकार अमेरि‍का से बहुत कुछ सीख सकती है। अमेरि‍की प्रशासन की मदद और आतंकवाद से संबंधि‍त वि‍भि‍न्‍न सरकारी मदद प्राप्‍त शोध संस्‍थानों और वि‍चारकों के समूहों के अहर्निश लेखन और प्रचार अभि‍यान के कारण ही आज अमेरि‍का में आतंकवादी आंतरि‍क घुसपैठ नहीं कर पा रहे हैं। भारत में ऐसा कोई भी तंत्र अभी काम नहीं कर रहा।
प्रधानमंत्री के अनुसार जम्‍मू-कश्‍मीर में आतंकि‍यों के गुटों की सक्रि‍यता में इजाफा हुआ है। सोचने वाली बात यह है कि‍ लोकतंत्र के सक्रि‍य स्‍तम्‍भों के होते हुए आखि‍रकार वह कौन सी चीज है जो आमलोगों को आतंकि‍यों की ओर खींचती है ? जम्‍मू-कश्‍मीर की अर्थव्‍यवस्‍था को पटरी पर लाने के लि‍ए केन्‍द्र ने अभी तक कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है,केन्‍द्र और राज्‍य सरकार पर्यटन पर ही भरोसा लगाए बैठी हैं,वि‍गत 25 सालों में जम्‍मू-कश्‍मीर में पूंजीपति‍यों को जबर्दस्‍ती ले जाकर कारखाने और नए उद्यांग धंधे खोले जाने चाहि‍ए थे,साथ ही नयी बस्‍ति‍यां बसाने पर भी जोर दि‍या जाना चाहि‍ए था,इसके लि‍ए हमें इस्राइल की रणनीति‍यों से बहुत कुछ सीखना चाहि‍ए।
आश्‍चर्य की बात यह है कि‍ आतंकि‍यों के हमलों के कारण लाखों कश्‍मीरी शरणार्थी की तरह दि‍ल्‍ली और अन्‍य इलाकों में वर्षों से दि‍न गुजार रहे हैं भारत सरकार ने कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाया जि‍ससे इन्‍हें वापस अपने घर भेजा सकता। भारतीय सेनाओं की सीमाओं की देखभाल और सुरक्षा करना जि‍म्‍मेदारी है तो उसकी आंतरि‍क सुरक्षा का वातावरण बनाए रखने की जि‍म्‍मेदारी है साथ भारत सरकार के अन्‍य मंत्रालयों की भी जम्‍मू-कश्‍मीर में कोई भूमि‍का हो सकती है जि‍सकी ओर अभी ध्‍यान ही नहीं गया है। भारत सरकार को जम्‍मू-कश्‍मीर में आतंकि‍यों को स्‍थानीय जनता में अलग-थलग डालने के लि‍ए बहुस्‍तरीय रणनीति‍ अपनानी होगी। महज सीमा की रखवाली वाली रणनीति‍ से अभीप्‍सि‍त परि‍णाम नहीं नि‍कलेगा।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में नक्‍सलवाद अथवा वामपंथी अति‍वाद की समस्‍या की ओर खींचते हुए पहलीबार एक संतुलि‍त राजनीति‍क बयान दि‍या है,वरना वामपंथी अति‍वाद को लेकर उनके बयान एकांगी हुआ करते थे,प्रधानमंत्री का कहना है वामपंथी अति‍वाद जटि‍ल समस्‍या है। इससे नि‍बटने के लि‍ए दो स्‍तरों पर रणनीति‍ बनाने की जरूरत है,राज्‍य को अपनी जि‍म्‍मेदारि‍यों और भूमि‍का अदा करनी चाहि‍ए,सुरक्षातंत्र मजबूत करना चाहि‍ए,कानून का शासन स्‍थापि‍त करना चाहि‍ए। साथ ही उन बुनि‍यादी समस्‍याओं को दूर करने का प्रयास करना चाहि‍ए जि‍सके कारण लोग नक्‍सलवाद की ओर आकर्षित होते हैं और प्रशासन के साथ जनता का अलगाव पैदा होता है। इस प्रसंग में दो बातें हैं जि‍नकी ओर राज्‍यों से पहले केन्‍द्र को ध्‍यान देना होगा,पहली चीज यह कि‍ राज्‍यों के पास पर्याप्‍त संसाधन नहीं हैं अत: पुलि‍सबलों के आधुनि‍कीकरण और खाली पदों की भर्ती के काम को राज्‍य नहीं कर पाए,दूसरा यह कि‍ खुद केन्‍द्र ने लंबे समय से नई नियुक्‍ति‍यों पर पाबंदी लगायी हुई थी, इसके अलावा वामपंथी अति‍वाद से प्रभावि‍त इलाके भयानक गरीबी में जी रहे हैं और इसके लि‍ए कोई नि‍योजि‍त केन्‍द्रीय योजना केन्‍द्र सरकार के द्वारा ही संभव है। तकरीबन 140 जि‍ले हैं जहां पर नक्‍सलवाद,माओवाद,उग्रवाद आदि‍ की समस्‍या फैली हुई है, इन इलाकों में पि‍छले 62 सालों में वि‍कासकार्य एकदम नहीं हुए हैं।
मुख्‍यमंत्रि‍यों का यह सम्‍मेलन आंतरि‍क सुरक्षा की समस्‍या पर वि‍चार करने के लि‍ए बुलाया गया था और इसमें पश्‍चि‍म बंगाल के मुख्‍यमंत्री अथवा कि‍सी भी मंत्री का नहीं पहुंचना इस बात का संकेत है कि‍ हमारी राज्‍य सरकारों में अभी तक आंतरि‍क सुरक्षा की समस्‍या पर जि‍स तरह की जागरूकता,सक्रि‍यता और राजनीति‍क तत्‍परता होनी चाहि‍ए है वह अभी तक पैदा नहीं हुई है। पश्‍चि‍म बंगाल अपने यहां सबसे गंभीर लालगढ़ आपरेशन में फंसा है यह आपरेशन केन्‍द्र की नीति‍ की परीक्षा है और अभी तक के संकेत बताते हैं कि‍ लालगढ़ में अभीप्‍सि‍त सफलता नहीं मि‍ली है और एक भी माओवादी को पुलि‍स पकड़ नहीं पायी है। केन्‍द्र ने बड़े पैमाने पर अर्द्ध सैनि‍क बलों की टुकडि‍यां मुहैयया करायी हैं,इसके बावजूद आपरेशन यदि‍ सफल नहीं हो रहा है तो उसका प्रधान कारण है राज्‍य पुलि‍सबल के पास नैति‍क और राजनीति‍क इच्‍छाशक्‍ति‍ का अभाव। पुलि‍सबलों में नैति‍क और राजनैति‍क इच्‍छाशक्‍ि‍त तब ही पैदा की जा सकती है जब पुलि‍सबलों को पेशेवर तरीके से काम करने दि‍या जाए और राजनीति‍क हस्‍तक्षेप से पूरी तरह मुक्‍त रखा जाए।

सोमवार, 17 अगस्त 2009

लालगढ़ में पुलि‍स की नौटंकी और उत्‍साही जनता

लालगढ़ में आज एकबार फि‍र नाटक हुआ और छत्रधर महतो अपनी जनसभा करने में सफल रहा। मजेदार बात यह है कि‍ राज्‍य सरकार उसकी गि‍रफ्तारी का हुकुम दे चुकी है , इसके बावजूद उसे पकड़ा नहीं गया है, और आज लालगढ में 'पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी' के आह्वान पर जनसभा थी ,जहां जनसभा होने वाली थी वहां पुलि‍सबलों ने पहले से ही जाकर कब्‍जा जमा लि‍या और जनसभा के मंच को उखाड़ फेंका। इसका इलाके की जनता पर कोई असर नहीं पड़ा ,अर्द्धसैनि‍क बलों ने दहशत पैदा करने के लि‍ए कई राउण्‍ड गोलि‍यां भी चलाई उससे भी लोग नहीं डरे और अंत में लोग सभास्‍थल से कुछ दूर जमा होने लगे और उन्‍होंने अपनी जनसभा भी कि‍ और उनके नेता छत्रधर महतो ने जमकर भाषण भी दि‍या । बाद में प्रेस से भी बातें कीं।
इस प्रसंग में यह सवाल उठता है जब पुलि‍स को कोई कार्रवाई ही नहीं करनी थी तो धारा 144 लगाने का क्‍या अर्थ है ? दूसरी बात यह कि‍ जब छत्रधर महतो को पकड़ना ही नहीं था तो गि‍रफ्तारी का आदेश जारी करने क्‍या अर्थ है ? तीसरी बात , जब पुलि‍सबलों को जनसभा को रोकना ही नहीं था तो इलाके के लोग जहां पर सभा करना चाहते थे उन्‍हें सभा करने देनी चाहि‍ए थी, यदि‍ प्रशासन का मानना था कि‍ जनसभा से परेशानी बढ़ सकती है तो फि‍र दूसरी जगह भी जनसभा को रोकना चाहि‍ए था। समग्रता में देखें तो पुलि‍स ने जनसभा करने दी और छत्रधर महतो को गि‍रफ्तारी भी नहीं कि‍या,ऐसी अवस्‍था में राज्‍य प्रशासन को गंभीरता के साथ 'पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी' के लोगों के साथ बातचीत आरंभ करनी चाहि‍ए और अति‍रि‍क्‍त पुलि‍सबलों को इस इलाके से हटा लेना चाहि‍ए।
थाने,पंचायत,वीडि‍ओ ऑफि‍स आदि‍ का इलाके में सुचारू रूप से काम चलना चाहि‍ए और जनता से मुठभेड़ से जि‍स तरह प्रशासन बचता रहा है यह उसकी सही नीति‍ है इस नीति‍ की संगति‍ में ही आन्‍दोलनकारि‍यों की मांगे मानकर सारे मामले को जि‍तना जल्‍दी हो सके सि‍लटा देना चाहि‍ए।
इसी प्रसंग में आज दि‍ल्‍ली में हुई मुख्‍यमंत्रि‍यों की बैठक का जि‍क्र करना भी समीचीन होगा।उल्‍लेखनीय है पश्‍चि‍म बंगाल के मुख्‍यमंत्री फ्लू से पीडि‍त होने के कारण दि‍ल्‍ली नहीं जा पाए, किंतु राज्‍य सरकार को उनकी अनुपस्‍थि‍ति‍ में कम से कम कि‍सी केबीनेट मंत्री को राज्‍य का पक्ष रखने के लि‍ए जरूर भेजना चाहि‍ए था। राज्‍य सरकार ने मुख्‍यमंत्रि‍यों की बैठक को गंभीरता से नहीं लि‍या है उसने मुख्‍यमंत्री की अनुपस्‍थि‍ति‍ में कि‍सी भी मंत्री को नहीं भेजकर सही राजनीति‍क समझ का परि‍चय नहीं दि‍या है,क्‍या यह भूल माकपा नेतृत्‍व के इशारे पर की गयी है ? राज्‍य सरकार ने अपने बड़े अधि‍कारि‍यों को इस बैठक में भेजकर यह संदेश भी दि‍या है कि‍ राज्‍य में इन दि‍नों राजनीति‍क मंदी छायी हुई है। मुख्‍यमंत्रि‍यों की बैठक में केरल के मुख्‍यमंत्री भी नहीं आए किंतु उन्‍होने अपनी एवज में एक जि‍म्‍मदार मंत्री को बैठक में भेजा। बुद्धदेव प्रशासन इतनी बड़ी भूल क्‍यों कर बैठा इसे कि‍सी भी तर्क से समझना मुश्‍कि‍ल है।

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