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मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

हिन्दी साहित्यालोचना का नीरा राडिया पंथ


       ‘आलोचना’पत्रिका ने हाल के बरसों में किसी गंभीर साहित्यिक बहस को जन्म नहीं दिया है। और न हिन्दी में किसी आलोचक को प्रतिष्ठित ही किया है सिवाय संपादक नामवर सिंह के। फिर भी हिन्दी में उसे आलोचना की महान पत्रिका कहते हैं। सोचने वाली बात यह है यह पत्रिका भी अब प्रायोजन और फिक्सिंग के नीरा राडिया मार्ग की पथिक हो गयी है। सवाल उठता है आलोचना में प्रकाशक की मार्केटिंग रणनीति के तहत चल रहा राडिया मार्ग आलोचना और साहित्य को आखिर कहां ले जाएगा ? इतने बड़े आलोचक के संपादन में निकलनी वाली पत्रिका ने किसी साहित्यिक आंदोलन को जन्म क्यों नहीं दिया ? किसी आलोचक या आलोचकों के समूह को हिन्दी में प्रतिष्ठित क्यों नहीं किया ?
   नामी-गिरामी समीक्षकों को संपादक बनाकर रखने वाली और महत्वपूर्ण कहलाने वाली इस पत्रिका ने साहित्य की श्रीवृद्धि की है । प्रकाशन समूह की प्रतिष्ठा बढ़ायी है। संपादक के नाम को रोशन किया है। लेकिन हिन्दी में किसी भी साहित्यांदोलन का नेतृत्व नहीं किया है।
     हाल के वर्षों में हिन्दी में नीरा राडिया पंथ (साहित्य में जन-संपर्क की रणनीति) कई मौकों पर अपने गुल खिला चुका है और साहित्य के अंदर तथाकथित प्रायोजित उत्तेजना भी पैदा कर चुका है। अलका सरावगी से लेकर धर्मवीर की किताबों को जनप्रिय बनाने और पुरस्कार दिलाने में राडिया मार्ग मददगार साबित हुआ है। इस मार्ग पर चलने से साहित्य को कम और प्रकाशक को ज्यादा लाभ हुआ है। बाजार की नव्य़ उदार तिकड़मों में माहिर हिन्दी के चंद प्रकाशक कैसे सरकारी रसद पर येन-केन प्रकारेण छापेमारी करते हैं, इसके किस्से किसी भी व्यक्ति से दरियागंज में सहज ही जाने जा सकते हैं। आप यह भी जान सकते हैं कि आखिरकार कौन सा प्रकाशक है जो सरकारी खरीद पर पल रहा है। मजेदार बात यह है कि हिन्दी प्रेस में उसके किस्से प्रकाशित नहीं होते।
     हिन्दी के एक सबसे बड़े प्रकाशन समूह की विशेषता है कि वह अधिकांश लेखकों को रॉयल्टी नहीं देता,पैसे लेकर किताबें छापता है। आश्चर्य की बात है कि इस पर कभी प्रगतिशील आलोचकों को गुस्सा नहीं आता। कभी किसी समीक्षक ने उस महान प्रकाशक को किताब देने से मना नहीं किया। किसी लेखक संगठन ने पारदर्शिता की मांग नहीं की।
    ‘नया ज्ञानोदय’ में एक घटिया प्रतिक्रिया पर बबाल करने वाले लेखकों की चेतना को इस प्रकाशन समूह की नव्य उदार तिकडमों और नीरा वाडिया टाइप हरकतों से कोई परेशानी क्यों नहीं होती  ? जबकि लेखक की रॉयल्टी खा जाना,किताब छापने के लिए पैसे मांगना ज्यादा गंभीर अपराध है और इसका प्रतिवाद किया जाना चाहिए। लेकिन मजाल है कि हमारे ज्ञानी-गुणी प्रगतिशील विद्वान कभी इस पर बोलें और बिलबिलाएं और कहें कि हम ऐसे प्रकाशक का एक लाख का इनाम नहीं लेंगे। उसे छापने के लिए किताब नहीं देंगे।  मजेदार बात यह है लेखकों के माल पर डाका डालने वाला ही लेखकों का रहबर बना हुआ है,इसी संदर्भ में हम देखें तो पाएंगे कि प्रकाशनजगत और समीक्षाजगत में हम नीरा राडिया के मार्ग पर चल पड़े हैं। यह बेहद दुखद और अपमानजनक स्थिति है।
     मैं निजी तौर पर ऐसे अनेक नामी लेखकों को जानता हूँ जिनकी पैसा लेकर किताबें छापने की जानकारी स्वयं मुझे उन्होंने दी । और यह भी कहा कि कभी भी एक पैसा रॉयल्टी का उस बड़े प्रकाशक ने नहीं दिया है । ऐसा नहीं है कि यह प्रकाशक सबका पैसा खा जाता है कुछ लेखकों-आलोचकों-प्रोफेसरों और नौकरशाहों को रॉयल्टी के बहाने पैसे खिलाता भी है। कुछ को रॉयल्टी भी देता होगा। लेकिन आमतौर पर इस बड़े प्रकाशक और उसके साथ जुड़ी साहित्य की नीरावाडिया (जन संपर्क टीम) टीम ने साहित्य में प्रायोजन और धंधे की महत्ता को स्थापित किया है। इस परंपरा का आरंभ बहुत पहले हो चुका था लेकिन आम लेखकों ने इसके खिलाफ कभी कुछ भी बोला नहीं है। ज्यादातर लेखक संगठन भी इस मामले में शांत हैं। वे ललचाई नजरों से देखते रहते हैं कि भाई हमें भी कुछ मिले, कुछ न सही हमारी पत्रिका का विशेषांक ही किताब के रूप में छापकर बेच दिया जाए इस प्रकाशक के जरिए। एक खास तरह की साहित्यिक फिक्सिंग कर दी गई है और इसमें अनेक नामी समीक्षक शामिल कर लिए गए हैं या वे स्वेच्छा से शामिल हो गए हैं।
    सुना है ‘आलोचना ’पत्रिका में कबीर पर लिखी पुरूषोत्तम अग्रवाल की आलोचना किताब पर कुछ खास प्रायोजित लेख आने वाले हैं। हमारी समस्या यह नहीं है कि कबीर पर जो किताब आयी है उस पर अनेक समीक्षकों को प्रायोजित ढ़ंग से क्यों लिखाया जा रहा है ,हमारी आपत्ति साहित्य के प्रायोजन पर है।
    साहित्य का प्रायोजन और फिर लक्ष्य को फिक्स करने की कला नीरा वाडिया कला है। इसका साहित्य की पहली और दूसरी परंपरा से कोई लेना-देना नहीं है। वैसे यह प्रकाशक प्रायोजित कला में माहिर है और उसके ही मेनीपुलेशन का खेल है कि दूरदर्शन के राष्ट्रीयचैनल से आने वाली समस्त पुस्तक समीक्षाओं में 80 प्रतिशत से ज्यादा इसी प्रकाशन ग्रुप के द्वारा प्रकाशित किताबों के रिव्यू नामवर सिंह करते हैं।
    नया खेल कबीर के नए अर्थ खोलने वाले पुरूषोत्तम अग्रवाल की किताब पर केन्द्रित प्रायोजित समीक्षाओं से जुड़ा है। कल मेरे एक साहित्यिक मित्र -शिक्षक और छात्र वेदरमण ने बताया आलोचना पत्रिका का पुरूषोत्तम अग्रवाल की किताब पर केन्द्रित अंक आने वाला है या आ गया है। खैर, जो भी हो, महत्वपूर्ण यह है कि अब समीक्षा की एक सामान्य किताब को महान किताब बनाने की मुहिम में हिन्दी के विद्वतजन जुट गए हैं। हम विनम्रता के साथ कहना चाहते हैं यह साहित्य में नीरा राडिया मार्ग पर जाना है,यह साहित्यालोचना के उत्थान की खबर नहीं है।
    इससे भी बड़ी समस्या है जिसका कायदे से नामवरसिंह जबाब दें कि कबीर जब इतने ही महान थे तो उन्होंने अपने जीवन में कबीर पर कोई शोधकार्य क्यों नहीं किया ? एक भी शोधपत्र क्यों नहीं लिखा ? स्वतंत्र भारत में बड़ी मुश्किलों से हिन्दी को मध्यकालीनता के जंजाल से हिन्दी के साहित्यकार छुड़ा पाए हैं अब अचानक कबीर पर लिखी  ‘अकथ कहानी प्रेम की’ किताब के बहाने वे हिन्दी को अतीत के अंधे कुए में ले जाना चाहते हैं। इससे वे किस महान लक्ष्य को हासिल करना चाहते हैं ?
   पुरूषोत्तम अग्रवाल बड़े हैं और सर्वोच्च सरकारी पद की शोभा बढ़ा रहे हैं ,वे चाहें तो उनकी सेवा में हिन्दी के अनेक बड़े लेखक कुछ भी लिख सकते हैं। वे जब तक इस पद पर हैं साहित्य के सारे बैल उनके खूंटे से बंधे रहेंगे।  लेकिन अचानक जिन आलोचकों और लेखकों को उनमें महान समीक्षक नजर आ रहा है उसके बारे में यही कहना है कि वह एक सामान्य अच्छी शोध है जो हर शोधार्थी करता है। इसमें महान जैसा कुछ नहीं है। कबीर उनके प्रिय हैं,उनकी पीएचडी के विषय भी हैं। यह सुंदर किताब है और इसमें कबीर पर सुंदर ढ़ंग से लिखा गया है।
     लेकिन विनम्रतापूर्वक कहना चाहेंगे इस किताब का भारत के,हिन्दी के सामयिक साहित्यिक सवालों,आलोचना की समस्याओं आदि से कोई लेना-देना नहीं है। यह किताब हिन्दी साहित्य में दलित साहित्य और स्त्री साहित्य को अपदस्थ करने और हाशिए पर डालने के बृहद प्रयास के तहत नीरा राडिया मार्गी तरीकों के जरिए प्रमोट की जा रही है।
    नामवर सिंह और उनकी भक्तमंडली एकबात का जबाब दे कि कबीर यदि इतने ही प्रासंगिक हैं तो जरा यह बताएं कि हिन्दी के आधुनिक कबीर नागार्जुन से लेकर केदारनाथ अग्रवाल,मुक्तिबोध, शमशेर,अज्ञेय आदि ने कभी कबीर पर क्यों नहीं लिखा ? स्वयं नामवर सिंह ने कोई किताब क्यों नहीं लिखी ? नव्य उदार दौर में मध्यकालीन कवियों की महत्ता का आख्यान क्या हमारे सामयिक साहित्यिक सवालों और समस्याओं का जबाब दे सकता है ? यदि ऐसा ही था तो भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर निराला तक किसी ने भी मध्यकालीन लेखकों का मार्ग क्यों नहीं पकड़ा ? मध्यकालीन कवियों के पास ही सामयिक साहित्यिक समस्याओं के समाधान थे तो हमें आधुनिककाल में नए विषयों और नए साहित्यिक नजरिए की खोज की ओर मुखातिब क्यों होना पड़ा ? जिन चार बड़े कवियों का हिन्दी में इस साल जन्मशती वर्ष मनाया जा रहा है उनमें से कोई भी कवि कबीर के मार्ग पर जाने को तैयार नहीं है और अचानक हिन्दी का एक समीक्षक आधुनिककाल के समस्त आलोचना पदबंधों का खिलंदडभाव से उपयोग करते हुए आलोचना में मध्यकाल में आधुनिककाल खोज लाया है। आलोचना का यह प्रगतिशील दृष्टिकोण नहीं है बल्कि नव्य उदार नजरिया है। इसका सामयिक मध्यकालीन भावबोध के नव्य उदार धार्मिक वातावरण से गहरा संबंध है।
   यह सच है पुरूषोत्तम अग्रवाल ने कबीर का सुंदर पुनर्मूल्यांकन किया है। लेकिन इस मूल्यांकन का आलोचना और रचना की सामयिक समस्याओं से कोई संबंध नहीं है। कबीर ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनके बारे में दलित विमर्श होगा,आधुनिकता विमर्श होगा,स्त्री विमर्श होगा,उत्तर आधुनिक विमर्श होगा। नए विमर्शों को खींचकर मध्यकाल में ले जाने की अपनी मुश्किलें हैं और इनसे समीक्षा कहीं नहीं पहुँची है।
    आलोचना वर्तमान से भविष्य की ओर जाती है। पुरूषोत्तम अग्रवाल की मुश्किल यह है कि उनकी समीक्षा वर्तमान से अतीत की ओर जाती है। उनके पास आधुनिक समीक्षा के पदबंध हैं और उनके अर्थ और भूमिकाएं वे वे मध्यकाल में खोज रहे हैं। मध्यकालीन कविता को तत्कालीन साहित्य समीक्षा की अवधारणाओं में खोजा जाना चाहिए। इस तरह की आलोचना को नीरा वाडिया की पदावली में साहित्यिक फिक्सिंग कहते हैं।
     मुश्किल यह है कि पुरूषोत्तम अग्रवाल मध्यकालीन आलोचना के पदबंधों में कम जाते हैं और आधुनिक आलोचना के पदबंधों और अवधारणाओं का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। मसलन- आधुनिकता,देशज,औपनिवेशिक, स्त्रीत्व,फैंटेसी,यूटोपिया,लोकवृत्त, उत्तर आधुनिकता, नस्ल,यूरो केन्द्रिकता,ओरिएंट आदि आधुनिक अवधारणाएं हैं इनका उदय और अर्थ वर्तमान या आधुनिक समाज से जुड़ा है। इसे मध्यकाल में ले जाकर लागू करना सही नहीं है। लेकिन अपने खिलंदडभाव में पुरूषोत्तम अग्रवाल ने यह काम खूब किया है।   
पुरूषोत्तम अग्रवाल की दूसरी बड़ी मुश्किल यह है कि वे बातें आधुनिक अवधारणाओं पर करना चाहते हैं लेकिन संदर्भ मध्यकाल का ऱखना चाहते हैं। आधुनिक अवधारणाओं पर मध्यकालीनता के आधार पर बातें करना वैसे ही ही है जैसे उत्तर आधुनिक कट एंड पेस्ट की पद्धति का इस्तेमाल करना।
    तीसरी मुश्किल है वे जाना चाहते हैं आधुनिकककाल में लेकिन जाएंगे मध्यकाल में से होकर । आधुनिक से आधुनिक की ओर की यात्रा तो सुनी थी थी लेकिन आधुनिक से मध्यकाल और फिर आधुनिककाल में लौटने के अतार्किक मार्ग से गुजरी कार रेस हम पहली बार देख रहे हैं। कम से कम रामचन्द्र शुक्ल,हजारीप्रसादद्विवेदी,राहुल सांकृत्यायन, पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, नंददुलारे बाजपेयी आदि की मध्यकालीन कवियों पर केन्द्रित किताबों में यह समस्या तो नहीं है कि आधुनिककाल की अवधारणाओं की रोशनी में मध्यकाल को देखो। वे मध्यकालीन कवि को तत्कालीन परिप्रेक्ष्य और अवधारणाओं की रोशनी में देखते हैं,वे मध्यकाल में आधुनिककाल खोजने नहीं जाते। मध्यकाल में आधुनिककाल की खोज करना अवैज्ञानिक आलोचना है। यह आलोचना का सब-वर्जन है। इस सब-वर्जन को प्रायोजित समीक्षाओं के जरिए वैधता प्रदान करने की कोशिश की जा रही है।
    अंत में, एक बात और कहनी है कि प्रायोजित समीक्षाओं से न तो महान समीक्षक-लेखक पैदा होता है और न महान समीक्षा। पुरूषोत्तम अग्रवाल कोई गुमनाम लेखक नहीं है। वह विगत 30 सालों से ज्यादा समय से मीडिया से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं में धुंधाधार लिखते रहे हैं। उनकी इस किताब के पहले भी कई किताबें आ चुकी हैं। सवाल यह है कि उनके लोक संघ सेवा आयोग के सदस्य बनाए जाने के बाद ही नामवर सिंह से लेकर अन्य दूसरे प्रशंसक समीक्षकों को पुरूषोत्तम अग्रवाल महान क्यों दिखने लगे हैं ? इसके पहले उनके किसी भी विचारवान लेख में इन लोगों को उल्लेखनीय दम नजर क्यों नहीं आया ? इससे पहले कभी हिन्दी आलोचकों और स्वयं नामवर सिंह ने पुरूषोत्तम अग्रवाल के लिखे निबंध या किताब पर जमकर लिखा क्यों नहीं ? यह कैसा आलोचकभाव है जिसके कारण अब पुरूषोत्तम अग्रवाल अचानक लोक संघ सेवा आयोग के सदस्य बनने के बाद महान दिखने लगे ! इसे समीक्षक की महत्ता नहीं पद की महत्ता कहना सही होगा। यह साहित्य में नीरा वाडिया मार्का साहित्यिक फिक्सिंग हैं। यह साहित्य में पकड़ो और लिखाओ का मार्ग है।





मंगलवार, 2 नवंबर 2010

मियाँ कबीर,तुम क्यों रोने लगे ?

मेरे एक दोस्त हैं सीताराम सिंह वे हमारे साथ जेएनयू में पढ़ते थे,वे रूसी भाषा में थे और मैं हिन्दी में था। वे स्वभाव से मधुर, बागी और बेहद क्रिएटिव हैं। अभी फेसबुक पर मिले और बोले कि पुरूषोत्तम अग्रवाल की किताब पढ़ रहा हूँ कबीर पर। मुझे उनकी बात पढ़कर एक सवाल सूझा कि लोग जिस बात को मानते नहीं है उसकी हिमायत में लिखते क्यूँ हैं ? इस प्रसंग में मुझे सआदत हसन मंटो याद आए और उनका कबीर पर लिखा एक वाकया याद आ रहा है। वाकया यूं है-
   ‘‘छपी हुई किताब के फ़रमे थे,जिनके छोटे-बड़े लिफ़ाफ़े बनाए जा रहे थे।
    कबीर का उधर से गुजर हुआ- उसने दो-तीन लिफ़ाफे उठाए और उन पर छपी हुई तहरीर पढ़कर उसकी आंखों में आंसू आ गए।
    लिफ़ाफ़े बनानेवाले ने हैरत से पूछाः ‘‘ मियाँ कबीर,तुम क्यों रोने लगे ? ’’
  कबीर ने जबाब दियाः ‘‘ इन कागजों पर भगत सूरदास की कविता छपी हुई है... लिफ़ाफ़े बनाकर इसकी बेइज़्ज़ती न करो।’’
लिफ़ाफ़े बनानेवाले ने हैरत से कहाः ‘‘जिसका नाम सूरदास है,वह भगत कभी नहीं हो सकता।’’
   कबीर ने ज़ारो-क़तार(फूट-फूटकर) रोना शुरू कर दिया। ’’
मैं सोचता हूँ कि पुरूषोत्तम अग्रवाल की कबीर पर किताब और उनकी लोकसेवा को देखकर कबीर फूट-फूटकर रो रहे होंगे।  जीवन और कर्म में इतनी बड़ी फांक कबीर झेल नहीं सकते।   




बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

स्त्री संस्कृति का जादुई संसार




    हजारों सालों बाद आज भी   औरत एक पहेली बनी हुई है। उसका शरीर,आचार, विचार, संभोग,जादू-टोना,प्रेम आदि सभी के बारे में पंडितों में भयानक भ्रम बना हुआ है। हमारे भक्ति आंदोलन के विचारकों में एक हैं पुरूषोत्तम अग्रवाल उन्होंने अपनी किताब में कबीर के साहित्य में ‘शाश्वत स्त्रीत्व’ की खोज की है। सच यह है शाश्वत स्त्रीत्व जैसी कोई चीज नहीं होती। वे शाश्वत स्त्री की धारणा के आधार पर पुंसवादी तर्कों का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं। इसी तरह हमारे और भी अनेक विद्वान दोस्त हैं जो आए दिन औरतों के धार्मिक व्रत ,उपवास,पूजा-उपासना आदि को लेकर फब्तियां कसते रहते हैं कि औरतें तो स्वभावतः धार्मिक होती हैं,पिछड़ी होती हैं।
     ऐतिहासिक तौर पर देखे तो स्त्री उत्पादक शक्ति है। वह कृषि की जनक है। मानव सभ्यता के इतिहास में उसे कृषि उत्पादक के रूप में जाना जाता है। पुरानी मान्यता है कृषि कार्यों की पुरूष के पौरूष पर निर्भरता कम है ईश्वर पर निर्भरता ज्यादा है। कृषि के लिए वेदों में जितने मंत्र हैं उतने किसी अन्य कार्य के लिए नहीं हैं। भारत में जनजातियों के अनेक तीज-त्यौहारों का कृषि जीवन से गहरा संबंध है।
    यह एक ऐतिहासिक वास्तविकता है कि कृषि की धुरी औरत है और कृषि की निर्भरता मंत्र-तंत्र और पूजा पर है,जिसके कारण औरतों में जादुई संस्कार सहज ही चले आए हैं।  जो लोग कहते हैं जादू-टोने का आधार अज्ञान है उन्हें देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय का कथन याद रखना चाहिए। उन्होने लिखा है ‘‘ इसे केवल अज्ञान मानना भी गलत होगा, क्योंकि यह कर्म को निर्देशित करता है यद्यपि यह मनोवैज्ञानिक दिशानिर्देश होता है।कृषि के प्रारंभिक चरण में जब इस मनोवैज्ञानिक निर्देशक की सबसे अधिक आवश्यकता होती है,हम सहज ही देखते हैं कि जादू-टोने में विश्वास और इससे संबद्ध क्रियाओं में विचित्र तीव्रता आ जाती है।’’
     उन्होंने यह भी लिखा है कि ‘‘ कृषि की खोज स्त्रियों ने की थी तो यह तर्कसंगत ही है कि अपने मूलरूप में जादू-टोना स्त्रियों के कार्य-क्षेत्र में आना चाहिए।’’यही वजह है कि समस्त धार्मिक उत्सव पूरी तरह स्त्रियों पर निर्भर हैं।
    औरतों का कृषि पर ही प्रभाव नहीं पड़ा बल्कि उन्होंने चिन्तन के विभिन्न क्षेत्रों को भी प्रभावित किया। इनमें तंत्र प्रमुख है। भारत में स्त्रियों से प्रभावित वामाचार का पूरा सम्प्रदाय रहा है जिसने समूचे जीवन पर गहरा असर डाला है। वामाचार का आम तौर पर संस्कृत के विद्वानों ने गलत अर्थ लगाया है। शब्द है वामा और आचार। आचार का अर्थ है क्रिया या धार्मिक क्रिया। वामा का अर्थ है स्त्री या काम।  इस प्रकार वामाचार का अर्थ है स्त्री और काम के अनुष्ठान।
     भारत में जो लोग स्त्री की स्वायत्त पहचान बनाना चाहते हैं। स्त्री की परंपरा और स्त्री संस्कृति का अध्ययन करना चाहते हैं उन्हें तंत्र और वामाचार का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए। तंत्र में स्त्री को काफी महत्व दिया गया है। वामाचारी स्त्री को प्रसन्न रखने की कोशिश करते थे और इसके लिए स्त्री का रूप भी धारण करते थे। तंत्र में ऐसे अनेक अनुष्ठान हैं जिनका सीधे संबंध स्त्री से है।
       कबीर के अंदर पुरूषोत्तम अग्रवाल ने नारी के भाव को खोजा है। उन्होंने लिखा है ‘‘कबीर की महत्ता इस बात में है कि वे कम से कम कविता के क्षणों में तो शाश्वत स्त्रीत्व को अपने आपमें व्यापने देते हैं।’’ इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि कबीर पर योगियों-नाथों-सिद्धों और तांत्रिकों का गहरा असर था। उन्होंने बड़ी मात्रा में तंत्र की धारणाओं का अपनी कविता में इस्तेमाल भी किया है। तंत्र की योगसाधना मूलतःमनोदैहिक क्रियाएं हैं। देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने इस पहलू की ओर ध्यान खींचा है। उन्होंने लिखा है कि योग क्रियाएं ‘‘ अपने अंदर नारीत्व का बोध कराने के उग्र प्रयत्न के अतिरिक्त और कुछ नहीं । अन्य शब्दों में यह मूल व्यक्तित्व और चेतना को एक स्त्री के व्यक्तित्व और चेतना में परिवर्तित करने के लिए एक तरह का प्रशिक्षण है। हमारे विद्वान इस बात को अभी तक नहीं पकड़ पाए हैं।’’
         बौद्धों से लेकर संस्कृत विद्वानों तक और देशज भाषाओं के रक्षक हिन्दी के पण्डितों तक योग में वर्णित नाडियों को लेकर जबर्दस्त भ्रम बना हुआ है। बाबा रामदेव जैसे लोग इसे स्नायुजाल बनाकर कसरत की दुकानदारी चला रहे हैं। सिर्फ एक ही उदाहरण काफी है। बौद्धों का एक मंत्र है ‘‘ ओम मणि पद्मे हुम’’ अर्थात ओम वह मणि जो पद्म में विराजमान है। इस मंत्र का बौद्ध प्रतिदिन जप करते हैं। लेकिन इसका असली अर्थ नहीं जानते। पद्म या कमल को तंत्रवाद में भग या योनि के अर्थ में लिया जाता है। पद्म इसका साहित्यिक नाम है। इसी तरह मणि का अर्थ बौद्धों में नाम है वज्र ,लेकिन तंत्र में कहते हैं पुरूष का लिंग। मणि इसका साहित्यिक नाम है। इसी तरह सुषुम्ना नाडी पर सात कमल नारीत्व के सात स्थान हैं।
   इसी तरह तंत्रवाद में त्रिकोण भग या योनि का प्रतीक है। इसके अलावा तंत्रों में सात शक्तियों जैसे कुलकुंडलिनी,वाणिनी,लाकिनी इत्यादि का उल्लेख किया है। प्रत्येक शक्ति एक-एक पद्म पर विराजमान है। मजेदार बात यह है कि वैष्णवों के सहजिया सम्प्रदाय में कुल कुंडलिनी शक्ति को राधा माना गया है यानी वह वैष्णवों का स्त्री सिद्धांत है। किंतु तंत्रवाद के निश्चित संदर्भ में ये सब अर्थ स्वीकार्य नहीं हैं। कायदे से सुषुम्ना आदि नाडियां स्त्री शक्ति और स्त्री संस्कृति की प्रतीक है। इसके अलावा वे किसी और रूप में स्वीकार्य नहीं हैं। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से स्त्री संस्कृति आरंभ होती है।
   हमारा यहां पर लक्ष्य योग के मंत्रों का विवेचन करना नहीं है। बल्कि उस बात की ओर ध्यान दिलाना है जिससे ये सारी चीजें परिचालित हैं। पुराना मंत्र है ,‘‘ वामा भूत्वा यजेत् परम ’’ अर्थात् स्वयं स्त्री बनकर प्रसन्न करो। यही वह आदि स्त्री सिद्धांत है जिससे कबीर प्रभावित हैं। इस प्रसंग में भंडारकर का मानना है कि ‘‘ तंत्रवाद के प्रत्येक निष्ठावान अनुयायी की महत्वाकांक्षा है कि वह त्रिपुरसुंदरी (तंत्रवाद में स्त्री सिद्धांत का एक ना) बन जाए । उसकी धार्मिक साधनाओं में से एक यह है कि वह स्वयं को एक स्त्री के रूप में समझने लगे। इस प्रकार शक्तिमत के अनुयायी अपने नाम को इस विश्वास के साथ उचित बताते हैं कि भगवान एक स्त्री रूप है और सभी का लक्ष्य एक स्त्री बनना होना चाहिए।’’
     कबीर के शाश्वत स्त्रीत्व बोध का एक और आयांम है जिसे मनोवैज्ञानिक आयाम कह सकते हैं। तंत्रवाद में योगसाधना का लक्ष्य कामोन्माद समाप्त करना नहीं है। यह कोई नपुंसकता की अवस्था भी नहीं है। बल्कि सच यह है कि योगसाधना के जरिए आंतरिक उन्माद,स्त्री उन्माद पैदा करना इसका लक्ष्य रहा है। वे पुरूषों में स्त्रीत्व जाग्रत करना चाहते थे। जो प्रत्येक पुरूष में होता है। नारीत्व को जाग्रत करके वे अपने अंदर के पुरूष को समाप्त कर देना चाहते थे। कामोन्माद को समाप्त करना उनका ध्येय नहीं था।बल्कि  आनंद उठाना लक्ष्य था।
     देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने लिखा है ‘‘ स्वयं को स्त्री रूप में परिवर्तित करने का सतत प्रयत्न या अपने अंदर सुप्त नारीत्व को जाग्रत करने का युक्तिसंगत उद्देश्य (चाहे वह कितना ही विचित्र हो) यह था कि प्रकृति की उत्पादन संबंधी गतिविधि को क्रियाशील बनाने के लिए सर्वोच्च महत्व के इन कामों को पूरा किया जाए।’’  













मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

कबीर की आंखें और आलोचना की रपटन

   कबीर पर पुरूषोत्तम अग्रवाल की किताब ‘अकथ कहानी प्रेम कीः कबीर की कविता और उनका समय’ (2009)निस्संदेह सुंदर किताब है। इस किताब में कबीर की कविता की तरह ही आधुनिक विषयों का रहस्यात्मक वर्णन है।
    कबीर बड़े लेखक हैं और कबीर पर लिखना मुश्किल काम है। पुरूषोत्तम अग्रवाल ने यह काम बहुत ही सुंदर ढ़ंग से किया है। लेकिन इस किताब को कबीर का रपटनभरा उत्तर आधुनिक पाठ कहें तो ज्यादा अच्छा होगा। लेखक की मुश्किल यह है कि वह बताना चाहता है कबीर के बारे में लेकिन चला कहीं और जाता है। विषय विशेष पर स्थिर होकर फोकस करने में यह किताब असफल रही है। कहने को कबीर के कवि की खोज करना और उसे प्रतिष्ठित करना लक्ष्य था लेकिन वह काम बहुत कम जगह पाता है। पहले पुरूषोत्तम अग्रवाल की पद्धति को ही देखें।
    कबीर को एक परिप्रेक्ष्य में समग्रता में देखने की बजाय विभिन्न परिप्रेक्ष्यों में एक ही साथ देखने की कोशिश की गयी है। ज्यादा से ज्यादा विषयों पर फोकस करने के चक्कर में समूची किताब उप-पाठों का पिटारा बनकर रह गयी है। और उप-पाठ भी विखंडित हैं। अधूरे हैं । और चलताऊ भाव से लिखे गए हैं। इस किताब में विलक्षण पद्धति का इस्तेमाल किया है। पाठक को यह समझने में कठिनाई आ सकती है कि लेखक आखिर किस नजरिए से देखना चाहता है ? लेखक का आलोचना की रपटन पर सरपट दौड़ने का प्रयास करना  और फिर रपटकर गिरना खटकता है। मूलतः इस किताब में कबीर संबंधी विभिन्न विषयों पर लिखे लेख हैं इनमें कबीर का युग कम आधुनिक युग ज्यादा व्यक्त हुआ है। कबीर के विद्वानों की बजाय आधुनिकशास्त्रों के विद्वानों और आधुनिक विषयों पर शब्द खर्च ज्यादा किए गए हैं। प्रत्येक अध्याय के आरंभ में उन उप पाठों की सूची दे दी गयी है जो अध्याय में समायोजित हैं। यह किताब संचार के तत्कालीन संदर्भ को एकदम स्पर्श नहीं करती।
    पुरूषोत्तम अग्रवाल की पद्धति है कि वे पहले समस्या बनाते हैं। फिर उसे रहस्य के आवरण से बाहर करते हैं,स्वाभाविक बनाते हैं,हठात उन्हें ख्याल आता है और विधा की ओर चले जाते हैं ,उन्हें कबीर की कविता की याद आ जाती है, साथ ही मूल्यविशेष को उठाते हैं,उसे समस्या बनाते हैं,फिर इतिहास में चले जाते हैं। इतिहास के द्वंद्व और बिडम्बनाओं में रपटते रहते हैं।उनके तरह-तरह के उदाहरण देते हैं। उनके लेखन में रपटन ज्यादा है स्थिर होकर सोचने का भाव कम है। इस समूची प्रक्रिया में लेखक ने सामाजिक समस्याओं की जटिलता की ओर ध्यान खींचा है साथ ही कविता,विचारधारा और कबीर के वि-रहस्यीकरण का काम किया है। वे कबीर के समाज की समस्याओं के बहाने आज के समाज की समस्याओं पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करते हैं।
   पुरूषोतम अग्रवाल  ने कबीर के आलोचकों को निशाने पर रखा है,उनकी आलोचना की है लेकिन अंत में उसी आलोचना दृष्टि को घुमा-फिराकर वैधता प्रदान की है। कबीर को पढ़ने का पुरूषोत्तम अग्रवाल का तरीका उत्तर आधुनिक है। वह उत्तर आधुनिकों की तरह उन बिंदुओं पर जाते हैं जहां पहले वाले आलोचक गए थे। वे बार-बार बताते हैं कि कबीर के फलां आलोचक या मध्यकाल के फलां आलोचक ने ऐसा लिखा है।  फलां ने कबीर के जमाने पर ऐसा लिखा है। इस क्रम में कबीर के भक्त समीक्षकों की समीक्षा सुंदर ढ़ंग से करते हैं। इस क्रम में वे कबीर को भगवान और अध्यात्म के चंगुल से छुड़ाने का प्रयास करते हैं। वे कबीर के पाठ को भक्ति का पाठ नहीं मानते,भगवान का पाठ नहीं मानते। वे कबीर का विश्लेषण करते हैं। उसे यथाशक्ति वस्तुगत बनाने की कोशिश करते हैं।
       कबीर की कविता महज कविता नहीं है। वह शब्दों का खेलमात्र नहीं है। बल्कि शब्दों में सांस्कृतिक पावरगेम चल रहा है। कबीर ने काव्यरचना महज स्वतःस्फूर्त्त भाव से नहीं की बल्कि उनकी कविता तत्कालीन पावरगेम का हिस्सा है। इस अर्थ में उसे महज शब्दार्थ वाली पद्धति से समझने में दिक्कत आती है। यही स्थिति अन्य भक्त कवियों की है। पुरूषोत्तम अग्रवाल की दिक्कतें यहीं पर हैं। कबीर और उनके समकालीनों के यहां आत्मगत भावों की अभिव्यक्ति के साथ-साथ पावरगेम का तानाबाना भी है। समस्या यह है कि क्या सामयिक पावरगेम से निकालकर किसी भी भक्त कवि को पढ़ा जा सकता है,किसी भी मध्यकालीन या प्राचीनयुगीन पाठ को पढ़ा जा सकता है ?
   एक अन्य समस्या है कबीर में व्यक्तिगत और आधुनिकभावबोध को खोजने की। इस मामले में कम्युनिकेशन के विकास की प्रक्रिया का सही ज्ञान ही हमें मदद कर सकता है। शब्दों के लिखने की कला के विकसित हो जाने के बाद लिखित शब्द व्यक्तिगत की अभिव्यक्ति करना बंद कर देते हैं। लेखक जब अपने युग के साथ मुठभेड़ करता है,संवाद करता है और शब्दों में लिखता है तो उसके निजी की अभिव्यक्ति नहीं होती,वह सामाजिक की अभिव्यक्ति करता है। वह अपने निजी को सामाजिक में स्थानान्तरित कर देता है। हमारे हिन्दी के अधिकांश आलोचक यह मानते हैं कि भक्ति आंदोलन के कवियों के यहां व्यक्तिगत बड़ी मात्रा में है। वे लेखन के युग के आने के साथ ही शब्द में से निज के सामाजिक हो जाने की प्रक्रिया की अनदेखी करते हैं और यह कमजोरी पुरूषोत्तम अग्रवाल की किताब में भी है।
वाचिक युग में शब्द अपनी मनमानी क्रीड़ा करते हैं लेकिन लेखन के युग में वे ऐसा नहीं कर पाते। कबीर का युग लेखन का युग है वाचन का युग नहीं है। इस दौर में कवि लिखता था। लिपिबद्ध करने की कला का विकास हो चुका था। अतः इस दौर की कविता में व्यक्त भावों को निजता के दायरे में नहीं रख सकते। वाचन के युग में शब्दों का अनियंत्रित खेल था, मनमानापन था। लेकिन लेखन के युग के आने के साथ यह मनमानापन खत्म हो जाता है। पहले विषय के अभिव्यक्त करने के लिए शब्दों की जरूरत होती थी लेकिन लेखन के युग में आने के बाद शब्द ही विषय बन गए। यही वजह है कबीर और अन्य कवियों के भाषिक प्रयोगों और उनकी व्याख्याओं पर बेशुमार ऊर्जा खर्च की गई है। वाचिक शब्द हमेशा जनता और यथार्थ से जुड़े रहते हैं। लेकिन लिखित शब्द के साथ ऐसा नहीं होता वहां अमूर्त्तन की स्थिति होती है। कबीर के यहां जिन्हें हम रहस्यपरक भाषिक प्रयोग मानते हैं उनका बुनियादी कारण है इस युग के कवियों का वाचन से लेखन के युग में पदार्पण। लिखित भाव में आते ही शब्दों के तर्कशास्त्र ,सिद्धांत और विश्लेषण का सिलसिला चल पड़ता है।
   कबीर की कविता की खूबी है कि वे शब्दों को सुनते नहीं हैं बल्कि देखते हैं। संस्कृति को सुनते नहीं  देखते हैं। इसके कारण ही वे कविता में मात्र भावों की अभिव्यक्ति नहीं करते बल्कि संस्कृति का विश्लेषण करते हैं । क्योंकि वे संस्कृति को सुनते नहीं हैं ,देखते हैं। इस क्रम में वे भाषा की त्रुटियों या भदेसभाषा में भी सहज रूप में चले जाते हैं कबीर के लिए संस्कृति की भाषा शिष्टभाषा नहीं है बल्कि वे जिस भाषा को देख रहे हैं वही है।
   कबीर की कविता की भाषा में विषय और व्यक्ति,शब्द, अर्थ और सामाजिक भूमिका और इससे भी ऊपर सामयिक जिंदगी की धुन का छंद हावी है। भक्ति आंदोलन के अधिकतर कवियों को भक्त कवि कहा जाता है वे कवि हैं ,भक्तकवि नहीं हैं। भक्त का संसार अलग है,कवि का संसार अलग है। ये दार्शनिक नहीं हैं, कवि हैं। भक्त भगवान की सुनता है कवि भगवान की नहीं सुनता। उपदेशक भगवान की सुनता है कवि नहीं सुनता। भक्ति आंदोलन के कवियों ने कानों से संस्कृति को नहीं सुना था आंखों से देखा था।
     संस्कृति को सुनना और देखना इन दोनों में बुनियादी अंतर होता है। संस्कृति को कानों से सुनने का अर्थ अनुकरण करना और संस्कृति को आंखों से देखने का अर्थ है अपने को अलग करना,पृथक करना। भक्ति आंदोलन के कवियों के द्वारा संस्कृति,जातिप्रथा,भेदभाव आदि बातों की जो काव्यालोचना मिलती है उसका कारण यह नहीं है उनके पास आधुनिकभावबोध था,बल्कि उसका प्रधान कारण है इन कवियों का संस्कृति को देखना। वे संस्कृति को आंखों से देख रहे थे। आंखों से देखने के कारण ही वे अपनी कविता में तमाम किस्म की सांस्कृतिक रूढ़ियों को आलोचनात्मक नजरिए से देखने में सफल रहते हैं। पुरूषोत्तम अग्रवाल के नजरिए की यही बुनियादी कमजोरी है कि वह लेखन के युग में शब्द और संस्कृति की प्रक्रिया में आए बुनियादी बदलावों को पकड़ने में असमर्थ रहे हैं।
    भक्ति आंदोलन के कवि सुनते नहीं हैं आंखों से देखते हैं। वे वाचिकयुग में नहीं हैं बल्कि लेखन के युग में आ गए हैं। यह प्रक्रिया आधुनिककाल और भक्तिकाल के बहुत पहले से भारत मे आरंभ हो गयी थी। भक्ति आंदोलन के कवि उस परंपरा का हिस्सा है। वे संस्कृति को आंखों से देखते हैं। हम भी संस्कृति को आंखों से देखें।
 
          





शनिवार, 18 सितंबर 2010

कबीर के बहाने नामवरसिंह का पुंसवादी खेल

    अभी एक पुराने सहपाठी ने सवाल किया था कि आखिरकार तुम नामवरजी के बारे में इतना तीखा क्यों लिख रहे हो ? मैंने कहा मैं किसी व्यक्तिगत शिकायत के कारण नहीं लिख रहा। वे अहर्निश आलोचना नहीं विज्ञापन कर रहे हैं और आलोचना को नष्ट कर रहे हैं। आलोचना के सम-सामयिक वातावरण को नष्ट कर रहे हैं। ऐसा नहीं है मैं पहलीबार उनके बारे में लिख रहा हूँ। पहले भी लिखा है लेकिन अब यह बेवयुग के लेखन है। नए परिप्रेक्ष्य का लेखन है।
    नामवर सिंह ने अब तक जो किया है उसका वस्तुगत आधार पर उनसे हिसाब लेने का वक्त आ गया है। इधर उन्होंने नए सिरे से कबीर के बहाने पुरूषोत्तम अग्रवाल की जिस तरह मार्केटिंग की है उसके विचारधारात्मक आयामों को समझने की जरूरत है। मजेदार बात यह है कि नामवर सिंह-पुरूषोत्तम अग्रवाल कबीर को नए सिरे साहित्य में प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। हमारा सवाल है  आज ऐसा क्या नया घटा है जिसके कारण उन्हें कबीर को दोबारा आलोचना का औजार बनाने की जरूरत पड़ गयी ?
    कबीर की पुनर्प्रतिष्ठा करके आखिरकार ये दोनों आलोचक क्या करना चाहते हैं ? कबीर के खेल में असल खेल क्या है ? किसकी उपेक्षा कर रहे हैं या किसकी कीमत पर कबीर को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं? मैं विनम्रता के साथ कहना चाहता हूँ कि कबीर के नाम पर आलोचना में स्त्री साहित्य और दलित साहित्य विरोधी पुंसवादी समीक्षाशास्त्र को नए कलेवर के साथ लाया जा रहा है।
     आज कबीर का युग नहीं है स्त्री साहित्य और दलित साहित्य का युग है।  कबीर-तुलसी-सूर आदि के बहाने हिन्दी आलोचना में पहली परंपरा और दूसरी परंपरा के आलोचक लंबे समय से पुंसवादी शास्त्र और पुंससाहित्य का प्रसार -प्रचार करते रहे हैं। इन लोगों से  सवाल किया जाना चाहिए कि कबीर के बहाने उनका राजनीतिक खेल क्या है ? आखिर इस आलोचना की मंशा और राजनीति क्या है ? कबीर के नाम पर ये साहित्य में किसकी राजनीति खेल रहे हैं ?
    बड़ी जद्दोजहद के बाद स्त्री साहित्य और दलित साहित्य केन्द्र में आया है। यह सब लोग जानते हैं कि स्त्री साहित्य को लेकर और स्त्री सवालों पर नामवर सिंह और दूसरी परंपरा के आलोचकों की राय अवैज्ञानिक रही है। स्त्री के बारे में गुरूवर नामवर सिंह क्या मानते हैं। इसका एक ही उदाहरण काफी है।
       नामवर सिंह की किताब ‘जमाने से दो दो हाथ’ में एक निबंध है ‘ मुक्त स्त्री की छद्म छबि’। इसका पहला वाक्य ही नामवर सिंह जैसे महापंडित के लिए अनुपयुक्त है। वैसे पूरी टिप्पणी उनके स्त्री संबंधी अवैज्ञानिक और पुंसवादी सोच का आदर्श नमूना है।
       नामवर सिंह ने लिखा है, ‘स्त्री-पुरूष संबंधों पर हम तीन दायरों में विचार कर सकते हैं। कानून ,समाज और परिवार।’ वे भूल ही गए स्त्री-पुरूष संबंधों पर इन तीन के आधार पर नहीं ‘लिंग’ के आधार पर विचार विमर्श हुआ है। स्त्री-पुरूष का मूल्यांकन गैर-लिंगीय आधार पर करने से गलत निष्कर्ष निकलेंगे और गलत समझ बनेगी।
    कानून में स्त्री-पुरूष संबंधों को लेकर क्या लिखा है यह नामवर सिंह नहीं जानते अथवा जानबूझकर गलतबयानी कर रहे हैं,कानून में विवाह संबंधी प्रावधान हैं,लेकिन विवाह को कानून ने स्त्री-पुरूष संबंधों का मूलाधार नहीं बनाया है। भारतीय कानून लिंगीय समानता के आधार पर स्त्री-पुरूष संबंधों पर विचार करता है। न कि विवाह के आधार पर।
    भारतीय कानून लंबे समय तक स्त्री विरोधी प्रावधानों से भरा था लेकिन विगत 60 सालों में औरतों के संघर्ष ने उसमें स्त्री अधिकारों के प्रति जो असंतुलन था उसे कम किया है। उसके पुंसवादी रूझान को तोड़ा है।
      स्त्री-पुरूष संबंध का मतलब शादी का संबंध नहीं है। स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में नामवर सिंह की समझ बेहद सीमित है। वे इस टिप्पणी में स्त्री-पुरूष संबंधों को शादी के संबंध में रिड्यूज करके देखते हैं। शादी में भी बहुविवाह या अवैध विवाह में रिड्यूज करके स्त्री-पुरूष संबंध को कानूनी नजरिए से देखते हैं, वे बात शुरू करते हैं स्त्री-पुरूष संबंधों की और अचानक शिफ्ट कर जाते हैं विवाह,बहुविवाह,अवैध संबधों पर और उसमें भी निम्न-मध्यवर्गीय पुंसवादी नैतिकता के नजरिए को व्यक्त करते हैं ,विवाह के साथ ही औरतों के बारे में नामवर सिंह की टिप्पणियां पुंसवाद को अभिव्यक्त करती हैं।
    नामवर सिंह ने लिखा है ,‘यह तो मानना ही होगा कि समलैंगिकता एक अपवाद है, कोई प्रचलन नहीं। वह चाहे पुरूष या स्त्री स्त्री के बीच हो,पर वह अप्राकृतिक है। साहित्य में इसे इसी रूप में आना चाहिए। कुछ अंग्रेजी लेखक पश्चिम के प्रभाव में इस अपवाद को ग्लोरिफाई करके सस्ती लोकप्रियता बटोरने की कोशिश कर रहे हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो मुझे स्त्रियों के अधिकारों को लेकर चल रहे आन्दोलनों का उद्देश्य समझ में नहीं आता। कहा जा रहा है कि स्त्रियाँ चूँकि अब कामकाजी हो गई हैं इसलिए वे उग्रता से अपने अधिकारों की मांग कर रही हैं। पर मुझे कोई यह तो बताए कि स्त्रियाँ कब कामकाजी नहीं थीं। यह अलग बात है कि पहले वे घरों में काम करती थीं ,अब दफ्तरों में करने लगी हैं। पर घरों का काम क्या दफ्तरों के काम से कम था। इससे भी बड़ी बात यह कि क्या घरों में काम करते हुए उनके अधिकार कम थे।’( जमाने से दो दो हाथ,पृ.123)
    नामवरसिंह जैसे प्रगतिशील विद्वान की उपरोक्त टिप्पणी स्वयं में इस बात का प्रमाण है कि उन्हें सेक्स ,परिवार और स्त्री के बारे में कितना कम और कितना गलत पता है। वरना कोई व्यक्ति इस तरह की टिप्पणी कैसे कर सकता है ‘क्या घरों में काम करते हुए उनके अधिकार क्या कम थे।’
    सच यह है कि आज भी घरों में औरतों के साथ दोयम दर्जे से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। हमारे घरों में औरतें आज भी अधिकारहीन हैं। इस बात को नामवर सिंह जानते हैं। औरतों के पास आज की तुलना में पहले भी घरों में अधिकार शून्य के बराबर थे, यदि ऐसा न होता तो औरतों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष ही नहीं करना पड़ता। घर वस्तुतःऔरत का कैदखाना है।
    यदि नामवरसिंह के अनुसार औरतों के पास पहले अधिकार थे तो बताएं वह कौन सा जमाना था जब अधिकार थे ? औरत अधिकारहीन थी,असमानता की शिकार थी, और आज भी है। यही वजह है कि आधुनिककाल में औरत के अधिकारों ,महिला संगठनों और संघर्षों का जन्म हुआ।
   इसी तरह समलैंगिकता पर भी नामवर सिंह अवैज्ञानिक बातें कह रहे हैं। समलैंगिकता स्वाभाविक आनंद है,मित्रता है। यह वैज्ञानिक सच है कि समलैंगिकता अस्वाभाविक नहीं है। वरना इस्मत चुगताई ‘लिहाफ’ जैसी महान समलैंगिक कहानी न लिखतीं। हिन्दी में आशा सहाय ‘एकाकिनी’ जैसा महान समलैंगिक उपन्यास नहीं लिख पातीं।
      नामवर सिंह की महिला आंदोलन के बारे में भ्रांत धारणा है। उनका मानना है कि महिला आंदोलन का सामाजिक परिणाम है पति-पत्नी में तलाक। महिला आंदोलन पर चलताऊ ढ़ंग से नामवर सिंह ने लिखा है ‘ इन आंदोलनों की खास बात यह थी कि पुरूषों ने स्त्रियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। बाद में गांधी के असहयोग आन्दोलन और मार्क्सवाद से प्रेरित समाजवादी आन्दोलनों में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यहाँ एक बात और कहना चाहूँगा कि पश्चिमी समाज में ऐसे आंदोलनों के अन्ततः क्या परिणाम निकले ? वहाँ हमारे समाज से अधिक तलाक होते हैं। और खासकर  सम्बंधों के मामले में वहाँ स्त्रियों का हमारे समाज से कहीं अधिक शोषण होता है। साहित्य में ये सब बातें प्रतिबिम्बित होती रही हैं। भारतीय साहित्य में स्त्री को हमेशा ही एक सम्मानित दर्जा दिया गया है। पति-पत्नी की मर्यादा का सभी लेखक निर्वाह करते आए हैं। निजी जीवन में कैसी भी स्थिति हो परन्तु साहित्य में उन्होंने पत्नी की गरिमा का ध्यान रखा है।’ (उपरोक्त,पृ.123-124)
    नामवर सिंह के अनुसार महिला आंदोलन की परिणति क्या है ? तलाक। साथ ही वे महिला आंदोलन की स्वतंत्र भूमिका और विकास को नहीं देखते बल्कि मर्दों के संघर्ष का हिस्सा मानते हैं। सच यह है कि महिला आंदोलन का परिप्रेक्ष्य  और मर्दों के द्वारा संचालित नवजागरण और समाजवादी आंदोलन के परिप्रेक्ष्य और सवालों में बुनियादी फर्क है।
     दूसरी महत्वपूर्ण भूल यह कि स्त्री का भारतीय परिवार में पश्चिम की तुलना में कम शोषण होता है। यह बात तथ्य और सत्य दोनों ही दृष्टियों से गलत है। इस बयान में भारतीय साहित्य में स्त्री के प्रति  जिस रवैय्ये की बात कही गयी है वह गलत है। भारतीय साहित्य की मूलधारा पुंसवादी है,वहां स्त्री का पुंसवादी परिप्रेक्ष्य में व्यापक चित्रण हुआ है। साहित्य में स्त्री साहित्य की भयानक उपेक्षा हुई है। स्त्री के पुंसवादी चित्रण जैसे पति-पत्नी की मर्यादा के पुंसवादी चित्रण को नामवरसिंह आदर्श चित्रण मानते हैं।  स्त्री के प्रति पुंसवादी नजरिए और स्त्री नजरिए में वे अंतर नहीं करते।




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