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शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

अस्मिता का पुनर्पाठ

          आदमी की निगाह का निर्धारक तत्व है वर्तमान। वह जब भी कोई चीज़,वस्तु,घटना , परंपरा,इतिहास या लिंग को देखता है तो वर्तमान के नज़रिएसे देखता है। सवाल यह है इंटरनेट या सूचना तकनीकी युग में औरत कोकैसे देखें ? इंटरनेट में लिंगबोध या लिंग जैसी कोई चीज़ नहीं होती। लिंगकी पहचान या स्त्री अस्मिता मूलत:प्रेस क्रांति के परिप्रेक्ष्य में निर्मित अवधारणा है। प्रेस क्रांति को ज्यों ज्यों अपदस्थ करते जाएँगे लिंगरहित अवस्था से जुड़ी समस्याओं में गुजरते जाएँगे। सवाल उठता है इंटरनेट युग या ऑनलाइन युगमें अस्मिता कैसेनिर्मित होती है ? हमारा आज भी अधिकांश समाज ग़ैर-इंटरनेट अवस्थामें जी रहा है, वहाँ ठीक से प्रेसक्रांति भी नहीं पहुँची है ऐसे में हमारे समाज में एक औरत में कई औरतों की इमेज और भाव-भंगिमाएँ सहज रूप मेंदेखी जा सकती हैं। मसलन्,जो लड़की इंटरनेट यूज़र है वह अतीत के स्त्रीमूल्यों से बुरी तरह बंधी है। जो पश्चिमी मूल्यों की क़ायल है वह दिमाग़ सेदहेज और संपत्ति के मोह में डूबी हुई है।तमाम क़िस्म के सामाजिकपरवर्जन में डूबी है।इसी तरह जो लड़की सूचना तकनीक का जमकरउपयोग कर रही है उनमें से अधिकांश की सामयिक राजनीति औरसमकालीन समस्याओं में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसी तरह नए बदलेमाहौल ने एक बड़ा परिवर्तन यह किया है कि उसने शिक्षित -अशिक्षितसभी क़िस्म की महिलाओं को मोबाइल से जोड़ दिया है।कम्युनिकेशन केलिहाज़ से यह लंबी छलाँग है। मोबाइल कम्युनिकेशन ने स्त्रीभेद औरउम्रभेद को एक ही झटके में ख़त्म कर दिया है। इसके कारण स्त्री के निजी और सार्वजनिक रूपों , बातों और संस्कारों में मूलगामी परिवर्तन हुआ है।

पहले स्त्री की कायिक मौजूदगी केन्द्र में थी लेकिन इंटरनेट-मोबाइल-एसएमएस ने स्त्री की भाषिक मौजूदगी को प्रमुख बना दिया है ।अब स्त्रीभाषा में मिलती है।पहले स्त्री के शरीर पर बहुत बातें हुई हैं, समूचाश्रृंगाररस स्त्री शरीर के ऊपर केन्द्रित है। लेकिन स्त्री की कायिक सत्ताका रीतिकाल के समापन के साथ पूँजीवाद ने नवीकरण किया है। पहलेसाहित्य में श्रृंगाररस थी जीवन में नहीं था । पूँजीवाद ने श्रृंगार कोवायवीयता बियावान से निकालकर भौतिक बनाया है ।

रैनेसां में स्त्री शरीर के सवाल केन्द्र में आते हैं।मध्यकाल में कविता में औरत का शरीर है जबकि रैनेसां में गद्य में औरत के शरीर कोरखा गया , कम्युनिकेशन और व्यापार के केन्द्र में स्त्री शरीर को रखा।यानी आधुनिककाल आते ही औरत को घर की चहारदीवारी से बाहरनिकाला गया।पहले की तुलना में औरत ने व्यापक सामाजिक स्थानबनाया । उसका बहुआयामी शोषण हुआ। नए श्रम विभाजन में औरत नेअपनी जगह बनायी। नए कम्युनिकेशन , नए सामाजिक बदलाव में औरतने सक्रिय भूमिका निभायी।ख़ासकर राजनीति और राजनीतिक अर्थशास्त्रके निर्माण महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। दिलचस्प बात यह है श्रृंगारऔरत करती थी लेकिन तय व्यवस्था ने किया। किसी महिला ने श्रृंगाररस पर नहीं लिखा। पुरूषों ने लिखा। इसी तरह सेक्स और उसका संबंधकैसा हो यह भी पुरूषों ने लिखा।कामसूत्र और श्रृंगार रस पर लिखा समूचाशास्त्र पुरूषों ने रचा। पुरूष माने व्यवस्था यह धारणा कई हज़ार सालों मेंनिर्मित हुई है। अब यह आदत बन गयी है। औरतों ने इन विषयों पर क्योंनहीं लिखा यह रहस्य बना हुआ है।जबकि उस ज़माने में औरतें जमकरलिख रही थीं।इसी तरह रैनेसां में स्त्री के सवाल केन्द्र में हैं लेकिन औरतेंचुप हैं ।औरतों की इस चुप्पी को जितना खोला जाएगा भिन्न क़िस्म केसवाल जन्म लेंगे।

मध्यकाल और रैनेसां में स्त्री को बाँधने, नियमित और नियंत्रित करनेके शास्त्र रचे गए।यह काम इकतरफ़ा और स्टीरियोटाइप ढंग से हुआफलत:स्त्री के तन,मन और अनुभूति को समाज सीमित रूप में ही जानपाया।औरत को इस क्रम में वैविध्यपूर्ण और मानवीय बनाने की बजायवायवीय-मिथकीय- रहस्यात्मक बना दिया।सच यह है मध्यकाल में पुरूष,औरत को बहुत कम जानता था।लेकिन आधुनिककाल में स्त्री के शरीर कीबजाय उसके सामाजिक अस्तित्व के सवाल जब उठे तो स्त्रीशरीर औरपुरूष के नज़रिए से मुक्ति का मार्ग निकला। स्त्री के बारे में , उसके मन,तन और सामाजिक कार्य व्यापार के बारे में सामाजिक सचेतनता बढी।कहने का आशय यह है कि तन के परे स्त्री के सामाजिक अस्तित्व केसवाल समाज और मीडिया में जितना स्थान घेरेंगे उतना ही स्त्रीताक़तवर बनेगी। स्त्री देह के सवाल पुरुष वर्चस्व को बनाए रखते हैं।जबकि स्त्री के सामाजिक अस्तित्व के सवालों पर संवाद और विमर्श सेमहिला सशक्तिकरण में इज़ाफ़ा होता है।

विगत चार दशकों के दौरान स्त्री अस्मिता की राजनीति साहित्यविमर्श के केन्द्र में है। क़ायदे से स्त्री अस्मिता को स्थिर अवधारणा के रूपमें देखने से बचना चाहिए। हिन्दी में अधिकांश लेखन स्त्री अस्मिता केस्थिर रूप से जुड़ा है। जबकि स्त्री अस्मिता को रूपान्तरित अवधारणा केरूप में देखना चाहिए। मसलन् एक स्त्री की अस्मिता सिर्फ़ स्त्री केविभिन्न रूपों में ही रूपान्तरित नहीं होती बल्कि अनेकबार वहलिंगातिक्रमण भी कर जाती है। मसलन् स्त्री अस्मिता या अस्मिता केस्थिर रूप के ज़रिए समलैंगिक या लेस्बियन अस्मिता को समझ ही नहींसकते। इसी तरह यदि मायावती-ममता -जयललिता आदि स्त्रियाँ जब राजनीति करती हैं तो वे मात्र स्त्री नहीं रह जातीं बल्कि उनकी राजनेता कीअस्मिता बन जाती है। यह वस्तुत: स्त्री अस्मिता का रूपान्तरित रूप है जोबेहद महत्वपूर्ण है। इसी तरह स्त्री और उच्च तकनीक के अन्तस्संबंधों सेजिस अस्मिता का निर्माण होता है वह स्त्री अस्मिता से भिन्न है। डोना हर्वेके अनुसार उच्च तकनीक के पैराडाइम में स्त्री या पुरूष का लिंगभेद ग़ायबहो जाता है, ऊँच -नीच, छोटेबडे का भेद ग़ायब हो जाता है। यहाँ पर तोज्ञान और राजनीति के परिप्रेक्ष्य में पहचान बनती है। हम डोना केनज़रिए से असहमत हैं,अंत: वे सही हैं,यह स्थिति नेट के प्रसंग में कम है, लेकिन कम्प्यूटर के संदर्भ में ज़्यादा है। नेट पर बडे पैमाने परस्त्रीविरोधी सामग्री है, बेवसाइट हैं।अभी तक सोशलमीडिया लेकर बेवसाइट तक स्त्री के लिए सुरक्षित स्थान नहीं है।वर्चुअल स्त्री के लिए समाज की ज़रूरत नहीं है लेकिन वास्तव औरत की दुनिया को समाज या समुदाय के बिना निर्मित नहीं कर सकते।वर्चुअल स्पेस में औरत नहीं उसकी इमेज मात्र रहती है। यह वास्तव स्त्री नहीं है।

रेमण्ड विलियम्स ने लिखा है मानवीय सांस्कृतिक गतिविधियों पर विचार करते समय सबसे बाधा यह है कि हम तात्कालिक और नियमित अनुभवों को निष्पन्न विचारों के साथ जोड़ देते हैं।इस क्रम में सारवान अतीत की ओर जाते हैं साथ ही सामयिक जीवन की ओर भी जाते हैं।इसमें संबंधो,संस्थानों और उन रूपों की ओर जाते हैं जिनमें सक्रिय हैं और रूपान्तरित कर रहे हैं,इस प्रक्रिया को निर्माण प्रक्रिया न कहकर समग्र कहना समीचीन होगा। इस नजरिए से देखें तो रोमांस,नौकरी ,शादी ,शिक्षा आदि कोई भी चीज जो अस्मिता को बनाती है वह तात्कालिक सामाजिक संरचनाओं और रूपों से निर्मित नहीं होती।मनुष्य सिर्फ तात्कालिक चीजों से ही नहीं बनता।बल्कि उसके निर्माण की प्रक्रिया सामाजिक अभ्यासों पर निर्भर है।सामाजिक अभ्यासों का निर्माण दीर्घकालिंक प्रक्रिया में होता है।इसलिए अस्मिता पर विचार करते समय इस पर सोचें कि उसके निर्माण के उपकरण कौन से हैं ॽ

सारी दुनिया में अस्मिता की अवधारणा को जनप्रिय बनाने और स्थापित करने में अमेरिकी समाजविज्ञानी-मनोशास्त्री जी.एच.मीड की बहुत बड़ी भूमिका है।भारत में अस्मिता के जिन उपकरणों का जो लोग इस्तेमाल करते हैं उनमें मीड के नजरिए के उपकरण जाने-अनजाने चले आए हैं।मसलन्, अस्मिता को व्यक्ति की सहजजात क्षमताओं को सामाजिक जीवन,आत्म-चेतना और आत्म-अभिव्यंजनाओं के साथ जोड़कर सामाजिक इतिहास का उत्पाद बनाकर पेश किया गया।इस तरह की वस्तुगत प्रस्तुतियों को संवेदनाओं के साथ जोड़कर पेश किया गया और यही अस्मिता का बुनियादी आधार है। सामान्यतौर पर अस्मिता की अवधारणा सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक रूपों के साथ निजी जगत की अभिव्यंजना है। मेरे लेखे अस्मिता निजी जीवन की भूमिकाओं सामाजिक परिणाम है।इसलिए अस्मिता को सामाजिक आचार-व्यवहार और अभ्यासों के जरिए ही समझा जा सकता है।अस्मिता का एक छोर जिस तरह सामाजिक अभ्यासों से जुड़ा है वहीं दूसरा छोर मनोजगत की संरचनाओं से जुड़ा है।मसलन् व्यक्ति अपनी देखभाल कैसे करता है,उसके प्रेरक कौन हैं,उसके इर्द-गिर्द जो घट रहा है उसके प्रति उसका किस तरह का रूख है,वह करीबी यथार्थ की कितनी देखभाल करता है।क्योंकि इन सबसे मिलकर ही मानवीय गतिविधियों का निर्माण होता है।मसलन्, निज के संदर्भ में अस्मिता नजर आती है,उसके हक नजर आते हैं ,जबकि अन्य के प्रति हम बेगाने बने रहते हैं तो इसे अस्मिता की अनुभूति नहीं कहेंगे।अस्मिता बनती है निजी और सामाजिक सरोकारों के साथ जुड़ने से।इसमें निजी जितना महत्वपूर्ण है,सामाजिक भी उतना ही महत्वपूर्ण है।हमें निजी तौर पर प्रभुत्व जितनी पीड़ित करता है सामाजिक तौर पर भी वह उतना ही पीड़ादायक होता है।इसलिए प्रभुत्व के सवाल निजी और सामाजिक दोनों ही धरातल पर हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं।अस्मिता सिर्फ निज की मुक्ति का प्रकल्प नहीं है बल्कि सामाजिक मुक्ति का प्रकल्प भी है।अस्मिता बनाम प्रभुत्व का अन्तर्विरोध एकायामी नहीं है बल्कि बहुआयामी है।अमूमन हिन्दी में अस्मिता एकायामी दिशा में गतिशील है इसलिए सामाजिक स्तर पर प्रभावहीन है।अस्मिता के सवाल सुविधा,आरक्षण आदि के ही सवाल नहीं हैं बल्कि अस्मिता के सवाल दीर्घकालिक अभ्यासों और सांस्थानिक रूपों को चुनौती देने के सवाल भी हैं।

सन् 1977 के बाद से अस्मिता विमर्श पर जितना लिखा गया है उतना किसी अन्य विषय पर नहीं लिखा गया है।यह स्थिति भारत की ही नहीं सारी दुनिया की है।भारत के संदर्भ में आपातकाल मूल रूप से पैराडाइम बदलता है। आपातकाल के बाद लोकतंत्र की रक्षा का सवाल सबसे बड़ा सवाल बन गया,लोकतंत्र हमारे देश की अस्मिता के पहचान का सबसे बड़ा रूप है,बाकी सारी अस्मिताएं इसके अधीन हैं या मातहत हैं। अस्मिता के सवाल लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य में उठाए जाने चाहिए। आपातकाल के बाद सबसे बड़ा परिवर्तन यही आया कि उसने पहले से चले आ रहे बहस के मुद्दों को सामाजिक क्षितिज से ठेलकर हाशिए पर डाल दिया और उन मुद्दों को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया जो लोकतंत्र से सीधे जुड़े हुए थे।लोकतंत्र बचेगा तो देश बचेगा,तमाम किस्म की अस्मिताएं भी बचेंगी।यही वह मूल प्रस्थान बिंदु है जिसके कारण विभिन्न क्षेत्रों में अस्मिता के सवाल उठे और उन पर व्यापकतौर पर लिखा गया।हिन्दी में दलित और स्त्री के संदर्भ में अस्मिता के सवाल ज्यादा उठे।

अस्मिता का कोई न मित्र है न शत्रु । अस्मिता की सारी आपत्तियां 'अन्याय' के खिलाफ हैं। 'अन्याय' के खिलाफ सामाजिक लामबंदी का उपकरण है अस्मिता। सवाल यह है अंत में अस्मिता किस बिंदु पर पहुँचती है ? क्या पुन: लौटकर अस्मिता की ओर लौटते हैं अथवा मानवता की ओर पहुँचते हैं।अस्मिता मूलत: राजनीतिक मंशा की देन है। अस्मिता पर राजनीति के बिना चर्चा संभव नहीं है। अस्मिता में निहित व्यक्तिगत और सामाजिक इच्छाओं को अभिव्यक्त किया है।अस्मिता विमर्श का इतिहास से गहरा संबंध है। इतिहास में जाए बिना इसका चित्रण और विवेचन संभव नहीं है।

अस्मिता विकल्प है। वह कभी स्वाभाविक नहीं होती। वह सामाजिक निर्मिति है।अस्मिता की धुरी है मनुष्य और मानवता।वह प्रतिस्पर्धी और बहुरूपी है। उसका दूसरा तत्व है भावुकता और सामाजिक तनाव। तीसरा , आत्महीनता। चौथा ,अस्मिता का सम-सामयिक फ्रेमवर्क । पांचवां , अस्मिता की राजनीति। अस्मिता विमर्श का सत्ता विमर्श के साथ गहरा संबंध है । छठा, अस्मिता विमर्श व्यक्तिवादी विमर्श है।अस्मिता विमर्श का इन दिनों जो रूप देखने में आ रहा है उसके दो प्रमुख आयाम है पहला है 'अन्याय' और दूसरा है ' इच्छापूर्त्ति'। सामाजिक-सांस्कृतिक रूपों में इन दो रूपों में अस्मिता का व्यापक उपभोग हो रहा है। अस्मिता विमर्श मूलत: उत्पादक है। सामाजिक शिरकत को बढ़ावा देती है। ध्यान रहे जाति,लिंग,नस्ल,त्वचा,धर्म आदि पर आधारित अस्मिता की सीमित भूमिका होती है। अस्मिता का मूलाधार है मानवता। मनुष्य ही प्रधान अस्मिता है। बाकी इसके मुखौटे हैं।

अस्मिता के फ्रेमवर्क में इन दिनों अनेक लेखक-लेखिकाओं की आत्मकथाएं आई हैं। अतः आत्मकथा के प्रमुख तत्वों को जानना बेहद जरूरी है।आत्मकथा का पहला तत्व है व्यक्तिगत अस्मिता और निर्वैयक्तिकता। आत्मकथा का दूसरा तत्व है उपस्थिति,वर्तमान और प्रस्तुति। रोलां बार्थ के शब्दों में आत्मकथा को उपन्यास के चरित्रों के माध्यम से व्यक्त होना चाहिए।आत्मकथा लिखते समय चिर-परिचित क्षेत्र हमेशा परेशान करते हैं। चिर-परिचित वातावरण समस्या पैदा करता है।दलितों की आत्मकथा को ही लें।इन आत्मकथाओं में चिर-परिचित यथार्थ है भारत की जाति समस्या। जाति समस्या लेखक को परेशान और उत्तेजित दोनों ही करती है। जातिप्रथा को करीब से जानने के कारण लेखक को इसके बारे में सटीक वर्णन ,विवरण और ब्यौरे तैयार करने में मदद मिली है। लेखक को जातिप्रथा की अनेक 'दरारें' नजर आती हैं। आत्मकथा में 'दरारों' की केन्द्रीय भूमिका होती है। 'दरारें' पुराने व्यक्तित्व की जगह नए व्यक्तित्व को सामने लाने का काम करती हैं। लेखक की जाति उत्पीड़न की पीड़ाएं जितनी बार व्यक्त होती हैं उतनी ही बार उसका नया रूप सामने आता है। पुराना रूप बदल जाता है। लेखक कहीं पर भी पुराने रूप को स्थापित करने का प्रयास नहीं करता। हमेशा नए रूप को सामने लाता है। पुराने रूप के साथ सामंजस्य बिठाने की बजाय 'दरारों' और 'अंतरालों' के बीच में से नए रूप में लेखक सामने आता है। रोलां बार्थ ने आत्मकथा के बारे में लिखा है आत्मकथा में आप स्वयं को नहीं देखते बल्कि इमेज को देखते हैं। अपनी आंखों को नहीं देखते। आत्मकथा लेखन हमेशा विचलनभरा होता है। विचलन के ऊबड़ खाबड़ पैरामीटर सर्किल बनाते हैं। इन रास्तों से गुजरने के बाद एक ही संदेश संप्रेषित होता है कि जिंदगी अर्थपूर्ण है।

आत्मकथा का केन्द्र बिंदु कौन सा है ? यह खोजने की जरूरत है।आत्मकथा में विश्वास सबसे बड़ी चीज है। आस्था के साथ लिखी आत्मकथा इमेज बनाती है। आत्मकथा में चित्रण के लिए चित्रण नहीं होता बल्कि प्रस्तुति पर जोर रहता है। आत्मकथा चिर-परिचित यथार्थ की प्रस्तुति होती है। प्रस्तुति में अंतराल ज्यादा साफ नजर आते हैं। क्योंकि आत्मकथा में समग्रता के तत्व का पालन नहीं होता।आत्मकथा में न्यूनतम अनुकरण, उद्धाटन ,विवरण और आख्यान होता है। आत्मकथा में नामों का जिक्र और नामों के साथ जुड़े अनुभवों का वर्णन होता है। फलत: आत्मकथा के दायरे में अनेक मील के पत्थर और पैरामीटर होते है। आत्मकथा भाषा प्रमुख है।वही आत्मकथा है। भाषा का संसार ही है जिसके कारण वह अपील करती है। आत्मकथा की भाषा में प्रस्तुति 'मैं' के अंत की घोषणा है। ''मैं'' संकेत मात्र होकर रह जाता है। भाषा सामूहिक प्रयासों से बनती है। आत्मकथा के 'मैं' का राजनीतिक - दार्शनिक चीजों में लोप हो जाता है। भाषाविज्ञान में लोप हो जाता है। आत्मकथा में '' मैं'' हमेशा घुला मिला होता है। आत्मकथा में जैसे 'तुम','वह','हम' होते हैं वैसे ही 'मैं' भी होता है। आत्मकथा में सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट दोनों एक हो जाते हैं। वक्ता और विषय एक हो जाते हैं।आत्मकथा का तीसरा प्रमुख तत्व है सुसंगत अनुभूति। जीवन के तथ्यों को सीधे बगैर किसी लाग-लपेट के अनुभूतियों के साथ पेश करना इसकी खूबी है। यहां तथ्यों को बगैर चासनी के पेश किया जाता है। बगैर किसी कृत्रिमता के पेश किया है। तथ्यों को अकृत्रिम भाव से पेश करना आत्मकथा का उत्तर आधुनिक फिनोमिना है। उत्तर आधुनिक आत्मकथा में अनिश्चितता,विचलन आदि को सहज ही देख सकते हैं। इसमें भाषा और विमर्श प्रभावशाली होते हैं।

आत्मकथा का पांचवां तत्व है छवि,काल्पनिक छवि और कल्पना। वाल्टर वूगीमैन के अनुसार '' वैध ज्ञान की पद्धति, कल्पना का अंत है।'' कहानी में शब्द,भाषा और भाषण चेतना निर्मित करते हैं। यथार्थ परिभाषित करते हैं। कल्पना के जरिए रूढिबद्धता से अपने को मुक्त करते हैं। अन्य किस्म का व्यक्तित्व निर्मित करते हैं। कल्पना के जरिए ही सामाजिक-साहित्यिक रूढियों को खारिज करने में मदद मिलती है। मनुष्य का रूपान्तरण होता है। यह रूपान्तरण सामंजस्य बिठाकर नहीं होता। व्यक्ति क्या है और व्यक्ति की क्या छवि बन रही है इन दोनों पर लेखक की नजर होती है,इसकी प्रस्तुति के दौरान लेखक रूढिबद्धता से बचने की कोशिश करता है। पूर्ण स्वतंत्रता और कल्पना का इस्तेमाल करता है। स्वतंत्रता और कल्पना के प्रयोग के कारण ही आत्मकथा ऊर्जा से भरी होती है। पढ़ने वालों के मन में ऊर्जा का संचार करती है। साहस और आस्था के साथ जोखिम उठाने की प्रेरणा देती है।

आत्मकथा का छठा तत्व है विमर्श,उद्धाटन और समापन। आत्मकथा में आत्म को उद्धाटित करने के लिए साहस की जरूरत होती है। अनेक लेखकों में साहस का अभाव होता है। आत्मविश्वास और साहस के बिना आत्मकथा लिखना संभव नहीं है। जो लेखन में जोखिम उठाते हैं और अपनी बात कहते हैं। वे अपना बोझ हलका करते हैं साथ ही समाज को भी खुली हवा में सांस लेने का मौका देते हैं।आत्म के बहाने लेखक लंबे समय से बंद कमरों को खोलता है। आत्मकथा में उद्धाटित करते समय लेखक डरता है, डरता है कि कहीं पकड़ा न जाऊँ ? अन्य के सामने नंगे खड़े होने का डर रहता है। यह शर्म और डर कहां से आता है ? असल में जो बौनेपन के शिकार होते हैं वे शर्माते हैं, डरते हैं। औसत बुद्धि के लेखक शर्माते और डरते हैं। इनमें से ज्यादातर रूढियों में जीते और तयशुदा मार्ग पर चलते हैं। 'क्लीचे' में जीते और बातें करते हैं।मजेदार बात यह है आत्मकथा में आत्म को बताना तो बहुत दूर की बात है लोग कहां जा रहे हैं यह तक साफतौर पर नहीं बताते। वे सामान्य सी चीज को बताने में डरते हैं, शरमाते हैं। उन्हें डर लगता है यदि अपनी बात बता देंगे तो पता नहीं क्या हो जाएगा। अमूमन हमें न बताने की आदत है। छिपाने की आदत है। छिपाना हमारी प्रकृत्ति है। जो छिपाया जा रहा है वह जितना महत्वपूर्ण है उतना ही वह भी महत्वपूर्ण है जो बताया जा रहा है। आत्मकथा को लिखने का मकसद होता है बंद अनुभूतियों को खोलना। छिपे हुए को सामने लाना। आत्मकथा के वातावरण को विभिन्न परिप्रेक्ष्य में देखना । निष्कर्ष निकालने से बचना।निष्कर्ष आत्मकथा को बंद गली में ले जाते हैं।आत्मकथा का मार्ग खुला होता है उसे निष्कर्ष के बहाने बंद करना आत्मकथा के मानकों की अवहेलना है। लेखन को इस बात से आंकना चाहिए कि आप कितना भूलते हैं और कितना क्षमा करते हैं। लेखन में अनुभवों की संभावनाओं का कभी अंत नहीं होता।







गुरुवार, 18 सितंबर 2014

वृन्दावन की विधवाएँ और पुंसवाद



हेमामालिनी ने वृन्दावन की विधवाओं के बारे में स्त्री विरोधी बयान देकर विधवाओं को आहत किया है।ये विधवाएँ हमारे समाज का आईना हैं और ये हमारी स्त्री विरोधी राजनीति का महाकाव्य भी हैं। वृन्दावन की विधवाएँ अभी तक बस नहीं पायी हैं। सोनिया गांधी से लेकर हेमामालिनी , इन्दिरा गांधी से लेकर अटलबिहारी वाजपेयी, कांग्रेस से लेकर जनवादी महिला समिति तक का समूचा विधवा प्रलाप हमारी राजनीति में प्रच्छन्न और प्रत्यक्षतौर पर सक्रिय पितृसत्तात्मक विचारधारा के वर्चस्व की अभिव्यक्ति करता है। केन्द्र से लेकर राज्य तक कई सरकारें आई और गईं लेकिन विधवाओं की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ। न तो किसी सांसद -विधायक विकासनिधि का इनके पुनर्वास के लिए इस्तेमाल हुआ और न विधवाओं तक विधवा पेंशन या बेकारीभत्ता का धन पहुँचा । 
   यह सोचने लायक बात है कि वृन्दावन में सैंकडों बेहद समृद्ध संत हैं लेकिन किसी ने दो मुट्ठी चावल से ज़्यादा की उनके लिए व्यवस्था नहीं की। आज़ादी के बाद लाखों लोगों को सरकार घर बनाकर दे चुकी है लेकिन इन विधवाओं के लिए घर बनाकर देने की किसी को चिन्ता नहीं है। यही हाल शैलानी पर्यटकों और नव-धनाढ्यवर्ग का है उसमें से भी कोई स्वयंसेवी सामने नहीं आया जो इन विधवाओं की हिफाज़त और ज़िन्दगी के बंदोबस्त के बारे में काम करता। कहने का अर्थ यह है कि विधवाएँ हमारे समाज में फ़ालतू और बेकार की चीज़ हैं। उनकी समाज हर स्तर पर उपेक्षा और अवहेलना करता रहा है,विधवाएँ बसायी जाएँ इसके लिए हमें स्त्री के प्रति अपना बुनियादी नज़रिया बदलने की ज़रुरत है। 
    राजनेताओं और मीडिया के लिए विधवाएँ इवेंट और बयान हैं।ये लोग भूल जाते हैं कि वे हाड़ -माँस की साक्षात स्त्री हैं, उनके पास दिलदिमाग है। वे नैतिकदृष्टि से बेहतरीन मानकों को जी रही हैं। वे स्वाभिमानी हैं। वे भिखारी और अनाथ नहीं हैं। वे संवेदनशील स्त्री हैं यह बात किसी के मन में क्यों नहीं आती? क्यों महिला संगठनों ने पहल करके इन विधवाओं के पुनर्वास के बारे में अभी तक कोई ठोस स्कीम लागू नहीं की ?
   विधवाएँ हमारे समाज की स्त्रीविरोधी तस्वीर का बर्बर पहलू है । इन औरतों की दुर्दशापूर्ण स्थिति को देखते हुए भी हम सब अनदेखी करते रहे हैं। विधवाओं को सहानुभूति की नहीं ठोस भौतिक मदद की ज़रुरत है। अधिकांश विधवाएँ बहुत ख़राब अवस्था में जीवन यापन कर रही हैं लेकिन केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक किसी का अभी तक ध्यान नहीं गया।इन विधवाओं की स्थिति यह है कि वे अपने दुखों को बोल नहीं सकतीं । अपने लिए हंगामा नहीं कर सकतीं।राजनीति नहीं कर सकतीं। वे जीवन से हार मानकर जिजीविषा के कारण किसी तरह जी रही हैं। उनको मदद करने वाले हाथ आगे क्यों नहीं आए यह प्रश्न अभी अनुत्तरित है। हम माँग करते हैं कि वृन्दावन की विधवाओं को तुरंत विधवापेंशन योजना के तहत पाँच हज़ार रुपया प्रतिमाह पेंशन दी जाय और मथुरा के सांसद और विधायक निधि फ़ण्ड और अन्य स्रोतों से मदद लेकर राज्य सरकार तुरंत उनके निवास के विधवा आश्रम बनाए। इन विधवाओं को मुफ़्त चिकित्सा ,बस और रेल से यात्रा के राष्ट्रीय पास उपलब्ध कराए जाएँ। 

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

फेसबुक और स्त्रीमुक्ति

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स्त्री अपनी पहचान अर्जित करे इसके लिए जरूरी है कि झूठी भावनाओं और लालसाओं से मुक्त होकर स्वयं को देखे। विभ्रमों से दूर रहे।

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स्त्री की मुक्ति का अर्थ है -स्त्रियों को आत्म-निर्णय का अधिकार होना चाहिए।

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औरत की स्वायत्तता की रक्षा के लिए उससे बात बात पर स्पष्टीकरण मांगना बंद करें।

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स्त्री की मुक्ति का मार्ग आरंभ होता है उसकी स्वायत्तता मानने से । हम उसे अपने अनुकूल ढालना बंद करें। स्त्री को अनुकूल ढालने का अर्थ है उसे मातहत बनाना।

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टीवी चैनल लगे हुए हैं कि समाज को बदलने के लिए क्या करें और पंडितलोग बता रहे हैं यह करो, यह न करो। समाज बदले इसके लिए पहली शर्त्त है कि औरत के जीवन में हस्तक्षेप बंद हो।

हर स्तर पर स्त्री पर समाज और परिवार का हस्तक्षेप सबसे बड़ी बाधा है। हमें स्त्री पर विश्वास करना चाहिए। उस पर संदेह करना छोडें। स्त्री को निषेध और हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।

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कथाकार रमेश उपाध्याय का सुझाव है कि- सबसे पहले हिंदी की स्त्री और स्त्री अंगों से सम्बंधित गालियों के खिलाफ जंग ज़रूरी है.

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भारतीय मनोदशा में जड़ जमाए हुए स्त्री के रूढ़बद्ध रूपों के खिलाफ जंग करने जरूरत है। इसमें सबसे जनप्रिय है रमणी , काली औरत, गोरी औरत,सुंदरी आदि।

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भारतीय मध्यकालीनबोध का आदर्शरूप है बातूनीपन। भारतीयलोग बात करने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे खूब बोलते हैं। तर्क करते हैं। लेकिन अधिकांश बातों को ठंड़े बस्ते में बंद कर देते हैं। हमें बातूनी भारतीय की जगह एक्शन वाले भारतीय की जरूरत है ,जो बात करें उसका पालन करें।

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ग्राम्य संस्कृति में अनेक स्त्रीविरोधी बातें हैं जो हमें संस्कारों में मिली हैं। उनमें से एक है कुलच्छनी लड़की की धारणा। उसे तरह तरह के तर्कों से शुचिता से जोड़ा गया। साथ ही अनेक किस्म की नैतिकता संबंधी मान्यताएं इस कुलच्छनी लड़की की धारणा में आरोपित करके लड़की के ऊपर थोप दी गयी हैं। जो ग्राम्यसमाज हमें कुलच्छनी लड़की की धारणा में बांधता है उसके क्षय की हम कामना करते हैं। लडकी कुलच्छनी नहीं होती।

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फेसबुक पर जो लोग आएदिन ग्राम्यसंस्कृति का महिमामंडन करते रहते हैं वे ग्राम्य संस्कृति में निहित कुसंस्कृति की हमेशा अनदेखी करते हैं। ग्राम्य संस्कृति की बल्गर कल्चर का आदर्श रूप है हलकट जवानी ,जलेबीबाई, चिकनी चमेली आदि के रूप में प्रचलित आइटम फिल्मी गाने। भोजपुरी आदि के लोकगीतों में कालांतर में आई वल्गर कल्चर को हिन्दी और भोजपुरी सिनेमा ने खूब भुनाया है। ये सारे हमारे ग्राम्यजीवन के पतन के सांस्कृतिक साक्ष्य भी हैं। इस तरह की प्रस्तुतियों ने स्त्री के भोग्यारूप को प्रतिष्ठा दिलायी है। स्त्री की वल्गर कल्चर का उपभोग अंततः मर्दानगी का नया पाठ रच रहा है।

लोककला के एक नहीं अनेकस्तर हैं। जैसे लोग होगें ,वैसे ही लोककला के स्तर भी होंगे। लोककला में इकसार जैसी चीज नहीं होती।इसलिए वह बदलती रही है। समाज में जितने सांस्कृतिक स्तर होगे के उतने ही लोककलाओं में भी स्तर होंगे। लोककला वल्गर संस्कृति का शिकार कब और किन सामाजिक समूहों के संपर्क और प्रभाव से हुआ है इसके अलग-अलग स्थानों के लिए अलग कारण हैं। लोकगीत किसी न किसी व्यक्ति की ही देन है। लोकसर्जक की प्रतिभा व्यक्तिगत होती है। उसमें समूह की भूमिका देखना सही नहीं होगा। जितने भी कला इतिहासकार हैं उन्होंने इस तथ्य को समानरूप से रेखांकित किया है। फलतः इसमें सर्जक व्यक्ति अनुभतियां और विचारधारा भी अभिव्यक्त हुई है।



हाउजर ने लोककला को कृषककला से अलगाया है। लिखा है- लेोककला जैसे कृषक कला के समरूप नहीं होती उसी तरह कस्बाई कला के भी समरूप नहीं होती। लोककला के सर्वाधिक उल्लेखनीय लक्षणों में एक शहरों और सांस्कृतिक केन्द्रों की कला से इसका वैपरीत्य है,यद्यपि सारतः यह गैर-शहरी कला है, लेकिन वह ऐसी कला नहीं जो शहरी होना चाहती है मगर हो नहीं सकती।... लोक कला हालांकि अपने आप शहरों,दरबारों और मठों में उत्पादित कला पर निर्भर करती है,पर कभी सचेतन रूप से, उद्देश्यपूर्वक या गुलाम ढ़ंग से उससे होड़ नहीं करती।हालांकि यह दोयमदर्जे की कला होती है।( कला का इतिहास दर्शन,पृ.258)



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भारतीय ग्राम्य मानसिकता है कि अपराध करो और भूल जाओ। मर्द अपराध करता है और समाज-परिवार लड़की से कहता है चुप रह,किसी से मत कहना,छोड़ जाने दे,भूल जा। दूसरी ओर अपराधी हाथ-पैर जोड़ने लगता है।रोने-बिसूरने लगता है। माफी चाहता है और कहता है भूल जाओ-माफ करो। इस मानसिकता ने अपराध की मानसिकता को सामाजिक समर्थन दिलाया है। अपराध की अनदेखी करने की आदत पैदा की है।

अपराध की अनदेखी अंततःअपराधी को अपराधी मनोदशा में बांधे रखती है। वह अपराध करना नहीं छोड़ता। स्त्री-संबंधी अपराधों को इसी कारण हल्के ढ़ंग से लिया जाता है।

आधुनिककाल आने के बाद स्त्री ने ज्योंही निर्ममता से पेश आना आरंभ किया और प्रतिवाद किया तो स्त्रीरक्षा के विभिन्न कानूनों का जन्म हुआ।

यह अचानक नहीं है कि पुराने जमाने में स्त्री हिंसा के खिलाफ कभी भी न तो कड़े कानून बने और न कभी हिंसकों को दण्डित किया गया। बल्कि स्त्री अपहरण को वीरता से विभूषित किया गया।

स्त्री को मर्द की जिन हरकतों से परेशानी होती है उनको सहन करने की शिक्षा हमारा समाज सदियों से देता रहा है और यह ग्रामीण समाज था ।अतःग्रामीण समाज में चली आ रही स्त्रीविरोधी मानसिकता को निशाना बनाने की जरूरत है।

नए मध्यवर्ग में मर्द की अनेक सामंतीदौर की कुप्रथाएं चली आई हैं। उनमें से एक है अपराध करो और भूल जाओ। औरत से कहा जाता है सहन करो और सो जाओ।

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स्त्री की सामाजिक और आर्थिक परनिर्भरता ने मर्दों के आतंक के खिलाफ स्त्री की लडाई को कमजोर किया है। इसके कारण औरत बेबस हुई है। औरत की बेबसी का आलम यह है कि यदि किसी लड़की के साथ किसी परिवारीजन के द्वारा बदतमीजी की हरकत की जाती है तो लड़की अपनी माँ से कहती है, पिता से नहीं। माँ कहती है तू चुप रह,वेबजह कलह होगी,सिर फूटेंगे,गोली चलेंगी,तेरी शादी-ब्याह का मसला भी उलझन में फंस जाएगा। यानी औरत को हमेशा अन्य की इज्जत की रक्षा दुहाई देकर अपनी इज्जत लुटने देने के लिए कहा जाता है। स्त्री के प्रति समाज का ग्राम्यबोध ही है जो औरत की इज्जत को इज्जत नहीं मानता ,मर्दों की इज्जत को इज्जत मानता है. परिवार,पंचायत,जाति,धर्म आदि सबकी इज्जत की रक्षा करने के नाम पर स्त्री की इज्जत को लूटा गया है।

स्त्री की इज्जत के सवाल हमें इसीलिए कभी उद्वेलित नहीं करते हम उनको बड़े बारीक -बारीक बहानों के जरिए टालते रहे हैं। स्त्री की इज्जत समाज की इज्जत है। समाज की इज्जत, स्त्री की इज्जत नहीं है। हमें ऐसे समाज से घिन आती है जो बहानों के जरिए स्त्री की इज्जत को हाशिए पर डालता रहा है। स्त्री की पूजा करने से हम बाज आएं ,उसकी इज्जत करना सीखें। स्त्री के प्रति पूजाभाव ग्राम्यबोध की देन है। स्त्री को इज्जत देना आधुनिकभावबोध से जुड़ा है।हम चाहते हैं स्त्री के प्रति चले आरहे ग्राम्यभावबोध का अंत हो।

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भारत में स्त्रियों पर बढ़ते हुए हमलों का एक वैचारिक पहलू धर्मनिरपेक्षता (कांग्रेस मार्का) और छद्म धर्मनिरपेक्षता (संघ परिवार-भाजपा मार्का) दो छोरों में बंधा हुआ है। धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हमने देश में कभी भी पितृसत्ता के बारे में सवाल ही खड़े नहीं किए। आज भी हम पुलिस,कानून,सरकार आदि की बातें कर रहे हैं पितृसत्ता की परतों को खोलने के लिए तैयार नहीं हैं। धर्मनिरपेक्षता के बारे में राजा राममोहन राय की धारणा असल में पितृसत्ता को बरकरार रखती है। उससे मुक्ति के बारे में हमने कभी सोचा ही नहीं। कम से कम स्त्री के नजरिए से हमने धर्मनिरपेक्षता पर कभी पुनर्विचार नहीं किया। यहांतक कि कम्युनिस्ट चिंतकों ने भी इस पहलू की उपेक्षा की है। क्योंकि मार्क्सवाद की आड़ में भी पितृसत्ता बनी रहती है। यही हाल संघ परिवार की विचारधारा का है वे तो पितृसत्ता के घृणिततम रूपों की भी हिमायत करते रहे हैं और औरत के बारे में हिटलर के विचारों का प्रचार करते रहे हैं। स्त्री पर हमले न हों इसके लिए जरूरी है पितृसत्ता का क्षय हो।उसके सभी रूपों के खिलाफ समझौताहीन दीर्घकालिक संघर्ष चलाया जाय।

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शहरों में गैर कानूनी गुजर बसर के वे इलाके भी देखे जाने चाहिए जिनको हम झुग्गी-झोंपडी के इलाके कहते हैं। ये समानान्तर इलाके हैं इनमें कानून का शासन नहीं चलता,यहां पर सामान्य नागरिक सुविधाएं भी नहीं हैं और ये समानान्तर अर्थव्यवस्था के बड़े क्षेत्र हैं। स्त्री पर शहरों में बढ़ते हमलों से लेकर तमाम किस्म के अवैध-धंधों के ये इलाके हैं,इन इलाकों में रहने वालों को दबंग किस्म के नेता-माफिया नियंत्रित करते हैं और ये वोटबैंक भी हैं। स्त्रियों पर हमले की घटनाएं इन इलाकों में रहने वाले मर्दों ने ज्यादा की हैं।



इसके अलावा शहरी मध्यवर्ग में जिनलोगों ने स्त्री को संपत्ति मानकर संबंध बनाए हैं वहां पर स्त्री पर हमले बढ़े हैं। स्त्री को निजी संपत्ति के रूप में देखने वालों में अच्छा-खासा तबका खाते-पीते मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग से आता है और स्त्री उत्पीडन का यह बड़ा सामाजिक क्षेत्र है। स्त्री स्वस्थ और सुखी रहे इसके लिए जरूरी है स्त्री को संपदा न समझा जाय और शादी-ब्याह में संपदा की मांग न की जाय।

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दिल्ली में आए दिन होने वाली बलात्कार की घटनाओं में जिन सामाजिक कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है उन पर कोई बात नहीं कर रहा।

दिल्ली में बड़े पैमाने पर माइग्रेटेड लोग गांवों से आ गए हैं और बड़े पैमाने पर गांवों को भी एनसीआर के दायरे में समेट लिया गया है। इसके कारण बडी मात्रा में गैर-शहरी जनता का एक अच्छा खासा असभ्य तबका शहरी संरचना में आ मिला है उसे महानगर की रौनक,उदारता,मूल्यबोध और आदतों का ज्ञान नहीं है और वह अपने पिछड़े भावबोध के साथ शहरी लोगों को खासतौर पर औरतों को औचक और असभ्यभाव से देखता है। इसी वर्ग में नशा करके चलने और शारीरिक हमले करने वालों की बड़ी संख्या पायी गयी है।

इसमें एकवर्ग वह भी है जो संपदा के लिहाज से मध्यवर्ग में आ गया है लेकिन सामाजिक चरित्र उसका ग्रामीण है और सामंती मूल्यों को जीता है। सामंती मूल्यबोध का घृणिततम रूप है स्त्री पर हमला।

सामंतों के लिए स्त्रियां कभी मनुष्य नहीं रही हैं। वे उनको मसलने की चीज समझते रहे हैं यही वजह है कि औरतों पर इन असभ्यों के हमले बढे हैं।

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

बलात्कारकांड ,सुभाष तोमर की मौत और फेसबुक पर उठे सवाल


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मीडिया कवरेज में जनता के असभ्य व्यवहार को कवरेज देकर भीड़ को उकसाया है। लाइव कवरेज के नाम पर अधिकांश टीवी चैनलों में संपादकीय नीति अनुपस्थित थी। मसलन् सरकारी संपत्ति तोड़ती भीड़ को कवरेज दिया।भीड़ में फांसी की मांग करने वालों को कवरेज देकर सही नहीं किया। टीवी पत्रकारों ने लगातार उत्तेजना पैदा करने का काम किया। पत्रकारों ने अपनी जिम्मेदारी को संयम के साथ नहीं निभाया। बलात्कार की घटना पर मीडिया ने उत्तेजना पैदा करने का काम करने जनता की अपूर्णीय क्षति की है। हाल ही में अमेरिका में 27 बच्चों की हत्या की घटना पर मीडिया ने वहां पर आम जनता को संयम बरतने और धैर्य से काम लेने की भूमिका अदा की। भारत में सामूहिक बलात्कार काड पर आम जनता को उत्तेजित करने से बचा जाना चाहिए। पहले से ही उत्तेजित भीड़ को भड़काया है।

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दैनिक हिन्दू अखबार ने लिखा है-यह रिपोर्ट उन सभी दावों को खारिज करती है जिनके जरिए आम आदमी पार्टी अपने नए तर्कशास्त्र गढ़ रही है।पढें रिपोर्ट-

A controversy raged on Wednesday over the cause of death of constable Subhash Tomar during violent demonstrations last Sunday with eyewitnesses and a government hospital claiming there were no injuries on his person while the post mortem report contradicted these versions.
The Delhi Police late in the evening released excerpts of report of the post mortem done by a Board of Doctors in the government-run Ram Manohar Lohia (RML) Hospital, where he died on Tuesday. 
Following contradictory versions, Delhi Police asked its Crime Branch to investigate the case in which murder charges have been invoked. 
“Myocardial infarction (cardiac arrest) and its complications that could be precipitated by multiple ante-mortem (before death) injuries to neck and chest produced by blunt force impact,” Additional Commissioner of Police (New Delhi) K.C. Dwivedi said quoting from the report as the cause of 47-year-old Tomar’s death. 
The Delhi Police statement came on a day when various claims emerged about the cause of Tomar’s death with two eyewitnesses claiming that they did not spot any injuries on his person when they tried to revive him after he collapsed near India Gate during violent protests against the gang-rape of a girl in a moving bus on December 16. 
To add to this, Medical Superintendent of RML Dr. T.S. Sidhu, said, there were “no major external injury marks except for some cuts and bruises. …In all our records, there are no severe internal injuries recorded but the post-mortem will tell everything.” 
Asked whether it was a case of cardiac arrest, Dr. Sidhu said, “I don’t know. That is not my comment. He came, he was in serious shock and we revived him. He came in a state of total collapse.” 
Yogendra, a journalism student, and his friend Paoline, who have rushed Tomar to the hospital, contradicted the police version that the constable was beaten up by protesters leading to his death. He fell down on his own, they said. 
Mr. Yogendra claimed, “I was at India Gate with a female friend who was injured. I saw one policeman who was running after protesters and then suddenly collapsing. We rushed towards him and some policemen were also there. Suddenly, policemen started running after other protesters. 
“So I rushed to a nearby PCR van. They took him to hospital. I also went in the same vehicle. I saw him in hospital and his body didn’t have any injuries. He wasn’t trampled by a mob, he wasn’t assaulted. The claims of police are false. I am surprised to hear that eight were arrested over Tomar’s death.” 

Ms. Paoline said she saw him falling down. “We removed his jacket and shoes. I asked whether he can hear me and then I asked him to breathe... He was sweating profusely and there were no injuries on his body. If we had not been there, he would have been dead on the spot,” she said. 
Tomar’s family refuted the eyewitness claims, saying he died after suffering injuries caused in the chaos. 
“My father died because of the chaos during the protests at India Gate. Protesters pushed him, they trampled upon him. He had internal injuries. The claims that he did not receive injuries are false,” Tomar’s son Aditya said. 
Tomar’s family claimed that the policeman did not have a history of heart problems. “Tomar was attacked by protesters. He did not suffer from any heart-related problems,” Tomar’s relative Naveen Chaudhary said. 
The post-mortem report said Tomar’s third, fourth and fifth ribs on left side had fractures and there was “mid-calibaculur bleeding” at several places. 
Police sources said effusion of blood was present in tissues and neck muscles and ante-mortem injuries were caused when the body suffered heavy blows from a blunt object. 
“He had a lot of injuries. His ribs had fractures. These multiple injuries aggravated his condition and led to cardiac arrest,” Mr. Dwivedi, the Additional Commissioner of Police, said. 
Asked whether after the post mortem report, police would initiate action against doctors at RML, Mr. Dwivedi said he has no comments to offer as investigations were with Crime Branch. “I can’t comment on doctors or eyewitness comments,” he said. 
Police have slapped murder charges in the case. Earlier, eight persons, including an activist of the Arvind Kejriwal-led Aam Aadmi Party (AAP) were arrested on Monday on charges of attempt to murder. 
Following the claims of the eyewitnesses, the AAP demanded sacking of Delhi Police Commissioner Neeraj Kumar alleging that police was misleading people by arresting eight “innocent youth” in connection with the incident. 
Mr. Kejriwal said Mr. Yogendra’s account was opposite of what police said. “Is police lying,” he asked. 
AAP chief spokesperson Manish Sisodia alleged police was “politicising” Tomar’s death to cover their mistakes and demanded that Mr. Kumar be sacked. 

“Delhi Police should have dealt with the matter with sensitivity and honoured the constable’s death. But, the police have politicised the death to cover their own mistakes. We feel that the Delhi Police are involved in a conspiracy. The Police Commissioner should be sacked,” he said. 
Meanwhile, the Home Ministry has announced an ex-gratia of Rs. 10 lakh to the next of kin of Tomar. 

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दिल्ली पुलिस के सिपाही सुभाष तोमर की मौत की वजहों को लेकर हो रहे अलग-अलग दावों से यह गुत्थी लगातार उलझती जा रही है। इस मामले में ताजा घटना यह है कि पुलिस ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के हवाले से दावा किया है कि मौत की वजह सीने पर लगी चोट है। चोट के बाद ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा जिससे उनकी मौत हुई। 
कायदे से इस रिपोर्ट के आने के बाद टीवी ट्रायल बंद कर दिए जाने चाहिए। अदालत को जांच करने दें और देश के अन्य मसले पर ध्यान दे मीडिया। इस प्रसंग में आम आदमी पार्टी के नेताओं का बार बार टीवी पर बहसों में उलझना अनेक सवाल खड़े करता है। अन्य दल इस मसले पर तकरीबन चुप हैं। 

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सुभाष यादव की हत्या के आरोप में पकड़े गए आठों में 4 लोगों ने एनडीटीवी को बताया कि वे निर्दोष हैं और घटना के समय घटनास्थल पर नहीं थे। टीवी चैनल की इस तरह की प्रस्तुतियां अदालत के काम में हस्तक्षेप कही जा सकती हैं।

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दिल्ली पुलिस के पीआरओ भगत ने कहा कि कुछ भी कहना प्रिमेच्योर होगा। कमिश्नर ने सीधे कहा कि सुभाष के किन किन अंगों पर चोट लगी है।जीन्यूज के अनुसार यह अन्तर्विरोध गैंगरेप कांड से ध्यान हटाने की कोशिश है।

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यूपी में एक माह में ऑनलाइन के जरिए स्त्री उत्पीडन की 61 हजार शिकायतें आई हैं, इनमें14 हजार फोन पर अश्लील बातें करने की शिकायतें हैं। हाय रे भारतमाता। कैसे कुपूत हैं तेरे देश में।

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अजीब स्थिति है कि योगेन्द्र के बयान के साथ जीन्यूज ने अपनी पोजीशन रख दी है कि वे उसके बयान से सहमत नहीं हैं।

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दूसरी चश्मदीद पाओलीन ने कहा कि सुभाषतोमर लोगों को हटाने के चक्कर में पहुँचे उनके गिरते ही 2मिनट में पुलिस वाले पहुँच गए थे। एबीपी न्यूज का खुलासा।

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राममनोहर लोहिया अस्पताल के डाक्टर ने कहा है सुभाष तोमर के शरीर पर गंभीरचोट के निशान नहीं थे। एक्सरे में हड्डी टूटने वाली बात नहीं।

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सुभाष तोमर की मौत के बाद जिस तरह के अन्तर्विरोधी बयान आ रहे हैं उनके कारण सुभाष तोमर की निष्पक्ष-पेशेवर मेडीकल जांच कराकर तथ्यों को सरकार उजागर करे। हेडलाइन टुडे के अनुसार अभी तक दिल्ली पुलिसकर्मियों ने सुभाष के परिवार को अपनी एकदिन की पगार सहायता के रूप में देने के लिए दो करोड़ रूपये एकत्रित किए हैं।

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एनडीटीवी इंडिया ने सुभाष तोमर की मौत के चश्मदीद गवाह की बातों पर यकीन कर लिया है और वह बार बार इस गवाह को पेश करके साफ कर देने पर आमादा है कि चश्मदीद गवाह का सत्य परमसत्य है।
आज सुबह भी उसे लाइव कवरेज के लिए इस्तेमाल किया गया। यह सीधे केजरीवाल एंड कंपनी द्वारा मीडिया उडान में पुलिस कवरेज को पछाड़कर बढ़त लेने या प्रौपेगैण्डा करने की योजना का अभिन्न अंग लगता है।

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एनडीटीवी पर चश्मदीद गवाह ने माना- " ये गिर गए वहां पर मैं इनको लेकर चला आया। " यह बात योगेन्द्र ने अस्पताल में उसी दिन कही थी। एनडीटीवी रिपोर्टर ने अभी पुलिस सूत्रों के हवाले कहा कि सुभाष तोमर को पीसीआर बैन अस्पताल लेकर गई।जबकि लड़के ने पहले कहा कि वो लेकर गया। यह उसने अपने बयान पहला झूठ बोला। अभी उसने ( योगेन्द्र) पलटा खाया और कहा कि पीसीआर बैन लेकर गयी।

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अफसोस यह है कि मीडिया से लेकर फेसबुक तक प्रबुद्धलोगों का एक वर्ग है जो सुभाष तोमर की मौत पर एक युवा की बातों को तोमर की मौत के संदर्भ में प्रमाण के रूप में पेश कर रहा है।

स्थिति की अतिरंजना का आलम यह है कि लोग गांधी को भी इस मौके पर याद कर रहे हैं। साथ ही सूचना के दुरूपयोग की संभावनाओं को एकसिरे से खारिज कर रहे हैं। आज के दौर में कैमरे के सामने किसी घटना विशेष के बारे जो व्यक्ति बोल रहा है और प्रमाणस्वरूप इमेजों को पेश कर रहा है। उसके बारे में कोई भी मूल्य निर्णय करना सही नहीं होगा। हो सकता है उस युवक का दावा तहकीकात में प्रमाणित ही न हो पाए।

होसकता है तहकीकात में पुलिस का दावा गलत साबित हो, लेकिन इसकी तहकीकात के लिए सबसे उपयुक्त स्थान अदालत है मीडिया नहीं।

जिस लड़के के पास ये प्रमाण हैं उन प्रमाणों को अपनी डिफेंस में वे लोग अदालत में पेश करें जो गिरफ्तार किए गए हैं।

मीडिया मेंउस लड़के का महाप्रमाण के रूप में आना सारे मसले को मीडिया तथ्य नें नहीं गॉसिप में बदल रहा है।

सुभाष तोमर के बेटे का बयान भी इस प्रसंग में देखें जिसमें वह बार बार कह रहा है कि उसके पिता को गहरी चोटें आई थीं। अफसोस है कि केजरीवाल एंड कंपनी के लोग इस कांड में धरे गए हैं, होसकता है पुलिस ने गलत लोगों को पकड़ा हो, यह भी हो सकता है सही लोग धरे गए हों, हमें उन पुलिस वालों के बयानों पर भी गौर करना होगा जिन्होंने इन 8 लोगों को मौके से पकड़ा है। अंततः फैसला मीडिया में नहीं अदालत में होगा गांधी या अन्य के विचारों की रोशनी में अदालत विचार नहीं करती, वहां ठोस प्रमाण की जरूरत होती है मीडिया गॉसिप की नहीं।

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मीडिया को छेड़खानी का कवरेज देते समय स्त्री का फोटो दिखना से बचना चाहिए, उसे शोहदों के ऊपर केन्द्रित करना चाहिए। इस तरह के मसले पर ध्यान हटाने से भी बचने की जरूरत है शोहदों पर न्यूज का केन्द्रित होना जरूरी है। मुश्किल यह है कि टीवीवाले पुलिस-नेताओं को पीटने लगते हैं।इससे मूल मसले से ध्यान हट जाता है। पुलिस -नेताओं को पीटने से भी ज्यादा जरूरी है शोहदों को पीटना। हाल ही में बलात्कार कांड के खिलाफ जो आंदोलन कवरेज आया उसमें उन लोगों पर कम जानकारी आई जो अपराधी हैं।

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छेड़खानी हो या स्त्री उत्पीडन के अन्य रूप हों मीडिया को उनको व्यापक कवरेज देना चाहिए और अपराध में शामिल लोगों के चेहरे बार बार दिखाए जाने चाहिए और प्रत्येक चैनल को अपनी बेवसाइट पर मनचले शोहदों की स्वतंत्र सीरीज चलानी चाहिए।

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सुभाष तोमर की मौत पर एनडीटीवी पर टीवी ट्रायल चल रहा है। एक चश्मदीद गवाह आया है जो विस्तार से विवरण दे रहा है। कायदे से मौत के बाद इस तरह का ट्रायल सही नहीं है। पुलिस मुखिया नीरज कुमार ने कहा कि गरदन,पेट और सीने पर गहरी चोट लगी हैं। असल में यह फैसला अदालत करे टीवीवाले नहीं। यह अदालत के काम में हस्तक्षेप है और अनैतिक है।

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सिपाही सुभाष तोमर की मौत के बाद 8लोगों पर हत्या के केस लगाए गए हैं।

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दिल्ली पुलिस का महाझूठ कि रेप विरोधी आंदोलन की आड़ में आतंकी इंडियागेट पर हमला कर सकते हैं।

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तीन विदेशी कंपनियों के एरिया मैनेजर साकेत मॉल में लड़कियों के साथ छेड़खानी करतेहुए धरे गए।

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दिल्ली के बर्बर बलात्कारकांड ने कामकाजी महिलाओं के आत्मविश्वास को हिला दिया है। कवरेज में हिंसा पर नहीं न्याय और दण्ड पर जोर दिया जाना चाहिए।पढें इकोनॉमिक टाइम्स (24दिसम्बर 2012)-

The horrendous rape case in Delhi has not only shaken the confidence of working women in the National Capital Region (NCR) but also in other major cities, a survey has said.



Most of the respondents felt that it is the time the quality of governance should be improved and the obsession of the police "bandobast" with the VVIPs be changed, Assocham said in a survey.



"Majority of respondents, who are working in companies located in Gurgaon, Noida, Delhi, Sonepat and Faridabad, said they have begun insisting on leaving offices on dot, immediately after duty hours following the atmosphere of insecurity," it said.



After the brutal gang-rape of a 23-year-old girl in a moving bus about a week back, people in many parts of the country have been demanding quick justice for her and also to make stringent laws against rape cases.



"About 88 per cent of women respondents said the anxiety is more among the guardians of those women who travel by chartered buses," the survey said.



These respondents said that now they get more calls while at work from home -- parents or husbands -- after the incident, it added.



The chamber said that it surveyed about 2,500 women and men in various cities.



The survey said those who use the Delhi Metro feel relatively secure as long as they are within the premises of the metro stations.



However, they said the moment they deboard the train, their anxiety levels increase as the basic infrastructure from the stations to the colonies is found lacking.



The survey said majority of respondents feel that the deployment of more police personnels would be there for few days and after that everything will be back to usual, the survey said.



"It is not difficult to wire the major and vulnerable parts of the region with CCTVs, which should be properly monitored and action taken," Assocham Secretary General D S Rawat said.



The fear of law must be instilled among those who are prone to commit heinous crime, he added.



The chamber said that accountability must be fixed not among the junior functionaries but also among the higher-ups. Those found guilty of incompetence and complacency should be simply sacked. "The fear of losing job would work."



Besides, the survey said that if the confidence of workforce is shaken, the NCR would lose its eminent position among even investors.



The respondents also wanted companies human resource departments to devise new ways of ensuring increased staff security, especially among those who work on night duties, it said.

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

स्त्री संस्कृति का जादुई संसार


                                                   
        हजारों सालों बाद आज भी   औरत एक पहेली बनी हुई है। उसका शरीर,आचार, विचार, संभोग,जादू-टोना,प्रेम आदि सभी के बारे में पंडितों में भयानक भ्रम बना हुआ है। हमारे भक्ति आंदोलन के विचारकों में एक हैं पुरूषोत्तम अग्रवाल उन्होंने अपनी किताब में कबीर के साहित्य में ‘शाश्वत स्त्रीत्व’ की खोज की है। सच यह है शाश्वत स्त्रीत्व जैसी कोई चीज नहीं होती। वे शाश्वत स्त्री की धारणा के आधार पर पुंसवादी तर्कों का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं। इसी तरह हमारे और भी अनेक विद्वान दोस्त हैं जो आए दिन औरतों के धार्मिक व्रत ,उपवास,पूजा-उपासना आदि को लेकर फब्तियां कसते रहते हैं कि औरतें तो स्वभावतः धार्मिक होती हैं,पिछड़ी होती हैं।
     ऐतिहासिक तौर पर देखे तो स्त्री उत्पादक शक्ति है। वह कृषि की जनक है। मानव सभ्यता के इतिहास में उसे कृषि उत्पादक के रूप में जाना जाता है। पुरानी मान्यता है कृषि कार्यों की पुरूष के पौरूष पर निर्भरता कम है ईश्वर पर निर्भरता ज्यादा है। कृषि के लिए वेदों में जितने मंत्र हैं उतने किसी अन्य कार्य के लिए नहीं हैं। भारत में जनजातियों के अनेक तीज-त्यौहारों का कृषि जीवन से गहरा संबंध है।
    यह एक ऐतिहासिक वास्तविकता है कि कृषि की धुरी औरत है और कृषि की निर्भरता मंत्र-तंत्र और पूजा पर है,जिसके कारण औरतों में जादुई संस्कार सहज ही चले आए हैं।  जो लोग कहते हैं जादू-टोने का आधार अज्ञान है उन्हें देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय का कथन याद रखना चाहिए। उन्होने लिखा है ‘‘ इसे केवल अज्ञान मानना भी गलत होगा, क्योंकि यह कर्म को निर्देशित करता है यद्यपि यह मनोवैज्ञानिक दिशानिर्देश होता है।कृषि के प्रारंभिक चरण में जब इस मनोवैज्ञानिक निर्देशक की सबसे अधिक आवश्यकता होती है,हम सहज ही देखते हैं कि जादू-टोने में विश्वास और इससे संबद्ध क्रियाओं में विचित्र तीव्रता आ जाती है।’’
     उन्होंने यह भी लिखा है कि ‘‘ कृषि की खोज स्त्रियों ने की थी तो यह तर्कसंगत ही है कि अपने मूलरूप में जादू-टोना स्त्रियों के कार्य-क्षेत्र में आना चाहिए।’’यही वजह है कि समस्त धार्मिक उत्सव पूरी तरह स्त्रियों पर निर्भर हैं।
    औरतों का कृषि पर ही प्रभाव नहीं पड़ा बल्कि उन्होंने चिन्तन के विभिन्न क्षेत्रों को भी प्रभावित किया। इनमें तंत्र प्रमुख है। भारत में स्त्रियों से प्रभावित वामाचार का पूरा सम्प्रदाय रहा है जिसने समूचे जीवन पर गहरा असर डाला है। वामाचार का आम तौर पर संस्कृत के विद्वानों ने गलत अर्थ लगाया है। शब्द है वामा और आचार। आचार का अर्थ है क्रिया या धार्मिक क्रिया। वामा का अर्थ है स्त्री या काम।  इस प्रकार वामाचार का अर्थ है स्त्री और काम के अनुष्ठान।
     भारत में जो लोग स्त्री की स्वायत्त पहचान बनाना चाहते हैं। स्त्री की परंपरा और स्त्री संस्कृति का अध्ययन करना चाहते हैं उन्हें तंत्र और वामाचार का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए। तंत्र में स्त्री को काफी महत्व दिया गया है। वामाचारी स्त्री को प्रसन्न रखने की कोशिश करते थे और इसके लिए स्त्री का रूप भी धारण करते थे। तंत्र में ऐसे अनेक अनुष्ठान हैं जिनका सीधे संबंध स्त्री से है।
       कबीर के अंदर पुरूषोत्तम अग्रवाल ने नारी के भाव को खोजा है। उन्होंने लिखा है ‘‘कबीर की महत्ता इस बात में है कि वे कम से कम कविता के क्षणों में तो शाश्वत स्त्रीत्व को अपने आपमें व्यापने देते हैं।’’ इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि कबीर पर योगियों-नाथों-सिद्धों और तांत्रिकों का गहरा असर था। उन्होंने बड़ी मात्रा में तंत्र की धारणाओं का अपनी कविता में इस्तेमाल भी किया है। तंत्र की योगसाधना मूलतःमनोदैहिक क्रियाएं हैं। देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने इस पहलू की ओर ध्यान खींचा है। उन्होंने लिखा है कि योग क्रियाएं ‘‘ अपने अंदर नारीत्व का बोध कराने के उग्र प्रयत्न के अतिरिक्त और कुछ नहीं । अन्य शब्दों में यह मूल व्यक्तित्व और चेतना को एक स्त्री के व्यक्तित्व और चेतना में परिवर्तित करने के लिए एक तरह का प्रशिक्षण है। हमारे विद्वान इस बात को अभी तक नहीं पकड़ पाए हैं।’’
         बौद्धों से लेकर संस्कृत विद्वानों तक और देशज भाषाओं के रक्षक हिन्दी के पण्डितों तक योग में वर्णित नाडियों को लेकर जबर्दस्त भ्रम बना हुआ है। बाबा रामदेव जैसे लोग इसे स्नायुजाल बनाकर कसरत की दुकानदारी चला रहे हैं। सिर्फ एक ही उदाहरण काफी है। बौद्धों का एक मंत्र है ‘‘ ओम मणि पद्मे हुम’’ अर्थात ओम वह मणि जो पद्म में विराजमान है। इस मंत्र का बौद्ध प्रतिदिन जप करते हैं। लेकिन इसका असली अर्थ नहीं जानते। पद्म या कमल को तंत्रवाद में भग या योनि के अर्थ में लिया जाता है। पद्म इसका साहित्यिक नाम है। इसी तरह मणि का अर्थ बौद्धों में नाम है वज्र ,लेकिन तंत्र में कहते हैं पुरूष का लिंग। मणि इसका साहित्यिक नाम है। इसी तरह सुषुम्ना नाडी पर सात कमल नारीत्व के सात स्थान हैं।
   इसी तरह तंत्रवाद में त्रिकोण भग या योनि का प्रतीक है। इसके अलावा तंत्रों में सात शक्तियों जैसे कुलकुंडलिनी,वाणिनी,लाकिनी इत्यादि का उल्लेख किया है। प्रत्येक शक्ति एक-एक पद्म पर विराजमान है। मजेदार बात यह है कि वैष्णवों के सहजिया सम्प्रदाय में कुल कुंडलिनी शक्ति को राधा माना गया है यानी वह वैष्णवों का स्त्री सिद्धांत है। किंतु तंत्रवाद के निश्चित संदर्भ में ये सब अर्थ स्वीकार्य नहीं हैं। कायदे से सुषुम्ना आदि नाडियां स्त्री शक्ति और स्त्री संस्कृति की प्रतीक है। इसके अलावा वे किसी और रूप में स्वीकार्य नहीं हैं। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से स्त्री संस्कृति आरंभ होती है।
   हमारा यहां पर लक्ष्य योग के मंत्रों का विवेचन करना नहीं है। बल्कि उस बात की ओर ध्यान दिलाना है जिससे ये सारी चीजें परिचालित हैं। पुराना मंत्र है ,‘‘ वामा भूत्वा यजेत् परम ’’ अर्थात् स्वयं स्त्री बनकर प्रसन्न करो। यही वह आदि स्त्री सिद्धांत है जिससे कबीर प्रभावित हैं। इस प्रसंग में भंडारकर का मानना है कि ‘‘ तंत्रवाद के प्रत्येक निष्ठावान अनुयायी की महत्वाकांक्षा है कि वह त्रिपुरसुंदरी (तंत्रवाद में स्त्री सिद्धांत का एक ना) बन जाए । उसकी धार्मिक साधनाओं में से एक यह है कि वह स्वयं को एक स्त्री के रूप में समझने लगे। इस प्रकार शक्तिमत के अनुयायी अपने नाम को इस विश्वास के साथ उचित बताते हैं कि भगवान एक स्त्री रूप है और सभी का लक्ष्य एक स्त्री बनना होना चाहिए।’’
     कबीर के शाश्वत स्त्रीत्व बोध का एक और आयांम है जिसे मनोवैज्ञानिक आयाम कह सकते हैं। तंत्रवाद में योगसाधना का लक्ष्य कामोन्माद समाप्त करना नहीं है। यह कोई नपुंसकता की अवस्था भी नहीं है। बल्कि सच यह है कि योगसाधना के जरिए आंतरिक उन्माद,स्त्री उन्माद पैदा करना इसका लक्ष्य रहा है। वे पुरूषों में स्त्रीत्व जाग्रत करना चाहते थे। जो प्रत्येक पुरूष में होता है। नारीत्व को जाग्रत करके वे अपने अंदर के पुरूष को समाप्त कर देना चाहते थे। कामोन्माद को समाप्त करना उनका ध्येय नहीं था।बल्कि  आनंद उठाना लक्ष्य था।
     देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने लिखा है ‘‘ स्वयं को स्त्री रूप में परिवर्तित करने का सतत प्रयत्न या अपने अंदर सुप्त नारीत्व को जाग्रत करने का युक्तिसंगत उद्देश्य (चाहे वह कितना ही विचित्र हो) यह था कि प्रकृति की उत्पादन संबंधी गतिविधि को क्रियाशील बनाने के लिए सर्वोच्च महत्व के इन कामों को पूरा किया जाए।’’  











शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

आलोचना के कॉमनसेंस के प्रतिवाद में

हिंदी आलोचना में इनदिनों एकदम सन्नाटा है। इस सन्नाटे का प्रधान कारण है आलोचना सैद्धांतिकी, समसामयिक वास्तविकता और सही मुद्दे की समझ का अभाव। यह स्थिति सामाजिक यथार्थ और आलोचना सिद्धांतों के साथ अलगाव से पैदा हुई है। लेखक-आलोचक लिख रहे हैं लेकिन वे क्या लिख रहे हैं,क्यों लिख रहे हैं और जो लिख रहे हैं उसके साथ सामाजिक सच्चाई के साथ कोई मेल भी है या नहीं इस पर वे थोड़ा देर ठहरकर सोचने या सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। एक खासकिस्म की मानसिक व्याधी में लेखक और आलोचक दोनों फंस गए हैं। वे अपनी कह रहे हैं अन्य की सुन नहीं रहे हैं। वे सिर्फ अनुकूल को देख रहे हैं।

दूसरी बड़ी समस्या यह है कि आलोचकों ने अपडेटिंग बंद कर दी है। अधिकांश आलोचना निबंधों में आलोचना सैद्धांतिकी के नए प्रयोग नजर नहीं आते। लोग लिखने के नाम पर लिख रहे हैं।यह आलोचना में आया तदर्थभाव है। सारी दुनिया में आलोचना में जो लिखा-पढ़ा जा रहा है उसके साथ संवाद-विवाद,ग्रहण और अस्वीकार बंद है।सवाल उठता है हमारे आलोचक और लेखक यह क्यों कर रहे हैं ? वे किसी मसले पर बहस कर रहे हैं तो बहस के नाम पर बहस कर रहे हैं। वे किसी साहित्य सैद्धांतिकी के मानकों के आधार पर बहस नहीं कर रहे।

मैं यहां सुविधा के लिए स्त्रीसाहित्य के प्रसंग में कुछ नई बातों की ओर ध्यान खींचना चाहता हूँ। हमारे यहां स्त्री को विलक्षण और औचक भाव से देखा जाता है। यहां तक कि अकादमिक जगत में भी उन्हें दूसरे लोक का प्राणी मानकर व्यवहार किया जाता है। साहित्य की स्नातक और उससे ऊपर की कक्षाओं में 'फेमिनिज्म' या स्त्रीवादी साहित्य सिद्धांत नहीं पढ़ाए जाते। अकादमिक जगत में हम स्त्री के बारे में बातकरते हैं लेकिन उसके शास्त्र को पढ़ाने से परहेज करते हैं। युवा लड़कियां भी फेमिनिस्ट कहलाना पसंद नहीं करतीं। क्या फेमिनिज्म के बिना औरत की स्वायत्त सत्ता संभव है ? क्या फेमिनिस्ट कहलाना गलत है ? हिंदी में फेमिनिज्म गाली है। यह हमारे स्त्रीविरोधी सोच की अभिव्यंजना है।

आज औरतों के पास जितने अधिकार हैं उन्हें दिलाने में फेमिनिज्म और महिला आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन अधिकतर औरतें और आलोचक ,फेमिनिज्म के इस कर्ज के प्रति कृतज्ञता से पेश नहीं आते। वे स्त्री की उन परिस्थितियों को अस्वीकार नहीं करते जिनमें औरतें कष्ट और अपमान में रह रही हैं, और अपनी वास्तव स्त्रीचेतना से वंचित है। इस क्रम में औरतें समाज में हाशिए पर चली गयी हैं। अधिकतर औरतें अदृश्य रहना चाहती हैं। वे परिवार के निर्माण में अपनी भूमिका निभाना चाहती हैं लेकिन सामाजिक वातावरण में अपनी भूमिका नहीं निभाना चाहतीं। उनके व्यक्तित्व से नागरिक आयाम एकसिरे से गायब है। यह भी कह सकते हैं औरत की घरेलू अस्मिता ने उसकी नागरिकअस्मिता का अपहरण कर लिया है।

फेमिनिज्म की खूबी है कि वह औरत के आसपास बने हुए परंपरागत माहौल को खत्म करता है।उसके अंदर नागरिक अधिकारों की चेतना पैदा करता है। खासकर लोकतंत्र में फेमिनिज्म तो स्त्रीरक्षा का प्रभावशाली हथियार है। उल्लेखनीय है विभिन्न रंगत का फेमिनिज्म प्रचलन में है स्त्री अपनी सुविधा और समझ के आधार पर चुन सकती है कि वह किस तरह के फेमिनिस्ट नजरिए का पालन करे। फेमिनिज्म के बिना स्त्री अपनी अस्मिता का निर्माण नहीं कर सकती। स्त्री के लिए फेमिनिज्म एक नजरिया है और सामाजिक विकास की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है। हिन्दी की आयरनी है कि हमारे यहां स्त्री साहित्य है लेकिन फेमिनिस्ट कोई नहीं है। उलटे फेमिनिज्म से नफरत करनेवाले लेखक- लेखिकाएं -आलोचक मिल जाएंगे।

लोकतंत्र में स्त्रीअधिकार की आधारशिला है उसका स्वायत्त अस्तित्व।स्त्री को जब तक स्वायत्तता नहीं मिलती,स्वायत्त वातावरण नहीं मिलता। सारी कवायद बेकार है। स्त्री का अस्तित्व और स्वायत्तता ये उसके दो बुनियादी हक हैं। अभी औरत को हम महज सेवा करने वाली और बच्चा पैदा करने वाली के रूप में ही देखते हैं। हिन्दी की आलोचना में स्त्री को मातहत मानने का भाव जड़ें जमाए हुए है। स्त्री-पुरूष संबंधों में लोकतंत्र नहीं आया है। लेखिका और आलोचक के बीच के रिश्ते में भी लोकतंत्र दाखिल नहीं हुआ है। इन सब स्थानों पर पितृसत्ता का कब्जा बरकरार है। स्त्री को हम पुरूष की पूरक मानते हैं। उसकी स्वायत्त सत्ता को नहीं मानते।कुछ लोग स्त्री की स्वायत्त सत्ता मानते हैं तो उसे नागरिकचेतना और नागरिक अधिकारों के साथ जोड़ नहीं पाए हैं। स्त्री महज स्त्री नहीं है। वह नागरिक है। स्त्री को स्त्री की पहचान के साथ नागरिक की पहचान के रूप में देखने की आवश्यकता है। वह जेण्डर भी है और नागरिक भी है। लोकतंत्र में नागरिक की पहचान हासिल करना प्रधान लक्ष्य है।

इसके अलावा विभिन्न संस्थानों को भी लोकतंत्र का पाठ नए सिरे से पढ़ाने की आवश्यकता है। जिससे वे नागरिकअधिकारों और नागरिकचेतना के प्रति परिपक्वता से पेश आएं। नागरिक परिपक्वता पैदा करने के लिए नागरिक कानूनों की नए सिरे से पड़ताल की जानी चाहिए। जजों से लेकर सांसदो-विधायकों को नागरिकता का गहन प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। वे जानें कि नागरिक अधिकारों का मतलब क्या है ? सीमाएं क्या हैं ? प्राकृतिक नियम विधान और कानूनी नियम विधान की सीमाएं क्या हैं ? इस दिशा में पहले कदम के तौर पर स्त्री की इच्छा और अधिकारों का हम सम्मान करना सीखें, उस पर थोपना बंद करें।

स्त्री-पुरूष ये दोनों समाज में स्वायत्त इकाई हैं। इस बात को बुनियादी तौर पर मानें। लोकतंत्र का आरंभ नागरिक संबंधों से होता है और नागरिक संबंधों को नागरिक अधिकारों के जरिए संरक्षण प्राप्त है। ये नागरिक अधिकार पुरूष की तरह स्त्री को भी प्राप्त हैं। स्त्री-पुरूष के बीच में प्रेम रहे। दोनों एक-दूसरे की संवेदना,अनुभूति,शरीर और मूल्यों का सम्मान करें।

हमारे देश में लोकतंत्र है, संविधान में हक भी मिले हैं। लेकिन स्त्री-पुरूष एक-दूसरे का सम्मान नहीं करते। नागरिकता का उदय तब होता है ,जब हम सम्मान करते हैं। भिन्नता को स्वीकार करते हैं। भिन्न किस्म की धार्मिक ,राजनीतिक और सांस्कृतिक भावनाओं को स्वीकार करते हैं। नागरिक भावबोध पैदा करने लिए हमें स्त्री-पुरूष के प्राकृतिक अंतर को भी मानना पड़ेगा। इन दोनों की स्वायत्तता को भी मानना पड़ेगा।

लोकतंत्र में हक मिलते नहीं हैं।उनको हासिल करना पड़ता है। यह स्त्रीविवेक पर निर्भर करता है कि वह अपने अधिकारों के प्रति कितनी सजग है। स्त्री की सजगता के आधार पर यह भी देख सकते हैं कि वह अपने को दासता से किस हद तक मुक्त करना चाहती है। इसके लिए स्त्री को लिंग के दायरे से बाहर निकलकर नागरिक के दायरे में आना होगा। लिंगबोध का नागरिकबोध में रूपान्तरण करना होगा।

लिंगबोध ,स्त्रीदासता बनाए रखता है। जबकि नागरिकता का दायरा इस दासता से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। इससे स्त्री को अपनी प्राकृतिक पहचान को नागरिक अस्मिता में रूपान्तरित करने में मदद मिलती है। स्त्री जब तक स्त्री की इमेज में बंधी रहेगी उसे नागरिक समाज और नागरिक अधिकारों के साथ सामंजस्य बिठाने में असुविधा होगी। यह भी संभव है स्त्री अपनी प्राकृतिक जिंदगी को पूरी तरह त्यागे बिना नागरिक जिंदगी में प्रवेश करे। जिस तरह स्त्री के लिए वस्त्र जरूरी हैं वैसे ही नागरिक अधिकार भी जरूरी हैं। इसके लिए जरूरी है कि स्त्री-पुरूष में प्रेम हो। प्रेम के बिना सब बेकार है। यहां तक कि नागरिक अधिकार भी अर्थहीन हैं। परंपरा और धर्म भी अर्थहीन है। स्त्री की स्वायत्तता बचे इसके लिए स्त्री-पुरूष में प्रेम जरूरी है। स्त्रियों में आपसी प्रेम जरूरी है।

स्त्री के प्रति रवैय्या बदले इसके लिए जरूरी है कि हम उसे देखने का तरीका बदलें। स्त्रीचेतना का सामाजिक स्रोत हैं संस्थान। स्त्री के बारे में जब भी किसी विषय पर बात की जाए उसे संस्थान के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। स्त्रीचेतना का निर्धारण स्त्री कम और सामाजिक संस्थान ज्यादा करते हैं। मसलन् ,मध्यकाल में स्त्री पर विचार करना है तो मध्यकालीन संस्थानों से जोड़कर देखें। आधुनिक औरत पर बात करनी है तो आधुनिक संस्थानों की भूमिका के संदर्भ में विश्लेषित करें। संस्थान के चरित्र उदघाटन के बिना स्त्री अस्मिता का रहस्योदघाटन संभव नहीं है।

सवाल उठता है संस्थान किसे कहते हैं ? उनका काम क्या है ? संस्थान की केन्द्रीय भूमिका है शिरकत पैदा करने की। जैसे न्यायालय,संसद,विधानसभा आदि ये संस्थान हैं। इनमें कोई भी शिरकत कर सकता है। स्त्रीसाहित्य को संस्थानों की शिरकत वाली भूमिका से जोड़ने की जरूरत है। उसे संस्थान बनाने की जरूरत है। आज हमारे यहां साहित्य या स्त्रीसाहित्य को संस्थान के रूप में विश्लेषित नहीं करते बल्कि महज कम्युनिकेशन के रूप में विश्लेषित करते हैं। संस्थान के रूप में विश्लेषित करते तो फेमिनिज्म के प्रति अछूतभाव न होता।

सामान्यतौर पर स्त्री पर बात करते समय ,उसके लिखे पर बात करते समय हम स्त्री को लिंग की तरह नहीं देखते,उसकी राय को लिंग की राय के रूप में ग्रहण नहीं करते।बल्कि व्यक्तिगत राय के रूप में देखते हैं। इस तरह देखने का दुष्परिणाम यह निकला है कि स्त्री को,उसके विचारों को हाशिए पर डाल देते हैं। उसके स्वायत्त अस्तित्व और उसकी उपलब्धियों या सामाजिक भूमिका को सीमित करके पुंस वर्चस्व के अधीन बना देते हैं।

उल्लेखनीय है लिंगरहित पहचान की जितनी भी धारणाएं या संबंध हमारे समाज में प्रचलन में हैं उनके आधार पर स्त्री की सही समझ नहीं बनती। मसलन्, स्त्री को मनुष्य, निजी,व्यक्ति, बीबी,बहू,बेटी,बहन आदि के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इस तरह के सारे पदबंध स्त्री की लिंग की पहचान को छिपाते हैं,या उसकी उपेक्षा करते हैं। स्त्री को न्यूनतम स्पेस देते हैं। साथ ही इनमें किसी न किसी रूप में पुंसवादी संदर्भ निहित है और वह निर्णायक भूमिका अदा करता है। ये सभी पदबंध पुरूषसंहिता में निर्मित हैं। कायदे से हमें मर्द के सॉचे में ढ़लकर आई अवधारणाओं और स्त्री के साँचे में ढलकर आई अवधारणाओं में अंतर करना चाहिए।

बुनियादी बात यह है कि स्त्री को आज फेमिनिज्म के साथ अपना अलगाव या अछूतभाव खत्म करना होगा। पाठ्यक्रमों में फेमिनिज्म को सम्मानजनक दर्जा देना होगा।स्त्री को स्त्रीअस्मिता के बाहर ले जाकर नागरिक की पहचान के रूप में स्थापित करना होगा। नागरिक अधिकार ही हैं जो अस्मिता के अधिकारों को विस्तार देते हैं। ये बातें दलित अस्मिता की राजनीति पर भी लागू होती हैं।

एक अन्य सवाल है कि लेखक को कैसे पढ़ें ? इन दिनों लेखक को पढ़ने की पद्धति बदल गयी है। लेकिन हिन्दी में अधिकांश आलोचक अभी भी पुरानी शैली में पढते हैं। पाठ में अनेक जटिलताएं होती हैं। इसकी परिभाषा को लेकर भी व्यापक मतभेद हैं। इसके बावजूद सवाल यह है कि पाठ किसे कहते हैं ? पाठ अनेक संकेतों का समूह है। इको का मानना है शब्द ही पाठ है और पाठ ही शब्द है। लेकिन इनका असुरक्षित इतिहास है।पाठ के शब्दसंसार पर प्रतिक्रिया देने का अर्थ है नए अर्थ की खोज करना। सवाल यह नहीं है कि रचना को आप कृति कहते हैं या पाठ कहते हैं। सवाल यह है उसका क्या निश्चित अर्थ होता है ? क्या उसमें अनेक संभावित अर्थ होते हैं ? अथवा कोई अर्थ ही नहीं होता ?

इनदिनों पाठक के पास अपने समाज,संस्कृति,राजनीति आदि की व्यापक जानकारी है और वह इसके आधार पर विभिन्न पाठों को नए सिरे से खोलता है। पाठ के संदर्भ में बुनियादी मसला क्या है ? यहां पर स्त्री का पाठ बुनियादी मसला है। अतः पाठ को स्त्री के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। उसी संदर्भ में पाठ के अर्थ की खोज की जानी चाहिए। साथ ही यह भी देखना चाहिए कि कौन पढ़ रहा है ? स्त्री पढ़ रही है या मर्द पढ़ रहा है ? इससे यह भी पता चलेगा कि पाठ का अर्थ कौन ग्रहण कर रहा है ? कौन रोक रहा है ? कौन प्रतिवाद कर रहा है ? या कौन अर्थ को समायोजित कर रहा है। यानी पाठक की अस्मिता का पाठ के मूल्यांकन में महत्व होता है। अपनी अस्मिता के आधार पर ही वह अर्थ की खोज करता है।

पाठ का पाठक पर विखंडित असर पड़ता है जिसके आधार पर वह राय बनाता है। पाठ का पाठक पर असर ही नहीं पड़ता बल्कि मूल्यों और विचारधारा का भी असर पड़ता है। इसका भी असर पड़ेगा कि आखिरकार पाठक निजी तौर पर स्त्री,लिंग,सेक्स, कामुकता, नस्ल,रक्तसंबंध,वर्ग ,जातीयता आदि के बारे में किस तरह के मूल्यों को जानता और महसूस करता है। उसमें वह किन मूल्यों को घातक मानता है। यह भी संभव है किसी कृति या फिल्म में ऐसे मूल्यों का चित्रण किया गया हो जिनका पाठक की मूल्य संरचना के साथ अन्तर्विरोध हो, विवाद हो,पंगा हो,ऐसे में वह पाठ से असहमत भी हो सकता है। उल्लेखनीय है फिल्म का पाठ नहीं संकेत की धारणा के आधार पर मूल्यांकन किया जाना चाहिए। यह भी देखें संकेत को किन तत्वों के साथ सजाकर पेश किया है।

मसलन् आप किसी शिक्षक के पढ़ाने को ले सकते हैं। कक्षा में विभिन्न किस्म के छात्र होते हैं। इनकी मनोदशा भी भिन्न किस्म की होती है। वे पाठ और शिक्षक को एक ही तरह से ग्रहण नहीं करते। उनके ग्रहण का आधार होता है ,उनकी अपनी चेतना और रीडिंग आदतें होती हैं। जिस छात्र की किताब पढ़ने की आदत नहीं है और नोटस से काम चला लेता है ,उसके लिए वह शिक्षक मूल्यवान है जो नोटस लिखाता है या नोटस देता है। लेकिन जो छात्र किताब पढ़ने में दिलचस्पी रखता है उसके लिए वह शिक्षक मूल्यवान है जो किताब के सवालों को विभिन्न तरीकों से खोलकर पढ़ाता है। यानी छात्र की अस्मिता और चेतना यहां मूलतः निर्धारण का काम कर रही है।

एस .हाल ने रेखांकित किया है पाठ की रीडिंग में शरीर की अवस्थिति की बड़ी भूमिका होती है। मसलन् कब,कहां,किस समय,किस अवस्था में शरीर है। इसका पाठ की रीडिंग पर सीधा असर पड़ेगा। इसी प्रसंग में मिशेल फूको ने व्यक्ति के शरीर के नियमन और अनुशासित करने की प्रक्रियाओं को विस्तार से बताया है कि आधुनिककाल आने के बाद व्यक्ति के शरीर को किस तरह नए किस्म के अनुशासन ,आदतों,संस्कार और नियमों में बांधा गया।

एस. हाल का मानना है अस्मिता आंतरिक तत्वों से बनती है, बाह्य रिप्रजेंटेशन से नहीं। प्रत्येक व्यक्ति अपना आख्यान एवं प्रस्तुति स्वयं बनाता है। जिसमें उसका समाज झांकता है। वह समाज के सांस्कृतिक तत्वों के जरिए ही अस्मिता बनाता है फलतः व्यक्ति की अस्मिता सांस्कृतिक निर्मित होती है। उसमें बहुस्तरीय सामयिक विषय तैरते रहते हैं। जो चीज उसके सांस्कृतिक संदर्भ में आ जाती है उसका वह रूपान्तरण कर लेता है।

पाठ की व्याख्या की कई परंपराएं हैं। खासकर रैनेसां के साथ पाठ की सार्वभौम व्याख्याओं का जन्म होता है। सार्वभौम तुलनाओं का किया जाता है। सार्वभौम तुलना का अर्थ है कि प्रत्येक चीज,बात,व्यक्ति,घटना,विचार आदि अन्य से जुड़ा है। यानी अन्य तत्व उस तत्व की अभिव्यंजना है या अन्य किसी चीज की अंतर्वस्तु है। जब आप दो चीजों में तुलना करेंगे, एक-दूसरे के साथ जोड़कर देखेंगे तो व्याख्या के अनियंत्रित होने की संभावनाएं भी रहेगी।यहां अर्थ से अर्थ की ओर रूपान्तरण होगा। समानता से समानता की ओर स्थानान्तरण होगा। इस छोर का उस छोर के साथ संपर्क बनेगा। यानी एक से दूसरे की ओर स्थान्तरण होगा। यहां कोई कदम सुनिश्चित नहीं हो सकता। हिन्दी में अभी तक रैनेसांकालीन आलोचना पद्धति प्रचलन में है। इस पद्धति में अर्थ और तुलना दोनों के ही असीमित रूपों के उदय की संभावना निहित है। रैनेसांकालीन आलोचना की सीमा यह है कि वह किसी चीज की अनुपस्थिति या रूपान्तरणकारी अर्थ के बारे में नहीं बताती। यही वजह है हमारे यहां भारतेन्दु से लेकर छायावाद तक रैनेसांकालीन आलोचना को अपने रूपान्तरण के अर्थ का पता नहीं है। वे तो यह देखते हैं कि हर चीज एक-दूसरे से जुड़ी है और उसके आधार पर ही आलोचना के सारे मानक बने हैं।

रैनेसां जब आया तो स्थिति यह थी कि व्याख्याओं का ढ़ेर लग गया।गद्य की बाढ़ आ गयी। वस्तु,घटना, व्यक्ति,संवृत्ति,प्रवृत्ति आदि के बारे में हम ज्यादा जानने लगे। हम ज्यादा जानते हैं इसका अर्थ नहीं है कि हम सब कुछ जानते हैं। यही हाल रैनेसाकालीन लेखकों का था। वे जिन चीजों को जानते थे ,साथ में उनके कुछ आधार को भी जानते थे। वे जिस संदर्भ में लिख रहे थे उसकी क्षमता भी जानते थे। नयी आधुनिक व्यवस्था के संदर्भ में वे असीमित जान सकते थे। लेकिन प्रक्रियाएं सीमित ही थीं,उनका असीमित ज्ञान संभव नहीं था।

रैनेसां में आलोचना की जो पद्धति अपनायी गयी उसमें अर्थ की जडों को जानने का भाव है। उसके आधार पर व्याख्या करने की प्रवृत्ति मिलती है। लेकिन एक अवस्था या समय गुजर जाने के बाद लेखक और आलोचक यथास्थितिवाद में बंध जाता है,रूढ़िवाद में बंध जाता है और फिर उससे निकलने की छटपटाहट आरंभ हो जाती है। अभिव्यक्ति के फॉर्म और अंतर्वस्तु को बदलने की छटपटाहट आरंभ हो जाती है। फलतः एक ही समय में अनेक किस्म की प्रवृत्तियां और शैलियां सक्रिय नजर आती हैं। अब हर किस्म का संदर्भ और हर चीज से संबंध प्रासंगिक नजर आता है। प्रत्येक वस्तु के साथ संबंध स्वीकार्य हो जाता है।

मसलन्, भारतेन्दु के साहित्य के साथ सन् 1857 का संपर्क ,संबंध और असर मान लिया गया। नयी पूंजीवादी सभ्यता के विभिन्न रूपों के साथ संपर्क-संबंध भी मान लिया गया।प्रेस से संबंध मान लिया, धार्मिक-समाजसुधार आंदोलन,पुनरूत्थानवाद,ब्रजभाषा,खड़ीबोली हिन्दी,उर्दू,पुराने भक्ति आंदोलन आदि जो भी चीजें मिलती गयीं उससे संबंध जोड़ते चले गए। इनमें से प्रत्येक चीज को अन्य के साथ जोड़ा,अभिव्यक्ति रूपों के साथ जोड़ा। एक अभिव्यक्ति रूप को दूसरे के साथ जोड़ा। यानी प्रत्येक अंतर्वस्तु को अन्य अंतर्वस्तु की अभिव्यक्ति माना। ग्लोबल अंतर्वस्तु का भी विकास होता रहा।

रैनेसांकाल से आरंभ हुई अनंत समीक्षा की संभावनाओं ने अवधारणा और अर्थ की अनंत संभावनाओं के द्वार खोले हैं। इसे आलोचना की भाषा में विस्थापन कहते हैं। जब आप आलोचना करते हैं तो अनुगमन करते हैं ,विस्थापन करते हैं। देरिदा ने "ऑफ ग्रामोटॉलॉजी "में लिखा ,पाठ तो मशीन है उसमें अनंत विस्थापन निहित हैं।इसकी प्रकृति वसीयत के मर्म को समेटे होती है। यानी इसमें वसीयती भाव है । यही वजह है इतिहास,परंपरा आदि की खोज का काम आधुनिककाल में ज्यादा हुआ है। लेखक अपने को भक्ति आंदोलन,रैनेसां आदि के वारिस के रूप में पेश करने लगे हैं।

यह ऐसा दौर है जिसमें पाठ का आनंद लें या कष्ट उठाएं,उससे आगे निकलें,या उसे छोड़ें।प्रत्येक क्षण का अध्ययन करें। प्रत्येक संकेत या पाठ या प्रवृत्ति के उदय की प्रक्रिया पढ़ने लायक होती है साथ ही वो एक समय के बाद खो जाती है या नष्ट हो जाती है। वह अपने समय से संबंध बनाती है और एक अवस्था के बाद संबंध विच्छिन्न कर लेती है। देरिदा के नजरिए से यही बुनियादी तौर पर "ड्रिफ्ट" है।

पाठ की आलोचना में मंशा की अवधारणा की महत्वपूर्ण भूमिका है। अम्ब्रेतो इको ने इसी संदर्भ में लिखा है पाठ के पीछे निहित आत्मगत मंशा को जब अस्वीकार कर दिया जाता है तो पाठक की पाठ के प्रति वफादारी खत्म हो जाती है। फलतः उसकी भाषा बहुस्तरीय खेलों का आधार बन जाती है।यही वजह है पाठ में अंतिम अर्थ को शामिल नहीं किया जा सकता। यहां कोई रूपान्तरणकारी संकेतित अर्थ नहीं रह जाता। प्रत्येक संकेतक अन्य संकेतक के साथ युक्त नजर आता है। कोई भी चीज प्रासंगिकता के दायरे के बाहर नजर नहीं आती। आलोचना का काम है पाठ में अंतर्निहित अर्थ की खोज करना । उसे भिन्न लक्ष्य के साथ पेश करना। इस क्रम में आलोचना कॉमनसेंस के दायरे का अतिक्रमण कर जाती है।









मंगलवार, 8 मार्च 2011

तुर्कमेन समाज में महिला दिवस के अनुभव -सुधासिंह



    8 मार्च 2011 को विश्व महिला दिवस सारी दुनिया में मनाया जाता है। मैं यहां तुर्कमेनिस्तान की राजधानी अस्काबाद में विश्वभाषा संस्थान में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हूँ, नया विभाग खुला है, मेरी यह दूसरी विदेश यात्रा है,पांच महिने गुजर चुके हैं यहां पर। महिला दिवस पर इस देश का माहौल देखकर आश्चर्य हो रहा है और उसी अनुभव को मैं साझा करना चाहती हूँ। यह देश पहले समाजवादी सोवियत संघ का हिस्सा था। इन दिनों संप्रभु राष्ट्र है। बेहद सम्पन्न हैं यहां के लोग।
करीब पांच छः रोज पहले मेरी तुर्कमेन दोस्त शमशाद ने वायदा किया है कि वो इस दिन मुझसे मिलने आएगी और मुझे एक सरप्राइज गिफ़्ट( मेरी एक पेंटिंग) देगी। मुझे हठात् 8 मार्च का प्रसंग ध्यान नहीं आया तो उसने याद दिलाया कि मंगलवार को 8 मार्च है। तब तक मुझे उम्मीद नहीं थी कि 8 मार्च का दिन तुर्कमेनिस्तान में इस तरह बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। 6 मार्च से ही राष्ट्रीय चैनलों पर बार-बार बधाई संदेश दिखाया जा रहा है। महिला दिवस मुबारक हो। राष्ट्रपति ने सभी महिलाओं और देशवासियों को इस दिन की बधाई दी है। कल 8 मार्च को राष्ट्रीय अवकाश है।
आज 7 मार्च से ही सारे दिन 'यास्लिक' नाम के राष्ट्रीय चैनल पर महिलाओं के लिए तरह तरह के कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। इसमें सक्रिय सरकारी भागीदारी है। मैंने महिला दिवस पर ऐसा कोई दृश्य अन्य किसी चैनल पर नहीं देखा , इस कारण सुखद आश्चर्य हुआ।
     वैसे भी तुर्कमेनिस्तान उत्सवप्रिय देश है। उत्सवधर्मिता यहां के लोगों की रग़-रग़ में है, थोड़ा शर्माकर सुंदर तरीके से कहते भी हैं कि हमारे देश में उत्सव बहुत हैं। पर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर इस तरह का उत्सवपूर्ण आयोजन देखना बहुत ही प्रीतिकर है। आम तौर पर अन्य अंतर्राष्ट्रीय चैनल बहस और रिपोर्टें दिखाते हैं, महिलाओं की स्थिति का वैश्विक आकलन प्रस्तुत करते हैं उनमें उत्सवधर्मिता और उल्लास कहीं ग़ायब हो जाता है। मैं ये नहीं कह रही कि बहसों और आंकड़ों की जरुरत नहीं। इनकी जरूरत है, कांगो में बलात्कार का युद्ध के अस्त्र के रुप में इस्तेमाल, मध्य पूर्व के देशों में महिलाओं द्वारा हाल के जनांदोलनों में भागीदारी पर और इस तरह के अन्य मसलों पर बहस की जरूरत है।
      लेकिन उत्सव की तरह इस दिन को मनाए जाने का अपना रचनात्मक और प्रतीकात्मक महत्व है। आज के कार्यक्रम की विशेषता है कि पूरा कार्यक्रम पुरुषों द्वारा पेश किया जा रहा है। इनमें किशोर हैं , युवा हैं और वृद्ध भी। वे ही काव्य-पाठ कर रहे हैं, नाच रहे हैं, वाद्य बजा रहे हैं। जबकि अमूमन किसी भी अन्य कार्यक्रमों में महिलाओं की बराबर भागीदारी होती है। वे गाती हैं, वाद्य भी बजाती हैं, नृत्य और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश करती हैं। पर आज हर उम्र की महिला को कार्यक्रम का केवल आनंद लेते देखा जा सकता है। उनके सम्मान में कार्यक्रम पेश किया जा रहा है मेल जेंडर के द्वारा। पुरुष मंडली नाच-गा कर महिला समाज की मेहरबानियों का बखान कर अपना आभार प्रकट कर रही है। स्त्री के अवदानों के प्रति यह एक कृतज्ञ समाज की सही भंगिमा है। बहस और रिपोर्टें भी हैं, चर्चाएं भी,महिलाओं की प्रतिक्रिया भी। सब समानुपातिक।
  समाजवादी समाज के ढ़ांचे के अंदर विकसित स्त्रीवादी सरोकारों को यहां देखा जा सकता है। यहां औरतों को सरकारी स्तर पर कई तरह की सुविधाएं हासिल हैं। कामकाजी महिलाओं के लिए विशेष रूप से प्रावधान है कि पूरी नौकरी के दौरान दो बार वे गर्भधारण के दौरान मिलने वाली सरकारी सहूलियतें ले सकती हैं। जच्चा –बच्चा दोनों के लिए ही नौकरीपेशा और गैर नौकरीपेशा महिलाओं के लिए सरकारी सुविधाएं दी जाती हैं। मां और शिशु को मासिक तौर पर दो वर्षों तक धन दिया जाता है साथ ही बच्चे की पढ़ाई –लिखाई का खर्चा भी मिलता है। पूरी नौकरी के दौरान यदि महिला ने दो बार गर्भ धारण किया है तो वह समय उसकी नौकरी में तरक्की में बाधा नहीं होता। यही नहीं वह चाहे तो गर्भधारण के समय को नौकरी की पूरी अवधि में से घटाकर पूरे पेंशन के साथ रिटायरमेंट ले सकती है।
  यह एक उदार मुस्लिम बहुल समाज है। धर्म को लेकर कहीं से भी कट्टरता का प्रदर्शन दिखाई नहीं देता। खान-पान, पहनावा, आचार-व्यवहार सबमें उदारता दिखाई देती है। मैंने यहां लगभग 6 महीनों में लोगों को जोर-जोर से बोलते या झगड़ा करते नहीं सुना। मेरे पड़ोस में रहनेवाली महिलाओं में भी मैंने कभी कोई कटु प्रसंग नहीं देखा। लड़की पैदा होने पर मां-बाप निश्चिंत होते हैं। लड़की स्वयं लड़का पसंद करती है। लड़की वाले शादी से पहले एक बार भी लड़के का घर देखने नहीं जाते। लड़के के घरवाले ही आते हैं और प्रस्ताव देते हैं।
     वैवाहिक संबंधों के न चल पाने की स्थिति में तलाक यहां स्टीग्मा नहीं है। तलाक की स्थिति में घर पर स्त्री का ही अधिकार होता है, उसे घर नहीं छोड़ना पड़ता। सबसे महत्वपूर्ण यह कि यहां स्त्रियां जितने भी सर्विस सेक्टर हैं उनमें बड़ी संख्या में काम करती हैं। केयरटेकर, बाज़ार में दुकानदारी, विदेशों से सामान आयात करके व्यापार, मिलों-कारखानों और दस्तकारी के कामों विशेषकर कालीन बनाने और यहां के राष्ट्रीय पोशाक – 'कोईनेक' (कशीदाकारी)की कढ़ाई, सिलाई सभी कामों में स्त्रियों की ही भागीदारी है। अपवाद रूप में भी पुरुष दिखाई नहीं देते।
    यहां 'मॉल' हैं उनमें पूरे दुकान की जिम्मेदारी स्त्रियों पर ही है। सेल्सगर्ल से लेकर कैश काउंटर तक वे ही हैं। 'बिज़नेस वूमन' की अवधारणा यहां आम है। पुरुष भवनों के निर्माण कार्य में या ऑफिसों में काम करते हैं। बाज़ार का पूरा अर्थतंत्र स्त्री के हवाले है। इस श्रम के अलावा इन स्त्रियों का घरेलू श्रम भी जुड़ा हुआ है। सदियों से चले आ रहे पितृसत्ताक विचारों के घुन ने इस समाज को भी खाया है। इतनी बड़ी संख्या में हर तरह के कामों में भागीदारी के बावजूद राजनीति और व्यापारिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण जगहों पर महिलाओं की भागीदारी समुचित नहीं है।
भारत में इतनी बड़ी संख्या में बाज़ार की संचालक शक्ति के रूप में स्त्री को देखना मुश्किल है। वे दिखाई देती हैं उपभोक्ता के रूप में। विशेषकर शहरों में तो यही दृश्य है। घर और बाहर के कामों का पितृसत्ता के नियमों के अनुसार सख़्त बंटवारा स्त्री को व्यक्तित्व के विकास के बहुत सारे अवसरों से तो बाधित करता ही है बहुत सी रुढ़ियों की समाप्ति की प्रक्रिया को भी विलंबित करता है।
मैं अभी तक तय नहीं कर पाई हूं कि अपनी उस छात्रा-मित्र द्वारा दी गई शिवरात्रि की बधाई का क्या प्रत्युत्तर दूं , उसी दिन शमशाद ने याद दिलाया था कि क्यों वह 8 मार्च को ही सरप्राइज देना चाहती है। पार्वती की कठिन 12 बरसों की तपस्या के बाद शिव प्रसन्न हुए थे और पार्वती से विवाह किया था। 'शिवरात्रि' के दिन कन्याएं इच्छित वर पाने के लिए और सुहागिनें सात जन्मों तक वर्तमान पति को पाने के लिए व्रत करती हैं।
   भारतीय स्त्रीवाद की विडंबना है कि यहां शिवरात्रि और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस एक ही पैराडाइम में मौजूद हैं। भारत में महिला आंदोलन अभी तक इस दिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित नहीं करा पाया है लेकिन पूर्व समाजवादी समाज के मुस्लिम बहुल देश तुर्मेनिस्तान में राष्ट्रीय अवकाश है।शरीयत की जगह आधुनिक संविधान है,कानून है। यहां औरत के लिए जिस तरह के अधिकार,सामाजिक सम्मान और सामाजिक सुरक्षाएं उपलब्ध हैं ,उन्हें देखकर यही इच्छा होती है कि काश !भारत की औरतों के पास इस तरह के अधिकार होते । (नई रोशनी ब्लॉग से साभार )



सोमवार, 3 जनवरी 2011

उत्तर आधुनिकतावाद,नारीवाद और मार्क्स- केरॉल ए.स्टेविले- समापन किश्त-


पारंपरिक नारीवाद की सीमाएं
मजदूर के रूप में महिलाओं की स्थितियों की व्याख्या करने तथा प्रभावी राजनीतिक कार्रवाई की बुनियाद का निर्माण करने दोनों रूपों में पारंपरिक नारीवाद की कमियां गर्भपात अधिकारों को लेकर किए गए संघर्ष की संकीर्णता द्वारा उजागर होती है। स्वाभाविक है कि विगत तीस बरसों से मुख्यधारा के महिला आंदोलनों का यह केंद्रीय मुद्दा रहा है। महिलाओं को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दों के सापेक्ष इस  मुद्दे के महत्व के बारे में तर्क की गुंजाइश है लेकिन मैं जो यहां कहना चाहती हूं उसका इस प्रश्न के सापेक्ष महत्व से उतना सरोकार नहीं है जितना उस नजरिए से जिससे इसे देखा गया है। उदाहरण के लिए 1977 में पारित हाईड अमेंडमेंट (जिससे निर्धन महिलाओं के लिए गर्भपात के आर्थिक रास्ते बंद कर दिए गए) का हाल के बेब्सटर डिसींजन (1990) की तुलना में बहुत कम नारीवादी विरोध हुआ। इस संदर्भ में ऐसा प्रतीत होता है कि गर्भपात के अधिकार विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं के अधिकार अधिक हैं। यह तथ्य ही कि गर्भपात अधिकारों की उत्पत्ति मुख्यधारा के नारीवादी सक्रियतावाद को परिभाषित करने वाले फोकस के रूप में हुई जिसमें गर्भपात के आर्थिक उपगम्य और जो महिलाएं जन्म दे रही हों उनके लिए डे केयर और सब्सिडी के रूप में आर्थिक सहायता निषिध्द है, नारीवादी हितों की एक संकीर्ण अवधारणा को दरशाता है।
1994 की शीत ऋतु में मैं प्रजनन अधिकारों के लिए एक संगठन बनाने में लगी थी। इसका लक्ष्य स्वास्थ्य सेवा (जन्म पूर्व और जन्म के बाद देखभाल तथा गर्भपात सेवाएं सहित), डे केयर तथा कल्याण जैसे आर्थिक मुद्दों पर बल देकर गर्भपातगर्भपात-विरोधीगतिरोध से बाहर निकलना था। 'एन.ओ.डब्ल्यू' और 'प्लैन्ड पैरंटहुड' से सहानुभूति रखने वाले संगठन के कई सदस्यों ने सुझाव दिया कि हम अपनी ऊर्जा 'फ्रीडम ऑफ एक्सेस टु क्लिनिक इंट्रेसेस एक्ट' को पारित कराने के लिए समर्थन जुटाने में लगाएं। अन्यों ने यह चिंता व्यक्त करते हुए आपत्ति की कि इस कानून का उपयोग सामान्य हड़ताली मजदूरों और राजनीतिक विरोध प्रदर्शनकारियों के विरुध्द कैसे किया जा सकता है। यद्यपि इसने अनुमान के अनुसार यूनियनों तथा लिंग-भेदभाव के बारे में गरमागरम बहस मुबाहिसा को जन्म दे दिया, लेकिन इस बहस से जो सर्वाधिक शक्तिशाली बात उभर कर आई वह यह थी कि जिन 'अधिकारों' का अनुमोदन करने के लिए हम लोगों से कहा जा रहा था, उन्हें विशेषाधिकृत परिप्रेक्ष्य में देखा गया था। चूंकि राज्य आर्थिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के विशिष्ट हितों को बढ़ावा देने में ये महिलाएं इस तथ्य को अनदेखा कर सकती थीं कि ठीक उसी समय (और प्राय: उन्हीं स्थानों में) राज्य बहुसंख्य महिलाओं और पुरुषों के अधिकारों का हनन कर रहा है। 'अधिकारों' के लिए इस संघर्ष को उस सत्ता और विशेषाधिकार के वृहद तंत्र से अलग देखा जा रहा था जिसमें ये अधिकार अवस्थित थे।
सेना में लिंग-भेदभाव और समलैंगिक-भय के विरुध्द संघर्षों के बारे में भी ठीक यही बातें कही जा सकती हैं। निस्संदेह किसी भी संस्था के लोकतंत्रीकरण के लिए किए जाने वाले संघर्षों का समाजवादियों द्वारा स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन सेना जैसी संस्था के अंदरूनी कार्यकलापों को लोकतांत्रिक बनाने जबकि स्वयं संस्था के लोकतंत्र-विरोधी तथा दमनकारी प्रकार्यों की अनदेखी करने, यहां तक कि स्वीकार करने के प्रयास के बारे में कुछ निश्चित ही अत्यधिक आंदोलित करने वाली बात है। और युध्द से प्रतिबंध हटा लेने से यह तथ्य नहीं बदल सकता कि कई महिलाएं (जिन्हें सेना में पदोन्नति की चाहत नहीं के बराबर है) सेना में इसलिए भर्ती होती हैं क्योंकि, जैसा कि मेरी एक मित्र ने एक बार कहा कि यह उनके लिए एक अच्छे लाभ की स्थायी जगह है जिनके पास आर्थिक अवसर नहीं के बराबर हैं।
ऐतिहासिक, राजनीतिक और आर्थिक संदर्भों का सार यह है कि 'अधिकारों' के बचाव ने नारीवादी राजनीति को कमजोर किया है तथा इस आम धारणा को बल प्रदान किया है कि नारीवाद केवल संकीर्ण और विशेषाधिकृत हितों को पूरा करता है।
ऐतिहासिक भौतिकवाद उत्पादन के पूंजीवादी संबंधों की शोषक प्रकृति की व्यापक समझ पर आधारित, परिवार हिंसा के विरुध्द संघर्षों में महिलाओं और पुरुषों को एकजुट कर, पहले ही घटाए जा चुके सामाजिक प्रोग्रामों में और कटौती कर तथा इन बुराइयों से लाभ उठाने वाले तंत्र के विरुध्द गठबंधनों की संभावना प्रस्तुत करता है। साथ ही यह प्रस्थापना करता है कि महिलाओं की मुक्ति का, यदि इसमें सभी महिलाओं को शामिल करना है तो, पूंजीवाद के साथ कोई सामंजस्य नहीं है।
ऐतिहासिक भौतिकवाद को उस प्रकार के आत्ममंथन प्रस्तुत करने का लाभ प्राप्त है जिसका उत्तरआधुनिकतावाद और समयुगीन नारीवाद में सर्वथा अभाव है। इस लेख में मैंनेइसे रेखांकित करने का प्रयास किया है। यह सत्ता की प्रभुत्वशाली संरचना के संबंध में हमारे सिध्दांतों, हमारे आचरणों और हमारी अवस्थितियों को समझने के लिए तुरंत बाध्य करता है तथा बहुराष्ट्रीय पूंजीवाद के भीतर महिलाओं और पुरुषों की अवस्थितियों और इन अवस्थितियों में समकालीन परिवर्तनों को समझने का अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी आधार प्रदान करता है।
उदाहरण के लिए 'पारिवारिक मूल्यों' के बहस के बारे में विचार करें। पारंपरिक नारीवादी तर्क है कि पारिवारिक मूल्यों की ओर लौटने का 'न्यू राइट' का आह्वान महज एक प्रतिक्षेप है। एक ओर कहा जाता है कि यह प्रतिक्षेप 'न्यूक्लियर फैमिली' के पारंपरिक संस्करण को पुनर्स्थापित करने के प्रयास को दरशाता है ताकि श्रमशक्ति से महिलाओं को बाहर निकलने के लिए तथा वापस घर में बैठने के लिए मजबूर किया जा सके। दूसरी ओर इसे नारीवादी आंदोलन को प्रभावकारी बनाने के उपाय के रूप में देखा जाता है क्योंकि अब महिलाओं के पास काम करने का 'विकल्प' है। इन विश्लेषणों में यह तथ्य सामने नहीं आता कि आर्थिक स्थितियों ने घरेलू कार्य के अतिरिक्त एक या दो पूर्णकालिक काम के दोहरे लाभ को मध्यवर्गीय महिलाओं पर लाद दिया है और इस सामाजिक परिवर्तन से पूंजीवाद को लाभ होता है न कि व्यक्ति विशेष को। निर्धन और मजदूर वर्ग की महिलाओं (जिनमें से कई अश्वेत हैं) ने लंबे समय तक घर से बाहर कार्य किया है लेकिन उनमें से शायद ही कोई अपने विमुख और प्राय: हताश श्रम को अपनी 'पसंद' का कार्य कहेंगी। महिलाओं के लिए जो लाभ बताया जा रहा है उसका अर्थ महज यह है कि मध्यम वर्गीय महिलाओं को अब पूंजीवाद की आवश्यकताओं द्वारा उस 'विकल्प' को चुनने के लिए मजबूर किया जा रहा है जो पारंपरिक रूप से निर्धन और मजदूर वर्ग की महिलाओं का रहा है। यह तर्क देना कि परिवार के मूल्यों के बारे में बहस का उद्देश्य महिलाओं को वापस घरेलू परिवेश में भेजना है, इस तथ्य की अनदेखी करना है कि पारंपरिक न्यूक्लियर परिवार की ओर लौटना संभव नहीं है क्योंकि अब यह आर्थिक दृष्टि से व्यवहार्य नहीं है। यह तर्क देना कि पारिवारिक मूल्यों के बारे में ये बहस नारीवादी सफलताओं द्वारा प्रेरित हैं, उस विचारधारात्मक रहस्यात्मकता को स्वीकार करना है जो पूंजीवाद के आर्थिक अधिदेशों को यों मानता है गोया वे मुक्त जीवन शैली के 'विकल्प' हों।
मैं यह विश्वास करना पसंद करूंगी कि दरअसल नारीवादी क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रतिबध्द हैं, लेकिन विचार करने के लिए और अपेक्षाकृत कम सुखद संभावना भी है जो वर्ग की स्थिति की अनदेखी के खतरों को इंगित करती है। संभव है कि अपने को नारीवादी कहने वाले कई व्यक्तियों की दिलचस्पी वर्ग के विशेषाधिकार को बनाए रखने में या ख्यातिलब्ध व्यक्ति का दर्जा पाने में हो। उस दृष्टिकोण से मार्क्सवाद एक गंभीर खतरा है न केवल इसलिए कि यह उत्तरआधुनिक नारीवाद के सैध्दांतिक बुनियादों के लिए चुनौती प्रस्तुत करता है बल्कि इसलिए भी कि यह ज्ञान के कुछ निश्चित रूपों के ऐतिहासिक, भौतिक यह काफी हद तक स्पष्ट है कि कैटी रोइफे, नाओमी वुल्फ और केमिली पेजिला जैसी महिलाएं नारीवाद का उपयोग समानता और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के बजाए, किसी प्रकार अपनी पुस्तकों, छवियों और आजीविकाओं को आगे बढ़ाने के लिए विपणन की कार्यनीति के रूप में करती हैं। लेकिन जब तक अनेक नारीवादी अपने विशेषाधिकार तथा उन तरीकों, जिनसे हम सभी कम विशेषाधिकृत महिलाओं और पुरुषों के शोषण से 'फायदा' उठाते हैं, को अस्वीकार नहीं करते, नारीवाद एक राजनीतिक परियोजना होने के बजाए एक पेशागत कार्यनीति बन जाने के खतरे में रहेगा।
अब हम संक्षेप में मीडिया तमाशा और ओ.जे. सिंपसन के मुकदमे की ओर लौटें। सितारों की दुनिया के तामझाम और न्यायालय कक्ष के अतिसंवेगी नाटक के अलावा, न्यायालय कक्ष एक बहुसांस्कृतिक समाज लग रहा था, एक ऐसा स्थान जहां स्थायी अस्मिताएं (आइडेंटिटीज) पल्लवित हो रही थीं। न्यायाधीश मंडली के सदस्य अफ्रीकी-अमरीकी थे। एक महिला और एक अफ्रीकी-अमरीकी पुरुष बहस में प्रमुख भाग लेने वाले थे। एक गंभीर मुद्रा वाला एशियाई-अमरीकी व्यक्ति कोर्टरूम की अध्यक्षता कर रहा था। लेकिन एक ऐसे समय में जब समाज के शीर्ष में पूंजीवाद का व्यापक सुदृढ़ीकरण हो रहा हो, क्या लोग वाकई इस तमाशे में यकीन करते हैं? एक ऐसे समय में जब अश्वेतों की बेरोजगारी श्वेतों की दुगुनी से भी अधिक हो, जब महिलाओं, पुरुषों और उनके परिवारों के अधिकारों को खुलेआम और क्रूरतापूर्ण ढंग से छीना जा रहा हो, जब समस्त अमरीका में महिला तथा पुरुष समलैंगिकों पर आक्रमण हो रहा हो और जब हड़ताली मजदूरों को पुलिस द्वारा डेकाटूर, इलिनॉइस जैसे स्थानों में गैस भर कर मारा जा रहा हो तो क्या लोग सचमुच बहुसांस्कृतिक समाज की छवि में विश्वास करते हैं?
अंतत: लोग क्या चाहते हैं या उनकी पहचान कैसे करते हैं मीडिया तमाशा इस बारे में हम लोगों को कुछ नहीं बताता। ऐसे समय में जब मीडिया की प्रस्तुति और सच्चाई में इतनी कम समानता हो, शायद ही कोई सच्चाई और कपोल-कल्पना के बीच ंफर्क कर पाएगा। क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन की संभावना में जिनका विश्वास बरकरार है वे आलोचनात्मक चेतना की शक्ति तथा उन उपकरणों में विश्वास नहीं छोड़ सकते जो लोगों (खास तौर पर अस्थिर आर्थिक भविष्य का सामना करने वालों) को अपनी स्थिति को समझने तथा इसके विरुध्द लड़ने में उन्हें सक्षम बनाते हैं, न कि इनसे महज समझौता करने में। यदि नारीवादी विश्लेषणों को विश्लेषणात्मक तथा राजनीतिक संसक्ति (प्रभावोत्पादकता का तो उल्लेख करने की आवश्यकता ही नहीं है) पर अपने किसी दावे को बरकरार रखना है तो यह बेहतर ढंग से समझने की आवश्यकता है कि उत्तरआधुनिकतावादी, नारीवादी या उनके मिले-जुले रूप, जिनको हममें से कुछ प्रोत्साहित करते हैं, दरअसल ये परियोजनाएं पूंजीवाद को बल प्रदान कर सकती हैं। ये परियोजनाएं विश्लेषण की उन श्रेणियों का त्याग कर, जो हमें समझने में सक्षम बनाती हैं, तंत्रगत शोषण के संबंधों के भीतर हमारी स्थितियों तथा वर्ग आधारों को भी उजागर करता है।उसको दुर्बोध बनाती हैं तथा सामाजिक परिवर्तन की किसी परियोजना को अस्वीकार्य कर देती हैं।
स्थायी अस्मिताओं (आइडेंटिटीज) के विखंडन को उत्सव का कारण समझने के बनिस्बत हमें यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि स्थायी अस्मिता को कैसे उन लोगों के लिए एक वस्तु में परिवर्तित कर दिया गया है जिनके पास इसके उपभोग के लिए पूंजी है और किस प्रकार पूंजीवादी तंत्र ने समाजवादी राजनीति के संघटन के विरुध्द कार्य किया है (और कार्य करता रहेगा)। स्थायी अस्मिता की राजनीति (आइडेंटिटी पॉलिटिक्स), जो दमन के प्रतिस्पर्ध्दी दावों की अंतहीन सम्मिलित प्रार्थना में समूहों को एक दूसरे के खिलाफ केवल खड़ा करने का काम करती है, के स्थान पर हम लोगों को दमन की तंत्रगत प्रकृति की सशक्त समझ विकसित करने की आवश्यकता है। हमें यह विचार करने की आवश्यकता है कि किस हद तक स्थायी अस्मिता की राजनीति तंत्र के लिए चुनौती नहीं बल्कि उसका यह उत्पाद है। किस हद तक यह एक वैश्विक तंत्र के रूप में पूंजी के विश्वीकरण द्वारा उत्पादित अस्मिता का वस्तूकरण तथा बाजार विखंडन की अभिव्यक्ति है। क्योंकि जो विरोधात्मक रणनीतियां प्रतीत हो रही हैं, हो सकता है वे दमन के संकेत साबित हों।
(यह निबंध इलेन मिकसिंन्स वुड और जॉन बेलेमा फास्टर संपादित किताब 'इतिहास के पक्ष में' से साभार लिया गया है, इसके प्रकाशक हैं ग्रंथ शिल्पी,दिल्ली)

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