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शनिवार, 27 अगस्त 2016

टीवी टॉक शो में संघी


पहले यह सोचा गया समाचार टीवी चैनल आएंगे तो समाचारों की बाढ़ आएगी,विभिन्न रंगत के न्यूज चैनलों के जरिए खबरों को व्यापक स्थान मिलेगा, नए किस्म का टीवी विमर्श जन्म लेगा। शुरू के वर्षों में कुछ उम्मीदें बंधी थीं,लेकिन जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है टीवी न्यूज चैनलों का समूचा चरित्र गुणात्मक तौर बदल गया है। खबरों की स्वायत्तता ,व्यापार की स्वायत्तता में बदल गयी है। न्यूज चैनलों में इरेशनल,अप्रासंगिक और बंधुआ विचारों ने स्थायी संप्रेषण की जगह बना ली है।इस तरह की खबरें और विचार ज्यादा प्रसारित हो रहे हैं जो अप्रासंगिक है या सामाजिक विभाजन को तेज करने वाले हैं।इनमें आरएसएस के प्रवक्ता या उसकी विचारधारा के पक्षधर की नियमित मौजूदगी को सहज ही देख सकते हैं।

सवाल उठता है आरएसएस के प्रवक्ता को टीवी टॉक शो में क्यों बुलाया जाता है और किन विषयों पर बुलाया जाता है ॽ मोदी सरकार आने के बाद से इस तरह के कार्यक्रमों में आरएसएस के प्रवक्ता ज्यादा नजर आते हैं जो सवाल हिन्दुत्व या हिन्दूधर्म से जुड़े हैं।भारत में हजारों सामाजिक-धार्मिक संगठन हैं,इनमें अनेक प्रतिष्ठित संगठन हैं जिनके लाखों अनुयायी हैं,लेकिन उनमें से किसी भी संगठन के प्रवक्ता को आप नियमित रूप में टीवी टॉक शो में नहीं देखेंगे। लेकिन आरएसएस के प्रवक्ता को जरूर देखेंगे।यहां तक कि नियमित तौर पर वामदलों के प्रवक्ता को अनुपस्थिति देखेंगे।

सवाल यह है आरएसएस के प्रवक्ता को प्रतिदिन टीवी चैनलों पर स्थान क्यों दिया जा रहा है ॽवह कौन सी मजबूरी है जिसके कारण न्यूज चैनल यह काम कर रहे हैं ॽ आरएसएस पहले भी था लेकिन मोदी सरकार बनने के पहले तक टीवी टॉक शो में आरएसएस के प्रवक्ता की यदा-कदा उपस्थिति होती थी लेकिन इन दिनों राजनीतिक मसलों पर रोज उपस्थिति रहती है।जबकि आरएसएस यह दावा करता है कि वह सामाजिक संगठन है।इसके बावजूद उसके प्रवक्ता को बुलाने का मकसद क्या है ॽ

जो संगठन जमीनी स्तर पर हिन्दुत्व के एजेण्डे का विरोध कर रहे हैं ,प्रतिवाद की भाषा बोलते हैं,संघर्ष कर रहे हैं उन संगठनों के प्रतिनिधियों टीवी टॉक शो में नियमित अनुपस्थिति और आरएसएस के प्रवक्ता की नियमित उपस्थिति दर्शकों के मन में यह धारणा पैदा कर रही है कि आरएसएस ऐसा संगठन है जिसकी विचारधारा को देश में चुनौती देने वाला कोई नहीं है।संघ के विचार सर्वग्राह्य विचार हैं। इस तरह के कम्युनिकेशन से वे लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं जो राजनीति कम जानते हैं और सामाजिक तौर पर निष्क्रिय हैं।खासकर औरतें और युवावर्ग इस तरह के अहर्निश कम्युनिकेशन से बड़ी मात्रा में प्रभावित हो रहे हैं।



असल में मौजूदा दौर ´पृष्ठभूमि´ की विचारधाराओं के उद्घाटन या उनके क्षितिज पर आ जाने का दौर है।संघ लंबे समय से ´पृष्ठभूमि´ के विचारधारात्मक संगठन के रूप में काम करता रहा है लेकिन इधर अचानक हिन्दुत्व के हिंसाचार और अपराध की खबरों के टीवी में तेजी से आने के कारण यह संगठन चमत्कृत ढ़ंग से सामने आ गया है और अब रोज ही उसके प्रवक्ता टीवी चैनलों पर बैठे रहते हैं।इस समय जितने भी राजनैतिक मसले हैं उन पर संघ की विचारधारात्मक राय को महत्व दिया जा रहा है । मोदी सरकार आने के पहले तक संघ और केन्द्र सरकार को अलग -पृथक –प्रच्छन्न दिखाया जाता था लेकिन मोदी सरकार आने के बाद अब हर राजनीतिक घटना पर प्रत्यक्ष और सीधे हस्तक्षेप करता,केन्द्र सरकार से संबंध जोड़ता दिखाया जा रहा है। भाजपा की सरकारों के साथ इस तरह का गाँठ बांधकर प्रचार करना अपने आपमें नया फिनोमिना है।पहले घटनाक्रम पर सरकार नियंत्रक नजर आती थी अब संघ नियंत्रक नजर आता है,संघ के प्रवक्ता जो कहते हैं वह पत्थर की लकीर होता है,सरकार के प्रवक्ता या भाजपा के प्रवक्ता हमेशा संघ के प्रवक्ता के पूरक होते हैं,कभी –कभी संघ प्रवक्ता पूरक नजर आता है।लेकिन नियंत्रक और पूरक का यह वैचारिक संबंध नई विचारधारात्मक परिघटना है।इस पूरे प्रसंग में किसी भी टॉक शो के अंदर संघ के लोग एंकर के साथ मिलकर बहस के नियंत्रक के रूप में पेश किए जाते हैं। अन्य नियंत्रित के रूप में पेश किए जाते हैं,इससे दर्शकों के मन में यह भाव संप्रेषित हो रहा है कि संघ नियंत्रक है और बकी नियंत्रित हैं।इसमें तर्क बनाम अंधश्रद्धा की टीवी जंग भी है,इसमें तर्क को अंधश्रद्धा नियंत्रण करती नजर आती है। इस फॉरमेट में एक तरफ ज्ञान और सूचनाएं पिटती नजर आती हैं तो दूसरी ओर अज्ञान ,कठमुल्लापन-कु-सूचना जीतती दिखायी जा रही है।

शनिवार, 14 मई 2016

चैनलों का पागलपन


         
टीवी चैनलों की खबरें और टॉकशो यही संदेश देते हैं कि हमारे देश का मीडिया इरेशनल और पगलाए लोगों के हाथों में कैद है। किसी व्यक्ति विशेष या चर्चित व्यक्ति के नाम का अहर्निश प्रसारण पागलपन है।एक जाता है दूसरा आता है। पहला पागल तब तक रहता है जब तक दूसरा पागल मिल नहीं जाता । यह मीडिया पागलपन है। हमें जनता की खबरें चाहिए,पागलों की खबरें नहीं चाहिए। यदि यह रिवाज नहीं बदला तो समाचार टीवी चैनलों को पागल चैनल कहा जाएगा।टीवी पागलपन वस्तुतः मीडिया असंतुलन है ।मीडिया अपंगता है ।मीडिया संचालक अपने को समाज का संचालक या जनमत की राय बनाने वाला समझते हैं। सच इसके एकदम विपरीत है। अहर्निश प्रसारणजनित राय निरर्थक होती है। और चिकित्साशास्त्र की भाषा में कहें तो पागल की बातों पर कोई विश्वास नहीं करता । उन्मादी प्रसारण राय नहीं बनाता बल्कि कान बंद कर लेने को मजबूर करता है ।

मीडिया पागलपन के तीन सामयिक रुप "मोदी महान","कांग्रेस भ्रष्ट" और "विपक्ष देशद्रोही "। टीवी वालो खबरें लाओ। एक बात का अहर्निश प्रसारण खबर नहीं है। चैनलों को देखकर लगेगा कि भारत गतिहीन समाज है। यहां इन तीन के अलावा और कुछ नहीं घट रहा !भारत गतिशील और घटनाओं और खबरों से भरा समाज है।चैनल चाहें तो हर घंटे नई खबरें दिखा सकते हैं। लेकिन पागल तो पागल होता है !एक बात पर अटक गया तो अटक गया !!

टीवी एंकर अपने को समाज का रोल मॉडल समझते हैं और टॉक शो में उनकी भाव-भंगिमाओं को देखकर यही लगेगा कि इनका ज्ञान अब निकला ! लेकिन ज्ञान निकलकर नहीं आता ! वहां सिर्फ एक उन्माद होता है जो निकलता है । उन्माद का कम्युनिकेशन हमेशा सामाजिक कु-संचार पैदा करता है । यह एंकर की ज्ञानी इमेज नहीं बनाता बल्कि उसकी इमेज का विलोम तैयार करता है एंकर ज्ञानी कम और जोकर ज्यादा लगता है । उससे दर्शक खबर या सूचना की कम उन्मादी हरकतों की उम्मीद ज्यादा करता है । अब लोग टीवी खबरें और टॉक शो पगलेपन में मजा लेने के लिए खोलते हैं । हमारे समाज में पागल लंबे समय से सामाजिक मनोरंजन का पात्र रहा है। पागल के प्रति समाज की कोई सहानुभूति नहीं रही है ।न्यूज मीडिया में अचानक यह फिनोमिना नजर आ रहा है कि "हम तो अर्णव गोस्वामी जैसे नहीं हैं"।"सारा मीडिया भ्रष्ट नहीं है। " ´’सब चीखते नहीं हैं”अब इन विद्वानों को कौन समझाए कि मीडिया पर संस्थान के रुप में ध्यान खींचा जा रहा है,यह निजी मामला नहीं है।

मीडिया कैसा होगा यह इस बात से तय होगा कि राजनीति कैसी है ॽ राजनीतिकतंत्र मीडिया के बिना रह नहीं सकता और मीडिया राजनीतिकतंत्र के बिना जी नहीं सकता । ये दोनों एक -दूसरे से अभिन्न तौर पर जुड़े हैं।जब राजनीति में ईमानदारी के लिए जगह नहीं बची है तो मीडिया में ईमानदारी के लिए कोई जगह नहीं होगी।भारत की राजनीति इस समय रौरव नरक की शक्ल ले चुकी है। ऐसे में निष्कलंक मीडिया संभव नहीं है।राजनीति जितनी गंदी होती जाएगी,मीडिया भी उतना गंदा होता जाएगा।

राजनीति की गंदगी से मीडिया तब ही बच सकता है जब वह खबरें खोजे,राजनीति और राजनीतिकदल नहीं।हमारे मीडिया ने खबरें खोजनी बंद कर दी हैं। राजनीतिक संरक्षक-मददगार खोजना आरंभ कर दिया है। फलतः मीडिया में खबरें कम और दल विशेष का प्रचार ज्यादा आ रहा है।यह मीडिया गुलामी है ।

टीवी चैनलों के टॉकशो में आने वाले लोग हैं राजनेता,बैंकर,वकील,राजनयिक, सरकारी अफसर आदि हैं। ये सारे लोग झूठ बोलने की कला में मास्टर हैं। मीडिया की नजर में ये ही ओपिनियनमेकर हैं ।इनमें अधिकांश मनो- व्याधियों और कुंठाओं के शिकार और गैर-जिम्मेदार होते हैं।मीडिया" इनकी खबर को जनता की खबर", "इनकी राय को जनता की राय"।"इनके सवालों को जनता के सवाल " बनाकर पेश कर रहा है।इस तरह के लोग जब मीडिया में जनमत की राय बनाने वाले होंगे तो सोचकर देखिए समाज में किस तरह की राय बनेगी ? मनो-व्याधियों के शिकार की राय कभी संतुलित और सही नहीं होती । वह खुद बीमार होता है और श्रोताओं को भी बीमार बनाता है । यही वजह है आम लोगों में टॉकशो को लेकर बहुत खराब राय है। त्रासद बात यह है कि मनोव्याधिग्रस्त ये लोग अपनी तमाम व्याधियों को सामाजिक व्याधि बना रहे हैं। वे स्वयं सत्तासुख पाने के लिए राय देते हैं और "जनता में भी सत्तासुख असली सुख है" .यही भावबोध पैदा करने में सफल हो जाते हैं ।

जबकि सच यह है जनता के भावबोध,दुख,सुख और खबरें अलग हैं और उनका टीवी मीडिया में न्यूनतम प्रसारण होता है। अधिकांश समय तो ये मनोव्याधिग्रस्त लोग घेरे रहते हैं।इसी अर्थ में न्यूज चैनल पागलचैनल हैं।

टीवी वाले बताते रहते हैं कि ईमानदार लोगों को सत्ता में आना चाहिए । सवाल ईमानदार लोगों के सत्ता में आने का नहीं है। सवाल यह है कि ताकतवर लोगों को, सत्ताधारीवर्ग के लोगों की शक्ति को कैसे कम किया जाय़ ।सवाल यह नहीं है कि अरविंद केजरीवाल लाओ, सवाल यह है कि कांग्रेस-भाजपा आदि दल जो सीधे सत्ताधारीवर्गों की नुमाइंदगी करते हैं उनको कैसे रोका जाए।

हत्यारा हत्याएं करता है। लेकिन कारपोरेट घराने,राजनेता, और धार्मिक मनोव्याधिग्रस्त लोग अर्थव्यवस्था और समाज को नष्ट करते रहते हैं ,और टीवी चैनल इनका महिमामंडन करते रहते हैं ।

कपिल के लाफ़्टर शो कार्यक्रम में औरतों पर वल्गर हमले हो रहे हैं । दादी, भुआ आदि की तो शामत आई हुई है । यह कैसा मनोरंजन है जिसमें औरत को निशाना बनाना पड़े ।घिन आती है ऐसे हास्य पर ।टीवी पर चुनाव की चौपालें अर्थहीन हंगामों में बदल दी गयी हैं । कमाल है !कारपोरेट हस्तक्षेप का !!

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मीडिया और फेसबुक मेँ वाक्य-वीर यौन शोषण पर खूब शब्द खर्च करते हैं, लेकिन श्रमिक या मीडियाकर्मी के शारीरिक और बौद्धिक शोषण पर चुप रहते हैँ.इन शब्दवीरोँ को यौन शोषण के अलावा शोषण के अन्य रुप नजर क्यों नहीं आते ?मीडिया मेँ स्त्री का शारीरिक शोषण गलत है, उससे भी ज्यादा मीडिया मेँ श्रम का शोषण होता है,यौन उत्पीडन का जो विरोध कर रहे हैँ वे मीडियाकर्मियों के शोषण पर बहादुरी से बोलते नहीं हैँ.यौन-उत्पीडन तो मीडिया मेँ चल रहे बृहद शोषण का छोटा अंश है.



बुधवार, 21 जनवरी 2015

टीवी डिबेट:लोकतंत्र में टीवी संपन्न और सूचना विपन्न



राजनीति के लिए टीवी युग कलियुग है। जो टीवी में गया वह वहीं का होकर रह गया। टीवी में दाखिल होना जितना मुश्किल है उससे जान बचाकर निकलना उससे भी ज्यादा मुश्किल है। सामान्य दर्शक ,टीवी ज्ञान का भूखा होता है। यह वह दर्शक है जो ज्ञान और सूचना से वंचित है और टीवी के जरिए अपने दिमाग़ के स्तर को "ऊँचा "उठाना चाहता है। समाचार टीवी चैनल यह भ्रम पैदा करते हैं कि वे सूचना संपन्न बनाते हैं ,टीवी दर्शक सूचना संपन्न नागरिक है, वे सच के रखवाले हैं! 
    भारत में टीवी ने लोकतंत्र को ताक़तवर बनाया है लेकिन लोकतांत्रिक मनुष्य को न्यूज़ कंगाल बनाया है। टीवी के टॉकशो हों या धर्म शो हों या इवेंट शो हों वे मन को संतोष देने का , तुरंता प्रचार का काम करते हैं। टीवी शो वस्तुत: "सेल-सेल"की रणनीति की साझा परिणति है। आमतौर पर नेतागण टीवी का इमेज निर्माण के लिए इस्तेमाल करते हैं लेकिन टीवी टॉकशो इमेज नहीं बनाते बल्कि इमेज बिगाड़ते हैं, यही वजह है टीवी टॉकशो में दलीय प्रतिनिधि के तौर पर वे नेता या प्रवक्ता बैठे रहते हैं जिनका कोई जनाधार नहीं है, मसलन् जिनकी संगठन में फ़ोटो से ज्यादा हैसियत नहीं है। ये लोग बुनियादी तौर पर दलीय डमी नेता हैं। जो पिटते और पीटते हैं। लेकिन इनकी वास्तविक हैसियत " सेल- सेल" के बैनर से जैसी होती है।  टीवी बहसों में आमतौर पर रीयल दलीयनेता ग़ायब रहता है। क्योंकि वह रीयल है और वह यदि टॉक शो में पिट गया तो बस जनता के हाथों उसके धुने जाने का भी चांस है।
              कल से टीवी पर बहस हो रही है केजरीवाल और किरनबेदी एक ही मंच पर आएँ बहस करें, कांग्रेस के अजय माकन भी साथ में आने को तैयार हैं। क्या इस तरह की बहस लोकतंत्र के लिए शुभ होगी ?रेटिंग और राजनीतिक गर्मी पैदा करने के लिहाज़ से ऐसी बहस उपयोगी होती है। इसकी मुश्किल यही है कि इसमें वक़्ता का अहंकार बहुत जल्दी नष्ट होता है। इस तरह का कम्युनिकेशन  अशिक्षितों की तुलना में शिक्षित मध्यवर्ग को जल्दी अपील करता है। दुविधाग्रस्त और तटस्थ शिक्षित मतदाताओं को इस तरह की बहस तेज़ी से नेता विशेष के प्रति आकृष्ट करने में सफल रहती है। 
      दिलचस्प बात यह है कि टीवी पर बहस हो रही है लेकिन रीयल मसलों पर नहीं । रीयल मसलों पर बहस करने में न तो टीवीएंकर की और न नेताओं की दिलचस्पी है। बहस में गैर- जरुरी सवाल वर्चस्व बनाए हुए हैं। मसलन् ,भाजपा में बग़ावत, किरनबेदी को क्यों लाया गया, केजरीवाल ने बनिया क्यों कहा?,इसे टिकट मिला और उसका टिकट कटा, इस नेता ने दल बदला, वह नेता छोड़कर गया, इसका रोड शो या उसका रोड शो। यह सच है कि इस तरह की ख़बरों का समाचार मूल्य है लेकिन चुनाव के असली मुद्दों पर भी तो  बातें हों ! 
     मसलन् , दिल्ली में विगत एक साल में क़ानून - व्यवस्था के हालात क्या थे ? , कितने कारख़ाने खुले या बंद हुए ? कितने नए रोज़गारों का जन्म हुआ ? बिजली उत्पादन और सप्लाई में सुधार आया कि गिरावट आई ?दिल्ली के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में कितनी नई नियुक्तियाँ हुईं और दाख़िले में कितनी नई सीटें बढी ? दिल्ली में सड़कों की दशा क्या है और कितनी नई सड़कें बनीं ? नए स्वास्थ्य केन्द्र, स्कूल, कॉलेज कितने खुले ? प्रत्येक क्षेत्र के विधायक के विधायक फंड  की क्या स्थिति है ? कहाँ और किन क्षेत्रों में विधायक निधि से धन खर्च किया गया ?महंगाई की अवस्था क्या ? दिल्ली पुलिस में नई भर्तियाँ कितनी हुईं ? दिल्ली के पर्यावरण में गिरावट आई या सुधार हुआ ? बिजली और पानी का बिल तो बहस में है लेकिन विगत एक साल की तथ्यपूर्ण सूचनाएँ और आंकडे कहाँ हैं? उन पर बहस होनी चाहिए। दिल्ली की अदालतों की दशा पर बहस हो, उनके इंफ़्रास्ट्रक्चर की समस्याओं पर बहस हो तब ही दिल्ली का असली चेहरा सामने आएगा। 
           दिल्ली राजधानी है और सारे बडे चैनलों का गढ़ है लेकिन दिल्ली की जनता सबसे ज्यादा सूचना विपन्न है। यह स्थिति कैसे बदले इस दिशा में कौन से कदम जरुरी हैं ? क्या मीडिया घरानों की पेडन्यूज और राजनीतिक विज्ञापनों को लेकर कोई नीति  है? 
      हम दिल्ली में रहते हैं , नेताओं और मीडिया से घिरे रहते हैं, सचेतनता के विभ्रम में रहते हैं लेकिन न्यूनतम सत्य भी नहीं जानते ऐसे मे हम सोचें हम सूचना विपन्न क्यों हैं ? सूचना विपन्नता टीवी सम्पन्नता से दूर नहीं होगी, सूचना संपन्न हम तब बनेंगे जब परंपरागत कम्युनिकेशन पुख़्ता बनाएँगे। परंपरागत कम्युनिकेशन बंद करके हम कभी भी सूचना संपन्न नहीं बन सकते। हम सोचें कि कैसे बिना विज्ञापन के आम लोग लाखों की संख्या में किसी तिथि विशेष पर गंगा स्नान करने चले जाते हैं? करोड़ों लोग कुंभ में चले जाते हैं! लेकिन मतदान केन्द्रों तक हम इतने व्यापक प्रचार के बावजूद कुंभ मेले जैसी लामबंदी नहीं कर पाते ! 
कहने का आशय यह है कि परंपरागत कम्युनिकेशन जितना ज्यादा होगा लोकतंत्र उतना ही सूचना संपन्न होगा। अमेरिका में देखें वहाँ मीडिया कम्युनिकेशन ख़ूब है, राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार टीवी बहसें करते हैं लेकिन आम जनता में आधी आबादी वोट डालने तक नहीं जाती । आमलोगों को विभिन्न मसलों पर कोई जानकारी नहीं होती। समग्रता मे देखें तो पाएँगे कि मीडिया कम्युनिकेशन तब ही प्रभावशाली होता है जब परंपरागत कम्युनिकेशन पुख़्ता हो। परंपरागत कम्युनिकेशन के अभाव में मीडिया कम्युनिकेशन प्रभावहीन होता है। 

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...