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रविवार, 30 जुलाई 2017

क्रांतियाँ बेकार नहीं जातीं -


                 
    विश्व विख्यात इतिहासकारों में एरिक हॉब्सबाम अग्रणी हैं।उनके लेखन की विशेषता है इतिहासलेखन को विशेषज्ञों के अध्ययन-अध्यापन के दायरे से बाहर लाकर जनोपयोगी बनाना,साधारण पाठक के लिए बोधगम्य बनाना। साधारण पाठक और इतिहासकार इन दोनों के बीच इतिहास को किस तरह जनप्रिय बनाया जाए इसी बुनियादी लक्ष्य को सामने रखकर उन्होंने 4प्रमुख किताबें लिखीं,वे हैं,1.क्रांति का युग,2.पूंजी का युग,3. साम्राज्य का युग और 4.अतिरेकों का युग।इन चारों किताबों के अनुवाद संवाद प्रकाशन,मेरठ ने छापे हैं। हमारी समीक्षा के केन्द्र में ´पूंजी का युग´ नामक किताब है।अंग्रेजी में यह ´एज आफ कैपीटल´नाम से प्रकाशित है।
     एरिक हॉब्सबाम ने´´पूंजी का युग´´(इतिहास 1848-1875) में लिखा ´बुर्जुआ समाज की विजय जितनी विज्ञानके अनुकूल थी,उतनी कला के लिए नहीं रही।´ यह सच है बुर्जुआ समाज के जन्म के साथ विज्ञान के क्षेत्र में सबसे तेजगति से विकास होता है लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि लेखकों-कलाकारों के अंदर व्यक्तिवादी मूल्यों के विकास के कारण साहित्य को नित नई ऊँचाईयों को स्पर्श करने का मौका मिला,इसके अलावा छापे की मशीन के आने के साथ ही साहित्य का लोकतांत्रिकीकरण हुआ। रचना के केन्द्र में मनुष्य आया और ईश्वर की विदाई हुई।कमोबेश यह प्रक्रिया हर देश में बुर्जुआ समाज के उदय के साथ घटित हुई।साहित्य और कला के मध्यकालीन मूल्यों की जगह नए आधुनिक कला मूल्यों का जन्म हुआ।
      एरिक हॉब्सबाम की कृति ´पूंजी का युग´कई मायनों में महत्वपूर्ण है।इस किताब में ´पूंजी´ को आधार बनाकर आधुनिककालीन राजनीतिक-आर्थिक और कलागत परिवर्तनों की व्याख्या पेश की गयी है।यह किताब आधुनिककाल का वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य बनाने में मददगार साबित हो सकती है। इस पुस्तक का अनुवाद वंदना राग ने किया है,अनुवाद बेहतरीन है और पढ़ते हुए लगता ही नहीं है कि यह पुस्तक अनुदित है।हिंदी पत्रिका जगत की मुश्किल यह है कि विश्व विख्यात लेखकों की वैचारिक किताबें हिंदी में खूब छप रही हैं लेकिन उन पर चर्चा या उनके मूल्यांकन या पुस्तक समीक्षा के काम को साहित्यिक पत्रिका के संपादक उपेक्षा की नजर से देखते हैं।जबकि इस तरह की वैचारिक किताबों के बारे में व्यापक  चर्चा होनी चाहिए। इससे हिंदी के विचार-जगत और पाठक जगत को विश्व के वैचारिक विमर्श के साथ जोड़ने और आलोचना में छाई अवधारणाहीन बहसों से बचने में मदद मिल सकती है।
     इस किताब का सबसे रोचक पहलू है ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´के प्रकाशन के साथ तत्कालीन क्रांतियों के संबंध की खोज।´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´ अज्ञात जर्मन लेखकों के नाम से 24फरवरी 1848 जर्मन में प्रकाशित होता है।बाद में इसे अंग्रेजी,फ्रेंच,इटालियन आदि अनेक भाषाओं में अनुदित करके छापा गया। हॉब्सबाम ने लिखा ´यह कहना सही होगा कि इसके राजनैतिक आग्रहों का जर्मन क्रांतिकारियों के छोटे तबके से बाहर बहुत कम प्रभाव रहा.अलबत्ता1870 के बाद प्रभाव बढ़ा.कुछही हफ्तों में और मैनीफेस्टो के प्रकाशन के कुछ ही घंटों बाद,मसीहाओं की आशाएं,आशंकाएं सब साकार होने को आईं.फ्रांसीसी राजशाही को बग़ावत के बाद सत्ता से अपदस्थ कर दिया गया.गणतंत्र राज्य की घोषणा कर दी गई और यूरोपीय क्रांति का आग़ाज हो गया।´
  ´आधुनिक दुनिया के इतिहास में कई महत्वपूर्ण क्रांतियां हुई हैं.कई क्रांतियां इससे अधिक सफल रही हैं.मगर जंगली आग की तरह इस तीव्रता से चारों ओर फैलने वाली,सरहदों, राज्यों, देशों और महासागरों के पार जाने वाली क्रांतियां कम ही हुई हैं´ दिलचस्प बात यह है 24 फरवरी को ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´प्रकाशित होता है और उसी दिन फ्रांस ने गणतंत्र राज्य की घोषणा की। हॉब्सबाम ने लिखा है ´दो मार्च तक क्रांति दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी,छह मार्च बवेरिया,ग्यारह मार्च बर्लिन,तेरह मार्च वियना और तत्काल ही हंगरी,अठारह मार्च मिलान और फिर इटली में फैल गई।´उल्लेखनीय है उन दिनों सबसे तेज संचार व्यवस्था  राथ्सचाइल्ड बैंक की थी ,वह भी पेरिस से वियना तक खबर पांच दिन से कम में नहीं पहुँचाती थी,लेकिन उससे भी तेज गति से क्रांति की आग चारों ओर फैल गयी।उन दिनों कुछ ही हफ्तों में यूरोप के दस से ज्यादा देशों में ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´के प्रकाशन के साथ ही क्रांति हो गई।उस क्रांति के असर से कोई भी सरकारी तंत्र अपना अस्तित्व नहीं बचा पाया।अन्य क्षेत्रों में भी इसके निश्चित प्रभाव दिखाई दिए।हॉब्सबाम कहते हैं कि गंभीर अर्थों में यह वैश्विक क्रांति थी।इस क्रांति ने 1848 में यूरोप के विकसित और पिछड़े दोनों ही किस्म के देशों को प्रभावित किया।हालांकि यह क्रांति सबसे व्यापक थी लेकिन यह सबसे कम सफल साबित हुई.इसके घटित होने के 6माह के बाद ही यह भविष्यवाणी की जा सकती थी कि इसकी विश्वव्यापी असफलता निश्चित है.लगभग 18 महीनों बाद सिर्फ़ एक को छोड़ सारी अपदस्थ सत्ताएं वापस,दोबारा सत्ता पर काबिज़ हो चुकीं थीं। हॉब्सबाम के अनुसार ´1848 की क्रांतियां विलक्षण ढ़ंग से इस किताब से अपना रिश्ता जोड़ती हैं।´ एक क्रांतिकारी किताब के रूप में ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´की सामाजिक-राजनीतिक ताकत का इससे एहसास होता है।हॉब्सबाम ने लिखा ´1848 की क्रांतियों के लिए व्यापक अध्ययन की आवश्यकता है और राज्य,जनता तथा भौगोलिक क्षेत्रों की अलग पड़ताल ज़रूरी है।यहां यह संभव नहीं।फिर भी उन सभी लोगों में कुछ बातें सामूहिक रूप से थीं.यह समझा जा सकता है.सिर्फ़ यह नहीं कि उनके घटित होने का समय एक था,बल्कि यह भी कि उनका एक साझा मिज़ाज था और एक साझा शैली थी.वह एक रहस्यमय-यूटोपियन माहौल था और उससे मिलता-जुलता आडंबरपूर्ण वक्तृत्व था´, ´शुरूआती दौर में स्वतंत्र होने का एहसास,जबर्दस्त आशा और आशावादी भ्रम.यह लोगों का वसंत था-और ठीक वसंत की तरह,स्थायी नहीं था इसलिए दीर्घायु नहीं हो पाया।´इन सभी क्रांतियों की प्रमुख साझा बात थी ´कि वे सब विजयी हुए फिर जल्द ही पराजित हुए´,´शुरूआती दिनों में ज़्यादातर क्रांति के क्षेत्रों की सरकारें या तो पूरी तरह ध्वस्त हुई हैं या असमर्थता की शिकार हुईं.सारी सरकारें बिना चुनौती के समर्पण कर गईं।अपेक्षाकृत बहुत ही कम समय में क्रांतियों ने अपनी पहलकदमी खो दी।´ अगस्त 1849 तक फ्रांस को छोड़कर सभी देशों में क्रांति मृतप्रायः हो गई। ´सारे पुराने सत्ताशाली अपनी सत्ताओं पर विराजमान हो चुके थे,कई जगहों पर पहले की अपेक्षा और शक्तिशाली अंदाजों में,क्रांतिकारी निर्वासित हो इधर-उधर बिखर गए थे.सारे संस्थागत बदलाव,सारे राजनैतिक और सामाजिक स्वप्न,जो1848 के वसंत में देखे गए थे,वे सारे के सारे नेस्तनाबूत हो चुके थे।´
      ´पूंजी के युग´ ने कला और साहित्य के क्षेत्र में जिन चीजों को जन्म दिया वे पहले के किसी भी युग में संभव नहीं थीं।यह सच है आधुनिककाल के पहले बहुत कुछ बेहतरीन साहित्य और दर्शन लिखा गया,उच्च कोटि के स्थापत्य और कला रूपों का निर्माण हुआ।लेकिन उन सबके बनाए मानकों और मूल्यों के दायरे और लेखकीय दायित्वों को आधुनिककाल में लेखक ने नए सिरे से परिभाषित किया। ´पूंजी के युग´ की केन्द्रीय विशेषता है हर चीज को बार-बार परिभाषित करना ।यहां तक कि तयशुदा चीजों,परिभाषाओं,संबंधों आदि को भी बार-बार परिभाषित करने की जरूरत पड़ती है,इसने साहित्य में ´समकालीनता´की धारणा को जन्म दिया।पहले साहित्य तो था लेकिन ´समकालीनता´ की धारणा नहीं थी।पहले लेखक नैसर्गिक भाव से लिखता था अब उसमें नया तत्व जुड़ा ´समकालीनता´।नए युग की रूचियां,स्वाद और मूल्य  ´समकालीनता´से प्रभावित थे।यह सच है कि कलाओं और साहित्य में गुणवत्ता के लिहाज से गिरावट आई,लेकिन ´उपन्यास´विधा के जन्म ने साहित्य के समूचे संसार को ही बदल दिया।
     ´पूंजी के युग´की महानतम साहित्यिक उपलब्धि है उपन्यास।हॉब्सबाम ने उपन्यास के बारे में लिखा ´साहित्य-उपन्यास के माध्यम से पोषित हुआ।यह एक ऐसा फार्म था जो बुर्जुआ समाज के उद्भव एवं अंतर्द्वद्वों से मुठभेड़ कर अपनी बात सक्षम ढ़ंग से रख रहा था।´ उल्लेखनीय है पुराने विधा रूपों नाटक,काव्य,महाकाव्य आदि में नए बुर्जुआ समाज को अभिव्यक्ति करने की साहित्यिक क्षमता ही नहीं थी,उपन्यास के जन्म के साथ पूर्व के सभी विधारूपों के चरित्र में उपन्यास की संगति में बदलाव आए।उल्लेखनीय है उपन्यास ,साहित्य की विभिन्न विधाओं में से एक विधा नहीं है।बल्कि यह विधाओं का राजा है।उसने अपने जन्म के साथ यह घोषणा की कि पहले से प्रचलित विधाएं अपने चरित्र को बदलें और उपन्यास की संगति में अपना विकास करें,जो विधा यह नहीं कर पाएगी वह अप्रासंगिक होने को अभिशप्त है।सन् 1848 के बाद शहरों और भवनों की संरचनाओं और स्थापत्य में बदलाब आया।भवन निर्माण कला को राजसी और आध्यात्मिक भवन कला के दायरे बाहर लाया गया।अब स्थापत्य कला के क्षेत्र में धर्मनिरपेक्ष और नागरिकबोध संपन्न इमारतों का जन्म हुआ। पहले वाले भवन पुराने किलों और राजसी वैभव के प्रतीक हुआ करते थे लेकिन नए भवन –स्थापत्य के केन्द्र में इसके लिए कोई जगह ही नहीं थी।
     हॉब्सबाम के अनुसार ´वियना शहर के पुराने किलों और दीवारों को 1850 के वर्षों में ढहा दिया गया और उससे उपजी ख़ाली जगहों में शानदार चक्करदार सड़कें बनाकर उनके पास बड़े भवनों को निर्मित कर दिया गया।वे कौन -से भवन थेॽ वे क्या थे ॽ एक स्टॉक एक्सचेंज(विनिमय-बाज़ार) का प्रतिनिधि था,दूसरा धर्म का (वोतिवखीशें),तीन उच्च शिक्षण संस्थान ,नागरिक सुविधा और सार्वजनिक मसलों से जुड़े प्रशासनिक भवन थे जैसे शहर की नगरपालिका,न्यायपालिका तथा संसद के महल, और लगभग आठ थिएटर संग्रहालय,शिक्षण-संस्थान आदि थे।´
     यह असल में बुर्जुआजी के विनीत भाव की अभिव्यक्ति का युग भी है।इस प्रक्रिया में बाजार भी बदला,नए किस्म के बाजार का जन्म हुआ।नए विस्तृत और वैभवशाली बाजार ने जन्म लिया।19वीं सदी में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अर्जित उपलब्धियों ने इन सभी क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तनों को जन्म दिया।जनोत्पादन और जनोपभोग को नई ऊँचाईयां मिलीं।हर स्तर पर ये दोनों प्रवृत्तियां नजर आने लगीं।जनोत्पादन के कारण हर चीज सस्ते और पुनरूत्पादित रूप में सामने आई।पुनरूत्पादन की तकनीक ने साहित्य,पत्रकारिता,शिक्षा आदि में क्रांतिकारी परिवर्तनों को जन्म दिया।इन क्षेत्रों का लोकतांत्रिकीकरण हुआ।साथ ही कलाओं और साहित्य में अवमूल्यन के तत्व का भी प्रवेश हुआ।पहले कला और साहित्य रूपों का अवमूल्यन नहीं होता था लेकिन नए युग में तेजी से कला और साहित्य रूपों का अवमूल्यन होने लगा।तकनीकी विकास ने साहित्य और कला के आभामंडल को छिन्न-भिन्न कर दिया।पहले लेखक राज्याश्रित था,उसके ही सहारे आजीविका के लिए जिंदा था लेकिन नए ´पूंजी के युग´में वह ´पूंजी´पर आश्रित था,´पूंजी´के नियमों से संचालित था।हॉब्सबाम ने लिखा है ´कला अपने स्वरूप में वैभवशाली और धन का उपार्जन करने वाली थी।सर्जनात्मक प्रतिभा जन-मानस को आकर्षित करती थी और स्तरहीन भी नहीं थी´, ´हम उन लोगों को खोज सकते हैं,जो बुर्जुआ समाज के प्रतिरोध में खड़े  या उन्हें हतप्रभ करने की योजना बना रहे थे।या उन लोगों को भी जो ग्राहक खोजने में असफल रहे। यह विशेषतया फ्रांस में हुआ।´
    ´पूंजी के युग´ में एक नए किस्म के कलाबोध,जीनियस और व्यक्तिगत-उद्यम को जन्म दिया।हॉब्सबाम के अनुसार ´इस दौर में स्त्री-पुरूष वस्तुओं से सुविधासंपन्न हो रहे थे और साथ ही सम्मान भी पा रहे थे।राजसत्ताओं,रजवाड़ों और कुलीन-वर्ग के समाज में कलाकार सज्जा प्रदान करनेवाला व्यक्ति ही नहीं था,बल्कि स्वयं सज्जा का पर्याय बन राजदरबार में उपस्थित रहता था अथवा महंगी विलासिता प्रदान करने वाली वस्तुओं का देयकर्ता होता था,जैसे केश-सज्जा करनेवाले,पोशाक बनानेवाले जिनकी आवश्यकता फ़ैशनेबल लोगों को बनाए रहती थी।बुर्जुआ समाज के लिए वह ´जीनियस´(विलक्षण) था,जो दरअसल व्यक्तिगत उद्यम का ग़ैर-वित्तीय संस्करण था।वह एक ऐसा ´आदर्श´था जो भौतिक सुख-सुविधा को ताज मुहैय्या कराता था और साथ ही आध्यात्मिक  मूल्यों को भी जिलाए रखता था।´
    ´पूंजी के युग´में कला की नई समझ पैदा हुई,जिसके तहत कहा गया कि कला को संपूर्ण मांगों का पूर्तिकर्ता होना चाहिए।पारंपरिक धर्म की जगह पढ़े-लिखे स्वतंत्र लोगों के बीच उसने अपने लिए जगह हासिल कर ली।इस वर्ग को हम मद्यमवर्ग के रूप में जानते हैं।यह इस युग का नया वर्ग था।इसके अलावा नए वर्ग के रूप में मजदूरवर्ग सबसे ताकतवर वर्ग के रूप में  जन्म लेता है।साहित्य में इन दोनों वर्गों की पक्षधरता,जीवनदृष्टि और चित्रण को लेकर सबसे ज्यादा लिखा गया।इस तरह के लेखन में बुर्जुआ और मजदूरवर्ग के आत्मविश्वास से भरपूर नजरिए का जमकर चित्रण हुआ। ´आत्मविश्वास´ इस दौर की सबसे बड़ी लेखकीय पूंजी है।
    ´पूंजी के युग´ में सृजन के हर क्षेत्र में एक ही प्रश्न छाया हुआ था ,वह था ´यह आखिर है क्या ´,यह इस युग का जायज सवाल है।इसके ही गर्भ से यथार्थवाद का जन्म हुआ। ´यथार्थ´ और ´जीवन´ को लेकर साहित्य और अन्य कला रूपों में सबसे ज्यादा वैचारिक-सर्जनात्मक बहसें हुईं। ´शाश्वत साहित्य´ की धारणा का अंत हुआ, ´साहित्य´की नई धारणा का उदय हुआ,साहित्य का मतलब ही है परिवर्तन,समाज और साहित्य की अंतर्क्रियाओं को समझने की ओर ध्यान गया और यह मान लिया गया कि जिस तरह समाज प्रतिक्षण बदलता है वैसे ही साहित्य भी बदलता है।इसी प्रकार पहले लेखक महत्वपूर्ण था लेकिन ´य़थार्थवाद´के युग में लेखक को हल्का बनाया गया और ´य़थार्थवाद´को प्रमुख और वजनी बनाया गया।पुराना साहित्य अतीत से जोड़ता था,नए युग का साहित्य भविष्य से जोड़ता है,यह बुनियादी अंतर हरेक कला रूप में अभिव्यंजित हुआ।
     सन् 1848 का कला और साहित्य पर राजनैतिक दृष्टि से असर यह हुआ कि राजनीतिक प्रतिबद्धता के बिना कला संभव ही नहीं थी।इस दौर में ´जो आंखें देखती हैं´,नारे के तहत साहित्य और फोटोग्राफी के बीच एक नए रिश्ते की शुरूआत हुई।वास्तविकता भी यही थी कि ’पूंजी के युग´की नायिका है फोटोग्राफी और नायक है उपन्यास।ये दोनों मिलकर समूचे समाज को वृहत्तर स्तर पर प्रभावित करते हैं।इस दौर के बारे में हॉब्सबाम ने लिखा ´बदलाव,तकनीकी ईजादों ,तथा विषयवस्तुओं को लेकर समकालीनता नए अर्थ गढ़ती है।´ इस प्रक्रिया में रचना में एक नए गुण का समावेश होता है वह है ´वर्तमान´।अब कला,साहित्य, राजनीति,दर्शन आदि को ´वर्तमान´की कसौटी पर रखकर परखा जाने लगा।साहित्य और जीवन, कला और जीवन, दर्शन और जीवन के बीच मौजूद महा-अंतराल का इसने अंत कर दिया।
पुस्तक का नाम- पूंजी का युग
लेखक-एरिक हॉब्सबाम
अनुवाद-वंदना राग
प्रकाशक-संवाद प्रकाशन,मुंबईःमेरठ।  
(इंद्रप्रस्थ भारती मेंप्रकाशित)

बुधवार, 30 नवंबर 2016

फिदेल की माँ , धर्म और गरीबी

        फिदेल कास्त्रो को स्पष्टवादिता का संस्कार क्रांति से मिला। क्रांतिकारी होने के नाते वे हर बात को स्पष्ट ढ़ंग से कहते थे।फिदेल का मानना था ´क्रांतिकारी राजनीतिज्ञ हर चीज के बारे में स्पष्ट और बेबाक बोलते हैं।´ यही स्पष्टवादिता क्रांतिकारियों को अभिव्यक्ति के मामले में अन्य विचारधारा के नेताओ से अलग करती है।मार्क्सवादियों में धर्मसंबंधी निजी सवालों के उत्तर देते समय अनेक किस्म के विभ्रम नजर आते हैं।लेकिन फिदेल के अंदर कोई विभ्रम नजर नहीं आते।

जब एफ.बिट्टो ने फिदेल से सवाल पूछा कि आपका जन्म धार्मिक परिवार में हुआ है ॽ तो फिदेल ने कहा इस सवाल का मैं किस तरह जवाब दूँ ॽ मैं इस सवाल का इस तरह उत्तर देना चाहूँगा,पहली बात यह कि मैं एक धार्मिक राष्ट्र से आता हूँ,दूसरी बात यह कि मैं एक धार्मिक परिवार में जन्मा,मेरी माँ लीना धार्मिक महिला थीं।मेरे पिता भी धार्मिक व्यक्ति थे।गांव में मेरा जन्म हुआ और मेरी माँ भी गांव की ही रहने वाली थीं।वह क्यूबा की रहने वाली थी।जबकि पिता गलीशिया,स्पेन के अत्यंत गरीब किसान थे।

फिदेल की माँ को किसी ईसाई मिशनरी ने धर्म की शिक्षा नहीं दी थी,वह एकदम अनपढ़ थीं। लेकिन उनकी गहरी धार्मिक आस्थाएं थीं।उन्होंने वयस्क होने के बाद अपने आप लिखना-पढ़ना सीखा। फिदेल के पिता का नाम एंजेल था। फिदेल ने कहा ´मेरी माँ एकदम निरक्षर थीं,उसने अपने आप लिखना-पढ़ना सीखा,मुझे याद नहीं है कि उसको लिखना-पढना सिखाने के लिए कोई शिक्षक मिला था,क्योंकि उसने किसी भी शिक्षक का कभी कोई जिक्र नहीं किया।उसने बहुत परिश्रम करके लिखना-पढ़ना सीखा,मैंने कभी नहीं सुना कि वह कभी पढ़ने के लिए स्कूल गयी ,वह स्व-शिक्षित थी,उसने कभी किसी स्कूल और चर्च में जाकर कोई शिक्षा ग्रहण नहीं की।मेरा मानना है उसके धार्मिक विश्वासों का स्रोत उसके परिवार की धार्मिक परंपराएं थीं।खासकर उसकी माँ (फिदेल की नानी) और माँ की माँ बड़ी धार्मिक थीं।´

बिट्टो ने फिदेल से पूछा कि क्या आपकी माँ नियमित चर्च जाती थी तो फिदेल ने कहा ´ वे नियमित चर्च नहीं जाती थीं,क्योंकि मेरा जहाँ जन्म हुआ था वह इलाका शहर से बहुत दूर गांव में पड़ता था,वहां कोई चर्च नहीं था।´

फिदेल का जहां जन्म हुआ उस गांव का नाम था बीरान,इस गांव में कुछ बड़ी इमारतें थी,कुछ रिहायशी घर थे,इन सबका स्पेनिश स्थापत्य था.चूंकि फिदेल के पिता स्पेनिश थे,अतः घर का स्थापत्य स्पेनिश था।उनके पास गांव में एक टुकड़ा जमीन का प्लॉट था,जिसमें खेती होती थी और लकड़ी का घर भी था,साथ ही पशुपालन भी करते थे।जाड़ों में पशुओं को घर के अंदर रखना होता था।घर में सूअर और गाएं थीं जिनका परिवार पालन-पोषण करता था।

दिलचस्प बात है फिदेल कास्त्रो के यहां तकरीबन बीस-तीस गाएं भी थीं, वे जब छह साल की उम्र के थे तो जाडों में घर में गायों के साथ सोते थे। फिदेल का बचपन का यह दौर गाय के गोबर और दूध के बीच गुजरा।

फिदेल की माँ की मृत्यु 6अगस्त1963 को हुई,यानी क्यूबा की क्रांति के छह महिने बाद।जबकि पिता की मृत्यु पहले ही 21अक्टूबर1956 को हो चुकी थी।उस समय फिदेल 30साल और दो महिने के थे।फिदेल ने अपनी आत्मकथा ´माई लाइफः फिदेल कास्त्रो´ में लिखा है कि वे अपनी मां के धार्मिक विश्वासों और आस्थाओं का हमेशा सम्मान करते थे।उनको एक क्रांतिकारी की माँ होने के नाते बहुत कष्ट उठाने पड़े।वे अत्यंत गरीब और सहिष्णु थीं।







गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

मनुष्य "पाने" की नहीं "देने" की भावना से बचता है


आजकल जो राजनीतिक आंदोलन और रैलियां होती हैं वे आम जनता या संघर्ष में शामिल जनता के मन में कैथारसिस या विरेचन या कुर्बानी की भावना पैदा नहीं करतीं, इसके उलटे आम जनता में लालच और मोह पैदा करती हैं। राजनीतिकदलों की समूची प्रचारनीति इस बात पर टिकी  है कि येन-केन प्रकारेण आम लोगों को अपने साथ लाया जाय,वे जनता की राजनीतिक शिक्षा नहीं करते, वे उसमें त्याग की भावना पैदा नहीं करते, वे प्रचार के जरिए उसमें उन्माद की भावना पैदा करके उसके विवेक को कुंद बनाते या विवेक का अपहरण कर लेते हैं। त्याग की भावना पैदा किए किए बना  किसानों और नौजवानों में किसी भी किस्म के उल्लास की भावना पैदा नहीं की है।
        जंतर-मंतर की रैली में आया किसान कायदे से उत्साह-उमंग में घर जाता तो बढ़िया होता लेकिन वह रैली में आने के बाद गहरी निराशा और हताशा में चला गया और उसने आत्महत्या का फैसला कर लिया,हमें यह बात सोचनी चाहिए कि वामदलों की किसानसभाएं और भारतीय किसान यूनियनों की राजनीति भी कमोबेश राजनीति का वही हथकंड़ा अपना रही हैं जो राजनीतिकदल अपना रहे हैं।
        हमें गंभीरता के साथ इस सवाल पर सोचना चाहिए कि जब किसानों की समस्या पर चौतरफा बातें हो रही हों और जुलूस आदि निकल रहे हों, टीवी पर असंख्य ट़ॉक शो हो रहे हों ऐसे में किसानों में आत्महत्या का सिलसिला थम क्यों नहीं रहा , कहीं हमारी संघर्ष की राजनीति में ही कोई बड़ा दोष तो नहीं आ गया ?
   राजनीति जब अर्थवाद और अवसरवाद के पैमानों से चलने लगती है तो आम जनता में लालच-लोभ और निराशा पैदा करती है, निहित स्वार्थी भावबोध पैदा करती है। किसान ,भूमि अधिग्रहण बिल आदि मसलों पर मोदी से लेकर राहुल तक,वामदलों से लेकर केजरीवाल तक यह फिनोमिना फैला हुआ है।  ये सभी मोर्चे "देने" की बजाय "पाने" की भावना से प्रचार कर रहे हैं।  
      लोकतंत्र में पाने की भावना से लड़ी गयी लड़ाईयां हमेशा हताशा में रुपान्तरित होती हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में अधिकांश लड़ाईयों में आम जनता हारती है क्योंकि सामाजिक-राजनीतिक शक्ति संतुलन उसके पक्ष में न होकर जनविरोधी ताकतों के पक्ष में रहता है।
     कहने का अर्थ यह है कि हमें हताशा,निराशा और आत्महत्या से समाज को बचाना है तो हमें राजनीति को अर्थवाद,अवसरवाद और कारपोरेटवाद से बचाना चाहिए। जंगजू संगठनों की मुश्किल यह है कि वे कारपोरेट घरानों से लड़ना जाहते हैं लेकिन अर्थवाद और अवसरवाद के उपकरणों और रणनीतियों के जरिए। कारपोरेट घरानों को इन उपकरणों के जरिए परास्त नहीं किया जा सकता। बल्कि ये दोनों रणनीतियां तो कारपोरेट नीतियों का अंग हैं।

        हमें समग्रता में अर्थवाद,अवसरवाद और कारपोरेटवाद के खिलाफ संघर्ष की रणनीति बनानी चाहिए। इसके अलावा उन्मादी प्रचारशैली से बचना चाहिए । उन्मादी प्रचारशैली अंततः विवेक की हत्या करती है। इससे नागरिक विवेक नष्ट होता है और पशु विवेक में इजाफा होता है। उन्मादी प्रचार जितना तेज हो रहा है अविवेक का तांडव उतना ही बढ़ता जा रहा है।       

मंगलवार, 4 जून 2013

केजीबी और साहित्य



केजीबी सोवियत संघ की खुफिया एजेंसी है,यह लंबे समय तक समाजवादी सोवियत संघ का ,आज अंग है रूस का। इस संस्था ने कला-साहित्य का कोई आंदोलन प्रमोट नहीं किया लेकिन साहित्य-कला के क्षेत्र में सोवियत संघ में काफी बड़ी संख्या में लेखकों को उत्पीडित किया। इनमें बड़े नाम हैं सोल्जेनित्सिन , सखारोव आदि।
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सोवियत संघ ने समाजवाद का जो मॉडल चुना यह वह मॉडल नहीं है जिसकी कल्पना मार्क्स-एंगेल्स ने की थी। समाजवादी सोवियत संघ में मानवाधिकारों को लेकर कोई समझ ही नहीं थी। खासकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि के लिए संविधान से लेकर सामाजिक संरचनाओं में कोई जगह नहीं दी गयी।फलतः विभिन्न किस्म की विचारधाराओं के माननेवाले लेखन और लेखकों के लिए भी कोई जगह नहीं थी। इसके विपरीत भारत में लोकतंत्र है और सभी नागरिकों को मानवाधिकारों की संविधान प्रदत्त गारंटी है। यहां पर कम्युनिस्टलेखक, विरोधी विचारधारा की आलोचना का संवैधानिक हक रखते हैं। इसके बाबजूद वे सोवियतसंघ आदि देशों के लेखकों के अभिव्यक्ति की आजादी के दर्द को महसूस करने में असमर्थ रहे।
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कार्ल मार्क्स -एंगेल्स के विचारों में क्रांतिकारी भावबोध इसलिए विकसित हुआ क्योंकि वे पूंजीवाद की उदार परंपराओं में विकसित हुए और क्रांतिकारी परंपराओं की खोज में सफल रहे । उन्हें उदार पूंजीवादी माहौल मिला। यदि सोवियत संघ में मार्क्स-एंगेल्स होते तो उनके साथ वही होता जो प्लेखानोव के साथ हुआ। प्लेखानोव को रूसी मार्क्सवाद का जनक माना जाता है।
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माइकेल एंजेलो ने एक बार स्वयं अपने विषय में कहा था " मेरा उपदेश ज्ञानी होने का दावा करने वाले अनेक अज्ञानियों को जन्म देगा।" इस पर प्लेखानोव ने कहा दुर्भाग्यवश यह भविष्यवाणी पूरी हो गयी है। आजकल मार्क्स का ज्ञान ऐसे अनेक अज्ञानियों को जन्म दे रहा है,जो ज्ञानी होने का दावा करते हैं।स्पष्ट रूप से इसमें मार्क्स का कोई कसूर नहीं है,बल्कि कसूर उन लोगों का है जो उनके नाम पर मूर्खता की बातें कर रहे हैं।ऐसी मूर्खताओं से बचने के लिए हमें भौतिकवाद की प्रणाली के महत्व को समझना आवश्यक है।
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सोवियत संघ के पतन में जिन कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उनमें KGB की भूमिका प्रधान कारक है। अर्सा पहले इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली ने सोवियत संघ के पतन पर एक विशेषांक निकाला था उसमें केजीबी के पूर्वप्रधान ने यह बात रेखांकित की थी। इसके अलावा केजीबी का काम था सोवियत नागरिकों की इलैक्ट्रोनिक नजरदारी करना और आंतरिक प्रतिवाद का दमन करना। इसके कारण घर-घर में जासूस पैदा हो गए,बाप अपने बेटे पर, बीबी अपने पति पर केजीबी के लिए जासूसी कर रहे थे। यह सीधे नागरिकों के जीवन को नरक बनाने के प्रयास थे जो अंत में सोवियत संघ के विघटन और समाजवाद के पतन तक ले गए।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -समापन किश्त-यशपाल


केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने का विचार किसी बहुत बड़ी झोंक या पिनक का परिणाम नहीं था। यह योजना एच.एस.आर.ए. की नीति और कार्यक्रम का मुंह बोलता उदाहरण था। अंग्रेज सरकार उस समय की केंद्रीय विधानसभा में दो नये दमनकारी कानून बनाने की चेष्टा कर रही थी। इनमें से एक था 'सार्वजनिक सुरक्षा कानून' और दूसरा मजदूरों की मांगें, और उनकी हड़तालों से संबंध रखने वाला 'औद्योगिक विवाद कानून' था। एच.एस.आर.ए. के साथी यह जानते थे कि विधान सभा में कांग्रेस और उदार दल के सदस्यों को मिला कर बहुमत इन कानूनों के विरुध्द में होगा। सरकार साधारण तरीके या बहुमत से इन कानूनों को पास नहीं करा सकेगी। यह भी मालूम था कि विधान सभा द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने पर भी सरकार इन कानूनों को वाइसराय की विशेष स्वीकृति से कानून बना देगी। यह दोनों कानून जनता में बढ़ते जाते असंतोष की भावना को कुचलने के प्रयोजन से बनाये जा रहे थे।
      एच.एस.आर.ए. की केंद्रीय समिति ने निश्चय किया था कि जिस समय इन कानूनों के बहुमत द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने पर भी इन्हें वाइसराय की आज्ञा से कानून बना दिए जाने की घोषणा विधानसभा में की जाए, एच.एस.आर.ए. की ओर से बम फेंक कर सरकार के दमनकारी व्यवहार के प्रति विरोध प्रकट किया जाये। बम फेंक कर विरोध प्रदर्शित करने के दो पहलू थे- एक पहलू में विदेशी सरकार को यह चुनौती थी कि तुम प्रजा के प्रतिनिधियों के निण्र्[1]ाय के विरुध्द शस्त्रा-शक्ति से शासन कर रहे हो तो उस का उत्तार हम भी शस्त्रा-शक्ति से देने के लिए तैयार हैं। दूसरे पहलू में वैधानिक आंदोलन द्वारा विदेशी सरकार का विरोध करने वाले राष्ट्रीय प्रतिनिधियों को चेतावनी थी कि आपका वैधानिक विरोध निष्फल है। आप के वैधानिक विरोध के बावजूद दमनकारी कानून बनाये जा सकते हैं। इस विधानसभा के पाखंड से क्या लाभ? विदेशी सरकार के दमनकारी शासन पर से वैधानिकता का नकाब हटा देना आवश्यक है। विदेशी सरकार के विरोध का वास्तविक मार्ग उससे युध्द करना है।
      इस काम की योजना को सफल बनाने के लिए एच.एस.आर.ए. का केंद्र भी अब दिल्ली में ही कायम किया गया और साथी जयदेव कपूर को विधान सभा की परिस्थितियों की जांच-पड़ताल करने के लिए नियुक्त कर दिया गया। तब भी विधानसभा में प्रवेश पासों द्वारा ही होता था। ऐसा प्रबंध कर लेना आवश्यक था कि जब चाहें दो-तीन पास सुविधा से मिल सकें। जयदेव ने विधानसभा की चौंकसी करने और पास देने वाले दफ्तर में अपना परिचय दिल्ली 'हिंदू-कालिज' में अर्थशास्त्र पढ़ने वाले विद्यार्थी के रूप में दिया था ताकि वह सुविधा से असेंबली के पुस्तकालय में आ-जा सके। दफ्तर के आदमियों पर विश्वास जमा लेने के बाद वह विधानसभा के अधिवेशन के समय दर्शकों की गैलरी में बैठ कर सभा की कार्यवाही भी देखता रहता। चौकसी दफ्तर के अधिकारी से काफी परिचय हो जाने पर जब चाहे दो या तीन पास बनवा लेने में भी जयदेव को कुछ कठिनाई न होती थी। साधारणत: पासों की आवश्यकता होने पर कांग्रेसी सदस्यों से चिट्ठी लेकर पास ले लिए जाते थे। जब-तब दूसरे साथी भी विधानसभा में आते-जाते रहते थे ताकि स्थान की परख अच्छी तरह से हो जाय।
      भगत सिंह भी जयदेव के साथ एक-दो बार विधानसभा में हो आया था। ऐसे हीएक मौके पर गैलरी में भगत सिंह की डाक्टर किचलू से आंखें चार हो गयी थीं। उस की दाढ़ी-मूंछ सफाचट देख कर डाक्टर साहब कुछ विस्मित से रह गए। सांडर्स कांड अभी ताजा ही था। पहले तो भगत सिंह ने अपना चेहरा अखबार की आड़ में छिपाने की कोशिश की परंतु जब डाक्टर साहब ने पहिचान ही लिया तो बाहर आने पर भगत सिंह ने उनसे नि:शंक मुलाकात की। डाक्टर किचलू ने बड़े सौहार्द्र से यथासंभव सहायता देने का विश्वास दिलाया। देहली में जब-जब भगत सिंह उनसे मिलता, वे सहायता देते भी रहते।
      विधान सभा में बम फेंकने की योजना के संबंध में ब्योरे की कई बातों पर विचार होता रहा। पहला प्रश्न था कि बम फेंकने वाले साथियों को घटना के पश्चात् सभा भवन से बचा कर निकाल लाने का प्रयत्न किया जाए या नहीं। आजाद भी एक दिन विधान सभा की गैलरी में कार्यवाही देखने गए और स्थिति का निरीक्षण कर इस परिणाम पर पहुंचे कि बम फेंकने वाले साथियों को सुरक्षित निकाल लाना कठिन नहीं अलबत्ता वहां से उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के लिए एक मोटर गाड़ी की जरूरत होगी।
      समय पर एक मोटर मिल सकने का भी प्रबंध कर लिया गया। यह भी निश्चय हो गया कि कौन-कौन साथी इस काम में भाग लेंगे परंतु भगत सिंह और विजय कुमार सिन्हा ने आगह किया कि विधान सभा में बम फेंक कर केवल परचे बांट देने से ही हम जनता के सम्मुख अपने उद्देश्य को पर्याप्त रूप से प्रकट नहीं कर सकेंगे। जनता एच.एस. आर.ए. को कुछ बिगड़े दिमाग खूनी नौजवानों की टोली समझ बैठेगी। आवश्यक यह है कि बम फेंकने वाले साथी बचने की कोशिश न करें। बम फेंकने के साथ वे साम्राज्यवाद विरोधी प्रदर्शन भी करें और बाद में मुकद्दमा चलने पर अदालत में अपनी नीति का स्पष्टीकरण करें। इस प्रकार हमारा कार्यक्रम और उद्देश्य जनता के सामने आ सकेंगे। साथियों ने इस मुकद्दमे की कल्पना एच.एस.आर.ए. के सैध्दांतिक मोर्चें के रूप में की थी।
      साधारणत: हम जो बातें कहना या जनता को सुनाना चाहते थे, वे राजद्रोही समझी जाती थीं। उन्हें कोई पत्र प्रकाशित करने का साहस नहीं कर सकता था, न सभा के मंच से ही वे बातें कही जा सकती थीं परंतु यह बातें अभियुक्तों के बयान के रूप में या अभियुक्तों पर लगाये गए अपराध के वर्णन के रूप में प्रकाशित हो सकती थीं। असेंबली-बमकांड और लाहौर-षडयंत्रा के मुकद्दमों से यह उद्देश्य एक सीमा तक पूरा होता रहा। बाद में सरकार भांप गयी कि क्रांतिकारी राजद्रोह के प्रचार के लिए उसकी अदालतों का ही उपयोग कर रहे हैं और एच.एस.आर.ए. के अभियुक्तों के बयानों का पत्रों में प्रकाशन भी गैरकानूनी करार दे दिया गया।
      यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि उस समय एच.एस.आर.ए. ने विधान सभा में बम फेंक लेना ही अपना लक्ष्य नहीं समझा बल्कि बम फेंकने को अपनी बात कह सकने का अवसर बनाने का उपाय समझा था। यदि बम फेंकना ही लक्ष्य होता तो बम फेंकने के बाद अपने आदमियों को निकाल सकने का अवसर होते हुए भी उन्हें कुर्बान कर देने का कोई अर्थ न होता। बम फेंकने मात्र के लिए दल का कोई भी साहसी व्यक्ति पर्याप्त हो सकता था। इस काम के लिए दल के विशेष योग्य व्यक्तियों को कुर्बान करने का प्रयोजन केवल यही था कि बम फेंक कर पैदा किये गए वातावरण में अपना उद्देश्य और नीति जनता के सामने रखी जाये। एच.एस.आर.ए. के इस व्यवहार से स्पष्ट हो जाता है कि इस समय सशस्त्रा क्रांति की चेष्टा करने वाले लोग आतंक की अपेक्षा जनमत और जनशक्ति के संगठन को अधिक महत्व दे रहे थे।
      विधान सभा में बम फेंकने को अपना सैध्दांतिक मोर्चा बनाने का निश्चय कर लेने पर यह समस्या सामने आई कि इस काम के लिए ऐसे कौन साथी नियुक्त किये जाएं जो एच.एस.आर.ए. के उद्देश्य को जनता के सामने स्पष्ट रूप से रखने के योग्य हो। इसके लिए कई बार कई नामों पर विचार किया गया।
      भगत सिंह के साथ कभी जयदेव कपूर का नाम रक्खा जाता, कभी राजगुरु का। विजय कुमार और शिव वर्मा भगत सिंह को असेंबली में भेजने का विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि आज़ाद और भगत सिंह में से किसी को भी इस काम के लिए नहीं जाना चाहिये क्योंकि संगठन के भविष्य के लिए इन दोनों की आवश्यकता अनिवार्य है।
      एच.एस.आर.ए. की केंद्रीय समिति की जिस बैठक में विधानसभा में बम फेंकने के लिए भगत सिंह को न भेज कर दूसरे दो साथियों को भेजने का निश्चय किया गया था, उस बैठक में सुखदेव न पहुंच सका था। इस निश्चय की सूचना सुखदेव को भी तुरंत भेज दी गयी थी। सूचना मिलते ही सुखदेव सीधा दिल्ली पहुंचा। अगली बात कहने से पहले यह कह दूं कि भगत सिंह और सुखदेव में बहुत ही गहरी घनिष्ठता थी। वे एक दूसरे के लिए जान दे सकते थे। सुखदेव ने भगत सिंह को एकांत में ले जाकर बात की-
      ''विधान सभा में बम फेंकने के लिए तो तुम्हें जाना था, दूसरे आदमियों को भेजने का निश्चय कैसे हो गया?''
      सम्भवत: भगत सिंह ने उत्तार दिया कि समिति का निर्णय है कि संगठन के भविष्य के लिए उसे पीछे रखने की जरूरत है।
      सुखदेव ने अपने रूखे और कड़े ढंग से विरोध किया-''यह सब बकवास है! तुम्हारे व्यक्तिगत मित्रा की स्थिति से मैं देख रहा हूं कि तुम अपने पांव कुल्हाड़ी मार रहे हो। यह देख कर मैं चुप नहीं रह सकता। जानते हो, तुम किस रास्ते पर चल रहे हो। तुम्हारा अंहकार बहुत बढ़ गया है। तुम अपने आपको दल का एक मात्र सहारा समझने लगे हो। तुम सान्याल दादा और जयचंद्र बनते जा रहे हो। जानते हो, तुम्हारा क्या अंत होगा? तुम एक रोज भाई परमानंद बन जाओगे।
      सुखदेव ने 1914-15 के लाहौर षडयंत्र के मुकदमे में दिया गया हाईकोर्ट के जज का निर्णय बताया। जज ने भाई परमानंद जी के लिए कहा था- 'भाई परमानंद इस क्रांतिकारी संगठन का मस्तिष्क और सूत्राधार है। परंतु व्यक्तिगत रूप से यह आदमी कायर है। यह संकट के काम में दूसरों को आगे झोंक कर अपने प्राण बचाने की चेष्टा करता रहा है।''
      सुखदेव ने कहा-''तुम सदा तो यों बच नहीं सकते। एक दिन तुम्हें भी अदालत के सामने आना ही पड़ेगा। उस दिन तुम्हारे लिए भी वैसा ही फैसला लिखा जाएगा जो भाई परमानंद के लिए लिखा गया था।''
      भगत सिंह के स्वभाव में ओज या उत्तेजना की कमी नहीं थी। वह चुपचाप सुखदेव की ओर देखता रहा। सुखदेव ने यहीं बस नहीं की। वह और आगे बढ़ा-''तुम कहना चाहते हो कि तुम संगठन के हित के लिए शहीद बनने के सम्मान को बलिदान कर रहे हो। ईमानदारी से अपने गिरेवान में झांक कर देखो! तुम इस समय मौत का सामना नहीं करना चाहते; क्योंकि तुम्हें जिंदगी इस समय बहुत लुभावनी लग रही है। तुम 'उस' औरत के स्नेह की आंच सेंकना चाहते हो और इसे दल के प्रति उत्तारदायित्व का बहाना बना रहे हो। तुम दूसरों से जो चाहे कहो, लेकिन मैं तुम से और तुम मुझ से नहीं छिप सकते। तुम फिसल रहे हो।''
      भगत सिंह बहुत देर तक कुछ बोल न सका। केवल सुखदेव की ओर घूरता रह गया जैसे पिंजरे में बंद शेर चोट करने वाले की ओर देखता रह जाए; फिर बोला-''विधानसभा में बम फेंकने मैं ही जाऊंगा। केंद्रीय समिति को मेरी बात माननी पड़ेगी। तुमने मेरा जो अपमान किया है उसका मैं उत्तर नहीं दूंगा। इसके बाद अब तुम मुझसे कभी बात न करना।''
      सुखदेव ने रूखे ही स्वर में उत्तर दिया-''प् ींअम कवदम उल कनजल जवूंतके उल तिपमदकष्ण् (मैंने अपने मित्र के प्रति अपना कर्त्तव्य ही पूरा किया है।) इस बातचीत के बाद दोनों अलग-अलग दल के केंद्रीय स्थान पर पहुंचे।
      सुखदेव जब दिल्ली से लाहौर पहुंचा उस समय भी उसकी आंखें सूजी हुई थीं। जान पड़ता था कि बहुत रोया है। वह किसी से बात न कर पाता था।
      1929 के अप्रैल की सात तारीख, दोपहर बाद सुखदेव ने भगतवती भाई को ढूंढ कर कहा-''भगत सिंह से अंतिम बार मिल लेना चाहते हो तो आज रात की गाड़ी से दिल्ली चलो!...भाभी को भी साथ ले लो।''
      सुशीलाजी उस समय छुट्टी लेकर लाहौर में भगवती भाई के यहां ही ठहरी हुई थीं।वे भी साथ गयीं। शची लाहौर से कलकत्तो तक और लौटते समय दिल्ली की यात्रा में 'लंबे चाचा जी' (भगत सिंह) से बहुत हिल गया था; इसलिए उसे भी साथ ले लिया गया। 8 अप्रैल प्रात: दिल्ली स्टेशन पर पहुंच कर सुखदेव ने भगवती भाई, दुर्गा भाभी और सुशीला जी को 'कुदसियाबाग' में जाकर प्रतीक्षा करने के लिए कहा और स्वयं दूसरी ओर चला गया।
      इन लोगों के कुछ समय प्रतीक्षा करने के बाद सुखदेव भगत सिंह के साथ वहां आया। क्या होने जा रहा है, इस विषय में कोई चर्चा नहीं हुई। भगत सिंह को रसगुल्ले और संतरे बहुत पसंद थे। भाभी और सुशीलाजी ये चीजें काफी मात्रा में साथ लेती आर्इं थीं। भगत सिंह को दोनों ने लाड़ से खूब खिलाया। साढे दस बजे के लगभग भगत सिंह विदा लेकर चला गया। भाभी और सुशीलाजी इतना तो जानती थीं कि भगत सिंह को अंतिम विदाई दे रही हैं। परंतु उन्हें यह मालूम न था कि क्या होने जा रहा है। यह दल का अनुशासन था। दोनों ने भगत सिंह को रोली और अक्षत से टीके लगा दिये।
      8 अप्रैल, 1929 के दिन विधान सभा में हिंदुस्तानी जनमत के विरोध के बावजूद 'सार्वजनिक सुरक्षा' और 'औद्योगिक विवाद' बिलों को वाइसराय की विशेष स्वीकृति से कानून बना देने की घोषणा की जाने वाली थी। विधान सभा की कार्यवाई आरंभ होने पर पहले प्रश्न और उत्तार होते हैं तब भी यही क्रम था। भगत सिंह और दत्ता जयदेव कपूर के साथ असेंबली में ऐसी जगह जाकर बैठ गए जहां से नीचे फर्श पर सरकार के सदस्यों की जगह बिलकुल सामने पड़ती थी।
      इस बात पर भी काफी विचार किया जा चुका था कि बम नीचे बैठी हुई विधान सभा के किस भाग में फेंके जायेंगे। अंग्रेज सरकार के गृह-सदस्य और उस समय के सरकारी दल के नेता सर जान शुस्टर और  विरोधी दल के नेता पंडित मोतीलाल नेहरू और इन के साथी आमने-सामने बहुत समीप ही बैठते थे। बम ठीक जान शुस्टर पर फेंकने से सरकारी सदस्यों के साथ ही कांग्रेस के सदस्यों के भी काफी चोट खा जाने और विधान सभा के प्रधान की कुर्सी पर बैठे विठ्ठलभाई पटेल के भी बहुत चोट खा जाने की आशंका थी इसलिए यह निश्चय किया गया था कि बम सर जान शुस्टर के कोच की काठ की दीवार के पीछे फेंका जाए ताकि उसकी चोट कांग्रेसी सदस्यों की बेंचों की ओर न जा सके।
      बम ऐसी जगह फेंकने से उसकी अधिकांश शक्ति जरूर ही काठ के भारी फर्नीचर से दब गयी और सरकारी सदस्यों को भी कम चोट आने की सम्भावना रही परंतु इससे कांग्रेस प्रतिनिधियों के लिए आशंका का कोई अवसर नहीं रहा। यह भी सोचा गया था कि कांग्रेस-सदस्यों को उस दिन विधान सभा में न जाने की चेतावनी दे दी जाए परंतुऐसा करने पर संदेह हो जाने से बात समय से पूर्व फूट जाने की आशंका थी इसलिए ऐसा नहीं किया गया।
      ज्यों ही सर जान शुस्टर उपरोक्त बिलों पर वाइसराय की विशेष स्वीकृति की घोषणा करने के लिए खड़े हुए, विधान सभा में उपस्थित एच.एस.आर.ए. के दूसरे साथी सभा भवन से बाहर निकल गए। भगत सिंह और दत्त के सभा भवन में जाने के 'पास' इन लोगों ने पहले ही उनसे ले लिए थे। यह सावधानी आवश्यक थी क्योंकि भगत सिंह और दत्ता के गिरफ्तार हो जाने के बाद उनकी तलाशी ली जाने पर उनकी जेब में मिले पासाें से यह न मालूम हो जाए कि उन्होंने किस सदस्य की मार्फत ये पास लिए थे। उस सदस्य से अभियुक्तों का संबंध मान लिया जाता और पुलिस उसे परेशान करती।
      ज्यों ही शुस्टर ने यह घोषणा की कि 'सार्वजनिक सुरक्षा' और 'औद्योगिक विवाद' बिल विधान सभा में बहुमत से अस्वीकार कर दिए जाने पर भी वाइसराय की विशेष स्वीकृति से कानून बना दिए गए हैं, भगत सिंह और दत्ता अपनी जगह पर उठ खड़े हुए। पहले से निश्चित स्थान पर भगत सिंह ने एक बम शुस्टर के काउच की दीवार के पीछे फेंक दिया। विस्फोट के भयंकर शब्द से सभा भवन में बैठे लोग बहरे से हो कर      स्तब्ध रह गए। इस के बाद दूसरा बम दत्त ने लगभग उसी स्थान पर फेंका। सभा भवन में भगदड़ मच गयी। हाल नीले धुंये से भर गया। सब सदस्य और दर्शक आतंक में भागने लगे। भवन में उस समय केवल तीन या चार व्यक्तियों के होश-हवास दुरूस्त जान पड़े। बिठ्ठल भाई पटेल, पंडित मोतीलाल नेहरू और जिन्ना अपनी कुर्सियों पर जैसे बैठे थे बैठे रहे। सर जान शुस्टर घोषणा करते समय खड़ा था वह वैसे ही खड़ा रह गया। भगत सिंह ने सर जान शुस्टर पर दो गोलियां चलायीं। यह गोलियां शुस्टर के शरीर पर न लग कर उस के डेस्क पर लगीं। शुस्टर अपने पर वार होता समझ कर आत्मरक्षा के लिए अपनी डेस्क के नीचे हो गया। शुस्टर के दुबक जाने के बाद भगत सिंह के पिस्तौल में छह गोलियां और जेब में आठ गोलियां शेष थीं परंतु उसने किसी दूसरे व्यक्ति पर गोली नहीं चलायी।
      भगत सिंह और दत्त ने बहुत ऊंचे स्वर में नारे लगाये- इंकलाब जिंदाबाद! साम्राज्यवाद का नाश हो! दुनिया के मजदूरो एक हो! -नारे लगाते हुए उन दोनों के एच.एस.आर.ए. के लाल रंग के घोषणापत्र हाल में फेंक दिए ।
      बम के धड़ाके से विधान सभा के सभी लोग और चौकसी के लिए तैनात सभा भवन की पुलिस भी इतना घबरा गयी थी कि दर्शकों की गैलरी पूरी खाली हो जाने के बाद भी कुछ देर तक किसी ने भी भगत सिंह और दत्ता के समीप आने का साहस नहीं किया। भगत सिंह और दत्ता अव्बल तो दर्शकों की भीड़ के साथ ही बाहर निकल जा सकते थे और उस के बाद भी निकल जाने का काफी समय था। पिस्तौल और बारह कारतूस तब भी इन लोगों के पास मौजूद थे। इन पर चलाये गए मुकद्दमे में पुलिस केगवाहों के बयान के आधार पर जज ने अपने फैसले में भी यह कहा था कि यदि अभियुक्त चाहते तो उन के बच कर भाग आने के लिए काफी अवसर था।
      यह भी तो निश्चित था कि उन्हें भागकर बचना नहीं था बल्कि अपनी बात कह सकने का अवसर बनाना था। यह बात भी अप्रासंगिक नहीं होगी कि 'साम्राज्यवाद का नाश हो' (क्वूद ूपजी प्उचतपंसपेउ) का नारा लगाया और संसार के मजदूरों के एके की पुकार की। यह दोनों नारे एच.एस.आर.ए. के तत्कालीन राजनैतिक दृष्टिकाण को स्पष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
      भगत सिंह और दत्त के काफी देर तक गैलरी में निश्चल खडे रहने पर सार्जेंट टेरी ने आकर उन से प्रश्न किया ''क्या यह तुम्हीं ने किया था?''   
      भगत सिंह ने हामी भरी। गोली भरा पिस्तौल अब भी उस के हाथ में था। वह चाहता तो उस गोरे सार्जेन्ट को वहीं ठंडा कर देता परंतु एच.एस.आर.ए. की युध्द घोषणा अंग्रेज व्यक्तियों के विरुध्द नहीं बल्कि अंग्रेज साम्राज्यशाही व्यवस्था के विरुध्द थी। भगत सिंह उस समय के लिए निश्चित अपना काम कर चुका था। अलबत्ता सर जान शुस्टर पर गोली चलाने का कारण यह था कि वह विधान सभा में ब्रिटिश शासन व्यवस्था  के मुख्य प्रतिनिधि के रूप में था। उस समय भगत सिंह और दत्ता खाकी निकर और कमीज पहने हुए  थे। दोनों के शरीर पर ऊनी कोट भी थे। भगत सिंह हाथ में फेल्ट हैट भी लिए था।
      भगत सिंह और दत्त के आत्मसमर्पण कर देने पर सशस्त्र पुलिस ने उन्हें बड़े साज-बाज से गिरफ्तार कर लिया और खूब चौकसी से घेर उन्हें अलग-अलग मोटरों में बैठा कर 'नई दिल्ली' के थाने की ओर ले गयी।
      भगत सिंह और दत्त को लिए मोटरें सड़क पर एक टांगे के पास से गुजरीं। इस टांगे में भगवतीचरण, भाभी और सुशीला जी मौजूद थे। सुखेदव टांगे का सहारा लिए साइकिल पर साथ-साथ चल रहा था। टांगे के पास से पुलिस से भरी मोटरें गुजरने पर इन लोगों ने एक दूसरे को पहचाना परंतु व्यवहार न पहचानने का ही किया। यह मन का कितना बड़ा संयम था। भगत सिंह को उस समय मृत्यु के हाथों से लौटा लेने के लिए अपने प्राण दे देना इनके लिए अधिक आसान होता। संयम और अनुशासन का ऐसा उदाहरण विकृत मस्तिक या कायर के लिए संभव नहीं हो सकता। वयस्क और समझदार लोग तो वैसे ही चुप जैसे 'पन्ना दाई ' कर्तव्य रक्षा में अपनी संतान को टुकड़े-टुकड़े होते देख कर चुप रह गई थी परंतु भाभी की गोद में बैठा शची भगत सिंह को समीप से गुजरती मोटर की तरफ बांह उठा कर जोर से चिल्ला उठा-''लंबे चाचा जी!''
      भाभी ने तुरंत शची का मुंह गोद में दबा कर चुप करा दिया। यह क्या पीड़ा से उठती रूलाई निकलने न देने के लिए अपना गला घोंट लेने से कम था ?   विधान सभा में बम विस्फोट की घटना के समाचार ने देश भर को हिला दिया। अंग्रेजी सरकार की पुलिस घबरा गयी थी। दिल्ली से तुरंत कलकत्ते की 'विशेष क्रांतिकारी पुलिस' (ैचमबपंस ज्मततवतपेज च्वसपबम) को पुकारा गया। दिल्ली से सभी दूसरे प्रांतों की राजधानियों तक टेलीफोन और दूसरे तार सरकारी संदेशों के लिए रिजर्व कर लिए गए। उन दिनों दिल्ली में 'स्टेट्समैन' के संवाददाता लाला दुर्गादास थे। उन्होंने उसी समय विधान सभा बमकांड का समाचार टेलीफोन या तार द्वारा कलकत्ते भेजना चाहा परंतु समाचार भेजने के सभी साधन सरकारी काम के लिए रिजर्व थे। लाला दुर्गादास ने इस समय पत्राकार की विशेष सूझ दिखाई। उन्होंने यह समाचार 'स्टेटसमैन' के लन्दन दफ्तर को भेज दिया और लन्दन से यह समाचार वायरलेस से कलकत्ते भेज दिया गया। जिस समय 'एसोशियेटेड प्रेस आफ इंडिया' द्वारा इस घटना का समाचार कलकत्ते के दूसरे पत्रों को मिला, 'स्टेटसमैन' का बम घटना का समाचार लिए 'विशेषांक' बाजार में भी पहुंच चुका था।
      पुलिस ने इस कांड के पीछे षडयंत्र का पता लगाने की सिर तोड़ कोशिशें कीं परंतु कहीं कोई सूत्रा न मिल सका। इस समय तक सांडर्स कांड का भी कोई सूराग न मिल सका। लाहौर-षड़यंत्र और सांडर्सवध से इस घटना के संबंध का पता लाहौर बम फैक्टरी में गिरफ्तार किये गए मुखबिर जयगोपाल के बयान से ही मिला था।
      अदालत के मंच से अपनी बात कह सकने के लिए एच.एस.आर.ए. ने भगत सिंह और दत्ता को विधानसभा भवन में बलिदान किया था। अदालत में अपने-अपने सिध्दांत की बात किस प्रकार कह सकते थे! उन पर असेंबली में बम फेंक कर पर हत्या करने की चेष्टा का अभियोग लगाया गया था। और सेशन जज ने भारत दंड विधान की धारा 307 और विस्फोटक पदार्थ रखने के अपराध में उन्हें उम्र कैद का दंड दिया था।






यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी-7-यशपाल

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आजाद को अच्छी-अच्छी पुस्तकें लाकर साथियों को पढ़ाने का बहुत शौक था परंतु उपन्यास या यौन विषय (सेक्स) संबंधी पुस्तकें देखकर उन्हें बहुत ही चिढ़ उठती थी। ब्रह्मचर्य का एक बहुत रूढ़िवादी आदर्श उस समय तक आजाद के मस्तिष्क में था। उससे पहले दो-एक दफे दल में ऐसे कांड हो चुके थे कि साथियों ने नारी के आकर्षण के कारण अपने कर्तव्य में निर्बलता दिखाई थी। आजाद को नारी, प्रेम और सौंदर्य की चर्चा से ही चिढ़ हो गई थी। कसरत स्वयं करने और दूसरों को कराने का भी शौक था। यदि कोई और काम न हो तो आजाद का मन लगातार बातचीत करने से या हवाई पिस्तौल ले कर किसी बारीक चीज पर निशाने का अभ्यास करते रहने से बहलता था।
      उस समय आजाद और दूसरे साथियों की ब्रह्मचर्य, नारी और सौन्दर्य के बारे में कैसी धारणायें थीं, यह दो-एक बहुत छोटे-छोटे उदाहरणों से स्पष्ट हो जायेगा। प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप में स्त्री का प्रसंग चलते ही आजाद एतराज किये बिना न रह सकते थे- ''फिर 'चुम्बक' की बात। यह साला 'चुम्बक' जिसे लगा ले डूबा। सिपाही को औरत से क्या मतलब '' उस समय ऐसी धारणा केवल आजाद की थी। दूसरे साथियों को स्त्री और प्रेम की चर्चा से कोई परहेज नहीं था। हां, सुखदेव भी इस प्रसंग में कम ही रस लेता था परंतु आदर्श की दृष्टि से कोई विरोध न था। उसका कहना था-'जब औरत है नहीं तो उस की चर्चा से क्या फायदा।'
      आजाद का सब से प्रिय गाना था-'मां हमें विदा दो, जाते हैं हम विजयकेतु फहराने आज।' वे प्राय: ही भगत सिंह या राजगुरु और बाद में बच्चन (वैशम्पायन) से यह गाना सुनाने के लिए अनुरोध करते। राजगुरु यों तो धीर स्वभाव था परंतु चुटकियां लेने में उसे मजा आता। जब आजाद उसे गाने के लिए कहें तो वह जरूर ही कोई इश्किया गजल गुनगुनाने की चेष्टा करने लगता। यह गजलें वह प्राय: भगत सिंह से सुन कर याद कर लेता था। भगत सिंह को शायरी से भी बहुत शौक था। महाराष्ट्रीय होने के कारण राजगुरु का उर्दू उच्चारण बहुत विचित्र था। गजल में वह आशिक और 'माशूक' को प्राय: ही 'आशुक' और 'माशिक' कह जाता और खूब हंसता। यदि आजाद 'विजयकेतु' वाला गाना सुनने पर जिद्द ही करें तो वह हंस कर उत्तर देता-'अभी पुलिस आता है विजयकेतु लेकर।'
      एक रोज राजगुरु कहीं से बहुत सुंदर स्त्री की तस्वीर का एक कैलेण्डर ले आया और लाकर 'नाई की मंडी' आगरा वाले मकान में दीवार पर लटका दिया। आजाद कहीं बाहर से लौटे। बच्चन (वैशम्पायन) ने उस कैलेंडर की और  संकेत किया-''भैया, देखा! यह कौन ले आया है?''
      आजाद ने कैलेंडर की ओर देखा। माथे पर बल पड़ गए। कैलेंडर को कील समेत दीवार से खींच लिया और फाड़ कर फेंक दिया।
      कुछ देर बाद राजगुरु लौटा। दीवार से अपना कैलेंडर गायब देखकर वह ऊंचे स्वर में पुकार उठा-''अरे, हमारे कैलेंडर का क्या हुआ?''
      बच्चन ने ओंठ दबाकर फर्श पर पड़े कैलेंडर के टुकड़ों की ओर देखा। राजगुरु ने झुंझलाहट और क्रोध के स्वर में प्रश्न किया-''यह किस ने किया?''   ''हमने किया।'' आजाद भला किसी से डरते थे।
      आजाद के प्रति आदर से स्वर को कुछ धीमा कर राजगुरु ने विरोध किया-''आपने क्यों फाड़ डाला? हम इतने शौक से तस्वीर लाये थे।''
      ''हमें-तुम्हें ऐसी तस्वीरों से क्या मतलब?'' आजाद ने डपट दिया।
      ''वाह, इतनी खूबसूरत तस्वीर थी।''
      ''हमें-तुम्हें खूबसूरत से मतलब?'' नाराजगी से ऊंचे स्वर में आजाद ने डांटा।
      ''तो जो कुछ खूबसूरत होगा उसे फाड़ डालोगे, तोड़ डालोगे?'' राजगुरु भी अड़ गया।
      ''हां तोड़ डालेंगे?'' आजाद ने सीना तान लिया।
      ''तो जाकर ताजमहल को भी तोड़ डालो'' राजगुरु ने चुनौती दी।
      ''हां तोड़ डालेंगे, जब हमारा बस चलेगा।'' आजाद की आंखों में सुर्ख डोरे उभर आए।
      दूसरे साथियों को होंठ दबाये, आंखें चुराते देख कर राजगुरु की झल्लाहट भी मुस्कराहट में बदल गई।
      ब्रह्मचर्य के विषय में 1929 के आरंभ में आजाद की ऐसी ही धारणा थी परंतु एक ही वर्ष में उन का दृष्टिकोण बहुत ही स्वाभाविक और यथार्थवादी हो गया था। अनाचार और उच्छृंखलता से तो आजाद को सदा ही घृणा रही परंतु 1930 के जाड़ों की बात मुझे याद है कि कानपुर के 'चुन्नीगंज' मुहल्ले में आजाद मुझ से बात किया करते थे कि क्रांति को जीवन भर का काम बना लेने वाले आदमी को क्रांतिकारी स्त्री से विवाह कर लेना चाहिए। कभी मजे में आकर सम्भावित पत्नी का जिक्र करते हुए कल्पना किया करते थे:
      ''...पहाड़-पहाड़ घूम रहे हों, एक राइफल उसके कंधे पर हो और एक हमारे     कंधे पर। दुश्मन से घिर जायें। वह राइफलें भरती जाए और हम दनादन-दनादन गोली चलाते जायें।''(क्रमशः)
                       

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -6-यशपाल


लाहौर से फरार हो जाने पर भगतसिंह ने दिल्ली, आगरा, कानपुर, पटना और कलकत्ते तक बार-बार चक्कर लगाकर भिन्न-भिन्न प्रांतों के क्रांतिकारियों को एक सूत्र में बांधने की चेष्टा की। स्थिति सभी प्रांतों में खराब ही थी। स्थिति खराब होने का मुख्य कारण था, साधनों और संगठन की कमी। गुप्त क्रांतिकारी आंदोलन की सब से बड़ी कठिनाई यह थी कि उसका उद्देश्य तो सार्वजनिक था परंतु उसे जनता से दूर रह कर जनता की सहायता के बिना चलना पड़ रहा था। अपने दल के लोगों अथवा सहानुभूति रखने वाले उंगलियों पर गिने जा सकने योग्य व्यक्तियों को छोड़ कर क्रांतिकारी अपनी आवश्यकता और स्थिति का भेद किसी को नहीं दे सकते थे। काकोरी की डकैती असफल हो जानेऔर इस मामले में बहुत से लोगों के मुखबिर भी हो जाने के कारण इस समय क्रांतिकारी सर्वसाधारण लोगों से सहानुभूति की आशा कम ही रख सकते थे।
      युक्त प्रांत में उन दिनों बहतु निरुत्साह था। सशस्त्र क्रांति के बढ़ने की कोई आशा थी तो केवल काकोरी के बंदियों को छुड़ा सकने से। इसके लिए अनेक योजनाएं बार-बार बनतीं और प्रयोग में आए बिना ही रह जातीं। इस अवस्था से ऊबकर काकोरी दल के नेता शहीद रामप्रसाद बिस्मिल ने जेल से संदेश भेजा था।बिस्मिल की बड़ी इच्छा थी कि एक बार किसी तरह जेल से निकल कर विदेशी सरकार से दो-दो हाथ कर पाते परंतु दल में इतनी शक्ति नहीं थीं; ये योजनाएं कपोल कल्पनाएं ही रह गई।भगत सिंह, सुखदेव, विजय और शिव वर्मा के प्रयत्नों से उत्तर भारत के प्रांतों के क्रांतिकारी प्रतिनिधियों की एक बैठक की योजना दिल्ली में की गई थी। यह बैठक 9-10 सिंतबर, 1928 को फीरोजशाह कोटला के खंडहरों में हुई थी। इस बैठक में पंजाब से  सुखदेव और भगत सिंह, राजपूताना से कुंदनलाल, युक्तप्रांत से शिव वर्मा, ब्रह्मदत्ता मिश्र, जयदेव, विजय कुमार सिन्हा, सुरेंद्रनाथ पांडे और बिहार से फणींद्रनाथ घोष और मनमोहन बनर्जी आए थे। आजाद इस बैठक में नहीं आ पाए थे। भगत सिंह और शिव वर्मा उनसे मिल चुके थे। आजाद ने आश्वासन दे दिया था कि बहुमत से जो कुछ निश्चय होगा, उसे वे स्वीकार कर लेंगे।
      अब तक भिन्न-भिन्न प्रांतों में क्रांतिकारी दलों के अपने-अपने पृथक नाम थे। बंगाल-बिहार के 'अनुशीलन' और 'युगांतर' समितियां, युक्त प्रांत में 'हिंदुस्तान प्रजातंत्र सेना' और 'बनारस रिवोल्यूशनरी पार्टी'। दिल्ली की बैठक में भगत सिंह और सुखदेव ने सभी प्रांतों से प्रतिनिधि लेकर एक केंद्रीय-समिति बनाई जाने और पूरे संगठन का नाम 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (हिंदुस्तानी समाजवादी प्रजातंत्रा सेना) रखे जाने का प्रस्ताव रखा।
      सोशलिस्ट शब्द जोड़े जाने का सुझाव भगत सिंह और सुखदेव ने ही दिया था परंतु युक्तप्रांत के शिव वर्मा और विजयकुमार सिन्हा का भी सबल अनुमोदन इनके साथ था। यह लोग कानपुर के संगठित मजदूर आंदोलन द्वारा प्रभावित हो चुके थे और कानपुर की मजदूर सभा से भी अपना संपर्क बना चुके थे। उन लोगों पर सन् 1925 के 'कानपुर बोल्शेविक षडयंत्र' का भी प्रभाव जरूर पड़ा होगा। सबसे बड़ी बात तो थी सन् 1928 में जगह-जगह हड़तालों द्वारा मजदूरों की चेतना और शक्ति का प्रदर्शन। एच.एस.आर.ए. के साथी मजदूर श्रेणी की क्रांतिकारी शक्ति से परिचित होने लगे थे।
      क्रांतिकारियों की बहुत सी शक्ति मुकद्दमों में बन गए मुखबिरों और पुलिस केथे। काकोरी की डकैती असफल हो जाने मामूली अफसरों के वध में ही नष्ट होती रही थी। दिल्ली में निश्चय किया गया कि अब केवल ऐसे ही मामलों को हाथ में लिया जायेगा जिनका सार्वजनिक राजनैतिक महत्व हो सके। इस उद्देश्य से सब से पहले चुना गया साइमन कमीशन को। इस कमीशन के आने पर बम्बई में मजदूरों की जो व्यापक हड़ताल हुई थी, उससे अपना सहयोग प्रकट करना दल आवश्यक समझता था।
      दिल्ली की बैठक में यह भी स्पष्ट रूप से निश्चिय कर लिया गया कि भविष्य में हमारा कार्यक्रम किसी एक व्यक्तिगत नेतृत्व में नहीं चलेगा। दल के सब हथियार और प्राप्त होने वाला धन केंद्रीय समिति के हाथ में रहेंगे। कोई भी कार्य करने से पहले सात आदमियों की केंद्रीय समिति में उस पर विचार किया जायेगा।
      इस बैठक में विजय कुमार सिन्हा और भगत सिंह पर अंतरप्रांतीय संबंध बनाए रखने का उत्तारदायित्व दिया गया। सुखदेव को पंजाब, शिव वर्मा को युक्तप्रांत, कुंदनलाल को राजपूताना, फणींद्रनाथ को बिहार का प्रतिनिधि संगठनकर्त्ता स्वीकार किया गया। हथियारों और कोष की कमी के कारण यह निश्चय किया गया कि हथियार और कोष पूर्णत: केंद्रीय-समिति के हाथ में रहें। कोष वास्तव में कुछ था ही नहीं। हथियार भी कम ही थे, इसलिए यह तय पाया कि जिस प्रांत में जब आवश्यकता हो हथियार भेज दिए जायें और फिर लौटा कर केंद्रीय समिति में दे दिए जाएं।
      इससे पूर्व के दल में से चंद्रशेखर आजाद ही ऐसे व्यक्ति थे जो ज्येष्ठ होने का दंभ छोड़ कर नए लोगों के साथ नये ढंग से काम करने के लिए तैयार थे। आजाद के अतिरिक्त उस समय नये लोगों में से शस्त्राों का उपयोग भी कोई दूसरा व्यक्ति ठीक से नहीं जानता था; इसलिए सशस्त्रा या सैनिक कार्य का नेता उन्हीं को बनाकर एच.एस.आर.ए. का 'कमांडर-इन-चीफ' निश्चिय किया गया था।
      लाहौर में नौजवान भारत सभा को यह निर्देश दिया गया था कि नगर में साइमन कमीशन के आने पर जहां तक हो सके सभी राजनैतिक दलों को मिलाकर विकट से विकट प्रदर्शन किया जाये। नौजवान भारत सभा की पुकार थी कि-''अंग्रेज सरकार को हमारे भाग्य निर्णय का अधिकार नहीं है। वे कमीशन भेजने वाले कौन होते हैं?'' लाहौर में साइमन कमीशन के बहिष्कार के प्रदर्शन का नेतृत्व सभा ही कर रही थी। सब ओर मुकम्मिल हड़ताल, काले झंडे और नंगे सिरों की बाढ़-सी नजर आती थी। इतने बड़े प्रदर्शन से प्रभावित हो कर कांग्रेस के नेताओं को प्रदर्शन में आगे चलना ही पड़ा।
   वृध्द पंजाब केसरी लाला लाजपत राय को भीड़ के धक्कों से बचाये और धूप में उनके सिर पर छतरी संभाले नौजवान उन्हें स्टेशन तक ले गए। भीड़ के आगे नौजवानभारत सभा के लोग थे। उन्होंने पुलिस की धमकियों के बावजूद कमीशन के लिए रास्ता देने से इनकार कर दिया। वे कमीशन को काले झंडे दिखा देने और 'साइमन गो बैक' की पुकार उनके कानों तक पहुंचा देने पर तुले हुए थे। पुलिस ने लाठी चार्ज किया। सभा के लोगों से जहां तक बन पड़ा जनता को पीछे हटने से रोके रहे। जनता के हृदय में अंग्रेजी सरकार के प्रति प्रबल घृणा उत्पन्न कर सकने का यह अच्छा अवसर था।
   लालाजी को घेरे इस मोर्चें को टूटते न देखकर समीप खड़े पुलिस सुपरिटेंडेंट स्काट ने इस टोली पर हमला करने की आज्ञा दी। डी.एस.पी. सांडर्स स्वयं छोटी लाठी हाथ में लेकर सिपाहियों के साथ इस टोली पर टूट पडा। उसकी एक लाठी से लालाजी के सिर पर तनी हुई छतरी टूट कर उनके कंधे पर भी चोट आ गयी।
   'मोरी दरवाजे' की विराट सार्वजनिक सभा में सुखदेव और मैं भीड़ के पीछे खड़े थे। हम लोगों से कुछ ही कदम दूर डिप्टी पुलिस सुपरिटेंडेंट नील खड़ा था। लालाजी ने अपनी ओजपूर्ण वक्तृता में सुबह की घटना की निंदा करते हुए कहा-''जो सरकार निहत्थी प्रजा पर इस तरह के जालिमाना हमले करती है, उसे तहजीबयाफ्ता (सभ्य) सरकार नहीं कहा जा सकता और ऐसी सरकार कायम नहीं रह सकती। मैं आज चैलेंज देता हूं कि इस सरकार की पुलिस ने मुझ पर जो बार किया है। वह एक दिन इस सरकार को ले डूबेगा।'' अंग्रेज अफसरों को लक्ष्य कर लालाजी ने अपनी बात अंग्रेजी में दोहराई-'' प् कमबसंतम जींज जीम इसवूे ेजतनबा ंज उम ूपसस इम जीम सेंज दंपसे पद जीम बविपिद व िजीम ठतपजपेी तनसम पद प्दकपंण्'' 
    17 नवंबर, 1928 को लालाजी का देहांत हो गया। जनता में विदेशी शासन विरोधी भावना और लालाजी के लिए आदर का प्रवाह उमड़ रहा था। लालाजी की अर्थी के जुलूस में लाख-डेढ़ लाख आदमी रहे होंगे। डॉक्टर गोपीचंदजी भार्गव तो विलख-विलख कर रोये। लाहौर में ऐसा कोई भी हिंदू-मुसलमान न होगा जिसने मातम न मनाया हो। लाहौर के सभी स्वयं-सेवक दलों ने शव-यात्राा के प्रबंध में साथ दिया था परंतु हम लोगों की सेवा समिति पर बोझ अधिक था। प्राय: दस बजे सुबह अर्थी की यात्राा लालाजी के बंगले से आरंभ हुई और चार मील दूर रावी नदी के तट पर पहुंचते-पहुंचते संध्या के पांच बज गए। अर्थी पर फूलों का बोंझ इतना था कि बीसियों आदमी उसे उठा कर चल रहे थे और दस-पांच कदम पर आदमी बदलते जाते थे।
      संध्या का अंधेरा हो गया था परंतु विराट चिता के समाप्त होने में अभी घंटों की देर थी। भीड़ प्राय: छंट चुकी थी। डाक्टर भार्गव आंसू बहाते हुए बोले कि वे चिता कोअकेला नहीं छोड़ना चाहते। उन्हें आशंका थी कि कोई चिता का अपमान न कर जाय। मैंने उन्हें सांत्वना दी कि मैं रात यहीं रह जाऊंगा।
      भगवती भाई ने मुझ से पूछा, यहां सख्त सर्दी में गीली रेत पर कैसे रह जाओगे? वे यह भी देख रहे थे कि मैं कितना थका हुआ था।
      ''अब तो कह चुका हूं।'' लाचारी दिखाई।  
      ''अच्छा।'' कहकर वे चले गए। मैं अकेला ही चिता से कुछ दूर बैठा रहा। हल्की-हल्की चांदनी फैल रही थी। रावी की तीखी ठंडी हवा चलने लगी थी। चिता से हल्का सेंक भी आ रहा था। आंखों में नींद भर रही थी।
      प्राय: एक घंटे के बाद अचानक अपने नाम की पुकार सुनी। आवाज पहिचानी, भगवती भाई थे। वे दूर रेती के पार खड़े पुकार रहे थे। पास जाकर देखा कि वे टांगे पर एक खाट और बिस्तर ले आए हैं और एक कटोरदान में कुछ खाने के लिए भी।
      हम लोगों ने चिता से कुछ दूर खाट पर बिस्तरा लगाया और दोनों एक साथ सो गए। सुबह सूर्य की किरणों से नींद खुली। नींद ऐसी आई थी कि करवट भी नहीं बदली। भगवती भाई के साथ खाट पर सोने से करवट लेने की गुंजाइश भी नहीं थी। फारारी के दिनों में हम लोगों को हफ्तों जाड़ों में एक कम्बल लेकर इसी प्रकार सोना पड़ा परंतु तब खाट भी नहीं थी।

17 दिसम्बर, 1928 को अपराहन में राजगुरु और भगत सिंह ने गोलियां मारकर सांडर्स को नरक रवाना कर दिया। साथ ही एच.एस.आर.ए. ने हत्या की जिम्मेदारी स्वीकार की और दीवारों पर इस्तहार लगाकर कहा गया 'नौकरशाही सावधान! सांडर्स की मृत्यु से लाला लाजपत राय की हत्या का बदला ले लिया गया।
      सबसे कठिन समस्या थी भगत सिंह को लाहौर से बार निकालने की। यह कल्पना कर लेना कठिन नहीं था कि जिस भगत सिंह के विषय में पुलिस को याें ही सदा संदेह बना रहता था, उसकी लम्बी फरारी और सांडर्स-वध की घटना के बाद पुलिस उसकी खोज में कितनी परेशान होगी। भगत सिंह केश कटा कर वेश तो बदल चुका था लेकिन इससे चेहरे में कितना परिवर्तन आ सकता था? फर्न पर गोली चलाते समय उसे तीन-चार सिपाहियों ने अच्छी तरह देखा भी था। भगत सिंह के पुराने रूप से लाहौर की खुफिया पुलिस खूब परिचित थी ही। दाढ़ी उसने साफ करा दी थी जरूर परंतु उसकी दाढ़ी बहुत घनी तो कभी थी भी नहीं।
      सुखदेव लगभग रात के आठ बजे आया। उन दिनों भाभी संस्कृत पढ़ा करती थीं। पड़ोस की एक और महिला के साथ मिल कर उन्होंने एक अध्यापक नियुक्त कर लिया था। भाभी को एक ओर बुला कर सुखदेव ने प्रश्न किया- ''कहीं बाहर जा सकती हो?''
      ''कहां?...क्या काम है? ''
      ''इस घटना के एक आदमी को बचा कर लाहौर से निकालना है। उसकी मेम साहब बन कर साथ जाना होगा,... खतरा है। सोच लो, गोली चल सकती है।'' सुखदेव भाभी की ओर घूरता रहा।
      ''कौन आदमी है?'' भाभी ने जानना चाहा।
      ''कोई भी हो।'' जैसी की सुखदेव की आदत थी।
      ''चली जाऊंगी।''
      ''वह रात में यहां ही रहेगा।...इस पढ़ाई को समाप्त कर दो।''
      ''अच्छा।''
      कुछ देर बाद सुखदेव के साथ एक लंबा सा जवान ओवरकोट, हैट पहने एक नौकर के साथ आ गया। भाभी ने उन्हें कमरे में बैठा दिया, स्वयं भी बैठी और सुखदेव की ओर देखती रहीं। अपरिचित आदमी की ओर क्या देखतीं?
      सुखदेव ने उस आदमी की ओर संकेत कर भाभी से पूछा-''इसे पहचानती हो!''
      भाभी ने देखा; जरा ध्यान से देखा-''भगत?''
      भगत सिंह और सुखदेव हंस पड़े।
      सुबह तड़के पांच-छह बजे कलकत्ता मेल से चलने की बात थी। भगत सिंह ओवरकोट का कालर उठाये, हैट माथे पर खींचे और अपना चेहरा गोद में लिए 'शची' के सिर की आड़ में किये रेलवे प्लेटफार्म पर पहुंचा। भगवती भाई का लड़का शचींद्र कुमार वोहरा, जो अब इंजीनियर है उस समय तीन बरस का था। भाभी भी यथाशक्ति चेहरे पर पाउडर मले और अपने सब से ऊंची एड़ी के जूते से खट-खट करती साथ थीं। भगत सिंह की जेब में भरा हुआ पिस्तौल था। राजगुरु नौकर के वेश में साथ था। उस की कमर पर भी भरा हुआ पिस्तौल बंधा था। पुलिस को संदेह हो जाता तो गोली जरूर चलती... शची और भाभी दोनों का क्या होता?(क्रमशः)




शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -5-यशपाल


     भगत सिंह के विक्षुब्ध रहने का कारण सरदार किशन सिंहजी का व्यवहार था। भगत सिंह काफी समय दिल्ली और कानपुर रह आया था। उस का यह प्रवास गुप्त ही था। पिता के बार-बार पूछने पर भी उसने उस प्रवास के रहस्य उन्हें नहीं बताये थे परंतु उसके लक्षणों से इस फरारी का कारण भांप लेना कठिन नहीं था। सरदारजी को यह आशंका बनी हुई थी कि लड़का फिर किसी समय अंतर्धान हो जा सकता है। बीच-बीच में दो-चार दिन के लिए वह उड़ भी जाता था। सी.आई.डी. उस का पीछा कर रही थी। यह देख कर सरदारजी और भी चिन्तित थे। वे सोचते ही नहीं बल्कि भगत सिंह को समझाते भी थे कि सी.आई.डी. का सन्देह दूर करने के लिए उसे अक्ल से काम लेना चाहिये!
      भगत सिंह को घर पर बांध लेने का उपाय जो सरदारजी ने सोचा सो कोई नया नहीं था; वही पुराना तरीका कि लड़के का विवाह कर दिया जाये। एक अच्छे अमीर देहाती सिख परिवार में उन्होंने लड़की भी निश्चित कर ली थी। विवाह के लिए भगत सिंह को तैयार न देख कर सरदारजी और भी क्रुध्द और चिंतित रहने लगे।
      सरदारजी ने विवाह के प्रति आपत्तिा का कारण पूछा। भगत सिंह ने उत्तार दिया कि वह जब तक आर्थिक रूप से अपने पांव पर खड़ा न हो जाए शादी करना ठीक नहीं समझता। सरदार किशन सिंह जी ने उत्तार दिया, ''तू हमें ही रास्ता बताना चाहता है? विवाह कर ले और अपने पांव पर खड़े होने की कोशिश भी कर। हम मना करते हैं? विवाह हो जाने से तुझे कौन झंझट हो जाएगा? ''
      भगत सिंह ने अपनी उम्र कम होने का भी एतराज किया। सरदारजी ने उत्तर दिया, ''और सब बातों के लिए जो बुर्जुर्ग बनता है, बस शादी के लिए ही कमसिन है? शादी हो जाने दो। बहू को घर तभी बुलाना जब जरूरत जान पडे।'' सरदारजी को इस विवाह से काफी बड़े दहेज की भी आशा थी। लड़की वाले बात पक्की कर लेना चाहते थे। इसलिए सरदारजी भगत सिंह के इनकार के कारण मानसिक ज्वर की-सी अवस्था में दिखाई देने लगे।
      बहुत दबाव पड़ता देखकर भगत सिंह ने एतराज किया कि वह शादी करेगा ही तो पढ़ी लिखी लड़की से करेगा। उसे यह मालूम हो चुका था कि सरदारजी ने जो लड़की तलाश की है, वह गांव के अच्छे  बड़े जमींदार की लड़की है। गांव में लड़कियों का स्कूल कहां थे? बहुत होगा, लड़की कुछ गुरुमुखी जानती होगी। भगत सिंह ने जिद्द की कि वह कम से कम मैट्रिक पास लड़की से शादी करेगा। इस उत्तार से सरदार जी और भी बौखला उठे।
      भगत सिंह को कभी-कभी तो दल के काम-काज से भी घर से बाहर रह जाना पड़ता था और कभी-कभी पिता के सदा बिगड़ते ही रहने के कारण भी वह घर न जाता। मेरे यहां या भगवतीचरण के यहां टिक जाता और कभी कहीं और। इस बात से सरदारजी और भी अधिक विक्षिप्त हो जाते। हम सभी सरदारजी के निरंतर क्रोध के कारण उनसे डरने लगे। कभी हम लोग आपस में मजाक ही कर रहे होते और वे अचानक आ जाते तो चुप हो जाते। बुजुर्गों के सामने सभी तरह की बातें भी तो नहीं की जा सकतीं। सरदारजी अनुमान कर लेते कि यह लोग राजनैतिक-षडयंत्रा की बातें कर रहे थे, मुझे देख कर चुप हो गए हैं। उनका क्षोभ और क्रोध और भी बढ़ आता।
      सरदारजी मच्छीहट्टा में मेरी जगह पर कभी नहीं आए थे। एक दिन पूछते-तांछते हाथ में लाठी लिए, वे मेरे यहां आ पहुंचे। उनका चेहरा देख कर ही भांप गया कि वे बहुत ही नाराज और बिगड़े हुए थे। आते ही क्रोध भरी आत्मीयता में उन्होंने मुझे सम्बोधन किया-''तू भगत सिंह को समझाता क्यों नहीं? आखिर वह शादी क्यों नहीं करता? अभी तुम लोग बड़े भारी क्रांतिकारी ब्रह्मचारी बने फिरते हो, चार दिन बाद गलियों में लहंगे सूंघते फिरोगे।'' उन्होंने कुछ ऐसे विकट शब्दों और उपमाओं का प्रयोग किया उन्हें दोहराया नहीं जा सकता।
      मैंने भगत सिंह की ओर से सफाई दी कि शादी करने से तो वह इन्कार नहीं करता। उसे पढ़ने-लिखने का शौक है। वह चाहता है कि लड़की पढ़ी-लिखी हो।
      सरदार जी उबल पड़े-''पढ़ी-लिखी लड़की में कुछ और बढ़ जाता है क्या? पढ़ी-लिखी औरत से क्या पढ़े-पढ़ाये बच्चे होते हैं?''
      उनका क्रोध बढ़ता ही गया, वे साफ-साफ गालियां देने लगे...''तू और जयचंद्र दोनों बहुत कमीने हो। अपने आपको बहुत चालाक समझते हो। खुद तो तुम लोग नौकरी कर रहे हो, दूसरों को बिगाडते फिरते हो। तू उसे समझा नहीं सकता?''
      उस समय यदि मैं उनसे यह कह देता कि मैं उसे क्या समझाऊं वही मुझे समझा रहा है, तो जाने वे मुझे क्या-क्या सुना देते। इसलिए मैं यही कहता रहा कि मैं तो उसे हमेशा समझाता रहता हूँ कि घर का काम देख, ''देखिये, मैं तो नौकरी कर रही रहा हूं ''
      मेरे अज्ञान प्रकट करने पर सरदारजी बिगड़ उठे-''उसने तो मुझसे यही कहा था कि तेरे यहां रह जाता है।'' एक जिम्मेवार व्यक्ति का नाम लेकर वे बोले- ''... ने भी भगत को आज सुबह तेरे साथ देखा था, तुझे पता नहीं तो किसे पता है?''...उन्होंने एक अच्छी जोरदार गाली दे कर कहा-''मैं तेरे बाप की जगह हूं। तू मुझे चराता है बदजात!''
      कसम खाकर विश्वास दिलाया कि भगत मेरे यहां आज नहीं आया बाजार में मिला था। इस पर उन्होंने पूछा-''सुखदेव कहां रहता है?''
      यह बताना मुश्किल था क्योंकि सुखदेव उन दिनों 'कन्हैयालाल बिल्डिंग' में जयगोपाल के साथ एक कमरा लेकर अप्रकट रूप से रह रहा था। मैंने सरदारजी को टालने के लिए दो-चार जगहों के नाम बता दिए कि हो सकता है वहां कहीं हो।
      सरदारजी ने उन सभी जगहों का चक्कर लगाया। बदकिस्मती से इन्हीं में से एक  जगह भगत सिंह मिल गया।
      भगत सिंह ने आकर क्रोध में इस मुलाकात का जो हाल सुनाया तो मेरी ग्लानि का अन्त न रहा। सौ कसमें खाकर उसे यकीन दिलाया कि मुझे विश्वास था कि तुम आजकल वहां नहीं आते होगे। इसीलिए मैंने उन जगहों का नाम ले दिया था। भगत सिंह ने घुटनों, कोहनियों और कन्धों पर लाठी की मार के चिह्न दिखाये और फिर हंस-हंस कर उन मौलिक गालियों के नये-नये समास बताये जिनका आविष्कार सरदारजी ने उस पर अपना क्षोभ प्रकट करने के लिए किया था।
      1927 में लाहौर में दशहरे के अवसर पर एक बम विस्फोट हुआ था। यह किसी विकृत मस्तिष्क की करतूत थी। घनी भीड़ में बम विस्फोट होने से बहुत लोग जख्मी हो कर अस्पताल में भरती हुए  थे। मैं सेवा समिति की ओर से इन लोगों की सेवा-सुश्रुषा के लिए अस्पताल जाता रहता था। दशहरे की भीड़ में हिंदुओं की संख्या तो ज्यादा थी ही, इसीलिए हिंदू भाइयों ने कल्पना कर ली कि यह बम विस्फोट मुसलमानों की शरारत थी।
      पुलिस ने संदेह में कुछ आदमियों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें से एक भगत सिंह था दूसरा हमारे कालिज का विद्यार्थी बाबूसिंह। पुलिस ने भगत सिंह को प्राय: दो सप्ताह हवालात में रखा। वकीलों की ओर से उसे अदालत में पेश किए जाने की मांग की जा रही थी। पुलिस कोई मामला न गढ़ पाई थी। उसे अदालत में पेश किये बिना ही जमानत पर छोड़ दिया गया। जमानत की रकम थी चालीस हजार रुपए। इस भारी जमानत पर होने के कारण, जामिनों को संकट में न डालने के लिए भगत सिंह को अपने घर में कैद हो जाना पड़ा। वह कहीं भी आता-जाता तो पुलिस के खुफिया उसके पीछे छाया की तरह लगे रहते। खुफिया पुलिस को चकमा दे देना तो मामूली बात थी किंतु  चकमा देने का अर्थ होता, उस विषय में पुलिस के सन्देह को मजबूत कर देना।

      मैंने डाक्टर गोपीचंद भार्गव की मार्फत पंजाब असेंबली में भगत सिंह को बिना कारण बताये जमानत पर रखकर परेशान करने के संबंध में प्रश्न का नोटिस दिला दिया। डाक्टर साहब को मुझ पर पूरा विश्वास था ही। उनके प्रश्न वगैरह मैं ही बना दिया करता था। चिकित्सा और कांग्रेस के दूसरे कामों से उन्हें रात के एक-एक बजे तक फुरसत न मिल पाती थी। असेंबली में प्रश्न का नोटिस देने पर भगत सिंह की जमानत वापस कर दी गई। कुछ दिन तो भगत सिंह साधु बना घर पर टिका रहा परंतु फिर ऐसा अन्तर्धान हुआ कि 1929 मार्च में केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने और परचा बांटने के बाद ही गिरफ्तार हो कर प्रकट हुआ।
      भगत सिंह भी अपनी कल्पना में एक दुबली-पतली, पीली-पीली सी लड़की को जो उन दिनों एक कालिज में पढ़ रही थी, अपने मन में 'मेवाड़पतन' की 'मानसी' बनाये बैठा था। मुझे अब 'मेवाड़पतन' की कहानी तो याद नहीं पर भगत सिंह की 'मानसी' याद है। इस 'मानसी' ने भगत सिंह से कोई प्रतिज्ञा भी नहीं की थी। यह केवल भगत सिंह के मन का पढ़ी-लिखी, सुसंस्कृत दिखाई देने वाली लड़की के प्रति स्वत: आकर्षण मात्र था। अस्तु, जब 'मानसी' ने देश के प्रति उत्सर्ग को अपने मतलब की बात न समझ कर एक समृध्द नौजवान के शिष्ट वेश और व्यवहार के प्रति आकर्षित होकर उससे सगाई कर ली तो भगत सिंह की कल्पना के आदर्शों की मीनार भी ठसक गई। वह भी दो-चार दिन लंबी-लंबी सांसें लेकर अपने घर के इक्के में, घोड़ों के बीमार हो जाने के कारण ऊंट के दूध के कलसे शहर में पहुंचाता हुआ क्रांति की बात सोचने लगा।(क्रमशः)





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