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रविवार, 10 मई 2015

माँ की सामाजिक ताकत

 माँ के बारे में लिखना बेहद मुश्किल काम है।सामने वो प्रशंसा सुनती नहीं थी, इस समय वो मौजूद नहीं है। जब तक रही अपार ऊर्जाका स्रोत बनी रही। हम सब भाई-बहन बेहद खुश रहते थे। कभी किसी चीज के बारे मेंमैंने निजी तौर पर कमी महसूस नहीं  की। वह हम सबकी सामाजिक ताकत थी। माँ का जन्म जिसपरिवार में हुआ वह  मथुरा के पढ़े-लिखे परिवारों में से एक बेहतरीन परिवारथा। उस परिवार के पास   बेहतरीनसांस्कृतिक और बौद्धिक परंपराएं थीं,नानाजी सोहनलाल चतुर्वेदी  संगीत के विद्वान थे, दोनों मामा पक्के खांटीमार्क्सवादी बुद्धिजीवी थे। मथुरा के चौबों की पंडिताई-प्रोहिताई की परंपरा सेमुक्त इस परिवार में तमाम किस्म के आधुनिक संस्कार थे।  माँ बचपन में टाइफायडके कारण गूंगी-बहरी हो गई, इसके अलावा उसकी छोटी उम्र में ही शादी भी हो गयी,शादी तकरीबन 6-7साल की उम्र में हुई,सात साल बाद द्विरागमन हुआ, वह मुश्किल से15-16साल की रही होगी जब मेरा जन्म हुआ। वह जब तक जिंदा रही मैं अधिकांश समय छायाकी तरह उसके साथ रहा। वह पढ़ी लिखी नहीं थी, लेकिन शिक्षा की ताकत जानती थी, नएविचारों और खासकर प्रगतिशील विचारों को व्यवहार से पहचानती और मानती थी। प्रगतिशीलविचारों का संस्कार मुझे माँ से ही मिला।
         माँके अंदर विलक्षण शारीरिक क्षमता थी और वह इसका अपने परिवार के साथ ,अपनी माँ औरनानी की मदद के लिए जमकर इस्तेमाल करती थी, उसके पास कभी खाली समय नहीं होता था,वहबेहद संगठित थी और परिवार के दूसरे लोगों की मदद करने में उसकी गहरी रुचि थी। आजकललड़कियों में जिस तरह  घरेलू काम के प्रति अरुचि दिखती है,वह उसमें एकदम नहींथी।  हमलोगों का संयुक्त परिवार था,तीनआंगन का बड़ा घर था और उसमें नौ कमरे थे, मेरी दादी और माँ ये दोनों उस घर की एकतरह स्वामिनी थीं,ताई मस्त थी ,उसकी घरेलू कामों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, वहसुबह होते ही यमुना नहाने, मंदिरों में दर्शन करने चली जाती थी,वहां से समय बचतातो गप्प करने अपनी माँ के यहां चली जाती और दोपहर  खाने के वक्त घर लौटती । ऐसी अवस्था में संयुक्तपरिवार के समस्त घरेलू काम  माँ और दादी मिलकर करते थे, घर में कोई नौकर नहींथा।
    कालान्तर में परिवार मेंबंटबारा हो जाने बाद माँ ने घर के काम के साथ मंदिर की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लीऔर पिता को उस काम में मदद की, मंदिर का काम बहुत ही परिश्रम साध्य था,वह घर औरमंदिर के काम में सुंदर संतुलन बनाकर काम करती थी और धीरे धीरे उसने पिता को मंदिरसे तकरीबन मुक्त ही कर दिया था।
         माँ केअंदर यह भावबोध था कि वह जिस परिवार में जन्मी है वह बहुत पढ़ा लिखा सांस्कृतिक तौरपर समृद्ध परिवार है। इसलिए उसकी यह मंशा थी कि मैं खूब पढूँ । संयोग की बात थीमेरे तीन भाई-बहन कम उम्र में ही विभिन्न बीमारियों के कारण मर गए। बाद में हम दोभाई बच गए । मेरे छोटे भाई की पढ़ने में कोई रुचि नहीं थी। लेकिन मेरी रुचि थी, इसरुचि को बनाने में परिवार के अन्य सदस्यों जैसे माता-पिता के अलावा दोनों मामा कीभी भूमिका रही है। लेकिन मैं नियमित संगठित ढ़ंग से पढूँ इस भावबोध को निर्मितकरने में माँ की केन्द्रीय भूमिका थी। माँ के कारण ही यह संभव हो पाया किचौदह-पन्द्रह साल की उम्र में ही मेरे लिए अलग से कमरा बनवा दिया गया जिसमेंपढ़ने-सोने की व्यवस्था के साथ एक रेडियो भी लगवा दिया गया जिससे में अपडेट करकेरहूँ।
      मैं वैसे संस्कृत पाठशालामें पढ़ता था लेकिन माँ के संस्कारों के असर के कारण मुझे स्वतंत्र रुप सेकमरा मिला,इसने  मेरे अंदर आधुनिक भावबोध ने जगह बनाने में मदद की। मैंने अधिकांश आधुनिकबातें माँ से ही सीखीं। माँ के कारण मुझे स्वतंत्र कमरा मिला,यह मेरे जीवन की सबसेबड़ी घटना थी, मेरे किसी भी संगी-साथी के पास अपना निजी कमरा नहीं था। इसके अलावा मुझेरोज सुबह चार बजे जगाने का काम भी माँ करती थी। 
      मैं सुबह उठकर पढता था और माँ केसाथ में  एक कप चाय भी पीता था, चाय पिलाकरवह चली जाती थी, लेकिन नजर रखती थी कि मैं कहीं बाद सो न जाऊँ, यदि कभी सोने कीकोशिश करता तो आकर जगा देती थी, उसका मानना था  सुबह पढ़ने से चीजें जल्दी याद हो जाती हैं औरसारी जिन्दगी मन में रहती हैं। खैर, बचपन में सुबह चार बजे उठने की जो आदत उसनेडाली वह आज भी मेरी सबसे बड़ी ताकत है ।
      मित्रलोग पूछते हैं मैं लिखता-पढ़ता कब हूँ, मैंयही कहता हूँ सुबह चार बजे।बचपन में संस्कार बना कि सुबह चार बजे उठने का मतलब हैमाँ से जुड़े रहना।किताबें पढ़ने का मतलब है माँ से जुड़े रहना।
      बाद में 1967-68 में माँके दबाव के कारण ही मुझे एकदम नया जापानी टेपरिकॉर्डर मेरे पिता ने खरीदकर दिया।जो मेरे पास अभी तक सुरक्षित है। संभवतः कम्युनिकेशन के संस्कार बनाने और बाद मेंकम्युनिकेशन और मीडिया पर लिखने की आदत इससे ही पड़ी। मैं तो यही सोचता हूँ कि माँये कम्युनिकेशन और स्वाध्याय के संस्कार न बनाती तो मैं लिख ही नहीं पाता।
     माँ के लिए वह क्षण बड़ा ही महत्वपूर्ण होता थाजब मैं परीक्षा में पास होता था, वह श्रेणी नहीं समझती थी,पास-फेल समझती थी। मुझेयाद है मैंने जब शास्त्री की परीक्षा पास की,तो वह बेहद खुश हुई थी ,उसने पिता कोबुलाकर कहा ,आज मैं बहुत खुश हूं मेरा बेटा तुमसे ज्यादा पढ़ गया। मेरे पिताशास्त्री प्रथम वर्ष तक पढ़ाई कर पाए, धनाभाव और घरेलू जिम्मेदीरियों की वजह से वेआगे नहीं पढ़ पाए,मैंने जब शास्त्री द्वितीय वर्ष की परीक्षा पास की तो मैंने उसेसमझाया कि मैं पिता से पढाई में आगे निकल गया हूँ तो वह बेइंतहा खुश हुई, यह अजीबसंयोग ही था कि मेरा शास्त्री का परीक्षाफल  आने के चार दिन बाद ही सन् 1976 में उसकी अचानकहृदयाघात के कारण मौत हो गयी।   

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

मनमोहन की 8 कविताएं



                             कविवर मनमोहन
भारतीय संस्कृति- मनमोहन
पहले पहल जब हमने सुना
चमड़े का वॉशर है
तो बरसों बरस नल का पानी नहीं पिया

तब कुओं-बावडि़यों पर हमारा कब्ज़ा था
जो आख़िर तक बना रहा

हमने कुएँ सुखा दिए
पर ऐरों-गैरों को फटकने न दिया
अब भी कायनात में पीने योग्य
जितना पानी बचा है
दलितों की बस्ती की ओर रूख करे इससे पहले
हमीं खींच लेते हैं

हमारे विकास ने जो ज़हर छोड़ा
ज़मीन की तहों में बस गया है

बजबजाते हुए हमारे विशाल पतनाले
हमारी विष्ठा हमारा कूड़ा और हमारा मैल लिए
सभ्यता की बसावट से गुजरते हैं
और नदियों में गिरते हैं
जिन्होने बहना बंद कर दिया है

कितना महान सांस्कृतिक दृश्य है कि
हत्याकांड सम्पन्न करने के बाद हत्यारा भीड़ भरे
घाट पर आता है
और संस्कृत में धारावाहिक स्तोत्र बोलता हुआ
रूकी हुई यमुना के रासायनिक ज़हर में
सौ मन दूध गिराता है



हाय सरदार पटेल ! - मनमोहन
 सरदार पटेल होते तो ये सब न होता
कश्मीर की समस्या का तो सवाल ही नहीं था
ये आतंकवाद वातंकवाद कुछ न होता
अब तक मिसाइल दाद चुके होते
साले सबके सब हरामज़ादे एक ही बार में ध्वस्त हो जाते
सरदार पटेल होते तो हमारे देश में
हमारा इस तरह अपमान न होता !
ये साले हुसैन वुसैन
और ये सूडो सेकुलरिस्ट
और ये कम्युनिस्ट वमुनिस्ट
इतनी हाय तौबा मचाते !
हर कोई ऐरे गैरे साले नत्थू खैरे
हमारे सर पर चठ़कर नाचते !
आबादी इस कदर बढ़ती !
मुट्ठीभर पढ़ी लिखी शहरी औरतें
 इस तरह बक बक करतीं !
सच कहें,सरदार पटेल होते
तो हम दस बरस पहले प्रोफेसर बन चुके होते !



चर्बी महोत्सव- मनमोहन

जिस तरह प्लास्टिक और पॉलीथिन हमारी नई सभ्यता है
जो अजर अमर हो गई है
चर्बी हमारी नई कल्चर है
जो इतनी नई भी नहीं

आप देख सकते
यह हमारी आँखों के आसपास सहज ही जमा हो जाती है
या गालों पर
या गलफड़ों में उतर आती है

दरअसल, हम चर्बी से बेहाल हुए जाते हैं
हमारी हँसी में चर्बी है
हमारे चुटकुलों में भी यह कम नहीं
बातों में बातें कम चर्बी ज्या़दा है
हाँ, बस रोना चाहें तो ढ़ंग से रो नहीं सकते

समझिए कि एक महोत्सव है

ख़ूबसूरत औरतें और क़ामयाब मर्द सब एक जगह
एक झुरमुट में व्यस्त हैं
लुक़मा चबलाते
बार-बार कन्धे उचकाते हैं

हमारा संप्रभु राष्ट्र-राज्य यही है
और इनके दायरे के बाहर सब दुश्मन देश

देखिए हमारे गोलमटोल बच्चे
जो कल को प्रबन्ध हाथ में लेंगे
अभी किस तरह तुतलाकर दिखलाते हैं
किस तरह खेल-खेल में वे कीटाणुओं को खदेड़ कर
भगा देते हैं और उनके दाँत कैसे चमकते हैं !

देववाणी -मनमोहन

अड़ियल चट्टानों को ढहा दिया जाएगा
डाइनामाइट लगा दिया जाएगा
ढेलों पर पाटा चला दिया जाएगा

चौरस बनेगा
चौरस
हमारा या आर्यावर्त

बिना कोनों वाला
बिना नोकों वाला

इसे टिकाएंगे हम

हम आर्यपुत्र
हम अमृतपुत्र
इसे टिकाएँगे इसे टिकाएँगे
तलवार की नोंक पर 


जिन्होंने मरने से इन्कार किया- मनमोहन

जिन्होंने मरने से इन्कार किया
और जिन्हें मार कर गाड़ दिया गया
वे मौका लगते ही चुपके से लौट आते हैं
और ख़ामोशी से हमारे कामों में शरीक हो जाते हैं

कभी-कभी तो हम घंटों बातें करते हैं
या साथ साथ रोते हैं

खा खाकर मर चुके लोगों को यह बात पता चलनी
जरा मुश्किल है
जो बड़ी तल्लीनता से अपने भव्य मकबरे बनाने
और अधमरे लोगों को ललचाने में लगे हैं


फिर भी मेरा क्या भरोसा- मनमोहन

मैं साथ लिया जा चुका हूँ
फ़तह किया जा चुका हूँ


फिर भी मेरा क्या भरोसा !

बहुत मामूली ठहरेंगी मेरी इच्छाएँ

औसत दर्जे़ के विचार
ज्यादातर पिटे हुए

मेरी याददाश्त भी कोई अच्छी नही

लेकिन देखिए ,फिर भी,कुत्ते मुझे सूँघने आते हैं
और मेरी तस्वीरें रखी जाती हैं



ईश वन्दना- मनमोहन

धन्य हो परमपिता ‍!

सबसे ऊँचा अकेला आसन
ललाट पर विधान का लेखा
ओंठ तिरछे
नेत्र निर्विकार अनासक्त
भृकुटि में शाप और वरदान
रात और दिन कन्धों पर
स्वर्ग इधर नरक उधर

वाणी में छिपा है निर्णय

एक हाथ में न्याय की तुला
दूसरे में संस्कृति की चाबुक

दूर -दूर तक फैली है
प्रकृति

साक्षात पाप की तरह।


ग़लती ने राहत की साँस ली
 उन्होंने झटपट कहा
हम अपनी ग़लती मानते हैं
ग़लती मनवाने वाले खुश हुए
कि आख़िर उन्होंने ग़लती मनवा कर ही छोड़ी
उधर ग़लती ने राहत की साँस ली
कि अभी उसे पहचाना नहीं गया















सोमवार, 4 अप्रैल 2011

मनमोहन की कुछ बेहतरीन कविताएं

कार्तिक-स्नान

एक ही दिन

एक ही मुहुर्त में

हत्यारे स्नान करते हैं

हज़ारों-हज़ार हत्यारे

सरयू में,यमुना में

गंगा में

क्षिप्रा ,नर्मदा और साबरमती में

पवित्र सरोवरों में

संस्कृत बुदबुदाते हैं और

सूर्य को दिखा -दिखा

यज्ञोपवीत बदलते हैं

मल-मलकर गूढ संस्कृत में

छपाछप छपाछप

ख़ूब हुआ स्नान

छुरे धोए गए

एक ही मुगूर्त में

सभी तीर्थों पर

नौकरी न मिली हो

लेकिन कई खत्री तरूण क्षत्रिय बने

और क्षत्रिय ब्राह्मण

नए द्विजों का उपनयन संस्कार हुआ

दलितों का उद्धार हुआ

कितने ही अभागे कारीगरों-शिल्पियों

दर्जि़यो,बुकरों,पतंगसाज़ों,

नानबाइयों,कुंजड़ों और हम्मालों का श्राद्ध हो गया

इसी शुभ घड़ी में

(इनमें पुरानी दिल्ली का एक भिश्ती भी था)

पवित्र जल में धुल गए

इन कम्बख़्तों के

पिछले अगले जन्मों के

समस्त पाप

इनके ख़ून के साथ-साथ

और इन्हें मोक्ष मिला

धन्य है

हर तरह सफल और

सम्पन्न हुआ

हत्याकांड


संचार की नई अवस्था

यह लीजिए जनाब लम्बा चक्कर लगा कर

एक बार फिर हम लोग

उसी जगह आते हैं

जो रास्ते पहले छोड़ दिए थे

खाई बन कर हमारे समाने हैं

जितना एक-दूसरे को देखते हैं

उससे कहीं ज्य़ादा बीच की खाई को

बातें भी एक-दूसरे से कम
ख़ाई से ज्य़ादा करते हैं
जैसे अब खाई ही अकेली पुल बची है


सिर्फ़ अपने-अपने शरीर लेकर 

जैसे वे सिर्फ़ अपने-अपने शरीर लेकर

चली आई हों इस दुनिया में

वे जानती हैं

हमारे पास कैमरे हैं

स्वचालित बहुकोणीय दसों दिशाओं में मुँह किए

जो हर पल उनकी तस्वीरें भेजते हैं

जिन्हें कभी भी प्रकाशित कर सकते हैं

कितनी सावधान वे गुज़रती हैं

मुस्कुराती हुई एक-एक हमारी दुनिया से

जैसे खचाखच भरे किसी जगमगाते स्टेडियम से

अकेले गुज़रती हों

 
सहमति का दौर-

टेढ़े रास्ते सीधे हो रहे हैं

टेढ़े लोग सीधे हो रहे हैं

कोई रूकावट नहीं

न कोई मोड़ है

कोई दो ओर नहीं

सब कहीं सुविधा है

इनकार की जरूरत क्या

थोड़ा -सा इसरार काफ़ी

क्योंकि कोई और नहीं

क्योंकि कोई गै़र नहीं

सब अपने हैं

कोई ऐसा इंतज़ार नहीं

जो हमें विकल कर दे

या तोड़ दे

किसी को कहीं से आना नहीं है

किसी को कहीं जाना नहीं है

बस प्रेम से रहना है

देखिए कमाल

एक राह से एक ही राह निकलती है

कोई दो राहें नहीं निकलतीं

एक बात से एक ही बात निकलती है

कोई दो बातें नहीं निकलतीं

अक्सर एक ही बात

अपने दो नमूने बना लेती है

जिससे बात रह जाती है
सच्चाई बस एक है
बाकी उदाहरण हैं

सहमति बुनियादी है

असहमति तो ऐसे ही है

जिससे सहमति घटित होती दिखाई दे

पहले ही जबाब इतना मौजूद है

कि सवाल पैदा ही नहीं होता

कैसी फुर्ती है

कि समस्या बनने के पहले ही

समाधान हाज़िर हो जाता है
जितना विवाद नहीं

उससे कहीं ज़्यादा बिचौलिए हैं

दलीलें,मिसालें,सुबूत

सब एक तरफ हैं

गवाह ,वकील, मुवक्किल,

मुंसिफ़ यहाँ तक कि मुद्दई

सब एक तरफ़



हमारा जातीय गौरव



आधी से ज्य़ादा आबादी

जहाँ ख़ून की कमी की शिकार थी

हमने वहाँ खून के खुले खेल खेले

हर बड़ा रक्तपात

एक रँगारँग राष्ट्रीय महोत्सव हुआ

हमने खूब बस्तियाँ जलाईं

और ख़ूब उजाला किया

और छत पर चढ़कर चिल्लाकर कहा

देखो,दुनिया के लोगो

देखो हमारा जातीय गौरव !


भारतीय संस्कृति

पहले पहल जब हमने सुना

चमड़े का वॉशर है

तो बरसों बरस नल का पानी नहीं पिया

तब कुओं-बावडि़यों पर हमारा कब्ज़ा था

जो आख़िर तक बना रहा

हमने कुएँ सुखा दिए

पर ऐरों-गैरों को फटकने न दिया

अब भी कायनात में पीने योग्य

जितना पानी बचा है

दलितों की बस्ती की ओर रूख करे इससे पहले

हमीं खींच लेते हैं

हमारे विकास ने जो ज़हर छोड़ा

ज़मीन की तहों में बस गया है
बजबजाते हुए हमारे विशाल पतनाले

हमारी विष्ठा हमारा कूड़ा और हमारा मैल लिए

सभ्यता की बसावट से गुजरते हैं

और नदियों में गिरते हैं

जिन्होने बहना बंद कर दिया है

कितना महान सांस्कृतिक दृश्य है कि

हत्याकांड सम्पन्न करने के बाद हत्यारा भीड़ भरे
                                                                                                                    
घाट पर आता है

और संस्कृत में धारावाहिक स्तोत्र बोलता हुआ

रूकी हुई यमुना के रासायनिक ज़हर में

सौ मन दूध गिराता है


हाय सरदार पटेल ! 

सरदार पटेल होते तो ये सब न होता

कश्मीर की समस्या का तो सवाल ही नहीं था

ये आतंकवाद वातंकवाद कुछ न होता

अब तक मिसाइल दाद चुके होते

साले सबके सब हरामज़ादे एक ही बार में ध्वस्त हो जाते

सरदार पटेल होते तो हमारे देश में

हमारा इस तरह अपमान न होता !

ये साले हुसैन वुसैन

और ये सूडो सेकुलरिस्ट

और ये कम्युनिस्ट वमुनिस्ट

इतनी हाय तौबा मचाते !

हर कोई ऐरे गैरे साले नत्थू खैरे

हमारे सर पर चठ़कर नाचते !

आबादी इस कदर बढ़ती !

मुट्ठीभर पढ़ी लिखी शहरी औरतें

इस तरह बक बक करतीं !

सच कहें,सरदार पटेल होते

तो हम दस बरस पहले प्रोफेसर बन चुके होते !



शनिवार, 19 मार्च 2011

हिन्दी का विलक्षण कवि मनमोहन

               मनमोहन के बारे में बातें करना बेहद जोखिमभरा काम है। खासकर उसके काव्य व्यक्तित्व पर बातें करते समय यही समस्या रहती है कि आखिर उस पर क्या बात करें ? वह 45 साल से कविताएँ लिख रहा है । वह देखने में जितना सीधा,सरल,सौम्य है, विचारों के क्षेत्र में उतना ही दुर्धर्ष है। विचारों की दुनिया में उसे पछाड़ना असंभव है। एकदम मौलिक पैराडाइम पर रखकर सोचने की कल्पनाशील बुद्धि उसे विरासत में अपने पिता की संगीतचेतना से मिली है। मनमोहन का परिवार मथुरा के उन चंद चतुर्वेदी परिवारों में से एक है जो पूरी तरह मॉडर्न परिवार कहलाते थे।सामंती मान्यताओं और आजीविका के सामंती तरीकों से एकदम मुक्त चतुर्वेदी परिवार की कल्पना करना उस जमाने में असंभव थी।
     मनमोहन के पिता संगीत के विद्वान शिक्षक थे और बेहद सुलझे हुए,ईमानदार, जनप्रिय सांस्कृतिक अभिरूचियों के पुंज थे। उनके स्वभाव में चतुर्वेदी समाज की सामंती-अर्द्ध सामंती मान्यताएं,मूल्य और संस्कार एकदम नहीं थे। यही वह बुनियादी पारिवारिक परिवेश था जिसमें मनमोहन का मनोजगत और सामाजिक जगत तैयार हुआ। सभ्यता, संस्कृति, शालीनता आदि में मनमोहन के पिता को आदर्श के रूप में समूचा शहर जानता था और यही वह चीज है जिसने मनमोहन के समूचे व्यक्तित्व को बनाया है। 
     परिवार की संगीत परंपरा के प्रभाव के कारण मनमोहन की संवेदनाएं और इन्द्रियबोध पक्षियों जैसा है। मैंने करीब से उसके सरल और पढ़ाकू स्वभाव को देखा है। बचपन में मेरा पढ़ने में कम मन लगता था उसका खूब,वो शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में पढ़ता था मैं संस्कृत पाठशाला में। मैं पक्का ईश्वरभक्त था और वो पक्का नास्तिक। वो नास्तिक कब और कैसे बना यह मैं नहीं जानता लेकिन उसके घर में मंदिर था और मंदिर की कभी -कभार उसे सेवा भी करनी पड़ती थी,इस काम को वो बखूबी अंजाम देता था।  
   मेरा उसके साथ बचपन से संबंध है। मैं पौराणिक कथाओं में डूबा रहता वो मार्क्सवादी सिद्धान्तों से जुड़े वैज्ञानिक चिंतन की समस्याओं में उलझा रहता। मैं उसकी किसी भी बात से सहमत नहीं होता था।उसके साथ विवाद करता था। मेरे और उसके बीच में खेल के लिए कभी दोस्ती नहीं हो पायी, वह कम खेलता था,मेरे कहने के बाद उसने शतरंज खेलना आरंभ किया और कभी-कभार मेरे कहने पर दशहरे पर पतंग उड़ाने छत पर भी चला जाता था। मेरी क्रिकेट,पतंग,शतरंज आदि खेलों में रूचि थी,उसकी दोस्ती करने, कविता सुनाने,दोस्तों के साथ ज्ञान बांटने,पार्क में घूमने और विभिन्न विषयों पर विमर्श और बहस करने में रूचि थी।
      मुझे यहां याद है वह कक्षा 10 में पढ़ता था तब से उसकी कविताएं हिन्दी की विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में छपती रही हैं। मथुरा में मनमोहन के चंद पाठक थे उनमें एक मैं भी था।सव्यसाची उसके बड़े प्रशंसक थे।वे उन दिनों मथुरा में कम्युनिस्ट पार्टी के जिलामंत्री थे।एक साहित्यिक पत्रिका 'उत्तरार्द्ध ' निकालते थे।उनके यहां हिन्दी की समस्त साहित्यिक पत्रिकाएं आती थीं । हम सभी उनसे वे पत्रिकाएं लेकर पढ़ते थे।
      मनमोहन की काव्य बुनावट की धुरी है मथुरा के वातावरण का बांकपन और व्यंग्य। उसकी कविता की खूबी है नियोजित विचार औऱ व्यंग्यपूर्ण काव्यभाषा । वह कविता लिखने के पहले कोई योजना नहीं बनाता। वह योजना बनाकर न तो सोचता है और न लिखता ही है। विषय, कल्पना और विचार में वह मुक्तभाव से विचरण करता है। ब्रज के वैष्णवसंतों की उदारता और पैनापन उसकी काव्यभाषा में घुला-मिला है। इस परंपरा के असर के कारण उसमें एकदम अहंकार नहीं है। वह स्वभाव और आदतों से वैष्णव है और विचारों से मार्क्सवादी है।
       कविता में बाँकपन और सीधे कहने की कला उसे मथुरा के परिवेश से विरासत में मिली हैं। मथुरा में उस समय आमतौर पर मध्यवर्ग के लोगों में ब्रजभाषा का प्रयोग होता था लेकिन मनमोहन ने अपने को सचेत रूप से ब्रजभाषा के दायरे से बाहर निकालकर खड़ी बोली हिन्दी के आधुनिक वातावरण में ढ़ाला। उस समय मथुरा में ब्रजभाषा में कविता लिखने वाले कवियों की अच्छी-खासी संख्या थी। मनमोहन के दोस्तों में मेरी याद में महेन्द्र 'नेह' अकेले कवि थे जो खड़ी बोली में क्रांतिकारी कविता लिखा करते थे।
    वह पहले भी युवाओं में नायक था और आज भी युवाओं में नायक है,युवा उसके दीवाने हैं। उसके विचारों में डूबते उतराते रहते हैं । उन्हें वह किसी न किसी वैचारिक-सामाजिक युक्ति के आधार पर बाँधने में सफल भी हो जाता है। मैंने अनेक कवि देखे हैं जिनका प्रगतिशील परंपरा में बड़ा योगदान है लेकिन उनमें से अधिकांश कम्युनिस्ट पार्टी और उसके संगठनों में जनता और युवाओं को संगठित करके लाने के काम में कमजोर रहे हैं। मनमोहन इस मामले में बेजोड़ है। वह जितना शानदार कवि है उतना ही शानदार संगठनकर्ता भी है। मनमोहन का मोटो है संगठन के बिना आंदोलन नहीं, आंदोलन के बिना कविता नहीं,कविता के बिना जीवन नहीं।
     भारत में किसी कवि ने इतने बड़े पैमाने पर कम्युनिस्ट कार्यकर्ता तैयार नहीं किए जितने उसने किए हैं। उसके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर सैंकड़ों युवाओं ने कम्युनिस्ट पार्टी का रूख किया है। इस तरह की मिसाल पुराने जमाने में इप्टा के दौर में मिलती हैं। लेकिन आजाद भारत में ऐसी मिसाल नहीं मिलती कि कवि स्वयं लिखे,जनता को संगठित करे,कम्युनिस्ट कैडर तैयार करे।
    जमीनी हकीकत को जानने और समझने की क्षमता वाले सैंकड़ों कम्युनिस्ट कार्यकर्ता पैदा करने में मनमोहन का अतुलनीय योगदान रहा है। मनमोहन के लिए मार्क्सवाद और क्रांति महज विचार नहीं हैं जिनके सहारे जी लिया जाए और कविता लिख दी जाए। मार्क्सवाद और क्रांति के कामों के लिए संरचनाओं के निर्माण के काम को जिस प्राथमिकता के साथ मनमोहन ने किया है उसके कारण वह बड़े-बड़े प्रगतिशीलों की नजर में छोटी उम्र में ही आदर का पात्र बन गया। उसकी यही चीज उसे हिन्दी की प्रगतिशील कवि परंपरा से भिन्न धरातल पर खड़ा कर देती है।  
          मथुरा में मनमोहन ने जब कविता लिखना आरंभ किया था तो  उस जमाने के ब्रज के ज्यादातर कवि सामयिक विषयों पर कविता नहीं लिखते थे। उनकी कविताओं में 17वीं और 18वीं शती के काव्य विषयों की भरमार थी। स्थानीयताबोध हावी था। मनमोहन की कविता का आरंभ ब्रजभाषा के इस स्थानीयतावाद से लड़ते हुआ। उसके नजरिए पर हिन्दी की प्रगतिशील काव्य परंपरा का गहरा असर था जिसने उसे कम उम्र में ही  ब्रजभाषा के स्थानीयतावाद से मुक्त होने में मदद की। उसे आरंभ से ही किसी भी किस्म के रीतिवाद से घृणा थी, वह न तो साहित्यिक रूढ़ियों को मानता था और नहीं सामाजिक रूढ़ियों की मानता था।यह सिलसिला आज भी जारी है।  
मनमोहन की कविता का आज जो ठाट दिखाई देता है वह एक दिन में नहीं बना है। इसमें मनमोहन की बड़ी मेहनत लगी है। मनमोहन की खूबी है उसे प्रगतिशील कविताएं बेहद पसंद हैं मुक्तिबोध और नागार्जुन का वो दीवाना है। लेकिन उसे प्रगतिशील कविता में व्याप्त स्टीरियोटाइप और एक खास किस्म के रीतिवाद से नफ़रत भी है।
मसलन् प्रगतिशील कविता में उन दिनों सार्वभौम लेखन हावी था,एक ही किस्म के विषयों पर लिखना,एक ही किस्म के सजे-सजाए विचारों को परोसना,मजदूर-किसान-आंदोलन और क्रांति ये चार विषय थे जिनके इर्दगिर्द हिन्दी की प्रगतिशील कविता के सार्वभौम विषयों का संसार घूमता रहा है। प्रगतिशीलों में सर्जनात्मकता के स्तर पर इस सार्वभौम (यूनीवर्सल) की हिमायत में खूब लिखा भी गया है। मनमोहन की कविता में आरंभ से यह प्रगतिशील यूनीवर्सल गायब है। हिन्दी कविता में यूनीवर्सल विषय और भावबोध के बिना कविता लिखी जा सकती है और उसे प्रगतिशील कविता कहते हैं इस बात को सामने लाने में मनमोहन की कविताओं की बड़ी भूमिका है।  
    वह आरंभ से प्रतिबद्ध कवि है। मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता आज भी बनी हुई है। मार्क्सवाद के जड़ और यांत्रिक प्रयोगों को मनमोहन ने कभी स्वीकार नहीं किया। सार्वजनिक मंचों पर वह मार्क्सवाद के लिए लड़ता है और अंदर पार्टी मंचों पर मार्क्सवाद और मार्क्सवादियों से लड़ता है।
    मार्क्सवाद को समाज में पाना और अंदर से उसकी अविवेकवादी मान्यताओं से लड़ना उसके कवि व्यक्तित्व की विशेषता है। इस क्रम में मनमोहन ने पाया कम और खोया ज्यादा है। मनमोहन की प्राप्ति है उसकी सामाजिक साख ,अभिव्यक्ति का पैनापन और सामाजिक परिवर्तन के कामों के प्रति उसका एकनिष्ठ समर्पणभाव ।
   मनमोहन की कविता में आधुनिकता के पूंजीवादी रूपों, संस्कारों,आदतों और रोमानियत के प्रति तेज और तीखा व्यंग्य मिलता है। उसने बुनियादी तौर पर आधुनिकतावादी राजनीति,संस्कृति,तकनीक और विधाओं से जुड़े सवालों को निशाना बनाया है। उसकी एक कविता है 'इच्छा',लिखा है- "एक ऐसी स्वच्छ सुबह मैं जागूँ/ जब सब कुछ याद रह जाय/और बहुत कुछ भूल जाय,जो फ़ालतू है/"
    मनमोहन की कविता में एक चीज में आरंभ से देख रहा हूँ कि उसे 'छिपाने' की आदत और 'भय' से सख्त नफरत है। 'छिपाने' की आदत और 'भय' के कारण आम तौर पर खोज का काम नहीं हो पाता। 'छिपाने' की आदत और 'भय' के प्रतिवाद के कारण उसकी कविताएं भावुकता से पूरी तरह मुक्त हैं।
     हिन्दी कविता में भावुकता को वे कवि ज्यादा इस्तेमाल करते हैं जो 'छिपाने' की कला में माहिर हैं। मनमोहन की कविता में जो फैंटेसी,भाषा और व्यंग्य है उसकी पहली और आखिर मुठभेड़ इस छिपाने की काव्यकला से है।यह सामंती कला रूप है।इसका जीवन से लेकर साहित्य तक साम्राज्य है।
     मनमोहन की कविता को खोलने के लिए 'छिपाने' की कला के समूचे ताने-बाने को जानना बेहद जरूरी है। छिपे को उजागर करने के चक्कर में उसे अनेक बार अभिव्यक्ति के संकट का भी सामना करना पड़ता है। फलतः अनेक बार उसकी कविता में प्योर विचारों में सच्चाई व्यक्त होती है। कविता में उसे जब अपनी बेचैनी और आक्रोश को व्यक्त करने के लिए कुछ नहीं मिलता तो विचार के अस्त्र का सफलता के साथ इस्तेमाल करता है। विचार को भी वह उजागर करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। अनेक कवि हैं जो विचार का छिपाने के लिए इस्तेमाल करते हैं लेकिन मनमोहन के लिए विचार छिपाने के कौशल का हिस्सा नहीं है। वह कविता कुछ इस तरह पेश करता है कि पाठक को लगे कि अरे यह तो मैं जानता था। ऐसी एक बेहद सुंदर कविता है 'ईश वन्दना' ,देखें-
"धन्य हो परमपिता ‍!
 सबसे ऊँचा अकेला आसन
ललाट पर विधान का लेखा                             
ओंठ तिरछे
नेत्र निर्विकार अनासक्त
भृकुटि में शाप और वरदान
रात और दिन कन्धों पर
स्वर्ग इधर नरक उधर
 वाणी में छिपा है निर्णय
 एक हाथ में न्याय की तुला
 दूसरे में संस्कृति की चाबुक
 दूर -दूर तक फैली है
 प्रकृति
 साक्षात पाप की तरह।"
        इस तरह की कविताशैली के जरिए मनमोहन एक ऐसे संसार की ओर ध्यान खींचना चाहता है जिसे हम भूल गए हैं। अपनी कविताओं में मनमोहन उन बातों का व्यापक जिक्र करता है जिन्हें हम भूल गए हैं। आधुनिकता ने स्मृतिक्षय को तेज गति से सम्पन्न किया है इस संदर्भ में देखें तो समझ सकते हैं कि वह भुलादी गयी बातों को कविता के केन्द्र में क्यों लाना चाहता है। यह रेखांकित करता है कि हमारी ईश्वर ,चीजों,विषयों,यथार्थ आदि के बारे में हमारी कितनी सीमित समझ है।
      छिपे यथार्थ को सामने लाने के पीछे प्रधान कारण है सत्य की खोज करना। इस सत्य की खोज के चक्कर में मनमोहन दैनंदिन जीवन के छोटे से अंश को पकड़ता है और अनसुलझे जटिल अलगाव की ओर संकेत करता है तो कभी मनोदशाओं के चित्रण में खो जाता है,कभी अवसाद और क्रांति की शरण में चला जाता है।
    छिपे हुए की खोज अंततः मनमोहन की कविता में विरल खेल करती है वह जब छिपे सत्य की खोज करता है तो झूठ को नंगा कर बैठता है। आपातकाल के प्रतिवाद में लिखी उसकी कविता 'आ राजा का बाजा बजा' कुछ इसी तरह के शिल्प की कविता है। यही कलात्मक कौशल उसकी कविता 'ग़लती ने राहत की साँस ली' में दिखाई देता है। लिखा है, "उन्होंने झटपट कहा/हम अपनी ग़लती मानते हैं/ग़लती मनवाने वाले खुश हुए/कि आख़िर उन्होंने ग़लती मनवा कर ही छोड़ी/उधर ग़लती ने राहत की साँस ली/कि अभी उसे पहचाना नहीं गया/"
     मनमोहन ने कविता के प्रचलित आख्यान को डिस्टर्ब किया है। वह कविता के नरेटिव की आकांक्षाओं को डिस्टर्ब करता है। उसकी कविता के नरेटिव के डिस्टर्ब होने का प्रधान कारण है कविता में अवधारणाओं का सृजन। आमतौर पर हिन्दी कवियों के यहाँ कविता में निहित आख्यान सीधे चलता है और यह परंपरा निराला से लेकर नागार्जुन तक सभी के यहां बरकरार है लेकिन मनमोहन इस परंपरा की काव्यशैली के गठन से अपने को अलग करता है।





       

जनकवि मनमोहन की छह कविताएँ

                                               (कवि मनमोहन)
जिन्होंने मरने से इन्कार किया 
जिन्होंने मरने से इन्कार किया
और जिन्हें मार कर गाड़ दिया गया
वे मौका लगते ही चुपके से लौट आते हैं
और ख़ामोशी से हमारे कामों में शरीक हो जाते हैं

कभी-कभी तो हम घंटों बातें करते हैं
या साथ साथ रोते हैं

खा खाकर मर चुके लोगों को यह बात पता चलनी
जरा मुश्किल है
जो बड़ी तल्लीनता से अपने भव्य मकबरे बनाने
और अधमरे लोगों को ललचाने में लगे हैं


फिर भी मेरा क्या भरोसा

मैं साथ लिया जा चुका हूँ
फ़तह किया जा चुका हूँ
 फिर भी मेरा क्या भरोसा !
 बहुत मामूली ठहरेंगी मेरी इच्छाएँ

औसत दर्जे़ के विचार
ज्यादातर पिटे हुए

मेरी याददाश्त भी कोई अच्छी नही

लेकिन देखिए ,फिर भी,कुत्ते मुझे सूँघने आते हैं
और मेरी तस्वीरें रखी जाती हैं



ईश वन्दना
धन्य हो परमपिता ‍!

सबसे ऊँचा अकेला आसन
ललाट पर विधान का लेखा
ओंठ तिरछे
नेत्र निर्विकार अनासक्त
भृकुटि में शाप और वरदान
रात और दिन कन्धों पर
स्वर्ग इधर नरक उधर

वाणी में छिपा है निर्णय

एक हाथ में न्याय की तुला
दूसरे में संस्कृति की चाबुक

दूर -दूर तक फैली है
प्रकृति

साक्षात पाप की तरह।

ग़लती

 उन्होंने झटपट कहा
हम अपनी ग़लती मानते हैं
ग़लती मनवाने वाले खुश हुए
कि आख़िर उन्होंने ग़लती मनवा कर ही छोड़ी
उधर ग़लती ने राहत की साँस ली
कि अभी उसे पहचाना नहीं गया

मेरी ओर   
मैं तुम्हारी ओर हूँ

ग़लत स्पेलिंग की ओर
अटपटे उच्चारण की ओर

सही -सही और साफ़ -साफ़ सब ठीक है
लेकिन मैं ग़लतियों और उलझनों से भरी कटी-पिटी
बड़ी सच्चाई की ओर हूँ

गुमशुदा को खोजने हर बार हाशिए की ओर जाना होता है
कतार तोड़कर उलट की ओर
अनबने अधबने की ओर

असम्बोधित को पुकारने
संदिग्ध की ओर
निषिद्ध की ओर ।

यक़ीन 
 एक दिन किया जाएगा हिसाब
जो कभी रखा नहीं गया
हिसाब
एक दिन सामने आएगा
जो बीच में ही चले गए
और अपनी कह नहीं सके
आएँगे और
अपनी पूरी कहेंगे
जो लुप्त हो गया अधूरा नक्शा़
फिर खोजा जाएगा

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