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सोमवार, 2 मई 2016

अक्ल का अजीर्ण है स्मृति ईरानी को

      मोदी सरकार में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के यहां अक्ल का अजीर्ण हो गया है।इसके कारण वे आए दिन अनाप-शनाप बोलती और एक्शन लेती रहती हैं।उनके अक्ल के अजीर्ण का ताजा नमूना है विपन चन्द्रा की किताब ´India’s Struggle for Independence´(1988) प्रतिबंध लगाने का सुझाव देना और दिल्ली वि.वि.के द्वारा उनके आदेश का तुरंत पालन करते हुए इस किताब की बिक्री पर रोक लगाना,पाठ्यक्रम में पाबंदी लगाना।

इस पुस्तक में विपनचन्द्रा के अलावा मृदुला मुखर्जी,आदित्य मुखर्जी ,सुचेता महाजन और के.एन पन्निकर के लिखे अध्याय भी हैं।विपन चन्द्रा ने भूमिका के अलावा इस किताब के कुल39 अध्यायों में से 22अध्याय स्वयं लिखे हैं।बाकी अन्य के लिखे हैं।मूल समस्या है भगतसिंह को ´क्रांतिकारी आतंकवादी´के रूप में सम्बोधित करने को लेकर ।यह किताब1988 में आई।तब से लेकर आज तक सारे देश में यह किताब बेहद जनप्रिय है।लाखों छात्रों ने इसका लाभ उठाया है।इसके पहले इस पदबंध को लेकर कभी किसी ने कोई आपत्ति प्रकट नहीं की।हाल ही में अचानक एक टीवी कार्यक्रम में इस पदबंध का जिक्र आया और मंत्री महोदया ने राजाज्ञा जारी करके किताब को पढ़ाए जाने पर पाबंदी लगादी।इससे एक बात तो साफ है कि मोदी सरकार और आरएसएस उन तमाम धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों को सहन करने की स्थिति में नहीं हैं जो साम्प्रदायिक नजरिए का विरोध करते हैं।स्मृति ईरानी का विपनचन्द्रा आदि की किताब पर जो रूख सामने आया है वह इस बात का भी प्रमाण है कि सत्ता के अंदर किस तरह असहिष्णुता भरी पड़ी है।इससे यह भी पता चलता है कि मोदी सरकार किसी भी तरह के वैज्ञानिक अनुसंधान को पसंद नहीं करती और ज्योंही कहीं पर कोई मौका मिलता है तुरंत हमलावर कार्रवाई करने पर उतारू हो जाती है।मंत्री महोदया के आदेस पर दिल्ली वि.वि. प्रशासन ने विभागीय स्वायत्तता का उल्लंघन किया है, बिना इतिहास विभाग से पूछे सीधे कार्रवाई करके नई घटिया मिसाल कायम की है। सामान्यतौर पर विभाग को अकादमिक मामलों में फैसले लेने का हक है,मंत्री या वीसी को भी यह हक नहीं है। खासतौर पर जिस तरह से इस किताब पर पाबंदी लगायी गयी है वह निंदनीय है और सरकार की फासिस्ट मनोदशा की अभिव्यंजना है।

सवाल यह है भगतसिंह आदि को ´क्रांतिकारी आतंकवादी´कहने का सिलसिला कहां से शुरू हुआ ॽ क्या क्रांतिकारियों को विपनचन्द्रा ने सम्बोधित करके इस पदबंध की शुरूआत की या फिर पहले से इसका कहीं आरंभ होता है।इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आतंकवादी किसे कहें ॽआतंकवादी की परिभाषा क्या है ॽस्वयं पीएम नरेन्द्र मोदी विश्व के नेताओं और संयुक्त राष्ट्र संघ का भी आतंकवाद की परिभाषा बनाने के लिए आह्वान कर चुके हैं। सवाल यह है आरएसएस की नजर में आतंकवाद की परिभाषा क्या है ॽभारत सरकार की नजर में आतंकवाद की परिभाषा क्या है ॽ क्रांतिकारी और क्रांति की परिभाषा क्या है ॽ इससे भी बड़ा सवाल यह है क्या किसी राजनीतिक संगठन या आरएसएस जैसे संगठन के नजरिए से भारत का इतिहास लिखा जा सकता है ॽ



इतिहास लेखन एक स्वतंत्र अनुशासन है,उसके नियम,परंपराएं और दृष्टियां हैं।सामग्री संकलन की शोध पद्धतियां हैं।इनको लंबे अकादमिक विचार-विमर्श के आधार पर निर्मित किया गया है,इनके बारे में किसी नेता के मूड़ और विचारों के आधार पर फैसला नहीं हो सकता।इतिहास का क्षेत्र इतिहासकारों का है ,वह राजनेताओं के जंग की जगह नहीं है।आरएसएस इतिहासलेखन को इतिहासकारों के दायरे से बाहर लाकर राजनेताओ की,संघ के काल्पनिक इतिहासकारों की कर्मशाला बनाना चाहता है।काल्पनिक इतिहास की अशिक्षित समाज में उपजाऊ जमीन होती है,वे किंवदन्तियों और पुराकथाओं को ही इतिहास के रूप में पेश करते हैं।वे इतिहासलेखन के किसी भी वैज्ञानिक पद्धतिशास्त्र को नहीं मानते।लेकिन अकादमिक जगत कल्पनाशास्त्र और किंवदन्तियों से नहीं चलता उसके लिए अकादमिक अनुशासन में प्रवेश करने, बुद्धि,विवेक और अकादमिकश्रम की जरूरत पड़ती है,जाहिरातौर पर आरएसएस के लोग इन सब पर विश्वास नहीं करते,वे अकादमिक अनुशासन को संघ के अनुशासन के जरिए अपदस्थ करने पर उतारू हैं,इससे भी शर्मनाक बात है कि दिल्ली वि. वि. के उपकुलपति महोदय संघ के अनुशासन को मानकर एक्शन ले रहे हैं।

गुरुवार, 26 जून 2014

थानेदार यूजीसी का बेसुरापन

        डीयू में बीए में दाखिले को लेकर यूजीसी रोज सर्कुलर इस तरह जारी कर रहा है गोया वो छात्रों का सबसे बड़ा रखवाला हो ! सच यह है यूजीसी केन्द्र सरकार का पिछलग्गू संस्थान है। दिविवि और यूजीसी की टकराहट में विवि प्रशासन के जिद्दीभाव ने काफी मुश्किलें खड़ी की हैं। मुझे एक वाकया याद आ रहा है सन् 1983 में जेएनयू में किसी समस्या पर आंदोलन हुआ जेएनयू प्रशासन और छात्रों के बीच टकराव हुआ।समूचा छात्र आंदोलन कुचल दिया गया। नरसिंहा राव शिक्षामंत्री थे। मैं उन दिनों जेएनयू में एसएफआई का अध्यक्ष था।छात्रसंघ पर समाजवादी युवजनसभा का कब्जा था। समूचा छात्र समुदाय एकजुट होकर संघर्ष कर रहा था।

छात्र आंदोलन का दमन करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने विश्वविद्यालय को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया। छात्रावास खाली करा दिए गए। यह आंदोलन मई1983 में हुआ था। विश्वविद्यालय प्रशासन ने सभी नियम कायदे तोड़कर सारी नीतियां बदल दीं। किसी से राय नहीं ली,किसी की राय नहीं सुनी। छात्र,शिक्षक,कर्मचारी संगठनों की राय नहीं मानी और नहीं विभागों में बैठक हुई,नहीं बोर्ड आफ स्टैडीज की मीटिंग हुई।

जेएनयू की सारी नीतियां शिक्षा मंत्रालय के आदेश से एक ही एसी मीटिंग में चंद मिनटों में बदल दी गयीं। जुलाई में होने वाले नए सत्र के दाखिले नहीं किए गए। पहलीबार किसी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में नए दाखिले नहीं हुए। पुराने छात्र कोर्स खत्म करके चले गए। जेएनयू की छात्र संख्या मई 1983 में 3000के आसपास थी जो जुलाई में घटकर 1400 के आसपास हो गई। 400छात्रों पर 18 धाराओं में झूठे मुकदमे ठोक दिए गए। 170 से अधिक छात्रों को निष्कासित कर दिया गया। हमसभी छात्रों ने इस सबके खिलाफ यूजीसी को कईबार ज्ञापन दिया। नए सत्र में दाखिले की मांग की। अलोकतांत्रिक ढ़ंग से नीतियों के बदले जाने का विरोध किया।यह भी बताया कि जेएनयू की नीतियां बदलने के पहले विभिन्न स्तरों पर सहमति नहीं ली गयी। किसी भी वर्ग की राय नहीं ली गयी। यहां तक कि जेएनयू की दाखिलानीति तक बदल दी गयी जो संसद से स्वीकृत थी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने हस्तक्षेप करने से मना कर दिया।

उल्लेखनीय है जेएनयू के इस नीतिगत परिवर्तन के विरोध में हम सभी छात्रों ने हर स्तर पर गुहार लगायी। पीएम,राष्ट्रपति,यूजीसी,सभीदलों के सांसदों आदि सबसे अनुरोध किया अंत में परिणाम जीरो निकला। जेएनयू में जुलाई 1983 में दाखिले नहीं हुए। प्रशासन ने नई नीतियों के तहत एक साल बाद दाखिले लिए ,हमलोगों ने जुलाई 1983 में वि वि खुलने पर पूरे साल संघर्ष चलाया यूजीसी दसियों बार गए लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। यूजीसी का यही कहना था कि विश्वविद्यालय स्वायत्त है हम कुछ नहीं कर सकते।

कोई भी व्यक्ति जेएनयू के जुलाई1983 में दाखिले न लिए जाने की सच्चाई जेएनयू जाकर या उस समय के अखबार पढ़कर जान सकता है। कोई अखबार नहीं है जिसने जेएनयू के छात्रों की खबर को प्रथम पन्ने पर न छापा हो। लेकिन न तो केन्द्र सरकार ने सुना और नहीं यूजीसी ने। सभी ने यही कहा हम हस्तक्षेप नहीं कर सकते। लेकिन इधर दिविवि के खिलाफ शिक्षकों और छात्रों के आंदोलन के पक्ष में एक साल बाद यूजीसी की अति सक्रियता चिन्ता पैदा करती है। यूजीसी रोज दाखिले शुरु करने के लिए दबाव डाल रहा है। धमकियां दे रहा है।



जबकि यही सक्रियता जेएनयू के प्रसंग में गायब थी। जेएनयू में जो कुछ विश्वविद्यालय कर रहा था वह केन्द्र सरकार की अनुमति से कर रहा था। फलतःयूजीसी भी उस पाप में शामिल हो गया।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और डीयू के टकराव का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि विश्वविद्यालय की नीतियां बनाने , कोर्स आदि बनाने के बारे में फैसले लेने की हक किसको है ? यूजीसी की क्या भूमिका है औरकहां तक है ? इस मसले पर कायदे से अदालत से स्पष्ट नीतिगत निर्देश लेने की जरुरत है।इसके लिए दिविवि के दाखिले यदि कुछ विलम्ब से भी हो सकते हैं। अदालत के हस्तक्षेप की जरुरत इसलिए भी है क्योंकि यूजीसी ने अपने कार्यक्षेत्र का अतिक्रमण किया है। वह थानेदार की भूमिका में उतर आया है।



मंगलवार, 24 जून 2014

अंतहीन आंदोलन,हिंसाचार और डीयू


    विश्वविद्यालय स्वायत्त नहीं होते। स्वायत्तता धोखा है।स्वायत्तता कभी नहीं रही।वीसी चमचा होता है।हमेशा अपने चमचों से एसी भर लेता है। एसी का वो मनमानी के लिए दुरुपयोग करता है। सरकार के एजेंट की तरह काम करता है। हठात ये सारे तर्क उनसे सुनने को मिल रहे हैं जो कल तक विश्वविद्यालयों के बारे में हर आंदोलन में यह कहते थे कि हमें हर हालत में विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की रक्षा करनी चाहिए। ये सारी बातें दिल्ली विश्वविद्यालय के चारसाला पाठ्यक्रम (FYUA) को यूजीसी द्वारा वैध घोषित किए जाने के कारण नए सिरे से उठी हैं।

मेरी दि वि वि के प्रशासन या उसके चार साला पाठ्यक्रम के साथ कोई निजी सहानुभूति या विरोध नहीं है। मैं वस्तुगत तौर पर एक राजनीतिक नजरिए से देख रहा हूँ। चीजें साफ ढ़ंग से नजर आएं इसके लिए एक अनुभव बताता हूँ।

मैंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर पद पर पदोन्नति हेतु सन्2000 में आवेदन किया और सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद 2001 में मैं प्रोफेसर हो गया।यह मेरा समूचे अकादमिक जीवन में एकमात्र प्रमोशन था। मैं मात्र 11 साल के शैक्षणिक अनुभव के बाद ही प्रोफेसर बन गया। यह सुखद अनुभव इतने कम समय में बहुत कम शिक्षकों को नसीब होता है। जबकि एक शिक्षक तीनबार प्रमोशन पाने का हकदार है। मुझे पदोन्नति का नियुक्ति पत्र मिल गया । बाद में पता चला कि मेरी नियुक्ति प्रक्रिया के सारे कागजात यूजीसी स्वीकृति हेतु भेजे गए हैं और यूजीसी उनको स्वीकृति देगी तब ही मैं प्रोफेसर माना जाऊँगा। मैं परेशान रहने लगा काफी दिन तक यूजीसी का उत्तर नहीं आया ।

एकदिन मैंने कलकत्ता वि .वि .के अधिकारियों से पूछा कि मेरी नियुक्ति पर यूजीसी का स्वीकृति पत्र अभी तक क्यों नहीं आया ? पता चला यह नियम और परंपरा है कि विश्वविद्यालय से नियुक्ति संबंधी जो कागजात यूजीसी भेजे जाते हैं उन पर यदि एक माह के अंदर यूजीसी आपत्ति नहीं भेजती तो मान लिया जाता है कि नियुक्ति वैध है। फलतः यूजीसी से मेरी नियुक्ति बगैर उनके पत्र के एक माह बाद वैध मान ली गयी। यदि मुझसे कोई पूछे कि यूजीसी का नियुक्ति वैधता प्रमाणपत्र दिखाओ तो मैं दिखा नहीं पाऊँगा । यह बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि दिविवि शिक्षकसंघ बार बार कह रहा है चारसाला पाठ्यक्रम को विजिटर की अनुमति जरुरी है,अब इन ज्ञानी लोगों को कौन बताए कि एक निश्चित समयावधि तक विजिटर आपत्ति नहीं करता तो कोर्स को स्वीकृत मान लिया जाता है और यह कन्वेंशन छह दशक से जारी है। विजिटर यानी राष्ट्रपति ने जब आपत्ति नहीं की तो शिक्षकसंघ के नेताओं की आपत्ति का कोई महत्व नहीं है। विजिटर की स्वीकृति अंतिम होती है।

यूजीसी के फैसले के कारण दि. वि.वि. का चारसाला पाठ्यक्रम आए या जाए, वीसी हटाया जाए या रहे,हमें इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह कोर्स रहेगा या जाएगा इसका फैसला अकादमिक परिषद यानी एसी को ही करना है। यह फैसला बदला भी जा सकता है और बरकरार भी रख सकते हैं।

मीडिया में कहा गया यूजीसी ने दिविवि के चारसाला बीए पाठ्यक्रम को अवैध घोषित कर दिया है। यह बुनियादी तौर पर सही नहीं है। यूजीसी ने पहले इस कोर्स को स्वीकृति दी इसके बाद ही यह कोर्स आरंभ हुआ। यह अनुमति कैसे और क्यों मिली,यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है इसको यूजीसी द्वारा स्वीकृति देना। यह कोर्स विजिटर और राष्ट्रपति के पास भी भेजा गया था। समय पर न तो यूजीसी ने और नहीं विजिटर ने आपत्ति की।इसलिए मान लिया गया कि सबकुछ ठीकठाक है। लागू करो। इस बीच में कोई अदालत भी नहीं गया।

यह भी सत्य है कि चारसाला पाठ्यक्रम का शिक्षकसंघ ने विरोध किया,अनेक छात्रसंगठनों ने भी विरोध किया। यह भी सच है कि वीसी का शिक्षकों और छात्रों के संगठनों के प्रति अलोकतांत्रिक और हठधर्मीवाला रवैय्या था। इससे चीजें सुलझने की बजाय उलझी ज्यादा हैं। आंदोलनकारियों ने चारसाला कोर्स को खत्म करने के आंदोलन को अंतहीन आंदोलन की तरह चलाकर आत्मघाती आंदोलन की शिक्षाविरोधी मिसाल कायम की है।

माकपा में एकवर्ग रहा है जो अंतहीन आंदोलन की राजनीति में विश्वास करता रहा है। अंतहीन आंदोलन के कारण हमेशा लोकतांत्रिक हकों का क्षय हुआ है। प्रशासन को मनमानी करने,हमले करने का बहाना मिलता है। अंतहीन आंदोलन की राजनीति हमेशा गरम गरम नारों और उत्तेजनापूर्ण अविवेकवाद को अभिव्यंजित करती है। यह विवेकहीन बहादुरी का आदर्श नमूना है।दिविवि शिक्षक संघ ने वस्तुतः इसी मॉडल को अपनाकर आंदोलन किया है और उसके कारण कैम्पस का सारा वातावरण नष्ट हुआ है। अधिकारियों ने मौके का लाभ उठाया है और सभी परंपराओं को तिलांजलि देदी। अंतहीन आंदोलन के मार्ग की ये सामान्य और अपरिहार्य परिणति है।

पश्चिम बंगाल इस तरह के अंतहीन आंदोलनों की सबसे बड़ी प्रयोगशाला रहा है। इस मार्ग पर चलकर पूरे राज्य का शिक्षा ,समाज और उद्योग बर्बाद हो चुका है।ये आत्मघाती आंदोलन की राजनीति है। आज इस मार्ग पर चलने के कारण पश्चिम बंगाल के सारे कॉलेज आज अखाडे बने हुए हैं, राजनीतिक हिंसाचार रोजमर्रा की चीज हो गया है। यही फिनोमिना दिविवि में भी पैदा हो गया है। कल यानी 23जून को आजतक टीवी चैनल के हल्लाबोल कार्यक्रम के प्रसारण के दौरान एक शिक्षक की जिस तरह छात्रनेताओं ने पिटाई की और लहू-लुहान किया वह संकेत है कि दिविवि यदि संभला नहीं तो पश्चिम बंगाल की तरह हर कॉलेज में हिंसा का शासन होगा।

उल्लेखनीय है अंतहीन आंदोलन की धारणा जब भी लागू करेंगे हिंसा होगी और संस्थान या कारखाने बंद होंगे। 23 जून की हिंसा उसकी अभिव्यक्ति है,प्रशासन का हिंसाचार उसकी अभिव्यक्ति है। अंतहीन आंदोलन के कारण पश्चिम बंगाल के सारे उद्योग खत्म हो गए या शिफ्ट होकर अन्य राज्यों में चले गए। अंतहीन आंदोलन के कारण पुलिस और गुण्डों की हिंसा ने रूटिन रुप धारण कर लिया है। यही सिलसिला दिविवि में चल रहा है। अंतहीन आंदोलनकारी नहीं जानते कि आंदोलन वापस कैसे लिया जाय। वे हर संघर्ष को नाक की लडाई या आर-पार की लडाई मानकर लड़ रहे हैं। दिविवि में दुर्भाग्य से यही हुआ है। माकपा के लोग दिविवि में अंतहीन आंदोलन की थ्योरी में फंस गए हैं । अंतहीन आंदोलन की थ्योरी आत्मघाती और हिंसक है।

दि वि वि में हमारी दिलचस्पी एक नागरिक के नाते है। हम सत्य और तथ्य जानने में रुचि रखते हैं। यूजीसी के जिस आदेश का हवाला दिया जा रहा है वह क्या है ? क्या यूजीसी ने अपने सदस्यों की राय के आधार पर चारसाला पाठ्यक्रम को अवैध घोषित किया है ? यदि हां तो यही काम विगत एक साल में क्यों नहीं किया गया ?क्यों एक साल पहले कोर्स लागू करने दिया ? या जिस हेकड़ी के साथ सर्कुलर निकाला गया है उसके पीछे यूजीसी नहीं है बल्कि मानव संसाधन मंत्रालय और उसके पीछे संघ के बंदे काम कर रहे हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ की अध्यक्षा की मौजूदगी में कई टीवी चैनलों पर यूजीसी के सदस्य एमएम अंसारी ने बार-बार साफ शब्दों में कहा कि यूजीसी का ताजा सर्कुलर केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के आदेश पर निकाला गया है और उस आदेश का यूजीसी के सर्कुलर में जिक्र भी है, इस तथ्य का डीयू शिक्षक संघ ने खंडन नहीं किया है। क्योंकि यूजीसी का इसमें वे इस्तेमाल कर रहे हैं। कहने का आशय है कि यूजीसी के चारसाला कोर्स को अवैध घोषित करने वाला सर्कुलर यूजीसी की स्वाभाविक राय नहीं है बल्कि नई सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय की राय है। यह एक राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित राय है।

उल्लेखनीय है कि मानव संसाधन मंत्रालय भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में किए गए वायदे को लागू कर रहा है। यह सर्कुलर एक बड़े लक्ष्य की पूर्ति के लिए जारी किया गया है दुखद यह है कि माकपा और उनके सहयोगी इसके पीछे निहित मोदी सरकार के असल मंतव्य को नहीं देख रहे हैं और अपनी नाक की जीत को देख रहे हैं। होसकता है इससे उनको कुछ क्षण के लिए राजनीतिक विजय का सुख मिले लेकिन यह विजय तो आसन्न पराभव की आहटें लेकर आई है ,उन आहटों को वे सुन नहीं पा रहे हैं।

मैं पहले भी लिख चुका हूँ कि माकपा में इस तरह के तत्व हैं जो अनुदार हैं,कंजरवेटिव हैं जो सहज ही इधर लाल दिखते हैं तो रातों-रात भगवा या हरे या नीले हो जाते हैं। प.बंगाल में तो इस समय लाल के भगवा या नीले या हरे होने का अंधड़ चला हुआ है। स्मृति ईरानी को इसका श्रेय जाता है कि उसने यूजीसी के एक सामान्य सर्कुलर के बहाने माकपा के नेतृत्ववाले शिक्षकसंघ और माकपाके नेताओं को अपने पीछे लामबंद कर लिया। माकपा-भाजपा का यह संयुक्त मोर्चा कितने दूर तक जाता है यह देखना दिलचस्प होगा। यह माकपा के राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा है।

उल्लेखनीय है पश्चिम बंगाल में शिक्षा में हुए तमाम किस्म के अ-लोकतांत्रिक कामों की दिल्ली विश्वविद्यालय के माकपा शिक्षकनेताओं ने कभी न तो निन्दा की और नहीं आलोचना की। मैं य़हां अशोक मित्र कमीशन की अप्रकाशित रिपोर्ट का संकेत में जिक्र करना चाहता हूँ। यह कमीशन पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु सरकार ने बनाया था जिसने निष्कर्ष के रुप में कहा कि वामशासन ने उच्चशिक्षा के समूचेतंत्र को बर्बाद करके रख दिया है। आश्चर्य की बात है कि वामशिक्षक संगठनों ने कभी अशोक मित्र कमीशन की रिपोर्ट को प्रकाशित नहीं होने दिया.जबकि अशोकमित्र तो उनके ही मित्र थे।यह बात में इसलिए कह रहा हूँ कि माकपा में लंबे समय से एक वर्ग रहा है जो स्वभाव से कठमुल्ला,पढ़ने-लिखने से नफरत करने वाला, पढ़ने-लिखने वालों का उपहास करने वाला,एंटी इंटेलेक्चुअल। यही वर्ग संयोग से दिविवि में शिक्षकों में फिलहाल नेतृत्व कररहा है। यही वह वर्ग है जो कल तक कांग्रेस शासन के साथ माल-मिठाई उडा रहा था , अब ये ही लोग विभिन्न बहानों से मोदी सरकार में विभिन्न संस्थानों में सरकारी कृपापदों पर बैठे नजर आएंगे।

दिल्ली विश्वविद्यालय का चारसाला कोर्स का आंदोलन और उसके बहाने स्मृति ईरानी के कृपाकटाक्षों का गिरना तो शुरुआतभर है। आनेवाले समय में ये लोग और भी सघनभाव से देशभक्ति और शिक्षा सुधार की आड़ में मोदी,भाजपा और संघ के एजेण्डे के साथ नजर आएंगे।

मंत्री से गुहार लगाना उचित है लेकिन मंत्री का दुरुपयोग करके विश्वविद्यालय की मान-मर्यादाओं पर हमले करना गलत है। मंत्री की मदद लो, लेकिन अकादमिक दंगल यूजीसी में नहीं होगा। यह दिलचस्प खोज का विषय है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह,शिक्षामंत्री (सिब्बल और राजू),यूजीसी,संसद और राष्ट्रपति तक वामनेतृत्व वाला शिक्षक संघ गया और कहीं पर भी उनकी बात नहीं मानी गयी। लेकिन मोदी सरकार आते ही एक साल बाद हठात उनके इशारे पर भाजपा मंत्री काम करने लगी और कल तक जो चीज सभी संस्थान वैध कह रहे थे, यूजीसी वैध कह रही थी, वह अचानक अवैध कहने लगी। राजनीतिक मेनीपुलेशन और सरेंडर का इससे बड़ा उदाहरण मिलना असंभव है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के चारसाला कोर्स का मौजूदा विवाद मोदीयुग का शिक्षा में आरंभ है । यह मोदी सपने की अभिव्यंजना है। वे अब सीधे उच्चशिक्षा को ऊपर से तोड़ने जा रहे हैं,माहौल बनना आरंभ हो गया है। लामबंदी शुरु हो गयी है। कंजरवेटिव एकजुट होने लगे हैं। भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में साफ कहा गया है वे विश्वविद्यालय आयोग को खत्म करेंगे। मनमोहन सरकार में भी इस तरह की कोशिशें हुई थीं लेकिन वे दबा दी गयीं।

मोदी सरकार का असल लक्ष्य है मनमोहन सरकार के अधूरे कामों को पूरा करना। मनमोहन सरकार ने चारसाला कोर्स की अनुमति देकर जो काम आरंभ किया था वह अधूरा पड़ा है। इस कोर्स का लक्ष्य वह नहीं है जो विश्वविद्यालय दावा कर रहा है।इस कोर्स का लक्ष्य है विदेश की सप्लाई लाइन को तेज करना। निजी विदेशी विश्वविद्यालयों के आने का मार्ग प्रशस्त करना। मोदी सरकार भी यही काम मुस्तैदी से करना चाहती है लेकिन शैली भिन्न रहेगी। मोदी शैली होगी उच्चशिक्षा के मौजूदा ढाँचे को ऊपर से तोड़ा जाय। चारसाला कोर्स नव्य-उदार लक्ष्यों की संगति में बनाया गया था, वे इसे अंशतः रखना चाहते हैं यह बात शिक्षक संघ भी कह रहा है। असल में हमें मोदी शिक्षा स्वप्न के नव्य उदार लक्ष्यों से मुठभेड़ के लिए तैयार रहना चाहिए।यह शुरुआत है।













रविवार, 22 जून 2014

दिल्ली विश्वविद्यालय का खेल - मोदी सरकार की पहली पराजय

       विश्वविद्यालय स्वायत्तता अपहरण का एक खेल दिल्ली में चल रहा है। इस खेल में संयोग से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ,माकपा और भाजपा एक ही मंच पर आकर मिल गए हैं। इस खेल की खूबी है कि ये तीनों खिलाडी संविधान,अकादमिक स्वायत्तता और बौद्धिक स्वतंत्रता इन तीनों का मखौल उडाने में लगे हैं।

विगत सप्ताह मोदी सरकार आने के बाद यूजीसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय को सर्कुलर भेजकर चार साला बीए कोर्स बंद करने का निर्देश दिया ,वह पूरी तरह असंवैधानिक है। यूजीसी इस तरह का आदेश किसी भी विश्वविद्यालय को नहीं दे सकता। सवाल यह है कि यूजीसी ने जब यह कोर्स लागू किया गया उस समय यह राय क्यों नहीं दी ?

यूजीसी सुझाव दे सकती है.आदेश नहीं। यूजीसी के आदेशों की हकीकत यह है कि गुजरात में अभी तक कॉलेज-विश्वविद्यालयों में छठे वेतन आयोग के आधार पर बने वेतनमान लागू नहीं हुए हैं। पश्चिम बंगाल में शिक्षकों का छठे वेतनमान के आधार पर वेतन मिला लेकिन बकाया धन अभी तक नहीं मिल पाया है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो दिए जा सकते हैं। मूल बात यह है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता में हस्तक्षेप करने का कोई हक नहीं है। यहां तक कि संसद को भी हक नहीं है।विजिटर को भी हक नहीं नहीं है। विजिटर या शिक्षामंत्री किसी भी फैसले के एकमहिने के अंदर विरोध करता है तो वह विरोध विचारयोग्य होता है। यदि एक महिने के बाद राय आतीहै तो विचारयोग्य भी नहीं होता।

विश्वविद्यालय के फैसले अकादमिक परिषद लेती है,कार्यकारी परिषद लेती है। शिक्षामंत्री या यूजीसी नहीं । यूजीसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय को चारसाला कोर्स को खारिज करने का आदेश देकर अपने संवैधानिक कार्यक्षेत्र का अतिक्रमण किया है। यूजीसी को जबाव देना होगा कि विगत समय में उसने और उसके अधिकारियों ने यही फैसला क्यों नहीं लिया ? क्यों दिविवि को कोर्स लागू करने को कहा ? क्या उन अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई ? हमारे शासकों को नौकरशाही को उपकरण बनाकर काम करने से बाज आना चाहिए।

चारसाला कोर्स की गुणवत्ता और गुणहीनता, संवैधानिकता और असंवैधानिकता,प्रासंगिकता या अप्रासंगिकता पर बहस का समय खत्म हो चुका है क्योंकि कोर्स लागू हो चुका है। हजारों विद्यार्थी एक साल से पढ़ रहे हैं, नए दाखिले होने जा रहे हैं। रिव्यू ही करना है तो पहले बैच के निकलने पर रिव्यू करो। लेकिन यह काम अकादमिक परिषद करेगी न कि यूजीसी। चारसाला कोर्स प्रासंगिक है या नहीं यह तय करने का काम विश्वविद्यालय का है। यह कोर्स तय करते समय बहुमत से तय पाया गया कि कोर्स आरंभ किया जाय।सभी इस फैसले को मानने को बाध्य हैं। इस मामले में माकपा-भाजपा की हठधर्मिता विलक्षण है।

शिक्षक संघ इसके विरोध में था अनेक छात्रसंगठन भी विरोध में थे,कई राजनीतिक पार्टियां भी विरोध में थीं। लेकिन विश्वविद्यालय के फैसले अकादमिक परिषद में होते हैं और दिविवि की अकादमिक परिषद ने पक्ष-विपक्ष पर विचार करने के बाद यह कोर्स आरंभ किया। शिक्षा के फैसले सड़कों पर जुलूसों और धरना स्थलों या फेसबुक पर नहीं होते।

यह मसला कईबार यूजीसी में भी गया,अनेक ज्ञानीलोगों ने यूजीसी से लेकर शिक्षामंत्री,प्रधानमंत्री,संसद और राष्ट्रपति तक अपनी राय भेजी लेकिन कहीं से भी यह नहीं कहा गया कि दिविवि यह कोर्स बंद कर दे। सबने कहा यह विश्वविद्यालय का आंतरिक मामला है बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

लेकिन भाजपा को जनादेश मिलतेही पहला हमला दिविवि की स्वायत्तता पर हुआ जो निंदनीय है। भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में चारसाला बीए कोर्स को खत्म करने का वायदा किया गया है। मोदी के सत्तारुढ़ होते ही निहित स्वार्थी लोग असंवैधानिक हथकंडों का इस्तेमाल करके यह कोर्स बंद कराना चाहते हैं जबकि इस मामले में नियमानुसार दिविवि प्रशासन एकदम सही मार्ग का अनुसरण कर रहा है। कल के अकादमिक परिषद के फैसले के बाद यह साफ हो चुका है कि भाजपा और माकपा के शिक्षक संगठनों के पास अकादमिक परिषद में समर्थन का अभाव है। मात्र 10 शिक्षक उनके पक्ष में थे बाकी सभी ने विवि के पक्ष का समर्थन किया। यह यूजीसी और प्रकारान्तर से भाजपा की पहली बड़ी पराजय है।यह मोदी सरकार के स्वायत्तता अपहरण अभियान की पहली बड़ी हार है।

इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि दिविवि को चारसाला कोर्स लागू करने पर पिछली सरकार का पूर्ण समर्थन था,संसद से लेकर पीएम तक,यूजीसी से लेकर शिक्षामंत्री तक सबने पिछले साल हस्तक्षेप करने से मना किया और दिविवि प्रशासन का साथ दिया। मोदी सरकार को पुरानी सरकार के इस फैसले का आदर करना चाहिए।



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