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सोमवार, 5 सितंबर 2016

शिक्षक के रूप में फेसबुक

       गुरू वह जो सम्प्रेषक बनाए।फेसबुक इस अर्थ में हम सबका गुरू है ,उसने हम सबको कम्युनिकेटर बनाया है।कम्युनिकेशन की कलाओं से लैस किया है। जो लोग फेसबुक पर सक्रिय है उन सबका अप्रत्यक्ष रूप में फेसबुक गुरू है।यह हमारी दिमागी हरकतों का नियंत्रक और नियामक है।

हर मीडियम हमें सिखाता है।लेकिन हम उसे उपकरण से अधिक महत्व नहीं देते।वास्तविकता यह है आधुनिक युग में मीडियम हमारे गुरू हैं। पहले हम शिक्षक से सीखते थे लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद शुरू हुई तकनीकी क्रांति ने मीडियम को शिक्षक और छात्र के बीच में लाकर खड़ा कर दिया है।हम देखें फिल्म ने एक मीडियम के रूप में समाज को किस तरह सिखाया-पढ़ाया और सजाया-संवारा है।उसी तरह फेसबुक ने लेखन और अभिव्यक्ति के तौर-तरीकों के संबंध में हमारी नए सिरे से शिक्षा की है।

मैंने निजी तौर पर मीडियम के तौर पर फेसबुक से बहुत कुछ सीखा है,रोज कोई न कोई नई चीज हम यहां सीखते हैं।फेसबुक हमारा नया शिक्षक है।फेसबुक की वॉल जब सामने खुली होती है तो हर शिक्षित व्यक्ति लिखने के पहले छह बार सोचता है कि क्या लिखूँॽ लिखते हुए भय और संकोच में रहता है। भय-संकोच में वे लोग भी रहते हैं जो सुंदर-सटीक बोलने के लिए जाने जाते हैं।जिनके पास मेधा की कमी नहीं है।लेकिन फेसबुक पर आते ही उनकी सरस्वती गुम हो जाती है !

अभिव्यक्ति के रूपों में फेसबुक बेहतरीन माध्यम है,इसमें मित्र ही शिक्षक हैं,यूजर या पाठक ही शिक्षक है,जो गलती आप करते हैं,उसे दूसरा तुरंत बताता है,आप दुरूस्त कर लेते हैं।आप ऐसे व्यक्ति के कहे को मान लेते हैं जिसे आपने देखा नहीं,जाना नहीं,अनजाने व्यक्ति की आलोचना मानना,उससे सीखना यह फेसबुक का गुण है।बात करने के कौशल को कैसे विकसित करें,विभिन्न किस्म के लोगों में रहकर किस तरह संप्रेषण करें,यह कला फेसबुक पर रहकर ही सीख सकते हैं।फेसबुक की शिक्षण की कोई किताब नहीं है,वह पुराने किस्म के लेखन और अभिव्यक्ति रूपों का नया संस्करण लेकर आता है,हम यहां सब एकलव्य हैं।मित्रों की मदद से लिखकर सीखते हैं।यहां कोई गुरू नहीं है।शिक्षक नहीं है।



फेसबुक ने पहलीबार यह सिखाया कि मित्र ही गुरू है।सार्वजनिक संप्रेषण सामूहिक कला है। संप्रेषण तब ही सफल होता है जब उसे कोई पढ़े,सुने,गुने।फेसबुक इस मायने में हमें आत्मनिर्भर सम्प्रेषक बनाता है। वह पुराने सभी किस्म के संप्रेषण रूपों से भिन्न पैराडाइम में ले जाता है। यह मनुष्य की आत्मनिर्भर संप्रेषण शक्ति का चरमोत्कर्ष है।

सोमवार, 1 सितंबर 2014

सोशल मीडिया और बर्बरता

        सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक बर्बरता का महाख्यान चल रहा है। जिस तरह आईएसआईएस की पोस्ट अबाधित रुप में पेश की जा रही हैं, बर्बर संगठनों के पक्ष में निरंतर लिखा जा रहा है। उससे यह संकेत जा रहा है कि सोशल मीडिया के लिए बर्बरता सबसे बड़ी खबर है और राजनीतिक आंदोलन, प्रतिवाद और लोकतांत्रिक संघर्षों का कोई मूल्य नहीं है।अधिकांश मीडिया, बर्बरता की प्रस्तुतियों में इस कदर व्यस्त है कि उनको जनांदोलनों की किसी खबर या समस्या के कवरेज की कोई चिंता ही नहीं है। यह भी कह सकते हैं कि मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक बर्बरता का नाटक चल रहा है और हम सब उसके मूकदर्शक बन गए हैं।बर्बरता का जितने बड़े रुप में प्रसारण हो रहा है जनांदोलनों का उतने बड़े रुप में प्रसारण नहीं हो रहा। यानी मीडिया की नजर में बर्बरता प्रासंगिक है,मोहन भागवत के नॉनशेंस बयान,बत्रा पंडित का पोंगापंथ और भगवापंथ की इरेशनल खबरें प्रासंगिक हैं, लेकिन अन्य लोकतांत्रिक खबरें और लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष विचार प्रासंगिक नहीं हैं।

मीडिया और सोशल मीडिया का यह बर्बरता प्रेम , बर्बरता का मित्र बना रहा है और लोकतंत्र से दूसरी बढ़ा रहा है। बर्बरता प्रेम का ही परिणाम है कि अनंतमूर्ति से लेकर विपनचन्द्र तक की मौत पर बर्बरता प्रेमी खुशी का इजहार कर रहे हैं। इस तरह का बर्बरता प्रेम गुलाम युग में देखा गया था।सोशलमीडिया -मीडिया कवरेज ने नार्सीसिस्ट भावबोध की सृष्टि की है। इसके कारण मीडिया ने करोड़ों-अरबों का मुनाफा कमाया है। इसने जहां एक ओर परपीड़क आनंद और उसके भोक्ताओं का बर्बर समाज पैदा किया है वहीं दूसरी ओर मूल्याधारित राजनीति को पूरी तरह निम्नस्तर पर उतार दिया है। मुनाफेखोर मीडिया घराने खुश हैं कि उनकी रेटिंग और मुनाफों में उछाल आया है वहीं दूसरी ओर वे मीडिया -सोशलमीडिया के जरिए लोगों की वधलीला भी कर रहे हैं। आज सोशलमीडिया में किसी के हत्या की तस्वीर लगाइए और खूब कवरेज पाइए। नैतिकता,सभ्यता और भद्रता के जितने ज्यादा परखच्चे उड़ाएंगे उतना ही दावे के साथ ज्यादा मुनाफा कमाएंगे।

पी साईनाथ ने कहा-' मीडिया में 80 फीसदी स्‍टेनोग्राफर...हिरोशिमा-नगासाकी पर बम गिराए जाने के बाद The Times of India ने अपने 11 नंबर पेज पर शीर्षक लगाया था, "Excellent results in raid on Nagasaki" और इसके नीचे एक और ख़बर थी जिसका शीर्षक था, "Uranium shares go up 90 points after Hiroshima.'' इस घटना पर पूरी दुनिया में वाइट हाउस से जारी प्रेस रिलीज़ आधारित जो पत्रकारिता की गई, उसने पत्रकारिता में उसी वक्‍त दो स्‍कूल बना दिए- एक पत्रकारों का और दूसरा स्‍टेनोग्राफरों का। आज पत्रकारिता में 80 फीसदी स्‍टेनोग्राफर हैं जो धीरे-धीरे कॉरपोरेट स्‍टेनोग्राफर होते जा रहे हैं। ये कहना है जाने-माने पत्रकार पी. साईनाथ का।'

'दिल्ली के कॉन्‍सटिट्यूशन क्‍लब में आयोजित एक समारोह में अपने संबोधन के दौरान पी. साईनाथ ने पत्रकारिता को लेकर कई अन्य बातें भी बताईं, जिसमें से एक यूं हैं.... हिरोशिमा-नगासाकी पर अमेरिकी बमबारी का जश्‍न मनाते हुए जब न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स के (अमेरिकी सैन्‍य विभाग प्रायोजित) पत्रकार विलियम लॉरेन्‍स 'बम के सौंदर्य की तुलना बीथोवन की सिम्‍फनी के ग्रैंड फिनाले' से और बमबारी से पैदा हुए 'मशरूम की आकृति के धुएं के गुबार की तुलना स्‍टैच्‍यू ऑफ लिबर्टी' से कर रहे थे, ठीक उस वक्‍त सिर्फ एक फ्रीलांसर पत्रकार था जिसने इस घटना का सच सामने लाने के लिए अपने खर्च पर हिरोशिमा जाने का फैसला किया। ऑस्‍ट्रेलिया के इस पत्रकार का नाम था विल्‍फ्रेड बर्चेट। उसकी बेहतरीन रिपोर्टिंग 'द डेली एक्‍सप्रेस' में छपी।'

'विल्‍फ्रेड बर्चेट की रिपोर्टिंग का वैश्विक मीडिया के समक्ष खण्‍डन करने के लिए टोक्‍यो में अमेरिकी मैनहैटन प्रोजेक्‍ट के ब्रिगेडियर जनरल थॉमस फैरेल ने एक प्रेस कॉन्‍फ्रेन्‍स रखी। बर्चेट को पता चला कि प्रेस कॉन्‍फ्रेन्‍स उसी के ऊपर है, तो वह वहां पहुंच गया। उसने ब्रिगेडियर से कुछ सवाल किए। सवालों से असहज होकर ब्रिगेडियर ने उससे कहा कि वह जापान के साम्राज्‍यवादी प्रोपेगेंडा का शिकार हो गया है। बाहर निकलते ही एलाइड ताकतों के प्रमुख के निर्देश पर उसका पासपोर्ट ज़ब्‍त कर लिया गया, उसे हिरासत में ले लिया गया और हिरोशिमा-नगासाकी बमबारी की रिपोर्टिंग पर प्री-सेंसरशिप लगा दी गई।छूटने के बाद दोबारा जब बर्चेट ने पासपोर्ट बनवाया तो फिर से गुप्‍तचर एजेंसियों ने उसे चुरा लिया। इसके बाद वह आजीवन बिना पासपोर्ट के रहा। बर्चेट ने अपनी आत्‍मकथा 'पासपोर्ट' के नाम से लिखी और हिरोशिमा में लगे विकिरण के असर से बेहद गरीबी में जीते हुए बगैर किसी नागरिकता के उसका निधन हुआ। उधर, अमेरिकी सैन्‍य विभाग द्वारा प्रायोजित न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स के पत्रकार को दुनिया के सामने बम का सौंदर्य बखान करने के लिए पुलित्‍ज़र पुरस्‍कार से नवाज़ा गया। तभी से दुनिया भर की पत्रकारिता में दो ध्रुव कायम हो गए- लॉरेन्‍स की और बर्चेट की पत्रकारिता। अब आपको तय करना है कि आप क्‍या बनना चाहेंगे- विलियम लॉरेन्‍स या विल्‍फ्रेड बर्चेट?'

(पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के वॉल से)







गुरुवार, 3 मई 2012

सोशल नेटवर्कः सामाजिक संबंधों के अंत का वर्चुअल राग


   यह सामाजिक संबंधों के अंत का दौर है। इसमें नए किस्म के सामाजिक संसार की सृष्टि सोशल नेटवर्किंग साइट पर हो रही है। एक सर्वे में अनुमान व्यक्त किया गया है कि सन् 2014 तक इंटरनेट पर सोशल नेटवर्क का आकार कल्पना के दायरों का अतिक्रमण कर जाएगा। सोशल नेटवर्क के बढ़ने से सामाजिक समुदायों के बीच पुख्ता संबंधों की संभावनाओं को व्यक्त किया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि इससे समाज में आस्था मजबूत होगी।
    उल्लेखनीय है पूंजीवाद की विकास प्रक्रिया ने सामाजिक आस्थाओं को कमजोर किया है। उम्मीद की जा रही है कि सोशल नेटवर्क के विकास से सामाजिक आस्थाएं लौटेंगी। व्यक्तिगत समस्याओं,नौकरी,सूचना के बेरीफिकेशन,साझा हितों और वस्तुओं का उपभोग बढ़ेगा।
      ‘पेव’ (2004 Pew Internet & American Life Predictions Survey) सर्वे के उपरोक्त निष्कर्षों से 39 फीसदी लोग सहमत हैं, 20 फीसदी लोग असहमत हैं, और 27 फीसदी ने उपरोक्त राय को चुनौती दी है। जबकि 15 फीसदी ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है। यह सर्वे 1,286 अमेरिकियों में सन् 2004 में किया गया था।
    इस सर्वे में जिस बात का अनुमान किया गया था वह सही साबित नहीं हुआ। लेकिन एक तथ्य साफ है कि 2004 से लेकर 2010 के बीच में सामाजिक आस्था में गिरावट आयी है। आर्थिक मंदी ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। मंदी का पूर्वानुमान लगाने में इंटरनेट और कारपोरेट मीडिया असफल रहा है। आज अमेरिका में बेकारी चरमोत्कर्ष पर है।
     सोशल नेटवर्क के बृहत्तर संगठन हैं। किंतु इनमें से ज्यादातर के संबंध हल्के और चलताऊ मूल्यों पर टिके हैं। सोशल नेटवर्क के लोगों के संबंधों में विश्वास का अभाव है। सोशल नेटवर्क में ज्यादातर लोगों का इकसार विचारों के लोगों के  बीच संबंध है। ये ऐसे लोगों के समूह हैं जो सहमत हैं। इनमें न्यूनतम असहमति है। ये लोग आपस में ज्यादा से ज्यादा रेडीकल विचारों का आदान-प्रदान करते हैं लेकिन एक-दूसरे पर कम से कम विश्वास करते हैं।
      दूसरी बड़ी समस्या यह है कि सोशल नेटवर्क के सदस्यों की सूचनाओं की सहज पुष्टि संभव नहीं है। सोशल नेटवर्क का लक्ष्य लोगों में आपसी विश्वास पैदा करने से ज्यादा माल या वस्तु के प्रति विश्वास पैदा करना है। व्यापारिक विश्वास और संचार पैदा करना इसका प्रधान लक्ष्य है। सोशल नेटवर्क के द्वारा बने संपर्क और संबंधों का सीमित महत्व है,लेकिन इसे व्यक्तिगत संबंधों का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
    सोशल नेटवर्क का विस्तार हो रहा है इसका यह अर्थ नहीं  है कि सामाजिक संबंधों में आस्था पैदा हो रही है। इंटरनेट पर सभी सूचनाएं विश्वास के लायक नहीं होतीं। नेट पर जितनी वैध सूचनाएं हैं उससे ज्यादा अवैध सूचनाएं हैं। जितने भरोसे के लोग हैं उससे ज्यादा भरोसा लूटने वाले लोग हैं। नेट पर जितना व्यक्तिगत सच है उससे कहीं ज्यादा झूठ फैला हुआ है।
     आज समाज में आम लोगों के पास सामाजिक संबंध बनाने के अनेक चैनल हैं,सोशल नेटवर्क उनमें सबसे कमजोर और अविश्वसनीय चैनल है। एक सीमा के बाद सोशल नेटवर्क की कोई उपयोगिता नहीं है। संपर्क और संबंध के जितने ज्यादा स्रोत होंगे उतने ही संशय और संदेह की संभावनाएं भी होंगी। नेट के विभिन्न ऱूप सामाजिक शिरकत की बजाय सामाजिक पलायन को बढ़ावा दे रहे हैं। आप किसी भी व्यक्ति का नेट के माध्यम से आसानी से विश्वास तोड़ सकते हैं। यहां शिरकत वही कर रहे हैं जो एकमत हैं।
    इंटरनेट के द्वारा बहुत दूर रहने वाले व्यक्ति के साथ संपर्क रख सकते हैं। तत्काल अपनी बात संप्रेषित कर सकते हैं। अब तक का इंटरनेट अनुभव बताता है कि यह संपर्क का सबसे प्रभावी माध्यम है। इससे हमें ज्ञान संचार के अनेक नए स्रोत भी हाथ लगे हैं।   
     इंटरनेट से संपर्क बनाने के लिए समय और धैर्य ये दो चीजें होनी चाहिए। नेट के संबंधों को बनाए रखने के लिए इफ़रात में समय खर्च करना पड़ता है। सोशल नेटवर्क से सतही संबंध बनता है। यह नकली संबंध है। वास्तव जीवन में जिन व्यक्तियों से जीवंत संबंध हैं उनसे सोशल नेटवर्क से जरिए संवाद फलदायी हो सकता है। ऐसे लोगों के संबंधों को सोशल नेटवर्क और भी प्रगाढ़ बनाता है।
   सोशल नेटवर्क के सभी सदस्य गुणी नहीं होते। अनेक अवगुणी सदस्य भी हैं,शैतान भी हैं। सोशल नेटवर्क के सभी दोस्त मूल्यवान नहीं होते। इस सबके बावजूद सोशल नेटवर्क का दायरा तेजी से फैल रहा है। इसमें विविध किस्म के लोग आ रहे हैं। इससे परंपरागत संप्रेषण और सामाजिक बंधनों की सीमाएं टूट रही हैं। इससे यूजर और भी आलसी बनेगा। सामाजिक शिरकत  घटेगी। हम ज्यादा से ज्यादा घर में बैठे रहेंगे। स्थानीय समाज और संस्कृति से बेगानापन बढ़ेगा।
   सोशल नेटवर्क वैसे ही है जैसे घर में टेलीफोन। जिस तरह फोन की सीमा है उसी तरह नेटवर्क की भी सीमा है। चाहे वह कितना ही बड़ा हो इसकी भी सीमा है। मानवीय अनुभव में विश्वास धीरे धीरे आता है। उसी तरह आस्था का हमारी सहजजात अनुभूतियों से गहरा संबंध है। अनुभव की कसौटी पर जब कोई सूचना खरी उतरती है तब ही विश्वास होता है।
            सोशल नेटवर्क की एक समस्या यह भी है कि इसके अधिकांश सदस्य एक-दूसरे से भूठ बोलते रहते हैं। वे एक ऐसी संस्कृति का हिस्सा हैं जिसे साइबर संस्कृति कहते हैं। साइबर संस्कृति में असत्य की वैसे ही गुंजाइश है जैसे जीवन में। यह काल्पनिक संस्कृति है,इसका वास्तव जगत से कम संबंध है। इसका आधार है वर्चुअल या डिजिटल तकनीक। इस तकनीक का सांस्कृतिक आधार है सत्याभास। इसका परिणाम है ईमानदारी का लोप। वक्ता के एथॉस का लोप।
      यह भी संभव है कि असत्य ढ़ंकने लिए बड़बोलेपन से काम लिया जाए। सत्य को छद्म रूप और छद्म नाम से पेश किया जाए। यह भी संभव है कोई यूजर सत्य ही बोलना चाहे और वास्तव नाम के साथ बोलना चाहे। इस तरह के अन्तर्विरोध के बावजूद सोशल नेटवर्क का विस्तार ही होगा। यह भी संभव है जागरूक लोगों के बीच सोशल नेटवर्क सघन विचारधारात्मक एकता और भाईचारे का प्रभावी माध्यम हो जाए। 
  कुछ लोगों का मानना है कि ‘सोशल नेटवर्क’ के बहाने ‘सामाजिक संबंधों’ को अपदस्थ किया जा रहा है। ‘नेटवर्क’ में ‘संबंध’ को अपदस्थ करने या उसका विकल्प तैयार करने की क्षमता नहीं है। ‘नेटवर्क’ सिर्फ कनेक्शन है। बेज़ान संपर्क सूत्र है। यहां से ही इसकी शक्ति,सीमा और संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। बेज़ान संपर्क सूत्र के जरिए बनने वाले संबंध में प्राणों का संचार करना संभव नहीं है।  
      जिन लोगों के बीच किसी भी किस्म का पहले से सामाजिक संबंध है उनके लिए तो सोशल नेटवर्क एक अतिरिक्त संपर्क सूत्र हो सकता है। लेकिन जो सीधे सोशल नेटवर्क के जरिए जुड़ रहे हैं,मित्र बन रहे हैं, उनकी दोस्ती वायवीय और काल्पनिक ही होगी। ऐसे संबंध वर्चुअल ही होंगे, इन्हें वास्तव संबंध समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। इस तरह के संबंध में परिवर्तन की क्षमता नहीं है। यह सच है कि सोशल नेटवर्क में हजारों -लाखों लोगों के साथ संपर्क किया जा सकता है,लेकिन एक व्यक्ति कम से कम लोगों से संपर्क करता है। यह वैसे ही है जैसे 400 से ज्यादा टीवी चैनल टीवी में दिखते हैं। लेकिन व्यक्ति 400 चैनल नहीं देखता वह चंद चैनल ही देखता है।
     सोशल नेटवर्क के डाटा की सुरक्षा और प्राइवेसी को लेकर खूब हंगामा हो रहा है। कई बार डाटा चोरी की खबरें भी आई हैं। व्यक्तिगज जीवन की सूचनाओं के अपहरण की भी खबरें आई हैं। इनकी चोरी का सीधा घातक असर भी होता है। पहचान से जुड़ी सूचनाओं की चोरी गंभीर क्षति पैदा करती है।
   सोशल नेटवर्क का भविष्य में विकास होगा लेकिन विश्वास में विकास नहीं होगा इसके विपरीत विश्वास घटेगा। इंटरनेट पर सूचना प्राप्ति के स्रोत बढ़ जाएंगे। किंतु विश्वासयोग्य सूचना स्रोत नहीं बढ़ेंगे। इसी तरह नेटवर्क बढ़ेगा लेकिन भरोसे के सपर्क उस अनुपात में नहीं बढ़ पाएंगे। इंटरनेट उन लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में असमर्थ है जिनके बीच पहले से ही विश्वसनीय संबंध हैं। जो एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं उन्हें इंटरनेट आकर्षित नहीं कर पाया है। खासकर वाचिक सभ्यता ,व्यक्तिगत संबंधों और पुरानी नातेदारी-रिश्तेदारी वाले समाजों में सोशल नेटवर्क की अपील ज्यादा नहीं होगी।
    एक अन्य पहलू है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। सोशल नेटवर्क पर बढ़ती भीड़ में एक-दूसरे पर विश्वास का जमना संभव नहीं है। यह भी़ड़ जितना बढ़ेगी निजी विश्वास उतना ही कम होगा। विश्वास कम लोगों में होता है,भीड़ पर विश्वास कोई नहीं करता,भीड़ में सच कोई नहीं बोलता. भीड़ की कोई पहचान नहीं होती। भीड़ में पहचान गुम हो जाती है। हजारों की सदस्यता वाले सोशल नेटवर्क में निजी पहचान बचाए रखना संभव नहीं है ,वहां प्राइवेसी को भी बचाना संभव नहीं है। सोशल नेटवर्क मूलतः भीड़ है। भीड़ का निजी विवेक नहीं होता। भीड़ अधिकारहीन होती है। भीड़ में भेड़चाल होती है।  
  सोशल नेटवर्क यूजर के भूगोल को बदल देता है। किंतु भूगोल के आकार को नहीं बदल सकता। किसी भी संबंध को बनने में समय लगता है। इंटरनेट पर रीयल टाइम में संबंध बनने से किसी सामाजिक संबंध को बनाने में खर्च होने वाला समय कम नहीं किया जा सकता। इंटरनेट पर जितनी सूचनाएं उपलब्ध हैं उससे ज्यादा डिस-इन्फॉर्मेशन या कु-सूचनाएं उपलब्ध हैं। इसके अलावा सूचनाओं का अतिरिक्त बोझा स्वयं में एक समस्या है।
       इंटरनेट के आने के साथ सूचना ही नहीं आ कही हैं बल्कि अफवाह, असत्य, भड़काने वाली बातें,बेबकूफियां भी आ रही हैं, इससे इंटरनेट और सोशल नेटवर्क पर अविश्वास बढ़ेगा। इंटरनेट के चाटरूम में चलने वाली बातचीत में भी किसी भी किस्म का नियमन नहीं है अतः वहां जो सुझाव दिए जा रहे हैं वे वास्तव हैं,वैध हैं, इसके बारे में छानबीन करना संभव नहीं है। नेट पर विभिन्न रूपों में होने वाली बातचीत को वाचिक पहलवानी कहना समीचीन होगा। बातों के शेर कभी हकीकत में शेर नहीं होते।
   ‘पेव’ के 2004 के सर्वे से यह भी पता चला है कि सन् 2014 तक राजनीतिक और धार्मिक कट्टरपंथियों की इंटरनेट पर तादाद में तेजी से बढ़ोतरी होगी। प्रतिक्रियावादी और कट्टरपंथी ग्रुपों के व्यक्तिगत नेटवर्क भी खूब तेजी से सामने आएंगे। ये वे लोग हैं जो खुलेआम हिंसाचार और अविवेकपूर्ण बातों की हिमायत करते हैं। हिंसा और प्रतिगामी विचार उनके बीच में एकता का मूलाधार है।
   सन् 2004 का सर्वे यह भी रेखांकित करता है कि आम लोगों में राजनीतिक विवाद बढ़ेंगे। राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर ध्रुवीकरण तेज होगा। विचारों के ध्रुवीकृत संसार में अर्थपूर्ण बहस करना संभव नहीं है। किसी भी मसले पर अर्थपूर्ण आम सहमति बनाना संभव नहीं होगा।  
                        





















                                      

शुक्रवार, 3 जून 2011

फेसबुक की चुनौतियां और अलगाव


हिन्दी फेसबुक पर बड़े पैमाने पर युवालोग लिख रहे हैं। इनमें सुंदर साहित्य, अनुवाद,विमर्श आदि आ रहा है। इनमें आक्रामक और पैना लेखन भी आ रहा है। साथ ही फेसबुक पर बड़े पैमाने पर बेबकूफियां भी हो रही हैं। फेसबुक एक गंभीर मीडियम है इसका समाज की बेहतरी के लिए,ज्ञान के आदान-प्रदान और सांस्कृतिक- राजनीतिकचेतना के निर्माण के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। अभी हिन्दी का एक हिस्सा फेसबुक पर अपने सांस्कृतिक पिछड़ेपन की अभिव्यक्ति में लगा है। वे निजी भावों की अभिव्यक्ति से ज्यादा इस मीडियम की भूमिका को नहीं देख पा रहे हैं। एक पंक्ति के लेखन को वे गद्यलेखन के विकास की धुरी मानने के मुगालते में हैं।

फेसबुक में कुछ भी लिखने की आजादी है ,इसका कुछ बतखोर लाभ ले रहे हैं,यह वैसे ही है जैसे अखबार और पत्रिकाओं का गॉसिप लिखने वाले आनंद लेते हैं। इससे अभिव्यक्ति की शक्ति का विकास नहीं होता। बतखोरी और गॉसिप से मीडियम ताकतवर नहीं बनता। मीडियम ताकतवर तब बनता है जब उस पर आधुनिक विचारों का प्रचार-प्रसार हो। सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों और समस्याओं के साथ मीडियम जुड़े। हिन्दी में फेसबुक अभी हल्के-फुल्के विचारों और भावों की अभिव्यक्ति के साथ जुड़ा है। कुछ लोगों का मानना है कि यह पासटाइम मीडियम है। वे इसी रूप में उसका इस्तेमाल भी करते हैं। फेसबुक एक सीमा तक ही पासटाइम मीडियम है । लेकिन यह सामाजिक परिवर्तन का भी वाहक बन सकता है। किसी भी मीडिया की शक्ति का आधुनिकयुग में तब ही विकास हुआ है जब उसका राजनीतिक क्षेत्र में इस्तेमाल हुआ है। हिन्दी में ब्लॉगिंग से लेकर फेसबुक तक राजनीतिक विषयों पर कम लिखा जा रहा है। ध्यान रहे प्रेस ने जब राजनीति की ओर रूख किया था तब ही उसे पहचान मिली थी। यही बात ब्लॉगिंग और फेसबुक पर भी लागू होती है। जो लोग सिर्फ साहित्य,संस्कृति के सवालों पर लिख रहे हैं या सिर्फ कविता,कहानी आदि सर्जनात्मक साहित्य लिख रहे हैं उनकी सुंदर भूमिका है। लेकिन इस माध्यम को अपनी पहचान तब ही मिलेगी जब हिन्दी के श्रेष्ठ ब्लॉगर और फेसबुक लेखक गंभीरता के साथ देश के आर्थिक-राजनीतिक सवालों पर लिखें, किसी न किसी जनांदोलन के साथ जोड़कर लिखें । हिन्दी में अभी जितने भी बड़े ब्लॉगर हैं उनमें से अधिकांश देश ,राज्य और अपने शहर के राजनीतिक हालात पर लिखने से कन्नी काट रहे हैं या उनको राजनीति पर लिखना पसंद नहीं है।

फेसबुक रीयलटाइम मीडियम होने के कारण विकासमूलक और आंदोलनकारी या वैचारिक क्रांति में बड़ी भूमिका निभा सकता है। समस्या है फेसबुक का पेट भरने की। देखना होगा फेसबुक के मित्र- यूजर किन चीजों से पेट भर रहे हैं। खासकर हिन्दी के फेसबुक मित्र किस तरह की चीजों और विषयों के संचार के लिए इस माध्यम का इस्तेमाल कर रहे हैं ? अभी एक बड़ा हिस्सा गली-चौराहों की पुरानी बातचीत की शैली और अनौपचारिकता को यहां ले आया है। इससे जहां एक ओर पुरानी निजता या प्राइवेसी खत्म हुई है। वहीं दूसरी ओर वर्चुअल संचार में इजाफा हुआ है। हमें फेसबुक को शक्तिशाली मीडियम बनाना है तो देश की राजनीति से जोडना होगा। राजनीति से जुडने के बाद ही फेसबुक को हिन्दी में अपनी निजी पहचान मिलेगी और फेसबुक की बतखोरी,गॉसिप और बाजाऱू संस्कृति से आगे जाकर क्या भूमिकाएं हो सकती हैं उनका भी रास्ता खुलेगा। कोई भी मीडिया टिप्पणियों, प्रशंसा,निजी मन की बातें,निजी जीवन की दैनंदिन डायरी, पत्रलेखन से बड़ा नहीं बना, इनसे मीडिया को पहचान नहीं मिलती।ब्लॉगिग,फेसबुक आदि को प्रभावी बनाने के लिए इन माध्यमों का राजनीति से जुड़ना बेहद जरूरी है। फेसबुक यूजरों की संख्या 60 करोड़ से ऊपर है। आज फेसबुक पर गतिविधियां ज्यादा चल रही हैं। इसने गूगल की गतिविधियों को काफी पीछे छोड़ दिया है। इंटरनेट पर इस समय 40 हजार से ज्यादा सर्वर हैं जो सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं। फेसबुक पर प्रतिमाह 4 बिलियन से सूचनाएं यूजरों के द्वारा साझा इस्तेमाल की जाती हैं। 850 मिलियन से ज्यादा फोटोग्राफ हैं और 8 बिलियन वीडियो हैं। ये सब गूगल के पास नहीं हैं। क्लारा शिन ने "दि फेसबुक एराः टेपिंग ऑनलाइन सोशल नेटवर्क्स टु बिल्ड बेटर प्रोडक्टस,रीच न्यू ऑडिएंशेज,एंड सेल मोर स्टफ” नामक किताब में लिखा है ऑनलाइन सोशल नेटवर्क के तेजी से विस्तार ने हमारी जीवनशैली,काम और संपर्क की प्रकृति को बुनियादी तौर पर बदल दिया है। इसने व्यापार के विस्तार की अनंत संभावनाओं को जन्म दिया है। फेसबुक विस्तार के तीन प्रधान कारण हैं। पहला, विश्वसनीय पहचान। दूसरा,विशिष्टता और तीसरा है समाचार प्रवाह। फेसबुक द्वारा डाटा और सूचनाओं के सार्वजनिक कर देने के बाद से इंटरनेट पर्दादारी का अंत हो गया है। सूचना की निजता की विदाई हुई है और वर्चुअल सामाजिकता और पारदर्शिता का उदय हुआ है। डाटा के सार्वजनिक होने से यूजर आसानी से पहचान सकता है कि वह किसके साथ संवाद और संपर्क कर रहा है।ब्लॉगिंग के साथ निजी सूचनाओं के सार्वजनिक करने की परंपरा आरंभ हुई थी जिसे फेसबुक ने नयी बुलंदियों पर पहुँचा दिया है। इसका यह अर्थ नहीं है कि सामाजिक जीवन से निजता का अंत हो गया है। इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि इंटरनेट पहले की तुलना में और भी ज्यादा पारदर्शी बना है। साथ ही सामान्य लोगों में निजी बातों को सार्वजनिक करने की आदत बढ़ी है। निजी और सार्वजनिक बातों के वर्गीकरण के सभी पुराने मानक दरक गए हैं। फेसबुक ने प्राइवेसी का अर्थ बदला है पहले प्राइवेसी का अर्थ था छिपाना। लेकिन आज कुछ भी छिपाना संभव नहीं है। आज प्राइवेसी का अर्थ है संचार के संदर्भ का सम्मान करना। नकारात्मक पक्ष है वर्चुअल यथार्थ। यानी यथार्थ का विलोम। वर्चुअल संचार ने समाज में वर्चस्वशाली ताकतों को और भी ज्यादा ताकतवर बनाया है और सामान्यजन को अधिकारहीन,नियंत्रित और पेसिव बनाया है। इंटरनेट आने के बाद दरिद्रता और असमानता के खिलाफ राजनीतिक जंग कमजोर हुई है। वर्चस्वशाली ताकतों को बल मिला है। सामाजिक और राजनीतिक निष्क्रियता बढ़ी है। शाब्दिक गतिविधियां बढ़ी हैं,कायिक शिरकत घटी है। अब हम वर्चुअल में मिलते हैं और वर्चुअल में ही गायब हो जाते हैं।











शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

फेसबुक और मीडिया का सांस्कृतिक परिवेश-1-


     फेसबुक संचार की दुनिया में लंबी छलांग है। यह एक ऐसा सामाजिक मंच है जिस पर आप व्यापार,संवाद,संचार,विचार-विमर्श,राजनैतिक प्रचार,सामाजिक गोलबंदी आदि कर सकते हैं। यह ऐसा मंच है जो व्यक्तिगत और सामाजिक एक ही साथ है। यह ऐसा मंच भी है जो संचार के साथ -साथ आपके ऊपर नजरदारी भी करता है। यह सूचनाओं का साझा सामाजिक मंच है।
   फेसबुक के यूजरों की संख्या 60 करोड़ से ऊपर है। आज फेसबुक पर गतिविधियां ज्यादा चल रही हैं। इसने गूगल की गतिविधियों को काफी पीछे छोड़ दिया है। इंटरनेट पर इस समय 40 हजार से ज्यादा सर्वर हैं जो सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं। फेसबुक पर प्रतिमाह 4 बिलियन से सूचनाएं यूजरों के द्वारा साझा इस्तेमाल की जाती हैं। 850 मिलियन से ज्यादा फोटोग्राफ हैं और 8 बिलियन वीडियो हैं। ये सब गूगल के पास नहीं हैं।
    कुछ अर्सा पहले तक यह माना जा रहा था कि गूगल सारे विश्व का सूचना कुबेर है लेकिन फेसबुक के आने और तेजी से विस्तार करने के साथ ही गूगल की जगह सूचना कुबेर का पद फेसबुक ने हथिया लिया है। आज फेसबुक सारी दुनिया में सूचनाओं का सबसे बड़ा खजाना है। गूगल से ज्यादा फेसबुक पर हलचल हो रही है।  
    क्लारा शिन ने "दि फेसबुक एराः टेपिंग ऑनलाइन सोशल नेटवर्क्स टु बिल्ड बेटर प्रोडक्टस,रीच न्यू ऑडिएंशेज,एंड सेल मोर स्टफनामक किताब में लिखा है ऑनलाइन सोशल नेटवर्क के तेजी से विस्तार ने हमारी जीवनशैली,काम और संपर्क की प्रकृति को बुनियादी तौर पर बदल दिया है। इसने व्यापार के विस्तार की अनंत संभावनाओं को जन्म दिया है।
   फेसबुक विस्तार के तीन प्रधान कारण हैं। पहला, विश्वसनीय पहचान। दूसरा,विशिष्टता और तीसरा है समाचार प्रवाह। फेसबुक द्वारा डाटा और सूचनाओं के सार्वजनिक कर देने के बाद से इंटरनेट पर्दादारी का अंत हो गया है। सूचना की निजता की विदाई हुई है और वर्चुअल सामाजिकता और पारदर्शिता का उदय हुआ है। डाटा के सार्वजनिक होने से यूजर आसानी से पहचान सकता है कि वह किसके साथ संवाद और संपर्क कर रहा है।
ब्लॉगिंग के साथ निजी सूचनाओं के सार्वजनिक करने की परंपरा आरंभ हुई थी जिसे फेसबुक ने नयी बुलंदियों पर पहुँचा दिया है। इसका यह अर्थ नहीं है कि सामाजिक जीवन से निजता का अंत हो गया है। इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि इंटरनेट पहले की तुलना में और भी ज्यादा पारदर्शी बना है। साथ ही सामान्य लोगों में निजी बातों को सार्वजनिक करने की आदत बढ़ी है। निजी और सार्वजनिक बातों के वर्गीकरण के सभी पुराने मानक दरक गए हैं।
     फेसबुक ने प्राइवेसी का अर्थ भी बदला है पहले प्राइवेसी का अर्थ था छिपाना। लेकिन इंटरनेट युग में अब कुछ भी छिपाना संभव नहीं है। आज प्राइवेसी का अर्थ है संचार के संदर्भ का सम्मान करना। लोगों को संचार के संदर्भ के बाहर ठेलना इसका मकसद नहीं है। अनेक लोग सोचते हैं कि फेसबुक उनकी प्राइवेसी का हनन कर रहा है। ऐसा सोचना सही नहीं है। फेसबुक में एक विकल्प है ' सिर्फ मित्र के लिए' यानी आप अपनी सूचना मित्र को ही शेयर करना चाहते हैं।लेकिन यह भी नहीं चाहते तो उसका भी विकल्प है।
   फेसबुक के बारे में यह कहा जा रहा है कि यह संचार का सर्वोत्तम रूप है और इसकी सफलताओं को परवर्ती पूंजीवाद की सफलताओं के रूप में देखा जा रहा है। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का परम रूप तक कहा जा रहा है। सच इसके एकदम उलट है। फेसबुक या अन्य ग्लोबल मीडिया के हमारे घरों तक चले आने का अर्थ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विस्तार नहीं है बल्कि यह नियंत्रण का विस्तार है। यह स्वतंत्र का विस्तार और नियंत्रण दोनों है। इससे सूचना दरिद्र और सूचना समृद्ध की खाई और भी चौड़ी हुई है।
  उल्लेखनीय है इंटरनेट आने के बाद दरिद्रता और असमानता के खिलाफ राजनीतिक जंग कमजोर हुई है। वर्चस्वशाली ताकतों को बल मिला है। सामाजिक और राजनीतिक निष्क्रियता बढ़ी है। शाब्दिक गतिविधियां बढ़ी हैं,कायिक शिरकत  घटी है। अब हम वर्चुअल में मिलते हैं और वर्चुअल में ही गायब हो जाते हैं। वर्चुअल की तथाकथित स्वतंत्रता का मजा लेते हैं।
     माध्यम की भाषा में वर्चुअल का अर्थ है यथार्थ का विलोम। वर्चुअल के संचार ने समाज में वर्चस्वशाली ताकतों को और भी ज्यादा ताकतवर बनाया है और सामान्यजन को अधिकारहीननियंत्रित और पेसिव बनाया है।
     आज लोकतांत्रिक विमर्श,बहस,विवाद, संघर्ष की जगह समाज में नहीं टीवी स्क्रीन और इंटरनेट में है। लोकतंत्र का मंच समाज नहीं टीवी चैनल हो गए हैं। पक्षधर कहते हैं टीवी चैनल मुक्तसमाज का दर्पण हैं। मानवाधिकारों के सरोकारों का मंच हैं। टीवी पर आई खबर स्वतःप्रमाण है।
     असल में टीवी में जो है वही हमारा कॉमनसेंस भी है। जीवन और मन पर हमने टीवी के बताए मार्ग,लालच,झूठ और सच,विचार आदि को धारण कर लिया है। टीवी हमारे जीवन का माई-बाप हो गया है। इसके कारण हम कम से कम तथ्यों में जीने लगे हैं। अब हमें ज्यादा तथ्यों की नहीं कम तथ्यों में जीने की आदत पड़ गयी है। टीवी के तथ्य ऐसे हैं जिनके लिए किसी सामाजिक एक्शन की दरकार नहीं है।
     टीवी पर बढ़ती निर्भरता ने व्यक्ति के मेनीपुलेशन की अनंत संभावनाओं को जन्म दिया है। आज सामान्यजन की आस्था और विश्वास की दुनिया पूरी तरह टीवी पर टिकी है अतः अपनी नियत धारणाओं के परे जाकर तथ्यों को खोजना दूभर हो गया है।
      टीवी जिन्हें विशेषज्ञ के रूप में पेश करता है उन्हें ही हम संबंधित विषय का विशेषज्ञ मानते हैं। हम सीमित तथ्यों में बंधे रहते हैं और उनके आधार पर ही सोचते हैं,टीवी जैसा समझा रहा है हम वैसी ही जीवनशैली अपनाते चले जा रहे हैं।वह जैसा मनोरंजन देता है वैसे ही मनोरंजन के आदी हो गए हैं। हमारे चारों ओर नकली चीजों ने नाकेबंदी कर ली है। हमें कोई नहीं बताता कि नकली दुनिया के बाहर कैसे निकलें।  साहित्य से लेकर संस्कृति तक कॉमनसेंस की सत्ता को प्रतिष्ठित करने की मुहिम चल रही है। कॉमनसेंस की बातों के आधार पर सत्य को परखने की कोशिश की जा रही है। टीवी के माध्यम से बृहत्तर समाज को सुझाव दिए जा रहे हैं। इन सुझावों के आधार पर ही आम सहमति बनाने की कोशिशें हो रही हैं। आज  वातावरण ऐसा बना दिया गया है कि जो बात तत्काल समझ में नहीं आती उसे तुरंत ही बकबास कहकर खारिज कर देते हैं। जो अप्रिय सत्य है उसे हम देखने और सुनने को तैयार नहीं होते।जो तर्क हमारे कॉमनसेंस के खिलाफ होते हैं उन्हें हंसी-मजाक में उड़ा देते हैं। जो जगत हमारी तयशुदा समझ के परे होता है उसे एकसिरे से खारिज कर देते हैं। अथवा जो बात हमारे हितों के खिलाफ होती है उसे खारिज कर देते हैं।
    परवर्ती पूंजीवादी समाज के मनुष्य की विशेषता है विवेक और दृढ़ता का अभाव। यह ऐसा मनुष्य है जो सवाल नहीं करता। इसके पास सामाजिक हितों का बोध नहीं है।
    मीडिया हमारे मन में यह विश्वास भी पैदा करता है कि हम चीजों को नियंत्रित नहीं करते। चूंकि हम नियंत्रित नहीं करते फलतः हमें बार बार यही बोध होता है कि जो कुछ गलत हो रहा है उसके लिए हम निजी तौर पर जिम्मेदार हैं। मीडिया ने ऐसा वातावरण बनाया है जिसके कारण अधिकांश लोग अब अपनी राय व्यक्त ही नहीं करते। मीडिया लोगों को मुँह खोलने की बजाय मुँह बंद रखने की आदत पैदा कर रहा है। संशय,अर्द्धसत्य ,भ्रम,और नाटकीयता ये चार तत्व हैं जिन्हें मीडिया पैदा कर रहा है।
      अमेरिका नियंत्रित माध्यमों में वर्चस्वशाली ताकतों के खिलाफ प्रतिवाद के लिए कोई जगह नहीं होती। धीरे धीरे भारत का कारपोरेट मीडिया भी उसी दिशा में जा रहा है। यहां पर प्रतिवाद के लिए स्थान कम होता जा रहा है।
    यह उपभोक्ता समाज है। इसमें व्यक्ति की निजी अनुभूति का हिस्सा है यथार्थ । यथार्थ के नए रूपों ने पुराने रूपों को अपदस्थ कर दिया है। आज यथार्थ संकेतों और 'फीलिंग' में व्यक्त होता है। वस्तु की अनुभूति में व्यक्त होता है। एक अवस्था के बाद यह अनुभूति गायब हो जाती है और यही वह अवस्था है जब हम 'हाइपर रियलिटी' से दो चार होते हैं। दो सौ साल पहले जिस यथार्थ का उदय हुआ था उसे अब हम खो चुके हैं। वह अपना परा-भौतिक मर्म खो चुका है। अब सामयिक समाज वर्चुअल रियलिटी में दाखिल हो चुका है। यथार्थ को अब तक अवधारणा के रूप में देखते रहे हैं। सामान्यत: यह वस्तु की अमूर्त मानसिक धारणा है। यह ऐसी धारणा है जिसे सामुदायिक चेतना के रूप में प्राप्त करते हैं। आज यह अपनी चारित्रिक विशेषताएं खो चुकी है। अथवा व्यक्तिगत अनुभूति के रूप में संकुचित होकर रह गयी है।सामूहिक प्रस्तुति के युग से निकलकर व्यक्तिगत अनुभूति के युग में दाखिल  हो गई है। परिणामत: यथार्थ सामूहिक नियमन से निकलकरव्यक्तिगत नियमन की अवस्था में दाखिल होगया है इससे यथार्थ विकृत हुआ है। देखने पर लगेगा कि समाज अपने को आधुनिक मानता है।  लेकिन जिसे हम आधुनिक समाज कहते हैं वह आधुनिक समाज नहीं है बल्कि 'अनुकरण समाज' है। इस समाज को अनुकरणमूलक परिवेश मिला है। यह ऐसा समाज है जिसमें हर चीज वस्तु है। यह ऐसा जगत है जो हमारे बारे में सोच रहा है हम उसके बारे में सोच रहे हैं।  आज किताब आपको पढ़ रही है, टीवी आपको देख रहा है। वस्तुएं हमारे बारे में सोच रही हैं। लेंस हमें देख रहे हैं। इनका भाव हमें प्रभावित कर रहा है। भाषा हमसे बोल रही है। समय हमारे पास खाली पड़ा है। पैसा हमें कमा रहा है। मौत हमारा इंतजार कर रही है।
       आज हम घर बैठे टीवी देखते हैं,जिसमें 5सौ से ज्यादा चैनल उपलब्ध हैं, चैनलों में जो दिखाया जा रहा है क्या वह हमारा यथार्थ है ?क्या उस यथार्थ के साथ वास्तव यथार्थ की तुलना कर सकते हैं ? क्या यह यथार्थ है ? यह टीवी इमेज है ? यदि टीवी इमेज है तो यथार्थ और इमेज के बीच क्या संबंध है ? क्या इमेज को यथार्थ मान लें ? क्या टीवी इमेजों को अ-यथार्थ मानकर खारिज किया जा सकता है ? हम टीवी में जो देख रहे हैं यदि वह यथार्थ नहीं है और प्रस्तुतिभर है तो आखिरकार उसे कैसे देखें ? अथवा समाज में मौजूद यथार्थ के अनेक रूपों को कैसे देखें ? यथार्थ की अनेक इमेजों को जब हम देखते हैं तो क्या खोखली इमेजों को देखते हैं ? आखिरकार इस तरह की इमेजों को किस तरह की सैध्दान्तिकी के आधार पर पढें ? क्या इस तरह के मामलों में इमेज को अस्वीकार करके पढ़ा जा सकता है ? इत्यादि सवालों पर विस्तार से विचार किया जाना चाहिए।
    





शुक्रवार, 4 मार्च 2011

न्यू मीडिया के रूप में फेसबुक की चुनौतियां


    हिन्दी फेसबुक पर बड़े पैमाने पर युवालोग लिख रहे हैं। इनमें सुंदर साहित्य,अनुवाद,विमर्श आदि आ रहा है। इसमें आक्रामक और पैना लेखन भी आ रहा है। साथ ही फेसबुक पर बड़े पैमाने पर बेबकूफियां भी हो रही हैं।     
    फेसबुक एक गंभीर मीडियम है इसका समाज की बेहतरी के लिए,ज्ञान के आदान-प्रदान और सांस्कृतिक-राजनीतिकचेतना के निर्माण के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। अभी हिन्दी का एक हिस्सा फेसबुक पर अपने सांस्कृतिक पिछड़ेपन की अभिव्यक्ति में लगा है। वे निजी भावों की अभिव्यक्ति से ज्यादा इस मीडियम की भूमिका को नहीं देख पा रहे हैं। एक पंक्ति के लेखन को वे गद्यलेखन के विकास की धुरी मानने के मुगालते में हैं।
    फेसबुक में कुछ भी लिखने की आजादी है ,इसका कुछ बतखोर लाभ ले रहे हैं,यह वैसे ही है जैसे अखबार और पत्रिकाओं का गॉसिप लिखने वाले आनंद लेते हैं। इससे अभिव्यक्ति की शक्ति का विकास नहीं होता। बतखोरी और गॉसिप से मीडियम ताकतवर नहीं बनता। मीडियम ताकतवर तब बनता है जब उस पर आधुनिक विचारों का प्रचार-प्रसार हो।खबरें लिखी जाएं। सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों और समस्याओं के साथ मीडियम जुड़े। हिन्दी में फेसबुक अभी हल्के-फुल्के विचारों और भावों की अभिव्यक्ति के साथ जुड़ा है। कुछ लोगों का मानना है कि यह पासटाइम मीडियम है। वे इसी रूप में उसका इस्तेमाल भी करते हैं। फेसबुक एक सीमा तक ही पासटाइम मीडियम है । लेकिन यह सामाजिक परिवर्तन का भी वाहक बन सकता है।  
    फेसबुक बेहद शक्तिशाली मीडियम है इसकी समग्र शक्ति का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। किसी भी मीडिया की शक्ति का आधुनिकयुग में तब ही विकास हुआ है जब उसका राजनीतिक क्षेत्र में इस्तेमाल हुआ है। हिन्दी में ब्लॉगिंग से लेकर फेसबुक तक राजनीतिक विषयों पर कम लिखा जा रहा है। ध्यान  रहे प्रेस ने जब राजनीति की ओर रूख किया था तब ही उसे पहचान मिली थी। यही बात ब्लॉगिंग और फेसबुक पर भी लागू होती है। जो लोग सिर्फ साहित्य,संस्कृति के सवालों पर लिख रहे हैं या सिर्फ कविता,कहानी आदि सर्जनात्मक साहित्य लिख रहे हैं उनकी सुंदर भूमिका है। लेकिन इस माध्यम को अपनी पहचान तब ही मिलेगी जब हिन्दी के श्रेष्ठ ब्लॉगर और फेसबुक लेखक गंभीरता के साथ देश के आर्थिक-राजनीतिक सवालों पर लिखें, किसी न किसी जनांदोलन के साथ जोड़कर लिखें ।खोजी खबरें दें। हिन्दी में अभी जितने भी बड़े ब्लॉगर हैं उनमें से अधिकांश देश ,राज्य और अपने शहर के राजनीतिक हालात पर लिखने से कन्नी काट रहे हैं या उनको राजनीति पर लिखना पसंद नहीं है।
   फेसबुक रीयलटाइम मीडियम होने के कारण विकासमूलक और आंदोलनकारी या वैचारिक क्रांति में बड़ी भूमिका निभा सकता है। समस्या है फेसबुक का पेट भरने की। देखना होगा फेसबुक के मित्र- यूजर किन चीजों से पेट भर रहे हैं। खासकर हिन्दी के फेसबुक मित्र किस तरह की चीजों और विषयों के संचार के लिए इस माध्यम का इस्तेमाल कर रहे हैं ? अभी एक बड़ा हिस्सा गली-चौराहों की पुरानी बातचीत की शैली और अनौपचारिकता को यहां ले आया है। इससे जहां एक ओर पुरानी निजता या प्राइवेसी खत्म हुई है। वहीं दूसरी ओर वर्चुअल संचार में इजाफा हुआ है।
     हमें फेसबुक को शक्तिशाली मीडियम बनाना है तो देश की राजनीति से जोडना होगा। राजनीति से जुडने के बाद ही फेसबुक को हिन्दी में अपनी निजी पहचान मिलेगी और फेसबुक की बतखोरी,गॉसिप और बाजाऱू संस्कृति से आगे जाकर क्या भूमिकाएं हो सकती हैं उनका भी रास्ता खुलेगा।
    ब्लॉगिंग,फेसबुक आदि को प्रभावी बनाने के लिए इन माध्यमों का राजनीति से जुड़ना बेहद जरूरी है। कोई भी मीडिया टिप्पणियों, प्रशंसा,निजी मन की बातें,निजी जीवन की दैनंदिन डायरी, पत्रलेखन से बड़ा नहीं बना, इनसे मीडिया को पहचान नहीं मिलती।
आधुनिककाल की धुरी है राजनीति । आधुनिक साहित्य तब आया जब उसने राजनीति से संबंध जोड़ा। प्रेस को पहचान तब मिली जब उसने राजनीति से संबंध जोड़ा। कोई भी माध्यम हो या जनमाध्यम हो,संचार हो या जनसंचार हो, साहित्य हो या कलाएं हों वे अपनी आधुनिक पहचान राजनीति से जुड़ने के बाद ही बना पाई हैं। फेसबुक आदि के यूजरों को राजनीति से जुड़ना होगा। इसके बिना यह सामाजिक परिवर्तन का मीडियम नहीं बन सकता।





मंगलवार, 11 जनवरी 2011

फेसबुक में हिन्दी के मतवालों की नई भूमिका की तलाश में

     फेसबुक और दूसरे सोशल नेटवर्क पर आकर्षक और प्रासंगिक विषयवस्तु की समस्या बनी हुई है। हिन्दी वाले सोशल नेटवर्क पर ज्यादातर व्यक्तिगत खोजखबर लेने ,हंसी -मजाक करने, रसभरी बातें करने,अतीत का स्मरण करने ,दैनंदिन जीवन की बातें करने में खर्च कर रहे हैं।यह उनका मतवाला भाव है। हिन्दी भाषी राज्यों में जिस तरह का सांस्कृतिक,विचारधारात्मक और राजनीतिक वैविध्य है उसके दर्शन सोशल नेटवर्क पर अभी नहीं हो रहे। खासकर फेसबुक पर हमारे हिन्दीभाषी राज्यों के जीवन की विविधता और दैनंदिन जीवन की चुनौतियां नजर नहीं आ रही हैं।
    सोशल नेटवर्क की सफल अंतर्वस्तु की रणनीति पर अभी कोई सुसंगत चर्चा भी हम नहीं कर पाए हैं। मसलन फेसबुक और ऐसी ही सोशल नेटवर्क का किस तरह बेहतर इस्तेमाल किया जाए। इसके बारे में भारत के व्यापारी भी ज्यादा नहीं जानते और यदि जानते भी हों तो ज्यादा इस्तेमाल नहीं करते। हिन्दी में अभी इक्का-दुक्का किताब प्रकाशक हैं जो अपनी किताबों के प्रचार-प्रसार के लिए फेसबुक का बड़े असुंदर ढ़ंग से इस्तेमाल कर रहे हैं। वे किसी पेशेवर व्यक्ति की अपने काम में मदद भी नहीं ले रहे हैं।
     सोशल नेटवर्क की अंतर्वस्तु को दुरूस्त करने के लिए कुछ निम्न प्रस्ताव हैं जिन पर आप काम कर सकते हैं और चाहें तो इसमें कुछ और भी जोड़ सकते हैं। सोशल वेब को अपको अपने ब्राँण्ड के  अनुरूप बनाना चाहिए। जिस तरह का व्यक्ति है, उसके जिस तरह के विचार, मूल्यबोध, व्यवहार और विचारधारा है उसके अनुरूप बनाना चाहिए। अथवा जिस तरह का ब्राँण्ड है उसकी प्रकृति के अनुकूल सोशल वेब को बनाया चाहिए।
     हिन्दी में मनमानापन चल रहा है। ज्यादातर हिन्दीवाले अपने विचार,मूल्य,आदत, संस्कार आदि के अनुकूल सामग्री कम परोस रहे हैं। मसलन जो पत्रकार हैं उनकी सोशल वेब पर खबरें और सामयिक विचारों पर उनका लिखा कम से कम है। वे अपनी निजी मेहनत नहीं कर रहे। वे अन्य की सामग्री एकत्रित करके प्रसारित कर रहे हैं। इससे सही ब्राँण्डिंग नहीं हो पाती। इससे उनकी पेशवर क्षमता या कौशल को भी हम नहीं देख पाते हैं।
    मसलन हमारे जेएनयू के दोस्तों ने फेसबुक पर अपना ग्रुप बनाया है। इस ग्रुप में सभी ज्ञानी लोग हैं। लेकिन वे इस ग्रुप के बहाने जेएनयू की और भी सुंदर बाँण्डिंग कर सकते थे लेकिन अभी तक नहीं कर पाए हैं। वे एक खास किस्म के नाँस्टेल्जिया में जी रहे हैं और जेएनयू के ढ़ावे से लेकर इधर-उधर के मृतप्रसंगों पर टिप्पणियां कर रहे हैं। मेरी राय में इतने समर्थ और ज्ञानी लोगों से वेब सोशल नेटवर्कसमाज कुछ और ही अपेक्षाएं रखता है। यही दशा हमारे अन्य फेसबुक पर सक्रिय दूसरे अनेक दोस्तों की है। हिन्दी में इंटरनेट उन्नति करे इसके लिए पहली अनिवार्य शर्त है कि वेब लेखक हिन्दी में लिखें। हिन्दी के यूनीकोड फॉण्ट का इस्तेमाल करना करें। अभी अधिकांश यूजर चैट से लेकर टिप्पणियां लिखने तक रोमन लिपि में हिन्दी लिखते हैं। यह हिन्दी के भविष्य के लिहाज से दुखद स्थिति है।जो हिन्दीभाषी नहीं हैं और हिन्दी से इतर भाषा में जिनका पठन-पाठन हुआ है वे सुविधानुसार रोमन लिपि में लिखें तो समझ में आता है। लेकिन जो हिन्दी भाषी हैं उन्हें तो हिन्दी के यूनीकोड फॉण्ट में लिखने की आदत डालनी चाहिए। अपने कम्प्यूटर या लैपटॉप में हिन्दी फॉण्ट डाउनलोड करना चाहिए। यही बात अन्य भाषाभाषियों पर भी लागू होती है वे अपनी भाषा में यूनीकोड फॉण्ट का इस्तेमाल करें।
     पिछले दिनों हमारे दोस्त सुहेल हाशमी ने एक संदेश दिया कि फेसबुक पर उर्दू भाषा में अभिव्यक्ति की सुविधा होनी चाहिए। मैं इस कॉज के साथ हूँ। आज स्थिति यह है कि उर्दू माइक्रोसॉफ्ट के पैकेज का हिस्सा है। विण्डोज विस्टा और माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस 2007 के लैंग्वेज इंटरफेस पैक में उपलब्ध है। उर्दू को आसानी से डाउनलोड भी कर सकते हैं। लेकिन सवाल है लिखने का। फेसबुक पर उर्दू लिखने का काम उर्दूभाषियों का है। कहने का अर्थ है कि सोशल वेब पर आप अपनी स्वयं ब्राँण्डिंग ठीक से करें। दूसरी बात यह कि सोशल वेब पर लेखन सरल,रंगीन, खिलंदडी,कल्पनाशील होना चाहिए।
   सोशल वेब पर लिखते समय यह भी ध्यान रहे कि आप जब भी लिखें या उसका व्यापार के लिए इस्तेमाल करें तो वह आपके नाम से,वेब से ही अभिव्यंजित हो। वहां पर आने वालों के लिए प्रासंगिक सूचनाएं उपलब्ध हों। संभावित कलैण्डर उपलब्ध हो।
     वेब पर आपका कोई अनुसरण क्यों करे ? आपको पसंद क्यों करे ?इसके लिए जरूरी है आप उसमें यह एहसास पैदा करें कि आप उसे कुछ देंगे। आपके पास आने से उसे कुछ मिलेगा। बतखोरी करना अच्छी बात है लेकिन महज बतखोरी को सर्जनात्मकता नहीं कहते। सोशल वेब पन्नों पर कुछ न कुछ प्रासंगिक लिखा जाए। प्रत्येक यूजर अपने हिसाब किसी न किसी प्रासंगिक समस्या, अनुभव, साहित्य,विचार,बाजार,पास-पड़ोस, कस्बा, गांव आदि के बारे में लिखे।
   वेब भावों,विचारों,अनुभूतियों,वस्तुओं आदि के बारे में संप्रेषण का शक्तिशाली मंच है। यूजर को कोशिश करना चाहिए कि वह अधिकांश समय ऐसे संदेश लिखे जो ज्यादातर लोगों के काम के हों।मसलन हम संस्कृति,व्यवहार,संस्कार आदि को लेकर संवाद के विभिन्न स्तरों और परतों को खोल सकते हैं।
मनुष्य सामाजिक प्राणी है और वह स्वयं को जिंदा रखने और अपना विकास करने में इसलिए सफल रहा है क्योंकि उसने समस्याओं और सवालों के समाधान खोजे हैं। सोशल वेब के यूजरों की जिम्मेदारी बनती है कि यूजरों के सवालों और समस्याओं के समाधान की दिशा में प्रयास करें।
एक अच्छी अंतर्वस्तु कभी नकली नहीं होती। अच्छी अंतर्वस्तु को आप संचित करते हैं। फैंकते नहीं हैं। एक अच्छी अंतर्वस्तु ईमानदार और मानवीयभावों को अभिव्यक्त करती है। हम उसका पीछा करते हैं। उसे लेकर व्यस्त रहते हैं। समाज बनाते हैं। इससे ही सोशल मीडिया बनता है। 

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

आनंदी लोगों की रमणस्थली फेसबुक

   सन् 2010 का सबसे चर्चित विषय फेसबुक रहा है। इस सामाजिक मंच पर जितने लोग रमण करने आए हैं उतने किसी अन्य मंच पर नहीं आए। हाल ही में ‘ट्विटर’ पर किए एक सर्वे से यह तथ्य सामने आया है। सामाजिक नेट पर वर्ल्ड कप फुटबाल और हित्ती का भूकंप बड़े ही चर्चित विषय रहे हैं। जबकि फेसबुक पर अमेरिकी समुद्र में तेल रिसने की खबर पर कोई बात नहीं हुई।ब्रिटेन में ट्विटर पर जो सर्वोच्च 10 विषय रहे वे हैं-  1 .Gulf Oil Spill,2 .FIFA World Cup,3 .Inception,4 .Haiti Earthquake,5 .Vuvuzela,6. Apple iPad,7 .Google Android,8. Justin Bieber,9. Harry Potter & the Deathly Hallows,10. Pulpo Paul
इसी तरह फेसबुक का बाजार भारत में तेजी से बढ़ा है। भारत को जून 2010 में विश्व का दूसरे नम्बर का फेसबुक सदस्य माना गया। सारी दुनिया में इन्डोनेशिया पहले नंबर  पर था। उसके बाद फेसबुक सदस्य बनाने में भारत का नाम आता है। भारत में तकरीबन 10 लाख नए सदस्य बने हैं।

    फेसबुक पर कराए सर्वे से पता चला है फेसबुक पर हैत्ती के भूकंप के पहले झटके के पांच मिनट के अंदर ही पहली खबर फेसबुक पर आ गयी थी। एक मिनट में 120 अपडेट आ गए। फेसबुक पर प्रति पोस्ट को कम से कम 1800 लोगों ने पढ़ा। इसी तरह चिली में खान में फंस गए 33 लोगों की खबर को फेसबुक पर एकल और समूह में सबसे ज्यादा पढ़ा गया।
    यह सर्वे कई मायनों में महत्वपूर्ण है ,पहली बात यह कि फेसबुक और ट्विटर पर इराक-अफगानिस्तान में जो युद्ध चल रहा है वह पूरी तरह गायब है ,दूसरा नव्य आर्थिक उदारीकरण,मंदी और बेकारी गायब है। निरूद्योगीकरण गायब है। अमेरिका में चल रहे विवादास्पद राजनीतिक विश्व प्रपंच गायब हैं। इससे यही पता चलता है कि फेसबुक आनंदी लोगों की रमणस्थली है।   


मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

फेसबुक का लक्ष्य है संपर्क न कि सामाजिक परिवर्तन

   हितेन्द्र पटेल ने फेसबुक पर लिखा- ‘‘फेसबुक में विस्तार तो बहुत हो रहा है लेकिन गंभीर संवाद की संभावना कम हो रही है. जहाँ भीड बढी कि वही 'भेडियाधसान' चालू..’’

आगे यह भी लिखा- ‘‘मुझे लगता है अधिकतर लोग बिना किसी योग्यता के हर विषय में अपनी राय रखते हैं और किसी तरह के संवाद की गुंजाईश नहीं बना पाते. कुछ लोग अपनी लिखी चीजों को पढवाने, अपना नाम लोगों तक पहुँचाने के लिए बस लगे रहते हैं. ऐसे लोगों के लिए कई अन्य मंच हैं. गौतम जी जिसे बकवास कह रहे हैं वह इतना ज़्यादा होता जा रहा है कि मुझे लगने लगा है कि अब फेस बुक पर से हटकर कहीं और ठिकाना ढूँढा जाए।’’

    किसी भी बुद्धिजीवी की यह पीड़ा जायज है। लेकिन इसकी जड़ों में जाने के बाद ही इसके असली रहस्य को जाना जा सकता है। महज ऊबने,भागने,गदगद होने या विभ्रम में रहने से काम नहीं चलेगा।

    इंटरनेट या फेसबुक मूलतःअपरिचितों का केन्द्र है। अपरिचितों की इलैक्ट्रोनिक स्पीड की दुनिया में सभी जल्दी में हैं। जल्दी में ही सभी समस्याओं के समाधान खोज रहे हैं, कुछ हैं जो ज्ञान की गंभीर समस्याओं के हल खोज रहे हैं। जल्दी में ही मित्रों को ईमेल कर रहे हैं। फेसबुक पर टिप्पणियां कर रहे हैं। इंटरनेट पर मेले जैसी भीड़ है।

     मौनी अमावास्या पर जैसे लोग डुबकी लगाकर अपने लिए पुण्य जुटाते हैं ठीक वैसे ही फेसबुक पर दो-तीन पंक्तियों को लिखकर साइबर लेखक बन रहे हैं। यह स्थिति कई मायनों में अच्छी है। कम से कम कुछ लोग मिल रहे हैं,बातें कर रहे हैं,दुआ-सलाम कर रहे हैं। विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। लेकिन गंगा डुबकी से पुण्य नहीं मिलता। पंक्ति लेखन से लेखकीय माहौल नहीं बनता। 

    लेकिन मेले -ठेले में गंभीर विमर्श नहीं होता। सिर्फ मिलते हैं और चलते बनते हैं। फेसबुक ने विचारों को तेजगति नहीं दी है। बल्कि विचारों को चर्चा से गायब कर दिया है। यह नए किस्म की साइबर संपर्कों की दुनिया है। जिसका मूल मकसद है प्रचार करना। विचार करना,जोड़ना और सामाजिक तौर पर सक्रिय करना इसका मकसद नहीं है।

     मेले में आप गंभीर नहीं होते। आनंद के भाव में होते हैं। नज़ारे देखने के भाव में होते हैं। इंटरनेट और फेसबुक के मेले में भी यूजर आनंदमय संचार करता है। छोटी-छोटी टिप्पणियां करके विभिन्न दुकानों की विचारों,भावों और संवेदनाओं की चटपटी यात्रा करता है।

    मेले में हर तरह के लोग होते हैं। फेसबुक में हर तरह के लोग हैं। संत हैं, वेश्याएं हैं, कॉलगर्ल हैं,पंडित हैं,पुजारी हैं,मंदिर हैं,बुद्धिजीवी हैं,फोटो हैं,लौंड़े हैं,लेस्बियन हैं,गे हैं और चुहलबाजी भी है।

     अब आप इस तरह के साइबर प्राकृतिक वातावरण में तय कर लें कि क्या करेंगे ? फेसबुक या इंटरनेट में कोई बता सकता कि कौन किसको क्या सप्लाई दे रहा है,जो दे रहा है वह जेनुइन आदमी है या नहीं ?

  कुछ अति-उत्साही विचारक और बुद्धिजीवी हैं जो यह मानकर चल रहे हैं कि सोशल नेटवर्क के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन किया जा सकता है। इस तरह के लोग यह भूल जाते हैं कि विचारों से संसार नहीं बदलता। विचारों का मनुष्य के भौतिक संबंध और संपर्क के बिना कोई मतलब नहीं होता।

      सोशल नेटवर्क के संबंध में पहली बात यह कि यह सामाजिक संस्थान या संगठन नहीं हैं। बल्कि संपर्क के माध्यम हैं। वे निजी तौर पर कोई भूमिका अदा नहीं करते। इसलिए उनके प्रभावित करने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

     दूसरी बड़ी बात यह है ये नेटवर्क का हिस्सा हैं ,जिसमें हायरार्की नाम की चीज भी होती है। आप किसी नेटवर्क से जुड़े हैं तो इसका यह अर्थ नहीं है कि उसकी हायरार्की से भी जुड़े हैं। नेटवर्क और उसकी हायरार्की का सामाजिकता से कम आर्थिक लाभ कमाने ज्यादा संबंध है।

    चूंकि बाजार विकेन्द्रित है अतःनेटवर्क भी विकेन्द्रित है। नेटवर्क इसलिए विकेन्द्रित नहीं है कि उसे लोकतंत्र का विस्तार करना है बल्कि इसलिए विकेन्द्रित है कि उसे बाजार को पकड़ना है। व्यापार करना है,मुनाफा कमाना है।

    नेटवर्क की हायरार्की विभिन्न स्तरों पर सहयोग और संपर्क करती है। नेटवर्क की हायरार्की विकेन्द्रित नहीं है बल्कि केन्द्रीकृत है। संरचनात्मक केन्द्रीकरण के जरिए नियमन किया जाता है। नेटवर्क का अर्थ है सूचनाओं के साझा आदान-प्रदान का मंच।इसमें भाग लेने वाले व्यक्ति और संगठन एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु रहें,सामंजस्य बिठाएं।

    नेटवर्क में जैसा विकेन्द्रीकरण दिखता है वैसा नेटवर्क की हायरार्की में नहीं दिखता। फेसबुक पर छोटी-छोटी बातें,छोटे-छोटे किस्से और छोटी-छोटी टिप्पणियां हैं जो छोटे छोटे परिवर्तनों को जन्म देती हैं। इनमें भूलें मिलेंगी,पंगे मिलेंगे। लेकिन नेटवर्क की हायरार्की में यह सब नहीं मिलेगा।

     फेसबुक में आप प्रचार कीजिए कि कल रैली है वोट क्लब पर आप लोग पहुँचे। संभवतः लोग नहीं पहुँचेंगे। वह सामाजिक तौर पर आमने-सामने लोगों को खींचकर लाने में असमर्थ है। इसके विपरीत किसी मंदिर में जाइए लोग बगैर किसी संदेश के पहुँचेगे और संपर्क करेंगे। एक-दूसरे को आमने-सामने देखेंगे। इसका कारण है सामाजिक शिरकत में हायरार्की नहीं होती। जबकि नेटवर्क में होती है। लेकिन दिखती नहीं है।

    यह सच है कि सामाजिक मीडिया जनता का शत्रु नहीं होता लेकिन सामाजिक आंदोलन खड़ा करने में असमर्थ होता है। सोशल मीडिया यथास्थितिवाद को चुनौती नहीं देता बल्कि देखता रहता है। उसके प्रति निष्क्रिय रहता है।

    सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है खासकर फेसबुक टाइप वेबसाइट की। इस तरह का मीडिया एक जैसी अनुभूतियों के लोगों को जोड़ने का काम करता है। वह शिरकत करने वालों में साझा परिप्रेक्ष्य पर एकमत होने की संभावनाएं पैदा करता है। जैसाकि हितेन्द्र पटेल की टिप्पणी पर आई प्रतिक्रियाओं से पुष्ट होता है। लेकिन इससे आप सामाजिक आंदोलन की बहुत सारी जरूरतों की पूर्ति नहीं कर सकते। इससे आप पुख्ता सामाजिक बंधन या मित्रता तैयार नहीं कर सकते।

    कम्प्यूटर केन्द्रित संबंध कितने मजबूत और भरोसे लायक होते हैं इसे आप सहज ही कम्प्यूटर डेटिंग से बने संबंधों में देख सकते हैं। यह संबंध एक ही समय में एक ही व्यक्ति का अनेक लोगों से बनता है। विवाहित-अविवाहित सबसे बनता है। वे डेटिंग में साझीदार होते हैं और शादीशुदा भी होते हैं।

   एक अन्य समस्या है कि क्या ट्विट करने या फेसबुक पर संवाद भेजने से क्रांति हो सकती है ? जी नहीं, संदेशों से क्रांति कभी नहीं होती ,चाहे उन्हें कोई भी भेजे। किसी भी सामाजिक परिवर्तन की एक बुनियादी शर्त है यथास्थितिवाद का विरोध या उसके साथ असहयोग। सोशल नेटवर्क साइट इनमें से कोई भी काम नहीं करते। लेकिन वे अभिव्यक्ति के शक्तिशाली माध्यम हैं।          







शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

फेसबुकजनित सामाजिक खतरे

        फेसबुक ने इंटरनेट यूजरों को घेरा हुआ है। जो लोग यह सोच रहे थे कि इंटरनेट के जमाने में सर्च का भविष्य होगा उन्हें फेसबुक ने दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। जिस गति और जितनी बड़ी तादाद में फेसबुक ने अपने सदस्य बनाए हैं उसने एक संदेश दिया है भविष्य सर्च का नहीं फेसबुक होगा।
    फेसबुक ने इंटरनेट पर विज्ञापन का भी भावी रास्ता तय कर दिया है। इंटरनेट वाले जानते नहीं थे कि उनके यूजर कहां हैं और कौन हैं,लेकिन फेसबुक ने इस असमंजस की अवस्था को भी खत्म कर दिया है। अब इंटरनेट पर फेसबुक सबसे प्रभावी विज्ञापन मंच है। फेसबुक के सदस्य को विज्ञापनदाता व्यक्तिगत तौर पर खूबियों और अभिरूचियों के आधार पर जान सकता है और टारगेट बना सकता है।
     आज आप फेसबुक पर पढ़ते हुए ऑडियो सुन सकते हैं,फिल्म देख सकते हैं,साथ ही और भी अन्य कार्य-व्यापार कर सकते हैं। फेसबुक ने तेजी से इंटरनेट यूजरों की जीवनशैली पर असर डालना आरंभ कर दिया है।
      फेसबुक सबसे कष्टकारी पहलू है उसका नियमों का पाबंद बनाना। फेसबुक में जब आप हैं तो आपकी निगरानी फेसबुक कर रहा है। वह आप पर नजर लगाए रहता है कि आप क्या कर रहे हैं। वह आपकी प्राइवेसी का अपहरण कर लेता है।
    फेसबुक की खूबी है कि वह आज इंटरनेट के केन्द्र में है। आप फेसबुक पर क्या कर रहे हैं,क्या पसंद करते हैं,कहां जाते हैं.कहां टिप्पणी देते हैं, किसे दोस्त बना रहे हैं या कौन दोस्त बन रहा है। आपकी सारी गतिविधि सामाजिक हैं। अब सामान्य चीज की खोजबीन को यदि फेसबुक के जरिए करते हैं तो आप सार्वजनिक मंच पर होते हैं। फेसबुक के बटन असल में सामाजिक नियंत्रण और निगरानी की चाभी हैं। आज फेसबुक का जलवा है और वेब और प्राइवेसी की वह खिल्ली उड़ा रहा है।
    भारत की खूबी है कि यहां पर संचार क्रांति आधे-अधूरे ढ़ंग से हुई है। हम नहीं जानते कि प्राइवेसी क्या है ? सार्वजनिक क्या है? संचार माध्यम से कैसे रिश्ता बनाएं ? किस तरह का रिश्ता बनाएं ? इसके कारण फेसबुक और दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर असभ्य और अश्लील बातों और टिप्पणियों के द्वारा परेशानी हो रही है। एक अच्छा खासा सामाजिक समूह ऐसे लोगों का फेसबुक में रमण कर रहा है जो सेक्स उद्योग से जुड़ा है।
    इसके अलावा निजी क्या है ? उसे किस तरह व्यक्त करें ? किस बात को सार्वजनिक करें आदि बातों को समझने और देखने का हमारे यूजरों के पास बोध कम है। इसका ही दुष्परिणाम है कि निजी में सार्वजनिक और सार्वजनिक में निजी चला आ रहा है और इसके कारण कानूनी पचड़े भी सामने आ सकते हैं।
     अमेरिका में जहां पर फेसबुक के सबसे ज्यादा सदस्य हैं,वहां पर अनेक लोगों ने अपनी फेसबुक की सदस्यता को खत्म कर दिया है। अनेक उपभोक्ता संगठनों के द्वारा शिकायतें दर्ज करायी गयी हैं। बड़ी मात्रा में सदस्यों की प्राइवेसी के लिए खतरा पैदा हो गया है। आम नागरिक परेशान हैं कि उनके प्राइवेट डाटा का दुरूपयोग हो रहा है। उपभोक्ता संगठनों के द्वारा की गई शिकायतों में 50 फीसदी फेसबुक सदस्यों ने ‘खतरनाक व्यवहार’ की शिकायत की है।
     अनेक सोशल नेटवर्क इस्तेमाल करने वालों ने कहा है कि इसका इस्तेमाल करने से कोई खास लाभ नहीं हो रहा है। बल्कि इसका उपयोग करने से लक्ष्य की पूर्ति नहीं होती। फेसबुक की व्यवस्थाओं का यदि बेहतर रूप में इस्तेमाल करना जानते हैं तो प्राइवेसी और अपने डाटा को बचा सकते हैं।  अमेरिका के 15 उपभोक्ता संगठनों ने अपनी शिकायत में कहा है कि - ‘‘Facebook now discloses personal information to the public that Facebook users previously restricted. Facebook now discloses personal information to third parties that Facebook users previously did not make available. These changes violate user expectations, diminish user privacy, and contradict Facebook’s own representations. These business practices are Unfair and Deceptive Trade Practices.’’
 इस शिकायत में खास तौर पर   “instant personalization” को निशाना बनाया है जिसके कारण फेसबुक सदस्यों के डाटा का दुरूपयोग हो रहा है।
अमेरिका की एक उपभोक्ता सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि 52 प्रतिशत लोग मानते हैं कि उनके साथ फेसबुक पर जोखिमभरा व्यवहार हुआ है। जनवरी 2010 में ऑनलाइन के जरिए दो हजार लोगों में किए सर्वे से पता चला है कि 9 प्रतिशत लोग ऑनलाइन दुर्व्यवहार के शिकार हुए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑनलाइन पर घर का पता लिखा होना स्वयं में एक जोखिम है। इसके अलावा परिवारी सदस्यों के फोटोग्राफ वगैरह लगाना भी जोखिम में डालना है। इसके अलावा जन्मतिथि,आप कहां जाते हैं,कहां घूमने गए थे,कहां -कहां क्या-क्या करते रहे हैं,ये सब जोखिम के दायरे में आ गया है।
     यह भी देखा गया है कि फेसबुक लोग जल्दी दोस्त बना लेते हैं और फिर जल्दी ही वायदे भी करने लगते हैं। इस तरह के वायदे खतरनाक हो सकते हैं,नुकसान पहुँचा सकते हैं। इस अर्थ में एक डच कंपनी के द्वारा सोशल नेटवर्किंग साइट के बारे में कराए सर्वे में कहा गया है कि इस तरह की साइट के द्वारा बने सामाजिक संबंधों में गहराई नहीं होती,वे सतही होते हैं। जो लोग सोचते हैं कि ये वास्तव सामाजिक संबंधों का विकल्प हैं तो वे गलत हैं। वास्तव सामाजिक संबंधों का सोशल नेटवर्क से बने संबंध विकल्प नहींहोसकते। बल्कि यह उसके पूरक की भूमिका मात्र निभा सकता है।
    फेसबुक की ताजा नई खबर यह है कि उसने वर्चुअल करेंसी उधार पर देने की व्यवस्था कर दी है। इस तरह का प्रोग्राम विकसित किया गया है कि आप 20 तरीकों से वर्चुअल करेंसी उधार ले सकते हैं और तमाम किस्म के वर्चुअल माल खरीद सकते हैं। फेसबुक ने  PlaySpan  के साथ इस संदर्भ में साझा कारोबार करने का फैसला लिया है। इस क्रेडिट व्यवस्था को अभी 25 से ज्यादा गेम कंपनियां इस्तेमाल कर रही हैं।
फेसबुक और दूसरे सोशल नेटवर्क और अन्य वेबमीडिया रूपों जैसे ब्लॉग,ट्विटर आदि में से किसका यूजर पर ज्यादा प्रभाव पड़ रहा है इसके बारे में अभी सुनिश्चित ढ़ंग से कुछ भी कहना संभव नहीं है। क्योंकि इस समय सोशल मीडिया और सोशल नेटवर्क के बीच में समायोजन की प्रक्रिया चल रही है। बाजार के बड़े खिलाड़ी इस पर नजर लगाए बैठे हैं। अभी यह देखा जा रहा है कि ट्विटर पर ज्यादा भीड़ है और ब्लॉग पर कम है। यही स्थिति फेसबुक के संदर्भ में भी देख सकते हैं यहां पर भी ट्विटर पर भीड़ ज्यादा है। सोशल मीडिया का आम लोग ट्विटर पर ज्यादा अनुकरण कर रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है फेसबुक ठंडा हो गया है,जी नहीं,फेसबुक ने समूचे इंटरनेट पर अपना वर्चस्व जमा लिया है और वह धीरे-धीरे अपने दायरों का विस्तार कर रहा है। आज फेसबुक पर 50 करोड़ यूजर 30 बिलियन संदेशों का प्रतिमाह संचार कर रहे हैं। 

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

सोशल नेटवर्क की सामाजिकता का अंत

बहुत पहले कार्ल मार्क्स ने कहा था कि पूंजीपतिवर्ग ने अपने स्वार्थ के लिए सारी दुनिया में छापा मारा और समस्त पवित्र संबंधों को नष्ट कर दिया। जहां पर वह यह नहीं कर पाया वहां उन्हें बाजार का गुलाम बना दिया। ठीक यही बात सोशल नेटवर्क पर लागू होती है। कल तक सोशल नेटवर्क का आम यूजर मित्रता,भाईचारे आदि के विकास के लिए सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहा था लेकिन कुछ अर्से से सोशल नेटवर्क पर बाजार के मालिकों की गिद्धदृष्टि पड़ी है और अब उन्होंने सोशल नेटवर्क के विश्वास का अपने मुनाफों के विस्तार के लिए दुरूपयोग आरंभ कर दिया है। अब माल की बिक्री के लिए दोस्तों और अनुयायियों की बिक्री हो रही है।
    आमतौर पर सोशल नेटवर्क के यूजर और सदस्य एक-एक करके अपने दोस्त और अनुयायी बनाते हैं । वे प्रत्येक के साथ निजी तौर पर संपर्क बनाते हैं। बाद में अपने दोस्तों और अनुयायियों से संवाद करते हैं,बहस चलाते हैं। अपनी राय का आदान-प्रदान करते हैं। यह सिस्टम विश्वास और वफादारी पर टिका है। यही वह बिंदु है जहां पर बाजार की शक्तियां दाखिल होती हैं और अपने माल की बिक्री के लिए सोशल नेटवर्क पर अनंत संभावनाएं देख रही हैं।
    सोशल नेटवर्क पर भेड़चाल है कि जिस व्यक्ति या कंपनी के ज्यादा मित्र हैं लोग उसी के पास जा रहे हैं। जिसके पास ज्यादा मित्र वहीं पर माल के प्रचार और बिक्री की ज्यादा संभावनाएं हैं। सोशल नेटवर्क ने कुटीर उद्योग के रूप में वर्चुअल बाजार की मदद करनी शुरू कर दी है।
    चूंकि दोस्त एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं तो बाजार की शक्तियां दोस्तों के भरोसे को माल की बिक्री और प्रचार में रूपान्तरित करने में लगी हैं। ट्विटर ने तो अपने माल के फॉलोअर को कमीशन पर बेचना आरंभ कर दिया है। कहने का तात्पर्य यह है कि सोशल नेटवर्क साइट और सोशल नेटवर्क मार्केटियर के बीच में चूहे-बिल्ली का खेल आरंभ हो गया है। और अब यूजर नामक चूहे की खैर नहीं दिखती।
    अब सोशल मार्केटियर सीधे उन ग्रुपों के पास जा रहे हैं जिनके पास ठोस मित्र और अनुयायी हैं। ऐसे ट्विटरों और फेसबुकधारी यूजरों की सीधे खरीद की जा रही है। जब एक बार ट्विटर या सोशल नेटवर्क के इंचार्ज से सौदा पट जाता है तो फिर सीधे माल की मार्केटिंग संबंधित सोशल नेटवर्क के यूजरों के साथ बड़े ही विश्वास के साथ की जा सकती है।
     ट्विटरों से सामयिक अपडेट लेने और उसके अनुयायियों में माल की बिक्री और प्रचार के प्रयास तेज हो गए हैं। इसी तरह “word of mouth ’ नामक नेटवर्क है जिसमें संपर्क करते ही आपका माल हजारों-लाखों यूजरों के पास एक ही झटके में पहुँच जाता है। यह परंपरागत विज्ञापन से भिन्न है। हजारों ट्विटरों ने अपनी क्षमता और मित्र संख्या के आधार पर सेवा सूची जारी की हुई है। इसी को कहते हैं संपर्क-संवाद का व्यापार में रूपान्तरण।
    आने वाले समय में सोशल नेटवर्क पर संवाद कम से कम किया जाएगा लेकिन माल का प्रचार ज्यादा होगा और यह वर्चुअल संवाद और सामाजिक संबंधों की विदाई है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि सोशल नेटवर्ट मॉल की तरह हैं।
       फेसबुक,ट्विटर,आर्कुट आदि तरूणों के लिए बनायी गयी वर्चुअल दुकानें हैं। तरूणों के मॉल हैं। सोशल नेटवर्क का आरंभ व्यक्ति से व्यक्ति का संवाद बनाने के लिए हुआ था। यही लग रहा था कि आम आदमी में समाजीकरण बढ़ेगा लेकिन बहुत जल्दी ही इस माध्यम ने अपने को सामाजिक भूमिका से मुक्त करके व्यवसायिक दिशा में मोड़ दिया है। आप जैसे मॉल में जाते हैं,घूमते हैं,मित्र से मिलते हैं,तफरी करते हैं, दुकानों में बगैर खरीददारी किए चहलकदमी करके लौट आते हैं ठीक वैसै ही दृश्य सोशल नेटवर्क पर नजर आ रहा है। सोशल नेटवर्क वर्चुअल युग के खुदरा दुकानदार बनते जा रहे हैं।
       इन दिनों सोशल नेटवर्क पर संगीत की सबसे ज्यादा खुदरा बिक्री हो रही है। ट्विटर पर जो संगीत बेवसाइट जमकर धंधा कर रहे हैं वे हैं Blip.fm, FoxyTunes, Grooveshark, Hype Machine, imeem, Last.fm, Twisten.fm । आप इन पर जाइए और ताजा संगीत की सूचनाएं पाइए। आप कौन सा गाना सुनना चाहते हैं अपने ट्विटर पर जाइए नाम लिखिए और बैठे -बैठे सूचना और संगीत पाइए। आप उस संगीत कंपनी के पास भी जा सकते हैं ,उस संगीत को भी सुन सकते हैं,डाउनलोड कर सकते हैं जो किसी ट्विटर ने पोस्ट किया है। यह भी कर सकते हैं कि आप उन लोगों का पीछा करें जो संगीत पोस्ट करते हैं। यह समूची प्रक्रिया सोशल नेटवर्क की सामाजिक भूमिका की विदाई का संकेत है।




शनिवार, 12 जून 2010

सोशल नेटवर्कः सामाजिक संबंधों के अंत का वर्चुअल राग

    यह सामाजिक संबंधों के अंत का दौर है। नए किस्म के सामाजिक संसार की सृष्टि सोशल नेटवर्किंग साइट पर हो रही है। एक सर्वे में अनुमान व्यक्त किया गया है कि सन् 2014 तक इंटरनेट पर सोशल नेटवर्क का आकार कल्पना के दायरों का अतिक्रमण कर जाएगा। सोशल नेटवर्क के बढ़ने से सामाजिक समुदायों के बीच पुख्ता संबंधों की संभावनाओं को व्यक्त किया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि इससे समाज में आस्था मजबूत होगी।
    उल्लेखनीय है पूंजीवाद की विकास प्रक्रिया ने सामाजिक आस्थाओं को कमजोर किया है। उम्मीद की जा रही है कि सोशल नेटवर्क के विकास से सामाजिक आस्थाएं लौटेंगी। व्यक्तिगत समस्याओं,नौकरी,सूचना के बेरीफिकेशन,साझा हितों और वस्तुओं का उपभोग बढ़ेगा।
      ‘पेव’ सर्वे के उपरोक्त निष्कर्षों से 39 फीसदी लोग सहमत हैं, 20 फीसदी लोग असहमत हैं, और 27 फीसदी ने उपरोक्त राय को चुनौती दी है। जबकि 15 फीसदी ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है। यह सर्वे 1,286 अमेरिकियों में सन् 2004 में किया गया था।
    इस सर्वे में जिस बात का अनुमान किया गया था वह सही साबित नहीं हुआ। लेकिन एक तथ्य साफ है कि 2004 से लेकर 2010 के बीच में सामाजिक आस्था में गिरावट आयी है। आर्थिक मंदी ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। मंदी का पूर्वानुमान लगाने में इंटरनेट और कारपोरेट मीडिया असफल रहा है। आज अमेरिका में बेकारी चरमोत्कर्ष पर है।
     सोशल नेटवर्क के बृहत्तर संगठन हैं। किंतु इनमें से ज्यादातर के संबंध हल्के और चलताऊ मूल्यों पर टिके हैं। सोशल नेटवर्क के लोगों के संबंधों में विश्वास का अभाव है। सोशल नेटवर्क में ज्यादातर लोगों का इकसार विचारों के लोगों के  बीच संबंध है। ये ऐसे लोगों के समूह हैं जो सहमत हैं। इनमें न्यूनतम असहमति है। ये लोग आपस में ज्यादा से ज्यादा रेडीकल विचारों का आदान-प्रदान करते हैं लेकिन एक-दूसरे पर कम से कम विश्वास करते हैं।
      दूसरी बड़ी समस्या यह है कि सोशल नेटवर्क के सदस्यों की सूचनाओं की सहज पुष्टि संभव नहीं है। सोशल नेटवर्क का लक्ष्य लोगों में आपसी विश्वास पैदा करने से ज्यादा माल या वस्तु के प्रति विश्वास पैदा करना है। व्यापारिक विश्वास और संचार पैदा करना इसका प्रधान लक्ष्य है। सोशल नेटवर्क के द्वारा बने संपर्क और संबंधों का सीमित महत्व है,लेकिन इसे व्यक्तिगत संबंधों का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
    सोशल नेटवर्क का विस्तार हो रहा है इसका यह अर्थ नहीं  है कि सामाजिक संबंधों में आस्था पैदा हो रही है। इंटरनेट पर सभी सूचनाएं विश्वास के लायक नहीं होतीं। नेट पर जितनी वैध सूचनाएं हैं उससे ज्यादा अवैध सूचनाएं हैं। जितने भरोसे के लोग हैं उससे ज्यादा भरोसा लूटने वाले लोग हैं। नेट पर जितना व्यक्तिगत सच है उससे कहीं ज्यादा झूठ फैला हुआ है।
     आज समाज में आम लोगों के पास सामाजिक संबंध बनाने के अनेक चैनल हैं,सोशल नेटवर्क उनमें सबसे कमजोर और अविश्वसनीय चैनल है। एक सीमा के बाद सोशल नेटवर्क की कोई उपयोगिता नहीं है। संपर्क और संबंध के जितने ज्यादा स्रोत होंगे उतने ही संशय और संदेह की संभावनाएं भी होंगी। नेट के विभिन्न ऱूप सामाजिक शिरकत की बजाय सामाजिक पलायन को बढ़ावा दे रहे हैं। आप किसी भी व्यक्ति का नेट के माध्यम से आसानी से विश्वास तोड़ सकते हैं। यहां शिरकत वही कर रहे हैं जो एकमत हैं।
    इंटरनेट के द्वारा बहुत दूर रहने वाले व्यक्ति के साथ संपर्क रख सकते हैं। तत्काल अपनी बात संप्रेषित कर सकते हैं। अब तक का इंटरनेट अनुभव बताता है कि यह संपर्क का सबसे प्रभावी माध्यम है। इससे हमें ज्ञान संचार के अनेक नए स्रोत भी हाथ लगे हैं।   
     इंटरनेट से संपर्क बनाने के लिए समय और धैर्य ये दो चीजें होनी चाहिए। नेट के संबंधों को बनाए रखने के लिए इफ़रात में समय खर्च करना पड़ता है। सोशल नेटवर्क से सतही संबंध बनता है। यह नकली संबंध है। वास्तव जीवन में जिन व्यक्तियों से जीवंत संबंध हैं उनसे सोशल नेटवर्क से जरिए संवाद फलदायी हो सकता है। ऐसे लोगों के संबंधों को सोशल नेटवर्क और भी प्रगाढ़ बनाता है।
   सोशल नेटवर्क के सभी सदस्य गुणी नहीं होते। अनेक अवगुणी सदस्य भी हैं,शैतान भी हैं। सोशल नेटवर्क के सभी दोस्त मूल्यवान नहीं होते। इस सबके बावजूद सोशल नेटवर्क का दायरा तेजी से फैल रहा है। इसमें विविध किस्म के लोग आ रहे हैं। इससे परंपरागत संप्रेषण और सामाजिक बंधनों की सीमाएं टूट रही हैं। इससे यूजर और भी आलसी बनेगा। सामाजिक शिरकत  घटेगी। हम ज्यादा से ज्यादा घर में बैठे रहेंगे। स्थानीय समाज और संस्कृति से बेगानापन बढ़ेगा।
   सोशल नेटवर्क वैसे ही है जैसे घर में टेलीफोन। जिस तरह फोन की सीमा है उसी तरह नेटवर्क की भी सीमा है। चाहे वह कितना ही बड़ा हो इसकी भी सीमा है। मानवीय अनुभव में विश्वास धीरे धीरे आता है। उसी तरह आस्था का हमारी सहजजात अनुभूतियों से गहरा संबंध है। अनुभव की कसौटी पर जब कोई सूचना खरी उतरती है तब ही विश्वास होता है।
            सोशल नेटवर्क की एक समस्या यह भी है कि इसके अधिकांश सदस्य एक-दूसरे से भूठ बोलते रहते हैं। वे एक ऐसी संस्कृति का हिस्सा हैं जिसे साइबर संस्कृति कहते हैं। साइबर संस्कृति में असत्य की वैसे ही गुंजाइश है जैसे जीवन में। यह काल्पनिक संस्कृति है,इसका वास्तव जगत से कम संबंध है। इसका आधार है वर्चुअल या डिजिटल तकनीक। इस तकनीक का सांस्कृतिक आधार है सत्याभास। इसका परिणाम है ईमानदारी का लोप। वक्ता के एथॉस का लोप।
      यह भी संभव है कि असत्य ढ़ंकने के लिए बड़बोलेपन से काम लिया जाए। सत्य को छद्म रूप और छद्म नाम से पेश किया जाए। यह भी संभव है कोई यूजर सत्य ही बोलना चाहे और वास्तव नाम के साथ बोलना चाहे। इस तरह के अन्तर्विरोध के बावजूद सोशल नेटवर्क का विस्तार ही होगा। यह भी संभव है जागरूक लोगों के बीच सोशल नेटवर्क सघन विचारधारात्मक एकता और भाईचारे का प्रभावी माध्यम हो जाए। 
  कुछ लोगों का मानना है कि ‘सोशल नेटवर्क’ के बहाने ‘सामाजिक संबंधों’ को अपदस्थ किया जा रहा है। ‘नेटवर्क’ में ‘संबंध’ को अपदस्थ करने या उसका विकल्प तैयार करने की क्षमता नहीं है। ‘नेटवर्क’ सिर्फ कनेक्शन है। बेज़ान संपर्क सूत्र है। यहां से ही इसकी शक्ति,सीमा और संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। बेज़ान संपर्क सूत्र के जरिए बनने वाले संबंध में प्राणों का संचार करना संभव नहीं है।  
      जिन लोगों के बीच किसी भी किस्म का पहले से सामाजिक संबंध है उनके लिए तो सोशल नेटवर्क एक अतिरिक्त संपर्क सूत्र हो सकता है। लेकिन जो सीधे सोशल नेटवर्क के जरिए जुड़ रहे हैं,मित्र बन रहे हैं, उनकी दोस्ती वायवीय और काल्पनिक ही होगी। ऐसे संबंध वर्चुअल ही होंगे, इन्हें वास्तव संबंध समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। इस तरह के संबंध में परिवर्तन की क्षमता नहीं है। यह सच है कि सोशल नेटवर्क में हजारों -लाखों लोगों के साथ संपर्क किया जा सकता है,लेकिन एक व्यक्ति कम से कम लोगों से संपर्क करता है। यह वैसे ही है जैसे 400 से ज्यादा टीवी चैनल टीवी में दिखते हैं। लेकिन व्यक्ति 400 चैनल नहीं देखता वह चंद चैनल ही देखता है।
     सोशल नेटवर्क के डाटा की सुरक्षा और प्राइवेसी को लेकर खूब हंगामा हो रहा है। कई बार डाटा चोरी की खबरें भी आई हैं। व्यक्तिगज जीवन की सूचनाओं के अपहरण की भी खबरें आई हैं। इनकी चोरी का सीधा घातक असर भी होता है। पहचान से जुड़ी सूचनाओं की चोरी गंभीर क्षति पैदा करती है।
   सोशल नेटवर्क का भविष्य में विकास होगा लेकिन विश्वास में विकास नहीं होगा इसके विपरीत विश्वास घटेगा। इंटरनेट पर सूचना प्राप्ति के स्रोत बढ़ जाएंगे। किंतु विश्वासयोग्य सूचना स्रोत नहीं बढ़ेंगे। इसी तरह नेटवर्क बढ़ेगा लेकिन भरोसे के सपर्क उस अनुपात में नहीं बढ़ पाएंगे। इंटरनेट उन लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में असमर्थ है जिनके बीच पहले से ही विश्वसनीय संबंध हैं। जो एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं उन्हें इंटरनेट आकर्षित नहीं कर पाया है। खासकर वाचिक सभ्यता ,व्यक्तिगत संबंधों और पुरानी नातेदारी-रिश्तेदारी वाले समाजों में सोशल नेटवर्क की अपील ज्यादा नहीं होगी।
    एक अन्य पहलू है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। सोशल नेटवर्क पर बढ़ती भीड़ में एक-दूसरे पर विश्वास का जमना संभव नहीं है। यह भी़ड़ जितना बढ़ेगी निजी विश्वास उतना ही कम होगा। विश्वास कम लोगों में होता है,भीड़ पर विश्वास कोई नहीं करता,भीड़ में सच कोई नहीं बोलता. भीड़ की कोई पहचान नहीं होती। भीड़ में पहचान गुम हो जाती है। हजारों की सदस्यता वाले सोशल नेटवर्क में निजी पहचान बचाए रखना संभव नहीं है ,वहां प्राइवेसी को भी बचाना संभव नहीं है। सोशल नेटवर्क मूलतः भीड़ है। भीड़ का निजी विवेक नहीं होता। भीड़ अधिकारहीन होती है। भीड़ में भेड़चाल होती है।  
  सोशल नेटवर्क यूजर के भूगोल को बदल देता है। किंतु भूगोल के आकार को नहीं बदल सकता। किसी भी संबंध को बनने में समय लगता है। इंटरनेट पर रीयल टाइम में संबंध बनने से किसी सामाजिक संबंध को बनाने में खर्च होने वाला समय कम नहीं किया जा सकता। इंटरनेट पर जितनी सूचनाएं उपलब्ध हैं उससे ज्यादा डिस-इन्फॉर्मेशन या कु-सूचनाएं उपलब्ध हैं। इसके अलावा सूचनाओं का अतिरिक्त बोझा स्वयं में एक समस्या है।
       इंटरनेट के आने के साथ सूचना ही नहीं आ रही हैं बल्कि अफवाह, असत्य, भड़काने वाली बातें,बेबकूफियां भी आ रही हैं, इससे इंटरनेट और सोशल नेटवर्क पर अविश्वास बढ़ेगा। इंटरनेट के चाटरूम में चलने वाली बातचीत में भी किसी भी किस्म का नियमन नहीं है अतः वहां जो सुझाव दिए जा रहे हैं वे वास्तव हैं,वैध हैं, इसके बारे में छानबीन करना संभव नहीं है। नेट पर विभिन्न रूपों में होने वाली बातचीत को वाचिक पहलवानी कहना समीचीन होगा। बातों के शेर कभी हकीकत में शेर नहीं होते।
   ‘पेव’ के 2004 के सर्वे से यह भी पता चला है कि सन् 2014 तक राजनीतिक और धार्मिक कट्टरपंथियों की इंटरनेट पर तादाद में तेजी से बढ़ोतरी होगी। प्रतिक्रियावादी और कट्टरपंथी ग्रुपों के व्यक्तिगत नेटवर्क भी खूब तेजी से सामने आएंगे। ये वे लोग हैं जो खुलेआम हिंसाचार और अविवेकपूर्ण बातों की हिमायत करते हैं। हिंसा और प्रतिगामी विचार उनके बीच में एकता का मूलाधार है।
   सन् 2004 का सर्वे यह भी रेखांकित करता है कि आम लोगों में राजनीतिक विवाद बढ़ेंगे। राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर ध्रुवीकरण तेज होगा। विचारों के ध्रुवीकृत संसार में अर्थपूर्ण बहस करना संभव नहीं है। किसी भी मसले पर अर्थपूर्ण आम सहमति बनाना संभव नहीं होगा।  
                        

















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