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बुधवार, 27 जनवरी 2010

शांति पत्रकारिता की जरुरत है मध्यपूर्व के लिए







  
(पहली दो पेंटिंग गाजा की नाकेबंदी और इस्राइल के अवैध कब्जे के खिलाफ में।  तीसरे फोटो में फिलीस्तीनी परिवार आनंद के क्षण में )                                                       
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संकट की अवस्था में मीडिया को कैसे देखें ? यह सवाल सबसे महत्व का है। संकट की अवस्था में साधारण लोग संशय और भ्रम के शिकार होते हैं।ऐसी स्थिति में साधारण आदमी का मीडिया पर विश्वास नहीं होता और न स्वयं पर ही भरोसा होता है। क्षेत्रीय युध्द का कवरेज इसे क्षेत्रीय युध्द नहीं रहने देता,बल्कि विश्वव्यापी मुद्दा बना देता है।इस तरह के युध्द के कवरेज में लगातार विध्वंस और मौत के दृश्य बार बार आते रहे हैं,ये दृश्य हमें बार-बार ज्यादा से ज्यादा व्याख्या की ओर ले जाते हैं किंतु टीवी पर व्याख्याकारों का अकाल पड़ा है,सीएनएन और बीबीसी जैसे माध्यमों पर जो व्याख्याकार आ रहे हैं वे सैन्य विशेषज्ञ हैं ,भू.पू. अमेरिकी-इस्राइली सैनिक अधिकारी हैं या फिर किसी कंजरवेटिव रिसर्च संगठन के थिंक टैंक हैं।


      समाचार चैनलों में इन दिनों सनसनीखेज खबर बनाने या फिर खबर छपाने का चक्र चल रहा है।इसके कारण सबसे ज्यादा उन्हें क्षति पहुँच रही है जो अपने अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।अपने जायज अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।समाचार चैनलों में गैर जरूरी सवालों पर ज्यादा ध्यान देने से ऑडिएंस के अ-राजनीतिकरण की प्रक्रिया को बल मिलता है।चैनल खबरों के इतिहास में नहीं जाते और न सही खबरों का चयन करते हैं। फिलीस्तीनी जनता के संघर्ष और कष्टों की खबरें एकसिरे से गायब हैं और जो खबरें दिखाई जा रही हैं वे हमलों की हैं।इजराइली सेना या फिलिस्तीनी संगठनों के हमले की खबरों को दिखाते समय खबरों के पीछे का सच छिपाया जाता है।
इस्राइली प्रशासन की कट्टरपंथी नीति के तहत इस्राइली ब्रॉडकास्टिंग ऑथरिटी ने कुछ अर्सा पहले यह आदेश दिया कि रेडियो खबरों में 'सेटलर्स' और 'सेटलमेंट्स' पदबंध का प्रयोग नहीं किया जाय।उल्लेखनीय है कि 1967 के युध्द के बाद फिलिस्तीनियों की जिन जमीनों पर अवैध बस्तियां बसायी गईं उन्हें 'सेटलमेंट्स' कहते हैं,और इनके अवैध बाशिंदों को 'सेटलर्स' कहते हैं। इस पाबंदी का असर हुआ और अब वे 'नेवरहुड'पदबंध का प्रयोग करते हैं।

यू.एन.प्रस्ताव सं.446 के अनुसार इन इलाकों में यहूदी बस्तियां बसाना गैर कानूनी है।यह प्रस्ताव 1979 में पास हुआ और तब से लेकर आज तक अधिकृत इलाकों में अवैध बस्तियां बसाने का काम जारी है।इनमें लाखों फंडामेंटलिस्ट यहूदियों को बसाया गया है।

   सुरक्षा परिषद ने एक अन्य प्रस्ताव पास करके यह भी कहा है कि अधिकृत बस्तियों के मूल बाशिंदों को न तो हटाया जाय और न स्थानान्तरित ही किया जाय।अमेरिकी मीडिया किस तरह इस्राइलपंथी है और फिलिस्तीन विरोधी पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है इस तथ्य की पुष्टि के लिए 'नेशनल पब्लिक रेडियो'(एनपीआर) के प्रसारणों के बारे में किए गए अनुसंधान से मदद ली जा सकती है।यह अनुसंधान 'फेयर' ने किया।इसमें सन्2001की प्रथम छमाही के समाचारों का मूल्यांकन किया गया।इसमें निष्कर्ष निकला कि इस अवधि में एनपीआर ने अपनी खबरों में 62 इस्राइली और 51 फिलिस्तीनियों की मौत की खबर प्रसारित की।सतही तौर पर यह आंकड़ा असंतुलित दिखाई नहीं देता।लेकिन गहराई में जाकर समीक्षा की गई तो पता चला कि इस अवधि में फिलिस्तीन-इस्राइल संघर्ष के दौरान 77 इस्राइली और 148 फिलिस्तीनी मारे गए।इसका अर्थ हुआ कि 81 फीसद इस्राइलियों की मौत की खबर प्रसारित की गई जबकि मात्र 34 फीसद फिलिस्तीनियों की मौत की खबर प्रसारित की गई।

इसी अवधि में 30 फिलिस्तीनी नागरिक मारे गए जिनकी उम्र 18वर्ष से कम थी।इनमें से मात्र 6 की खबर प्रसारित हुई यानी 20फीसद की रिपोर्टिंग हुई।इसके विपरीत 19 अल्पवयस्क इस्राइली मारे गए जिनमें से 17 की खबर प्रसारित हुई। यानी 89फीसद की रिपोर्टिंग की गई।इसी अवधि में 61 युवा फिलिस्तीनी मारे गए।किंतु 26फीसद की ही रिपोर्टिंग हुई। इसी तरह इस्राइली नागरिकों की मौत की खबर तुरंत प्रसारित की गई। 84 फीसद इस्राइली नागरिकों की मौत की खबर को 'नेशनल पब्लिक रेडियो' ने तुरंत प्रसारित किया। जबकि इस्राइली सेना की इसी अवधि में हुईं 69 फीसद मौत की खबरें प्रसारित की गईं।

इसकी तुलना में फिलिस्तीनी सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने की 72 फीसद खबरें प्रसारित की गईं और फिलिस्तीनी नागरिकों के मारे जाने की मात्र 22 फीसद खबरें प्रसारित की गईं।सर्वे की अवधि में अधिकृत इलाकों में 112 फिलिस्तीनी नागरिक मारे गए।इनमें से मात्र 26 की मौत की खबर प्रसारित की गई।इसके विपरीत अधिकृत अवैध बस्तियों में रहने वाले 28 इजराइली मारे गए इनमें से 21 की खबर 'नेशनल पब्लिक रेडियो' ने प्रसारित की।

कहने का तात्पर्य यह है कि अमेरिकी बहुराष्ट्रीय और राष्ट्रीय जनमाध्यमों का इस्राइल-फिलिस्तीन संघर्ष की खबरों की प्रस्तुतियों को लेकर संतुलित और वस्तुगत रवैयया कभी नहीं रहा। बल्कि इन माध्यमों की नीतियां अमेरिकी विदेश नीति से तय होती रही हैं।अमेरिकी विदेशी नीति मध्य-पूर्व के संदर्भ में अरब देशों और फिलिस्तीन राष्ट्र के हितों के खिलाफ और इस्राइली नस्लवादी, विस्तारवादी और फंडामेंटलिस्ट नीति से गहरे जुड़ी रही है। इस्राइली प्रशासन की प्रत्येक नीति को बहुराष्ट्रीय चैनल व्यापक कवरेज देते हैं जिससे उसके क्रिया- कलापों को वैध बनाया जा सके और फिलिस्तीनियों के संप्रभु राष्ट्र की स्थापना के संघर्ष को नाजायज ठहराया जा सके।
     मीडिया कवरेज का मूल समस्या है तथ्य और कल्पना के प्रति रवैयये की। कहां खबर है और कहां कहानी है।इसके बारे में मीडिया खासकर समाचार चैनलों के क्षरा सबसे ज्याइा भ्रम पैदा किया जा रहा है।सामान्य तौर पर खबर से बड़ी कहानी होती है,उसका कल्पना या वक्ता के विचारों से संबंध होता है। घटना के तथ्यों से उसका कोई संबंध नहीं होता। समाचार चैनलों में युध्द की खबरें कम और युध्द के इलाके का काल्पनिक विवरण ज्यादा आता रहता है।
     मसलन् चैनल पर युध्द के मोर्चे से एक खबर दिखाई गयी,उसके बाद उसके व्याख्याकार आने शुरू हो गए,वे सारे दिन या घंटों अपने विचारों को व्यक्त करते रहते हैं।आमतौर पर इन विचारों का घटना से कम काल्पनिक कहानी से ज्यादा संबंध होता है।
     हम यह भी कह सकते हैं ये 'खबर' के नाम पर व्यक्त की गयी 'राय' है। इस 'राय' में वक्ता के पूर्वाग्रह वर्चस्व बनाए होते हैं,इसके कारण ऑडिएंस या पाठक को 'खबर' को लेकर भ्रम पैदा हो जाता है। यह भी कह सकते हैं कि 'खबर' और 'राय' के बीच में चैनलों के द्वारा जो घालमेल चलाया जा रहा है वह खबर को गुम कर देता है और पूर्वाग्रहों को स्थापित कर देता है।यह काम 'रिपोर्ट' और 'खबर' के बीच घालमेल पैदा करके किया जाता है।
     मीडिया में 'रिपोर्ट' महज राय को व्यक्त करती है ,उसे खबर समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।मीडिया कवरेज को देखते समय यह देखा जाना चाहिए कि किस तरह के वाक्य,भाषा,शीर्षक या कैप्सन का बार-बार प्रसारण किया जा रहा है। इनका बार-बार प्रसारण खास तरह की समझ बनाता है। ये हमेशा खास किस्म के अर्थ को व्यक्त करते हैं। इनके माध्यम वैचारिक प्रचार कार्य किया जाता है।यह भी कह सकते हैं कि समाचार के खास किस्म के कोड होते हैं जिनका भाषा के माध्यम से समाचार चैनल इस्तेमाल करते हैं।
    समाचार की भाषा में इनकी पुनरावृत्ति इस बात का संकेत भी है कि मामला सरल और सीधा सादा नहीं है। समाचार के भाषायी प्रयोग दर्शक को खास मनोदशा और वैचारिक सोच में ढ़ालते हैं,उसके लिए प्रशिक्षित करते हैं।उनके बारे में कोई भी निष्कर्ष इस बात पर निर्भर करता है कि हम उन्हें किस तरह ग्रहण करते हैं,दर्शक की आलोचनात्मक क्षमता का स्तर क्या है ?दर्शक की तथ्य के संदर्भ को समझने की क्षमता,स्टोरी के पीछे छिपे इतिहास को जानने की क्षमता पर समाचार का प्रभाव निर्भर करता है। समाचार के कोड वर्ड का इसी अर्थ में विशेष महत्व होता है।
    मसलन् इस्राइल के द्वारा फिलीस्तीनी इलाकों पर कब्जे के खिलाफ में फिलीस्तीनी प्रतिरोध को बीबीसी ने कभी प्रतिरोध नहीं कहा,बल्कि उसे 'सशस्त्र मुठभेड़' (आर्मड कनफंट्रेशन)कहा,जब 'सशस्त्र मुठभेड़' कहा जाएगा तो इसका अर्थ होगा कि फिलीस्तीनी अपनी जमीन पर वैध अधिकार प्राप्त करने के लिए हिंसा फैला रहे हैं।
    'कनफंट्रेशन' इकतरफा होता है।इसका अर्थ यह भी होगा कि फिलीस्तीनी हिंसा पैदा कर रहे हैं। जबकि सच यह है कि हिंसाचार इस्राइल कर रहा है। किंतु इसका कहीं भी बीबीसी खबरों में जिक्र नहीं मिलेगा। बीबीसी ने हम्मास को 'आर्मड मिलिशिया' कहा,जबकि फिलीस्तीनी नजरिए से हम्मास एक प्रतिरोधी सैन्य संगठन है। जबकि 'आर्मड मिलीशिया' का अर्थ है हाशिए का ग्रुप।
      समाचार के संदर्भ में यह तथ्य हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए यदि पूर्व निर्धारित अर्थ के तहत समाचार प्रसारित किए जाएंगे तो किसी भी किस्म विमर्श जन्म नहीं लेता, फिलीस्तीन, इराक, और अफगानिस्तान के संदर्भ में बहुराष्ट्रीय समाचार चैनलों से इन इलाकों की जो खबरें आ रही हैं वे इसी कारण विमर्श पैदा नहीं करतीं,वे इकतरफा प्रचार सामग्री की तरह पेश की जा रही हैं।यही वजह है कि इन क्षेत्रों के बाशिंदों के अधिकारों के समर्थन में जनता जुगाड़ करना मुश्किल होता जा रहा है।
मध्यपूर्व संकट मीडिया कवरेज के विस्तृत मूल्यांकन का मूल मकसद है मीडिया की व्यापक शक्ति का शांति के लिए इस्तेमाल किया जाय,आज दुनिया को युध्द पत्रकारिता की नहीं बल्कि शांति पत्रकारिता की जरूरत है। आज के दौर में यदि कोई यह सोचे कि वह अराजकता या तबाही या विध्वंस से राजनीतिक लाभ उठा सकता है,राजनीतिक बढत हासिल कर सकता है तो वह गलतफहमी का शिकार है। इस तरह की किसी भी स्थिति में कोई भी अनुकूल परिणाम हासिल नहीं कर सकता है। इस्राइल को अरब देशों या फिलीस्तीन से आत्मरक्षा के नाम पर हमला करने की मीडिया में नंगी वकालत की जा रही है,किंतु आत्मरक्षा का अधिकार अरब देशों,फिलीस्तीन या इराक को नहीं है। सवाल किया जाना चाहिए कि यह आत्मरक्षा का एकतरफा और मनमाना अधिकार सिर्फ इस्राइल को ही क्यों है ?



अमरीकी सैन्य उद्योग का मध्यपूर्व में सूचना वर्चस्व



                    
  (गाजा में इस्राइली नाकेबंदी के प्रतिवाद में बनायी गयी कलाकृतियां)                                                          
       




अमेरिकी साम्राज्यवाद का उत्तर आधुनिक मंत्र है सूचना वर्चस्व बनाए रखो। विरोधी के सूचना तंत्र को नष्ट करो,अप्रासंगिक बनाओ। इस मंत्र का मध्यपूर्व में भी इस्तेमाल किया जा रहा है।जो मीडिया साथ नहीं है ,उसके साथ शत्रुतापूर्ण बर्ताव करना,दण्डित करना, उसे भी आतंकवाद विरोधी मुहिम के निशाने पर लाना। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर मीडिया को चौथा मोर्चा घोषित कर दिया गया है। मीडिया के खिलाफ भी युध्द की घोषणा कर दी गयी है।

नयी परिस्थितियों में संवाददाता,चैनल,अखबार आदि सभी को निशाना बनाया जा रहा है। मीडिया को वस्तुत: युध्द का उपकरण घोषित कर दिया गया है। यह विश्वस्तर पर चल रही अमेरिका की 'आतंकविरोधी मुहिम' का वैध निशाना है।सेना का वैध लक्ष्य है।

     इस्राइली विस्तारवाद और अमेरिकी अंध आक्रामकता का आलम यह है कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर इस्राइल के बारे में किसी भी किस्म की आलोचना के लिए कोई जगह नहीं है। स्थिति इस कदर बदतर है कि इस्राइल की आलोचना को कानून का उल्लंघन माना जाता है।टेरेल इ.अरनॉल्ड ने ' अगेस्ट दि लॉ टु क्रिट्रीसाइस इस्राइल ?' शीर्षक निबंध में लिखा है कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों में मध्यपूर्व से संबंधित किसी भी विषय पर आलोचना की मनाही है,खासकर उन मसलों पर जिन पर इस्राइल की आलोचना की जा सकती हो।

सीनेटर रीक सेनटोरम और सीनेटर साम ब्राउनबेक के द्वारा बनबाए गए उच्च शिक्षा कानून के छठे संशोधित अनुच्छेद के अनुसार यह व्यवस्था की गई है।किसी भी विश्वविद्यालय के छात्र,शिक्षक और अंशकालिक शिक्षक यदि किसी भी किस्म की इस्राइल के खिलाफ टिप्पणी व्यक्त करते हैं तो उस विश्वविद्यालय का आर्थिक अनुदान बंद कर दिया जाएगा।इस्राइल के बारे में की गई किसी भी किस्म की आलोचना को यहूदियों के खिलाफ की गई आलोचना घोषित कर दिया गया है।इस्राइल को यहूदी का पर्याय बना दिया गया है। जो कि गलत है।
    
    अमेरिका-इस्राइल के द्वारा मध्य पूर्व में नए किस्म की रणनीति लागू की जा रही है। नयी रणनीति के तहत मध्यपूर्व का नया नक्शा बनाया जा रहा है। मध्यपूर्व के तेल और गैस के कुओं पर कब्जा जमाओ,स्थानीय स्तर पर युध्द भड़काओ,जातीय हिंसा भड़काओ।मध्य पूर्व में अमेरिकी-इस्राइल सैन्य विस्तार करो।इस रणनीति के तहत 1991-92 में सऊदी अरब में सेनाओं का जमघट लगाया गया।कुवैत में अमेरिकी सेना के स्थायी अड्डे का इंतजाम किया गया।यह सारा कार्य किया गया सद्दाम हुसैन के जुल्मोसितम को मिटाने के नाम पर।बाद में इराक पर कब्जा जमा लिया गया।अब अगला निशाना ईरान है।

     प्रौपेगैण्डा किसी भी युध्द में उसी तरह महत्वपूर्ण है जैसे सैनिक और बम। खासकर ऐसे समय में जब राज्य अपने एक्शन को वैध ठहराना चाहता हो। दूसरे इराक युध्द के समय से युध्द के संदर्भ में तैयार की गई जन-संपर्क रणनीति का काफी महत्वपूर्ण स्थान है। युध्द के समय जन-संपर्क नीति का लक्ष्य होता है भावुक इमेजों की वर्षा और युध्द के लिए समर्थन जुटाना।इससे युध्द के समय सारा वातावरण नियंत्रित रहता है।

नियंत्रित और सेंसरशिप के माहौल में जब कोई सूचना दी जाती है तो लोग उस पर विश्वास करके चलते हैं।इस सूचना में शायद ही कभी आलोचना शामिल हो। खासकर फिलीस्तीनी इलाकों पर इस्राइल के हमले के दौरान जो खबरें इस्राइली सेना के जरिए आ रही थीं उनमें इस्राइल की आलोचना का जिक्र ही नहीं था। कवरेज के दौरान लगातार हम्मास के हमलों या प्रभावित लोगों के साक्षात्कार दिखाए गए जिनके बहाने इस्राइली हिंसाचार को वैधता प्रदान करने की कोशिश की गई। ज्योंही किसी संवाददाता को इस्राइली एक्रिडिशन मिला ,उसके पास तत्काल ईमेल और फोन कॉल का तांता लग जाता है।

इस्राइली प्रशासन के द्वारा संवाददाता का खास ख्याल रखा जाता है। उसे तरह-तरह की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं,पैकेज टूर कराए जाते हैं,खबरों का पुलिंदा भेज दिया जाता है। उसे खबर खोजनी नहीं होती,बल्कि इस्राइली प्रेस विभाग के लोग स्वयं खबर की व्यवस्था कर देते हैं। लंच,विशेषज्ञ आदि की व्यवस्था कर देते हैं। ये सारी चीजें पत्रकार को बगैर मांगे ही पेश कर दी जाती हैं।यानी पत्रकार को खबर खोजने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता।ईमेल के जरिए संवाददाता के पास खबरों का अम्बार लगा दिया जाता है।पत्रकार को खबर के लिए कहीं भी जाने की जरूरत नहीं है,उसे सिर्फ फोन भर कर देना है,सारी चीजें रेडीमेड रूप में तत्काल उपलब्ध करा दी जाती हैं।

खासकर रेडियो और टीवी पत्रकारों को अपनी खबरों के लिए बार-बार होटल से बाहर जाना रास नहीं आता,उन्हें परेशानी होती है,उनके लिए इस्राइली प्रशासन की इस तरह की व्यवस्था से लाभ होता है। ईमेल से पत्रकारों को जिन खबरों को पोस्ट किया जाता है,उसमें चश्मदीद गवाहों के नाम,फोन नम्बर तक दिए रहते हैं,संवाददाता चाहे तो होटल में बैठे-बैठे उनसे बातें करके अपनी स्टोरी तैयार कर ले।यदि यह भी न कर सके तो उनके बयान साथ में ही रहते हैं,उनका इस्तेमाल कर ले। किसी भी चश्मदीद गवाह का बयान लेते समय भाषा संबंधी असुविधाओं का भी ख्याल रखा जाता है। अनुवादक की व्यवस्था भी करायी जाती है।इसका सारा खर्चा इस्राइली प्रशासन उठाता है। गवाहों में अनेक भाषा के लोगों के नाम रहते हैं,आप चाहे जिस भाषा के गवाह का इस्तेमाल कर सकते हैं। ये सारे जन संपर्क के हथकंडे हैं। जिनके जरिए संवाददाता को युध्द के यथार्थ से काट दिया जाता है।
मानव इतिहास में संकट की अवस्था में सबसे ज्यादा अगर किसी चीज की जरूरत होती है तो वह है वस्तुगत मीडिया। वस्तुगत मीडिया के बिना जनता को सही जानकारी नहीं मिलती।       खासकर युध्द,आतंकवाद और अतिवादी राजनीतिक कार्रवाईयों के दौर में वस्तुगत मीडिया जनता का सबसे विश्वसनीय साथी होता है। इन तीनों अवस्थाओं में सबसे पहले सत्य की हत्या होती है। सत्य को बोलना अपराध घोषित कर दिया जाता है।जबकि ऐसी अवस्था में सत्य का उद्धाटन सबसे पहली जरूरत है।

इन अवस्थाओं में मीडिया के मैथड और मंशा का बड़ा महत्व है। जब मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो और राजनीतिक ध्रुवीकरण चरम पर हो,ऐसी अवस्था में वस्तुगत मीडिया बेहद जरूरी है।जबकि यह देखा गया है कि  संकट की इन अवस्था में मीडिया वस्तुगत होने की बजाय ज्यादा से ज्यादा पूर्वाग्रहग्रस्त हो जाता है। उसके सारे पूर्वाग्रह जनतंत्र के लिए खतरा के नाम पर सामने आते हैं।

आश्चर्य की बात यह है कि आज मध्यपूर्व में मीडिया तेजी से अपना विकास कर रहा है।मध्यपूर्व में मीडिया के चरमोत्कर्ष ने खुलापन पैदा किया है। मध्यपूर्व के लोगों में जनतंत्र, जनतांत्रिक मूल्य और समानतावादी विचारों के प्रति आग्रह पैदा हुए हैं। पश्चिम निर्मित यथार्थ का तिलिस्म टूटा है। बेहतरीन टीवी पत्रकारिता का प्रसार हुआ है।

मध्यपूर्व में घट रहे यथार्थ को लेकर मध्यपूर्व का मीडिया सत्य का पक्षधर बनकर सामने आया है,इसके विपरीत पश्चिम का बहुराष्ट्रीय मीडिया पूर्वाग्रहों से ग्रस्त नजर आता है,उसके ऊपर मध्यपूर्व की जनता विश्वास नहीं करती। मध्यपूर्व में एक तरह से मीडिया-सूचना क्रांति की हवा चल रही है,जिसकी धुरी है सत्य के उद्धाटन का आग्रह और पश्चिमी पूर्वाग्रहों के प्रति घृणा। पश्चिमी मीडिया को आज मध्यपूर्व में अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

पश्चिमी मीडिया को मध्यपूर्व की ऑडिएंस कुसमाचार और अमेरिकी प्रचार के तंत्र के रूप में देख रही है। अमेरिका के मीडिया को खासकर इस संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है। मध्यपूर्व में पश्चिमी मीडिया के पूर्वाग्रह खासकर इस्राइल-फिलीस्तीनी संघर्ष,लेबनान-इस्राइल संघर्ष,इराक-अमेरिकी संघर्ष के समय साफ दिखाई दिए हैं। इन तीनों क्षेत्रों में भड़काने वाले के रूप में फिलीस्तीन,हिजबुल्ला और सद्दाम प्रशासन को चित्रित किया है।

फिलीस्तीनी इलाकों में इस्राइल इसलिए गया क्योंकि फिलीस्तीनी भड़काऊ कार्रवाई कर रहे थे।यही तर्क अन्य क्षेत्रों के बारे में है। इन क्षेत्रों की रिपोर्टिंग झगड़े से शुरू होती है और झगडे तक ही सीमित रहती है। झगड़े के बुनियादी कारणों को रिपोर्टिंग में खोजने की कोशिश ही नहीं की जाती। इस क्रम में फिलीस्तीनी संगठन क्या चाहते हैं,उनका क्या मानना है, घटना विशेष पर उसकी क्या राय है, इत्यादि के बारे में कभी समग्र तस्वीर पेश नहीं की जाती। किसी घटना विशेष की रिपोर्टिंग करते समय मैनस्ट्रीम मीडिया सटीक रिपोर्टिंग का आभास देता है।

     संबंधित घटना को पेश करते समय उसका आरंभ अनुकूल तर्क को केन्द्र में  रखकर होता है।जिससे वह आकर्षक और तार्किक लगे।इसके लिए घटना को क्रमवार पेश किया जाता है। किंतु मुख्यधारा का मीडिया फिलीस्तीन नागरिकों के दैनंदिन जीवन के कष्टों के बारे में हमें खबरें नहीं देता। वह यह नहीं बताता है कि किस तरह इस्राइली कार्रवाई ने उनका जीना दूभर कर दिया है ।

   इस्राइली आतंक के कारण उन्हें किस तरह की मानसिक,शारीरिक,आर्थिक और राजनीतिक यंत्रणाओं से गुजरना पड़ रहा है ? इस्राइली विमानों के द्वारा बस्तियों पर नीचे तक आकर उडान भरने,बम फेंकने आदि के कारण किस तरह रोज आतंक,उत्पीडन और भड़कानेवाली यंत्रणाओं से गुजरना पड़ता है। गर्भवती औरतों का इसके कारण गर्भपात हो जाता है।बच्चों और औरतों के कान के पर्दे फट जाते हैं।रात में जब ये विमान बस्तियों के ऊपर मडराते रहते हैं तो रात की नींद गायब हो जाती है। मीडिया ने कभी इस्राइल के इस तरह के अमानवीय आचरण को अपनी रिपोर्टिंग का हिस्सा नहीं बनाया।
    मध्यपूर्व में दो युध्द चल रहे हैं,पहला युध्द इस्राइली सेना  लड़ रही है,दूसरा युध्द मीडिया लड़ रहा है।मीडिया के पर्दे पर बम के धुंए और तबाही के चित्र आते हैं,भागते हुए लोग दिखाई देते हैं। किन्तु मीडिया कभी अपने को आलोचनात्मक नजरिए से नहीं देखता।वह संकट की प्रक्रियाओं को नहीं दिखाता।बल्कि वह ऐसा दृश्य पेश करता है कि सभी पक्ष पूर्वाग्रह से घिरे हैं।इस प्रक्रिया में अनेक किस्म के आख्यान और व्याख्याएं एक ही साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए नजर आते हैं।
    सवाल यह नहीं है कि सत्य क्या है और आप इसे कैसे जानते हैं ?बल्कि समस्या यह है कि तेजी से परिवर्तित परिस्थितियों में आप क्या जानना चाहते हैं,क्या परिवर्तित परिस्थितियों के सही संदर्भ में चीजें पेश की जा रही हैं ? डच पत्रकार जोरिस लियोनदिजिक ने अपनी नयी किताब ' देआर जस्ट लाइक ह्यूमन विंग' में इस प्रसंग को विस्तार से विश्लेषित किया है।उसने लिखा है ''जब फिलीस्तीन-इस्राइल संघर्ष की रिपोर्टिंग की जाती है तो 'मीडियावार' पदबंध का शायद ही कोई अर्थ हो,समाचारपत्र और टीवी इस संघर्ष की तटस्थ  खिड़की नहीं हैं।बल्कि वह मंच ज्यादा बेहतर जगह है जहां लड़ाई लड़ी जा रही है।दोनों ही पक्षों के परिप्रेक्ष्य एक-दूसरे से कोसों दूर नजर आते हैं। ऐसे में निष्पक्षता का बने रहना एकदम असंभव है।

इस समूची प्रक्रिया में मीडिया भाषा और नजरिए का महत्वपूर्ण स्थान होता है।यहां सारी प्रक्रिया शब्द चयन से शुरू होती है,आतंकवादी या स्वाधीनता सेनानी,शांति की प्रक्रिया या शांति स्थापित करने के प्रयास,ज्यों ही इस्राइल के बारे में कवरेज आना शुरू होता है तो इस्राइल की नीतियों की आलोचना आती है तो इस्राइल यही कहना शुरू कर देता है कि मीडिया के उसके प्रति पूर्वाग्रह हैं।जबकि सच यह है कि अधिकांश मैनस्ट्रीम मीडिया इस्राइलपंथी है।पीडितों को ही आक्रामक के रूप में पेश करता है।
     सामान्यत: मध्यपूर्व में इस्राइली हिंसा से पीडित हैं उन्हें ही आक्रामक के रूप में पेश किया जाता रहा है। किंतु इस्राइली बमबारी और तबाही के जो विवरण और ब्यौरे आने चाहिए थे,वे एकसिरे से गायब हैं। मुख्यधारा के मीडिया ने इस्राइली हमलों को आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई कहा। मध्यपूर्व संघर्ष में मीडिया को सीधे दोषी ठहरा दिया जाए, यह एक तरह का सरलीकरण होगा। मीडिया का काम है मध्यपूर्व में जो मीडिया युध्द चल रहा है उसे उद्धाटित किया जाए। मीडिया युध्द में जो भी पक्ष गलत काम कर रहा है,उसे उजागर किया जाय।
                   

फिलीस्तीन मुक्ति सप्ताह का आज आखिरी दिन - मध्यपूर्व के बारे में मीडिया में इस्राइली मिथ









(गाजा की नाकेबंदी के खिलाफ फिलीस्तीनी कलाकारों की कलाकृतियां)                                            
    
इस्राइली सेना के बारे में पश्चिमी मीडिया यह मिथ प्रचारित कर रहा है कि वह कभी गलती नहीं कर सकता। इस्राइली हमेशा जीतेंगे। इस्राइली सेना इस्राइली जनता की रक्षा करेगी। इस्राइली चैनलों में 'हम' की केटेगरी के तहत पश्चिम की प्रशंसा और पश्चिम के साथ इस्राइली रिश्ते के साथ जोड़कर पेश किया जा रहा है। इस्राइल के द्वारा 'अन्य' या पराए की केटेगरी में समूचे अरब जगत को पेश किया जा रहा है। फिलीस्तीनी और अरब जनता को 'न्यूसेंस' और आतंकी के रूप में पेश किया जा रहा है।

इस्राइली प्रचार में कहा जा रहा है इस्राइल का लक्ष्य है 'न्यूसेंस' और आतंकवाद का विरोध करना,उसका सफाया करना।ऐसा करने में किसी भी किस्म के पश्चाताप करने की जरूरत नहीं है। अरब जनता को शक्लविहीन और आतंकी बनाने में पश्चिमी मीडिया का बड़ा हाथ है,खासकर चैनलों का।
      मीडिया आसानी से यह बात भूलता जा रहा है कि इस्राइली सैनिकों के द्वारा फिलिस्तीनी जनता पर निरंतर अमानवीय अत्याचार किए जा रहे हैं।  वे इन लोगों को अपमानित और परेशान कर रहे हैं। ऐसे में फिलीस्तीनी जनता के मन में गुस्सा,घृणा या प्रतिवाद या बदला लेने की भावना पैदा होती है या नहीं ? इस्राइल के सैनिकों के द्वारा गाजा के इलाकों में किया जा रहा अपमानजनक व्यवहार गुस्सा पैदा करता है।मीडिया इसकी ओर कभी ध्यान ही नहीं देता।

गाजा और बेस्ट बैंक के इलाकों में निरंतर बमबारी बच्चों और गर्भवती औरतों के लिए गंभीर रूप से क्षति पहुँचा रही है। बच्चे और औरतें रात में सो नहीं पाते,बच्चों के कान के पर्दे फट रहे हैं,गर्भवती औरतों के बमबारी के धमाकों के कारण गर्भ गिर रहे हैं। पश्चिमी मीडिया में ये सारी बातें एकसिरे से गायब हैं।

इसके अलावा फिलीस्तीनी इलाकों में चली आ रही आर्थिक नाकेबंदी के कारण भी फिलीस्तीनी जनता का जीना दूभर हो गया है। आर्थिक नाकेबंदी के कारण इस्राइल सामूहिक तौर पर फिलीस्तीनी जनता को उत्पीडित कर रहा है। इस सारे अमानवीय कार्यकलाप का आख्यान मीडिया से गायब है। यहीं पर हमें मैनस्ट्रीम मीडिया की भूमिका के बारे में गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।

खासकर आतंकवादी हमलों, युध्द और प्राकृतिक आपदा जैसे संकट के समय मैनस्ट्रीम मीडिया को वस्तुगत भूमिका अदा करनी चाहिए। संकट के समय राजनीतिक ध्रुवीकरण सबसे ज्यादा होता है। मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। ऐसी अवस्था में ही जनता के हितरक्षक के रूप में मीडिया सक्रिय भूमिका अदा करता है। संकट की अवस्था में मैनस्ट्रीम मीडिया में जो चीज सबसे पहले गायब होती है वह है वस्तुगतता।
     वस्तुगत रिपोर्टिंग के अभाव के कारण अनेक किस्म के अ-जनतांत्रिक पूर्वाग्रहों को मीडिया हवा देने लगता है। मध्य-पूर्व के संदर्भ में खासतौर पर यह बात ध्यान रखने की है कि वहां पर अरब देशों को लेकर मीडिया अपने पूर्वाग्रहों से पूरी तरह बंधा हुआ है। अरब जनता को शैतान के रूप में चित्रित करता रहा है।
  मध्यपूर्व की समस्या की बुनियादी वजह है अमेरिका का इस्राइल की तुलना में अरब देशों के साथ भेदभावपूर्ण संबंध। अमेरिका-इस्राइल के द्वारा अरब देशों के ऊपर कब्जा,उत्पीडन ,बर्बरता और अरब जनता के जीवन का अवमूल्यन।
अमेरिका की नीति है कि वह मध्यपूर्व के संकट को चुनिंदा रूप में सम्बोधित करता रहा है,कभी समग्रता में इस संकट का समाधान खोजने की कोशिश नहीं की गई।वह कभी मध्यपूर्व की समग्र जनता को सम्बोधित नहीं करता। वह उन्हें अपने शांति प्रयासों में शामिल नहीं करता। अमेरिका का सारा जोर इस्राइल की सुरक्षा पर है। यही स्थिति अमेरिकी मीडिया में भी देखी जा सकती है। अमेरिकी जनता को अपने चैनलों पर कभी इस्राइली बर्बरता के चित्र देखने को नहीं मिलते। फिलीस्तीनी इलाकों में इस्राइल ने किस तरह का संकट और तबाही पैदा की है उसके विवरण और ब्यौरे कभी दिखाए नहीं जाते। इस्राइल जहरीले रासायनिक अस्त्रों का इस्तेमाल कर रहा है,जिसके ब्यौरे गैर अमेरिकी मीडिया में मिल जाएंगे। किन्तु अमेरिकी -इस्राइली मीडिया में इसकी एकसिरे से अनुपस्थिति है।

मीडिया में मध्यपूर्व का जो थोड़ा-बहुत कवरेज आ रहा है उसमें ऐतिहासिक नजरिए का अभाव है। समस्त रिपोर्टिंग घटना केन्द्रित रहती है,समस्या और उसके ऐतिहासिक कारणों को कभी पाठक या दर्शक को नहीं बताया जाता। कहने का तात्पर्य यह है कि इस्राइली जुल्म और अरब देशों पर अमेरिका-इस्राइल के अवैध कब्जे के आख्यान के बिना मीडिया मध्यपूर्व की खबरें दे रहा है। चैनलों में यदि कभी अरब विशेषज्ञ शामिल किए जाते हैं तो बहस में एक पक्ष के रूप में,विवादी स्वर के रूप में।

यदि कभी किसी चैनल में अरब देशों के पक्षधर विशेषज्ञों से सवाल किए जाते हैं तो सवाल इस तरह का होता है कि विशेषज्ञ को रक्षात्मक मुद्रा अपनानी पड़ती है। मीडिया की मूल समस्या यह है कि उसे मध्यपूर्व में असमानता और वैषम्य नजर नहीं आता। असमानता और वैषम्य जब तक रहेगा हिंसा जारी रहेगी।

 हिंसा के लिए सिर्फ बहाना चाहिए। हिंसा का मूल कारण घटना विशेष को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। घटना विशेष तो बहाना है,मूल कारण है अमेरिका-इस्राइल का मध्यपूर्व के प्रति असमान नजरिया और भेदभावपूर्ण विदेशनीति। समस्या है इसे को चुनौती देने की।

चैनलों के द्वारा सुनियोजित ढ़ंग से ऐसी भाषा और पध्दति का इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे अमेरिकी-इस्राइली हितों और नजरिए के पक्ष में माहौल बना रहे।मसलन् बहुराष्ट्रीय मीडिया ने फिलीस्तीनी नाकेबोदी ,अहर्निश बमबारी और तबाही को युध्द की संज्ञा नहीं दी है। बहुराष्ट्रीय मीडिया ने इसे 'मध्यपूर्व संकट' , 'इस्राइल - हम्मास झगड़ा' 'इस्राइल और आतंकवाद' के बीच के संघर्ष के नाम से ही पेश किया है। इसमें इस्राइली-अमेरिकी विशेषज्ञों ,सैन्य अधिकारियों को ही बार-बार प्रमाण के रूप में पेश किया है।
इस्राइल के द्वारा फिलीस्तीनी इलाकों में किए जा रहे हमलों को आतंकवादी ठिकानों पर किए जा रहे हमले कहा है,जबकि ये सारे हमले रिहायशी इलाकों पर किए गए हैं। इस्राइली बमबारी में बच्चे,औरतें और निर्दोष नागरिक ही मारे गए हैं।ऐसे में इस्राइल का यह दावा कि उसकी सारी कार्रवाई आतंकवादियों के खिलाफ है। गलत साबित होता है। समाचार चैनलों में नंगे रूप में इस्राइली प्रचार अभियान चल रहा है। इसमें मध्यपूर्व का यथार्थ एकसिरे से गायब है। समूचा बहुराष्ट्रीय मीडिया सेंसरशिप और आत्म-सेंसरशिप से गुजर रहा है।
    
                    

फिलीस्तीन मुक्ति सप्ताह- बहुराष्ट्रीय मीडिया में नदारत फिलीस्तीनी सच


               
          फिलीस्तीन की सामयिक सच्चाई यह है कि अभी तक इस्राइल ने फिलीस्तीन की जमीन से अपने अवैध कब्जे नहीं हटाए है। अवैध रूप से बसायी गयी पुनर्वास बस्तियों को नहीं हटाया गया है । कुछ बस्तियों को कुछ समय पहले प्रतीकात्मक तौर पर खाली कराया गया था किंतु असल में सभी अवैध पुनर्वास बस्तियां ज्यों की त्यों बसी हुई हैं। संकेत मिल रहे हैं कि वेस्ट बैंक में बसायी गयी अवैध 149 बस्तियों को इजरायल नहीं हटाएगा। इसका अर्थ है कि फिलीस्तीनियों को स्थायी तौर पर विभाजन और घृणा में जीना पड़ेगा।
संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवीय कार्यकलाप संयोजन दफतर के मुताबिक अभी वेस्ट बैंक में इस समय 651 निगरानी चौकियां हैं।इन निगरानी चौकियों के जरिए फिलीस्तीनियों की चैकिंग होती है।  जबकि अवैध बस्तियों के इलाकों में मात्र आठ निगरानी चौकियां हैं।
     निगरानी चौकियों के बहाने फिलीस्तीनियों को दैनन्दिन जीवन में अकथनीय तकलीफों का सामना करना पड़ता है।  उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर समूची अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो गयी है। आश्चर्य की बात है  जो फिलीस्तीनी नागरिक अपने वतन आना चाहते हैं उन्हें इस्राइल आने नहीं देता और इसके बदले में फिलीस्तीनियों की जमीन पर अवैध ढ़ंग से यहूदियों को बाहर से लाकर बसाया जा रहा है। ऐसा करके स्थायी तौर पर वह फिलीस्तीन को पूरी तरह नष्ट करके उसका अंत ही कर देने पर आमादा है। 
फिलीस्तीनियों पर एक तरफ हमले हो रहे हैं दूसरी ओर उन्हें बेदखल करके उनकी जमीन हथियाकर अवैध ढंग से यहूदी बस्तियां बसायी जा रही हैं। अवैध यहूदी बस्तियां सिर्फ बस्तियां ही नहीं हैं बल्कि इन्हें फिलीस्तीनी बस्तियों से अलग काटकर बसाया जा रहा है। उनकी बस्तियों से अलग इन्हें दीवार बनाकर किले की तरह बसाया जा रहा है। यह एक तरह का स्थायी विभाजन है जिसे फिलीस्तीन की सरजमीं पर थोपा जा रहा है।
     कोई सभ्यता मानवीय है या नहीं यह इस तथ्य से तय होता है कि वह हमलावर है या नहीं। भारतीय सभ्यता का दर्जा इसी अर्थ में पश्चिमी सभ्यता से काफी ऊँचा है। भारतीय सभ्यता हमलावर नहीं है। इसमें मित्रता का भाव है,इसके विपरीत पश्चिमी पूंजीवादी सभ्यता हमलावर सभ्यता है। वह युध्द के बिना जिंदा नहीं रह सकती,बर्बर आक्रमण उसकी दैनन्दिन खुराक है।

बड़े पूंजीवादी राष्ट्र अन्य कमजोर देशों पर बर्बर हमले न करें तो पश्चिमी सभ्यता की सांसें बंद हो जाएं ,कारखाने बंद हो जाएं। पश्चिमी सभ्यता के भक्तों को इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि पश्चिम इतना बर्बर, निष्ठुर, निरंकुश ,असहिष्णु, और आक्रामक क्यों है ?

इस्राइल की बर्बरता और युध्दवादी मानसिकता के पीछे आज समूचा पश्चिमी सत्ता तंत्र खड़ा है। इस्राइल को पश्चिमी समाज आधुनिकता का आदर्श मॉडल बताकर पेश करता रहा है,जबकि  इस्राइल सबसे ज्यादा बर्बर और हिंसक देश है। इस्राइली आक्रामकता,हिंसाचार,यहूदीवादी विस्तारवाद की चैनलों से गाथाएं गायब हैं। मरने वालों के बारे में कोई विस्तृत रिपोर्ट नहीं आ रही है। यहां तक कि संयुक्तराष्ट्र संघ भी इस्राइल के सामने असहाय है।

मुसलमानों का प्रतिदिन किसी न किसी बहाने कत्ल या जनसंहार दिखाना आम रिवाज बन गया है, इससे मुसलमानों के बारे में खास किस्म की इमेज बन रही है। मुसलमानों को बर्बर, आतंकवादी,हिंसक आदि रूपों में पेश किया जा रहा है। इसके कारण मुसलमानों के प्रति सही और संतुलित ढ़ंग से आम जीवन में बातें करना भी मुश्किल हो गया है।

 मिथकशास्त्री एस.कीन ने मध्यपूर्व युध्द में निर्मित किए गए मिथों का खुलासा करते हुए लिखा है,''हथियारों से हत्या करने से पहले सबसे पहले हम मन में लोगों की हत्या करें।चाहे जिस तरह का युध्द हो।शत्रु हमेशा संहारक होता है और हम अच्छे लोगों की तरफ होते हैं।वे बर्बर होते हैं।हम सभ्य होते हैं।वे शैतान होते हैं।टेलीविजन से निरंतर आग के गोले दर्शक को एक ऐसे स्वप्नलोक में ले जाते हैं जहां उसके दिमाग में किसी भी किस्म के विचार नहीं आते। अब शत्रु को नम्बरों में बदल दिया गया था। "
समाचार चैनलों में मारे गए इस्राइली नागरिकों ,बच्चों के माता-पिता के बयान,फोटो, दुखी चेहरे दिखाई दे जाएंगे ,किन्तु किसी मुसलमान बच्चे के माता-पिता के दुखी चेहरे नजर नहीं आएंगे। गाजा में तो लंबे समय से सिर्फ बच्चों का ही इस्राइल द्वारा कत्ल किया जा रहा है किन्तु किसी भी चैनल ने पीडित माता-पिता के दृश्य नहीं दिखाए, गोया ! मुसलमान बच्चों के माता-पिता नहीं होते !
      चैनलों में लेबनान,सीरिया,इण्डोनेशिया, इरान, इराक, सोमालिया, सऊदी अरब,लीबिया,सूडान,अफगानिस्तान,पाकिस्तान आदि के मुसलमानों की कत्लेआम की खबरें आम हो गई हैं। आतंकवाद विरोधी मुहिम के तहत इन देशों के मुस्लिम बाशिंदों को खदेड़ा जा रहा है, हमले ए जा रहे हैं,बदनाम किया जा रहा है,सवाल किया जाना चाहिए कि यदि इन सभी देशों से मुसलमानों को निकाल देगें तो आखिरकार मुसलमान जाएंगे कहां ? क्या सारी दुनिया में मुसलमान सिर्फ शरणार्थी शिविरों में ही रहेंगे ? अथवा मुसलमानों को उनके देश में ही कैद करके रखा जाएगा ?जिससे उन्हें कभी भी कुत्तों की तरह गोलियों से भून दिया जाए,जैसा कि अभी मध्य-पूर्व के देशों में हो रहा है। पश्चिमी सभ्यता के रखवाले अमेरिका-इस्राइल ने मुसलमानों के सामने जनतांत्रिक प्रतिवाद का कोई अवसर ही नहीं छोड़ा है। मुसलमान को प्रतिवाद करना हो तो आतंकवादी बने अथवा अमेरिका के चरणों में पड़ा रहे।

मध्यपूर्व  अमेरिका की जो दादागिरी चल रही है उसका गहरा संबंध अमेरिका के सैन्य उद्योग समूह के साथ है।अमेरिका की विदेश नीति का यह उद्योग समूह मूलाधार है। अमेरिका की समूची अर्थव्यवस्था इस समय सैन्य उद्योग,संस्कृति उद्योग और सूचना उद्योग पर टिकी हुई है। ये तीनों उद्योग समूह एक-दूसरे पर निर्भर हैं।एक के बिना दूसरे का विकास संभव नहीं है। हथियार उत्पादन अमेरिकी नीतियों में सबसे प्रमुख क्षेत्र है।हथियार उत्पादन क्षेत्र यदि प्रमुख क्षेत्र होगा तो उसका दूसरा कदम हथियारों का निर्यात करना होगा।अमेरिकी कंपनियों को इसके लिए ग्लोबल रणनीति बनानी होती है।इसका अर्थ यह है कि युध्द का निरंतर बने रहना। युध्द नहीं होंगे तो हथियार नहीं बिकेंगे। हथियार नहीं बिकेंगे तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी।इसका अर्थ यह हुआ कि निररंतर युध्द का बने रहना।

मजेदार बात यह है कि हमारे शांति आंदोलन की मांगों में युध्द बंद करने या अमेरिका की युध्दवादी नीतियों को नंगा करने वाली मांगें तो रहती हैं किंतु सैन्य उद्योग को शांति और विकास के कार्यों में रूपान्तरित करने की मांग शामिल नहीं रहती।यह स्थिति अमेरिका के शांति आंदोलन की भी है।

कायदे से शांति आन्दोलन को युध्द के साथ -साथ सैन्य उद्योग के शांति एवं विकास कार्यों में रूपान्तरण की मांगों को भी अपना एजेण्डा बनाना चाहिए। शांति आंदोलन की मुश्किल यह है कि युध्द के खत्म होते ही वे शांत हो जाते हैं। जबकि सैन्य उद्योग काम करता रहता है।

युध्द को खत्म करने के लिए जरूरी है कि हथियारों के उत्पादन पर रोक लगायी जाए।हम यह चेतना अभी तक पैदा नहीं कर पाए हैं कि जनसंहारक अस्त्रों के निर्माण कार्य में हमारे वैज्ञानिक,रक्षा विशेषज्ञ आदि भाग न लें। हथियारों को बनाने वाले हाथ नहीं होगे तो हथियार भी नहीं बनेंगे। जनसंहारक अस्त्रों के निर्माण की प्रक्रिया से लेकर युध्द के मैदान और युध्द के बाद की स्थितियों तक शांति आंदोलन का दायरा फैला हुआ है।

हमें इस लचर  तर्क से बचना चाहिए वैज्ञानिक अस्त्र नहीं बनाएंगे तो खाएंगे क्या ?सैन्य उद्योग समूह पर जो परिवार निर्भर हैं वे क्या खाएंगे ? अमेरिकी कंपनियां इस्राइल को नए अस्त्र-शस्त्र सप्लाई कर रही हैं। अमेरिकी सैन्य उद्योग में काम करने वाले ओवरटाइम काम कर रहे हैं। वे इस्राइल के आर्डर की सप्लाई लाइन चालू रखे हुए हैं।

सैन्य उद्योग में काम करने वाले कर्मचारी इस बात पर गर्वित हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा उत्पादन कर रहे हैं। क्या हमारे मजदूर आंदोलन को सैन्य उद्योग में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ शांति आंदोलन को जोड़ने के बारे में नहीं सोचना चाहिए ? हमें इस सवाल का भी जबाव खोजना होगा कि आखिरकार अमेरिका के शांति आंदोलन ने सैन्य कर्मचारियों को अपने प्रभाव में अभी तक क्यों नहीं लिया है ?

आज हथियारों की दौड़ धरती तक ही सीमित नहीं है बल्कि उसने पूरे अंतरिक्ष को भी अपनी जद में ले लिया है।पेंटागन का अब तक का सबसे बड़ा प्रकल्प है प्लेनेट अर्थ ।इसका लक्ष्य है अंतरिक्ष को हथियारों से भर देना। यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि आज अमेरिका अपने देश में शांति के काम में आने वाली कितनी चीजें पैदा कर रहा है ? बाजार में जाने पर बमुश्किल कोई ऐसी चीजें नजर आएं।हथियारों का निर्माण करके अमेरिका बड़े पैमाने जहां युध्द को बनाए रखना चाहता है,वहीं दूसरी ओर अमेरिका युध्द के बहाने गैस और तेल के भंडारों को अपने कब्जे में लेना चाहता है।यह सिलसिला जारी है।

              







मंगलवार, 26 जनवरी 2010

फिलीस्तीन मुक्ति सप्ताह- गाजा पर बनी फिलीस्तीन के कलाकारों की प्रतिवादी कलाएं










फिलीस्तीन मुक्ति सप्ताह- बहुराष्ट्रीय मीडिया में नदारत फिलीस्तीनी सच





                                                  
 फिलीस्तीन की सामयिक सच्चाई यह है कि अभी तक इस्राइल ने फिलीस्तीन की जमीन से अपने अवैध कब्जे नहीं हटाए है। अवैध रूप से बसायी गयी पुनर्वास बस्तियों को नहीं हटाया गया है । कुछ बस्तियों को कुछ समय पहले प्रतीकात्मक तौर पर खाली कराया गया था किंतु असल में सभी अवैध पुनर्वास बस्तियां ज्यों की त्यों बसी हुई हैं। संकेत मिल रहे हैं कि वेस्ट बैंक में बसायी गयी अवैध 149 बस्तियों को इजरायल नहीं हटाएगा। इसका अर्थ है कि फिलीस्तीनियों को स्थायी तौर पर विभाजन और घृणा में जीना पड़ेगा।
संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवीय कार्यकलाप संयोजन दफतर के मुताबिक अभी वेस्ट बैंक में इस समय 651 निगरानी चौकियां हैं।इन निगरानी चौकियों के जरिए फिलीस्तीनियों की चैकिंग होती है।  जबकि अवैध बस्तियों के इलाकों में मात्र आठ निगरानी चौकियां हैं।
     निगरानी चौकियों के बहाने फिलीस्तीनियों को दैनन्दिन जीवन में अकथनीय तकलीफों का सामना करना पड़ता है।  उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर समूची अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो गयी है। आश्चर्य की बात है  जो फिलीस्तीनी नागरिक अपने वतन आना चाहते हैं उन्हें इस्राइल आने नहीं देता और इसके बदले में फिलीस्तीनियों की जमीन पर अवैध ढ़ंग से यहूदियों को बाहर से लाकर बसाया जा रहा है। ऐसा करके स्थायी तौर पर वह फिलीस्तीन को पूरी तरह नष्ट करके उसका अंत ही कर देने पर आमादा है। 
फिलीस्तीनियों पर एक तरफ हमले हो रहे हैं दूसरी ओर उन्हें बेदखल करके उनकी जमीन हथियाकर अवैध ढंग से यहूदी बस्तियां बसायी जा रही हैं। अवैध यहूदी बस्तियां सिर्फ बस्तियां ही नहीं हैं बल्कि इन्हें फिलीस्तीनी बस्तियों से अलग काटकर बसाया जा रहा है। उनकी बस्तियों से अलग इन्हें दीवार बनाकर किले की तरह बसाया जा रहा है। यह एक तरह का स्थायी विभाजन है जिसे फिलीस्तीन की सरजमीं पर थोपा जा रहा है।
     कोई सभ्यता मानवीय है या नहीं यह इस तथ्य से तय होता है कि वह हमलावर है या नहीं। भारतीय सभ्यता का दर्जा इसी अर्थ में पश्चिमी सभ्यता से काफी ऊँचा है। भारतीय सभ्यता हमलावर नहीं है। इसमें मित्रता का भाव है,इसके विपरीत पश्चिमी पूंजीवादी सभ्यता हमलावर सभ्यता है। वह युध्द के बिना जिंदा नहीं रह सकती,बर्बर आक्रमण उसकी दैनन्दिन खुराक है।

बड़े पूंजीवादी राष्ट्र अन्य कमजोर देशों पर बर्बर हमले न करें तो पश्चिमी सभ्यता की सांसें बंद हो जाएं ,कारखाने बंद हो जाएं। पश्चिमी सभ्यता के भक्तों को इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि पश्चिम इतना बर्बर, निष्ठुर, निरंकुश ,असहिष्णु, और आक्रामक क्यों है ?

इस्राइल की बर्बरता और युध्दवादी मानसिकता के पीछे आज समूचा पश्चिमी सत्ता तंत्र खड़ा है। इस्राइल को पश्चिमी समाज आधुनिकता का आदर्श मॉडल बताकर पेश करता रहा है,जबकि  इस्राइल सबसे ज्यादा बर्बर और हिंसक देश है। इस्राइली आक्रामकता,हिंसाचार,यहूदीवादी विस्तारवाद की चैनलों से गाथाएं गायब हैं। मरने वालों के बारे में कोई विस्तृत रिपोर्ट नहीं आ रही है। यहां तक कि संयुक्तराष्ट्र संघ भी इस्राइल के सामने असहाय है।

मुसलमानों का प्रतिदिन किसी न किसी बहाने कत्ल या जनसंहार दिखाना आम रिवाज बन गया है, इससे मुसलमानों के बारे में खास किस्म की इमेज बन रही है। मुसलमानों को बर्बर, आतंकवादी,हिंसक आदि रूपों में पेश किया जा रहा है। इसके कारण मुसलमानों के प्रति सही और संतुलित ढ़ंग से आम जीवन में बातें करना भी मुश्किल हो गया है।

 मिथकशास्त्री एस.कीन ने मध्यपूर्व युध्द में निर्मित किए गए मिथों का खुलासा करते हुए लिखा है,''हथियारों से हत्या करने से पहले सबसे पहले हम मन में लोगों की हत्या करें।चाहे जिस तरह का युध्द हो।शत्रु हमेशा संहारक होता है और हम अच्छे लोगों की तरफ होते हैं।वे बर्बर होते हैं।हम सभ्य होते हैं।वे शैतान होते हैं।टेलीविजन से निरंतर आग के गोले दर्शक को एक ऐसे स्वप्नलोक में ले जाते हैं जहां उसके दिमाग में किसी भी किस्म के विचार नहीं आते। अब शत्रु को नम्बरों में बदल दिया गया था। "
समाचार चैनलों में मारे गए इस्राइली नागरिकों ,बच्चों के माता-पिता के बयान,फोटो, दुखी चेहरे दिखाई दे जाएंगे ,किन्तु किसी मुसलमान बच्चे के माता-पिता के दुखी चेहरे नजर नहीं आएंगे। गाजा में तो लंबे समय से सिर्फ बच्चों का ही इस्राइल द्वारा कत्ल किया जा रहा है किन्तु किसी भी चैनल ने पीडित माता-पिता के दृश्य नहीं दिखाए, गोया ! मुसलमान बच्चों के माता-पिता नहीं होते !
      चैनलों में लेबनान,सीरिया,इण्डोनेशिया, इरान, इराक, सोमालिया, सऊदी अरब,लीबिया,सूडान,अफगानिस्तान,पाकिस्तान आदि के मुसलमानों की कत्लेआम की खबरें आम हो गई हैं। आतंकवाद विरोधी मुहिम के तहत इन देशों के मुस्लिम बाशिंदों को खदेड़ा जा रहा है, हमले ए जा रहे हैं,बदनाम किया जा रहा है,सवाल किया जाना चाहिए कि यदि इन सभी देशों से मुसलमानों को निकाल देगें तो आखिरकार मुसलमान जाएंगे कहां ? क्या सारी दुनिया में मुसलमान सिर्फ शरणार्थी शिविरों में ही रहेंगे ? अथवा मुसलमानों को उनके देश में ही कैद करके रखा जाएगा ?जिससे उन्हें कभी भी कुत्तों की तरह गोलियों से भून दिया जाए,जैसा कि अभी मध्य-पूर्व के देशों में हो रहा है। पश्चिमी सभ्यता के रखवाले अमेरिका-इस्राइल ने मुसलमानों के सामने जनतांत्रिक प्रतिवाद का कोई अवसर ही नहीं छोड़ा है। मुसलमान को प्रतिवाद करना हो तो आतंकवादी बने अथवा अमेरिका के चरणों में पड़ा रहे।

मध्यपूर्व  अमेरिका की जो दादागिरी चल रही है उसका गहरा संबंध अमेरिका के सैन्य उद्योग समूह के साथ है।अमेरिका की विदेश नीति का यह उद्योग समूह मूलाधार है। अमेरिका की समूची अर्थव्यवस्था इस समय सैन्य उद्योग,संस्कृति उद्योग और सूचना उद्योग पर टिकी हुई है। ये तीनों उद्योग समूह एक-दूसरे पर निर्भर हैं।एक के बिना दूसरे का विकास संभव नहीं है। हथियार उत्पादन अमेरिकी नीतियों में सबसे प्रमुख क्षेत्र है।हथियार उत्पादन क्षेत्र यदि प्रमुख क्षेत्र होगा तो उसका दूसरा कदम हथियारों का निर्यात करना होगा।अमेरिकी कंपनियों को इसके लिए ग्लोबल रणनीति बनानी होती है।इसका अर्थ यह है कि युध्द का निरंतर बने रहना। युध्द नहीं होंगे तो हथियार नहीं बिकेंगे। हथियार नहीं बिकेंगे तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी।इसका अर्थ यह हुआ कि निररंतर युध्द का बने रहना।

मजेदार बात यह है कि हमारे शांति आंदोलन की मांगों में युध्द बंद करने या अमेरिका की युध्दवादी नीतियों को नंगा करने वाली मांगें तो रहती हैं किंतु सैन्य उद्योग को शांति और विकास के कार्यों में रूपान्तरित करने की मांग शामिल नहीं रहती।यह स्थिति अमेरिका के शांति आंदोलन की भी है।

कायदे से शांति आन्दोलन को युध्द के साथ -साथ सैन्य उद्योग के शांति एवं विकास कार्यों में रूपान्तरण की मांगों को भी अपना एजेण्डा बनाना चाहिए। शांति आंदोलन की मुश्किल यह है कि युध्द के खत्म होते ही वे शांत हो जाते हैं। जबकि सैन्य उद्योग काम करता रहता है।

युध्द को खत्म करने के लिए जरूरी है कि हथियारों के उत्पादन पर रोक लगायी जाए।हम यह चेतना अभी तक पैदा नहीं कर पाए हैं कि जनसंहारक अस्त्रों के निर्माण कार्य में हमारे वैज्ञानिक,रक्षा विशेषज्ञ आदि भाग न लें। हथियारों को बनाने वाले हाथ नहीं होगे तो हथियार भी नहीं बनेंगे। जनसंहारक अस्त्रों के निर्माण की प्रक्रिया से लेकर युध्द के मैदान और युध्द के बाद की स्थितियों तक शांति आंदोलन का दायरा फैला हुआ है।

हमें इस लचर  तर्क से बचना चाहिए वैज्ञानिक अस्त्र नहीं बनाएंगे तो खाएंगे क्या ?सैन्य उद्योग समूह पर जो परिवार निर्भर हैं वे क्या खाएंगे ? अमेरिकी कंपनियां इस्राइल को नए अस्त्र-शस्त्र सप्लाई कर रही हैं। अमेरिकी सैन्य उद्योग में काम करने वाले ओवरटाइम काम कर रहे हैं। वे इस्राइल के आर्डर की सप्लाई लाइन चालू रखे हुए हैं।

सैन्य उद्योग में काम करने वाले कर्मचारी इस बात पर गर्वित हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा उत्पादन कर रहे हैं। क्या हमारे मजदूर आंदोलन को सैन्य उद्योग में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ शांति आंदोलन को जोड़ने के बारे में नहीं सोचना चाहिए ? हमें इस सवाल का भी जबाव खोजना होगा कि आखिरकार अमेरिका के शांति आंदोलन ने सैन्य कर्मचारियों को अपने प्रभाव में अभी तक क्यों नहीं लिया है ?

आज हथियारों की दौड़ धरती तक ही सीमित नहीं है बल्कि उसने पूरे अंतरिक्ष को भी अपनी जद में ले लिया है।पेंटागन का अब तक का सबसे बड़ा प्रकल्प है प्लेनेट अर्थ ।इसका लक्ष्य है अंतरिक्ष को हथियारों से भर देना। यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि आज अमेरिका अपने देश में शांति के काम में आने वाली कितनी चीजें पैदा कर रहा है ? बाजार में जाने पर बमुश्किल कोई ऐसी चीजें नजर आएं।हथियारों का निर्माण करके अमेरिका बड़े पैमाने जहां युध्द को बनाए रखना चाहता है,वहीं दूसरी ओर अमेरिका युध्द के बहाने गैस और तेल के भंडारों को अपने कब्जे में लेना चाहता है।यह सिलसिला जारी है।

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