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बुधवार, 5 जून 2013

शीतयुद्धोत्तर परिप्रेक्ष्य की तलाश और मार्क्सवादी रूढ़ियां


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फेसबुक पर हिन्दीलेखकों में लेखकीय ध्रुवीकरण शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क से बंधा है। कायदे से शीतयुद्धीय राजनीति और सीआईए- -सोवियत कम्युनिज्म के दायरे से बाहर निकलकर चीजों को देखने की जरूरत है। खासकर मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य शीतयुद्धीय राजनीति के पक्ष-विपक्ष मे बांधता है।
नए जमाने की मांग है लोकतंत्र और दुर्भाग्य की बात है कि सीआईए या अमेरिकी साम्राज्यवाद या समाजवाद दोनों ही लोकतंत्र की सत्ता-महत्ता और स्वायत्तता को स्वीकार नहीं करते। मंगलेश डबराल,वीरेन्द्रयादव, अशोक पाण्डेय आदि ने मेरी पोस्ट पर अशोक पाण्डेय की फेसबुक वॉल पर जो बहस चलायी है उसमें भागलेने वाले सुधीजन शीतयुद्ध की राजनीति के दायरे के बाहर निकलकर नहीं सोच पाए हैं।
चार्ली चैप्लिन,ब्रेख्त आदि सभी नामी प्रगतिशील लेखकों के नजरिए की मुश्किलें वही हैं जो शीतयुद्धीय राजनीति की हैं। वे भी उसके दायरे के बाहर नहीं देख पाते। प्रगतिशीलों का शीतयुद्धीय राजनीति को समाजवाद के नजरिए से देखना मार्क्सवादी रूढ़िवाद है। मार्क्सवादी रूढ़िवाद हमें लोकतांत्रिक नजरिए से सोचने में बाधाएं पैदा करता है।
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शीतयुद्धोत्तर परिप्रेक्ष्य की तलाश और मार्क्सवादी रूढ़ियां-1-

फेसबुक पर हिन्दीलेखकों में लेखकीय ध्रुवीकरण शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क से बंधा है। कायदे से शीतयुद्धीय राजनीति और सीआईए- -सोवियत कम्युनिज्म के दायरे से बाहर निकलकर चीजों को देखने की जरूरत है। खासकर मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य शीतयुद्धीय राजनीति के पक्ष-विपक्ष मे बांधता है।
नए जमाने की मांग है लोकतंत्र और दुर्भाग्य की बात है कि सीआईए या अमेरिकी साम्राज्यवाद या समाजवाद दोनों ही लोकतंत्र की सत्ता-महत्ता और स्वायत्तता को स्वीकार नहीं करते। मंगलेश डबराल,वीरेन्द्रयादव, अशोक पाण्डेय आदि ने मेरी पोस्ट पर अशोक पाण्डेय की फेसबुक वॉल पर जो बहस चलायी है उसमें भागलेने वाले सुधीजन शीतयुद्ध की राजनीति के दायरे के बाहर निकलकर नहीं सोच पाए हैं।
चार्ली चैप्लिन,ब्रेख्त आदि सभी नामी प्रगतिशील लेखकों के नजरिए की मुश्किलें वही हैं जो शीतयुद्धीय राजनीति की हैं। वे भी उसके दायरे के बाहर नहीं देख पाते। प्रगतिशीलों का शीतयुद्धीय राजनीति को समाजवाद के नजरिए से देखना मार्क्सवादी रूढ़िवाद है। मार्क्सवादी रूढ़िवाद हमें लोकतांत्रिक नजरिए से सोचने में बाधाएं पैदा करता है।
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तीसरी मार्क्सवादी रूढ़ि है -मार्क्सवादी कल्पनाशीलता। भारत में विभिन्न रंगत के मार्क्सवादियों में एक विलक्षण साम्य है वे रहते पूंजीवाद में हैं,अधिकार पूंजीवाद के चाहते हैं,पूंजीवादी संरचनाओं के दुरूस्तीकरण के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन चाहते हैं समाजवाद ।
हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों-आलोचकों ने कभी गंभीरता के साथ "कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य और साहित्य" के अन्तस्संबंध पर विचार नहीं किया ।वे पूंजीवाद के सरलीकरणों और अमेरिकी बहानेबाजी के जरिए अपने दायित्व से भागते रहे हैं।
भारतीय समाज के निर्माण में कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की प्रधान भूमिका रही है। इसे सोवियत समाजवादी नजरिए या अमेरिकी नजरिए से नहीं समझा जा सकता। इसे समाजवाद के आग्रह के नजरिए से भी नहीं समझा जा सकता।
समाजवाद का आग्रह लोकतंत्र की शक्ति को समझने में बाधा पैदा करता है। भारत का वर्तमान लोकतंत्र से निर्धारित हो रहा है और भविष्य में भी लोकतंत्र से जल्दी मुक्ति मिलने वाली नहीं है। समाजवाद यहां के लिए कल्पनाशीलता है। लोकतंत्र को हमें लोकतंत्र के नजरिए से देखना होगा। समाजवाद के नजरिए से लोकतंत्र को देखना मार्क्सवादी कल्पनाशीलता है ।
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मार्क्सवादी रूढ़िवाद की चौथी रूढ़ि है लोकतंत्र को हिकारत की नजर से देखना। हिन्दी के प्रगतिशील  लेखकों में बड़ा हिस्सा है जो समाजवाद के आख्यान और गुणों को जानता है लेकिन भारत में लोकतंत्र में लेखकीय और नागरिक अधिकारों की चेतना से शून्य है।
    मसलन्, हिन्दीलेखकों में  लेखक के अधिकारों को लेकर कोई गुस्सा नहीं है। मसलन्, हमने यह कभी नहीं सुना कि नामवर सिंह या अन्य किसी लेखक ने राजकमल के मालिक से लेखकों की रॉयल्टी समय पर देने के लिए कभी संघर्ष किया हो।
     मैं निजी तौर पर दर्जनों लेखकों को जानता हूँ जिनको प्रकाशक रॉयल्टी नहीं देता और लेखकसंघ चुप तमाशा देखते रहते हैं।
      भारत के लेखक के लिए उसके अधिकारों की चेतना समाजवादी चेतना से ज्यादा महत्वपूर्ण है। लेखक के अधिकारों की चेतना लोकतंत्र के प्रति प्रेम और आस्था पैदा करके ही पैदा की जा सकती है। लोकतंत्र में हिकारत से देखना लोकतंत्र का निषेध है।
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हिन्दी लेखकों में मार्क्सवादीदंभ बहुत बड़ी समस्या है । मार्क्सवादीदंभ भाव रहने वाले लेखक बेहतर न लिखकर भी अपने लेखकीय श्रेष्ठत्व का दावा करते हैं।
इसके कवच के तौर पर वे मार्क्सवाद को पहले सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं ,बाद में मार्क्सवादियों और फिर अपने को सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं। ये लेखक भूल गए हैं कि मार्क्सवाद का जन्म श्रेष्ठता के सिद्धांत और संस्कार के प्रतिवाद में हुआ था।
मार्क्सवाद ,मार्क्सवादी और निज को श्रेष्ठ मानने का विचार अवैज्ञानिक है। मार्क्सवाद ने कभी श्रेष्ठता का दावा नहीं किया। स्वयं मार्क्स ने श्रेष्ठ होने का दावा नहीं किया।
एक अच्छा मार्क्सवादी दंभी नहीं संवेदनशील होता है,विनयी होता है,अन्य को सम्मान देता है।
दंभी की भाषा हेटभाषा होती है, रूप में भी और अंतर्वस्तु में भी। एक अच्छा मार्क्सवादी वह है जिसके पास अन्य के विचारों और विचारधारा के लिए जगह है। अन्य हैं इसलिए मार्क्सवाद उनसे भिन्न और वैज्ञानिक है।
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मार्क्सवादी लेखकों की इस दौर में सबसे बड़ी असफलता है कि वे शीतयुद्ध में साहित्य के अवमूल्यन को नहीं रोक पाए। साहित्य के जो मानक रचे गए उनमें इजाफा नहीं कर पाए।साहित्य के नए पैराडाइम को पकड़ नहीं पाए। फलतःआज वे हाशिए के बाहर चले गए हैं। लंबे समय से हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचना की कोई किताब बाजार में नजर नहीं आई और हिन्दी के मार्क्सवादी आलोचकों ने समीक्षा का कोई नया मानक नहीं बनाया।
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शीतयुद्ध और उसके बाद के दौर में जातीय विध्वंस का ग्लोबल चक्र चला है। पूर्व समाजवादी समाजों से लेकर कांगो-सोमालिया-इराक अफगानिस्तान आदि तक इसका दायरा फैला हुआ है। एक जमाने में समाजवादी समाज में जातीय समस्या के समाधान का हिन्दी में खूब गुणगान किया गया लेकिन जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो इस जातीय विघटन पर हिन्दी में अधिकांश मार्क्सवादी चुप रहे। यहां तक कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां और माओवादी-नक्सल भी चुप रहे। यह चुप्पी अचानक नहीं है बल्कि शीतयुद्धोत्तर यथार्थ को वैज्ञानिक ढ़ंग से न देख पाने का फल है।
शीतयुद्धोत्तर यथार्थ पहले की तुलना में ज्यादा जटिल और संश्लिष्ट है। नए यथार्थ और नई राजनीतिक समस्याओं के खिलाफ मोर्चा लेते हुए आप स्वयंसेवी संगठनों और व्यक्तियों के समूहों को देख सकते हैं लेकिन मार्क्सवादी दलों-संगठनों को कहीं पर भी नहीं देखेंगे।

मसलन् यूनियन कारबाइड के खिलाफ विगत 25 सालों में कौन संघर्ष कर रहा है ?मोदी के दंगों के खिलाफ कौन केस लड़ रहा है ?आदि अनेक समस्याएं हैं जहां पर छोटे स्वयंसेवी संगठन संघर्ष कर रहे हैं ,कम्युनिस्टदल सोए हैं।

रविवार, 20 जून 2010

शीतयुद्धीय राजनीति और जीवनशैली के मायावी खेल





अधिकांश विज्ञापनों में किसी वस्तु विशेष की प्राप्ति को 'सफलता' या 'खुशी' का आधार बनाकर दर्शाया जाता है। यह ऐसी अवस्था है जिसे ग्राहक कभी अर्जित नहीं कर पाता। इसके संप्रेषण के लिए फैंटेसी का सहारा लिया जाता है जिससे वह व्यक्ति के स्वप्न को अनंत काल तक बनाए रखने में सफल हो जाता है। इसी अर्थ में विज्ञापन को 'जादुई दर्पण' भी कहा जाता है जिसमें प्रच्छन्नत: वह व्याख्या निहित है कि दैनंदिन जीवन की व्यवस्था असंतोषजनक है। विज्ञापन की फैंटेसी इससे ध्यान हटाने में मदद करती है।
प्रश्न उठता है कि विज्ञापन में इस तरह की 'ग्लैमरस' ्रूजदगी को बार-बार क्यों दोहराया जाता है? जॉन सिंक्लियर ने लिखा है कि विज्ञापन में ग्लैमरस ्रूजदगी की वस्तु के साथ प्रस्तुति का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विकास किया गया। इसका अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ है। इस प्रवृत्तिा का शीतयुध्दीय राजनीति से संबंध है। इसके प्रभाववश ही 'स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग', 'सिविलाइजेशन', या 'लाइफ स्टाइल' के रूपों और मुहावरों का प्रयोग शुरू हुआ। उसे समूची संस्कृति का पर्याय बनाकर पेश किया गया। यह शीतयुध्दीय राजनीति की समाजवाद विरोधी विचारधारा का केंद्रीय तत्व है। सन् 1950 के बाद समूची दुनिया में विज्ञापन-कला का तेजी से विकास हुआ। माध्यम सिध्दांतों का निर्माण हुआ। बड़े पैमाने पर औपनिवेशिक शोषण से मुक्त नव-स्वाधीन राष्ट्रों का जन्म हुआ। हिटलर की पराजय में सोवियत संघ की अग्रणी और निर्णायक भूमिका के कारण समाजवादी विचारों के प्रति विश्वव्यापी लहर पैदा हुई। अनेक देशों में समाजवादी परिवर्तनों को लागू करने से जीवन में गुणात्मक परिवर्तन देखे गए, खासकर रूस और चीन में। इसी संदर्भ में विज्ञापन के साथ जीवनशैली की प्रस्तुति को एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया गया। समाजवादी समाज में घट रहे परिवर्तनों ने पूंजीवादी दुनिया और जीवनशैली के प्रति असंतोष और अनास्था को झकझोर दिया था। ठीक इसी समय समाजवाद के खिलाफ विचारधारात्मक संघर्ष तेज करने और पूंजीवाद के प्रति आस्था पैदा करने के लिए जीवनशैली के 'ग्लैमरस' रूप को माल की बिक्री के साथ संप्रेषित किया गया। समाजवादी देशों के बारे में कहा गया कि वहां 
अधिनायकवाद है, अभाव है, एक जैसापन है, वहां कमिसार है, कंज्यूमर नहीं है। समाजवाद को सबसे बुरी सभ्यता के रूप में चित्रिात किया गया। जॉन सिंक्लियर ने लिखा कि वस्तु का जीवनशैली के साथ पेश किया जाना पूंजीवादी व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने की बृहत्तर योजना का एक अंग है। पूंजीवादी व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने के लिए विज्ञापनों में जहां एक ओर वर्गीय संरचना का लोप कर दिया गया, वहीं पर उपभोग को तरजीह दी गई। पूंजीवाद में नई जीवनशैली, सभ्यता और जीवन स्तर के उच्च रूपों को दिवा-स्वप्न के रूप में पेश किया जाता है। इसी संदर्भ में रेमंड विलियम्स ने विज्ञापन को 'पूंजीवादी समाज की आधिकारिक कला कहा था।' मिशेल सुंडसॉन ने कहा कि पूंजीवादी व्यवस्था ने विज्ञापन को 'सोवियत समाज की सामाजिक यथार्थवादी कलाओं के समकक्ष रखकर पेश किया।' अमेरिकी संस्कृति के प्रमुख इतिहासज्ञ जे. बोरस्टिन डेनियल ने लिखा कि विज्ञापन अमेरिकी सभ्यता की मुख्य धारा का अंग है और वह नए विश्व समाज की दिशा तय करने वाला तत्व भी है।34
जॉन सिंक्लियर ने लिखा कि विज्ञापन के माध्यम से विचारों की बिक्री अचानक ही नहीं है और न यह मात्रा व्यावसायिक उद्देश्य से की जा रही है, बल्कि विचारों और मूल्यों का चयन वस्तुओं और सेवाओं को सांस्कृतिक रूप में पेश करने के लिए किया जाता है। परिणामत: विज्ञापन का अर्थांतर विचारधारा में हो जाता है।
विज्ञापन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इससे जनता की 'स्व-निर्भर' इमेज को निर्मित किया। कल्याणकारी रूप को वेश्यावृत्ति माना और ग्लैमर और ऐंद्रिय सुख को ग्राहक का जीवन तत्व माना। जिस तरह पूंजीवाद कहता है कि मैं तुमको प्यार करता हूं, इसी धारणा की विज्ञापन में अभिव्यक्ति का रूप है मैं स्वयं को प्यार करता हूं। यही विज्ञापन की 'स्व-निर्भर' छवि है। यह मूलत: स्वार्थी प्रवृत्तिा है जो सिर्फ निजता पर बल देती है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि विज्ञापन में जीवनशैली का प्रयोग विशेष वैचारिक हितों की पूर्ति के लिए किया गया अत: उसे विचारधारा के रूप में देखना चाहिए। इस विचारधारा का दायरा जीवनशैली से लेकर अर्थव्यवस्था तक फैला हुआ है। भारत में ऐसे चिंतकों का अभी विकास नहीं हुआ है जो विज्ञापन की पूंजीवादी विचार-
धारा के संदर्भ में विश्लेषित करते हों। इसके विपरीत ऐसे लोग मिल जाते हैं जो यह तर्क देते हैं कि विज्ञापन का विचारधारा से कोई संबंध नहीं होता। वह तो सिर्फ वस्तु का विज्ञापन मात्रा है। ऐसे लोगों को मिलर जैसे पूंजीवादी विचारकों को पढ़ना चाहिए जो पूंजीवादी विचारधारा की संरचना में रखकर विज्ञापन को देखते हैं।
मिलर ने लिखा कि मुक्त व्यापार पर आधारित लोकतंत्रा के विकास में विज्ञापन का महत्वपूर्ण स्थान है, वह उसके भविष्य का प्रभावशाली तत्व है। वह बड़े उद्देश्य की पूर्ति करता है। यह उद्देश्य है वस्तुओं की बिक्री और सेवाओं को उपलब्ध कराना। मिलर ने लिखा कि मैं यह मानता हूं कि विज्ञापन संयोगवश एक और उद्देश्य की पूर्ति करता है जो हमारे समाज में वस्तु की बिक्री से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। ... इसका मतदाताओं को सूचना देने और चुनाव संपन्न कराने के साथ संबंध है। सूचना देने का कार्य जनमाध्यमों के बिना संभव नहीं है और मुक्त बाजार में व्यापार तब तक संभव नहीं है जब तक कि वह अपने ग्राहकों से वस्तुओं और सेवाओं का विज्ञापन के जरिए जनमाध्यमों से संप्रेषण न करे। यह स्थिति हमारी लोकतांत्रिाक जीवनशैली का विकास करती है। विज्ञापन उसका एक अंग है। मिलर ने लिखा कि मुक्त बाजार पर आधारित लोकतंत्रा के भविष्य को सुरक्षित रखने में विज्ञापन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अत: उसकी रक्षा की जानी चाहिए।
मिलर ने विज्ञापन के जिस कार्य को प्रधान उद्देश्य माना है वह उसका प्राथमिक उद्देश्य नहीं है, बल्कि वह उसका 'दोयम दर्जे' का उद्देश्य है। वह उपभोग का माहौल बनाए रखता है। मिलर ने जिसे संयोगवश घटित घटना माना है, यह संयोगवश घटित नहीं है। किसी भी वस्तु या सेवा को जब सांस्कृतिक रूप में ढाला जाता है तो विज्ञापन का विचारधारा में रूपांतरण हो जाता है। इसमें किन विचारों और मूल्यों का चयन होगा? उसका संकेत शब्द और संकेत चिद्द क्या होगा? किस तरह की जीवनशैली के साथ पेश किया जाएगा, मानव सभ्यता को किस रूप में पेश किया जाएगा, मानवीय आवश्यकताओं को किस रूप में पेश किया जाएगा, इत्यादि प्रश्नों का विज्ञापन निर्माता ध्यान देता है अत: विज्ञापन की विचारधारा नहीं होती, इस धारणा का कोई आधार नहीं है। विज्ञापन की विशेषता होती है कि वह साधारणत: दुनिया जैसी है उसे स्वीकार करता है और उसी को अतिरंजित रूप में पेश करता है।
समाजवादी विचारों के प्रभाववश सामूहिकता और वर्गीय आधार पर संगठित होने की तरफ लोगों का ध्यान गया था। विज्ञापन ने शीतयुध्दीय राजनीति के तहत वास्तव के बजाय काल्पनिक दुनिया का सपना पेश किया। समूह के बजाय व्यक्तिगत हीरो/हीरोइन/खिलाड़ी/धनाढय आदि को आरामदायक अवस्था के आदर्श रूप में पेश किया। वे ग्राहक के प्रेरक तत्व की भूमिका अदा करते हैं। वे ग्राहक के मन में आरामदायक जीवन का सपना जगाते हैं, बस, इसके लिए सिर्फ एक भाग्यशाली मौका हाथ लग जाना चाहिए। 'चांस' की धारणा का विज्ञापनों में, मासकल्चर के रूप में, प्रचार मूलत: अहंवाद को बढ़ाता है। यह अहंवाद व्यक्ति के अंदर यह प्रभाव पैदा करता है कि वह अपने आसपास के व्यक्तियों से घृणा औरर् ईष्या करने लगता है। खासकर उन लोगों के प्रति घृणा पैदा हो जाती है जो 'चांस' के सक्षम दावेदार हों। वह पूंजीवादी व्यवस्था का समर्थन करनेवाला मनोवैज्ञानिक तत्व है। यह मासकल्चर का अंग है। यही मासकल्चर इजारेदार पूंजी के इर्द-गिर्द व्यक्ति को इकट्ठा करती है।
आज भारत का समूचा विज्ञापन उद्योग पूरी तरह अमेरिकी बहुराष्ट्रीय संचार और विज्ञापन कंपनियों पर निर्भर है। इस निर्भरता ने हमें अमेरिकी संस्कृति के स्रोत से जोड़ दिया है। अमेरिकी समाज में बुर्जुआ प्रचार अभियान के पांच मिथ प्रचलित हैं। ये मिथ हमारे विज्ञापन में भी हैं। ये पांच मिथ हैंपहला, व्यक्तिवाद और व्यक्तिगत चयन का मिथ, दूसरा, तटस्थता का मिथ, तीसरा, मानवीय प्रकृति की अपरिवर्तनीयता का मिथ, चौथा, सामाजिक अंतर्विरोधों से दूर रहने का मिथ, पांचवां, बहुलवाद का मिथ। भारतीय विज्ञापनों का गंभीरता से अध्ययन करें तो पाएंगे कि व्यक्ति की 'प्रसन्नता' को 'धन' पर निर्भर के रूप में पेश किया जाता है। यह मूलत: पूंजीवादी व्यवस्था के आम निमय का ही पुनरुत्पादन है। इसमें जीवन का उद्देश्य होता है पैसा पैदा करना और स्वतंत्राता का अर्थ होता है व्यापार की आजादी, साथ ही, समानता को 'अवसर की समानता' के रूप में पेश किया जाता है। 'पर्सुएशन' और 'मेनीपुलेशन' के तत्व आज अमेरिकी रणनीति की धुरी भी हैं। इनके माध्यम से अमेरिकी रणनीति को सांस्कृतिक क्षेत्रा में उतारा जाता है, राजनीतिक क्षेत्रा में वर्चस्व रखा जाता है और अर्थनीति पर मजबूत पकड़ बनाए रखी जाती है।
प्रसिध्द अमेरिकी पत्राकार और इतिहासकार क्रिस्टोफर लीख ने लिखा है कि आज अमेरिकी नागरिक टैक्नोक्रेटिक इमेजों की दुनिया में जीते हैं, ये इमेज फोटोग्राफी, सिनेमा, टेलीविजन और अत्याधुनिक रिकार्डिंग मशीनों के जरिए पैदा की जाती हैं, पहले से तैयार शुदा इमेजों के कारण यथार्थ चेतना और यथार्थ इमेज को नजरअंदाज किया जा रहा है। इन सबके द्वारा भ्रमों की बाढ़ पैदा की जा रही है। उन्हें हमारे अनुभव में उतारा जा रहा है और अब वे सब अमेरिका का व्यापार हो गए हैं। जे. बोरिस्टन ने लिखा कि अमेरिकी माध्यमों से जो सूचनाएं और अर्ध्दसूचनाएं पेश की जाती हैं, वे न तो सच होती हैं और न झूठी किंतु 'विश्वासयोग्य' होती हैं।38 अत: अमेरिकी संस्कृति और विचारधारा की तरफ बढ़ते हुए भारतीय विज्ञापन और मासकल्चर के कदम मूलत: सामाजिक विभाजन और तनाव को तीव्रता ही प्रदान करेंगे।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

शीतयुद्ध में मुसलमानों के खिलाफ संघ और अमेरिका भाई भाई


साम्प्रदायिकता का आक्रामक उभार और विकास हमारे देश में शीतयुध्द के साथ तेजी से हुआ है। यह विश्व में उभर रही आतंकी-साम्प्रदायिक विश्व व्यवस्था का हिस्सा है। यह दिखने में लोकल है किंतु चरित्रगत तौर ग्लोबल है। इसकी ग्लोबल स्तर पर सक्रिय घृणा और नस्ल की विचारधारा के साथ दोस्ती है। याराना है। भारत में राममंदिर आंदोलन का आरंभ ऐसे समय होता है जब शीतयुद्ध चरमोत्कर्ष पर था।
      शीतयुद्ध के पराभव के बाद अमरीका ने खासतौर पर इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ हमलावर रूख अख्तियार किया है। इसके नाम पर अंतर्राष्ट्रीय मुहिम भी चल रही है, ग्लोबल मीडिया इस मुहिम में सबसे बड़ा उपकरण बना हुआ है। मुसलमानों और इस्लामिक देशों पर तरह-तरह के हमले हो रहे हैं। इस विश्वव्यापी इस्लाम -मुसलमान विरोधी मुहिम का संघ परिवार वैचारिक-राजनीतिक सहयोगी है। फलत: ग्लोबल मीडिया का गहरा दोस्त है।
बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियों और संघ परिवार ने इस्लाम धर्म और मुसलमानों को हमेशा विदेशी ,अनैतिक ,शैतान और हिंसक माना । इसी अर्थ में वे इस्लाम और मुसलमान के खिलाफ अपने संघर्ष को देवता अथवा भगवान के लिए किए गए संघर्ष के रूप में प्रतिष्ठित करते रहे हैं। अपनी जंग को राक्षस और भगवान की जंग के रूप में वर्गीकृत करके पेश करते रहे हैं। शैतान के खिलाफ जंग करते हुए वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उन तमाम राष्ट्रों के साथ हैं जो शैतानों के खिलाफ जंग चला रहे हैं। इस अर्थमें संघ परिवार ग्लोबल पावरगेम का हिस्सा है। चूंकि इस्लाम-मुसलमान ‘हिंसक’ होते हैं अत: उनके खिलाफ हिंसा जायज है,वैध है। हिंसा के जरिए ही उन्हें ठीक किया जा सकता है। वे मुसलमानों पर हमले इसलिए करते हैं जिससे हिन्दू शांति से रह सकें। हिन्दुओं के शांति से रहने के लिए मुसलमानों की तबाही करना जरूरी है और यही वह तर्क है जो जनप्रियता अर्जित करता जा रहा है। दंगों को वैध बना रहा है। दंगों को गुजरात में बैध बनाने में इस तर्क की बड़ी भूमिका है। 'शांति के लिए मुसलमान की मौत' यही वह साम्प्रदायिक स्प्रिट है जिसमें गुजरात से लेकर सारे देश में दंगों और दंगाईयों को वैधता प्रदान की गई है। यही वह बोध है जिसके आधार पर साम्प्रदायिक हिंसा को वैधता प्रदान की जा रही है।
     संघ परिवार पहले प्रतीकात्मक हमले करता है और बाद में कायिक हमले करता है। प्रतीकों के जरिए संघ परिवार जब हमले करता है तो प्रतीकों के दबाव में सत्ता को भी ले आता है। वे कहते हैं यदि एक हिन्दू मारा गया तो बदले में दस मुसलमान मारे जाएंगे। वे मौत का बदला और भी बड़ी भयानक मौत से लेने पर जोर देते हैं। वे मुसलमानों की मौत के जरिए व्यवस्था को चुनौती देते हैं। हिन्दुओं में प्रेरणा भरते हैं। व्यवस्था को पंगु बनाते हैं। अपने हिंसाचार को व्यवस्था के हिंसाचार में तब्दील कर देते हैं। साम्प्रदायिकता आज पिछड़ी हुई नहीं है। बल्कि आधुनिकता और ग्लोबलाईजेशन के मुखौटे में जी रही है। मोदी का विकास का मॉडल उसका आदर्श उदाहरण है। इस्लाम,मुसलमान के प्रति हिंसाचार, आधुनिकतावाद और भूमंडलीकरण ये चारों चीजें एक-दूसरे अन्तर्गृथित हैं। इस अर्थ में साम्प्रदायिकता के पास अपने कई मुखौटे हैं जिनका वह एक ही साथ इस्तेमाल कर रही है और दोहरा-तिहरा खेल खेल रही है।
      आज प्रत्येक मुसलमान संदेह की नजर से देखा जा रहा है। प्रत्येक मुसलमान को राष्ट्रद्रोही की कोटि में डाल दिया गया है। मुसलमान का नाम आते ही अपराधी की शक्ल, आतंकवादी की इमेज आंखों के सामने घूमने लगती है। कल तक हम मुसलमान को नोटिस ही नहीं लेते थे अब उस पर नजर रखने लगे हैं। इसे ही कहते हैं संभावित अपराधीकरण। इस काम को संघ परिवार और ग्लोबल मीडिया ने बड़ी चालाकी के साथ किया है। इसे मनोवैज्ञानिक साम्प्रदायिकता भी कह सकते हैं।
      साम्प्रदायिक दंगों को संघ परिवार साम्प्रदायिक दंगा नहीं कहता, बल्कि जबावी कार्रवाई कहता है। यही स्थिति भाजपा नेताओं की है वे भी साम्प्रदायिक दंगा पदबंध का प्रयोग नहीं करते। बल्कि प्रतिक्रिया कहते हैं। उनका तर्क है हिंसा हमेशा 'वे' आरंभ करते हैं। 'हम' नहीं। साम्प्रदायिक हिंसाचार अथवा दंगा कब शुरू हो जाएगा इसके बारे में पहले से अनुमान लगाना संभव नहीं है।  इसी अर्थ में दंगा भूत की तरह आता है। भूतघटना की तरह घटित होता है। दंगा हमेशा वर्चुअल रूप में होता है सच क्या है यह अंत तक नहीं जान पाते और दंगा हो जाता है। हमारे पास घटना के कुछ सूत्र होते हैं,संकेत होते हैं। जिनके जरिए हम अनुमान कर सकते हैं कि दंगा क्यों हुआ और कैसे हुआ। दंगे के जरिए आप हिंसा अथवा अपराध को नहीं रोक सकते। (संघ परिवार का यही तर्क है कि दंगा इसलिए हुआ क्योंकि मुसलमानों ने अपराध किया,वे हिंसक हैं) ,दंगे के जरिए आप भगवान की स्थापना अथवा लोगों की नजर में भगवान का दर्जा भी ऊँचा नहीं उठा सकते।
      दंगे के जरिए आप अविवेकपूर्ण जगत को विवेकवादी नहीं बना सकते।  मुसलमानों का कत्लेआम करके जनसंख्या समस्या का समाधान नहीं कर सकते। मुसलमानों को भारत में पैदा होने से रोक नहीं सकते। मुसलमानों को मारकर आप सुरक्षा का वातावरण नहीं बना सकते। मुसलमानों को पीट-पीटकर तटस्थ नहीं बनाया जा सकता। मुसलमानों की उपेक्षा करके ,उनके लिए विकास के सभी अवसर छीनकर भी सामाजिक जीवन से गायब नहीं कर सकते। हमें इस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा कि मुसलमान और इस्लाम धर्म हमारी वैविध्यपूर्ण संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। आप इस्लाम और मुसलमान के खिलाफ चौतरफा आतंक और घृणा पैदा करके इस देश में सुरक्षा का वातावरण और स्वस्थ लोकतंत्र स्थापित नहीं कर सकते।   
       मुसलमान और इस्लाम लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं है। लोकतंत्र को कभी अल्पसंख्यकों से खतरा नहीं हुआ बल्कि बहुसंख्यकों ने ही लोकतंत्र पर बार-बार हमले किए हैं। जिन दलों का बहुसंख्यकों में दबदबा है वे ही लोकतंत्र को क्षतिग्रस्त करते रहे हैं। आपात्काल, सिख जनसंहार,गुजरात के दंगे,नंदीग्राम का हिंसाचार आदि ये सभी बहुसंख्यकों के वोट पाने वाले दलों के द्वारा की गई कार्रवाईयां हैं। मुसलमानों के खिलाफ हिंसाचार में अब तक साम्प्रदायिक ताकतें कई बार जीत हासिल कर चुकी हैं। साम्प्रदायिक जंग में अल्पसंख्यक कभी भी जीत नहीं सकते बल्कि वे हमेशा पिटेंगे।
     



रविवार, 6 दिसंबर 2009

शीतयुध्द के बाद मीडिया की भूमिका - 2



आज जितने भी विवाद अस्मिता की राजनीति अथवा लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर उठ रहे हैं उनका सिर्फ राष्ट्रीय आधार ही नहीं है । उनका अंतर्राष्ट्रीय अन्तस्संबंध भी है। खासकर इलैक्ट्रोनिक मीडिया युग में ऐसे विवादों का प्रचार राष्ट्र की परिधि तक सीमित नहीं हैं। समाज में राजनीतिक विवाद होते हैं। राजनीतिक विवादों का होना एक स्वाभाविक चीज है। किंतु हिंसा का विवादों में आना स्वाभाविक चीज नहीं है। राजनीतिक विवादों में हिंसा को प्रश्रय अथवा हिंसा का सहारा वे तत्व लेते हैं जिनका विवाद सुलझाने से कोई लेना-देना नहीं होता । वे चीजों को जटिल बनाते हैं। समूचे वातावरण को विषाक्त बनाते हैं। विवाद,तर्क-वितर्क और हिंसाचार ये तीनों चीजें चक्राकार रूप में घूमती हैं और समाज को अस्थिर करती हैं। इससे सभी वर्ग के लोगों की क्षति होती है। राजनीतिक तनाव और असुरक्षा में इजाफा होता है। अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती है। राज्य तंत्र पंगु हो जाता है।
     राजनीतिक विवाद के समय मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मीडिया तटस्थ नहीं रहता। सवाल उठता है क्या मीडिया के द्वारा विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के प्रयासों को उभारा जा रहा है अथवा मीडिया अशांति बनाए रखने वाले प्रस्तावों को हवा दे रहा है। मीडिया सूचना दे रहा है अथवा प्रौपेगैण्डा तंत्र का काम कर रहा है ? मीडिया को विवाद के समय प्रौपेगैण्डा तंत्र बनने से बचना चाहिए। आग में घी का काम नहीं करना चाहिए। विवाद को गरमाने और टकराव पैदा करने का काम नहीं करना चाहिए। इससे सुरक्षा का वातावरण नष्ट होता है। असुरक्षा में इजाफा होता है। वैध सूचनाओं के अभाव में जनता के जानोमाल के लिए खतरा पैदा हो जाता है।
   विवाद के समय सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता सबसे बड़ी चीज है हर हालत में मीडिया को अपना कवरेज इसी तथ्य को ध्यान में रखकर तैयार करना चाहिए। विवाद में शामिल दोनों गुटों के प्रति निष्पक्ष रूख अख्तियार करना चाहिए। आमतौर पर विवाद के समय मीडिया तटस्थ नहीं रह पाता,शांति के अग्रदूत की भूमिका अदा नहीं कर पाता,इसके कई कारण हैं।
     पहला प्रधान कारण है मीडिया में पेशेवर प्रशिक्षित पत्रकारों का अभाव और पत्रकारों पर स्थानीय राजनीतिक दबाव। अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पत्रकार कवरेज तैयार करते हैं। दूसरा बड़ा कारण है आम जनता में साक्षरता का अभाव और लोकतंत्र की कमजोर नींव। जिन समाजों में लोकतंत्र कमजोर है , जनता में साक्षरता कम है,जनता के पास वैकल्पिक सूचनातंत्र का अभाव है वहां पर मीडिया तनाव में इजाफा करने में सफल हो जाता है। स्थानीय तनाव को पूरे राज्य और पूरे राष्ट्र में प्रसारित करने में सफल हो जाता है।
       भारत जैसे देश में जहां लोकतंत्र की मजबूत जड़ें हैं,अनेक मीडिया विकल्प हैं, वहां पर किसी भी पृथक्तावादी आंदोलन का सीमित क्षेत्रीय दायरे के बाहर प्रसारित करना असंभव है।एक अवधि के बाद इस तरह के आंदोलन ठंड़े पड़ जाते हैं। राजनीतिक तनाव के वातावरण में लोकतांत्रिकीकरण एकमात्र विकल्प है। इससे तनाव कम होता है।  हमारे देश में सन् 1977 के बाद से स्थानीय राजनीतिक तनाव कम हुए हैं। इसका प्रधान कारण लोकतांत्रिक संरचनाओं का विकास। लोकतांत्रिक संस्थाओं के त्रिस्तरीय ढ़ांचे का सख्ती से लागू किया जाना।
     देखना चाहिए जिस क्षेत्र में राजनीतिक तनाव पैदा हुआ है वहां किन लोगों के हित दांव पर लगे हैं। जिन लोगों के हित दांव पर लगे होते हैं तो वे बगावत पर आमादा हो जाते है, जब लोगों के पास लोकतांत्रिक विकल्प और संरचनाएं उपलब्ध नहीं होतीं ,उपलब्ध राजनीतिक संरचनाएं जनता की सेवा करने में असमर्थ हों तब तनाव पैदा होता है।
    त्रिपुरा में जनजाति इलाकों में तनाव था किंतु त्रिपुरा उपजाति परिषद के गठन के बाद तनाव गायब हो गया। देश में लंबे समय से पंचायती व्यवस्था ठप्प थी, इसके कारण व्यापक असंतोष था किंतु आज स्थिति वैसी नहीं है। इसका प्रधान कारण असंतोष को व्यक्त करने,समस्याओं के समाधान तलाशने में लोकतांत्रिक संरचनाओं से मदद मिली। जो असंतुष्ट थे उनके राजनीतिक हितों को संतोष मिला, उनके राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति हुई। तात्पर्य यह है कि लोकतांत्रिक समाधान राहत देते हैं।
      दूसरी महत्वपूर्ण है कि जब विवादास्पद गुट संघर्षरत हों तब मीडिया को शांतिपूर्ण संवाद कायम करने में मदद करनी चाहिए। स्थानीयस्तर पर विवादित गुटों में संवाद स्थापित करने में मीडिया सक्रिय भूमिका अदा सकता है। उन बिंदुओं को उभारा जाना चाहिए जो समझौते का आधार बन सकते हैं। जिन बिंदुओं पर लेन-देन हो सकता है। इसके अलावा सामाजिक असुरक्षा कम करने की कोशिश की जानी चाहिए।
तनाव क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवर पत्रकारों को पत्रकार ही रहना चाहिए उन्हें शांतिरक्षक अथवा प्रचारक की भूमिका अदा नहीं करनी चाहिए। पत्रकार का काम किसी खास समाधान का प्रचार करना नहीं है। संवाददाता का काम है विवादित गुटों के बीच के प्रस्तावों के सकारात्मक और नकारात्मक तत्वों को सामने लाना । जनता को शिक्षित करना। जनता में साझा समझ और साझा आधार तैयार करना। पत्रकार को स्वाभाविक आधार तैयार करना चाहिए जिस पर विवादित गुट आकर अपनी बात कह सकें। एक-दूसरे के बीच संवाद हो।
     आमतौर पर मीडिया अपनी रेटिंग बढ़ाने के चक्कर में संप्रेषण का साझा आधार बनाने की भूमिका त्याग देता है। विवादित गुटों में यदि कोई समझौता होता है तो मीडिया का काम है उस समझौते के परिपालन पर नजर रखना और आम जनता को उसके बारे में सूचनासम्पन्न बनाना। संवाददाता का काम किसी खास 'परिप्रेक्ष्य' का प्रचार करना नहीं है।
    विवाद क्षेत्र में पत्रकारों की सुरक्षा सबसे बड़ी समस्या है। विवादित इलाकों में उन पर बार-बार हमले होते  हैं। फलत: स्थानीय पत्रकारों को बड़े पैमाने पर अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। 'कमेटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट '' के अनुसार सन् 1994 से 2003 के बीच में 346 पत्रकार मारे गए। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए ऐसा वातावरण बनाया जाए जिसमें वे शांति के साथ अपना काम कर सकें। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए सबसे पहले उन्हें विपत्ति के समय काम करने की विशेष शिक्षा दी जानी चाहिए। 

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