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गुरुवार, 12 मई 2016

भारतीय परिवार और लोकतंत्र


         
भारतीय परिवार स्वभाव से अ-राजनीतिक और पुंसवादी है।परिवार का यह ढाँचा बदले इसकी ओर स्वाधीनता संग्राम में ध्यान गया।जिन परिवारों में लोकतांत्रिक राजनीतिक माहौल था वहाँ से जो राजनीति में आया उसकी राजनीतिक भूमिका बेहतर रही है।बेहतर से मतलब लोकतंत्र की मान्यताओं और संस्थाओं के निर्माण में ऐसे लोगों की बेहतर भूमिका रही है । सवाल है कि लोकतंत्र के निर्माण में परिवार की भी कोई भूमिका होती है क्या ? क्या लोकतंत्र के लिए परिवार को बदलने की ज़रुरत है या नहीं ? संघ परिवार ने ऐसे नेता दिए जो परिवारविहीन हैं। परिवारविहीन नेता सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ कम निबाहते हैं। सामाजिक विध्वंस ज़्यादा करते हैं !

पूरा परिवार राजनीति करे, यह संस्कार हमारे देश में स्वाधीनता संग्राम ने पैदा किया था । नेहरु परिवार आज़ादी की लड़ाई में तपा और बदला। गांधी परिवार ने नेहरु परिवार की इस विरासत की यथाशक्ति रक्षा की । गांधी परिवार की तरह कोई परिवार संघ के नेता क्यों नहीं पैदा कर पाए ? लोकतांत्रिक परिवार हो और राजनीतिक परिवार हो, यह स्वाधीनता संग्राम की देन है,आज़ादी के बाद कम्युनिस्टों,सोशलिस्टों और कांग्रेसियों ने लोकतांत्रिक-राजनीतिक परिवार की परंपरा का काफ़ी हद तक निर्वाह किया है । लोकतांत्रिक- राजनीतिक परिवार लोकतंत्र का स्वस्थ मूल्य है।संघ परिवार के नेता आए दिन गांधी परिवार पर जो हमले करते हैं वह असल में लोकतांत्रिक -राजनीतिक परिवार की संरचना पर हमले हैं। संघ परिवार चाहता है हमारे देश में लोकतांत्रिक-राजनीतिक परिवार न हों बल्कि उपभोक्ता परिवार हों ,जिनका अ-राजनीति की राजनीति में विश्वास हो। इस तरह के परिवार फासिज्म का आसानी से जनाधार बनते हैं ।नरेन्द्र मोदी इस तरह के परिवारों के लाड़ले हैं।

गांधी परिवार राजनीतिक परिवार है और लोकतंत्र के प्रति वचनवद्ध है। वे परिवार अच्छे हैं जो लोकतांत्रिक राजनीति करते हैं । कम से कम गांधी परिवार ने राजनीति के अलावा कोई धंधा नहीं किया ।

"संघ परिवार "और "गांधी परिवार" में कौन देशभक्त है ?किस "परिवार" ने देश के लिए क़ुर्बानियाँ दी हैं ?

परिवार पर बातें करते समय मेरा-तेरा परिवार करके न देखें । परिवार को एक संस्थान की तरह देखें। यह कहना सही नहीं है कि मेरा परिवार तो ठीक है और आपकी बातें हम पर लागू नहीं होतीं।

महाशय,हमारे आपके भद्रजनों के परिवार अंदर से पूरी तरह सड़ चुके हैं ।कभी आपको अंदर से दुर्गंध महसूस क्यों नहीं होती ? कभी परिवार को बदलने की मांग को लेकर हमारे आजाद देश में कोई जुलूस क्यों नहीं निकला ?

समाज को बदलने के लिए हमें अपना एजेण्डा बदलना होगा ।सरकार,पुलिस,नेता,भ्रष्टाचार,मनमोहन सिंह,कांग्रेस,भाजपा आदि के खिलाफ बोलना आसान है,जुलूस निकालना आसान है, लेकिन अपने परिवार के सड़े तंत्र के खिलाफ बोलना और जुलूस निकालना बेहद कठिन है।

हमसब कायर हैं और हमने लोकतंत्र के विभिन्न तंत्रों के आवरण में अपनी कायरता को छिपा लिया है , रेशनलाइज कर लिया है । लोकतंत्र के आवरण के बाहर निकलकर परिवार को खोलें और सड़कों पर,मीडिया में ,लोकसभा से लेकर पंचायतों तक बहस करें और समाधान खोजें ।

भारत को अपराधमुक्त बनाना है तो परिवार को अपराधमुक्त बनाओ। देश में लोकतंत्र लाना है तो परिवार में पहले लोकतंत्र स्थापित करो।फलतः देश में बहुत बडी मात्रा में अपराधों में गिरावट स्वतःमहसूस करेंगे । समाज में होने वाले अपराध हमारे परिवार के अंदर होने वाले अपराधों का ही विस्तार हैं ।

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रविवार, 12 अप्रैल 2015

भूरा के सर्जक


          मेरा जन्म परंपरागत परिवार में हुआ,घर में दादी का वर्चस्व था, वही परिवार की मुखिया थी और उसने ही परिवार के सभी महत्वपूर्ण फैसले लिए। मेरे निर्माण में मेरी माँ के अलावा दादी और बुआ की बहुत बड़ी भूमिका रही है। बचपन में स्त्रीमन को पढ़ने के सूत्र मुझे इन तीनों से ही मिले। परिवार की स्त्रियां बच्चे के मन को  रचती हैं । मैं 13-14 साल की उम्र से ही सुबह चार बजे उठ रहा हूँ। सुबह उठाने का काम माँ और दादी करती थी,इन दोनों की जिम्मेदारी थी कि मैं सुबह उठूँ और पढ़ूँ. वह सिलसिला आज तक बना हुआ है। मैं सुबह उठकर सो न जाऊँ इसलिए मुझे एक गिलास में  रोज चाय मिलती थी जिसमें तेज काली मिर्च हुआ करती थीं। बेहतर बात यह थी कि मेरे लिए एक छोटा कमरा अलग से बनवा दिया गया था जिसमें मैं अकेले सोता था,मेरे लिए एक रेडियो ,एक टेबिल लैंप, कुर्सी-टेबिल की व्यवस्था कर दी गयी थी ।   
      मेरा जन्म संयुक्त परिवार में हुआ था, जिस मकान में जन्म हुआ वह तीन आंगन का  था और उसमें आठ कमरे थे । लंबी छतें थीं। घर में एक भी पंखा नहीं था, एक छोटी सी घड़ी थी । परिवार के पालन-पोषण का आधार परंपरागत यजमानी थी । साथ में चर्चिका देवी के मंदिर से भी कुछ आमदनी हो जाती थी। मैंने जेएनयू में दाखिला लेने के पहले तक अधिकांश समय वे ही कपड़े पहने जो मंदिर पर चढ़ावे में आते थे। कभी-कभार मेरे लिए बाजार से लट्ठे का कपड़ा खरीदकर पायजामा बनवा दिया जाता था बाकी मंदिर पर चढ़े कपड़े के शर्ट या कुर्ता बनाकर पहनता था। संयोग की बात थी कि मेरे परिवार में और भी बच्चे थे लेकिन उन सबको बाजार से अच्छे कपड़े खरीदकर बनवाए जाते थे । मेरी माँ गूंगी और बहरी दोनों थी लेकिन देखने में बहुत सुंदर थी, वह जब तक जिंदा रही,मैं अधिकांश समय उसके ही साथ रहता था.वह अकेला छोड़ती ही नहीं थी,उसकी आंखों के सामने खेलना,कूदना, पतंगें उड़ाना, यमुना किनारे घाटों पर खेलना, नदी में नहाना,दोस्तों के साथ क्रिकेट और शतरंज खेलना आदि सब कुछ उसकी आंखों के सामने होता था। वह जब नानी के घर जाती थी तो अधिकांश समय अपने साथ लेकर जाती थी । एक तरह से वह छाया की तरह हमेशा साथ रहती थी। मैं एकमात्र स्कूल अकेले जाता था ,बाकी समय मेरे समय और साथ की मालिक मेरी माँ थी । मैं कल्पना ही नहीं कर सकता था कि वो रहेगी और मुझे अकेला छोड़ देगी । वह मुझे सब कुछ करने देती थी ,मैं जो चाहता था वह मुझे मिलता था,मेरी हर रुचि का ख्याल रखती थी। पिता चाहते थे कि मैं पंडिताई सीखूँ और अच्छा पंडित बनूँ ।जबकि पंडित बनना मेरी रुचि का अंग नहीं था लेकिन मैं नहीं जानता था कि मैं क्या बन सकता हूँ। यह संयोग की बात है कि सन्1976 में माँ की मृत्यु के बाद मैंने खेलना बंद कर दिया।   मैंने उसी साल शास्त्री की परीक्षा पास की थी।माँ की मृत्यु के एक सप्ताह पहले परीक्षा परिणाम आया था। वह बेहद खुश थी,उसके साथ हम फिल्म देखने गए थे।वह जब तक जिंदा रही जन्मदिन मनाया जाता था। वह मेरे शास्त्री होने पर बेहद खुश थी। उसकी मृत्यु ने परिवार की अपूरणीय क्षति की,मेरा बचपन एक ही झटके में गायब हो गया।
       मथुरा में घरों की बनाबट और स्थापत्यकला की यह विशेषता थी कि सारा शहर छतों से जुड़ा हुआ था। प्रत्येक मकान की छत एक-दूसरे से जुड़ी थी। यह विलक्षण बात थी कि मथुरा में आप छतों के जरिए सारा शहर घूमकर आ सकते थे । छत से छत का जुड़ने का अर्थ है पड़ोसियों के दिल मिले हुए हैं। इन दिनों छतों के बीच में दीवारें आ गयी हैं और दिलों में भी दीवारें हैं।
      गली दशावतार में घर होना बड़े सौभाग्य की बात थी,तकरीबन हर घर में कुँआ था और कई धर्मशालाएं थीं,गली के ठीक सामने यमुना किनारा और लोकप्रिय सतीघाट-सतीबुर्ज था।यह हमलोगों की पारिवारिक धरोहर भी है, पुरखों को कभी तीन घाट दान में मिले थे । नगरपालिका में आज भी पिता के नाम ये तीन घाट दर्ज हैं। मथुरा के घाटों की चर्चा फिर कभी। ये तीनों घाट मथुरा के पवित्रतम घाट विश्रामघाट के साथ जुड़े हैं।
    मेरे घर से सटा हुआ घर दयानंद सरस्वती के गुरु स्वामी विरजानंद सरस्वती का है, बचपन से मैं विरजानंद सरस्वती के किस्से सुनकर बड़ा हुआ। ठीक एक घर छोड़कर कानपुर वालों का घर है गली के नुक्कड़ पर उसमें एक जमाने में 'हरे राम हरे कृष्ण' सम्प्रदाय के संस्थापक संत वर्षों रहे, मैं बचपन में उनसे अनेकबार बालसुलभ बहसों में उलझ चुका हूँ । बचपन का सबसे सुंदर समय वह भी था जब प्रिय वैदिक विद्वान दत्तात्रेय कुंठे जी महाराज रोज मेरे मंदिर पर दर्शन करने आते थे और मैं उनको प्रणाम करता और वे मेरे पिता को प्रेरित करते कि मुझे सामवेदी होने के कारण सामवेद पढाया जाय। स्वयं दत्तात्रेयजी वेदों के विलक्षण विद्वान थे। उनसे मेरे पिता पढ़े थे, मैंने भी बचपन में उनकी कक्षाएं कीं, वेद पढ़े । बचपन का दूसरा रोचक समय वह  था जब करपात्री जी महाराज मथुरा आते थे और जितने दिन मथुरा रहते मेरे मंदिर दोपहर में दर्शन करने आते, पिता के साथ जमकर शास्त्रचर्चा करते ,आमतौर पर दोपहर में यह होता था, मैं हमेशा आश्चर्य के साथ करपात्री जी की बातें सुनता था और मजे लेता था, शास्त्रज्ञान तो एकदम नहीं था लेकिन उनकी बातों से मेरा मन बहुत बहलता था। उनकी बोलने की शैली बहुत ही मधुर और तार्किक हुआ करती थी। करपात्री जी मेरे पिता से बातें करते समय यदि मैं नजर नहीं आता था तो वे कहते थे कि बेटे को बुलाओ,आशीर्वाद दूँगा। इस चक्कर में मैं अपनी दोपहर की नींद से अनेक दिन वंचित हुआ और मुझे पांडित्य के साथ संवाद-विवाद की कला को सीखने का मौका मिला।
मजेदार बात यह है कि मैंने राहुल सांकृत्यायन की करपात्री जी के विचारों पर लिखी किताब रामराज्पय और मार्क्सवाद पढी नहीं थी उस समय लेकिन मैं उनसे सहमत नहीं था, जबकि मैं उनका करीबी था, रामराज्य परिषद की ओर से प्रचारकरते थे चुनावों में मुझे पता नहीं क्यों रामराज्य परिषद मनोरंजक दल लगता था ।
  यह भी रोचक घटना है राधामोहन चतुर्वेदी, कांग्रेसी नेता,बड़े स्वाधीनता सेनानी थे और हमारे मंदिर पर नियमित आते थे और उनसे भी जमकर पुरानी कहानियां सुनने को मिलती थीं, राधेश्याम चतुर्वेदी,एडवोकेट सोशलिस्ट थे और कैलाशनाथ चतुर्वेदी ठेकेदार,कम्युनिस्ट थे और ये सभी हमारे मंदिर पर आते थे,इनसे भी जमकर साम्यवाद और लोहिया के बचपन में किस्से सुने ।यह बचपन ही था जिसमें मनीराम बागड़ी जैसे सोशलिस्ट नेता को भी करीब से जानने और सुनने का मौका मिला। कांग्रेस के बड़े नेताओं में लक्ष्मीरमण आचार्य (यूपी के वित्तमंत्री) और दयालकृष्ण एडवोकेट (  यूपी में मंत्री बने ) नियमित हमारे मंदिर पर आते थे और उनसे रोचक राजनीतिक कहानियां सुनने और विवाद करने का मौका मिला । 
मेरे बचपन में मुश्किल यह थी कि मेरे मंदिर पर दर्शन करने आने वालों में संस्कृत के विद्वान बहुत आते थे और वे ही मेरे ज्ञान संचार और संवाद का आधार बने। कालान्तर में मुझे उन सभी विद्वानों से पढ़ने का मौका भी मिला। इस तरह प्राचीन ज्ञान परंपरा मुझे सहज ही घर बैठे मिल गयी। वैदिक विद्वानों में दत्तात्रेय कुंठे जी महाराज, लालनकृष्ण पंड्या,दर्शन के विद्वान सवलकिशोर पाठक, व्याकरण के विलक्षण विद्वान् बलदेव चतुर्वेदी ,संस्कृत साहित्य के वनमाली शास्त्री,कृष्णचन्द्र चतुर्वेदी और सिद्धात ज्यौतिष के प्रखर विद्वान संकटाप्रसाद उपाध्याय से तेरह वर्षों से प्रथमा से लेकर आचार्य पर्यंत श्री माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय में पढ़ने का मौका मिला। इसी कॉलेज में हिन्दी के शिक्षक मथुरानाथ चतुर्वेदी से प्रथमा से लेकर शास्त्री पर्यन्त हिन्दी पढ़ी। मथुरानाथ चतुर्वेदी राजनीतिक तौर पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक नेताओं में थे, वे मथुरा में जनसंघ के निर्विवाद नेता थे,उनसे राजनीतिक विषयों पर बातें करते हुए राजनीति का सबसे पहले परिचय हुआ और वे ही मुझे सोवियत समाजवादी साहित्य और वहां से प्रकाशित पत्रिकाएं नियमित दिया करते थे,माकपा नेता  सव्यसाची से तो बहुत बाद में आपातकाल में मुलाकात हुई ।दिलचस्प बात यह थी कि मथुरानाथ जी ने मुझे कभी आरएसएस का साहित्य पढ़ने को नहीं दिया और नहीं आरएसएस की विचारधारा मानने के लिए कहा,वे हमेशा सामान्य राजनीतिक विषयों पर राय व्यक्त करते थे और मैं आमतौर पर उनसे मतभिन्नता रखता था।         




बुधवार, 15 सितंबर 2010

एकनिष्ठ परिवार का ऐतिहासिक महाख्यान- फ्रेडरिक एंगेल्स -1-

      परिवार का यह रूप बर्बर युग की मध्यम तथा उन्नत अवस्थाओं के बीच के युग में युग्म-परिवार से उत्पन्न होता है। उसकी अंतिम विजय सभ्यता के युग के आरंभ होने का सूचक थी। एकनिष्ठ विवाह वाला परिवार पुरुष की प्रधानता पर आधारित होता है। उसका स्पष्ट उद्देश्य ऐसे बच्चे पैदा करना होता है जिनके पितृत्व के बारे में कोई विवाद न हो। यह इसलिए जरूरी होता है कि समय आने पर ये बच्चे अपने पिता के सीधे उत्तराधिकारियों के रूप में उसकी दौलत विरासत में पा सकें। युग्म-परिवार से एकविवाह परिवार इस माने में भिन्न होता है कि इसमें विवाह का संबंध कहीं ज्यादा दृढ़ होता है और दोनों में से कोई भी पक्ष उसे जब चाहे तब नहीं तोड़ सकता। अब तो नियम यह बन जाता है कि केवल पुरुष को ही विवाह के संबंध को तोड़ देने और अपनी पत्नी को त्याग देने का अधिकार होता है। अपनी पत्नी के प्रति वफादार न रहने का उसका अधिकार अब भी कायम रहता है, कम से कम रीति-रिवाज इस अधिकार को मान्यता प्रदान करते हैं (नेपोलियन की विधि संहिता में तो साफ तौर पर पति को यह अधिकार दिया गया है, बशर्ते कि वह अपनी रखैल को अपने घर के अंदर न लाए30) और समाज के विकास के साथ-साथ पुरुष इस अधिकार का अधिकाधिक प्रयोग करता है। लेकिन यदि पत्नी प्राचीन यौन-संबंधों की प्रथा की याद करके उन्हें फिर से लागू करना चाहे तो उसे पहले से भी अधिक सख्त सजा दी जाती है।
       परिवार के इस नए रूप को, ऐसी हालत में, जब उसमें जरा भी नरमी नहीं रह गई है, हम यूनानियों के बीच देखते हैं। जैसा कि मार्क्स ने कहा थायूनानियों की पुराणकथाओं में देवियों का जो स्थान है, वह उस पूर्व काल का प्रतिनिधित्व करता है जब स्त्रियों की स्थिति अधिक सम्मानप्रद और स्वतंत्र थी। लेकिन वीरगाथा काल में ही हम यूनानी स्त्रियों को, पुरुष की प्रधानता और दासियों की होड़ के कारण, निरादृत पाते हैं। 'ओडीसी' में आप पढ़ेंगे कि टेलेमाकस किस प्रकार अपनी मां को डांटकर चुप कर देता है। होमर की रचनाओं में यह वर्णन मिलता है कि जब कभी युवतियां युध्द में पकड़ी जाती हैं, तो वे विजेताओं की कामलिप्सा का शिकार बनती हैं। विजयी सेना के नायक अपने पदों के क्रमानुसार सबसे सुंदर युवतियों को अपने लिए छांट लेते हैं। यह सुविदित है कि 'इलियाड' महाकाव्य की पूरी कथावस्तु का केंद्रीय तत्व ऐसी ही एक दासी के बारे में एकिलीज और एगामेम्नोन का झगड़ा है। होमर की रचनाओं में प्रत्येक महत्वपूर्ण नायक के संबंध में एक ऐसी वंदिनी युवती का जिक्र आता है जो उसकी हमबिस्तर है और हमसफर भी। इन युवतियों को उनके मालिक अपने घर ले जाते हैं, जहां उनकी विवाहित पत्नियां होती हैं, जैसे कि ईस्खिलस का एग्गामेन्नोन कसांड्रा को अपने घर ले गया था। इन दासियों से जो पुत्र पैदा होते हैं, उनको पिता की जायदाद में से एक छोटा सा हिस्सा मिल जाता है और वे स्वतंत्र नागरिक समझे जाते हैं। तेलामोन का एक ऐसा ही जारज पुत्र त्यूक्रोस है, जिसे अपने पिता का नाम ग्रहण करने की इजाजत है। विवाहित पत्नी से उम्मीद की जाती थी कि वह इन सारी बातों को चुपचाप सहन करेगी और खुद कठोर पातिव्रत्य धर्म का पालन करेगी तथा पतिपरायण रहेगी। यह सच है कि वीरगाथा काल में यूनानी पत्नी का सभ्यता के युग की पत्नी से अधिक आदर होता था, लेकिन पति के लिए उसका केवल यही महत्व था कि वह उसके वैध उत्तराधिकारियों की मां है, उसके घर की प्रमुख प्रबंधकर्त्री है और उसकी उन दासियों की दारोगा है, जिनको वह जब चाहे अपनी रखैल बना सकता है और बनाता भी है। एकनिष्ठ विवाह के साथ-साथ चूंकि समाज में दासता भी प्रचलित थी और सुंदर दासियां पूर्णत: पुरुष की संपत्ति होती थीं, इसलिए एकनिष्ठ विवाह पर शुरू से ही यह छाप लग गई कि वह केवल नारी के लिए एकनिष्ठता है, पुरुष के लिए नहीं। और आज तक उसका यही स्वरूप चला आया है।
जहां तक वीरगाथा काल के बाद के यूनानियों का सवाल है, हमें डोरियनों और आयोनियनों में भेद करना चाहिए। कई बातों में डोरियन लोगों में, जिनकी ठेठ मिसाल स्पार्टा है, होमर द्वारा वर्णित वैवाहिक संबंधों से भी अधिक प्राचीन संबंध मिलते हैं। स्पार्टा में हम एक ढंग का युग्म-विवाह पाते हैं, जिसे वहां के राज्य ने प्रचलित विचारों के अनुसार थोड़ा परिवर्तित कर दिया था। युग्म-विवाह का वह एक ऐसा रूप है, जिसमें यूथ-विवाह के भी अनेक अवशेष मिलते हैं। जिस विवाह से संतान नहीं होती थी उसे भंग कर दिया जाता था। राजा अनेक्सांद्रिदस ने (560 ई.पू. के लगभग) एक दूसरा विवाह किया, क्योंकि उसकी पहली पत्नी से संतान नहीं हुई थी और इस प्रकार दो गृहस्थियां कायम रखीं। इसी काल के एक और राजा एरिस्टोनस ने अपनी पहली दो बांझ पत्नियों के अलावा एक तीसरी स्त्री से विवाह किया था लेकिन उसने पहली दो पत्नियों में से एक को अपने यहां से चले जाने दिया था। दूसरी ओर, कई भाई मिलकर एक सामूहिक पत्नी भी रख सकते थे। यदि किसी को अपने मित्र की पत्नी पसंद आ जाती थी, तो वह भी हिस्सेदार हो सकता था। बिस्मार्क के शब्दों में, और किसी कामुक 'सांड़' के आ जाने पर, यदि वह सहनागरिक नहीं हो तो भी, अपनी पत्नी को उसके उपभोग के लिए प्रस्तुत करना उचित समझा जाता था। शोमान के अनुसार, प्लुटार्क की वह कथा और भी अधिक यौन-स्वच्छंदता की ओर इंगित करती है, जिसमें स्पार्टा की एक स्त्री अपने एक प्रेमी को, जो उसके पीछे पड़ा हुआ था, अपने पति से बात करने को भेज देती है। इस प्रकार, वास्तविक व्यभिचार, यानी पति की पीठ पीछे पत्नी का किसी और पुरुष के साथ यौन-संबंध उन दिनों सुनने में नहीं आता था। दूसरी ओर, स्पार्टा में कम से कम उसके उत्कर्ष काल में घरेलू दासप्रथा नहीं थी। स्पार्टियेटों में हीलोटों की स्त्रियों के साथ संभोग करने का कम प्रलोभन होता था, क्योंकि हीलोट लोग अलग बस्तियों में रहते थे। यदि इन सब परिस्थितियों में स्पार्टा की नारियां यूनान की और सब नारियों से अधिक सम्मान और आदर की पात्र समझी जाती थीं तो यह स्वाभाविक था। प्राचीन युग के लेखक यूनानी स्त्रियों में केवल स्पार्टा की नारियों और एथेंस की विशिष्ट हैटेराओं को ही इस काबिल समझते थे कि उनका जिक्र आदर के साथ करें, उनकी उक्तियों को अपनी रचनाओं में स्थान दें।
आयोनियन लोगों में हालत बिलकुल भिन्न थी जिनका लाक्षणिक उदाहरण एथेंस था। वहां लड़कियों को केवल कातना-बुनना और सीना-पिरोना सिखाया जाता था। बहुत हुआ तो वे थोड़ा पढ़ना-लिखना भी सीख लेती थीं। उन्हें करीब-करीब परदे में रखा जाता था और वे केवल दूसरी स्त्रियों से ही मिल-जुल सकती थीं। जनानखाना घर का एक खास और अलग हिस्सा होता था। यह आम तौर पर ऊपर की मंजिल पर या मकान के पिछले हिस्से में होता था। यहां पुरुषों की, खास तौर पर अजनबियों की आसानी से पहुंच नहीं हो सकती थी। जब मेहमान आते, औरतें वहां चली जाती थीं। स्त्रियां अकेले और बिना एक दासी को साथ लिए बाहर नहीं जाती थीं। घर में उन पर पहरा सा रहता था। एरिस्टोफेनस कहता है कि व्यभिचारियों को पास न फटकने देने के लिए मोलोस्सियन कुत्ते घर में रखे जाते थे और, कम से कम एशिया के शहरों में, औरतों पर पहरा देने के लिए हिजड़े रखे जाते थे। हेरोडोटस के काल से ही कियोस द्वीप में बेचने के लिए हिजड़े बनाए जाते थे। वाक्समुथ का कहना है कि वे केवल बर्बर लोगों के लिए ही नहीं बनाए जाते थे।यूरिपिडीज में पत्नी को ओइकुरेमा यानी गृह-प्रबंध के लिए एक वस्तु (यह शब्द नपुंसक लिंग का है) की संज्ञा दी गई है क्योंकि बच्चे पैदा करने के सिवा एक एथेंसवासी की दृष्टि में पत्नी का महत्व प्रमुख नौकरानी से अधिक कुछ नहीं था। पति अखाड़े में जाकर कसरत करता था, सार्वजनिक जीवन में भाग लेता था, पर इस सबसे पत्नी को अलग रखा जाता था। इसके अलावा उसके पास दासियां भी होती थीं और एथेंस के उत्कर्ष काल में तो वहां बड़े व्यापक रूप में वेश्यावृत्ति भी होती थी। कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि इसे राज्य की तरफ से बढ़ावा मिलता था। इस वेश्यावृत्ति के आधार पर ही यूनान का वह एकमात्र प्रसिध्द नारी वर्ग विकसित हुआ था। यह अपने बुध्दिबल और कलाप्रेम के कारण प्राचीन काल की नारियों के साधारण स्तर से उतना ही ऊपर उठ गया था, जितना ऊपर स्पार्टा की नारियां अपने चरित्र के कारण उठ गई थीं। एथेंस की पारिवारिक व्यवस्था पर इससे भयंकर इलजाम और क्या लगाया जा सकता है कि सही मानों में नारी बनने के लिए पहले हैटेरा बनना पड़ता था।

सोमवार, 13 सितंबर 2010

परिवार के अंदर और बाहर का समाज

      आज परिवार की संरचना सबसे ज्यादा संकटग्रस्त है। कोई परिवार नहीं है जहां संकट न हो। सवाल यह है  क्या परिवार स्थिर संरचना है ? अपरिवर्तनीय संरचना है अथवा परिवार की संरचना में बदलाव आते रहे हैं। परिवार बनाने और परिवार बचाने के नाम पर निरंतर हिंसाचार हो रहा है और औरतों पर हमले बढ़े हैं। विभिन्न बहानों से औरतों के अधिकारों में कटौती की पुंसवादियों ने मुहिम छेड़ दी है। ऐसे में एकबार परिवार  और उससे जुड़े बुनियादी सवालों पर विचार कर लेना समीचीन होगा।
      फ्रेडरिक एंगेल्स ने ‘परिवार,निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ नामक किताब में लिखा है ‘‘मौर्गन कहते हैं : 'परिवार एक सक्रिय स्रोत है। वह कभी भी जड़ और स्थिर नहीं होता, बल्कि निम्न रूप से सदा उच्चतर रूप की ओर अग्रसर होता है। यह उसी प्रकार है जिस तरह पूरा समाज निम्न से उच्च्तर अवस्था की ओर बढ़ता है। इसके विपरीत, रक्त-संबध्दता की व्यवस्थाएं निष्क्रिय हैं। परिवार ने जो प्रगति की है, उसे ये व्यवस्थाएं बहुत बाद में जाकर व्यक्त करती हैं। ये मौलिक रूप से तभी बदलती हैं, जब परिवार में मौलिक परिवर्तन हो चुका होता है।' मार्क्स इस पर कहते हैं : 'और यही बात राजनीतिक, कानूनी, धार्मिक तथा दार्शनिक प्रणालियों पर भी लागू होती है।' परिवार तो जीवित अवस्था में रहता है, लेकिन रक्त-संबद्धता की व्यवस्था जड़ीभूत हो जाती है। रक्त-संबद्धता की व्यवस्था जबकि रूढ़िबद्ध रूप में विद्यमान रहती है, परिवार विकसित होकर उसके चौखटे से बाहर निकल आता है।’’  यह बात आज भी सच है कि परिवार आगे निकल गया है,इसके बावजूर रक्त संबंधों पर आधारित गोत्र व्यवस्था अभी भी जड़ रूप में मौजूद है और उसके खाप पंचायत जैसे हिमायती भी हैं। वे परिवार को देख नहीं रहे हैं वे गोत्र को देख रहे हैं।
     खाप पंचायत वाले जिस तरह परिवार और गोत्र की व्यवस्था के बारे में शुद्धतावादी नजरिए से बातें कर रहे हैं उसे देखकर आश्चर्य होता है कि अपने गोत्र के अतीत को भी वैज्ञानिक ढ़ंग से देखना नहीं चाहते। वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि मानव सभ्यता में ,मानव संबंधों में,गोत्र के संबंधों में आदिकाल में कोई अनियंत्रित यौन संबंध नहीं थे। सामाजिक विकास के क्रम में एकनिष्ठ यौन संबंध बहुत बाद की अवस्था में पैदा हुए हैं। खाप पंचायत वाले यौन सभ्यता के इतिहास और उसकी सम्मिश्रण की प्रक्रिया को ठुकरा रहे हैं। ऐसी स्थिति में एक बार एंगेल्स को याद करना बेहतर होगा।
     एंगेल्स के अनुसार ‘‘कुछ दिनों से यह कहना एक नैतिक शुध्दतावादी फैशन सा हो गया है कि मानवजाति के यौन-जीवन के इतिहास में इस प्रारंभिक अवस्था का अस्तित्व ही न था। उद्देश्य यह है कि मानवजाति इस 'कलंक' से बच जाए। कहा जाता है कि ऐसी अवस्था का कहीं कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं मिलता। इसके अलावा, खास तौर पर बाकी पशुलोक की दुहाई दी जाती है। इसी प्रेरणावश लेतूर्नो ने ('विवाह और परिवार का विकास', 1888) ऐसे बहुत से तथ्यों को जमा किया जिनसे सिध्द होता था कि पशुलोक में भी नीचे की अवस्था में ही पूर्ण रूप से अनियंत्रित यौन-संबंध पाए जाते हैं। लेकिन इन तमाम तथ्यों से मैं केवल एक ही परिणाम निकाल सकता हूं। वह यह कि जहां तक मनुष्य का और उसकी आदिम जीवनावस्था का संबंध है, इन तथ्यों से कुछ भी सिध्द नहीं होता। यदि कशेरुकी पशु लंबे समय तक युग्म-जीवन व्यतीत करते हैं तो इसके पर्याप्त शरीरक्रियात्मक कारण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, पक्षियों में मादा को अंडे सेने के दिनों में मदद की जरूरत होती है। वैसे भी पक्षियों में दृढ़ एकनिष्ठ परिवार के उदाहरणों से मनुष्य के बारे में कुछ भी सिध्द नहीं होता क्योंकि मनुष्य पक्षियों के वंशज नहीं हैं। यदि एकनिष्ठ यौन-संबंध को ही नैतिकता की पराकाष्ठा समझा जाए तो हमें टेपवर्म को सर्वश्रेष्ठ समझना चाहिए। इसके शरीर में 50 से 200 तक देहखंडों में से प्रत्येक में नर और मादा दोनों प्रकार का पूरा लैंगिक उपकरण होता है। इसका पूरा जीवन इन खडों में से प्रत्येक में, स्वयं अपने साथ सहवास करने में बीतता है। लेकिन यदि हम केवल स्तनधारी पशुओं पर विचार करें, तो हमें उनमें हर प्रकार का यौन-जीवन मिलता है अनियंत्रित यौन-संबंध, यूथ-संबंध के चिह्न, एक नरपशु का अनेक मादापशुओं से यौन-संबंध और एकनिष्ठ यौन-संबंध। केवल एक रूप, एक मादापशु का अनेक नरपशुओं से यौन-संबंध उनमें नहीं मिलता। इस रूप तक केवल मनुष्य ही पहुंच सके। हमारे निकटतम संबंधी, चौपाया प्राणियों में भी, नर और मादा के संबंधों में हद दर्जे की विभिन्नता पाई जाती है। और यदि हम अपने दायरे को और भी सीमित करना चाहें और केवल चार तरह के पुरुषाभ वानरों पर विचार करें, तो लेतूर्नो से हमें ज्ञात हो सकता है कि वे कभी एकनिष्ठ यौन-जीवन व्यतीत करते हैं तो कभी बहुनिष्ठ। सोस्सुर, जिन्हें जिरो-त्यूलों ने उध्दृत किया है, कहते हैं कि वे एकनिष्ठ ही होते हैं। हाल में प्रकाशित 'मानव विवाह का इतिहास'(लंदन, 1891) में वेस्टरमार्क के इस दावे को भी कि पुरुषाभ वानरों में एकनिष्ठ यौन-जीवन की प्रवृत्ति पाई जाती है, कोई बहुत बड़ा सबूत नहीं माना जा सकता। संक्षेप में, ये सारे तथ्य इस प्रकार के हैं कि ईमानदार लेतूर्नो को स्वीकार करना पड़ता है कि 'स्तनधारी पशुओं में बौध्दिक विकास के स्तर तथा यौन-संबंध के रूप में कोई निश्चित संबंध नहीं पाया जाता।' और एस्पिनास ('पशु समाज', 1877) तो साफ-साफ कहते हैं कि 'पशुओं में दिखाई पड़ने वाला सर्वोच्च सामाजिक रूप यूथ होता है। लगता है कि यूथ परिवारों को मिलाकर बना है लेकिन शुरू से ही परिवार और यूथ के बीच एक विरोध बना रहता है, वे एक दूसरे के उल्टे अनुपात में विकसित होते हैं।' बुनियादी बात है यूथ और परिवार के बीच का अन्तर्विरोध। जो आज भी बना हुआ है समस्या यह है कि इसे किस तरह हल किया जाए।



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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...